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चीन ने WHO की जाँच टीम को नहीं दी देश में एंट्री: कोरोना वायरस पर पोल खुलने का सता रहा डर

कोरोना वायरस आखिर कहाँ से आया? दुनिया भर में तबाही मचाने वाले इस घातक महामारी को लेकर अक्‍सर यह सवाल उठते रहे हैं। कई देश इसके लिए सीधे-सीधे चीन को जिम्‍मेदार ठहराते रहे हैं तो चीन ने इससे हमेशा इनकार किया है। इस बीच खबर आ रही है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) की एक टीम चीन के वुहान शहर में इस वायरस के उत्पत्ति की जाँच करने के लिए निकली थी लेकिन अब तक इन लोगों को चीन आने की परमिशन नहीं मिल पाई है।

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ दल को चीन आने की अनुमति अब तक न दिए जाने पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख ने चीनी अधिकारियों के रवैये पर निराशा जताई है। जेनेवा में एक प्रेस कांफ्रेस में डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने कहा कि हमें यह जानकर बहुत धक्का लगा कि इस जाँच दल को चीन ने अब तक अपने यहाँ आने की इजाजत नहीं दी।

डब्ल्यूएचओ प्रमुख टेड्रोस एडहैनम घेब्रयेसिस (Tedros Adhanom Ghebreyesus) ने चीन की आलोचना करते हुए कहा, “हमें पता चला कि चीनी अधिकारियों ने अभी तक टीम के चीन दौरे के लिए अंतिम रूप से अनुमति नहीं दी है। मैं इस खबर से बहुत निराश हूँ कि दो सदस्यों ने पहले ही अपनी यात्रा शुरू कर दी थी और अन्य को अंतिम मिनट तक अनुमति नहीं मिली।”

टेड्रोस ने कहा कि टीम चीन में कोरोना वायरस की उत्पत्ति की जाँच करेगी और देश में प्रकोप के शुरुआती चरणों के दौरान क्या हुआ इसका पता लगाएगी। उन्होंने कहा कि उन्होंने चीनी अधिकारियों से चीन में टीम के प्रवेश को सुनिश्चित करने का आग्रह किया है, ताकि मिशन जल्द से जल्द शुरू हो सके। उन्होंने कहा, “हम चीन के वरिष्ठ अधिकारियों के संपर्क में हैं और हमने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि यह मिशन डब्ल्यूएचओ और अंतर्राष्ट्रीय टीम की प्राथमिकता में है।”

इससे पहले मंगलवार (जनवरी 5, 2021) को डब्लूएचओ के महानिदेशक ने कोरोना वैक्सीन को लेकर भारत की सराहना की। महामारी को खत्म करने के लिए भारत सरकार द्वारा लिए गए फैसलों की प्रशंसा करते हुए घेब्रयेसिस ने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े वैक्सीन निर्माता के रूप में भारत ने कोविड-19 महामारी को समाप्त करने के अपने संकल्प को पूरा किया है।

कोरोना वायरस से निपटने को लेकर विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (WHO) पर भी सवाल उठते रहे हैं। डब्‍ल्‍यूएचओ से अमेरिका की नाराजगी इस कदर बढ़ी कि उसने इस वैश्विक संस्‍था से अपना नाता ही तोड़ लिया। अमेरिका, ब्राजील जैसे देशों ने विश्‍व स्वास्थ्य संगठन पर आरोप लगाया कि यह वैश्विक संस्‍था अब चीन के नियंत्रण में जा चुकी है। 

अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीधे तौर पर कहा कि संगठन अपने उद्देश्यों की पूर्ति करने और उनमें सुधार करने में नाकाम रहा। इन आरोपों के बीच डब्‍ल्‍यूएचओ को इस जाँच की जिम्‍मेदारी सौंपी गई कि आखिर कोरोना वायरस संक्रमण की उत्‍पत्ति कहाँ से हुई, जिसके कारण दुनियाभर में करोड़ों लोगों ने अपनों को खोया और बीमार पड़े। लेकिन जाँच के लिए जा रहे डब्‍ल्‍यूएचओ के वैज्ञानिकों को चीन ने अपने यहाँ आने से रोक दिया है।

चीन के इस रवैये के बाद उसकी नीयत को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं कि क्‍या वास्‍तव में कोविड-19 को लेकर ऐसा कुछ है, जिसे वह छिपा रहा है? कोविड-19 की उत्पत्ति की जाँच के सिलसिले में जाने वालों को परेशान करने, उनका पीछा करने, उनका रास्‍ता रोकने और हाल के दिनों में चीन में कई छोटी प्रयोगशालाओं को बंद किए जाने की रिपोर्ट भी बीते कुछ समय में सामने आई है, जिसे देखते हुए चीन को लेकर आशंकाएँ बढ़ रही हैं।

‘समझौता कर लो, जो माँगोगी वो मिलेगा’: सपा नेता आजम खान के ‘रिश्तेदार’ ने दहेज के नाम पर सूफिया को किया प्रताड़ित, दिया तीन तलाक

उत्तर प्रदेश के बरेली में तीन तलाक के एक मामले में सपा नेता आजम खान का नाम उछला है। खबर है कि एक पीड़िता ने पुलिस अधिकारी पर यह आरोप लगाया कि उसे न्याय दिलाने की बजाय पुलिस ने उससे कहा कि वह समझौता कर ले, क्योंकि उसके ससुराल वाले आजम खान के समधी हैं और वो जो भी माँगेगी उसे वो सब मिलेगा। हालाँकि, पुलिस अधिकारी ने अपने ऊपर लगे आरोपों को बेबुनियाद बता कर खारिज किया है।

