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जिसने माँ-बच्चे और पत्नी के सामने की शख्स की हत्या, उसे केरल के हाई कोर्ट ने दी माँ की सेवा करने को पैरोल: जेल के नियमों में नहीं था ऐसा कोई प्रावधान, कहा- हमारे यहाँ आँख के बदले आँख वाली सजा नहीं दी जाती

केरल हाईकोर्ट ने 93 साल की एक वृद्ध महिला की सेवा के लिए उसके बेटे को एस्कॉर्ट परोल दे दी। दरअसल हत्या का दोषी पाए जाने पर बेटा को कोर्ट ने मौत की सजा दी थी। अब मानवीय पहलू के आधार पर न्यायमूर्ति पी. वी. कुन्हिकृष्णन ने पैरोल देने का आदेश दिया।

हालाँकि केरल कारागार एवं सुधार सेवाएँ (प्रबंधन) अधिनियम और केरल कारागार एवं सुधार सेवाएँ (प्रबंधन) अधिनियम के मुताबिक मौत की सजा पाए कैदियों को पैरोल नहीं दिया जा सकता है।

न्यायमूर्ति पी. वी. कुन्हीकृष्णन ने कहा, “हालाँकि यह सच है कि दोषी किसी भी ‘मानवीयता’ का हकदार नहीं है, क्योंकि उसने एक व्यक्ति की उसकी माँ, पत्नी और बच्चे के सामने बेरहमी से हत्या की है। लेकिन कोर्ट कैदी की तरह बर्ताव नहीं कर सकता।”

कोर्ट ने कहा,

“अगर कोई कहता है कि कैदी की माँग गलत है तो उन्हें पूरी तरह झुठलाया नहीं जा सकता। लेकिन कोर्ट कैदी की तरह अमानवीय रुख नहीं अपना सकता। कैदी ने एक परिवार को अनाथ कर दिया। भारत ऐसा देश नहीं है, जहाँ ‘आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत’ जैसी सजा दी जाती हो। हमारा देश न्याय करते समय अपनी मानवता, करुणा और सहानुभूति के लिए जाना जाता है। यह देखना संवैधानिक न्यायालय का कर्तव्य है कि सजा पूरी होने तक कैदी की बुनियादी जरूरतों और बुनियादी अधिकारों की रक्षा की जाए।”

कैदी ने सत्र न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी। कैदी की पत्नी ने जेल अधिकारियों से भी अनुरोध किया था, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद उसने एस्कॉर्ट पैरोल के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट को उसने बताया कि 93 साल की माँ बिस्तर पर पड़ी हैं और बुरी तरह बीमार हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब मृत्युदंड की प्रतीक्षा कर रहा एक कैदी कोर्ट से गुहार लगाता है कि वह अपनी बीमार माँ को देखना चाहता है, तो न्यायालय अपनी आँखें बंद नहीं कर सकता, भले ही उसने हत्या करते समय मृतक और उसके रिश्तेदारों के साथ अमानवीय व्यवहार किया हो, जिसे ट्रायल कोर्ट ने सही पाया है।

कोर्ट ने जेल अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे दोषी को उसकी माँ से मिलने के लिए एस्कॉर्ट पैरोल पर ले जाएँ और उसकी माँ के साथ कम से कम 6 घंटे बिताने दें। इस दौरान एस्कॉर्टिंग पुलिस निगरानी करती रहे।

न्यूजीलैंड में हिंदुओं-सिखों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, ॐ लिखा झंडा जलाया तो खिल गईं इस्लामी कट्टरपंथियों की बाँछे, सेकुलरों को भी मिला असीम सुख: जानें – ‘अंब्रेला कंट्री’ में इस नई आफत के पीछे कौन

शांति और खूबसूरती के लिए दुनिया भर में पहचाना जाने वाला न्यूजीलैंड इन दिनों अशांति की खबरों से चर्चा में है। यहाँ सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनमें गैर-ईसाई धर्मों (हिंदू, मुस्लिम, सिख), प्रवासियों, फिलिस्तीनी समुदायों और यहाँ तक कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) को निशाना बनाया जा रहा है। इन प्रदर्शनों की अगुवाई एक माओरी मूल का धार्मिक नेता ब्रायन तमाकी कर रहा है, जो डेस्टिनी चर्च नामक संगठन चलाता है।

प्रदर्शनों में माओरी युद्ध नृत्य ‘हाका’ और हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, फिलिस्तीनी झंडों को जलाने जैसे भड़काऊ कदम उठाए गए हैं। ये सब न्यूजीलैंड की उस छवि को नुकसान पहुँचा रहे हैं, जो इसे सभी धर्मों और संस्कृतियों को अपनाने वाला ‘अंब्रेला कंट्री’ बनाती है।

इस प्रदर्शन के दौरान माओरी युद्ध नृत्य ‘हाका’ और धार्मिक झंडों को जलाने जैसे भड़काऊ कदम उठाए गए हैं, जिससे न्यूजीलैंड की बहुसांस्कृतिक छवि को ठेस पहुँची है। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिसमें हिंदुओं और खालिस्तानियों के खिलाफ प्रदर्शन के दावे किए जा रहे हैं।

इन प्रदर्शनों के वीडियो और तस्वीरें लोग अपने ‘हिसाब’ से पोस्ट कर रहे हैं। इस्लामी हैंडल और कथित सेकुलर लोग ये कहकर इस प्रदर्शन का वीडियो शेयर कर रहे हैं कि न्यूजीलैंड में हिंदुओं का विरोध हो रहा है।

फातिमा जैसे हैंडल्स को इसी बात की खुशी हो रही है कि हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है।

वहीं श्रवण पासवान नाम के ट्विटर हैंडल ने वीडियो शेयर करते हुए इस बात पर खुशी जताई कि न्यूजीलैंड में हिंदू (ब्राह्मणों) के खिलाफ जनता सड़कों पर उतरी है।

हालाँकि इन प्रदर्शनों का विरोध भी हो रहा है। आखिर इस अशांति की जड़ क्या है? ‘अंब्रेला कंट्री’ यानी सभी को समेटने वाले देश न्यूजीलैंड में ऐसा क्यों हो रहा है? इस पूरे मामले को विस्तार से समझाते हैं

न्यूजीलैंड में विरोध प्रदर्शन का मामला क्या है?

न्यूजीलैंड की आबादी करीब 53 लाख है और यह देश हमेशा से प्रवासियों के लिए खुला रहा है। लेकिन कोविड-19 महामारी के बाद, यानी 2022 से, यहाँ प्रवासियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इससे कई समस्याएँ सामने आई हैं, जैसे मकानों की कमी और किराए में भारी बढ़ोतरी। लोग परेशान हैं कि उनके लिए घर और नौकरियाँ कम पड़ रही हैं। सरकार ने कोशिश की है कि कुशल प्रवासियों जैसे शिक्षकों या डॉक्टरों को प्राथमिकता दी जाए, लेकिन स्थानीय लोगों को लगता है कि प्रवासी उनके संसाधन छीन रहे हैं।

इन प्रदर्शनों की अगुवाई करने वाले ब्रायन तमाकी के एक्स हैंडल पर एक 40 मिनट से भी ज्यादा का वीडियो मिला, जिसमें वो और उनके ‘प्रदर्शनकारी’ अनुयाई सभी गैर-ईसाइयों के खिलाफ आग उगल रहे हैं।

हालाँकि इस मामले पर न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने भी बयान दिया था कि इतना ज्यादा प्रवास ‘लंबे समय तक चल नहीं सकता।’ इसके साथ ही कई न्यूजीलैंडवासी बेहतर नौकरियों और जिंदगी की तलाश में ऑस्ट्रेलिया जा रहे हैं। 2023 में 47,000 लोग देश छोड़कर चले गए, जो एक रिकॉर्ड है। इस स्थिति ने कुछ लोगों में गुस्सा और असुरक्षा की भावना पैदा की है।

