सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने असम में सत्र भूमि को अतिक्रमण से मुक्ति दिलाने की बड़ी पहल की है। पूर्वोत्तर राज्य असम में कई वैष्णव मठ हैं जिन्हें सत्र कहा जाता है। इनकी स्थापना असमिया संत श्रीमंत शंकरदेव और उनके शिष्यों माधवदेव, हरिदेव और दामोदरदेव ने 15वीं और 16वीं शताब्दी में की थी।
सत्र एक आध्यात्मिक संस्था है और राज्य में पारंपरिक साहित्य, संगीत और अन्य सांस्कृतिक का केंद्र रहा है। आम तौर पर सत्र भूमि में एक बड़ा प्रार्थना कक्ष, स्नान कक्ष, शयनगृह और अतिथि गृह होते हैं।
असम के सत्र ( फाइल फोटो, साभार- पर्यटन विभाग, असम सरकार )
राज्यभर में करीब 900 सुत्रा है जो चारों ओर फैले हुए हैं। ये लोग सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े हुए हैं। इनमें औनियाती, कमलाबारी, दखिनपत, गरमुर, बेंगनाती, समागुरी और नतुन कमलाबारी शामिल हैं।
सैकड़ों वर्षों से राजाओं और स्थानीय हिंदुओं ने सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक प्रचार के लिए सत्रों को भूमि दान में देते आ रहे हैं। इन जमीनों को ‘सत्र भूमि’ के रूप में जाना जाता है। इसका उल्लेख आधिकारिक भूमि अभिलेखों में भी है।
इस सत्र भूमि का इस्तेमाल भिक्षुओं की मदद और धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यों में होता था। असमिया पहचान को बनाए रखने में सत्र आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सत्र भूमि पर कब्जा
पूरे असम में सत्र भूमि के बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा हो चुका है। सत्र भूमि की समस्याओं की समीक्षा और मूल्यांकन के लिए बने आयोग ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि असम के 11 जिलों में 303 सत्रों की 15,288.52 बीघा (1,898 हेक्टेयर से अधिक) भूमि पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया है।
सीएम हेमंता बिस्वा सरमा ने कहा है कि बोंगाईगांव, माजुली, डिब्रूगढ़, नागांव, बाजाली, कामरूप, लखीमपुर और धुबरी जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण किया गया है। राजधानी दिसपुर के आकार से दोगुने क्षेत्रों पर अतिक्रमण कर लिया गया है।
An area twice the size of our capital Dispur! Yes, that's the magnitude of Satra land encroached upon in Assam.
The sheer scale of encroachment of the Satras is a direct assault on Assam's culture and identity.
सरमा ने ट्वीट किया, “हमारी राजधानी दिसपुर से दोगुना बड़ा क्षेत्र! हां, असम में सत्र भूमि पर अतिक्रमण का यह परिणाम है। सत्रों पर अतिक्रमण का विशाल पैमाना असम की संस्कृति और पहचान पर सीधा हमला है।”
Happy to receive interim report of Commission for Review & Assessment of Problems of Satra Lands in Assam led by Hon’ble MLA Shri Prodip Hazarika.
The Commission visited 62 satras to prepare the report, which we’ll study before deciding on next course of action. pic.twitter.com/9OwtQCtQRi
जनसांख्यिकीय परिवर्तन, भू-माफिया की संलिप्तता और राजनीतिक संरक्षण जैसे कारकों ने इस खतरे को बढ़ाने में योगदान दिया है। उन्होंने अवैध अतिक्रमण से सख्ती से निपटने का प्रण लिया है।
असम सरकार ले रही है भूमि वापस
हाल के वर्षों में, असम में हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने सत्र भूमि को अवैध कब्जे से मुक्ति दिलाने में अहम भूमिका निभाई है। नवंबर 2021 में इसको लेकर एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। इसे ‘असम में सत्र भूमि की समस्याओं की समीक्षा और आकलन के लिए आयोग (CRAPSLA) कहा जाता है। आयोग में असम के तीन विधायक प्रदीप हजारिका, रूपक सरमा और मृणाल सैकिया शामिल थे।
Our Satriya culture has been passed on through generations and is a living example of Assam's rich history.
Have you wondered what are the essentials of this dance form? Let me introduce it to you~
Sattriya Paag (The headgear) Bortaal (The cymbal) Khol Khorom Devotional Book pic.twitter.com/KTFrUS0MBA
एक साल बाद दिसंबर 2022 में, CRAPSLA ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट हिमंत बिस्वा सरमा को सौंपी। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने असम के 62 सत्रों का दौरा किया और अवैध अतिक्रमणों की जाँच की। आयोग का कार्यकाल आगे बढ़ाया गया ताकि अधिक प्रभावित सत्रों का दौरा किया जा सके।
9 जून 2023 को CRAPSLA ने अपनी अंतिम रिपोर्ट हेमंत बिस्वा सरमा को सौंपी। आयोग ने 126 सत्रों का दौरा किया, अपना विस्तृत मूल्यांकन दिया और नीतिगत कार्रवाई के लिए सिफारिशें की।
असम के मुख्यमंत्री ने कहा, “यह रिपोर्ट सत्र भूमि पर कब्जे की पूरी जानकारी देती है। सरकार निष्कर्षों की गहन जाँच करेगी और सिफारिशों पर कार्रवाई करेगी।” उन्होंने एक वर्ष के भीतर एक स्थायी सत्र आयोग के गठन की भी घोषणा की। आयोग के पास प्रशासनिक स्वायत्तता, न्यायिक अधिकार और राज्य में सत्रों की आर्थिक मदद के लिए वित्तीय अनुदान होगा।
सीएम सरमा ने कहा, “आयोग को संस्थागत बनाने के लिए सितंबर या फरवरी के विधान सत्र में एक कानून पेश किया जाएगा। यह सत्र संस्थानों की सुरक्षा और आधुनिकीकरण के लिए 25 साल का विजन तैयार करेगा।”
अतिक्रमण करने वालों पर होगा एक्शन
दिसंबर 2022 में CRAPSLA की अंतरिम रिपोर्ट प्रकाशित होने के तुरंत बाद असम सरकार एक्शन में दिखी। सरकार ने नागाँव जिले में श्रीमंत शंकरदेव के जन्मस्थान के पास 1000 बीघा भूमि को अतिक्रमण से मुक्त करवाया।
असम सरकार ने फरवरी 2023 में गोपाल अता सत्र के पास 55 बीघा कब्जे वाली जमीन वापस ली। जुलाई 2024 में इसी तरह के अतिक्रमण हटाओ अभियान से सत्र को 34 बीघा भूमि वापस मिली।
Minorities should respect the traditions and customs of the indigenous people and not try to create a conflict by building Masjids near Satras and occupying Satra land.
