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ममता बनर्जी की ‘ना’ से बंगाल के किसानों को हुआ भारी नुकसान, बाकी सभी राज्यों की सरकारें पीएम सम्मान निधि का हिस्सा: कृषि मंत्री

पश्चिम बंगाल के किसान ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ से अभी तक वंचित हैं। इस संबंध में कल भी केंद्रीय कृषि मंत्री ने पत्र लिखकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से योजना में जल्दी शामिल होने की अपील की है।

समाचार एजेंसी एएनआई ने कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के हवाले से कहा, “पश्चिम बंगाल सरकार के अलावा सभी राज्यों की सरकारें पीएम सम्मान निधि योजना का हिस्सा बन चुकी हैं।”

उन्होंने बताया, “अब तक 96 हजार करोड़ रुपए किसानों को भेजे जा चुके हैं। यह योजना पश्चिम बंगाल में 70 लाख किसानों को फायदा पहुँचाएगी।” तोमर ने बताया कि उन्होंने बंगाल को इस योजना में शामिल होने के लिए ममता बनर्जी को पत्र भी लिखा है।

इसके अलावा किसान आंदोलन की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले विपक्षी पार्टियों पर हमला बोलते हुए कृषि मंत्री ने कहा, “जो किसानों के हमदर्द बनकर उन्हें गुमराह कर रहे हैं, उन्हें जनता भविष्य में सबक सिखाएगी।”

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी किसानों से बातचीत के दौरान ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा था, “अगर बंगाल आपकी धरती है तो आपने बंगाल में किसानों को केंद्र सरकार की योजना से होने वाले लाभ से क्यों वंचित रखा? अब आप उठ कर पंजाब पहुँच गए? आपको क्या लगता है लोग इसे भूल जाएँगे।”

उन्होंने कहा कि बंगाल के किसानों को केंद्र की योजनाओं के लाभ से वंचित रखा गया। बंगाल एकमात्र ऐसा राज्य है, जो योजनाओं का लाभ किसानों तक नहीं पहुँचने दे रहा। ममता बनर्जी की विचारधारा ने बंगाल को बर्बाद कर दिया है। अपनी बात रखते हुए पीएम ने उस विचारधारा को भी कोसा, जिसके कारण आज बंगाल का विकास रुका हुआ है।

बता दें कि बंगाल में किसान सम्मान निधि न लागू करने पर भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने भी ममता बनर्जी को आड़े हाथों लिया। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल की सीएम द्वारा सूची न देने के कारण बंगाल के 72 लाख किसान आज पीएम किसान सम्मान निधि मिलने से वंचित हुए हैं। उन्होंने पूछा, “ममता बनर्जी, आपका झगड़ा पीएम मोदी और भाजपा से है, पर उसका बदला बंगाल के किसानों से क्यों? आखिर पश्चिम बंगाल के किसानों ने आपका क्या बिगाड़ा है”

उल्लेखनीय है कि केंद्रीय कृषि मंत्री ने कल कॉन्ग्रेस आलाकमान के बेटे पर भी हमला बोला था। उन्होंने कहा, “राहुल गाँधी जो कुछ भी कहते हैं, उनकी बातों को खुद कॉन्ग्रेस भी गंभीरता से नहीं लेती। आज जब वे हस्ताक्षरों के साथ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए राष्ट्रपति के पास गए, तो इन किसानों ने मुझसे कहा कि कॉन्ग्रेस का कोई भी नेता हमारे हस्ताक्षर लेने के लिए नहीं आया था।”

उन्होंने कहा, “अगर राहुल गाँधी इतने ही चिंतित हैं तो उन्हें किसानों के लिए कुछ करना चाहिए था जब उनकी सरकार सत्ता में थी। कॉन्ग्रेस हमेशा किसान विरोधी रही है।”

वीडियो: ट्रैक्टर से बैरिकेडिंग तोड़ पुलिस की ओर बढ़े प्रदर्शनकारी, लोगों ने पूछा- क्या ऐसे ‘किसानों’ को पकड़ा नहीं जाना चाहिए?

किसान आंदोलन के नाम पर अब प्रदर्शकारियों का समर्थन करने वाले लोग कानून को हाथ में लेकर पुलिस प्रशासन को चुनौती देते नजर आने लगे हैं। समाचार एजेंसी एएनआई द्वारा जारी की गई हालिया वीडियो में हम देख सकते हैं कि ट्रैक्टर की मदद से कथित किसान समर्थक पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ने पर आमादा हैं। उन्हें ये भी डर नहीं है कि इस हरकत से कोई घायल हो सकता है।

एजेंसी के मुताबिक, उत्तराखंड जिले के उधम सिंह नगर के बाजपुर से यह वीडियो आई है। वीडियो में पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में किसान आंदोलन का समर्थन करने वाले प्रदर्शनकारी पुलिस बैरिकेड पर ट्रैक्टर चढ़ा रहे हैं।

इस वीडियो में कई पुलिसकर्मी बैरिकेडिंग के पीछे नजर आ रहे हैं, लेकिन ट्रैक्टर चलाने वाला लगातार उसे आगे बढ़ा रहा है। अंत में पुलिस को जान बचाते हुए ट्रैक्टर के सामने से हटना पड़ता है और प्रदर्शनकारी बैरीकेड के ऊपर वाहन चढ़ा कर आगे निकल जाते हैं।

इस वीडियो को देखने के बाद लोग अलग-अलग प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कोई इसे किसान आंदोलन के मजबूत होने से जोड़ रहा है तो कोई ऐसी हरकत को शर्मनाक बता रहा है। वीडियो को देख लोग पूछ रहे हैं कि क्या ऐसे किसानों को पकड़ा नहीं जाना चाहिए। ये लोग ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों को मारने का प्रयास कर रहे हैं?

