MSP की गारंटी से महँगाई बढ़ेगी, निर्यात पर असर पड़ेगा, छोटे किसानों के उत्पाद गारंटी कानून के कारण घरों में सड़ जाएँगे, और भारत की अर्थव्यवस्था इससे हिल जाएगी।
‘अपराधियों की संपत्ति जब्त कर गरीबों मेंं बँटेगी, दुनिया देखेगी जहाँ माफिया का कब्ज़ा था वहाँ गरीब रह रहा है’: CM योगी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बुधवार (16 दिसंबर, 2020) को प्रयागराज में आयोजित अधिवक्ता समागम में हिस्सा लेने पहुँचे थे। इस दौरान उन्होंने अधिवक्ताओं की समस्याएँ दूर करने के अलावा, 2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को मद्देनजर रखते हुए विपक्षियों को भी घेरा। माफिया व अपराधियों पर की जा रही कार्रवाई को वाजिब बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि माफिया व अपराधियों की संपत्ति जब्त कर उसे गरीबों मेंं बाँटा जाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश अधिवक्ता समागम-2020 के शुभारंभ कार्यक्रम में प्रतिभाग करते मुख्यमंत्री श्री @myogiadityanath जी… https://t.co/j9dFYorr8y
— CM Office, GoUP (@CMOfficeUP) December 16, 2020
केपी कालेज ग्राउंड में हुए अधिवक्ता समागम में उन्होंने कहा, “यूपी में बड़े-बड़े लोग माफिया से घबराते थे। मैंने विकास प्राधिकरण से कहा है कि जिन सरकारी ज़मीनों पर माफिया ने कब्जा किया है उन्हें मुक्त करवा वहाँ गरीबों के लिए आवास योजना बनाई जाए। देश देखेगा, दुनिया देखेगी कि जहाँ पहले एक माफिया रहता था वहाँ एक गरीब रह रहा है।”
#WATCH | यूपी में बड़े-बड़े लोग माफिया से घबराते थे। मैंने विकास प्राधिकरण से कहा है कि जिन सरकारी ज़मीनों पर माफिया ने कब्जा किया है उन्हें मुक्त करवा वहां गरीबों के लिए आवास योजना बनाई जाए। देश देखेगा दुनिया देखेगी कि जहां पहले एक माफिया रहता था वहां एक गरीब रह रहा है: यूपी CM pic.twitter.com/Y2XNRn8cT4
— ANI_HindiNews (@AHindinews) December 16, 2020
मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि प्रयागराज विकास प्राधिकरण माफिया से छुड़ाई गई जमीन पर आवासीय योजनाएँ बनाकर उसका आवंटन अधिवक्ताओं के साथ-साथ पत्रकारों और शिक्षकों में नो लास, नो प्राफिट के आधार पर करे। साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार ने वकीलों के चेंबर के लिए काफी धनराशि अवमुक्त की है। कोविड के दौरान वकीलों की मदद के लिए कार्ययोजना माँगी है। साथ ही मदद का रास्ता निकालने का भरोसा भी दिया है।
आत्मनिर्भर भारत को प्रोत्साहन देते हुए सीएम ने कहा, “हमें मिट्टी के दीपक, गणपति और माँ लक्ष्मी जी की मूर्ति के लिए भी चीन पर निर्भर होना पड़ता था। कोरोना ने चीन को ऐसा घेरा कि वहाँ से सामान नहीं आ सकता था। आत्मनिर्भर भारत के तहत हर जगह मिट्टी के बर्तन बनने लगे। लोगों की आमदनी बढ़ी और आत्मनिर्भर भारत का आधार टेराकोटा बना।”
हमें मिट्टी के दीपक, गणपति और मां लक्ष्मी जी की मूर्ति के लिए भी चीन पर निर्भर होना पड़ता था। कोरोना ने चीन को ऐसा घेरा कि वहां से सामान नहीं आ सकता था। आत्मनिर्भर भारत के तहत हर जगह मिट्टी के बर्तन बनने लगे। लोगों की आमदनी बढ़ी और आत्मनिर्भर भारत का आधार टेराकोटा बना: यूपी CM pic.twitter.com/sQiEYFprMr
— ANI_HindiNews (@AHindinews) December 16, 2020
इसके अलावा यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने संबोधन के दौरान दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार को भी आड़े हाथों लिया। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यूपी की जनसंख्या 24 करोड़ है जबकि दिल्ली की पौने दो करोड़ है। फिर भी कोरोना का प्रबंधन यूपी में दिल्ली के मुकाबले काफी बेहतर रहा है।
If you compare this to Delhi – UP has a population of 24 crores and there have been 8,000 deaths. Delhi, with a population of 1.75 crores, recorded 10,000 deaths: Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath https://t.co/csJDjVtBmg
— ANI UP (@ANINewsUP) December 16, 2020
उन्होंने कहा कि दो महीने पहले यूपी में 68000 सक्रिय मरीज थे पर आज संक्रमितों की संख्या 18 हजार से भी कम है। वहीं, प्रदेश में कोविड-19 के संक्रमण की दर व मृत्युदर भी काफी कम है। उन्होंने कहा कि यूपी में कोरोना के कारण अब तक 8000 मौतें हो चुकी हैं जबकि दिल्ली में 10 हजार लोगों की मौत हो चुकी है।
यूपी में पहले और अभी के सरकार की तुलना करते हुए सीएम ने प्रयागराज कुंभ का भी उल्लेख किया। उन्होंने कुंभ को दुनिया का भव्य आयोजन बताते हुए कहा कि पहले भगदड़, गंदगी कुम्भ का पर्याय था, लेकिन 2019 का कुंभ शहर के कायाकल्प वाला रहा। कई कुंभ बीते लेकिन भरद्वाज ऋषि को किसी ने याद नही किया था। हमने उनकी भव्य प्रतिमा लगाई। कई देशों के राजदूत और नागरिक आए। शासन की मंशा नेक थी, इसलिए लोगों ने घर टूटने के बाद भी कार्यों का विरोध नहीं किया।
‘न्यूयॉर्क टाइम्स का फर्जीवाड़ा’: श्रमिक ट्रेन को ‘वायरस ट्रेन’ साबित करने के लिए संजीव सान्याल के 40 मिनट के इंटरव्यू को केवल 2 शब्दों में समेटा
पूरा विश्व कोरोना वायरस महामारी से जूझ रहा है और इससे जल्द से जल्द निपटने की कोशिश में जुटा हुआ है। इस दौरान सभी देशों की निगाहें एक-दूसरे पर रहीं कि कौन इस अज्ञात महामारी से निपटने के लिए कितना तैयार था और उसे इसमें किस हद तक सफलता मिली। मगर इस दौर में भी फेक न्यूज और प्रोपेगेंडा का बाजार गर्म रहा।
इस दौरान पश्चिमी मीडिया हाउस द्वारा कोविड-19 महामारी पर भारत की प्रतिक्रिया को काफी पक्षपाती तरीके से कवर किया गया। बता दें कि पश्चिमी मीडिया को अक्सर चीन से पैसे लेकर उसके लिए प्रोपेगेंडा फैलाते हुए देखा गया है।
इसी तरह का एक लेख हाल ही में सामने आया। यह लेख अमेरिकी समाचार पत्र ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में प्रकाशित हुआ था। लेख का शीर्षक था- The virus trains: How lockdown chaos spread COVID-19 across India। हिंदी में इसका अर्थ है- ‘वायरस रेलगाड़ियाँ: लॉकडाउन की अव्यवस्था ने कोविड-19 को देशभर में कैसे फैलाया’।
यह लेख पूर्ण रूप से मोदी सरकार के खिलाफ पूर्वग्रहों से भरा हुआ था। जिसमें देश में कोरोना वायरस के प्रसार के लिए मोदी सरकार को दोषी ठहराया गया।