पत्रिका की खबर के अनुसार, सूफिया खान नाम की महिला कांकरटोला की रहने वाली है। उसका निकाह 30 मई 2020 को फहाद अली से हुआ था। उसके मुताबिक फहाद के मामा सपा नेता आजम खान के समधी हैं इसलिए उनसे कहा जा रहा है कि वो समझौता कर ले। लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं है। वह बताती हैं कि निकाह के कुछ दिन बाद से ही उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और इसी बीच उसके पति ने उसे तीन तलाक देकर घर से भी निकाल दिया।

कोई रास्ता न दिखने पर महिला ने 1 नवंबर को बारादरी पुलिस में इस संबंध में शिकायत की और पुलिस ने उसके बयान के आधार पर उसके शौहर फहाद, सास जरीना, जेठानी रूबी और जेठ रिजवान व आमिर के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया। मगर दो माह बीत जाने के बाद भी जब इनके विरुद्ध पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया, तो महिला ने दोबारा आवाज उठाई।

इसके साथ ही पुलिस अधिकारी शितांशु शर्मा पर इल्जाम लगाकर कहा कि वह उस पर समझौते का दबाव बना रहे हैं, जबकि पुलिस इंस्पेक्टर का कहना है कि महिला के शौहर की ओर से पहले ही उसके व उसके परिजनों के विरुद्ध डकैती का केस दर्ज है। और इसीलिए वह इस मामले में अपनी जाँच कर रहे हैं। वहीं महिला का कहना है कि आरोपित शौहर ने उसके भाई व परिजनों के ख़िलाफ़ झूठे केस दर्ज करवाए हैं, जिसकी जाँच शितांशु शर्मा कर रहे हैं।

यहाँ बता दें कि तीन तलाक का एक अन्य मामला उत्तर प्रदेश के हरदोई से आया है। यहाँ बेटे की चाहत में एक शौहर ने अपनी बीवी को तीन तलाक दिया और ससुराल वाले उसे ताने दे देकर प्रताड़ित करते रहे। महिला की शिकायत पर शौहर समेत 7 के विरुद्ध मामला दर्ज हुआ है।

पीड़िता ने बताया कि उसका निकाह साल 2015 में नजीफ से हुआ था। उसके तीन साल बाद उसने एक बेटी को जन्म दिया, जिसे देख पति, सास, ससुर सब मिलकर उसे प्रताड़ित करने लगे। जब महिला तंग होकर मायके गई तो एक माह पहले नजीफ वहाँ पहुँचा और उसे तीन तलाक देकर आ गया।

पुलिस ने इस संबंध में मुजीब, इस्लाम, गुलाम, मो इसहाक, नूरजहाँ व सकीना के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। पुलिस पूरे मामले की जाँच कर रही है और उसी के आधार पर आरोपितों के विरुद्ध कार्रवाई होगी।

हाथरस CBI चार्जशीट में चौकाने वाले खुलासे: पॉलीग्राफ टेस्ट में संदीप ने अधिकतर दिए गलत जवाब, रिश्ते को लेकर…

हाथरस के बूलगड़ी गाँव में 14 सितंबर को दलित लड़की के साथ हुए कथित बलात्कार व उसके बाद इलाज के दौरान हुई उसकी मौत के बाद पूरे देश से आक्रोश की आवाज उठी थी। पीड़िता की मौत के बाद यूपी सरकार ने सीबीआई को इसकी जाँच सौंपी थी। वहीं अब घटना के मुख्य आरोपित को लेकर एक चौकाने वाली जानकारी सामने आई है कि पॉलीग्राफ टेस्ट में संदीप ने अधिकतर जवाब गलत दिए है।

दरअसल, घटना के बाद से ही संदीप अपनी मौजूदगी पिता के साथ घर के बाहर बता रहा था, जबकि पॉलीग्राफी टेस्ट में उसका घटनास्थल के आस-पास ही होना पाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, पॉलीग्राफी टेस्ट के दौरान संदीप से जो भी सवाल पूछ गए, उसका उसने सही तरीके से जवाब नहीं दिया था। जिस वजह उस पर संदेह बना हुआ है।

बता दें संदीप को लेकर उठ रहे सवालों के जवाब के लिए आरोपितों का पॉलीग्राफी टेस्ट कराया गया था। पॉलीग्राफी टेस्ट की रिपोर्ट में संदीप का भी घटना स्थल के आसपास होना पाया गया है। इस टेस्ट के ज्यादातर सवाल पीड़िता से जुड़े हुए थे। पीड़िता पर हमले के समय वह कहाँ पर था? पीड़िता से उसका मेलजोल था या नहीं, उससे फोन पर बातचीत होती थी या नहीं, वह युवती की निगरानी करता था या नहीं? बाकी आरोपितों का कनेक्शन क्या है। ऐसे कई सवाल किए गए।

जाँच के दौरान जवाबों के साथ-साथ ही आरोपित संदीप के हाव-भाव का भी अध्ययन किया गया। पॉलीग्राफी टेस्ट रिपोर्ट के अनुसार संदीप के जब यह पूछा गया कि क्या घटना के दिन 14 सितंबर को वह उस खेत की निगरानी कर रहा था, जिस पर पीड़िता जा रही थी तो उसका जवाब नहीं था। टेस्ट रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि उसने यह झूठ बोला।

