यूरोप के कई शहरों में टूरिस्टों की भरमार के खिलाफ रविवार (15 जून 2025) को बड़े प्रदर्शन होने वाले हैं। स्पेन, इटली, पुर्तगाल और फ्रांस के लोग इस भीड़ से तंग आ चुके हैं। ‘साउथर्न यूरोप अगेंस्ट टूरिस्टिफिकेशन’ नाम का संगठन इस आंदोलन को चला रहा है।
स्पेन के बार्सिलोना, ग्रेनेडा, पाल्मा, सैन सेबेस्टियन, मिनोर्का और इबीसा में लोग सड़कों पर उतरेंगे। पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन और इटली के वेनिस, जेनोवा, पलेर्मो, मिलान और नेपल्स में भी टूरिस्टों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होंगे। फ्रांस के कुछ शहर भी इसमें शामिल हो सकते हैं।
पिछले साल जुलाई में बार्सिलोना में प्रदर्शनकारियों ने टूरिस्टों पर वाटर गन से पानी फेंका था। बार्सिलोना और पाल्मा में पहले हुए प्रदर्शनों में करीब 20,000 लोग शामिल थे। इस साल अप्रैल में एक वर्कशॉप भी हुई, जिसमें प्रदर्शनकारी टूरिस्टों के लिए जगहों पर घुसने से रोकने या हवाई अड्डों पर धरना देने की योजना बना रहे थे।
यूरोप में हर साल टूरिस्टों की तादाद बढ़ रही है। इस साल टूरिस्टों के खर्च में 11% की बढ़ोतरी हुई, जो 838 बिलियन डॉलर तक पहुँच गई। बार्सिलोना में 2024 में 26 मिलियन टूरिस्ट आए, जिससे वहाँ के मेयर ने 2028 तक शॉर्ट-टर्म किराये के घर बंद करने का ऐलान किया। पिछले 10 साल में वहाँ किराया 68% और घर खरीदने की कीमत 38% बढ़ी। बार्सिलोना के 31% लोग टूरिस्टों को नुकसानदेह मानते हैं। ग्रीस के सेंटोरिनी और बेल्जियम के ब्रुगेस जैसे शहरों ने टूरिस्टों की संख्या कम करने के लिए टैक्स और नियम लागू किए हैं।
टूरिस्टों की भरमार से स्थानीय लोगों को कई दिक्कतें हो रही हैं। घरों के किराये आसमान छू रहे हैं, सड़कों पर भीड़ बढ़ रही है, और स्थानीय संस्कृति को नुकसान हो रहा है। प्रदर्शनकारी टूरिस्टों की संख्या पर रोक लगाने की माँग कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकारों को टूरिस्टों और स्थानीय लोगों के बीच बैलेंस बनाना चाहिए। इस आंदोलन से यूरोप में टूरिज्म की नीतियों पर बहस तेज हो गई है। क्या ये प्रदर्शन टूरिस्टों की संख्या कम कर पाएँगे या ये सिर्फ गुस्सा निकालने का जरिया बनकर रह जाएँगे?
गुजरात के अहमदाबाद में गुरुवार (12 जून 2025) को भीषण प्लेन क्रैश हुआ। उसके बाद हर किसी के मन में ये जानने की जिज्ञासा थी कि आखिर उड़ने के कुछ सेकेंडों में प्लेन कैसे क्रैश हो गया। कुछ समय बाद एक वीडियो सामने आया जिसमें प्लेन के उड़ने के बाद उसके क्रैश होने का फुटेज शामिल था। इसे बनाने वाला एक 15 वर्ष का बच्चा था।
वीडियो वायरल होने के बाद एक अफवाह उड़ी कि पुलिस ने वीडियो बनाने वाले बच्चे को गिरफ्तार कर लिया है। इसे लेकर लल्लन टॉप न्यूज पोर्टल के एसोसिएट एडिटर अभिनव पांडे ने पुलिस पर ही सवाल खड़े कर दिए।
जिस बच्चे आर्यन ने प्लेन क्रैश का पहला वीडियो बनाया था,उसे अहमदाबाद की पुलिस अपने साथ ले गई।
बच्चा पहले से ही बहुत ज्यादा डरा हुआ था। उसे और क्यों डराया जा रहा है? पहली बार वो शहर आया था,पहली बार उसने प्लेन देखा।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक पर पोस्ट साझा की जिसमें अभिनव ने लिखा, “बच्चा पहले से ही बहुत ज्यादा डरा हुआ था। उसे और क्यों डराया जा रहा है? पहली बार वो शहर आया था,पहली बार उसने प्लेन देखा। अहमदाबाद पुलिस निहायती गलत कर रही है। ये क्या तरीका है?”
अभिनव के साथ-साथ कई अन्य मीडिया हाउस के पोर्टल पर भी पुलिस द्वारा बच्चे को हिरासत में लिए जाने की अफवाह फैलाई गई थी।
अहमदाबाद पुलिस ने खोली पोल
अभिनव की सवाल पूछती हुई यह पोस्ट उन पर तब भारी पड़ गई जब अहमदाबाद पुलिस ने इस बात का खंडन कर दिया। पुलिस ने अभिनव की ही पोस्ट में रिप्लाई किया और इस बात को झूठा करार दे दिया।
अभिनव की X पोस्ट पर अहमदाबाद पुलिस के जवाब का स्क्रीनशॉट
अहमदाबाद पुलिस ने लिखा, “वीडियो को बनाने के लिए किसी को गिरफ़्तार नहीं किया गया है। मोबाइल वीडियो की स्क्रीन रिकॉर्डिंग वायरल हुई। वीडियो बनाने वाले नाबालिग ने पुलिस को वीडियो का विवरण दिया। वह अपने पिता के साथ गवाह के तौर पर बयान देने आया था। फिर उसे उसके पिता के साथ भेज दिया गया। कोई गिरफ़्तारी या हिरासत नहीं की गई है।”
पुलिस के इस ट्वीट के बाद अब अभिनव की जमकर किरकिरी हो रही है। सोशल मीडिया यूजर्स अभिनव को गलत तरीके से खबर को फैलाने के लिए लताड़ रहे हैं।
Dallantop for a reason. @AhmedabadPolice has clarified that the kid who recorded the Viral crash video from the rooftop came to the police with his father as a “Witness” and sent home the same day after recording his statement. But Dallantop being Dallantop twisting statements https://t.co/i6EhxBmaaZpic.twitter.com/eNVJuKb41j
महाराष्ट्र के अहिल्या नगर (पुराना नाम-अहमदनगर) जिले में शनि शिंगणापुर मंदिर ने शुक्रवार (13 जून 2025) को 167 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया, जिनमें 114 मुस्लिम थे। मंदिर में कुल 114 मुस्लिम काम कर रहे थे और वो सभी इस कार्रवाई में निकाल दिए गए। मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि ये लोग अनुशासन नहीं मान रहे थे और कई महीनों से काम पर नहीं आ रहे थे।
ये फैसला तब हुआ जब हिंदू संगठन शनिवार (14 जून 2025) को बड़ा प्रदर्शन करने वाले थे। इसकी वजह एक वीडियो था – जिसमें मुस्लिम कारीगर मंदिर के पवित्र चबूतरे पर काम कर रहे थे।
इस पूरे मामले के बाद सवाल उठते हैं कि आखिर हिंदू मंदिर में 114 मुस्लिम कर्मचारी थे ही क्यों? बतौर हिंदू मेरा मत साफ है कि हिंदू मंदिरों में सिर्फ हिंदू कर्मचारी होने चाहिए। इस लेख में यही बात समझाने की कोशिश की गई है।
शनि शिंगणापुर में क्या हुआ?