न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख में कहा गया कि मोदी सरकार की कोविड-19 टास्क फोर्स में ‘उच्च जाति के हिंदुओं’ का वर्चस्व है। यह लिखना मीडिया हाउस के पक्षपाती रवैये को उजागर करता है। इतना ही नहीं, लेख में यह भी दावा किया गया कि सरकार ने बिना सोचे ही लॉकडाउन लगा दिया और उन्होंने यह नहीं सोचा कि लॉकडाउन लगाने से लाखों प्रवासी श्रमिकों के लिए हताशा, घबराहट और अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी।

कैसे प्रवासियों ने भारत के सरकार द्वारा व्यवस्थित विशेष रेलगाड़ियों की यात्रा करके देश के हर कोने में कोरोना वायरस को पहुँचाया- इस विषय पर लेख लिखने के लिए NYT के लेखकों ने लेखक एवं केन्द्रीय वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल समेत कई लोगों से बात की। लेकिन अब संजीव सान्याल ने खुलासा किया है कि वामपंथी प्रकाशन ने किस तरह से सिर्फ इस बात का चयन किया कि क्या प्रकाशित करना है और क्या नहीं। उन्होंने सिर्फ वही प्रकाशित किया जिसके लिए उन्होंने पहले से ही सोच रखा था और जो उनके नैरेटिव के हिसाब से सही बैठता था।
Yes, your journalist did speak to me but the article does not reflect the conversation and uses an arbitrary two word “quote”. Would you like to hear the conversation? I have the full audio recording. https://t.co/yWjIeSgYT2
— Sanjeev Sanyal (@sanjeevsanyal) December 16, 2020
लेख में उल्लेख किया गया है कि संजीव सान्याल ने पुष्टि की थी कि प्रशासन को शहरी ‘हॉटस्पॉट क्षेत्र’ से ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को ले जाने से होने वाले जोखिमों के बारे में पता था। उन्होंने कहा कि स्थिति को ‘काफी अच्छी तरह से’ (‘quite well’) प्रबंधित किया गया था। केवल दो शब्द ‘quite well’ उस साक्षात्कार से उद्धृत किए गए थे, जो उन्होंने उसके साथ लिया था।
ऑपइंडिया ने अब संजीव सान्याल और न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार के बीच हुई बातचीत की पूरी रिकॉर्डिंग हासिल कर ली है। NYT के लेख के सह-लेखकों में से एक, सुहासिनी राज ने संजीव सान्याल से संपर्क किया उनसे कोविड -19 महामारी पर सरकार की प्रतिक्रिया के बारे में विस्तार से बात की। बातचीत 40 मिनट से अधिक समय तक चली। और 40 मिनट के इंटरव्यू में से प्रकाशन हाउस ने केवल दो शब्द ‘quite well’ लिए। हालाँकि यह आश्चर्य की बात नहीं है। वाशिंगटन पोस्ट ने भी दिल्ली दंगों के दौरान इसी तरह के अपने नैरेटिव को फिट होने वाले शब्दों का चयन किया था।
30 of 40mins was about the thinking behind India’s policy response. As will be obvious, the journalist was not interested. She already had an agenda to push a pre-decided story. When I did not play along, she tries in the last 10 mins to put words in my mouth 3/n
— Sanjeev Sanyal (@sanjeevsanyal) December 16, 2020
संजीव सान्याल ने ट्वीट करते हुए बताया कि इंटरव्यू के दौरान 40 में से 30 मिनट भारत की नीति प्रतिक्रिया के पीछे की सोच के बारे में था। मगर अब यह स्पष्ट हो गया है कि पत्रकार की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। उनके पास अपनी स्टोरी और नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए पहले से ही एजेंडा तैयार था। उन्होंने यह भी बताया कि जब उन्होंने पत्रकार के मुताबिक बात नहीं की तो आखिरी 10 मिनट में उन्होंने उनके मुँह से अपने मुताबिक बातें निकलवाने की कोशिश की।
Since I did not provide a quote useful to her agenda, I was just give a two word quote in the article just to show that NYT gave all sides a chance. I am posting the recording so that it can be used as a case study on how Indian officials can deal with biased Western media 4/n
— Sanjeev Sanyal (@sanjeevsanyal) December 16, 2020
वो आगे लिखते हैं, “चूँकि मैंने उनके एजेंडे के लिए उपयोगी बयान (quote) नहीं दिया तो लेख में मेरे दो शब्दों के उल्लेख ये दिखाने के लिए किया गया कि NYT ने सभी पक्षों को मौका दिया। मैं रिकॉर्डिंग पोस्ट कर रहा हूँ, ताकि इसका उपयोग केस स्टडी के रूप में किया जा सके कि भारतीय अधिकारी पक्षपाती पश्चिमी मीडिया से कैसे निपट सकते हैं।”
न्यूयॉर्क टाइम्स की पत्रकार सुहासिनी राज और संजीव संजल के बीच की पूरी बातचीत नीचे YouTube पर सुनी जा सकती है। कृपया ध्यान दें कि ऑडियो की शुरुआत में लगभग 1.30 मिनट तक कोई आवाज़ नहीं है, इसलिए आप ऑडियो सुनने के लिए 1.30 मिनट तक स्किप कर सकते हैं।
यह भी उल्लेखनीय है कि हालाँकि ऑडियो रिकॉर्डिंग 40 मिनट से अधिक लंबी है, पहले आधे घंटे में श्रमिक विशेष ट्रेनों के बारे में कोई चर्चा नहीं है। वे पहले सामान्य रूप से लॉकडाउन के बारे में बात करते हैं, और फिर अंत में पत्रकार सान्याल से अपने एजेंडे के मुताबिक बातें निकलवाने की कोशिश करती है, मगर उनके जवाब से पत्रकार को निराशा ही हाथ लगी, इसलिए उन्होंने इस इंटरव्यू के मात्र ‘दो चुनिन्दा शब्द’ इस्तेमाल करने का निश्चय किया।
MSP की गारंटी कृषि सहित भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देगी
1965-70 के दशक में भारत ने अपने दो मूलभूत समस्याओं को निवारण हेतु हरित क्रांति और श्वेत क्रांति की अवधारणाओं को क्रियान्वित किया। इससे पहले के दौर में चाहे वो तकनीकी पिछड़ापन हो, या दूरदृष्टि का अभाव, अपनी शैशवावस्था से बाहर आते देश के सामने अनाजों और दूध एवम् डेयरी उत्पादों की किल्लत थी। हम जितना उपजाते थे, उससे ज्यादा हमारी जनसंख्या थी। लगातार भारत भोजन और दूध के मामले में एक अभाव में जीता था।
खेती योग्य भूमि के संदर्भ में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है, और मवेशियों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक यहीं है। फिर भी, भारत न तो अपने योग्य अनाज उपजा पाता था, न ही दूध और उससे जुड़े उत्पाद। तब भारत में सरकार ने दोनों ही क्षेत्रों को लिए योजना बना कर, इन वस्तुओं के आयात पर लगाम लगाने की कोशिश की।
यहीं से भारत में पहली बार MSP, यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की अवधारणा कृषि के क्षेत्र में आती है। भारत ने यह तय किया कि गेहूँ, चावल जैसे अनाजों के मामले में राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाना है। लेकिन, इसके लिए किसानों को हर उस अनाज को उपजाने के लिए प्रोत्साहित करना था, जो हमारी जनसंख्या की माँग से कम था। लेकिन, किसान को अगर लगे कि वो सब्जी उपजा कर ज्यादा लाभ कमा सकता है, तो वो गेहूँ या चावल में क्यों समय और धन लगाएगा?