Dhubri, Barpeta, etc. are an example of such templates and we should not let this be repeated. pic.twitter.com/94qSPcO6j9
अगस्त 2024 में हिमंता सरकार ने 250 साल से ज्यादा पुराने हेरिटेज संस्थानों के 5 किलोमीटर के दायरे में बाहरी लोगों को जमीन खरीदने पर रोक लगा दिया। इसके लिए ‘असम भूमि और राजस्व विनियमन (दूसरा संशोधन) विधेयक’ पारित किया। इसके अलावा सत्र को आर्थिक सहायता देने की भी घोषणा की।
असम सरकार ने अक्टूबर 2024 में सत्रों को भूमि दिए जाने और कानूनी रूप से कोई दिक्कत न हो, इसके लिए ‘मिशन बसुंधरा 3.0’ के तहत कई उपाय किए।
हेमंता विस्वा सरमा ने इस ओर इशारा किया कि मस्जिदों का निर्माण सत्र की जमीन पर हो रहा है साथ ही सत्र संस्कृति को नुकसान पहुँचाने के लिए बीफ खाया जा रहा है।
उन्होंने कहा, “जब सत्र के पास गाय का मांस खाया जाता है और मस्जिद से अज़ान की आवाज सत्र के कार्यक्रमों को बाधित करती है।” उन्होंने कहा कि ऐसी गतिविधियाँ सत्रों से 10 किलोमीटर दूर की जा सकती हैं।
भाजपा 2016 की शुरुआत में ही सत्र की भूमि पर अतिक्रमण का मुद्दा उठाती रही है, जबकि कॉन्ग्रेस शासन ने इसे ‘सरकार की साजिश’ करार दिया है।
पिछले 9 वर्षों में, भाजपा सरकार (अब एक मिशन मोड में) सत्रों को उसकी भूमि वापस दिलाने के काम में लगी हुई है।
अमेरिकी के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार (25 जून 2025) को नीदरलैंड में नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष के खत्म होने की बात कही। हालाँकि साथ में ही ये कहना नहीं भूले कि अगर फिर से युद्ध जैसी स्थिति बनती है तो अमेरिका इस जंग का हिस्सा एक बार फिर से बनेगा।
नाटो की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने ईरान के साथ बातचीत कर समझौते पर हस्ताक्षर करने की बात कही। हालाँकि ट्रंप का ये भी मानना है कि ये जरूरी नहीं है। बातचीत को लेकर ईरान की ओर से कोई टिप्पणी सामने नहीं आई है।
उन्होंने कहा, “हम अगले सप्ताह ईरान के साथ बातचीत करने जा रहे हैं, हम एक समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। पर मुझे नहीं लगता कि यह आवश्यक है।” इस दौरान ट्रंप ने इस बात पर अधिक जोर दिया कि अमेरिका के हमलों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम तबाह हो गया है।
ट्रंप ने ईरान के परमाणु सुविधाओं पर अमेरिकी हमलों की तुलना जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर हुए हमले से की है। अपने बयान में ट्रंप ने कहा, “अगर आप हिरोशिमा या नागासाकी को याद कर पाएँ तो की आपको पता लगेगा कि इससे भी युद्ध खत्म होता है।” ट्रंप ने आगे कहा कि इससे युद्ध का अंत एक अलग तरीके से हुआ पर यह बहुत भयानक और विनाशकारी था।
इस दौरान ट्रंप ने अपने उसे दावे पर सफाई भी पेश की जिसमें उन्होंने यह कहा था कि बंकर- बस्टिंग बमों के जरिए अमेरिका ने ईरान के अंडरग्राउंड बने दो न्यूक्लियर फैसिलिटी को ध्वस्त किया था।
अमेरिकी क्लासिफाइड इंटेलिजेंस रिपोर्ट की मानें तो ईरान पर हुए अमेरिकी हमले से ईरान का परमाणु प्रोग्राम काफी पीछे खिसक गया है। ईरान के विदेश मंत्रालय की ओर से भी इस बात की पुष्टि की गई है कि इन हमलों से परमाणु ठिकानों को काफी नुकसान पहुँचा है।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने बुधवार को इसकी जानकारी दी है। नाटो शिखर सम्मेलन में ही ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान परमाणु कार्यक्रम को आगे नहीं बढ़ाएगा। लेकिन ईरान ने यह साफ तौर पर कहा है कि अपने परमाणु कार्यक्रम से गए पीछे नहीं हटेंगे।
ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच 22 जून 2025 को अमेरिकी सेना ने ईरान के नतांज, इस्फहान और फोर्डो के तीन परमाणु ठिकानों पर बमों से हमला किया था। जवाबी हमले में ईरान ने कतर, सीरिया और इराक में बने अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हमला किया था। इसके बाद ट्रंप ने ईरान-इजरायल के बीच सीजफायर का एलान कर दिया था।
अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA के डायरेक्टर जॉन रैटक्लिफ ने बुधवार (25 जून 2025) को बताया कि अमेरिका ने हाल ही में ईरान पर जो हवाई हमले किए थे, उनसे ईरान के परमाणु ठिकानों को बहुत तगड़ा नुकसान हुआ है। ये नुकसान ऐसा है कि इसका असर लंबे समय तक दिखेगा।
पहले कुछ खबरों में कहा गया था कि इन हमलों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ा, लेकिन CIA ने इस बात से साफ इनकार कर दिया है। रैटक्लिफ का कहना है कि उनके पास पक्की खबर है कि ‘ईरान की कई अहम परमाणु सुविधाएँ पूरी तरह से बर्बाद हो गई हैं और उन्हें फिर से बनाने में कई साल लग जाएँगे।’
खुफिया एजेंसी का पक्का दावा
CIA के डायरेक्टर जॉन रैटक्लिफ ने बताया, “हमारी टीम के पास पक्की जानकारी है कि हाल ही में जो हमले हुए, उनसे ईरान का परमाणु कार्यक्रम बुरी तरह से बर्बाद हो गया है।”
डायरेक्टर ने आगे कहा, “हमें जानकारी मिली है कि ईरान की कई खास परमाणु जगहें पूरी तरह खत्म हो गई हैं और उन्हें दोबारा बनाने में कई साल लग जाएँगे।”
‘पुख्ता सबूत’ देने का वादा
ट्रंप ने कहा अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ गुरुवार (26 जून 2025) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पक्के सबूत दिखाएँगे। ऐसा करने से अमेरिकी सेना जवानों का हौसला बढ़ेगा, जिन्होंने इन हमलों में हिस्सा लिया था। ट्रंप ने अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) की खुफिया रिपोर्टों को फेक न्यूज बताया था।
नाटो की बैठक में ट्रंप ने कहा कि इज़रायल और दूसरे देश भी उनकी बात का समर्थन कर रहे। ईरान के विदेश मंत्रालय ने भी माना कि उन्हें ‘बहुत नुकसान’ हुआ है, लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि सब कुछ तबाह हो गया है।
हमलों का असर
अमेरिकी सेना ने बताया कि उन्होंने ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर 14 बहुत बड़े बम गिराए। इन बमों को ‘बंकर-बस्टर’ कहते हैं, और इनमें से हर एक का वजन 13,600 किलो से भी ज़्यादा था।
फोर्डो संवर्धन सुविधा भी उन जगहों में शामिल था जहाँ हमला हुआ था। यह जगह एक पहाड़ के अंदर बहुत गहराई में बनी थी और यहाँ परमाणु बम बनाने वाली खास मशीनें (सेंट्रीफ्यूज) रखी हुई थीं।
