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मुलायम सिंह बुलाते हैं ‘टीपू’ तो अखिलेश ‘अब्बा’ क्यों नहीं कह सकते: CM योगी के ‘अब्बा जान’ बयान पर सिद्धार्थनाथ सिंह

चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘अब्बा जान’ ने उफान ला दिया है। ‘अब्बा जान’ के प्रयोग से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दल समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच वाकयुद्ध छिड़ गया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक कार्यक्रम में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर तंज कसते हुए उनके पिता मुलायम सिंह यादव के लिए ‘अब्बा जान’ शब्द का इस्तेमाल किया था।

अखिलेश यादव द्वारा अब्बा शब्द पर आपत्ति जताने के बाद यूपी के कैबिनेट मंत्री सिद्घार्थनाथ सिंह ने सपा अध्यक्ष पर सवाल खड़े किए हैं। सिद्धार्थनाथ सिंह ने अखिलेश यादव से पूछा कि मुलायम सिंह यादव उन्हें ‘टीपू’ बुलाते हैं तो उन्हें अपने पिता के लिए ‘अब्बा’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति क्यों है?

यूपी के कैबिनेट मंत्री सिंह ने कहा, “उर्दू का एक मीठा और अच्छा शब्द है। अखिलेश यादव मुलायम सिंह जी को पिताजी तो बोलते नहीं होंगे। जब वह डैडी बोल सकते हैं, जो अंग्रेजी शब्द है तो उर्दू का शब्द अब्बा क्यों नहीं बोल सकते। अखिलेश यादव को बताना चाहिए कि उर्दू के शब्दों को लेकर उनके मन में इतनी नफरत क्यों आ गई है।”

दरअसल, एक निजी मीडिया चैनल के कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर के मुद्दे को लेकर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर तंज किया था। सीएम योगी ने कहा था, “उनके अब्बा जान तो कहा करते थे कि वहाँ (अयोध्या में) परिंदा भी पर नहीं मार सकता।”

मुख्यमंत्री योगी के इस बयान पर अखिलेश यादव ने आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था कि मुख्यमंत्री योगी को अपनी भाषा का संतुलन रखना चाहिए। अखिलेश ने कहा, “हमारा और उनका झगड़ा मुद्दों पर है। अगर वो मेरे पिता के बारे में कुछ कहते हैं तो मैं भी उनके पिता के बारे में बहुत कुछ कह दूँगा।” अखिलेश यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री को अपने पिता के बारे में सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए अथवा उन्हें अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए।

अखिलेश यादव के इस बयान पर उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने अखिलेश यादव से पूछा कि उन्हें उर्दू के शब्द अब्बा से इतनी नफरत क्यों है, इसे उन्हें बताना चाहिए।

विश्व के बेस्ट जेवलिन खिलाड़ी रहे उवे होन को कोच बनाया, 4 साल पहले ही मोदी सरकार ने कर दी थी व्यवस्था: सच हुई गुरु की भविष्यवाणी

टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympics) में ‘भाला फेंक (Javelin Throw)’ प्रतियोगिता में भारत ने नीरज चोपड़ा (Neeraj Chopra) ने स्वर्ण पदक (Gold Medal) अपने नाम किया। क्या आपको पता है कि इसके लिए उनकी तैयारी अभी नहीं, बल्कि कई वर्षों से चल रही थी। साथ ही केंद्रीय खेल मंत्रालय भी इसके लिए व्यवस्थाएँ कर रहा था। तभी जेवलिन थ्रो के महान खिलाड़ी उवे होन (Uwe Hohn) को उनका कोच नियुक्त किया गया था।

2018 में जकार्ता में हुए एशियन गेम्स में भी नीरज चोपड़ा ने स्वर्ण पदक जीता था। तब भी वो उवे होन के अंतर्गत ही प्रशिक्षित हो रहे थे। कभी 104.80 मीटर भाला फेंकने वाले उवे होन ऐसा करने वाले खिलाड़ी हैं। भाले की रिडिजाईनिंग के कारण ये एक ‘इटरनल वर्ल्ड रिकॉर्ड’ है। उवे होन ने 2018 में ही इसकी भविष्यवाणी कर दी थी कि ओलंपिक में नीरज चोपड़ा सोना लेकर स्वदेश लौटेंगे। नीरज चोपड़ा के करियर को धार देने में उनका बड़ा हाथ है।

2018 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान भी वो नीरज चोपड़ा के कोच थे। वहाँ भी नीरज चोपड़ा ने गोल्ड मेडल ही हासिल किया था। 2018 में कोच ने कहा था कि ओलंपिक में मेडल उनकी क्षमताओं से परे नहीं है और वो अभी ही दुनिया में ‘जेवलिन थ्रो’ के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी हैं। हरियाणा के पानीपत में जन्मे नीरज चोपड़ा ने टोक्यो में इतिहास रच कर अपने गुरु की बातों को सच्चा साबित कर दिया है।

खुद उवे होन का भी कभी ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का सपना था, लेकिन 1984 में लॉस एंजेल्स में हुए ओलंपिक खेलों का ईस्ट जर्मनी ने बहिष्कार कर दिया था। इससे वो उसमें हिस्सा नहीं ले पाए। लेकिन, वर्ल्ड कप और यूरोपियन चैंपियनशिप में उन्होंने ज़रूर सोना अपने नाम किया। 1999 से ही वो युवा खिलाड़ियों को तराश रहे हैं। चीन के नेशनल चैंपियन झाओ किंगगांग ने भी उन्हें ही अपना गुरु बनाया था।

मई 2017 में ही ‘एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (AFI)’ ने उवे होन का नाम भारत के जेवलिन कोच के रूप में सुझाया था और केंद्रीय खेल मंत्रालय के पास इसका प्रस्ताव भेजा था। उस समय विजय गोयल केंद्रीय खेल मंत्री थे। हालाँकि, 4 महीने बाद ही राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को ये जिम्मेदारी दे दी गई थी। ऑस्ट्रेलिया के गैरी कल्वर्ट के इस्तीफे के बाद ये पद खाली हुआ था। तब IAAF वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए नीरज चोपड़ा के साथ-साथ देविंदर सिंह ने भी क्वालीफाई किया था।