इसके लिए सरकार ने कई तरह की सब्सिडी और प्रोत्साहन मूल्यों की घोषणा की। 1966 में भारत में सरकार ने किसानों से कहा कि वो अगर वैसे अनाज उपजाएँगे जो सरकार उनसे खेत में लगवाना चाहती है, तो सरकार उन्हें प्रति टन कम से कम एक तय मूल्य देगी ही। इसके साथ ही, सरकार ने उर्वरक, बिजली और सिंचाई के लिए सब्सिडी की व्यवस्था की। बीजों के लिए ब्लॉक के स्तर पर बेहतर व्यवस्थाएँ बनाई गईं। गाँव-गाँव में कृषि के क्षेत्र में नए तरीकों को ले कर प्रचार अभियान भी चले।
कहानी अमूल की, सहकारिता की, जहाँ सरकार नहीं है
इसी के समानांतर, अमूल नाम की एक कम्पनी थी, जो लगभग आजादी के ही समय में भारत में दुग्ध उत्पादों को लिए अस्तित्व में आई। सत्तर के दशक में सरकार के लिए डेयरी उत्पादों के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता एक लक्ष्य थी। यहाँ ‘ऑपरेशन फ्लड‘ या ‘श्वेत क्रांति’ का जन्म होता है जिसके प्रणेता डॉ वर्गीज़ कूरियन थे। डॉ कूरियन ने यह दिखाया कि एक कम्पनी, भले ही सरकार के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आगे आ रही है, लेकिन बिना किसी भी सरकारी मदद के, एक सहकारिता के ढाँचे को कॉरपोरेट शैली में चलाते हुए, सफलता की नई कहानी रच सकती है।
अमूल कम्पनी को, या उसके बाद उसी मॉडल पर आई सुधा या अन्य कम्पनियों को सरकार से खास मदद नहीं मिलती, न ही उसकी कभी आवश्यकता पड़ी। यहाँ व्यवस्था यह थी कि बाजार में दूध और उसके उत्पादों की आवश्यकता है, बाजार माँग तय करेगा, किसान (दुग्ध उत्पादक) एक कम्पनी के माध्यम आपूर्ति करेगा और उसके मूल्य तय करेगा। यहाँ, न सरकार ने कभी समर्थन मूल्य बताया, न ही भंडारण में मदद की, न ही बाजार तक पहुँचाने में, फिर भी हर गाँव में पाँच-दस लोगों के साथ शुरु हुई संस्थाएँ हर महीने लाखों रुपए का व्यवसाय कर रही हैं।
यहीं पर, मैं अपना एक निजी अनुभव साझा करना चाहूँगा ताकि आपको यह समझ में आए कि बिना सरकारी मदद के एक संस्था कैसे चलती है, और लाभ में रहती है। मेरा गाँव ‘रतनमन बभनगामा’ बेगूसराय जिले में है। 1990-91 की बात है जब मेरे दालान पर छः लोगों ने अपने घर से दूध ला कर, जमा कर के बरौनी स्थित सुधा डेयरी को बेचना शुरु किया। इससे पहले या तो ग्रामीणों का दूध गाँव में ही लोग ‘उठौना’ (प्रति दिन एक तय मात्रा में किसी के घर से ले जाना) खरीदते थे, या फिर ज्यादा है तो उससे घी बना लो, मट्ठा बना लो या फिर ग्वाले को उसके मन के दाम पर बेचो।
यानी, कोई निश्चित व्यवस्था नहीं थी। अमूल की तर्ज पर, डॉ कूरियन की दूरदर्शिता को आधार बना कर, सुधा डेयरी स्वयं को स्थापित करने लगती है। इस व्यवस्था में दूध की गुणवत्ता के आधार पर आपको पैसे मिलते थे। पैसे साप्ताहिक अंतराल पर मिलते थे। इसके साथ ही डेयरी ने किसानों को गायें खरीदने में आर्थिक मदद की। हर किसान ने एक-दो गायें खरीद लीं। धीरे-धीरे गाँव में दुग्ध उत्पादन बढ़ने लगा।
गाँव के ही मिल्क सेंटर पर, गाय के गर्भाधान से ले कर हर तरह की चिकित्सा आदि के लिए वैटनरी डॉक्टर उपस्थित होते थे। साथ ही, ग्रामीण किसानों को कृषि के क्षेत्र में भी आई नई तकनीकों, बीजों आदि की भी जानकारी दी जाती थी। कुछ ही समय में गाँव का मिल्क सेंटर लाभ कमाने लगा, जो किसानों की सहकारिता से चलने के कारण उन्हें भी मिलता था। फिर वहाँ अपना शीत गृह बन गया, अपनी बड़ी बिल्डिंग खड़ी हो गई, कम्प्यूटर लग गए।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा उत्कृष्टता का अवार्ड भी हमारे गाँव की डेयरी को मिला। आज के दौर में हर महीने तीस लाख रुपए किसानों को वितरित किए जाते हैं, यानी हर दिन एक लाख की दूध खरीदी जाती है। मैंने अपने गाँव और आस-पास के गाँवों को बिना किसी सरकारी सहायता के ऊपर उठते देखा है। किसानों की संस्था, किसानों का उत्पाद, पारदर्शिता के साथ काम और किसानों तक लाभ पहुँचना।
बात MSP की
एक तरफ, जहाँ अमूल द्वारा लाई गई क्रांति ने इसी देश में और भी सफल कंपनियों को जन्म दिया, स्वयं भी वैश्विक स्तर पर एक सफल कंपनी बनी, वहीं दूसरी तरफ हर स्तर पर सरकारी सहयोग मिलने वाली कृषि की हालत क्या है, वह किसी से छुपा नहीं। MSP की अवधारणा एक तय समय के लिए होना चाहिए थी, ताकि जब भारत आत्मनिर्भर हो जाए, तब किसान खुले बाजार में अपने उत्पाद बेच सकें और सरकार का मुँह न ताकें।
लेकिन, जैसा कि हर वोट बैंक के साथ होता है, आरक्षण की तरह ही यह नीति अपना लक्ष्य पूरा करने के बाद भी चलती रही। MSP देने का मतलब है कि आप बाजार के चलन में एक रुकावट या बदलाव लाना चाहते हैं। जैसे कि सड़क में अगर आप, एक जगह गड्ढा होने पर, या उसके टूट जाने पर, एक सहायक व्यवस्था बनाते हैं कि लोग किसी तरह लक्ष्य तक पहुँचें, लेकिन टूटी सड़क को भी सुधारने का काम करते रहते हैं, वैसे ही सरकार को यही करना चाहिए था, लेकिन सरकार ने दो सड़कें बना दीं।
आवश्यकता एक सड़क के सही तरह से काम करने की थी, आपने दो बना दिए, तो जाहिर है कि दो में से एक रास्ता लम्बा होगा, दोनों का रखरखाव करने में ज्यादा संसाधन जाएँगे और किसी को यह समझ में आ गया कि रास्ता तोड़ने पर उसकी घर की तरफ से भी सरकार वैकल्पिक रास्ता बना सकती है, तो वो जेसीबी ले कर मुख्य सड़क को तोड़ने पहुँच सकता है।
MSP के कारण कुछ ऐसा ही हुआ। अनाज की उपज कम थी, सरकार ने प्रोत्साहित किया ताकि वो अपने गोदाम भर सके, और समय पड़ने पर बाजार में अनाज की आपूर्ति कर सके। उदाहरण के लिए शुरू में आवश्यकता सौ टन की थी, और यहाँ सिर्फ 80 टन ही पैदावार हो रही थी। लेकिन इस पैदावार का मूल्य किसान तय करता था। अब सरकार ने कहा कि उसे 20 टन और चाहिए, तथा जो भी उपजाएगा उसे बिजली, खाद और सिंचाई में आर्थिक छूट के साथ, उसका अनाज खरीदने में भी मदद देगी।
इस चक्कर में उपजने लगा 120 टन। सरकार ने तो कहा था कि वो मदद देगी, लेकिन अब इस अतिरिक्त अनाज का सरकार क्या करेगी? या तो कम दाम में बेचेगी, या गरीबों वाली किसी योजना में इसे अडजस्ट करेगी, या फिर वैश्विक बाजार में निर्यात करेगी। इसके साथ दूसरी समस्या यह है कि अतिरिक्त पैदावार वाले अनाज एक ही गुणवत्ता के हों, यह भी संभव नहीं, लेकिन आपने न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की है, तो किसान कहेंगे कि ‘सरकार ने कहा था उपजाओ, अब हम कहाँ बेचें, हमें तो इतना पैसा मिलना ही चाहिए।’
अब सरकार के पास दो तरह के अनाज हैं, कम गुणवत्ता के और बेहतर गुणवत्ता के। गरीबों को खराब गुणवत्ता का दो, तो मीडिया पीछे पड़ेगी कि पंजाब में जब इतना अच्छा गेहूँ किसानों ने उपजाया तो सरकार ने उसका क्या किया? उसे निर्यात क्यों किया क्योंकि पहला हक तो भारतीय लोगों का है। ये तर्क भी सही है। दूसरी समस्या यह है कि खराब गुणवत्ता के अनाज को आप, निर्यात करेंगे भी तो कोई क्यों लेगा अगर उसके पास बेहतर गुणवत्ता का, आपसे कम दाम पर मिल जाए?
