Home Blog Page 3366

समाज सेवा के लिए गायन छोड़ना चाहती थीं लता मंगेशकर, सावरकर ने समझाया और बनीं सुर की देवी: कहानी राष्ट्रभक्ति के एक रिश्ते की

महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिंदुत्व के अग्रदूत वीर सावरकर भारतीय इतिहास के उन शख्सियतों में से हैं जिनकी छवि धूमिल करने के लगातार प्रयास हुए। दशकों तक सरकारें उनकी उपेक्षा करती रहीं और अपमानजनक व्यवहार किया। इन सरकारों में से अधिकतर कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली थी। बहुत ही सक्रिय तरीके से वीर सावरकर की छवि को धूमिल करने के प्रयास हुए ताकि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को कम किया जा सके।

लेकिन भारत रत्न लता मंगेशकर और उनका परिवार उन लोगों में से हैं, जिन्होंने कभी भी कॉन्ग्रेस और उसके वफादारों के बनाए गए सिस्टम के प्रोपेगेंडा पर भरोसा नहीं किया। उन्होंने पाया कि वीर सावरकर भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्पित देशभक्त और प्रतिभाशाली व्यक्ति थे, जो कविता और लेखन का कार्य भी करते थे।

विनायक दामोदर सावरकर या वीर सावरकर को हिंदुत्व के राजनीतिक दर्शन को स्पष्ट रूप से सामने रखने के लिए जाना जाता है। वे भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, कार्यकर्ता, राजनीतिज्ञ, वकील और लेखक थे। उनका जन्म महाराष्ट्र में नासिक जिले के पास भागलपुर गाँव में हुआ था। वे हिंदू महासभा से जुड़े थे और हिंदुत्व के पैरोकार थे। 1910 का साल था जब ब्रिटिश सरकार ने उन्हें क्रांतिकारी समूह ‘इंडिया हाउस’ से जुड़े होने के आरोप में गिरफ्तार किया। वीर सावरकर को 1911 में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह स्थित सेलुलर जेल में रखा गया था। मार्सिले से ले जाते वक्त वहाँ से भागने की उनकी असफल कोशिशों के बाद उन्हें दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। सेलुलर जेल में अपनी सजा काटते हुए वीर सावरकर ने कई विषयों पर लिखा था। उनकी लेखनी में मातृभूमि के लिए उनकी तड़प से लेकर हिंदुत्व की समझ को लेकर उनकी गहराई का पता चलता है।

वीर सावरकर और मंगेशकर परिवार के संबंध

स्वर कोकिला लता मंगेशकर और उनका परिवार वीर सावरकर के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों को लेकर हमेशा गौरवान्वित रहा है। हर साल सावरकर की जयंती और पुण्यतिथि पर (28 मई और 26 फरवरी) लता मंंगेशकर हिंदुत्व के इस विचारक को सार्वजनिक तौर पर श्रद्धांजलि देने और अंग्रेजों के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके अमूल्य योगदान को दोहराने से कभी नहीं कतराती हैं।

इसी क्रम में इस साल भी लता मंगेशकर ने सोशल मीडिया के जरिए महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को याद किया था। उन्होंने अपने फॉलोवर्स के साथ वीर सावरकर के साथ पुरानी तस्वीरें साझा कर उन्हें श्रद्धांजलि दी थी।

लता मंगेशकर ने सावरकर को ‘भारत माता का सच्चा सपूत’ बताते हुए उन्हें पिता समान बताया। वीर सावरकर जब जीवित थे तो लता मंगेशकर उन्हें ‘तात्या’ के नाम से संबोधित करती थीं। यह शब्द पिता या बुजुर्ग पुरुष के लिए सम्मान में इस्तेमाल किया जाता है।

पिछले साल प्रसिद्ध गायिका ने सावरकर को याद करते हुए कहा था कि उनका नाम मंगेशकर परिवार के हृदय में दर्ज था। ट्वीट के साथ ही उन्होंने एक वीडियो भी शेयर किया था जिसे लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर ने संगीतबद्ध किया था। यह गीत वीर सावरकर ने उनके पिता के नाटक ‘संन्यास खडग’ के लिए लिखा था।

साल 2019 में लता ने अपने परिवार और स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के बीच रहे करीबी संबंध को याद करते हुए एक ट्वीट किया था। महान गायिका ने कहा था, “वीर सावरकर जी और हमारे परिवार के बहुत घनिष्‍ठ संबंध थे, इसलिए उन्होंने मेरे पिताजी की नाटक कंपनी के लिए नाटक ‘संन्यास खडग’ लिखा था। नाटक का पहली बार मंचन 18 सितम्बर 1931 को हुआ था। इसका एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था।”

वीर सावरकर वह सलाह

यह एक अल्पज्ञात तथ्य है कि अपने करियर की शुरुआत में लता मंगेशकर ने अपना समय और ऊर्जा समाज सेवा और गरीबों के कल्याण के लिए समर्पित करने के लिए गायन छोड़ने का मन बना लिया था। लेखक यतींद्र मिश्रा ने अपनी पुस्तक ‘लता: सुर गाथा‘ में खुलासा किया है कि कैसे वीर सावरकर ने लता मंगेशकर को यह निर्णय लेने से रोका और उन्हें गायन जारी रखने के लिए प्रेरित किया।

अपनी पुस्तक में मिश्रा कहते हैं कि लता ने किशोरावस्था में ही समाज सेवा करने का निश्चय कर लिया था। इसके लिए वह क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के साथ विचार-विमर्श और परामर्श कर रहीं थी और विभिन्न तरीकों पर विचार-विमर्श कर रही थीं, ताकि वह अपने संकल्पों को पूरा कर सकें। एक समय ऐसा भी आया जब लता समाज के लिए गायन छोड़ने जा रही थीं। उस वक्त सावरकर ने उनसे मिलकर उन्हें समझाया और उन्हें उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर की याद दिलाई जो उस समय भारतीय शास्त्रीय संगीत और आर्ट फर्ममेंट में अग्रणी थे।

सावरकर ने ही लता को समझाया था कि संगीत और गायन के प्रति समर्पित होकर भी वो समाज की सेवा कर सकती हैं। इसके बाद लता मंगेशकर ने संगीत में करियर बनाने को लेकर अपनी धारणाओं को बदला। सावरकर की सलाह पर अमल करते हुए वो पूरी तरह से संगीत की दुनिया में डूब गईं और इसका परिणाम ये हुआ कि वे महान गायिका बनकर उभरीं। अगर लता मंगेशकर को सावरकर की सलाह नहीं मिलती तो ये दुनिया उत्कृष्ट गायकों में से एक (लता मंगेशकर) से वंचित रह जाती।

वीर सावरकर के महान त्याग के बावजूद इतिहास इस स्वतंत्रता सेनानी के प्रति कभी भी नरम नहीं रहा है। साल 1947 में देश की आजादी के बाद से ही सरकारों ने सावरकर को तिरस्कार का पात्र बनाया। इतना ही नहीं उन्हें गाँधी जी की हत्या के केस में फँसाया गया था। बाद में सबूतों की कमी के कारण उन्हें बरी कर दिया गया।