यूजर्स को पूछना है कि यदि कोई पुलिसकर्मी ऐसे प्रयासों के दौरान चोटिल हो जाए तो जिम्मेदार किसे माना जाएगा? क्या इस तरह कोई प्रदर्शन हो रहा है? भारत में पुलिस की जान की कोई कीमत नहीं है क्या?

उल्लेखनीय है कि इससे पहले दिल्ली में प्रदर्शनस्थल से एक वीडियो सामने आई थी। इस वीडियो में किसान नेता राकेश टिकैत अन्य प्रदर्शनकारियों के सामने मंदिरों और पंडितों का मखौल उड़ा रहे थे। उनका कहना था कि मंदिर वालों को रोज पूजा जा रहा है, लेकिन वो लोग एक भी दिन भंडारा लगाते नहीं नजर आए। ये लोग कहाँ हैं? इनसे भी हिसाब-किताब ले लो। इनका अता-पता ले लो। हमारी माँ-बहनें इन्हें जा-जा कर दूध दे रही हैं। ये लोग बदले में एक कप चाय भी नहीं पिला रहे हैं। इन सब लोगों को भी पता चलेगा।

जयपुर में छेड़छाड़ का विरोध करने वाले वीडियो पत्रकार की मौत: BJP ने उठाए गहलोत सरकार पर सवाल

राजस्थान के जयपुर में 8 दिसंबर को हुए एक हमले में गंभीर रूप से घायल वीडियो पत्रकार अभिषेक सोनी की बुधवार (दिसंबर 23, 2020) देर रात ट्रॉमा सेंटर में मौत हो गई। 8 दिसंबर को अपनी साथी महिला पत्रकार के साथ छेड़छाड़ का विरोध करने पर बदमाशों ने उन्हें लोहे की छड़ से बुरी तरह पीटा था। 

इस घटना की वीडियो भी सामने आई थी। वीडियो में सारे बदमाश सरिया से अभिषेक को बुरी तरह मारने के बाद फरार होते नजर आ रहे थे। पुलिस ने इस संबंध में खुलासा किया था कि बदमाशों ने पहले महिला को प्रताड़ित करना शुरू किया था और फिर सोनी के विरोध करने पर उन्हें छड़ी और सरिए से मारने लगे।

जानकारी के मुताबिक पूरी घटना में अभिषेक को काफी गंभीर चोटे आई थीं। उन्हें एसआरएम अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। जहाँ ट्रॉमा सेंटर में बुधवार को उन्होंने दम तोड़ा। पुलिस के मुताबिक अब इस केस में आरोपितों के ख़िलाफ़ धारा 323, 341, 354ए और 307 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। तीनों आरोपितों की पहचान हो गई है। इनमें से पुलिस ने एक को गिरफ्तार भी किया है। बाकी दो अब भी फरार हैं।

पुलिस टीम बनाकर बाकी आरोपितों की तलाश कर रही है। आरोपितों के नाम शंकर चौधरी, कनाराम जट्ट और सुरेंद्र जट्ट बताए जा रहे हैं। वहीं अभिषेक के परिवार का आरोप है कि पुलिस इस मामले में अच्छी तरह से जाँच नहीं कर रही। उनकी माँग है कि इस केस में अलग से एफआईआर हो। जबकि राजस्थान पुलिस ने महिला पत्रकार की शिकायत में ही उनकी शिकायत जोड़ने का फैसला किया है।

वीडियो पत्रकार की मृत्यु के बाद भाजपा ने भी गहलोत सरकार पर सवाल उठाए हैं। भाजपा नेता सतीश पूनिया ने घटना के संबंध में लिखा, “राज्य में अशोक गहलोत के राज में 2 वर्षों में प्रदेश की कानून व्यवस्था ध्वस्त हो गई है, लोकतंत्र के प्रहरी और कोरोना योद्धा पत्रकार भी सुरक्षित नहीं है, जयपुर में बदमाशों के हमले में अभिषेक सोनी की मृत्यु और गिरधारी पालीवाल का घायल होना सरकार की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।”

बाबा वेंगा की भविष्यवाणी: ‘2021 में आएगा प्रलय, डोनाल्‍ड ट्रंप होंगे बहरे तो यूरोप पर इस्लामी कट्टरवादी करेंगे हमला…’

अमरीका में हुए 9/11 हमले और 2004 में आए सुनामी की सटीक भविष्यवाणी करने वाली बाबा वेंगा भविष्यवाणियों और फ्यूचर प्रेडिक्शन के लिए दुनियाभर में जानी जाती हैं। साल 2020 में कोरोना से त्रस्त लोग आने वाले साल 2021 को लेकर चिंतित है। नए साल को लेकर तमाम तरह की भविष्यवाणियाँ सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं, जिनमें मशहूर रहस्यवादी बाबा वेंगा की भविष्यवाणी भी शामिल है।

2021 को लेकर बुल्गारिया की भविष्यवक्ता बाबा वेंगा की भविष्यवाणी इन दिनों चर्चाओं में हैं। बता दें, 1996 में बाबा वेंगा की 85 साल की उम्र में मौत हो गई थी। वेंगा ने 50 साल में करीब 100 फ्यूचर प्रेडिक्शन किया था। इनमें से ज्यादातर सच साबित हुई है।

बाबा वेंगा ने 2021 के बारे में कुछ ऐसी भविष्यवाणी की है जो काफी आश्चर्यजनक और चौकाने वाली है तो वहीं कुछ भविष्यवाणियों से लगता है कि आने वाला साल 2020 से भी ज्यादा खतरनाक होगा। खुद की मौत की भविष्यवाणी करने वाली बाबा वेंगा ने कहा था कि 2021 में कठिन समय आएगा और लोगों को उनके धर्म के आधार पर विभाजित किया जाएगा। और यह साल मानवता के मुकद्दर को बदलकर रख देगा।