शनि शिंगणापुर का मंदिर भगवान शनि का है। ये मंदिर अनोखा है क्योंकि यहाँ कोई दीवार या छत नहीं है, सिर्फ एक काला पत्थर है, जो शनिदेव का प्रतीक है। रोज हजारों लोग दर्शन करने आते हैं, और खास मौकों जैसे अमावस्या पर लाखों लोग पहुँचते हैं। गाँव में घरों के दरवाजे भी नहीं हैं, क्योंकि लोग मानते हैं कि शनिदेव उनकी रक्षा करते हैं।
हाल ही में मंदिर ट्रस्ट ने 167 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। इनमें 114 मुस्लिम थे, जो खेती, कचरा प्रबंधन, और शिक्षा जैसे काम करते थे। ट्रस्ट का कहना है कि ये लोग पाँच महीने से बिना बताए गायब थे और काम में लापरवाही कर रहे थे। लेकिन फैसला 8 और 13 जून 2025 को हुआ, ठीक उस वक्त जब हिंदू संगठन 14 जून को प्रदर्शन की तैयारी कर रहे थे।
बीजेपी के आध्यात्मिक मोर्चे के प्रमुख आचार्य तुषार भोसले ने इसे हिंदुओं की जीत बताया। उन्होंने कहा, “हमने मुस्लिम कर्मचारियों को हटाने के लिए आंदोलन किया। मंदिर प्रशासन को झुकना पड़ा। मैं सभी शनि भक्तों और हिंदू समाज को बधाई देता हूँ।” उनका मानना था कि मुस्लिम कर्मचारियों की मौजूदगी मंदिर की पवित्रता को नुकसान पहुँचाती है।
शनि शिंगणापुर मंदिर से जुड़े विवाद की शुरुआत एक वीडियो से हुई, जिसमें मुस्लिम कारीगार शनि शिंगणापुर के पवित्र चबूतरे पर काम कर रहे थे। मंदिर का ये हिस्सा बहुत पवित्र है, और हिंदू भक्तों को लगा कि ऐसा काम सिर्फ हिंदुओं को करना चाहिए।
हिंदू मंदिर में गैर-हिंदू कर्मचारी क्यों नहीं होने चाहिए
एक हिंदू भक्त के लिए मंदिर सिर्फ इमारत नहीं, बल्कि भगवान का घर है। यहाँ की हर चीज – पूजा, रीति-रिवाज, और माहौल को पवित्र रखना जरूरी है। हिंदू धर्म में मंदिर की पवित्रता बहुत मायने रखती है। अगर कोई गैर-हिंदू जो हिंदू नियमों को न माने, मंदिर के काम में शामिल हो, तो ये भक्तों की आस्था को ठेस पहुँचा सकता है।
उदाहरण के लिए हिंदू धर्म में कई नियम हैं – जैसे शाकाहारी भोजन, पूजा से पहले स्नान और खास मंत्रों का जाप। मंदिर में काम करने वाले को इनका पालन करना चाहिए। अगर कोई गैर-हिंदू इन नियमों को न माने, तो मंदिर का सात्विक माहौल खराब हो सकता है। शनि शिंगणापुर में जब एक मुस्लिम कर्मचारी मंदिर के चबूतरे पर चढ़ा, तो भक्तों को लगा कि ये गलत है। ऐसे पवित्र काम सिर्फ हिंदुओं को करने चाहिए, जो इन नियमों को समझते हों।
ये सवाल उठता है कि 114 मुस्लिम कर्मचारी वहाँ थे ही क्यों? मंदिर के काम, चाहे वो पूजा हो, रखरखाव हो या कोई और काम.. ये कम हिंदुओं को ही मिलना चाहिए। हिंदू भक्तों का मानना है कि मंदिर की सेवा वही करे, जो उसकी पवित्रता को समझे। गैर-हिंदू कर्मचारी, भले ही वो अच्छे इंसान हों, हिंदू रीति-रिवाजों को पूरी तरह नहीं समझ सकते। इसलिए मंदिरों में सिर्फ हिंदू कर्मचारी रखना सही है।
कानून और परंपरा भी यही कहते हैं
इस सोच को कानूनी समर्थन भी मिला है। जनवरी 2024 में मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि तमिलनाडु के हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदू लोग ‘कोडिमरम’ (झंडे वाले खंभे) से आगे नहीं जा सकते। कोर्ट ने कहा कि मंदिर हिंदुओं की पूजा के लिए हैं, और गैर-हिंदुओं का पवित्र जगहों पर जाना मंदिर की पवित्रता को नुकसान पहुँचा सकता है। ये फैसला साफ बताता है कि मंदिरों में हिंदू परंपराओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
अगर गैर-हिंदुओं को मंदिर के पवित्र हिस्सों में जाने की इजाजत नहीं, तो उन्हें मंदिर के काम में शामिल करने का क्या मतलब? शनि शिंगणापुर में मुस्लिम कर्मचारी भले ही पूजा न करते हों, लेकिन मंदिर की दीवार या शिखर पर काम करना भी पवित्र काम है। ऐसे काम हिंदुओं को ही करने चाहिए, ताकि कोई विवाद न हो।
ऐसे कई मंदिर हैं, जहाँ गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। जैसे सबरीमाला मंदिर में सख्त नियम हैं। तेलंगाना स्थित तिरुपति बालाजी मंदिर में ऐसी ही घटना के बाद मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने केवल हिंदू कर्मचारियों की नियुक्ति का आदेश दिया था। शनि शिंगणापुर में भी यही भावना है कि मंदिर का हर काम हिंदू धर्म के हिसाब से हो।
मंदिरों के मैनेजमेंट से खुद को दूर रखें सरकारें
ये विवाद ये भी दिखाता है कि सरकार मंदिरों को अपने कंट्रोल में रखती है। महाराष्ट्र में कई मंदिर ट्रस्ट को सरकारी अधिकारी चलाते हैं। हिंदू संगठन इसका विरोध करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि मंदिरों का पैसा धर्म और संस्कृति के लिए इस्तेमाल होना चाहिए, न कि सरकारी खर्चों में। 2018 में महाराष्ट्र सरकार ने शनि शिंगणापुर मंदिर को अपने कब्जे में लेने की कोशिश की थी, लेकिन हिंदू संगठनों ने इसे रुकवाया।
इस बार आचार्य तुषार भोसले और उनके संगठन ने मुस्लिम कर्मचारियों को हटाने की माँग की। कुछ लोग इसे राजनीति कह सकते हैं, लेकिन हिंदू भक्तों के लिए ये मंदिर की पवित्रता की लड़ाई है। जैसे अयोध्या के राम मंदिर में हिंदू अधिकारियों को अहम जगह दी गई, वैसे ही शनि शिंगणापुर में भी हिंदू कर्मचारी होने चाहिए।
फैसले पर सवाल उठाने वालों को जवाब
शनि शिंगणापुर देवस्थान के सीईओ गोरक्षनाथ दरंदाले ने बताया कि करीब 2400 कर्मचारी यहाँ काम करते हैं। इनमें से कई काम पर नहीं आते। ऐसे लोगों की सैलरी भी रोकी गई है। इसके बाद ही ये कार्रवाई की गई। कईयों की सैलरी 5-5 माह से रुकी है। कुछ लोग कहते हैं कि 114 मुस्लिम कर्मचारियों को निकालना भेदभाव है। ट्रस्टी अप्पासाहेब शेटे का कहना है कि धर्म की वजह से नहीं, बल्कि खराब काम और गैर-हाजिरी की वजह से ऐसा हुआ। लेकिन 167 में से 114 मुस्लिम कर्मचारियों का निकाला जाना और फैसले की टाइमिंग सवाल उठाती है।
हालाँकि हिंदू भक्तों का मानना है कि मंदिर का काम कोई साधारण नौकरी नहीं। ये सेवा है, जो आस्था और परंपरा से जुड़ी है। भले ही कर्मचारी पूजा न करते हों, लेकिन मंदिर के हर काम में पवित्रता का ध्यान रखना जरूरी है। अगर गैर-हिंदू कर्मचारी मंदिर की दीवार पेंट करें या शिखर पर चढ़ें, तो ये भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुँचाता है। इसलिए मंदिर में सिर्फ हिंदू कर्मचारी रखना ही सही है।
मद्रास हाई कोर्ट का फैसला भी यही कहता है कि मंदिरों में हिंदू परंपराओं को प्राथमिकता मिले। गैर-हिंदुओं को दूसरी नौकरियों में मौका मिल सकता है, लेकिन मंदिरों में हिंदुओं को ही काम करना चाहिए।
पहले भी बदले हैं नियम
शनि शिंगणापुर मंदिर पहले भी विवादों में रहा है। 2016 में महिलाओं को मंदिर के गर्भगृह में जाने की इजाजत नहीं थी। तब कार्यकर्ता तृप्ति देसाई ने आंदोलन किया, और बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि कोई कानून महिलाओं को मंदिर में जाने से नहीं रोक सकता। इस फैसले के बाद 400 साल पुराना नियम टूटा। ये दिखाता है कि समय के साथ मंदिरों के नियम बदल रहे हैं।
