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6 मस्जिदों पर लगाया ताला, 89 पर है नजर: फ्रांस में इस्लामी कट्टरपंथ पर ऐसे लगाई जा रही लगाम

वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध जिस एकजुटता का दुनिया भर से आह्वान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार अंतराष्ट्रीय मंचों से किया है, उस पर सकारात्मक रूप से तमाम देशों के साथ फ्रांस ने भी अपने प्रभावी कदम बढ़ा दिए हैं । फ्रांस के आंतरिक मामलों के मंत्री (गृहमंत्री) के अनुसार अब फ्रांस सीधे आतंकवाद की जड़ों पर वार करेगा।

फ्रांसीसी मंत्री ने ये बयान एक स्थानीय अखबार ले फ़िगारो को दिए हैं, जिसने दुनिया भर में इबादतगाहों को ले कर सतर्कता और सन्देह की नई बहस छेड़ दी है। फ्रांसीसी सरकार की आंतरिक जाँच में मज़हबी चरमपंथ को बढ़ावा देने में वहाँ के इबादतगाहों की प्रमुख भूमिका सामने आ रही है।

आंतरिक मामलों के मंत्री गेराल्ड डार्मैनिन (Gerald Darmanin) के अनुसार अब तक 89 इबादतगाहों में से लगभग एक तिहाई की जाँच की जा चुकी है। इन 89 इबादतगाहों में चरमपंथ को बढ़ावा देने की शिकायत मिली थी। फ्रांस सरकार की खुफिया जाँच रिपोर्ट में इन सभी को कट्टरपंथ का केंद्र मान कर चिन्हित किया गया था, जिन पर जल्द ही कड़ी कार्यवाही संभावित है।

इस मामले में तत्काल ही 6 इबादतगाहों (मस्जिदों) को बंद करने के शासकीय आदेश जारी कर दिए गए हैं। इसी के साथ फ्रांस की सुरक्षा व खुफिया एजेंसी इन चरमपंथी केंद्रों से जुड़े अन्य प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कट्टरपंथी तत्वों की तलाश कर रही हैं।

कभी वामपंथी शासकों के प्रभाव में लंबे समय तक शासित रहे फ्रांस ने ईराक-ISIS युद्ध के दौरान तमाम सीरियाई व इराकियों को मानवता के आधार पर शरण दी थी परंतु उसके बाद संसार के सबसे सुंदर व पर्यटन योग्य देशों में शामिल रहे फ्रांस में आतंकी हमलों की अंतहीन श्रृंखला शुरू हो गई ।

इस पूरे मामले में उच्चस्तरीय जाँच कर रहीं फ्रांसीसी जाँच एजेंसियों ने इस्लामिक प्रकाशकों Nawa और LDNA नाम से कुख्यात ब्लैक अफ्रीकन डिफेंस लीग पर भी कठोर कार्रवाई करने के लिए कहा है। यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि ब्लैक अफ्रीकन डिफेंस लीग ने जून 2020 में फ्रांस की राजधानी पेरिस की सड़कों पर उतर कर अमेरिकी दूतावास के आगे सरकार व पुलिस विरोधी रैली की थी, जिसमें उसने सैकड़ो की संख्या में भीड़ जुटा कर शक्ति प्रदर्शन किया था ।

ब्लैक अफ्रीकन डिफेंस लीग से ही संबन्धित संस्था ब्लैक वीमेन डिफेंस लीग है, जिसने अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप शासन के अंतिम समय में हुए नस्लीय दंगो में पूरे संसार में अमेरिका की छवि गिराने और आखिरकार ट्रम्प की भी हार में एक अहम रोल अदा किया था।

फ्रांसीसी मंत्री ने जिस दूसरे संदिग्ध समूह Nawa को उल्लेखित किया, वो फ्रांस में यहूदियों के प्रति घृणा का भाव फैलाने, उनको देश से निकालने की मुहिम के साथ समलैंगिक लोगों को पत्थर से मार-मार कर जान से मार डालने को बढ़ावा देने का समर्थन करता है। कुल मिला कर दूसरे शब्दों में ये भी कहा जा सकता है कि Nawa वहाँ की सरकार को अस्थिर करने और वहाँ के मूल्यों को समाप्त करने की दिशा में कार्य कर रहा है। इस समूह का मुख्य प्रभाव फ्रांस के दक्षिणी क्षेत्र में अधिक है, जो फिलहाल पूर्ण रूप से शांत नहीं है।

इस समूहों के साथ फ्रांसीसी मंत्री ने आने वाले एक वर्ष में 10 अन्य चरमपंथी व विघटनवादी समूहों पर भी कार्रवाई की बात कही है, जो फ्रांस विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं या रहे हैं। आपको बता दें कि राष्ट्रहित में उठे किसी भी कठोर कदम को इस्लामोफोबिया बताने वालों को गत सप्ताह झटका देते हुए फ्रांस की सर्वोच्च प्रशासनिक अदालत, काउंसिल ऑफ स्टेट ने मज़हबी चरमपंथ के विरुद्ध फ्रांस की सरकार के एक्शन को स्वीकृति प्रदान कर दी थी।

यह कार्रवाई अक्टूबर 2020 में एक शिक्षक सैमुअल पेटी की निर्मम हत्या के बाद शुरू की गई थी, जिन्हें कक्षा के दौरान चार्ली हेब्दो पत्रिका द्वारा प्रकाशित पैगंबर मोहम्मद का कार्टून दिखाने का बहाना बना कर मार डाला गया था ।

फ्रांस की बहुसंख्यक जनता भी सरकार के कदम के साथ खड़ी होती दिखाई दे रही है। फ्रांस का बड़ा वर्ग शरणार्थी के नाम पर आतंकी स्वरूप में आ चुके घुसपैठियों को देश से बाहर खदेड़ने की भी मुहिम चला रहा है। इसी अभियान के तहत सोशल मीडिया पर No More Refugees कैम्पेन भी चलाया जा रहा है।

कन्हैया कुमार की ‘डिमोशन’ और राहुल गाँधी की ‘प्रमोशन’ यात्रा: कॉन्ग्रेस का गटर ही जेएनयू के वामपंथ का किनारा