बाबा वेंगा की भविष्यवाणियाँ

  • डोनाल्ड ट्रंप को लेकर बाबा वेंगा ने बताया था कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ब्रेन ट्रॉमा हो सकता है और वो बहरे हो सकते हैं।
  • ◆ यूरोप के पुतिन पर हमले की बात कहते हुए वेंगा ने कहा था कि पुतिन पर उनके ही देश का कोई जानलेवा हमला करेगा। इसके अलावा उन्होंने कहा है कि यूरोप पर इस्लामी कट्टरवादी हमला करेंगे।
  • ◆बाबा वेंगा ने अनुमान लगाया था कि 2021 में कई देशों पर जल्द ही कुछ बाढ़ और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएँ आ सकती हैं।
  • ◆उन्होंने कहा था कि एक ड्रैगन इंसानियत के लिए खतरा बन सकता है। इस बात को लोग चीन की बढ़ती ताकत से जोड़ कर देख रहे हैं।
  • ◆ बाबा वेंगा का कहना है कि 21वीं शताब्दी में इंसान कैंसर का भी इलाज ढूँढ लेगा और साइंस इतनी तरक्की करेगा कि ट्रेन हवा में उड़ सकेंगी।
  • ◆ बाबा ने यह भी कहा कि 2021 में ‘तीन राक्षस एक हो जाएँगे।’ इस भविष्यवाणी से लोग काफ़ी डरे हुए है। उन्होंने कहा था कि ब्रह्माण्ड 5079 में खत्म हो जाएगा।

गौरतलब है कि बाबा वेंगा की कुछ भविष्यवाणियाँ तो सही साबित हुई हैं और आने वाले समय में कितने और फ्यूचर प्रेडिक्शन सच साबित होंगे, ये तो वक्त ही बताएगा।

मालूम हो कि बाबा वेंगा बुल्गारिया के रहने वाली थी। उनका असली नाम वेंगेलिया पांडेवा दिमित्रोवा था। उनका जन्म सन् 1911 में हुआ था। उन्होंने 12 वर्ष की उम्र में ही एक तूफान के दौरान अपनी दोनों आँखें खो दी थी। इसके बाद उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि वह भविष्य की घटनाओं को देख सकती हैं।

Jio सिम के बहिष्कार की बात पर आपस में ही भिड़ पड़े किसान, कल ही किया था 3 महीने वाला रिचार्ज

केंद्र सरकार के तीन नए फासीवादी कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों ने एक नया और दर्दनाक मोड़ ले लिया है। दरअसल, सारा हंगामा अम्बानी के रिलायंस जियो के टॉवर उखाड़ने को लेकर शुरू हुआ। कुछ किसान संगठन चाहते थे कि रिलायंस के सभी उत्पादों का बहिष्कार किया जाए, जबकि दूसरा किसान संगठन रिलायंस जियो के बहिष्कार की बात पर निजी कारणों से अड़ गया है।

यह विवाद अब बड़ा होते नजर आ रहा है। पंजाब के कुछ किसान जब ‘किसान पुत्र’ रितेंदर सिंह के घर के पास लगे जियो टॉवर की लाइट काटने कुल्हाड़ी लेकर पहुँचे तो रितेंदर सिंह के गुस्से का ठिकाना नहीं रहा। रितेंदर सिंह ने कहा, “किसानों ने कहा रिलायंस का पेट्रोल पंप मुर्दाबाद, हमने कहा रिलायंस का पंप मुर्दाबाद। किसानों ने कहा रिलायंस रिटेल स्टोर मुर्दाबाद, हमने कहा रिलायंस स्टोर मुर्दाबाद। लेकिन अब अगर आप चाहते हैं कि रितेंदर रिलायंस जियो को भी मुर्दाबाद कहे, तो ये हमसे नहीं हो पाएगा। रिलायंस जियो जिंदाबाद था, जिंदाबाद है और जिंदाबाद रहेगा और इसके लिए मैं सभी किसान संगठनों को लाहौर छोड़ने के लिए भी तैयार हूँ।”

एक समाचार चैनल से बात करते हुए आक्रोशित किसान पुत्र ने कहा कि उसने कल ही रिलायंस जियो का तीन महीने वाला रिचार्ज कराया था और अब आज ही ये किसान चाहते हैं कि रिलायंस का सिम फेंक दें तो वो ऐसा हरगिज नहीं करेंगे। रितेंदर ने बताया कि उन्होंने इसे रिचार्ज करते समय चिप्स के साथ मिले एक कूपन कोड को भी इस्तेमाल कर लिया है।

किसान संगठनों द्वारा रितेंदर के इस व्यवहार की कड़ी निंदा की गई है। उन्होंने कहा कि उनके पास भी रिलायंस जियो के सिम थे और उन्होंने भी उसकी डेढ़ जीबी का लालच किए बिना उसका बहिष्कार किया, लेकिन रितेंदर के सिम में ऐसा अनोखा क्या है?

