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बीवी पायल अब्दुल्ला से तुरंत तलाक चाहिए उमर अब्दुल्ला को, पहुँचे SC: निकाह के बाद त्याग दिया था ‘नाथ’ सरनेम

जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला का अपनी पत्नी पायल अब्दुल्ला से वैवाहिक संबंधों को लेकर चल रहा विवाद अभी भी दिल्ली उच्च न्यायालय में अटका हुआ है। इसका कारण यह है कि उनकी पत्नी के वकील ने वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग कार्यवाही के लिए अभी तक भी सहमति नहीं दी है, जबकि उमर अब्दुल्ला जल्द तलाक लेना चाहते हैं।

आखिरकार अब उमर अब्‍दुल्‍ला ने सुप्रीम कोर्ट की मदद लेने का फैसला लिया है। उमर अब्दुल्ला ने एक याचिका के जरिए दिल्‍ली हाईकोर्ट के उस सर्कुलर को चुनौती दी है, जिसमें कहा गया है कि दूरस्‍थ माध्‍यम की सुनवाई (वर्चुअल सुनवाई) के लिए दोनों पक्षों को सहमत होना जरूरी है। रिपोर्ट के अनुसार, सीजेआई एसए बोबडे और जस्टिस एएस बोपन्ना और वी रामासुब्रमण्यम की पीठ ने उनकी याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए नोटिस जारी किया है।

उमर अब्दुल्ला और पायल की शादी सितंबर 01, 1994 को हुई थी। दोनों ही साल 2009 से अलग रह रहे हैं। पायल नाथ एक सिख फैमिली से थी और उनके पिता मेजर जनरल रामनाथ सेना से रिटायर्ड हैं। गौरतलब है कि दिल्ली HC ने राहत देने से इंकार करने के बाद उमर अब्दुल्ला ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई और कहा कि सर्कुलर के खिलाफ उसकी याचिका को खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार (फ़रवरी 18, 2021) को उमर अब्दुल्ला की याचिका पर सुनवाई करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा अप्रैल, 2020 को जारी सर्कुलर को चुनौती देने पर सहमति जताई है। साथ ही, पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी किया और प्रतिक्रिया भी माँगी।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री की इस याचिका पर जल्‍द सुनवाई के लिए मना कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले को सही समय पर ही सुना जाएगा। इस मामले में उमर अब्दुल्ला की ओर से कॉन्ग्रेस नेता और वकील कपिल सिब्बल केस लड़ रहे हैं।

कपिल सिब्बल ने कहा कि वैवाहिक मामले में अन्य पक्ष अंतिम सुनवाई के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जल्द सुनवाई की सहमति नहीं दे रहा है। कपिल सिब्बल ने दलील दी कि दूसरा पक्ष ट्रायल कोर्ट के समक्ष कार्यवाही में उपस्थित हुआ है। इस पर कोर्ट ने कहा कि वो दूसरे पक्ष को सहमति देने के लिए बाध्य कर सकते हैं?

इस मामले में अगली सुनवाई अब दो सप्ताह के बाद होगी। दिल्ली हाईकोर्ट ने अप्रैल 26, 2020 के सर्कुलर को चुनौती देने वाली अब्दुल्ला की याचिका को पिछले साल 03 नवंबर को खारिज कर दिया था। उमर अब्दुल्ला ने दलील दी थी कि सुनवाई अदालत के 2016 के एक आदेश के खिलाफ उनकी विवाह संबंधी अपील फरवरी, 2017 से अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई है।

वहीं, सुनवाई अदालत ने अब्दुल्ला की तलाक याचिका को खारिज कर दिया था। कोरोना वायरस महामारी के बीच अदालतों के सीमित कामकाज के दौरान इस पर सुनवाई नहीं हो सकी क्योंकि उमर अब्दुल्ला से अलग हो चुकीं उनकी पत्नी पायल अब्दुल्ला ने वर्चुअल सुनवाई के लिए अपनी सहमति नहीं दी।

कृष्णा ढाबा के बाद श्रीनगर के शिव शक्ति मिष्ठान भंडार पर आतंकियों ने की गोलीबारी: 2 पुलिसकर्मी वीरगति को प्राप्त

हाल ही में आतंकवादियों ने श्रीनगर स्थित डलगेट इलाके में मौजूद शाकाहारी ‘कृष्णा ढाबा’ पर गोलीबारी की थी। कृष्णा ढाबा के बाद श्रीनगर के ही बारजुला क्षेत्र में शिव शक्ति मिष्ठान भंडार पर आतंकवादियों ने हमला किया है। आतंकियों द्वारा अंजाम दी गई गोलीबारी की इस वारदात में दो पुलिसकर्मी वीरगति को प्राप्त हुए हैं। 

इस घटना का वीडियो भी सामने आया है। इसमें साफ तौर पर देखा जा सकता है कि कैसे आतंकवादी बेख़ौफ़ होकर पुलिसकर्मियों पर गोली चलाता है। बलिदानी पुलिसकर्मियों की पहचान हवलदार सुहैल अहमद और मोहम्मद युसूफ के रूप में हुई है।

एके-47 से लैस आतंकवादी बाज़ार में घुसता है और पुलिस वालों पर पीछे से गोलियों की बौछार कर देता है। वारदात को अंजाम देने के ठीक बाद वह मौके से फ़रार हो जाता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इस हमले की जिम्मेदारी आतंकवादी संगठन टीआरएफ़ ने ली है।

