कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भारत सरकार से कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गाँधी और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती को भारत रत्न देने की माँग की है। अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर अपनी माँगें रखते हुए रावत ने कहा कि सोनिया गाँधी और मायावती ने महिला सशक्तीकरण के लिए बहुत बड़ा योगदान दिया है।
अपने फेसबुक पोस्ट में हरीश रावत ने लिखा, “आदरणीय सोनिया गाँधी जी व सम्मानित बहन मायावती जी, दोनों प्रखर राजनैतिक व्यक्तित्व हैं। आप उनकी राजनीति से सहमत और असहमत हो सकते हैं, मगर इस तथ्य से आप इनकार नहीं कर सकते हैं कि सोनिया जी ने भारतीय महिला की गरिमा और सामाजिक समर्पण व जनसेवा के मापदंडों को एक नई ऊँचाई व गरिमा प्रदान की है, आज उन्हें भारत की नारीत्व का गौरवशाली स्वरूप माना जाता है। सुश्री मायावती जी ने वर्षों से पीड़ित-शोषित लोगों के मन में एक अद्भुत विश्वास का संचार किया है, भारत सरकार को चाहिए कि इन दोनों व्यक्तित्वों को इस वर्ष का भारत रत्न देकर अलंकृत करें।”
हालाँकि, रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य के बसपा नेतृत्व ने उनकी माँग को ‘जनता को बेवकूफ बनाने’ की तकनीक करार दिया है। वहीं, भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और मीडिया प्रभारी डॉ देवेंद्र भसीन ने कहा कि क्या सोनिया गाँधी को भारत रत्न देने से रावत चाहते हैं कि सम्मान किसी ऐसे को दिया जाए जो जमानत पर है? उन्होंने कहा कि ऐसी माँग रखकर वह किस तरह की मिसाल कायम करना चाहता हैं? यह कभी नहीं होगा।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अगर चाहते तो आज नेपाल भी भारत का हिस्सा होता, लेकिन उन्होंने इस ऑफर को ठुकरा दिया। ये खुलासा दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक में किया है। उनकी आत्मकथा ‘The Presidential Years’ (द प्रेसिडेंसियल ईयर्स) के अनुसार, नेपाल के तत्कालीन राजा त्रिभुवन वीर विक्रम शाह ने नेहरू को ऑफर दिया था कि नेपाल को भी भारत का एक प्रांत बना दिया जाए, लेकिन नेहरू ने इसे ठुकरा दिया।
इस पुस्तक के चैप्टर 11 की हेडिंग है – ‘My Prime Ministers: Different Styles, Different Temperaments’ (मेरे प्रधानमंत्री: अलग-अलग स्टाइल्स, अलग-अलग मिजाज)। इसमें उन्होंने लिखा है कि अगर तब जवाहरलाल नेहरू की जगह पर इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री होतीं, तो वो इस मौके को नहीं छोड़तीं और इसे लपक लेतीं। उन्होंने याद दिलाया है कि इंदिरा ने सिक्किम के मामले में भी ऐसा ही किया था।
अलग-अलग सरकारों में कई प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर चुके प्रणब मुखर्जी का कहना है कि उन सभी के काम करने के तौर-तरीके अलग थे। उन्होंने शुरुआती उदाहरण ही गिनाए हैं कि लाल बहादुर शास्त्री के काम करने का तरीका उनके पूर्ववर्ती नेहरू से बिलकुल अलग था। उन्होंने लिखा है कि आंतरिक सुरक्षा, विदेश मामलों और प्रशासन को लेकर भी प्रधानमंत्रियों का अलग-अलग नजरिया होता है, भले ही वो समान पार्टी से ही क्यों न आते हों।
मुखर्जी ने लिखा है कि नेहरू ने नेपाल के साथ काफी डिप्लोमेटिक तरीके से व्यवहार किया। वो लिखते हैं, “नेपाल में राणाओं के शासन को राज-तंत्र से स्थानांतरित किया गया। नेहरू चाहते थे कि वहाँ पर लोकतंत्र हो। नेहरू का कहना था कि नेपाल एक स्वतंत्र राष्ट्र है और उसे ऐसे ही बने रहना चाहिए। इसीलिए उन्होंने राजा वीर विक्रम शाह के ऑफर को ठुकरा दिया और नेपाल भारत का हिस्सा नहीं बन पाया।”
प्रणब मुखर्जी की इस पुस्तक को लेकर जम कर विवाद भी हुआ था। बेटे अभिजीत मुखर्जी ने उनके संस्मरण ‘The Presidential Memoirs’ के प्रकाशन को लेकर आपत्ति जताते हुए इस पर कुछ वक्त के लिए रोक लगाने की माँग की थी। जबकि इसके उलट, प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपने भाई से बेवजह की बाधा उत्पन्न नहीं करने का अनुरोध किया था। शर्मिष्ठा ने कहा था कि उनके द्वारा व्यक्त किए गए विचार उनके खुद के हैं और किसी को भी किसी सस्ते प्रचार के लिए प्रकाशित होने से रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
नई दिल्ली में आगामी 26 जनवरी को होने वाली गणतंत्र दिवस परेड के लिए रक्षा मंत्रालय द्वारा उत्तराखण्ड राज्य की झाँकी का अंतिम रुप से चयन कर लिया गया है। इस बार उत्तराखंड राज्य की ओर से बाबा केदारनाथ की झाँकी का चयन किया गया है। भारत सरकार द्वारा इस सम्बन्ध में गत दिसम्बर 31, 2020 को आदेश जारी कर दिए गए थे।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजपथ में आयोजित होने वाली परेड 2021 के लिए उत्तराखण्ड राज्य की झांकी का चयन हुआ है। महानिदेशक, सूचना, डॉ0 मेहरबान सिंह बिष्ट ने बताया कि रक्षा मंत्रालय भारत सरकार में पांच बार की बैठक के पश्चात यह अवसर मिला है। झांकी का विषय ‘केदारखण्ड’ रखा गया है। pic.twitter.com/oqfGBOeYUc
रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्तराखंड की झाँकी का नाम इस प्रक्रिया में भाग लेने वाले 32 अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की झाँकी के साथ शामिल था, जिन्होंने इस प्रक्रिया में भाग लिया था। इनमें से केंद्र ने केवल 17 का चयन किया। राज्य के सूचना निदेशालय के महानिदेशक मेहरबान सिंह बिष्ट ने कहा कि रक्षा मंत्रालय द्वारा रखी गई इस प्रक्रिया में केंद्र ने 31 दिसंबर को इसके लिए एक आदेश पारित किया था जिसके बाद 32 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने चयन प्रक्रिया के लिए अपनी झांकी के नमूने भेजे थे।
उत्तराखंड राज्य के सूचना महानिदेशक, डॉ मेहरबान सिंह बिष्ट ने बताया कि रक्षा मंत्रालय भारत सरकार में 5 बार की बैठक के बाद उत्तराखण्ड राज्य की झांकी को भी गणतंत्र दिवस परेड में स्थान मिला है। मंगलवार (जनवरी 05, 2020) को राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा यह सूचना जारी की गई।
इस वर्ष उत्तराखंड राज्य की ओर से प्रदर्शित की जाने वाली झांकी का विषय ‘केदारखण्ड’ रखा गया है। झांकी के अग्र भाग में राज्य पशु कस्तूरी मृग, राज्य पक्षी मोनाल एवं राज्य पुष्प ब्रह्मकमल तथा पार्श्व भाग में केदारनाथ मन्दिर परिसर एवं श्रद्धालुओं को दर्शाया गया है।
इससे पहले, उत्तराखंड राज्य द्वारा वर्ष 2003 में फूलदेई, वर्ष 2005 में नंदा राजजात, वर्ष 2006 में फूलों की घाटी, वर्ष 2007 में कार्बेट नेशनल पार्क, वर्ष 2009 में साहसिक पर्यटन, वर्ष 2010 में कुम्भ मेला हरिद्वार, वर्ष 2014 में जड़ी बूटी, वर्ष 2015 में केदारनाथ, वर्ष 2016 में रम्माण, वर्ष 2018 में ग्रामीण पर्यटन तथा वर्ष 2019 में अनाशक्ति आश्रम (कौसानी प्रवास एवं अनाशक्ति) विषयों पर आधारित झाँकियों का सफल प्रदर्शन राजपथ पर किया जा चुका है।
क्या मजबूत पत्थरों से बनी ऊँची चारदीवारी और बुर्जों से घिरे किसी एक हजार साल पुराने राजमहल का कोई हिस्सा किसी की निजी संपत्ति हो सकता है, जिसकी एक दीवार को तोड़कर सीमेंट और लोहे का दरवाजा लगा दिया गया हो और कोई इस तरफ ऐसी-वैसी निगाह न देखे इसके लिए पुरानी दीवार पर एक साइन बोर्ड टाँग दिया गया हो- ‘निजी संपत्ति, उदयपुर पैलेस, खसरा नंबर-822, वार्ड नंबर-14।’
मध्य प्रदेश के विदिशा शहर से करीब 70 किलोमीटर दूर उदयपुर नाम के एक प्राचीन नगर में देश के जाने-माने इतिहासकार डॉ. सुरेश मिश्र के साथ घूमना एक यादगार अनुभव रहा। आठ हजार आबादी की इस बस्ती में हजार-बारह सौ साल की इमारतें आज भी काफी हद तक बची हुई है।
पूरा नगर अपने पुराने डिजाइन पर ऊबड़-खाबड़ हालत में मौजूद है, जहाँ परमार राजवंश के वास्तुशिल्प के अनुसार दीवार-दरवाजे, मंदिर, महल, तालाब, बावड़ी, कमरे, दीवारें और गलियाँ हैं। इनसे गुजरते हुए लगता है कि आप अतीत में लौटकर सदियों पहले के खोए हुए वैभव की सैर कर रहे हैं।
इस जगह की प्रसिद्धि नीलकंठेश्वर मंदिर से है, जो राजा भोज के बाद की पीढ़ी में हुए महाराज उदयादित्य ने बनवाया था। इस नगर का नाम उदयपुर भी उनसे ही जुड़ा है। उस दौर में राजा के युवराजों को राजधानी से दूर के महत्वपूर्ण नगरों और सैन्य ठिकानों की कमान सौंपी जाती थी।
एक तरह से राज्य शासन चलाने के पारिवारिक प्रशिक्षण का यह हिस्सा था। जैसे मगध में सम्राट बनने के पहले अशोक के पिता बिंदुसार ने उन्हें अवंति का राज्यपाल बनाकर उज्जैन भेजा था। बहुत संभव है युवराज उदयादित्य अपने पिता के समय परमारों के राज्य की सीमा पर स्थित उदयपुर भेजे गए हों।
हो सकता है कि उदयादित्य ने ही इस नगर की विकास योजना बनाई हो और अपनी वंश परंपरा के अनुसार बेहतरीन निर्माण किए हों, जो उनके राजा बनने के बाद भी जारी रहे होंगे। वर्ना ऐसे मंदिर गाँव-गाँव में हैं, लेकिन चौकोर दुर्ग से सुरक्षित नगर के भीतर एक विशाल चारदीवारी और बुर्जों से घिरे राजमहल की रूपरेखा इस इलाके में सिर्फ यहीं हैं।
डॉ. सुरेश मिश्र ने अफसोस के साथ कहा कि पूरे नगर को नए सिरे से सहेजने की जरूरत है। यहाँ कई इमारतें, महल और मंदिर बचे हुए हैं, जो भारत के सदियों पुराने स्थापत्य का एक शानदार परिचय दे रहे हैं। अगर इन्हें न बचाया गया तो हमारी आँखों के सामने यह धूल में मिल रहा है।
अब कोई विदेशी आक्रांता यह बर्बादी नहीं कर रहे। इसके जिम्मेदार हम हैं। पत्थर की खदानों ने निर्माण के लिए आवश्यक बुनियादी सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराई। आबादी का जितना विस्तार है, प्राचीन नगर का उससे ज्यादा है। एक बड़े हिस्से की इमारतें धीरे-धीरे ढह रही हैं।
महल का काफी कुछ हिस्सा आज भी ऐसा है, जिसे सहेजा जा सकता है। यह पूरे जिले में एकमात्र ऐसी जगह है, जिसे एक शानदार पर्यटन केंद्र के रूप में ऐसा विकसित किया जा सकता है कि लोगों को एक पूरा दिन यहाँ बिताकर अपने अतीत में झाँकने का मौका मिले।
