Home Blog Page 4147

शाहीनबाग वाली दादी बताने को लेकर कंगना पर किसान दादी ने किया केस, कहा- मेरी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा

कंगना रनौत एक बार फिर कानूनी दाँवपेंच में फँस गई हैं। दरअसल, किसान आंदोलन को लेकर एक महीने पहले किए गए एक ट्वीट की वजह से उन पर 73 वर्षीय महिला किसान महिन्दर कौर ने मानहानि का मामला दर्ज किया है। ट्वीट में कंगना ने उन्हें गलती से ‘शाहीनबाग वाली दादी’ बता दिया था। हालाँकि बाद में विवाद बढ़ता देख कंगना ने ट्वीट डिलीट कर दिया था। अभिनेत्री के खिलाफ बठिंडा कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई गई है।

पंजाब के बहादुरगढ़ जंडिया गाँव की निवासी महिन्दर कौर ने शुक्रवार (8 जनवरी, 2021) को वकील रघबीर सिंह के माध्यम से आईपीसी की धारा 499 (मानहानि) और 500 (मानहानि की सजा) के तहत अभिनेत्री के खिलाफ मुकदमा दायर किया। कौर ने आरोप लगाया कि अभिनेत्री के उसे सोशल मीडिया पोस्ट की वजह से उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची है, जिसमें उन्हें शाहीनबाग की दादी (बिल्किस बानो) बताया गया था।

बुजुर्ग महिला ने अपनी शिकायत में कहा कि कंगना के ट्वीट की वजह से उन्हें अपने परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों, ग्रामीणों और पब्लिक की नजरों में काफी मानसिक तनाव, पीड़ा, उत्पीड़न, अपमान, प्रतिष्ठा की हानि और मानहानि से जूझना पड़ रहा है। उन्होंने कहा है कि ट्वीट को लेकर कंगना रनौत ने उनसे अभी माफ़ी भी नहीं माँगी है। महिला ने दावा किया कि वह और उनका पूरा परिवार किसान है। वे अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं और इस कारण वे पहले दिन से ही ‘किसानों के विरोध’ का समर्थन कर रहे हैं।

गौरतलब है कि लगभग एक महीने पहले कंगना रनौत ने गलती से किसान आंदोलन में शामिल एक बुजुर्ग महिला को शाहीनबाग विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लेनी वाली दादी ‘बिल्किस बानो’ समझ लिया था। उन्होंने ट्विटर पर एक पोस्ट को रिट्वीट किया, जिसमें दावा किया गया कि किसान विरोध-प्रदर्शन में अब बिल्किस बानो दादी भी शामिल हो गई हैं। रनौत ने पोस्ट शेयर करते हुए लिखा था कि दादी को अब किसान विरोध-प्रदर्शन के लिए हायर कर लिया गया है। बाद में विवाद बढ़ता देख कंगना ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया था।

उल्लेखनीय है कि अभिनेत्री के ट्वीट को लेकर चंडीगढ़ के एक वकील हाकम सिंह ने भी उनके खिलाफ मुकदमा दायर किया था। उन्होंने एक बुज़ुर्ग महिला का मजाक उड़ाने का आरोप लगाते हुए उन्हें कानूनी नोटिस भेजा था और सात दिनों के भीतर रनौत से सार्वजनिक माफी माँगने के लिए कहा था।

गौरतलब है कि टाइम पत्रिका 2020 के शीर्ष 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल शाहीनबाग की दादी हाल ही में किसान विरोध प्रदर्शन में शामिल हुईं थी। हालाँकि, उन्हें सिंघु बॉर्डर पर मौजूद पुलिस ने हिरासत में लिया था। पुलिस ने कहा कि कोविड-19 महामारी के बीच दादी को उनकी सुरक्षा के लिए रोका गया, क्योंकि वह वरिष्ठ नागरिक हैं।

‘CAA विरोधी आंदोलन सत्याग्रह नहीं, यह आतंकी गतिविधि के दायरे में’: गुवाहाटी हाईकोर्ट का अखिल गोगोई को बेल देने से इनकार

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने गुरुवार (7 जनवरी 2021) को ‘एक्टिविस्ट’ अखिल गोगोई की जमानत याचिका खारिज की दी। वह देशद्रोह और सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान हिंसा भड़काने सहित कई आरोपों में दिसंबर 2019 से जेल में बंद है। हाई कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज करते हुए विशेष एनआईए कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अखिल को असम में ऐंटी सीएए हिंसा में उसकी भूमिका को लेकर राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। 

उच्च न्यायालय ने एनआईए की एक विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें गोगोई के खिलाफ दर्ज 13 मामलों में से एक मामले में जमानत याचिका खारिज कर दिया गया था। बता दें कि गोगोई को इस मामले के अलावा सभी अन्य मामलो में जमानत मिल चुकी है।