हिंदू भक्तों का मानना है कि मंदिरों में गैर-हिंदू कर्मचारियों को रखने का कोई मतलब नहीं। अगर मंदिर हिंदुओं का है, तो उसका हर काम हिंदुओं के हाथ में होना चाहिए। इससे न विवाद होगा, न किसी की भावनाएँ आहत होंगी।
मद्रास हाई कोर्ट का फैसला हर जगह हो लागू
शनि शिंगणापुर का ये मामला साफ करता है कि हिंदू मंदिरों में सिर्फ हिंदू कर्मचारी होने चाहिए। इसके लिए साफ नियम बनने चाहिए। पूजा, रखरखाव या कोई भी काम, जो मंदिर से जुड़ा हो, हिंदुओं को ही करना चाहिए। मद्रास हाई कोर्ट का फैसला इसकी शुरुआत है, लेकिन इसे हर मंदिर में लागू करना होगा।
सरकार को मंदिरों से अपना कंट्रोल हटाना चाहिए। मंदिरों को हिंदू समाज चलाए, ताकि उनकी पवित्रता बनी रहे। हिंदू संगठनों को भी अपनी बात रखते वक्त ध्यान रखना चाहिए कि कोई तनाव न बढ़े।
एक हिंदू भक्त के लिए मंदिर की पवित्रता सबसे ऊपर है। इसलिए शनि शिंगणापुर में 114 मुस्लिम कर्मचारियों का होना गलत था। ऐसे में मंदिर का हर काम हिंदुओं के हाथ में होना चाहिए, ताकि भक्तों की आस्था बनी रहे। ये फैसला सही दिशा में है और इसे हर हिंदू मंदिर में लागू करना चाहिए।
पिछले दिनों एक खबर आई थी कि पाकिस्तानी फौज के प्रमुख जनरल असीम मुनीर को अमेरिका ने सेना दिवस के मौके पर अमेरिका आने का निमंत्रण दिया है। खबर उड़ी कि मुनीर को व्हाईट हाउस बुलाया गया है। इसके बाद कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भारत की आलोचना की थी। अब अमेरिका ने इसे फर्जी खबर करार दिया है। इसके बाद सोशल मीडिया यूजर्स का गुस्सा सामने आ रहा है।
असीम मुनीर के न्यौते पर अपने ट्वीट में जयराम ने पीएम मोदी पर निशाना साधा। लिखा, “यह खबर भारत के लिए कूटनीतिक और सामरिक दृष्टि से एक बड़ा झटका है।”
खबर है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को अमेरिका के सेना दिवस (14 जून) के मौके पर वॉशिंगटन डीसी में आयोजित कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया है।
यह खबर भारत के लिए कूटनीतिक और सामरिक दृष्टि से एक बड़ा झटका है।
यह वही व्यक्ति हैं जिसने पहलगाम आतंकी हमले से ठीक पहले…
उन्होंने आगे लिखा, “मोदी सरकार कह रही है कि ऑपरेशन सिंदूर अभी जारी है, ऐसे में पाकिस्तानी सेना प्रमुख का अमेरिकी सेना दिवस में बतौर अतिथि शामिल होना निश्चित ही गंभीर चिंता का विषय है”।
जयराम रमेश ने अमेरिका पर भी सवाल उठाया था और कहा था “यह वही व्यक्ति है जिसने पहलगाम आतंकी हमले से ठीक पहले भड़काऊ और उकसाने वाली भाषा का इस्तेमाल किया था, सवाल उठता है कि अमेरिका की मंशा क्या है?”
हालाँकि कुछ समय बाद ही अमेरिका ने स्पष्ट किया कि असीम मुनीर के न्यौते वाली बात पूरी तरह से अफवाह है। अब, जब पूरी खबर ही झूठी निकल गई तो सोशल मीडिया पर जयराम रमेश को लोगों ने घेरना शुरू कर दिया। एक के बाद एक कई सोशल मीडिया यूजर्स ने पोस्ट कर कहा कि जयराम रमेश को अपने आलोचनात्मक और झूठे बयान के लिए माफी माँगनी चाहिए।
Apologise for the repeated misinformation @Jairam_Ramesh
किसी वरिष्ठ नेता की तरफ से इस तरह की खबरें फैलाना और उसी खबर के आधार पर देश के ही खिलाफ सार्वजनिक रूप से अपमानजनक टिप्पणी करना उन पर भी कई सवाल खड़े करता है।
जयराम रमेश ने जब पोस्ट किया था तब कॉन्ग्रेस के अन्य नेताओं ने भी भारत के खिलाफ इसी तरह की बयानबाजी की थी। हालाँकि बाद में जो खबर आई वो जयराम के बयान और सोशल मीडिया पर फैली अफवाह से एक रत्ती भी मेल नहीं खा रही है। ऐसे में लोगों का गुस्सा भी जायज है।
इजरायल और ईरान के बीच में तनाव हमलों का रूप ले चुका है। एक ओर इजरायल ने ‘ऑपरेशन राइजिंग लॉयन’ नाम से मिशन शुरू कर हमले शुरू किए। इसके बाद ईरान ने भी ‘टू प्रॉमिस थ्री’ इसराइल पर जवाबी हमले शुरू कर दिए। तनाव बढ़ने के साथ अब ईरान ने जामकारन मस्जिद पर लाल झंडा भी फहरा दिया है। इस लाल झंडा का महत्व ऐतिहासिक भी है और धार्मिक भी। लाल झंडे से ईरान दुनिया को स्पष्ट रूप से अपना संदेश देना चाहता है।
जामकारन पर लाल झंडा
जनवरी 2020 में अमेरिका ने बगदाद में एक एयर स्ट्राइक में ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर कासिम सुलेमानी को मार गिराया था। इसके बाद ईरान के कोम शहर की जमकारन मस्जिद के गुंबद पर पहली बार लाल झंडा लहराया गया। इसे अमेरिका के खिलाफ ईरान के जंग के ऐलान के तौर पर देखा जा रहा था। इसके बाद इजरायल के खिलाफ अप्रैल 2024 में और हमास नेता इस्माइल हानियेह की तेहरान में हत्या के बाद 31 जुलाई 2024 को भी ये लाल झंडा फहराया गया।
इस लाल झंडे का ईरान के लिए जितना महत्व है, उसकी ऐतिहासिकता उतनी ही भारत से भी जुड़ी हुई है। भारत की बात करें तो 1739 में पर्सिया से आए नादिरशाह ने चाँदनी चौक की सुनहरी मस्जिद पर लाल झंडा फहराया। वहीं से खड़े होकर वह अपनी फौज को दिल्ली की गलियों को खून से रंगते निहार रहा था। असल में लाल झंडा शिया परंपरा में खूनी प्रतिशोध का प्रतीक होता है। झंडे पर लिखा था, ‘जो लोग हुसैन के ख़ून का बदला लेना चाहते हैं’। शिया परंपरा के अनुसार, लाल झंडे पर लगे खून के छींटे मारे गए व्यक्तियों का बदला लेने का प्रतीक है।
अब आते हैं ईरान पर, यही लाल झंडा अब ईरान के कोम शहर की जमकारन मस्जिद के गुंबद पर लहरा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कोम शहर से कुछ 6 किलोमीटर पूर्व में जामकारन गाँव में कोम-काशान मार्ग पर ये मस्जिद स्थित है। इस मस्जिद का निर्माण 393 हिजरी यानी 1003 ईसवीं में शिया इस्लाम के 12वें इमाम, इमाम महदी के आदेश पर बनाया गया था।
कब शुरू हुए हमले
शुक्रवार (13 जून 2025) और शनिवार (14 जून 2025) को इजरायल और ईरान के बीच हमले चरम पर पहुँच गए हैं। जहाँ एक ओर इजरायल ने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर जोरदार हमले किए हैं तो उसके जवाब में ईरान ने भी इजरायल पर 100 से अधिक ड्रोन्स और मिसाइलें दागी हैं।
इजरायल ने शुक्रवार (13 जून 2025) की सुबह 5:30 बजे ईरान पर अपना सबसे बड़ा हवाई हमला शुरू किया था। ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ नाम से शुरू किए गए मिशन के तहत इजरायली फाइटर जेट्स और ड्रोन्स के जरिए 100 से अधिक जगहों पर हमले किए गए।
शुक्रवार की ही देर रात इजरायल ने फिर से ईरान पर हमला कर उसके परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया। इन हमलों में अब तक 78 लोग मारे गए हैं और 350 से ज्यादा घायल हुए हैं। असल में इजरायल और अमेरिका नहीं चाहते कि ईरान परमाणु शक्ति बने, इसलिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ये हमले किए गए हैं। इन हमलों से ईरान के परमाणु ठिकानों के साथ मिसाइल और सैन्य ठिकानों को काफी नुकसान पहुँचा है।
इन हमलों के जवाब में ईरान ने ‘ट्रू प्रॉमिस थ्री’ नाम से ऑपरेशन चलाया और इजरायल पर 150 से ज़्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इनमें से 6 मिसाइलें राजधानी तेल अवीव में गिरीं, जिसमें 1 महिला की मौत हो गई और 63 लोग घायल हो गए।
