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कोविड-19 का खुलासा करने वाली पत्रकार की जल्द रिहाई की माँग: अमेरीकी विदेश मंत्री ने चीनी सरकार को लताड़ा

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने चीनी नागरिक पत्रकार झांग झान की रिहाई की माँग की है। बता दें चीन ने वुहान में कोरोना वायरस पर कई खुलासे करने वाली स‍िट‍िजन जर्नलिस्‍ट झांग झान को 4 साल जेल की सजा सुनाई गई है। बीजिंग की इस कार्रवाई को शर्मनाक करार देते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने इसकी निंदा की है।

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने वुहान में कोरोना वायरस का पहला मामला सामने आने पर लाइवस्ट्रीम रिपोर्टिंग दिखाने वाली महिला पत्रकार को सजा सुनाए जाने की निंदा करते हुए कहा, “अमेरिका पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) सिटीजन जर्नलिस्ट झांग झान को सजा सुनाए जाने की कड़ी निंदा करता है। हम पीआरसी सरकार से उन्हें तुरंत रिहा करने की माँग करते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “चीन कम्युनिस्ट पार्टी के झूठ के विपरीत, वुहान से चीनी नागरिक पत्रकार झांग झान की बिना सेंसर हुई रिपोर्टों ने दुनिया को कोरोना प्रकोप के बारे में ज़रूरी सच से अवगत कराया। उनके इस साहस के लिए उनकी तारीफ़ की जानी चाहिए न की क़ैद किया जाना चाहिए।”

अमेरिकी मंत्री ने चीन के हिटलर रवैए पर उन्हें लताड़ते कहा कि चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) ने एक बार फिर दिखा दिया है कि वह उन सभी लोगों की आवाज चुप करा देगी जो उसके खिलाफ आवाज उठाएँगें।

गौरतलब है कि चीन में कोई भी स्‍वतंत्र मीडिया नहीं है और चीनी अधिकारी उन कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई करते हैं जो कोरोना वायरस को लेकर चीन सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं। वकील और पेशे से पत्रकार 37 वर्षीय झांग ने फरवरी में वुहान की यात्रा की थी और सोशल मीडिया के कई मंचों पर महामारी फैलने के बारे में लोगों को अवगत कराया था।

उल्लेखनीय है कि चीन के वुहान शहर से ही कोविड-19 महामारी की शुरुआत पिछले साल के अंत में फैलनी शुरू हुई थी। जानलेवा बीमारी की खबर सार्वजनिक करने के लिए उन्हें मई में गिरफ्तार किया गया था। चीन में संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए लक्षित राष्ट्रव्यापी उपायों और सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया की आलोचना पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाने के बीच यह कार्रवाई की गई थी।

PDP नेता वहीद पारा ने घाटी में खूनी खेल के लिए आतंकी संगठन हिजबुल को दिए थे ₹10 लाख: NIA ने किया खुलासा

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने बुधवार (30 दिसंबर, 2020) को जम्मू-कश्मीर पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता वहीद उर रहमान पारा को लेकर चौकाने वाले खुलासे किए हैं। एनआईए के मुताबिक, 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले वहीद पारा ने अपने समर्थन को सुनिश्चित करने के लिए आंतकी संगठन हिजबुल-मुजाहिद्दीन को 10 लाख रुपए दिए थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय जाँच एजेंसी एनआईए ने पारा को जम्मू कश्मीर के जिला विकास परिषद (डीडीसी) चुनाव के कुछ दिन पहले नवम्बर में गिरफ्तार किया था। यह गिरफ्तारी सस्पेंड चल रहे डीएसपी दविंदर सिंह और हिजबुल मुजाहिदीन के संबंधों की जाँच के दौरान पारा का कनेक्शन मिलने के बाद की गई थी। वहीद पारा अभी जेल में ही है। जेल में रहते हुए ही पारा ने जम्मू-कश्मीर के पुलवामा से डीडीसी चुनाव में जीत हासिल की थी।

गौरतलब है कि पारा के वकील टीएन रैना से जब एनआईए के दावे को लेकर बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने कुछ भी नहीं बताया। हालाँकि, इस महीने की शुरुआत में जम्मू में एनआईए की विशेष कोर्ट में दायर की गई अपनी जमानत याचिका में पारा ने हिजबुल के साथ किसी भी तरह से संपर्क रखने से इनकार कर दिया था। पारा ने कहा कि उसे एक खास राजनीतिक पार्टी द्वारा साजिश के तहत उन्हें फँसाया जा रहा है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कथित तौर पर, पारा ने हिजबुल के ऑपरेटिव सैयद मुश्ताक उर्फ ​​नावेद बाबू तक ये रकम डीएसपी दविंदर सिंह के जरिए पहुँचाई थी। ताकि घाटी में आंतकी खेल खेला जा सके। जम्मू कश्मीर पुलिस के निलंबित अधिकारी दविंदर सिंह को श्रीनगर एयरपोर्ट पर ये रकम दी गई थी जहाँ वह उस समय तैनात थे। यह पैसे एक टिफ़िन बॉक्स में छिपाया गया था।

दविंदर सिंह को 11 जनवरी को हिजबुल-उल-मुजाहिद्दीन के आतंकवादी नवीद बाबू और आसिफ राथर के साथ गिरफ्तार किया गया था, जिस दौरान वे एक कार में एक साथ यात्रा कर रहे थे। जिसके बाद मामले को एनआईए के हाथों में सौंपा गया था। एनआईए को जाँच के दौरान ही वहीद पारा के भी टेरर फंडिंग में जुड़े होने के साक्ष्य मिले थे।

इस साल भी सेना ने नहीं निकलने दिए घर-घर से अफजल: वो ऑपरेशन जिन्होंने फेल कर दिया वामपंथियों का खूनी एजेंडा

कुछ ही साल पहले जेएनयू के कुछ छात्रों ने अपने कैंपस में संसद भवन पर हमले के गुनहगार अफजल गुरु की बरसी मनाई और नारे लगाए हुए ऐलान किया था कि ‘कितने अफजल मारोगे हर घर से अफजल निकलेगा।’ यह महज कुछ भटके हुए युवाओं की नारेबाजी नहीं बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में चरमपंथ और आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए भारतीय सेना और सुरक्षा बलों के साथ ही केंद्र की दक्षिणपंथी सरकार के लिए वामपंथी कट्टरपंथियों की ओर से भेजा गया एक तरह का संदेश था।

लेकिन पिछले कुछ सालों में भारतीय सुरक्षाबलों ने जिस तरह से कश्मीर घाटी से आतंकवाद और चरमपंथ के खिलाफ अभियान चलाया है, उसने कट्टरपंथियों के हौंसले पस्त कर दिए हैं। हालत ये है कि कई बार हिज्बुल और जैश ए मोहम्मद जैसे संगठनों के शीर्ष पद खाली रहे, या फिर वह जल्दी भारतीय सेना और सुरक्षा बलों द्वारा खाली कर दिया गया।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, अब कश्मीर में 170 से 200 के बीच ही आतंकी शेष रह गए हैं। इनमें से 40 पाकिस्तान के बताए जा रहे हैं। इनमें सबसे अधिक आतंकी संगठन हिज्बुल और लश्कर के आतंकी हैं। सेना के ऑपरेशन का परिणाम ही है कि जैश के आतंकियों की संख्‍या में लगातार गिरावट आ रही है क्योंकि सीमा पार से घुसपैठ पर विराम लग चुका है जिस कारण सीमा की दूसरी ओर से ट्रेनिंग लेकर जैश के आतंकी भारत में नहीं घुस पा रहे हैं।

आतंकवाद के सफाए के साथ-साथ सेना ने कई आतंकियों को सरेंडर करने का भी निमंत्रण दिया। इसका ही नतीजा है कि सेना के अधिकारियों के समक्ष इस वर्ष हथियार डालने वाले 17 युवकों ने हथियार डाले और मुख्यधारा में लौटने की बात पर सहमती जताई। इनमें से 12 आतंकियों ने सीधी मुठभेड़ के दौरान आत्मसमर्पण किया।

साल 2020 में हथियार डालने वाले 17 आतंकवादियों में अल-बद्र आतंकवादी समूह का शोएब अहमद भट भी है, जिसने इस वर्ष अगस्त में सरेंडर किया था। वह उस समूह का हिस्सा था जिसने दक्षिण कश्मीर के शोपियाँ जिले में टेरिटोरियल आर्मी के एक जवान की हत्या की थी।

ऑपरेशन ऑल आउट

2014 में इस देश में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवादियों पर नकेल कसने के सख्त निर्देश दिए और यह अभियान 2017-18 में और भी तेज हो गया, जब भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन ऑल आउट’ शुरू किया। इसका उद्देश्य आतंकियों के नेतृत्व को खत्म करना और घाटी से आतंकी मॉड्यूल का सफाया था। वर्ष 2018 सबसे अधिक सफल कहा जा सकता है, जब भारतीय सेना 257 आतंकवादियों को मारने में सफल रही।