कोर्ट ने कहा कि असम में जो ऐंटी सीएए आंदोलन हुआ था वह सत्याग्रह नहीं था, बल्कि गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) में परिभाषित टेररिस्ट ऐक्ट के तहत आता है। जस्टिस कल्याण राय सुराना और अजीत बाठकुर की बेंच ने आदेश में कहा, “हिंसा का इस्तेमाल करते हुए अखिल के नेतृत्व वाली भीड़ ने अहिंसक आंदोलन की अवधारणा को ही खारिज कर दिया था। आंदोलन के जरिए सरकारी मशीनरी को कमजोर करने, आर्थिक नाकेबंदी, समुदायों के बीच नफरत फैलाने और शांति में बाधा उत्पन्न करके सरकार के प्रति अंसतोष पैदा करने की कोशिश की गई थी।” कोर्ट ने कहा कि इस तरह की गतिविधि यूएपीए की धारा 15 के तहत आतंकी कार्य के रूप में परिभाषित है।

गोगोई ने एनआईए द्वारा असम में सीएए के खिलाफ हिंसक विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में दर्ज दो मामलों में से एक में जमानत हासिल करने में कामयाबी हासिल की थी। यह एकमात्र मामला बचा था जहाँ विशेष एनआईए अदालत ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। गुवाहाटी कोर्ट की एक खंडपीठ ने एनआईए अदालत के फैसले को बरकरार रखा और गोगोई द्वारा दायर जमानत याचिका को खारिज कर दिया।

बता दें कि अखिल गोगोई, कृषक मुक्ति संग्राम परिषद और राइजोर दल का नेता है। संशोधित नागरिकता कानून (CAA) के खिलाफ कथित हिंसक प्रदर्शन के मामले में गोगोई को जोरहाट से दिसंबर 2019 में गिरफ्तार किया गया था और तब से वह गुवाहाटी केंद्रीय कारागार में बंद है।

गौरतलब है कि यह मामला शुरू में गुवाहाटी के चंदमारी पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में इसे एनआईए को ट्रांसफर कर दिया गया। गोगोई पर कड़े गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, राजद्रोह, आपराधिक साजिश, आतंकवादी संगठनों को समर्थन, सहित अन्य आरोप लगाए गए हैं। 

उसे 12 दिसंबर 2019 को CAA के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों में भूमिका के लिए गिरफ्तार किया गया था। केंद्र सरकार द्वारा पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से संबंधित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए यह कानून पारित किया गया था। उसके तीन साथियों को एक दिन बाद गिरफ्तार किया गया था।

गोगोई को बाद में एनआईए को सौंप दिया गया और एक अदालत ने उसे 17 दिसंबर को एजेंसी की 10 दिन की हिरासत में भेज दिया। उसे पूछताछ के लिए नई दिल्ली भी लाया गया। गोगोई को 25 दिसंबर को वापस गुवाहाटी ले जाया गया और तब से वह न्यायिक हिरासत में है।

सरकार की दो टूक- रद्द नहीं होंगे कृषि कानूनः किसान नेताओं ने दी धमकी तो कहा- सुप्रीम कोर्ट ही करेगा फैसला

कृषि सुधार क़ानूनों का विरोध लगातार दूसरे महीने भी जारी है, जिसमें ज़्यादातर किसान संगठन पंजाब के हैं। जहाँ एक तरफ किसान अपनी माँग पर अड़े हुए हैं कि उन्हें किसी भी तरह का संशोधन स्वीकार नहीं है वहीं दूसरी तरफ सरकार ने भी किसानों के ब्लैकमेलिंग पर समर्पण करने से साफ़ मना कर दिया है। 

सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कृषि सुधार क़ानून वापस नहीं लिए जा सकते हैं बल्कि बेहतर यही होगा कि अब इस मुद्दे पर देश की सबसे बड़ी अदालत फैसला ले। सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि वह क़ानूनों में संशोधन पर ज़िम्मेदारी ले सकती है या माँगों पर विचार कर सकती है लेकिन क़ानून रद्द करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। 

किसान संगठनों के पास ऐसी सूरत में दो ही विकल्प बचते हैं, या तो वह बेहतर सुझाव के साथ आगे आएँ या फिर सुप्रीम कोर्ट को अंतिम फैसला लेने दें। पिछली सुनवाई में इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति के गठन की बात कही थी। जिसमें सिर्फ पंजाब, हरियाणा या पश्चिमी यूपी ही नहीं बल्कि देश के अन्य किसान संगठन शामिल हों। सुप्रीम कोर्ट सोमवार को इस मामले से जुड़ी अगली सुनवाई करेगा। 

