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नन और पादरी को भी देना होगा टैक्स, आर्टिकल-25 धर्म के आधार पर टैक्स में नहीं देता कोई छूट: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि अनुच्छेद-25 धर्म के आधार पर टैक्स में कोई छूट प्रदान नहीं करता है। कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए आगे कहा कि नन और पादरी के वेतन में टीडीएस की कटौती होगी। रिपोर्ट्स के अनुसार, जस्टिस एसवी भट्टी और जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि इस तरह की टैक्स कटौती संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करती है।

इसके साथ ही खंडपीठ ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि नन और पादरी अपने वेतन का इस्तेमाल नहीं करते हैं, बल्कि इसे अपनी धार्मिक मंडली को दे देते हैं। उन्होंने कहा कि यदि आय आयकर अधिनियम के तहत वेतन के रूप में आती है, तो इस पर टीडीएस कटौती की अनुमति है।

बाइबिल के कोट, “Render unto Caesar the things that are Caesar’s and unto God the things that are God’s” का हवाला देते हुए केरल हाईकोर्ट की बेंच ने कई पादरी और नन की दलीलों को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने टैक्स देने का विरोध किया था। अदालत ने कहा कि सरकारी और सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में काम करने के दौरान मिलने वाले वेतन पर टैक्स कटौती की अनुमति है। साथ ही उन्होंने कहा, “अनुच्छेद-25 धर्म के आधार पर टैक्स में कोई छूट प्रदान नहीं करता है।”

दरअसल, साल 1944 से सरकारी व सहायता प्राप्त संस्थानों द्वारा नन और पादरी को दिया जाने वाला वेतन टीडीएस यानी टैक्स कटौती के अन्तर्गत नहीं आता था। हालाँकि, इसे 2014 में संशोधित किया, जब आयकर अधिकारियों ने जिला कोषागार अधिकारियों (District Treasury Officers) को निर्देश दिया है कि सरकारी संस्थानों से वेतन प्राप्त करने वाले धार्मिक कर्मचारी भी टीडीएस के दायरे में आएँगे। इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने टीडीएस में छूट का दावा करने के लिए 1944 में और साथ ही 1977 में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (Central Board of Direct Taxes) द्वारा जारी परिपत्रों का हवाला दिया।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि नन और पादरी कोई आय या संपत्ति रखने का हकदार नहीं हैं। उनकी सभी संपत्तियाँ, वेतन और पेंशन धार्मिक मण्डली को दे दी जाती है। उन्होंने कैनन कानून का भी हवाला दिया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि कैनन कानून के अनुसार एक बार शपथ लेने के बाद नन या पादरी इसके तहत नागरिक नहीं माने जाते हैं। इस पर अदालत ने कहा कि कैनन कानून किसी भी परिस्थिति में आयकर अधिनियम पर हावी नहीं हो सकता है।

…न भाला है, यह गेहुअन करइत काला है: लंबे-नुकीले ‘मैस्कुलिन पैट्रिआर्कि’ पर यूँ बिफरा लिबरल गिरोह विशेष

टोक्यो ओलंपिक में नीरज चोपड़ा ने 87.58 मीटर दूर भाला क्या फेंका, इसका घाव भारत में बैठे लिबरल गिरोह के कुछ लोगों को महसूस हुआ। अब ये भाला कहाँ जाकर लगा है, ये तो देखने वाली बात होगी। लेकिन हाँ, कुछ सेक्युलर ब्रिगेड के पत्रकारों की टिप्पणियाँ ज़रूर हमारे पास आ गई हैं, जिन्हें हम आपके साथ साझा करना चाहेंगे। उससे पहले श्याम नारायण पांडेय की ये पंक्तियाँ देखिए, जो हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के भाले के बारे में बताता है:

क्षण देर न की तन कर मारा,
अरि कहने लगा न भाला है,
यह गेहुअन करइत काला है,
या महाकाल मतवाला है

हम सबसे पहले पहुँचे रवीश कुमार के पास, जो अपने घर में रखी हर नुकीली चीज को काले रंग से पेंट कर रहे थे। उन्होंने नीरज चोपड़ा के टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने की बात पर पूछा कि इससे राकेश टिकैत और योगेंद्र यादव जैसे ‘किसानों’ को क्या फायदा होगा? फिर उन्होंने भाला फेंकने को एक हिंसक गेम बताते हुए कहा कि अगर भाला किसी को लग जाता तो? उन्होंने इसे खतरनाक खेल करार दिया।

रवीश ने कहा, “जब मोदी सरकार किसी व्यक्ति को ओलंपिक में भाला फेंकने की अनुमति दे सकती है तो किसानों को क्यों नहीं भाला फेंकने दिया जा रहा? कहीं भाला दिखा कर ये सरकार हमें डरा तो नहीं रही? वो भाला ज़रूर अंबानी-अडानी की कंपनियों ने बनाया होगा। भाले की जाँच होनी चाहिए। नीरज चोपड़ा ‘राजपूताना राइफल्स’ से हैं। ये जातिवाद है। कश्मीर के बच्चे जब पत्थर फेंकते हैं तो सरकार उन्हें पीटती है, यहाँ भाला फेंकने पर जश्न क्यों मनाया जा रहा?”