अमेरिका के व्हाइट हाउस और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के ऑफिस ने मिलकर बताया कि इन बमों से ‘संवर्धन सुविधा अब काम के लायक नहीं रही।’ इजरायल की परमाणु ऊर्जा कमीशन ने भी कहा कि अमेरिका और इजरायल के इस हमले ने ‘ईरान की परमाणु हथियार बनाने की ताकत को कई साल पीछे धकेल दिया है।’
*משרד ראש הממשלה בשם הוועדה לאנרגיה אטומית (וא"א):*
התקיפה ההרסנית של ארצות-הברית על פורדו הרסה את התשתית הקריטית של האתר והפכה את מתקן ההעשרה לבלתי-שמיש. אנו מעריכים שהתקיפות האמריקניות על מתקני הגרעין של איראן, בשילוב עם התקיפות הישראליות על מרכיבים אחרים בתכנית הגרעין הצבאית…
— Benjamin Netanyahu – בנימין נתניהו (@netanyahu) June 25, 2025
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाएई ने भी माना कि “हमारी परमाणु सुविधाओं को बहुत नुकसान हुआ है, यह तो पक्का है।”
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में 5 साल से यीशु दरबार चलाया जा रहा था। टेंट के नीचे बेसहारा लोगों का लालच देकर बुलाया जाता था। दरबार की आड़ में हिंदुओ का धर्म परिवर्तन करने का धंधा किया जा रहा था। नौकरी के नाम नौजवानों को ईसाई धर्म अपनाने को कहा गया। महिलाओं को संतान प्राप्ति के झाँसे में फँसाया गया। दरबार से आसपास के 50 से ज्यादा गाँव के 500 से अधिक हिंदुओ का धर्म परिवर्तन कराया गया।
बजरंग दल की मदद से पुलिस ने रविवार (22 जून 2025) को यीशु दरबार पर छापा मारा। यह दरबार हर रविवार लगाया जाता था। पुलिस के पहुँचते ही दरबार के पंडाल में हाहाकार मच गया। लोग इधर-उधर भागने लग गए। आयोजनकर्ता ने तो पुलिस को पैसा खिलाकर मामला दबाने की भी कोशिश की। मौके से पुलिस ने पादरी अनिल कुमार और उनके सहयोगी कृष्ण कुमार और संजय को दबोच कर थाने ले गए।
पुलिस ने बताया कि बहरिया थाना क्षेत्र के नेवादा गाँव में पिछले 5 साल से यीशु दरबार लगाया जा रहा था। ग्राम प्रधान विश्व हिंदू परिषद और बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने दरबार में धर्म परिवर्तन कराने की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद थानाध्यक्ष बहरिया महेश मिश्रा ने पुलिसबल के साथ यीशु दरबार पहुँचे। यहाँ धर्म परिवर्तन कराने वाले ईसाई लोगों को रंगे हाथों पकड़ा। इसके अलावा 18 लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई है।
पुलिस के अनुसार, मऊआइमा थाना क्षेत्र निवासी विभूति नारायण ने मामले में तहरीर दी थी। इस आधार पर पादरी अनिल कुमार और उसके सहयोगी को गिरफ्तार कर सोमवार (23 जून 2025) को जेल भेज दिया गया है। पुलिस पूछताछ में यह भी सामने आया कि गाँव की ऊषा देवी, राजेश कुमार, विवेक कुमार और बाकी लोग रोजगार दिलाने, बीमारी ठीक करने और पैसे का लालच देकर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया था।
इसके अलावा यह भी आरोप है कि यीशु दरबार गाँव की जमीन पर बिना किसी अनुमति के चलाया जा रहा था। ग्राम प्रधान शिव कली देवी ने जमीन से पंडाल को हटाने की माँग की है। इस पर थानाध्यक्ष महेश मिश्रा और राजस्व निरीक्षक दिनेश चंद्र पांडेय ने मौके से टेंट पंडाल हटवाने की भी कार्रवाई का आश्वासन दिया।
केरल की एक स्पेशल कोर्ट में सुनवाई के दौरान NIA ने बड़ा खुलासा किया है। एजेंसी ने बताया कि बैन हो चुके इस्लामी संगठन PFI यानी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया ने करीब 977 लोगों की हिट लिस्ट तैयार की थी। इन लोगों को संगठन ने अपना दुश्मन माना था और मौका मिलते ही मारने की योजना बनाई थी। हिट लिस्ट में एक रिटायर्ड जिला जज का नाम भी शामिल है।
यह जानकारी NIA ने चार आरोपितों की ज़मानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दी। ये चारों आरोपित मुहम्मद बिलाल, रियासुद्दीन, अंसार के पी और सहीर के वी केरल के पालक्कड़ जिले से हैं। एजेंसी ने बताया कि ये लोग हिंसा फैलाने, हत्या की साजिश रचने और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहे हैं।
कहाँ से मिली इतनी बड़ी हिट लिस्ट?
NIA ने कोर्ट में बताया कि उन्होंने केरल में कई जगहों पर छापेमारी की। खासकर पेरियार वैली कैंपस, अलुवा में की गई रेड के दौरान उन्हें सबसे अहम सबूत मिले। यह जगह हथियारों की ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल की जा रही थी।
इसमें से PFI के कार्यकर्ता सिराजुद्दीन के पास से 240 नामों वाली एक लिस्ट मिली, जिसमें सभी गैर-मुस्लिम समुदाय के लोग (अधिकाँश हिंदू) थे। एक फरार PFI कार्यकर्ता अब्दुल वहाब के बटुए से 5 लोगों के नाम और उनकी जानकारी थी। उसमें भी एक रिटायर्ड जिला जज का नाम शामिल है। इसके अलावा एक अन्य आरोपित जो अब सरकारी गवाह बन गया है, उसके पास से 232 लोगों की एक अलग लिस्ट मिली। वहीं अयूब टी ए नाम के शख्स के घर से 500 नामों की एक और लिस्ट मिली।
NIA ने कहा कि ये सभी लिस्ट्स मिलाकर यह साफ होता है कि PFI एक सुनियोजित रणनीति के तहत देशभर में अपने दुश्मनों को मारने की योजना बना रहा था।
कैसे काम करता था PFI का आतंक नेटवर्क?
NIA ने कोर्ट में बताया कि PFI का नेटवर्क बहुत गहराई से फैला हुआ था। इस संगठन के पास अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग टीमें थीं-
रिपोर्टर विंग : यह टीम टारगेट बनने वाले लोगों की रेकी करती थी, उनके घर, ऑफिस, दिनचर्या और तस्वीरें जुटाती थी।
सर्विस विंग: ये लोग हत्या को अंजाम देते थे।
फिजिकल और आर्म्स ट्रेनिंग विंग: ये विंग नए लड़कों को ट्रेनिंग देती थी कि कैसे हथियार चलाने हैं और फिजिकल फिटनेस कैसे बनाए रखना है।
PFI के पास एक पूरी रणनीति थी- पहले रेकी, फिर ट्रेनिंग और आखिर में हत्या।
PFI का ‘India 2047’ प्लान और श्रीनिवासन की हत्या
NIA ने कोर्ट को बताया कि PFI का लक्ष्य केवल विरोधियों की हत्या करना नहीं था, बल्कि उनका एक लंबा प्लान था जिसे उन्होंने नाम दिया था ‘India 2047’। इस योजना का मकसद था – भारत में इस्लामी शासन की स्थापना करना।
यह बात तब सामने आई थी जब बिहार के फुलवारी शरीफ में 2022 में हुई छापेमारी में मुहम्मद जमालुद्दीन नाम के आरोपित के पास से 6 पेज का दस्तावेज मिला था, जिसमें इस योजना की पूरी जानकारी थी।
NIA ने ये भी बताया कि पालक्कड़ में RSS नेता श्रीनिवासन की हत्या कोई इत्तेफाक नहीं थी। बल्कि यह भी इसी ‘India 2047’ प्लान का हिस्सा थी। PFI के कैडरों के पास से ऐसे ऑडियो क्लिप और गवाहों के बयान मिले हैं जो यह साबित करते हैं कि संगठन के भीतर यह योजना कई स्तरों पर फैलाई जा चुकी थी।
कोर्ट ने क्यों खारिज की जमानत?