आपसे कम दाम पर बेहतर गुणवत्ता का अनाज किसी देश को इसलिए भी मिलेगा क्योंकि भले ही आपने ‘अपने देश के लोगों का पेट भरने के लिए प्रोत्साहन के तौर पर किसानों को बाजार से अलग मूल्य दिया’, लेकिन वही समस्या किसी और विक्रेता देश की नहीं होगी। तात्पर्य यह है कि दूसरे देश की लागत भी कम होगी, और गुणवत्ता भी अच्छी, तो आपका अनाज या तो कम दाम में बिकेगा या फिर गोदामों में रखा हुआ सड़ जाएगा।
MSP की व्यवस्था खुले बाजार के नियमों के विरोध में है
बजाय इसके कि किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्नत तकनीक और बीज आदि का सहयोग दिया जाए, जैसा कि अमूल ने किया, सरकार ने उन्हें अपने ऊपर आश्रित हो जाने का भरपूर मौका दिया। इसीलिए, एक जगह जहाँ सरकार ने मछली पकड़ना सिखाया, दूसरी जगह मछली पका कर देती रही। इस कहानी की नैतिक शिक्षा सबको पता है कि मछली पकड़ने वाला न सिर्फ अपनी भूख मिटा सकेगा, बल्कि वो ज्यादा पकड़ कर व्यापार भी कर पाएगा। वहीं, मछली खाने वाले के जीवन में जीभ के स्वाद के अलावा कुछ भी नहीं रहेगा।
बाजार का सीधा नियम है कि वह ‘माँग और आपूर्ति’ से चलता है, और उपभोक्ताओं के लिए मूल्य भी वहीं से तय होते हैं। बाजार के विधान में अगर सरकार हस्तक्षेप कर रही हो, तो उसके लिए कोई आपातस्थिति होनी चाहिए। जैसे कि कोविड के समय में सरकार ने अस्पतालों, बीमा कंपनियों और दवाई विक्रेताओं के लिए विशेष निर्देश तय किए क्योंकि यह महामारी का दौर है।
सत्तर के दशक में एक आपातस्थिति थी क्योंकि हमारे पास भूमि होते हुए भी पैदावार बहुत कम थी। इसलिए सरकार ने MSP के जरिए बाजार व्यवस्था में हस्तक्षेप किया। जब हम अनाज के मामले में माँग से ज्यादा पैदा करने लगे, तो जाहिर सी बात है कि मूल्य नीचे ही जाएगा। जब यह मूल्य नीचे जाने लगा, तो उन किसानों को सबसे ज्यादा समस्या हुई जो सरकार से हमेशा एक निश्चित मूल्य पाते थे, और सब्सिडी की बात तो ऊपर से थी ही।
दूसरी बात, सरकार अपने पास रखने के लिए तो अनाज खरीदती नहीं, वो तो उन इलाकों में भेजी जाएगी, जहाँ उसकी आवश्यकता है, लेकिन पैदावार नहीं। इसीलिए, सरकार ने इन अनाजों को (और अन्य कृषि उत्पादों को) ‘एसेंशियल कमोडिटी’ कह कर वर्गीकृत कर रखा था कि ये आवश्यक वस्तुएँ हैं, जिनका भंडारण हर कोई नहीं कर सकता। क्योंकि कहीं इसकी माँग हो, और किसी दूसरे राज्य में दस व्यापारियों ने मूल्य बढ़ाने के लिए उसकी आपूर्ति कम कर दी, तो समस्या हो जाएगी। अब पैदावार इतनी ज्यादा है कि इन वस्तुओं के भंडारण से सरकार को कोई आपत्ति नहीं, फिर भी अगर कोई व्यक्ति बाजारों को नियंत्रित या प्रभावित करने के लिए इस तरह का कार्य करता है, तो उसके लिए अलग कानून की भी व्यवस्था है।
इसके साथ ही, एक और विमा (आयाम) यह भी है कि मैं किसको बेचूँ या किससे खरीदूँ, यह सरकार तय नहीं कर सकती। यह मेरे व्यापार करने के मौलिक अधिकार के विरोध में है। दो लोग अपनी वस्तु को चाहे जिस मूल्य पर खरीदें या बेचें, इसमें सरकार को तीसरी पार्टी बनने की आवश्यकता नहीं है। अगर वह ऐसा करती है तो पूरी अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता है।
MSP की गारंटी क्यों नहीं दी जा सकती
यही कारण है कि सरकार MSP की गारंटी नहीं दे सकती। सरकार के पास भंडारण की क्षमता तो रहने दीजिए, अनाजों को खरीदने से ले कर गोदाम तक पहुँचाने में सही तकनीक नहीं है कि अनाज की बर्बादी रोकी जा सके। यही कारण है कि स्टेशनों के प्लेटफॉर्म हों या फिर आपके इलाके के FCI गोदाम, बोरियों से गिरते अनाज, चूहे, नालियाँ और सड़ते दानों का दृश्य प्रायः देखने को मिल ही जाता है।
ऐसे में, सरकार अगर MSP पर खरीदने की गारंटी देने लगे, तो फिर उतना अनाज वो रखेगी कहाँ? और, अगर सरकार स्वयं न खरीद सके, तो फिर कोई भी व्यापारी ज्यादा दाम में उसे क्यों खरीदेगा? आप ही सोचिए कि अगर आपके गाँव में गेहूँ 100 क्विंटल उपजा, खपत 70 की है, लागत प्रति क्विंटल ₹1000 की है, और MSP 1500 की, बगल के गाँव में भी सही पैदावार हो गई है, तो MSP पर खरीद कर व्यापारी बेचेगा कहाँ?
आपके पास खाने के लिए है, 30 क्विंटल अतिरिक्त है, बगल के गाँवों में आपने पता कर लिया कि पैदावार अच्छी है तो कहीं भी 1200 से ज्यादा मूल्य नहीं मिल रहा, फिर कोई भी व्यापारी आपको ज्यादा मूल्य क्यों देगा? सरकार ने कह दिया कि उसका तो भंडार भर गया है, और कानून बना दिया गया कि किसानों से जो भी गेहूँ खरीदेगा ₹1500 की ही दर से खरीदना होगा। ऐसे में आपको बेचना भी है, किसी को आपने राजी कर लिया कि वो बाजार के दर, यानी 1200 पर ही ले ले। बाद में आप ही ने उस पर केस कर दिया कि उसने कानून तोड़ा है तो व्यापारी क्या करेगा?
व्यापारी फिर गेहूँ खरीदना बंद कर देगा और कहीं और पैसा लगाएगा। इसलिए, एक सीमा के बाद सरकार बाजार के मूल्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। वैसे भी, न्यूनतम समर्थन राशि का मतलब यह नहीं है कि उतना मिलना ही चाहिए, बल्कि वह एक ऐसी संख्या है जिसके आस-पास लेन-देन होने की संभावना हो। इस संभावना से ऊपर उठने के लिए बाजार की आधारभूत बात, माँग और आपूर्ति (डिमांड और सप्लाय), केन्द्र में आती है। उपज ज्यादा होने पर सबके पास सामान है बेचने के लिए, और उसी कारण से उसकी माँग भी कम है, ऐसे में कोई जबरन ज्यादा मूल्य क्यों देगा?
मान लेते हैं कि सारी खरीद सरकार ने या फिर निजी संस्थाओं और व्यापारियों ने MSP के दर पर कर ली। अब यही गेहूँ या धान, आटा या चावल बनेंगे। उसके बाद इसके अन्य प्रोसेस्ड उत्पाद बनेंगे। चूँकि किसी की लागत ज्यादा है, तो आटे का मूल्य स्वतः बढ़ेगा, चावल और महँगा होगा। इनसे बनने वाली चीजें, जो हम और आप रेस्तराँ में खाते हैं, चिप्स आदि के रूप में खरीदते हैं, सबका मूल्य बढ़ेगा। इस कृत्रिम महँगाई को कैसे नियंत्रण में लाया जाएगा?
