Home Blog Page 330

3 को दी फाँसी, 700 को किया गिरफ्तार… ईरान ने सीजफायर का भी नहीं किया लिहाज, इजरालयी एजेंटों को पकड़कर मौत की सजा देने में जुटा

ईरान ने 12 दिनों तक चले इजरायल के साथ युद्ध के बाद अब कथित तौर पर जासूसी करने वालों को सजा देना शुरू कर दिया है। ईरान ने अपने तीन नागरिकों को फाँसी की सजा दी है जबकि करीब 700 लोगों को सलाखों के पीछे भेज दिया है।

जिन लोगों को फाँसी दी गई है उनके नाम हैं- इदरीस अली, आजाद शोजाई और रसूल अहमद रसूल। इनपर इजरायल के लिए जासूसी करने और देश में हथियार लाने का आरोप था। बुधवार (25 जून 2025) को उरमिया जेल में इनलोगों को फाँसी पर लटका दिया गया। ईरानी मीडिया ने इसकी पुष्टि की है।

तुर्की की सीमा से सटा हुआ उरमिया ईरान के उत्तर पश्चिम में स्थित एक शहर है। उरमिया के जेल से फाँसी पर लटकाने से पहले की तीनों की तस्वीर जारी की गई। 13 जून 2025 को ईरान-इजरायल जंग के दौरान ईरान ने इजरायल के पक्ष में काम करने वालों को सख्त चेतावनी दी थी कि वो उन्हें नहीं छोड़ेंगे।

पिछले 12 दिनों में 700 लोग गिरफ्तार

ईरान ने पिछले 12 दिनों में करीब 700 लोगों को गिरफ्तार किया। इन पर इजरायल खुफिया एजेंसी ‘मोसाद’ को सीक्रेट जानकारी देने और ईरानी सैन्य और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने में मदद करने का आरोप लगाया है।

ईरान का कहना है कि कई आरोपितों से अभी पूछताछ चल रही है जबकि कई से पूछताछ पूरी हो गई है। इनलोगों को जल्द ही सजा सुनाई जाएगी। ईरान ने इजरायल के साथ तनातनी के बाद ही अपने देश के नागरिकों को सख्त चेतावनी दी थी कि वो इजरायल के नेटवर्क का हिस्सा न बनें।

ये पहली बार नहीं है जब ईरान ने जासूसी के आरोप में अपने नागरिक को फाँसी की सजा दी हो। हाल ही में ईरान ने 3 लोगों को इजरायल का समर्थन करने के आरोप में फाँसी पर लटका दिया था।

ईरान के 14 परमाणु वैज्ञानिकों की हुई मौत

इजरायल और अमेरिका के हमलों में न सिर्फ ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया बल्कि बड़े बड़े परमाणु वैज्ञानिकों को भी मौत के घाट उतार दिया। दरअसल हमले का मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना था क्योंकि ईरान परमाणु बम बनाने की कगार पर खड़ा था।

इससे इजरायल के अस्तित्व को खतरा है। इजरायल के खुफिया तंत्र का ईरान के अंदर नेटवर्क काफी मजबूत है। ऐसे में ईरान ऐसे लोगों को सजा देना चाहता है जो इजरायल को किसी भी तरह से मदद कर रहे थे।

तीन तलाक ‘सही’, पर ‘खुला’ पर बिलबिला उठते हैं इस्लामी कट्टरपंथी: तेलंगाना हाई कोर्ट ने माना मुस्लिम महिला का ‘अधिकार’, जानिए क्या है मामला

मुस्लिम महिला को ‘खुला’ यानी तलाक माँगने का अधिकार बिल्कुल सही है। इसके लिए शौहर की सहमति नहीं चाहिए। यह टिप्पणी तेलंगाना हाई कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान की है। कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के हक में फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर महिला अपने शौहर के साथ नहीं रहना चाहती है, तब महिला को अधिकार है कि वह ‘खुला’ से तलाक ले सकती है।

कोर्ट ने आगे कहा कि बीवी के लिए विवाह विच्छेद को अंतिम रूप देने के लिए मुफ्ती या दार-उल-कजा से खुलनामा (विवाह विच्छेद का प्रमाण पत्र) लेना जरूरी नहीं है। मुफ्ती की राय केवल सलाह के लिए होती है। इसके साथ कोर्ट ने साफ किया कि अगर पत्नी खुला माँगती है और केस अदालत तक पहुँचता है। ऐसे मामले में खुला तत्काल रूप से प्रभावी हो जाता है। बेशक ही मामला दोनों पक्षों का निजी क्यों न हो।

जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य और जस्टिस बीआर मधुसूदन राव की बेंच ने कहा कि मुस्लिम बीवी का ‘खुला’ माँगने का अधिकार सही है। इसके लिए पति की स्वीकृति या कारण बताने की जरूरत नहीं है। इसलिए कोर्ट की भूमिका केवल निकाह को खत्म कराने के लिए मुहर लगाने तक ही सीमित है।

बेंच ने कहा, “कोर्ट की एकमात्र भूमिका निकाह समाप्ति पर न्यायिक मुहर लगाना है, जो कि खुला के दौरान दोनो पक्षों के लिए तनावपूर्ण हो जाती है…पारिवारिक न्यायालय को केवल यह पता लगाना है कि दोनों पक्षों के बीच आपसी मतभेद सुलझ सकते है या नहीं। इसी आधार पर खुला की माँग वैध मानी जाएगी। इसके लिए विस्तारित जाँच नहीं होनी चाहिए, बल्कि केंद्रित जाँच काफी है।”

क्या है मामला ?

तेलंगाना हाई कोर्ट ने यह फैसला एक मुस्लिम दंपति के मामले में सुनाया है। मामले में एक मुस्लिम बीवी ने अपने शौहर को खुला की माँग की, लेकिन शौहर ने उसकी माँग को ठुकरा दिया। इसके बाद बीवी ने फैमिली कोर्ट में केस दर्ज कराया। यहाँ कोर्ट ने बीवी के पक्ष में फैसला सुनाया।

इसके बाद गैर-सरकारी संगठन सदा-ए-हक शरई परिषद ने मुस्लिम व्यक्ति को तलाक प्रमाण-पत्र सौंप दिया। परिषद निकाह के बाद छिड़े गृह कलह के समाधान कराने का काम करता है। लेकिन व्यक्ति ने इस प्रमाण-पत्र के विरोध में तेलंगाना हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी। अब तेलंगाना हाई कोर्ट ने मुस्लिम व्यक्ति को फटकार लगाई है और मुस्लिम महिला के पक्ष में फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने इस मामले में कुरान की आयतों में ‘खुला’ का अध्ययन किया। साथ ही इस मामले में इतिहास की परतें भी खोली। जिसमें कहा गया, “कुरान के अध्याय-2 की आयत 228 और 229 में बीवी को अपने शौहर के साथ निकाह को रद्द करने का पूर्ण अधिकार दिया गया है। खुला की वैधता के लिए शौहर की सहमति कोई पूर्व शर्त नहीं है।”

साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर शौहर अपनी बीवी की खुला की माँग को स्वीकार नहीं करता है, तो इस्लाम में इस मामले पर कोई भी प्रक्रिया नहीं है। चाहे वह कुरान, सुन्नत या पैगंबर हो।

क्या है खुला?