ईरान का जामकारन मस्जिद पर लाल झंडा फहराने के पीछे राजनीतिक महत्व भी है। इसके जरिए ईरान ने हमले का बदला लेने का ऐलान कर दिया है। अब ये देखना होगा कि इजरायल और अमेरिका ईरान के इस संदेश को समझ कर क्या कोई नई रणनीति तैयार करेंगे या फिर ईरान का ये ऐलान मूर्त रूप लेने में कामयाब होगा।
असम के धुबरी ज़िले में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव को देखते हुए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने शुक्रवार (13 जून 2025) को शाम 6 बजे के बाद शूट-एट-साइट यानी देखते ही गोली मारने का आदेश जारी कर दिया।
बांग्लादेश सीमा से सटे मुस्लिम-बहुल इस कस्बे में हाल ही में एक समूह ने भड़काऊ पोस्टर लगाने और धार्मिक स्थलों के पास गोमांस के टुकड़े फेंके थे, जिसके बाद माहौल गरमा गया। हालात को काबू में करने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और CRPF की तैनाती की जा रही है।
सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने जानकारी दी है कि धुबरी में हनुमान मंदिर के पास फेंके गए गोमांस के टुकड़े पर कार्रवाई करते हुए रात भर में 38 लोग गिरफ्तार किए गए है।
धार्मिक स्थल के पास मिला गोमांस
सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के अनुसार, नबीन बांग्ला नामक एक समूह ने धुबरी को बांग्लादेश में मिलाने की माँग करते हुए भड़काऊ पोस्टर लगाए। यह कार्य ‘सांप्रदायिक उकसावे’ के रूप में देखा गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ईद के अगले दिन, हनुमान मंदिर के सामने एक गाय का कटा हुआ सर मिला था, जिसके बाद शहर में तनाव बढ़ गया। रात में पथराव की घटनाएँ भी हुईं। मुख्यमंत्री ने इसे ‘गंदे हथकंडों से माहौल बिगाड़ने’ की साजिश बताया।
सीएम का सख्त संदेश
सीएम सरमा खुद शुक्रवार (13 जून 2025) को धुबरी पहुँचे और कहा, “जो कोई भी धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुँचाएगा या पथराव करेगा, उसे तुरंत गोली मारी जाएगी।”
सीएम सरमा ने घोषणा की कि वे अगले साल (2026) ईद पर खुद धुबरी में रहेंगे और ज़रूरत पड़ी तो मंदिर की पहरेदारी भी करेंगे।
इस बार ईद पर कुछ असामाजिक तत्वों ने धुबरी के हनुमान मंदिर में गौ मांस फेंककर घृणित और निंदनीय अपराध किया!
आगामी ईद पर अगर आवश्यकता पड़ी, तो मैं खुद रात भर हनुमान बाबा के मंदिर में पहरेदारी करूंगा। pic.twitter.com/Cbxen8Blws
सरमा ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में मवेशी अवैध रूप से धुबरी लाए गए है। सीएम ने इसे भी तनाव की वजह बताते हुए जाँच और गिरफ्तारी के आदेश दिए हैं।
वहीं मामले को देखते हुए RAF, CRPF, और स्थानीय पुलिस की बड़ी तैनाती की जा रही है। व्यापारियों और धार्मिक स्थलों पर CCTV लगाने को कहा गया है। सरकार ज़रूरतमंद मंदिरों और मस्जिदों को कैमरे मुहैया कराएगी।
क्यों है धुबरी संवेदनशील?
धुबरी जिला असम का मुस्लिम-बहुल इलाका है, जहाँ लगभग 90% आबादी मुस्लिम है। बांग्लादेश की सीमा से सटा होने के कारण लंबे समय से यह इलाका अवैध घुसपैठ, पहचान और राजनीतिक विवादों का केंद्र रहा है।
सरमा ने सभी समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील की और कहा कि जो भी सांप्रदायिकता फैलाएगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा। कानून-व्यवस्था बनाए रखना हमारी प्राथमिकता है।
पिछले 48 घंटों में, यानी शुक्रवार (13 जून 2025) और शनिवार (14 जून 2025) को इजरायल और ईरान के बीच तनाव बहुत बढ़ गया है। इजरायल ने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर लगातार दूसरे दिन जोरदार हमले किए हैं, जिसके जवाब में ईरान ने भी मिसाइलें दागी हैं।
इजरायल ने शुक्रवार (13 जून 2025) सुबह 5:30 बजे ईरान पर अपना सबसे बड़ा हवाई हमला शुरू किया। इजरायली फाइटर जेट्स और ड्रोनों ने 100 से ज़्यादा ठिकानों को निशाना बनाया। इन हमलों को ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ नाम दिया गया है।
वहीं, शुक्रवार (13 जून 2025) देर रात को भी इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों को दोबारा निशाना बनाया। इन हमलों में अब तक 78 लोग मारे गए हैं और 350 से ज्यादा घायल हुए हैं।
प्रमुख ठिकाने और अधिकारियों की मौत
इजरायली हमले से ईरान के नतांज और फोर्डो जैसे महत्वपूर्ण परमाणु ठिकानों को भारी नुकसान पहुँचा है। इजरायल और अमेरिका नहीं चाहते कि ईरान परमाणु शक्ति बने, इसलिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ये हमले किए गए हैं।
वहीं ईरान के इस्फहान, तेहरान, तबरीज, अराक और करमनशाह जैसे शहरों में मौजूद सैन्य और मिसाइल ठिकानों को पूरी तरह से तबाह कर दिया गया है।
इजरायल ने पुष्टि की है कि उसके हमलों में 9 ईरानी परमाणु वैज्ञानिक और लगभग 6 शीर्ष IRGC कमांडर मारे गए हैं। इनमें ईरान के चीफ ऑफ स्टाफ मोहम्मद बाघेरी, IRGC प्रमुख हुसैन सलामी, खतम-अल अंबिया सेंट्रल मुख्यालय के प्रमुख घोलम अली राशिद, IRGC वायु सेना प्रमुख ब्रिगेडियर जनरल अमीर अली हाजीजादेह, IRGC वायु सेना ड्रोन यूनिट कमांडर ताहिर पोर और IRGC वायु सेना वायु रक्षा यूनिट कमांडर दावूद शेखियन शामिल हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई के शीर्ष सलाहकार अली शमखानी को भी निशाना बनाया गया।
इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद ने इस ऑपरेशन में अहम भूमिका निभाई। मोसाद के एजेंटों ने महीनों पहले ही ईरान के अंदर ड्रोन और हथियार छिपा दिए थे। हमले के पहले चरण में, ईरान के रडार और हवाई सुरक्षा सिस्टम को निष्क्रिय कर दिया गया ताकि इजरायली लड़ाकू विमानों को हमला करने में आसानी हो।
ईरान का जवाब: ‘ट्रू प्रॉमिस थ्री’ का सीमित असर
जवाब में, ईरान ने ‘ट्रू प्रॉमिस थ्री‘ नाम से ऑपरेशन चलाया और इजरायल पर 150 से ज़्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इनमें से 6 मिसाइलें राजधानी तेल अवीव में गिरीं, जिसमें 1 महिला की मौत हो गई और 63 लोग घायल हो गए। ईरानी मीडिया ने दावा किया कि इजरायली रक्षा मंत्रालय को भी निशाना बनाया गया था।
जानकारी के मुताबिक, ईरान ने शनिवार (14 जून 2025) को सेंट्रल इजराइल में बैलिस्टिक मिसाइल हमला किया, जिसके बाद कई घरों को नुकसान पहुँचा है। हमलों में कम से कम 10 लोग घायल बताए जा रहे हैं।
Footage from the Iranian ballistic missile impact in central Israel. Medics say they're treating at least 10 wounded. pic.twitter.com/iZtMAh8IlD
— Emanuel (Mannie) Fabian (@manniefabian) June 14, 2025
हालाँकि, इजरायल ने अमेरिका के THAAD (टर्मिनल हाई-एल्टिट्यूड एरिया डिफेंस) सिस्टम की मदद से ज्यादातर मिसाइलों को आसमान में ही रोक दिया, जिससे ईरान का हमला उतना कामयाब नहीं हो पाया जितना वह चाहता था। अमेरिका ने अक्टूबर 2024 में इजरायल में THAAD को तैनात किया था।
नेतन्याहू की पीएम मोदी से बातचीत
ईरान की ओर से हमले की आशंका को देखते हुए इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू को सुरक्षित जगह पर भेज दिया गया था। नेतन्याहू ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात कर उन्हें हालात की जानकारी दी।