धार्मिक और सांस्कृतिक टकराव एक जगह लाए ब्रायन तमाकी

इसी माहौल में ब्रायन तमाकी और उनके डेस्टिनी चर्च ने गैर-ईसाई धर्मों और प्रवासियों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किए। 21 जून 2025 को ऑकलैंड में हुए एक प्रदर्शन में हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध और फिलिस्तीनी झंडों को जलाया गया। प्रदर्शनकारी माओरी युद्ध नृत्य ‘हाका’ कर रहे थे, जो माओरी संस्कृति का एक पवित्र हिस्सा है। तमाकी का कहना है कि गैर-ईसाई धर्मों का प्रसार ‘नियंत्रण से बाहर’ हो गया है और प्रवासियों का बिना न्यूजीलैंड की संस्कृति को आत्मसात हुए आना ‘अतिक्रमण‘ है।

न्यूजीलैंड की ‘अंब्रेला कंट्री’ छवि पर खतरा

न्यूजीलैंड को ‘अंब्रेला कंट्री’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ हर धर्म और संस्कृति के लोग शांति से रहते हैं। लेकिन तमाकी के प्रदर्शन ने इस एकता को चुनौती दी है। हालाँकि न्यूजीलैंड के नेताओं ने इसे सख्ती से नकारा है। कार्यवाहक प्रधानमंत्री डेविड सेमुर ने इसे ‘गैर-न्यूजीलैंड जैसा’ बताया और कहा कि यहाँ सभी धर्मों और संस्कृतियों का स्वागत है, बशर्ते वे शांति से रहें।

पुलिस मंत्री मार्क मिशेल ने भी प्रदर्शन को ‘घृणास्पद’ करार दिया, खासकर माओरी युद्ध हथियार ‘ताइहा’ का इस्तेमाल धार्मिक झंडों को नष्ट करने के लिए करना गलत बताया। विभिन्न धार्मिक संगठनों ने एकजुट होकर तमाकी की निंदा की और कहा कि न्यूजीलैंड की ताकत उसकी विविधता में है।

हालाँकि न्यूजीलैंड में अभी हालात इतने खराब नहीं हैं, लेकिन तमाकी जैसे नेताओं के उत्तेजक बयान और प्रदर्शन अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर इसे रोका नहीं गया, तो न्यूजीलैंड की शांति और एकता को नुकसान पहुँच सकता है।

क्यों पड़ेगा फर्क?

ये प्रदर्शन न्यूजीलैंड की सामाजिक और आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा हैं। अगर धार्मिक और प्रवासी समुदायों के खिलाफ नफरत बढ़ती है, तो देश की बहुसांस्कृतिक छवि को नुकसान होगा। इससे पर्यटन, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों पर भी असर पड़ सकता है। साथ ही सामाजिक तनाव बढ़ने से अपराध और हिंसा की घटनाएँ बढ़ सकती हैं, जैसा कि 2019 के क्राइस्टचर्च मस्जिद हमले जैसे मामलों में देखा गया। धार्मिक संगठनों ने सरकार से नफरत भरे भाषणों के खिलाफ सख्त कानून बनाने की माँग की है, ताकि ऐसी घटनाएँ रोकी जा सकें।

कौन है प्रदर्शनों की अगुवाई करने वाला ब्रायन तमाकी

ब्रायन रेमंड तमाकी का जन्म 2 फरवरी, 1958 को न्यूजीलैंड के वाइकाटो क्षेत्र में हुआ। वे माओरी मूल के हैं और ताइनुई जनजाति से ताल्लुक रखते हैं। 15 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और जंगल में मजदूरी शुरू की। किशोरावस्था में तमाकी की मुलाकात हन्नाह ली से हुई। उनका रिश्ता तूफानी था। एक बार हन्नाह ने तमाकी पर चाकू से हमला किया, और वे बाथरूम में बंद होकर बमुश्किल बचे। 1978 में उनके पहले बच्चे का जन्म हुआ, जो शादी से पहले था। 1980 में तमाकी और हन्नाह ने तोकोरोआ के एक चर्च में शादी की। इसके बाद उनके दो और बच्चे हुए।

डेस्टिनी चर्च की स्थापना

1982 में तमाकी और हन्नाह ने बाइबल कॉलेज में पढ़ाई की और फिर तोकोरोआ में पादरी बने। 1980 के दशक में उन्होंने कई चर्च शुरू किए और 1998 में डेस्टिनी चर्च की नींव रखी। यह चर्च अपनी कट्टरपंथी विचारधारा के लिए जाना जाता है, जो समलैंगिकता, गैर-परंपरागत परिवार मूल्यों और आधुनिक सामाजिक बदलावों का विरोध करता है। तमाकी खुद को ‘बिशप’ कहते हैं और समृद्धि धर्मशास्त्र को बढ़ावा देते हैं, जिसमें धन और सफलता को ईश्वर की देन माना जाता है। यह विचारधारा कई बार विवादास्पद रही, क्योंकि इसे अनैतिक और खतरनाक माना गया।

राजनीतिक में कई बार मिली करारी शिकस्त

तमाकी ने कई बार राजनीति में कदम रखने की कोशिश की, लेकिन हर बार असफल रहे। 2003 में उनके समर्थकों ने डेस्टिनी न्यूजीलैंड पार्टी बनाई, जो 2005 के चुनाव में केवल 0.6% वोट पा सकी। 2019 में उनकी पत्नी हन्नाह ने विजन न्यूजीलैंड पार्टी शुरू की, जो गर्भपात और समलैंगिकता जैसे मुद्दों पर केंद्रित थी। 2022 में तमाकी ने फ्रीडम्स न्यूजीलैंड पार्टी बनाई, जो 2023 के चुनाव में 0.33% वोट के साथ नाकाम रही।

तमाकी का प्रभाव सीमित है, लेकिन उनके उत्तेजक बयान और प्रदर्शन सोशल मीडिया के जरिए वायरल होते हैं, जिससे वे चर्चा में रहते हैं। कुल मिलाकर तमाकी का जीवन बेहद उठापटक भरा रहा है और इन प्रदर्शनों के जरिए वो न्यूजीलैंड की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

ब्रायन तमाकी के नेतृत्व में न्यूजीलैंड में हो रहे प्रदर्शन देश की शांति और बहुसांस्कृतिक छवि के लिए चुनौती हैं। प्रवास, आवास संकट और सांस्कृतिक तनाव जैसे मुद्दों ने न्यूजीलैंड की सामाजिक एकता को खतरा पैदा किया है। ऐसे में अब न्यूजीलैंड के सामने अब अपनी ‘अंब्रेला कंट्री’ की पहचान को बचाने की भी चुनौती है और यह तभी संभव होगा जब एकता और सम्मान के मूल्यों को बढ़ावा दिया जाए।

नशा देकर रेप, ब्लैकमेलिंग, परिवारों पर झूठे मुकदमे… पादरी बजिंदर सिंह की काली करतूतों के कई पीड़ित:’पापा जी’ की कहानी बताते हुए सिहरती जाती हैं महिलाएँ

पंजाब का यीशू-यीशू वाला पादरी बजिंदर सिंह के अत्याचार से पीड़ित महिलाएँ अब खुल कर सामने आ रही हैं। बजिंदर फिलहाल मनसा जेल में बंद है। उसे एक मामले में 1 अप्रैल 2025 को उम्रकैद की सजा मिली है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक महिला ने बताया कि बजिंदर सिंह ने उसे नशा देकर रेप किया और उसका वीडियो बना कर ब्लैकमेल करने लगा। बजिंदर ने कहा कि अगर वह उसके पास नहीं गई तो वीडियो वायरल कर देगा। इतना ही नहीं उसे श्मशान भेजा और तंत्र-मंत्र के लिए जलती चिता की राख और खोपड़ी लाने का आदेश दिया। वह 4 बार श्मशान गई और जलती हुई राख और खोपड़ियाँ लेकर आई। पूरी रात वह मंत्र पढ़ता था और तांत्रिक पूजा करता था। इस दौरान महिला को उसके साथ बैठना पड़ता था।

महिला ने तंग आकर उसके खिलाफ पुलिस कंप्लेन करने की धमकी दी। इसके बाद महिला पर चोरी का इल्जाम लगाया गया और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। हालाँकि पुलिस को उसके पास से कुछ नहीं मिला और उसे छोड़ दिया गया। महिला के मुताबिक उसने 2018 में सबसे पहले पादरी बजिंदर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी, वो गिरफ्तार भी हुआ लेकिन 3 महीने में ही जेल से बाहर आ गया।