कश्मीर ज़ोन पुलिस द्वारा किए गए ट्वीट के अनुसार, “आतंकवादियों ने श्रीनगर स्थित बारजुला में पुलिस पार्टी पर हमला किया। इस आतंकी घटना में दो पुलिस वालों को गोली लगी है, उन्हें उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पूरे इलाके को सुरक्षित कर दिया गया है और मामले की जाँच भी शुरू कर दी गई है। आगे मिलने वाली जानकारी के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।” जिस इलाके में गोलीबारी हुई है, उससे कुछ ही दूरी पर पुलिस थाना मौजूद है। 

अभी तक सामने आई जानकारी के मुताबिक़ घायल पुलिसकर्मियों को चिकित्सकों ने उपचार के दौरान मृत घोषित कर दिया। जिस वक्त आतंकवादियों ने उन पर हमला किया, उस वक्त वह मिठाई की दुकान पर खड़े थे। फ़िलहाल पुलिस ने इस वारदात को अंजाम देने वाले आतंकवादियों को गिरफ्तार करने के लिए खोजबीन अभियान शुरू कर दिया है। अभी तक एक संदिग्ध हिरासत में भी लिया गया है। 

17 फरवरी 2021 को आतंकवादियों ने कश्मीर के श्रीनगर स्थित डलगेट इलाके में एक मशहूर शाकाहारी ढाबे के मालिक पर गोली चला दी थी। यह ढाबा होटल ललित से महज़ कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित था जहाँ जम्मू कश्मीर के दो दिवसीय दौरे पर आए विदेशी राजनयिक रुके हुए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ आतंकवादियों ने मशहूर कृष्णा ढाबा मालिक रमेश कुमार मेहरा के बेटे आकाश मेहरा (22) पर गोली चलाई थी। यह शाकाहारी ढाबा श्रीनगर के अति सुरक्षित इलाके में मौजूद है। 

आतंकियों ने आकाश पर क्लोज़ रेंज से गोली चलाई थी, जिसकी वजह से वह बुरी तरह घायल हुआ था। घटना के ठीक बाद घायल को तुरंत एसएमएचएस अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कश्मीर पुलिस के मुताबिक़ इस आतंकी हमले की ज़िम्मेदारी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन मुस्लिम जाँबाज फ़ोर्स ने ली थी। इस घटना के बारे में कुछ चश्मदीदों का कहना था कि आतंकवादी आकाश मेहरा पर गोलीबारी करके वहाँ से फ़रार हो गए। इसेक बाद पुलिस ने घटनास्थल से मिले सीसीटीवी फुटेज की जाँच करना शुरू कर दिया था। 

बंगाल में शांतिपूर्ण विधानसभा चुनाव के लिए तैनात होंगी पैरा मिलिट्री की 125 कंपनियाँ: गृह मंत्रालय ने दिया आदेश

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले गृह मंत्रालय ने पैरा मिलिट्री फोर्स की 125 कंपनियाँ राज्य में तैनात करने का निर्णय लिया है। मंत्रालय ने यह कदम राज्य में शांतिपूर्ण तरह से चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिहाज से उठाया है।

25 फरवरी तक CRPF, CISF और BSF की कंपनियाँ बंगाल पहुँचेंगी। इससे पहले बंगाल राज्य से इनकी तैनाती को लेकर योजना बनाने को कहा गया है। राज्य सरकार से कोरोना प्रोटोकॉल्स को ध्यान में रखते हुए इन कंपनियों की आवाजाही व अन्य जरूरतों के इंतजाम सुनिश्चित करने को भी कहा है। ये कंपनियाँ संवेदनशील इलाकों में तैनात की जाएँगी। इस संबंध में सीएपीएफ के नोडल अधिकारी जल्द ही राज्य सरकार के साथ चर्चा शुरू करेंगे।

बता दें कि इससे पूर्व भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यसभा सांसद स्वप्नदास गुप्ता के नेतृत्व में चुनाव आयोग को पत्र लिख कर सेंट्रल फोर्स को राज्य में तैनात करने की माँग की थी। चुनावों के मद्देनजर पार्टी ने यह माँग इसलिए उठाई थी ताकि इलेक्शन निष्पक्षता के साथ संपन्न हों। पार्टी ने कहा था कि ऐसे पुलिस कर्मी भी पूरी प्रक्रिया से दूर रहने चाहिए जिन पर बीते समय में किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े होने का आरोप हो।

गौरतलब है कि बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले कानून को ताक पर रख कर आए दिन भारतीय जनता पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं। पिछले दिनों की बात है जब टीएमसी छोड़ भाजपा में शामिल होने वाले अरिंदम भट्टाचार्य को दीवारों पर लिख कर हत्या की धमकी दी गई थी। दीवारों पर लिखा गया था, “7 दिन में शांतिपुर छोड़ो वरना अपनी हत्या के लिए तुम खुद जिम्मेदार होगे।” अरिंदम ने इस घटना की जानकारी होने पर चुनौती स्वीकार करते हुए कहा था, “मैं शांतिपुर छोड़कर नहीं जाऊँगा।”

इसके अलावा 3 जनवरी की रात भाजपा नेता कृष्णेंदु मुखर्जी (Krishnendu Mukherjee) की कार पर फायरिंग करने का भी एक मामला सामने आया था। जिसके बाद भाजपा नेता ने इसका आरोप सत्ताधारी टीएमसी के गुंडों पर लगाया था। वहीं टीएमसी के एक नेता की वीडियो वायरल हुई थी। उसमें वह खुलेआम जनता को बीजेपी के ख़िलाफ़ भड़काते दिखे थे। वीडियो में वह लोगों से कह रहे थे, “जहाँ भी तुम बीजेपी को देखो, मै बता रहा हूँ, उन्हें पीटकर भगा देना। उन्हें पता होना चाहिए कि हम उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे।”