Received a phone call from PM @netanyahu of Israel. He briefed me on the evolving situation. I shared India's concerns and emphasized the need for early restoration of peace and stability in the region.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा, “अभी भी वक्त है, समझौता करो वरना कुछ नहीं बचेगा।”
वहीं, संयुक्त राष्ट्र (UN) में चीन के डिप्लोमैट फू कांग ने इजरायली हमले की निंदा की और सैन्य कार्रवाई रोकने की माँग की। फू कांग ने कहा कि चीन इजरायल की तरफ से ईरान की संप्रभुता और सुरक्षा के उल्लंघन को लेकर बहुत चिंतित है।
संघर्ष निर्णायक मोड़ पर
‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ ने साफ कर दिया है कि इजरायल ईरान के परमाणु खतरे को लेकर चुप नहीं बैठेगा। इस ऑपरेशन ने न केवल ईरान की सैन्य ताकत को कमजोर किया है, बल्कि दुनिया को यह संदेश भी दिया है कि इजरायल अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
ईरान का जवाब भले ही तेज था, लेकिन वह इजरायल की मजबूत सुरक्षा दीवारों को भेदने में नाकाम रहा। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि क्या यह लड़ाई किसी बड़े युद्ध में बदलती है या बातचीत से कोई रास्ता निकलता है।
गुजरात का द्वारकाधीश मंदिर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है, जिन्हें द्वारकाधीश यानी ‘द्वारका का राजा’ के रूप में पूजा जाता है। समुद्र में डूबी द्वारका नगरी स्थित श्रीकृष्ण का ये प्राचीन मंदिर चार धामों में से एक है और करोड़ों भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में द्वारका को अपनी राजधानी बनाया था। मंदिर श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी स्मृतियों को जीवंत करता है।
द्वारकाधीश मंदिर में रोज़ाना सैंकड़ों भक्तों का जनसैलाब दर्शन के लिए उमड़ता है। मंदिर सुबह 6 बजे से दोपहर 1 बजे तक और शाम 5 बजे से रात 9:30 बजे तक श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुलता है।
मंदिर का इतिहास
द्वारका शहर और द्वारकाधीश मंदिर का इतिहास लगभग 2500 वर्षों पुराना है। हिन्दू मान्यता के अनुसार, महाभारत काल में भगवान कृष्ण ने जब मथुरा छोड़ने का निर्णय लिया तब उन्होंने समुद्र से भूमि प्राप्त कर द्वारका नामक एक नगर बसाया। यह नगर अत्यंत सुंदर और समृद्ध था और इसे भगवान कृष्ण की राजधानी माना गया।
माना जाता है कि मंदिर की मूल संरचना 200 ईसा पूर्व में बनाई गई थी। हालाँकि, समय के साथ-साथ इसे कई बार नष्ट किया गया और पुनर्निर्मित किया गया। 15वीं शताब्दी में महमूद बेगड़ा ने मंदिर को नष्ट कर दिया था लेकिन 16वीं शताब्दी में इसे फिर से बनाया गया। मंदिर की वर्तमान मूर्ति 1559 में अनिरुद्धाश्रम शंकराचार्य द्वारा स्थापित की गई थी।
इतिहास में एक समय ऐसा भी आया जब वाघेर समुद्री डाकुओं ने एक मौलाना के जहाज पर हमला किया, जिसके कारण सुल्तान महमूद ने द्वारका पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने द्वारका सहित पूरे क्षेत्र को लूट लिया था। उस समय के राजा भीम द्वारका छोड़कर बेट द्वीप चले गए थे।
गुजरात के द्वारका स्थित द्वारकाधीश मंदिर (साभाऱ : sailana place)
मंदिर की संरचना
द्वारकाधीश मंदिर एक भव्य और विशाल पाँच मंजिला इमारत है जो 72 मजबूत स्तंभों पर टिकी हुई है। यह इमारत चूना पत्थर से बनी है और इसकी दीवारों पर सुंदर नक्काशी की गई है। मंदिर की लंबाई 29 मीटर और चौड़ाई 23 मीटर है।
मंदिर के दो मुख्य द्वार हैं – मोक्ष द्वार (प्रवेश द्वार) और स्वर्ग द्वार (निर्गमन द्वार)। स्वर्ग द्वार से नीचे उतरने पर 56 सीढ़ियाँ गोमती नदी की ओर जाती हैं जहाँ श्रद्धालु स्नान करते हैं।
मंदिर का शिखर लगभग 78.3 मीटर ऊँचा है और इसके शीर्ष पर एक त्रिकोणीय झंडा फहराया जाता है, जिसमें सूर्य और चंद्रमा के प्रतीक होते हैं। यह झंडा दिन में चार बार बदला जाता है और इसे चढ़ाने का सौभाग्य भक्तों को दान के रूप में प्राप्त होता है। माना जाता है कि जब तक सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी पर हैं तब तक भगवान कृष्ण इस स्थान पर विराजमान रहेंगे।
मंदिर परिसर में एक गर्भगृह (निज मंदिर) और अंतराल (ड्योढ़ी) है। गर्भगृह में भगवान कृष्ण की काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है जो भक्तों के लिए दर्शन का प्रमुख केंद्र है।
गुजराक के द्वारका स्थित द्वारकाधीश मंदिर (साभार : xplro)
कैसे पहुँचें ?
द्वारका नगरी भारत के गुजरात राज्य के पश्चिमी छोर पर स्थित है और यहाँ पहुंचना आज के समय में बहुत आसान हो गया है। सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा जामनागर है जो लगभग 130 किलोमीटर दूर है। जामनगर से टैक्सी या बस से द्वारका पहुँचा जा सकता है।
इसके अलावा द्वारका रेलवे स्टेशन कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। अहमदाबाद, राजकोट, सूरत, मुंबई और दिल्ली से कई सीधी ट्रेनें द्वारका के लिए जाती हैं।
सड़क मार्ग से द्वारका पहुँचना अलग अनुभव है। गुजरात राज्य परिवहन की बसें और निजी वाहन द्वारका के लिए चलते हैं। समुद्र के अद्भुत दृश्यों को निहारते हुए सड़क यात्रा भी की जा सकती है।
भारत इस समय अपनी सेना को और ताकतवर बनाने के लिए बड़े कदम उठा रहा है। खबरों के मुताबिक, भारत रूस के सुखोई Su-57E जो पाँचवीं पीढ़ी का एक शानदार लड़ाकू विमान है, उसे खरीदने और भारत में बनाने की सोच रहा है।
दूसरी तरफ अमेरिका का F-35 विमान भी है, जिसे पश्चिमी देशों का सबसे उन्नत विमान माना जाता है। लेकिन भारत का इसकी तरफ ज्यादा ध्यान न देने के कई बड़े कारण हैं।
भारत और रूस का रक्षा साझेदारी का रिश्ता दशकों पुराना और भरोसेमंद है। रूस न सिर्फ विमान बेचने की बात कर रहा है, बल्कि तकनीक देने और भारत में ही विमान बनाने का ऑफर भी दे रहा है। वहीं, अमेरिका तकनीक देने में कंजूसी करता है और उसके हथियारों की डिलीवरी में देरी की शिकायतें भी रही हैं। भारत अपनी रक्षा नीति में आत्मनिर्भरता और आजादी को बहुत अहम मानता है। ऐसे में रूस का प्रस्ताव भारत की ‘मेक इन इंडिया’ नीति और लंबे समय की रणनीति के ज्यादा करीब है।
पाकिस्तान और उसका दोस्त चीन लगातार अपनी सेना को मजबूत कर रहे हैं, खासकर भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे सफल अभियान के बाद। ऐसे हालात में भारत का Su-57 जैसे उन्नत स्टील्थ विमान की तरफ झुकाव सिर्फ हवाई सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि दुनिया में बदलते हालात में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश का भी हिस्सा है। लेकिन यह तय करने से पहले कि भारत को Su-57 लेना चाहिए या F-35, यह समझना जरूरी है कि भारत को अपनी वायुसेना को तुरंत आधुनिक बनाने की जरूरत क्यों है।
रूसी Su-57
भारत को अपनी वायुसेना को आधुनिक क्यों करना चाहिए?