कन्हैया कुमार ने कॉन्ग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली है। इसके साथ ही उनका डिमोशन हो गया। उनके डिमोशन की बात मैं इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि एक समय था जब बुद्धिजीवियों, संपादकों और पत्रकारों ने जेएनयू में उनके भाषण कौशल और मीडिया द्वारा उन्हें दिए जाने वाले एयर टाइम के आधार पर उन्हें नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले सबसे बड़ा नेता घोषित कर दिया था। यह वो समय था जब लोकतंत्र की तथाकथित हत्या रोकने के लिए इन सब को हर दस महीने में एक नए हीरो की तलाश रहती थी और कन्हैया कुमार ऐसे ही किसी तलाश में बरामद हुए थे। नरेंद्र मोदी के खिलाफ सबसे मजबूत दावेदार से एक कॉन्ग्रेसी सिपाही बनने तक की उनकी इस डिमोशन यात्रा में लगभग साढ़े चार वर्ष लगे।

राजनीतिक पंडितों और विशेषज्ञों का यह मानना है कि उनके कॉन्ग्रेस ज्वाइन करने से कॉन्ग्रेस पार्टी सेंटर से लेफ्ट की तरफ चली गई है। मुझे लगता है इसमें कुछ भी नया नहीं है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में भारत के टुकड़े होने की बात डफली की तान पर गाने के बाद जो नेता कन्हैया कुमार और उनके साथियों के समर्थन में सबसे पहले विश्वविद्यालय के कैंपस पर उतरा था उसका नाम राहुल गाँधी ही था। ऐसे में यदि कन्हैया कुमार आज कॉन्ग्रेस पार्टी ज्वाइन करते हैं तो उसमें कैसा आश्चर्य? ऐसा तो हो नहीं सकता न कि टुकड़े-टुकड़े का नारा लगाने वाले के समर्थन में राहुल गाँधी सार्वजनिक तौर पर उतर आएँ पर जब नारा लगाने वाले गाँधी जी (मेरा मतलब राहुल गाँधी से है) की पार्टी ज्वाइन कर लें तो इसे लेकर आश्चर्य व्यक्त किया जाए। 

कन्हैया कुमार का अपना राजनीतिक कद और जमा पूँजी कितनी बड़ी है, इसे लेकर बहस होती रहेगी। व्यवहारिकता और यथार्थवादी विश्लेषक यह याद दिलाएँगे कि कैसे कन्हैया कुमार बड़े-बड़े सेलेब द्वारा उन्हें दिए गए समर्थन और चुनाव प्रचार के बावजूद गिरिराज सिंह से कितने मतों से हारे थे। दूसरी ओर आधुनिक राजनीतिक कला और अप्रत्यक्ष संपत्ति के पारखी यह बताएँगे कि कैसे कन्हैया कुमार के पास बोलने की कला और जेएनयू की डिग्री है और ऐसा कुछ है जो दिखाई भले न दे पर उन्हें लंबी रेस का नेता बनाता है। कई पारखी उन्हें पहले ही आज का मार्क्स बता चुके हैं। सोशल मीडिया युग में आधुनिक वैचारिक मतभेद का आलम यह है कि उनके विरोधी मार्क्स को अपने युग का कन्हैया कुमार बता चुके हैं। 

इस तरह की बहस के बीच जो प्रश्न खो जाएगा वह यह है कि वर्तमान परिस्थितियों में एक कुशल नेता की कॉन्ग्रेसी खोज क्या कन्हैया कुमार तक ही जा सकती है?

कन्हैया कुमार कई वर्षों से अपनी मार्केटिंग के सबसे बड़े सेल्समैन हैं। जेएनयू में वर्षों तक रहने और अफ्रीकन स्टडीज में पीएचडी की डिग्री लेने के बावजूद वे ऐसी हिंदी बोलते हैं जिससे वे जमीन से जुड़े हुए लगें। उन्होंने कॉन्ग्रेस ज्वाइन करते समय यह बताया कि यदि कॉन्ग्रेस नहीं रहेगी तो यह देश नहीं रहेगा। उनके कहने का अर्थ यह कि वे दरअसल देश बचाने आए हैं, इस प्रक्रिया में कॉन्ग्रेस ज्वाइन करना तो महज एक संयोग है। साथ ही उन्होंने बताया कि कैसे उनके समर्थन देने के कारण लोगों की मित्रता और शादियाँ तक टूट गई।

राजनीतिक दल ज्वाइन करते समय कौन से नेता ने खुद की ऐसी मार्केटिंग की होगी? अपनी ऐसी विकट मार्केटिंग के पीछे शायद उनके मन में आत्मविश्वास की कमी एक कारण है और ऐसा लगता है जैसे वे कॉन्ग्रेस पार्टी में अपने प्रवेश को उचित ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, यह सोचते हुए कि लोगों के मन में उनकी योग्यता को लेकर सवाल होंगे। 

कन्हैया कुमार का कॉन्ग्रेस ज्वाइन करना मेरे लिए आश्चर्य व्यक्त करने वाली घटना नहीं है। मेरे विचार से इस समय वर्तमान भारतीय राजनीति के सेक्युलर दलों के बीच नेता एक्सचेंज प्रोग्राम चल रहा है। ऐसे नहीं कि केवल कन्हैया कुमार का ही ट्रांसफर हुआ है। पिछले ढाई-तीन वर्षों में ऐसे कई और लाइटवेट नेता कॉन्ग्रेस पार्टी से आम आदमी पार्टी, शिवसेना और तृणमूल कॉन्ग्रेस में गए हैं और यह एक वृहद सेक्युलर सहयोग का हिस्सा है। 