कश्मीर घाटी में भारतीय सेना की आतंकवाद के खिलाफ जंग का ही नतीजा रहा कि कट्टरपंथियों के साथ ही पड़ोसी देश पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान तक की नींद हराम रही और उसने कई बार संदेश जाहिर करते हुए भारत पर फॉल्स ऑपरेशन करने का आरोप भी लगाया है।

इस साल सेना द्वारा घाटी में चलाए गए कुछ सफलतम ऑपरेशंस में से एक ‘ऑपरेशन ऑलआउट’ (Operation All Out) भी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, घाटी में मौजूद आतंकी संगठनों में शामिल होने वाले युवाओं की संख्या में भी कमी देखी गई है। वर्ष 2020 की शुरुआत में घाटी में करीब 300 आतंकी मौजूद थे जिनकी संख्या अब 170 से 200 के बीच बताई जा रही है। सुरक्षाबलों के अनुसार, जम्मू कश्मीर में साल 2020 में दिसंबर माह तक करीब 203 आतंकवादियों को मार गिराया गया है। पिछले वर्ष, 2019 में मारे गए आतंकियों की संख्या 152 थी।

वर्ष 2016, 2017, 2018 और 2019 में कई बड़े कमांडर मारे गए थे। इनमें सब्जार अहमद भट्ट, बुरहान वानी, जुनैद मट्टू, बशीर लश्करी, अबू लल्हारी, जाकिर मूसा, जीनल उल इस्लाम, सद्दाम पाडर, नाविद जट्ट, समीर टाइगर, मन्नान वानी आदि शामिल हैं।

ऑपरेशन जैकबूट

यही क्रम वर्ष 2020 में भी जारी रहा और इस साल सेना द्वारा मार गिराए गए कुछ बड़े आतंकियों की लिस्ट में जो एक बड़ा नाम शामिल है, वो है हिज्बुल मुजाहिद्दीन कमाडंर रियाज नाइकू का। सेना ने रियाज पर 12 लाख रुपए का इनाम भी रखा था। मीडिया द्वारा यह खबर भी जमकर सामने रखी गई थी कि आतंकी संगठन का लीडर बनने से पहले रियाज एक गणित का टीचर था।

बुरहान वानी गैंग के सफाए के बाद रियाज नायकू मोस्ट वांटेड बन चुका था। उसे पकड़ने के लिए काफी कोशिशें की गई। पहले उसके ओवरग्राउंड वर्कर नेटवर्क को नेस्तनाबूद करते हुए उसके 30 खबरियों को पकड़ा गया। साथ ही उसके सभी प्रमुख ठिकानों को भी नष्ट किया गया। 

इसी के साथ भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का ‘ऑपरेशन जैकबूट’ भी पूरा हो गया, जिसे उन्होंने घाटी में आतंकवाद को खत्म करने के पिछले साल अक्टूबर माह में शुरू किया गया था। बताया जाता है कि इस ऑपरेशन में आखिरी आतंकी रियाज नाइकू ही था।

रियाज नाइकू के बाद ‘आतंक का डॉक्‍टर’ कहा जाने वाला हिज्‍बुल मुजाहिदीन का टॉप कमांडर सैफुल्‍लाह भी सेना द्वारा ढेर कर दिया गया। हिज्‍बुल के टॉप कमांडर रियाज नाइकू के मारे जाने के बाद सैफुल्लाह को संगठन का चीफ बनाया गया था, जिसे नवम्बर माह की शुरुआत में ही एक ज्वाइंट ऑपरेशन के बाद ढेर कर दिया गया। सेना की लिस्ट में उसे भी A++ कैटेगरी में रखा गया था।

इससे पहले जून के महीने ही शोपियाँ में हिज्बुल का टॉप कमांडर फारुक अहमद भट उर्फ नाली को भी ठिकाने लगा दिया गया था। फारूक अहमद भट ने 2015 में हिज्बुल मुजाहिदीन को ज्वॉइन किया था।

आतंकवाद मुक्त हुए त्राल और डोडा

इस साल जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले के त्राल को हिज्बुल मुजाहिद्दीन के आतंकियों से पूर्ण रूप से मुक्त कराने के बाद सुरक्षाबलों ने श्रीनगर के डोडा इलाके को भी आतंकी मुक्त करवाया। यह जानकारी स्वयं जम्मू-कश्मीर पुलिस के डीजीपी दिलबाग सिंह ने दी थी। डीजीपी ने बताया है कि एक मुठभेड़ में हिज्बुल कमांडर मसूद के मारे जाने के बाद इलाका पूरी तरह से आतंकी मुक्त हो गया। वह बलात्कार के मामले में भी वंछित था।

हिज्बुल के आलावा, आतंकी संगठन अल बद्र और लश्कर (LET) के आतंकवादियों का सफाया भी सेना द्वारा जमकर किया गया। जुलाई के माह ही श्रीनगर में सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच हुई मुठभेड़ में भारतीय सेना ने दो आतंकियों को मार गिराया गया, जिनमें से एक इशफाक रशीद खान लश्कर-ए-तैयबा का टॉप कमांडर था, जबकि एक दूसरा आतंकी एजाज भट भी इसी आतंकी संगठन से जुड़ा था।

इशफाक रशीद खान श्रीनगर के सोजिथ इलाके का रहे वाला था और उसे 2018 में आतंकी संगठन का टॉप कमांडर बना दिया गया था। उसकी मौत के बाद कश्मीर पुलिस ने घोषणा की थी कि अब श्रीनगर जिले का एक भी आतंकी जिंदा नहीं बचा है।

ऑपरेशन रंदोरी बहक

सेना और सुरक्षाबलों को कुछ मुठभेड़ों में अपने जवानों को भी गँवाना पड़ा। यह बड़े ऑपरेशन सफल तो रहे लेकिन सेना ने अपने जवानों को भी खोया। ऐसे ही एक ऑपरेशन जो इस वर्ष सबसे साहसी, खतरनाक और रक्त रंजित माना जाता है, उसका नाम था- ऑपरेशन रंदोरी बहक!

अप्रैल, 2020 के ही एक दिन सुरक्षा बलों ने कुपवाड़ा में LOC पर मुठभेड़ में 5 आतंकियों को मार गिराया। इस ऑपरेशन (Operation Randori Behak) में सेना ने अपने पाँच सैनिकों को खो दिया। तीन मुठभेड़ के दौरन और दो सैनिकों ने पास के सैन्य अस्पताल में दम तोड़ दिया। खराब मौसम के कारण जख्मी जवानों को निकालने में सेना को बहुत मश्क्कत करनी पड़ी थी।

भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा पर कुपवाड़ा के केरन सेक्टर में ऑपरेशन रंदोरी बहक शुरू किया, जो 5 दिनों तक जारी रहा और इसमें हेलीकॉप्टर और ड्रोन की मदद ली जा रही थी। घुसपैठ के दौरान सुरक्षा बलों से उनकी मुठभेड़ हुई, लेकिन खराब मौसम और घने जंगल का फायदा उठा कर आतंकी भाग निकलने में कामयाब हो गए थे। सेना ने अपना ऑपरेशन जारी रखते हुए पूरे इलाके की घेराबंदी करके ऑपरेशन को जारी रखा।

पहली अप्रैल को नियंत्रण रेखा के पास पैरों के निशान देखे गए थे। इस जगह पर बाड़ पूरी तरह से बर्फ में डूबे हुए थे। इसके बाद पैरों के निशानों को ही आधार बनाकर सर्च ऑपरेशन चलाया गया था। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना के विशेष बल के दस्ते का नेतृत्व सूबेदार संजीव कुमार ने किया और इसमें हवलदार डावेंद्र सिंह, पैराट्रूपर बाल कृष्ण, पैराट्रूपर अमित कुमार और पैराट्रूपर छत्रपाल सिंह शामिल थे। वे सभी इस मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हुए।

सेना द्वारा घाटी में आतंक के सफाए का अभियान लगातार जारी है। आज बुधवार (दिसंबर 30, 2020) को भी सेना तीन आतंकियों को ठिकाने लगाने में कामयाब रही है। सेना ने बताया कि ये आतंकवादी आगामी गणतंत्र दिवस पर किसी बड़े हमले की साजिश रच रहे थे। यदि आतंकवाद विरोधी अभियान इसी गति से जारी रहा, तो हम 2022 के अंत तक घाटी से आतंकवाद के पूर्ण उन्मूलन की आशा कर सकते हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है।