लौटते समय रास्ते में हमें अजीत अंजुम भी मिल गए, जिन्होंने गोल्ड मेडल की बात सुनते ही सोना के महँगा होने पर आपत्ति जताई। हमने जब उन्हें बताया कि सोने के दाम तो कई दशकों से बढ़ रहे हैं तो वो खिसिया गए। उन्होंने कहा कि पूरे देश के लोग बेवकूफ हैं, जो पेगासस को छोड़ कर सोने का जश्न मना रहे हैं। फिर वो कुछ बुदबुदाते हुए अपनी एसी कार में बैठ कर निकल लिए। जाते-जाते कह गए कि गोल्ड मेडल तो सिर्फ ‘जी न्यूज’ पर आया है, देश में नहीं।

सरदर्द की दवा खा कर जब हम आगे बढ़े तो हमारा सामना सागरिका घोष. आरफा खानुम शेरवानी और बरखा दत्त जैसे पत्रकारों से हुआ, जो ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ का पोस्टर लगा कर मार्च निकाल रही थीं। उन्होंने अपने संयुक्त बयान में हमें बताया, “भाला लंबा और नुकीला होता है, इसीलिए ये ब्रह्मिनिकल पैट्रिआर्कि की निशानी है। भाला मैस्कुलिन है, क्या इसे हम भाली नहीं कह सकते? हिंदी में सोना शब्द ही पुल्लिंग है। इससे हमें दिक्कत है।”

‘बेरोजगार’ पुण्य प्रसून बाजपेयी और अभिसार शर्मा हमें एक साथ ही मिल गए, जो जंगलों की ख़ाक छान रहे थे। अभिसार शर्मा ने कहा कि पुलिस आए दिन प्रदर्शनकारियों पर भाले चटकाती है, अब इसे ओलंपिक में ले जाया गया है। हमने जब उन्हें बताया कि धान और गेहूँ की तरह भाला और लाठी अलग-अलग चीजें हैं, तो वो चौंक गए। वहीं बाजपेयी ने कहा कि वो महीने के अंत में पेमेंट आने के बाद ही इस पर टिप्पणी करेंगे। पेमेंट कहाँ से आए, इस पर उन्होंने कुछ बताने से इनकार कर दिया।

फिर हम राजदीप सरदेसाई के पास पहुँचे, जहाँ वो अपने अगले न्यूज़ शो की तैयारी में लगे थे। कोलकाता से आए स्पेशल रसगुल्ले खाते हुए राजदीप से हमने पूछा कि क्या वो नीरज चोपड़ा को बधाई नहीं देंगे? उन्होंने अपने कर्मचारियों को ये पता करने को कहा कि कहीं नीरज चोपड़ा को बधाई देने से ममता बनर्जी तो नाराज़ नहीं होंगी? TMC के दफ्तर से अनुमति मिलने के बाद उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि नीरज चोपड़ा का जन्म कॉन्ग्रेस काल में हुआ था, इसीलिए इसका श्रेय पीएम मोदी को नहीं मिल सकता।

बहन की हो चुकी थी मौत, टोक्यो ओलंपिक में खेल रही थीं धनलक्ष्मी: लौटने पर खबर सुन फूट-फूट कर रोईं

टोक्यो ओलंपिक 2020 में हिस्सा लेकर अपने घर तमिलनाडु पहुँचीं एथलीट धनलक्ष्मी सेकर को बड़ा झटका लगा। त्रिचि लौटकर उन्हें पता चला कि जब वह ओलंपिक के लिए घर से दूर थीं, तब उनकी बहन का बीमारी के कारण निधन हो गया। उनके घर के लोगों ने भी उनसे इस बात को छिपाए रखा क्योंकि सबको मालूम था कि अगर ऐसा कुछ भी धनलक्ष्मी को मालूम चला तो उनका ध्यान भटक जाएगा।