मूल शिव मंदिर के अलावा भी और कई पुराने मंदिर और बावड़ियाँ हैं, जो किसी चमत्कार से ही बचे रह गए हैं। इस्लामी हमलावरों से यह नगर अछूता नहीं रहा है। इसके सबूत मंदिर में ही दिखाई देते हैं, जहाँ मूर्तियों को तोड़ा गया है। यह आश्चर्य की बात है कि फिर भी यह मंदिर अपने मूल आकार में बचा रह गया और यह नगर भी।
हर दिन दूर-दूर से लोग उदयपुर आते हैं। ज्यादातर सिर्फ 11वीं सदी के मंदिर के दर्शन करने आते हैं और वे भी सिर्फ महादेव की पूजा-अर्चना के लिए। गर्भगृह से बाहर आकर वे हक्के-बक्के से गर्दन ऊँची करके मंदिर के स्थापत्य को देखते हैं।
मोबाइल आजकल सबके पास हैं सो फोटो खींचना फूल चढ़ाने जैसी आवश्यक रस्म बन गई है ताकि सोशल मीडिया पर प्रसारित कर सकें। इक्का-दुक्का ही कोई पत्थरों पर उकेरे इस चमत्कार की डिटेल में जाना चाहता होगा। न के बराबर। उन्हें इतिहास में कोई रुचि नहीं है।
जब ऐसा है तो यह भी स्वाभाविक है कि ग्राम पंचायत से लेकर जिला पंचायत के स्थानीय नुमांइदे भी एक अजीब बेफिक्री में हों। उन्हें भी कोई परवाह नहीं रही कि हजार साल पुराने इस हीरे की सही साज-सँभाल करने लायक वे इस नगर को विकसित करने के बारे में सोचते।
उनकी नजर में यह पुरातत्व वालों का काम है। जब ऐसा है तो यह भी स्वाभाविक है कि सिविल सेवाओं की परीक्षाएँ पास करके प्रशासन तंत्र में आने वाले भी नेत्रहीन, मूक, बधिर, विकलांग और मंदबुद्धि हों, जो अपने हिस्से का तीन-चार साल का कार्यकाल काटकर अगले प्रमोशन की घात में बैठे रहें।
और परमारों के नाम पर लैटरहेड पर माैजूद तरह-तरह के संगठन भी किसी क्षत्रिय महासभा की एक शाखा के रूप में साल में एक दिन अपनी शिराओं में बहते क्षत्रिय रक्त की अनुभूति के लिए केसरिया साफे बाँधकर शोभायात्राएँ निकाल लेते होंगे, उन्हें भी अपने महान पूर्वजों के स्मारकों की बरबादी और कब्जे की कहानी से क्या लेना-देना?
परमार लिख लेने से हर कोई राजा भोज या उदयादित्य तो हो नहीं जाता! मैंने कुछ समय पहले विदिशा जिले के एक कलेक्टर को इस नगर में जीवित बचे रह गए इतिहास को सहेजने की दृष्टि से कुछ सुझाव और निवेदन एक पत्र में लिखे थे। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर अगर कुछ काम हो तो उदयपुर मध्यप्रदेश में राजधानी भोपाल के काफी पास पर्यटन मानचित्र पर चमक सकता है।
कलेक्टर का नाम भी किसी प्राचीन सूयर्वंशी राजवंश की तरह काफी प्रभावशाली था, जिसका जिक्र मैंने उस पत्र में विशेष रूप से किया था कि आपके नाम से लगता है कि यह पराक्रम आप कर सकते हैं-‘परमवीर अशोकचक्र वीर बहादुर महाप्रतापी कुंअर विक्रमसिंह।’ मुझे बड़ी उम्मीद थी कि वे कम से कम कागजों पर एक योजना ही बनाते, कोई मीटिंग करते।
हो सकता है कुछ क्रांतिकारी रचना फाइलों में रखकर चले गए हों। अक्सर नाम भी एक किस्म का फरेब रचते हैं। विजय नाम होने से भर से कोई विजेता नहीं हो सकता! कलेक्टर या कमिश्नर हो सकता है। राजधानी भोपाल की नाक के नीचे सिर्फ डेढ़ सौ किलोमीटर दूर एक पूरा और पुराना नगर अपने एक हजार साल पुराने वैभव में बचा हुआ जैसे दम तोड़ रहा है, लेकिन ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक की यात्रा करने वाले जनता के प्रतिनिधियों और प्रशासनिक पराक्रमियों ने इसे घूरे की तरह रखकर छोड़ा है।
जैसा कि सब जानते हैं, उनकी प्राथमिकताओं में खदानें, कब्जे, निर्माण, बजट, कमीशन, सेटिंग, तबादले, प्रमोशन, टिकट, चुनाव जैसे ऐतिहासिक कर्म सबसे ऊपर रहे हैं। दृष्टि होती तो दूरदृष्टि की अपेक्षा उनसे होती। मैं यह प्रसंग इसलिए लिख रहा हूँ कि अखबारों से पता चला है कि सरकार अवैध कब्जे करने वाले माफियाओं का हालचाल जरा जोर से ही पूछ रही है।
मैं ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि अवैध कब्जे सिर्फ शहरों में नहीं हैं, जहाँ झुग्गी-झोपड़ी प्रकोष्ठ और ठेला-गुमटियों को संरक्षण देने वालों ने नर्क का नजारा पेश किया है। उदयपुर की गलियों के कोनों, तिराहों, सड़कों और दीवारों पर हरी चादरों के टुकड़े हाल ही में डाले गए हैं।
मासूम ग्रामवासी हिंदू किसी परमज्ञानी मौलवी के हवाले से यहाँ किसी पीर (रहमतउल्लाअलैह) के प्रकट होने की ब्रेकिंग न्यूज हाथ जोड़कर थमा देते हैं। ज्योतिष का जानकार नहीं हूँ लेकिन भविष्यवाणी कर सकता हूँ कि यहाँ आने वाले सालों में रौनकदार मजारें बनेंगी, जहाँ कौमी एकता के उर्स और मुशायरों में यही जनप्रतिनिधि पधारेंगे और यही महाप्रतापी अफसर उनके इंतजामों में लगेंगे।
उदयपुर की शिराओं में सूखता भारतीय संस्कृति का वैभव तब दम तोड़ चुका होगा। परमार वंश के महाराजा उदयादित्य के राजमहल के एक बंद दरवाजे पर टँगा वह साइनबोर्ड नए इतिहास की घोषणा कर रहा है- ‘निजी संपत्ति, उदयपुर पैलेस, वार्ड नंबर-14, खसरा नंबर-822, काजी सैयद इरफान अली, काजी सैयद महबूब अली, काजी सैयद अहमद अली।’
नोट: ऑपइंडिया के लिए यह लेख विजय मनोहर तिवारी ने लिखा है।
बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने अब दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के खिलाफ आपराधिक धमकी देने का आरोप लगाते हुए नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही अभिनेत्री ने कानूनी नोटिस जारी कर उन्हें धमकाने के लिए गुरुद्वारे से माफी की माँग की है। बता दें कि गुरुद्वारा निकाय ने पिछले महीने कंगना को उनके ट्विट्स के लिए कानूनी नोटिस भेजा था, जिसमें कंगना ने कथित रूप से उन किसानों और कार्यकर्ताओं पर निशाना साधा था, जो नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने अभिनेत्री कंगना रनौत द्वारा निकाय को भेजे गए नोटिस को ट्विटर पर शेयर किया। सिरसा ने इसे ट्वीट करते हुए लिखा, “उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे। माफी तो आप ही माँगोगी कंगना रनौत। अब यह लड़ाई कोर्ट तक जाएगी और तुम्हें वहाँ हिसाब देना होगा किसानों के खिलाफ अपनी नफरत भरी सांप्रदायिक ट्विट्स का।”
Kangana Ranaut replied to our Notice & asked us to apologise for criminal intimidation ? उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे
अपने नोटिस में, कंगना ने आरोप लगाया है कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी द्वारा भेजा गया कानूनी नोटिस ‘अस्थिर और कानूनी रुप से अयोग्य’ (‘Untenable and bad in law’) है। ऐसा इसलिए कि उन्होंने जो भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 499, 500 की धारा लगाई है, उसकी वो व्याख्या नहीं कर पा रही है कि उन्होंने किस आधार पर लगाया। इसके लिए उन्हें आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 199 को पढ़ना चाहिए।
कंगना के खिलाफ कार्रवाई के लिए दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी के पास हस्तक्षेप का अधिकार नहीं
कंगना द्वारा कानूनी नोटिस उच्च न्यायालयों द्वारा दिए गए पिछले फैसले पर भेजा गया है, जिसमें कहा गया कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा के पास उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा करने के लिए हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। उन्होंने अपने नोटिस में कहा है कि मानहानि के मामले में सीआरपीसी की धारा 199 केवल ‘पीड़ित पक्ष’ को ही अदालत में जाने की अनुमति देती है।
नोटिस में आगे दावा किया गया है कि मौजूदा कानून और नागरिक कानून के प्रावधानों के तहत गुरुद्वारा निकाय को प्रतिवादी के खिलाफ आगे बढ़ने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि उसके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसकी ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई है। नोटिस में उल्लेख किया गया है कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी आपराधिक धमकी के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 503 और 506 के तहत मुकदमा चलाने के लिए उत्तरदायी है।
टेंडर माफी और माँगें वापस लें या सिविल और आपराधिक कार्यवाही का सामना करें: गुरुद्वारा कमिटी से कंगना
कंगना रनौत के वकील ने कहा कि उनके क्लाइंट की पहुँच और सामाजिक प्रतिष्ठा का अनुचित लाभ उठाते हुए पब्लिसिटी और चंद मिनटों का फेम पाने के लिए कानूनी नोटिस भेजा गया है। कानूनी नोटिस में गुरुद्वारा कमेटी को अपनी माँगों को तुरंत वापस लेने और कंगना रनौत से माफी माँगने के लिए कहा गया है। ऐसा करने में विफल रहने पर उनके खिलाफ सिविल और आपराधिक कार्यवाही शुरू की जा सकती है।
इससे पहले पिछले महीने, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने अभिनेत्री कंगना रनौत को एक मानहानि नोटिस भेजा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि अभिनेत्री ने मोदी सरकार के खिलाफ ‘किसान विरोध’ में शामिल किसानों, प्रदर्शनकारियों और कार्यकर्ताओं को बदनाम किया। सिख संगठन ने अपने नोटिस में बिना शर्त माफी और ‘अपमानजनक’ ट्वीट को हटाने की माँग की थी।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की और कोरोना वायरस के नए स्ट्रेन के सामने आने के बाद गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत आने में अपनी असमर्थता व्यक्त की है। लेकिन इस बीच एक बड़ी खबर सामने आई है कि इच्छाधारी आन्दोलनकारी योगेन्द्र यादव ने केंद्र सरकार के सामने गणतंत्र दिवस के दिन बोरिस जॉनसन बनकर आने की इच्छा जाहिर की है।
जी हाँ, आजकल किसान आंदोलनों में एक प्रदर्शनकारी की भूमिका निभा रहे इच्छाधारी आंदोलनकारी योगेंद्र यादव ने ये प्रस्ताव खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने रखा। उन्होंने ऑपइंडिया से बात करते हुए, बहुत ही विनम्र और धीमी आवाज में, शब्दों को चबाते हुए कहा, “राष्ट्रहित में मैं बोरिस जॉनसन क्या, डोनल्ड ट्रम्प भी बन सकता हूँ। आपको क्या लगता है कि ‘नमस्ते ट्रंप’ इवेंट में मोदी जी के साथ ट्रंप थे? वहाँ भी मैं ही था। चार पैसे मिल जाएँ तो किसान, चार और मिल जाएँ तो मजदूर… अपनी तो मस्त कट रही है ब्रो!”