ज़रूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ जाएँगे

केंद्र सरकार की तरफ से मिली यह तीखी प्रतिक्रिया प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों के गले नहीं उतरी। उन्होंने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की तरफ से दखल दिए जाने की बात पर प्रतिरोध जताया। इस पर महिला किसान अधिकार मंच की कविता कुरुगांती ने कहा, “यह लोकतंत्र के लिए निराशा भरा दिन है। एक चुनी हुई सरकार बातचीत के बीच में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा रही है और चाहती है कि न्यायालय इस मुद्दे का हल निकाले।” सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी माँग के धुंधले होने के डर से किसान संगठनों ने यह कहना शुरू कर दिया कि उनका आंदोलन जारी रहेगा। अगर सुप्रीम कोर्ट भी उन्हें पीछे हटने के लिए कहता है फिर भी वह पीछे नहीं हटेंगे। 

भारतीय किसान यूनियन एकता उग्रहन के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उग्रहन ने भी वही राग अलापा। टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, “हमें इस बैठक से कोई उम्मीद नहीं थी। सरकार इन क़ानूनों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं है लेकिन हम इससे कम कुछ भी स्वीकार नहीं करने वाले हैं।” इसी तरह क्रांतिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष दर्शन पाल ने कहा, “हम अपना मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में नहीं रखेंगे। अगर सुप्रीम कोर्ट ने हमें प्रदर्शन रोकने का आदेश दिया तो हम उनकी बात भी नहीं मानेंगे और अपना आंदोलन जारी रखेंगे।” 

किसान संगठनों की दलील ये है कि मुद्दा नीतिगत मामलों से जुड़ा हुआ है इसमें न्यायपालिका के हस्तक्षेप का कोई मतलब नहीं है। जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि विरोध उन क़ानूनों का हो रहा है जो संवैधानिक प्रक्रिया के अंतर्गत पारित किए गए हैं। इसलिए इस मुद्दे पर देश की सबसे बड़ी अदालत ही फैसला ले तो बेहतर होगा।       

केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए कृषि सुधार क़ानूनों को लेकर किसानों और भारत सरकार के बीच शुक्रवार (8 जनवरी 2021) को आठवें दौर की बैठक ख़त्म हुई थी। इस बैठक में भी कोई नतीजा निकल कर नहीं आया। एक तरफ किसान अपनी माँग पर अड़े हुए हैं तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वह कृषि सुधार क़ानून वापस नहीं लेगी। 15 जनवरी 2021 को किसान और सरकार के बीच अगली बैठक होनी है। 

कोई नतीजा निकल कर नहीं आया

वहीं सरकार का पक्ष रखते हुए कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा, “हम एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अगर कोई क़ानून लोकसभा और राज्यसभा में पारित होता है तो सुप्रीम कोर्ट के पास उसका विश्लेषण करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई हो भी रही है। आज की बैठक भी कृषि सुधार क़ानूनों पर चर्चा हुई है लेकिन उसका कोई परिणाम निकल कर नहीं आया है।”

सरकार का कहना है कि किसान तीनों क़ानूनों को वापस लेने के अलावा कोई और विकल्प दें तो उस पर विचार सम्भव है। लेकिन किसानों ने कोई अन्य विकल्प प्रदान नहीं किया। किसानों के साथ अगली बैठक 15 जनवरी को तय की गई है। वहीं भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के राकेश टिकैत ने कहा, “जब तक सरकार तीनों कृषि क़ानून वापस नहीं लेती है तब तक हमारा आंदोलन जारी रहेगा। हम सरकार द्वारा तय की 15 जनवरी की बैठक में शामिल होंगे, हम यहीं हैं। सरकार संशोधन की बता कह रही है लेकिन हमारी सिर्फ एक ही माँग है कि क़ानून रद्द किए जाएँ।”        

आज भारत दो ‘मेड इन इंडिया’ COVID-19 टीकों के साथ मानवता को बचाने के लिए तैयार: प्रवासी भारतीय दिवस पर PM मोदी

कोविड-19 महामारी के बीच आयोजित 16वें प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन का आज (जनवरी 09, 2021) पीएम मोदी ने डिजिटल माध्यम से उद्घाटन किया। इस दौरान पीएम मोदी ने कहा कि आज नई पीढ़ी भले ही जड़ों से दूर हो गई हो, लेकिन उनका जुड़ाव भारत से बरकरार है। 

पीएम मोदी ने कहा, “आज दुनिया के कोने-कोने से हमें भले इंटरनेट से जोड़ा गया है। लेकिन हम सबका मन हमेशा से माँ भारतीय से जुड़ा है, एक दूसरे के प्रति अपनत्व से जुड़ा है।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि जब भारत आतंकवाद के सामने खड़ा हुआ, तो दुनिया को भी इस चुनौती से लड़ने का नया साहस मिला। आज भारत भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग कर रहा है। लाखों और करोड़ों की धनराशि सीधे लाभार्थी के खाते में जमा की जा रही है। उन्होंने कहा कि देश के गरीबों को सशक्त बनाने के लिए भारत में चल रहे अभियान की दुनिया भर में चर्चा हो रही है। हमने दिखाया है कि अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में, एक विकासशील देश भी नेतृत्व कर सकता है।