कुणाल कामरा पर आपराधिक मामला के लिए याचिका: मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती, 2 मार्च को सुनवाई

हाल ही में मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया था जिसके बाद ‘कॉमेडियन’ कुणाल कामरा के खिलाफ़ आपराधिक मामले को रद्द कर दिया गया था। जिसमें उस पर राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने के लिए एफ़आईआर दर्ज करने की माँग की गई थी, अब उत्तर प्रदेश स्थित वाराणसी की सेशन कोर्ट ने मजिस्ट्रेट आदेश को चुनौती देने वाली संशोधन/पुनर्विचार याचिका (revision petition) स्वीकार कर ली है। दरअसल, कुणाल कामरा ने सुप्रीम कोर्ट की एडिटेड तस्वीर साझा की थी, जिसमें अदालत के ऊपर लगे हुए तिरंगे की जगह भारतीय जनता पार्टी का झंडा लगा हुआ था। 

कामरा पर आपराधिक मामला ख़त्म करने वाले आदेश को चुनौती

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक़ एडिशनल सेशन जज अनुराधा कुशवाहा की अदालत ने 11 फरवरी 2021 को संशोधन याचिका पर नोटिस जारी किया था। इस मामले पर अगली सुनवाई 2 मार्च 2021 को होनी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ कामरा ने सुप्रीम कोर्ट की एक तस्वीर ट्वीट की थी, जिसका रंग भगवा था और उसके ऊपर भाजपा का झंडा लगा हुआ था। इसके अलावा उसने देश की सबसे बड़ी अदालत पर अपमानजनक टिप्पणी भी की थी। इस संशोधन याचिका में मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी गई थी जिसके तहत कुणाल कामरा के खिलाफ़ आपराधिक मामले को खारिज कर दिया गया था। 

यह पुनर्विचार/संशोधन याचिका सौरभ तिवारी नाम के वकील ने दायर की थी। याचिका में उन्होंने कहा था कि कामरा की हरकत ने लोगों की भावनाओं को आहत किया है और राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया है।

अपराध सोशल मीडिया पर हुआ इसलिए नहीं तय हो सकता न्याय क्षेत्र 

मजिस्ट्रेट के आदेश से हतोत्साहित होकर सौरभ तिवारी ने वाराणसी की सेशन कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और वहीं पर एफ़आईआर दर्ज करने की माँग उठाई थी। क्योंकि ये कृत्य सोशल मीडिया पर किया गया था, इसका मतलब ये हुआ कि जितनी जगहों में ट्विटर का उसका पोस्ट देखा गया उतनी जगहों पर अपराध को अंजाम दिया गया। सौरभ तिवारी ने निवेदन किया था कि कामरा को राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम की रोकथाम 1971 की धारा 2 और भारतीय दंड संहिता की धारा 153 बी (राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन), 505 (लोक रिष्टिकारक वक्तव्य) के तहत हिरासत में लिया जाना चाहिए। 

सुप्रीम कोर्ट में कामरा पर अवमानना का मामला

कुणाल कामरा पर पहले ही सुप्रीम कोर्ट में अवमामना का मामला चल रहा है। अटॉर्नी जनरल ऑफ़ इंडिया केके वेणुगोपाल ने पिछले साल नवंबर में इस मामले पर सुनवाई की अनुमति प्रदान की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई शुरू हुई थी। न्यायाधीश अशोक भूषण, सुभाष रेड्डी और एमआर शाह की पीठ ने दिसंबर 2020 में कामरा के खिलाफ़ दायर की तीन अवमानना याचिका स्वीकार की थी। अवमानना के एक मामले की सुनवाई 22 फरवरी 2021 को है।    

‘गलवान में मरे थे हमारे सैनिक’ – चीन ने 8 महीने तक छुपाया, पहली बार अब अपने 4 जवान को किया मरणोपरांत सम्मानित

15 जून 2020 की रात चीन ने भारतीय सैनिकों पर कायरता पूर्वक हमला किया था और गलवान घाटी में घुसपैठ करके पूर्वी लद्दाख वाले क्षेत्र में यथास्थिति (status quo) बदलने का प्रयास किया था। इसके बाद वहाँ हिंसक झड़प हुई थी और भारतीय सेना के जवान चीनी सेना के जवानों को पीछे धकेलने में कामयाब रहे थे। इस दौरान 20 भारतीय जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे, वहीं चीन के 43 सैनिकों की मृत्यु हुई थी। 

इस घटना के बाद से ही चीन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘डैमेज कंट्रोल’ करना शुरू कर दिया था। चीन ने अपने सैनिकों की मृत्यु और हताहत होने को लेकर तमाम झूठे दावे किए थे और भ्रमित करने वाला अभियान चलाया था। अब उसी चीन ने उन 4 सैनिकों को मरणोपरांत सम्मानित किया है, जो भारतीय सीमा में की गई घुसपैठ में शामिल थे। 

चीनी मीडिया समूह पीपल्स डेली (People’s Daily) के मुताबिक़, “4 चीनी सैनिक जिन्होंने जून में हुए सीमा विवाद की वजह से अपनी जान गँवाई, उन्हें मरणोपरांत सम्मानित किया जा रहा है। एक कर्नल जिसने सैनिकों की अगुवाई की और वह गम्भीर रूप से घायल हुआ था, उसे भी सम्मानित किया जा रहा है।” 