योगेन्द्र यादव ने हमें बताया कि हाल ही के कुछ समय में देश में इच्छाधारियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है, इस बात की गंभीरता को जानते हुए उन्होंने बोरिस जॉनसन के मना करने की खबर सुनते ही तुरंत अपने लम्ब्रेटा स्कूटर को थोड़ा झुकाकर दो किक मारी और प्रधानमंत्री मोदी के सामने यह प्रस्ताव रखा। लेकिन पीएम मोदी ने कहा कि उनके सामने योगेन्द्र यादव से पहले ही लिबरलों के दुग्गल साहब यानी ध्रुव राठी भी ये पेशकश कर चुके हैं।
हालाँकि, पीएम मोदी ने ऑपइंडिया से बताया कि उनकी हार्दिक इच्छा ना योगेन्द्र यादव को बोरिस भाई जॉनसन बनाने की है और ना ही ध्रुव राठी को! प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उनकी इच्छा है कि अगर किसी विदेशी को ही मेहमान बनाना है तो क्यों न राहुल गाँधी को ही ये मौका दिया जाए?
असमंजस की स्थिति में पीएम मोदी ने कहा कि जनता के बीच योगेन्द्र यादव और ध्रुव राठी ने अपनी इच्छाधारी शक्तियों का लोहा मनवाया है लेकिन फिर भी जो मजा राहुल गाँधी जनता को दे सकते हैं वह योगेन्द्र और राठी सामूहिक रूप से नहीं दे सकते। इस पर, राहुल गाँधी के पास वर्तमान में एक बड़ी बढ़त ये भी है कि वो विदेशों में ही किसी अज्ञात जगह पर हैं और भारत में किसानों के साथ आँदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।
गौरतलब है कि कभी कानून के जानकार, कभी किसान मामलों के जानकार, कभी कोरोना एक्सपर्ट, कभी राजनीतिज्ञ, तो कभी साहित्य के बारे में भरपूर जानकारी रखने वाले योगेन्द्र यादव कई बार अपनी क्षमताओं को साबित भी कर चुके हैं। इस कारण पीएम मोदी अभी उनके नाम पर भी विचार कर रहे हैं। इस बारे में अंतिम फैसला आने पर सबसे पहले हमारे गोपनीय सूत्रों को ही सूचित किया जाएगा।
केजरीवाल सरकार द्वारा दिल्ली के चाँदनी चौक में कराए जा रहे सौंदर्यीकरण के दौरान तोड़े गए हनुमान मंदिर को लेकर हिंदू संगठन ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन कर रहे विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के सदस्यों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। उत्तर दिल्ली नगर निगम ने अदालत के आदेश के बाद रविवार (जनवरी 3, 2021) को मंदिर तोड़ दिया था।
यह चाँदनी चौक के सौंदर्यीकरण का हिस्सा बताया जा रहा है। प्रदर्शनकारी भगवा झंडा थामे बजरंग दल के कार्यकर्ता थे। उन्होंने गौरी शंकर मंदिर से लेकर उस स्थान तक मार्च निकाला, जहाँ मंदिर बना था। उन्होंने नारेबाजी भी की। हालाँकि, पुलिस ने उन्हें बैरिकेट लगाकर रोक दिया।
दोपहर करीब 2 बजे हिंदू संगठनों की महिला कार्यकर्ताओं ने तोड़े गए मंदिर स्थल पर हनुमान चालीसा का पाठ भी किया। लेकिन दिल्ली पुलिस ने कानून-व्यवस्था बिगड़ते देख उन्हें वहाँ से भी दूर कर दिया।
विहिप के प्रवक्ता महेंद्र रावत ने बताया कि दिल्ली के प्रमुख कपिल खन्ना, उपाध्यक्ष सुरेंद्र गुप्ता, सतिव रवि और बजरंग दल के राज्य संयोजक बी बत्रा समेत 15-20 कार्यकर्ताओं और नेताओं को प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने हिरासत में ले लिया। मंदिर तोड़े जाने के मामले में भाजपा ने AAP सरकार को घेरा। दिल्ली भाजपा ने माँग की है कि दिल्ली सरकार चाँदनी चौक के सौंदर्यीकरण की योजना को री-डिजाइन करके वहाँ हनुमान मंदिर को फिर से बनवाने की व्यवस्था करें।
वहीं आम आदमी ने पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा शासित MCD ने पहले सैकड़ों साल पुराना मंदिर तोड़ा और अब जनता के आक्रोश से बचने के लिए और अपने जघन्य अपराध को छिपाने के लिए AAP पर आरोप लगा रही है। दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस भी इस विवाद में कूद गई है। कॉन्ग्रेस ने AAP और भाजपा दोनों पर निशाना साधा।
इससे पहले सोमवार (जनवरी 04, 2020) को उपराज्यपाल से मुलाकात के बाद विश्व हिंदू परिषद के नेता आलोक कुमार ने कहा था कि उन्होंने उपराज्यपाल से कहा है कि वे उच्च न्यायालय में प्रार्थना पत्र लगाकर मंदिर की पुनर्स्थापना के लिए अनुमति लें तथा उसी स्थान पर मंदिर को दोबारा स्थापित करें। उन्होंने कहा था कि अगर मंदिर की पुनर्स्थापना नहीं होती है तो वीएचपी आंदोलन के लिए मजबूर होगा।
वहीं, विहिप प्रान्त प्रचार प्रसार प्रमुख महेंद्र रावत ने बताया था कि वीएचपी, बजरंगदल, मातृशक्ति, दुर्गावाहनी, अन्य हिन्दू संगठनों के साथ मिलकर विरोध दर्ज कराएँगे। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के प्रांत अध्यक्ष कपिल खन्ना ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पत्र लिखकर माँग की कि हनुमान मंदिर तोड़ने के दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो।
गौरतलब है कि इस मसले पर बीजेपी दिल्ली के प्रवक्ता प्रवीण शंकर कपूर ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा था कि दो अन्य धार्मिक संरचनाओं को ध्वस्त करने का प्रस्ताव था, जिन्हें दिल्ली सरकार द्वारा संरक्षित किया गया, लेकिन AAP ने हनुमान मंदिर के लिए ऐसा करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “योजना दिल्ली सरकार की थी, यह आदेश दिल्ली उच्च न्यायालय से आया था। दिल्ली सरकार ने दो अन्य धार्मिक स्थलों को बचाया है, हनुमान मंदिर को क्यों नहीं?”