आक्रोशित रितेंदर ने दो किसानों के कान के नीचे बजाने के बाद वहाँ मौजूद रिपोर्टर्स को बताया कि उसने हाल ही में नेटफ्लिक्स पर ड्रग्स के कारोबार पर आधारित एक वेब सीरीज ‘गलत तुड़ाई’ देखनी शुरू की थी और वो अभी उसके दूसरे ही एपिसोड तक पहुँच पाया है। जियो उपभोक्ता ने बताया कि वेब सीरीज को ही पूरा करने के उद्देश्य से उसने अन्य किसान संगठनों की नजर में आए बिना अपना रिलायंस जियो सिम रिचार्ज कर लिया था।

एक किसान संगठन के नेता ने बताया कि हर कोई रिलायंस जियो की सेवा का लाभ ले रहा था लेकिन ऐसे नाजुक समय में अम्बानी की इस सेवा ने हमारी एकता को खंडित किया है। उन्होंने कहा कि वो भी वेब सीरीज देखते हैं लेकिन सरकार के विरोध के लिए उन्होंने इसका त्याग कर दिया है।

एक अन्य घटना में रिलायंस जियो टॉवर गिराने और उसकी बिजली कनेक्शन काटते समय दो किसान संगठन आपस में भीड़ पड़े। घटनास्थल पर हालात पर नियंत्रण पाने के लिए पुलिसबल को बुलाया गया। जब पुलिस को पता चला कि कुछ किसान रिलायसं जियो का टॉवर बंद करने पहुँचे थे तो उनके गुस्से का ठिकाना नहीं रहा और उन्होंने आरोपितों की जमकर सुताई कर डाली।

पुलिसकर्मी ने बताया कि वो जियो सिम से मिलने वाले दैनिक डेढ़ जीबी से ही किसान संगठनों के समर्थन में ट्विटर पर हैशटैग चला रहे थे। समाचार लिखे जाने तक पुलिस ने उन्हें किसान विरोध को बाधित करने की साजिश के अपराध में हिरासत में ले लिया और किसी भी उपभोक्ता की वेब सीरीज में रुकावट आने की आशंका के चलते इलाके के प्रत्येक रिलायंस टॉवर के पास अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

मंदिर वाले सब कहाँ गए? एक भी भंडारा नहीं… सुधर जाओ पंडित: किसान आंदोलन में हिंदू-घृणा, वीडियो वायरल

कृषि कानून के ख़िलाफ़ दिल्ली में चल रहे ‘किसान’ आंदोलन में अब खुलेआम मंदिरों का मखौल उड़ाया जा रहा है। हाल में एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आई है। इस वीडियो में कथित तौर पर किसान नेता राकेश टिकैत अन्य प्रदर्शनकारियों को माइक लेकर संबोधित कर रहे हैं और मंदिर व पंडितों की मंशा पर सिर्फ़ इसलिए सवाल खड़े कर रहे हैं क्योंकि प्रदर्शन स्थल पर उनके लिए भंडारा नहीं करवाया गया।

इस वीडिया में किसान नेता को कहते सुना जा सकता है कि मंदिर वालों को रोज पूजा जा रहा है, लेकिन वो लोग एक भी दिन भंडारा लगाते नहीं नजर आए। ये लोग कहाँ हैं? इनसे भी हिसाब-किताब ले लो। इनका अता-पता ले लो। हमारी माँ-बहनें इन्हें जा-जा कर दूध दे रही हैं। ये लोग बदले में एक कप चाय भी नहीं पिला रहे हैं। इन सब लोगों को भी पता चलेगा।

वीडियो में व्यक्ति कहता है कि गाय का बच्चा हो या भैंस का, सबसे पहला दूध पंडित के यहाँ जाता है। लेकिन इनमें से एक भी (प्रदर्शन स्थल) पर कुछ नहीं भिजवा रहे। इनसे बढ़िया तो गुरुद्वारा ही है।

आगे पंडितों पर हमला बोलते हुए कहा जाता है, “देखो सुधर जाओ। पंडित भी सुधर जाओ, जो मंदिर में बैठे हैं। इन पर बहुत चढ़ावा है… इनसे हिसाब-किताब तो ले लो भाई। यहाँ एकाध भंडारा लगवा दो। हम कोई कृष्ण जी के ख़िलाफ़ थोड़ी हैं, लेकिन तुम भंडारा तो लगवाओ। सब हरिद्वार जा रहे हैं, मथुरा जा रहे हैं, एक भी पंडित यहाँ नहीं आ रहा। इलाज इनका सबका होगा। इनकी सबकी लिस्ट बनेगी।”

बता दें कि सोशल मीडिया पर इस वीडियो को लिबरल गिरोह के लोगों द्वारा शेयर किया जा रहा है। वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी इस पर लिखते हैं, “मंदिर वाले सब कहाँ चले गए? एक भी भंडारा नहीं? ज़रा सिख समुदाय से ही सीख लो। … जो बोले सो निहाल …”

वहीं मनीष सिंह लिखते हैं, “सौ आने सच बोल रहे हैं टिकैत जी, सच में हम हिंदुओं को सिख भाइयों के प्यार से बिना भेदभाव के चलने वाले भंडारे से सीखने की जरूरत है। साथ ही किसानों को भी उनकी बात पर हँस कर उसको हँसी में नहीं उड़ाना चाहिए, वो व्यंगात्मक लहजे में बोल रहे हैं लेकिन उसको गम्भीरता से सुनने की जरूरत है।”

इसके अलावा यह भी गौरतलब हो कि आज के दिन सोशल मीडिया पर मनुस्मृति दहन दिवस को सोशल मीडिया पर ट्रेंड करवाया जा रहा है। इस ट्रेंड को जोड़ करके लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं, “देश का किसान अपनी सही जगह पर है, इन्हें अडानी-अंबानी के चमचे, दलाल दोगले बीजेपी के नेता और मंत्री, मंदिरों में बैठे हुए फ्री का खाने वाले पंडे-पुरोहित, आरएसएस के फर्जी देशभक्त और खुद प्रधानमंत्री फेकू नाथ जी गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।”