उन्होंने कहा कि दुनिया भर से हजारों साथियों ने ‘भारत को जानिए’ क्विज कॉम्पीटिशन में हिस्सा लिया है। ये संख्या बताती है कि जड़ से भले दूर हो जाएँ, लेकिन नई पीढ़ी का जुड़ाव उतना ही बढ़ रहा है। इस क्विज के 15 विजेता भी आज इस वर्चुअल समारोह से जुड़े हुए है। उन्होंने सभी विजेताओं को इसके लिए बधाई दी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत जैसा इतना बड़ा लोकतांत्रिक देश जिस एकजुटता के साथ खड़ा हुआ है, उसकी मिसाल दुनिया में नहीं है। उन्होंने कहा, “भारत के लोकतंत्र पर एक वक्त संदेह प्रकट किया गया था, लेकिन आज भारत ही वह स्थान है जहाँ लोकतंत्र सबसे अधिक मजबूत है और सबसे जीवंत है।”

प्रवासी भारतीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “भारत बाहर से पीपीई किट, मास्क, वेंटिलेटर और परीक्षण किट आयात करता था, लेकिन आज हमारा राष्ट्र आत्मनिर्भर है। आज भारत दो ‘मेड इन इंडिया’ COVID-19 टीकों के साथ मानवता को बचाने के लिए तैयार है। कोरोना काल में आज भारत दुनिया के सबसे कम मृत्यु दर और सबसे अधिक रिकवरी रेट वाले देशों में है।”

कोरोना का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “बीता साल हम सभी के लिए बहुत चुनौतियों का साल रहा है, लेकिन इन चुनौतियों के बीच विश्व भर में फैले भारतीय मूल के साथियों ने जिस तरह काम किया है, अपना फर्ज निभाया है वो हम सभी के लिए गर्व की बात है। यही तो हमारी मिट्टी के संस्कार हैं। आप सभी ने जहाँ आप रह रहे हैं वहाँ और भारत में कोविड के खिलाफ लड़ाई में बड़ा योगदान किया है। पीएम केयर्स में दिया गया आपका योगदान भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत कर रहा है।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत सरकार हर समय, हर पल आपके साथ, आपके लिए खड़ी है। दुनियाभर में कोरोना लॉकडाउन से विदेशों में फँसे 45 लाख से ज्यादा भारतीयों को वंदे भारत मिशन के तहत लाया गया। विदेशों में भारतीय समुदायों को समय पर सही मदद मिले इसके लिए हर संभव प्रयास किए गए। दुनिया भर में भारतीय समुदाय के साथ बेहतर कनेक्टिविटी के लिए रिश्ता नाम का नया पोर्टल शुरु किया गया है। इस पोर्टल से मुश्किल समय में अपने समुदाय से संपर्क करना, उन तक पहुँचना आसान होगा।”

जिस एप पर ट्रम्प ने बनाया अकाउंट, उसे Google ने हटाया, एप्पल ने नोटिस थमाया: ट्विटर और फेसबुक कर चुका है बैन

ट्विटर और फेसबुक के बाद अब गूगल ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। गूगल ने सोशल नेटवर्किंग एप्लीकेशन पार्लर (Parler) को प्ले स्टोर से हटा दिया है और आरोप लगाया है कि वो भड़काऊ कंटेंट्स को अपने प्लेटफॉर्म से हटाने में असफल रहा। गूगल ने कहा है कि जिन कंटेंट्स को उसने अपने नियमों का उल्लंघन माना था, उसे ‘Parler’ ने जगह दी – इसीलिए, उसके खिलाफ कार्रवाई की गई।

गूगल ने ‘Parler’को चेताया है कि जब तक वो अपने प्लेटफॉर्म पर कंटेंट्स को छानने के लिए सही मेकेनिज्म लेकर नहीं आता है, तब तक उसे प्ले स्टोर पर वापस नहीं लाया जाएगा। ये एप डोनाल्ड ट्रम्प के समर्थकों के बीच खासा लोकप्रिय है और उन्होंने ट्विटर और फेसबुक से सस्पेंड होने के बाद यहाँ अकाउंट बनाया था। साथ ही ‘Apple’ ने भी इस एप पर नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए हटाने की चेतावनी दी है।

अमेरिका में कई सोशल मीडिया कम्पनियाँ दक्षिणपंथियों को निशाना बनाती रहती हैं और वामपंथी विचारधारा के विरोधियों को प्रतिबंधित करती रहती हैं। काफी बार ये गुप्त-रूप से किया जाता है, जिसे शैडो-बैन भी कहते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प के समर्थकों ने भी सोशल मीडिया से प्रतिबंधित किए जाने के बाद ‘Parler’ को ही अपनी बात रखने का जरिया बनाया था। अब गूगल और एप्पल के स्टोर्स से पार्लर डाउनलोड के लिए उपलब्ध नहीं है।