धनलक्ष्मी, जिन्हें तमिलनाडु से एथलेटिक्स में एक उभरता चेहरा माना जाता है। उन्हें इस बार विकल्प में रखा गया था। उन्होंने गृह नगर लौटकर कहा कि वह अगली बार मेडल जीत कर देश का नाम ऊपर करेंगी। उन्होंने माना कि पहले के ओलंपिक्स में तमिलनाडु से अधिक खिलाड़ियों ने हिस्सा नहीं लिया, लेकिन धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है और उन्हें विश्वास है कि आने वाले समय में ये संख्या बढ़ेगी।

इस बयान के बाद ही धनलक्ष्मी को पता चला कि उनकी बहन का निधन हो गया है जिसे सुन वह टूट गईं और अचानक सबको उनके तेज-तेज रोने की आवाज सुनाई पड़ने लगी। लौटते ही ऐसी खबर सुन धनलक्ष्मी खुद को संभाल नहीं पाईं और घुटनों के बल बैठकर तेज-तेज रोईं। इस दौरान उनके रिश्तेदारों ने उनको संभालने की कोशिश भी की, लेकिन वह चुप नहीं हुईं। बताया जा रहा है कि धनलक्ष्मी की माँ ने यह जानकारी इसलिए नहीं दी थी क्योकि उन्हें मालूम था कि ओलंपिक में भाग लेने और खेलने का मतलब क्या है।

उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु के त्रिचि की धनलक्ष्मी कक्षा 6 से एथलेटिक्स में हैं। उनके पिता हमेशा से उनके सपनों का समर्थन करते थे। 4 साल से धनलक्ष्मी ओलंपिक्स के लिए प्रैक्टिस कर रही थीं। तैयारी के लिए उन्हें तमिलनाडु सरकार से भी 5 लाख रुपए की सहायता मिली। उनकी माँ ऊषा ने कहा कि सरकार द्वारा दिए गए पैसे से उनके लोन खत्म हो जाएँगे, जो उन्होंने धनलक्ष्मी की तैयारी करवाने के लिए लिए थे। बता दें कि ऊषा, मनरेगा स्कीम के तहत व अन्य घर के काम करके घर का खर्चा चलाती हैं। धनलक्ष्मी का सपना था कि उनको एथलीट बनना है। इसके लिए उनके परिवार को अपने गाय-बकरियाँ भी बेचनी पड़ीं।

टोक्यो ओलंपिक का हिस्सा रहे तीरंदाज प्रवीण जाधव के परिवार को महाराष्ट्र में मिल रही धमकियाँ, पिता ने कहा- गाँव छोड़ने को हूँ मजबूर

टोक्यो ओलंपिक में भारतीय दल का हिस्सा रहे तीरंदाज प्रवीण जाधव के परिवार को लगातार धमकियाँ मिल रही हैं, जिससे वह बेहद परेशान हैं। महाराष्ट्र के सतारा जिले के सराडें गाँव में जाधव के माता-पिता रहते हैं। यहाँ उनका परिवार घर बनाना चाहता है, लेकिन पड़ोसी उन्हें ऐसा करने से धमका रहे हैं और घर का ​निर्माण करने से रोक रहे हैं। पड़ोसियों के इस रवैये से उनका परिवार बेहद दुखी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जाधव का परिवार जहाँ उनका पहले से ही एक छोटा सा मकान है, उसे वो बड़ा बनाना चाहते हैं। प्रवीण के परिवार का आरोप है कि पड़ोसी उन्हें उनकी ही जमीन पर कंस्ट्रक्शन नहीं करने दे रहे हैं और धमका रहे हैं। खिलाड़ी के पिता रमेश जाधव ने कहा है कि अगर यह विवाद जल्दी नहीं सुलझा तो उन्हें गाँव छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा।

टोक्यो से लौटने के बाद प्रवीण ने बताया था कि मेरे माता-पिता स्टेट एग्रीकल्चर कॉरपोरेशन में मजदूरी करते थे। कॉरपोरेशन ने ही उन्हें यह जमीन पट्टे पर दी थी, जिसका कोई लिखित समझौता नहीं हुआ था। अब मेरा परिवार इस जमीन पर बड़ा मकान बनाना चाहता है, लेकिन पड़ोसी उन्हें लगातार धमका रहे हैं। वे इसे अपनी जमीन बता रहे हैं। उन्होंने बताया कि पड़ोसी पहले भी परेशान करते थे और एक अलग लेन चाहते थे, जिस पर हम राजी हो गए थे। हालाँकि, अब वे पूरी जमीन की माँग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम इस मकान में बरसों से रह रहे हैं और हमारे पास सारे कागजात हैं।