खुला के तहत अगर बीवी अपने शौहर से अलग होती है तो उसे अपने शौहर से उसकी जायदाद लौटानी पड़ेगी। पर यह जरूरी है कि दोनों इसके लिए रजामंद हों। उल्लेखनीय है कि खुला की पहल केवल बीवी ही कर सकती है। कुरान और हदीस में इसका जिक्र है।

वहीं, भारत में मुस्लिमों के बीच मान्य पुस्तक फतवा-ए-आलमगीरी में कहा गया है कि जब निकाह के बाद शौहर-बीवी इस बात पर राज़ी हैं कि अब वे साथ नहीं रह सकते तो बीवी कुछ संपत्ति शौहर को वापस करके स्वयं को उसके बंधन से मुक्त कर सकती है। जायदाद में बीवी अपनी मेहर की रकम छोड़ सकती है या फिर कोई अन्य रकम/संपत्ति दे सकती है।

खुला को लेकर मुस्लिमों की आपत्ति

‘खुला’ को लेकर हनफी सहित कुछ तबके के उलेमाओं का कहना है कि इसके तहत मुस्लिम महिला तभी तलाक ले सकती है, जब उसका शौहर तैयार हो। अगर शौहर मना कर दे तो महिला के पास मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम 1939 के प्रावधानों के तहत अदालत जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने साल 2021 में ‘खुला’ के संबंध में कहा था कि इस प्रक्रिया में पति की स्वीकृति एक शर्त है। वहीं, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कुरान एक मुस्लिम बीवी को एक प्रक्रिया निर्धारित किए बिना उसकी निकाह को रद्द करने के लिए ‘खुला’ का अधिकार देता है।

मद्रास हाई कोर्ट ने भी ‘खुला’ पर सुनाया था फैसला

मद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के ‘खुला’ को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिलाएँ ‘खुला’ के तहत अपने शौहर से तलाक लेने की अधिकारी हैं। हालाँकि, कोर्ट ने इसके लिए कुछ प्रावधान बताए हैं।

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ‘खुला’ के तहत तलाक लेने के लिए मुस्लिम महिलाओं को फैमिली कोर्ट जाना होगा। किसी निजी शरीयत परिषद को इस संबंध में प्रमाण पत्र जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसे प्रमाण-पत्र की कोई मान्यता नहीं है।

आपातकाल का ठीकरा भी सागरिका घोष ने RSS के सिर फोड़ा, इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस को बताया एकदम पाक साफ: नसबंदी से लेकर मीडिया सेंसरशिप पर नहीं फूटे बोल

आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सासंद और पूर्व ‘पत्रकार’ सागरिका घोष ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा की। इसमें उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को की शान में कसीदे पढ़ने शुरू किए और आपातकाल के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को ही जिम्मेदार ठहरा दिया।

मंगलवार (25 जून 2025) को सागरिका ने एक्स पर साझा पोस्ट में कहा कि इंदिरा गाँधी ने 1975 में आपातकाल लागू किया क्योंकि RSS भारत को आराजकता की ओर में धकेल रहा था।

सागरिका यहीं नहीं रुकीं। इसके बाद उन्होंने इंदिरा की शान में कसीदों के चिट्ठे पढ़ने शुरू कर दिए। उन्होंने लिखा कि इंदिरा ने इस्तीफा दिया, चुनाव करवाए, जनता के सवालों के जवाब दिए।

अपनी इस पोस्ट में सागरिका ने 1978 में इंदिरा गांधी की प्रेस से बातचीत करते हुए वीडियो साझा की और इसमें भी वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसना नहीं भूली। उन्होंने लिखा कि पीएम मोदी इमरजेंसी की नकल करने में व्यस्त रहते हैं और गाँदी की तरह प्रेस कॉफ्रेंस क्यों नहीं करते।

पोस्ट में लगी इंदिरा गाँधी की वीडियो में वह जनता के समर्थन का दावा करती नजर आ रही हैं। वीडियों में वह कह रही हैं, “राजनीति में मेरा भविष्य जैसा मीडिया ने कहा है बिल्कुल वैसा नहीं है। मुझे हमेशा से ही लोगों का समर्थन मिलता रहा है फिर चाहे स्थिति कैसे भी हो या कैसी भी बनाने की कोशिश की गई हो। हारने के तुरंत बाद भी मैं जहाँ भी गई वहाँ पर मुझे लोगों का समर्थन मिला। भले ही आप लोगों ने मेरी कैसी भी छवि बनाने की कोशिश की हो।”

आगे के सवाल में इंदिरा ने कहा, “देखिए मैंने सेंसरशिप लगाया और मैं इस बात को मानती हूँ कि मैंने इसे लगाया है। ये लोग कह रहे हैं कि इसमें कई बंधन थे जो कि पूरी तरह से अलग बात है।” वीडियो के अंत में इंदिरा गाँधी को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वह नहीं चाही कि लोगों को ‘पीड़ित’ बनाया जाए।

इस प्रोपेगेंडा वीडियो को उपयोग करके सागरिका घोष ने कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी के लिए ये बताने की कोशिश की कि वह लोगों के लिए कितनी दयालु थीं और RSS ने ही इंदिरा गाँधी को इमरजेंसी लागू करने के लिए ‘उकसाया’।

आपातकाल के पीछे की सच्चाई क्या है?

आपातकाल को 25 जून 1975 को घोषित किया गया। ये 21 मार्च 1977 तक चला था। इस दौर को स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है। इसे लागू करने वाली तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ही थीं। इस दौरान मौलिक अधिकारों के साथ प्रेस की स्वतंत्रता को भी खत्म कर दिया गया था। इसी समय, विपक्ष के नेताओं को जेल भेजा गया और लोगों के अधिकारों का हनन बुरी तरह से किया गया।

इस पूरे समय का असल कारण राजनीतिक उथल-पुथल था, न कि RSS की ओर से की गई कोई काल्पनिक ‘अराजकता’। 1971 की जंग में जीत के बाद बांग्लादेश के उभरने के साथ ही इंदिरा गाँधी की प्रतिष्ठा को काफी हद तक बढ़ा दिया था। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस सरकार की सत्ता के दौरान बढ़ती मँहगाई, पूँजीवाद और बढ़ते भ्रष्टाचार के चलते 1974 तक जनता में अविश्वास की लहर साफ देखने के मिल रही थी।

इसके बाद 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट में जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गाँधी को 1971 के लोकसभा चुनाव में धोखाधड़ी करने के आरोप को सही ठहराते हुए उनकी सीट को अमान्य घोषित कर दिया।

इसे लेकर विपक्ष के बड़े नेताओं ने इंदिरा के इस्तीफे की माँग को लेकर देशव्यापी आंदोलन किया। कॉन्ग्रेस सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए गए। इसी के बाद इंदिरा गाँधी ने बेटे संजय गाँधी और सहयोगी सिद्धार्थ शंकर रे की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को आपातकाल घोषित करने का निर्देश दिया था।

इसके बाद 25 और 26 जून की आधी रात को जयप्रकाश नारायण को आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (MISA) के तहत गिरफ्तार किया। आपातकाल के इन 21 महीनों के दौरान इंदिरा गाँधी का अलग रुख नजर आया। भारतीय प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाया गया। 1 लाख से भी अधिक लोगों की मानमाने तौर पर गिरफ्तारियाँ की गईं।

पुलिस हिरासत में लोगों को प्रताड़ित किया गया, यातनाएं दी गईं। साथ ही गरीबों और कमजोर वर्गों के लगभग 80 से 120 लाख लोगों की जबरन नसबंदी करने का अभियान चलाया गया। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की लोकतांत्रिक छवि भी खराब हुई। इंदिरा की सरकार में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर कई रिपोर्ट्स छापी गई।

अब इसी आपातकाल को 50 वर्ष बाद सागरिका घोष जैसे लोग नए तरीके से लोगों के बीच परोसने की कोशिश कर रहे हैं ताकि RSS को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा सकें और कॉन्ग्रेस की बची कुची छवि को सुधार सकें।

मंदिर की जमीन से हटाओ सेंट जोसेफ स्कूल- मद्रास हाईकोर्ट ने 5 साल पहले कहा था, लेकिन केरल की वामपंथी सरकार ने अब तक नहीं किया अमल: 5 IAS अधिकारियों को नोटिस

तमिलनाडु में 5 आईएएस अफसरों को मद्रास हाईकोर्ट ने अवमानना का नोटिस जारी किया है। ये नोटिस देवनाथ स्वामी मंदिर की जमीन पर सेंट जोसेफ मैट्रिकुलेशन हायर सेकेंडरी स्कूल चलाने को लेकर है।