2018 के IAAF कप में नीरज चोपड़ा को अपने खेल में कुछ तकनीकी खामी नजर आई थी। उन्होंने पाया था कि उनके थ्रो जो आमतौर पर सीधे जाते हैं, वो बाईं तरफ जा रहे हैं और एक मौके पर तो सीमा से बाहर भी चले गए। कुहनी में चोट के कारण 2019 विश्व एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में वो हिस्सा नहीं ले पाए थे। ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने का ये अवसर उनके साथ से निकल गया था।

1 साल बाद वापसी करते हुए जनवरी 2020 में उन्होंने विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता, लेकिन फिर कोरोना महामारी आ गई। उन्होंने जैव-यांत्रिकी विशेषज्ञ क्लाउस बार्टोनिट्ज़ (Klaus Bartonietz) के अंतर्गत भी प्रशिक्षण लिया। 2021 में उन्होंने 88.07 मीटर के थ्रो के साथ अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा। तब उन्हें लगा कि वो ओलंपिक के लिए तैयार हैं। फिर लिस्बन मीट में भी उन्हें गोल्ड मेडल हासिल हुआ। अब टोक्यो ओलंपिक में उन्होंने झंडा गाड़ दिया है।

16 जून, 2021 को नीरज चोपड़ा ने एक ट्वीट कर के जानकारी दी थी, “जहाँ तक टोक्यो ओलंपिक के लिए मेरी तैयारियों का सवाल है, मेरी सारी ज़रूरतों का सर्वश्रेष्ठ तरीके से ख्याल रखा गया है। मैं फ़िलहाल यूरोप में प्रशिक्षण ले रहा हूँ। कठिन वीजा नियमों के बावजूद भारत सरकार और भारतीय दूतावास द्वारा किए गए प्रयासों के लिए मैं उनका आभारी हूँ।” इससे साफ़ है कि भारत सरकार नीरज चोपड़ा के करियर में उनका पूरा साथ दे रही थी।

राजस्थान में 16 साल की दलित लड़की के साथ तालीम और आमीन खान ने 3 बार किया गैंगरेप: अश्लील वीडियो शूट कर ब्लैकमेलिंग भी

राजस्थान के अलवर में नाबालिग लड़की से गैंगरेप किए जाने की खबर आई है। आरोप है कि तालीम ओर आमीन खान ने 3 बार छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया। ये घटना बड़ोदा मेव क्षेत्र के रौणपुर का बास गाँव की है। 16 वर्षीय दलित नाबालिग लड़की 10वीं कक्षा की छात्र है। तालीम और आमीन खान ने न सिर्फ उसके साथ गैंगरेप किया, बल्कि इस पूरी वारदात का अश्लील वीडियो भी शूट कर लिया।

ये दोनों बार-बार धमकी देते थे कि अगर किशोरी ने उनकी बात नहीं मानी तो वो इस आपत्तिजनक वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल कर देंगे। बड़ोदा मेव थाने में पीड़िता के पिता द्वारा दर्ज कराई गई FIR के अनुसार, इसी वीडियो के सहारे ब्लैकमेल कर के उनकी बेटी के साथ 3 बार गैंगरेप किया गया। पीड़िता अलवर के एक हॉस्टल में रह कर पढ़ाई करती है। आरोपित उसके गाँव के पड़ोसी ही हैं और पहले से ही दोस्ती के लिए दबाव बना रहे थे।

‘नवभारत टाइम्स’ की खबर के अनुसार, 2 फरवरी, 2021 को दोनों ने छात्रा का पीछा किया। घर से सरकारी स्कूल जाते समय रास्ते में घेर कर उस पर दोस्ती के लिए दबाव बनाया गया। जब वो इनकार करती रही तो पेय पदार्थ में नशा मिला कर उसे जबरन पिला दिया। इसके बाद बेहोशी की हालत में दोनों आरोपित पीड़िता को पास के एक खेत में लेकर गए। वहाँ उसका अश्लील वीडियो क्लिप शूट किया गया।

होश में आने पर धमकाया गया कि वो किसी से कुछ नहीं बताए। युवकों ने कहा कि अगर वीडियो वायरल हुआ तो तेरे ही घर वाले तुझे जान से मार डालेंगे। इसके बाद इसी वीडियो के सहारे उसका गैंगरेप करते रहे। साथ ही ब्लैकमेल कर के रुपए भी ऐंठ लिए। ‘ई-मित्र’ के जरिए उन्होंने बालिका से साढ़े 7 हजार रुपए निकलवा कर रख लिए। ब्लैकमेलिंग के डर से पीड़िता ने इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताया।

हालाँकि, घर की ही एक महिला को इसकी भनक लगी तो राज़ खुला। इसके बाद शनिवार (7 अगस्त, 2021) को पिता ने थाने में FIR दर्ज करवाई। पुलिस ने दो युवकों के साथ-साथ उनके दो अन्य साथियों इदु व विजेंद्र के खिलाफ मामला दर्ज कर के उनकी तलाश में दबिश देना शुरू कर दिया है। थानाधिकारी चंद्रशेखर ने मीडिया को बताया कि अनुसंधान शुरू है। विपक्ष ने इस मामले में लेकर राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार को घेरा है।

केरल के सरकारी विभाग से 1000 रुपए की धोती और शर्ट… ओलंपिक मेडल जीतने वाले पीआर श्रीजेश को

ओलंपिक के इतिहास में सबसे ज्यादा मेडल भारत को इसी साल मिला है। खिलाड़ियों की जम कर प्रशंसा भी हो रही है, उन्हें पैसे-पद-सम्मान से नवाजा भी जा रहा है। गोल्ड मेडल लाने वाले नीरज चोपड़ा पर तो पैसों की बरसात सी हो गई है, होनी भी चाहिए!

लेकिन यह खुशी सबको शायद पच नहीं रही है। कैसे, कहाँ हो रही खिलाड़ियों की अनदेखी?