इसी तरह पॉलीग्राफ टेस्ट रिपोर्ट मे जब उससे यह पूछा गया कि क्या वह 14 सितंबर को पीड़िता पर खेत मे हुए जानलेवा हमले में शामिल था। तब भी उसने इस बात से इनकार कर दिया था। जोकि रिपोर्ट में झूठ निकला। वहीं जब उससे यह पूछा गया कि क्या घटना के दिन छोटू के खेत में उसने पीड़िता तो छुआ था तो इसका उत्तर भी उसने न में ही दिया।

पॉलीग्राफी टेस्ट के हिसाब से उसका यह उत्तर भी गलत था। इसी तरह उससे यह सवाल भी पूछे गए कि क्या उसे पीड़िता का दुपट्टे से गला दबाया था और क्‍या उसका पीड़ि‍ता से कोई संबंध था तो उसने इसका उत्‍तर भी न में दिया। पॉलीग्राफी टेस्ट के हिसाब से यह उत्तर भी उसके संशयपूर्ण ही थे। बता दें इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को होनी है।

गौरतलब है कि केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने 22 सितंबर को पीड़िता द्वारा दिए गए अंतिम बयान के आधार पर चार आरोपितों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया था। सीबीआई ने विशेष न्यायालय में चारों आरोपितों संदीप, रवि, रामू और लवकुश के खिलाफ धारा 376, 376 ए,376 डी, 302 व 3(2)(5) एससी-एसटी एक्ट के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।

वहीं सीबीआई को दोनों की कॉल डिटेल चेक करने पर मालूम चला कि 17 अक्टूबर 2019 से 3 मार्च 2020 के बीच में दोनों ने एक-दूसरे को 105 बार कॉल किया था। मृतका भी संदीप को क़ॉल करती थी। दोनों की फोन पर बातें हुआ करती थीं। लेकिन एक समय के बाद लड़की से बातचीत बंद होने पर संदीप नाराज हो गया था।

कॉन्ग्रेस में बिखराव का बिगुल: 11 विधायकों की पार्टी छोड़ने की तैयारी, BJP ने कहा- तुष्टिकरण की राजनीति छोड़ने वालों का है स्वागत

कॉन्ग्रेस नेता भरत सिंह के दावे ने बिहार का सियासी पारा बढ़ा दिया है। उन्होंने दावा किया कि कॉन्ग्रेस के 19 में से 11 विधायक पार्टी छोड़ने का मन बना चुके हैं। कॉन्ग्रेस नेता भरत सिंह ने इस बात का भी दावा किया कि यह ज्यादातर विधायक वहीं हैं जिन्होंने पैसे के बल पर टिकट हासिल किया था। इसके बाद यह चुनाव जीत गए। भरत सिंह ने साफ-साफ कहा कि पार्टी के 11 विधायक आने वाले दिनों में एनडीए में जा सकते हैं। भरत सिंह ने तो यह भी दावा कर दिया कि कॉन्ग्रेस विधायक दल के नेता अजीत शर्मा भी ऐसे लोगों में शामिल हैं जो पार्टी को तोड़ना चाहते हैं।

सिंह की मानें तो मदन मोहन झा वही रास्ता अपना रहे हैं जो अशोक चौधरी ने अपनाया था। उन्होंने ये भी खुलासा किया कि कॉन्ग्रेस के 11 विधायकों ने पैसे देकर टिकट लिया और जीते। लेकिन अब ये ही 11 विधायक एनडीए में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं।

भरत सिंह ने तो यह भी कह दिया जो विधायक पार्टी छोड़ने को तैयार हैं उनका मार्गदर्शक प्रदेश के पार्टी अध्यक्ष मदन मोहन झा, राज्यसभा सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह और वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता सदानंद सिंह है। जेडीयू ने कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता के इस बयान पर प्रतिक्रिया दी है। पार्टी प्रवक्ता राजीव रंजन ने कहा है कि भरत सिंह का यह बयान जाहिर करता है कि कॉन्ग्रेस में भगदड़ की स्थिति बनी हुई है। संभवतः इसी कारण शक्ति सिंह गोहिल ने प्रभारी पद से इस्तीफा भी दिया है।

बता दें कि एक दिन पहले ही बिहार कॉन्ग्रेस प्रभारी और सांसद शक्ति सिंह गोहिल ने आलाकमान को अपने इस्तीफे की पेशकश की थी। उन्होंने एक ट्वीट के जरिए बताया था कि वह अपने स्वास्थ्य कारणों के कारण बिहार के प्रभार से मुक्त होना चाहते हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल के पद छोड़ने की इच्छा को सहमति दे दी है। गोहिल को बिहार प्रभारी की जिम्मेदारी से मुक्त करते हुए भक्त चरण दास को यह दायित्व सौंप दिया गया है।

यही नहीं अपने दावे में भरत सिंह ने आरजेडी से कॉन्ग्रेस को अलग होने की सलाह भी दी है। आपको बता दें कि विधानसभा चुनाव 2020 में खराब प्रदर्शन के बाद बिहार कॉन्ग्रेस में विवाद की स्थिति बनी हुई है। पार्टी नेताओं में आपसी मतभेद की चर्चाएँ लगातार बनी हुई हैं।