वर्तमान में कॉन्ग्रेस पार्टी घाटे वाले उस बैठ गए कॉर्पोरेट ग्रुप की तरह है जिसके प्रमोटर को अचानक एक दिन यह लगता है कि यदि हम कुछ करते हुए नहीं दिखे तो बैंक हमें और लोन नहीं देंगे। कुछ करते हुए दिखने की इस प्रक्रिया में प्रमोटर पैरेंट कंपनी के अफसर सब्सिडियरी कंपनी में ट्रांसफर करता है और सब्सिडियरी कंपनी के अफसर पैरेंट कंपनी में। साथ ही किसी प्रसिद्ध एनजीओ के सीईओ को बड़े तामझाम के साथ कंपनी में लाता है और कर्ज देने वाले बैंकों को बताता है कि देखिए हम पूरे ग्रुप की रिस्ट्रक्चरिंग कर रहे हैं और अब आप बस अगले तिमाही का रिजल्ट देखिएगा। 

कन्हैया कुमार पर कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व का भरोसा वर्षों से एक्टिविस्ट, एनजीओ, संपादक, पत्रकार, बुद्धिजीवी और आन्दोलनजीवी वगैरह पर उसके भरोसे का ही विस्तार है। इसमें नया कुछ नहीं है। यह पार्टी द्वारा अपनी राजनीतिक लड़ाई को आउटसोर्स करने का एक और उदाहरण है। आने वाले समय में कन्हैया कुमार और उनके ही और मित्रों को कॉन्ग्रेस ज्वाइन करते हुए देखेंगे। हर राजनीतिक दल का अपनी लड़ाई लड़ने का अलग-अलग तरीका होता है पर उसे आउटसोर्स करने का काम लोकतांत्रिक राजनीति के भारतीय मॉडल में फिट होने में काफी समय लगेगा। कॉन्ग्रेस पार्टी और उसका नेतृत्व जितनी जल्दी इस बात को स्वीकार कर लेगा, पार्टी के लिए राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक रहने की संभावना उतनी ही बढ़ेगी।            

दागियों की वापसी कबूल नहीं, एजेंडे के साथ लड़ूँगा: सिद्धू का Video संदेश, अमरिंदर बोले- नई पार्टी ज्वाइन करेगा

पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष पद से नवजोत सिंह सिद्धू के इस्तीफे के बाद पंजाब कॉन्ग्रेस में एक बार फिर उठा-पटक शुरू हो गई है। उनके बाद उनके समर्थक भी अपना पद छोड़ रहे हैं। माना जा रहा है कि चन्नी सरकार में अपनी न चलने के कारण सिद्धू ने इस्तीफा दिया। अब कॉन्ग्रेस पार्टी कमेटी बनाकर, नेताओं को सिद्धू के पास भेज कर, उन्हें मनाने की कोशिश कर रही है।

इस बीच सिद्धू ने अपना इस्तीफा देने के बाद पहला वीडियो संदेश जारी किया। सिद्धू ने कहा, वह अपने मुद्दों से समझौता नहीं कर सकते हैं, हक और सच की लड़ाई को वह लड़ते रहेंगे। वह बोले,

“प्यारे पंजाबियों, 17 साल का राजनीतिक सफर एक मकसद के साथ किया है। पंजाब के लोगों की जिंदगी को बेहतर करना और मुद्दों की राजनीति करना। यही मेरा धर्म था और यही मेरा फर्ज है, मैंने कोई निजी लड़ाई नहीं लड़ी है। मेरी लड़ाई मुद्दों की है, पंजाब का अपना एक एजेंडा है। इस एजेंडे के साथ मैं अपने हक-सच की लड़ाई लड़ता रहा हूँ, इसके लिए कोई समझौता नहीं।”

नवजोत सिंह सिद्धू ने आगे कहा,

“मेरे पिता ने एक ही बात सिखाई है, जहाँ भी मुश्किल खड़ी हो तो सच की लड़ाई लड़ो। जब भी मैं देखता हूँ कि सच के साथ समझौता हो रहा है, जब मैं देखता हूँ कि जिन्होंने कुछ वक्त पहले बादल सरकार को क्लीन चिट दी, बच्चों पर गोलियाँ चलाई उन्हें ही इंसाफ की जिम्मेदारी दी थी। जिन्होंने खुलकर बेल दी है, वो एडवोकेट जनरल हैं।”

वीडियो संदेश में सिद्धू बोले,

“मैं न ही हाईकमान को गुमराह कर सकता हूँ और न ही गुमराह होने दे सकता हूँ। पंजाब के लोगों के लिए मैं किसी भी चीज़ की कुर्बानी दूँगा, लेकिन अपने सिद्धातों पर लड़ूँगा। दागी नेता, दागी अफसरों की वापसी कर वही सिस्टम खड़ा नहीं किया जा सकता है।”

‘सिद्धू करेगा नई पार्टी ज्वाईन’

पंजाब कॉन्ग्रेस में सिद्धू के इस्तीफे के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बयान दिया है। उनका कहना है, “सिद्धू ने ये फैसला कोई नैतिकता या सिद्धांतों के आधार पर नहीं लिया। वो सिर्फ कॉन्ग्रेस को छोड़ने की जमीन तैयार कर रहे हैं। इंतजार करो और देखते जाओ, वो नई पार्टी जल्द ज्वाइन करेगा।” वह कहते हैं, “मैं इस लड़के को बचपन से जानता हूँ। ये अकेला रहा है और कभी टीम के साथ काम करने वाला नहीं रहा।”

कहा जा रहा है कई कॉन्ग्रेस नेता सिद्धू के इस्तीफे के बाद उनके घर पहुँचे थे ताकि जान सकें कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। हालाँकि सिद्धू ने कथिततौर पर कहा कि वो सोच विचार करने के मूड में नहीं है। इससे पहले सिद्धू एक बार कह चुके हैं कि वो पार्टी हाई कमान के हाथों की कठपुतली नहीं बने रह सकते।

बता दें कि इस सारी उठापटक के बीच गाँधी परिवार अपनी शिमला की छुट्टियाँ बीच में छोड़ कर राजधानी लौट आया है। हर संभव कोशिश की जा रही है कि सिद्धू मान जाएँ। पार्टी के महासचिव के सी वेणुगोपाल ने कहा है, “सब ठीक हो जाएगा। सिद्धू की ये भावनात्मक प्रतिक्रिया है।”

धंधा बन गया, पैसा कमा रहे पर क्वालिटी घटिया: नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने बताया OTT प्लेटफॉर्म हो रहे बदतर