आप कहेंगे कि सरकार लाएगी। लेकिन सरकार भी तो हमारे ही पैसे लगाएगी। नब्बे प्रतिशत जनसंख्या जिस देश में या तो गरीब है, या बहुत ज्यादा गरीब है, वो क्या इस मूल्य पर आटा-चावल खरीद सकेगी? उनके लिए फिर सरकार को ही सब्सिडी या लाल कार्ड जैसी सुविधा देनी होगी। इस सब्सिडी के लिए बजट में प्रावधान करने होंगे। इस प्रावधान के कारण आपका फिस्कल डेफिसिट यानी वित्तीय घाटा और बढ़ेगा क्योंकि भारत बजट सरप्लस देश तो है नहीं कि तेल बेच कर घाटा कम कर लेगा।
साथ ही, ज्योंही आपके राष्ट्र में पैदावार का मूल्य वैश्विक बाजारों से ज्यादा होगा, यहीं के किसान निर्यात करने में कठिनाई में होंगे क्योंकि उनसे कम दाम पर कोई और सामान बेच रहा होगा। भारतीय कृषि उत्पादों का निर्यात, भारत के पूरे निर्यात में 11% है। यह एक बड़ा प्रतिशत है और इसका सीधा प्रभाव फोरेक्स रिजर्व पर पड़ेगा। तात्पर्य यह है कि MSP की गारंटी से महँगाई बढ़ेगी, निर्यात पर असर पड़ेगा, छोटे किसानों के उत्पाद गारंटी कानून के कारण घरों में सड़ जाएँगे, और भारत की अर्थव्यवस्था इससे हिल जाएगी।
अमूल सफल कैसे हुआ और MSP नाकाम कैसे हुई
अमूल की सफलता यही है कि उसने अपने तकनीकों में हमेशा सुधार किया। अगर गर्मियों में गाँव से दूध ले जाते समय रास्ते में फट जाता था, तो उसके लिए गाँवों में ही ‘शीत गृह’ बनवा दिए। गायों को बीमारी होगी, हर साल गर्भाधान कराया जाएगा, रोगों से बचाने के लिए दवाइयाँ दी जाएँगी, इसलिए स्थानीय स्तर पर मवेशी डॉक्टरों की व्यवस्था की। हरा चारा हर समय उपलब्ध नहीं हो पाएगा, अतः दाना, सरसों/तिलहन की खल्ली, मिक्सचर आदि की व्यवस्था भी कराई गई।
अमूल ने समय के साथ स्वयं को बदला और पालसन जैसी विदेशी संस्थाओं को यहाँ से भगाया। अमूल ने न तो विदेश से मवेशीपालक मँगवाए, न ही उनकी मार्केटिंग तकनीक अपनाई, न ही सरकार से हस्तक्षेप की माँग की, बल्कि लगातार तकनीकी संवर्धन और दुग्ध उत्पादकों को केन्द्र में रख कर नीतियाँ बनाईं, और न सिर्फ स्वयं एक कम्पनी के रूप सफल हुए बल्कि देश में डेयरी व्यवसाय में कई कम्पनियों के सामने एक आदर्श भी स्थापित किया।
वहीं, MSP एक वैकल्पिक व्यवस्था थी जिसे समय के साथ खत्म हो जाना चाहिए था। सरकार ने न सिर्फ MSP को बढ़ावा दिया बल्कि कुछ अनाज, आलू, प्याज, तिलहन और दलहन के भंडारण पर भी नियंत्रण रखा। इसका कुप्रभाव यह हुआ कि आपूर्ति की मात्रा छूने के बाद, सरकार के पास न सिर्फ भंडारण में समस्या आने लगी, बल्कि MSP की व्यवस्था के बाद भी, राजनैतिक मुद्दा यह बन गया कि किसानों को उसकी उपज के पैसे नहीं मिल रहे।
दूसरी बात यह है कि सरकार कुल 23 कृषि उत्पादों पर MSP जारी करती है जिसमें सात अनाज, पाँच दाल, सात तिलहन और चार व्यावसायिक फसलें हैं। फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) और राज्य सरकारें मंडियों के द्वारा किसानों से उनकी पैदावार खरीदती है। लेकिन आश्यर्चजनक बात यह कि सारे राज्यों को किसान अपनी सारी उपज या आनुपातिक उपज इन संस्थाओं को नहीं बेच पाते।
उदाहरण के लिए जहाँ पंजाब ने पूरे भारत के गेहूँ की सरकारी खरीद में 33% का योगदान देते हुए कुल 127 लाख मैट्रिक टन बेचा, वहीं बिहार ने महज 10,000 मैट्रिक टन का योगदान दिया। यह योगदान लगभग 0.02% के आस-पास आता है। अब बात यह है कि क्या बिहार का किसान उपेक्षित नहीं है? या फिर पंजाब के किसानों के गेहूँ की गुणवत्ता अच्छी है, और वहाँ उपज ज्यादा है? या, उनके यहाँ से FCI और मंडियों की तालमेल अच्छी है?
किसानों को सरकारों ने MSP के चक्कर में कुछ खास फसलों को ही उपजाने को प्रोत्साहित कर दिया है, जिससे उनका ध्यान वहाँ से अलग नहीं हो पाता। साथ ही, सरकार ने अपना लक्ष्य हासिल करने के बाद भी MSP को निरंतर बनाए रखा, और लोगों को दूसरी फसलों या वैकल्पिक व्यवस्थाओं की तरफ मोड़ने के भी उपाय नहीं किए। मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, इंटीग्रेटेड फार्मिंग, ऑर्गेनिक फार्मिंग की तकनीकों के बारे में दस गाँव में एक व्यक्ति मिलता है जिसे कुछ पता हो।
अमूल ने तकनीक को अपने ही स्तर से गाँव तक पहुँचाया, यहाँ सरकारों ने कृषि के क्षेत्र में हो रहे अनुसंधानों को किसानों तक नहीं पहुँचाया। अमूल ने दूध से मक्खन, घी, पेड़ा, छाछ, मसाला छाछ, आइसक्रीम, चॉकलेट आदि के बाजारों में पैठ बनाई, MSP वाला किसान तब भी गेहूँ उपजा रहा था, आज भी वही कर रहा है। फूड प्रोसेसिंग की छोटी ईकाईयों के लगाने की बात हाल में शुरु भी हुई है, लेकिन पहले तो किसान की लोन माफी के अलावा सरकारों को कुछ सूझता ही नहीं था।
लोन माफी हो या फिर MSP की बात, ये लम्बे समय के लिए असफल योजनाएँ हैं। इससे वोट बैंक बना रह सकता है, लेकिन किसानों की जीवनशैली नहीं सुधरने वाली। किसानों के बैंक अकाउंट में रोपाई की शुरुआत में कुछ पैसे भेजना एक बेहतर विकल्प है क्योंकि किसान उससे बीज आदि खरीद सकता है, जिसके लिए उसे कहीं और से ऋण लेना पड़ता है। फसल बीमा योजना भी सही शुरुआत है लेकिन मैंने जहाँ भी किसानों से बात की है, उसकी असफलता के किस्से ज्यादा मिले हैं।
सरकारों को ‘इनेब्लर’, यानी संबल की भूमिका निभानी चाहिए न कि वैसे पिता की जिसके स्नेह के चक्कर में बच्चा इतना चॉकलेट खाता है कि उसके सारे दाँत झड़ जाते हैं, और फिर नए दाँत बनवाने में और भी पैसे लगते हैं, पारिवारिक दर्द सहना पड़ता है, वो अलग। रोपाई से पहले सहायता पहुँचाना छोटे किसानों को सक्षम बनाना है, न कि यह सुनिश्चित करना कि रोपने के भी पैसे हम देंगे और कोई नहीं खरीदेगा तो हम खरीदेंगे। यहाँ सरकार पैसे दे रही है, न कि यह कह रही है कि इस पैसे का गेहूँ रोप लो, बाद में हम ले लेंगे।
बदलते समय के साथ कृषि क्षेत्र में जिन सुधारों की आवश्यकता है, उसमें से MSP की गारंटी एक नहीं है। यहाँ उच्च तकनीक, बाजार की माँग के अनुपात में (और उसकी माँग की विविधता में कि बस तीन ही चीजों की खेती न कर रहे हों) खेती करना, स्थानीय स्तर पर भंडारण और प्रोसेसिंग की लघु ईकाईयों का निर्माण करना, आपदाओं की स्थिति में किसानों की आर्थिक सहायता करना आदि वो बिन्दु हैं जिन पर सरकारों को आगे बढ़ना चाहिए।
सरकार बाजार को नियंत्रित नहीं कर सकती क्योंकि बाजार खुला हुआ है। बाजार अपने मूल्य तय करेगा, अपनी गुणवत्ता सुनिश्चित करेगा ताकि प्रतिस्पर्धा बढ़े, लोग यह समझें कि किस फसल की खेती में किस तरह के लाभ हैं, सरकारों से नई तकनीक सीखने की सहायता माँगे। अन्यथा, हम उसी वृत्त में घूमते रह जाएँगे जहाँ भले ही मिथिला क्षेत्र में मछली की माँग बहुत है, बिहार में तालाब के लिए जमीन भी बहुत है, लेकिन वहाँ का किसान गेहूँ उपजा कर कम दाम पर बेचता रहता है, लेकिन अपने खेत में तालाब नहीं खोदता कि मत्स्य पालन कर सके, और मछली आंध्र प्रदेश की खाता है।
मुस्लिम वोटर्स ममता की जागीर नहीं, वो अपना घर सँभाले: BJP से पैसे लेने के आरोप पर औवैसी का पलटवार
पश्चिम बंगाल के अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के चुनावी दंगल में AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की भी एंट्री हो गई है। असदुद्दीन ओवैसी ने बंगाल विधानसभा चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं, जिसके बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन पर निशाना साधा। ममता बनर्जी ने अपने एक बयान में ओवैसी की पार्टी की ओर इशारा करते हुए बयान दिया था कि भाजपा मुस्लिम वोट बाँटने के लिए हैदराबाद से एक पार्टी लाने के लिए करोड़ों खर्च कर रही है।