हाल ही में लेखक विक्रम संपत स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर पर अपने समापन खंड ‘सावरकर: ए कंटेस्टेड लिगेसी 1924-1966’ के साथ सामने आए। इसमें उन्होंने सावरकर के असाधारण जीवन के अंतिम चरण का वर्णन किया है। यह पुस्तक 26 जुलाई 2021 को जारी की गई थी। इसमें वीर सावरकर को झूठा बदनाम करने और उनकी प्रतिष्ठा धूमिल करने के लिए लगातार कॉन्ग्रेस सरकारों और लेफ्ट-लिबरल्स बुद्धिजीवियों द्वारा किए गए जोरदार प्रयासों को लेकर चल रही बहस को तेज कर दिया है।

सावरकर की रचना, लता मंगेशकर के भाई बर्खास्त

वीर सावरकर द्वारा लिखी गई कविताओं पर मंगेशकर परिवार, जिसमें लता मंगेशकर, उषा मंगेशकर और उनकी अन्य बहनें व इकलौते भाई हृदयनाथ संगीत के धुनों की रचना कर रहे थे। उनका यह कार्य वीर सावरकर को सदा खलनायक बताने की कोशिश करने वाली कॉन्ग्रेस को नहीं जँचा। नतीजा यह हुआ कि कॉन्ग्रेस के शासनकाल के दौरान ऑल इंडिया रेडियो ने 1954 में हृदयनाथ मंगेशकर को वीर सावरकर की कविताओं पर उनकी संगीत रचना के लिए बर्खास्त कर दिया था।

उस घटना के सालों बीतने के बाद एबीपी माझा को दिए एक इंटरव्यू में हृदयनाथ मंगेशकर ने स्वीकार किया था कि वीर सावरकर की लिखी कविताओं का चयन करने के कारण उन्हें ऑल इंडिया रेडियो से निकाल दिया गया था। मंगेशकर ने मराठी में कहा था, “मैं उस समय ऑल इंडिया रेडियो में काम कर रहा था। मैं 17 साल का था और मेरी सैलरी 500 रुपए प्रति माह थी। यह आज मूँगफली की तरह होगा, लेकिन उस समय 500 रुपए मोटी रकम होती थी। लेकिन मुझे ऑल इंडिया रेडियो से निकाल दिया गया था, क्योंकि मैंने वीर सावरकर की प्रसिद्ध कविता ‘ने मजसी ने परत मातृभूमि, सागर प्राण तालमला’ के लिए एक संगीत रचना बनाने का विकल्प चुना था।”

लता मंगेशकर ने साल 2009 में सावरकर द्वारा लिखी गई लोकप्रिय कविता ‘ने मजसी ने परत मातृभूमिला, सागर प्राण तालमला’ को लिखे जाने के 100 साल बाद याद किया कि कैसे इस कविता ने देशभक्ति की भावना जगाई और न केवल मराठी बल्कि सभी भारतीयों के लिए प्रेरणादायक बनी थी। उस दौरान रोते हुए लता मंगेशकर ने अफसोस जताया था कि वीर सावरकर को स्वतंत्र भारत में वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।

मूल रूप से यह लेख जिनित जैन ने अंग्रेजी में लिखी है। इसका अनुवाद कुलदीप सिंह ने किया है। मूल लेख पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

अलीगढ़ के मदरसे में जंजीरों से बँधे थे बच्चे, रोने की आवाज सुन पहुँचे लोग: मौलवी गिरफ्तार, देखें Video

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से दिलदहलाने वाला मामला सामने आया है। अलीगढ़ के ऊपरकोट इलाके के एक मदरसे में मौलाना ने मासूम बच्चों को तालीम देने के नाम पर लोहे की मोटी-मोटी जंजीरों से जकड़ कर रखा था। मामला प्रकाश में आने के बाद पुलिस ने मौलाना को गिरफ्तार कर उससे पूछताछ शुरू कर दी है।

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में मोहल्ला लड़िया के मदरसा जामिया तलीम उल कुरान में तीन से चार मासूम बच्चों को लोहे की जंजीर से बाँधा हुआ दिखाया गया है। यहाँ के मदरसे के मौलाना फहीमुद्दीन ने इन बच्चों को जंजीर से बाँधकर रखा था।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि मौलवी दबंग और आपराधिक प्रवृति का है और बच्चों से मारपीट करता था। लोगों ने बताया कि जब उन्होंने बच्चों के रोने की आवाजें सुनी, तो वे वहाँ गए और देखा कि बच्चों को मदरसे में लोहे की जंजीरों से बाँधकर रखा गया है। वहीं, मदरसा के संचालक फहीमुद्दीन ने इन आरोपों का खंडन किया है। उसने कहा, “ऐसी कोई बात नहीं है। परिजनों की सहमति से बच्चों को जंजीर से बाँधा जाता है, क्योंकि वे पढ़ने के बजाय भाग जाते हैं। यहाँ एक बच्चे को उसके माँ-बाप बाँध कर गए हैं। मैंने नहीं बाँधा है।”

एबीपी न्यूज के मुताबिक जो वीडियो वायरल हो रहा है उसमें एक नहीं बल्कि चार बच्चे जंजीरों में बँधे हुए थे। सीओ प्रथम राघवेंद्र सिंह ने बताया कि मोहल्ला लड़िया मामले में आरोपित मौलवी फहीमुद्दीन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। इस संबंध में उससे पूछताछ की जा रही है। वहीं, पीड़ित बच्चे को चाइल्ड लाइन के हवाले कर दिया गया है। पुलिस ने बताया कि जिन बच्चों को जंजीरों में बाँधकर रखा गया है, उनका भी पता लगाया जा रहा है, जिससे कि उनके माता-पिता से भी पूछताछ की जा सके।

नवजोत सिंह सिद्धू ने पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष पद से दिया इस्तीफा, सोनिया गाँधी को लिखे पत्र में कही ये बात

पंजाब कॉन्ग्रेस में चल रहे घमासान के बीच मंगलवार (28 सितम्बर, 2021) को पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष पद से नवजोत सिद्धू ने 72 दिन बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

कुछ दिन पहले ही पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद चरणजीत चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया था। उसके बाद से सिद्धू पर सुपर सीएम होने के भी आरोप लग रहे थे। सिद्धू ने सोनिया गाँधी को अपना इस्तीफा भेज दिया है। 

कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी को संबोधित अपने त्यागपत्र में सिद्धू ने लिखा, “समझौता करने से व्यक्ति का चरित्र खत्म हो जाता है। मैं पंजाब के भविष्य और पंजाब की जनता के कल्याण के एजेंडा से कभी समझौता नहीं कर सकता हूँ। उन्होंने आगे लिखा, इसलिए मैं पंजाब प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देता हूँ। मैं कॉन्ग्रेस की सेवा करता रहूँगा।”

हालाँकि, सिद्धू ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को लिखे खत में कहा कि वे कॉन्ग्रेस पार्टी के सदस्य बने रहेंगे। 

बता दें कि पंजाब में आज ही नए मंत्रियों के बीच विभागों का बँटवारा हुआ है और इसके चंद घंटे बाद ही सिद्धू ने सोनिया गाँधी को इस्तीफा भेज दिया। इसके पीछे कुछ कारण खास है फिलहाल सबकुछ ठीक नहीं ये कयास लगाए जा रहे हैं।

गौरतलब है कि आज मंगलवार को ही पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह के गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात पर अटकलों का सिलसिला अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि नवजोत सिद्धू ने इस्तीफा देकर नया धमाका कर दिया। वहीं कई मीडिया रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि सिद्धू इकबाल प्रीत सहोता को डीजीपी बनाए जाने से नाराज थे। इसके साथ ही कुछ और संभावित कारण बताए जा रहे हैं।