न्यायमूर्ति केआर श्रीराम और न्यायमूर्ति सुंदर मोहन की खंडपीठ ने जिन आईएएस अधिकारियों को नोटिस जारी किए, उनके नाम हैं :

  1. एस मधुमती, सचिव, स्कूल और शिक्षा विभाग
  2. डॉ बी चंद्रमोहन, सचिव, पर्यटन, संस्कृति, मानव संसाधन और सीई विभाग
  3. पीएन श्रीधर, आयुक्त, हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती प्रशासन विभाग
  4. सिबी आदित्य सेंथिलकुमार, जिला कलेक्टर, कुड्डालोर
  5. इसके अलावा एचआर एंड सीई विभाग के दो संयुक्त आयुक्तों का नाम भी उच्च न्यायालय द्वारा जारी नोटिस में शामिल है। हाईकोर्ट ने इन सभी अधिकारियों को 10 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा है।

बीजेपी के आध्यात्मिक और मंदिर विकास विंग के राज्य सचिव एस विनोद राघवेंद्रन ने ये याचिका दायर की थी। इसमें याचिकाकर्ता ने मद्रास उच्च न्यायालय के अप्रैल 2024 के आदेश का पालन न करने का आरोप लगाया था। अप्रैल 2024 में, उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के अधिकारियों को सेंट जोसेफ स्कूल के लिए वैकल्पिक भूमि खोजने के लिए कहा था।

एस विनोद राघवेंद्रन ने अपनी याचिका में कहा था कि कुड्डालोर में जिस जमीन पर सेंट जोसेफ मैट्रिकुलेशन और हायर सेकेंडरी स्कूल चल रहा है, वह एक हिंदू मंदिर की जमीन है। इसे खाली कराने की कई कोशिशें की गई लेकिन अतिक्रमण नहीं हटाया जा सका।

मद्रास उच्च न्यायालय में स्कूल ने भी 2009 में रिट याचिका दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 4.5 एकड़ जमीन स्कूल को 6 महीने के अंदर आवंटित करने का आदेश सरकार को दिया था। राज्य सरकार के वकील ने न्यायालय को बताया कि वैकल्पिक व्यवस्था अभी तक राज्य सरकार ने नहीं की है। छात्रों को दिक्कत न हो इस पर भी विद्यालय का जोर है।

इसके बाद अप्रैल 2024 में कोर्ट ने स्कूल को वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने के लिए राज्य को 6 महीने का और वक्त दिया था। लेकिन राज्य सरकार अब तक कोई कदम नहीं उठा पाई।

याचिकाकर्ता एस विनोद रघुनाधरन ने हाईकोर्ट में कहा कि राज्य सरकार की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया गया है कि स्कूल को कहाँ ले जाएँगे? और न ही ये निश्चित किया गया है कि स्कूल की जमीन से अवैध कब्जा कब हटेगा?

मनोरमा यादव, नीलम यादव, ब्रजेश यादव… सारे सुनाते हैं कथा, सुनते हैं ब्राह्मण भी: इटावा की घटना में ‘जाति’ खोजने और टूट पड़ने की यह प्रवृत्ति सनातन के लिए भी खतरनाक

उत्तर प्रदेश के इटावा की एक घटना ने सामाजिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। यह मामला एक कथावाचक मुकुट मणि और उसके सहयोगियों के साथ हुई मारपीट, जातीय विवाद और छेड़छाड़ के आरोपों से शुरू हुआ, जो अब ब्राह्मण बनाम ओबीसी-दलित की तर्ज पर एक सामाजिक-राजनीतिक रंग ले चुका है। इस पूरे प्रकरण में कई आयाम हैं – जातिगत संवेदनशीलता, सोशल मीडिया पर त्वरित प्रतिक्रियाएँ और कथावाचक की शुचिता जैसे गंभीर मुद्दे।

इस लेख में हम इस मामले को विस्तार से समझेंगे। साथ ही यह भी देखेंगे कि सनातन परंपरा में कथावाचन को लेकर कोई जातिगत बाध्यता नहीं रही है। हम उन कथावाचकों के उदाहरण भी देंगे जो गैर-ब्राह्मण हैं। हम आपको इस मामले के जबरदस्त तरीके से वायरल होने के पीछे की वजह भी बताएँगे कि कैसे कुछ लोग बिना पूरा सच जाने ब्राह्मणों को निशाना बनाकर अपनी राजनीति चमकाने में लग जाते हैं।

इटावा का दांदरपुर से जुड़ा क्या है पूरा मामला

इटावा के बकेवर थाना क्षेत्र के दांदरपुर गाँव में 21 जून 2025 को श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ था। कथावाचक मुकुट मणि और उनके सहयोगी संत सिंह व्यास को एक ब्राह्मण परिवार ने कथा के लिए बुलाया था। आयोजक परिवार की महिला रेनू तिवारी और उनके पति जय प्रकाश तिवारी ने आरोप लगाया कि कथावाचक ने कथा के दौरान और बाद में अभद्र व्यवहार किया।

पीड़ित रेनू का दावा है कि कथावाचक ने कलश यात्रा के दौरान उनका हाथ गलत नियत से पकड़ा और जब इसका विरोध किया गया तो धमकी दी कि वे समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के रिश्तेदार हैं।

इसके बाद मामला और गंभीर हो गया जब यह सामने आया कि कथावाचक ने अपनी जाति छिपाई थी। उनके पास दो आधार कार्ड मिले, जिनमें से एक में वे खुद को ब्राह्मण (अग्निहोत्री) बता रहे थे। ग्रामीणों को उनकी वास्तविक जाति (यादव) का पता चलने पर विवाद बढ़ा और 22 जून की रात कुछ लोगों ने कथावाचकों के साथ मारपीट की, उनकी चोटी काटी और नाक रगड़वाने की घटना हुई। इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया और बकेवर थाने में दो नामजद और 50 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ।

इस घटना ने स्थानीय स्तर पर सामाजिक तनाव पैदा कर दिया। ब्राह्मण महासभा ने इसे ब्राह्मणों के खिलाफ साजिश बताते हुए कथावाचकों पर कार्रवाई की माँग की, जबकि समाजवादी पार्टी और यादव महासभा ने इसे ब्राह्मणों द्वारा ओबीसी-दलित समुदाय के उत्पीड़न के रूप में पेश किया। सोशल मीडिया पर भी इस मामले ने तूल पकड़ा और कई लोगों ने बिना पूरा सच जाने ब्राह्मणों को निशाना बनाना शुरू कर दिया।

सनातन परंपरा में कथावाचक के साथ कोई जातिगत बंधन नहीं

सनातन धर्म में कथावाचन और भक्ति का कोई जातिगत बंधन नहीं रहा है। यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाभारत की ‘व्याध गीता’ है। इस कथा में एक शिकारी (व्याध) जो निम्न माने जाने वाले समुदाय से था, वो एक ब्राह्मण को कर्म और धर्म का उपदेश देता है। यह उपदेश भगवद्गीता जितना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। सनातन परंपरा में ज्ञान, भक्ति और कथावाचन के लिए जाति कभी आड़े नहीं आई।

आधुनिक समय में भी कई गैर-ब्राह्मण कथावाचक हैं, जो समाज में सम्मानित हैं और जिनकी कथाओं में लाखों लोग शामिल होते हैं। इसे कुछ उदाहरणों से भी समझ सकते हैं –

मोरारी बापू: गुजरात के प्रसिद्ध कथावाचक मोरारी बापू बनिया समुदाय से हैं। उनकी रामचरितमानस की कथाएँ देश-विदेश में लाखों लोगों द्वारा सुनी जाती हैं। उनके भक्तों में हर वर्ग के लोग शामिल हैं और उनकी सादगी और विद्वता की कोई जातिगत सीमा नहीं है।