भारत को चीन और पाकिस्तान, दोनों मोर्चों पर खतरे का सामना है। पुराने पड़ते लड़ाकू विमानों को बदलने के लिए नई और उन्नत तकनीक वाले विमानों की जरूरत है। भारतीय वायुसेना को भविष्य की लड़ाइयों के लिए तैयार करना और देश की सुरक्षा को मजबूत करना अब बहुत जरूरी है।
भारतीय वायुसेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे मिशनों में अपनी ताकत दिखाई है, लेकिन अभी उसके पास सिर्फ 31 स्क्वाड्रन हैं, जबकि कम से कम 42 स्क्वाड्रन चाहिए। यह कमी तब और गंभीर हो जाती है, जब पाकिस्तान, जो आर्थिक तंगी में है, फिर भी चीन से J-35 जैसे स्टील्थ विमान खरीदने की तैयारी कर रहा है। भारत अपने पुराने मिग-21, जगुआर और मिराज 2000 जैसे विमानों को धीरे-धीरे हटा रहा है। सिर्फ फ्रांस के राफेल विमानों पर निर्भर रहना ठीक नहीं। भारत को अपने विमानों में विविधता लानी होगी।
स्वदेशी तेजस और AMCA जैसे प्रोजेक्ट अभी पूरी तरह तैयार नहीं हैं और इनमें देरी हो रही है। इसलिए भारत को अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए पाँचवीं पीढ़ी के स्टील्थ विमानों पर विचार करना पड़ रहा है। भारत की रक्षा अनुसंधान संस्था DRDO, AMCA स्टील्थ विमान पर काम कर रही है, लेकिन यह 2035 से पहले तैयार नहीं होगा। दूसरी तरफ, पाकिस्तान को इस साल से ही चीन से J-35A जैसे उन्नत विमान मिलने शुरू हो जाएँगे। ऐसे में 10 साल तक इंतजार करना भारत के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
पाकिस्तान की सेना ने अपने रक्षा बजट में 18-20% की बढ़ोतरी की है, भले ही उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर है और वह IMF से कर्ज ले रहा है। फिर भी, वह भारत के खिलाफ टकराव की तैयारी कर रहा है। यह भारत के लिए साफ चेतावनी है कि उसे अपनी वायुसेना को जल्दी मजबूत करना होगा।
एक अहम बात यह है कि डीआरडीओ ने एएमसीए (AMCA) फाइटर जेट का विकास शुरू कर दिया है, लेकिन पहला विमान 2035 से पहले मिलने की उम्मीद नहीं है।
तेजस मार्क-1 का ऑर्डर पूरा होने के बाद, HAL 2028-29 में तेजस मार्क-2 बनाना शुरू करेगा। इसके बाद ही AMCA का उत्पादन शुरू होगा। किसी भी आधुनिक विमान को बनाने में 10-15 साल लगते हैं। चूँकि AMCA प्रोजेक्ट को पिछले साल ही मँजूरी मिली है, इसलिए अभी इसमें काफी समय लगेगा। इसीलिए भारत को अभी विदेशी पाँचवीं पीढ़ी के विमानों पर विचार करना पड़ रहा है।
अमेरिकी F-35 भारत के लिए क्यों ठीक नहीं?
भारत उन गिने-चुने देशों में है जो रूस और अमेरिका, दोनों से रक्षा उपकरण खरीदता है। रूस लंबे समय से भारत का भरोसेमंद साथी रहा है, जबकि अमेरिका अक्सर रक्षा सौदों का इस्तेमाल भारत पर दबाव बनाने के लिए करता है।
अमेरिका से खरीदे उपकरणों में भारत को कई बार मुश्किलें आई हैं। मिसाल के तौर पर, तेजस MK-1A के लिए अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक (GE) के F404 इंजन की डिलीवरी में देरी हुई है। तेजस MK-2 के लिए GE F414 इंजन का सौदा भी दो साल पहले हुए समझौते के बावजूद रुका हुआ है।
इस सौदे में भारत में इंजन बनाने और तकनीक हस्तांतरण की बात थी, लेकिन अमेरिका इसमें अड़चन डाल रहा है। पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने ‘Make in America’ नीति पर जोर दिया और एप्पल को भी भारत में उत्पादन न करने को कहा था। ऐसे में यह साफ नहीं कि अमेरिका भारत को इंजन बनाने की इजाजत देगा या नहीं।
इसलिए भारत के लिए चिंता की बात है कि अमेरिका से रक्षा उपकरणों की डिलीवरी समय पर नहीं हो रही और न ही तकनीक देने का भरोसा है।
अमेरिका भारतीय सेना के लिए बोइंग के अपाचे हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी में भी देरी कर रहा है। मार्च 2024 में भारतीय सेना ने जोधपुर के पास 451 आर्मी एविएशन स्क्वाड्रन तैयार किया था, ताकि अपाचे तैनात किए जा सकें। इनकी डिलीवरी मई-जून 2024 में होनी थी, लेकिन अमेरिका ने सप्लाई-चेन और तकनीकी समस्याओं का बहाना बनाकर इसे दिसंबर 2024 तक टाल दिया। अब वह इस नई समय-सीमा को भी पूरा नहीं कर पाया है।
रूस का Su-57 और अमेरिका का F-35, दोनों ही पाँचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं (फोटो साभार: रायटर्स)
साल 2020 में भारत ने अमेरिका के साथ 600 मिलियन डॉलर का सौदा किया था, जिसमें 6 अपाचे हेलीकॉप्टर खरीदे जाने थे। लेकिन अब तक पहले बैच के तीन हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी के लिए अमेरिका दो बार समय-सीमा टाल चुका है। अमेरिका ने साफ नहीं किया कि ये हेलीकॉप्टर कब मिलेंगे और देरी क्यों हो रही है।
अमेरिका इसे सप्लाई-चेन की दिक्कतें और तकनीकी समस्याएँ बता रहा है, लेकिन यह उसकी पुरानी चाल मानी जाती है, जिसमें वह जानबूझकर देरी करता है ताकि भारत पर दबाव बनाए। यह देरी ऐसे समय हो रही है, जब भारत अपनी हवाई ताकत को तेजी से बढ़ा रहा है और चीन-पाकिस्तान के साथ तनाव के चलते युद्ध की तैयारी को प्राथमिकता दे रहा है। अपाचे हेलीकॉप्टर जरूरी हैं, क्योंकि ये आधुनिक हथियारों और टारगेटिंग सिस्टम से लैस हैं। फिर भी अमेरिका इसे प्राथमिकता नहीं दे रहा।
दूसरी तरफ, रूस ने भू-राजनीतिक मुश्किलों के बावजूद भारत को समय पर रक्षा उपकरण देने का अच्छा रिकॉर्ड रखा है। यही कारण है कि Su-57 जैसे विमान को समय पर भारतीय वायुसेना में शामिल करने के लिए रूस ज्यादा भरोसेमंद और अनुमानित विकल्प है।
अमेरिका की डिलीवरी में देरी कोई नई बात नहीं। उसकी विदेश नीति अक्सर दबाव बनाने, धमकाने, प्रतिबंध लगाने और न मानने वाले देशों में शासन बदलने की कोशिशों पर टिकी रही है। जैसा कि पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने कहा था, “अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन उसका दोस्त होना जानलेवा भी हो सकता है।” यह बात आज भी सही लगती है।
दिलचस्प है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार ‘व्यापार समझौतों’ को संघर्ष सुलझाने का हथियार बताया, लेकिन यूक्रेन-रूस युद्ध और भारत-पाकिस्तान तनाव जैसे मामलों में यह रणनीति नाकाम रही, जैसे संयुक्त राष्ट्र इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष को रोकने में नाकाम रहा।
रूस का Su-57 क्यों बेहतर है?