वहीं भरत सिंह का बयान सामने आने के बाद बीजेपी प्रवक्ता निखिल आनंद ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि तुष्टिकरण की राजनीति छोड़ने वालों का स्वागत है। उन्होंने कहा कि बीजेपी की राजनीति विचारधारा प्रेरित है, सत्ता प्रेरित नहीं है। हम किसी को तोड़ने-फोड़ने में विश्वास नहीं करते हैं। बीजेपी प्रवक्ता ने कहा, “कॉन्ग्रेस पार्टी में टूट की खबर पार्टी के भीतर से ही आ रही है। इससे साबित होता है कि पार्टी में भयंकर असंतोष है और दिल्ली या बिहार के नेतृत्व पर लोगों को अब भरोसा नहीं रह गया है। राहुल गाँधी का मन देश से ज्यादा विदेश में लगता है और कॉन्ग्रेस पार्टी अब एड-हॉक या प्रॉक्सी तरीके से चलाई जा रही है।”

1 से सीधा 234 टेस्टिंग लैब, 51 लाख मजदूरों को रोजगार: ‘TIME’ मैगजीन में CM योगी के कोरोना नियंत्रण पर लेख

कोरोना काल में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा किए गए कार्यों की गूँज अब दुनिया भर में सुनाई दे रही है। अंतरराष्ट्रीय ‘Time’ मैगजीन में छपे एक लेख में इसकी चर्चा हुई है। ‘Time’ मैगजीन में छपे लेख में कहा गया है कि कोरोना से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उठाए गए क़दमों से पूरी दुनिया प्रभावित है और WHO ने भी इसकी प्रशंसा की है। WHO ने कहा था कि यूपी सरकार ने कांटेक्ट ट्रेसिंग जो कदम उठाए, वो अनुकरणीय हैं।

पत्रिका मे लिखा गया है कि पूरे उत्तर प्रदेश में 70,000 स्वास्थ्य कर्मचारियों ने दिन-रात मेहनत की और इन फ्रंटलाइन वर्कर्स ने कोरोना मरीजों के हाई-रिस्क संपर्कों को ट्रेस किया। भारत में सबसे ज्यादा कोरोना टेस्टिंग करने के लिए उत्तर प्रदेश पहले ही रिकॉर्ड स्थापित कर चुका है। एक दिन में राज्य में 1.75 लाख टेस्ट्स किए जा रहे हैं। सीएम योगी के कामकाज को ‘विषम परिस्थितियों में निपुण प्रबंधन का अभूतपूर्व उदाहरण’ करार दिया। यह आलेख ‘उत्तर प्रदेश द्वारा प्रदान की गई सामग्री’ लिख कर छापा गया है।

‘Time’ के इस लेख में लिखा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तभी से सक्रियता दिखानी शुरू कर दी, जब कोरोना का पहला मामला आया। लिखा है कि उन्होंने कई राज्यों और यहाँ तक कि देश में सबसे पहले कदम उठाए और स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना शुरू कर दिया। कोरोना के फ्लो चार्ट, रोकथाम, सतर्कता, अन्य जागरूकता के लिए मेडिकल कर्मचारियों का ‘सीएम योगी के योग्य प्रशासन के अंतर्गत’ प्रशिक्षण हुआ।

मुख्यमंत्री ने 11 वरिष्ठ अधिकारियों की एक टीम बनाई, जिनमें सभी को कोरोना से निपटने के लिए होने वाली तैयारियों की लगातार समीक्षा का काम दिया गया। इस ‘टीम-11’ के सभी अधिकारियों को अलग-अलग काम सौंपे जाते थे। आलेख कहता है कि बाकी राज्यों ने भी इसका अनुकरण किया। आगे लिखा है कि सीएम योगी 3 दिन के लॉकडाउन का ऐलान करने वाले पहले सीएम थे और उन्होंने ज़रूरी सामाग्रियों की जनता तक पहुँच सुनिश्चित करने के बाद ही ये कदम उठाया।

Time’ मैगजीन में जिक्र किया गया है कि जब कोरोना की रोकथाम का एक ही मिशन था और वो था ‘टेस्टिंग’, तब यूपी में मात्र एक ही टेस्टिंग लैब हुआ करता था और मार्च 22, 2020 तक तो मात्र 60 टेस्ट्स की ही क्षमता थी। लेकिन, सरकारी संसाधनों और मशीनरी का ऐसा उपयोग किया गया कि आज राज्य में 234 टेस्टिंग लैब्स और इनमें से 131 सरकारी हैं। राज्य में अब तक 2.5 करोड़ कोरोना टेस्टिंग हो चुकी हैं।

साथ ही बताया गया है कि कैसे सभी जिलों में ‘इंटीग्रेटेड कण्ट्रोल एंड कमांड सेंटर्स (ICCC)’ की स्थापना की गई और टेस्टिंग, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, होम आइसोलेशन और मेडिकल टीम को लोगों के घर भेजने सहित कई मामलों में ये ICCC का बहुत बड़ा रोल साबित हुआ। लेकिन, पत्रिका ने सबसे कड़ा टास्क माना है 40 लाख प्रवासी मजदूरों के रहने-खाने की व्यवस्था करना। 1660 ट्रेनों के जरिए इन प्रवासी मजदूरों को घर वापस लाया गया।

पत्रिका में इसे मास्टरस्ट्रोक करार दिया है। मजदूरों को स्वच्छ भोजन और पानी देने, कम्युनिटी किचेंस की व्यवस्था और लॉकडाउन में उनके बीच 6.75 करोड़ फ़ूड पैकेट्स बाँटने जैसे क़दमों की प्रशंसा की गई है। विभिन्न पेंशन योजनाओं के तहत 86.8 लाख लोगों को 2 महीने का एडवांस पेंशन दिया गया। अप्रैल से ही अनाज देने शुरू हो गए। 40 लाख मजदूरों की ‘स्किल मैपिंग’ हुई और सबके लिए MNREGS (मनरेगा) कार्ड बने।

