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नाश्ते में आर्सेनिक ट्राइऑक्साइड जहर देकर हुई थी मारने की कोशिश: ISRO के शीर्ष वैज्ञानिक तपन मिश्रा का खुलासा

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)के शीर्ष वैज्ञानिक तपन मिश्रा (Tapan Misra) ने मंगलवार (जनवरी 5, 2021) को खुलासा किया कि उन्हें तीन साल से अधिक समय पहले जहर देकर मारने की कोशिश हुई थी। अपने हालिया फेसबुक पोस्ट ‘लॉन्ग केप्ट सीक्रेट’ में उन्होंने इस बात का खुलासा किया कि मई 23, 2017 को बेंगलुरु में इसरो मुख्यालय में पदोन्नति साक्षात्कार के दौरान उन्हें घातक आर्सेनिक ट्राइऑक्साइड जहर देकर मारने की कोशिश की गई थी।

मिश्रा ने अंदेशा जताया कि उन्हें डोसे की चटनी में जहर देकर मारने की कोशिश हुई थी, जिसके बाद उन्हें तनाव और दर्द से उबरने में 2 साल लग गए। अपने पोस्ट में उन्होंने अपनी हत्या के प्रयासों में अमेरिका की संलिप्ता भी बताई। तपन ने लिखा कि साल 2019 में अचानक एक भारतीय अमेरिकी प्रोफेसर उनके कार्यालय में दिखाई दिया और उन्हें जहर देने की इस घटना पर चुप रहने को भी कहा गया। इससे पहले उन्हें ईमेल के जरिए भी सैंकड़ों धमकियाँ मिलती रहती थीं। वह बताते हैं कि कई बार सुरक्षा एजेंजजियों ने उन्हें आगाह करके बचाया था।

जहर दिए जाने के अपने आरोपों पर वैज्ञानिक तपन मिश्रा ने कहा, “कोई निश्चित रूप से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) को कुछ नुकसान पहुँचाना चाहता था। एकमात्र उपाय अपराधी को पकड़ना और उन्हें दंडित करना है।”

अपने फेसबुक पोस्ट में मिश्रा ने उन सहकर्मियों के प्रति भी दुःख व्यक्त किया है, जो उन्हें इस हमले के बाद नकारने लगे थे। वह कहते हैं कि लाख प्रयासों के बाद उन्हें आज भी न्याय नहीं मिला है। उनके मुताबिक, ISRO के दो अध्यक्षों ने तो उनके विरोध पर आँख मूंद ली है और उन्हें न्याय नहीं मिल पा रहा।

फेसबुक पोस्ट का पहला हिस्सा

अपने पोस्ट की शुरुआत में उन्होंने कई वैज्ञानिकों की संदिग्ध मौत का उल्लेख किया। उन्होंने 1971 में प्रोफेसर विक्रम साराभाई, 1999 में डॉ एस श्रीनिवासन की आकस्मिक मौत और 1994 में नम्बी नारायण के साथ हुई साजिश का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने (तपन मिश्रा) कभी सोचा भी नहीं था कि वह इन रहस्यों का एक हिस्सा बनेंगे।

उन्होंने आशंका जताई कि उन्हें लगता है कि डोसे की चटनी में मिलाकर जहर दिया गया जिसके कारण वह असहनीय पीड़ा से गुजरे। उन्होंने मलद्वार से खून के रिसाव के कारण 30-40% खून का गँवाया। ISRO के वैज्ञानिक के मुताबिक, उन्हें दो सालों तक साँस लेने में तकलीफ, त्वचा पर अजीब फोड़े-फुंसियाँ, शरीर की खाल का उतरना, हाथ-पाँव के नाखूनों का जाना, शरीर के हर बाहरी व आंतरिक हिस्से में फंगल इन्फेक्शन.. ये सब झेलना पड़ा। उन्होंने बताया कि उनका इलाज टीएमएच मुंबई और दिल्ली एम्स में भी चला।

फॉरेंसिक विशेषज्ञ ने उन्हें बताया कि उन्होंने अपने पूरे करियर में ऐसा हत्या का प्रयास नहीं देखा। वह अपने पोस्ट में उन साथियों का और गृह मंत्रालय की सुरक्षा एजेंसियों का आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने जहर के हमले को लेकर पहले ही चेतावनी दी थी। वह बताते हैं कि उनके मुताबिक उन्हें मॉलिक्यूलर लेवल सस्पेंशन पर जहर दिया गया, वो भी गरिष्ठ भोजन के ठीक बाद।

ऐसा सस्पेंशन रंगरहित, खुशबू रहित और स्वादरहित होता है, इसलिए इसे लेकर संदह नहीं किया जा सकता। ये पेट में जाता है और लाल रक्त कणिकाओं को नष्ट करता है, जो बाद में रक्त धमनियों में इकट्ठा होती है और व्यक्ति हार्ट अटैक से दो या तीन घंटे बाद मर जाता है। मिश्रा इसे अपनी खुशकिस्मती कहते हैं कि उन्होंने उस दिन लंच नहीं किया था। वह इस हमले को कोई जासूसी अटैक बताते हैं, जिनका मकसद एक ऐसे वैज्ञानिक को हटाना था, जिसने सैन्य और वाणिज्यिक महत्व के महत्वपूर्ण योगदान दिया हो।

फेसबुक पोस्ट का दूसरा हिस्सा

वह 3 मई, 2018 का जिक्र करते हैं और याद करते हैं कि कैसे सुरक्षा एजेंसियों के कारण उस दिन उनकी जान बच पाई और एक भयावह घटना में 100 करोड़ की लैब क्षतिग्रस्त हो गई। इसी तरह 19 जुलाई, 2019 को एक भारतीय अमेरिकी वैज्ञानिक ने उन्हें उनके कार्यालय में आकर भविष्य में इस सम्बन्ध में एक भी शब्द न बोलने को कहा। उसी साल 12 जुलाई, 2019 को उनकी सुरक्षा के साथ एक भारी खिलवाड़ हुआ और उन्हें हाइड्रोजन साइनाइड दिया गया। इस जहर का असर इतना भयावह था कि उन्हें मिर्गी आई, उनकी यादश्त चली गई। वह कहते हैं उस दिन बचे तो सिर्फ़ अपने PSO के कारण। उसने उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया और फौरन वहाँ उनका इलाज शुरू हुआ। उनके मुताबिक, शायद ये सब चंद्रयान 2 की लॉन्च डेट पर मौजूद रहने से रोकने के लिए हुआ।

फेसबुक पोस्ट का तीसरा हिस्सा

वह अपने पोस्ट में ऐसी ही कई चौंकाने वाली बातों का जिक्र करते हैं। वह लिखते हैं कि पिछले दो सालों में उन्होंने अपने क्वार्टर में कई बार कोबरा और क्रेट जैसे जहरीले साँपों को देखा है। जबकि कार्बोलिक एसिड वेंट्स को हर 10 फीट पर डाला जाता है, फिर भी साँप घुसने में कैसे कामयाब रहा? वह अपनी चार बिल्लियों और सिक्योरिटी स्टाफ के शुक्रगुजार हैं कि उनके कारण ये साँप हर बार पकड़ लिए गए। वह कहते हैं कि कुछ तीन महीने पहले उन्हें उस सुरंग का पता चला, जहाँ से साँप आ रहे थे जिसके बाद उन्होंने उसे बंद करवा दिया।

उन्होंने अपने पोस्ट में अपने बेटे पर सितंबर में हुए एक और हमले के प्रयास का जिक्र किया। उन्होंने अपने साथियों, बुद्धिजीवियों से उनकी आपबीती आगे तक पहुँचाने की अपील की और अपने व अपने परिवार की सुरक्षा की माँग की। मिश्रा अपने साथ हुई घटनाओं के मद्देनजर बताते हैं कि उन्हें विश्वास है कि ऐसे लोग हमारे सिस्टम में मौजूद हैं और वैज्ञानिकों की रहस्यमय मौतों व हमारे संस्थानों के विनाश के लिए जिम्मेदार हैं।

ऑपइंडिया की तपन मिश्रा से बातचीत

बता दें कि तपन मिश्रा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के निदेशक के रूप में सेवा दे चुके हैं। ऑपइंडिया ने इस पोस्ट को देखने के बाद तपन मिश्रा से बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने बातचीत करते हुए कहा, “सरकार और राजनीतिक तंत्र से मेरा निवेदन है कि जो लोग देश का निर्माण करते हैं, अगर हम उनकी रक्षा नहीं करते हैं, अगर हम अपनी संपत्ति की रक्षा नहीं करते हैं, तो कल हमारा देश नष्ट हो जाएगा।”

मोबाइल चोर था झारखंड का तबरेज अंसारी, साथी चोर आरिफ पकड़ा गया दो फोन के साथ; भीड़ ने की थी पिटाई

आपको झारखंड के सरायकेला-खरसावाँ जिले के सरायकेला थाना इलाके के धातकीडीह गाँव में करीब डेढ़ साल पहले तबरेज अंसारी (Tabrez Ansari) नामक चोर की मौत का मामला याद होगा। तबरेज अंसारी की मौत के मामले के सहारे पूरे देश में ‘मॉब लिंचिंग’ का माहौल होने का दुष्प्रचार भी फैलाया गया था। अब इस घटना के दिन चोरी किए गए दो मोबाइल फोन्स के साथ खरसा के कदमडीहा गाँव निवासी आरिफ अंसारी (Arif Ansari) को दबोच लिया गया है। पुलिस लगातार इस मामले पर नजर बनाए हुए थी।

आरिफ अंसारी इससे पहले भी मोबाइल फोन्स की चोरी और चोरी किए गए मोबाइल फोन्स की खरीद-फरोख्त करने के मामले में जेल जा चुका है। उस पर पहले से ही कई मामले दर्ज हैं। थाना प्रभारी सनोज कुमार चौधरी इस पूरे मामले में अनुसंधान का नेतृत्व कर रहे और उन्होंने पूरी सजगता के साथ जाँच करते हुए आरोपित आरिफ को गिरफ्तार किया। वो मृतक तबरेज अंसारी का साथी था और चोरी का सामान बेचा करते थे।।

इस पूरे मामले को संसद में भी उठाया गया था और केंद्र के साथ-साथ झारखंड में भी भाजपा की सरकार होने के कारण विपक्षी दलों और नेताओं ने ‘मुस्लिमों की मॉब लिंचिंग’ का मामला उठाते हुए तबरेज अंसारी की मौत के मामले में राजनीति की थी। उससे ‘जय श्री राम’ बुलवाए जाने के आरोपों के अलावा ‘हिंदूवादी गुंडों’ को उसकी हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। मोबाइल फोन्स की चोरी का ये मामला जून 17, 2019 का है, जो धातकीडीह गाँव में घटी थी। गाँव के हेमसागर प्रधान और राजेश प्रमाणिक ने दर्ज कराया था।

ये मोबाइल फोन्स उनके घर से ही चोरी हो गए थे। इसके बाद से ही पुलिस ने इन चोरी हुए मोबाइल फोन्स के EMI नंबरों को नोट कर के उन्हें ट्रेसिंग के लिए सर्विलांस पर रख दिया था और इस पर नजर रखी गई थी। हाल ही में, चोरी हुए ये दोनों मोबाइल फोन्स ऑन किए गए, जिससे पुलिस तुरंत सतर्क हो गई। छानबीन के बाद पुलिस आरिफ अंसारी के घर पहुँची और उसे चोरी हुए मोबाइल फोन्स के साथ गिरफ्तार कर लिया।

सरायकेला थाना अंतर्गत धातकीडीह गाँव में हुई चोरी की घटना के बाद ही ग्रामीणों ने तबरेज अंसारी नामक चोर को पकड़ के पीटा था। मोहम्मद इरफान और नुमेर अली नामक उसके दो साथी भागने में सफल रहे थे। ये दोनों अब भी फरार हैं और पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकी है। फरार आरोपितों के खिलाफ उनके परिजनों ने भी गुमशुदगी का कोई मामला नहीं दर्ज कराया है। पिटाई के 3 दिन बाद तबरेज अंसारी की मौत हुई थी।

सितम्बर, 2019 में झारखंड पुलिस ने तबरेज अंसारी की मौत के मामले में दायर आरोप-पत्र से हत्या की धारा को हटा दिया था। पुलिस ने डॉक्टरों की रिपोर्ट (पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट) का हवाला देते हुए कहा था कि तबरेज की मौत तनाव और कार्डियक अरेस्ट (हृदयाघात) की वजह से हुई थी। झारखंड पुलिस के इस फैसले के बाद सभी 11 आरोपितों के ऊपर से हत्या संबंधी IPC की धारा (धारा 302) हटा ली गई थी।

उमर खालिद ने ताहिर हुसैन के साथ मिल कर रची थी दिल्ली दंगों की साजिश: कोर्ट ने कहा- पर्याप्त सबूत हैं मौजूद

दिल्ली की एक अदालत ने माना है कि जेनएयू के पूर्व छात्रनेता उमर खालिद और आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन ने पिछले साल की शुरुआत में राजधानी दिल्ली में हुई हिंसा की साजिश रची थी। कोर्ट ने एक बयान में कहा कि शुरुआती सबूतों से ऐसा ही प्रतीत होता है। आरोप पत्र का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया जाँच निष्कर्षों के अनुसार, JNU के छात्र नेता रहे उमर खालिद और AAP के पार्षद रहे ताहिर हुसैन ने मिल कर नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली दंगों की साजिश रची थी – ये मानने के वाजिब आधार हैं। चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट दिनेश कुमार ने ये बातें कही।

कोर्ट ने मंगलवार (दिसंबर 5, 2020) को पूरक आरोप-पत्र का संज्ञान लेते हुए उक्त टिप्पणी की। दिल्ली में फ़रवरी 2020 के अंतिम सप्ताह में हिन्दू-विरोधी दंगे भड़क गए थे, जिसमें 50 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। कोर्ट ने कहा कि खजूरी खास में हुई सांप्रदायिक हिंसा के मामले में उमर खालिद के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं, जिससे इस मामले में जाँच आगे बढ़ाया जा सकता है।

कोर्ट ने एक गवाह के बयान का भी अध्ययन किया। इसके बारे में कोर्ट ने कहा कि ये बयान ये दिखाने के लिए पर्याप्त है कि उक्त अवधि में उमर खालिद दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपित ताहिर हिस्सें से लगातार संपर्क में था, जिस पर इन दंगों की फंडिंग के साथ-साथ लोगों को लूटपाट और सम्पत्तियों को जलाने के लिए भड़काने का आरोप है। कोर्ट ने इस आरोप को भी नोट किया कि उमर खालिद ने घूम-घूम कर दिल्ली में लोगों को भड़काया और आपराधिक षड्यंत्र रचे।

गवाहों ने अपने बयान में बताया कि उन्होंने ताहिर हुसैन को लोगों में रुपए बाँटते हुए देखा था, ताकि वो CAA के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों में आ सकें। कोर्ट ने ये भी नोट किया कि इन आरोपितों द्वारा भड़काए जाने के बाद लोग इकट्ठे हुए और सम्पत्तियों को जलाया गया, तोड़फोड़ की गई। गवाहों ने उमर खालिद, खालिद सैफी और ताहिर हुसैन को शाहीनबाग़ आंदोलन के दौरान साथ भी देखा था।

अब कोर्ट की हरी झंडी के बाद इस मामले में जाँच आगे बढ़ेगी। इससे पहले उमर खालिद ने कोर्ट में दावा किया था कि उसे पता ही नहीं है कि उसके ऊपर क्या आरोप तय किए हैं। उसने अपने वकील को चार्जशीट न दिए जाने का आरोप ददिल्ली पुलिस पर लगाया था। कड़कड़डूमा कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने कहा था कि उसे चार्जशीट की कॉपी उपलब्ध करा दी जाएगी। उसने इस मामले में फेयर ट्रायल का अधिकार न मिलने का आरोप लगाया था।

इससे पहले कट्टरपंथी मुस्लिम और हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के आरोपित उमर खालिद ने कथित तौर पर पुलिस के सामने कबूल किया था कि वह मुस्लिम समूहों को संगठित करने, उन्हें उकसाने और बड़े पैमाने पर हिंसा की साजिश रचने में शामिल था। 2020 की शुरुआत में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के हिंदू विरोधी दंगों के सिलसिले में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद के खिलाफ बुधवार को चार्जशीट दाखिल की थी। 

केरल में आतंकी कैंप चलाने के लिए PFI ने जमा की थी मोटी रकम: ED का खुलासा- धार्मिक द्वेष बढ़ाना, देश की अखंडता को तोड़ना था मकसद

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के ख़िलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जाँच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय ने मंगलवार (जनवरी 05, 2021) को कथित तौर पर दावा किया कि इस समूह ने केरल में आतंकी कैंप चलाने के लिए भारी मात्रा में फंड इकट्ठा कर लिया था।

PMLA (धनशोधन रोकथाम कानून) कोर्ट में केंद्रीय एजेंसी ने यह दावा PFI के छात्र नेता व मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में पकड़े गए रऊफ शरीफ की जमानत याचिका का विरोध करते हुए किया। एजेंसी ने अपने बयान में बताया कि उन्होंने राष्ट्रीय जाँच एजेंसी द्वारा विशेष अदालत में दायर चार्जशीट के आधार पर अपनी जाँच शुरू की थी।

उन्होंने कहा कि एनआईए द्वारा साल 2013 में दायर आरोप पत्र के मुताबिक PFI व SDPI के कार्यकर्ताओं के एक समूह ने अपने कार्यकर्ताओं को विस्फोटकों और हथियारों का इस्तेमाल सिखाने के लिए आपराधिक षड्यंत्र किया और कन्नूर जिले के नारथ में एक आतंकवादी शिविर का आयोजन किया। 

चार्जशीट के अनुसार, इस कैंप का आयोजन धर्मों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने, उन्हें आतंकवादी गतिविधियों के लिए तैयार करने और इस तरह राष्ट्र की एकता व अखंडता को खतरे में डालने के लिए प्रतिबद्ध कृत्यों के लिए किया गया था। 

ईडी ने कहा, ‘‘पीएफआई ने आतंकवादी शिविरों के आयोजन के लिए और उससे जुड़ी गतिविधियों व साम्प्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुँचाने के लिए पर्याप्त धन जमा कर लिया था… जाँच के दौरान पीएफआई के कई बैंक खातों और अन्य वित्तीय दस्तावेजों का विश्लेषण किया गया।”

रऊफ की बेल याचिका का विरोध करते हुए ईडी ने रऊफ के पास पहुँची विदेशी सहायतों का जिक्र किया और उन्हें बेहद संदिग्ध बताया। एजेंसी ने कहा कि कई दस्तावेज और डिजिटल डिवाइस को हाल में की गई छापेमारी में बरामद किया गया है, जिनसे खुलासा होता है कि बहुत भारी मात्रा में फंड एकत्रित किए गए।

एजेंसी ने इस बात पर भी गौर करवाया कि चूँकि ये विदेशी फंड पीएफआई के बैंक अकॉउंट में नहीं नजर आते, इसलिए ये बात साफ है कि इन्हें हवाला या फिर अंडरग्राउंड चैनल के माध्यम से भेजा गया। 

बेल याचिका के विरोध में ईडी ने कोर्ट को बताया कि उनके द्वारा दिए गए सबूतों से साबित होता है कि पीएफआई का छात्र समूह सीएफआई (कैम्पस फ्रंट ऑफ़ इण्डिया) लगातार मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल रहा और देश भर में अपराध व गैर कानूनी गतिविधियों को करवाता रहा।

ईडी ने आरोप लगाया कि शरीफ ने हाथरस पहुँचे तीन सदस्यों में से अतीक उर रहमान को सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने और सम्प्रदायिक दंगे करवाने के लिए फंड ट्रांसफर किया। इसके अतिरिक्त, आरोपित के अकॉउंट से निकाले गए रुपयों को भी जाँच एजेंसी ने संदिग्ध कहा।

बता दें कि पिछले दिनों पीएफआई सदस्य रऊफ शरीफ़ को केरल के तिरुअनंतपुरम एयरपोर्ट से हिरासत में लिया गया था। वह ओमान भागने की फ़िराक में था। हाथरस केस में रऊफ पर जातीय दंगे भड़काने की साजिश रचने का आरोप है।

गौरतलब है कि हाल में ईडी ने कोर्ट में हलफनामा दायर किया था, जिसमें कहा गया था कि पीएफआई को वर्षों से अब तक 100 करोड़ रुपए से ज्यादा राशि फंड के रूप में मिली। इतना ही नहीं इस संगठन पर शांति बिगाड़ने का भी आरोप लगा।

वहीं, पीएफआई के राष्ट्रीय सचिव ने सभी आरोपों को खारिज किया और ईडी पर आरोप मढ़ा कि उन्हें भाजपा शासित प्रदेश में उपकरण की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। 26 दिसंबर को पीएफआई ने अपने अकॉउंट में आने वाले फंड को पब्लिक डोनेशन बताया और कहा कि उनके पास हर चीज का हिसाब है।

‘ठाकुर’ लिखे जूते बेच रहा नासिर लिया हिरासत में तो यूपी पुलिस पर भड़कीं RJ सायमा

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में नासिर को पुलिस ने हिरासत में लिया है। वो ‘ठाकुर’ लिखे जूते बेच रहा था, जिसके बाद कुछ लोगों ने शिकायत की थी कि इससे किसी खास जाति के खिलाफ घृणा फैलाई जा रही है और उसे अपमानित किया जा रहा है। यूपी में सरकार जातिवाद और जातीय वैमनस्य को लेकर पहले से ही सख्त है। पुलिस ने दुकानदार नासिर को हिरासत में लिया, जिसके बाद रेडियो मिर्ची की RJ सायमा भड़क गईं।

अब दुकानदार कह रहा है कि वो तो सिर्फ इन जूतों को बेचने का काम करता है, इसे बनाती तो कंपनी है। पुलिस ने जानकारी दी कि इस सम्बन्ध में थाना गुलावठी पर सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत है। अभियोग में नामित अभियुक्त पुलिस हिरासत में है एवं अग्रिम विवेचनात्मक कार्रवाई की जा रही है। RJ सायमा ने इसे मजाक बताते हुए लिखा कि पकड़ना ही है तो उन्हें पकड़ें जिन्होंने ये जूते बनाए, एक बेचारे दुकानदार को हिरासत में क्यों?

जबकि सच्चाई ये है कि लोगों की शिकायत पर कंपनी के खिलाफ भी मामला दर्ज हुआ है। इस मामले में IPC की धाराओं 153-A (धर्म, भाषा, नस्ल वगैरह के आधार पर लोगों में नफरत फैलाने की कोशिश करना), 323 (किसी को स्वेच्छा से चोट पहुँचाना) और 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) के तहत मामला दर्ज किया गया है। वहीं कुछ लोगों का दावा था कि ये ‘ठाकुर फुटवियर’ की कंपनी है।

उनका दावा है कि जैसे ‘बजाज’ अपना नाम अपने स्कूटरों पर छापता है, ठीक उसी तरह ये भी जूतों पर ‘ठाकुर’ शब्द लिखता है। इस पूरे विवाद के बाद यूपी पुलिस ने भी स्थिति स्पष्ट की है। पुलिस ने कहा है कि इस प्रकरण में वर्तमान विधि व्यवस्था के अनुसार जो सुसंगत था वह एक्शन लिया गया है, यदि पुलिस एक्शन न लेती तो बहुत से लोग उलटी/भिन्न प्रतिक्रिया देते। बुलंदशहर पुलिस ने कहा, “अतः, पुलिस ने नियम का पालन किया है। कृपया इसे इसी रूप में देखें।”

हालाँकि, जिस युवक ने शिकायत दर्ज कराई है उसका कहना है कि दुकानदार नासिर ने उसके साथ झगड़ा भी किया था। उसने जब ‘ठाकुर’ लिखे जूतों पर आपत्ति जताई तो वो लड़ाई पर उतर आया, जिसके बाद उसने पुलिस में शिकायत की। असल में शिकायत दर्ज कराने वाले ने ही आरोप लगाया है कि इस मामले में दुकानदार और कंपनी, दोनों ही दोषी हैं। पुलिस इस मामले की जाँच कर रही है, जिसके बाद सुसंगत कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है।

RJ सायमा अक्सर अपनी कट्टरवादी विचारधारा के कारण विवादों में रहती हैं। अक्टूबर 2020 में  ‘रेडियो मिर्ची’ ने एक ट्वीट में ‘जिहाद, आतंकवाद नहीं है’ लिखकर इस्लामी कट्टरपंथियों का बचाव किया गया था। साथ ही RJ सायमा की ‘उर्दू की पाठशाला’ में ‘काफिर’ अंग्रेजी में ‘Non Believer’ बताया गया था, अर्थात किसी चीज में अविश्वास करने वाला। उन्होंने इस शब्द के महिमामंडन के लिए एक शायरी भी पढ़ी थी: ‘एक बेवफा के प्यार में हद से गुजर गए, काफिर के प्यार ने हमें काफिर बना दिया।‘

भारत रत्न की हकदार हैं सोनिया और मायावती: कॉन्ग्रेस नेता हरीश रावत ने की केंद्र सरकार से माँग

कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भारत सरकार से कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गाँधी और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती को भारत रत्न देने की माँग की है। अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर अपनी माँगें रखते हुए रावत ने कहा कि सोनिया गाँधी और मायावती ने महिला सशक्तीकरण के लिए बहुत बड़ा योगदान दिया है।

अपने फेसबुक पोस्ट में हरीश रावत ने लिखा, “आदरणीय सोनिया गाँधी जी व सम्मानित बहन मायावती जी, दोनों प्रखर राजनैतिक व्यक्तित्व हैं। आप उनकी राजनीति से सहमत और असहमत हो सकते हैं, मगर इस तथ्य से आप इनकार नहीं कर सकते हैं कि सोनिया जी ने भारतीय महिला की गरिमा और सामाजिक समर्पण व जनसेवा के मापदंडों को एक नई ऊँचाई व गरिमा प्रदान की है, आज उन्हें भारत की नारीत्व का गौरवशाली स्वरूप माना जाता है। सुश्री मायावती जी ने वर्षों से पीड़ित-शोषित लोगों के मन में एक अद्भुत विश्वास का संचार किया है, भारत सरकार को चाहिए कि इन दोनों व्यक्तित्वों को इस वर्ष का भारत रत्न देकर अलंकृत करें।”

हालाँकि, रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य के बसपा नेतृत्व ने उनकी माँग को ‘जनता को बेवकूफ बनाने’ की तकनीक करार दिया है। वहीं, भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और मीडिया प्रभारी डॉ देवेंद्र भसीन ने कहा कि क्या सोनिया गाँधी को भारत रत्न देने से रावत चाहते हैं कि सम्मान किसी ऐसे को दिया जाए जो जमानत पर है? उन्होंने कहा कि ऐसी माँग रखकर वह किस तरह की मिसाल कायम करना चाहता हैं? यह कभी नहीं होगा।

नेहरू न ठुकराते राजा का ऑफर तो आज भारत का हिस्सा होता नेपाल: प्रणब मुखर्जी की पुस्तक में खुलासा

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अगर चाहते तो आज नेपाल भी भारत का हिस्सा होता, लेकिन उन्होंने इस ऑफर को ठुकरा दिया। ये खुलासा दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक में किया है। उनकी आत्मकथा ‘The Presidential Years’ (द प्रेसिडेंसियल ईयर्स) के अनुसार, नेपाल के तत्कालीन राजा त्रिभुवन वीर विक्रम शाह ने नेहरू को ऑफर दिया था कि नेपाल को भी भारत का एक प्रांत बना दिया जाए, लेकिन नेहरू ने इसे ठुकरा दिया।

इस पुस्तक के चैप्टर 11 की हेडिंग है – ‘My Prime Ministers: Different Styles, Different Temperaments’ (मेरे प्रधानमंत्री: अलग-अलग स्टाइल्स, अलग-अलग मिजाज)। इसमें उन्होंने लिखा है कि अगर तब जवाहरलाल नेहरू की जगह पर इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री होतीं, तो वो इस मौके को नहीं छोड़तीं और इसे लपक लेतीं। उन्होंने याद दिलाया है कि इंदिरा ने सिक्किम के मामले में भी ऐसा ही किया था।

अलग-अलग सरकारों में कई प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर चुके प्रणब मुखर्जी का कहना है कि उन सभी के काम करने के तौर-तरीके अलग थे। उन्होंने शुरुआती उदाहरण ही गिनाए हैं कि लाल बहादुर शास्त्री के काम करने का तरीका उनके पूर्ववर्ती नेहरू से बिलकुल अलग था। उन्होंने लिखा है कि आंतरिक सुरक्षा, विदेश मामलों और प्रशासन को लेकर भी प्रधानमंत्रियों का अलग-अलग नजरिया होता है, भले ही वो समान पार्टी से ही क्यों न आते हों।

मुखर्जी ने लिखा है कि नेहरू ने नेपाल के साथ काफी डिप्लोमेटिक तरीके से व्यवहार किया। वो लिखते हैं, “नेपाल में राणाओं के शासन को राज-तंत्र से स्थानांतरित किया गया। नेहरू चाहते थे कि वहाँ पर लोकतंत्र हो। नेहरू का कहना था कि नेपाल एक स्वतंत्र राष्ट्र है और उसे ऐसे ही बने रहना चाहिए। इसीलिए उन्होंने राजा वीर विक्रम शाह के ऑफर को ठुकरा दिया और नेपाल भारत का हिस्सा नहीं बन पाया।”

प्रणब मुखर्जी की इस पुस्तक को लेकर जम कर विवाद भी हुआ था। बेटे अभिजीत मुखर्जी ने उनके संस्मरण ‘The Presidential Memoirs’ के प्रकाशन को लेकर आपत्ति जताते हुए इस पर कुछ वक्त के लिए रोक लगाने की माँग की थी। जबकि इसके उलट, प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपने भाई से बेवजह की बाधा उत्पन्न नहीं करने का अनुरोध किया था। शर्मिष्ठा ने कहा था कि उनके द्वारा व्यक्त किए गए विचार उनके खुद के हैं और किसी को भी किसी सस्ते प्रचार के लिए प्रकाशित होने से रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। 

26 जनवरी के दिन राजपथ पर नजर आएगी बाबा केदारनाथ की झाँकी: साथ में होंगे कस्तूरी मृग, मोनाल एवं ब्रह्मकमल

नई दिल्ली में आगामी 26 जनवरी को होने वाली गणतंत्र दिवस परेड के लिए रक्षा मंत्रालय द्वारा उत्तराखण्ड राज्य की झाँकी का अंतिम रुप से चयन कर लिया गया है। इस बार उत्तराखंड राज्य की ओर से बाबा केदारनाथ की झाँकी का चयन किया गया है। भारत सरकार द्वारा इस सम्बन्ध में गत दिसम्बर 31, 2020 को आदेश जारी कर दिए गए थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्तराखंड की झाँकी का नाम इस प्रक्रिया में भाग लेने वाले 32 अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की झाँकी के साथ शामिल था, जिन्होंने इस प्रक्रिया में भाग लिया था। इनमें से केंद्र ने केवल 17 का चयन किया। राज्य के सूचना निदेशालय के महानिदेशक मेहरबान सिंह बिष्ट ने कहा कि रक्षा मंत्रालय द्वारा रखी गई इस प्रक्रिया में केंद्र ने 31 दिसंबर को इसके लिए एक आदेश पारित किया था जिसके बाद 32 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने चयन प्रक्रिया के लिए अपनी झांकी के नमूने भेजे थे।

उत्तराखंड राज्य के सूचना महानिदेशक, डॉ मेहरबान सिंह बिष्ट ने बताया कि रक्षा मंत्रालय भारत सरकार में 5 बार की बैठक के बाद उत्तराखण्ड राज्य की झांकी को भी गणतंत्र दिवस परेड में स्थान मिला है। मंगलवार (जनवरी 05, 2020) को राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा यह सूचना जारी की गई।

इस वर्ष उत्तराखंड राज्य की ओर से प्रदर्शित की जाने वाली झांकी का विषय ‘केदारखण्ड’ रखा गया है। झांकी के अग्र भाग में राज्य पशु कस्तूरी मृग, राज्य पक्षी मोनाल एवं राज्य पुष्प ब्रह्मकमल तथा पार्श्व भाग में केदारनाथ मन्दिर परिसर एवं श्रद्धालुओं को दर्शाया गया है।

इससे पहले, उत्तराखंड राज्य द्वारा वर्ष 2003 में फूलदेई, वर्ष 2005 में नंदा राजजात, वर्ष 2006 में फूलों की घाटी, वर्ष 2007 में कार्बेट नेशनल पार्क, वर्ष 2009 में साहसिक पर्यटन, वर्ष 2010 में कुम्भ मेला हरिद्वार, वर्ष 2014 में जड़ी बूटी, वर्ष 2015 में केदारनाथ, वर्ष 2016 में रम्माण, वर्ष 2018 में ग्रामीण पर्यटन तथा वर्ष 2019 में अनाशक्ति आश्रम (कौसानी प्रवास एवं अनाशक्ति) विषयों पर आधारित झाँकियों का सफल प्रदर्शन राजपथ पर किया जा चुका है।

परमार वंश के राजमहल पर काजी इरफान, महबूब और अहमद की निजी संपत्ति का बोर्ड…

क्या मजबूत पत्थरों से बनी ऊँची चारदीवारी और बुर्जों से घिरे किसी एक हजार साल पुराने राजमहल का कोई हिस्सा किसी की निजी संपत्ति हो सकता है, जिसकी एक दीवार को तोड़कर सीमेंट और लोहे का दरवाजा लगा दिया गया हो और कोई इस तरफ ऐसी-वैसी निगाह न देखे इसके लिए पुरानी दीवार पर एक साइन बोर्ड टाँग दिया गया हो- ‘निजी संपत्ति, उदयपुर पैलेस, खसरा नंबर-822, वार्ड नंबर-14।’

मध्य प्रदेश के विदिशा शहर से करीब 70 किलोमीटर दूर उदयपुर नाम के एक प्राचीन नगर में देश के जाने-माने इतिहासकार डॉ. सुरेश मिश्र के साथ घूमना एक यादगार अनुभव रहा। आठ हजार आबादी की इस बस्ती में हजार-बारह सौ साल की इमारतें आज भी काफी हद तक बची हुई है।

पूरा नगर अपने पुराने डिजाइन पर ऊबड़-खाबड़ हालत में मौजूद है, जहाँ परमार राजवंश के वास्तुशिल्प के अनुसार दीवार-दरवाजे, मंदिर, महल, तालाब, बावड़ी, कमरे, दीवारें और गलियाँ हैं। इनसे गुजरते हुए लगता है कि आप अतीत में लौटकर सदियों पहले के खोए हुए वैभव की सैर कर रहे हैं।

इस जगह की प्रसिद्धि नीलकंठेश्वर मंदिर से है, जो राजा भोज के बाद की पीढ़ी में हुए महाराज उदयादित्य ने बनवाया था। इस नगर का नाम उदयपुर भी उनसे ही जुड़ा है। उस दौर में राजा के युवराजों को राजधानी से दूर के महत्वपूर्ण नगरों और सैन्य ठिकानों की कमान सौंपी जाती थी।

एक तरह से राज्य शासन चलाने के पारिवारिक प्रशिक्षण का यह हिस्सा था। जैसे मगध में सम्राट बनने के पहले अशोक के पिता बिंदुसार ने उन्हें अवंति का राज्यपाल बनाकर उज्जैन भेजा था। बहुत संभव है युवराज उदयादित्य अपने पिता के समय परमारों के राज्य की सीमा पर स्थित उदयपुर भेजे गए हों।

हो सकता है कि उदयादित्य ने ही इस नगर की विकास योजना बनाई हो और अपनी वंश परंपरा के अनुसार बेहतरीन निर्माण किए हों, जो उनके राजा बनने के बाद भी जारी रहे होंगे। वर्ना ऐसे मंदिर गाँव-गाँव में हैं, लेकिन चौकोर दुर्ग से सुरक्षित नगर के भीतर एक विशाल चारदीवारी और बुर्जों से घिरे राजमहल की रूपरेखा इस इलाके में सिर्फ यहीं हैं।

डॉ. सुरेश मिश्र ने अफसोस के साथ कहा कि पूरे नगर को नए सिरे से सहेजने की जरूरत है। यहाँ कई इमारतें, महल और मंदिर बचे हुए हैं, जो भारत के सदियों पुराने स्थापत्य का एक शानदार परिचय दे रहे हैं। अगर इन्हें न बचाया गया तो हमारी आँखों के सामने यह धूल में मिल रहा है।

अब कोई विदेशी आक्रांता यह बर्बादी नहीं कर रहे। इसके जिम्मेदार हम हैं। पत्थर की खदानों ने निर्माण के लिए आवश्यक बुनियादी सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराई। आबादी का जितना विस्तार है, प्राचीन नगर का उससे ज्यादा है। एक बड़े हिस्से की इमारतें धीरे-धीरे ढह रही हैं।

महल का काफी कुछ हिस्सा आज भी ऐसा है, जिसे सहेजा जा सकता है। यह पूरे जिले में एकमात्र ऐसी जगह है, जिसे एक शानदार पर्यटन केंद्र के रूप में ऐसा विकसित किया जा सकता है कि लोगों को एक पूरा दिन यहाँ बिताकर अपने अतीत में झाँकने का मौका मिले।

मूल शिव मंदिर के अलावा भी और कई पुराने मंदिर और बावड़ियाँ हैं, जो किसी चमत्कार से ही बचे रह गए हैं। इस्लामी हमलावरों से यह नगर अछूता नहीं रहा है। इसके सबूत मंदिर में ही दिखाई देते हैं, जहाँ मूर्तियों को तोड़ा गया है। यह आश्चर्य की बात है कि फिर भी यह मंदिर अपने मूल आकार में बचा रह गया और यह नगर भी।

हर दिन दूर-दूर से लोग उदयपुर आते हैं। ज्यादातर सिर्फ 11वीं सदी के मंदिर के दर्शन करने आते हैं और वे भी सिर्फ महादेव की पूजा-अर्चना के लिए। गर्भगृह से बाहर आकर वे हक्के-बक्के से गर्दन ऊँची करके मंदिर के स्थापत्य को देखते हैं।

मोबाइल आजकल सबके पास हैं सो फोटो खींचना फूल चढ़ाने जैसी आवश्यक रस्म बन गई है ताकि सोशल मीडिया पर प्रसारित कर सकें। इक्का-दुक्का ही कोई पत्थरों पर उकेरे इस चमत्कार की डिटेल में जाना चाहता होगा। न के बराबर। उन्हें इतिहास में कोई रुचि नहीं है।

जब ऐसा है तो यह भी स्वाभाविक है कि ग्राम पंचायत से लेकर जिला पंचायत के स्थानीय नुमांइदे भी एक अजीब बेफिक्री में हों। उन्हें भी कोई परवाह नहीं रही कि हजार साल पुराने इस हीरे की सही साज-सँभाल करने लायक वे इस नगर को विकसित करने के बारे में सोचते।

उनकी नजर में यह पुरातत्व वालों का काम है। जब ऐसा है तो यह भी स्वाभाविक है कि सिविल सेवाओं की परीक्षाएँ पास करके प्रशासन तंत्र में आने वाले भी नेत्रहीन, मूक, बधिर, विकलांग और मंदबुद्धि हों, जो अपने हिस्से का तीन-चार साल का कार्यकाल काटकर अगले प्रमोशन की घात में बैठे रहें।

और परमारों के नाम पर लैटरहेड पर माैजूद तरह-तरह के संगठन भी किसी क्षत्रिय महासभा की एक शाखा के रूप में साल में एक दिन अपनी शिराओं में बहते क्षत्रिय रक्त की अनुभूति के लिए केसरिया साफे बाँधकर शोभायात्राएँ निकाल लेते होंगे, उन्हें भी अपने महान पूर्वजों के स्मारकों की बरबादी और कब्जे की कहानी से क्या लेना-देना?

परमार लिख लेने से हर कोई राजा भोज या उदयादित्य तो हो नहीं जाता! मैंने कुछ समय पहले विदिशा जिले के एक कलेक्टर को इस नगर में जीवित बचे रह गए इतिहास को सहेजने की दृष्टि से कुछ सुझाव और निवेदन एक पत्र में लिखे थे। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर अगर कुछ काम हो तो उदयपुर मध्यप्रदेश में राजधानी भोपाल के काफी पास पर्यटन मानचित्र पर चमक सकता है।

कलेक्टर का नाम भी किसी प्राचीन सूयर्वंशी राजवंश की तरह काफी प्रभावशाली था, जिसका जिक्र मैंने उस पत्र में विशेष रूप से किया था कि आपके नाम से लगता है कि यह पराक्रम आप कर सकते हैं-‘परमवीर अशोकचक्र वीर बहादुर महाप्रतापी कुंअर विक्रमसिंह।’ मुझे बड़ी उम्मीद थी कि वे कम से कम कागजों पर एक योजना ही बनाते, कोई मीटिंग करते।

हो सकता है कुछ क्रांतिकारी रचना फाइलों में रखकर चले गए हों। अक्सर नाम भी एक किस्म का फरेब रचते हैं। विजय नाम होने से भर से कोई विजेता नहीं हो सकता! कलेक्टर या कमिश्नर हो सकता है। राजधानी भोपाल की नाक के नीचे सिर्फ डेढ़ सौ किलोमीटर दूर एक पूरा और पुराना नगर अपने एक हजार साल पुराने वैभव में बचा हुआ जैसे दम तोड़ रहा है, लेकिन ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक की यात्रा करने वाले जनता के प्रतिनिधियों और प्रशासनिक पराक्रमियों ने इसे घूरे की तरह रखकर छोड़ा है।

जैसा कि सब जानते हैं, उनकी प्राथमिकताओं में खदानें, कब्जे, निर्माण, बजट, कमीशन, सेटिंग, तबादले, प्रमोशन, टिकट, चुनाव जैसे ऐतिहासिक कर्म सबसे ऊपर रहे हैं। दृष्टि होती तो दूरदृष्टि की अपेक्षा उनसे होती। मैं यह प्रसंग इसलिए लिख रहा हूँ कि अखबारों से पता चला है कि सरकार अवैध कब्जे करने वाले माफियाओं का हालचाल जरा जोर से ही पूछ रही है।

मैं ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि अवैध कब्जे सिर्फ शहरों में नहीं हैं, जहाँ झुग्गी-झोपड़ी प्रकोष्ठ और ठेला-गुमटियों को संरक्षण देने वालों ने नर्क का नजारा पेश किया है। उदयपुर की गलियों के कोनों, तिराहों, सड़कों और दीवारों पर हरी चादरों के टुकड़े हाल ही में डाले गए हैं।

मासूम ग्रामवासी हिंदू किसी परमज्ञानी मौलवी के हवाले से यहाँ किसी पीर (रहमतउल्लाअलैह) के प्रकट होने की ब्रेकिंग न्यूज हाथ जोड़कर थमा देते हैं। ज्योतिष का जानकार नहीं हूँ लेकिन भविष्यवाणी कर सकता हूँ कि यहाँ आने वाले सालों में रौनकदार मजारें बनेंगी, जहाँ कौमी एकता के उर्स और मुशायरों में यही जनप्रतिनिधि पधारेंगे और यही महाप्रतापी अफसर उनके इंतजामों में लगेंगे।

उदयपुर की शिराओं में सूखता भारतीय संस्कृति का वैभव तब दम तोड़ चुका होगा। परमार वंश के महाराजा उदयादित्य के राजमहल के एक बंद दरवाजे पर टँगा वह साइनबोर्ड नए इतिहास की घोषणा कर रहा है- ‘निजी संपत्ति, उदयपुर पैलेस, वार्ड नंबर-14, खसरा नंबर-822, काजी सैयद इरफान अली, काजी सैयद महबूब अली, काजी सैयद अहमद अली।’

नोट: ऑपइंडिया के लिए यह लेख विजय मनोहर तिवारी ने लिखा है।

कंगना ने दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमिटी के नोटिस का दिया लीगल नोटिस से जवाब: धमकाने के लिए गुरुद्वारे से की माफी की माँग

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने अब दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के खिलाफ आपराधिक धमकी देने का आरोप लगाते हुए नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही अभिनेत्री ने कानूनी नोटिस जारी कर उन्हें धमकाने के लिए गुरुद्वारे से माफी की माँग की है। बता दें कि गुरुद्वारा निकाय ने पिछले महीने कंगना को उनके ट्विट्स के लिए कानूनी नोटिस भेजा था, जिसमें कंगना ने कथित रूप से उन किसानों और कार्यकर्ताओं पर निशाना साधा था, जो नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने अभिनेत्री कंगना रनौत द्वारा निकाय को भेजे गए नोटिस को ट्विटर पर शेयर किया। सिरसा ने इसे ट्वीट करते हुए लिखा, “उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे। माफी तो आप ही माँगोगी कंगना रनौत। अब यह लड़ाई कोर्ट तक जाएगी और तुम्हें वहाँ हिसाब देना होगा किसानों के खिलाफ अपनी नफरत भरी सांप्रदायिक ट्विट्स का।”

अपने नोटिस में, कंगना ने आरोप लगाया है कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी द्वारा भेजा गया कानूनी नोटिस ‘अस्थिर और कानूनी रुप से अयोग्य’ (‘Untenable and bad in law’) है। ऐसा इसलिए कि उन्होंने जो भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 499, 500 की धारा लगाई है, उसकी वो व्याख्या नहीं कर पा रही है कि उन्होंने किस आधार पर लगाया। इसके लिए उन्हें आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 199 को पढ़ना चाहिए।

कंगना के खिलाफ कार्रवाई के लिए दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी के पास हस्तक्षेप का अधिकार नहीं

कंगना द्वारा कानूनी नोटिस उच्च न्यायालयों द्वारा दिए गए पिछले फैसले पर भेजा गया है, जिसमें कहा गया कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा के पास उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा करने के लिए हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। उन्होंने अपने नोटिस में कहा है कि मानहानि के मामले में सीआरपीसी की धारा 199 केवल ‘पीड़ित पक्ष’ को ही अदालत में जाने की अनुमति देती है।

नोटिस में आगे दावा किया गया है कि मौजूदा कानून और नागरिक कानून के प्रावधानों के तहत गुरुद्वारा निकाय को प्रतिवादी के खिलाफ आगे बढ़ने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि उसके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसकी ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई है। नोटिस में उल्लेख किया गया है कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी आपराधिक धमकी के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 503 और 506 के तहत मुकदमा चलाने के लिए उत्तरदायी है।

टेंडर माफी और माँगें वापस लें या सिविल और आपराधिक कार्यवाही का सामना करें: गुरुद्वारा कमिटी से कंगना 

कंगना रनौत के वकील ने कहा कि उनके क्लाइंट की पहुँच और सामाजिक प्रतिष्ठा का अनुचित लाभ उठाते हुए पब्लिसिटी और चंद मिनटों का फेम पाने के लिए कानूनी नोटिस भेजा गया है। कानूनी नोटिस में गुरुद्वारा कमेटी को अपनी माँगों को तुरंत वापस लेने और कंगना रनौत से माफी माँगने के लिए कहा गया है। ऐसा करने में विफल रहने पर उनके खिलाफ सिविल और आपराधिक कार्यवाही शुरू की जा सकती है।

इससे पहले पिछले महीने, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने अभिनेत्री कंगना रनौत को एक मानहानि नोटिस भेजा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि अभिनेत्री ने मोदी सरकार के खिलाफ ‘किसान विरोध’ में शामिल किसानों, प्रदर्शनकारियों और कार्यकर्ताओं को बदनाम किया। सिख संगठन ने अपने नोटिस में बिना शर्त माफी और ‘अपमानजनक’ ट्वीट को हटाने की माँग की थी।