हालाँकि, ब्राउज़र से इसे अभी भी डाउनलोड किया जा सकता है। वहाँ सोशल प्लेटफॉर्म्स Gab और टेलीग्राम भी खासे लोकप्रिय हो रहे हैं और आशंका जताई जा रही है कि जहाँ भी डोनाल्ड ट्रम्प के समर्थक जुटेंगे, उसे विश्व की तीनों बड़ी तक कम्पनियाँ मिलकर निशाना बनाएँगी। गूगल ने पार्लर के कंटेंट्स को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया। एप्पल ने भी पार्लर को कंटेंट्स हटाने के लिए 24 घंटों का समय दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम पर पार्लर के CEO जॉन मात्ज़े ने कहा कि एप्पल उस पर वही नियम-कानून थोपना चाहता है, जिसका पालन वो खुद नहीं करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे न तो राजनीतिक रूप से प्रेरित कंपनियों के सामने झुकेंगे और न ही अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाने वाले सत्तावादियों की बात मानेंगे। उन्होंने पूछा कि अगर हिंसा के लिए पार्लर जिम्मेदार है तो आईफोन्स से होने वाले अपराधों के लिए भी एप्पल जिम्मेदार है?

ट्विटर पर पहले से ही पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी लोग सितंबर 2018 की उस घटना को याद कर रहे हैं, जब एक महिला एक्टिविस्ट लॉरा लूमर ने कैपिटल हिल में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ चल रही सुनवाई में घुस कर ट्विटर के CEO जैक डॉर्सी को खरी-खोटी सुनाई थी। उन्होंने CEO जैक को पक्षपात वाला रवैया त्यागने की चेतावनी दी थी और आरोप लगाया था कि ट्विटर विरोधी विचारधारा के लोगों को सेंसर करने में लगा हुआ है।

‘हिन्दू राष्ट्र का सुप्रीम कोर्ट, नपुंसक, हरा@जादा’: रंजन गोगोई और न्यायपालिका पर एमनेस्टी इंडिया के पूर्व प्रमुख ने फैलाई घृणा

खुद को मानवाधिकार कार्यकर्ता बताने वाले और एमनेस्टी इंडिया के मुखिया रहे आकार पटेल ने अकारण ही देश के सर्वोच्च न्यायालय के खिलाफ तिरस्कारपूर्ण टिप्पणी कर दी है। कभी मुस्लिमों और दलितों को हिंसा के लिए भड़काने वाले आकार पटेल ने शुक्रवार (जनवरी 8, 2021) रात सुप्रीम कोर्ट पर छींटाकशी की। उन्होंने एक सेक्सिस्ट और ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रति घृणा दर्शाने वाले ट्वीट के जरिए ऐसा किया।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जजों की तुलना ‘नपुंसकों’ से की और कहा कि न्यायपालिका जब ‘संकट’ में है तो ये जज ‘मर्द की तरह’ खड़े नहीं हो पाए। साथ ही उन्होंने पूर्व CJI रंजन गोगोई के खिलाफ आए यौन शोषण के एक मामले का भी जिक्र किया और लिखा, “हिन्दू राष्ट्र के सुप्रीम कोर्ट के नपुंसक जजों ने यौन शोषक मुख्य न्यायाधीश को उसी मामले में पेश होने दिया, जिसमें वो खुद ही मुख्य आरोपित हैं।”

उन्होंने आगे लिखा, “इन सबके बावजूद हमें सुप्रीम कोर्ट के सामने इस तरह से घुटने टेकने हैं, जैसे डेल्फी (ग्रीक गॉड अपोलो की सैंक्चुरी) की कोई आकाशवाणी हो।” हालाँकि, जब इस ट्वीट के लिए जम कर उन्हें लोगों ने लताड़ लगाई, तब उन्होंने इसे तुरंत डिलीट कर लिया। लेकिन, उन्होंने इससे भी बड़ी बेहूदगी कर दी। उन्होंने लिखा कि अब वो ‘नपुंसक’ की जगह यहाँ ‘हरामजादा’ शब्द लेकर आ रहे हैं।

आकार पटेल का घृणास्पद ट्वीट

साथ ही उन्होंने ‘नपुंसक’ शब्द के इस्तेमाल के लिए माफ़ी भी माँगी। उन्होंने भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ बताते हुए पूछा कि क्या पूर्व CJI पर लगे यौन शोषण के आरोपों के बारे में बच्चों को पढ़ाया जाएगा? उन्होंने गोगोई पर असम में हजारों लोगों को प्रताड़ित करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने गोगोई पर अपने पद का गलत इस्तेमाल कर के राज्यसभा सांसद की सीट बदले में लेने का भी आरोप लगाया।

सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए किया गाली का इस्तेमाल

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जजों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘डरा हुआ’ और कायर भी करार दिया। उन्होंने लिखा कि न्यायपालिका को कार्यपालिका से ज्यादा अधिकार मिले हुए हैं, लेकिन वे ‘डरे हुए’ हैं। उन्होंने बार-बार अपने ट्वीट्स में देश के सर्वोच्च न्यायालय को ‘हिन्दू राष्ट्र का सुप्रीम कोर्ट’ बताया। ‘माफ़ी माँगने’ के बाद उन्होंने ‘नपुंसक’ की जगह ‘हरामजादा’ लिख कर फिर से उसी ट्वीट को दोबारा से प्रकाशित किया।

बता दें कि मई 2019 में ही सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई द्वारा गठित तीन सदस्यीय जाँच पैनल ने उन्हें क्लीनचिट दे दी थी। जाँच पैनल को सीजेआई रंजन गोगोई के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट की पूर्व कर्मचारी द्वारा लगाए गए यौन शोषण के आरोपों का कोई सबूत नहीं मिला था। इस पैनल का नेतृत्व जस्टिस एसए बोबडे कर रहे थे, जो अब देश के मुख्य न्यायाधीश हैं। चूँकि यह एक अनौपचारिक जाँच थी, इसीलिए इस जाँच की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया था।

दिल्ली की मदीना मस्जिद में 10 साल के बच्चे की लाश मिली, ईंट से दबाकर रखा गया था: रिपोर्ट

दिल्ली के खजूरी ख़ास के सी ब्लॉक स्थित मदीना मस्जिद के भीतर एक बच्चे की लाश मिलने से हड़कंप मच गया। फरहान नाम के बच्चे का शव मस्जिद की सबसे ऊपरी मंजिल पर ईंट से दबाकर रखा गया था। बच्चे की उम्र 10 वर्ष बताई जा रही है। पुलिस ने घटना की जानकारी मिलते ही शव को कब्ज़े में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। मामले की पड़ताल चल रही है।

आज तक में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ दिल्ली के थाना खजूरी ख़ास क्षेत्र अंतर्गत सी ब्लॉक की गली नंबर 11 में शमीम का परिवार रहता है। शमीम का 10 वर्षीय बेटा फरहान नज़दीक की मस्जिद में कुरान पढ़ने जाता था। शमीम के चार बच्चों में फरहान सबसे छोटा था। वह रोज़ की तरह कुरान पढ़ने के लिए मस्जिद की तरफ निकला, लेकिन रात होने के बावजूद वापस नहीं लौटा। परिजनों को इस बात से चिंता हुई तब उन्होंने पुलिस को इस मामले की सूचना दी। 

इसके बाद रात के ही वक्त पुलिस और फरहान के परिवार वालों ने उसकी खोजबीन शुरू कर दी। रिपोर्ट के मुताबिक़ खोजबीन के दौरान जब वे मदीना मस्जिद की सबसे ऊपरी मंजिल पर पहुँचे तो वहाँ उन्होंने देखा कि फरहान का शव ईंट के नीच दबा कर रखा गया है। पुलिस ने शव को कब्ज़े में लेकर तत्काल प्रभाव से पोस्टमार्टम के लिए जीटीबी अस्पताल भेज दिया गया।

पुलिस ने इस संबंध में हत्या का मामला दर्ज कर लिया है और पूरे प्रकरण की जाँच शुरू कर दी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि बच्चे की मृत्यु का असल कारण क्या है।

‘सेक्स करने को कहते हैं पादरी, करते हैं ब्लैकमेल’: ईसाई महिलाओं की याचिका सुनेगा SC, चर्च में ‘पाप का प्रायश्चित’ को चुनौती

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (जनवरी 8, 2021) को केरल की ईसाई महिलाओं की एक रिट याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया, जिसमें मालंकारा ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च में अनिवार्य कन्फेशन की परम्परा को चुनौती दी गई है। याचिका में इसे धर्म और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों के विरुद्ध करार दिया गया है। मुख्य याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट ने याचिका में संशोधन कर और नए फैक्ट्स आलोक में लाने की अनुमति भी दे दी है।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस रमासुब्रमण्यन की पीठ इस मामले को सुनेगी। हालाँकि, इस दौरान पाँचों ईसाई महिलाओं के वकील मुकुल रोहतगी से सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि वो इस मामले में केरल हाईकोर्ट क्यों नहीं जा रहे हैं। इसके जवाब में रोहतगी ने कहा कि सबरीमाला जजमेंट में ऐसे सवाल उठ चुके हैं, जिस पर 9 सदस्यीय पीठ सुनवाई कर रही है, इसलिए हाईकोर्ट ऐसे विचाराधीन मामलों में फैसला नहीं सुना सकती। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि कन्फेशन के एवज में पादरी यौन फेवर माँगते हैं, सेक्स करने को कहते हैं।