स्पेशल कोर्ट के जज पी के मोहनदास ने आरोपियों की ज़मानत याचिका को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है। आरोप Prima Facie यानी पहली नजर में ही सही लगते हैं। इसलिए UAPA की धारा 43D(5) लागू होती है, जिसके तहत गंभीर आरोपों वाले आतंकवादियों को जमानत नहीं दी जा सकती। जज ने कहा कि अब इस मामले में ट्रायल शुरू करने के लिए सबूत और गवाह पूरी तरह तैयार हैं।
PFI को लेकर कॉन्ग्रेस और लेफ्ट पर उठे सवाल
साल सितंबर 2022 में जब भारत सरकार ने PFI पर प्रतिबंध लगाया, तो लेफ्ट पार्टियों खासकर CPI(M) ने इसका खुलकर विरोध किया। उनका कहना था कि किसी संगठन को बैन करने से कुछ हासिल नहीं होता। CPI(M) ने यहाँ तक कह दिया कि जैसे कभी RSS पर भी बैन लगा था, वैसे ही PFI को बैन करना कोई बड़ी बात नहीं।
कॉन्ग्रेस ने बैन का खुला विरोध तो नहीं किया, लेकिन उसका रुख भी संदिग्ध रहा। कॉन्ग्रेस ने कहा कि अगर PFI पर बैन लगाया जा सकता है, तो RSS को भी बैन किया जाना चाहिए। यानी आतंकवाद के गंभीर आरोपों पर भी कॉन्ग्रेस की राजनीति चलती रही।
SDPI ने कॉन्ग्रेस को दिया चुनावी समर्थन
बता दें कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव में PFI की राजनीतिक शाखा SDPI ने कॉन्ग्रेस को केरल में समर्थन दिया। इसके बाद बीजेपी ने कॉन्ग्रेस को जमकर घेरा। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि एक ओर कॉन्ग्रेस आतंकवाद की बात करती है और दूसरी ओर उन्हीं के सहयोग से चुनाव लड़ती है।
कॉन्ग्रेस ने बाद में सफाई दी कि उन्हें SDPI का कोई समर्थन नहीं चाहिए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बाद में केरल के पालक्कड़ उपचुनाव में बीजेपी के राज्य अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस और SDPI के बीच गुप्त समझौता हुआ है। उन्होंने कहा कि SDPI की ‘ग्रीन आर्मी’ नाम की टीम घर-घर जाकर UDF (कॉन्ग्रेस गठबंधन) के लिए वोट माँग रही थी।
क्या यह सिर्फ आतंक की कहानी है?
ये मामला सिर्फ PFI की साजिश तक सीमित नहीं है। इसमें देश की राजनीति का एक खतरनाक चेहरा भी उजागर होता है। जब एक संगठन देश में इस्लामी शासन की साजिश रच रहा था, तब कुछ राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति के लिए उसी संगठन से सहानुभूति रखते दिखाई दिए। कॉन्ग्रेस और लेफ्ट जैसी पार्टियों ने या तो इनपर चुप्पी साधी या फिर बैन का विरोध कर अपनी मंशा साफ कर दी। सवाल ये है कि क्या आतंकवाद से लड़ाई सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी है? क्या राजनीतिक दल सिर्फ चुनाव के वक्त ही देशभक्ति दिखाएँगे?
ईरान ने 12 दिनों तक चले इजरायल के साथ युद्ध के बाद अब कथित तौर पर जासूसी करने वालों को सजा देना शुरू कर दिया है। ईरान ने अपने तीन नागरिकों को फाँसी की सजा दी है जबकि करीब 700 लोगों को सलाखों के पीछे भेज दिया है।
जिन लोगों को फाँसी दी गई है उनके नाम हैं- इदरीस अली, आजाद शोजाई और रसूल अहमद रसूल। इनपर इजरायल के लिए जासूसी करने और देश में हथियार लाने का आरोप था। बुधवार (25 जून 2025) को उरमिया जेल में इनलोगों को फाँसी पर लटका दिया गया। ईरानी मीडिया ने इसकी पुष्टि की है।
Three spies convicted of espionage for Zionist regime's intelligence agency were executed this morning at Urmia Prison.
They were sentenced for smuggling assassination equipment into Iran, leading directly to the assassination of a prominent figure. pic.twitter.com/soAXlMbmdM
— Daily Iran Military (@IRIran_Military) June 25, 2025
तुर्की की सीमा से सटा हुआ उरमिया ईरान के उत्तर पश्चिम में स्थित एक शहर है। उरमिया के जेल से फाँसी पर लटकाने से पहले की तीनों की तस्वीर जारी की गई। 13 जून 2025 को ईरान-इजरायल जंग के दौरान ईरान ने इजरायल के पक्ष में काम करने वालों को सख्त चेतावनी दी थी कि वो उन्हें नहीं छोड़ेंगे।
पिछले 12 दिनों में 700 लोग गिरफ्तार
ईरान ने पिछले 12 दिनों में करीब 700 लोगों को गिरफ्तार किया। इन पर इजरायल खुफिया एजेंसी ‘मोसाद’ को सीक्रेट जानकारी देने और ईरानी सैन्य और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने में मदद करने का आरोप लगाया है।
ईरान का कहना है कि कई आरोपितों से अभी पूछताछ चल रही है जबकि कई से पूछताछ पूरी हो गई है। इनलोगों को जल्द ही सजा सुनाई जाएगी। ईरान ने इजरायल के साथ तनातनी के बाद ही अपने देश के नागरिकों को सख्त चेतावनी दी थी कि वो इजरायल के नेटवर्क का हिस्सा न बनें।
ये पहली बार नहीं है जब ईरान ने जासूसी के आरोप में अपने नागरिक को फाँसी की सजा दी हो। हाल ही में ईरान ने 3 लोगों को इजरायल का समर्थन करने के आरोप में फाँसी पर लटका दिया था।
ईरान के 14 परमाणु वैज्ञानिकों की हुई मौत
इजरायल और अमेरिका के हमलों में न सिर्फ ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया बल्कि बड़े बड़े परमाणु वैज्ञानिकों को भी मौत के घाट उतार दिया। दरअसल हमले का मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना था क्योंकि ईरान परमाणु बम बनाने की कगार पर खड़ा था।
इससे इजरायल के अस्तित्व को खतरा है। इजरायल के खुफिया तंत्र का ईरान के अंदर नेटवर्क काफी मजबूत है। ऐसे में ईरान ऐसे लोगों को सजा देना चाहता है जो इजरायल को किसी भी तरह से मदद कर रहे थे।
मुस्लिम महिला को ‘खुला’ यानी तलाक माँगने का अधिकार बिल्कुल सही है। इसके लिए शौहर की सहमति नहीं चाहिए। यह टिप्पणी तेलंगाना हाई कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान की है। कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के हक में फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर महिला अपने शौहर के साथ नहीं रहना चाहती है, तब महिला को अधिकार है कि वह ‘खुला’ से तलाक ले सकती है।
कोर्ट ने आगे कहा कि बीवी के लिए विवाह विच्छेद को अंतिम रूप देने के लिए मुफ्ती या दार-उल-कजा से खुलनामा (विवाह विच्छेद का प्रमाण पत्र) लेना जरूरी नहीं है। मुफ्ती की राय केवल सलाह के लिए होती है। इसके साथ कोर्ट ने साफ किया कि अगर पत्नी खुला माँगती है और केस अदालत तक पहुँचता है। ऐसे मामले में खुला तत्काल रूप से प्रभावी हो जाता है। बेशक ही मामला दोनों पक्षों का निजी क्यों न हो।
जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य और जस्टिस बीआर मधुसूदन राव की बेंच ने कहा कि मुस्लिम बीवी का ‘खुला’ माँगने का अधिकार सही है। इसके लिए पति की स्वीकृति या कारण बताने की जरूरत नहीं है। इसलिए कोर्ट की भूमिका केवल निकाह को खत्म कराने के लिए मुहर लगाने तक ही सीमित है।
बेंच ने कहा, “कोर्ट की एकमात्र भूमिका निकाह समाप्ति पर न्यायिक मुहर लगाना है, जो कि खुला के दौरान दोनो पक्षों के लिए तनावपूर्ण हो जाती है…पारिवारिक न्यायालय को केवल यह पता लगाना है कि दोनों पक्षों के बीच आपसी मतभेद सुलझ सकते है या नहीं। इसी आधार पर खुला की माँग वैध मानी जाएगी। इसके लिए विस्तारित जाँच नहीं होनी चाहिए, बल्कि केंद्रित जाँच काफी है।”
क्या है मामला ?