भारत और रूस का रक्षा रिश्ता लंबे समय से भरोसे और सम्मान पर टिका है। रूस का Su-57 ऑफर भारत के लिए खास है, क्योंकि यह ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी योजनाओं से मेल खाता है। रूस ने Su-57 के भारत में गहरे निर्माण का प्रस्ताव दिया है, जिसमें हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) की उन फैक्ट्रियों में सह-उत्पादन शामिल है, जहां पहले से Su-30MKI विमान बन रहे हैं। यह भारत को उन्नत तकनीक देगा और घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करेगा।
रूस ने Su-57 की पूरी तकनीक देने और भारत को GaN-आधारित AESA रडार, भारतीय मिशन कंप्यूटर और स्वदेशी हथियार जैसे अस्त्र और रुद्रम मिसाइल जोड़ने की छूट देने का वादा किया है।
सबसे खास बात ये है कि 4 जून 2025 को रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन ने कहा कि भारत को Su-57 के सोर्स कोड तक पूरी पहुँच मिलेगी। यह बहुत बड़ा ऑफर है, क्योंकि इससे भारत को विमान में अपनी जरूरत के हिसाब से बदलाव करने की आजादी मिलेगी। ऐसी पारदर्शिता और नियंत्रण शायद ही कोई और देश दे।
वहीं, अमेरिका का F-35 सिर्फ चुनिंदा सहयोगी देशों जैसे इजरायल, जापान, ऑस्ट्रेलिया और इटली को मिलता है। इसके सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर पर अमेरिका का सख्त नियंत्रण है। खरीदार देशों को F-35 बनाने या उसमें गैर-NATO हथियार जोड़ने की इजाजत नहीं मिलती, जब तक अमेरिका मंजूरी न दे। यह भारत के लिए मुश्किल है, क्योंकि भारत अपने हिसाब से विमान में बदलाव और स्वदेशी हथियार जोड़ना चाहता है।
भारत की नीति विदेशी रक्षा आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करने की है। अमेरिका का सख्त रवैया भारत के लिए चिंता का सबब है। ट्रंप के समय यह और साफ हुआ, जब अमेरिका ने तकनीक देने से मना किया, यह कहकर कि इससे उसकी तकनीकी बढ़त कमजोर हो सकती है।
कीमत की बात करें तो अमेरिकी F-35A की लागत लगभग 80 से 110 मिलियन डॉलर प्रति यूनिट है, जबकि रूस का Su-57 कहीं ज्यादा सस्ता है, करीब 35 से 40 मिलियन डॉलर प्रति यूनिट। इसके अलावा, Su-57 की रखरखाव लागत भी F-35 की तुलना में काफी कम है। इसलिए, सिर्फ रणनीतिक और तकनीकी कारणों से ही नहीं, बल्कि आर्थिक नजरिए से भी Su-57 भारत के लिए एक ज्यादा व्यावहारिक और लचीला विकल्प बन जाता है।
रूस का Su-57 और अमेरिका का F-35 – दो पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (फोटो: रॉयटर्स)
लागत और तकनीकी दिक्कतें
F-35 की कीमत 80 से 110 मिलियन डॉलर प्रति विमान है, जबकि Su-57 सिर्फ 35 से 40 मिलियन डॉलर में मिलता है। Su-57 की रखरखाव लागत भी F-35 से कम है। यानी आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक नजरिए से Su-57 भारत के लिए ज्यादा फायदेमंद है।
साल 2023 की एक बिजनेस इनसाइडर रिपोर्ट के मुताबिक, F-35 में कई तकनीकी समस्याएँ हैं, जैसे स्टील्थ कोटिंग, सुपरसोनिक उड़ान, हेलमेट डिस्प्ले और तोप में कंपन। इसे बिजली गिरने से भी खतरा है।
सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा को लेकर भी चिंता है। F-35 को हैकिंग के लिए असुरक्षित माना गया है। 2015 में एक जर्मन पत्रिका ने खुलासा किया था कि एडवर्ड स्नोडेन द्वारा लीक किए गए दस्तावेजों के अनुसार, चीनी हैकर्स ने ऑस्ट्रेलिया के US-निर्मित F-35 से लगभग 50 टेराबाइट डेटा चुरा लिया था। इसमें विमान के रडार सिस्टम, इंजन डिज़ाइन और टारगेट ट्रैकिंग तकनीक जैसी संवेदनशील जानकारी शामिल थी।
यही कारण है कि विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के J-35A और अमेरिका के F-35 में कई डिजाइन और तकनीकी समानताएँ दिखती हैं। ये सभी बातें F-35 की विश्वसनीयता और सुरक्षा पर सवाल खड़े करती हैं, खासकर उन देशों के लिए जो इसे अपनाने पर विचार कर रहे हैं।
अगर भारत F-35 फाइटर जेट को तैनात करना चाहता है, तो उसे अमेरिका से AIM-120 एडवांस मीडियम-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (AAM) भी खरीदनी पड़ेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि F-35 में भारत की अपनी मिसाइलें या गैर-NATO हथियार तभी लगाए जा सकते हैं जब अमेरिका इसकी इजाजत दे, जो आसान नहीं है।
इसके अलावा, भारतीय वायुसेना (IAF) के पास पहले से ही सात अलग-अलग तरह के फाइटर जेट हैं। तेजस, राफेल, मिग-21, मिग-29, सुखोई Su-30MKI, मिराज 2000 और जगुआर। इन सभी की मेंटेनेंस, स्पेयर पार्ट्स, ओवरहाल और ट्रेनिंग पर भारी खर्च आता है। अगर भारत अब एक और अलग और महंगा फाइटर जेट F-35 शामिल करता है, तो यह एक बड़ा लॉजिस्टिक सिरदर्द बन सकता है और संचालन में और भी जटिलता जोड़ देगा।
हालाँकि Su-57 भी एक नया फाइटर जेट है, लेकिन चूँकि यह सुखोई परिवार से है, और भारत पहले से ही Su-30MKI जैसे सुखोई विमानों का इस्तेमाल कर रहा है, इसलिए Su-57 को अपनाना ज्यादा आसान, सस्ता, और IAF के लिए बेहतर फिट हो सकता है। इससे रखरखाव और ट्रेनिंग में भी आसानी होगी।
तकनीकी बातों के अलावा, भारत के रक्षा खरीद फैसले भू-राजनीतिक कारणों से भी बहुत प्रभावित होते हैं। खासकर अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले प्रतिबंधों के डर से, जिन्हें काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शन्स एक्ट (CAATSA) कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, भारत ने 2021 में रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा था, जिससे अमेरिका नाराज़ हो गया था। इसके बावजूद भारत ने अमेरिका की धमकियों और हथियारों की सप्लाई में देरी की चेतावनियों को नजरअंदाज किया और S-400 खरीदने का अपना फैसला कायम रखा।
इसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान, अमेरिका ने भारत के रूस से तेल खरीदने पर भी आपत्ति जताई और फिर से प्रतिबंधों की धमकी दी। इन सब घटनाओं से साफ होता है कि भारत अपने रक्षा और ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिका के दबावों के बावजूद अपने रणनीतिक फैसले खुद ले रहा है।
संयुक्त राज्य अमेरिका ने हमेशा अपनी रक्षा तकनीकों को सुरक्षित रखने के लिए निर्यात नियंत्रण और प्रतिबंध लगाए हैं। इससे भारत के लिए F-35 के पुर्जों और रखरखाव में दिक्कतें आ सकती हैं, खासकर संकट के समय। अमेरिका पहले भी उन देशों को हथियारों की सप्लाई में देरी करता रहा है या रोक लगाता है, जिन्हें वह अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के खिलाफ समझता है।
जैसा कि पहले बताया गया है, अमेरिका इस तरह की देरी रणनीतिक दबाव बनाने के लिए करता है ताकि दूसरे देश उसके अनुसार चलें। अमेरिका की विश्वसनीयता इस बात से भी सवाल उठती है कि वह पाकिस्तानी नागरिकों को अमेरिका में आतंकवादी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार करता है, लेकिन फिर भी पाकिस्तान को ‘अभूतपूर्व भागीदार’ कहकर समर्थन देता रहता है। वह भारत को परेशान करने के बावजूद पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते खत्म नहीं करता।