अरुणाचल प्रदेश में नीतीश की JDU को बड़ा झटका: पार्टी के 6 विधायक भाजपा में शामिल

जनता दल यूनाइटेड (जदयू) को अरुणाचल प्रदेश में बड़ा झटका लगा है, पार्टी के कुल 6 विधायक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं। यह जानकारी विधानसभा द्वारा जारी किए गए बुलेटिन में साझा की गई। इसके अलावा पीपुल्स पार्टी ऑफ़ अरुणाचल (PPA) के इकलौते लिकबाली (Likabali) विधानसभा क्षेत्र से विधायक कार्दो निगोर (Kardo Nyigor) ने भी भाजपा की सदस्यता ले ली। पंचायत और निकाय चुनावों के नतीजों के ठीक एक दिन पहले यह बात सामने आई है। 

इसके अलावा शनिवार (26 दिसंबर 2020) से ही जदयू (JDU) की पटना में राष्ट्रीय परिषद की बैठक होने वाली है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इन विधायकों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी लेकिन अब यह भाजपा में शामिल हो चुके हैं। भाजपा की सदस्यता लेने वालों में जदयू के 6 विधायकों में तलेम तबोह (रुमगोंग), हायेंग मंगफी (तयांग तजो), जिक्के टको (टाली), दोर्जी वांगडी खरमा (कालाकतांग), डोंगऊ सियोंगजू (बोमदिला), कांगगोंग टाकू (मरियांग-गेकू) शामिल हैं। 

26 नवंबर 2020 को जदयू ने सियोंगजू, खरमा और टाकू को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए ‘कारण बताओ नोटिस’ भेजा था, इसके बाद उन्हें पार्टी से निलंबित भी किया था। जदयू के इन 6 विधायकों ने तलेम तबोह को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की जानकारी के बगैर विधायक दल का नेता चुन लिया था। इस महीने की ही शुरुआत में PPA विधायक को भी पार्टी से निलंबित किया गया था। इस पर अरुणाचल भाजपा अध्यक्ष बीआर वाघे ने कहा, “हमने उनके पार्टी में शामिल होने के उद्देश्य से दिए गए पत्र को स्वीकार कर लिया है।” 

फ़िलहाल इस मुद्दे पर जदयू की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। उल्लेखनीय है कि नीतीश कुमार की जदयू ने 2019 में हुए प्रदेश के विधानसभा चुनावों में 15 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें 7 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस जीत के साथ जदयू अरुणाचल प्रदेश में भाजपा के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी। भाजपा ने इस चुनाव में कुल 41 सीटों पर अपना कब्ज़ा जमाया था।

जदयू के 6 और PPA के एक विधायक को मिला कर भाजपा के विधायकों की संख्या 48 हो गई है। वहीं जदयू के पास सिर्फ एक विधायक शेष है, कॉन्ग्रेस व एनपीपी के पास 4-4 विधायक मौजूद हैं। गौरतलब है कि भाजपा और जदयू बिहार के भीतर गठबंधन में सरकार चलाते हैं लेकिन अन्य राज्यों में अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं। हाल ही में जदयू ने पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनावों में 75 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है।  

एक और किसान हो गए ‘शहीद’, PM मोदी यह असहनीय है: कॉन्ग्रेसी नेता और हीरो सबने किया शेयर – Fact Check

देश भर में किसान आंदोलन को लेकर चर्चा चल रही है। जहाँ एक तरफ मोदी सरकार के खिलाफ अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए खालिस्तानी समर्थक, वामपंथी गिरोह और विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा किसान आंदोलन हाइजैक किया जा चुका है, वहीं कथित किसानों के प्रति सहानुभूति रखने वाले कई सोशल मीडिया यूजर्स अब फर्जी खबरें फैलाने में लगे हैं। इस बीच इंटरनेट पर ऐसी ही एक तस्वीर वायरल हो रही है, जिसके जरिए लोगों को भ्रमित किया जा रहा।

दरअसल, सोशल मीडिया पर गुरुवार (24 दिसंबर, 2020) को कॉन्ग्रेस पार्टी के सदस्यों, कुछ किसान संगठनों और एक अभिनेता द्वारा एक मृत बुजुर्ग व्यक्ति की तस्वीर शेयर की गई। जिसको लेकर उन्होंने दावा किया कि यह तस्वीर हरियाणा-दिल्ली सीमा पर प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों में से एक बुजुर्ग किसान की है, जिनकी मोदी सरकार के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान मृत्यु हो गई।

जम्मू और कश्मीर की यूथ कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता आबिद मीर मगामी ने ट्वीट कर दावा किया कि मौजूदा विरोध प्रदर्शन में एक और किसान ‘शहीद’ हो गया है। साथ ही उन्होंने मोदी सरकार को घेरते हुए मृत किसान की तस्वीर भी शेयर की।

जम्मू और कश्मीर की यूथ कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता

दूसरी ओर किसानों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले अखिल भारतीय किसान संघर्ष संगठन ने भी अपने ट्विटर एकाउंट पर इसी तस्वीर को साझा करते हुए लोगों को भरमाया और दावा किया कि मृत किसान दिल्ली किसान मोर्चा का एक सदस्य है, जिसने विरोध प्रदर्शन के दौरान अपने जीवन का बलिदान दिया है।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष ने लिखा, “दुखी मन से बता रहा हूँ, दिल्ली किसान मोर्चे में एक और किसान भाई शहिद हो गए, उनके इस शहादत को मैं कोटि-कोटि नमन करता हूँ।” यहीं नहीं, इस पोस्ट में उन्होंने स्वघोषित पत्रकार विनोद कापरी और प्रशांत कनौजिया, इस्लामी सईमा और अभिनेता सोनू सूद को टैग भी किया। गौरतलब है कि कापरी, कनौजिया और सईमा फेक न्यूज़ फैलाने और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर लोगों को उकसाने के लिए कुख्यात हैं।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष का ट्वीट