सिद्धू की नाराजगी के मुख्य कारण: रिपोर्ट्स

  1. राणा गुरजीत सिंह को नवजोत सिंह सिद्धू के विरोध के बावजूद मंत्री बनाना
  2. सुखजिंदर रंधावा को गृह विभाग देना
  3. एपीएस देयोल को एडवोकेट जरनल बनाना
  4. कुलजीत नागरा को मंत्रिमंडल में शामिल न करना
  5. मंत्रिमंडल के गठन ओर मंत्रियों के पोर्टफोलियो बँटवारे में सिद्धू की राय न लिया जाना
  6. सीएम न बनाए जाने से नाराजगी

सौरव गांगुली को 2 एकड़ जमीन का आवंटन रद्द, ममता सरकार पर जुर्माना: हाई कोर्ट ने माना- सत्ता का मनमाना इस्तेमाल

पश्चिम बंगाल के आवास निगम ने कुछ साल पहले पूर्व क्रिकेटर सौरव गांगुली को एक शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने के लिए 2 एकड़ की जमीन आवंटित की थी। अब उसी जमीन के मद्देनजर कलकत्ता हाई कोर्ट ने गांगुली पर 10 हजार रुपए की टोकन लागत और बंगाल सरकार व उसके आवास निगम पर 50-50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया है। आरोप है कि सौरव को बिना टेंडर और कम कीमत पर जमीन दी गई।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, ये जमीन सौरव की ओर से पहले ही सरेंडर की जा चुकी है, लेकिन फिर भी कोर्ट ने सत्ता के मनमाने इस्तेमाल के लिए पश्चिम बंगाल हाउसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (डब्ल्यूएचआईडीसीओ) और राज्य सरकार पर 50-50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया। वहीं गांगुली के ऊपर 10 हजार की टोकन लागत लगाई गई।

कोर्ट ने पाया कि ये जमीन गलत ढंग से आवंटित हुई थी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी की खंडपीठ ने आवंटित प्रक्रिया के दौरान आवास निगम के आचरण पर नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि गांगुली शर्तों को निर्धारित करने में सक्षम थे, फिर भी जमीन इस तरह आवंटित हुई जैसे वो राज्य संपत्ति न होकर कोई प्राइवेट कंपनी है जिसे अपनी संपत्ति अपने ढंग से डील करने की अनुमति हो, वो भी कोई कानूनी प्रक्रिया के बिना।

बेंच ने कहा कि गांगुली को कानून के मुताबिक काम करना चाहिए था। हाई कोर्ट ने दोहराया कि यदि गांगुली खेलों के विकास में रुचि रखते थे, विशेष रूप से क्रिकेट, तो वह उभरते क्रिकेटरों को प्रेरित करने के लिए कई मौजूदा खेल प्रतिष्ठानों से जुड़ सकते थे।

पीठ ने कहा कि देश हमेशा खिलाड़ियों के लिए खड़ा होता है। खासकर जो इंटरनेशनल स्‍तर पर देश का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। यह सच है कि सौरव गांगुली ने क्रिकेट में देश का नाम रोशन किया है, लेकिन जब बात कानून और नियमों की आती है तो संविधान में सब समान है। कोई भी उससे ऊपर होने का दावा नहीं कर सकता।

बेंच ने गांगुली द्वारा लिखित पत्र की जाँच में पाया कि पत्र की सामग्री से यह और स्पष्ट हो गया है कि इसका इस्तेमाल पूर्ण रूप से वाणिज्यिक उपक्रमों के लिए होना था। इसके अलावा आवेदन में कहीं ये बात नहीं थी कि ये एक आवंटन एक चैरिटेबल इंस्टिट्यूशन के लिए है।

बता दें कि पूरा मामले ये है कि गांगुली के शैक्षणिक संस्‍था को बंगाल सरकार ने कोलकाता के न्‍यू टाउन एरिया में नियमों के विपरीत जमीन दी थी और इसी के बाद जनहित याचिका में बीसीसीआई अध्‍यक्ष और गांगुली एजुकेशन एंड वेलफेयर सोसायटी को स्‍कूल के लिए आवंटित 2 एकड़ जमीन पर सवाल खड़ा किया गया था।

सबसे पहले मामला कलकत्ता हाई कोर्ट में आया था। सौरव गांगुली ने तब किसी तरह की परेशानी में फँसने से बचने के लिए जमीन वापस कर देने का फैसला किया और उसे लौटा दिया। फिर दूसरी जमीन देने का प्रस्ताव दिया गया और उसके ख़िलाफ़ भी हाई कोर्ट में केस दर्ज हुआ। दावा था कि सौरव को बिन टेंडर और कम दाम पर जमीन आवंटित हुई थी।

‘हम क्षत्रिय, गुर्जर क्षेत्र का नाम’: सम्राट मिहिर भोज के वंशज का PM मोदी को पत्र, राजपूतों के आंदोलन को समर्थन

जहाँ एक तरफ सम्राट मिहिर भोज को’गुर्जर’ बताया जा रहा है और इसे लेकर बड़ा विवाद भी खड़ा हो गया है, नागौद रियासत के उनके वंशजों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर निवेदन किया है कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ नहीं किया जाना चाहिए। ‘किला नागौद’ से लिखे गए पत्र में ‘राजकुमार’ अरुणोदय सिंह परिहार ने कहा कि ‘गुर्जर’ या ‘गुज्जर’ सबसे बड़ा और सबसे विवादित शब्द है। उन्होंने कहा कि गुर्जर शब्द का अर्थ गुर्जर प्रदेश में राज करने वाले राजाओं से सम्बंधित है, न कि किसी जाति-समुदाय से।

उन्होंने इतिहास को एक विस्तृत व विवाद का विषय बताते हुए कहा कि ‘आदिवराह’ सम्राट मिहिर भोज, नागभट्ट द्वितीय के प्रत्यक्ष वंशज थे और रामभद्र के पुत्र थे, जिसके प्रमाण स्वरूप कई शिलालेख भी मिले हैं। उन्होंने उन सिक्कों का भी जिक्र किया है, जिस पर ‘आदिवराह’ अंकित है। उन्होंने आरोप लगाया कि इतिहास में कई बार ‘राजपूत’ शब्द का गलत अर्थ निकाला गया है। उन्होंने सम्राट मिहिर भोज को ‘गुर्जर’ बताए जाने का विरोध किया है।

राजकुमार अरुणोदय सिंह परिहार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रेषित पत्र में लिखा है, “मिहिर भोज ने ‘गुर्जराधिपति’ की पदवी धारण की और ‘गुर्जर देश’ पर शासन स्थापित किया। इस पूरे क्षेत्र को गुर्जर के रूप में जाता था था, इसीलिए वो गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज के रूप में भी विख्यात हैं। कुछ समुदायों ने गलत धारणा और गलत व्याख्या कर के दावे किए हैं कि सम्राट मिहिर भोज उनके पूर्वक हैं – ये गलत है।”

इस पत्र में उन्होंने लिखा है कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ने भी ‘गुर्जर देश’ का जिक्र किया है, जहाँ प्रतिहार वंश का शासन था। उनके अनुसार, ‘आदिवराह’ मिहिर भोज ने ‘गुर्जर देश’ पर शासन किया था, इसीलिए उन्हें गुर्जराधिपति कहा गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि नागौद राजवंश उन्हीं के वंशज हैं और वो क्षत्रिय राजपूत हैं। उन्होंने खुद को नागौद का राजकुमार बताते हुए ‘ऐतिहासिक साक्ष्यों व अधिकार’ के साथ इसकी वकालत की कि साम्राट मिहिर भोज क्षत्रिय राजपूत थे।