इन महिलाओं का कहना था कि उन्हें अपने चुने हुए पादरी के समक्ष भी कन्फेशन करने दिया जाए। साथ ही ये भी कहा गया कि ईसाई महिलाओं के लिए कन्फेशन अनिवार्य करना असंवैधानिक है, क्योंकि पादरियों द्वारा इसे लेकर ब्लैकमेल करने की घटनाएँ सामने आई हैं। केरल और केंद्र की सरकारों को भी इस मामले में पक्ष बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भारत के अटॉर्नी जनरल केसी वेणुगोपाल से भी प्रतिक्रिया माँगी है। AG ने बताया कि ये मामला मालंकारा चर्च में जैकोबाइट-ऑर्थोडॉक्स गुटों के संघर्ष से उपज कर आया है।

ये संघर्ष भी सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था, लेकिन तीन जजों की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के बाद फैसला दे दिया था। मुकुल रोहतगी ने ध्यान दिलाया कि ऐसे मामले संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ ये भी देखना होगा कि क्या कन्फेशन एक अनिवार्य धार्मिक प्रक्रिया हुआ करती थी। किसी बिलिवर की ‘राइट टू प्राइवेसी’ का धार्मिक प्राधिकरण के आधार पर पादरी द्वारा उल्लंघन किया जा सकता है या नहीं, उन्होंने इस पर भी विचार करने की सलाह दी।

उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ पादरी महिलाओं द्वारा किए गए कन्फेशन का गलत इस्तेमाल करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं, जिस पर रोहतगी ने कहा कि वो याचिका में संशोधन कर ऐसी घटनाओं को जोड़ेंगे। कन्फेशन को लेकर इससे पहले भी याचिकाएँ आ चुकी हैं। कन्फेशन के अंतर्गत लोग पादरी की उपस्थिति में अपने ‘पापों’ को लेकर प्रायश्चित करते हैं।

2018 में केरल हाईकोर्ट ने कन्फेशन को हटाने की याचिका को रद्द करते हुए कहा था कि जब कोई किसी खास धर्म को मानता है तो इसका अर्थ है कि वो इसके अंतर्गत आने वाले नियम-कानूनों को भी स्वीकार करता है। हाईकोर्ट ने कहा था कि ये प्रक्रिया ईसाई महजब का एक अंग रहा है और याचिककाकर्ता किसी धर्म की परम्पराओं से नाराज हैं तो वो उसे छोड़ सकते हैं। NCW भी यौन शोषण के आरोपों के कारण इस प्रक्रिया को बंद करने की सलाह दे चुका है।

केरल के एक नन ने अपनी आत्मकथा में आरोप लगाया था कि एक पादरी अपने कक्ष में ननों को बुला कर ‘सुरक्षित सेक्स’ का प्रैक्टिकल क्लास लगाता था। इस दौरान वह ननों के साथ यौन सम्बन्ध बनाता था। उसके ख़िलाफ़ लाख शिकायतें करने के बावजूद उसका कुछ नहीं बिगड़ा। उसके हाथों ननों पर अत्याचार का सिलसिला तभी थमा, जब वह रिटायर हुआ। सिस्टर लूसी ने लिखा था कि उनके कई साथी ननों ने अपने साथ हुई अलग-अलग घटनाओं का जिक्र किया और वो सभी भयावह हैं।

लॉरा ने जो 2018 में कहा, वही 2021 में ट्रंप के साथ कर रहा ट्विटरः अमेरिकी संसद की सुनवाई में जैक डर्सी को लगाई थी लताड़

आज जब ट्विटर अमेरिका की राजनीति में बढ़-चढ़कर हस्तक्षेप कर रहा है और उसने वहाँ के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हैंडल को सस्पेंड कर दिया है, लोग सितंबर 2018 की उस घटना को याद कर रहे हैं, जब एक महिला एक्टिविस्ट लॉरा लूमर ने कैपिटल हिल में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ चल रही सुनवाई में घुस कर ट्विटर के CEO जैक डॉर्सी को खरी-खोटी सुनाई थी। उस समय ट्विटर और फेसबुक को सीनेटरों के कई सवालों के जवाब देने पड़े थे।

जहाँ ट्विटर की तरफ से जैक डॉर्सी वहाँ पहुँचे हुए थे, फेसबुक ने COO शेरिल सैंडबर्ग को अपना पक्ष रखने के लिए भेजा था। उनसे पूछताछ की गई थी कि वो अपने प्लेटफॉर्म्स पर गालियों और घृणा फैलाने वाले कंटेंट्स से कैसे निपट रहे हैं। साथ ही चुनावी हस्तक्षेप से लेकर राजनीतिक भेदभाव के सम्बन्ध में भी सवाल किए गए थे। हालाँकि, गूगल ने अपने प्रतिनिधि को भेजने से इनकार कर दिया था, जिससे एक खाली कुर्सी को वहाँ रखा गया था।