वहीं, स्थानीय प्रशासन का इस पूरे विवाद पर कहना है कि जिस जमीन पर प्रवीण का परिवार मकान बनाकर रह रहा है, वह अभी भी एग्रीकल्चर कॉरपोरेशन के नाम पर ही है। बता दें कि इस समय जाधव सोनीपत में हैं और उनका परिवार गाँव में हैं।

‘दोषी मुस्लिम भी हो तो फाँसी पर लटका दूँगा’: गुस्से से लाल थे राजेश पायलट, RSS दफ्तर में ब्लास्ट से मरे थे 11 स्वयंसेवक

आज से 28 साल पहले तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दफ्तर को आतंकियों ने निशाना बनाया गया। वो 8 अगस्त, 1993 का ही दिन था जब चेन्नई में RSS के दफ्तर हुए बम ब्लास्ट में 11 स्वयंसेवकों की जान चली गई थी। इनमें से 5 संघ के प्रचारक थे। उस समय केंद्र में कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार थी और पीवी नरसिंहा राव भारत के प्रधानमंत्री थे। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण तब देश के गृह मंत्री हुआ करते थे।

वहीं तमिलनाडु की बात करें तो वहाँ AIADMK की सरकार थी और जयललिता पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं। तब बाबरी विध्वंस और लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के कारण देश की राजनीति उबाल पर थी। साथ ही श्रीलंका में तमिल अलगावादियों ने वहाँ की सरकार के दाँत खट्टे कर रखे थे। इस घटना से सवा 2 साल पहले ही मई 1991 में तमिलनाडु के ही कांचीपुरम स्थित श्रीपेरुम्बुदुर में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की एक बम ब्लास्ट में हत्या कर दी गई थी।

लालकृष्ण आडवाणी ने चेन्नई के RSS दफ्तर में मारे गए स्वयंसेवकों को श्रद्धांजलि भी दी थी। बॉम्बे और कलकत्ता (मुंबई और कोलकाता) में बम ब्लास्ट हो चुके थे, ऐसे में दिल्ली की सुरक्षा कड़ी कर दी गई थी क्योंकि आशंका थी कि आतंकी राष्ट्रीय राजधानी को निशाना बना सकते हैं। ये बात तब की है, जब चेन्नई, मद्रास हुआ करता था। चेटपेट इलाके में स्थित RSS की इमारत में रात के समय जोरदार धमाका हुआ।

11 स्वयंसेवकों की मौत हो गई और 7 घायल हुए। मृतकों में दो महिलाएँ भी शामिल थीं। RSS मुख्यालय के सेक्रेटरी वी काशीनाथन की भी इस हमले में जान चली गई। देश में इस घटना के कारण काफी खलबली मची थी। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री राजेश पायलट तुरंत मद्रास पहुँचे थे। बताते चलें कि राजस्थान में कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे सचिन पायलट उन्हीं के बेटे हैं। राजेश पायलट की जून 2011 में एक कार दुर्घटना में मौत हो गई थी।

RSS के स्थानीय नेताओं ने तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री राजेश पायलट को जानकारी दी थी कि ‘पलानी बाबा’ नाम के एक इस्लामी कट्टरवादी ने इस धमाके के पिछले महीने ताम्बरम में अपने अनुयायियों को भड़काते हुए RSS के मुख्यालय व कांची शंकराचार्य मठ में बम विस्फोट करने के लिए कहा था। ‘पलानी बाबा’ पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI और प्रतिबंधित ‘इस्लामिक सेवक संघ’ से जुड़ा हुआ था।

राजेश पायलट ये सुनते ही गुस्से से लाल हो गए थे और उन्होंने कहा था, “मैं दोषियों को फाँसी पर लटका दूँगा, वो मुस्लिम ही क्यों न हो।” लालकृष्ण आडवाणी भी चेन्नई पहुँचे थे और इस बम ब्लास्ट को पिछले 2 बड़े ब्लास्ट्स से जोड़ते हुए सरकार को चेताया था। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकियों के तमिलनाडु में सक्रिय होने की ख़ुफ़िया सूचना मिलने के बावजूद केंद्र व राज्य की सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं।

जब RSS में बम ब्लास्ट के कारण दिल्ली तक के नेता वहाँ पहुँच रहे थे, जब जयललिता पलानी में चुनाव प्रचार के लिए निकली हुई थीं। तमिलनाडु के तत्कालीन राज्यपाल एम चन्ना रेड्डी ने इसके लिए उनकी आलोचना भी की थी। जयललिता ने बाद में सफाई में कहा था कि उन्हें इस बम विस्फोट की तीव्रता व इससे हुए नुकसान का अंदाज़ा नहीं था। राज्यपाल ने पुलिस और मुख्य सचिव की भी उनकी निष्क्रियता के लिए आलोचना की थी।