चलिए, केरल चलते हैं। यहाँ के एक खिलाड़ी हैं – पीआर श्रीजेश। बड़ा नाम है, बड़ा कारनामा भी किया है। हॉकी में पिछले 41 साल के सूखे को समाप्त कर मेडल दिलाने में इनकी भूमिका सबसे अहम रही है – यह सर्वविदित है। अब अन्य राज्यों की भाँति केरल सरकार भी इनको सम्मानित करने से पीछे कैसे हटती? लेकिन कितना सम्मान दिया जाए, यह सवाल बड़ा है और केरल सरकार ने जो दिया, उससे राज्य का कद छोटा कर दिया।

केरल सरकार के हथकरघा विभाग ने शनिवार (7 अगस्त 2021) को भारतीय हॉकी के गोलकीपर पीआर श्रीजेश को अजीबोगरीब इनाम देने की घोषणा कर सबको चौंका दिया। मलयालम भाषा वाला वेबसाइट जन्मभूमि की रिपोर्ट के अनुसार, केरल के हथकरघा विभाग ने घोषणा (ध्यान से दोबारा भी पढ़िएगा) की:

पीआर श्रीजेश फील्ड हॉकी के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ियों में से एक और टोक्यो ओलंपिक में भारत की सफलता के पीछे के स्तंभ। ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के लिए प्रशंसा के रूप में लगभग 1000 रुपए की धोती और शर्ट दी जाने की घोषणा।

पीआर श्रीजेश और हॉकी में ओलंपिक मेडल

भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने कांस्य पदक के प्ले-ऑफ में जर्मनी को 5-4 से हराकर टोक्यो ओलंपिक के फील्ड हॉकी में ऐतिहासिक कांस्य पदक जीता। ऐसा करके भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने 41 साल में अपना पहला ओलंपिक पदक हासिल किया।

इस जीत में टीम के सबसे वरिष्ठ खिलाड़ी पीआर श्रीजेश ने न केवल जर्मनी के अग्रेसिव गोलों को बचाया बल्कि टीम में युवा खिलाड़ियों को भी प्रेरित किया। भारतीय हॉकी टीम की जीत के बाद पीआर श्रीजेश के प्रदर्शन और नेतृत्व के लिए उनकी सराहना लगभग सभी ने की।

कई राज्यों ने अपने-अपने राज्यों के हॉकी टीम के सदस्यों को पदक जीतने के लिए पुरस्कार भी घोषित किया। हालाँकि पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने अभी तक पीआर श्रीजेश के लिए किसी भी इनाम की घोषणा नहीं की है… इसके बजाय, केरल सरकार के हथकरघा विभाग ने उन्हें धोती और शर्ट देने का फैसला किया है। शायद उनके हिंदू संस्कृति और मंदिरों वाली फोटो केरल सरकार के हाथ लग गई होगी, शायद!

मिल्खा सिंह को हराने वाला खिलाड़ी जो गरीबी से तड़प कर मरा, इलाज बगैर खो दिए 2 बेटे: मेडल बेचने को मजबूर थी विधवा पत्नी

टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले नीरज चोपड़ा ने भारत के दिवंगत धावक मिल्खा सिंह को धरद्धजली दी है। उन्होंने अपने गोल्ड मेडल उन्हें समर्पित किया है। 18 जून, 2021 को 91 वर्ष की उम्र में भारत के ‘फ़्लाइंग सिख’ मिल्खा सिंह का निधन हो गया था। वो जब तक जीवित रहे, खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाते रहे और खेल को प्रोत्साहन देने के काम करते रहे। वो किसी पहचान के मोहताज नहीं। लेकिन, क्या आपको माखन सिंह याद हैं?

जी हाँ, धावक माखन सिंह। मिल्खा सिंह पर फिल्म भी बनी और उसने दुनिया भर में 200 करोड़ रुपयों से भी अधिक का कारोबार किया। इस भारतीय लीजेंड की गाथा घर-घर पहुँचनी भी चाहिए। लेकिन, माखन सिंह इस मामले में बड़े ही दुर्भाग्यशाली रहे। अगर भारत के ही एक एथलिट के पास मिल्खा सिंह को हराने का तमगा हासिल है, ये आपको पता नहीं होगा। माखन सिंह को सरकार ने भुला दिया, उनका जीवन गरीबी में गुजरा।

टोक्यो ओलंपिक में जब भारत ने 7 मेडल जीत कर अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है, आज हम माखन सिंह की बात कर रहे हैं। माखन सिंह की स्थिति ऐसी हो गई थी कि उन्हें ट्रक चलाना पड़ता था। रास्ते में पुलिस वाले घूस माँगते थे। इसके बदले माखन सिंह उन्हें एक तस्वीर दिखाते थे। तस्वीर में एक युवक राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन से ‘अर्जुन अवॉर्ड’ ले रहा होता है। ये युवक माखन सिंह ही थे।

माखन सिंह की स्थिति ऐसी थी कि पुलिस वाले भी इस तस्वीर को देख कर पहचान नहीं पाते थे कि अब इस तरह कमजोर दिख रहा ये व्यक्ति ही तस्वीर वाला ओजस्वी युवक है। जी हाँ, 1962 के एशियन गेम्स में स्वर्ण व रजत पदक जीतने वाले खिलाड़ी की 1999 आते-आते यही हालत हो गई थी। हवा की तरह भागने वाला व्यक्ति उसी भारत की आबोहवा में तड़प-तड़प कर मरा, जिसका प्रतिनिधित्व उसने देश-विदेश में किया था।

माखन सिंह को एक ट्रक ड्राइवर के रूप में काम करना पड़ा। स्टेशनरी की दुकान चलानी पड़ी। एक दुर्घटना में उनका एक पाँव चला गया, जिसके बाद आर्टिफीसियल लेग लगवाने पड़े थे। दर्द को मिटाने के लिए उन्हें अल्कोहल का सहारा लेना पड़ता था। रोते-रोते कहते थे कि इस ‘अर्जुन अवॉर्ड’ को मेरी आँखों के सामने से हटाओ। बारिश होने पर घर में पानी टपकता था। वो गरीब कम थे, गरीबी में जी ज्यादा रहे थे।

उपेक्षा की सीमा देखिए कि ‘अर्जुन अवॉर्ड’ विजेताओं को जो रेल पास मिलता है, उन्हें वो तक नहीं मिला। वो दिल्ली के रेलवे भवन में गए ज़रूर थे, लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटा दिया गया। वहाँ कर्मचारियों ने उनका मजाक बनाया। उनका कहना था कि एशियन गेम्स में सोना जीतने वाला इस तरह बैसाखी पर नहीं चलता है। उन्हें लगता था कि कोई भिखाड़ी है, जो किसी तरह यहाँ घुस आया है। उन्हें अपमानित किया जाता था।

इस समय से साढ़े 3 दशक पीछे जाएँ तो 1964 ही वो साल था, जब माखन सिंह ने कलकत्ता में हुए एक 400 मीटर की रेस में मिल्खा सिंह को 2 यार्ड्स से मात दी थी। जकार्ता में हुए 1962 के एशियन गेम्स में भी उनका मुकाबला मिल्खा सिंह से ही था। उस वक़्त ‘फ़्लाइंग सिख’ ने बाजी मारी थी। लेकिन, रिले में मिल्खा सिंह के साथ-साथ माखन को भी स्वर्ण पदक मिला। भारत के लिए दोहरी ख़ुशी। लेकिन, कुछ ही सालों बाद उनका बुरा दौर शुरू हो गया।