अरुणोदय सिंह ने मिहिर भोज की वंशावली भी पीएम मोदी को भेजी

उन्होंने दावा किया क़ नागौद, हमीरपुर, अलीपुरा, शोहरतगढ़ के परिहार उनके ही वंशज हैं। उन्होंने लिखा, “मिहिर भोज का अन्य जाति से होना गलत है। उनके नाम की प्रतिमाएँ व स्थानों का निर्माण करवाया जा रहा है, परन्तु उनका जाति-परिवर्तन किया जा रहा है, जो इतिहास के साथ सरासर छेड़छाड़ है। हमारे 1300 वर्ष पुराने मान-सम्मान को ठेस पहुँचाया जा रहा है और हम दृढ़ता से इसका विरोध करते हैं।”

वंशावली का अगला भाग

पत्र के साथ-साथ उन्होंने सम्राट मिहिर भोज और प्रतिहार वंश की वंशावली भी राजाओं व वंशजों के नामों के साथ संलग्न की है। इसमें 730 ईश्वी में नागभट्ट से लेकर वर्तमान राजा शिवेंद्र प्रताप सिंह तक के नाम का जिक्र है। सम्राट मिहिर भोज को इसमें नागभट्ट द्वितीय का पोता बताया गया है। शिवेंद्र से पहले राजा रुदेंद्र प्रताप सिंह और महेंद्र प्रताप सिंह का नाम है। अब देखना ये है कि इसके बाद विवाद थमता है या नहीं।

वहीं उन्होंने राजपूत समाज को समर्पित एक वीडियो बनाते हुए उनके द्वारा एकता का प्रदर्शन किए जाने को सराहनीय करार दिया और उनका धन्यवाद दिया। उन्होंने दादरी में हुए विरोध प्रदर्शन की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से राजा मिहिर भोज का जाति-परिवर्तन किया जा रहा है, वो इतिहास व उनके मान-सम्मान के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने कहा कि क्षत्रिय इतिहास रक्त व बलिदान से लिखी गई है, जिसे इतनी आसानी से बदला नहीं जा सकता।

बता दें कि इसे ‘इतिहास की चोरी’ का नाम देते हुए राजपूत समाज के लोग कह रहे हैं कि उनसे उनकी पहचान व उनके पूर्वजों की अस्मिता न छीनी जाए। ऐसा नहीं है कि आक्रोशित सिर्फ राजपूत ही हैं। गुर्जर समाज में भी आक्रोश है, क्योंकि उनका आरोप है कि सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के अनावरण के दौरान ‘गुर्जर’ शब्द को हटा दिया गया। उनका कहना है कि प्रतिमा का उद्घाटन तब तक नहीं माना जाएगा, जब तक वापस वहाँ ‘गुर्जर’ शब्द नहीं लिख दिया जाता।

SIT करेगी IAS इफ्तिखारुद्दीन से जुड़े ‘धर्मांतरण वीडियो’ की जाँच, CM योगी ने 7 दिन में माँगी रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश में अवैध धर्मान्तरण कराने वाले गैंग से उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ IAS अधिकारी मोहम्मद इफ्तिखारुद्दीन के कनेक्शन को लेकर वायरल वीडियो की जाँच अब SIT करेगी। सीएम योगी आदित्यनाथ के संज्ञान में यह प्रकरण आने के बाद जाँच के लिए गृह विभाग से गठित इस एसआईटी के अध्यक्ष डीजी सीबीसीआईडी जीएल मीणा होंगे एवं सदस्य एडीजी कानपुर जोन भानु भास्कर होंगे। यह मामले की जाँच करके 7 दिन में शासन को अपनी रिपोर्ट देगी। IAS अधिकारी पर हिंदू धर्म के खिलाफ प्रचार करने का आरोप लगाया गया है। इससे पहले कानपुर के पुलिस कमिश्नर ने भी एडीसीपी को जाँच सौंपी है। इस प्रकरण पर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने भी नाराजगी जताई है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बताया जा रहा है कि SIT जाँच में इस बात पर फोकस करेगी कि क्या वीडियो में कोई अपराध दिख रहा है? क्या IAS के सरकारी आवास पर कट्टरता और धर्मान्तरण से जुड़े जलसे करने से नियमों का उल्लंघन हुआ है? IAS अफसर की बैठक में कौन-कौन लोग शामिल हुए थे?

सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद अब यह बात भी निकलकर सामने आई है कि कानपुर कमिश्नर रहने के दौरान अपने सरकारी आवास में इस तरह की बैठक IAS मो. इफ्तिखारुद्दीन के लिए आम थी। वह इसमें खुद कट्टरता का पाठ पढ़ाते देखे जा सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि कानपुर ही नहीं कई राज्यों के मुस्लिम इसमें शामिल होने के लिए आते थे। यह भी कहा जा रहा है कि बंगला खाली करने के बाद जब उनके आवास की सफाई हुई तो धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने वाला साहित्य भारी मात्रा में बरामद हुआ था। मगर IAS अफसर होने के चलते तब मामले को दबा दिया गया था।

कानपुर में वरिष्ठ आइएएस अधिकारी मोहम्मद इफ्तिखारुद्दीन की तैनाती के दौरान मंडलायुक्त के सरकारी आवास परधर्मान्तरण से जुड़ी तकरीरों के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ ने बड़ा कदम उठाते हुए इस मामले की जाँच का आदेश दिया था जिसके बाद तीन सदस्यीय एसआइटी टीम का गठन किया गया है। वायरल कई वीडियो में IAS अधिकारी अपने सरकारी आवास पर मुस्लिम धर्म को लेकर तकरीरें पढ़ते नजर आ रहे हैं। वीडियो में उनके साथी मतांतरण की बातें कर रहे हैं।

बता दें कि इफ्तिखारुद्दीन 17 फरवरी 2014 से 22 अप्रैल 2017 तक कानपुर के मंडलायुक्त रहे। वह श्रमायुक्त का पदभार भी सँभाल चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उनसे जुड़े जो करीब आधा दर्जन वीडियो वायरल हो रहे हैं। वह उस समय कानपुर के मंडलायुक्त थे।

यूपी के कानून मंत्री बृजेश पाठक ने भी मामले पर चिंता व्यक्त करते हुए जाँच की बात कही है। बृजेश पाठक ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “जिस तरह से वीडियो सामने आया है उसकी जाँच की जा रही है। ये गंभीर मुद्दा है। धर्मांतरण को लेकर हमारी सरकार ने कानून बनाया हुआ है जो भी ये करता पाया जाएगा उसको छोड़ा नहीं जाएगा चाहे वो कोई भी हो। इस पूरे मामले की SIT जाँच कराई जा रही है यदि वीडियो सही पाया जाएगा तो कार्यवाही की जाएगी।”