‘पलानी बाबा’ के बारे में बता दें कि इस बम ब्लास्ट के पौने 4 साल बाद फरवरी 1997 में उसकी भी हत्या हो गई थी, जिसके बाद तमिलनाडु के कई हिस्सों में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क गए थे। इसी साल जनवरी में भाजपा के स्टेट एग्जीक्यूटिव सदस्य एसडी माणिक्कम की हत्या हुई थी। तब तक तमिलनाडु में करुणानिधि के DMK की सरकार आ चुकी थी। गणेश पूजा के जुलूस को मुस्लिम इलाकों से नहीं गुजरने दिया गया।

‘मुनेत्र कझगम’ नाम के एक इस्लामी चरमपंथी संगठन ने तो राजभवन पर ही कब्ज़ा करने की कोशिश की थी, जिसे पुलिस ने नाकाम कर दिया था। ये भी जानने लायक है कि RSS के चेन्नई दफ्तर में हुए बम ब्लास्ट का मुख्य आरोपित मुस्ताक अहमद इस घटना के 25 साल बाद जनवरी 2018 में धराया। CBI ने उसे चेन्नई से दबोचा था। वो तमिलनाडु के आतंकी संगठन ‘अल उम्माह’ का सरगना था।

59 वर्षीय मुस्ताक अहमद पर तब पुलिस ने 10 लाख रुपए का इनाम रखा था। बम ब्लास्ट में इस्तेमाल किए गए RDX का इंतजाम उसी ने किया था और अन्य आतंकियों को शरण दी थी। इस मामले की जाँच CB-CID को सौंपी गई थी। इसके बाद 1994 में 18 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई थी। इस मामले में 431 गवाह थे। जून 2007 में स्पेशल कोर्ट ने 11 को दोषी ठहराया और 4 को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। एक अन्य आरोपित इमाम अली मुठभेड़ में मारा गया था।

प्रेमी बब्बू खान से मिलकर आशा ने पति को मौत के घाट उतारा, गुमशुदगी की रिपोर्ट: शव के शिनाख्त से इनकार पर बच्चों ने खोली पोल

दिल्ली से सटे गाजियाबाद में साहिबाबाद रेलवे स्टेशन के सामने स्थित नाले में मिली लावारिस लाश को लेकर नया खुलासा हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लक्ष्मण यादव ने थाने में अपने मृतक भाई अर्जुन की पत्नी आशा एवं साले रजनीश और भाई की पत्नी के प्रेमी बब्बू खान के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कराया है। बताया जा रहा है कि इस मामले में नया मोड़ तब आया जब मृतक के बच्चों ने परिजनों को अपने मामा, माँ और उसके प्रेमी के घिनौने कृत्य के बारे में बताया।

बच्चों ने बताया कि उनकी मम्मी ने पापा को खाने में बेहोशी की दवा मिलाकर दी थी। खाना खाने के बाद पापा बेहोश हो गए थे। उसके बाद माँ, मामा और एक अन्य शख्स ने मिलकर पापा की चुन्नी से गला घोंटकर हत्या कर दी। दूसरे शख्स की पहचान महिला के प्रेमी बब्बू खान के रूप में हुई है।

पुलिस को दी शिकायत में लक्ष्मण यादव ने बताया कि भाई का पता नहीं चलने पर 11 मार्च को अर्जुन की पत्नी आशा अपने तीनों बच्चों को लेकर बलिया जिले के गाँव टोला सिवान चली गई थी। इसके बाद आशा बच्चों को छोड़कर अपने भाई रजनीश के साथ घर से चली गई। लक्ष्मण यादव ने आगे बताया कि बच्चों ने बलिया स्थित घर पहुँचकर उन्हें बताया कि 20 फरवरी की रात खाने में बेहोशी की दवा मिलाकर आशा और उसके प्रेमी बब्बू खान व साले रजनीश ने चुन्नी से गला घोंटकर अर्जुन की हत्या कर दी थी। इसके बाद शव को साहिबाबाद स्थित नाले में फेंककर तीनों फरार हो गए थे।

पुलिस ने बताया कि उसे 24 फरवरी 2021 को साहिबाबाद रेलवे स्टेशन के सामने स्थित नाले में एक लावारिस शव मिला था। पुलिस ने बताया कि महिला से भी लाश की शिनाख्त कराई गई थी, लेकिन उसने शव को पहचानने से इनकार कर दिया था। इसके बाद पुलिस ने उस शव को लावारिस मानकर उसका अंतिम संस्कार किया था। एसपी सिटी ज्ञानेंद्र सिंह ने बताया कि रिपोर्ट दर्ज कर आवश्यक कार्रवाई जारी है। मृतक के बच्चों का डीएनए सैंपल लिया गया है।