उनकी एक टाँग चली गई। वो अपने जीवनयापन के लिए एक गैस एजेंसी आउटलेट खोलना चाहते थे। लाख कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। पंजाब के एक सांसद तक से निवेदन किया, लेकिन उस नेता ने उनसे इसके लिए 5 लाख रुपए घूस माँगे। कई नेताओं से मिले, लेकिन निराशा हाथ लगी। 1 जुलाई, 1937 को पंजाब के होशियारपुर स्थित भथुल्ला गाँव में जन्मे माखन सिंह 1955 में भारतीय सेना में भी भर्ती हुए थे, जिसके बाद उन्होंने खेल की दुनिया में कदम रखा।

1959 में कटक में हुए नेशनल में कांस्य पदक उनकी पहली बड़ी जीत थी। इसके अगले ही साल दिल्ली में हुए राष्ट्रीय खेलों में उन्होंने शॉर्ट स्प्रिंट में स्वर्ण पदक और 300 मीटर की रेस में रजत पदक अपने नाम किया। मिल्खा सिंह ने एक इंटरव्यू में बताया था कि कोई एक व्यक्ति है जिससे वो ट्रैक पर डरते हैं, तो वो धावक माखन सिंह हैं। उन्होंने कहा था कि माखन सिंह एक उम्दा एथलिट थे, जिन्होंने उन्हें उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने को मजबूर करते थे।

मिल्खा सिंह ने माखन सिंह को पाकिस्तान के अब्दुल खालिक से भी ऊपर रेट किया था। एक टोक्यो ओलंपिक 1964 में भी हुआ था, जिसमें 4×100 व 4×400 रिले टीम का हिस्सा थे। 1972 में वो सेना में सूबेदार पद से रिटायर हुए और उसके बाद से ही उनके बुरे दिन शुरू हो गए। मुंबई, पुणे और नागपुर में उन्हें ट्रक चला कर समान की डिलीवरी का काम करना पड़ा। उनका कहना था कि ऐसी सफलता किस काम की जिसे लोग नहीं पहचानें, आपको खुद अपनी तारीफ़ करनी पड़े।

1974 में उन्होंने शादी की। उनकी तीन संतानें हुईं, लेकिन उनमें से दो इंद्रपाल और गुरविंदर बीमारी से चल बसे। इलाज के लिए रुपए नहीं थे। मेडिकल सपोर्ट के बिना उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। 1990 में दुर्घटना में उनका एक पाँव चला गया। सरकार ने इलाज के लिए कोई सुविधा नहीं दी, कोई मदद नहीं की। एक पड़ोसी से पैसे उधार लेकर आर्टिफीसियल लेग लगवाया। ट्रक चलाना अब दूभर था, इसीलिए दुकान खोल ली।

चब्बेवाल में स्थित उस दुकान को चलाने के लिए उन्हें रोज 3 किलोमीटर साइकिल से रास्ता तय करना होता था। 2002 में 65 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। कार्डियक अरेस्ट को उसकी मौत की वजह बताई गई। उनके परिवार की गरीबी की हालत ये थी कि वो उनके अवॉर्ड्स और पुराने स्पोर्ट्स ब्लेजर बेच कर किसी तरह अपना गुजरा चलाना चाहते थे। ऐसे समय में भाजपा की दिवंगत नेता सुषमा स्वराज आगे आईं।

सुषमा स्वराज ने अगस्त 2013 में यूपीए सरकार की आँखें खोलते हुए संसद में माखन सिंह के परिवार की बदहाली का मुद्दा उठाया। अगस्त 2013 में ‘भाग मिल्खा भाग’ देखने के बाद सुषमा स्वराज ने ट्विटर पर लिखा था कि किस तरह ये फिल्म युवाओं को प्रेरणा देती है और सफलता के पीछे किस तरह परिश्रम करना पड़ता है। लेकिन इसी समय ‘जी न्यूज’ पर माखन सिंह के परिवार की बदहाली की खबर दिखाई।

संसद में सुषमा स्वराज ने बताया कि किस तरह उनकी विधवा के पास खाने के लिए रोटी तक नहीं थी। वो मेडलों का ढेर लगा कर बैठी थीं कि कोई उन्हें खरीद कर कुछ रुपए दे जाए। सरदार माखन सिंह हमेशा बच्चों से कहते थे – कभी खिलाड़ी नहीं बनना। इसके बाद सरकार जागी और 7 लाख रुपए की सहायता परिवार को दी गई। उनके बेटे परमिंदर को डिस्ट्रिक्ट सैनिक वेलफेयर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिली, 7000 रुपए की मासिक तनख्वाह पर।

सुषमा स्वराज के हस्तक्षेप के बाद माखन सिंह के परिवार की सरकार ने की मदद

इसीलिए, आज जब अंजू बॉबी जॉर्ज जैसी खिलाड़ी कहती हैं कि मोदी सरकार के आने के बाद बदलाव हुआ है, तो हमें मानना चाहिए। ओलंपिक जीतने वाले खिलाड़ियों को सिर्फ मेडल लाने पर ही प्रोत्साहन के रूप में रुपए नहीं दिए जाते हैं, बल्कि उनकी तैयारी की शुरुआत से ही उनका साथ दिया जाता है। अभी ज़रूरत है कि जमीनी स्तर पर काम में और तेज़ी आए, ताकि गाँव-गाँव से बच्चे ओलंपिक में पहुँचें।

माखन सिंह के अलावा भारत का कोई भी धावक मिल्खा सिंह को हरा नहीं सका था। उनकी शादी के बाद भी उनके ससुराल वाले उन्हें एक ट्रक ड्राइवर ही समझते थे। एक मैगजीन में जब उन्होंने उनके बारे में एक लेख देखा, तो उनकी पत्नी से कहा कि वो इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताएँ। उनकी पत्नी ने मिल्खा सिंह के साथ रेस की एक तस्वीर देखी, जब जाकर यकीन हुआ। गाँव में लोगों को संशय होता था कि क्या वो सच में ‘अर्जुन अवॉर्ड’ से सम्मानित हैं।

NDTV की खबर, मुस्लिम की फोटो… धमकी और डिलीट: यहाँ झुकता है रोज हिन्दुओं को गाली देने वाला गिरोह