दिल्ली उच्च न्यायालय ने नवंबर 2019 में मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया था। HC ने दिल्ली सरकार की ‘धार्मिक समिति’ के पुनर्विकास योजना के तहत हनुमान मंदिर और शिव मंदिर के एकीकरण के सुझाव को खारिज कर दिया था।
उत्तरी दिल्ली नगर निगम ने दिसंबर में दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया कि वह जल्द ही हनुमान मंदिर को ध्वस्त करना चाहता है। विभिन्न कारणों का हवाला देते हुए विध्वंस को कई बार स्थगित किया गया था। विध्वंस की तारीख 20 दिसंबर निर्धारित की गई थी, लेकिन तब भी कुछ नहीं हुआ। अंततः इसे 2 और 3 जनवरी के बीच की मध्यरात्रि में ध्वस्त कर दिया गया।
चीन के सबसे अमीर कारोबारियों में शुमार अलीबाबा ग्रुप के मालिक जैक मा पिछले दो महीने से गायब हैं। हालाँकि, अब चीनी मीडिया का कहना है कि जैक मा चीनी सरकार के सुपरविजन यानी, ‘देखरेख’ में हैं। ऐसे में, कयास लगाए जा रहे हैं कि जैक मा (Jack Ma) को गिरफ्तार कर लिया गया है या फिर उन्हें अनजान जगह पर नजरबंद कर दिया गया है। बड़ी और नामी हस्तियों की गिरफ्तारी के बारे में जानकारी छुपाने का चीन का इतिहास रहा है, इसलिए आशंका लगाई जा रही है कि ‘सरकार की देखरेख’ (सुपरविजन) में होने का मतलब जेल हो सकता है।
जैक मा के व्यापार पर बीजिंग के आक्रामक तेवर के बाद, हांगकांग के ‘द एशिया टाइम्स’ ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘पीपुल्स डेली’ के हवाले से कहा है कि उन्हें देश नहीं छोड़ने का आदेश दिया गया है। पीपुल्स डेली ने नवंबर माह के एक अंश में यह भी कहा था कि जैक मा चीनी सरकार की नीतियों के बिना अलीबाबा को इतनी ऊँचाइयों तक नहीं ले जा सकते। जैक मा नवंबर, 2020 से किसी भी सार्वजनिक इवेंट या टीवी शो में नजर नहीं आए जिसके बाद उनके गायब होने की खबरें आने लगीं।
जैक मा करीब दो महीने से किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं दिखाई दिए। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, जैक मा ने चीन के वित्तीय नियामकों और सरकारी बैंकों की पिछले साल अक्टूबर में दिए गए भाषण की आलोचना की थी। इसी आलोचना के बाद उनका और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ विवाद भी हुआ और इस विवाद के बाद से वो लगभग दो महीने से नजर नहीं आए हैं।
कौन हैं जैक मा
चीन की बड़ी आईटी कंपनियों में शुमार अलीबाबा के संस्थापक हैं। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, अलीबाबा चीन के मशहूर कारोबारी और अपने बोलने के लिए प्रसिद्ध जैक मा की है। वह कभी एक स्कूल में पढ़ाया करते थे और अब वह अरबपति कारोबारी हैं। अलीबाबा विश्व की बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों में से एक है जिसके करोड़ों की संख्या में यूजर्स हैं। अलीबाबा का टर्नओवर भी अरबों में है। इसकी तीन मेन वेबसाइट टाउबाउ (Taobao), टीमॉल (Tmall) और अलीबाबा डॉट कॉम (Alibaba.com) है। अलीबाबा का ही एंट ग्रुप भी है, जिसने डिजिटल वॉलेट ‘अलीपे’ बनाया है, जो चीन में एक मोबाइल पेमेंट सिस्टम (मोबाइल वॉलेट) है। कंपनी ने भारत के पेटीएम में भी निवेश किया है।
दो महीने से लापता हैं अलीबाबा कंपनी के मालिक जैक मा, चीनी राष्ट्रपति से हुआ था विवाद
जैक मा के बनाए उनके टीवी शो ‘अफ्रीका के बिजनेस हीरो’ में भी जैक मा नजर नहीं आए हैं। कार्यक्रम में उनकी जगह किसी और शख्स को भेज दिया गया है। टीवी शो में शामिल नहीं होने पर अलीबाबा के प्रवक्ता ने कहा कि शेड्यूल को लेकर हुए विवाद की वजह से वे टीवी शो में शामिल नहीं हुए।
क्या है पूरा मामला
चीन की सरकार अलीबाबा ग्रुप पर मोनोपोली यानी एकाधिकार के गलत इस्तेमाल को लेकर तहकीकात कर रही है। अलीबाबा ने कहा था कि उन्हें एसएएमआर (SAMR) के जरिए एंट ग्रुप (Ant Group) को भी नोटिस भी भेजा गया है। यह जैक-मा की ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा डॉट कॉम और फिनटेक एंपायर के लिए बहुत बड़ा झटका माना गया।
भारी पड़ा सरकार की आलोचना करना
माना का रहा है कि ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा के मालिक जैक मा द्वारा सार्वजनिक तौर पर चीन के वित्तीय नियामकों और बैंकों का अलोचना करना भारी पड़ गया है। चीन सरकार द्वारा की गई कार्रवाई के बाद जैक मा की संपत्ति बीते दो महीने में 11 अरब डॉलर कम हो गई है। दरअसल, जैक मा ने चीन के वित्तीय नियामकों की इस बात के लिए लताड़ लगाई थी कि वो जोखिम लेना बिल्कुल पसंद नहीं करते।