‘Time’ मैगजीन के इस आलेख के अनुसार, 8 लाख MSME यूनिट्स को सक्रिय किया गया और लेबर एम्प्लॉयमेंट कमीशन का गठन किया गया। वहाँ 51 लाख मजदूरों को रोजगार मिला। ‘आत्मनिर्भर योजना’ के तहत 4.35 लाख इंडस्ट्री यूनिट्स को 10744 करोड़ रुपए बतौर लोन बाँटे गए। इन सबके अलावा 5.81 लाख नए इंडस्ट्री यूनिट्स की स्थापना हुई और उन्हें 15541 करोड़ रुपए लोन दिए गए। अकेले मई 14, 2020 को 98743 यूनिट्स को 2447 करोड़ रुपए के लोन बाँटे गए।

साथ ही इसका भी जिक्र किया गया है कि जिस तरह से युवाओं के बीच खुद का बिजनेस शुरू करने के उद्देश्य से नई स्टार्टअप नीति लाई गई, उससे 50000 लोगों को सीधे और 1 लाख को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा होगा। राज्य में कोरोना के कारण मृत्यु दर मात्र 1.3% है जबकि, रिकवरी दर 94% हो गया है। खुद पीएम मोदी ने कहा था कि यूपी सरकार की कड़ी तैयारियों से कम से कम 85,000 जानें बची हैं, जिसके बारे में 2017 से पहले सोचा भी नहीं जा सकता था।

बता दें कि  योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की सरकार ने तो शुरू से केंद्र सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर वुहान वायरस (कोविड 19) के खिलाफ लड़ाई जारी रखी हुई है। उन्होंने संवेदना के आधार पर एक-एक कर ऐसे अनेक निर्णय लिए जो गरीब, दिहाड़ी मज़दूर और कमज़ोर तबके के लोगों के लिए इस लॉकडाउन के दौरान अति आवश्यक हैं या होंगी। उन्होंने गरीबों के लिए स्वास्थ्य, खाद्यान्न, निश्चित धनराशि और अन्य मूलभूत सुविधाएँ प्रदान करने के लिए प्रबंध किया।

नोट: नए तथ्यों के आलोक में इस लेख को अपडेट किया गया है।

Video: दिल्ली की खाली सड़क पर खड़ी गाय को दिनदहाड़े कार में भरकर ले गए 3 युवक

दिल्ली के शास्त्री पार्क इलाके से गोवंश को दिनदहाड़े उठाकर ले जाने की एक वीडियो सामने आई है। वीडियो में देख सकते हैं कि सड़क पर शांति से खड़ी एक गाय को जबरदस्ती तीन युवक अपने साथ कार में भरकर ले गए।

‘सुदर्शन न्यूज’ के एडिटर इन चीफ सुरेश चव्हाणके ने इस वीडियो को अपने ट्विटर पर साझा किया है। वह लिखते हैं, “दिल्ली मेवात के रिकॉर्ड तोड़ रही है। शास्त्री पार्क क्षेत्र में गाय को बीच सड़क से उठा कर जबरन कार में डाला जा रहा है।” वह पूछते हैं कि जब विशाल शरीर का गोवंश ऐसे गायब हो रहा तो बहन-बेटियाँ व बच्चे कितने सुरक्षित हैं?”

ये वीडिया किस समय और किस दिन की है ऑपइंडिया इसकी पुष्टि नहीं करता। इससे पहले सुदर्शन न्यूज़ द्वारा ही जनवरी 05, 2021 को यह वीडियो अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर किया गया था। मगर, सुरेश चव्हाणके के पोस्ट पर उत्तर पूर्वी दिल्ली पुलिस ने ट्वीट करके जानकारी दी है कि वो इस मामले में एक्शन ले चुके हैं और अपराध में शामिल अभियुक्तों की पहचान और गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे हैं।

शास्त्री पार्क, उत्तर पूर्वी दिल्ली का एक इलाका है। इसके आस-पास मुस्लिम बहुल आबादी के क्षेत्र हैं। इस इलाके से सामने आई वीडियो में हम देख सकते हैं कि एक खुली सड़क पर दो गाय खड़ी थीं। तभी एक कार वहाँ उन्हें देख कर रुकी और तीन युवकों ने बाहर उतर कर उनमें से छोटी गाय को कार में घुसाया और उसे लेकर वहाँ से फरार हो गए।

दिन-दहाड़े दिल्ली की सड़क पर इस घटना को अंजाम दिया गया। लोग जब विरोध करने वहाँ पहुँचते तब तक कार जा चुकी थी। वीडियो के अंत में कुछ लोगों को शॉल ओढ़े कैमरे में भाग कर सामने आते दिख रहे हैं। लेकिन वह भी कार को रोक पाने में सफल नहीं होते।

बता दें कि दिल्ली में गोवंशों के साथ बर्बरता के मामले पिछले दिनों कुछ ज्यादा खबरों में आए हैं। अभी हाल में दिल्ली के द्वारका सेक्टर-23 स्थित पोचनपुर गाँव में एक नाले से गायों का शव और इनके अवशेष मिले थे। पशु चिकित्सक, फॉरेंसिक और क्राइम टीम ने मौके पर पहुँच कर जाँच भी की थी बाद में मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था और दो पुलिसकर्मियों को लापरवाही के आधार पर सस्पेंड भी कर दिया गया था।