NDTV की एक खबर आई। सामान्य खबर, जो सारे मीडिया संस्थान प्रतिदिन कर रहे हैं। शुक्रवार (6 अगस्त, 2021) को आई उस खबर में बताया गया था कि भारत में पिछले 1 दिन के मुकाबले कोरोना के 4% ज्यादा मामले आए हैं। नए मामलों की संख्या 44,643 है। सामान्यतः हर खबर के साथ तस्वीर होती है, जो प्रतीकात्मक भी हो सकती है। इस खबर के साथ भी एक व्यक्ति की तस्वीर थी, जो कोरोना टेस्ट करा रहा था।

इस्लामी चरमपंथियों ने इसे मुस्लिमों को बदनाम करने की साजिश करार दिया और पूछा कि आखिर कोरोना की खबर में मुस्लिम व्यक्ति की तस्वीर क्यों लगाई गई? NDTV की ट्वीट पर सैकड़ों रिप्लाइज आए। धमकी पर धमकी मिली। इस हिसाब से देखें तो कोरोना की ख़बरों में अब तक ‘नॉन-मुस्लिमों’ की प्रतीकात्मक तस्वीर दिखाई जा रही थी लेकिन पिछले डेढ़ वर्ष में किसी जाति-मजहब ने हंगामा नहीं किया।

खुद को इस्लामी एक्टिविस्ट कहने वाले शरजील उस्मानी भी धमकी पर उतर आए। उन्होंने सीधा यही सवाल पूछा कि आखिर वो कौन सा अधिकारी है, जिसने NDTV में इस तरह की तस्वीर के प्रयोग करने का निर्णय लिया? साथ ही उसने NDTV के कर्मचारियों से कहा कि वो मैसेज भेज कर गुप्त रूप से बता सकते हैं कि किसने ऐसा किया है। अंततः NDTV को अपनी ट्वीट डिलीट ही करनी पड़ी।

उससे पहले NDTV की एडिटोरियल डायरेक्टर सोनिया सिंह ने आकर इस तस्वीर के प्रयोग करने के पक्ष में तर्क भी दिए। उन्होंने शरजील उस्मानी की धमकी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें इस तस्वीर में एक ‘भारतीय नागरिक’ कोरोना टेस्ट कराते हुए दिख रहा है। साथ ही सलाह दी कि शरजील उस्मानी NDTV की टीम को अपने एजेंडे के लिए धमकाना बंद करे। लेकिन, मीडिया संस्थान के पास ट्वीट डिलीट करने के अलावा कोई चारा न बचा।

एक बार नाम पता चल जाए, उसके बाद इस्लामी कट्टरवादी या आतंकी क्या करते हैं – ये छिपा नहीं है किसी से। जब फ़्रांस जैसे देश में ‘शार्ली हेब्दो’ नामक पत्रिका के दफ्तर पर हमला कर के कर्मचारियों को मौत के घाट उतारा जा सकता है तो फिर भारत में ये लोग क्या कर सकते हैं, सोच लीजिए। यहाँ NDTV को अपनी ट्वीट डिलीट करनी पड़ी क्योंकि उसे पता है कि उसके कर्मचारियों के साथ क्या किया जा सकता है।

कई मीडिया संस्थान शायद इसीलिए मौलानाओं द्वारा किए गए अपराधों में भी पुजारियों व साधु-संतों की प्रतीकात्मक तस्वीर डाल देते हैं, फकीरों को तांत्रिक बताते हैं, क्योंकि हिन्दू सहिष्णु हैं। अपना अपमान होते हुए देख कर भी हिन्दू सिर्फ विरोध भर ही करते हैं। सहिष्णु हिन्दुओं के विरोध पर ‘कड़ा जवाब’ देकर लिबरल गिरोह के पत्रकार खुद को ‘शेर’ दिखाते हैं। लेकिन, इस्लामी चरमपंथियों के आगे इनके पास ‘भीगी बिल्ली’ बनने के अलावा कोई चारा नहीं रहता।

क्या आप जानते हैं कि धमकी न देने की सलाह पर शरजील उस्मानी ने क्या जवाब दिया सोनिया सिंह को? उसने कहा कि ‘इस्लामोफोबिया’ से ग्रसित लोगों को डराने की कोई ज़रूरत ही नहीं है क्योंकि वो ‘हम लोगों’ के अस्तित्व में होने भर से ही आतंकित हैं। ये रौब है इन इस्लामी कट्टरपंथियों का। सिर्फ एक तस्वीर पर आपत्ति की और भारत के सबसे बड़े व पुराने मीडिया संस्थानों में से एक को पीछे हटना पड़ा।

वो भी एक ऐसा मीडिया संस्थान, जो उनका ‘अपना’ है। जिसकी ख़बरें उनके ही एजेंडे को ध्यान में रख कर तैयार की जाती हैं। कोरोना टेस्ट कराना तो अच्छी बात है, लेकिन इन्होंने आपत्ति जता दी तो फिर कोई उपाय नहीं। सहिष्णु हिन्दुओं को बात-बात पर गाली देने वाले पत्रकारों को भी झुकना पड़ता है एक ‘इस्लामी एक्टिविस्ट’ के सामने। रोज हिंदुत्व को बदनाम कर के भी ये सुरक्षित हैं, लेकिन एक प्रतीकात्मक तस्वीर में किसी ने ‘मुस्लिम’ ढूँढ लिया तो इनकी शामत आ जाती है।

वैसे ‘डर’ ज़रूरी भी है क्योंकि शरजील इमाम एक ‘एक्टिविस्ट’ भर ही तो है, उमर खालिद एक ‘छात्र नेता’ ही तो था और ताहिर हुसैन एक ‘जनप्रतिनिधि’ ही तो था। इन तीनों ने दिल्ली दंगों में दर्जनों हिन्दुओं का खून बहाने के आरोपित हैं। इस दंगे में अधिकतर ‘एक्टिविस्ट्स’ के नाम ही तो आए। शाहीन बाग़ वाले भी ‘एक्टिविस्ट्स’ ही थे। शरजील उस्मानी भी वही है। ये ‘एक्टिविस्ट्स’ क्या कर सकते हैं, समझा जा सकता है।

आदि विनायक मंदिर: हाथी वाले नहीं बल्कि मानवमुख वाले गणेश जी हैं विराजमान, श्री राम से है जुड़ा इतिहास