इनके अलावा अभिनेता सुशांत सिंह भी हमेशा की तरह फर्जी न्यूज़ के लपेटे में आ गए। उन्होंने एक अन्य सोशल मीडिया यूजर के एक पोस्ट को शेयर किया, जिसने इसी फर्जी न्यूज़ को बढ़ावा देने का काम किया था। पोस्ट को शेयर करते हुए कथित अभिनेता ने प्रधानमंत्री मोदी पर हमला करते हुए कहा कि यह ‘असहनीय’ है।

सुशांत सिंह का ट्वीट

हालाँकि, कथित किसान विरोध से जुड़े ट्रॉल्स द्वारा साझा की गई तस्वीर का अभी के समय से कोई लेना-देना नहीं है।

फैक्ट चेक

बुजुर्ग मृतक व्यक्ति की तस्वीर, जिसे आक्रामक रूप से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह दावा करते हुए साझा किया जा रहा है कि वह कथित किसानों की दिल्ली चलो रैली में प्रदर्शनकारियों में से एक थे और उसकी विरोध प्रदर्शन के दौरान मृत्यु हो गई, यह खबर फैक्ट चेक के दौरान झूठ साबित हुआ है।

ट्विटर यूजर Befittingfacts ने ट्रोल्स और राजनीतिक हैंडल द्वारा फैलाए गए इस झूठ का पर्दाफाश करते हुए इन्हें जम कर लताड़ा है। साथ ही पुलिस से इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की माँग भी की है।

बता दें कि यह तस्वीर 2, सितंबर 2018 में पहली बार फेसबुक पर गरीब जट्ट नाम के एकाउंट से साझा की गई थी। फेसबुक पोस्ट के अनुसार, बोहड़ी चौराहे पर लगभग 70 साल का एक बूढ़ा व्यक्ति मृत पाया गया था। जिनकी डिटेल उस समय उपलब्ध नहीं थी।

इस पोस्ट के जरिए उन्होंने सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं से पोस्ट शेयर करने का आग्रह किया था, ताकि मृतक के परिवार को उनकी मृत्यु के बारे में पता चल सके। यहाँ आप उस फेसबुक पोस्ट का स्कीनशॉट देख सकते हैं जोकि 2 साल पहले पोस्ट किया गया था।

2 साल पहले शेयर किया गया पोस्ट

इस फैक्ट चेक से यह बात साबित होती है कि सोशल मीडिया पर अधिकतर तस्वीरें मात्र लोगों को गुमराह करने या बरगलाने के लिए साझा की जा रही है। इन फेक खबरों का उद्देश्य केवल केंद्र सरकार को घेरने और विपक्षी पार्टियों द्वारा राजनीतिक रोटियाँ सेकने के लिए किया जा रहा है।

वहीं जैसे ही सोशल मीडिया यूजर्स ने फर्जी न्यूज पेडर्स को फैक्ट चेक कर के पुराने फेसबुक पोस्ट को शेयर करना शुरू किया, अभिनेता सुशांत सिंह ने अपनी गलती स्वीकार की और कहा कि यह मेरे लिए सबक है और मुझे इसके लिए पीएम मोदी से भी माफ़ी माँगनी चाहिए।

कृषि सुधारों का UPA से NDA तक का सफर: जहाँ बीजेपी लगातार कर रही पहल वहीं कॉन्ग्रेस ने पूरे 10 साल बयानबाजी में बिताए

भारत में कृषि सुधारों पर केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदम राजनैतिक गतिरोध एवं विवाद का मुद्दा बन गए है। संसद द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध जताने के लिए कॉन्ग्रेस शासित पंजाब राज्य के किसान दिल्ली में डेरा जमाए हुए हैं। दूसरी तरफ, कॉन्ग्रेस सहित वामपंथी एवं अन्य विपक्षी दल लगातार केंद्र सरकार पर इन कानूनों को वापस लेने का दवाब बना रहे हैं।

केंद्र में चाहे किसी की भी सरकार हो– जब कोई विधेयक संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो पहले उसे एक लम्बी संवैधानिक प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है। कृषि में सुधार के लिए लागू कानून कोई एक ही रात के ‘तुगलकी फरमान’ नहीं थे। बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत संसद द्वारा पारित किए गए थे। दरअसल, किसानों की आय में बढ़ोत्तरी, बिचौलियों से राहत, और अनावश्यक लालफीताशाही से उन्हें निकालने की माँग वर्षों पुरानी है। बस जरुरत एक ठोस निर्णय पर पहुँचने की थी, जिसे वर्तमान केंद्र सरकार ने साकार कर दिया।

भारतीय कृषि में बड़े पैमानें पर सुधारों की चर्चा को गति जुलाई 2004 में यूपीए (I) सरकार के दौरान मिलनी शुरू हुई। हालाँकि, मनमोहन सिंह सरकार को राष्ट्रहित के मामलों पर टालमटोल करने और उन्हें लंबित करने में महारत हासिल थी। धीरे-धीरे सरकार में भ्रष्टाचार व्याप्त हो गया और हर मुद्दे पर अलोकप्रिय होने का डर हावी होने लगा था। अतः इस सरकार ने कृषि सुधारों सहित रक्षा सौदे, आतंकवाद पर रोकथाम, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था और विदेश नीति सम्बन्धी अनेक मामलों को लटकाए रखा। यूपीए (I) सरकार के गठन के एक महीने के अन्दर यानि 19 जुलाई, 2004 को लोकसभा में कृषि सुधारों पर एक सवाल कृषि मंत्री से पूछा गया था। इसपर तत्कालीन कृषि राज्य मंत्री कांतिलाल भूरिया ने मंडी शुल्क खत्म करने, निजी क्षेत्र द्वारा उच्च तकनीक प्रदान करना, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के लिए यूनिफाइड फूड लॉ, विदेशी खरीददारों को चिन्हित करना, और निजी क्षेत्र को निवेश के लिए प्रोत्साहित करने वाला पॉंच स्तर वाला कृषि सुधारों का एक खाका पेश कर दिया।