उन्होंने चीन के बैंकों पर सूदखोर सेठों जैसा व्यवहार करने का आरोप लगाया। उनका इशारा इस तरफ था कि चीनी बैंक बिना कोई चीज गिरवी रखवाए कर्ज नहीं देते। गौरतलब है कि चीन में ज्यादातर बैंक सरकारी हैं, इसलिए उनकी टिप्पणियों को सीधे सरकार के खिलाफ कही गई बात माना गया।
शुरू हुए जैक मा के बुरे दिन
इस भाषण के बाद चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी भड़क उठी। जैक मा की आलोचना को कम्युनिस्ट पार्टी पर हमले के रूप में लिया गया। इसके बाद जैक मा के बुरे दिन शुरू हो गए। उनके कारोबार के खिलाफ तरह-तरह की जाँच शुरू कर दी गईं। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इशारे पर चीनी अधिकारियों ने जैक मा को झटका देते हुए पिछले साल नवंबर माह में उनके एंट ग्रुप के 37 अरब डॉलर के आईपीओ को निलंबित कर दिया।
चीन से बाहर नहीं जाने के आदेश
एक मीडिया रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हुई थी कि जैक मा के एंट ग्रुप के आईपीओ को रद्द करने का आदेश सीधा चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ओर से आया था। क्रिसमस की पूर्व संध्या पर जैक मा को निर्देश दिए गए कि वह तब तक चीन से बाहर न जाएँ, जब तक कि उनके अलीबाबा ग्रुप के खिलाफ चल रही जाँच को पूरा नहीं कर लिया जाता है।
अलीबाबा और एंट ग्रुप पर कार्रवाई
चीन ने जैक मा की ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा और उसकी वित्तीय कारोबार की शाखा एन्ट ग्रुप पर कार्रवाई शुरू की है। इस कार्रवाई को लेकर दुनिया भर में कयास लगाए जा रहे हैं। वहीं, चीन के मार्केट रेगुलेटर का कहना है कि उसने अलीबाबा के खिलाफ बाजार पर एकाधिकार कायम करने संबंधी कोशिशों को लेकर यह कार्रवाई शुरू की है। चीन सरकार की कार्रवाई से कंपनियों में ऐसा खौफ समाया है कि महज दो ही दिन में चीन की बड़ी कंपनियों को करीब 15 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो गया है। कुछ समय पहले जानकारों का मानना है कि यह बदले में की गई कार्रवाई ज्यादा लगती है।
आखिरी वक्त चीन की सरकार ने रोकी लिस्टिंग
चीन सरकार ने जैक मा को कमजोर करने के लिए हाल ही में नए बैंक एंट ग्रुप की शेयर बाजार में लिस्टिंग को रोक दिया था। इस कदम के पहले इस ग्रुप की कीमत 316 अरब डॉलर आँकी गई थी। एंट ग्रुप के आईपीओ (इनिशियल पब्लिक ऑफ़रिंग) को जबर्दस्त कामयाबी मिल रही थी। चीन की नियामक संस्था ने लिस्टिंग रोकते हुए कहा था कि एंट ग्रुप को अपने कारोबारों में सुधार (रेक्टिफिकेशन) करने की जरूरत है। एंट ग्रुप दुनिया की सबसे बड़ी फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी कंपनी है।
मंगलवार (जनवरी 05, 2021) को लगातार दूसरे दिन कॉन्ग्रेस पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद और प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा के घर आयकर विभाग की टीम पहुँची है। बेनामी संपत्ति मामले में उनसे लगातार दूसरे दिन पूछताछ की जाएगा। आपको बता दें कि कल भी वाड्रा के बयान विभागीय अधिकारियों द्वारा रिकॉर्ड किए गए थे।
जानकारी के मुताबिक, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने बेनामी संपत्ति के मामले में प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट वाड्रा को नोटिस भेजा था, लेकिन वह इनकम टैक्स के दफ्तर नहीं पहुँचे। ऐसे में इनकम टैक्स की टीम पूछताछ के लिए रॉबर्ट वाड्रा के घर ही पहुँच गई। फिलहाल रॉबर्ट से पूछताछ जारी है।
ब्रिटेन में कथित तौर पर कुछ अघोषित आय रखने के आरोप में वाड्रा आयकर विभाग की जाँच के दायरे में हैं। प्रवर्तन निदेशालय भी धनशोधन विरोधी कानून के तहत उनके खिलाफ इन आरोपों की जाँच कर रहा है। पेशे से कारोबारी वाड्रा ने अपने खिलाफ लगे आरोपों और कुछ भी गलत करने से इनकार किया है। कॉन्ग्रेस ने कुछ महीने पहले कहा था कि वाड्रा के खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से कार्रवाई की जा रही है।
आरोप है कि रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी ने कम दाम में बीकानेर में ज़मीन खरीदी, जिसे आगे अधिक दाम में बेचकर मुनाफा कमाया। इसी से जुड़े एक मामले में प्रवर्तन निदेशालय भी जाँच कर रहा है। प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा पर लंदन में संपत्ति की खरीद के लिए मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है। वाड्रा पर ब्रायनस्टन स्क्वायर में 1.9 मिलियन पाउंड की कीमत का मकान खरीदने का आरोप है। रॉबर्ट वाड्रा फिलहाल अग्रिम जमानत पर हैं।
पहले दिन की पूछताछ के बाद पेशे से कारोबारी वाड्रा ने कुछ भी गलत करने से इनकार किया। उन्होंने अपने घर के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि उन्होंने आयकर विभाग के अधिकारियों द्वारा पूछे गए सभी सवालों का जवाब दिया। अधिकारियों ने उनसे उनके कारोबार और कामकाज के बारे में पूछताछ की। उन्होंने कहा कि उन्होंने कोई कर चोरी नहीं की है और उनसे जो भी पूछा गया उन्होंने उसके जवाब दिए।
जब उनसे पूछा गया कि क्या आयकर विभाग ने उनसे बेनामी संपत्ति को लेकर पूछताछ की तो वाड्रा ने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है। कई मामले अदालत में हैं। हमारा मकसद सहयोग करना है। एक दिन जरूर सच्चाई की जीत होगी। मेरे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है।
गौरतलब है कि कुछ महीने पहले रॉबर्ट वाड्रा को लगातार प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के ऑफिस बुलाया जा रहा था। उस दौरान ईडी ने दिल्ली उच्च न्यायालय से यहाँ तक कहा था कि रॉबर्ट वाड्रा को हिरासत में लेकर पूछताछ किए जाने की आवश्यकता है। जाँच एजेंसी ने दलील दी थी कि धन के लेन-देन की कड़ियों से कथित रूप से उनका सीधा संबंध है। ईडी ने वाड्रा पर आरोप लगाया था कि वे अपने खिलाफ धनशोधन मामले की जाँच में सहयोग नहीं कर रहे हैं।
साल 2018 से ही समाचार चैनल रिपब्लिक टीवी ने अपने सभी प्रतिद्वंदी चैनलों को पछाड़ते हुए व्यूअरशिप मामले में काफी बढ़त हासिल की है। यह खुलासा अब ‘क्रोम डीएम’ (Chrome DM) के हवाले से हुआ है जो कि एक प्रतिष्ठित मार्केट रिसर्च फर्म है। ‘क्रोम डीएम’ ने बताया है कि रिपब्लिक टीवी के पास अपने प्रतिद्वंदी समाचार चैनल ‘टाइम्स नाउ’ से ज्यादा ‘ओटीएस’ (Opportunity-To-See) है।
ओटीएस का मतलब होता है कि एक दर्शक ने चैनल या ब्रांड को कितनी बार देखा। किसी चैनल का ओटीएस यदि अधिक है, तो मतलब साफ है कि उस चैनल को देखने वाले लोग भी अधिक हैं।
इंडियन टेलीविजन के अनुसार, क्रोम डीएम ने साल 2016 से 2020 का डेटा का विश्लेषण किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि रिपब्लिक टीवी ने साल 2018 में अपने प्रतिद्वंदी चैनल टाइम्स नाउ को पछाड़ा और 2019 तक शहर में रहने वाले भारतीयों के घरों में देखे जाने वाला सबसे बड़ा चैनल बन गया।
अपनी रिपोर्ट में क्रोम डीएम ने कहा, “इस शैली (समाचार) में किसी भी अन्य चैनल की तुलना में चैनल (रिपब्लिक) का वितरण और उपलब्धता बहुत अधिक है।” फर्म ने यह भी पाया कि 2017 में इंडस्ट्री में रिपब्लिक टीवी के प्रवेश ने समाचार शैली को महत्वपूर्ण दिशा दी है।
साल 2017 के बाद ‘टाइम्स नाउ’ ने रिपब्लिक टीवी को कैसे पछाड़ा
रिपब्लिक टीवी चूँकि एक ‘फ्री टू एयर’ चैनल है। ऐसे में, TRAI ने जब अपने नए टैरिफ ऑर्डर (NTO) के कार्यान्वयन को सुनिश्चित किया, तो इसकी पहुँच पूरे भारत में बढ़ गई। और इस प्रकार, टाइम्स नाउ और रिपब्लिक टीवी के बीच दर्शकों की संख्या/पहुँच में साल 2018 से 2020 के बीच ज्यादा फर्क आ गया। क्रोम डीएम ने यह भी नोटिस किया कि साल 2017 में रिपब्लिक के लॉन्च के बाद चैनल ने अच्छी बढ़त बनाई। वहीं, उसके साथ शुरू हुए चैनल इतनी रफ्तार नहीं पकड़ पाए।
OTS विश्लेषण रिपब्लिक टीवी की बढ़त और नेतृत्व को दर्शाता है: रिपब्लिक मीडिया ग्रुप सीईओ
ओटीएस विश्लेषण पर रिपब्लिक मीडिया ग्रुप के सीईओ विकास खानचंदानी ने कहा कि रिपब्लिक नेटवर्क ने अपनी संबंधित शैलियों में सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित करके उसको व्यापक प्लेटफॉर्मों तक वितरित किया। उन्होंने कहा कि Chrome का उपरोक्त डेटा महज एक आँकड़ा है, जो दिखाता है कि हमारा ब्रांड और नेतृत्व कितना बढ़ा। मीडिया ग्रुप के सीईओ ने सोशल मीडिया पर भी रिपब्लिक टीवी को यूजर्स से जुड़ा हुआ बताया। साथ ही, विश्वास जताया कि वह उभोक्ताओं और विज्ञापनदाताओं के लिए सबसे बड़े अंग्रेजी और हिंदी समाचार के लिए मंच को लाते रहेंगे।
फेक टीआरपी स्कैम
यहाँ याद दिला दें कि एक ओर जहाँ रिपब्लिक टीवी आए दिन नई ऊँचाइयों को छू रहा है, उसकी कामयाबी के स्पष्ट सबूत आँकड़ों में नजर आ रहे हैं, वहीं, रिपब्लिक टीवी पिछले दिनों फेक टीआरपी मामले में विवादों में रहा। फेक टीआरपी का पूरा मामला 8 अक्टूबर को मुंबई कमिशनर की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद शुरू हुआ था।
हालाँकि, एक दिन के भीतर ही रिपब्लिक टीवी ने यह सबूत दे दिए थे कि मामले में दर्ज हुई शिकायत में उनके चैनल का नाम नहीं है। लेकिन तब भी, मुंबई पुलिस चैनल को निशाना बनाती रही और पिछले दिनों रिपब्लिक टीवी पर कई कार्रवाई कर डाली।