नवाजुद्दीन सिद्दीकी को 2021 इंटरनेशनल एमी अवॉर्ड में बेस्ट एक्टर केटेगरी में नामांकन मिला था। वजह ओटीटी प्लेटाफॉर्म नेटफ्लिक्स पर आई सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘सीरियस मेन’ में किया गया उनका दमदार अभिनय था। लेकिन नवाजुद्दीन ओटीटी प्लेटफॉर्म को लेकर सशंकित हैं। उनका मानना है कि ओटीटी ( प्लेटफॉर्म आज के जमाने में एक धंधा बन गया है। चीजें बदतर होती जा रही हैं। कंटेट के नाम पर बड़े प्रोडक्शन हाउस सिर्फ पैसा कमा रहे हैं।

न्यूज 18 की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, अभिनेता का कहना है कि ओटीटी जब देश में आया था तो इसने फिल्म निर्माताओं के लिए नए रास्ते खोले थे। लेकिन अब प्रोडक्शन हाउस आकर्षक कंटेट नहीं दे पा रहे हैं। सिद्दीकी ने कहा, “ओटीटी ने वास्तव में अच्छी शुरुआत की और भारत में फिल्म निर्माताओं और अभिनेताओं के लिए नए रास्ते खोले। जो कंटेंट हम सिनेमाघरों में देखते हैं, वह स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर अलग थी और इसकी अपनी अनूठी शैली थी। लेकिन अब मुझे लगता है कि यह अपना नयापन खोता जा रहा है। कंटेंट बहुत अधिक आ रहे हैं, लेकिन उनकी क्वालिटी एकदम घटिया है। ओटीटी एकदम क्लिच्ड हो चुका है। आप इसकी तुलना टेलीविजन सीरियल से कर सकते हैं।”

ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई सीरियस मेन, रात अकेली है और घूमकेतु जैसी फिल्मों में एक्टिंग कर चुके अभिनेता का मानना है कि स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म व्यवसाय का रूप ले चुके हैं। उन्होंने आगे कहा, “बड़े प्रोडक्शन हाउस ने स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के साथ लाखों सौदे किए हैं। कंटेंट के नाम पर ये प्रोडक्शन हाउस सिर्फ रन-ऑफ-द-मिल कंटेंट लेकर आते हैं। हमें कला को व्यवसाय में बदलने की आदत है और ओटीटी भी एक धंधा बन गया है। प्रोडक्शन हाउस केवल पैसे कमा रहे हैं।”

नवाजुद्दीन सिद्दीकी मानते हैं कि कई सारे ऐसे फिल्म निर्माता है, जो अपनी प्रतिभा दिखाने के काबिल हैं, लेकिन उन्हें इसका मौका ही नहीं मिलता है। दर्शक भी अच्छा कंटेंट देखना चाहते हैं लेकिन बड़े प्रोडक्शन हाउस औसत और खराब कंटेंट बना रहे हैं। एक समय था जब ओटीटी का एकाधिकार नहीं था. लेकिन अब सब कुछ बदल रहा है।

लंदन में हीरोपंती-2 की शूटिंग कर रहे सिद्दीकी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म को लेकर कहते हैं, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म ने मुझे वैश्विक उपस्थिति दी है। सेक्रेड गेम्स के बाद जब भी मैं विदेश यात्रा करता था तो बहुत से लोग मुझे पहचानते और यहाँ तक ​​कि मुझे गणेश गायतोंडे (सेक्रेड गेम्स में उनका किरदार) भी कहते थे। लेकिन दुख की बात है कि आज कंटेंट की क्वालिटी खराब हो गई है। लोग अब एक ही चीज को देखकर बोर हो गए हैं और यही वजह है कि हम शायद ही कोई वेब सीरीज या फिल्म देखते हैं जिसकी हाल के दिनों में काफी तारीफ हुई हो।”

‘कान खोलकर सुन… अपनी सीमा मत भूलना’: आधी रात भूपेश बघेल ने धमकाया, नविका कुमार पर भड़के कॉन्ग्रेसी

टाइम्स नाउ पर पंजाब कॉन्ग्रेस में मचे घमासान को लेकर बहस चल रही थी। इसी दौरान एंकर नविका कुमार की जुबान फिसल गई। इसके लिए उन्होंने खेद भी जताया। लेकिन फिर भी कॉन्ग्रेस समर्थक उन्हें निशाना बनाने से नहीं चूके। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तो बुधवार (29 सितंबर 2021) आधी रात ट्वीट कर मीडिया को धमका दिया।

बघेल ने ट्वीट कर कहा, “कान खोलकर सुन लिया जाए। राहुल गाँधी विपक्ष के मुख्य नेता हैं। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता उनके खिलाफ ‘अपमानजनक’ शब्द बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम हर मीडिया हाउस का सम्मान करते हैं जो लोकतंत्र का एक जिम्मेदार चौथा स्तंभ है। लेकिन अपनी सीमा मत भूलना।”

हकीकत ये है कि वायनाड के सांसद राहुल गाँधी विपक्ष के नेताओं में से एक हैं। वे न तो पार्टी अध्यक्ष हैं (उनकी माँ हैं) और न ही वे लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं।

बहरहाल, भूपेश बघेल के धमकी भरे बयान ने नेटिजन्स को उन्हें घेरने का मौका दे दिया।

दिल्ली बीजेपी के प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने सवाल किया कि बघेल मुख्यमंत्री हैं या गुंडा। उन्होंने याद दिलाया कि 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद राजीव गाँधी द्वारा इस्तेमाल की गई इसी तरह की भाषा के कारण हजारों सिखों की हत्या हुई थी।

एक अन्य ट्विटर यूजर ने बताया कि बघेल आधी रात को राहुल गाँधी को दिए गए उपनाम ‘पप्पू’ के लिए ट्वीट कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “पप्पू के लिए रात में 12 बजे ट्वीट हो रहा। इतना ध्यान अपने राज्य में देते तो इस्तीफ़ा देने की नौबत ना आती।” उल्लेखनीय है कि इस समय छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस में भी उथल पुथल चल रही है और दूसरा धड़ा सीएम पद पर अपनी दावेदारी जता रहा है।