तेलंगाना हाई कोर्ट ने यह फैसला एक मुस्लिम दंपति के मामले में सुनाया है। मामले में एक मुस्लिम बीवी ने अपने शौहर को खुला की माँग की, लेकिन शौहर ने उसकी माँग को ठुकरा दिया। इसके बाद बीवी ने फैमिली कोर्ट में केस दर्ज कराया। यहाँ कोर्ट ने बीवी के पक्ष में फैसला सुनाया।
इसके बाद गैर-सरकारी संगठन सदा-ए-हक शरई परिषद ने मुस्लिम व्यक्ति को तलाक प्रमाण-पत्र सौंप दिया। परिषद निकाह के बाद छिड़े गृह कलह के समाधान कराने का काम करता है। लेकिन व्यक्ति ने इस प्रमाण-पत्र के विरोध में तेलंगाना हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी। अब तेलंगाना हाई कोर्ट ने मुस्लिम व्यक्ति को फटकार लगाई है और मुस्लिम महिला के पक्ष में फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने इस मामले में कुरान की आयतों में ‘खुला’ का अध्ययन किया। साथ ही इस मामले में इतिहास की परतें भी खोली। जिसमें कहा गया, “कुरान के अध्याय-2 की आयत 228 और 229 में बीवी को अपने शौहर के साथ निकाह को रद्द करने का पूर्ण अधिकार दिया गया है। खुला की वैधता के लिए शौहर की सहमति कोई पूर्व शर्त नहीं है।”
साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर शौहर अपनी बीवी की खुला की माँग को स्वीकार नहीं करता है, तो इस्लाम में इस मामले पर कोई भी प्रक्रिया नहीं है। चाहे वह कुरान, सुन्नत या पैगंबर हो।
क्या है खुला?
खुला के तहत अगर बीवी अपने शौहर से अलग होती है तो उसे अपने शौहर से उसकी जायदाद लौटानी पड़ेगी। पर यह जरूरी है कि दोनों इसके लिए रजामंद हों। उल्लेखनीय है कि खुला की पहल केवल बीवी ही कर सकती है। कुरान और हदीस में इसका जिक्र है।
वहीं, भारत में मुस्लिमों के बीच मान्य पुस्तक फतवा-ए-आलमगीरी में कहा गया है कि जब निकाह के बाद शौहर-बीवी इस बात पर राज़ी हैं कि अब वे साथ नहीं रह सकते तो बीवी कुछ संपत्ति शौहर को वापस करके स्वयं को उसके बंधन से मुक्त कर सकती है। जायदाद में बीवी अपनी मेहर की रकम छोड़ सकती है या फिर कोई अन्य रकम/संपत्ति दे सकती है।
खुला को लेकर मुस्लिमों की आपत्ति
‘खुला’ को लेकर हनफी सहित कुछ तबके के उलेमाओं का कहना है कि इसके तहत मुस्लिम महिला तभी तलाक ले सकती है, जब उसका शौहर तैयार हो। अगर शौहर मना कर दे तो महिला के पास मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम 1939 के प्रावधानों के तहत अदालत जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने साल 2021 में ‘खुला’ के संबंध में कहा था कि इस प्रक्रिया में पति की स्वीकृति एक शर्त है। वहीं, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कुरान एक मुस्लिम बीवी को एक प्रक्रिया निर्धारित किए बिना उसकी निकाह को रद्द करने के लिए ‘खुला’ का अधिकार देता है।
मद्रास हाई कोर्ट ने भी ‘खुला’ पर सुनाया था फैसला
मद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के ‘खुला’ को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिलाएँ ‘खुला’ के तहत अपने शौहर से तलाक लेने की अधिकारी हैं। हालाँकि, कोर्ट ने इसके लिए कुछ प्रावधान बताए हैं।
मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ‘खुला’ के तहत तलाक लेने के लिए मुस्लिम महिलाओं को फैमिली कोर्ट जाना होगा। किसी निजी शरीयत परिषद को इस संबंध में प्रमाण पत्र जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसे प्रमाण-पत्र की कोई मान्यता नहीं है।
आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सासंद और पूर्व ‘पत्रकार’ सागरिका घोष ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा की। इसमें उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को की शान में कसीदे पढ़ने शुरू किए और आपातकाल के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को ही जिम्मेदार ठहरा दिया।
मंगलवार (25 जून 2025) को सागरिका ने एक्स पर साझा पोस्ट में कहा कि इंदिरा गाँधी ने 1975 में आपातकाल लागू किया क्योंकि RSS भारत को आराजकता की ओर में धकेल रहा था।
सागरिका यहीं नहीं रुकीं। इसके बाद उन्होंने इंदिरा की शान में कसीदों के चिट्ठे पढ़ने शुरू कर दिए। उन्होंने लिखा कि इंदिरा ने इस्तीफा दिया, चुनाव करवाए, जनता के सवालों के जवाब दिए।
Indira Gandhi imposed #Emergency1975 because @RSSorg was pushing India towards total anarchy. YES, the Emergency was a BLOT, BUT the same #IndiraGandhi called elections, resigned and took questions in public. Why doesn’t @narendramodi hold a press conference like this ??first… pic.twitter.com/NP5nlx2J7s
अपनी इस पोस्ट में सागरिका ने 1978 में इंदिरा गांधी की प्रेस से बातचीत करते हुए वीडियो साझा की और इसमें भी वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसना नहीं भूली। उन्होंने लिखा कि पीएम मोदी इमरजेंसी की नकल करने में व्यस्त रहते हैं और गाँदी की तरह प्रेस कॉफ्रेंस क्यों नहीं करते।
पोस्ट में लगी इंदिरा गाँधी की वीडियो में वह जनता के समर्थन का दावा करती नजर आ रही हैं। वीडियों में वह कह रही हैं, “राजनीति में मेरा भविष्य जैसा मीडिया ने कहा है बिल्कुल वैसा नहीं है। मुझे हमेशा से ही लोगों का समर्थन मिलता रहा है फिर चाहे स्थिति कैसे भी हो या कैसी भी बनाने की कोशिश की गई हो। हारने के तुरंत बाद भी मैं जहाँ भी गई वहाँ पर मुझे लोगों का समर्थन मिला। भले ही आप लोगों ने मेरी कैसी भी छवि बनाने की कोशिश की हो।”
आगे के सवाल में इंदिरा ने कहा, “देखिए मैंने सेंसरशिप लगाया और मैं इस बात को मानती हूँ कि मैंने इसे लगाया है। ये लोग कह रहे हैं कि इसमें कई बंधन थे जो कि पूरी तरह से अलग बात है।” वीडियो के अंत में इंदिरा गाँधी को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वह नहीं चाही कि लोगों को ‘पीड़ित’ बनाया जाए।
इस प्रोपेगेंडा वीडियो को उपयोग करके सागरिका घोष ने कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी के लिए ये बताने की कोशिश की कि वह लोगों के लिए कितनी दयालु थीं और RSS ने ही इंदिरा गाँधी को इमरजेंसी लागू करने के लिए ‘उकसाया’।
आपातकाल के पीछे की सच्चाई क्या है?