एक साल बीत गया लेकिन जमीन पर कोई हालत में बदलाव नहीं आया। अतः कांतिलाल भूरिया ने लोकसभा के समक्ष 22 अगस्त, 2005 को एक प्रश्न का जवाब देते हुए कहा, “मौजूदा कृषि उपज विपणन समिति कानून किसान को सीधे उत्पादक से संपर्क करने में बाधा उत्पन्न करता है। उसे अपना माल लाइसेंसधारी व्यापारियों एवं मंडियों के माध्यम से ही बेचना पड़ता है। ऐसा ही फलों एवं सब्जियों के मामले में भी होता है। इस दौरान किसान से लेकर फुटकर विक्रेता के बीच इतने बिचौलिए होते है कि किसान को अंतिम उपभोक्ता मूल्य तक 30 प्रतिशत तक का नुकसान उठाना पड़ता है।” इन दो उदाहरणों से स्पष्ट है कि यूपीए (I) सरकार को किसानों की समस्याएँ और उनके उनके माल की उचित कीमत नहीं मिलने का अंदाजा था। इस संदर्भ में वे लोकसभा में लगातार बयान भी दे रहे थे। सरकार समस्या और उसका समाधान दोनों बता रही थी, लेकिन उसे किसानों तक पहुँचाने की प्रतिबद्धता एवं दृष्टिकोण उसके पास नहीं था।


साल 2005-06 में कृषि पर संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने भी कृषि सुधार के दर्जनों सुझाव पेश किए। जैसे सरकार के पास फसल का उचित भंडारण एवं गोदाम नहीं थे इसलिए किसानों को अपनी फसल सस्ते दामों में बाहर बेचनी पड़ रही थी। अतः भंडारण की आधुनिक और वृहद व्यवस्था के लिए निजी निवेश को लाने की बात कही गई। साथ ही कमेटी ने स्वीकार किया कि कई बार किसानों को फसल का दाम एमएसपी (MSP) से अच्छा निजी खरीददारों से मिल जाता है। उसी साल गेहूँ का एमएसपी 650 रुपए प्रति क्विंटल तय किया गया और उसपर 50 रुपए का अतिरिक्त बोनस भी दिया गया था। हालाँकि, किसानों ने अपनी फसल निजी व्यापारियों को बेचीं क्योंकि वहाँ उन्हें 800 रुपए प्रति क्विंटल का दाम मिल रहा था।

इसी दौरान, सरकार ने निश्चय कर लिया कि भंडारण के अतिरिक्त अगर किसान को उसकी फसल का दाम निजी व्यापारियों से अच्छा मिलता है तो वह वहाँ बेचने के लिए स्वतंत्र होगा। तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने 24 अप्रैल, 2012 को लोकसभा में यह सूचना दे दी थी। किसानों मिलने वाली नयी राहतों और सुधारों की जमीन पर हकीकत बिलकुल नगण्य थी। दरअसल, केंद्र सरकार एकतरह से खानापूर्ति के लिए बयानबाजी कर रही थी। खेतों में फसल के उत्पादन से लेकर उसे मंडियों में उचित दामों में बेचना इतना भी आसान नहीं था। केंद्र-राज्य सरकारों के कानून, अध्यादेश अथवा मंडी समितियों के स्थानीय व्यवस्थाओं में ही किसान फंस कर रह जाता था। सिर्फ लोकसभा अथवा राज्यसभा में कहने भर से काम नहीं चल सकता था। इसलिए व्यवस्थित तौर पर कानूनों की आवश्यकता थी।


इस क्रम में साल 2017 में फिर से प्रयास शुरू हुए। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ‘मॉडल एपीएमसी एंड कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट’ लेकर आई जिसके अंतर्गत किसानों की उपज का मुक्त व्यापार, विपणन चैनलों के माध्यम से प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना, और पूर्व-सहमत अनुबंध के तहत खेती को बढ़ावा देना शामिल था। साल 2018-19 में 31 लोकसभा और राज्यसभा सदस्यों वाली कृषि पर संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने बताया कि ‘मॉडल एपीएमसी एंड कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट’ को लेकर राज्यों में अधिक रूचि देखने को नहीं मिल रही है।


कमेटी के सुझाव पर जुलाई 2019 में सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक उच्चस्तरीय सीमिति बनाई गई। इसके संयोजक देवेन्द्र फडणवीस (महाराष्ट्र) और सदस्यों में एच.डी. कुमारस्वामी (कर्नाटक), मनोहरलाल खट्टर (हरियाणा), पेमा खांडू (अरुणाचल प्रदेश), विजय रूपानी (गुजरात), योगी आदित्यनाथ (उत्तर प्रदेश), कमल नाथ (मध्य प्रदेश), और नरेन्द्र सिंह तोमर (केंद्रीय कृषि मंत्री) और नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद को सदस्य-सचिव बनाया गया। इस प्रक्रिया के तहत, सबके सुझावों को समाहित करते हुए  5 जून, 2020 को कृषि सुधार से सम्बंधित तीन अध्यादेश जारी कर दिए गए। जिन्हें संसद द्वारा इसी साल सितम्बर में पारित कर दिया गया। आखिरकार भारत के राष्ट्रपति ने भी उनपर अपनी मुहर लगा दी।

अब विडम्बना देखिए, लगभग 15 सालों के बाद कृषि सुधार के लिए कोई कानून बनाये गए, तो आम जन-जीवन को प्रभावित करने के लिए सड़कों को बाधित किया जाने लगा। विपक्षी दलों द्वारा अराजक तरीके से कानूनों की प्रतियाँ विधानसभाओं में फाड़ दी गई। सामाजिक वैमनस्य फैलाने के लिए उत्तेजक एवं भड़काऊ भाषण दिए गए। सोशल मीडिया के माध्यम से भ्रमित और झूठी खबरों को फैलाया गया। कॉन्ग्रेस शासित राज्य सरकारों ने विशेष विधानसभा सत्र बुलाकर कानूनों के बहिष्कार का निर्णय लिया।


जब कृषि सम्बन्धी तीन विधेयक संसद के समक्ष रखे गए तो सभापति के समक्ष नारेबाजी की गई, माइक तोड़े गए, और सदन का बहिष्कार भी किया गया। संसदीय समितियों की बैठकों में अनुपस्थित रहना एक सामान्य सी बात हो गयी है। जिसपर शायद ही किसी का ध्यान जाता होगा। इस तरह देश एक हित में नीतिगत फैसलों का विरोध एक सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए किया गया।
जब कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए (I) और (II) के पास सत्ता थी तो उसके पास किसानों को मजबूत और स्थाई तौर पर राहत देने के लिए पूरे 10 साल का समय था। जोकि उन्होंने एक के बाद एक बयानबाजी कर गँवा दिया। ऐसा नही था कि कॉन्ग्रेस के एजेंडे में किसान हित शामिल नही थे।

बस कृषि सुधार उनके प्राथमिक कार्यों में शामिल नही थे। अब वर्तमान केंद्र सरकार को मौका मिला तो उन्होंने किसान के हितों की रक्षा के लिए ठोस पहल कर दी। अब थोड़ा सब्र रखने की आवश्यकता है। इन कानूनों का धरातल पर उतरने के बाद ही उनका विश्लेषण किया जा सकता है। उससे पहले, केंद्र और राज्यों के संबंधों को कमजोर करना अथवा संसद द्वारा पारित कानूनों को फाड़ना कोई लोकतांत्रिक अधिकार नही बल्कि अराजकता है।

झगड़ा PM मोदी और BJP से… लेकिन भुगत रहे बंगाल के 72 लाख किसान: ममता कर रहीं ओछी राजनीति

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज (दिसंबर 25, 2020) पीएम किसान सम्मान निधि (PM Kisan Samman Nidhi) के तहत देश भर के किसानों को वित्तीय लाभ की किस्त जारी कर दी। एक बटन दबाकर आज पीएम ने 9 करोड़ से अधिक किसानों के खातों में 18 हजार करोड़ रुपए की मदद ट्रांसफर की। 

ऐसे में भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि बंगाल में 72 लाख से ज्यादा किसान हैं, जिन्हें इस स्कीम का फायदा मिलना था, लेकिन ममता सरकार के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका। पीएम मोदी ने भी अपनी बात रखते हुए बंगाल सीएम की नीयत का पर्दाफाश किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से बातचीत के दौरान ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा, “अगर बंगाल आपकी धरती है तो आपने बंगाल में किसानों को केंद्र सरकार की योजना से होने वाले लाभ से क्यों वंचित रखा? अब आप उठ कर पंजाब पहुँच गए? आपको क्या लगता है लोग इसे भूल जाएँगे।”

उन्होंने कहा कि बंगाल के किसानों को केंद्र की योजनाओं के लाभ से वंचित रखा गया। बंगाल एकमात्र ऐसा राज्य है, जो योजनाओं का लाभ किसानों तक नहीं पहुँचने दे रहा। ममता बनर्जी की विचारधारा ने बंगाल को बर्बाद कर दिया है। अपनी बात रखते हुए पीएम ने उस विचारधारा को भी कोसा, जिसके कारण आज बंगाल का विकास रुका हुआ है

बता दें कि बंगाल में किसान सम्मान निधि न लागू करने पर भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजय वर्गीय ने भी ममता बनर्जी को आड़े हाथों लिया। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल की सीएम द्वारा सूची न देने के कारण बंगाल के 72 लाख किसान आज पीएम किसान सम्मान निधि मिलने से वंचित हुए हैं। उन्होंने पूछा, “ममता बनर्जी, आपका झगड़ा पीएम मोदी और भाजपा से है, पर उसका बदला बंगाल के किसानों से क्यों? आखिर पश्चिम बंगाल के किसानों ने आपका क्या बिगाड़ा है”

अपने अगले ट्वीट में उन्होंने ममता बनर्जी को ओछी राजनीति के लिए दुत्कारते हुए कहा, “पश्चिम बंगाल के 72 लाख किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि से ममता बनर्जी की ओछी राजनीति ने वंचित रखा हैं, 23 लाख किसानों ने केंद्र सरकार के PMKISAN पोर्टल पर पंजीकृत करवा कर दिखा दिया कि उन्हें इस मदद की कितनी ज़रूरत हैं। बंगाल के किसानो को 9800 करोड़ से वंचित रख रखा हैं। शर्म करो ममता बनर्जी”

उल्लेखनीय है कि इससे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने बंगाल में किसानों को मदद न पहुँचा पाने के लिए सीएम ममता को जिम्मेदार बताया था। उन्होंने कहा था कि देश कहा था कि देश 10 करोड़ किसानों को डेढ़ सालों में 95 हजार करोड़ की सहायता दी गई है। लेकिन बंगाल के किसानों को इसका लाभ नहीं मिला, क्योंकि उनकी सूची ही ममता सरकार द्वारा केंद्र को नहीं दी गई। उन्होंने पूछा था कि आखिर ममता बनर्जी क्यों नहीं चाहती कि बंगाल के किसानों को 6 हजार रुपए नहीं मिलना चाहिए।