केस खत्म करने के लिए उसने महिला को 10 लाख रुपए ऑफर किए थे, लेकिन महिला नहीं मानी। इसके बाद उसके पति को झूठे रेप केस में फँसाया। यहाँ तक कि महिला पर रेप में मदद करने का आरोप भी लगाया। इस मामले में दोनों पति-पत्नी अभी बेल पर हैं। महिला और उसके पति को परेशान करने का सिलसिला थमा नहीं है।

महिला के मुताबिक बजिंदर को रेपिस्ट करने पर जालंधर में उनदोनों के खिलाफ केस दर्ज हुआ। ये केस चर्च के प्रधान ने कराया। इसमें दोनों बरी हो गये। एक और केस चंडीगढ़ में किया गया। इसमें महिला के पति पर नशा देकर रेप करने का आरोप है।
एक और मामला हिमाचल प्रदेश के मंडी में दर्ज किया गया है। इसमें आरोप लगाया गया कि महिला ने लड़की का किडनैप किया। महिला के पति और ड्राइवर ने मिलकर रेप किया। इस केस में महिला के तरफ से फर्जी वकील भी कोर्ट में खड़ा था। उसके बेल की अर्जी रिजेक्ट भी हो गयी।

एक दूसरी महिला अनीशा (बदला हुआ नाम) ने फरवरी 2025 में बजिंदर सिंह पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। महिला के मुताबिक बजिंदर सिंह प्रोफेट या पादरी नहीं है बल्कि शैतान है जो फर्जी चमत्कार की बात करके लोगों को बरगलाता है। अनीशा के मुताबिक, ” 2017 में बजिंदर ने उसे गंदे तरीके से छुआ। उस वक्त वह मात्र 13 साल की थी। मुझे लगा कि शायद ये गलती से हुआ है। 2020 से वह बहाने बनाकर अकेले अपने ऑफिस बुलाने लगा। मेरे साथ सब कुछ हुआ,
बस रेप नहीं हुआ”

दरअसल 2017 में अनीशा अपने माँ के साथ चर्च जाने लगी थी। एक साल बजिंदर ने उसकी माँ को अपनी टीम में शामिल कर लिया। वह हमेशा अनीशा को सेवा के लिए बुलाने का दबाव डालता। अनीशा के मुताबिक उसकी माँ ने 2020 में उसे सेवा के लिए पहली बार भेजा। उसे फिर अकेले बजिंदर बुलाने लगा। उसे बैड टच के बाद गंदे मैसेज भी करने लगा। बात बैड टच से आगे बढ़ गई और अनीशा को डिप्रेशन होने लगा। अनीशा कहती है कि जब भी उसे बुलावा आता, वह पैनिक हो जाती, लेकिन मजबूरन जाना पड़ता था।

अनीशा की माँ बजिंदर के बुलावे को यीशू का संदेश समझती और उसे भेज देती। अनीशा को बजिंदर ने धमकी दी कि अगर उसने मुँह खोला तो उसके पूरे परिवार को मार देगा।
अनिशा के मुताबिक बजिंदर कहता,” मैंने बहुत लोगों को मारा है, तुम्हें भी मार दूँगा और कोई मेरा कुछ नहीं कर पाएगा।”

बजिंदर ने अनीशा की माँ को धमकी दी कि अगर किसी से कुछ कहा तो परिवार की बेइज्जती करेंगे। अनीशा के पिता को लड़की की छेड़छाड़ के आरोप में फँसाया।

अनीशा कहती है कि चर्च में कई लड़कियों के साथ बजिंदर ने जोर जबरदस्ती की। एक लड़की के माता-पिता अभी भी चर्च में काम करते हैं। उन्हें बजिंदर के करतूतों के बारे में सब पता है लेकिन वे डरते हैं।

अनिशा के मुताबिक चर्च से कई लड़के-लड़कियाँ गायब भी हुए। अनीशा ने 7 साल तक बजिंदर के साथ काम किया है। वह कहती हैं कि ” वह कोई चमत्कार नहीं करता, सबकुछ योजनाबद्ध तरीके से होता है। उसकी टीम आगे की लाइन में बैठती है। जो भी मंच तक पहुँचते हैं सब पहले से तय होता है। मेरी तो आँखों के सामने ये सब होता था।”

कौन है पादरी बजिंदर सिंह?

पादरी बजिंदर सिंह हरियाणा के करनाल का रहने वाला है। उसका जन्म यमुनानगर में हुआ था। उसके चर्च की देशभर में करीब 260 शाखाएँ हैं। मोहाली के न्यू चंडीगढ़ में सबसे बड़ा चर्च है। जालंधर के ताजपुर में पादरी बजिंदर सिंह एक चर्च चलाता है, जिसे ग्लोरी ऑफ विजडम चर्च कहा जाता है।

करीब 15 साल पहले एक हत्या के मामले में उसे सजा मिली। वह जेल से निकला और ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। वह बीमारियों का इलाज करने का दावा करता है। उसकी सभाओं में हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती है। उसके यूट्यूब चैनल पर करीब 37 लाख सब्सक्राइबर हैं। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इजरायल, मॉरिशस, मलयेशिया तक में शाखाएँ हैं और उसके अनुयायी उसे ‘पापा जी’ कहते हैं।

रेयर अर्थ मिनरल, TBM, स्मार्टफोन पार्ट… भारत की विकास यात्रा में अड़ंगा लगा रहा चीन: अब स्पेशल खाद की भी सप्लाई रोकी, ‘हाथी’ की आर्थिक तरक्की ‘ड्रैगन’ को नहीं हो रही बर्दाश्त

बीते 20-30 वर्षों में चीन ने अभूतपूर्व आर्थिक विकास हासिल किया है। चीन ‘दुनिया की फैक्ट्री’ के रूप में उभरा है। लेकिन चीन की कम्युनिस्ट तानाशाही और उसकी विस्तारवादी नीतियों के चलते विश्व का उस पर विश्वास नहीं है। उसका विकल्प इस दुनिया में मात्र एक ही देश है, और वह है भारत। भारत ने कई मामलों में चीन को कड़ी टक्कर देना चालू कर दिया है। चीन, भारत की तरक्की में अब रोड़े अटका रहा है। उसने बीते कुछ वर्षों में कई बार ऐसी हरकतें की हैं, जिससे भारत की विकास यात्रा को धक्का लगे।

अब चीन ने उर्वरक पर लगाया बैरियर

इस कड़ी में सबसे ताजा मामला चीन से भारत आने वाले कृषि उत्पादों से जुड़ा हुआ है। इकॉनमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने बिना कोई आधिकारिक प्रतिबन्ध लगाए ही विशेष काम में उपयोग होने वाले उर्वरकों की आपूर्ति रोक दी है। चीन के पोर्ट पर भारत जाने के लिए कंटेनर तैयार रखे हैं, लेकिन चीनी अधिकारी उनकी जाँच कर हरी झंडी नहीं दे रहे, जिससे यह अधर में लटके हैं। फसल को बढ़ाने, कीट भगाने और उसकी विशेष जरूरतों को पूरा करने वाले यह उर्वरक भारत आना बंद हो चुके हैं।

रिपोर्ट बताती है कि चीन भारत छोड़ कर बाकी देशों को ख़ुशी-ख़ुशी यह उर्वरक भेज रहा है। यहाँ ना कोई जाँच में दिक्कत है और ना ही पोर्ट पर इससे सम्बन्धित कंटनेर रोके जा रहे हैं। भारत इस उत्पाद का हर साल जून-दिसम्बर के बीच लगभग 1.5 लाख टन आयात चीन से करता है। चीन बीते कुछ वर्षों से यह आयात भारत को करने में आनाकानी कर रहा था लेकिन इस बार उसने पूरी तरह से ब्रेक लगा दिया है।

भारत इन विशेष तरह के उर्वरकों के लिए 80% चीन पर ही निर्भर है। इकॉनोमिक टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि जिन उर्वरकों के निर्यात पर चीन ने कैंची चलाई है, वह सामान्यतः नैनो तरह के हैं और पानी में घोले जाते हैं। भारत जहाँ यूरिया, DAP और फॉस्फेट जैसे उत्पादों में काफी हद तक आत्मनिर्भर है, वहीं ऐसे विशेष तरह के उर्वरकों के लिए वह चीन समेत कई अन्य देशों पर निर्भर है। भारत को प्रति वर्ष लगभग 3.5