आचार्या मनोरमा सिंह यादव: उत्तर प्रदेश की यह कथावाचक श्रीमद्भागवत महापुराण और रामकथा कहती हैं। उनकी कथाओं के यूट्यूब वीडियो को लाखों लोग देखते हैं। यादव समुदाय से होने के बावजूद उन्हें हर वर्ग का सम्मान प्राप्त है।

नीलम यादव शास्त्री: यह भी एक लोकप्रिय कथावाचक हैं, जिनके भजन और कथाएँ विशेष रूप से महिलाओं के बीच लोकप्रिय हैं। उनकी कथाओं में भारी भीड़ होती है और वे भी गैर-ब्राह्मण हैं।

हेमराज सिंह यादव: कॉमेडी और भक्ति का अनूठा मिश्रण करने वाले इस कथावाचक के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल रहते हैं। उनकी कथाओं में भी हर वर्ग के लोग शामिल होते हैं। इसी तरह से मंजेश सिंह यादव भी मशहूर कथावाचक हैं।

डॉ. ब्रजेश यादव: बरेली के सर्जन डॉक्टर ब्रजेश यादव कथा वाचन के साथ-साथ रामचरितमानस की प्रतियाँ बाँटते हैं। वो नवजात शिशुओं के कानों में ‘रामभक्त बनना’ का संदेश देते हैं।

हनुमान प्रसाद पोद्दार: गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित रामचरितमानस की टीका इन्हीं की है, जो आज विश्व में सबसे अधिक पढ़ी जाती है। वे भी गैर-ब्राह्मण थे। हनुमान प्रसाद पोद्दार सनातन के रक्षक, प्रचारक थे, जिनकी वजह से सनातन संस्कृति आज विश्व के कोने कोने में है। उन्होंने सनातन विरोधियों चाहे वो जवाहरलाल नेहरू जैसे देश के ब्राह्मण प्रधानमंत्री ही क्यों न रहे हों, उन पर भी निशाना साधा और वो कभी सनातन की लड़ाई से पीछे नहीं हटे। हनुमान प्रसाद पोद्दार कभी कथावाचक नहीं रहे, बल्कि वो सनातन के रक्षक, प्रचारक और अग्रदूत थे।

ये उदाहरण साबित करते हैं कि सनातन परंपरा में कथावाचन का कोई जातिगत आधार नहीं है। गाँवों में भी अधिकांश मंदिरों के पुजारी गैर-ब्राह्मण समुदायों से हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पुजारियों की कमी के कारण कोई भी व्यक्ति, जिसे धर्म में आस्था हो, मंदिर में पूजा-अर्चना कर सकता है। फिर भी कुछ लोग हर घटना को ब्राह्मण बनाम गैर-ब्राह्मण के चश्मे से देखते हैं और सामाजिक तनाव को बढ़ावा देते हैं।

इटावा मामले को लेकर अखिलेश यादव की राजनीति

इटावा का यह मामला जल्द ही राजनीतिक रंग लेने लगा। समाजवादी पार्टी के नेताओं विशेष रूप से अखिलेश यादव ने इसे ब्राह्मणों द्वारा ओबीसी-दलित उत्पीड़न के रूप में पेश किया। सपा के जिलाध्यक्ष प्रदीप शाक्य ने ब्राह्मण महासभा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अगर कथावाचकों के खिलाफ कोई आपत्ति थी, तो पहले शिकायत क्यों नहीं की गई। दूसरी ओर ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष अरुण दुबे ने इसे ब्राह्मणों के खिलाफ साजिश करार दिया और कथावाचकों पर कार्रवाई की माँग की।

सोशल मीडिया पर भी इस मामले ने तूल पकड़ा। कुछ लोगों ने बिना पूरा सच जाने वीडियो और पोस्ट के जरिए ब्राह्मणों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। 10-15 मिनट में बनाए गए वीडियो और पोस्ट वायरल हो गए, जिनमें ब्राह्मणों को जातिवादी और उत्पीड़क बताया गया। यह प्रवृत्ति गंभीर है, क्योंकि यह न केवल सामाजिक तनाव को बढ़ाती है बल्कि सनातन परंपरा की एकता को भी कमजोर करती है।

ओडिशा का उदाहरण – गलत प्रचार और सवर्णों को निशाना बनाने का एक और नमूना

इटावा का मामला अकेला नहीं है। हाल ही में ओडिशा के रायगढ़ जिले के बैगानगोडा गाँव में एक अनुसूचित जनजाति (ST) परिवार के 40 सदस्यों का ‘शुद्धिकरण’ हुआ, क्योंकि उनकी एक युवती ने अनुसूचित जाति (SC) के लड़के से शादी कर ली थी। गाँव की पंचायत ने परिवार को सिर मुंडवाने और पशु बलि देने का आदेश दिया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और कुछ लोगों ने इसे ‘मनुवादी वर्चस्व’ और ‘सवर्णों द्वारा उत्पीड़न’ बताकर ब्राह्मणों और सवर्णों पर हमला बोला।

हालाँकि, बाद में यह सामने आया कि यह अनुष्ठान परिवार ने अपनी मर्जी से जनजातीय परंपराओं के अनुसार किया था और इसमें किसी सवर्ण समुदाय की कोई भूमिका नहीं थी। फिर भी सोशल मीडिया पर कुछ हैंडल्स जैसे ‘ट्राइबल आर्मी’ व अन्य ने इसे सवर्णों और बीजेपी-आरएसएस के खिलाफ प्रचारित किया।

ऐसा ही अन्य हैंडल्स ने भी किया।

कुछ मीडिया पोर्टल जैसे ललनटॉप ने अपने हेडलाइन से लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की।

यह घटना इस बात का उदाहरण है कि कैसे बिना तथ्यों की जाँच किए सवर्णों और खास तौर पर ब्राह्मणों को निशाना बनाया जाता है।

क्यों बनते हैं ब्राह्मण आसान निशाना?

ब्राह्मण समुदाय को बार-बार निशाना बनाए जाने के पीछे कई कारण हैं। पहला, ब्राह्मणों को सामाजिक और धार्मिक परंपराओं का प्रतीक माना जाता है, जिसके कारण कुछ लोग उन्हें “मनुवादी” या ‘जातिवादी’ बताकर आसानी से निशाना बना लेते हैं। दूसरा, ब्राह्मण समुदाय आमतौर पर ऐसी घटनाओं पर पलटवार नहीं करता या ‘पीड़ित’ की भूमिका में नहीं आता, जिससे कुछ लोग इसे उनकी कमजोरी मान लेते हैं। तीसरा – राजनीतिक दल और सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ लोग ऐसी घटनाओं को अपने निहित स्वार्थों के लिए भुनाते हैं।

इटावा मामले में समाजवादी पार्टी ने इसे हिंदुओं को तोड़ने और ब्राह्मणों को बदनाम करने का मौका बना लिया। अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने बिना पूरा सच जाने इसे सामाजिक भेदभाव का रंग दे दिया। सोशल मीडिया पर भी कुछ लोग तुरंत वीडियो बनाकर ब्राह्मणों को कोसने लगे, बिना यह समझे कि कथावाचक ने खुद गलत व्यवहार किया था और अपनी जाति छिपाई थी।

कथावाचक की शुचिता और सामाजिक अपेक्षाएँ

कथावाचक का स्थान समाज में बहुत ऊँचा होता है। उनसे शुचिता, नैतिकता और सादगी की अपेक्षा की जाती है। इटावा मामले में कथावाचक मुकुट मणि पर छेड़छाड़ और धमकी देने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। इसके अलावा उनके पास फर्जी आधार कार्ड भी मिले। सोशल मीडिया पर तो दावा किया जा रहा है कि पहले आरोपित बौद्ध कथाएँ सुनाता था और फिर भागवत कथा करने लगा। इस तरह की उसकी पिछली गतिविधियों ने भी संदेह पैदा किया है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या कथावाचक की शुचिता पर सवाल उठाना गलत है? और अगर कथावाचक गलत करता है तो क्या उसे उसकी जाति के आधार पर बचाव करना चाहिए?