आपातकाल को 25 जून 1975 को घोषित किया गया। ये 21 मार्च 1977 तक चला था। इस दौर को स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है। इसे लागू करने वाली तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ही थीं। इस दौरान मौलिक अधिकारों के साथ प्रेस की स्वतंत्रता को भी खत्म कर दिया गया था। इसी समय, विपक्ष के नेताओं को जेल भेजा गया और लोगों के अधिकारों का हनन बुरी तरह से किया गया।
इस पूरे समय का असल कारण राजनीतिक उथल-पुथल था, न कि RSS की ओर से की गई कोई काल्पनिक ‘अराजकता’। 1971 की जंग में जीत के बाद बांग्लादेश के उभरने के साथ ही इंदिरा गाँधी की प्रतिष्ठा को काफी हद तक बढ़ा दिया था। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस सरकार की सत्ता के दौरान बढ़ती मँहगाई, पूँजीवाद और बढ़ते भ्रष्टाचार के चलते 1974 तक जनता में अविश्वास की लहर साफ देखने के मिल रही थी।
इसके बाद 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट में जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गाँधी को 1971 के लोकसभा चुनाव में धोखाधड़ी करने के आरोप को सही ठहराते हुए उनकी सीट को अमान्य घोषित कर दिया।
इसे लेकर विपक्ष के बड़े नेताओं ने इंदिरा के इस्तीफे की माँग को लेकर देशव्यापी आंदोलन किया। कॉन्ग्रेस सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए गए। इसी के बाद इंदिरा गाँधी ने बेटे संजय गाँधी और सहयोगी सिद्धार्थ शंकर रे की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को आपातकाल घोषित करने का निर्देश दिया था।
इसके बाद 25 और 26 जून की आधी रात को जयप्रकाश नारायण को आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (MISA) के तहत गिरफ्तार किया। आपातकाल के इन 21 महीनों के दौरान इंदिरा गाँधी का अलग रुख नजर आया। भारतीय प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाया गया। 1 लाख से भी अधिक लोगों की मानमाने तौर पर गिरफ्तारियाँ की गईं।
पुलिस हिरासत में लोगों को प्रताड़ित किया गया, यातनाएं दी गईं। साथ ही गरीबों और कमजोर वर्गों के लगभग 80 से 120 लाख लोगों की जबरन नसबंदी करने का अभियान चलाया गया। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की लोकतांत्रिक छवि भी खराब हुई। इंदिरा की सरकार में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर कई रिपोर्ट्स छापी गई।
अब इसी आपातकाल को 50 वर्ष बाद सागरिका घोष जैसे लोग नए तरीके से लोगों के बीच परोसने की कोशिश कर रहे हैं ताकि RSS को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा सकें और कॉन्ग्रेस की बची कुची छवि को सुधार सकें।
तमिलनाडु में 5 आईएएस अफसरों को मद्रास हाईकोर्ट ने अवमानना का नोटिस जारी किया है। ये नोटिस देवनाथ स्वामी मंदिर की जमीन पर सेंट जोसेफ मैट्रिकुलेशन हायर सेकेंडरी स्कूल चलाने को लेकर है।
न्यायमूर्ति केआर श्रीराम और न्यायमूर्ति सुंदर मोहन की खंडपीठ ने जिन आईएएस अधिकारियों को नोटिस जारी किए, उनके नाम हैं :
एस मधुमती, सचिव, स्कूल और शिक्षा विभाग
डॉ बी चंद्रमोहन, सचिव, पर्यटन, संस्कृति, मानव संसाधन और सीई विभाग
पीएन श्रीधर, आयुक्त, हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती प्रशासन विभाग
सिबी आदित्य सेंथिलकुमार, जिला कलेक्टर, कुड्डालोर
इसके अलावा एचआर एंड सीई विभाग के दो संयुक्त आयुक्तों का नाम भी उच्च न्यायालय द्वारा जारी नोटिस में शामिल है। हाईकोर्ट ने इन सभी अधिकारियों को 10 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा है।
बीजेपी के आध्यात्मिक और मंदिर विकास विंग के राज्य सचिव एस विनोद राघवेंद्रन ने ये याचिका दायर की थी। इसमें याचिकाकर्ता ने मद्रास उच्च न्यायालय के अप्रैल 2024 के आदेश का पालन न करने का आरोप लगाया था। अप्रैल 2024 में, उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के अधिकारियों को सेंट जोसेफ स्कूल के लिए वैकल्पिक भूमि खोजने के लिए कहा था।
एस विनोद राघवेंद्रन ने अपनी याचिका में कहा था कि कुड्डालोर में जिस जमीन पर सेंट जोसेफ मैट्रिकुलेशन और हायर सेकेंडरी स्कूल चल रहा है, वह एक हिंदू मंदिर की जमीन है। इसे खाली कराने की कई कोशिशें की गई लेकिन अतिक्रमण नहीं हटाया जा सका।
मद्रास उच्च न्यायालय में स्कूल ने भी 2009 में रिट याचिका दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 4.5 एकड़ जमीन स्कूल को 6 महीने के अंदर आवंटित करने का आदेश सरकार को दिया था। राज्य सरकार के वकील ने न्यायालय को बताया कि वैकल्पिक व्यवस्था अभी तक राज्य सरकार ने नहीं की है। छात्रों को दिक्कत न हो इस पर भी विद्यालय का जोर है।
इसके बाद अप्रैल 2024 में कोर्ट ने स्कूल को वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने के लिए राज्य को 6 महीने का और वक्त दिया था। लेकिन राज्य सरकार अब तक कोई कदम नहीं उठा पाई।
याचिकाकर्ता एस विनोद रघुनाधरन ने हाईकोर्ट में कहा कि राज्य सरकार की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया गया है कि स्कूल को कहाँ ले जाएँगे? और न ही ये निश्चित किया गया है कि स्कूल की जमीन से अवैध कब्जा कब हटेगा?