अब असदुद्दीन ओवैसी ने ममता बनर्जी को जवाब दिया है और कहा, “मुझे पैसों से खरीदने वाला आज तक कोई पैदा नहीं हुआ। ममता बनर्जी के आरोप निराधार हैं, उन्हें अपने घर के बारे में फिक्र होनी चाहिए। उनकी पार्टी के कई लोग बीजेपी में जाना शुरू कर चुके हैं। उन्होंने बिहार के मतदाताओं और हमारे लिए वोट करने वाले लोगों का अपमान किया है।” ओवैसी ने कहा कि मुस्लिम वोटर्स ममता बनर्जी की जागीर नहीं हैं।
Never was a man born who can buy Asaduddin Owaisi with money. Her allegation is baseless and she is restless. She should worry about her own home, so many of her people are going to BJP. She has insulted the voters of Bihar and the people who voted for us: Asaduddin Owaisi, AIMIM https://t.co/mT1fe7piii pic.twitter.com/8rfWq5eSk3
— ANI (@ANI) December 16, 2020
बता दें कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार (दिसंबर 15, 2020) AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी पर गंभीर आरोप लगाए। जलपाईगुड़ी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि अल्पसंख्यकों के वोटों को बाँटने के लिए उन्होंने (BJP) हैदराबाद की एक पार्टी को चुनावी मैदान में उतारा है। टीएमसी प्रमुख ने आरोप लगाया कि भाजपा उन्हें पैसे देती है और वे इस पैसे को बाँटते हैं, यही बिहार विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला था।
To divide minority votes they have caught hold of a party from Hyderabad, BJP gives them money and they are dividing votes. Bihar election has proved it: West Bengal CM Mamata Banerjee in Jalpaiguri, earlier today pic.twitter.com/P9PWMVDJJh
— ANI (@ANI) December 15, 2020
ममता बनर्जी ने कहा कि भाजपा असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को बंगाल में लाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि ऐसा करके भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना चाहती है और हिंदू-मुस्लिम वोट आपस में बाँटना चाहती है।
उल्लेखनीय है कि TMC के दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी ने आज (दिसंबर 16, 2020) विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। बुधवार शाम को बंगाल विधानसभा पहुँचे शुभेंदु अधिकारी ने स्पीकर के ना होने पर सचिवालय को अपना इस्तीफा सौंपा दिया। खबरों के अनुसार, अधिकारी जल्द ही बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। शुभेंदु का यह इस्तीफा आने वाले पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव को मद्देनजर ममता सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
वहीं तृणमूल कॉन्ग्रेस के बागी विधायक जितेंद्र तिवारी ने भी खुलेमाम पार्टी छोड़ने की धमकी दी है। दुर्गापुर में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने पूछा कि आखिर लोग कब तक डर में जीते रहेंगे? आसनसोल नगर निगम के बोर्ड ऑफ एडमिनिस्ट्रेटर के अध्यक्ष तिवारी ने कहा, “एक न एक दिन हमें निर्णय लेना ही होगा कि क्या करना है? मैंने सोच लिया है कि अगर जरूरत पड़ी तो मैं (पार्टी) छोड़ दूँगा, लेकिन लोगों के साथ बना रहूँगा।”
किसान आंदोलन में शामिल संत राम सिंह की गोली लगने से मौत: सुसाइड नोट मिलने के बाद जाँच में जुटी दिल्ली पुलिस
नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन जारी है। इस बीच खबर आ रही है कि सिंघु बार्डर पर किसानों के धरने में शामिल संत राम सिंह ने खुद को कथित तौर पर गोली मार ली है, जिससे उनकी मौत हो गई है। बाबा राम सिंह करनाल के रहने वाले थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक पंजाबी में लिखा एक सुसाइड नोट भी छोड़ा है। बताया जा रहा है कि संत राम सिंह दिल्ली बॉर्डर पर किसानों को कंबल बाँटने गए थे।
#FarmerProtest
— Rajesh poddar (@Rajeshpoddar00) December 16, 2020
सिंघु बॉर्डर पर किसान आंदोलन में आए संत बाबा राम सिंह, नानकसर सिंगरा ने एक सुसाइड नोट लिखकर अपने आप को गोली मार ली , अस्पताल में हुई मौत@NBTDilli @gulshanNBT @AshishXL pic.twitter.com/KHZwLpOEWc
बताया जा रहा है कि मृतक राम सिंह ने प्रदर्शन के दौरान कुंडली बॉर्डर पर गाड़ी में बैठकर कर पिस्टल से खुद को गोली मारी। जिसके बाद वहाँ मौजूद लोगों ने उन्हें पानीपत के पार्क अस्पताल ले गए, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उन्होंने सुसाइड नोट में किसान आंदोलन का जिक्र करते हुए किसानों के हक की बात कही है।
संत बाबा राम सिंह हरियाणा एसजीपीसी के नेता थे। पीटीसी न्यूज के अनुसार, सुसाइड नोट में बाबा राम सिंह ने लिखा है कि वे किसानों की हालत नहीं देख सकते हैं। उन्होंने लिखा कि केंद्र सरकार विरोध को लेकर कोई ध्यान नहीं दे रही है, इसलिए वे किसानों, बच्चों और महिलाओं को लेकर चिंतित हैं। फिलहाल पुलिस मामले की जाँच में जुटी है। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने खुदकुशी पर दुख जाहिर किया है।
दिल बहुत दुखी है आप को ये बताते हुए कि संत राम सिंह जी सिंगड़े वाले ने किसानों की व्यथा को देखते हुए आत्महत्या कर ली। इस आंदोलन ने पूरे देश की आत्मा झकझोर कर रख दी है। मेरी वाहेगुरु से अरदास है कि उनकी आत्मा को शांति मिले
— Manjinder Singh Sirsa (@mssirsa) December 16, 2020
आप सभी से संयम बनाकर रखने की विनती ?? pic.twitter.com/DyYyGmWgGg
बाबा राम सिंह ने सुसाइड नोट में लिखा है, “किसानों का दुख देखा, वो अपने हक लेने के लिए सड़कों पर हैं। बहुत दिल दुखा है। सरकार न्याय नहीं दे रही। जुल्म है, जुल्म करना पाप है, जुल्म सहना भी पाप है। और उसे बर्दाश्त करना भी पाप है, मैं किसान भाइयों से कहना चाहता हूँ कि मैं इस स्थिति को देख नहीं पा रहा हूँ।”
सुसाइड नोट में आगे लिखा है, “किसी ने किसानों के हक में और जुल्म के खिलाफ अपने सम्मान लौटाए किसी ने पुरस्कार वापस किया। आज मैं किसानों के हक में और सरकारी जुल्म के रोष में आत्महत्या करता हूँ। यह ज़ुल्म के खिलाफ आवाज है और किसान के हक में आवाज है। वाहेगुरु जी का खालसा ते वाहेगुरु जी की फतेह।”
ममता सरकार को जोर का झटका: TMC के दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी ने विधायक पद से भी दिया इस्तीफा
TMC के दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी ने आज (16 अक्टूबर, 2020) विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। बुधवार शाम को बंगाल विधानसभा पहुँचे शुभेंदु अधिकारी ने स्पीकर के ना होने पर सचिवालय को अपना इस्तीफा सौंपा दिया। खबरों के अनुसार, अधिकारी जल्द ही बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। शुभेंदु का यह इस्तीफा आने वाले पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर ममता सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
#UPDATE: TMC leader Suvendu Adhikari tenders his resignation from the membership of West Bengal Legislative Assembly. https://t.co/R8LU5ERFGW