अब लोग उस महिला एक्टिविस्ट लॉरा लूमर को याद कर रहे हैं। लॉरा लूमर ने सुनवाई के बीच में ही घुस कर ट्विटर के CEO जैक डॉर्सी पर आरोप लगाए थे। उन्होंने वहाँ पर आशंका जाहिर कर दी थी कि ट्विटर भविष्य में क्या करने वाला है। इस्लामी कट्टरपंथियों के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए लॉरा लूमर को उबर और लिफ्ट जैसी राइडिंग सर्विस कंपनियों के अलावा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने भी प्रतिबंधित कर रखा है।

उन्होंने कॉन्ग्रेसनल सुनवाई में घुस कर जैक डॉर्सी को झूठा बताते हुए कहा उन्हें पक्षपात वाला रवैया त्यागने की चेतावनी दी थी और आरोप लगाया था कि ट्विटर विरोधी विचारधारा के लोगों को सेंसर करने में लगा हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया था कि न सिर्फ ट्विटर ने कन्जर्वेटिव्स को सेंसर किया, बल्कि चुनाव में भी पक्षपात किया। उस दौरान रिप्रेजेन्टेटिव बिली लॉन्ग जोर-जोर से बोलने लगे थे, ताकि लोग उनकी आवाज़ न सुन पाएँ।

लॉरा लूमर ने तब कहा था, “राष्ट्रपति महोदय, हमलोगों की मदद कीजिए। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, हमारी मदद कीजिए। जैक डॉर्सी चुनाव को प्रभावित करना चाह रहे हैं। वो चुनाव को अपने हिसाब से मोड़ देना चाहते हैं। डेमोक्रेट्स इस चुनाव को चुरा सकें, इसीलिए वो ऐसा कर रहे हैं। इसीलिए वो कन्जर्वेटिव्स को शैडो-बैन कर रहे हैं और उन्हें सेंसर कर रहे हैं।” उन्होंने ऐसा बोलते समय मोबाइल से खुद का वीडियो भी बनाया था।

उन्होंने जैक डॉर्सी पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को भी ऑनलाइन सेंसर करने का आरोप लगाया था। उन्होंने उस घटना का भी जिक्र किया था, जब ट्विटर पर डोनाल्ड ट्रम्प के अकाउंट को सस्पेंड कर दिया गया था और इसके लिए कंपनी ने एक कर्मचारी पर आरोप मढ़ दिए थे। एक ट्विटर कस्टमर सपोर्ट कर्मचारी को इसके लिए दोषी ठहराते हुए ट्विटर ने कहा था कि वो आंतरिक जाँच बिठा रहे हैं और ऐसा आगे नहीं होगा।

बता दें कि सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म ट्विटर ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हैंडल को सस्पेंड कर दिया है। साथ ही उनके एक और आधिकारिक ट्विटर हैंडल ‘टीम ट्रम्प’ को भी सस्पेंड कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने POTUS (प्रेजिडेंट ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका) के ट्विटर हैंडल से ट्वीट्स किए, लेकिन ट्विटर ने उन ट्वीट्स को भी हटा दिया। हिंसा फैलाने की आशंका का आरोप लगा कर ऐसा किया गया है।

यूपी पुलिस ने मंदिर के पास गायों की हत्या करने वाले कसाइयों को घेरा, मुठभेड़ के बाद 3 को दबोचा

गेटर नोएडा में पुलिस और गाय की हत्या करने वाले कसाइयों के बीच मुठभेड़ हुई। इसके बाद पुलिस ने 3 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार किए गए आरोपितों पर एनसीआर के कई थानों में गोकशी के मामले दर्ज हैं। पुलिस फ़िलहाल इस मामले से जुड़े अन्य आरोपितों की तलाश कर रही है।  

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ पुलिस उपायुक्त (ज़ोन तृतीय) राजेश कुमार सिंह ने बताया कि गुरुवार (7 जनवरी 2021) की देर रात ग्रेटर नोएडा की दादरी पुलिस मायचा गाँव के नज़दीक खोजबीन कर रही थी। इस बीच पुलिस को जानकारी मिली कि कई लोग उसी गाँव में गोकशी करने की योजना बना रहे हैं। 

पुलिस ने सक्रियता दिखाते हुए सभी आरोपितों को गाँव के मंदिर के पास घेर लिया। बदमाशों ने खुद को पुलिस से घिरा देख कर फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में पुलिसकर्मियों ने भी बदमाशों पर गोली चलाई। नतीजतन शाह आलम और गफ्फार के पैरों में गोली लगी। इस बीच बदमाशों के 4 साथी मौके का फ़ायदा उठा कर भागने में कामयाब रहे। 

पुलिस फ़िलहाल उन चारों की तलाश में जुट गई है। गिरफ्तार किए गए आरोपितों से की गई पूछताछ में पुलिस को पता चला कि वे गायों की हत्या करने वाले कसाई हैं। लगभग तीन दिन पहले ही इन आरोपितों ने दादरी थाना क्षेत्र के एक गाँव में गोकशी की थी।