हालाँकि इसके पहले अगस्त 2020 में चीन ने डंके की चोट पर दावा किया था कि चीनी सैनिकों की मृत्यु नहीं हुई है। इसके पहले कई रिपोर्ट्स सामने आई थीं, जिनमें दावा किया गया था कि भारतीय जवानों के साथ टकराव में चीनी सैनिकों की जान गई थी। इसके बावजूद चीन लगातार पीपल्स लिबरेशन आर्मी के जवानों की मौत का संज्ञान नहीं ले रहा था।  

Massachusetts Institute of Technology के चीनी विशेषज्ञ एम टेलर फायलर के मुताबिक़ एक चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर 19 साल के चीनी सैनिक के मकबरे की तस्वीर वायरल हुई थी, जिसकी मौत ‘भारतीय-चीन सेना के बीच टकराव’ के दौरान हुई थी। उसके मकबरे पर लिखा था

“चेन जियांग्रो (Chen Xiangro) का मकबरा। फुजियान (fujian) स्थित पिंगनान (pingnan) की 69316 टुकड़ी का जवान। जून 2020 में भारतीय सीमा पर मौजूद जवानों के साथ हुई हिंसक झड़प में अपनी जान गँवाई। उसे मरणोपरांत सेंट्रल मिलिट्री कमीशन द्वारा याद किया जा रहा है।” 

मकबरे पर ये भी लिखा था कि सैनिक जो एक्शन में मर गया था (किल्ड इन एक्शन), वह दिसंबर 2001 में पैदा हुआ था यानी उसकी उम्र सिर्फ 19 साल थी। मकबरे में उसकी यूनिट के बारे में भी जानकारी दी हुई थी। 69316 यूनिट जो कि सीमा पर तैनात की जाती है और वो उत्तरी गलवान घाटी के नज़दीक स्थित टियानवेनडियान (Tianwendian) से आती है। इस तरह की तस्वीरें बताती हैं कि गलवान घाटी में चीनी सैनिक तैनात किए गए थे। 

इसके अलावा और भी रिपोर्ट्स सामने आई थीं, जिसमें इस तरह के दावे किए गए थे। भारत के तमाम वामपंथी मीडिया समूहों ने सच्चाई बयान करने वाली इन तस्वीरों का काउंटर किया था। चीन ने खुद इन तस्वीरों से किनारा कर लिया था।

अब चीन का अपने 4 सैनिकों को मरणोपरांत सम्मानित करना दिखाता है कि अनुमान से कहीं अधिक चीनी सैनिकों की मौत हुई। यानी गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुए टकराव में चीन के मृत सैनिकों की संख्या काफी ज़्यादा है।  

15 जून को चीनी सैनिकों ने लद्दाख सीमा पर एलएसी के पास भारतीय सेना के जवानों पर हमला कर दिया था। चीनी सेना की इस कायरता भरी हरकत के चलते 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। केंद्र सरकार ने शहीदों को सम्मानित किया था और सरकारी प्रतिनिधियों की मौजूदगी में उनका अंतिम संस्कार किया गया था। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद घायल सैनिकों से मुलाक़ात की थी।  

राहुल गाँधी की रैली में भीड़ के लिए दाढ़ी वाले की वायरल वीडियो: ‘2025 की तलवार…’ से बनाया डर का माहौल

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और उनके सार्वजानिक भाषणों में जुटने वाली भीड़ अक्सर चर्चा का विषय रहती है। इसी के चलते कॉन्ग्रेस पार्टी और इसके कार्यकर्ता यह प्रयास करते देखे जाते हैं कि जब जिस शहर में राहुल गाँधी बोलें, तो वहाँ श्रोता कम से कम ‘ठीक-ठाक’ मात्रा में नजर आ जाएँ।

इस बार राजस्थान में 13 फरवरी को राहुल गाँधी की एक रैली हुई, जिसमें ‘भीड़ जुटाए जाने’ वाली रणनीति एक वायरल वीडियो के जरिए बहस का विषय बनी हुई है। ठीक एक साल पहले भी इसी तरह के आरोप राहुल गाँधी की रैलियों में भीड़ के जुटान को लेकर राजस्थान सरकार पर लगे थे। आरोप यह था कि राहुल गाँधी की रैली में भीड़ जुटाने के लिए एक ‘वायरल’ आदेश में कॉलेज की कक्षाएँ नहीं लगने की बात कही गईं थीं।

इसे लेकर तब भारी बवाल भी हुआ था और भाजपा ने फेसबुक, ट्विटर और वाट्सऐप पर इस आदेश की फोटो के साथ राजस्थान की राज्य सरकार पर रैली में भीड़ जुटाने के लिए सत्ता का दुरुपयोग करने के आरोप लगाए थे। नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने रिट्वीट कर उठाया मुद्दा था।

ऐसे में, अब एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि एक मजहबी गुरू लोगों से राहुल गाँधी की रैली में भारी मात्रा में इकठ्ठा होने के लिए कह रहा है।

ट्विटर पर ‘हम लोग We The People’ (@humlogindia) नाम के एक ट्विटर यूजर ने ये वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, “आखिर कॉन्ग्रेस का विरोध क्यों जरूरी है.. राजस्थान में राहुल गाँधी की रैली के लिए भीड़ इकट्ठी करने के लिए बाकायदा मस्जिदों से 2025 का डर दिखाकर रैली में इकट्ठा होने का ऐलान किया गया।”