सनातन परंपरा में कथावाचक का धर्म और आचरण सर्वोपरि होता है, न कि उसकी जाति। अगर कोई कथावाचक गलत करता है, तो उसकी आलोचना होनी चाहिए, चाहे वह किसी भी समुदाय से हो। लेकिन इसे पूरे समुदाय पर हमला करने का मौका बनाना गलत है। इटावा मामले में कुछ लोगों ने इसे ब्राह्मणों के खिलाफ हथियार बनाया, जो न केवल अनुचित है बल्कि सामाजिक एकता के लिए भी हानिकारक है।

सच को समझने की जरूरत

इटावा का दांदरपुर मामला एक जटिल सामाजिक और कानूनी मुद्दा है, जिसमें मारपीट, छेड़छाड़, और जातिगत विवाद जैसे कई पहलू शामिल हैं। पुलिस ने इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया है, और एसएसपी ने दोनों पक्षों की बात सुनकर निष्पक्ष जाँच का आश्वासन दिया है। लेकिन इस मामले को ब्राह्मण बनाम ओबीसी-दलित के रूप में पेश करना और सोशल मीडिया पर त्वरित प्रतिक्रियाएँ देना सामाजिक तनाव को बढ़ाने का काम कर रहा है।

सनातन परंपरा में कथावाचन और भक्ति की कोई जातिगत सीमा नहीं है। मोरारी बापू, मनोरमा सिंह यादव, नीलम यादव और हनुमान प्रसाद पोद्दार जैसे गैर-ब्राह्मण विद्वानों-कथावाचकों ने यह साबित किया है कि भक्ति और ज्ञान का आधार आचरण और श्रद्धा है, न कि जाति। फिर भी कुछ लोग हर घटना को ब्राह्मणों के खिलाफ प्रचार करने का मौका बना लेते हैं, जो न केवल गलत है बल्कि हिंदू समाज की एकता को भी कमजोर करता है।

इस मामले में कानून को अपना काम करना चाहिए। मारपीट और छेड़छाड़ जैसे गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही समाज को भी यह समझना होगा कि बिना पूरा सच जाने त्वरित प्रतिक्रियाएँ देना और किसी एक समुदाय को निशाना बनाना न केवल अनुचित है, बल्कि खतरनाक भी है। हमें ऐसी राजनीति और प्रचार से बचना होगा जो समाज को बाँटने का काम करती है।

राखी बाँधती थी नेहा, फिर भी जबरन निकाह करना चाहता था तौफीक: दिल्ली में हिंदू लड़की की हत्या करने वाला रामपुर से गिरफ्तार, पीड़ित पिता बोले- मेरे सामने बेटी को छत से फेंक दिया

दिल्ली 19 वर्षीय युवती नेहा को पाँचवीं मंजिल से धक्का देकर मौत के घाट उतारने वाला तौफीक उत्तर प्रदेश के रामपुर से पकड़ा गया। यह घटना सोमवार (23 जून 2025) को हुई थी, जब तौफीक ने नेहा को पाँचवीं मंजिल से धक्का दिया था।

राखी बाँधती थी नेहा- परिजन

नेहा के परिवार ने बताया कि वो तौफीक को भाई मानती थी और राखी भी बाँधती थी। पिछले कुछ समय से तौफीक नेहा पर निकाह का दबाव बना रहा था। इसके बाद नेहा ने तौफीक से बात करना बंद कर दिया। नेहा को यह भी पता चला था कि तौफीक ने अपनी बहन के बारे में झूठ बोला था। तौफीक ने कहा था कि उसकी कोई बहन नहीं है।

घटना पूर्व नियोजित

नेहा के परिजनों का कहना है कि ये घटना पूर्व नियोजित थी। नेहा की माँ ने बताया, “मेरी बेटी तड़प-तड़प कर मरी है। मैं चाहती हूँ कि तौफीक का एनकाउंटर किया जाए और उसे फाँसी दी जाए।”

हत्याकांड के विरोध में मंडोली मार्केट को बंद रखा गया। इलाके में पैरा मिलिट्री फोर्स और आसपास के जिलों की रिजर्व पुलिस को तैनात किया गया है।

‘मैं अपनी बेटी को बचा नहीं पाया’- नेहा के पिता

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, नेहा के पिता ने कहा, “जब मैं ऊपर पहुँचा तो देखा कि तौफीक मेरी बेटी का गला दबा रहा है। उसने उसे छत से धक्का दे दिया और वह गिरकर मर गई।”

पिता ने बताया कि उन्होंने नेहा को बचाने की कोशिश की थी, लेकिन तौफीक ने उन्हें धकेल कर नेहा को छत से नीचे फेंक दिया और वो कुछ भी नहीं कर पाए।

‘मैं तुझे कहीं का नहीं छोड़ूँगा’- तौफीक

मीडिया रिपोट्स के अनुसार, माँ ने कहा, “तौफीक नेहा के ऑफिस में बार-बार फोन करता था और उससे बात करने के लिए परेशान करता था। एक हफ्ते पहले तौफीक ने नेहा को धमकी देकर बोला, “मैं तुझे कहीं का नहीं छोड़ूँगा।”

माँ ने बताया कि मैंने लोगों की चीखें सुनी, लोग चिल्ला रहे थे ‘पकड़ो उसे… पकड़ो उसे…’ मैंने तौफीक को भागते हुए देखा था।

जिस ‘गंगा जल बँटवारा संधि’ से बांग्लादेश को मिलता रहा 35000 क्यूसेक पानी, उसे देने पर अब भारत करेगा विचार: 30 साल पहले हुए समझौते की मियाद पूरी, बांग्लादेश खौफ में

भारत में विकास और जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच बांग्लादेश के साथ ऐतिहासिक गंगा जल-बँटवारे की संधि की समीक्षा का वक्त आ गया है। दरअसल भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बँटवारा समझौता 2026 में अपनी अवधि पूरी कर रहा है। भारत ने संकेत दिया कि वह घरेलू जल आवश्यकताओं में वृद्धि के कारण गंगा संधि पर फिर से बातचीत करना चाहता है।

गौरतलब है कि भारत ने पाकिस्तान के साथ हुए सिंधु जल समझौता को निरस्त कर दिया है। गृह मंत्री अमित शाह ने ये भी दोहराया है कि ये ‘अतीत की बात’ हो गई है। ये समझौता भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद निरस्त किया था। नई दिल्ली ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया था।

बांग्लादेश में भी राजनीतिक परिस्थितियाँ 30 साल पुरानी वाली नहीं है। गंगा समझौता के तहत बांग्लादेश को बगैर किसी रुकावट के पानी मिलता रहे इसके लिए समझौता करना जरूरी है।

ये संधि 30 साल के लिए था। भारतीय अधिकारी चाहते हैं कि यह केवल 10-15 साल तक का हो। संधि पर भारत के रुख ने बांग्लादेश को चिंतित कर दिया है।

अतीत के आईने में गंगा जल बंटवारा संधि

गंगा नदी भारत और बांग्लादेश के लोगों की जीवनदायिनी है। इसके पानी को साझा करना दोनों देशों के लिए एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। दोनों देशों के बीच जल बँटवारे को लेकर विवाद 1950 के दशक से शुरू हुआ। उस वक्त भारत ने कोलकाता की ओर पानी मोड़ने के लिए पश्चिम बंगाल के फरक्का में बैराज बनाना शुरू किया।

1971 में अलग राष्ट्र बनने के बाद बांग्लादेश और भारत ने मिलकर इसके समाधान का प्रयास किया। 1972 में भारत और बांग्लादेश ने एक संयुक्त नदी आयोग (JRC) का गठन किया। 1977 में 5 साल के लिए जल-बँटवारे का समझौता हुआ। 1978 से 1982 के बीच लागू इस समझौते के तहत बांग्लादेश को हर हाल में जल उपलब्ध कराने की गारंटी दी गई। समझौता खत्म होने के बाद दोनों देशों ने करीब एक दशक तक जल संसाधनों के बँटवारे पर कोई औपचारिक समझौता नहीं किया। इस दौरान भारत ने गर्मी में गंगा के पानी को अपनी तरफ मोड़ा, जिससे बांग्लादेश के साथ संबंधों में तनाव पैदा हुआ। 1990 के दशक में दोनों पक्षों ने माना कि फरक्का बैराज विवाद को हल करने और गंगा जल बँटवारे के लिए दीर्घकालिक संधि की आवश्यकता है।