यूपी में टेरर फंडिंग और रोहिग्याओं की तलाश में ATS की छापेमारी: अब्दुल मन्नान सहित आधा दर्जन से ज्यादा संदिग्ध गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश में टेरर फंडिंग और रोहिंग्या निवासियों की तलाश में बुधवार को यूपी ATS ने बड़ी कार्रवाई की है। एटीएस ने संदिग्धों की तलाश में संत कबीर नगर स्थित खलीलाबाद, बस्ती और अलीगढ़ समेत कई जिलों में छापेमारी की है। इस दौरान खलीलाबाद से जेई अब्दुल मन्नान सहित करीब आधा दर्जन से ज्यादा संदिग्ध लोगों को ATS ने हिरासत में लिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, यूपी आतंकवाद निरोधक दस्ता शाम तक किसी बड़े राज से पर्दाफाश कर सकती है। वहीं इस छापेमारी की भनक एसटीएस ने स्थानीय पुलिस वालों को भी नहीं लगने दी है। यूपी एटीएस अभी पूरे मामले की तफ्तीश में जुटी है।

एनबीटी के रिपोर्ट के अनुसार एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “यह छापेमारी अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्याओं को लेकर की गई है। हम फाइनेंस एंगल से भी केस को इनवेस्टिगेट कर रहे हैं। यूपी एटीएस लखनऊ में इस संबंध में प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करने वाली है।”

इसके अलावा यूपी एटीएस की एक टीम महाराष्ट्र में भी छापेमारी कर रही है, जिसमें उसकी मदद महाराष्ट्र एटीएस कर रही है। वहीं तेलंगाना में हैदराबाद में भी छापेमारी की खबर है। अभी छापेमारी से जुड़ी कोई भी आधिकारिक जानकारी एटीएस की ओर से साझा नहीं की गई है।

इससे पहले 29 दिसंबर को एटीएस ने गोरखपुर में गोलघर के बलदेव प्लाजा स्थित नईम एंड संस मोबाइल शाप समेत फर्म की दो दुकानों पर छापा मारा था। इस मामले में भी ATS को टेरर फंडिंग, हवाला और देश विरोधी तत्वों की खुफिया जानकारी मिली थी। करीब आठ घंटे से ज्यादा चली इस जाँच में टीम ने दुकान में लगे कंप्यूटर की हार्ड डिस्क और अन्य दस्तावेज कब्जे में लिया था।

गौरतलब है कि यूपी पुलिस की ATS ने दो संदिग्ध बांग्लादेशी आतंकियों को सहारनपुर से गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार संदिग्ध आतंकियों के नाम इकबाल और फारुख था। पुलिस ने दोनों आरोपितों के पास से फर्जी आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड समेत तमाम अन्य दस्तावेज बरामद किए थे।

‘मनमोहन को PM पद दान में मिला, जबकि मोदी ने हासिल किया, कॉन्ग्रेस खो चुकी है अपना करिश्माई नेतृत्व’: प्रणब मुखर्जी

भारत के पूर्व राष्ट्रपति और कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता रहे प्रणब मुखर्जी का पिछले साल ब्रेन सर्जरी के बाद निधन हो गया था। हालाँकि, आखिरी समय में उन्होंने अपने संस्मरण को पूरा किया था। अब उनकी लिखी किताब ‘द प्रेजिडेंशियल ईयर्स’ के सामने आने के बाद इसके कई पहलुओं पर हर तरफ चर्चा भी शुरू हो गई है।

पूर्व राष्ट्रपति ने यह पुस्तक पिछले साल अपने निधन से पहले लिखी थी। मंगलवार (जनवरी 5, 2021) को यह पुस्तक बाजार में आई। उनकी आत्मकथा ‘The Presidential Years’ (द प्रेसिडेंसियल ईयर्स) के अनुसार, कॉन्ग्रेस का अपना करिश्माई नेतृत्व खत्म होने की पहचान नहीं कर पाना 2014 के लोकसभा में उसकी हार के कारणों में से एक रहा।

पूर्व राष्ट्रपति ने आत्मकथा में उल्लेख किया है कि 2014 के लोकसभा चुनाव की मतगणना वाले दिन उन्होंने अपने सहायक को निर्देश दिया था कि उन्हें हर आधे घंटे पर रुझानों के बारे में सूचित किया जाए। उन्होंने लिखा है, ‘‘नतीजों से इस बात की राहत मिली कि निर्णायक जनादेश आया, लेकिन किसी समय मेरी अपनी पार्टी रही कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन से निराशा हुई।’’ 

उन्होंने पुस्तक में लिखा है, ‘‘यह यकीन कर पाना मुश्किल था कि कॉन्ग्रेस सिर्फ 44 सीट जीत सकी। कॉन्ग्रेस एक राष्ट्रीय संस्था है जो लोगों की जिदंगियों से जुड़़ी है। इसका भविष्य हर विचारवान व्यक्ति के लिए हमेशा सोचने का विषय होता है।’’ 

कॉन्ग्रेस की कई सरकारों में केंद्रीय मंत्री रहे मुखर्जी ने 2014 की हार के लिए कई कारणों का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है, ‘‘मुझे लगता है कि पार्टी अपने करिश्माई नेतृत्व के खत्म होने की पहचान करने में विफल रही। पंडित नेहरू जैसे कद्दावर नेताओं ने यह सुनिश्चित किया कि भारत अपने अस्तित्व को कायम रखे और एक मजबूत एवं स्थिर राष्ट्र के तौर पर विकसित हो। दुखद है कि अब ऐसे अद्भुत नेता नहीं हैं, जिससे औसत लोगों की सरकार बन गई।’’ 