इस वायरल वीडियो में एक व्यक्ति मंच से कह रहा है, “जनाब राहुल गाँधी, राजस्थान के मुख्यमंत्री जनाब अशोक गहलोत साहब और बहुत सारे मंत्री आ रहे हैं.. और इस मौके पर, जो टाइम दिया गया है… शहर में ऐलान भी हो रहे हैं, उसका आप ध्यान रखें और 13 फरवरी को सुबह 11 बजे अपने काम बंद कर के राज पब्लिक स्कूल के पास सभास्थल पर पहुँचकर अपनी जिंदादिली का सबूत पेश करें और एकजुटता का परिचय दें। ये इसलिए भी जरुरी है क्योंकि आपके सर पर 2025 की भी तलवार लटक रही है।”

हालाँकि, इस वायरल वीडियो के वास्तविक स्रोत और तारीख की पुष्टि नहीं की गई है लेकिन ट्विटर पर इस वायरल वीडियो को बड़े स्तर पर शेयर किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि यही असली सेक्यूलरिज़्म है। वहीं, कुछ लोग इस वीडियो को लेकर कॉन्ग्रेस समर्थकों और वामपंथियों से भी सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर मुस्लिम समुदाय के लोग कॉन्ग्रेस को वोट क्यों देते हैं?

एक ट्विटर यूजर ने पूछा है कि यही बात अगर किसी मंदिर में पुजारी ने कही होती तो?

वास्तव में, लोगों के बीच यह वीडियो इस कारण वायरल हो रहा है क्योंकि उनका मानना है कि वीडियो में नजर आ रहा दाढ़ी वाला व्यक्ति एक मौलवी है और वो मस्जिद से 2025 (माना जा रहा है कि इस व्यक्ति का इशारा 2024 के आम चुनाव की ओर था) के आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए राहुल गाँधी की रैली में शामिल होने की अपील कर रहा था।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी गत 13 फरवरी को राजस्थान के अपने दौरे के दूसरे दिन अजमेर के पास रूपनगढ़ में किसानों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने तीन केंद्रीय कृषि कानूनों का जिक्र करते हुए कहा कि हिंदुस्तान का सबसे बड़ा व्यापार कृषि का है। उन्होंने कहा कि कानून रद्द किए बगैर अब सरकार से बात नहीं होगी।

एमएस गोलवलकर… वो ‘गुरुजी’ जिनका संगठन मंत्र और तंत्र आज भी प्रासंगिक: पटेल और वाजपेयी दोनों जिनके कायल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अधिकतर कार्यक्रमों में मुख्यतः तीन चित्र मंच पर दिखाई देते हैं। सबसे बाईं ओर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का, उसके बाद बीच में भारत माता का और सबसे दाहिनी ओर माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर का।

स्वाभाविक है डॉ. हेडगेवार संघ के संस्थापक रहे हैं और भारत माता संघ के स्वयंसेवकों के लिए आराध्य हैं, इसलिए उनका चित्र लगाया जाता है। तीसरा चित्र एमएस गोलवलकर का होता है, जो मात्र उनके संघ के द्वितीय सरसंघचालक होने के नाते नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व की विशेताओं के कारण लगाया जाता है।

आज यह जानना और भी जरूरी हो जाता है कि किन कारणों से अपनी मृत्यु के इतने वर्षों के बाद भी एमएस गोलवलकर लाखों स्वयंसेवकों के लिए मार्गदर्शक हैं और क्यों आज भी हर संघ स्वयंसेवक उनको ”गुरुजी” के नाम से पुकारता है। क्योंकि वो गोलवलकर ही थे, जिनके कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लम्बे संघर्ष और उथल-पुथल के बाद भी आज देश का ही नहीं अपितु दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बन पाया है।

आज के परिप्रेक्ष्य में उनके संगठन तंत्र और मंत्र की विशेषता जानना और भी प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि उनके मार्गदर्शन में स्थापित सभी संगठन चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो… जैसे शिक्षा, सेवा, वनवासी कल्याण, मजदूर उत्थान, राजनीति या अन्य हर क्षेत्र में… वह देश या दुनिया के सबसे मुख्य संगठनों में से एक है।

एमएस गोलवलकर 1940–1973 तक संघ के सरसंघचालक रहे और यह वही दौर था, जब संघ ने स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया और बाद में महात्मा गाँधी का हत्यारा होने का आरोप भी सहा सबूतों के अभाव में फिर प्रतिबंध हटाया भी जाता है और 1962 के भारत-चीन युद्ध में संघ स्वयंसेवकों की भूमिका देख कर 1963 में राजपथ पर परेड में भाग लेने के लिए बुलाया भी जाता है।

आज संघ का स्वयंसेवक राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक का दायित्व निभा रहा है। यह “गुरुजी” की कार्यशैली ही थी, जिसके कारण भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल दिनांक 11 अगस्त 1948 को उनके लिखे पत्र के उत्तर में लिखते हैं,

”राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने संकटकाल में हिन्दू समाज की सेवा की, इसमें कोई संदेह नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में, जहाँ उनकी सहायता की आवश्यकता थी, संघ के नवयुवकों ने स्त्रियों तथा बच्चों की रक्षा की तथा उनके लिए काफी काम किया।”