यदि चीन इन उर्वरकों की सही समय पर आपूर्ति नहीं करता, तो भारत में कई फसलें प्रभवित हो सकती हैं। रिपोर्ट बताती है कि चीन का विकल्प बाजार में मौजूद है। भारत जॉर्डन या किसी अन्य यूरोपियन देश से यह उर्वरक खरीद सकता है। लेकिन समस्या यह है कि ये देश इतनी बड़ी मात्रा, इतने कम समय में आपूर्ति कर नहीं पाएँगे। भारत को आने वाले सामानों पर चीन कोई पहली बार ऐसी बदमाशी नहीं कर रहा। इससे पहले भारत की आर्थिक तरक्की को ब्रेक लगाने के लिए कई बार ऐसे ही प्रयास कर चुका है।

TBM भी रोकीं

भारत में लगातार बन रहा इन्फ्रा भी चीन को बर्दाश्त नहीं हो रहा है। वह इसके निर्माण में जिस तरह से अड़ंगा लगा सकता है, लगा रहा है। चीन ने अहमदाबाद-मुम्बई बुलेट रेल प्रोजेक्ट में उपयोग होने वाली 3 टनल बोरिंग मशीन (TBM) का भारत को आयात रोक दिया है। टनल बोरिंग मशीन, जमीन के नीचे सुरंग बनाने के लिए काम में लाई जाती हैं। यह जमीन के नीचे एक दिशा में गड्ढा खोदती जाती हैं, यह वर्तमान में जमीन के नीचे सुरंग बनाने के लिए सबसे तेज तरीका है।

TBM मशीन (प्रतीकात्मक चित्र, साभार: Terratec)

रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन ने वर्तमान में भारत को आने वाली 3 ऐसी TBM रोक रखी हैं। यह तीनों मशीनें जर्मनी की एक कम्पनी ने बनाई हैं। यह कम्पनी इन्हें चीन के गुआंगझाऊ में बनाती है। इनकी आवश्यकता मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स बनाने में है। यह कॉरिडोर 21 किलोमीटर लम्बा है। इनके चक्कर में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में देरी हो रही है। तीन में से 2 TBM भारत अक्टूबर, 2024 में ही आ जानी थीं। लेकिन अभी तक यह चीन के पोर्ट पर फंसी हैं।

इस मामले को वाणिज्य मंत्रालय के साथ ही विदेश मंत्रालय के पास पहुँचाया गया है। वह इस पर काम कर रहे हैं। TBM का मुद्दा कोई नया नहीं है। इसको लेकर केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल जर्मनी के मंत्री को सावर्जनिक तौर पर लताड़ चुके हैं। इसमें उन्होंने जर्मन कम्पनी की बनाई TBM के चीन के पोर्ट पर रोके जाने की बात दोहराई थी इसका वीडियो भी वायरल हुआ था। इन TBM के आने के बाद ही भारत में काम तेजी पकड़ पाएगा। भारत में इन्फ्रा निर्माण में अड़ंगा लगाने का यह दांव चीन अब जानबूझ कर खेल रहा है।

रेयर अर्थ मिनरल पर भी ताला

चीन के पास पृथ्वी के दुर्लभ चुंबकीय तत्वों (रेयर अर्थ मैग्नेट्स) का भंडार है। अमेरिका के साथ टैरिफ वार के बाद चीन ने इन दुर्लभ तत्वों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसका बड़ा नुकसान भारत को हुआ। भारत में स्थापित ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर और अन्य उपकरण निर्माण से जुड़े उद्योगों को इस प्रतिबंध के चलते आपूर्ति बाधित हो गई थी। अप्रैल 2025 में चीन ने 7 मध्यम से भारी दुर्लभ तत्वों पर सुरक्षा और प्रसार संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था।

इसके बाद चीन ने निर्यातकों को लाइसेंस लेने की जरूरत बता दी। दुर्लभ मैग्नेट इलेक्ट्रिक और पेट्रोल गाड़ियों, रक्षा उपकरणों और में एक अहम भूमिका निभाते हैं। इनका उपयोग मोटर और स्टीयरिंग सिस्टम, ब्रेक, वाइपर और ऑडियो डिवाइसेज के निर्माण में किया जाता है। कई भारतीय कम्पनियों को निर्माण पर ब्रेक के बारे में भी चीन के इस कदम के चलते सोचना पड़ा था। मारुति सुजुकी की आने वाली गाड़ी E-विटारा का उत्पादन तक इसके चलते प्रभावित हो गया।

भारत की अर्थव्यवस्था में 7.1% हिस्सा ऑटोमोबाइल सेक्टर का है। यह देश में रोजगार का एक बड़ा स्रोत है। ऐसे में चीन यह सप्लाई बाधित कर भारत की जीडीपी वृद्धि दर को भी प्रभावित कर रहा है। हालाँकि, उसकी यह हरकतें ज्यादा दिन नहीं चलती। लेकिन हर बार बार वह किसी ना किसी तरीके से यह प्रयास करता है कि भारत के आर्थिक इंजन पर ब्रेक लगा दे। यह भी उसी कड़ी में उठाया एक कदम है।

स्मार्टफोन निर्माण में भी लगा रहा ब्रेक

भारत बीते कुछ वर्षों में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन निर्माता बन कर उभरा है। इस मामले में उसने सीधे चीन को चुनौती दी है। एप्पल के लिए फोन बनाने वाली फॉक्सकॉन समेत तमाम कम्पनियाँ लगातार भारत में निवेश कर रही हैं। भारत स्मार्टफोन निर्माण के मामले में चीन के विकल्प के तौर पर उभरा है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2025 खत्म होते-होते भारत विश्व के 20% फोन बना रहा होगा। इस मेक इन इंडिया से चीन को करारा झटका लगा है।

अपने हाथ से बिजनेस छिनता देख चीन ने भारत के मेक इन इंडिया में टाँग अड़ाने का प्रयास किया है। जनवरी में आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि चीन ने उन विशेषज्ञ इंजीनियरों के भारत आने पर रोक लगाई है, जो यहाँ स्मार्टफोन निर्माण को लेकर काम करने वाले थे। वह फॉक्सकॉन के चीनी स्टाफ को भारत आने देने में कई बैरियर लगा रही हैं। यहाँ तक कि इन स्टाफ को टिकट करवा लेने के बाद भी अपनी यात्रा रद्द करने को कहा गया।

कुछ रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि चीन स्मार्टफोन बनाने के लिए आवश्यक कई पार्ट्स की सप्लाई भी रोक रहा है। वह इससे भारत की मेक इन इंडिया की यात्रा को प्रभावित करना चाहता है। चीन की यह हरकतें इस बात का प्रमाण हैं कि वह भारत के लिए वर्तमान में कितनी भी मीठी बातें बोल रहा हो, वह असल में हमारी आर्थिक वृद्धि नहीं देख पा रहा। वह जानता है कि भारत ही उसके जितनी निर्माण क्षमता बना सकता है। इसलिए चाहे TBM हों या स्मार्टफोन के पुर्जे, वह सबकी सप्लाई में पेंच फँसाता है।

खुद को ड्रैगन और भारत को हाथी बताने वाला चीन वैसे तो दोनों के साथ ‘डांस’ यानी दोनों देशों के सहयोग की बात करता है, लेकिन जब असल सहयोग की बात आती है तो उसे समस्या हो जाती है और वह चतुराई से हाथी को धोखा देने लगता है।

‘कोई अनपढ़ होगा जो मैन्युफैक्चरिंग में जाति की बात करेगा’: राहुल गाँधी के प्रोपेगेंडा को नेहरू प्लेस के दुकानदार ने किया तार-तार, Opindia से बताया- कॉन्ग्रेस के राज में तो असेम्बलिंग तक नहीं होती थी

राहुल गाँधी वर्तमान में एक मिशन पर हैं। यह मिशन है हर उस चीज में कमी निकालना, जो भारत की उपलब्धियाँ हैं। इसी कड़ी में 21 जून, 2025 को राहुल गाँधी ने ट्विटर पर एक वीडियो जारी किया। लगभग 8 मिनट के इस वीडियो का शीर्षक रखा गया, ‘सब माल चाइनीज है।’

राहुल गाँधी ने यह वीडियो देश के सबसे बड़े इलेक्ट्रॉनिक मार्केट ‘नेहरू प्लेस’ में बनाई। राहुल गाँधी नीली टीशर्ट में यहाँ पहुँचते हैं, एक लैपटॉप-मोबाइल की रिपेयरिंग की दुकान को चुनते हैं। यहीं से यह वीडियो बनाई गई है। वीडियो में वह एक मुस्लिम और एक हिन्दू कारीगर को अपने दाएँ-बाएँ बैठाते हैं।

राहुल गाँधी इसके बाद पूछते हैं कि उनके यहाँ उपयोग होने वाला माल कहाँ बना होता है। इसके बाद वह अपना पहले से निर्धारित प्रोपेगेंडा चालू करते हैं। राहुल गाँधी दावा करते हैं कि भारत में वर्तमान में कोई मैन्युफैक्चरिंग नहीं होती और सब कुछ चीन से आता है। भारत में होने वाली मैन्यूफैक्चरिंग को वह ‘असेम्बली’ बताते हैं।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी इसके बाद राहुल ‘मेड इन इंडिया’ और ‘असेम्बलड इन इंडिया’ में फर्क समझाने का प्रयास करते हैं। राहुल गाँधी अपने प्रोपेगेंडा के तहत बताते हैं कि भारत अगर मैन्युफैक्चरिंग में पिछड़ा है तो इसकी जड़ में जाति है। वह इसी से अपने वीडियो का अंत करते हैं।

राहुल गाँधी की पूरे वीडियो के दौरान कोशिश होती है कि केंद्र की मोदी सरकार की ‘मेड इन इंडिया स्कीम’ की साख पर बट्टा लगाएँ। राहुल गाँधी पूरे विडियो के दौरान यह बताने की कोशिश करते हैं कि कैसे चीन ने भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मार्केट पर कब्जा कर लिया है।

यह बात जगजाहिर है कि भारत में वर्तमान में तेजी से स्मार्टफोन और बाकी इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्माण बढ़ रहा है। यह यहाँ तक बढ़ा है कि भारत वर्तमान में दूसरे नम्बर का स्मार्टफोन निर्माता है। 2024-25 में भारत का सबसे बड़ा निर्यात स्मार्टफोन ही थे। हालाँकि, यह सब जानने के बावजूद हमारे मन में कुछ प्रश्न उठे।

इन प्रश्नों का जवाब लेने के लिए हम नेहरू प्लेस पहुँचे। नेहरू प्लेस पहुँच कर सबसे पहले हमने बात की रेहड़ी-पटरी पर इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वालों से। हमारा उनसे प्रश्न था कि क्या नेहरू प्लेस या भारतीय बाजार में केवल चीनी इलेक्ट्रॉनिक सामान ही मिलता है।

इसका जवाब था, नहीं! अधिकतर दुकानदारों ने बताया कि अब ग्राहक चीन का नाम सुनकर प्रॉडक्ट को रिजेक्ट कर देते हैं। उन्होंने बताया, “हमारी दुकानों पर अब 80% माल मेड इन इंडिया ही है।” कैमरा बंद होते ही दुकानदारों ने यह भी कहा कि देश के इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर में पीछे रहने की वजह कॉन्ग्रेस के नेताओं का भ्रष्टाचार ही है।

नेहरू प्लेस के अधिकतर दुकानदार राहुल गाँधी के सब माल चाइनीज है वाले दावे को खोखला बताते हैं। उनका कहना था कि मनमोहन सिंह के समय में अधिकतर प्रोडक्ट मेड इन चाइना होते थे लेकिन 2014-15 के बाद मार्केट बदला है। उन्होंने बताया कि अधिकतर इलेक्ट्रॉनिक सामान अब भारत में ही बने हुए हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि ग्राहक भी भारत में ही बना हुआ सामान पसंद करते हैं। उनका कहना था कि चीनी सामान पर कोई गारंटी नहीं होती, इसलिए भी भारतीय ग्राहक उससे बचते हैं। दुकानदारों का कहना था कि भारतीय सामानों पर एक साल तक की गारंटी मिल रही है।

दुकानदारों के मेड इन इंडिया वाले दावों का समर्थन आँकड़े भी करते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, 2014 में देश में 2 मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट थीं जबकि आज 300 से अधिक यूनिट काम कर रही हैं। मोबाइल फोन एक्सपोर्ट में भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्लेयर बन चुका है।

भारत ने 2024-25 में ₹2 लाख करोड़ से अधिक स्मार्टफोन निर्यात किए हैं। इस निर्माण गतिविधि को असेम्बलिंग बताने वाले राहुल गाँधी को यह भी जानना चाहिए कि भारत में बनने वाले स्मार्टफोन में अब 25% तक पार्ट भारतीय ही उपयोग हो रहे हैं।

राहुल गाँधी को यह पता होना चाहिए कि दशकों से इस काम जुटा हुआ चीन भी अभी तक 35%-40% के स्तर पर पहुँच पाया है। भारत ने 20% की उपलब्धि 5 ही वर्षों में हासिल कर ली है। सिर्फ स्मार्टफोन ही नहीं, सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में भी 1.52 लाख करोड़ के इन्वेस्टमेंट के साथ 5 नए प्रोजेक्ट लॉन्च हुए हैं।

2026 तक भारत का इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्शन 300 बिलियन डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है। बाजार पर भी इसका सीधा असर नजर आता है। दुकानदार कहते हैं कि अब भारत में किसी भी कंपनी को व्यापार करना है तो अपनी फैक्ट्री यहाँ लगानी ही होगी, सैमसंग जैसी कम्पनियाँ भारत में अपनी बड़ी यूनिट्स लगा रही हैं।

राहुल गाँधी के चीन वाले प्रोपेगेंडा का सच जानने के बाद हम उस दुकान पर गए, जहाँ से राहुल गाँधी ने यह वीडियो शूट किया था। हमने उसी मैकेनिक शिवम से बात की, जिससे राहुल गाँधी ने बात की थी। हमने पूछा कि क्या वो राहुल गाँधी की काम में जाति देखने के तर्क से सहमत है? शिवम का जवाब चौंकाने वाला था।

शिवम ने कहा, “जाति की बात करने वाला व्यक्ति कोई अनपढ़ ही होगा। काम में जाति देखने के बजाए योग्यता देखना चाहिए। उसने कहा कि मेरा पूरा नाम शिवम माहेश्वरी है और मैं बनिया जाति से आता हूँ। हमारी दुकान वाल्मीकि समाज से लेकर तमाम जातीय और सामाजिक वर्गों से आने वाले लोग काम करते हैं।”

शिवम ने आगे बताया, “हम हमेशा योग्यता को ही प्राथमिकता देते हैं। साथ ही असेम्बलड इन इंडिया वाली बात को काटते हुए कहा कि 2014-15 से पहले तो हम असेम्बल भी नहीं करते थे, अब असेम्बल तो कर रहे हैं कम से कम।”

उस दुकान में शिवम के सहयोगी ने बताया कि जब कोई जाति नहीं होगी तभी हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाएगा। अन्य दुकानदार भी बताते हैं कि 2014 के बाद चीनी प्रोडक्टस मार्केट में कम हुए हैं। लोगों का विश्वास भी मेड इन इंडिया पर ज्यादा है।

शिवम और अन्य दुकानदारों की बातें सीधे तौर पर यह साबित करती हैं कि राहुल गाँधी ने अपने राजनैतिक लाभ के लिए उनका इस्तेमाल किया था। संभव है कि, राहुल गाँधी की सोशल मीडिया टीम ने अपने नैरेटिव के हिसाब से क्लिप्स को काटकर प्रचारित किया हो। लेकिन Opindia की ग्राउंड रिपोर्ट में सारा सच निकलकर सामने आ गया।

हिंदू राजाओं ने जिस ‘सत्र भूमि’ को धार्मिक प्रचार के लिए दिया दान… वहाँ कभी मिलता है गोमांस, कभी सुनाई पड़ती है अजान: अब असम में इन जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराएगी हिमंता सरकार, जानें पूरा मामला

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने असम में सत्र भूमि को अतिक्रमण से मुक्ति दिलाने की बड़ी पहल की है। पूर्वोत्तर राज्य असम में कई वैष्णव मठ हैं जिन्हें सत्र कहा जाता है। इनकी स्थापना असमिया संत श्रीमंत शंकरदेव और उनके शिष्यों माधवदेव, हरिदेव और दामोदरदेव ने 15वीं और 16वीं शताब्दी में की थी।

सत्र एक आध्यात्मिक संस्था है और राज्य में पारंपरिक साहित्य, संगीत और अन्य सांस्कृतिक का केंद्र रहा है। आम तौर पर सत्र भूमि में एक बड़ा प्रार्थना कक्ष, स्नान कक्ष, शयनगृह और अतिथि गृह होते हैं।

असम के सत्र ( फाइल फोटो, साभार- पर्यटन विभाग, असम सरकार )

राज्यभर में करीब 900 सुत्रा है जो चारों ओर फैले हुए हैं। ये लोग सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े हुए हैं। इनमें औनियाती, कमलाबारी, दखिनपत, गरमुर, बेंगनाती, समागुरी और नतुन कमलाबारी शामिल हैं।

सैकड़ों वर्षों से राजाओं और स्थानीय हिंदुओं ने सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक प्रचार के लिए सत्रों को भूमि दान में देते आ रहे हैं। इन जमीनों को ‘सत्र भूमि’ के रूप में जाना जाता है। इसका उल्लेख आधिकारिक भूमि अभिलेखों में भी है।

इस सत्र भूमि का इस्तेमाल भिक्षुओं की मदद और धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यों में होता था। असमिया पहचान को बनाए रखने में सत्र आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सत्र भूमि पर कब्जा

पूरे असम में सत्र भूमि के बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा हो चुका है। सत्र भूमि की समस्याओं की समीक्षा और मूल्यांकन के लिए बने आयोग ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि असम के 11 जिलों में 303 सत्रों की 15,288.52 बीघा (1,898 हेक्टेयर से अधिक) भूमि पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया है।

सीएम हेमंता बिस्वा सरमा ने कहा है कि बोंगाईगांव, माजुली, डिब्रूगढ़, नागांव, बाजाली, कामरूप, लखीमपुर और धुबरी जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण किया गया है। राजधानी दिसपुर के आकार से दोगुने क्षेत्रों पर अतिक्रमण कर लिया गया है।

सरमा ने ट्वीट किया, “हमारी राजधानी दिसपुर से दोगुना बड़ा क्षेत्र! हां, असम में सत्र भूमि पर अतिक्रमण का यह परिणाम है। सत्रों पर अतिक्रमण का विशाल पैमाना असम की संस्कृति और पहचान पर सीधा हमला है।”

जनसांख्यिकीय परिवर्तन, भू-माफिया की संलिप्तता और राजनीतिक संरक्षण जैसे कारकों ने इस खतरे को बढ़ाने में योगदान दिया है। उन्होंने अवैध अतिक्रमण से सख्ती से निपटने का प्रण लिया है।

असम सरकार ले रही है भूमि वापस

हाल के वर्षों में, असम में हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने सत्र भूमि को अवैध कब्जे से मुक्ति दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।
नवंबर 2021 में इसको लेकर एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। इसे ‘असम में सत्र भूमि की समस्याओं की समीक्षा और आकलन के लिए आयोग (CRAPSLA) कहा जाता है। आयोग में असम के तीन विधायक प्रदीप हजारिका, रूपक सरमा और मृणाल सैकिया शामिल थे।

एक साल बाद दिसंबर 2022 में, CRAPSLA ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट हिमंत बिस्वा सरमा को सौंपी। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने असम के 62 सत्रों का दौरा किया और अवैध अतिक्रमणों की जाँच की। आयोग का कार्यकाल आगे बढ़ाया गया ताकि अधिक प्रभावित सत्रों का दौरा किया जा सके।

9 जून 2023 को CRAPSLA ने अपनी अंतिम रिपोर्ट हेमंत बिस्वा सरमा को सौंपी। आयोग ने 126 सत्रों का दौरा किया, अपना विस्तृत मूल्यांकन दिया और नीतिगत कार्रवाई के लिए सिफारिशें की।

असम के मुख्यमंत्री ने कहा, “यह रिपोर्ट सत्र भूमि पर कब्जे की पूरी जानकारी देती है। सरकार निष्कर्षों की गहन जाँच करेगी और सिफारिशों पर कार्रवाई करेगी।” उन्होंने एक वर्ष के भीतर एक स्थायी सत्र आयोग के गठन की भी घोषणा की। आयोग के पास प्रशासनिक स्वायत्तता, न्यायिक अधिकार और राज्य में सत्रों की आर्थिक मदद के लिए वित्तीय अनुदान होगा।


सीएम सरमा ने कहा, “आयोग को संस्थागत बनाने के लिए सितंबर या फरवरी के विधान सत्र में एक कानून पेश किया जाएगा। यह सत्र संस्थानों की सुरक्षा और आधुनिकीकरण के लिए 25 साल का विजन तैयार करेगा।”

अतिक्रमण करने वालों पर होगा एक्शन

दिसंबर 2022 में CRAPSLA की अंतरिम रिपोर्ट प्रकाशित होने के तुरंत बाद असम सरकार एक्शन में दिखी। सरकार ने नागाँव जिले में श्रीमंत शंकरदेव के जन्मस्थान के पास 1000 बीघा भूमि को अतिक्रमण से मुक्त करवाया।

असम सरकार ने फरवरी 2023 में गोपाल अता सत्र के पास 55 बीघा कब्जे वाली जमीन वापस ली। जुलाई 2024 में इसी तरह के अतिक्रमण हटाओ अभियान से सत्र को 34 बीघा भूमि वापस मिली।

अगस्त 2024 में हिमंता सरकार ने 250 साल से ज्यादा पुराने हेरिटेज संस्थानों के 5 किलोमीटर के दायरे में बाहरी लोगों को जमीन खरीदने पर रोक लगा दिया। इसके लिए ‘असम भूमि और राजस्व विनियमन (दूसरा संशोधन) विधेयक’ पारित किया। इसके अलावा सत्र को आर्थिक सहायता देने की भी घोषणा की।

असम सरकार ने अक्टूबर 2024 में सत्रों को भूमि दिए जाने और कानूनी रूप से कोई दिक्कत न हो, इसके लिए ‘मिशन बसुंधरा 3.0’ के तहत कई उपाय किए।

हेमंता विस्वा सरमा ने इस ओर इशारा किया कि मस्जिदों का निर्माण सत्र की जमीन पर हो रहा है साथ ही सत्र संस्कृति को नुकसान पहुँचाने के लिए बीफ खाया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “जब सत्र के पास गाय का मांस खाया जाता है और मस्जिद से अज़ान की आवाज सत्र के कार्यक्रमों को बाधित करती है।” उन्होंने कहा कि ऐसी गतिविधियाँ सत्रों से 10 किलोमीटर दूर की जा सकती हैं।

भाजपा 2016 की शुरुआत में ही सत्र की भूमि पर अतिक्रमण का मुद्दा उठाती रही है, जबकि कॉन्ग्रेस शासन ने इसे ‘सरकार की साजिश’ करार दिया है।

पिछले 9 वर्षों में, भाजपा सरकार (अब एक मिशन मोड में) सत्रों को उसकी भूमि वापस दिलाने के काम में लगी हुई है।

ट्रंप बोले- खत्म हुआ युद्ध, ईरान नहीं करेगा परमाणु कार्यक्रम पर काम: शिया मुल्क ने नकारा, खामेनेई ने कहा- पीछे नहीं हटेंगे

अमेरिकी के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार (25 जून 2025) को नीदरलैंड में नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष के खत्म होने की बात कही। हालाँकि साथ में ही ये कहना नहीं भूले कि अगर फिर से युद्ध जैसी स्थिति बनती है तो अमेरिका इस जंग का हिस्सा एक बार फिर से बनेगा।

नाटो की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने ईरान के साथ बातचीत कर समझौते पर हस्ताक्षर करने की बात कही। हालाँकि ट्रंप का ये भी मानना है कि ये जरूरी नहीं है। बातचीत को लेकर ईरान की ओर से कोई टिप्पणी सामने नहीं आई है।

उन्होंने कहा, “हम अगले सप्ताह ईरान के साथ बातचीत करने जा रहे हैं, हम एक समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। पर मुझे नहीं लगता कि यह आवश्यक है।” इस दौरान ट्रंप ने इस बात पर अधिक जोर दिया कि अमेरिका के हमलों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम तबाह हो गया है।

ट्रंप ने ईरान के परमाणु सुविधाओं पर अमेरिकी हमलों की तुलना जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर हुए हमले से की है। अपने बयान में ट्रंप ने कहा, “अगर आप हिरोशिमा या नागासाकी को याद कर पाएँ तो की आपको पता लगेगा कि इससे भी युद्ध खत्म होता है।” ट्रंप ने आगे कहा कि इससे युद्ध का अंत एक अलग तरीके से हुआ पर यह बहुत भयानक और विनाशकारी था।

इस दौरान ट्रंप ने अपने उसे दावे पर सफाई भी पेश की जिसमें उन्होंने यह कहा था कि बंकर- बस्टिंग बमों के जरिए अमेरिका ने ईरान के अंडरग्राउंड बने दो न्यूक्लियर फैसिलिटी को ध्वस्त किया था।

अमेरिकी क्लासिफाइड इंटेलिजेंस रिपोर्ट की मानें तो ईरान पर हुए अमेरिकी हमले से ईरान का परमाणु प्रोग्राम काफी पीछे खिसक गया है। ईरान के विदेश मंत्रालय की ओर से भी इस बात की पुष्टि की गई है कि इन हमलों से परमाणु ठिकानों को काफी नुकसान पहुँचा है।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने बुधवार को इसकी जानकारी दी है। नाटो शिखर सम्मेलन में ही ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान परमाणु कार्यक्रम को आगे नहीं बढ़ाएगा। लेकिन ईरान ने यह साफ तौर पर कहा है कि अपने परमाणु कार्यक्रम से गए पीछे नहीं हटेंगे।

ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच 22 जून 2025 को अमेरिकी सेना ने ईरान के नतांज, इस्फहान और फोर्डो के तीन परमाणु ठिकानों पर बमों से हमला किया था। जवाबी हमले में ईरान ने कतर, सीरिया और इराक में बने अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हमला किया था। इसके बाद ट्रंप ने ईरान-इजरायल के बीच सीजफायर का एलान कर दिया था।

CIA ने बताया- अमेरिकी हमले से ईरान का परमाणु कार्यक्रम बुरी तरह ध्वस्त: अमेरिका ने किया था 14 बड़े बमों से शिया मुल्क पर हमला, ‘ठोस सबूत’ दिखाएँगे ट्रंप

अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA के डायरेक्टर जॉन रैटक्लिफ ने बुधवार (25 जून 2025) को बताया कि अमेरिका ने हाल ही में ईरान पर जो हवाई हमले किए थे, उनसे ईरान के परमाणु ठिकानों को बहुत तगड़ा नुकसान हुआ है। ये नुकसान ऐसा है कि इसका असर लंबे समय तक दिखेगा।

पहले कुछ खबरों में कहा गया था कि इन हमलों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ा, लेकिन CIA ने इस बात से साफ इनकार कर दिया है। रैटक्लिफ का कहना है कि उनके पास पक्की खबर है कि ‘ईरान की कई अहम परमाणु सुविधाएँ पूरी तरह से बर्बाद हो गई हैं और उन्हें फिर से बनाने में कई साल लग जाएँगे।’

खुफिया एजेंसी का पक्का दावा

CIA के डायरेक्टर जॉन रैटक्लिफ ने बताया, “हमारी टीम के पास पक्की जानकारी है कि हाल ही में जो हमले हुए, उनसे ईरान का परमाणु कार्यक्रम बुरी तरह से बर्बाद हो गया है।”

डायरेक्टर ने आगे कहा, “हमें जानकारी मिली है कि ईरान की कई खास परमाणु जगहें पूरी तरह खत्म हो गई हैं और उन्हें दोबारा बनाने में कई साल लग जाएँगे।”

‘पुख्ता सबूत’ देने का वादा

ट्रंप ने कहा अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ गुरुवार (26 जून 2025) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पक्के सबूत दिखाएँगे। ऐसा करने से अमेरिकी सेना जवानों का हौसला बढ़ेगा, जिन्होंने इन हमलों में हिस्सा लिया था। ट्रंप ने अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) की खुफिया रिपोर्टों को फेक न्यूज बताया था।

नाटो की बैठक में ट्रंप ने कहा कि इज़रायल और दूसरे देश भी उनकी बात का समर्थन कर रहे। ईरान के विदेश मंत्रालय ने भी माना कि उन्हें ‘बहुत नुकसान’ हुआ है, लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि सब कुछ तबाह हो गया है।

हमलों का असर

अमेरिकी सेना ने बताया कि उन्होंने ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर 14 बहुत बड़े बम गिराए। इन बमों को ‘बंकर-बस्टर’ कहते हैं, और इनमें से हर एक का वजन 13,600 किलो से भी ज़्यादा था।

फोर्डो संवर्धन सुविधा भी उन जगहों में शामिल था जहाँ हमला हुआ था। यह जगह एक पहाड़ के अंदर बहुत गहराई में बनी थी और यहाँ परमाणु बम बनाने वाली खास मशीनें (सेंट्रीफ्यूज) रखी हुई थीं।

अमेरिका के व्हाइट हाउस और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के ऑफिस ने मिलकर बताया कि इन बमों से ‘संवर्धन सुविधा अब काम के लायक नहीं रही।’ इजरायल की परमाणु ऊर्जा कमीशन ने भी कहा कि अमेरिका और इजरायल के इस हमले ने ‘ईरान की परमाणु हथियार बनाने की ताकत को कई साल पीछे धकेल दिया है।’

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाएई ने भी माना कि “हमारी परमाणु सुविधाओं को बहुत नुकसान हुआ है, यह तो पक्का है।”

यीशु दरबार में झाँसा देकर धर्मांतरण का काम, अब तक 500 हिंदुओं को बनाया जा चुका है ईसाई: पुलिस ने पादरी को रंगे हाथों दबोचा, प्रयागराज का मामला

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में 5 साल से यीशु दरबार चलाया जा रहा था। टेंट के नीचे बेसहारा लोगों का लालच देकर बुलाया जाता था। दरबार की आड़ में हिंदुओ का धर्म परिवर्तन करने का धंधा किया जा रहा था। नौकरी के नाम नौजवानों को ईसाई धर्म अपनाने को कहा गया। महिलाओं को संतान प्राप्ति के झाँसे में फँसाया गया। दरबार से आसपास के 50 से ज्यादा गाँव के 500 से अधिक हिंदुओ का धर्म परिवर्तन कराया गया।

बजरंग दल की मदद से पुलिस ने रविवार (22 जून 2025) को यीशु दरबार पर छापा मारा। यह दरबार हर रविवार लगाया जाता था। पुलिस के पहुँचते ही दरबार के पंडाल में हाहाकार मच गया। लोग इधर-उधर भागने लग गए। आयोजनकर्ता ने तो पुलिस को पैसा खिलाकर मामला दबाने की भी कोशिश की। मौके से पुलिस ने पादरी अनिल कुमार और उनके सहयोगी कृष्ण कुमार और संजय को दबोच कर थाने ले गए।

पुलिस ने बताया कि बहरिया थाना क्षेत्र के नेवादा गाँव में पिछले 5 साल से यीशु दरबार लगाया जा रहा था। ग्राम प्रधान विश्व हिंदू परिषद और बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने दरबार में धर्म परिवर्तन कराने की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद थानाध्यक्ष बहरिया महेश मिश्रा ने पुलिसबल के साथ यीशु दरबार पहुँचे। यहाँ धर्म परिवर्तन कराने वाले ईसाई लोगों को रंगे हाथों पकड़ा। इसके अलावा 18 लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई है।

पुलिस के अनुसार, मऊआइमा थाना क्षेत्र निवासी विभूति नारायण ने मामले में तहरीर दी थी। इस आधार पर पादरी अनिल कुमार और उसके सहयोगी को गिरफ्तार कर सोमवार (23 जून 2025) को जेल भेज दिया गया है। पुलिस पूछताछ में यह भी सामने आया कि गाँव की ऊषा देवी, राजेश कुमार, विवेक कुमार और बाकी लोग रोजगार दिलाने, बीमारी ठीक करने और पैसे का लालच देकर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया था।

इसके अलावा यह भी आरोप है कि यीशु दरबार गाँव की जमीन पर बिना किसी अनुमति के चलाया जा रहा था। ग्राम प्रधान शिव कली देवी ने जमीन से पंडाल को हटाने की माँग की है। इस पर थानाध्यक्ष महेश मिश्रा और राजस्व निरीक्षक दिनेश चंद्र पांडेय ने मौके से टेंट पंडाल हटवाने की भी कार्रवाई का आश्वासन दिया।

PFI के ‘रिपोर्टर विंग’ ने बनाई थी 977 लोगों की हिट लिस्ट, रिटायर्ड जज के साथ अधिकांश हिंदुओं के नाम: NIA ने कोर्ट में पेश किए सबूत, कॉन्ग्रेस-लेफ्ट देते रहे हैं राजनीतिक समर्थन

केरल की एक स्पेशल कोर्ट में सुनवाई के दौरान NIA ने बड़ा खुलासा किया है। एजेंसी ने बताया कि बैन हो चुके इस्लामी संगठन PFI यानी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया ने करीब 977 लोगों की हिट लिस्ट तैयार की थी। इन लोगों को संगठन ने अपना दुश्मन माना था और मौका मिलते ही मारने की योजना बनाई थी। हिट लिस्ट में एक रिटायर्ड जिला जज का नाम भी शामिल है।

यह जानकारी NIA ने चार आरोपितों की ज़मानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दी। ये चारों आरोपित मुहम्मद बिलाल, रियासुद्दीन, अंसार के पी और सहीर के वी केरल के पालक्कड़ जिले से हैं। एजेंसी ने बताया कि ये लोग हिंसा फैलाने, हत्या की साजिश रचने और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहे हैं।

कहाँ से मिली इतनी बड़ी हिट लिस्ट?

NIA ने कोर्ट में बताया कि उन्होंने केरल में कई जगहों पर छापेमारी की। खासकर पेरियार वैली कैंपस, अलुवा में की गई रेड के दौरान उन्हें सबसे अहम सबूत मिले। यह जगह हथियारों की ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल की जा रही थी।

इसमें से PFI के कार्यकर्ता सिराजुद्दीन के पास से 240 नामों वाली एक लिस्ट मिली, जिसमें सभी गैर-मुस्लिम समुदाय के लोग (अधिकाँश हिंदू) थे। एक फरार PFI कार्यकर्ता अब्दुल वहाब के बटुए से 5 लोगों के नाम और उनकी जानकारी थी। उसमें भी एक रिटायर्ड जिला जज का नाम शामिल है। इसके अलावा एक अन्य आरोपित जो अब सरकारी गवाह बन गया है, उसके पास से 232 लोगों की एक अलग लिस्ट मिली। वहीं अयूब टी ए नाम के शख्स के घर से 500 नामों की एक और लिस्ट मिली।

NIA ने कहा कि ये सभी लिस्ट्स मिलाकर यह साफ होता है कि PFI एक सुनियोजित रणनीति के तहत देशभर में अपने दुश्मनों को मारने की योजना बना रहा था।

कैसे काम करता था PFI का आतंक नेटवर्क?

NIA ने कोर्ट में बताया कि PFI का नेटवर्क बहुत गहराई से फैला हुआ था। इस संगठन के पास अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग टीमें थीं-

  1. रिपोर्टर विंग : यह टीम टारगेट बनने वाले लोगों की रेकी करती थी, उनके घर, ऑफिस, दिनचर्या और तस्वीरें जुटाती थी।
  2. सर्विस विंग: ये लोग हत्या को अंजाम देते थे।
  3. फिजिकल और आर्म्स ट्रेनिंग विंग: ये विंग नए लड़कों को ट्रेनिंग देती थी कि कैसे हथियार चलाने हैं और फिजिकल फिटनेस कैसे बनाए रखना है।

PFI के पास एक पूरी रणनीति थी- पहले रेकी, फिर ट्रेनिंग और आखिर में हत्या।

PFI का ‘India 2047’ प्लान और श्रीनिवासन की हत्या

NIA ने कोर्ट को बताया कि PFI का लक्ष्य केवल विरोधियों की हत्या करना नहीं था, बल्कि उनका एक लंबा प्लान था जिसे उन्होंने नाम दिया था ‘India 2047’। इस योजना का मकसद था – भारत में इस्लामी शासन की स्थापना करना।

यह बात तब सामने आई थी जब बिहार के फुलवारी शरीफ में 2022 में हुई छापेमारी में मुहम्मद जमालुद्दीन नाम के आरोपित के पास से 6 पेज का दस्तावेज मिला था, जिसमें इस योजना की पूरी जानकारी थी।

NIA ने ये भी बताया कि पालक्कड़ में RSS नेता श्रीनिवासन की हत्या कोई इत्तेफाक नहीं थी। बल्कि यह भी इसी ‘India 2047’ प्लान का हिस्सा थी। PFI के कैडरों के पास से ऐसे ऑडियो क्लिप और गवाहों के बयान मिले हैं जो यह साबित करते हैं कि संगठन के भीतर यह योजना कई स्तरों पर फैलाई जा चुकी थी।

कोर्ट ने क्यों खारिज की जमानत?

स्पेशल कोर्ट के जज पी के मोहनदास ने आरोपियों की ज़मानत याचिका को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है। आरोप Prima Facie यानी पहली नजर में ही सही लगते हैं। इसलिए UAPA की धारा 43D(5) लागू होती है, जिसके तहत गंभीर आरोपों वाले आतंकवादियों को जमानत नहीं दी जा सकती। जज ने कहा कि अब इस मामले में ट्रायल शुरू करने के लिए सबूत और गवाह पूरी तरह तैयार हैं।

PFI को लेकर कॉन्ग्रेस और लेफ्ट पर उठे सवाल

साल सितंबर 2022 में जब भारत सरकार ने PFI पर प्रतिबंध लगाया, तो लेफ्ट पार्टियों खासकर CPI(M) ने इसका खुलकर विरोध किया। उनका कहना था कि किसी संगठन को बैन करने से कुछ हासिल नहीं होता। CPI(M) ने यहाँ तक कह दिया कि जैसे कभी RSS पर भी बैन लगा था, वैसे ही PFI को बैन करना कोई बड़ी बात नहीं।

कॉन्ग्रेस ने बैन का खुला विरोध तो नहीं किया, लेकिन उसका रुख भी संदिग्ध रहा। कॉन्ग्रेस ने कहा कि अगर PFI पर बैन लगाया जा सकता है, तो RSS को भी बैन किया जाना चाहिए। यानी आतंकवाद के गंभीर आरोपों पर भी कॉन्ग्रेस की राजनीति चलती रही।

SDPI ने कॉन्ग्रेस को दिया चुनावी समर्थन

बता दें कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव में PFI की राजनीतिक शाखा SDPI ने कॉन्ग्रेस को केरल में समर्थन दिया। इसके बाद बीजेपी ने कॉन्ग्रेस को जमकर घेरा। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि एक ओर कॉन्ग्रेस आतंकवाद की बात करती है और दूसरी ओर उन्हीं के सहयोग से चुनाव लड़ती है।

कॉन्ग्रेस ने बाद में सफाई दी कि उन्हें SDPI का कोई समर्थन नहीं चाहिए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बाद में केरल के पालक्कड़ उपचुनाव में बीजेपी के राज्य अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस और SDPI के बीच गुप्त समझौता हुआ है। उन्होंने कहा कि SDPI की ‘ग्रीन आर्मी’ नाम की टीम घर-घर जाकर UDF (कॉन्ग्रेस गठबंधन) के लिए वोट माँग रही थी।

क्या यह सिर्फ आतंक की कहानी है?

ये मामला सिर्फ PFI की साजिश तक सीमित नहीं है। इसमें देश की राजनीति का एक खतरनाक चेहरा भी उजागर होता है। जब एक संगठन देश में इस्लामी शासन की साजिश रच रहा था, तब कुछ राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति के लिए उसी संगठन से सहानुभूति रखते दिखाई दिए। कॉन्ग्रेस और लेफ्ट जैसी पार्टियों ने या तो इनपर चुप्पी साधी या फिर बैन का विरोध कर अपनी मंशा साफ कर दी। सवाल ये है कि क्या आतंकवाद से लड़ाई सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी है? क्या राजनीतिक दल सिर्फ चुनाव के वक्त ही देशभक्ति दिखाएँगे?