प्रणब मुखर्जी ने अपनी इस किताब में ये खुलासा भी किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा करने से पहले उनके साथ इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं की थी, लेकिन इससे उन्हें हैरानी नहीं हुई क्योंकि ऐसी घोषणा के लिए आकस्मिकता जरूरी है।

अपनी पुस्तक में प्रणब मुखर्जी ने लिखा, “मैंने जिन दो पीएम के साथ काम किया, उनके लिए प्रधानमंत्री बनने का मार्ग बहुत अलग था। सोनिया गाँधी द्वारा डॉ सिंह को पद की पेशकश की गई थी। दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी 2014 में ऐतिहासिक जीत के लिए भाजपा का नेतृत्व करने के बाद लोकप्रिय पसंद के माध्यम से प्रधानमंत्री बन गए।”

प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि कई नेताओं ने उनसे कहा था कि अगर 2004 में वो प्रधानमंत्री बने होते तो 2014 में इतनी करारी हार नहीं मिलती। प्रणब मुखर्जी ने आगे लिखा है कि उनके राष्ट्रपति बनने के बाद कॉन्ग्रेस ने दिशा खो दी थी और सोनिया गाँधी सही फैसले नहीं कर पा रही थी। मनमोहन सिंह का ज्यादा वक्त अपनी सरकार बचाने में गया जिसका बुरा असर सरकार के कामकाज पर पड़ा।

इसके साथ ही उन्होंने अपनी पुस्तक में खुलासा किया कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अगर चाहते तो आज नेपाल भी भारत का हिस्सा होता, लेकिन उन्होंने इस ऑफर को ठुकरा दिया। इसमें उन्होंने लिखा है कि अगर तब जवाहरलाल नेहरू की जगह पर इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री होतीं, तो वो इस मौके को नहीं छोड़तीं और इसे लपक लेतीं। उन्होंने याद दिलाया है कि इंदिरा ने सिक्किम के मामले में भी ऐसा ही किया था।

प्रणब मुखर्जी की किताब ‘द प्रेजिडेंशियल ईयर्स’ को लेकर उनके बेटे और बेटी में टकराव देखने को मिला। पूर्व राष्ट्रपति के बेटे-बेटी पिछले महीने ही ट्विटर पर उनकी किताब के प्रकाशन को लेकर आपस में भिड़ गए। अभिजीत मुखर्जी ने कहा कि उनके पिता की किताब को उनकी मर्जी के बिना न छापा जाए। वहीं शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कहा कि कोई सस्ती लोकप्रियता के लिए उनके पिता की किताब को छपने से न रोके। ऐसा करना पूर्व राष्ट्रपति का अपमान होगा।

‘कानून रद्द नहीं होगा, चाहें तो सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं’: कृषि मंत्री का किसान नेताओं को दो टूक जवाब

सरकार और किसानों के बीच सातवें दौर की वार्ता भी बेनतीजा रही। अब अगले दौर की बैठक 8 जनवरी को आयोजित होगी। किसानों के कानून रद्द करने की माँग पर सरकार ने एक संयुक्त कमेटी बनाने का प्रस्ताव रखा। लेकिन किसान नेता इस पर राजी नहीं हुए। किसानों की एक ही माँग है कि सरकार एमएसपी पर लिखित में आश्वासन दे और तीनों कानूनों को रद्द करने का वादा करे।

हालाँकि, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने स्पष्ट कर दिया है कि तीनों कृषि कानूनों को रद्द नहीं किया जाएगा। इसके लिए किसान चाहें तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। यह बातें किसान मजदूर संघर्ष समिति के सरवन सिंह पंधेर ने कहा, जिन्होंने बैठक में भाग लिया था। उन्होंने कहा, “हम पंजाब के युवाओं से लंबी दौड़ की तैयारी करने का आग्रह करते हैं। हम गणतंत्र दिवस पर एक बड़ा जुलूस निकालेंगे।”

वहीं सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के प्रदर्शन और केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानून को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं पर बुधवार (जनवरी 6, 2021) को सुनवाई करते हुए सीजेआई ने कहा कि सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की जाएगी। सीजेआई ने कहा कि कोर्ट नए कृषि कानून के खिलाफ दाखिल याचिका पर सोमवार (जनवरी 11, 2021) को सुनवाई करेगी। साथ ही उन्होंने कहा कि वो किसानों की समस्याओं को समझते हैं।

बता दें कि केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानून को रद्द करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। कृषि कानूनों के खिलाफ ये याचिका वकील एमएल शर्मा ने दाखिल की है। याचिका में वकील ने केंद्र सरकार की ओर से लाए तीनों कानूनों को खत्म करने की माँग की है। याचिका में कहा गया है कि नए कृषि कानून कॉर्पोरेट के हितों को प्रोमोट करने वाले और किसानों को नुकसान की ओर ले जाने वाले हैं।

गौरतलब है कि पिछले साल केंद्र द्वारा लाए गए तीन नए कृषि कानूनों को वापस लेने की माँग पर अड़े हजारों किसान बीते एक महीने से भी ऊपर वक्त से दिल्ली की सीमाओं पर डटे हैं। यह गतिरोध खत्म करने के लिए केंद्र सरकार किसान संगठनों के साथ कई दौर की वार्ता कर चुकी हैं लेकिन ये सभी बेनतीजा रही हैं। 