एमएस गोलवलकर ऐसे संगठनकर्ता थे, जिनके संगठन तंत्र और मंत्र चुनौतियों का सामना करना भी सिखाते हैं और साथ ही साथ दृढ़ होकर विस्तार का मार्ग भी दिखलाते हैं। अपने कार्य के प्रति अद्भुत वैचारिक स्पष्टता थी गोलवलकर में। यह उनकी वैचारिक स्पष्टता और स्पष्ट दृष्टिकोण ही था, जिसके कारण वह इतने विशाल जन समर्थन और प्रसिद्धि पाने के बाद भी राजनीति से दूर रह कर जीवन भर मनुष्य निर्माण के कार्य में, व्यक्ति को समाज से जोड़ने की साधना में और हिन्दू समाज को एकत्रित करने में लगे रहे।

जब गोलवलकर 1940 में संघ के द्वितीय सरसंघचालक बने, तब तक संघ का कार्य देश के हर प्रान्त और जिले तक नहीं पहुँचा था। लेकिन अपने दायित्व पर रहते हुए उन्होंने इस लक्ष्य को पूर्ण किया। कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण, उनका चिंतन, उनके सुख-दुःख में सहभागी होना… यह एमएस गोलवलकर की दिनचर्या का अहम भाग बन गया था। उन्होंने अपने साथी कार्यकर्ताओं को उपदेश नहीं अपितु स्वयं के उद्धरण से प्रेरित किया।

डॉ कृष्ण कुमार बवेजा द्वारा लिखित पुस्तक ‘श्री गुरुजी – व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ के अनुसार “गुरुजी” को यह कदापि पसन्द नहीं था कि कोई भी सेवाकार्य जनता पर उपकार की भावना से किया जाए। उनके अनुसार,

”सेवा हिन्दू जीवन-दर्शन की प्रमुख विशेषता है। निःस्वार्थ सेवा ही उसका स्वभाव है। जहाँ स्वार्थ है, वह सेवा नहीं हो सकती। स्वार्थ का प्रवेश होते ही, वह सेवा न रह कर व्यापार बन जाती है।”

यह एमएस गोलवलकर की असीम साधना ही थी, जिसके कारण संघ इतने उथल-पुथल के बाद भी राष्ट्रजागरण का केंद्र-बिंदु बना और भारत की जनता का आकर्षण केंद्र ही नहीं बल्कि आशा का केंद्र भी बन पाया। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कहते थे कि ”श्री गुरुजी” के महान व्यक्तित्व में समर्थ स्वामी रामदास की भक्ति तथा शिवाजी महाराज की शक्ति का अपूर्व संगम था।

आत्मविस्मृत हिन्दू समाज को स्वत्व का साक्षात्कार करा कर “गुरुजी” ने उसे संगठित शक्तिशाली तथा आत्मविश्वास से परिपूर्ण बनाने के राष्ट्रकार्य के लिए अपने शरीर का कण-कण और जीवन का क्षण-क्षण समर्पित कर दिया। आज भी लाखों संघ स्वयंसेवक एमएस गोलवलकर को ”गुरुजी” के नाम से पुकारते हैं और वह सैकड़ों युवाओं को राष्ट्र समर्पित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।

हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर कार्टून, पैगंबर मोहम्मद के नाम पर माफी: हिंदू-घृणा से सनी BBC हिंदी की दोहरी मानसिकता

असहिष्णुता, अभिव्यक्ति की आजादी और फासीवाद, इस देश के वामपंथी मीडिया से लेकर उदारवादी गिरोह के बीच ये जुमले अक्सर लोकप्रिय विषय रहे हैं और वो भी सिर्फ भारत के संदर्भ में। इस बीच, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ध्वजवाहक होने का दावा करने वाले वामपंथी मीडिया संस्थान अक्सर दक्षिणपंथी सत्ता और हिन्दुओं पर असहिष्णुता बढ़ाने का भी आरोप लगाते आए हैं। ये और बात है कि इसी बहाने हिन्दुओं के खिलाफ जिसने भी, जब और जिस तरह से चाहा, उसी तरह से नफरत फैलाई गई।

कभी त्रिशूल और शिवलिंग पर कंडोम चढ़ाकर हिन्दू-घृणा को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर परोसा गया, तो कभी हिन्दुओं की आराध्य देवी दुर्गा को अपमानित किया जाता रहा। ऐसा सिर्फ खबरों में ही हिन्दू-घृणा परोसकर नहीं, बल्कि कार्टून और विषैले लेखों, यूट्यूब वीडियो से लेकर टीवी चैनल्स और फिल्मों के माध्यम से भी हिन्दू धर्म को निशाना बनाया जाता रहा। मगर कभी शायद ही इन बातों को लेकर किसी ने कोई आपत्ति व्यक्त की हो।

लेकिन इस बार इन्हीं वामपंथी संगठनों में से एक, प्रोपेगेंडा मशीन बीबीसी को मुस्लिम संगठनों ने निशाने पर लिया है। मजहबी संगठन राजा अकादमी की आपत्ति के बाद बीबीसी हिंदी ने अपने चैनल से एक ऐसे वीडियो को डिलीट कर दिया है, जिसमें बीबीसी द्वारा कथित तौर पर पैगंबर मोहम्मद का चित्र दिखाया गया था। बीबीसी ने अपनी इस ‘भूल’ के लिए इस मजहबी संगठन से बाकायदा माफ़ी भी माँगी है। बीबीसी के इस वीडियो का शीर्षक था- “पाकिस्तान के इस कदम से अहमदिया मुस्लिमों में डर किसलिए है?”