— ANI (@ANI) December 16, 2020
बता दें अधिकारी पिछले कुछ समय से ममता सरकार से खफा चल रहे हैं। वह परिवहन मंत्री के पद से पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं। वहीं अब उन्होंने विधानसभा की सदस्यता भी छोड़ दी है। वहीं भाजपा ने शुभेंदु अधिकारी के इस फैसले का स्वागत किया है।
शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे पर बीजेपी महासचिव मुकुल रॉय ने आज कहा, “जिस दिन शुभेन्दु अधिकारी ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया था, मैंने कहा था कि अगर वह टीएमसी छोड़ देंगे तो मुझे खुशी होगी और हम उनका स्वागत करेंगे। आज उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है और मैं उनके फैसले का स्वागत करता हूँ।”
Trinamool Congress (TMC) is collapsing like a house of cards. Everyday someone from the party comes to us to join our party: BJP Vice President Mukul Roy. https://t.co/CPo2MIIywi
— ANI (@ANI) December 16, 2020
भाजपा नेता मुकुल रॉय ने कहा, ”तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ताश के पत्तों की तरह ढह रही है। पार्टी (टीएमसी) से रोज कोई न कोई हमारी पार्टी में शामिल होने के लिए आता है।”
गौरतलब है कि इससे पहले मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी जल्द ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होंगे। रिपोर्ट्स का कहना है कि इस सप्ताह वो अपने राजनीतिक भविष्य की अटकलों पर विराम लगाते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा में शामिल होंगे।
News 18’ से बातचीत करते हुए भाजपा उपाध्यक्ष मुकुल रॉय ने कहा था, “शुभेंदु अधिकारी पर फैसला हो गया है। 2 या 4 दिन में पार्टी में शामिल होंगे। सारी बातें लगभग हो चुकी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कितना भी दौरा कर लें, लेकिन वह और टीएमसी जीतेगी नहीं। सीएम कितना भी प्रचार करें, नतीजा जीरो ही रहने वाला है। ये छूटने की कोशिश है, दौरा नहीं है।”
वहीं इससे पहले शुभेंदु अधिकारी ने स्थानीय और बाहरी लोगों के संबंध में चल रही बहस को लेकर तृणमूल कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अन्य राज्यों से आने वाले लोगों को बाहरी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि वह पहले भारतीय हैं और फिर बंगाली हैं। उन्होंने तृणमूल कॉन्ग्रेस नेतृत्व की भी आलोचना करते हुए कहा था कि वह लोगों की अपेक्षा पार्टी को अधिक महत्व दे रहा है।
दिग्गी राजा ने विंध्य की धरा को सूखा रखा अब बना है हमदर्द, तुमने पाप किया है प्रायश्चित करो: CM शिवराज ने लगाई कॉन्ग्रेस की क्लास
किसान आंदोलन को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्षी पार्टियों के बीच बहस बढ़ती जा रही है। इसी बीच कॉन्ग्रेस में कई नेताओं ने किसानों के साथ भूख हड़ताल करने का ऐलान कर दिया है। वहीं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिग्विजय सिंह और कमलानाथ के भूख हड़ताल करने और राहुल गाँधी के कृषि कानूनों का विरोध करने पर पलटवार किया है।
मध्यप्रदेश के रीवा में एक किसान सम्मेलन के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि राहुल गाँधी किस आधार पर कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। क्या वो किसानी की समझ रखते हैं? क्या वो जानते हैं कि खेती कैसी होती है? क्या वो मकई का पौधा लगाने का सही तरीका बता सकते हैं? उन्हें क्या पता की भुट्टा इधर से लगता है या उधर से और किसानों की बात कर रहे हैं।
<#WATCH: “On what ground is Rahul Gandhi protesting farm laws. Does he understand anything about farmers? Does he know what farming is? Can he even tell the correct orientation to sow a corn plant?” says MP CM Shivraj Singh Chouhan, at Kisan Sammelan in Rewa, Madhya Pradesh https://t.co/eCEmo1fzqv pic.twitter.com/KUepU02g5h
— ANI (@ANI) December 16, 2020
शिवराज सिंह ने रैली को संबोधित करते हुए कहा कि क्या कॉन्ग्रेस के राज में कभी किसानों के खातों में पैसे आते थे? शिवराज सिंह चौहान ने राहुल गाँधी पर हमला करते हुए बोला कि सौ-सौ चुहे खाकर अब बिल्ली हज को जा रही है। इसके अलावा शिवराज सिंह चौहान ने दिग्विजय सिंह और कमलनाथ पर भी हमला बोला है।
#WATCH | हमने सुना है कि दिग्विजय और कमलनाथ उपवास करने वाले हैं, वो भी किसानों के साथ हुए अन्याय के लिए…अरे तुमने तो पाप किया है प्रायश्चित करो, भूखे रहो लेकिन प्रायश्चित करने के लिए रहो: रीवा में आयोजित किसान सम्मेलन में म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान pic.twitter.com/PGuxtF8XQK
— ANI_HindiNews (@AHindinews) December 16, 2020
शिवराज सिंह ने कहा, “हमने सुना है कि दिग्विजय और कमलनाथ उपवास करने वाले हैं, वो भी किसानों के साथ हुए अन्याय के लिए…अरे तुमने तो पाप किया है प्रायश्चित करो, भूखे रहो लेकिन प्रायश्चित करने के लिए रहो ना कि किसान के समर्थन में भूख हड़ताल पर रहो।”
शिवराज सिंह ने दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और कॉन्ग्रेस पार्टी पर आरोप लगाते हुए कहा कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के दौरान आप लोगों ने किसानों का काफी नुकसान किया है, जिसका आपको प्रायश्चित करना चाहिए। इसलिए प्रायश्चित के तौर पर आपको भूख हड़ताल करनी चाहिए।
NCC ग्राउंड, रीवा में आयोजित #KisaanSammelan #AatmaNirbharKrishi https://t.co/JCScji1Rcu
— Office of Shivraj (@OfficeofSSC) December 16, 2020
शिवराज सिंह ने कहा, “10 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे दिग्गी राजा ने मध्य प्रदेश की सूखी धरती की प्यास नहीं बुझाई, 10 वर्षों तक विंध्य कि धरा को प्यासा रखा, अब खुद को किसान का हमदर्द बता रहे हैं। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने तो फसल बीमा योजना का 24 सौ करोड़ रुपए का प्रीमियम तक नहीं जमा किया था। जिसके कारण किसानों को फसल बीमा योजना का लाभ नहीं मिल पाया। कमल नाथ और दिग्गी राजा कहते हैं कि वह उपवास करेंगे, मैं आपको बताना चाहता हूँ कि वो अपने अपने गुनाहों कि माफी माँगेंगे।”
सीएम शिवराज ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी देश की इकलौती पार्टी है जो किसानों के हितों का ध्यान रखती। उन्होंने यह साफ किया है की देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किसान हित में जो निर्णय लिए गए वह अभूतपूर्व निर्णय हैं। चाहे वो प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की बात हो या फिर किसानों को अपनी फसल बेचने की स्वतंत्रता। मैं इस मंच से यह विश्वास दिलाता हूँ कि इस कानून के बाद भी मंडियाँ बंद नहीं होंगी, किसान की मर्जी पर निर्भर है वह व्यापारी को डायरेक्ट अनाज बेच सकता है, वह तो चाहे मंडी में अनाज बेचे चाहे। वह समर्थन मूल्य पर अनाज की बिक्री करें यह किसान की मर्जी उन्होंने कहा कि किसान मेरे लिए सर्वोपरि हैं।