भारत के मंदिर ही यहाँ की पहचान हैं। देश के कोने-कोने में स्थित कई ऐसे मंदिर हैं जो चमत्कारिक हैं, अद्भुत हैं और अपनी अद्वितीय पहचान के लिए जाने जाते हैं। ऐसा ही एक मंदिर तमिलनाडु राज्य में स्थित है, जहाँ भगवान गणेश के गजमुख (हाथी के सूँड़ वाले) स्वरूप की नहीं बल्कि मानवमुख स्वरूप की पूजा होती है। यह प्राचीन मंदिर भगवान श्री राम से सम्बंधित है और यहाँ दर्शन करने से ही पितरों को मुक्ति मिलती है।

तमिलनाडु के तिरुवरुर जिले में कुटनूर से लगभग 3 किमी दूर तिलतर्पणपुरी है। यहाँ स्थित है भगवान गणेश का आदि विनायक मंदिर, जो भारत ही नहीं अपितु संभवतः पूरी दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहाँ भगवान गणेश के मानवमुख स्वरूप की उपासना की जाती है अर्थात मंदिर में स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा का सिर हाथी का नहीं अपितु मनुष्य का है।

मंदिर का इतिहास

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम जब अपने पिता की मृत्यु के बाद पिंडदान कर रहे थे, तब उनके द्वारा बनाए गए चावल के पिंड कीड़ों में बदल जा रहे थे। श्री राम ने जितनी बार चावल के पिंड बनाए, उतनी बार वो कीड़ों में बदल जाते। अंततः उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की, तब महादेव ने उन्हें आदि विनायक मंदिर जाकर विधि-विधान से पूजा करने के लिए कहा। इसके बाद भगवान राम आदि विनायक मंदिर आए और महाराजा दशरथ के लिए पूजा की। उनके द्वारा बनाए गए चावल के चार पिंड बाद में शिवलिंग के रूप में बदल गए, जो आदि विनायक मंदिर के पास स्थित मुक्तेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित हैं।

भगवान राम के द्वारा इस मंदिर में महाराजा दशरथ और अपने पूर्वजों के लिए किए गए पिंडदान के बाद से यहाँ देश के कोने-कोने से लोग अपने पूर्वजों की शांति के लिए आते हैं। तिलतर्पणपुरी भी दो शब्दों से मिलकर बना है, तिलतर्पण अर्थात पूर्वजों के तर्पण से सम्बंधित और पुरी का अर्थ है नगर। इस प्रकार इस स्थान को पूर्वजों के मोक्ष और मुक्ति का नगर कहा जाता है। पितरों की शांति के लिए पिंडदान नदी के किनारे किया जाता है लेकिन धार्मिक अनुष्ठान मंदिर के अंदर ही होते हैं।

यहाँ मंदिर में गणेश जी के साथ माता सरस्वती का भी मंदिर स्थापित है। प्राचीन कवि ओट्टकुठार ने देवी के इस मंदिर की स्थापना की थी। भगवान गणेश के दर्शन करने के लिए आने वाले श्रद्धालु माता सरस्वती का भी दर्शन अवश्य करते हैं। साथ ही यहाँ मुक्तेश्वर महादेव का मंदिर है, जहाँ वही चार शिवलिंग स्थापित हैं, जिनका वर्णन पहले किया जा चुका है।

कैसे पहुँचें?

तिरुवरुर शहर मुख्यालय से आदि विनायक मंदिर की दूरी लगभग 22 किलोमीटर (किमी) है। यहाँ का नजदीकी हवाईअड्डा तिरुचिरापल्ली में स्थित है, जो लगभग 110 किमी दूर है। इसके अलावा चेन्नई हवाईअड्डे से इस स्थान की दूरी लगभग 318 किमी है।

तिरुवरुर रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग 23 किमी की दूरी पर है। तंजावुर के माध्यम से यहाँ से तमिलनाडु के लगभग सभी शहरों के लिए रेल सुविधा उपलब्ध है। सड़क मार्ग से भी यहाँ पहुँचना आसान है क्योंकि यह तमिलनाडु के सभी बड़े शहरों से सड़क मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है।

‘अब PM और मंत्रालय का मिलता है साथ’: पूर्व एथलीट अंजू बॉबी जॉर्ज ने मोदी सरकार Vs पहले की सरकार का बताया राज

टोक्यो ओलंपिक में भारत का प्रदर्शन शानदार रहा है। न सिर्फ हमारे 127 खिलाड़ियों ने इस बार टूर्नामेंट में हिस्सा लिया, बल्कि 7 मेडल जीत कर भारत ने पिछले रिकॉर्ड तोड़ डाले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुद हर एक खिलाड़ी के प्रदर्शन पर नजर थी और कभी हमने उन्हें सेमीफाइनल में हार के बाद भारतीय महिला हॉकी टीम को सांत्वना देते देखा तो कभी स्वर्ण पदक जीतने पर नीरज चोपड़ा को बधाई देते। पूर्व एथलिट अंजू बॉबी जॉर्ज ने भारत के खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर अपनी बात रखी है।

अंजू बॉबी जॉर्ज ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि आज पहली बार ऐसा हो रहा है जब केंद्र सरकार इस तरह से खिलाड़ियों को प्रोत्साहित कर रही है, वरना उनके समय में तो वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी मेडल जीतने पर देश तो सेलिब्रेट करता था लेकिन खेल मंत्रालय ऐसा दिखाता था जैसे ये कोई बड़ी बात नहीं। उन्होंने कहा कि अब प्रधानमंत्री खुद टूर्नामेंट से पहले खिलाड़ियों से एक-एक कर बात करते हैं और उन्हें प्रोत्साहित करते हैं।

‘अर्जुन अवॉर्ड’, ‘मेजर ध्यानचंद खेल रत्न अवॉर्ड’, ‘पद्म श्री’ और ‘BBC लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ से सम्मानित अंजू बॉबी जॉर्ज आज भारतीय स्पोर्ट्स को लेकर सरकार के रुख में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार में खेल मंत्री खुद खिलाड़ियों पर ध्यान देते हैं। उन्होंने बताया कि मोदी सरकार में खेल मंत्री रहे किरण रिजिजू खुद खेल के क्षेत्र से थे और जब भी ज़रूरत होती थी, वो उपस्थित रहते थे।