सरकार और किसानों में 4 में से 2 मुद्दों पर बनी सहमति: पराली जलाने पर दंड नहीं, बिजली सब्सिडी रहेगी जारी

तीन नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों और सरकार के बीच छठे बैठक के बाद चार में से दो माँगों पर सहमति बनी है। बैठक के समापन के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि वार्ता बहुत अच्छे वातावरण में आयोजित की गई और यह एक सकारात्मक माहौल में संपन्न हुई।

किसानों और सरकार के बीच पराली जलाने और बिजली बिल संबंधी अध्यादेश पर सहमति बनी है। अब दिल्ली और आस-पास के इलाकों में बड़े पैमाने पर वायु प्रदूषण का कारण बने पराली जलाने के लिए किसानों को दंडित नहीं किया जाएगा। बता दें कि भारत सरकार ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों अध्यादेश 2020 में वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए आयोग की शुरुआत की थी। वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में कई जनहित याचिकाएँ दायर करने के बाद सरकार ने यह कदम उठाया था।

अध्यादेश के अनुसार, वायु प्रदूषण को लेकर हरियाणा, पंजाब, यूपी और राजस्थान के क्षेत्रों सहित एनसीआर पर आयोग का अधिकार क्षेत्र होगा। अध्यादेश आयोग को वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए उसके द्वारा जारी किए गए किसी भी उपाय या निर्देशों के उल्लंघन के लिए पाँच साल की जेल की सजा या एक करोड़ रुपए तक का जुर्माना या दोनों का अधिकार देता है। किसान आशंका जता रहे थे कि अगर उन्हें पराली जलाने का दोषी पाया जाता है तो उन्हें भी इस अध्यादेश के तहत कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

अब बैठक के बाद, केंद्र सरकार किसानों को इसके दायरे से बाहर रखने के लिए अध्यादेश में संशोधन करने पर सहमत हो गई है। इसका मतलब है कि वायु प्रदूषण को कम करने के लिए एक नया निकाय स्थापित किए जाने के बावजूद, सितंबर-दिसंबर की अवधि के दौरान एनसीआर में वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में से एक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।

हल किया जाने वाला दूसरा मुद्दा इलेक्ट्रीसिटी अधिनियम में संशोधन है। किसानों को डर है कि अगर बिजली अधिनियम में सुधार लाया जाता है, तो उन्हें नुकसान होगा। किसान यूनियनों ने माँग की कि वर्तमान में किसानों को सिंचाई के लिए दी जाने वाली बिजली सब्सिडी जारी रहनी चाहिए। केंद्र ने इस माँग पर भी सहमति जताई है।

हालाँकि, किसानों की अन्य दो माँगों पर गतिरोध जारी है। वो दो माँगें हैं- तीन कृषि कानूनों को वापस लेना और एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) की गारंटी देने के लिए एक कानून बनाना। केंद्रीय सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि कानूनों को वापस नहीं लिया जाएगा, लेकिन यदि किसान कानूनों के किसी विशेष खामी के बारे में बताते हैं तो से संशोधित किया जा सकता है। मगर किसान यूनियन इसके लिए तैयार नहीं हैं, या फिर वो कानून में खामियाँ निकालने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए वो कानून को ही रद्द करने की माँग पर अड़े हुए हैं। गौरतलब है कि कुछ महीने पहले तक किसान यूनियन और कॉन्ग्रेस जैसे विपक्षी दल नए कृषि कानूनों में किए गए प्रावधानों की माँग और वादा कर रहे थे।

एमएसपी दशकों से बिना किसी कानून के एक कार्यकारी निर्णय के रूप में जारी है, लेकिन अब किसान इसके लिए एक कानून चाहते हैं। सरकार ने यह भी आश्वासन दिया है कि एमएसपी जारी रहेगा, हालाँकि, गारंटी देने के लिए एक कानून लाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है।

किसानों ने दावा किया है कि वे तब तक विरोध प्रदर्शन समाप्त नहीं करेंगे जब तक कि उनकी अन्य दो माँगें भी पूरी नहीं होती हैं। अगले दौर की वार्ता 4 जनवरी को होगी। मंत्री तोमर ने कहा कि बैठक न्यूनतम समर्थन मूल्य और तीन कृषि कानूनों पर केंद्रित होगी।

दो दिन से गायब नाबालिग बहनों को टेलर मास्टर ज़फर ने बनाया था बंधक: पटना से बाहर भेजने की थी तैयारी

पटना के कंकड़बाग थाना के चाँदमारी रोड से 2 नाबालिग बच्चियों की किडनैपिंग का मामला सामने आया है। पुलिस ने मामले में एक टेलर मास्टर जफर को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि उसने ही दोनों बच्चियों को अपने दुकान पर बंधक बना लिया था। लड़कियों के विरोध करने पर आरोपित जाफर उनके हाथ पैर बाँध कर उन्हें बेहरमी से पीटता और चिल्लाने पर दाेनाें काे बार-बार ठंडे पानी से नहला देता था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कंकड़बाग की रहने वाली दो बच्चियाँ सोमवार (28 दिसंबर, 2020) की शाम को टीपीएस कॉलेज के पास से अचानक से लापता हो गई थीं, इसके बाद इनके परिवार वाले इनकी तलाश कर रहे थे। इसी दौरान सड़क पर आने जाने वाले लोगों को एक टेलर की दुकान से कुछ आवाज आई, जिसके बाद स्थानीय लोगों ने दुकान खोला तो उसमें से दोनों बच्चियों को बरामद किया गया।

बच्चियों की ऐसी हालत देख आक्रोशित लोगों ने दुकानदार जाफर की जमकर पिटाई कर दी। वहीं ठंड से ठिठुरती एक बच्ची की हालत काफी नाजुक लग रही थी। उसे बार-बार उल्टी हाे रही है, लोगों से तुरंत आग जला कर उसे ठीक करने की काेशिश की। इसके बावजूद उसकी तबियत गंभीर होती जा रही थी। जिसे बेहतर इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया गया है। इधर, स्थानीय लोगों की सूचना पर कंकड़बाग पुलिस मौके पर पहुँची और आरोपित को गिरफ्तार के थाना ले गई। पुलिस जाफर से पूछताछ करने में जुटी है। जाफर चाँदमारी राेड का रहने वाला है।

घटना के संबंध में नाबालिग लड़की ने बताया, “दाेनाें सामान खरीदने के लिए चाँदमारी राेड आई थीं। इसी बीच टेलर ने आवाज देकर बुलाया और कहा कि जरूरी काम है। दाेनाें उसके पास गईं तो उसके बाद उसने शटर बंद कर दिया। बीच-बीच में टेलर बाहर निकलता पर शटर काे बाहर से बंद कर देता था। हम दाेनाें का हाथ-पाँव बँधा था। टेलर जफ़र बार-बार हमें ठंडे पानी से नहला रहा था।” बच्चियों ने बताया कि उन्हें खाना तक नहीं दिया गया।

वहीं घटना के बाद लोगों का मानना है कि यह मानव तस्करी का मामला है। क्योंकि बच्चियों के बयान के मुताबिक जाफर ने उनका शारीरिक शोषण नहीं किया लेकिन उसकी उन्हें कहीं बाहर भेजने की योजना थी। फिलहाल पुलिस उससे पूछताछ करने में जुटी है। इसके अलावा उसके माेबाइल फोन को भी खंगाला जा रहा है।

कंकड़बाग थाना के प्रभारी थानेदार सुमन कुमार ने कहा कि दाेनाें में से किसी के साथ रेप नहीं हुआ है। दाेनाें काे हाथ-पाँव बाँधकर बंधक बनाए हुए था और ठंडे पानी से नहलाने से एक की तबीयत खराब है, उसे पीएमसीएच भेजा गया है। पुलिस जाफर से पूछताछ करने में जुटी है।

व्यंग्य: पिज़्ज़ा, डीजे, मसाजर, काम क्या-क्या है, अन्नदाता आ गया है, इंतजाम क्या-क्या है

अन्नदाता आंदोलन कई मायनों में एक अभिनव प्रयोग है। भारतभूमि तो अनादिकाल से अनूठे प्रयोगों को लिए विश्वगुरु की उपाधि प्राप्त कर चुका है, तो ऐसे में शाहीन बाग के पुष्पों के प्रस्फुटित होने के बाद, माओनंदनों की नई योजना किसान आंदोलन के रूप में आया ही चाहती थी। छात्र तो मैं अंग्रेजी साहित्य और पत्रकारिता का ही रहा हूँ, लेकिन इफैक्ट डालने के लिए यह कह देता हूँ कि ‘आंदोलन शास्त्र’ का एक गंभीर विद्यार्थी होने के नाते, मेरे लिए अन्नदाता आंदोलन वैश्विक पटल पर अपनी गहरी छाप छोड़ने वाला है।

भारत में किसानों ने कई रूप धरे हैं। खास कर मोदी सरकार के आने के बाद तथाकथित किसानों की प्रतिभा में अनायास ही वृद्धि होती रही है। उन्होंने देश को दिखाया है कि किसान चाहे तो कुछ भी हो सकता है। तमिलनाडु से आए किसानों को याद करें तो पता चलेगा कि कालांतर में समुद्रतट पर यो-यो करने वाला व्यक्ति, जंतर-मंतर पर खोपड़ी ले कर मरे चूहे भी खा सकता है, अगर उसे बारह वर्गमीटर की परिमिति में लाल माइक लिए हुए पत्रकारिता के मसीहा कहीं दिख गए।

मसीहा जी का तो ऐसा है कि किसान आंदोलन हो या फिर शाहीन बाग, टेंट-शामियाना में बैठे कुर्ता-सलवार वाले स्वयं को भीष्म और इस पौंड्रक को वासुदेव समझते हैं। फिर गीता न सही, ‘शामियाना के चोंप देबौ ढोढ़िए में घोंप’ नामक गीत पर नाच होता रहता है।

ये किसान आंदोलन भी हमारे किसानों के नए रूप सामने ले कर आ रहा है, जिसके लिए समस्त भारत इनका आभार प्रकट करता है। हमने इस आंदोलन में भी पाया कि किसान विद्युत अभियंता भी हो सकता है जो टावरों की बिजली काटता रहता है। एक और आयाम हमें यह भी दिखा कि किसान जेनरेटर चोर भी हो सकता है। लेकिन यह चोर और चोरों की तरह नहीं है, बल्कि चोरी का माल यह किसान गुरुद्वारे में दान कर देता है।

मैंने जानने की कोशिश की तो सॉल्ट न्यूज के संस्थापक, एवम् नासा से ताम्रपत्र पाए प्रतीक ने बताया, “जिसे दुनिया टावर का तार काटने वाला बता रही है, वो वस्तुतः भारत का टावर है ही नहीं। वो तो आइफिल टावर है जो आपको अलग एंगल से देखने पर पूरा दिखेगा। जो लोग तार काट रहे हैं वो भारतीय नहीं हैं। उन लोगों की आँखों पर ज़ूम करने से सच्चाई दिखती है कि वो कुछ संघी भजपैइए हैं जिसे मोदी ने ट्रक में बिठा कर पेरिस भेज दिया था।”

आगे उन्हीं के मित्र और पंचर विज्ञान के अग्रणी जुब्बू रंगरसिया ने कहा, “साथ ही, वीडियो को आप देखेंगे तो पाएँगे कि यह वीडियो जान-बूझ कर क्लोजअप में शूट की गई है ताकि यह पता न चले कि जगह कौन सी है। सर पर पगड़ी रखवा कर, भाजपा के लोगों ने पेरिस में आइफिल टावर के नीचे कटे हुए तार पकड़ा दिए हैं और वो वायरल करा दिया गया। वो जानते थे कि प्रतीक भाई उनकी करतूत भारत में होने से पहले ही पकड़ लेंगे, अतः उन्होंने राफेल देने वाले राष्ट्र को चुना।”

अन्नदाता आंदोलन ‘आत्मनिर्भर भारत’ का एक उदाहरण है

हमने यह भी देखा कि इस अनुपम प्रयोग में सिर्फ टेंट-शामियाना ही नहीं देखा। इसमें गरीब दिखने वाले लोग थे, इसमें परेशान दिखने वाले लोग थे, इसमें खून की प्यासी चाचियाँ थीं, ठोक देने वाले खालिस्तानी अंकल थे, मर्सीडीज वाले भैया थे, सिनेमा का प्रोजेक्टर था, थिन क्रस्ट पिज़्ज़ा था, गाने-बजाने वाले लोग थे, अख़बार था, समाचार था, गैस से चलने वाले गीजर थे… मतलब, आप सोचिए कि वहाँ क्या था, और वो वहाँ था।

आप सोचिए कि पाँच हजार लोग अपना घर-बार छोड़ कर कहीं से चलते हैं, ‘मुसाफिर हूँ यारों, न घर है, न ठिकाना’ गाते हुए पहुँचते हैं और अगली लाइन सुनने से पहले दिल्ली पुलिस उन्हें रोक देती है। दिल्ली पुलिस ने ही सबसे ज्यादा समस्या पैदा की है। किसान भाई तो बंगाल की खाड़ी की तरफ जा रहे थे क्योंकि अगली लाइन के हिसाब से ‘मुझे चलते जाना है, बस चलते जाना’।

आप ही सोचिए कि जो किसान पंजाब से चार महीने का राशन ले कर चला होगा, वो क्या सोच कर चला होगा? आपको लगता है कि घर छोड़ कर कोई किसी यात्रा पर निकलता है तो सड़क पर बैठ कर चाय बनाने के लिए निकलता है? या फिर राशन इस हिसाब से लेता है कि सफर भर राशन चलता रहे।

मुझ पर विश्वास नहीं है तो ध्रुव टट्टी के गणित और ग्राफ पर विश्वास करेंगे या नहीं? गूगल मैप कहता है कि आदमी लगातार पैदल चलता रहे तो वो चौदह दिन और छः घंटे में पहुँच जाएगा। इस हिसाब से लोग लगातार चलते ही रहेंगे। लेकिन श्री ध्रुव राठी जी के गणित से चलें और दिन के छः घंटे ही चलें, तो लगभग 56 दिन लगेंगे। मतलब, दो महीने। बंगाल की खाड़ी जाने और वापस आने का मिला लें तो लगभग चार महीने हो ही जाते हैं।

अब दिल्ली पुलिस ने स्वयं ही आसमानी डर के चलते बैरिकेड लगा दिए और रोक दिया उन्हें। इसी में दिलजीत भाई गाने की अगली लाइन गा रहे थे तो उन्हें कंगना ने रंग-बिरंगी बातें कह कर चुप करा दिया। फिर किसान आखिर करते क्या? किसानों ने सोचा कि मोदी जी का इतना साथ दिया है, तो ‘आत्मनिर्भर भारत’ योजना में भी साथ दे दूँ।

इसी कारण कहीं से टेंट आया, कहीं से कालीनें आईं और तैयारी शुरु हो गई। मुझे, आंदोलनों का एक छात्र होने के बाद भी, नहीं लगा कि यहाँ कुछ प्रदर्शन टाइप का होगा। मुझे लगा कि टेंट लग गया है शरजील इमाम टाइप कोई प्रवचन देने वाला पीएचडी आएगा और कहेगा कि भैया, असम को काट नहीं सकते क्या? ऐसे में वामपंथियों ने यहाँ पर घुसपैठ कर ली और लोगों को बताने लगे कि अब बैठ ही गए हो तो पाँच महीने पुराने बिल पर आंदोलन ही कर लो।

वामपंथियों ने उकसाया और कहा: अब आ गए हो तो आंदोलन ही कर लो

फिर तय हुआ कि आंदोलन कृषि बिलों के ऊपर होगा। लोगों ने कहा कि उन्होंने तो बिल पढ़ा ही नहीं है। वामपंथियों ने समझाया कि पढ़ा तो उन्होंने भी नहीं है लेकिन आंदोलन का पढ़ाई-लिखाई से क्या लेना-देना। पौंड्रक भी वहीं पर था, उसने कहा, “देखिए, एक लोकतंत्र में आंदोलन होते रहने चाहिए, इससे लोकतंत्र मजबूत होता है।”

अपने सफर के बीच में रोक लिए गए यात्रियों ने सवाल उठाया कि कृषि बिलों में तो ऐसा कुछ है ही नहीं जो विरोध किया जाए। पौंड्रक कुमार ने कहा, “था तो नागरिकता वाले में भी नहीं, लेकिन हमने सौ दिन चलाया कि नहीं उसे? वो किसके लिए था? आपको लगता है कि मेरी पत्रकारिता चमक गई उससे? जहाँ जाता हूँ गाली सुनता हूँ। फिर भी राष्ट्रहित में मैंने उस आंदोलन को हवा दी। मैं जानता हूँ कि वहाँ शरजील, सफूरा, खालिद, ताहिर सब क्या कर रहे थे, लेकिन भीतर से घनघोर राष्ट्रवादी होने के कारण, मैंने लोकतंत्र में विरोध के स्वर को जीवित रखा।”

“लोकतंत्र में और है क्या? विरोध से ही लोकतंत्र चलता है, यहाँ विरोध है ही नहीं। ये आदमी हर काम सही करता जा रहा है, सारी योजनाएँ गरीबों के लिए बना रहा है, अल्पसंख्यकों के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन ला रहा है, और चुनाव भी जीत रहा है। अतः, विरोध की सारी संभावनाएँ खत्म हो रही थीं। फिर मेरे सपने में एक दिन निर्भय दूबे और गुलाम मुस्तफा आए। उन्होंने कहा कि मेरे ही हाथों में भारत का भविष्य है। तब मैंने तय किया कि लोग मुझे गालियाँ दें, वो ठीक है लेकिन अपने कुकर्मों से मैं मोदी को जिताता रहूँगा क्योंकि लोग मुझे सारे वामपंथियों का प्रणेता मान कर गुस्से में वोट करेंगे।”

तब जा कर यात्री लोग माने। एक ने कहा कि कम से कम कानून में जो है वो तो बता दिया जाए। लेकिन किसी ने सुना ही नहीं। वामपंथियों की पूरी टीम फिर आंदोलन को आंदोलन जैसा बनाने में लग गई। उनके साथ समस्या यह है कि उनके अपने काडर अब बचे नहीं, संघी लोग अपना काडर कई बार मोदी को भी नहीं देते प्रचार के लिए, तो वहाँ से मिलने की संभावना है नहीं, इसलिए वो थ्योरी तो बहुत जानते हैं, लेकिन प्रैक्टिकल की कूट वाली कॉपी के लिए पैसा नहीं है।

ऐसे में वो भीड़ ढूँढते हैं, और उसमें आंदोलन कराते हैं। आप देखिए कि शाहीन बाग तो गैर-भारतीय मुस्लिमों के लिए भारतीय मुस्लिमों का आंदोलन था, उसमें हिन्दू क्या करने गए थे? वहाँ बिंद्रा बिरयानी और लंगर क्यों चला रहा था? वहाँ पोस्टर बनाने वाले कहाँ से आ गए? ये तो आंदोलनों के नव-अवयव हैं। समय बदलने के साथ-साथ आंदोलनों की प्रकृति भी बदली है।

ऐसे में वामपंथी तो बदल गए हैं लेकिन आंदोलन के लिए डफली पीट कर भीड़ जुटाने वाले झोलाछाप वामपंथी-वामपंथनों को लोग पैसा तो दे देते हैं, ध्यान नहीं देते। जियो के दौर में लोग सेक्स और रोमांच से भरपूर वैसे वेब सीरीज देख रहे हैं जो यूपी के बाहर का कोई व्यक्ति देख ले तो उस राज्य में बेटी न ब्याहे क्योंकि हर सीरीज में घर की बहू ससुर के साथ आलिंगन में पाई जाती है, और आदमी दिन भर गाली बकता है, गोली चलाता है।

ऐसे में डेढ़-दो सौ सालों के अनुभव और समय के साथ बदलने की प्रवृत्ति के कारण वामपंथी थिंकटैंक तो इवॉल्व होता गया, लेकिन उसे क्रियान्वित करने वाले कम होते चले गए। बाद बाकी कसर मोदी ने सैकड़ों NGO को बेद करवा कर पूरी कर दी। यही कारण है कि अब आंदोलन व्यवस्थित तरीके से होने लगे हैं। पहले आंदोलनों की तस्वीर में आपको लोगों की विवशता और सरकार के लिए गुस्सा दिखता था, ये चार दिन चलता था।

अब के आंदोलनों में आपको लोगों की बेहतर जीवनशैली दिखेगी, सरकार के लिए गुस्सा दिखाने का काम पौंड्रक कुमार जैसे लोग करने लगे। अब यहाँ आपको फुट मसाजर दिखेगा, सिनेमा देखने के लिए प्रोजक्टर दिखेगा, पिज़्ज़ा दिखेगा, वाई-फाई की व्यवस्था दिखेगी, गर्म पानी के लिए गीज़र दिखेगा और अपने प्रोपेगेंडा के लिए अपना अखबार और यूट्यूब चैनल दिखेगा।

भीड़ बनी किसानों की भीड़, आंदोलन होने लगा तैयार

आंदोलन पहले स्वतःस्फूर्त हुआ करते थे। यानी लोगों को कुछ सही नहीं लगा, इकट्ठा हुए और नारेबाजी हो गई, ज्ञापन दे दिया, मीडिया में कवरेज हो गई चले आए। अब आंदोलन योजना के साथ होते हैं, और वही होना भी चाहिए। एमबीए के दौर में इवेंट मैनेजमेंट एक विषय बन चुका है, और आंदोलन में ग्लैमर की कमी हमेशा रही। अगर आंदोलन आदि व्यवस्थित तरीके से नहीं होंगे, तो इस विषय को शादी की प्रीवेडिंग फोटोशूट और ‘राते दीया बुता के पीया क्या-क्या किया’ वाले नाच तक में ही समेट दिया जाएगा।

पब्लिसिटी के लिए तो पीआर वालों का मूलमंत्र है ही कि ‘एनी पब्लिसिटी इज़ गुड पब्लिसिटी’, तो भले ही वहाँ सिंघु बॉर्डर पर हर दिन पिज़्ज़ा न मिल रहा हो, लेकिन ये तस्वीर लीक की जाती है कि देखो क्या चल रहा है। इसी कारण तो ‘हाय-हाय मोदी मर जा तू’ वाले गीत गवाए गए। और, पूरे आंदोलन को एक विस्फोटक कवरेज मिले, इसके लिए ‘इंदिरा को ठोका था, मोदी को भी ठोक देंगे’ वाली बात कही गई। नहीं तो आपको लगता है कि अपने कौमार्य वाले दौर के नाम को लिए जाने पर जो महिला एक एंकर को उठवा सकती है, वो इंदिरा को ठोकने की बात पर अपने गुंडे नहीं भेजेगी?

आंदोलन होना है तो बड़बोले लोग चाहिए जो माइक देखते ही फुल नेटवर्क में आ जाएँ और ऐसा टॉकटाइम करें कि सारा रिचार्ज खत्म हो जाए। इसके लिए वामपंथियों को खालिस्तानियों से बेहतर कौन मिलता। उधर खालिस्तानियों को पब्लिसिटी की दरकार थी, इधर वामपंथियों की हथेली में खुजली हो रही थी, काम बन गया। सूक्तियों में भी उद्धृत है कि ‘अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्, परोपकारः पुण्याय पापाय परपीड़णम्’।

आंदोलन को खड़ा करने के लिए पूरा फ्लो-चार्ट और सिचुएशन-रिएक्शन अनालिसिस होती है। जरूरतों को खड़ा किया गया, फिर उसे पूरा किया गया। फिर जब लोगों ने गरियाना शुरु किया तो ये कहा जाने लगा कि आंदोलन का मतलब ये नहीं होता कि आदमी परेशान हो कर रहे। सही बात है कि जब भारत डिजिटल इंडिया हो गया, तो आंदोलन थोड़ा आधुनिक हो जाए तो क्या समस्या है!

दुनिया बदल रही है, मौसम बदल रहा है तो ऐसे में वामपंथियों के आंदोलन कैसे पुराने रहेंगे? ये लोग अब अमेरिका के चुनाव तक को पलट दे रहे हैं, और आपको लगता है कि वहीं ‘हँसिया-बाली’ वाले गीत गाते रहें और झंडा ले कर मार्च करें? नहीं, एक आंदोलन शहर बसाया जाएगा।

आंदोलन शहर क्या है?

जैसे ‘इश्क में शहर होना’ होता है, वैसे ही दिल्ली ‘आंदोलन में शहर होना’ जैसी बात है। आंदोलन शहर एक टाउनशिप टाइप की आत्मनिर्भर व्यवस्था है। इसमें निकम्मे और नकारे लोगों की एक भीड़ को सड़क पर होने का एक जस्टिफिकेशन दिया जाता है। उनसे ऐसी बातें रखने को कही जाती हैं, जो वो भी जानते हैं कि नहीं मानी जाएगी। यही सही तरीका भी है कि अगर बात मान ही ली जाएगी तो फिर ये चार महीने के राशन का क्या करेंगे? वापस जाने पर बेइज्जती होगी कि नहीं?

जिन लोगों ने बिल पढ़ा ही नहीं है वो पहली डिमांड तो यही रखेंगे ही कि कानून वापस ले लो। पढ़ लेते तो कहते कि ये वाली बात सही नहीं है, नहीं पढ़े हैं तो कह रहे हैं सारे कानून ही वापस ले लो। वामपंथियों का भी दुख आपको समझना पड़ेगा कि आनन-फानन में क्रैश कोर्स भी तो नहीं दे पाते हैं। इन्होंने दो प्रयोजित आंदोलन ऐसे ही निकाल दिए जिसमें लोगों का कानून ही नहीं पता था।

एक भजन है ‘मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है’, आंदोलनकारियों के लिए भी यही गाना सूट करता है कि ‘मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है, पीछे हैं वामपंथी, मेरा नाम हो रहा है’। अब इन किसानों का भी सोचिए कि रोक लिए गए, वरना पैदल चलते रहते बंगाल की खाड़ी पहुँचने तक पैर में कितना दर्द कर जाता। अब है कि सड़क पर चलना भी नहीं है, और फुट मसाज भी मिल जा रहा है। इसी को पहले ज़ी सिनेमा पर ‘डबल मज़ा’ कह के भुनाया जाता था।

आंदोलन शहर के निवासी

आंदोलन शहर है, तो निवासी भी उसी तरीके के होने चाहिए। आंटियों की तो बात मैंने कह ही दी जो पार्कों में ‘अरे बेटा शादी कब करोगे’ से शुरु करती हैं, और ‘तीसरा बच्चा भी कर ही लो… खेलने में बाकी दोनों का मन लगा रहेगा’ पर समापन करती है। और अगर आपने ये सारे महत्वपूर्ण समाजोपयोगी उत्पादक कार्य कर लिए हैं, तो आप चुगली हेतु या ‘काली कमली वाला मेरा यार है, मेरे मन का मोहन तो दिलदार है’ टाइप के स्वरचित गीत पर ढोलक और चम्मच बजाती हुई किसी ‘पारक’ में मिल ही जाएँगी। यहाँ भी, भजन की जगह ढोलक पर ‘हाय-हाय मोदी मर जा तू’ का रैप बजा ही दिया गया। इसमें आँटियों का क्या दोष, आंटित्व के गुणों को लिखते हुए शुकदेव जी महाराज ने यही सारी बातें तो शास्त्रों में लिखी थीं। ये बात और है कि गरुड़ पुराण में चुगलखोर लोगों के लिए सजा का भी प्रावधान किया गया है।

दूसरे टाइप के निवासी वो हैं जिन्हें मैथिली में ‘बनचुहार’ कहा गया है। ‘बनचुहार’ शब्द ‘वन’ और ‘चुहार’ के संगम से बना है। ‘चुहार’ शब्द मैथिली में ‘चोर’ का सहचर है जैसे कि ‘ऊ सब त चोर-चुहार छै’। इसी टाइप के लोग अडानी-अम्बानी को गरियाते हुए जेनरेटर चुरा रहे थे, और मुर्खतावश ‘जियो’ के टावरों का तार काट रहे थे, जो कि अम्बानी ने कुछ समय पहले किसी और कनेडियन कम्पनी ब्रूकफील्ड को बेच दिया था। यहाँ पर यह भी कहा जा सकता है कि अम्बानी को पहले से पता था कि आंदोलन होगा और उसने पैसे बचा लिए क्योंकि मोदी आधा अम्बानी की जेब में, आधा अडानी की जेब में रहता है! है कि नहीं!

तीसरे टाइप के वो लोग हैं जो ‘आपदा में अवसर’ खोजने वाले हैं। ‘अन्नदाता’ जैसे शब्दों के बेजोड़ प्रयोग से जनता को गिल्ट ट्रिप पर ले जाने वाले नवयुवकों ने, कॉलेज में फर्जी डीएसएलआर लटकाने वालों को काम दिया और उभरते स्कोडा-लहसुन फोटोग्राफी फेसबुक पेज वालों को कहा कि फिल्ममेकर बनने की इंटर्नशिप दी जाएगी। काम था कि किसानों पर वीडियो बनाओ, यूट्यूब का चैनल खुलेगा। चार-पाँच दिन में यूट्यूब चैनल के दस लाख सब्सक्राइबर हो गए, बिजनेस झमाझम चल रहा है।

चौथे टाइप के वो लोग हैं जो गरीब जैसे दिखते हैं, जिनके चेहरे पर हमेशा परेशानी की आड़ी-तिरछी रेखाएँ होती हैं। ऐसे लोगों को वामपंथी डीप फोकस मोड, दुपहरी में भी अपर्चर साइज कम कर के, अँधेरे, गमगीन माहौल में रोने-गाने और उदासी भरे बयान देने के लिए तैयार रखते हैं। ये लोग आपको किसी भी टाइम ‘अरे यार, अन्नदाता का यह हाल है, शर्म आनी चाहिए हमें अपने आप पर’ वाले मोड में भेज देंगे।

पाँचवें टाइप के लोग वो हैं जिन्होंने नाम में क्रांतिकारी लगवा लिया है और खाँसते-छींकते स्वयं को भगत सिंह बताते फिरते हैं। ये लोग भावुक लोग हैं जिन्होंने भगत सिंह को पढ़ने का दावा वैसे ही किया होता है जैसे वामपंथी करते हैं। ये लोग भगत सिंह को उन टुटपुँजिया नक्सलियों के समकक्ष रख देते हैं जो अपने ही देश के गरीब सिपाहियों का नरसंहार करते हैं। ये वैसे ही करते हैं जैसे भगत सिंह को सारा ज्ञान इन्होंने ही दिया था, और आज की तारीख में वो उन्हें भारत के नीच वामपंथियों की तरह अपना बताते फिरते हैं।

छठे टाइप के लोग वे हैं जिन्होंने लोगों से ज्यादा संगठन बना रखे हैं। ये लोग मेन लोग हैं। इनका काम है कि पगड़ी का रंग फीका न पड़े और माइक देखते हैं, ‘आप कैसे हैं’ पूछने पर अपनी पत्नी को भी कह दें कि ‘तीनों बिल वापस लेने ही होंगे, उससे पहले बात नहीं होगी’। ये लोग हमेशा ‘काला कानून वापस लो’ मोड में रहते हैं। हर बातचीत में ये जाते हैं और काले कानून को वापस ले कर आ जाते हैं टेंट में। इनसे भी पूछेंगे कि काला कानून क्या है, तो वो बोलेंगे ‘काला है जी, वापस होना चाहिए।’ (पगड़ी से तात्पर्य किसी भी तरह के ‘सर के पहनावे’ से है, सिख समुदाय को अपमानित करना हमारा उद्देश्य नहीं है।)

सातवें टाइप के लोग वो हैं जो वामपंथियों द्वारा भी नकार दिए गए हैं, और अपनी मार्केटिंग करने किसी भी आंदोलन में पहुँच जाते हैं। ये बहुवचन तो छोड़िए, द्विवचन में भी नहीं आते लेकिन स्वयं को अमीता बच्चन से कम नहीं मानते। इसका नाम है योगेन्द्र यादव। ये व्यक्ति इच्छाधारी आंदोलनकारी है। ये संविधान के भी ज्ञाता हैं, किसान तो देखने से ही लगते हैं, शिक्षा तो इनके बायें हाथ की कानी उँगली का खेल है, पेट्रोल का दाम ओपेक इनसे फोन कर के ही घटाता या बढ़ाता है, रिसेशन तो लीमैन बंधुओं द्वारा अर्थशास्त्री यादव जी की बात न मानने के कारण विश्व को झेलना पड़ा। ‘अतिविनम्रता धूर्ताः लक्षणम्’ की तर्ज पर इच्छाधारी आंदोलनकर्मी योगेन्द्र भाई एम्पिलिफायर वालों के कई स्पीकर फुड़वा चुके हैं। क्योंकि इनके बाद जो भी बोलता है, आवाज इतनी ज्यादा रहती है कि स्पीकर फट ही जाता है।

आठवें टाइप के लोग हैं जो क्राउड को मैनेज कर रहे हैं। वो बताते हैं कि किस जिले से कितने ट्रैक्टर चले हैं और फिर मीडिया बताती है कि अब मोदी सरकार की चूलें हिल जाने वाली है। हिलती तो खैर कुछ भी नहीं है। ये लोग डिजिटल मीडिया पर छोटे वीडियो और गीत-संगीत शेयर कर के आंदोलन को बाइनरी जीवन दिए रहते हैं। ये लोग मूलतः खलिहर लौंडे हैं जो ‘अरे चल ना यार, अडवेंचर हो जाएगा’ के चक्कर में पड़ रहते हैं।

इसी आठवें का एक वैरिएशन उन लोगों का है जो मुफ्त का भोजन करने आए हैं। इन्हीं में से किसी के बारे में आप कुछ दिन बाद यह हेडलाइन पढ़ेंगे: “किसान आंदोलन के बीच खिला प्रेम पुष्प, कुलदीप ने किया धैर्यकांत से विवाह!” फिर कोई फॉलोअप के लिए ‘यूनीक आइडिया’ ढूँढता पत्रकार नौ महीने बाद एक नई हेडलाइन देगा: नौ महीने बाद भी केडी-डीके को नहीं मिला संतान सुख, कोशिश जारी है’।

दसवें तरह के लोग वो हैं जिनको लगने लगा है कि ये जीवनशैली सबसे सही है। खाना मिल रहा है, टीवी पर चर्चा हो रही है और काम कुछ नहीं करना है। ये लोग कैमरे में भीड़ की शक्ल में खड़े रहते हैं। यही वो होते हैं जो गंभीर मुद्दे पर ‘चौथे टाइप’ के गरीब लोगों के बयान देते वक्त आपस में मीम शेयर करते हुए दाँत निपोड़े पाए जाते हैं। ही वो लोग हैं जिन्हें टीवी पर आने का शौक तो होता है लेकिन पता नहीं होता कि माहौल क्या है। उनसे सवाल पूछोगे तो कह देंगे कि ‘इतने लोग आए हैं, कुछ तो बात होगी, हम इनके साथ खड़े हैं।’ यही लोग गैर-वामपंथी पोर्टलों और यूट्यूबर्स के बीच अतिलोकप्रिय होते हैं।

लोग तो खैर और भी तरह के होते हैं, लेकिन इतनी विविधता के बाद बताने की आवश्यकता नहीं है।

न्यू ईयर में क्या होगा?

अभी ही भूतपूर्व जानेमन ने लेख के बीच फोन कर के पूछ दिया कि मेरा नए साल का प्लान क्या है। मुझे लगा कि अपने प्लान में शामिल करेगी, लेकिन उसके जवाब पर अब क्या बात करना! मैं ठहरा घोर राष्ट्रवादी व्यक्ति, मैंने फोन काटा और कहा कि मैंने अपना जीवन राष्ट्रवाद को दे दिया है, पार्टी नहीं करता। बोलने में दर्द तो हुआ लेकिन क्या है, सह लेंगे थोड़ा।

मैंने सोचा कि किसान आंदोलन में जब सिनेमा चल ही रहा है, पिज़्ज़ा आ ही रहा है, छुहारे बँट ही रहे हैं, मसाज चल ही रहा है, डीजे बज ही रहा है, तो फिर पार्टी तो ‘यूँ ही चालेगी’ वाली बात होनी चाहिए। जब आंदोलन टिपिकल आंदोलन टाइप रहा नहीं, वामपंथी मीडिया ने भी बताया कि आंदोलनकर्मी थकेंगे तो फुट मसाज को ऐसे क्यों बताया जा रहा है जैसे वो कोई पाप हो, तो फिर माहौल घरेलू होना चाहिए।

ऐसे में ओपन टेरेस पार्टी न सही, ओपन रोड पार्टी तो बनती है यार। एक एंकर का भाई कई कारणों से चर्चा में रहता ही है तो उसका कॉन्टैक्ट यूज कर के कुछ नाचने वालों को भी तो बुलाया जा सकता है। माहौल तो होना चाहिए न, आंदोलन तो हो ही रहा है। आंदोलन के बारे में लिखा जा रहा है, कनाडा के पीएम तक ने बयान दे दिया है, अमेरिकी मीडिया वालों को भी स्थान विशेष में दर्द उठ ही रहा है, तो इसमें आंदोलनकर्मियों के लिए अब बचा ही क्या है कि वो एन्जॉय न करें!

अब काम तो सिर्फ ‘छठे टाइप’ के लोगों का बचा है, उनका भी पहले का भी रिकॉर्डेड वीडियो चला देंगे तो भी किसी को पता नहीं चलेगा। उन्होंने पूरे टाइम एक ही तो बात बोली है, “काला कानून वापस लो, उसके पहले कोई बातचीत संभव ही नहीं है।” तो वो भी पार्टी, प्री पार्टी और आफ्टर पार्टी में शरीक हो ही सकते हैं। आंदोलन सड़क पर बता हो या नहीं, मीडिया में तो हो ही रहा है। लोग हेडलाइन पढ़ रहे हैं, कोई देखने गया है कि दिन भर राशन खपाने के अलावा और क्या हो रहा है।

वैसे भी आम आदमी पार्टी वालों ने इन्टरनेट का इंतजाम कर ही दिया है। भले ही कुछ साइटें न खुलें लेकिन कॉलेज में डीएसएलआर ले कर घूमने वाले बंदे को ये तो पता है न कि वीपीएन कैसे काम करता है, व्हाट्सएप्प ग्रुप में ये जानकारी तीन मिनट में फैल जाएगी और युवा वर्ग बिना बफर किए हुए इंटरनेट का समुचित आनंद ले पाएगा।

न्यू इयर के बारे में प्राचीन संस्कृत में एक सूक्ति लिखी गई है कि ‘संगीतनृत्यभोजनम्, पेयपदार्थ तथैव च, न्यू इयर पार्टीस्य चतुर्राकर्षणम्’ अर्थात् संगीत, भोजन, नृत्य और पेय पदार्थों (वायव्य और द्रव, दोनों) को नववर्ष की पार्टी का प्रमुख आकर्षण माना गया है।

ऐसे में अब एक ही कार्य बचा है कि ऐसे व्यवस्थित और योजनाबद्ध आंदोलनकारियों को नमन किया जाए और नए साल की तरफ इस उम्मीद से देखा जाए कि फरवरी 2021 में कोई हिन्दू विरोधी दंगा न हो जाए। क्योंकि वामपंथी जब-जब दूसरों के आंदोलनों को हायजैक करते हैं, लोग मरते हैं। ये हमने बाबरी तोड़ने के बाद देखा, इसी साल शाहीन बाग के समय देखा, और उसी रास्ते पर जाते इस तथाकथित आंदोलन को भी देख रहे हैं।

ये बात और है कि कोरोना के कारण देश की पाँच-सात यूनिवर्सिटी के भाड़े के दस-दस लोग, बिना बिल पढ़े, मूर्खों की तरह पोस्टर ले कर वीडियो नहीं बनवा रहे जिसे बकैत कुमार यह कह कर चलाता कि देखिए आईआईटी खड़गपुर भी दे रहा है शाहीन बाग को समर्थन! ऑनलाइन होने से ये वैचारिक उत्पात तो अभी तक नदारद है।

कर्नाटक में कॉन्ग्रेसी विधायकों ने जिन डिप्टी स्पीकर को ‘जलील’ किया, रेलवे ट्रैक पर उनका शव मिलने की हो उच्च स्तरीय जाँच: ओम बिरला

कर्नाटक विधान परिषद के उपाध्यक्ष एसएल धर्मे गौड़ा (SL Dharme Gowda) मंगलवार (दिसंबर 29, 2020) तड़के कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले में एक रेल की पटरी पर मृत मिले। उनके दुर्भाग्यपूर्ण मौत पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla) ने शोक व्यक्त किया है। बिरला ने ट्वीट कर माँग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जाँच हो। कथित तौर पर उन्होंने ट्रेन के आगे आकर आत्महत्या की।

बिरला ने ट्वीट किया, “कर्नाटक विधानपरिषद उपाध्यक्ष एसएल धर्मे गौड़ा के निधन की दुखद खबर से व्यथित हूँ। उनके परिवार के प्रति मेरी संवेदनाएँ। पीठासीन अधिकारी के रूप में उनके साथ सदन में हुआ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम लोकतंत्र की गरिमा पर कठोर आघात है। उनकी मृत्यु की उच्च स्तरीय-निष्पक्ष जाँच आवश्यक है।” उन्होंने लिखा, “संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा और पीठासीन अधिकारियों की गरिमा व स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखना हम सबका दायित्व है।”

मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने घटना पर स्तब्धता जाहिर करते हुए, इसे ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ करार दिया। उन्होंने विधान परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में कुशलतापूर्वक संचालन के लिए एमएलसी की सराहना की। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने भी ट्वीट कर धर्मे गौड़ा के निधन पर स्तब्धता जाहिर की और उन्हें एक सभ्य राजनेता के तौर पर याद किया।

बता दें कि एसएल धर्मे गौड़ा के भाई एसएल भोजे गौड़ा भी एमएलसी हैं। गौड़ा अपनी निजी कार में सखारयापत्तना स्थित फार्महाउस से सोमवार शाम को घर के लिए निकले थे, लेकिन पहुँचे नहीं और इसके बाद उनके परिवार तथा स्टाफ ने उनकी तलाश शुरू की। उन्होंने अपने चालक से कहा था कि वह किसी से बात करने जा रहे हैं और वह थोड़ी दूर ही रुक जाए। शव के साथ एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ था। धर्मेगौड़ा के शव को आगे की जाँच के लिए शिमोगा के सरकारी अस्पताल ले जाया गया।

गौरतलब है कि लगभग दो हफ्ते पहले, कर्नाटक विधान परिषद में तो हद ही हो गई थी। उपाध्यक्ष धर्मेगौड़ा को कॉन्ग्रेस के एमएलसी जबरन उठाकर सदन से बाहर ले गए और दरवाजा बंद कर दिया। इसपर भारतीय जनता पार्टी के एमएलसी लेहर सिंह सिरोया ने इस घटना की आलोचना की। उन्होंने कहा था, “कुछ MLC ने विधान परिषद के उपाध्यक्ष को जबरन कुर्सी से हटाकर गुंडों की तरह व्यवहार किया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया। हमने अपने परिषद के इतिहास में ऐसा शर्मनाक दिन कभी नहीं देखा। मुझे शर्म आ रही है कि जनता हमारे बारे में क्या सोच होगी।”

नर्स ने कोरोना संक्रमित मरीज के साथ हॉस्पिटल के बाथरूम में किया सेक्स: पोस्ट वायरल होने के बाद गिरफ्तार

कोरोना वायरस महामारी के दौरान लोगो से लगातार सोशल डिस्टेसिंग का पालन करने की अपील की जा रही है। ऐसे में इंडोनेशिया (Indonesia) से एक बेहद ही चौंकाने वाली खबर सामने आई है। जहाँ एक इंडोनेशियाई पुरुष नर्स को कोविड-19 मरीज के साथ अस्पताल के टॉयलेट में सेक्स (Sex) करने के बाद गिरफ्तार किया गया है।

अस्पताल के टॉयलेट में कोरोना संक्रमित मरीज से सेक्स करने के बाद आरोपित नर्स को पुलिस की जाँच का सामना करना पड़ रहा है। इंडोनेशिया एक्सपैट के मुताबिक, यह घटना जकार्ता के विस्मा एटलेट इमरजेंसी अस्पताल की है। नर्स को कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।

नेशनल नर्स एसोसिएशन के एसेप गुनवान ने कहा, “यह सच है कि विस्मा एटलेट इमरजेंसी अस्पताल में एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता और एक COVID-19 मरीज के बीच समान सेक्स रिलेसनशिप (same-sex relationship) की एक संदिग्ध घटना हुई है।” 

यह घटना तब सामने आई, जब मरीज ने 25 दिसंबर को ट्विटर पर पुरुष नर्स के साथ बनाए गए संबंध की घटना को शेयर किया। इस विवरण में नर्स के साथ एक वॉट्सऐप चैट का स्क्रीनशॉट शेयर किया गया था, जिसमें उन्होंने प्राइवेट पार्ट के साइज के बारे में बात की थी। इसके अलावा बाथरूम के फर्श पर नर्स के पीपीई किट की एक तस्वीर भी शामिल थी। 

पोस्ट के वायरल होने के बाद मरीज और नर्स से पूछताछ की गई। पूछताछ के दौरान दोनों ने स्वीकार किया कि वे जकार्ता के विस्मा एटलेट आइसोलेशन फैसिलिटी में एक टॉयलेट में सेक्स के लिए मिले थे। क्षेत्रीय सैन्य कमान में सूचना के प्रमुख लेफ्टिनेंट कर्नल अरह हरविन बीएस ने खुलासा किया कि दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया।

हरविन ने स्थानीय मीडिया को बताया, “यह मामला केंद्रीय जकार्ता पुलिस को स्थानांतरित कर दिया गया है। हमने स्वास्थ्य कार्यकर्ता को गवाह बनने और आगे की जानकारी माँगने के लिए सुरक्षित कर लिया है।”

सेंट्रल जकार्ता पुलिस को सौंपे जाने से पहले कोविड-19 के लिए पुरुषों का परीक्षण किया गया था। नर्स का कोविड-19 रिपोर्ट नेगेटिव आया, जिसके बाद उसे हिरासत में ले लिया गया, जबकि मरीज का कोविड-19 टेस्ट पॉजिटिव आया उसे आइसोलेशन के लिए फिर से अस्पताल में भेजा गया। अधिकारियों ने पुष्टि की है कि वे आपराधिक मुकदमे का सामना कर सकते हैं। अगर उन्हें दोषी ठहराया जाता है तो 10 साल तक की सजा हो सकती है।

शादीशुदा जावेद ने अवैध संबंध के शक में अपनी गर्लफ्रेंड को गला रेत कर मार डाला: यूपी पुलिस ने किया गिरफ्तार

मेरठ से हत्या का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। जहाँ जावेद ने अपनी गर्लफ्रैंड नाजरीन को किसी और से अफ़ेयर के शक में मौत के घाट उतार दिया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आरोपित जावेद और मृतका नाजरीन पहले से शादीशुदा है। जावेद के दो बच्चे है और नाजरीन के 3 बच्चे है। दोनों कई सालों से अवैध संबंध में थे। पुलिस ने मौके पर आकर हत्यारोपित को हिरासत में ले लिया। मृतक महिला का पति दिल्ली में काम करता है। उसे इस घटना के बारे में सूचना दे दी गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामला उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित ब्रह्मपुरी के हरिनगर का है। जावेद पिछले कई सालों से नाजरीन के साथ अवैध संबंध में था। वहीं कुछ दिनों पहले उसे पता चला कि नाजरीन किसी और शख्स से मिलने जुलने लगी है, जोकि उसे नागवार गुजरी और वह गुस्से में अपनी गर्लफ्रैंड के घर निकल पड़ा।

नाजरीन काम मे जुटी थी, इसी दौरान अचानक जावेद खंती लेकर उसके घर में दाखिल हुआ। इससे पहले वह कुछ समझ पाती, जावेद ने उसके सर पर खंती से ताबड़तोड़ वार करते हुए फिर बाद में गला रेत कर हत्या कर उसे मौत के घाट उतार डाला। उसी वक्त घर में मौजूद बच्चों ने जब खून से लतपथ माँ को देखा तो चीखने चिल्लाने लगे। उनकी चीख-पुकार सुनकर इकट्ठे हुए क्षेत्र के लोगों ने हिम्मत दिखाकर आरोपित जावेद को धर दबोचा।

हत्या के बाद इलाके में कोहराम मच गया और पुलिस को सूचना दी गई। घटना की जानकारी के बाद मौके पर पहुँची पुलिस ने आरोपित को हिरासत में ले लिया। इसी के साथ महिला के शव को कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया।

ब्रह्मपुरी सीओ अमित राय ने जानकारी दी है कि मृतिका नाजरीन का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। पुलिस अब इस मामले में कानूनी कार्रवाई करने में जुटी है। मृतिका का पति दिल्ली में रह कर काम करता है उसे सूचना देने के बाद आगे की कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

‘अल्लाह हू अकबर’ चिल्लाती मुस्लिमों की भीड़ ने हिंदू मंदिर को किया आग के हवाले: देखें हमले और तोड़फोड़ का Video

पाकिस्तान से हिंदू धर्म के प्रति घृणा की भयावह तस्वीर सामने आई है। वहाँ सैंकड़ों की तादाद में इकट्ठा होकर बहुसंख्यक आतताइयों ने हिंदू मंदिर को तहस-नहस कर दिया है। मंदिर में रखी मूर्तिया खंडित कर दी गई हैं। वहाँ आग लगाई गई है। 

सोशल मीडिया पर वॉयस ऑफ पाकिस्तानी माइनॉरिटी ने पूरी घटना की वीडियो शेयर की है। उनके ट्वीट के मुताबिक ये खैबर पख्तूनख्वा की घटना है। जहाँ कट्टरपंथी मुस्लिम भीड़ करक में हिंदू मंदिर को आग के हवाले करके उसे तोड़ने पर आमादा है। 

वीडियो में देख सकते हैं कि सैंकड़ों मुस्लिमों की भीड़ वहाँ मौजूद है। आस-पास अल्लाह-हू-अकबर के नारे लग रहे हैं। इस्लामी झंडा लहरा कर मंदिर को तोड़ा जा रहा है। जगह जगह से धुआँ उठ रहा है। गोले दागने की आवाजें भी वीडियो साफ सुनाई पड़ रही हैं।

ट्वीट के अनुसार, एक छोटी सी बहस पर भी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की जिंदगी बर्बाद कर देना कोई नई बात नहीं हैं। वहाँ के सामाजिक कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन भी इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखते हैं कि इस वीडियो में घृणा, क्रोध और नारे को चेक करें, यह हर साल दर्जनों बार गैर-मुस्लिमों के घरों और पूजा स्थलों के साथ होता है लेकिन किसी को भी इस तरह के कार्य के लिए दंडित नहीं किया जाता।

बता दें कि इससे पहले पाकिस्तान के भीमपुरा कराची में हिंदुओं के प्राचीन मंदिर पर हमला किया गया था। नवंबर की उस घटना में मंदिर के हिंदू देवी-देवताओं को निकाल कर बाहर फेंक दिया गया था। इसके साथ ही देवी-देवता से संबंधित सामानों को भी फेंक दिया गया था। हालाँकि, उस दौरान आरोपित घटना को अंजाम देकर फरार हो गए थे, लेकिन आज सैंकड़ों की भीड़ घटनास्थल पर बेखौफ मजहबी नारे बुलंद करके हिंदू मंदिर को ध्वस्त कर रही है।