लेकिन इसी बीबीसी ने हिन्दुओं की आस्था को एक नहीं बल्कि अनेकों बार निशाना बनाया है और इसके पीछे आधार ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ को बनाया गया। ऐसे ही कुछ उदाहरण, जब-जब बीबीसी ने अपने हिन्दू विरोधी अजेंडे को हवा देने का काम किया, नीचे दी गई तस्वीरों में देख सकते हैं –

बीबीसी ने एक ऐसे ‘कार्टून’ का समर्थन किया था, जिसमें श्रीराम से सीता को यह कहते दिखाया गया था कि वो इस बात से खुश हैं कि उन्हें रावण ने कैद किया था, ना कि रामभक्तों ने। इस कार्टून का मकसद ये साबित करना था कि रामभक्त बलात्कारी होते हैं।

‘जय श्री राम’ को बीबीसी ने बताया था ‘मर्डर क्राई’ –

मॉब लिंचिंग में बीबीसी और उसके ‘कार्टूनिस्ट्स’ का ‘जय श्री राम’ वाला नैरेटिव –

“BBC HINDI CARTOON: मंदिर बनता रहेगा, पहले ठेकेदार तो लड़ लें…”

फ़ोटो का कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है.

इन खबरों/कार्टून्स/वीडियो की ख़ास बात और हिन्दू धर्म की खूबसूरती यही है कि ये सभी आज भी बीबीसी की वेबसाइट पर मौजूद हैं।

गाड़ी से निकाल वकील पति-पत्नी को काट डाला: TRS नेता समेत 3 पर FIR, अवैध जमीन और मंदिर निर्माण का मामला

तेलंगाना के पेडापल्ली जिले स्थित हाइवे पर मंगलवार (17 फरवरी 2021) की दोपहर वकील दंपत्ति जी वामन राव (52) और जी नागमणि (48) की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई। अब इस मामले में कई बड़े खुलासे हो रहे हैं। हत्या में टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति) नेता कुंता श्रीनिवास का नाम सामने आया है।

एफ़आईआर के मुताबिक़ घटना के पहले आरोपित वेल्दी वसंथा राव ने टीआरएस नेता कुंता श्रीनिवास और अक्कापका कुमार के साथ मिल कर वकील दंपत्ति की हत्या का षड्यंत्र रचा। इसके पीछे की वजह ये थी कि वो कथित तौर पर गुंजापडूगू गाँव में पेदम्मा मंदिर और अवैध घर का निर्माण करवा रहा था।

ज़ोन आईजी वाई नागी रेड्डी के मुताबिक़ टीआरएस नेता कुंता श्रीनिवास का मंदिर निर्माण को लेकर वामन राव से विवाद था। वामन राव के ड्राइवर ने भी बयान दिया, जिसके मुताबिक़ वामन राव ने टीआरएस नेता का नाम लिया था। फिलहाल पुलिस इस मामले में 4 आरोपितों को गिरफ्तार कर चुकी है, जिसमें 3 का नाम एफ़आईआर में मौजूद है।

पति-पत्नी दोनों ही तेलंगाना हाईकोर्ट में वकालत करते थे। दरअसल मंगलवार को जी वामन राव और उनकी पत्नी जी नागमणि अपनी कार में मंथानी कोर्ट से हैदराबाद जा रहे थे। कलवाचर्ला गाँव के नज़दीक बदमाशों ने जबरन उनका रास्ता रोका। इसके बाद उन्होंने वकील दंपत्ति पर धारदार हथियार से हमला कर दिया और उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

चेतावनी: नीचे एम्बेड किए ट्वीट का वीडियो खौफनाक है

घायल वकील दंपत्ति को पेडापल्ली स्थित अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ दोनों की मृत्यु हो गई। फ़िलहाल टीआरएस नेता कुंता श्रीनिवास को पार्टी से निलंबित कर दिया गया है। 

इस पूरे प्रकरण का एक और पहलू है। एक मामला था, जिसमें हिरासत के दौरान मृत्यु हुई थी। इसकी जाँच के लिए वकील दंपत्ति ने याचिका दायर की थी। इस संबंध में उन्होंने पुलिस पर प्रताड़ित करने का आरोप भी लगाया था। इस मामले में जी वामन राव और जी नागमणि ने खुद को ख़तरा बताया था।

वकील दंपत्ति के एक मित्र का कहना था कि दोनों ने ज़मीन से जुड़े घोटालों में कई स्थानीय नेताओं के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई थी। मृतक जी वामन राव के पिता किशन राव ने ही रामागिरी पुलिस थाने में इस मामले को लेकर एफ़आईआर दर्ज कराई। 

किशन राव ने एफ़आईआर में कहा है कि उनके बेटे और बहू की हत्या इसलिए की गई क्योंकि वह जमीन से जुड़े कई घोटालों को उजागर करने वाले थे। इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए किशन राव ने कहा:

“मैंने अपनी एफ़आईआर में 3 लोगों का नाम लिखा है। जिसमें से एक सत्ताधारी दल टीआरएस के मंथानी मंडल का अध्यक्ष है। मुझे ऐसा लगता है कि मेरे बेटे और बहू की हत्या के पीछे इन तीनों का हाथ है। मेरा बेटा गुमशुदा लोगों की शिकायत का ड्राफ्ट तैयार कराने में लोगों की मदद करता था। अगर पुलिस कार्रवाई नहीं थी तो वह अदालत में याचिका दायर करता था, जब उसे ज़मीन पर कब्ज़े या अवैध गतिविधियों के बारे में पता चलता था तो वह शांत नहीं बैठता था।” 

         

पैगंबर मोहम्मद का फोटो दिखाया, BBC हिंदी ने माँगी माफी: मजहबी संगठन ने धमकाया, खौफ या पत्रकारिता?