गौरतलब है कि अर्जुन यादव (32) एक फैक्ट्री में मैकेनिक काम काम करता था। वह अपनी पत्नी आशा और तीन बच्चों के साथ साहिबाबाद में किराए का मकान लेकर रहता था। 21 फरवरी को लापता होने के बाद उसकी पत्नी की तरफ से लिंक रोड थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। दूसरी तरफ, 24 फरवरी को साहिबाबाद रेलवे स्टेशन के सामने नाले में एक अज्ञात व्यक्ति का शव मिला था, जिसके हाथ-पैर चुन्नी से बंधे हुए थे। इसके बाद पुलिस ने अर्जुन यादव के परिजनों को बुलाकर शव की पहचान कराने का प्रयास किया। इस दौरान परिजनों ने शव को पहचानने से मना कर दिया था।

हॉकी कप्तान मनप्रीत सिंह मोदी सरकार से नहीं लेंगे अवार्ड मनी, कृषि कानून वापस लेने की है माँग? : वायरल दावे का Fact Check

मोदी सरकार के प्रति नफरत जाहिर करने में विरोधी फेक न्यूज का सहारा लेने से भी गुरेज नहीं करते। लेकिन कई बार ये फेक न्यूज भी इतनी हास्यास्पद होती हैं कि आम पाठक सोच में पड़ जाए। कुछ ऐसा ही एक बार फिर हुआ है। भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने 41 साल बाद देश को ओलंपिक में मेडल दिलाया और पूरे भारत ने इसकी खुशी मनाई। मगर, इसी बीच प्रोपगेंडा फैलाने वाले भी सक्रिय हुए और सोशल मीडिया पर ये फैला दिया कि टीम के कप्तान ने अवार्ड लेने से मना कर दिया है।

सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट को देख सकते हैं, इसमें लिखा है कि हॉकी टीम के कप्तान मनप्रीत सिंह ने मोदी सरकार से अवार्ड मनी लेने से मना कर दिया है जब तक वह कृषि के तीनों काले कानून वापस नहीं ले लेते। ये पोस्ट With RG (राहुल गाँधी के समर्थन में) के पेज से किया गया है। इस पेज को जहाँ 8,32, 178 लोग फॉलो करते हैं। वहीं केवल पोस्ट की बात करें तो इस पर 10 हजार लाइक, 868 कमेंट और 1.6 शेयर्स हो चुके हैं।

वायरल दावा

कमेंट्स में दिख रहा है कि इस पोस्ट से लोग कितना प्रभावित हैं। कोई मोदी सरकार की आलोचना कर रहा है तो कोई मनप्रीत सिंह को लेकर कह रहा है कि ऐसा बर्ताव किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। राजनीति को खेल में मिलाने की क्या जरूरत।

गूगल पर संबंधित जानकारी सर्च करने पर रिजल्ट

अब इस पोस्ट को अगर ध्यान में न रखें और मनप्रीत सिंह से जुड़ी न्यूज गूगल और उनके ट्विटर पर देखें तो ऐसी जानकारी कहीं भी नहीं मिलती।

इसके उलट देख सकते हैं कि मनप्रीत सिंह ने लगातार न केवल पीएम मोदी को बल्कि भाजपा को भी उनके समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया है। 5 अगस्त को जब हॉकी टीम ने मेडल जीता तो नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया और मनप्रीत सिंह की तारीफ की। इस पर हॉकी टीम कप्तान ने रिप्लाई देते हुए 6 अगस्त को लिखा,

“आपके प्रोत्साहन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद सर, मुझे और टीम को आपका कभी न खत्म होने वाला समर्थन मिला  – यह अंत नहीं है, हम देश को और ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए मेहनत करेंगे।”

इसी तरह बाजपा ने भी 5 अगस्त को टीम को तारीफ की थी। इस पर भी मनप्रीत सिंह ने आभार व्यक्त किया। इसके अलावा एक वीडियो में भी देख सकते हैं कि मनप्रीत सिंह से नरेंद्र मोदी कॉल पर बात कर रहे हैं और मनप्रीत खुशी-खुशी प्रोत्साहन बढ़ाने के लिए आभार व्यक्त कर रहे हैं। कहीं से ऐसा नहीं लग रहा कि उनके मन में कोई मलाल है या नाराजगी।