उन्होंने बताया कि नए खेल मंत्री अनुराग ठाकुर भी खिलाड़ियों की ज़रूरतों को समझते हैं। 2003 में पेरिस में हुए एथलेटिक्स के वर्ल्ड चैंपियनशिप में लॉन्ग जम्प में कांस्य पदक जीतने वाली अंजू बॉबी जॉर्ज ने कहा कि ऐसा नहीं है कि आज की सरकार सिर्फ मेडल जीतने पर ही खिलाड़ियों को प्रोत्साहित कर रही है, बल्कि वो शुरुआत से उनके साथ हैं। उनकी तैयारी के दौरान भी उनकी मदद की जाती है।

अंजू बॉबी जॉर्ज ने 31 जुलाई, 2021 को टोक्यो ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर की थी बात

उन्होंने बताया कि किस तरह खिलाड़ियों को सरकार और खेल मंत्रालय से उम्मीद होती है कि वो उनका साथ दें। उन्होंने कहा कि इसके परिणाम देखने को भी मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि जमीनी स्तर पर भी योजनाएँ बन रही हैं और अभी से 2028 और 2032 के ओलंपिक की तैयारी हो रही है। बकौल अंजू बॉबी जॉर्ज, इस तरह का समर्थन मिलता रहा तो भारत का प्रदर्शन और शानदार होता जाएगा।

कैसे व्यवस्था बदली है, इस पर ‘सोनी स्पोर्ट्स इंडिया’ से बात करते हुए अंजू बॉबी जॉर्ज ने कहा कि जब सिस्टम में स्पोर्ट्समेन को पद दिया जाता है तो वो जानते हैं कि कैसे बदलाव लाया जा सकता है। जैसे, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने खेल मंत्री रहते कई योजनाएँ लागू की। उन्होंने कहा कि खेल संघों व प्रशासन में और खिलाड़ियों की ज़रूरत है, ऐसा अमेरिका जैसे देशों में भी हो रहा। अंजू बॉबी जॉर्ज खुद ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम’ की अध्यक्ष हैं।

पीएम मोदी का समर्थन करने पर नीरज चोपड़ा में वामपंथियों ने खोजा ‘संघी’ चेहरा: बधाई तो दूर, उड़ा रहे स्वर्ण पदक विजेता का मजाक

भाला फेंक स्पर्धा में नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक में देश को पहला स्वर्ण पदक दिलाकर इतिहास रच दिया है। इस पदक का विशेष महत्व है, क्योंकि नीरज ने 100 से अधिक वर्षों में पहली बार ट्रैक एंड फील्ड में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया है। किसी भारतीय ने एथलेटिक्स में आखिरी पदक 1920 में जीता था। टोक्यो ओलंपिक में चोपड़ा के शानदार प्रदर्शन और स्वर्ण पदक जीतने का जश्न पूरा देश मना रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों, खासकर स्वर्ण पदक विजेता के गृह राज्य हरियाणा में खुशी का माहौल है। लोग जश्न में डूबे हुए हैं। सोशल मीडिया पर लोगों ने नीरज चोपड़ा को जीत की बधाई दी और देश के लिए स्वर्ण पदक लाने के लिए आभार व्यक्त किया।

इसी बीच खुद को वामपंथी बताने वाले बहुत से लोग चोपड़ा को बधाई देने और उनकी जीत का जश्न मनाने से कतरा रहे हैं। इसका कारण चोपड़ा के पुराने ट्वीट्स हैं, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर विरोधियों ने उन्हें पीएम का समर्थन करते हुए देखा था। ये ट्वीट्स वायरल हो गए हैं।

साल 2019 के आम चुनाव में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता पर दोबारा काबिज होने पर नीरज चोपड़ा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई देते हुए एक ट्वीट किया था। उन्होंने लिखा था, ”इस ऐतिहासिक जीत के लिए हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मेरी तरफ से हार्दिक बधाई। आपके नेतृत्व में हमारा देश नई ऊँचाइयों को छुए।”

चोपड़ा के टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के बाद उनके पुराने ट्वीट सोशल मीडिया वायरल हो रहे हैं। इन ट्वीट्स को व्यापक रूप से साझा किया जा रहा है। उनके ट्वीट्स में से एक लोकसभा चुनाव 2019 में प्रचंड बहुमत हासिल करने वाले पीएम मोदी के लिए उनका बधाई संदेश था। यह भारत में वामपंथी ‘लिबरल’ को रास नहीं आ रहा है। यही कारण ​है कि वह ओलंपिक में स्वर्ण पदक दिलाने वाले नीरज चोपड़ा से खार खाए बैठे हैं।

नीरज चोपड़ा के स्वर्ण पदक जीतने के बाद लिबरल लोगों में छाई शोक की लहर

पत्रकार रोहिणी सिंह को शायद यह बुरा लगा कि नीरज चोपड़ा पीएम मोदी के समर्थक हैं।

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एक अन्य ट्विटर यूजर ने कहा कि भारतीय पुरुषों, विशेष रूप से नीरज चोपड़ा जैसे संघी पुरुषों का जश्न मनाना शर्मनाक है।

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इसी तरह अन्य लोग भी थे, जो इस बात से नाराज़ थे कि एक ‘संघी’ ने ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता है।

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कई और लोगों ने भी ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता को तिरस्कृत किया, क्योंकि वह ऑस्ट्रेलिया में गिरफ्तार किए गए एक हिंदू के लिए खड़े थे।

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बता दें कि नीरज चोपड़ा ने शनिवार (7 अगस्त) को टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। जैवलिन थ्रो (भाला फेंक) में इससे पहले किसी भारतीय खिलाड़ी को ओलंपिक का मेडल नहीं मिला था। नीरज चोपड़ा के गोल्ड मेडल की जीत के साथ ही भारत ने टोक्यो ओलंपिक में अपने मेडल टैली में पहली गोल्ड हासिल कर ली है।

11 साल के बच्चे ने 7000 के भाले से की शुरुआत: ‘सूबेदार’ नीरज चोपड़ा का टोक्यो तक का सफर, एथलेटिक्स में पहला मेडल

जब आप नीरज चोपड़ा की ट्विटर प्रोफाइल पर जाएँगे तो आपकी नजर सबसे पहले उनके पिन किए गए ट्वीट (pinned tweet) पर पड़ेगी। इस ट्वीट में नीरज ने लिखा है, “जब सफलता की ख्वाहिश आपको सोने न दे, जब मेहनत के अलावा और कुछ अच्छा न लगे, जब लगातार काम करने के बाद थकावट न हो तो समझ लेना कि सफलता का नया इतिहास रचने वाला है।” इस ट्वीट को देखने के बाद किसी को भी यह आश्चर्य नहीं होगा कि नीरज चोपड़ा ने वाकई भारत के लिए टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया और ऐसा कारनामा करने वाले वो भारत के पहले ट्रैक एंड फील्ड इवेंट्स (एथलेटिक्स) के खिलाड़ी हैं।