1996 में गंगा जल समझौते पर हुआ हस्ताक्षर

भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय तक बातचीत चली। आखिरकार, 12 दिसंबर 1996 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा और बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने जल-बँटवारे के समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते को एक ऐसी सफलता के रूप में देखा गया जिसने नदी को लेकर दोनों देशों के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव को खत्म कर दिया।

बांग्लादेश ने इस संधि को अपने किसानों और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जरूरत के रूप में देखा। जबकि भारत ने इसे एक पड़ोसी देश के साथ सहयोग करने के तौर पर लिया। यह समझौता ऐसे समय में हुआ जब दोनों देशों के बीच रिश्ते मधुर हो रहे थे। ढाका में नवगठित हसीना सरकार भारत के साथ अच्छे संबंध बनाना चाहती थी, वहीं भारत की संयुक्त मोर्चा सरकार बांग्लादेश के साथ अच्छे संबंध सुनिश्चित करना चाहती थी।

गंगा जल समझौते के तहत जल बंटवारा

गंगा जल बँटवारा संधि में जब गंगा में कम जल स्तर होता है तो जल बंटवारा कैसे किया जाए? इस पर सहमति बनी थी। फरक्का में गंगा नदी के प्रवाह के पुराने डेटा के मुताबिक माना गया कि 1 जनवरी से 31 मई के बीच जल स्तर कम रहता है। ये डेटा 1949 से 1988 तक के गंगा नदी में जल प्रवाह के डेटा के आधार पर बताया गया।

जब गंगा का प्रवाह कम होता है, तो भारत और बांग्लादेश पानी का बँटवारा बराबर-बराबर करें। लेकिन बाकी के वक्त भारत गंगा के जल का एक निश्चित हिस्सा लेगा।

  1. फरक्का में जब जल का बहाव 70,000 क्यूसेक या उससे कम होता है तो इसे कम माना जाता है। ऐसे वक्त में दोनों देशों को आधा-आधा पानी मिलता है।
  2. जब प्रवाह 70,000 और 75,000 क्यूसेक के बीच होता है, तो इसे मध्यम माना जाता है। इस वक्त बांग्लादेश को 35,000 क्यूसेक मिलता है जबकि भारत को बाकी पानी मिलता है।
  3. फरक्का में जब गंगा नदी का प्रवाह 75,000 क्यूसेक से अधिक होता है, तो भारत 40,000 क्यूसेक तक पानी ले सकता है और बाकि 35000 क्यूसेक पानी बांग्लादेश को मिलता है।
  4. यह संधि दोनों देशों को गर्मी के मौसम में जब जल प्रवाह नदी में कम होता है, उस वक्त बराबर पानी मिले ये तय करता है। इससे खेतों की सिंचाई में कोई बाधा न आए।
  5. हालाँकि अगर गंगा का जलस्तर असामान्य रूप से कम हो जाता है, तो न्यूनतम प्रवाह की कोई गारंटी नहीं है। दोनों देश आपस में बातचीत कर समस्या सुलझाएँ। संधि के अनुच्छेद II में ये बातें कही गई है।

कौन करता है प्रवाह की निगरानी?

गंगा नदी में जल प्रवाह की निगरानी के लिए भारत-बांग्लादेश संयुक्त नदी आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने एक संयुक्त समिति गठित की जिसमें दोनों पक्षों के तकनीकी अधिकारियों को शामिल किया गया। ये कमेटी गंगा जल स्तर की निगरानी, ​​डेटा का आदान-प्रदान और बाकी काम करती है।

संयुक्त समिति आम तौर पर साल में तीन बार मिलती है। अगर बीच में कोई समस्या आ गई हो, तो उसका हल निकालने के लिए आपात बैठक भी कर सकती है। इसमें तीसरे पक्ष की भागीदारी के लिए कोई प्रावधान नहीं है।

सहयोग और विवाद के तीन दशक

संधि पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद से लगभग 30 साल बीत चुके हैं। इस दौरान कई बार दोनों देशों के बीच विवाद हुए हालाँकि समझौते का सम्मान किया गया। जल स्तर पर निगरानी रखने वाली समिति में दोनों देशों के प्रतिनिधि नियमित रूप से मिलते हैं और डेटा का आदान-प्रदान करते हैं।

हालांकि कई बार बांग्लादेश ने समझौते को लेकर निराशा व्यक्त की है, खासकर उन वर्षों में जब नदी में पानी का प्रवाह काफी कम था।

कुछ अध्ययनों से पता चला है कि वास्तविक जल आपूर्ति वादे से कम की गईं। 1997 से 2016 के बीच, 300 दस-दिवसीय अवधियों में से 94 में, बांग्लादेश को अपने हार्डिंग ब्रिज बिंदु पर फरक्का में दर्ज की गई तुलना में कम पानी मिला। बांग्लादेश ने दावा किया कि उसे हमेशा जल की आपूर्ति कम होती है। बांग्लादेश ने यहाँ तक ​​आरोप लगाया कि भारत कभी-कभी गर्मी के महीने में पानी रोक लेता है और फिर बाद में ज्यादा पानी देकर इसकी भरपाई करता है। इससे बांग्लादेश में फसलों को नुकसान पहुँचता है।

बांग्लादेश में पर्यावरण से जुड़े संगठनों ने भी पारिस्थितिकी तंत्र को होने वाले नुकसान की ओर इशारा किया है। उन्होंने दावा किया है कि संधि फरक्का में जल के बँटवारे पर केन्द्रित है और बांग्लादेश के दूसरे हिस्सों पर होने वाले प्रभाव की अनदेखी करता है। गंगा के निचले हिस्सों में नदी का खारापन लगातार बढ़ रहा है और इससे भूमि बंजर होती जा रही है।

जबकि भारत का मत है कि संधि के इतर उसने बांग्लादेश को ज्यादा पानी दिया है। पश्चिम बंगाल के राजनेताओं ने शिकायत की है कि उनके अपने किसान और शहर पानी की कमी का सामना कर रहे हैं, जबकि भारत संधि की वजह से बांग्लादेश को गंगा जल देता है।

कोलकाता बंदरगाह में जम रहा है गाद

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने संधि को ‘एकतरफा’ करार देते हुए इसकी समीक्षा पर जोर दिया है। उन्होने हर हाल में नई संधि किए जाने पर बंगाल को अधिक गंगा का जल देने की माँग की है। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट यानी श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट तक 40,000 क्यूसेक पानी लगातार रहे इसके लिए फरक्का बैराज बनाया गया।

लेकिन 1996 की गंगा जल संधि ने फरक्का बैराज के संचालन के तरीके में बदलाव करने के लिए मजबूर किया। कोलकाता के इस व्यस्त बंदरगाह में गाद जमा हो रही है, जिससे जहाजों के आवागमन में दिक्कतें आ रही हैं। यहाँ तक कि फरक्का में स्थित एनटीपीसी के प्लांट को भी पानी की कमी का सामना करना पड़ता है।

भारत के दूसरे राज्यों की भी अलग-अलग शिकायतें हैं। फरक्का से ऊपर बिहार को दिक्कत है कि मॉनसून के दौरान कभी-कभी बैराज से बहुत ज्यादा पानी छोड़ दिया जाता है जिससे बाढ़ आ जाती है। इस वक्त फरक्का बैराज के गेट भी खोल दिए जाते हैं, जिससे बिहार के गंगा बेसिन में गाद और बाढ़ का प्रकोप बढ़ जाता है।