‘मेजर ध्यानचंद खेल रत्न’ के बाद अब कर्नाटक में उठी राजीव गाँधी राष्ट्रीय उद्यान का नाम बदलने की माँग: अभियान तेज

केंद्र की मोदी सरकार की इस घोषणा के बाद कि भारत का सबसे बड़ा खेल सम्मान- राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार अब “मेजर ध्यानचंद खेल रत्न” पुरस्कार के नाम से जाना जाएगा, कर्नाटक के नागरहोल में स्थित राजीव गाँधी राष्ट्रीय उद्यान का नाम भी बदलने की माँग तेज हो गई है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कोडागु जिले के निवासी विनय कयापंडा ने शुक्रवार को Change.org पर एक ऑनलाइन अभियान शुरू किया है, जिसमें माँग की गई है कि नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान का नाम कोडंडेरा मडप्पा करियप्पा (Kodandera Madappa Cariappa) के नाम पर रखा जाए, जो भारतीय सेना में पहले कमांडर-इन-चीफ थे। बता दें कि कोडागु के मूल निवासी करियप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को मदिकेरी, कोडागु में हुआ था और उनका तीन दशकों का विशिष्ट सैन्य करियर था।

ऑनलाइन याचिका अब तक 7,500 के लक्ष्य में से 5,200 से अधिक हस्ताक्षरों को पार कर चुकी है। याचिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई को टैग किया गया है।

याचिका में कहा गया है कि नागरहोल राष्ट्रीय आरक्षित वन का नाम पूर्व पीएम राजीव गाँधी के नाम पर केवल एक विशेष राजनीतिक परिवार और पार्टी को खुश करने के लिए रखा गया था और इसलिए कर्नाटक मूल के जनरल कोडंडेरा मडप्पा करियप्पा के नाम पर राष्ट्रीय उद्यान का नाम बदलने की माँग की गई और यदि यह न हो तो कम से कम इसका पिछला नाम ही बहाल कर दिया जाए। बता दें कि 1988 में राजीव गाँधी के शासन के दौरान इसका नाम रखने से पहले पार्क को नागरहोल नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता था।

कोडागु के कई अन्य गणमान्य लोगों ने भी नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान का नाम बदलने के अभियान को अपना समर्थन दिया है। कुर्ग वाइल्डलाइफ सोसाइटी के कर्नल सीपी मुत्तन्ना (सेवानिवृत्त) ने कहा, “हमने इसे कभी राजीव गाँधी राष्ट्रीय उद्यान कहा ही नहीं। हर कोई इसे नागरहोल ही कह रहा है। अचानक, एक दिन, हमने देखा कि बोर्ड और उस पर सरकार के आदेश से नाम बदल दिया गया है।”

यह याचिका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक आश्चर्यजनक निर्णय में हॉकी के दिग्गज मेजर ध्यानचंद के नाम पर खेल रत्न पुरस्कार का नाम बदलने की घोषणा के कुछ ही दिनों बाद आई है। गौरतलब है कि खेल रत्न पुरस्कार भारत का सर्वोच्च खेल सम्मान है। अब तक इसका नाम कॉन्ग्रेस नेता पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के नाम पर रखा गया था।

बता दें कि मेजर ध्यानचंद देश की महान खेल हस्तियों में से एक हैं जिन्होंने 1928, 1932 और 1936 में ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया और हॉकी में देश का ओलंपिक पदक सुनिश्चित किया।

एक राजनेता के बजाय एक खेल के दिग्गज के नाम पर पुरस्कार का नाम रखने के लिए लोगों द्वारा लम्बे समय से माँग की जा रही थी। आखिरकार राजीव गाँधी को उनके खेल कौशल के लिए तो नहीं जाना जाता था।

बजरंग पूनिया ने किसान आंदोलन का किया था समर्थन, PM मोदी ने कॉल भी नहीं किया, बधाई भी नहीं दी – Fact Check

एक पत्रकार है। साक्षी जोशी। PM मोदी पर आरोप लगाई है। आरोप है – PM ने ओलंपिक से मेडल लाए एक खिलाड़ी से बात नहीं की। आरोप के पीछे तर्क – उस खिलाड़ी ने किसान आंदोलन का समर्थन किया था।

पहले पढ़ते हैं, मैडम ने क्या लिखा है।

साक्षी जोशी का ट्वीट

साक्षी लिखती हैं – क्या उन्होंने (बिना नाम लिए निशाना PM मोदी पर) अभी तक बजरंग पूनिया से बात नहीं की है क्योंकि किसान आंदोलन पर पूनिया ने अपने मत रखे थे?