उत्तर प्रदेश के इटावा की एक घटना ने सामाजिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। यह मामला एक कथावाचक मुकुट मणि और उसके सहयोगियों के साथ हुई मारपीट, जातीय विवाद और छेड़छाड़ के आरोपों से शुरू हुआ, जो अब ब्राह्मण बनाम ओबीसी-दलित की तर्ज पर एक सामाजिक-राजनीतिक रंग ले चुका है। इस पूरे प्रकरण में कई आयाम हैं – जातिगत संवेदनशीलता, सोशल मीडिया पर त्वरित प्रतिक्रियाएँ और कथावाचक की शुचिता जैसे गंभीर मुद्दे।
इस लेख में हम इस मामले को विस्तार से समझेंगे। साथ ही यह भी देखेंगे कि सनातन परंपरा में कथावाचन को लेकर कोई जातिगत बाध्यता नहीं रही है। हम उन कथावाचकों के उदाहरण भी देंगे जो गैर-ब्राह्मण हैं। हम आपको इस मामले के जबरदस्त तरीके से वायरल होने के पीछे की वजह भी बताएँगे कि कैसे कुछ लोग बिना पूरा सच जाने ब्राह्मणों को निशाना बनाकर अपनी राजनीति चमकाने में लग जाते हैं।
इटावा का दांदरपुर से जुड़ा क्या है पूरा मामला
इटावा के बकेवर थाना क्षेत्र के दांदरपुर गाँव में 21 जून 2025 को श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ था। कथावाचक मुकुट मणि और उनके सहयोगी संत सिंह व्यास को एक ब्राह्मण परिवार ने कथा के लिए बुलाया था। आयोजक परिवार की महिला रेनू तिवारी और उनके पति जय प्रकाश तिवारी ने आरोप लगाया कि कथावाचक ने कथा के दौरान और बाद में अभद्र व्यवहार किया।
पीड़ित रेनू का दावा है कि कथावाचक ने कलश यात्रा के दौरान उनका हाथ गलत नियत से पकड़ा और जब इसका विरोध किया गया तो धमकी दी कि वे समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के रिश्तेदार हैं।
इसके बाद मामला और गंभीर हो गया जब यह सामने आया कि कथावाचक ने अपनी जाति छिपाई थी। उनके पास दो आधार कार्ड मिले, जिनमें से एक में वे खुद को ब्राह्मण (अग्निहोत्री) बता रहे थे। ग्रामीणों को उनकी वास्तविक जाति (यादव) का पता चलने पर विवाद बढ़ा और 22 जून की रात कुछ लोगों ने कथावाचकों के साथ मारपीट की, उनकी चोटी काटी और नाक रगड़वाने की घटना हुई। इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया और बकेवर थाने में दो नामजद और 50 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ।
इस घटना ने स्थानीय स्तर पर सामाजिक तनाव पैदा कर दिया। ब्राह्मण महासभा ने इसे ब्राह्मणों के खिलाफ साजिश बताते हुए कथावाचकों पर कार्रवाई की माँग की, जबकि समाजवादी पार्टी और यादव महासभा ने इसे ब्राह्मणों द्वारा ओबीसी-दलित समुदाय के उत्पीड़न के रूप में पेश किया। सोशल मीडिया पर भी इस मामले ने तूल पकड़ा और कई लोगों ने बिना पूरा सच जाने ब्राह्मणों को निशाना बनाना शुरू कर दिया।
सनातन परंपरा में कथावाचक के साथ कोई जातिगत बंधन नहीं
सनातन धर्म में कथावाचन और भक्ति का कोई जातिगत बंधन नहीं रहा है। यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाभारत की ‘व्याध गीता’ है। इस कथा में एक शिकारी (व्याध) जो निम्न माने जाने वाले समुदाय से था, वो एक ब्राह्मण को कर्म और धर्म का उपदेश देता है। यह उपदेश भगवद्गीता जितना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। सनातन परंपरा में ज्ञान, भक्ति और कथावाचन के लिए जाति कभी आड़े नहीं आई।
आधुनिक समय में भी कई गैर-ब्राह्मण कथावाचक हैं, जो समाज में सम्मानित हैं और जिनकी कथाओं में लाखों लोग शामिल होते हैं। इसे कुछ उदाहरणों से भी समझ सकते हैं –
मोरारी बापू: गुजरात के प्रसिद्ध कथावाचक मोरारी बापू बनिया समुदाय से हैं। उनकी रामचरितमानस की कथाएँ देश-विदेश में लाखों लोगों द्वारा सुनी जाती हैं। उनके भक्तों में हर वर्ग के लोग शामिल हैं और उनकी सादगी और विद्वता की कोई जातिगत सीमा नहीं है।
आचार्या मनोरमा सिंह यादव: उत्तर प्रदेश की यह कथावाचक श्रीमद्भागवत महापुराण और रामकथा कहती हैं। उनकी कथाओं के यूट्यूब वीडियो को लाखों लोग देखते हैं। यादव समुदाय से होने के बावजूद उन्हें हर वर्ग का सम्मान प्राप्त है।
नीलम यादव शास्त्री: यह भी एक लोकप्रिय कथावाचक हैं, जिनके भजन और कथाएँ विशेष रूप से महिलाओं के बीच लोकप्रिय हैं। उनकी कथाओं में भारी भीड़ होती है और वे भी गैर-ब्राह्मण हैं।
हेमराज सिंह यादव: कॉमेडी और भक्ति का अनूठा मिश्रण करने वाले इस कथावाचक के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल रहते हैं। उनकी कथाओं में भी हर वर्ग के लोग शामिल होते हैं। इसी तरह से मंजेश सिंह यादव भी मशहूर कथावाचक हैं।
डॉ. ब्रजेश यादव: बरेली के सर्जन डॉक्टर ब्रजेश यादव कथा वाचन के साथ-साथ रामचरितमानस की प्रतियाँ बाँटते हैं। वो नवजात शिशुओं के कानों में ‘रामभक्त बनना’ का संदेश देते हैं।
हनुमान प्रसाद पोद्दार: गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित रामचरितमानस की टीका इन्हीं की है, जो आज विश्व में सबसे अधिक पढ़ी जाती है। वे भी गैर-ब्राह्मण थे। हनुमान प्रसाद पोद्दार सनातन के रक्षक, प्रचारक थे, जिनकी वजह से सनातन संस्कृति आज विश्व के कोने कोने में है। उन्होंने सनातन विरोधियों चाहे वो जवाहरलाल नेहरू जैसे देश के ब्राह्मण प्रधानमंत्री ही क्यों न रहे हों, उन पर भी निशाना साधा और वो कभी सनातन की लड़ाई से पीछे नहीं हटे। हनुमान प्रसाद पोद्दार कभी कथावाचक नहीं रहे, बल्कि वो सनातन के रक्षक, प्रचारक और अग्रदूत थे।
ये उदाहरण साबित करते हैं कि सनातन परंपरा में कथावाचन का कोई जातिगत आधार नहीं है। गाँवों में भी अधिकांश मंदिरों के पुजारी गैर-ब्राह्मण समुदायों से हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पुजारियों की कमी के कारण कोई भी व्यक्ति, जिसे धर्म में आस्था हो, मंदिर में पूजा-अर्चना कर सकता है। फिर भी कुछ लोग हर घटना को ब्राह्मण बनाम गैर-ब्राह्मण के चश्मे से देखते हैं और सामाजिक तनाव को बढ़ावा देते हैं।
इटावा मामले को लेकर अखिलेश यादव की राजनीति