बदलते माहौल में संधि की समीक्षा बेहद जरूरी है इसलिए 2026 में संधि की समाप्ति की तारीख आ रही है, तो उम्मीद की जा रही है कि भारत लंबे समझौते के लिए तैयार नहीं होगा बल्कि इसकी अवधि थोड़ी छोटी होगी। इसकी तैयारी भी शुरू हो गयी है। पिछले साल भारत सरकार ने गंगा से होने वाली घरेलू जल आवश्यकताओं का आकलन करने के लिए पश्चिम बंगाल और बिहार के प्रतिनिधियों सहित एक समिति का गठन किया।

बांग्लादेश कहता रहा है कि जल हिस्से में अगर कमी की गई तो उसे भयावह स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। गर्मी के महीनों में कृषि, मत्स्य पालन और पेयजल आपूर्ति की गंभीर समस्या पैदा होगी। जून 2024 में शेख हसीना की दिल्ली यात्रा के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने आश्वासन दिया कि संधि को बढ़ाए जाने पर बातचीत शुरू होगी, हालाँकि अब परिस्थितियाँ बदल गई हैं।

मार्च 2025 में दोनों देशों के विशेषज्ञों की कोलकाता में बैठक हुई। इसमें फरक्का में जल प्रवाह को संयुक्त रूप से मापने की बात कही गई। इस बीच पर्यावरण वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन की चेतावनी दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि गंगा का प्रवाह अनियमित होता जा रहा है। कभी लंबे समय तक जल प्रवाह काफी कम रहता है तो कभी कम वक्त में ज्यादा बारिश से पानी का जलस्तर बढ़ जाता है।

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट द्वारा 2019 में किए गए एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि जलवायु परिवर्तन आने वाले दशकों में गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के रास्ते में बदलाव ला सकता है। इससे लाखों लोग प्रभावित होंगे।

दोनों पक्षों ने माना है कि नई संधि में पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने और जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रख कर बनाया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का सुझाव है कि नई संधि में बेहतर डेटा संकलन, संयुक्त बाढ़ प्रबंधन की नीतियाँ भी होनी चाहिए, जिससे जल बँटवारा सही तरीके से धरातल पर उतर सके।

बांग्लादेश में बदल गई है सत्ता

हमें ये भी याद रखना चाहिए कि भारत और बांग्लादेश के बीच नई संधि पर राजनीतिक परिस्थितियों का भी असर पड़ेगा। अगस्त 2024 से बांग्लादेश में अंतरिम सरकार है। भारत ने संकेत दिया है कि वह ढाका में एक निर्वाचित सरकार के साथ बड़े समझौते करना पसंद करता है।

बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार का चीन- पाकिस्तान के साथ नजदीकियाँ बढ़ गई हैं। इसलिए भारत ज्यादा सतर्क है। संधि की शर्तें आने वाले दशकों में भारत और बांग्लादेश के बीच राजनयिक संबंधों का भविष्य तय करेंगी। 2026 में संधि को समाप्त होने देना दोनों देशों के बीच अनिश्चितता और अविश्वास की शुरुआत कर सकता है।

भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल समझौता संतुलित होना चाहिए। भारत के विकास की रफ्तार को देखते हुए अब 1996 के समझौते में तय की गई शर्तों को जारी रखना संभव नहीं है। किसी भी दो देशों के बीच जल बँटवारे के लिए हमेशा कूटनीति, वैज्ञानिक प्रबंधन और समझौते की भावना की आवश्यकता होती है। गंगा का जल 30 वर्षों से दोनों देशों के बीच शांतिपूर्वक बह रहा है। आने वाले दिनों में गंगा अविरल रहे ये भी जरूरी है, क्योंकि ये दोनों देशों की लाइफ लाइन है। ये समझौता इस ख्याल से भी मील का पत्थर साबित होगा।

6 साल पुराने मामले में IPS गौरव उपाध्याय पर असम के POCSO कोर्ट में आरोप तय, मोबाइल में Video दिखाने के बहाने यौन शोषण का है आरोप

असम कैडर के आईपीएस अधिकारी गौरव उपाध्याय के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। एक स्पेशल कोर्ट ने 6 साल पुराने यौन शोषण केस मामले में गौरव उपाध्याय के खिलाफ पॉक्सो (POCSO) एक्ट और भारतीय दंड संहिता (IPC) की अन्य धाराओं के तहत आरोप तय करने का आदेश दिया है। इसका मतलब है कि अब उन पर कानूनी रूप से मुकदमा चलेगा।

यह मामला दिसंबर 2019 का है। उस समय गौरव उपाध्याय कार्बी आंगलोंग जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) थे। गौरव उपाध्याय पर आरोप है कि उन्होंने एक 14 साल की नाबालिग लड़की को जबरदस्ती किस किया और प्राइवेट पार्ट को छुआ था।

जानें पूरा मामला

कोर्ट पहुँचे यौन शोषण के इस मामले में बताया गया है कि पीड़िता के साथ दो बार यौन शोषण की घटना हुई थी। पहली दीफू में SP बंगले में और दूसरी उस होटल के कमरे में जहाँ पीड़िता अपनी माँ और भाई के साथ रुकी हुई थी।

आरोप पत्र में बताया गया है कि पीड़िता अपनी माँ और भाई के साथ IPS उपाध्याय के बेटे की जन्मदिन की पार्टी में गई थी। पार्टी के बाद उपाध्याय उन्हें अपना दफ्तर दिखाने ले गए। आरोप है कि जब लड़की की माँ वॉशरूम गई थीं, तो उपाध्याय ने लड़की के भाई के सामने ही लड़की को जबरन दो बार KISS किया था।

इसके बाद उपाध्याय ने तीनों (माँ, बेटे और लड़की) को एक होटल में छोड़ा, जहाँ उन्होंने उनके लिए एक सुइट बुक किया था। आरोप है कि होटल के कमरे में उपाध्याय ने अपने मोबाइल पर वीडियो दिखाने के बहाने लड़की के प्राइवेट पार्ट को छुआ और उसे चूमने की कोशिश की। लड़की किसी तरह बेडरूम में जाकर दरवाजा बंद कर पाई।

जब अगले दिन लड़की की माँ को इस बारे में पता चला तो उन्होंने 3 जनवरी 2020 को गुवाहाटी के महिला पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज करवाया। बाद में यह मामला अपराध जाँच विभाग (CID) को सौंप दिया गया। CID ने जाँच के बाद IPS अधिकारी के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया, जिसमें पर्याप्त सबूत होने की बात कही गई।

कोर्ट ने कहा है कि आरोपित ने नाबालिग लड़की को जबरन चूमा और उसके प्राइवेट पार्ट को हाथ लगाया जो कि एक आपराधिक कृत्य है। कोर्ट ने साइकोलॉजिस्ट की रिपोर्ट का भी हवाला दिया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि लड़की इस घटना के बाद सदमें और अवसाद में चली गई थी।

बता दें कि गौरव उपाध्याय 2012 बैच के IPS अधिकारी हैं और वर्तमान में असम राज्य परिवहन विभाग के अतिरिक्त सचिव के पद पर कार्यरत हैं। अब इस मामले में उन पर मुकदमा चलेगा। अगली सुनवाई 10 जुलाई 2025 को होगी।

अमेरिका नहीं कर पाया ईरानी न्यूक्लियर प्लांट्स तबाह… CNN और NYT की खबर देख भड़के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप: कहा- ये केवल Fake News, US को कमजोर दिखाना है मकसद

हाल ही में एक अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट सामने आई, जिसमें दावा किया गया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर जिन ईरान के तीन प्रमुख परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले हुए थे उन्हें सिर्फ कुछ नुकसान हुआ है। इस रिपोर्ट पर ट्रंप और व्हाइट हाउस का दावा है कि ईरान का पूरा परमाणु ढाँचा नष्ट कर दिया गया है।