एक ट्विटर यूजर ने बघेल को अपने खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी देते हुए लिख दिया कि राहुल गाँधी गधा है।

स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने बताया कि किस तरह इस तरह की धमकी ‘सर तन से जुदा’ से सिर्फ एक कदम दूर थी। ‘सर तन से जुदा’ कट्टर इस्लामवादियों का नारा है जो ईशनिंदा के आरोपों पर सिर काटने की देते रहते हैं।

बघेल की ट्वीट की वजह नविका कुमार का वह शो माना जा रहा है जिसमें वह पंजाब के राजनीतिक संकट पर चर्चा कर रही थीं। शो के दौरान उन्होंने कहा, “…मेरी छुट्टी चाहिए और मैं छुट्टी पर जाऊँगा और जिस दिन वह लौटते हैं, bl**dy… मुझे खेद है, क्षमा करें, जिस दिन वह लौटते हैं उस दिन पंजाब सुर्खियों में रहता है…।”

बस फिर क्या था कॉन्ग्रेस समर्थकों ने ट्विटर पर ‘कचरा नविका’ ट्रेंड कराया और उनके गलती से निकले ‘bl**dy’ शब्द के लिए उन्हें गालियाँ दीं।

बाद में नविका कुमार ने बातचीत के प्रवाह में अपनी क्षणिक चूक और ऑन एयर हुए ‘असंसदीय शब्द’ का उपयोग करने के लिए सोशल मीडिया के जरिए माफी माँगी।

उन्होंने स्पष्टीकरण दिया कि कैसे इस शब्द का उपयोग करने के लिए उन्होंने तुरंत माफी भी माँगी थी। हालाँकि, इसके बावजूद कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता, नेता और समर्थक संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने उसे ऑफ एयर करने की माँग की।

कुछ लोगों ने यह भी माँग की कि वह एक वीडियो माफी जारी करें और राहुल गाँधी के खिलाफ कभी भी ‘इस पागलपन को दोबारा नहीं’ दोहराने का वादा करें।

जाहिर तौर पर कॉन्ग्रेसियों के लिए ऑन-एयर माफी से कम कुछ भी काम नहीं करेगा। गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस के फेवर वाले मीडिया घरानों के साथ-साथ एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और अन्य मीडिया संगठनों ने अभी तक बघेल की मीडिया घरानों की धमकी पर कोई टिप्पणी नहीं की है।

पलायन के लिए बदनाम पहाड़ों में जाकर बस रहे मुस्लिम: 10 साल में 45 फीसदी बढ़े, देहरादून में भी डरा रहा डेमोग्राफी चेंज

उत्तराखंड की पहाड़ों से एक तरफ रोजगार और शिक्षा के लिए लगातार पलायन हो रहा है। दूसरी ओर इन्हीं जगहों पर मैदानी इलाकों से जाकर मुस्लिम बस रहे हैं। इसके कारण राज्य में कई जगहों पर डेमोग्राफी में बड़ा बदलाव आया है और अब इसे भी पलायन की एक वजह माना जा रहा है।

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार राजधानी देहरादून और उससे सटे इलाकों में भी आबादी में बड़ा बदलाव आया है। तीन दर्जन से अधिक ऐसे इलाके हैं जहाँ करीब दो दशक के भीतर ही मुस्लिम आबादी ढाई गुणा तक बढ़ गई है। 2001-2011 के बीच इन इलाकों में समुदाय विशेष की आबादी में 45 फीसदी तक का इजाफा देखने को मिला है। जनगणना के नए आँकड़ें सामने आने के बाद यह तस्वीर और साफ होगी, क्योंकि पिछले 10 सालों में इस ट्रेंड ने और जोर पकड़ा है।

रिपोर्ट के अनुसार डेमोग्राफी में इस बदलाव को लेकर प्रशासन भी सतर्क हो गया है। उन इलाकों की निगरानी शुरू की गई है जहाँ पिछले कुछ सालों में जमीन की खरीद-फरोख्त में तेजी देखी गई है।

उत्तराखंड के वे इलाके जहॉं आबादी के अनुपात में आया बड़ा बदलाव (साभार: दैनिक जागरण)

आबादी के अनुपात में यह बदलाव केवल देहरादून से सटे इलाकों तक ही सीमित नहीं है। नेपाल से लगे जिलों में 2.5 गुना तक मुस्लिम आबादी में वृद्धि देखने को मिली है। बताया जाता है कि इन इलाकों में 2 साल के भीतर ही 400 मदरसे और मस्जिद बने हैं। कुमाऊँ के तीन क्षेत्र ऊधमसिंह नगर, चम्पावत और पिथौरगढ़ इस लिहाज से बेहद संवेदनशील हो चुके हैं।

कुमाऊँ मंडल के मुख्यालय नैनीताल में डेमोग्राफी बदलाव को लेकर खुफिया अलटे के बाद जाँच कमिटी गठित की गई है। शहर के विभिन्न क्षेत्रों में मुस्लिमों के बढ़ते दखल को लेकर एजेंसियों ने अलर्ट किया था। उच्च न्यायालय के अधिवक्ता नितिन कार्की ने इसको लेकर जिला प्रशासन के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भी सौंपा था।

एजेंसियों का मानना है कि नैनीताल में घोड़ा, टैक्सी, नौका संचालन, टूरिस्ट गाइडिंग, होटलों इत्यादि को लीज में लेने में मुस्लिम समुदाय का दखल बढ़ा है। इनमें से अधिकतर खास मपुर, दडिय़ाल, स्वार, मुरादाबाद, बिजनौर और सहारनपुर के रहने वाले हैं। इतना ही नहीं कई संवेदनशील और प्रतिबंधित क्षेत्रों में पहले कच्चा मकान और फिर रातोंरात पक्का निर्माण करने की भी बातें सामने आई है।