कानून मंत्री बृजेश पाठक ने आगे कहा कि इस तरह के मामले में 2 तरह के प्रावधान बनते हैं। पहला तो उन्होंने सर्विस कोड का उल्लंघन किया है तो उन पर उसके तहत कार्यवाही की जाएगी। दूसरा उन पर धर्मांतरण को लेकर भी कार्यवाही की जाएगी जिसमें 10 साल तक कि सजा और जुर्माने का प्रावधान है। अगर वीडियो सत्य पाया जाता है तो उन पर इन दोनों मामलों के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी। पाठक ने ये भी कहा कि अगर इस तरह आईएएस अधिकारी धर्मांतरण के मामले में संलिप्त पाए जाते हैं तो ये देश के लिए चिंता का विषय है।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश स्थित कानपुर के वरिष्ठ IAS इफ्तिखारुद्दीन के 3 वीडियोज वायरल हुए हैं, जिसमें वो कथित रूप से मंडलायुक्त पद पर तैनाती के दौरान सरकारी आवास में मुस्लिम कट्टरपंथियों को बुलाकर धर्म-परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले पाठ पढ़ा रहे हैं। उन पर अपने पद का दुरुपयोग करते हुए इस्लामी कट्टरता को बढ़ावा देने के आरोप लगे हैं। ‘मठ मंदिर समन्वय समिति’ ने इस बाबत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से शिकायत की है।

‘खाना देने गई थी मेरी बेटी, मौलवी ने हाथ पकड़ अंदर खींचा…’: पटौदी की मस्जिद में 9 साल की बच्ची से छेड़छाड़

हरियाणा के गुरुग्राम में पटौदी की एक मस्जिद में मौलवी द्वारा 9 साल की बच्ची से छेड़छाड़ का मामला सामने आया है। पटौदी पुलिस ने बच्ची की माँ की शिकायत पर पोक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज कर आरोपित मौलवी को गिरफ्तार कर लिया है।

यह घटना सोमवार (27 सितंबर 2021) दोपहर को तब सामने आई जब लड़की ने अपने माँ को बताया कि मस्जिद में मौलवी ने उसे गलत तरीके से छुआ था। इसके तुरंत बाद मोहल्ले के लोगों ने इकट्ठा होकर आरोपित मौलवी को जमकर पीटा। सोशल मीडिया पर मारपीट का वीडियो सामने आया है। इसे मोहल्ले के ही एक व्यक्ति ने बनाया है, जिसका कहना है कि लड़की के साथ मस्जिद के अंदर छेड़छाड़ की गई थी।

ट्विटर पर इस वीडियो को राजीव प्रताप दुबे ने शेयर किया है। उन्होंने लिखा, “गुरुग्राम में मस्जिद के अंदर 9 साल की बच्ची से छेड़छाड़ की वारदात को चंदा इकट्ठा करने आए जमाती इमाम ने अंजाम दिया। मौलवी को खाना देने गई बच्ची के साथ गंदी हरकत की गई। इसको लेकर आरोपित जमाती इमाम की लोगों ने जमकर धुनाई की। पटौदी इलाके में सोमवार दोपहर करीब 12 बजे हुई यह वारदात हुई।”

वीडियो में आप देख सकते हैं कि मौलवी को लेकर लोगों में कितना आक्रोश है। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। इसमें एक 35 वर्षीय शख्स जो सफेद कुर्ता, पायजामा और टोपी पहने हुए दिखाया गया है, उसी पर मासूम बच्ची के साथ छेड़छाड़ का आरोप है। इसको लेकर भीड़ ने उसकी जमकर धुनाई की है। भीड़ बच्ची के साथ छेड़छाड़ की शिकायत के बाद मस्जिद के पास जमा हुई थी। मौके पर पहुँची पुलिस की टीम ने मौलवी को बचाने के लिए भीड़ को तितर-बितर किया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक सोमवार शाम को पीड़िता की माँ ने मौलवी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। महिला ने कहा कि उसकी बेटी खाना देने मस्जिद गई थी। मस्जिद के मुख्य मौलवी मौजूद नहीं थे। दूसरे मौलवी ने मेरी बेटी का हाथ पकड़ कर उसे मस्जिद के अंदर खींच लिया। महिला मूलरूप से पलवल की रहने वाली है। वह पटौदी थाना क्षेत्र में रहती है और लोगों के घरों में काम करती है। महिला ने आरोप लगाया कि मौलवी ने उसकी बच्ची को किस भी किया। इससे घबराकर बच्ची भागकर अपने परिवार के पास गई और उन्हें घटना के बारे में ताया। पुलिस ने लड़की का बयान दर्ज कर मौलवी के खिलाफ पोक्सो एक्ट (यौन हमला) की धारा 8 के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

गौरतलब है कि हाल में मस्जिदों के अंदर बच्चियों के साथ यौन शोषण के कई मामले सामने आए हैं। पिछले दिनों दिल्ली में एक 47 वर्षीय मौलवी को मस्जिद के अंदर 10 साल की नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। लड़की रात 10 बजे मस्जिद के अंदर पानी लेने गई थी। मौलवी ने कथित तौर पर उसे रोका और फिर उसके साथ दुष्कर्म किया।

ऐसा ही एक और मामला राजस्थान के भिवाड़ी का है। यहाँ एक मौलवी ने मस्जिद के अंदर एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार किया और उसके बाद उसे कुएँ में धकेल दिया। घटना का खुलासा तब हुआ जब 14 वर्षीय पीड़िता के परिवार ने सात दिन बाद थाने का दरवाजा खटखटाया। मौलाना जफरू उसे कुएँ में फेंकने के बाद अपने परिवार के साथ वहाँ से फरार हो गया था। लेकिन घटनास्थल पर जमा हुए लोगों ने बच्ची को कुएँ से सकुशल बाहर निकाला और मौलाना के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज कराया।

‘CM योगी का करते हैं सम्मान, उन्हें पता है सही इतिहास’: मिहिर भोज को ‘गुर्जर’ बताए जाने पर क्यों गुस्से में है राजपूत समाज?

सम्राट मिहिर भोज को ‘गुर्जर’ बताए जाने पर आखिर राजपूत समाज आक्रोशित क्यों है? आखिर क्या कारण है कि उन्हें ‘गुर्जर’ बताने वाले पोस्टरों को न सिर्फ फायदा गया, बल्कि दादरी में इसके विरोध में प्रदर्शन भी हुआ था। उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के कई इलाकों में हमने देखा कि कैसे राजपूत समाज ने सड़क पर उतर कर सम्राट मिहिर भोज को ‘गुर्जर’ बताए जाने के विरुद्ध कड़ा रुख अख्तियार किया।

आखिर उनके आक्रोश का कारण क्या है? आखिर सम्राट मिहिर भोज को ‘गुर्जर’ कहे जाने पर क्षत्रिय समाज आंदोलन पर क्यों उतर आया? अब जब उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में ये मुद्दा जोर पकड़ता ही जा रहा है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा प्रतिमा के अनावरण के बाद भी ये शांत होता नहीं दिख रहा है। राजनीतिक रूप से इसका क्या असर पड़ सकता है, हम इस पर भी बात करेंगे।

ऑपइंडिया ने इस सम्बन्ध में सोशल मीडिया में सर्कुलेट हो रहे संदेशों की भी पड़ताल की, जिनमें इसके खिलाफ अलग-अलग तरीकों से विरोध दर्ज कराया जा रहा था। राजपूत समाज के बीच एक सन्देश काफी प्रसारित हो रहा है, जिसमें कहा जा रहा है कि जब एक इतिहासकार के पास कुछ लोगों ने जाकर ऐसा भारत का इतिहास बताने को कहा जिसमें ‘क्षत्रिय’ नहीं आएँ, तो उस इतिहासकार ने उन्हें कोरा कागज देकर भेज दिया।