ट्रंप ने इन खबरों को ‘फेक न्यूज‘ बताते हुए CNN और The New York Times पर निशाना साधा है।

खुफिया रिपोर्ट का दावा – ठिकानों को पूरी तरह नहीं उड़ाया गया

अमेरिकी रक्षा खुफिया एजेंसी (DIA) की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के फोर्डो और नतांज परमाणु ठिकाने पूरी तरह से तबाह नहीं हुए।

रिपोर्ट में कहा गया कि ईरान के पास अभी भी प्रमुख उपकरण मौजूद हैं और वे कुछ महीनों में परमाणु कार्यक्रम दोबारा शुरू कर सकता है।

ट्रंप का जवाब – ‘फेक न्यूज फैलाई जा रही है’

ट्रंप ने रिपोर्ट को खारिज करते हुए अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर लिखा, “ईरान के परमाणु बेस को पूरी तरह से तबाह कर दिया गया है। ‘टाइम्स’ और ‘सीएनएन’ झूठ बोल रहा है और उन्हें जनता की आलोचना का सामना करना पड़ेगा।”

ट्रंप ने इसे एक शानदार सैन्य सफलता करार दिया और कहा कि ईरान अब शांति के लिए मजबूर होगा। वहीं व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने खुफिया रिपोर्ट लीक करने वाले को ‘लो-लेवल लूजर’ कहा और आरोप लगाया कि इसका उद्देश्य ट्रंप को कमजोर दिखाना है।

रिपोर्ट में सामने आई नई जानकारियाँ

  • ईरान ने हमलों से पहले 400 किलो यूरेनियम कहीं और भेज दिया था।
  • सैटेलाइट तस्वीरों में ‘फ़ोर्डो’ के बाहर 16 ट्रक देखे गए, जो कदाचित यूरेनियम को गुप्त जगहों पर ले गए।
  • ‘फ़ोर्डो’ ठिकाना पहाड़ों के नीचे बना है, जिसे बंकर बस्टर बम से भी पूरी तरह नष्ट करना मुश्किल है।

हमले में इस्तेमाल हुआ भारी हथियारों का जखीरा

B-2 बॉम्बर्स ने फोर्डो और नतांज पर कुल 14 ‘GBU-57 बंकर बस्टर’ बम गिराए।

अमेरिकी नौसेना की पनडुब्बी से इस्फहान पर 30 टॉमहॉक मिसाइलें दागी गईं।

वहीं, जनरल डैन केन इस मिशन के मेन लीडर थे। जनरल ने कहा कि ठिकानों को गंभीर नुकसान पहुँचाया गया है, लेकिन आखिरी हिसाब लगाना अभी बाकी है।

सीजफायर होने तक लगातार चलता रहा ‘ऑपरेशन सिंधु, युद्ध विराम की घोषणा के बाद जाकर भारत ने अभियान रोका: ईरान-इजरायल से लौटे अब तक 3170 लोग, 1 दिन में 1100 की वापसी

इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में सीजफायर के ऐलान के बाद तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर यह घोषणा की है कि ईरान से भारतीय लोगों को बाहर निकालने के लिए चलाए जा रहे ‘ऑपरेशन सिंधु’ को धीरे-धीरे बंद कर दिया जाएगा। दूतावास में हेल्प डेस्क भी बंद कर दिया है।

बता दें कि ऑपरेशन सिंधु के जरिए इजरायल और ईरान में फँसे भारतीय नागरिकों को देश वापस लाने के लिए लगातार जतन किए जा रहे हैं। मंगलवार (24 जून 2025) को दोनों देशों के बीच युद्ध विराम के ऐलान के बाद दूतावास ने भी नए लोगों के निकासी के लिए जारी की गई हेल्प डेस्क को बंद कर दिया है।

सोशल मीडिया एक्स पर दूतावास ने लिखा है कि भारत सरकार इस पूरे मसले पर अपनी नजर बनाए हुए है। अगर भारतीय नागरिकों के लिए फिर से कोई खतरा नजर आता है तो नई रणनीति तय की जाएगी।

दूतावास ने ये भी लिखा कि ईरान में रह रहे भारतीय किसी भी तरह की सहायता के लिए दूतावास की ओर से जारी किए गए टेलीग्राम चैनल या हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क कर सकते हैं।

कतर ने बंद किया था एयरस्पेस

इजरायल और ईरान के संघर्ष के बीच अमेरिका ने भी ईरान के परमाणु सुविधाओं पर हमले किए थे। इसके बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की थी। इसके तहत सीरिया, इराक और कतर में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरान ने मिसाइलों से हमला किया था।

इसके कारण कतर ने अपना एयरस्पेस कुछ घंटों के लिए बंद कर दिया था। भारत सरकार लगातार इस पूरे मामले पर अपनी नजर बनाए हुई थी। इस बारे में विदेश मंत्रालय ने भी मंगलवार को ही अपना बयान जारी किया।

मंत्रालय ने कहा कि इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता को लेकर हम गंभीर चिंता व्यक्त करते हैं। कतर द्वारा एयरस्पेस दोबारा खोले जाने के बाद विदेश मंत्रालय ने कहा कि इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष विराम की खबरें और कतर की ओर से निभाई गई भूमिका का हम स्वागत करते हैं।

भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी किया गया बयान (साभार X/@MEAIndia)

विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत इस दिशा में हर संभव सहयोग देने को तैयार है और हम उम्मीद करते हैं कि सभी पक्ष मिलकर शांति और स्थिरता की दिशा में काम करेंगे।

भारत की ओर से इजरायल और ईरान में फँसे भारतीयों को वापस लाने के लिए ऑपरेशन सिंधु शुरू किया गया था। इसके तहत बुधवार (25 जून 2025) की रात 12:01 बजे ईरान के मशहद से 282 भारतीयों को फ्लाइट के जरिए दिल्ली लाया गया। मंगलवार को भारत में 1100 से भी अधिक नागरिकों को देश वापस लाया गया है।

ऑपरेशन सिंधु के तहत ईरान और इजरायल से निकल गए और भारतीय नागरिकों की कुल संख्या 3170 हो गई है। ईरान से 2858 लोग अब तक रेस्क्यू किया जा चुके हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मिडल ईस्ट के 6 खाड़ी देशों में 90 लाख से भी अधिक भारतीय रहते हैं। इनमें यूएई में 35.5 लाख, सऊदी अरब में 26 लाख, कुवैत में 11 लाख, ओमान में 7.79 लाख, कतर में 7.45 लाख और बहरीन में 3.3 लाख लोग शामिल हैं।

पहले भी भारतीयों के लिए चले कई ऑपेशन

आपदा के साथ किसी भी अन्य स्थिति में भी भारत ने अब तक कई ऑपरेशन चला कर विदेशों में रह रहे भारतीयों को देश वापस लाने में सफलता हासिल की है। इसके तहत 2020 में कोविड में सहायता देने के लिए मालदीव के लिए ‘ऑपरेशन संजीवनी’ चलाया गया।

2021 में भारत के अफगानिस्तान में सिखों और हिंदुओं को रेस्क्यू करने के लिए ‘ऑपरेशन देवी शक्ति’ और तालिबान के कब्जे के बाद ‘ऑपरेशन अजायी’ चलाया गया। 2022 में रूस यूक्रेन के युद्ध के दौरान भारतीय छात्रों और नागरिकों को रेस्क्यू के लिए ‘ऑपरेशन गंगा’ के साथ 2023 में सूडान में हुए सिविल वॉर में भारतीय नागरिकों के रेस्क्यू के लिए ‘ऑपरेशन कावेरी’ चलाया गया।

इसी तरह 2023 में तुर्किए में आए भूकंप में सहायता देने के लिए ‘ऑपरेशन मित्र शक्ति’ और अप्रैल 2025 में म्यांमार में आए भूकंप के बाद मदद के लिए ‘ऑपरेशन ब्रह्मा’ समेत कई अन्य मिशन भी इस कड़ी में अपना कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं।