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‘तुम्हारी औकात नहीं है’ कहकर राजधानी एक्सप्रेस से उतारे गए मजदूर? CCTV फुटेज से पता लगी सच्चाई

राजधानी एक्सप्रेस को लेकर कई मीडिया रिपोर्ट्स मे फैलाए जा रहे झूठ को भारतीय रेलवे ने खारिज किया है। पिछले दिनों कहा गया था कि झारखंड में इस ट्रेन से दो मजदूरों को यह कहकर निकाल दिया गया कि उनकी औकात नहीं है, जबकि रेलवे ने सीसीटीवी फुटेज जारी करके साबित किया है कि स्टेशन से ट्रेन के छूटने के बाद दोनों यात्री वहाँ पहुँचे और बाद में झूठी शिकायत दर्ज करवा दी।

इन दोनों मजदूरों की शिकायत पर कई हिंदी मीडिया संस्थान ने बुधवार को रिपोर्ट की थी। इनके नाम रामचंद्र यादव और अजय यादव हैं। इनका कहना था कि नई दिल्ली-भुवनेश्वर राजधानी एक्सप्रेस से टीटीई ने इन्हें कोडरमा जंक्शन पर उतार दिया और कहा कि इसमें बड़े लोग सफर करते हैं, उनकी इतनी औकात नहीं है कि वो इसमें चढ़ें।

इस घटना के बाद दोनों ने टीटीई के ख़िलाफ़ स्टेशन मास्टर के पास शिकायत दर्ज करवाई, जिसे बाद में रेलवे प्रशासन को फॉरवर्ड कर दिया गया। मीडिया रिपोर्ट्स ने इस दावे की गंभीरता दर्शाने के लिए धनबाद रेल डिविजन के आशीष बंसल को कोट किया और उनके हवाले से कहा कि यदि ये सब सच है तो मजदूरों के साथ गलत हुआ और मामले की जाँच के बाद आरोपित पर कार्रवाई होनी चाहिए।

इस खबर को ऑल इंडिया महिला कॉन्ग्रेस ने भी ट्वीट किया और सारा ठीकरा रेल मंत्री पर फोड़ दिया। हालाँकि, आज धनबाद के डीआरएम आशीष बंसल ने इस खबर के बाबत सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी। अमर उजाला में प्रकाशित संबंधित खबर का लिंक साझा करते हुए उन्होंने कहा,

“आपकी ख़बर तथ्यों पर आधारित नहीं है। भुवनेश्वर राजधानी एक्सप्रेस सुबह 05:22 पर खुल चुकी थी, जबकि यात्री 05:23 पर उपरिगामी पुल पर दौड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। कृप्या समाचार को संशोधित करें।”

अपने ट्वीट के साथ उन्होंने ओवरब्रिज की फुटेज भी डाली, जिसमें दोनों मजदूर 5:23 पर दौड़ते नजर आ रहे थे। डीआरएम का कहना था कि ये लोग 5:23 पर स्टेशन पर पहुँचे ही हैं, जबकि ट्रेन 5:22 पर स्टेशन से जा चुकी थी।

बंसल के ट्वीट के बाद अमर उजाला ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया और उसी खबर को नई जानकारी डाल कर प्रकाशित कर दिया। वहीं, रेलवे ने भी आधिकारिक बयान जारी कर मीडिया के दावों को खारिज किया और कहा कि इनमें दिए गए तथ्य बिलकुल गलत हैं। यात्रियों की ट्रेन इसलिए छूटी क्योंकि वह देर से पहुँचे, न कि इसलिए क्योंकि उनकी किसी रेलवे स्टाफ से झड़प हुई।

बयान में कहा गया कि ये यात्री ओडिशा की प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं। इन्होंने पहले स्टेशन मास्टर के सामने गलत बयान दिया, फिर इसकी कॉपी अपने नियोक्ता को भेजी। आखिर में यह किसी प्रेस रिपोर्टर तक पहुँची और मामला प्रकाशित हुआ। रेलवे का कहना है कि उनके संज्ञान में यह मामला आते हुए उन्होंने सीसीटीवी फुटेज की जाँच से सच्चाई पता लगाई। अब धनबाद रेलवे डिवीजन अखबारों में इस मामले पर एक चेतावनी जारी कर रहा है।

रियल वुमेन भाड़ में, ट्रांस वुमेन जिंदाबाद: ‘ठेकेदारों’ के लिए महिलाएँ कभी वजाइना ओनर्स तो कभी मेंस्ट्रूरेटर

साल 2020 कई मायनों में उल्लेखनीय रहा। बात चाहे किसी काम को करने के प्रति नजरिया बदलने की हो या फिर किसी स्थिति से निपटने की, हर सामान्य तरीके में इस वर्ष आमूलचूल बदलाव देखे गए। मगर, इस बीच महिला अधिकारों के कुछ अति आधुनिक ठेकेदारों ने ट्रांस वुमेन (trans women) के अधिकारों के नाम पर बायोलॉजिकल वुमेन तथा उनके स्वास्थ और अधिकारों को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

Abigail Shrier का किस्सा

इसी 2020 में पत्रकार Abigail Shrier की एक किताब पब्लिश हुई। किताब का नाम था- ‘Irreversible Damage: The Transgender Craze Seducing Our Daughters’ जिसमें पत्रकार ने बताया था कि पश्चिमी देशों में किस तरह किशोरियों पर जेंडर पॉलिटिक्स के भयावह प्रभाव पड़ रहे हैं। 

उन्होंने अपनी किताब में कहा कि (पश्चिमी देशों में) जो किशोर लड़कियाँ जेंडर डिस्फोरिया (एक लिंग से दूसरे लिंग को चाहने की स्थिति) से पीड़ित नहीं भी होतीं, उन्हें भी लगता है कि वो किसी शरीर में आकर फँस गई हैं, जिसकी वजह से वो मेडिकल प्रक्रियाओं से गुजरती हैं। नतीजतन बाद में या तो उन्हें पछतावा होता है या फिर कई कारणों से उनका जीवन और बदतर हो जाता है।

अब कायदे से इस किताब के निष्कर्षों को लेकर नारीवादियों को चिंतन-मनन करने की आवश्यकता थी। लेकिन उन्होंने इसके बजाय क्या किया? वो सब इकट्ठा होकर लेखिका पर इल्जाम लगाने लगीं कि लेखिका डर और नफरत के साथ ट्रांसफोबिया फैला रहीं हैं, इसलिए spotify पर मौजूद उनके एपिसोड को हटा दिया जाए।

आज के समय में हम देखें तो लेखिका ने किताब के जरिए जो निष्कर्ष दिया था उस परेशानी के कारण वाकई कई माता-पिता बहुत चिंतित हैं। मगर फिर भी, ऐसे टॉपिक पर बात करने की बजाय तथाकथित नारिवादियों की बहस ने इस साल ये दिखा दिया कि उनके लिए एक महिला की जिंदगी से ज्यादा उनकी घटिया राजनीति महत्वपूर्ण है।

हैरी पॉटर की लेखिका को भी नकारा गया

इसके बाद हैरी पॉटर की लेखिका जेके रॉलिंग को भी इन क्रांतिकारियों ने अपना शिकार बनाया। उनकी गलती बस ये थी कि उन्होंने बायोलॉजिकल सेक्स को हकीकत कहा था और मासिक धर्म को लेकर कहा था कि ये सिर्फ़ महिलाओं को ही हो सकता है। 

बता दें, तथाकथित क्रांतिकारियों ने रॉलिंग के इस मत के बदले उन्हें TERF कहा। ये एक ऐसा शब्द है जिसे उन नारीवादियों के लिए अपमानजनक तौर से इस्तेमाल किया जाता है जो इस बात को नकारते हैं कि पुरुष से महिला में तब्दील हुआ ट्रांस वुमेन महिला नहीं कहलाया जा सकता।

रॉलिंग का कहना था, “अगर लिंग वास्तविक नहीं है तो कोई समान लिंग आकर्षण नहीं होगा। अगर लिंग वास्तविक नहीं है तो वैश्विक स्तर से महिलाओं की पहचान मिट जाएगी। मैं ट्रांस लोगों को जानती हूँ और प्यार करती हूँ। लेकिन लिंग को मिटाने की अवधारणा लोगों से उनके जीवन पर बात करने की क्षमता को मिटा देगी। सच बोलने का अर्थ नफरत करना नहीं है। ”

आज के टाइम में अजीब बात ये है कि इन सोशल जस्टिस वॉरियर्स को रॉलिंग की बात समझ नहीं आ सकती क्योंकि इनका अब भी मानना है कि लिंग समाज द्वारा निर्मित होता है और एक ऐसी महिला जिसे माहवारी आती हो, वह पुरुष हो सकता है, अगर समाज के लोग ऐसा मानना और उसे पुरुष कहना शुरू कर दें। उनके मुताबिक उनकी इस टेक्निक से ये तथ्य मिट जाएगा कि सिर्फ़ महिलाओं को माहवारी होती है।

महिलाओं के लिए अजीब शब्दों का प्रयोग

साल 2020 में एक सबसे अजीब बात ये भी देखने को मिली कि महिलाओं को एक सब्जेक्ट की तरह इस्तेमाल किया गया और प्रोग्रेसिव होने के नाम पर महिलाओं के लिए अलग-अलग शब्द इस्तेमाल हुए। महिलाओं को वजाइना ओनर्स (Vagina owners), मेंस्ट्रूरेटर (menstruators) समेत न जाने क्या-क्या कहा गया।

हमारे लिए शर्म की बात यह है कि ऐसा करने वालों में सिर्फ़ पश्चिमी नारीवादियों का हाथ नहीं था, भारतीय महिलाओं ने भी इस बीच महिलाओं के लिए खूब अजीब शब्दों के इस्तेमाल किए।

मीटू के वेरिफिएड ट्विटर हैंडल को चलाने वाली ऋतुपर्णा चटर्जी इन भारतीयों में से एक हैं जिन्होंने एक-दो बार नहीं, बल्कि बार बार महिलाओं के मुद्दों पर बात करते हुए औरतों को ‘मेस्ट्रूरेटर कहा।

अब वैसे तो इस पूरे मुद्दे से जुड़ी कई गंभीर घटनाएँ आए दिन सामने आती रहती हैं। लेकिन सबसे खतरनाक साल 2019 में देखने को मिली थी। जेसिका यानिव नामक केस में एक पुरुष अपने आपको महिला बताता था और अपने गुप्तांग की वैक्स महिला से करवाना चाहता था। जब महिला ने ऐसा करने से मना कर दिया तो उसने महिला पर केस दायर किया। वह चाहता था कि महिलाओं को इस तरह पुरुषों के गुप्तांग को हैंडल करने से सिर्फ़ इसलिए मना नहीं करना चाहिए, क्योंकि वो उसे नहीं करना चाहती, उसके हिसाब से ये सही नहीं था।

ऐसे तमाम किस्सों के अलावा हम यदि देखें तो बहुत पहले से सामान्य महिलाओं के बारे में सोचे बिना ये ‘क्रांतिकारी’ इस माँग को उठाते आए हैं कि महिला बनने की इच्छा रखने वाले पुरुषों को महिलाओं के खेलों में भाग लेने के लिए सहमति दी जाए, जिसका कई बार विरोध भी हुआ है। लेकिन ये हमारा दुर्भाग्य है कि उत्तर आधुनिक लोग अब भी बाज नहीं आ रहे और बायोलॉजिकल वुमेन के ख़िलाफ़ सोशली ऐसी लड़ाई लड़ रहे हैं।

शाहीन बाग की बिलकिस दादी के कारण ‘वंडर वुमेन’ हुईं ट्रोल, डिलीट करना पड़ा पोस्ट

‘वंडर वुमेन’ गैल गैडोट (Gal Gadot) ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि वुमेन इक्वेलिटी पर बात करने के लिए उन्हें सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया झेलने पड़ेगी। आज साल 2020 का अंतिम दिन है और गैल अपने अकाउंट पर अपनी ‘पर्सनल वंडर वुमेन’ की तस्वीर शेयर करने के कारण ट्रोल हो रही हैं। आपको शायद हैरानी होगी लेकिन उनकी अकाउंट पर शेयर तस्वीर शाहीन बाग की बिलकिस दादी की है। 

गैल गैडोट ने अपने इंस्टा स्टोरी पर बिलकिस दादी की तस्वीर शेयर करके लिखा है, “My personal wonder women” इसके नीच उन्होंने लिखा, “बिलकिस। ये 82 साल की एक्टिविस्ट भारत में महिलाओं को समानता दिलाने के लिए लड़ रही है, जो मुझे दिखाती हैं कि अपने विश्वास के लिए लड़ाई लड़ने के लिए कभी देरी नहीं होती।”

बता दें कि 31 दिसंबर को गैडोट ने उन महिलाओं की तस्वीर शेयर की जिनसे उन्हें प्रेरणा मिलती है। इन महिलाओं को उन्होंने पर्सनल वंडर वुमेन कहा। इनमें से एक शाहीन बाग की बिलकिस दादी थीं जो भारत में सीएए/एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में शामिल थीं और लेफ्ट लॉबी ने उन्हें वर्चुअली प्रदर्शन का चेहरा बना दिया। 

जब वंडर वुमेन ने बिलकिस को वुमेन इक्वेलिटी दिलाने वाली कार्यकर्ता के नाम पर पेश किया तो कई लोग उन्हें बताने लगे कि ये औरत, महिला अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ रही थी, बल्कि इसलिए प्रदर्शन कर रही थी ताकि भारत उन अल्पसंख्यकों को देश में एंट्री न दे जिन्हें उनके देशों में मजहब के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है। किसी ने तो गैल को यहूदियों का उदाहरण देकर समझाया कि भारत वैसे ही अल्पसंख्यकों को सीएए के तहत शरण देना चाहता है, जिन पर उनके देशों में यहूदियों जैसे अत्याचार हुआ।

बता दें कि अब यह तस्वीर इजराइली अभिनेत्री के स्टोरी से डिलीट हो चुकी है, लेकिन उनके अकाउंट पर यह तस्वीर अब भी मौजूद है। शायद उन्हें ये नहीं पता था कि बिलकिस दादी ने मानवता के आधार पर तैयार किए गए सीएए का विरोध किया था। वह उन प्रदर्शन का हिस्सा बनीं थीं जिससे कई लोगों की आवाजाही बाधित हुई, जहाँ हिंदू विरोधी नारे खुलेआम लगाए गए और जिसका परिणाम पूरी राजधानी को दंगों के रूप में झेलना पड़ा।

इजरायली अभिनेत्री द्वारा बिलकिस दादी का इस प्रकार का वर्णन उनकी अनभिज्ञता पर सवाल नहीं उठाता, बल्कि ये बताता है कि इंटरनेशनल मीडिया में दिल्ली दंगों और शाहीन बाग विरोध प्रदर्शनों के बारे कैसी रिपोर्टिंग हुई और किस तरह एक ऐसे प्रदर्शन को वैश्विक स्तर पर ऐतिहासिक दिखाया गया। यदि याद हो तो इसी साल राणा अयूब ने टाइम्स मैगजीन में बिलकिस दादी के लिए नोट लिखा था और झूठ फैलाया था कि सीएए मुस्लिमों को भारत में नागरिकता देने से रोकता है।

ध्वस्त होगी वह कॉलोनी जहाँ राम मंदिर के लिए चंदा माँग रहे लोगों पर हुआ था पथराव, बेगमबाग में बनेगी पार्किंग

मध्य प्रदेश के उज्जैन में हाल ही में हिंदुओं की एक रैली पर मुस्लिम भीड़ द्वारा पथराव किए जाने के बाद पुलिस गुनहगारों की तलाश में है। बुधवार को मामले में आरोपित एक शख्स की जमानत याचिका को कोर्ट ने भी खारिज कर दिया था। पुलिस ने मामले में अब तक कुल 18 लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें से 5 लोगों के खिलाफ रासुका (एनएसए) के तहत मामला दर्ज किया गया है। घटना के मद्देनजर अब तक करीब 36 लोगों को आरोपित बनाया गया है।

नई दुनिया की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस पाँच आरोपित मोहम्मद अयाज, अल्टू उर्फ असलम, वसीम उर्फ शाहरूख, शादाब पुत्र असलम भेड़ा, युसूफ उर्फ खुजली के खिलाफ रासुका की कार्रवाई कर चुकी है। मामले में एक आरोपित यास्मीन याने कोर्ट में जमानत याचिका दायर की थी। इसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। वहीं घटना के बाद बेगमबाग व आसपास के क्षेत्रों में तनाव की स्थिति बनी हुई है। इसे देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित बेगमबाग में 25 दिसंबर, 2020 की शाम ‘रामनिधि संग्रहण’ रैली निकालने के दौरान मुस्लिम समुदाय के अराजक तत्वों ने हिन्दू संगठन पर पथराव किया था। इस घटना पर संज्ञान लेते हुए पुलिस ने उन लोगों पर कड़ी कार्रवाई करते हुए नगरपालिका की संयुक्त टीम के साथ मिलकर उस घर को ध्वस्त कर दिया था, जिसके आस-पास मौजूद होकर कुछ महिलाएँ और बच्चे यात्रा निकालने वालों पर पथराव कर रहे थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ जिस घर के नज़दीक अराजक तत्वों ने पथराव की घटना को अंजाम दिया था, वह ग़ैरक़ानूनी था। इसके बाद अधिकारियों ने घर को जेसीबी मशीन से ध्वस्त कर दिया। वहीं ध्वस्तीकरण से प्रभावित होने वाले परिवारों को धतरावदा गाँव में बनने वाले फ्लैट दिए जाएँगे।

नए फ्लैटों के निर्माण पर 15 करोड़ रुपये खर्च किए जाएँगे। नगर निगम ने फ्लैटों के निर्माण के लिए कंपनियों को टेंडर डालने के लिए आमंत्रित किया था। प्रशासन द्वारा जल्द ही टेंडर फाइनल किया जाएगा।

गौरतलब है कि नए फ्लैटों को कथित रूप से प्रभावित परिवारों को सस्तें दरों पर उपलब्ध कराया जाएगा। निर्माण दो साल के भीतर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत किया जाएगा। वहीं जिस जमीन पर कॉलोनी स्थित है उसका उपयोग पार्किंग क्षेत्र और अन्य सुविधाओं को विकसित करने के लिए किया जाएगा। बस्तीवाली जमीन पर पार्किंग एवं अन्य सुविधाओं का विकास होगा। बेगमबाग बस्ती के लोगों को शिफ्ट करने का फैसला पिछले महीने हुई उज्जैन स्मार्ट सिटी बोर्ड की बैठक में कर लिया गया था।

शाहजहाँपुर में ‘किसानों’ ने पुलिस बैरिकेड पर चढ़ाए ट्रैक्टर, देखें Video

कृषि कानून के ख़िलाफ़ चल रहे किसान आंदोलन में अब प्रदर्शनकारी कानून को हाथ में लेने से भी गुरेज नहीं कर रहे। ताजा तस्वीरें राजस्थान-हरियाणा के बॉर्डर शाहजहाँपुर से सामने आई है। वहाँ राजस्थान के किसानों ने जबरदस्ती बॉर्डर में घुसने की कोशिश की और हरियाणा पुलिस की बैरिकेडिंग पर ट्रैक्टर चढ़ा दिए। करीब एक दर्जन ट्रैक्टरों ने इस दौरान हरियाणा में प्रवेश किया। इसके बाद सब दिल्ली की ओर रवाना हो गए।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, आंदोलनकारी किसानों ने पुलिस बैरिकेड तोड़कर राजस्थान-हरियाणा बॉर्डर से हरियाणा में प्रवेश किया है। इस जानकारी के साथ एएनआई ने एक वीडियो भी जारी की है। वीडियो में देख सकते हैं कि दर्जन भर प्रदर्शनकारी किस तरह उग्र हो रखे हैं और ट्रैक्टर व ट्रकों के पीछे भाग रहे हैं। वीडियो में गाली देते लोग भी सुनाई दे रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, पुलिस ने इस बीच प्रदर्शनकारियों को रोकने का बहुत प्रयास किया, मगर भारी संख्या में होने के कारण वह बैरिकेंडिंग तोड़ते हुए आगे निकल गए। पुलिस और किसानों के मध्य काफी संघर्ष हुआ। पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े। पानी की बौछार की। लेकिन किसानों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।

इससे पूर्व उत्तराखंड जिले के उधम सिंह नगर के बाजपुर से एक ऐसी ही वीडियो सामने आई थी। वीडियो में पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में किसान आंदोलन का समर्थन करने वाले प्रदर्शनकारी पुलिस बैरिकेड पर ट्रैक्टर चढ़ा रहे थे।

वीडियो में देखा गया था कि कई पुलिसकर्मी बैरिकेडिंग के पीछे खड़े थे, लेकिन ट्रैक्टर चलाने वाला लगातार उसे आगे बढ़ा रहा था। अंत में पुलिस को जान बचाते हुए ट्रैक्टर के सामने से हटना पड़ा था और प्रदर्शनकारी बैरिकेड के ऊपर वाहन चढ़ा कर आगे निकल गए थे।

गंदे नाले पर रखा मंदिर का नक्काशी वाला प्राचीन स्तम्भ कलक्टर ऑफिस लाया गया, जाँच में जुटी पुलिस

सोशल मीडिया पर हाल ही में कुछ स्तंभों की तस्वीरें वायरल हुई थी। ये मंदिर के नक्काशी वाले प्राचीन स्तम्भ की तरह दिख रहे थे। एक गंदे नाले के ऊपर इन्हें देख कर लोग काफी आक्रोशित हो गए थे। इस पत्थर पर कुछ नक्काशियाँ थीं जिन पर कुछ आकृतियाँ नजर आ रही हैं। दक्षिण भारत के कई प्राचीन मंदिरों पर लगे स्तम्भों पर भी ऐसे चित्र देखे जाते हैं। लोगों का दावा किया था कि यह तमिलनाडु के काँचीपुरम स्थित पेरिया के पास की तस्वीरें हैं।

वहीं अब इस मामले पर शिकायतकर्ता रामनाथन ने आगे की जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि मामले को एएसआई के संज्ञान में लाया गया। इसके बाद उन्होंने इसे गंभीरता से लेते हुए उस स्थान का दौरा किया जहाँ स्तंभ रखे हुए थे। फिलहाल स्तंभ को सरकार ने अपनी कस्टडी में ले लिया है और उसे नाले से उठवा कर कलक्टर ऑफिस में रखवा दिया गया है।

शिकायतकर्ता रामनाथन ने बताया कि उन्होंने और दिल्ली बाबू नाम के शख्स ने मामले को लेकर एएसआई के पास एक एफआईआर भी दर्ज कराई है। जिसमें उन्होंने स्तंभों के प्राचीन साक्ष्यों, यह कब और कैसे नाले के ऊपर पहुँची इसका पता लगाने की माँग की है। ऑपइंडिया को नाले पर रखे स्तंभों की कुछ तस्वीरें भी मिली है।

बता दें कांचीपुरम पुलिस मामले की जाँच पड़ताल में जुट गई है। वहीं ASI ने स्तंभों को उसी काल के मंदिरों में रखने की बात कहीं है जिस दौर में उन्हें बनाया गया था।

गौरतलब है कि 27 दिसंबर, 2020 को ‘धर्म रक्षक’ नाम के एक ट्विटर यूजर ने कुछ तस्वीरें ट्वीट करते हुए लिखा था, “ऐतिहासिक शहर काँचीपुरम में, भारत की विरासत (मंदिर के सालों पहले बने स्तंभ) नाले को पार कराने के काम आ रही है।”

वहीं वायरल तस्वीर पर प्रतिक्रिया देते हुए कुछ लोगों ने अनुमान लगाया था कि यह किसी 600 साल पुराने शिव मंदिर के पत्थर लग रहे हैं।

साथ ही कुछ लोगों ने ASI को टैग करते हुए इन तस्वीरों की पुष्टि कर उचित कार्रवाई करने की भी माँग की थी। तस्वीरों से आक्रोशित ट्विटर यूजर्स ने लिखा था कि ASI को मुगलों के किलों से समय निकलकर इन पर ध्यान देना चाहिए।

हिन्दू मंदिरों के बारे में जानकारी देने वाले ‘लॉस्ट टेम्पल’ नाम के ट्विटर अकाउंट ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री को इन तस्वीरों के साथ टैग करते हुए लिखा था, “क्या यही हमारी प्राचीन विरासत के प्रति सम्मान है? एक सदियों पुराना स्तम्भ नाले पर पुल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। आदरणीय मुख्यमंत्री, जितनी जल्दी हो सके कृपया कार्रवाई करें।”

इटली में छुट्टी मना रहे राहुल गाँधी को नहीं पता राइट ऑफ: कर्ज माफी के नाम पर फैलाया फेक न्यूज़, लोगों को किया गुमराह

नए वर्ष पर छुट्टी मनाने मिलान (इटली) गए कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने गुरुवार (31 दिसंबर, 2020) को ट्विटर का सहारा लेते हुए मोदी सरकार के खिलाफ लोगों भ्रमित करने का काम किया है। उन्होंने एक ट्वीट कर दावा किया है कि इस साल मोदी सरकार ने कुछ उद्योगपतियों का 23 खरब से ज्यादा रुपए का कर्ज माफ किया है।

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने ‘2378760000000’ रुपए के आँकड़ों के साथ दावा किया है कि इस साल मोदी सरकार ने कुछ उद्योगपतियों के इतने रुपए का कर्ज माफ किया। राहुल गाँधी के अनुसार, सरकार द्वारा इस राशि से कोविड के मुश्किल समय में 11 करोड़ परिवारों को 20-20 हजार रुपए में दिए जा सकते थे। वहीं पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए उन्होंने इसे उनके विकास की असलियत भी बताया।

हालाँकि, मोदी सरकार द्वारा उद्योगपतियों के कर्ज माफी को लेकर राहुल का दावा सच्चाई से कोसों दूर है। हमेशा की तरह इस बार भी राहुल गाँधी माइक्रो इकोनॉमिक तकनीकी को समझने में विफल रहे और देश में उद्योगपतियों के लाखों करोड़ों के ऋणों की कथित छूट के बारे में जानकारी रखते हुए लोगों को भरमाने की कोशिश की।

कॉन्ग्रेस आलाकमान के बेटे राहुल गाँधी के ट्वीट से ऐसा मालूम होता है मानो उन्हें लोन राइट-ऑफ ’और लोन वेव-ऑफ’ के बीच अंतर नहीं पता हैं। बता दें कि लोन राइट-ऑफ ’और लोन वेव-ऑफ’ के पुनर्गठन के बीच एक बहुत बड़ा अंतर है। कॉन्ग्रेस नेता के ट्वीट के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में जो ऋण उद्योगपतियों को दिया गया, जिनमें कुछ यूपीए के समय में भी दिया गया था, उसे मोदी सरकार द्वारा ‘माफ’ किया जा रहा है।

वित्त वर्ष 2019-2020 में, अनुसूचित कमर्शियल प्राइवेट और पब्लिक बैंकों ने स्ट्रेस्ड एसेट्स का पुनर्गठन करते हुए कथित रूप से 2,37,206 करोड़ रुपए के ऋण को राइट ऑफ किया है। हालाँकि, यह बताने के लिए कोई विश्वसनीय स्रोत नहीं है कि कितने रुपए के लोन को रिटेन-ऑफ किया गया है।

वहीं जैसा कि राहुल गाँधी ने दावा किया है हम आपको बता दें किसी भी उद्योगपति के कर्ज को बिना किसी विश्वसनीय तर्क के बगैर माफ़ नहीं किया जा सकता है। वास्तव में कर्ज माफ करने या न चुकाने पर कर्जदार की संपत्ति को माफ करने की एक बहुत ही लंबी प्रक्रिया है।

राइट ऑफ का मतलब कर्ज माफी नहीं होता है, जैसा कि राहुल गाँधी को लगता है। राइट ऑफ बहीखाता को साफ-सुथरा रखने की एक प्रकिया है। दरअसल, बैंक अक्सर उन कर्जदारों के लोन को राइट ऑफ यानी बट्टे खाते में डाल देती है जोकि उन्हें चुकाने में असक्षम होते है। इन लोन को बट्टे खाते में इसलिए डाला जाता है, ताकि बहीखाते में इस कर्ज का उल्लेख न हो और बहीखाता साफ-सुथरा रहे और बैंक को अपने असली एसेट्स और लाइबिलिटी की जानकारी हो सके ताकि उसी हिसाब से प्रभावी तरीके से टैक्स की देनदारी हो।

यदि बैंक इन ऋणों को राइट ऑफ नहीं करती हैं, तो इससे उच्च-गुणवत्ता वाली संपत्ति प्रभावित होती है और रिटर्न-ऑन-एसेट्स बैंक की आय के रूप में क्लासिफएड हो जाता है। इसलिए राहुल गाँधी के दावों के विपरीत उद्योगपतियों को दिए गए 2,37,206 करोड़ रुपए के लोन को किसी भी प्रकार से ‘माफ नहीं’ किया जा रहा है।

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब राहुल गाँधी ने उद्योगपतियों के कर्ज माफी को लेकर मोदी सरकार पर ऐसे आरोप लगाए है। पिछले साल जुलाई 2019 में भी राहुल गाँधी ने अपने भाषण में दावा किया था कि पिछले 5 वर्षों में भाजपा सरकार ने 4.3 लाख करोड़ कर रियायतें दीं और अमीर व्यापारियों के लिए 5.5 लाख करोड़ का कर्ज माफ कर दिया। उन्होंने इसे मोदी सरकार का शर्मनाक दोहरा स्टैंडर्ड भी बताया था।

उससे पहले भी राहुल गाँधी ने इस झूठ को दोहराया है, लेकिन हर बार इसके आँकड़ों में फेरबदल कर दिया। हर बार नई राशि के साथ उन्होंने अपने झूठ को परोसा है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के अनुसार, मोदी सरकार ने अमीर उद्योगपतियों के 5.50 लाख करोड़ / 3.50 लाख करोड़ / 3.00 लाख करोड़ / 2.50 लाख करोड़ / 1.40 लाख करोड़ / 1.30 लाख करोड़ / 1.10 लाख करोड़ के कर्ज़ माफ किए हैं।

राहुल गाँधी ने नवंबर 2016 में अपनी राजनीति को चमकाने के लिए झूठा दावा करते हुए था कि मोदी सरकार ने अमीर उद्योगपतियों के 1.1 लाख करोड़ रुपए के कर्ज को माफ कर दिया। 2017 में गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार के दौरान राहुल गाँधी ने एक बार फिर इसी झूठ को दोहराते हुए इसके आँकड़ों को 20,000 करोड़ से बढ़ाकर 1.3 लाख करोड़ रुपए बताया था। वहीं कर्नाटक में उन्होंने इसे 2.5 लाख करोड़ कर दिया था।

हालाँकि, हर बार झूठा दावा करने वाले राहुल गाँधी अभी भी कर्ज माफी और राइट ऑफ लोन के बारे में अंतर समझ नहीं पाएँ हैं।

वाकई मुसलमान भारत में अल्पसंख्यक हैं, अलग-थलग हैं?

पुरानी आदतें जड़ जमा चुके बुरे नशे की तरह होती हैं। मुश्किल से ही छूटती हैं। अव्वल तो प्राण छूट जाएँ, आदतें नहीं छूटती। पत्रकार शेखर गुप्ता की एक टिप्पणी मुझे ऐसी ही आदतों की याद दिला रही है। दैनिक भास्कर में छपने वाले अपने कॉलम में उन्होंने 29 दिसंबर को लिखा- “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे भारतीय मुसलमान अल्पसंख्यकों’ की ओर पहली बार हाथ बढ़ाया है।”

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की वर्षगाँठ के अवसर पर प्रधानमंत्री के भाषण को सुनकर शेखर गुप्ता को मुस्लिमों के बारे में ‘भाजपा से अलग’ मोदी का रवैया दिखाई दिया है। मुसलमानों के संदर्भ में गहरी चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने ‘नाराज, हताश और उपेक्षित’ शब्दों के प्रयोग किए हैं।

यह बेहद गंभीर है कि भारत में कोई समुदाय अपने आपको किसी भी राज्य में अलग-थलग, नाराज, हताश और उपेक्षित महसूस करे। किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र का लक्षण यह नहीं है। सबके साथ बराबरी का व्यवहार ही लोकतंत्र में सत्ताधीशों से अपेक्षित है और ऐसी अपेक्षा बुरी बात नहीं है।

इसके लिए अड़ने और आंदोलन करने के साथ ही अदालतों के रास्ते भी खुले हुए हैं। लेकिन भारतीय मुसलमानों के संदर्भ में क्या यह तोहमत सही है कि वे खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं? क्या यह दूषित और विकलांग सेक्युलर सोच से उपजी एक गलत व्याख्या नहीं है?

भारतीय मुसलमानों का जिक्र करते हुए उन्हें ‘अल्पसंख्यक’ लिखना ही दोषपूर्ण है। जाने-माने वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में बाकायदा एक याचिका लगाकर अल्पसंख्यक की परिभाषा स्पष्ट करने की गुहार लगाई थी।

इसका आधार वे नौ राज्य थे, जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हो चुके हैं, लेकिन अल्पसंख्यकों के नाम पर बँटने वाली सारी सरकारी खैरात स्थानीय बहुसंख्यक ही हड़प रहे हैं। अल्पसंख्यक की प्रचलित ठोस परिभाषा में भी सबसे पहले मुसलमान हैं, जो बाकी सब अल्पसंख्यकों के जोड़ से भी ज्यादा हैं।

किस मुल्क में 20 करोड़ की आबादी अल्पसंख्यक के रूप में मान्य हो सकती है? लेकिन सत्तर साल तक दूषित और एकपक्षीय सेक्युलर तंत्र में पली-पनपी सोच में जब भी मुसलमानों का जिक्र होगा, उनके आगे अल्पसंख्यक लिखा जाना ऐसे जरूरी हाेगा, जैसे वह उन्हें प्रदत्त काेई सम्मान हो।

नदीम एक कारपेंटर है। वह हमेशा की तरह अपने काम में लगा है। अब्दुल अपने गैराज में बराबर मेहनत कर रहा है। कोई मुसलमान जज है तो वह रोज की तरफ फैसले सुना रहा है। अफसर है तो अफसरी कर रहा है। वे पहले की तरह दफ्तर का काम छोड़कर दिन की नमाजें पूरी करने जा रहे हैं।

शिक्षक है तो पढ़ा रहा है। छात्र है तो पढ़ रहा है। जो सरकारी योजनाओं के पात्र हैं, उन्हें बराबर सब तरह की योजनाओं का भरपूर फायदा मिल रहा है। कश्मीर में तो पहली बार वोट डालने के लिए बेखौफ होकर लोग कतारों में खड़े देखे गए हैं। वे अलग-थलग होकर कहीं पहाड़ों में नहीं गए। कहीं कोई अलग-थलग नहीं है।

कोई स्कूल-काॅलेज, दफ्तर, अदालत, गैराज और अपना हुनर छोड़कर मायूस घर में नहीं पड़ा है, जहाँ झाँक-झाँक कर शेखर गुप्ता जैसे पत्रकार अखबारों में ऐसा लिख रहे हैं। यह मुसलमानों को एक पीड़ित पक्ष की तरह प्रस्तुत करने वाले विक्टिम कार्ड पर मुहर लगाने का घृणित काम है।

पाकिस्तान की पूरी आबादी के बराबर यही भारतीय मुसलमान (जो कि अल्पसंख्यक भी हैं), क्या तब भी अलग-थलग महसूस कर रहे थे या डरे हुए थे, जब सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने उनकी नारकीय बदहाली पर चंद अशआर लिखे थे?

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट एक तरह से आजादी के बाद से लेकर सच्चर साहब के टेबल पर बैठने तक रही सब सरकारों की पोल ही खोल रही थी। वह उन सब सेक्युलर सरकारों के गालों पर पड़े एक तमाचे की तरह थी, जिन्होंने साठ साल तक मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया था और मुसलमानों की जमीनी असलियत सच्चर साहब अपनी रिपोर्ट में लिख रहे थे।

इतिहास के अनुभव बताते हैं कि मुसलमान कहीं और कभी अलग-थलग हो ही नहीं सकता। लोकतंत्र तो बहुत बाद में उड़ी हुई एक चिड़िया का नाम है। 14 सौ साल के इतिहास की गवाही हर उस देश में दर्ज है, जहाँ इस्लाम ने पैर पसारे।

इस्लाम की आक्रामक वैचारिक और दार्शनिक ताकत अपने अनुयायियों को कहीं अलग-थलग बर्दाश्त नहीं कर सकती। वह एक किस्म का असंतोष तब तक गर्भ में पालकर रखती है जब तक उनका परचम सत्ता के शिखरों पर फहराने लायक संख्या का पशुबल पैदा नहीं होता।

वही कृत्रिम असंतोष और नाराजगी सियासी मंचों पर विक्टिम कार्ड बनकर प्रकट होती रहती है, जो हवाओं के रुख, सूरज की रोशनी और धरती की गति तक में अपने खिलाफ एक साजिश देखती है।

वे सेक्युलर नाव में तब तक दम साधे रहते हैं जब तक कि कोई मजहबी पोत पास में न आ जाए। जैसे ही कोई इस्लामी विकल्प सामने आता है, वे कूदकर उस पर सवार होने में एक सेकंड नहीं लगाएँगे और तब सारा लोकतंत्र दो कौड़ी का हो जाएगा। हर समय और हर जगह भरसक कोशिश यही कि जिस झपट्‌टे में जितना झपट लें।

पहले पाकिस्तान, फिर कश्मीर, फिर विक्टिम कार्ड के साथ कहीं तीस फीसदी और कहीं चालीस फीसदी का वोट बैंक। जैसे ही कोई ओवैसी आया, बिहार के मध्यांचल वालों ने कॉन्ग्रेस, आरजेडी समेत सारी सेक्युलर नावों को डूबने के लिए पीछे छोड़ दिया और तकबीर का नारा बुलंद हो गया। एक बार ताकत में आए तो अलग-थलग होना दूसरे शुरू हो जाते हैं। उदाहरण भरे पड़े हैं।

शेखर गुप्ता अकेले नहीं हैं। यह एक पूरी जमात है, जिनके सोचने के तरीके पुरानी आदतों जैसे हैं। इस हरी-भरी जमात में राजदीप सरदेसाई, सागरिका घोष, बरखा दत्त, प्रीतीश नंदी और बेशक रवीश कुमारों और पुण्य प्रसून वाजपेयियों की भरमार है।

इनके लिए अल्पसंख्यक के नाम पर मुस्लिमपरस्ती की बातें एक ऐसा फैशन हैं, जिसका रंग दुनिया भर में उड़ चुका है। ये बेरौनक बाजार में खड़े कारोबारी हैं, जिनके मख्खियाँ भिनभिनाते उत्पाद सेहत के लिए हानिकारक सिद्ध हो चुके हैं। घाटी से निकाले गए हिंदुओं को छोड़ दीजिए, हाल के वर्षों में जम्मू-कश्मीर में ‘रोशनी एक्ट’ में उन्हें अल्लाह का नूर नजर आएगा।

सीएए के खिलाफ शाहीनबाग मुसलमानों की नाराजगी का प्रतीक नहीं था, वह यह बताने की एक जोरदार कोशिश थी कि हम अलग-थलग नहीं हैं। कोई ऐसा मानने की भूल भी न करे। हम अब असम को बाकी हिंदुस्तान से काटने का इरादा रखते हैं। दिल्ली के बाद बेंगलुरू में ठीक से बताया गया कि किसी शहर में आग लगानी हो तो मसले पैदा करना भी काेई हमसे सीखे।

पाकिस्तान से दो ताजा खबरें हैं। खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के करक जिले में जमीयत उलमा-ए-इस्लाम नाम की सियासी पार्टी की एक रैली में भड़काऊ भाषण सुनकर निकली भीड़ ने एक पुराने हिंदू मंदिर पर हमला कर दिया। मंदिर को तोड़-फोड़ कर आग के हवाले कर दिया गया।

दूसरी खबर इस्लामाबाद से है। तीन स्वयंसेवी संगठनों ने एक स्टडी के आधार पर बताया है कि हर साल करीब एक हजार से ज्यादा हिंदू, सिख, ईसाई लड़कियों को उठा लिया जाता है और उनके निकाह करके धर्मांतरण जारी है।

पुलिस का रवैया मामलों को रफा-दफा करने का पाया गया। सिंध में अब भी गुलामी की प्रथा है और ये गुलाम कोई और नहीं असल अल्पसंख्यक हिंदू हैं, जो खत्म होने की कगार पर हैं और आखिरी साँसें ले रहे हैं। ये खबरें ताजा भले ही हैं, लेकिन पाकिस्तान की आम खबरें हैं।

यह एक मनोवृत्ति को दर्शाती हैं, जो दुनिया भर में बहुत साफ देखी जा रही है। अलबत्ता भारत में एक तबका पुरानी आदतों में ही ठहरा हुआ है, जो नशे की बुरी लत की तरह उनका पीछा नहीं छोड़ रहीं। उनकी नजर में मुसलमान ‘अल्पसंख्यक’ भी हैं। ‘अलग-थलग’ भी, ‘नाराज’ भी, ‘उपेक्षित’ भी। क्या मजाक है!

यह लेख विजय मनोहर तिवारी द्वारा लिखा गया है

देश विरोध, हिंदूफोबिया, नेपोटिज्म… 2020 में गजब पड़ी बॉयकॉट की मार

2020 में ऐसी तमाम बातें हुई जो सभी के लिए अलग और नई थीं। इनमें से ज़्यादातर को शायद ही कोई याद रखना चाहेगा। ऐसा ही एक शब्द इस साल काफी चर्चा में रहा और वह था बहिष्कार यानी ‘बॉयकॉट’। कई समूहों, संस्थाओं, फिल्मों और चेहरों ने इस शब्द की भरपूर मार झेली। इनमें से ज़्यादातर का बहिष्कार एक ही वजह से हुआ कि इनसे संबंधित कोई न कोई बात लोगों की आस्था या भावना के विपरीत थीं।

बॉयकॉट चीन

इस कड़ी में सबसे पहला नाम है हमारे पड़ोसी मुल्क चीन का! एक ही साल में ऐसे न जाने कितने मौके आए जब इंटरनेट की जनता चीन का बहिष्कार करते हुए नज़र आई। चाहे टिकटॉक पर लगाई गई पाबंदी का वक्त हो, भारत और चीन की सेना के बीच टकराव का वक्त हो या दीवाली का वक्त हो। जब जब चीन की तरफ से कोई अप्रत्याशित हरकत हुई, सोशल मीडिया पर लोग उसके विरोध में नज़र आए। सरकार ने भी आंतरिक सुरक्षा और जन भावनाओं को मद्देनज़र रखते हुए इस मुद्दे पर कड़े कदम उठाते हुए चीन को स्पष्ट संदेश दिया।

बॉयकॉट टिकटॉक

ज़िक्र हुआ टिकटॉक का, चीन की कंपनी का बनाया हुआ एक वीडियो शेयरिंग एप्लीकेशन! जिसे लेकर भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों ने सख्त कदम उठाए। बाद में यह बात भी सामने आई कि इस एप्लीकेशन की मदद से चीन दूसरे देशों की अहम जानकारी इकट्ठा कर रहा है। भारत में इसके बहिष्कार का एक और बड़ा कारण था, दो बड़े कंटेंट प्लेटफॉर्म की लड़ाई (youtube vs tik-tok) के बाद टिकटॉक से जुड़े कई नकारात्मक पहलू खुल कर सामने आए। टिकटॉक पर ऐसी विषयवस्तु को बढ़ावा दिया जा रहा था जो ग़ैरक़ानूनी होने के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा को लेकर भी बड़े सवाल खड़े कर रहे थे। 

बॉयकॉट तनिष्क

2020 में सबसे बड़े पैमाने पर बहिष्कार झेलने वालों नामों तीसरा नाम है तनिष्क का। एक ऐसा ब्रांड जिसने तथाकथित ‘सेक्युलर’ नज़र आने की होड़ में एक विज्ञापन बनाया। विज्ञापन में एक मुस्लिम परिवार की गर्भवती हिन्दू बहू की गोदभराई का वीडियो दिखाया गया। यानी ऐसा संदेश देने की कोशिश हुई कि मुस्लिम परिवार कितना ‘सहिष्णु’ है (बाकी सच्चाई सर्वव्याप्त है)। विज्ञापन का इस कदर विरोध हुआ जिसकी शायद ही किसी ने कल्पना की होगी। नतीजा यह निकला कि अंत में तनिष्क को अपना ‘सो कॉल्ड सेक्युलर’ वीडियो हटाना पड़ा। तनिष्क ने साल में एक बार नहीं बल्कि दो बार बहिष्कार झेला, दूसरी बार दीवाली के मौके पर। ऐसा विज्ञापन बनाया जिसमें ज्ञान दिया गया कि पटाखे नहीं जलाने चाहिए। धर्म निरपेक्षता इस कदर हावी थी कि दीवाली के विज्ञापन में त्यौहार से संबंधित कोई भी अहम चीज़ नहीं नज़र आई। हालाँकि, विरोध के बाद तनिष्क ने यह विज्ञापन भी हटा लिया था

बॉयकॉट मिर्जापुर-2

मिर्जापुर की दूसरी किस्त ने भी 2020 में भी बॉयकॉट का स्वाद जम कर चखा। दरअसल, इस वेब सीरीज़ में भूमिका निभाने वाले किरदारों की राजनीतिक बयानबाजी की वजह से इसका विरोध शुरू हुआ था। इसकी शुरुआत दिसंबर 2019 से ही हो गई थी जब अली फ़ज़ल ने सीएए और एनआरसी के विरोध में सुर बुलंद किए थे। उसको मद्देनज़र रखते हुए लोगों ने अक्टूबर 2020 में रिलीज़ हुई दूसरी किस्त का विरोध शुरु हुआ। इसके बाद निर्माताओं और अन्य कलाकारों ने कह दिया कि उन्हें इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता और वह ट्रेंड की दया पर नहीं जीते हैं। इस वेब सीरीज़ में ऐसा कंटेंट भी जम कर पेश किया गया था जो हिन्दू समुदाय की भावनाओं को आहत करने वाला था। फिर क्या था? इंटरनेट की जनता ने इस बयान को भी पूरी गंभीरता से लिया और मिर्जापुर-2 का जम कर बहिष्कार किया। 

बॉयकॉट नेटफ्लिक्स

हिन्दू देवी देवताओं की धुरी पर मनोरंजन की आड़ में रचनात्मक होने का चलन पुराना है। ऐसा ही कुछ दोहराया गया नेटफ्लिक्स पर सीरीज कृष्णा एंड हिज लीला (Krishna & His Leela) में। इस सीरीज में एक कृष्णा नाम के लड़के के कई लड़कियों से शारीरिक संबंध होते है। इनमें से एक लडक़ी का नाम राधा भी होता है। अब इसी बिंदु को आधार बनाकर सोशल मीडिया पर सवाल उठना शुरू हुए। इस सीरीज़ का बहिष्कार करने की माँग होने लगी। लोगों का पूछना था कि आखिर क्यों हिंदू देवी-देवताओं को लेकर अभद्रता के मामले बढ़ते जा रहे हैं? क्यों हमारे देवी-देवताओं का अपमान किया जा रहा है? क्या इसका कारण नेटफ्लिक्स का हिंदूफोबिक होना है? 

बॉयकॉट इरोस नाउ

हिन्दू देवी देवताओं के साथ हिन्दू त्यौहारों को लेकर भी बड़े-बड़े समूहों की फूहड़ता सामने आई। यह कारनामा किया था इरोज नाउ (Eros Now) ने! नवरात्र के मौके पर इरोज नाउ ने इस तरह की कई तस्वीरें साझा की थीं, जो सांस्कृतिक त्यौहार के दृष्टिकोण से आपत्तिजनक थीं। जबकि अन्य मज़हब के त्यौहारों पर यही इरोज नाउ ने बेहद धर्म निरपेक्ष तरीके से शुभकामनाएँ दी थीं। हिन्दुओं के 9 दिन तक चलने वाले त्यौहार नवरात्र के मौके पर कंपनी की ओर से कई तस्वीरें ट्वीट की गई थीं। वह तस्वीरें ऐसी कतई नहीं थीं, जिनके ज़रिए एक त्यौहार की शुभकामनाएँ दी जाती हैं। विरोध बढ़ने पर इरोज नाउ ने सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगी। 

बॉयकॉट सड़क-2

2020 कुछ चर्चित नामों के लिए भी बहुत अच्छा नहीं रहा, इसमें सबसे उल्लेखनीय हैं स्टार किड्स। इस साल OTT मंच पर एक फिल्म रिलीज़ हुई सड़क-2 जिसमें संजय दत्त, आलिया भट्ट और आदित्य रॉय कपूर ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई थीं। बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद लोग निराश थे और समय के साथ यह निराशा गुस्से में तब्दील हुई। अगस्त के दूसरे हफ्ते में इस सड़क-2 का ट्रेलर लॉन्च हुआ था, ट्रेलर जारी होने के कुछ ही समय बाद उसने dislikes का नया रिकॉर्ड बना दिया। यह शायद पहला ऐसा ट्रेलर था जो यूट्यूब पर लाइक्स के लिए नहीं बल्कि डिसलाइक्स की वजह से ट्रेंड कर रहा था। कुछ समय बाद फिल्म भी रिलीज़ हुई और उसकी IMDB रेटिंग ने भी गिरावट के कई कीर्तिमान स्थापित किए।  

दिल्ली पुलिस पर रिवॉल्वर तानने वाले शाहरुख को भूली कॉन्ग्रेस, जामिया फायरिंग के नाबालिग को ‘उग्र दक्षिणपंथी’ बता दिखाया

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में CAA/NRC के ख़िलाफ़ हुए विरोध-प्रदर्शन का अंजाम फरवरी 2020 आते-आते क्या हुआ था, इससे सब भली-भाँति वाकिफ हैं। आज सबको मालूम है कि आखिर किन कारणों से उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा भड़की। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट हो या फिर सामने आए तमाम प्रमाण… हर तथ्य इस बात को साबित करते हैं कि दिल्ली का माहौल कुछ ऐसे पढ़े-लिखे नासमझों के कारण पूरे साल संघर्ष करता रहा, जिन्होंने आम जनता को समझाने की बजाय उन्हें बरगलाया और प्रदर्शन के नाम पर उनमें केंद्र सरकार के साथ-साथ एक समुदाय, एक विचारधारा और एक संस्कृति के प्रति घृणा भरने का काम किया।

आज इस साल का आखिरी दिन है। कई लोग खुश हैं कि 2020 का अंत हुआ। लेकिन इस बीच कुछ लोग ऐसे हैं जो साल के अंत में भी अपने एजेंडे को हवा देने से बाज नहीं आ रहे। कॉन्ग्रेस को ही देखिए, आज एक ट्वीट किया है और इस ट्वीट में वह अपने दोहरेपन की पराकाष्ठा को एक बार फिर पार करते हुए दिखे। ट्वीट में कॉन्ग्रेस ने लिखा, “शांतिपूर्ण ढंग से अपने विरोध को जता कर दिलों को जीता जाता है, नफरत से सिर्फ चुनाव जीते जाते हैं। बीजेपी ने देश को नफरत की आग में झोंका है।”

इस ट्वीट के साथ उन्होंने दो तस्वीर लगाई। दोनों तस्वीर जनवरी 2020 की है। एक ट्वीट में महात्मा गाँधी की तस्वीर हाथ में लिए सीएए का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारी हैं, जिसका बैकग्राउंड नीला है और उस पर लिखा है- “राष्ट्र ने एक साथ होकर शांतिपूर्ण ढंग से सीएए का विरोध किया।” दूसरी तस्वीर में लाल बैकग्राउंड में शाहीन बाग में गोली चलाने वाला नाबालिग लड़का है, जिसने कथित तौर पर कासगंज में कट्टरपंथी भीड़ के हाथों मारे गए चंदन गुप्ता की मौत से परेशान होकर इस काम को अंजाम दिया और उसकी तस्वीर पर कैप्शन लिखा है, “उग्र दक्षिणपंथी ने जामिया विश्वविद्यालय के बाहर गोली चलाई।”

अब सीएए/एनआरसी प्रदर्शन के दौरान हिंदुओं द्वारा गोलीबारी करने की ऐसी घटना कितनी घटी या उनके उद्देश्य क्या थे, इसे आप उंगलियों पर गिन सकते हैं। मगर जो शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के नाम पर जहर समाज में तैयार किया गया क्या उसे आप आँक पाएँगे? या क्या कॉन्ग्रेस कभी उन पर खुल कर बात कर पाएगी?

आज कॉन्ग्रेस के ट्वीट में दक्षिणपंथी शब्द के साथ ‘उग्र’ विशेषण बहुत सोच-समझकर इस्तेमाल किया गया है। लेकिन जो सवाल उठाने वाली बात है वो यह कि क्या कभी आपने कॉन्ग्रेस को जामिया में हुई हिंसा और उत्तरपूर्वी दिल्ली में हुए दंगे करवाने वाले दंगाइयों के लिए ‘कट्टरपंथी’ शब्द का इस्तेमाल करते देखा है? इसी कॉन्ग्रेस ने क्या कभी शरजील इमाम की उस स्पीच पर बात की है, जिसमें वह असम को भारत से काटने की बात कर देता है और देश के लिबरल गिरोह को उसमें एक क्रांति नजर आई थी?

वास्तविकता में कॉन्ग्रेस न तो कभी दिल्ली पुलिस पर फेंके गए पत्थरों पर बात करती है और न ही विरोध के नाम पर सार्वजनिक संपत्तियों को पहुँचाए गए नुकसान पर। आग में जलती बसें उन्हें देश की संपत्ति नजर नहीं आती। बाधित आवागमन उन्हें चिंता का विषय नहीं लगता। सबसे अजीब बात शाहीन बाग का हिंदू लड़का कॉन्ग्रेस को साल के आखिर तक याद आता है, मगर उत्तर पूर्वी दिल्ली में पुलिस पर बंदूक तानने वाला शाहरुख उनकी स्मृतियों से बिलकुल गायब हो जाता है। उसे जामिया में गोली चलाने वाले नाबालिग का चेहरा दिखाने से उसे गुरेज नहीं है। उन्हें वो शरजील उस्मानी देश का दुश्मन नहीं लगता जो शाहरुख पठान की हरकत पर गौरवान्वित होता है बल्कि वो आरएसएस लगती है जो मुश्किल की घड़ी में लाखों घर में बुनियादी जरूरतों का सामान पहुँचाती है।

वर्तमान में कॉन्ग्रेस फिलहाल किसान आंदोलन के जरिए अपनी पृष्ठभूमि बचाने के लिए प्रयासरत है। उससे पहले उन्हें हाथरस केस के बहाने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने का मौका मिला था। इसी तरह जून जुलाई में उन्हें चीन के ख़िलाफ़ उठाए गए भारत के कदमों पर सवाल ख़ड़ा करना महत्तवपूर्ण समझा था। अप्रैल-मई के महीने में लॉकडाउन पर सवाल उठा कर कॉन्ग्रेस वामपंथियों की प्रिय बनी थी। उससे पहले दिल्ली दंगे और सीएए/एनआरसी के विरोध प्रदर्शन ने उन्हें 2020 में जीवन दान दिया था

मगर, इन सबके के बीच एक सवाल यह है कि कॉन्ग्रेस साल दर साल अलग-अलग मौकों पर ये सब क्यों कर रही है? आज उन्हें हिंदू घृणा फैलाने के लिए ये ट्वीट करने की क्या आवश्यकता थी? जाहिर है लोकतांत्रिक देश में विपक्षी पार्टी होने के लिहाज से तो बिलकुल नहीं, क्योंकि 2014 के बाद से ही केंद्र सरकार के विशुद्ध विरोधी कॉन्ग्रेस ने कभी खुद को विपक्ष नहीं समझा। उनकी हरकतों को देखकर यही लगा है कि उन्हें बस विपक्ष की कुर्सी पर बैठकर सरकार की आलोचना करनी है। उनके प्रति अपनी कुंठा निकालनी है। बात चाहे जनता की भलाई की हो या देश के फायदे की। उनके हर बयान बताते हैं उनका वाबस्ता राष्ट्रहित से ज्यादा केंद्र सरकार की आलोचना रहा है।

जो पार्टी बालाकोट एयरस्ट्राइक होने पर अपने सिपाहियों के साहस पर उंगली उठा दे, उनसे यदि हम उम्मीद रखते हैं कि साल 2020 में वो हकीकत पर बात करेंगे, तो ये हमारी मूर्खता है। इस वर्ष मौकापरस्त कॉन्ग्रेस का असली चेहरा खूब सामने आया है। लेकिन साल के अंत में आज उनका ये ट्वीट बताता है कि कहीं न कहीं वो ये बात स्वीकार चुके हैं कि राजनीति में उनका करियर आखिरी दम भर रहा है और केवल वामपंथी-कट्टरपंथी ही इसे ऑक्सीजन देकर बचाए रखने का काम कर सकते हैं।