इसे ‘इतिहास की चोरी’ का नाम देते हुए राजपूत समाज के लोग कह रहे हैं कि उनसे उनकी पहचान व उनके पूर्वजों की अस्मिता न छीनी जाए। ऐसा नहीं है कि आक्रोशित सिर्फ राजपूत ही हैं। गुर्जर समाज में भी आक्रोश है, क्योंकि उनका आरोप है कि सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के अनावरण के दौरान ‘गुर्जर’ शब्द को हटा दिया गया। उनका कहना है कि प्रतिमा का उद्घाटन तब तक नहीं माना जाएगा, जब तक वापस वहाँ ‘गुर्जर’ शब्द नहीं लिख दिया जाता।

सियासत में मौके देखते ही फायदे के लिए नेता तो कूद पड़ते ही हैं, ऐसे में 2017 तक उत्तर प्रदेश में सत्ता में रही सपा के मुखिया अखिलेश यादव भी कैसे पीछे रहते। अखिलेश यादव ने दावा किया कि सम्राट मिहिर भोज गुर्जर-प्रतिहार थे, लेकिन भाजपा ने उनकी जाति ही बदल दी है। उन्होंने लिखा, “इतिहास में पढ़ाया जाता रहा है कि सम्राट मिहिर भोज गुर्जर-प्रतिहार थे, पर भाजपाइयों ने उनकी जाति ही बदल दी है। निंदनीय!’”

अखिलेश यादव ने आगे कहा, ‘”छल वश भाजपा स्थापित ऐतिहासिक तथ्यों से जानबूझ कर छेड़छाड़ व सामाजिक विघटन कर किसी एक पक्ष को अपनी तरफ करती रही है। हम हर समाज के मान-सम्मान के साथ हैं।” हालाँकि, सीएम योगी के दादरी दौरे से पहले गुर्जर और राजपूत संगठनों ने एक साथ मंच पर आकर विवाद ख़त्म करने की घोषणा की थी। लेकिन, ‘गुर्जर’ शब्द शिलापट्ट से हटाने जाने के विरोध में गुर्जर समाज ने महापंचायत बुला लिया।

सम्राट मिहिर भोज पर क्या कहना है राजपूत समाज के प्रतिनिधियों का?

हमने इस पूरे मामले को समझने के लिए उत्तर प्रदेश में ‘श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना’ प्रदेश संगठन महामंत्री राणा बृजेश प्रताप सिंह से बात की, जिन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस प्रतिमा का अनावरण किया है, उस पर ‘गुर्जर’ शब्द नहीं लिखा था और ये बात उस कार्यक्रम में उपस्थित गुर्जर नेताओं को भी पता है। उन्होंने ताज़ा घटना का जिक्र करते हुए बताया कि सोमवार (27 सितंबर, 2021) की रात को सपा-बसपा के कुछ गुर्जर नेताओं ने प्रतिमा को गंगाजल से धोया है।

राणा बृजेश प्रताप सिंह ने कहा कि इस कृत्य में कुछ भाजपा के स्थानीय नेता भी शामिल थे। उनका कहना था कि वो इस उद्घाटन को नहीं मानते, इसीलिए ‘शुद्धिकरण’ कर के फिर से उसमें ‘गुर्जर’ शब्द लगा दिया। उन्होंने भाजपा नेता सुरेंद्र सिंह नागर पर आरोप लगाया कि उन्होंने सुबह-सुबह जाकर प्रतिमा पर फूल चढ़ाया और सोशल मीडिया पर ‘सत्यमेव जयते’ लिखा। बृजेश ने पूछा कि क्या किसी के लिख देने से इतिहास बदल जाएगा?

उन्होंने कहा कि पहली बात तो ये है कि मुख्यमंत्री ने इसकी अनुमति नहीं दी थी। उन्होंने कहा कि इस शब्द को लगाने का ये लोग प्रयास कर रहे थे, लेकिन मुख्यमंत्री को संभवतः इतिहास की जानकारी है और इसीलिए उन्होंने इस शब्द पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा कि सीएम योगी ने सत्य का साथ दिया है, लेकिन इन हरकतों से उनका अपमान किया जा रहा है। उन्होंने पूछा कि जब यही करना था तो उन्हें बुलाया क्यों?

बृजेश ने कहा, “आज का राजपूत युवा स्वतंत्र सोच रखता है और किसी पार्टी के पीछे लग कर काम करने वाला नहीं है। वो खुद अपना निर्णय लेने में सक्षम है। कुछ लोग बंद कमरे में समझौता कर के आंदोलन को खत्म कराने का ठेका ले रहे हैं, लेकिन ये आंदोलन युवाओं का है। समझौता कराने वालों का नहीं है, जो मीडिया में आकर आंदोलन खत्म कराने की घोषणा कर रहे। युवा नाराज़ है। रोजगार नहीं मिल रहा हमारे युवाओं में। सरकारी नौकरियों में हमारी हिस्सेदारी 4% से भी कम है। युवाओं को कोई बहका नहीं सकता, वो अपना हक़ माँगने के बदले अब छीनेंगे।”

अखिलेश यादव के बयान पर राणा बृजेश प्रताप सिंह ने कहा कि पूर्व सीएम ने ‘गुर्जर-प्रतिहार’ लिख कर एक भ्रामक सी स्थिति पैदा कर छोड़ दी है और ये नहीं बताया है कि वो जाति की बात कर रहे या क्षेत्र की। वो बाद में राजपूतों से कहेंगे कि क्षेत्र की बात की है और गुर्जरों से कहेंगे कि उनकी बात की गई है। बकौल बृजेश, गाँव-गाँव में राजपूत युवाओं की पंचायत हो रही है और सिकंदराबाद-जेवर से लेकर कई विधानसभा क्षेत्रों में ये चालू है।

उन्होंने कहा, “भाजपा और RSS पिछले एक-डेढ़ दशक से इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास कर रही है। युवा इसके खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है। पहले के बड़े-बुजुर्ग समझौते कर के बैठ जाते थे। अब हम मूर्तियाँ लगाएँगे, क्योंकि पहले नहीं लगाया तभी आज ऐसा हो रहा। हम सम्राट मिहिर भोज के अलावा भीमदेव सोलंकी, पृथ्वीराज चौहान, अनंगपाल तोमर और महाराजा सुहेलदेव की भी प्रतिमाएँ लगाएँगे। महाराणा प्रताप एक राष्ट्रीय नायक हैं, उनकी छवि अलग है। हम अब उन नायकों की प्रतिमाएँ लगाएँगे, जिनकी ज्यादा चर्चा नहीं हुई।”

उन्होंने ‘श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना’ की अगली योजनाओं के बारे में बात करते हुए बताया कि अब हमारे जो छिपे हुए महापुरुष हैं, उन्हें सबके सामने लाना है क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया तो उन पर भी दावा ठोका जाएगा कल को। उन्होंने कहा कि गुर्जर व राजपूत में विवाद पैदा कर के योगी आदित्यनाथ को नुकसान पहुँचाया जा रहा है, जिसमें कुछ भाजपा के लोग भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि राजपूत युवा अब अपना अलग स्वतंत्र राजनीतिक लड़ाई शुरू करेंगे।

वहीं ऑपइंडिया ने ‘अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा’ के यशपाल तँवर से भी बात की, जिन्होंने जानकारी दी कि हमारे समाज ने करनाल में 26 सितंबर, 2021 को ‘वीर चक्र’ से सम्मानित कर्नल देवेंद्र सिंह के नेतृत्व में एक महापंचायत बुलाई थी। उन्होंने बताया कि पूरे हरियाणा के राजपूत अक्टूबर में पुनः इकट्ठे होंगे और लुधियाना के अमर गार्डन में राजपूत समाज का एक बहुत बड़ा कार्यक्रम हुआ था, जिसमें पंजाब के विधानसभा स्पीकर केपी राणा भी आए थे।

उन्होंने बताया कि 10,000 के राजपूत उस दिन इकट्ठे हुए थे। उन्होंने कहा, “हमारे पूर्वजों की जाति बदली जाएगी तो हमारे युवा इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। ग्वालियर में हमारी टीम अदालत में भी लड़ाई लड़ रही है। केवल सोशल मीडिया ही नहीं, जमीन पर भी हम लड़ रहे हैं। हमारे अध्यक्ष महेंद्र तँवर ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस की। सरकार असामाजिक तत्वों को सहारा दे रही है। लोकतंत्र के भीतर राजपूतों के अधिकारों का हनन हो रहा है।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारे बच्चों पर गोकशी के आरोप लगाए जा रहे हैं। उनका बेवजह चालान काटा जाता है। ‘किसान आंदोलन’ को मैं ‘जाट आरक्षण’ आंदोलन कहता हूँ, उन्होंने ‘भारत बंद’ के बहाने इतनी तबाही मचाई, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। राजपूत समाज पूरे देश में फैला हुआ है। हमारा युवा योगी जी को काफी पसंद करता है और जब उन्हें दिल्ली बुलाया गया था और उन्हें सीएम पद से हटाने जाने की अटकलें थीं, उस समय पूरे देश के राजपूतों ने उनके समर्थन में ट्रेंड चलाया।”

सम्राट मिहिर भोज को ‘गुर्जर’ बताए जाने पर राजपूत समाज के विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें

गाँव गागरोल सिकंदराबाद विधान सभा के जिला बुलंदशहर में टीम करणी सेना के पदाधिकारियों की मीटिंग
लखनऊ में इतिहास संरक्षण पर ‘करणी सेना’ के सभी पदाधिकारियों की मीटिंग
ग्राम भावसी में बैठक, अनूपशहर विधानसभा बुलंदशहर में
ग्राम नगला मुइद्दीनपुर में महाराज सुहेलदेव जी के नाम से बोर्ड लगाया गया और बैठक की – विधानसभा क्षेत्र खुर्जा बुलंदशहर

ग्राम मुराद गढ़ी जेवर विधानसभा में इस तरह का बोर्ड लगाया गया

सम्राट मिहिर भोज के ‘राजपूत’ होने के पीछे क्या दिए जा रहे हैं सबूत?

आज भी ‘प्रतिहार’ वंश का क्षत्रिय समाज मौजूद है। भीनमाल, उज्जैन और कन्नौज पर इन्हीं के पूर्वजों ने शासन किया था – ऐसा माना जाता है। ये भी कहा जा रहा है कि राजस्थान और गुजरात के कुछ इलाकों को ही ‘गुर्जरदेश’ कहा जाता था, पूरे भारत को नहीं। ‘गुर्जर’ का अर्थ ‘गुजराती’ या ‘गुर्जरदेश में निवास करने वाले’ के रूप में भी किया जाता रहा है। गल्लका के शिलालेख में लिखा है कि नागभट्ट ने गुर्जरों को हराया था, जो अब तक अजेय थे।

इन तर्कों के आधार पर सवाल पूछा जा सकता है कि जब बागभट्ट ‘गुर्जर’ थे तो उन्होंने ‘गुर्जरों’ को कैसे हरा दिया? नागभट्ट के वंश में ही मिहिर भोज का जन्म हुआ था। कहा जाता है कि ‘गुर्जरदेश’ पर विजय पाने के पश्चात ही नागभट्ट को ‘गुर्जरेश्वर’ कहा गया। मिहिर भोज के सेनापति कनलपल के बारे में भी तथ्य दिया जा सकता है कि वो ‘गुर्जर’ नहीं थे, क्योंकि आज भी गढ़वाल में परमार राजपूत रहते हैं, जो इसी समाज के हैं।

836 ईस्वी से 885 ईस्वी तक शासन करने वाले मिहिर भोज का शासनकाल 49 वर्षों का था। इन 5 दशकों में भारतीय उप-महाद्वीप का एक बड़ा हिस्सा उनके मार्गदर्शन में काफी फला-फूला। उनका साम्राज्य मुल्तान से पश्चिम बंगाल में गुर्जरपुर तक और कश्मीर से कर्नाटक तक फैला हुआ था। ये वो समय था, जब अरब के इस्लामी कट्टरपंथियों ने साम्राज्य विस्तार शुरू कर दिया था और उनकी नजर सिंधु के पार भारतवर्ष पर थी।

स्टिंग से बेनकाब हुए बड़े वाले टिकैत: कैश पेमेंट मिलने पर गुड़ फैक्ट्री के लिए जमीन-गन्ना ‘सस्ता’ दिलाने को हो गए तैयार

बीकेयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और तथाकथित किसान नेता राकेश टिकैत के भाई नरेश टिकैत, ज़ी न्यूज़ द्वारा किए गए एक स्टिंग ऑपरेशन में अपनी दोहरी नीतियों के कारण पकड़े गए हैं, जिसमें उन्हें यह कहते हुए पाया गया कि विदेशी कंपनी को न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) से कम कीमत पर गन्ना और फ़ैक्ट्री के लिए सस्ती जमीन भी दिला सकते हैं यदि नकद में भुगतान किया जाए।

नरेश टिकैत को लगभग 7 मिनट 24 सेकंड के वीडियो में गुड़ फ़ैक्ट्री और उसी के लिए गन्ना खरीद के प्रस्ताव पर चर्चा करते देखा जा सकता है। एक रिपोर्टर, जो एक उद्योगपति व्यापारी के रूप में नरेश टिकैत के सामने एक व्यापारिक सौदे का प्रस्ताव रख रहा है, को नरेश टिकैत से गुड़ की फैक्ट्री खोलने के बारे में बात करते हुए देखा जा सकता है और जब बातचीत आगे बढ़ते हुए गन्ने की कीमतें बढ़ीं तो… यहाँ पहुँची तो नरेश टिकैत को यह कहते हुए सुना जा सकता है, “बहुत अच्छा, हमारे यहाँ बड़ी मात्रा में गन्ना है, और ये गन्ने आपको सही दाम पर मिलेंगे, मिल भी इतना गन्ना नहीं ले सकती, बस भुगतान नकद में होना चाहिए, मिल में माँगे गए दर से भी कम कीमत पर आपको गन्ना मिलेगा, जैसा कि मिल की कीमत है, 325 रुपए प्रति क्विंटल है, जबकि क्रशर (कोल्हू) की कीमत 225 रुपए, 250 रुपए या 275 रुपए में मिल जाएगा आपको..”

यह ऐसे समय में आया है जब नरेश टिकैत जैसे तथाकथित किसान नेता और उनके भाई राकेश टिकैत किसान विरोधी होने का दावा करते हुए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। जबकि ‘किसान प्रदर्शनकारी’ एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) को वैध बनाने की माँग कर रहे हैं। वहीं टिकैत अन्य मिलों द्वारा दी जाने वाली कीमत से कम पर वही गन्ना दिलाने की बात कह रहे हैं, अगर पैसे का भुगतान नकद में किया जाता है। सीधे बैंक हस्तांतरण नहीं। इस प्रकार बड़ी मात्रा में बेहिसाब नकदी लेनदेन काले धन की समस्या का कारण भी बन सकता है।

Zee News के अनुसार, उनकी टीम उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में टिकैत से मिली, जहाँ हाल ही में एक ‘महापंचायत’ आयोजित की गई थी। टिकैत इसी जिले के रहने वाले हैं। अंडरकवर ज़ी न्यूज़ की टीम ने नरेश टिकैत को सिंगापुर की एक कंपनी के साथ यूपी में गुड़ की फ़ैक्टरी लगाने के समझौते के बारे में बताया। पहले तो टिकैत ने दिलचस्पी नहीं दिखाई लेकिन जब उन्हें विदेशी कंपनी के निवेश के बारे में पता चला, तो उनकी दिलचस्पी बढ़ गई।

मजे की बात यह है कि टिकैत ने उन मुद्दों को नहीं उठाया जो वह और उनके भाई अक्सर ‘किसान’ नेताओं द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शनों के दौरान उठाते थे। उदाहरण के लिए, उन्होंने यह उल्लेख नहीं किया कि किसान उद्योगों को जमीन नहीं देते हैं, जिस तरह से वे विभिन्न विरोध प्रदर्शनों में दावा करते रहे हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने कंपनी को सालाना 10,000 रुपए प्रति बीघा की दर से 12 बीघा जमीन भी देने की पेशकश की। मुजफ्फरनगर में हाल ही में हुई महापंचायत के दौरान टिकैत ने किसानों को अपनी जमीन उद्योगों को देने के खिलाफ ‘चेतावनी’ दी थी क्योंकि वे उनकी जमीन ‘हड़प’ सकते हैं। लेकिन जब बात उनकी अपनी जमीन या उनके साथ सौदे की आई तो नरेश टिकैत कंपनियों के साथ समझौता करने को तैयार नजर आए।

अचानक नहीं भड़की हिंसा, सोची-समझी साजिश थी दिल्ली दंगा; CCTV तोड़ना भी उसी का हिस्सा: दिल्ली हाई कोर्ट की दो टूक

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में हेड कॉन्सटेबल रतन लाल की हत्या मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने मोहम्मद इब्राहिम की बेल याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने बताया कि मौजूदा सबूत इस बात की पुष्टि करते हैं कि शहर में कानून व्यवस्था को बिगाड़ने के लिए एक पूर्व नियोजित साजिश रची गई थी।

मोहम्मद इब्राहिम की बेल याचिका को खारिज करने वाले कोर्ट के आदेश के अंश

कोर्ट ने कहा, “फरवरी 2020 में देश की राष्ट्रीय राजधानी को दहलाने वाले दंगे स्पष्ट तौर पर एकदम से नहीं हुए। वीडियो और फुटेज में दिखने वाला प्रदर्शनकारियों का बर्ताव जिसे अभियोजन पक्ष द्वारा रिकॉर्ड में रखा गया, साफ तौर पर दिखाता है कि यह सरकार के कामकाज को अस्त-व्यस्त करने के साथ-साथ शहर में लोगों के सामान्य जीवन को बाधित करने का एक सुनियोजित प्रयास था।”

अदालत ने यह भी कहा कि सीसीटीवी कैमरों को भी व्यवस्थित ढंग से नष्ट किया गया था जो शहर में कानून व्यवस्था को बिगाड़ने के लिए एक पूर्व नियोजित साजिश के अस्तित्व की पुष्टि करता है। अदालत ने कहा, “यह (पूर्व नियोजित साजिश) इस तथ्य से भी साफ होती है कि असंख्य दंगाइयों ने बेरहमी से पुलिस अधिकारियों पर लाठी, डंडे, बैट चलाए।”

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के दौरान मारे गए हेड कॉन्सटेबल रतन लाल के मर्डर केस में आरोपित की बेल याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पाया कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता इस प्रकार दुरुपयोग नहीं की जानी चाहिए कि समाज के ताने बाने को अस्थिर करके खतरा हो और दूसरों को चोट पहुँचे।

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा, “इस न्यायालय ने पहले एक लोकतांत्रिक राजनीति में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व पर विचार किया है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दुरुपयोग इस तरह से नहीं किया जा सकता है जिससे सभ्य समाज के ताने-बाने को अस्थिर करने का प्रयास किया जाता है। यह और अन्य व्यक्तियों को चोट पहुँचाता है।”

इब्राहिम के ख़िलाफ़ केस

सीसीटीवी फुटेज में मोहम्मद इब्राहिम को नेहरू जैकेट, सलवार कुर्ता, और इस्लामी टोपी पहने साफ देखा गया था। अभियोजन पक्ष ने तीन वीडियो सबूत के तौर पर पेश किए थे कि ताकि साबित हो कि हेड कॉन्सटेबल रतन लाल की मौत पूर्व-नियोजित थी। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली दंगे कुछ ऐसा नहीं थे जो अचानक भड़क गए हों।

कोर्ट ने बेल याचिका को नकारते हुए कहा, भले ही इब्राहिम क्राइम सीन पर न दिखा, लेकिन वह भीड़ का हिस्सा था। वह जानबूझकर अपने इलाके से  1.5 किलोमीटर दूर तक गया। उसके हाथ में तलवार थी जिसका इस्तेमाल किसी भी नुकसान के वक्त किया जा सकता था। कोर्ट ने कहा, “इसी प्रकाश में याचिकाकर्ता की तलवार के साथ वाली फुटेज काफी भयानक है जो याचिकाकर्ता को हिरासत में रखे रखने के लिए पर्याप्त है।”

बता दें कि आरोपितों की ओर से पेश हुए कई वकीलों की दलीलें सुनने के बाद इस संबंध में पिछले माह आदेश सुरक्षित रख लिया गया था। अभियोजन पक्ष की ओर से एएसजी एसवी राजू और विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद मामले में पेश हुए थे। इब्राहिम की जमानत याचिका 11 जमानत आवेदनों में सुरक्षित आदेशों का हिस्सा थी। गौरतलब है कि, अदालत ने मामले में शाहनवाज और मोहम्मद अय्यूब नाम के अन्य आरोपितों को जमानत दे दी, लेकिन सादिक और इरशाद अली के आवेदनों को खारिज कर दिया। 5 अन्य आरोपितों- मो. आरिफ, शादाब अहमद, फुरकान, सुवलीन और तबस्सुम को इस महीने की शुरुआत में जमानत मिली थी।

रतन लाल की हत्या 

24 फरवरी को दिल्ली दंगों के समय इस्लामी भीड़ डंडा, लाठी, बास्केट बैट, लोहे की रॉड और पत्थरों लेकर वजीराबाद रोड पर करीब 1 बजे इकट्ठा हुई। कुछ देर में ये हिंसक हो गए। स्थिति संभालने के लिए पुलिस को आंसू गैस छोड़ने पड़े। मौजूदा पुलिसकर्मी बताते हैं कि प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों को मारना शुरू कर दिया था। भीड़ ने डीसीपी शाहदरा, एसीपी गोकुलपुरी और हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल पर भी हमला किया। दोनों सड़क पर गिर गए और गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल को मृत घोषित कर दिया गया।