इटावा का यह मामला जल्द ही राजनीतिक रंग लेने लगा। समाजवादी पार्टी के नेताओं विशेष रूप से अखिलेश यादव ने इसे ब्राह्मणों द्वारा ओबीसी-दलित उत्पीड़न के रूप में पेश किया। सपा के जिलाध्यक्ष प्रदीप शाक्य ने ब्राह्मण महासभा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अगर कथावाचकों के खिलाफ कोई आपत्ति थी, तो पहले शिकायत क्यों नहीं की गई। दूसरी ओर ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष अरुण दुबे ने इसे ब्राह्मणों के खिलाफ साजिश करार दिया और कथावाचकों पर कार्रवाई की माँग की।
सोशल मीडिया पर भी इस मामले ने तूल पकड़ा। कुछ लोगों ने बिना पूरा सच जाने वीडियो और पोस्ट के जरिए ब्राह्मणों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। 10-15 मिनट में बनाए गए वीडियो और पोस्ट वायरल हो गए, जिनमें ब्राह्मणों को जातिवादी और उत्पीड़क बताया गया। यह प्रवृत्ति गंभीर है, क्योंकि यह न केवल सामाजिक तनाव को बढ़ाती है बल्कि सनातन परंपरा की एकता को भी कमजोर करती है।
ओडिशा का उदाहरण – गलत प्रचार और सवर्णों को निशाना बनाने का एक और नमूना
इटावा का मामला अकेला नहीं है। हाल ही में ओडिशा के रायगढ़ जिले के बैगानगोडा गाँव में एक अनुसूचित जनजाति (ST) परिवार के 40 सदस्यों का ‘शुद्धिकरण’ हुआ, क्योंकि उनकी एक युवती ने अनुसूचित जाति (SC) के लड़के से शादी कर ली थी। गाँव की पंचायत ने परिवार को सिर मुंडवाने और पशु बलि देने का आदेश दिया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और कुछ लोगों ने इसे ‘मनुवादी वर्चस्व’ और ‘सवर्णों द्वारा उत्पीड़न’ बताकर ब्राह्मणों और सवर्णों पर हमला बोला।
हालाँकि, बाद में यह सामने आया कि यह अनुष्ठान परिवार ने अपनी मर्जी से जनजातीय परंपराओं के अनुसार किया था और इसमें किसी सवर्ण समुदाय की कोई भूमिका नहीं थी। फिर भी सोशल मीडिया पर कुछ हैंडल्स जैसे ‘ट्राइबल आर्मी’ व अन्य ने इसे सवर्णों और बीजेपी-आरएसएस के खिलाफ प्रचारित किया।
ऐसा ही अन्य हैंडल्स ने भी किया।
कुछ मीडिया पोर्टल जैसे ललनटॉप ने अपने हेडलाइन से लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की।
यह घटना इस बात का उदाहरण है कि कैसे बिना तथ्यों की जाँच किए सवर्णों और खास तौर पर ब्राह्मणों को निशाना बनाया जाता है।
क्यों बनते हैं ब्राह्मण आसान निशाना?
ब्राह्मण समुदाय को बार-बार निशाना बनाए जाने के पीछे कई कारण हैं। पहला, ब्राह्मणों को सामाजिक और धार्मिक परंपराओं का प्रतीक माना जाता है, जिसके कारण कुछ लोग उन्हें “मनुवादी” या ‘जातिवादी’ बताकर आसानी से निशाना बना लेते हैं। दूसरा, ब्राह्मण समुदाय आमतौर पर ऐसी घटनाओं पर पलटवार नहीं करता या ‘पीड़ित’ की भूमिका में नहीं आता, जिससे कुछ लोग इसे उनकी कमजोरी मान लेते हैं। तीसरा – राजनीतिक दल और सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ लोग ऐसी घटनाओं को अपने निहित स्वार्थों के लिए भुनाते हैं।
इटावा मामले में समाजवादी पार्टी ने इसे हिंदुओं को तोड़ने और ब्राह्मणों को बदनाम करने का मौका बना लिया। अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने बिना पूरा सच जाने इसे सामाजिक भेदभाव का रंग दे दिया। सोशल मीडिया पर भी कुछ लोग तुरंत वीडियो बनाकर ब्राह्मणों को कोसने लगे, बिना यह समझे कि कथावाचक ने खुद गलत व्यवहार किया था और अपनी जाति छिपाई थी।
कथावाचक की शुचिता और सामाजिक अपेक्षाएँ
कथावाचक का स्थान समाज में बहुत ऊँचा होता है। उनसे शुचिता, नैतिकता और सादगी की अपेक्षा की जाती है। इटावा मामले में कथावाचक मुकुट मणि पर छेड़छाड़ और धमकी देने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। इसके अलावा उनके पास फर्जी आधार कार्ड भी मिले। सोशल मीडिया पर तो दावा किया जा रहा है कि पहले आरोपित बौद्ध कथाएँ सुनाता था और फिर भागवत कथा करने लगा। इस तरह की उसकी पिछली गतिविधियों ने भी संदेह पैदा किया है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या कथावाचक की शुचिता पर सवाल उठाना गलत है? और अगर कथावाचक गलत करता है तो क्या उसे उसकी जाति के आधार पर बचाव करना चाहिए?
सनातन परंपरा में कथावाचक का धर्म और आचरण सर्वोपरि होता है, न कि उसकी जाति। अगर कोई कथावाचक गलत करता है, तो उसकी आलोचना होनी चाहिए, चाहे वह किसी भी समुदाय से हो। लेकिन इसे पूरे समुदाय पर हमला करने का मौका बनाना गलत है। इटावा मामले में कुछ लोगों ने इसे ब्राह्मणों के खिलाफ हथियार बनाया, जो न केवल अनुचित है बल्कि सामाजिक एकता के लिए भी हानिकारक है।
सच को समझने की जरूरत
इटावा का दांदरपुर मामला एक जटिल सामाजिक और कानूनी मुद्दा है, जिसमें मारपीट, छेड़छाड़, और जातिगत विवाद जैसे कई पहलू शामिल हैं। पुलिस ने इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया है, और एसएसपी ने दोनों पक्षों की बात सुनकर निष्पक्ष जाँच का आश्वासन दिया है। लेकिन इस मामले को ब्राह्मण बनाम ओबीसी-दलित के रूप में पेश करना और सोशल मीडिया पर त्वरित प्रतिक्रियाएँ देना सामाजिक तनाव को बढ़ाने का काम कर रहा है।
सनातन परंपरा में कथावाचन और भक्ति की कोई जातिगत सीमा नहीं है। मोरारी बापू, मनोरमा सिंह यादव, नीलम यादव और हनुमान प्रसाद पोद्दार जैसे गैर-ब्राह्मण विद्वानों-कथावाचकों ने यह साबित किया है कि भक्ति और ज्ञान का आधार आचरण और श्रद्धा है, न कि जाति। फिर भी कुछ लोग हर घटना को ब्राह्मणों के खिलाफ प्रचार करने का मौका बना लेते हैं, जो न केवल गलत है बल्कि हिंदू समाज की एकता को भी कमजोर करता है।
इस मामले में कानून को अपना काम करना चाहिए। मारपीट और छेड़छाड़ जैसे गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही समाज को भी यह समझना होगा कि बिना पूरा सच जाने त्वरित प्रतिक्रियाएँ देना और किसी एक समुदाय को निशाना बनाना न केवल अनुचित है, बल्कि खतरनाक भी है। हमें ऐसी राजनीति और प्रचार से बचना होगा जो समाज को बाँटने का काम करती है।