सातवें दौर की बैठक के बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि किसानों के कानून को वापस लेने की ज़िद पर अड़े रहने के कारण कोई नतीजा नहीं निकल सका। तोमर का कहना था, “हमलोग चाहते थे कि किसान नेता तीनों कृषि कानूनों के एक-एक क्लॉज पर बात करें। हमलोग किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके क्योंकि किसान नेता कानून को वापस लिए जाने की अपनी माँग पर अड़े हुए थे।”

दरअसल, केंद्र सरकार तीन नए कृषि कानून लेकर आई है, जिनमें सरकारी मंडियों के बाहर खरीद, अनुबंध खेती को मंजूरी देने और कई अनाजों और दालों की भंडार सीमा खत्म करने जैसे प्रावधान किए गए हैं। इसको लेकर किसान लगातार आंदोलनरत हैं और इन कानूनों को वापस लेने की माँग कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि ये कानून मंडी सिस्टम और पूरी खेती को प्राइवेट हाथों में सौंप देंगे, जिससे किसान को भारी नुकसान उठाना होगा। किसान इन कानूनों को खेती के खिलाफ कह रहे हैं और तीनों कानूनों को वापस नहीं होने तक आंदोलन जारी रखने की बात कह रहे हैं। वहीं सरकार का कहना है कि किसानों को विपक्ष ने भ्रम में डाला है, ये कानून उनके फायदे के लिए हैं।

बैनर के विवाद में शिवसेना-NCP कार्यकर्ताओं के बीच जमकर चलीं कुर्सियाँ-हाथ-गालियाँ: देखें वीडियो

महाराष्ट्र में ‘औरंगाबाद’ का नाम ‘संभाजी नगर’ करने के मामले में महाविकास आघाड़ी सरकार में पहले ही फूट पड़ती दिखाई दे रही थी और अब खबर है कि मंगलवार (जनवरी 6, 2021) को गठबंधन की दो प्रमुख पार्टियों ( NCP और शिवसेना) के कार्यकर्ता भिवंडी में चुनाव आयुक्त के सामने ही एक दूसरे से भिड़ गए।

दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं में झगड़ा एक अनाधिकृत बैनर को लेकर उस समय शुरू हुआ जब एनसीपी के जिलाध्यक्ष अपनी ही साथी पार्टी के दावेदार की शिकायत लेकर चुनाव आयुक्त कार्यालय में पहुँच गए और वहाँ आपसी बहस के बाद दोनों पक्षों में जुबानी जंग हाथापाई में बदल गई।

बता दें कि महाराष्ट्र सरकार में दोनों पार्टियाँ भले ही एक गठबंधन का हिस्सा हैं लेकिन भिवंडी नगर निगम को लेकर दोनों में विवाद काफी पुराना है। भिवंडी में जल्द ही ग्राम पंचायत चुनाव होने जा रहे हैं, जिसके सम्बन्ध में मंगलवार को शिवसेना और एनसीपी के उम्मीदवार नामांकन भरने गए थे। एनसीपी अध्यक्ष गुलवी ने इस दौरान चुनाव आयुक्त के कार्यालय में शिवसेना के दावेदार प्रवीण गुलवी के बैनर का विरोध किया। इस घटना की बाद में एक वीडियो भी सामने आई। वीडियो में दोनों पक्ष एक दूसरे को गाली गलौच करते और एक दूसरे पर कुर्सी उठाकर मारते देखे जा सकते हैं।

घटना की बाबत भिवंडी चुनाव आयुक्त डॉ सुनील भालेराओ (Dr Sunil Bhalerao) ने संज्ञान लिया है और दोनों समूहों के ख़िलाफ़ सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में केस दर्ज किया है। इस संबंध में शांतिनगर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज हुई है।

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों भी महा विकास आघाडी गठबंधन में गठबंधन के सहयोगियों के बीच टकराव स्पष्ट नजर आया था। यह टकराव कॉन्ग्रेस और शिवसेना के बीच औरंगाबाद का नाम बदलकर ‘संभाजी नगर’ करने के प्रयासों के बीच बढ़ता हुआ देखा गया था।

शिवसेना काफी समय से से औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजी नगर करने की माँग करती रही थी। यह माँग उस वक्त भी की गई थी, जब शिवसेना भाजपा के साथ गठबंधन सरकार का हिस्सा थी। लेकिन कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री बालासाहेब थोराट ने औरंगाबाद को संभाजी नगर करने का विरोध किया। इसके ही एक दिन बाद ही, शिवसेना ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के माध्यम से शहर का नाम बदलने के विषय को जोरशोर से उठाया था और कहा था कि नाम बदलने से महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी सरकार के भविष्य पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

लेख में बताया गया था कि कैसे शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने 30 साल पहले इसका नाम संभाजी नगर रखा था और लोगों ने इसे तहे दिल से स्वीकार भी किया था। ‘सामना’ के सम्पादकीय में कहा गया कि नाम को आधिकारिक रूप से लागू करने के लिए बस दस्तावेजों की औपचारिकताओं को छोड़ दिया गया था। आगे कॉन्ग्रेस पार्टी पर कटाक्ष करते हुए इस लेख में कहा गया कि औरंगाबाद का नाम बदलने से देश के धर्मनिरपेक्षता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और राज्य के अधिकांश कॉन्ग्रेसी शिवसेना द्वारा शहर का नाम बदलने की माँग से सहमत होंगे।