भारत अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता पर जोर देता है और किसी का कठपुतली बनने से मना करता है। इसलिए, वह किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहता। ऐसे में रूस का Su-57 जेट भारत के लिए एक बेहतर विकल्प है क्योंकि इसमें भू-राजनीतिक बंधन कम हैं और यह भारत की स्वतंत्रता और सुरक्षा की जरूरतों के अनुसार बेहतर फिट बैठता है।
इस बात में कोई शक नहीं कि भारत को अपनी रक्षा जरूरतों के लिए विदेशी निर्भरता कम करनी चाहिए। लेकिन रूस के साथ भारत की रक्षा साझेदारी ने समय की कसौटी पर अच्छा प्रदर्शन किया है।
भारत का लगभग 60 प्रतिशत सैन्य उपकरण जैसे ब्रह्मोस मिसाइल, Su-30MKI लड़ाकू जेट, S-400 सिस्टम और T-72 टैंक रूसी हैं। जब प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, समर्थन और सह-उत्पादन की बात आती है, तो रूस काफी लचीला रहता है, जबकि अमेरिका इसे ‘सुरक्षा कारणों’ का हवाला देकर मना कर देता है।
Su-30MKI, रूसी Su-30 का एक खास रूप है, जो भारतीय वायु सेना का मुख्य हिस्सा है और इसके 260 से ज्यादा विमान सेवा में हैं। HAL की नासिक फैक्ट्री में इसका सफल निर्माण भारत-रूस रक्षा सहयोग की ताकत दिखाता है।
रूस ने भारत में मौजूदा सुविधाओं का इस्तेमाल करने का भी प्रस्ताव दिया है, जिससे Su-57 को अपनाना आसान होगा। इसके मुकाबले, अमेरिका का F-35 जेट भारत के लिए नया होगा, जिससे नए प्रशिक्षण और रखरखाव की जरूरत पड़ेगी और रसद की परेशानियां बढ़ेंगी। इस वजह से रूस का विकल्प भारत के लिए ज्यादा सुविधाजनक और सही माना जा रहा है।
जैसा कि ऊपर बताया गया है, रूस की विश्वसनीयता भारत के लिए महत्वपूर्ण समय पर साबित हुई है, जैसे 1971 के भारत-पाक युद्ध में, जबकि अमेरिका के साथ ऐसा भरोसा कम है। अमेरिका ने भारत को C-17 ग्लोबमास्टर और अपाचे हेलीकॉप्टर दिए हैं, लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सों की डिलीवरी में जानबूझकर देरी और सख्त निर्यात नियम भारत के लिए चिंता का कारण बने हैं।
रूसी Su-57 पाँचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान न केवल F-35 से सस्ता है, बल्कि भारत के रक्षा बजट के हिसाब से भी बेहतर है और भारत को बड़े बेड़े खरीदने की सुविधा देता है। Su-57 का डिजाइन खासतौर पर तेज़ गति, सुपरक्रूज़ (लगातार तेज उड़ान) और बहु-भूमिका क्षमता पर केंद्रित है, जो चीन की सीमा जैसे उच्च और चुनौतीपूर्ण इलाकों में लड़ने के लिए भारत की जरूरतों के लिए बेहतर है।
वहीं, F-35 नेटवर्क-आधारित युद्ध के लिए ज्यादा अनुकूलित है और यह अकेले ऑपरेशन के लिए भारत की जरूरतों को पूरी तरह पूरा नहीं कर सकता। इसलिए, Su-57 भारत के लिए ज्यादा सही विकल्प माना जा रहा है।
बदलते वैश्विक रिश्तों में भारत नाटो के ज्यादा करीब नहीं रहना चाहेगा, खासकर जब रूस, नाटो समर्थित यूक्रेन से युद्ध कर रहा है। रूस का Su-57 सह-उत्पादन का ऑफर भारत को उन्नत विमान बनाने और क्षेत्रीय निर्यात का मौका देगा। इससे भारतीय रक्षा उद्योग को फायदा होगा, क्योंकि दुनिया भारत के हथियारों में रुचि दिखा रही है। F-35 में निर्यात पर सख्त पाबंदी है, इसलिए भारत को ऐसी आजादी नहीं मिलेगी।
इससे भारतीय रक्षा उद्योग को बड़ा फायदा होगा, क्योंकि दुनिया भारत के युद्ध-परीक्षणित हथियारों में तेजी से रुचि दिखा रही है। वहीं, अमेरिका के F-35 में निर्यात पर सख्त रोक के कारण भारत को ऐसी आज़ादी नहीं मिलेगी। इसलिए, Su-57 भारत के लिए बेहतर विकल्प है।
निष्कर्ष
जब तक AMCA जैसे स्वदेशी विमान तैयार नहीं हो जाते, भारत को पाँचवीं पीढ़ी के विदेशी विमानों पर विचार करना होगा। इस दौरान लागत, आसानी और समय पर डिलीवरी महत्वपूर्ण है, जो रूस बेहतर दे सकता है। रूस का भारत के साथ पुराना भरोसा, तकनीक देने की इच्छा और भारत की रणनीतिक आजादी का सम्मान उसे बेहतर विकल्प बनाता है।
रक्षा में आयात कम करना चाहिए, लेकिन AMCA तैयार होने तक भारत को रूस जैसे भरोसेमंद साथी पर भरोसा करना चाहिए, न कि अमेरिका पर। खासकर जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पाकिस्तान के पक्ष में रहे हैं और अपनी निजी योजनाओं में व्यस्त हैं। भारत कब तक अपनी रक्षा और रणनीतिक आजादी को छोड़कर अमेरिका के स्वार्थों का बोझ उठाएगा?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को ईरान को चेतावनी दी है कि वह परमाणु समझौते को स्वीकार करे, वरना परिणाम भुगते। उन्होंने कहा कि इजरायल के पास दुनिया में सबसे बेहतरीन अमेरिकी हथियार हैं और दावा किया कि इजरायल का अगला हमला और भी घातक होगा।
ट्रंप ने कहा कि ईरान को इससे पहले समझौता कर लेना चाहिए, जब तक कि कुछ भी न बचे। उन्होंने कहा- “बस करो, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए”
60 दिन का ईरान को ट्रंप ने दिया था वक्त
सोशल मीडिया पोस्ट पर डोनाल्ड ट्रंप ने लिखा है कि उन्होंने ईरान को समझौता करने के कई मौके दिए, लेकिन वे इसे पूरा नहीं कर पाए। उन्होंने कहा कि उन्होंने चेतावनी दी थी कि हमला उनकी अपेक्षा से कहीं अधिक भयानक होगा, लेकिन कुछ ईरानी कट्टरपंथियों ने समझौते को अस्वीकार कर दिया। ट्रंप ने कहा कि ऐसे कट्टरपंथी अब मर चुके हैं। ट्रंप के मुताबिक उन्होंने ईरान को 60 दिन का वक्त दिया था लेकिन ईरान ने गँवा दिया और समझौता नहीं किया।
ट्रंप ने कहा, “मैंने ईरान को समझौता करने के लिए कई मौके दिए। मैंने उन्हें सख्त शब्दों में कहा, “बस करो”, लेकिन चाहे उन्होंने कितनी भी कोशिश की हो, चाहे वे कितने भी करीब क्यों न पहुँचे हों, वे इसे पूरा नहीं कर पाए। संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया में अब तक का सबसे बेहतरीन और सबसे घातक सैन्य उपकरण बनाता है। इजरायल के पास इसका भंडार है। वे जानते हैं कि इसका इस्तेमाल कैसे करना है? कुछ ईरानी कट्टरपंथी बहादुरी से बोलते थे, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि क्या होने वाला है। वे सभी अब मर चुके हैं, और स्थिति और भी बदतर होगी!”
नरसंहार को रोकने का अभी भी है वक्त-ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि इजरायली हमले को रोकने के लिए समय है। इसके लिए ईरान को एक समझौता करना होगा। उन्होंने कहा, “पहले से ही बहुत अधिक मौतें और विनाश हो चुके हैं, लेकिन इस नरसंहार को समाप्त करने के लिए अभी भी समय है। ईरान को परमाणु समझौता करना चाहिए, इससे पहले कि कुछ भी न बचे, और जिसे कभी ईरानी साम्राज्य के रूप में जाना जाता था उसे बचाओ।”
डोनाल्ड ट्रम्प ने ट्रुथ पोस्ट में कहा, “अब और मौत नहीं, अब और विनाश नहीं, बस करो, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। भगवान आप सभी का भला करे!”
ईरान नहीं करेगा अब अमेरिका के साथ परमाणु वार्ता
ईरान ने आधिकारिक तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ परमाणु वार्ता से हटने की घोषणा की है। यह निर्णय इजरायल द्वारा ईरानी परमाणु और सैन्य स्थलों पर हमला और तेहरान द्वारा जवाबी ड्रोन हमले के बाद लिया गया है।
इस वार्ता का उद्देश्य 2015 के परमाणु समझौते को फिर से लागू करना था। उस वक्त प्रतिबंधों में राहत के बदले ईरान की परमाणु गतिविधि को सीमित कर दिया गया था।
इस बीच ईरान ने अपने परमाणु स्थलों पर हमले और तेहरान में अपने वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व की हत्या का बदला लेने की कसम खाई है और कहा कि वह जोरदार तरीके से जवाब देगा और “इस कहानी का अंत ईरान के हाथों से लिखा जाएगा”।