हरियाणा के पानीपत जिले के खांद्रा गाँव में 24 दिसंबर 1997 को पैदा हुए नीरज चोपड़ा बचपन में भारी-भरकम शरीर वाले बच्चे थे लेकिन हरियाणा का एक परिवार, जहाँ अपने बच्चों को चुस्त-दुरुस्त और तंदरुस्त रखने का रिवाज है, भला अपने बच्चे को मोटापे का शिकार होते कैसे देख सकता था? फिर क्या था? पिता और चाचा नीरज को पानीपत के शिवजी स्टेडियम ले गए जहाँ उन्हें खेल खेलने के लिए कहा गया। हालाँकि वजन अधिक होने के कारण न तो नीरज दौड़ पा रहे थे और न ही लंबी कूद या ऊँची कूद जैसे खेल खेल पा रहे थे।

लेकिन कहते हैं न कि जीवन में एक दिन ऐसा जरूर आता है जब इंसान का जीवन बदलने वाला होता है। स्टेडियम में सीनियर खिलाडियों को भाला फेंकते हुए देखकर उन्होंने भी भाला उठाया और फेंक दिया। 11 साल की उम्र के लड़के ने जब पहली ही बार में 25 मीटर से भी दूर भाला फेंक दिया तो किसी को भी समझते देर नहीं लगी कि नीरज इसी खेल के लिए बना है। लेकिन तब यह भी शायद ही किसी ने सोचा होगा कि 25 मीटर तक भाला फेंकने वाला यह छोटा सा बच्चा एक दिन ओलंपिक जैसे मंच पर देश का नाम रोशन करेगा।

कहते हैं न कि सफलता मुश्किलों को पार करके ही मिलती है। नीरज के जीवन के शुरूआती दौर में मुश्किल के तौर पर सामने आईं कमजोर आर्थिक परिस्थितियाँ 17 लोगों के संयुक्त एवं किसान परिवार में रहने वाले नीरज को 7,000 रुपए के भाले से ही संतोष करना पड़ा। हालाँकि जैवलिन थ्रो के एक भाले की कीमत लगभग एक से डेढ़ लाख होती है जो नीरज के परिवार के लिए बहुत थी। लेकिन नीरज ने कभी इस मुश्किल को अपने रास्ते नहीं आने दिया। उसी भाले से उन्होंने अभ्यास शुरू किया और इस खेल में उनका ऐसा मन लगा कि रोजाना 7-8 घंटे का अभ्यास उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। न्यूज 18 की रिपोर्ट में बताया गया है कि नीरज ने जैवलिन थ्रो की ट्रेनिंग लेने के लिए यूट्यूब का भी सहारा लिया।

साल 2013 में यूक्रेन में हुई वर्ल्ड यूथ चैंपियनशिप और 2 साल बाद चीन के वुहान शहर में हुई एशियन चैंपियनशिप में नीरज का प्रदर्शन औसत रहा और वह दोनों प्रतियोगिताओं में क्रमशः 19वें और 9वें स्थान पर रहे। लेकिन बचपन से लड़ने के दमखम रखने वाला नीरज हार कैसे मान लेते। मेहनत दोगुनी की और उसके बाद फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद 2016 में हुए साउथ एशियन गेम्स और वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप, 2017 के कॉमनवेल्थ गेम्स और 2018 के एशियन गेम्स में नीरज ने लगातार अपने ही रिकॉर्ड तोड़ डाले और गोल्ड मेडल से कम कुछ भी स्वीकार ही नहीं किया। नीरज ने 2016 में पोलैंड में हुए IAAF वर्ल्ड U-20 चैम्पियनशिप में 86.48 मीटर दूर भाला फेंककर गोल्ड जीता। इसके बाद उन्हें भारतीय सेना में पदस्थ किया गया और नीरज बन गए सूबेदार नीरज चोपड़ा

आज नीरज के सिर्फ परिवार को ही नहीं बल्कि पूरे भारत देश को उन पर गर्व है लेकिन उनके साथ उनके परिवार ने जो योगदान दिया, वह भी अतुलनीय है। शनिवार (07 अगस्त 2021) को जब हजारों मील दूर नीरज देश के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे थे तब यहाँ उनके गाँव में उनका पूरा परिवार साथ बैठकर उनका मुकाबला देख रहा था। दादा धर्म सिंह ने कहा कि उनके पोते ने देश के लिए मेडल जीतकर देश का और उनका नाम रोशन कर दिया। नीरज के चाचा भीम चोपड़ा को अपने भतीजे पर इतना भरोसा था कि उन्होंने पहले ही कह दिया था, “गोल्ड मेडल तो म्हारे छोरे का ही है।”

टोक्यो ओलंपिक में मिला मेडल, ट्रैक एंड फील्ड इवेंट्स यानी एथलेटिक्स में भारत का पहला मेडल है, जो कोई 10 या 20 साल बाद नहीं बल्कि 121 साल बाद मिला क्योंकि साल 1900 में ब्रिटिश इंडिया की ओर से खेलते हुए नॉर्मन प्रिटचार्ड ने एथलेटिक्स में गोल्ड जीता था लेकिन वह एक अंग्रेज थे, भारतीय नहीं। ऐसे में यह कहा जाना चाहिए कि नीरज द्वारा जीता गया मेडल ओलंपिक खेलों के इतिहास का एथलेटिक्स का पहला मेडल है। नीरज ने 13 साल बाद भारत को गोल्ड मेडल दिलाया है। इसके पहले साल 2008 में बीजिंग में हुए ओलंपिक में भारतीय निशानेबाज अभिनव बिंद्रा गोल्ड मेडल जीतने में सफल रहे थे।

ओलंपिक तक पहुँचने के पहले नीरज कई बार चोटिल हुए। चीन के वुहान शहर से निकले वायरस से वो खुद भी संक्रमित हुए लेकिन जैसा उन्होंने अपनी ट्वीट में लिखा, “जब लगातार काम करने के बाद थकावट न हो तो समझ लेना कि सफलता का नया इतिहास रचने वाला है” और आखिरकार अपने ट्वीट को सही साबित करते हुए नीरज चोपड़ा ने इतिहास रच ही दिया।