इस ओर ध्यान खींचते हुए पिछले दिनों उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड के अध्यक्ष रहे रह चुके  गजराज सिंह बिष्ट ने फेसबुक पर अपना वीडियो शेयर किया था। इसमें वह लोगों को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि ये मुस्लिम शुरुआत में आपके पैर पकड़ने आएँगे। फिर आपसे हाथ जोड़ेगे और विनती करेंगे, लेकिन जब यही 1 से 10 हो जाते हैं तो आप इनकी गली में घुस भी नहीं सकते हैं।

हालाँकि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पहले ही साफ कर चुके हैं कि इस संबंध में जाँच किसी समुदाय को निशाना बना कर नहीं की जा रही है। उन्होंने कहा था, “काफी विचार-विमर्श करने के बाद ही सरकार ने यह कदम उठाया है। पलायन और जनसंख्या असंतुलन चिंता का विषय है।”

उल्लेखनीय है कि यह बात भी सामने आ चुकी है कि पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा होते हुए पाकिस्तान से बांग्लादेश को जोड़ने वाली एक मुस्लिम पट्टी तैयार करने की साजिश पर भी काम चल रहा है। कथित तौर पर रोहिंग्या और बांग्लादे​शी घुसपैठियों को बड़े पैमान पर इस पट्टी में आने वाले इलाकों में बसाया जा रहा है।

‘हमारे कारण जिनका तलाक हुआ, जो दोस्तों-परिवारों से लड़े… सबका धन्यवाद’ – कॉन्ग्रेस में शामिल होते ही कन्हैया कुमार

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार देश विरोधी नारे लगाकर (आरोप लगा, दिल्ली पुलिस ने पुष्टि की थी) लाइम लाइट में आए। छात्र नेता के बाद सीपीआई का दामन थामा। अब वही कन्हैया कुमार मंगलवार (28 सितंबर 2021) को कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए। कॉन्ग्रेस में शामिल होने के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए कन्हैया ने कहा कि उनके आंदोलन के कारण डिनर टेबल पर लड़ाई तक हो गई और तो और तलाक भी हुए हैं।

कन्हैया कुमार ने कहा, “मैं उस जगह का आभारी हूँ जहाँ मैं पैदा हुआ था और जिस पार्टी (सीपीआई) ने मुझे बड़ा किया, मुझे सिखाया और मुझे लड़ने की हिम्मत दी। उस पार्टी के साथ-साथ मैं करोड़ों लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूँ, जो लोग हमारे खिलाफ निराधार आरोप लगाए जाने पर स्कूल के व्हाट्सएप ग्रुप में अपने दोस्तों के साथ लड़े थे। हमारे आंदोलन के समर्थन में वे खाने की मेज पर लड़े और अपनी दोस्ती तक तोड़ दी। यहाँ तक ​​कि इससे तलाक भी हो गया। देश में चल रहे इस वैचारिक संघर्ष में केवल कॉन्ग्रेस पार्टी ही नेतृत्व प्रदान कर सकती है।”

कॉन्ग्रेस पार्टी में शामिल होने के अपने कारणों के बारे में कन्हैया कुमार ने कहा, “मैं कॉन्ग्रेस में शामिल हो रहा हूँ क्योंकि देश पर शासन करने वाले कुछ लोग इस देश के विचारों, संस्कृति को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने देश की सबसे लोकतांत्रिक पार्टी में रहना चुना है।” उन्होंने आगे कहा, “युवाओं को इस बात का अहसास होने लगा है कि अगर कॉन्ग्रेस खत्म हो गई तो यह देश भी सुरक्षित नहीं रहेगा।”

कन्हैया कुमार ने दावा किया कि देश में कॉन्ग्रेस पार्टी का कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा, “अगर कॉन्ग्रेस जैसा बड़ा जहाज नहीं बचा तो छोटी नावें नहीं बचेंगी।”

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार और निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी के साथ दिल्ली के आईटीओ स्थित शहीद-ए-आजम भगत सिंह पार्क में जश्न मनाया। दोनों नेताओं के पार्टी में औपचारिक रूप से शामिल होने की खुशी को सेलिब्रेट करने के दौरान पाटीदार नेता हार्दिक पटेल भी मौजूद थे।

सूरत-मुंबई में ब्लास्ट के लिए आतंकियों ने की थी रेकी, बिहार का गाँधी सेतु भी था टारगेट; ओसामा का चाचा कर रहा था कोर्डिनेट: रिपोर्ट

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने बीते 14 सितंबर को 6 आतंकियों को गिरफ्तार कर पाकिस्तान के आंतकी मॉड्यूल का पर्दाफाश किया था। अब रिपोर्टों से यह बात सामने आई है कि इस आतंकी नेटवर्क को ओसामा का चाचा हुमैद उर रहमान कोर्डिनेट कर रहा था। आतंकियों के टारगेट पर गुजरात का सूरत, मुंबई और बिहार के पटना का गाँधी सेतु था।

रहमान ने 24 सितंबर को प्रयागराज में सरेंडर किया था। वह यूपी एटीएस के वांटेड लिस्ट में था। उसने ही ओसामा को ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान भेजा था। ओसामा उन 6 आतंकियों में था जिन्हें दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था।

दिल्ली पुलिस की पूछताछ में शामिल रहे एक अधिकारी के हवाले से न्यूज 18 ने बताया है कि जीशान कमर ने कबूला है कि उसने सूरत और उसके साथी ने मुंबई में रेकी की थी। उनकी योजना सितंबर और अक्टूबर के दौरान धमाकों को अंजाम देने की थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि महाराष्ट्र एटीएस के अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि जान मोहम्मद ने गणेश उत्सव से पहले गिरगाँव चौपाटी की रेकी की थी।

रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली पुलिस के कमिश्नर राकेश अस्थाना खुद पूरी जाँच की निगरानी कर रहे हैं। अधिकारियों ने बताया कि सोमवार (27 सितंबर 2021) को उन्होंने गिरफ्तार आतंकियों से खुद पूछताछ भी की थी। इससे पहले यह बात सामने आई थी कि ओसामा और जीशान ने पूछताछ में बताया है कि पाकिस्तान में 15 दिन की ट्रेनिंग के दौरान उन्हें AK-47 चलाना और किसी भी केमिकल से ब्लास्ट करना सिखाया गया था। उन्हें आईडी बनाने और कम समय में ब्लास्ट को अंजाम देने के तरीकों के बारे में भी बताया गया था।