मुस्लिम संगठन रजा अकादमी (Raza academy) की आपत्ति के बाद बीबीसी हिंदी (BBC) ने अपने यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज से एक ऐसे वीडियो को डिलीट कर दिया है, जिसमें BBC द्वारा कथित तौर पर पैगंबर मोहम्मद का चित्र दिखाया गया था। BBC ने अपनी इस ‘भूल’ के लिए इस मजहबी संगठन से बाकायदा माफ़ी भी माँगी है। बीबीसी के इस वीडियो का शीर्षक था- “पाकिस्तान के इस कदम से अहमदिया मुस्लिमों में डर किसलिए है?”

TOI Noida/Ghaziabad edition, date 18 Feb, page 13

दरअसल, मुंबई स्थित मुस्लिम संगठन ने बीबीसी हिंदी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। तहफ़ुज़ ए नामूस ए रिसालत (टीएनआर) बोर्ड के नेताओं ने मुंबई के पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह से मुलाकात की और सोशल मीडिया पर पैगंबर मुहम्मद को चित्रित करने के लिए बीबीसी हिंदी समाचार के खिलाफ कार्रवाई की माँग की।

मुंबई पुलिस को सौंपे इस ज्ञापन में TNR बोर्ड के अध्यक्ष हज़रत सईद मोईन मिया ने लिखा कि बीबीसी हिंदी समाचार को अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल से पैगंबर मोहम्मद के चित्र वाला ये वीडियो हटाना होगा और मुस्लिमों से माफी माँगनी होगी। उन्होंने आगे लिखा है कि बीबीसी हिंदी समाचार को मुस्लिम समुदाय को भविष्य में इस तरह के कृत्यों से बचना होगा।

मजहबी संगठन का कहना है कि इस वीडियो में बीबीसी द्वारा एक चित्र दिखाया गया है और उसमें इसका नाम पैगम्बर मोहम्मद बताया है, जबकि यह इस्लाम के अनुसार ईशनिंदा है। टीएनआर नेताओं ने कमिश्नर परमबीर सिंह से शिकायत पर कड़ी कार्रवाई करने के साथ ही इन लिंक और यूआरएल को जल्द से जल्द ब्लॉक करने का भी अनुरोध किया।

आमदार नारायण वाघ (@MLANarayanWagh) नाम के ट्विटर यूजर ने तमाम स्क्रीनशॉट के साथ ही एक यूट्यूब वीडियो की लिंक भी शेयर की है। इस यूट्यूब वीडियो में दावा किया गया है कि यह संगठन की आपत्ति के बाद बीबीसी हिंदी द्वारा टीएनआर नेता मोहम्मद सईद नूरी के साथ बातचीत की कॉल रिकॉर्डिंग है।

इस वीडियो में एक ओर से एक व्यक्ति, जो कि बीबीसी का सीनियर जर्नलिस्ट होने का दावा किया है, कहते हैं, “मैं इकबाल अहमद बीबीसी न्यूज़ हिंदी से। मेरे दोस्त ने आपसे बात की होगी। मैं खुद अभी छुट्टी पर हूँ, मेरे वालिद की बरसी है। लेकिन मुझे खबर मिली है। हम बीबीसी की तरफ से बहुत शर्मिंदा हैं, हम लोगों की तरफ से गलती हुई है। क्या है, कैसा है.. ये लंदन से मामला है। हम भी कलमागोह हैं, गलती पर हम लोग बिलकुल जाँच करवा रहे हैं। आपसे गुजारिश है कि आपके जो भी ऐतराज हैं, हम शत प्रतिशत अपनी गलती मानते हैं। हम इस वीडियो को हटवा भी रहे हैं। और लंदन से जैसे ही वो लोग आ जाएँगे, उसके बाद वहाँ से वो चीजें हटा ली जाएँगी। ऐसी कोई मंशा नहीं थी। वो किसी इंसान की बेवकूफी हो सकती है। मैं आपसे छोटा हूँ, इस मामले को रफा-दफा करा दिए जाए। कैसे भी इस बात को खत्म कर दिया जाए। और सबसे बड़ी बात कि गलती हुई है।”

दूसरी ओर से आवाज आती है, “हमारा प्रोग्राम था बीबीसी ऑफिस जाने का लेकिन आप कह रहे हैं कि दो-चार घंटे में वीडियो हट जाएगा….”

इस पर पहला व्यक्ति कहता है, “मैं खुद उसी संस्था से जुड़ा हूँ। मेरे वालिद की बरसी है। मुझे उठाया गया कि आप हमारी तरफ से बात कीजिए। वीडियो बिलकुल हट जाएगा। ये लंदन का ममला है, वक्त का फासला है और कुछ नहीं। चार-पाँच घंटे का समय लगेगा, लेकिन हटा दिया जाएगा। किसी स्टाफ की गलती से ये हो गया। हम ये अभी करवा देते हैं।”

इसके बाद सोशल मीडिया पर बीबीसी का ये वीडियो अब नजर नहीं आ रहा है। वीडियो की यूट्यूब लिंक पर भी यही सन्देश नजर आ रहा है कि ये वीडियो अब उपलब्ध नहीं है। हालाँकि, सोशल मीडिया पर जिन लोगों द्वारा यह वीडियो शेयर किया गया था, वो ट्वीट अब भी ट्विटर पर मौजूद हैं।

बीबीसी की वेबसाइट पर यह रिपोर्ट अभी भी मौजूद है। इसका यह भी कारण हो सकता है कि मजहबी संगठन की आपत्ति सिर्फ वीडियो में पैगम्बर मोहम्मद के चित्र को दिखाए जाने को लेकर थी।