PM मोदी पर आरोप तो लगा दिया गया। सोशल मीडिया ने लपक भी लिया मुद्दे को। अब जानते हैं सच।

7 अगस्त को शाम के 5 बजे के आसपास ANI एक ट्वीट करती है। ANI एक न्यूज एजेंसी है, साक्षी जैसी पत्रकार यहीं से खबरें लेकर खबर बनाती है… या शब्दों से हेरफेर कर प्रोपेगेंडा गढ़ती है। ANI के इस ट्वीट के अनुसार PM मोदी ने बजरंग पूनिया से बात भी की, बधाई भी दी।

बेचारी साक्षी! बिना किसी लंबे-चौड़े फैक्ट चेक (12 ट्वीट, 27 स्क्रीनशॉट टाइप) के इनका झूठ ध्वस्त हो गया। झूठ ध्वस्त हो ही जाता है, आगे भी किया जाता रहेगा। ध्यान दीजिए कि साक्षी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट लगाया गया है जबकि ANI का डायरेक्ट ट्वीट। पता है क्यों? क्योंकि साक्षी जैसे प्रोपेगेंडाधारी लोग झूठ पकड़े जाने पर ट्वीट डिलीट कर भाग जाते हैं।

और हाँ, बस जानकारी के लिए। साक्षी जोशी के पति हैं विनोद कापड़ी। TV न्यूज में “नाग -नागिन”, “स्वर्ग की सीढ़ी”, “एलियन का बदला” जैसे शो इन्होंने बहुत मेहनत करके बनाए थे। अब ट्वीट कर पत्रकारिता पर ज्ञान बाँचते देखे जाते हैं।

एक और जानकारी, मजेदार है। साक्षी जोशी वो हैं, जिनको यह जानना है कि ममता बनर्जी सूसू-पॉटी कब जाती हैं।

मुलायम सिंह बुलाते हैं ‘टीपू’ तो अखिलेश ‘अब्बा’ क्यों नहीं कह सकते: CM योगी के ‘अब्बा जान’ बयान पर सिद्धार्थनाथ सिंह

चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘अब्बा जान’ ने उफान ला दिया है। ‘अब्बा जान’ के प्रयोग से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दल समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच वाकयुद्ध छिड़ गया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक कार्यक्रम में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर तंज कसते हुए उनके पिता मुलायम सिंह यादव के लिए ‘अब्बा जान’ शब्द का इस्तेमाल किया था।

अखिलेश यादव द्वारा अब्बा शब्द पर आपत्ति जताने के बाद यूपी के कैबिनेट मंत्री सिद्घार्थनाथ सिंह ने सपा अध्यक्ष पर सवाल खड़े किए हैं। सिद्धार्थनाथ सिंह ने अखिलेश यादव से पूछा कि मुलायम सिंह यादव उन्हें ‘टीपू’ बुलाते हैं तो उन्हें अपने पिता के लिए ‘अब्बा’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति क्यों है?

यूपी के कैबिनेट मंत्री सिंह ने कहा, “उर्दू का एक मीठा और अच्छा शब्द है। अखिलेश यादव मुलायम सिंह जी को पिताजी तो बोलते नहीं होंगे। जब वह डैडी बोल सकते हैं, जो अंग्रेजी शब्द है तो उर्दू का शब्द अब्बा क्यों नहीं बोल सकते। अखिलेश यादव को बताना चाहिए कि उर्दू के शब्दों को लेकर उनके मन में इतनी नफरत क्यों आ गई है।”

दरअसल, एक निजी मीडिया चैनल के कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर के मुद्दे को लेकर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर तंज किया था। सीएम योगी ने कहा था, “उनके अब्बा जान तो कहा करते थे कि वहाँ (अयोध्या में) परिंदा भी पर नहीं मार सकता।”

मुख्यमंत्री योगी के इस बयान पर अखिलेश यादव ने आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था कि मुख्यमंत्री योगी को अपनी भाषा का संतुलन रखना चाहिए। अखिलेश ने कहा, “हमारा और उनका झगड़ा मुद्दों पर है। अगर वो मेरे पिता के बारे में कुछ कहते हैं तो मैं भी उनके पिता के बारे में बहुत कुछ कह दूँगा।” अखिलेश यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री को अपने पिता के बारे में सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए अथवा उन्हें अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए।

अखिलेश यादव के इस बयान पर उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने अखिलेश यादव से पूछा कि उन्हें उर्दू के शब्द अब्बा से इतनी नफरत क्यों है, इसे उन्हें बताना चाहिए।