दिल्ली पुलिस ने जिन आतंकियों को पकड़ा था उनकी पहचान महाराष्ट्र के जान मोहम्मद शेख, दिल्ली के ओसामा समी, रायबरेली के ओसामा मूलचंद, प्रयागराज के जीशान कमर, लखनऊ के मोहम्मद आमिर जावेद और अबू बकर के तौर पर हुई थी। इनमें जीशान और ओसामा को पाकिस्तान में ट्रेनिंग मिली थी।

ओसामा और जीशान को पाकिस्तान के थट्टा टेरर कैंप में ट्रेनिंग दी गई थी। कराची के पास स्थित इस ट्रेनिंग कैंप में इन्हें ओमान के रास्ते ले जाया गया था। यह वही टेरर कैंप हैं, जहाँ 26/11 के हमले में जिंदा पकड़े आतंकी हमले अजमल कसाब को भी ट्रेनिंग दी गई थी।

इसी साल अप्रैल में ओसामा और जीशान ओमान के रास्ते पाकिस्तान के कराची पहुँचे थे। वे ओमान से जिवानी गए और वहाँ से दोनों को थट्टा भेजा गया। आतंकी ट्रेनिंग के लिए ओमान के रास्ते का इस्तेमाल पहली बार किए जाने की बात भी सामने आई थी। ओसामा पर अप्रैल से ही नजर रखी जा रही थी। वह 22 अप्रैल 2021 को सलाम एयर की फ्लाइट से लखनऊ से ओमान के मस्कट लिए रवाना हुआ था। वहीं एक फ्लैट में उसकी मुलाकात प्रयागराज के जीशान से हुई। वह भी पाकिस्तान में ट्रेनिंग के लिए भारत से मस्कट पहुँचा था। यहाँ 15-16 बांग्लादेशी भी इनके साथ जुड़े। इन सबको छोटे-छोटे ग्रुप में बाँटा गया। जीशान और ओसामा को एक ही ग्रुप में रखा गया था।

दिल्ली पुलिस के डीसीपी (स्पेशल सेल) प्रमोद कुशवाहा ने बताया था कि ओमान से इन्होंने कुछ दिनों तक कई बार नाव बदल समुद्र दूरी तय की। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से इन्हें जिवानी ले जाया गया। वहाँ से थट्टा के एक फार्महाउस पर ले जाकर ट्रेनिंग दी गई।

यह बात भी सामने आई थी कि अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का भाई अनीस आतंकी हमले के लिए फंड मुहैया करा रहा था और इसकी साजिश पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने रची थी। दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए आतंकी जान मोहम्मद पर मुंबई पुलिस की भी नजर थी। पेशे से ड्राइवर शेख को 2001 में एक केस में गिरफ्तार भी किया गया था। उसके डी कंपनी से सीधे तार जुड़े थे।

180 अफगानी सैन्य अफसरों को भारत में रहने के लिए 6 महीने का वीजा, मिलती रहेगी ट्रेनिंग भी

अफगानिस्तान में तालिबानी शासन के बाद वहाँ अराजकता का माहौल है। इसका असर भारत में अलग-अलग मिलिट्री एकेडमी में ट्रेनिंग ले रहे 180 अफगानिस्तान मिलिट्री के जवानों और कैडेट्स पर भी पड़ा है। उनके समक्ष इस बात की चिंता है कि ट्रेनिंग पूरी होने के बाद वो कहाँ जाएँगे? उनकी इन्हीं मुश्किलों को देखते हुए भारत सरकार ने इन जवानों को ट्रेनिंग पूरी होने के बाद 6 महीने का ई वीजा देने का निर्णय लिया है। ताकि इस दौरान वो अपने भविष्य को लेकर निर्णय ले सकें।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस बीच भारत की विभिन्न मिलिट्री एकेडमी में प्रशिक्षण ले रहे 140 जवानों और कैडेट्स ने बेहतर भविष्य की तलाश में बड़ी संख्या में कनाडा, ब्रिटेन और जर्मनी समेत दूसरे देशों में वीजा के लिए अप्लाई किया है। वहीं कुछ जवानों ने भारत में अपना भविष्य तलाशने का निर्णय लिया है। फिलहाल इनकी ट्रेनिंग का सारा खर्च अफगानिस्तान में राष्ट्र निर्माण के प्रयासों के तहत भारत सरकार ही वहन कर रही है।

एएनआई को सरकारी सूत्रों ने बताया, “हमारी अकादमियों में प्रशिक्षण लेने वाले सभी अफगान कैडेटों और सैनिकों को छह महीने का ई-वीजा दिया जाएगा। उनके पास इस अवधि में अपने भविष्य के बारे में अपनी कार्रवाई के बारे में निर्णय लेने का विकल्प है।” सूत्रों का कहना है कि देश की प्रशिक्षण अकादमियों में ट्रेनिंग ले रहे इन सैनिकों को उन एजेंसियों के संपर्क में रखा गया है, जो पहले से ही देश में रह रहे अफगानों के साथ मिलकर काम कर रही हैं।

उल्लेखनीय है कि 180 अफगान बलों को ‘कैपेसिटी बिल्डिंग प्रोग्राम’ के तहत यह प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसी महीने इन सैनिकों को लेकर रक्षा राज्यमंत्री अजय भट्ट ने कहा था कि सरकार को हालात की जानकारी है। मंत्री के मुताबिक, अकादमियों में ट्रेनिंग ले रहे सैनिकों का प्रशिक्षण चलता रहेगा और इसके बारे में सरकार द्वारा निर्धारित नीतियों के तहत फैसले लिए जाएँगे।

केंद्रीय मंत्री ने कहा, “वे फिलहाल ट्रेनिंग ले रहे हैं। वे खुद चिंतित हैं। मैंने उनसे बातचीत नहीं की है, लेकिन इसको लेकर अधिकारियों को बताया है। हमें बताया गया है कि वे और उनके परिजन परेशान हैं। वे अच्छे लोग हैं। उन्हें ट्रेनिंग मिलेगी और सरकार की नीतियों के हिसाब से आगे देखेंगे।” जवानों और अधिकारियों को इंडियन मिलिट्री एकेडमी देहरादून, ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी चेन्नई और एनडीए खड़गवासला में ट्रेनिंग दी जा रही है।

रक्षा अधिकारियों ने कहा कि इन अधिकारियों और कैडेटों के प्रशिक्षण और अन्य खर्च भारत द्वारा 2001 के बाद अफगानिस्तान में राष्ट्र निर्माण के प्रयासों के तहत वहन किया जा रहा था। गौरतलब है कि तालिबान ने अगस्त में अफगानिस्तान का शासन अपने हाथ में ले लिया, जिसके बाद से वहाँ के हालात खराब हैं।

‘इस्लाम कबूलो तो जमीन मिलेगी’: IAS इफ्तिखारुद्दीन ने बनाया था धर्म परिवर्तन का दबाव, मुस्लिम बनाने के लिए ‘शुद्ध भक्ति’ भी लिखी

धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले वीडियो वायरल होने के बाद IAS इफ्तिखारुद्दीन चर्चा में हैं। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने मामले की SIT जाँच के आदेश देते हुए 7 दिन में रिपोर्ट तलब की है। इसके बाद कई ऐसे लोग सामने आए हैं जिनका दावा है कि आईएएस मोहम्मद इफ्तिखारुद्दीन ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए उन पर इस्लाम कबूलने का दबाव डाला था।

ये मामले तब के हैं जब इफ्तिखारुद्दीन कानपुर मंडल के आयुक्त हुआ करते थे। फिलहाल वे उत्तर प्रदेश परिवहन निगम के चेयरमैन हैं। जो वीडियो वायरल हुए हैं वे भी उसी वक्त के बताए जा रहे जब इफ्तिखारुद्दीन कानपुर में तैनात थे। रिपोर्ट के अनुसार कानपुर के कल्याणपुर में रहने वाले निर्मल कुमार ने दावा किया है कि तत्कालीन कमिश्नर इफ्तिखारुद्दीन और उनके आदमियों ने उनकी बस्ती के लोगों पर धर्म परिवर्तन का दबाव डाला था।

भ्रष्ट तंत्र विनाशक शनि मंदिर चलाने वाले रॉबी शर्मा और राजकीय उन्नयन बस्ती की रहने वाली सविता देवी ने भी इसी तरह के आरोप लगाए हैं। निर्मल कुमार के अनुसार पहले मेट्रो की डीपीआर में गलत तरीके से लोगों की जमीन शामिल की गई। इसके बाद जब पीड़ित इफ्तिखारुद्दीन के पास फरियाद लेकर पहुँचे तो उन्हें कथित तौर पर इस्लाम कबूलने पर जमीन वापस मिलने की बात कही।

सविता देवी ने आज तक को बताया, “हम लोग अपनी फरियाद लेकर कमिश्नर इफ्तखारुद्दीन के पास गए थे। हमारी फरियाद नहीं सुनी गई। हमसे धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बनने को कहा गया। मना करने पर हमें बाहर निकाल दिया गया।” इन मामलों के सामने आने के बाद बिठूर से बीजेपी विधायक अभिजीत सिंह सांगा ने कानपुर के उस दफ्तर को गंगाजल से पवित्र कराने और हवन करने की बात कही है, जहाँ अपनी तैनाती के दौरान इफ्तखारुद्दीन बैठते थे।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार उस समय इस बात को लेकर मोहम्मद इफ्तिखारुद्दीन का विरोध भी हुआ था, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। उल्लेखनीय है कि उस वक्त राज्य में सपा की सरकार थी। कथित तौर पर आईएएस इफ्तिखारुद्दीन ने ‘शुद्ध भक्ति’ के नाम से एक किताब भी लिख रखी है। कुरान की आयत वाली यह किताब इस्लाम का महिमामंडन करती है और लोगों को मुस्लिम बनने के लिए प्रेरित करने के मकसद से लिखी गई है। पीड़ितों के अनुसार उनकी बस्ती में भी यह किताब बाँटी गई थी।

गौरतलब है कि वायरल वीडियो IAS इफ्तिखारुद्दीन के आवास के बताए जा रहे हैं। इसमें एक व्यक्ति कुर्सी पर बैठ जमीन पर बैठे कुछ मुस्लिमों को सम्बोधित कर रहा है, जिसे IAS इफ्तिखारुद्दीन बताया गया है। वीडियो में एक मौलाना कहता है, “पूरे दुनिया के इंसानों को बताओ इस्लाम को आगे बढ़ाओ। अभी पिछले दिनों पंजाब के एक भाई ने इस्लाम कबूल किया तो मैंने उन्हें दावत नहीं दी थी। मैंने कहा कि इस्लाम कबूल करने की वजह क्या थी, तो उन्होंने कहा कि मेरी बहन की मौत। जब उसे जलाया तो वो कपड़े जल गए और वो निर्वस्त्र हो गई। फिर मुझे लगा मेरी बेटी भी है। कल को उसे भी लोग ऐसे ही देखेंगे। इसीलिए, मुझे इस्लाम से अच्छा कोई मजहब नहीं लगा और मैंने कबूल कर लिया।”

वह पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी की पुस्तक का भी जिक्र करता है। वो कहता है, “अल्लाह ने हमें उत्तर प्रदेश के रूप में एक ऐसा सेंटर दिया है, जहाँ से हम पूरे देश-दुनिया में काम कर सकते हैं। ऐलान करो दुनिया के इंसानों से कि अल्लाह की बादशाहत और निजामियत पूरी दुनिया में कायम करनी है। हर घर में अल्लाह का दीन दाखिल होना है, करना चाहिए।” एबीपी न्यूज का दावा है कि वायरल वीडियो का पूरा हिस्सा उसके पास है। इसमें IAS इफ्तिखारुद्दीन इस्लाम का महिमामंडन करते हुए धर्मपरिवर्तन के लिए उकसाते दिख रहे हैं।