इससे पहले मध्य प्रदेश के उज्जैन में आयोजित किसान सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसान आंदोलन का समर्थन कर रही कॉन्ग्रेस पार्टी और इसके नेता राहुल गाँधी पर जमकर निशाना साधा था। शिवराज ने राहुल गाँधी पर तंज कसते हुए कहा था कि उन्हें यह भी पता नहीं भिंडी कैसे उगती है। शिवराज ने कहा कि कृषि कानूनों का विरोध वे लोग कर रहे हैं, जिनका खेती से कोई सरोकार नहीं है। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री का नाम सुनते ही उन्हें पसीना आने लगता है। इसलिए किसानों के कंधों पर बंदूक रखकर चला रहे हैं।
किसानों के खाते में डालेंगे 1600 करोड़
गौरतलब है कि कैबिनेट मीटिंग के दौरान सीएम शिवराज ने यह घोषणा की थी कि 18 दिसंबर को किसानों के खाते में 1600 करोड़ रुपए डाले जाएँगे। यह कुल राहत राशि का एक हिस्सा है। यह इसी साल हुई सोयाबीन आदि फसलों के नुकसान का पैसा है। सीएम ने किसानों से कहा है कि एक किश्त अभी देंगे और बाद में दूसरी किश्त भी देंगे। तब तक फसल बीमा योजना की राशि भी आ जाएगी।
सिर्फ 8 महीने में योगी सरकार ने दिया 26 लाख से अधिक लोगों को रोजगार, लॉकडाउन में बनाई योजना साबित हुई कारगर
लॉकडाउन के दौरान जब लगभग हर राज्य की सरकारें राजस्व की समस्या पर हताश हो रही थीं उस समय यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार वाकई आपदा में अवसर खोजने के लिए प्रयासरत थी। अब उन्हीं कोशिशों का नतीजा है कि सरकार ने मात्र 8 माह में 26 लाख 62 हजार 960 लोगों को रोजगार मुहैया करवाने में सफलता पाई है।
राज्य सरकार के प्रवक्ता ने बताया है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एक जिला-एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना रोजगार मुहैया कराने में गेम चेंजर साबित हुई। उन्होंने कहा कि देश और प्रदेश में लॉकडाउन लागू होते ही छोटे-बड़े सभी उद्योग तो करीब करीब बंद हो गए थे और श्रमिकों का पलायन भी शुरू हो गया था।
प्रवक्ता का कहना है कि यही सब देखते हुए बीती 4 मई को सीएम योगी ने अपने आवास पर उच्चाधिकारियों के साथ बैठक की थी और दूसरे प्रदेशों से यूपी लौट रहे मजदूरों व अन्य लोगों के लिए राज्य में ही रोजगार के अवसर प्रदान करने का निर्देश दिया था।
इसके बाद एक कार्य योजना को तैयार किया गया और उसी पर अमल करते हुए 8 महीनों में आत्मनिर्भर पैकेज के जरिए 6,65,740 नई इकाइयों में 26,62,960 लोगों को रोजगार मिला। इनमें से 2,57,348 श्रमिक ऐसे हैं, जिन्हें पहले से चल रही इकाइयों में ही रोजगार दिया गया।
लाखों श्रमिकों को MSME (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग) सेक्टर में आत्मनिर्भर पैकेज से सर्वाधिक रोजगार मिला। इतना ही नहीं सीएम के निर्देश पर तैयार किए गए सेवायोजन पोर्टल के जरिए भी 13 दिसंबर तक 5,25,978 लोगों को रोजगार मिला।
बता दें कि उत्तर प्रदेश में रोजगार देने के लिए प्रतिबद्ध योगी आदित्यनाथ सरकार की कोशिशों की तारीफ कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट भी कर चुका है। यूपी सरकार ने बीते दिनों 4 साल में लगभग चार लाख लोगों को नौकरी और रोजगार देने का अनोखा रिकॉर्ड भी अपने नाम किया है। और अब सूचना है कि योगी सरकार ने आत्मनिर्भर पैकेज के तहत 4,24,283 पुरानी इकाइयों को 1,092 करोड़ रुपए का लोन देकर पुराने रोजगार बचाए रखा।
सरकारी प्रवक्ता के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार के इस प्रयास के कारण देशभर में उनकी सराहना हो रही है। कहा जा रहा है कि योगी सरकार ने छोटे उद्योगों से रोजगार देने का बड़ा लक्ष्य साधा है और इसी मॉडल को देश के अन्य राज्यों में भी लागू किया जाना चाहिए।
Fact Check: सरकार ने भारतीय रेलवे अडानी को बेच दिया? प्रियंका गाँधी के फर्जी दावे की फिर खुली पोल
किसानों ने कृषि बिल वापसी को लेकर आंदोलन तेज कर दिया है। उनका आरोप है कि सरकार देश के बड़े-बड़े उघोगपतियों, जैसे- अडानी और अंबानी को फायदा पहुँचाने के लिए नए कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था और मंडियाँ खत्म की तैयारी में है, जिससे वे कॉरपोरेट की दया पर निर्भर रह जाएँगे। तो वहीं, दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस किसान आंदोलन के बहाने लगातार राजनीति करने में जुटी हुई है।
साथ ही, कॉन्ग्रेस लगातार मोदी सरकार को घेरने के लिए सोशल मीडिया के जरिए किसानों में भ्रम फैलाने की कोशिश भी कर रही है। इसी बीच सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। जिसमें दावा किया जा रहा है कि भारतीय रेलवे अडानी ग्रुप को बेच दी गई है। इस वीडियो को कॉन्ग्रेस नेता ने अपने ट्विटर हैंडल से शेयर किया है।
भारतीय रेल पर अदानी के फ़्रेश आटे का विज्ञापन देखने लायक़ हैं। अब तो दावे के साथ कह सकते है की किसानों की लड़ाई सत्य के मार्ग पर हैं। pic.twitter.com/WB97kaG6Fe
— Hardik Patel (@HardikPatel_) December 12, 2020
कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने गुजरात कॉन्ग्रेस के नेता हार्दिक पटेल के ट्वीट को रिट्वीट किया है। जिसमें कॉन्ग्रेस के नेता हार्दिक पटेल ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, “भारतीय रेल पर अडानी के फ़्रेश आटे का विज्ञापन देखने लायक हैं। अब तो दावे के साथ कह सकते है कि किसानों की लड़ाई सत्य के मार्ग पर है।”

वहीं प्रियंका गाँधी ने फेसबुक पर वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “जिस भारतीय रेलवे को देश के करोड़ों लोगों ने अपनी मेहनत से बनाया। भाजपा सरकार ने उस पर अपने अरबपति मित्र अडानी का ठप्पा लगवा दिया। कल को धीरे-धीरे रेलवे का एक बड़ा हिस्सा मोदी के अरबपति मित्रों को चला जाएगा। देश के किसान खेती-किसानी को भी आज मोदी के अरबपति मित्रों के हाथ में जाने से रोकने की लड़ाई लड़ रहे हैं।”

सोशल मीडिया के जरिए केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ भ्रम फैलाने की कोशिश में लगी कॉन्ग्रेस पार्टी की खुद ही पोल खुल गई है। ट्विटर पर कॉन्ग्रेस द्वारा फैलाए जा रहा ये वीडियो एकदम गलत साबित हुआ है और केंद्र सरकार द्वारा भारतीय रेलवे को अडानी ग्रुप को बेचने वाली खबर फेक निकली।
Through a video on Facebook, it is being claimed that the Government of India has put stamps of a private company on the trains. This claim is misleading, this is is just a commercial advertisement with the aim of improving ‘non-rental revenue’: Press Information Bureau (PIB) pic.twitter.com/OUG4vSFEft
— ANI (@ANI) December 16, 2020
प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने इस दावे का खंडन करते हुए कहा कि यह दावा भ्रामक है। यह केवल एक वाणिज्यिक विज्ञापन है, जिसका उद्देश्य केवल ‘गैर किराया राजस्व’ (NFR) को बेहतर बनाना है। वहीं कॉन्ग्रेस की पोल खुलने के बाद लोगों ने ट्विटर पर प्रियंका गाँधी और हार्दिक पटेल की जमकर खरी खोटी सुनाई।
गौरतलब है कि प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया था कि उनके निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में पिछले 5 सालों में केवल 15 किलोमीटर की एक सड़क लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डे से वाराणसी शहर के लिए बनी है, उसके अलावा कोई सड़क ही नहीं बनी है। हमने इसका फैक्ट-चेक किया जिसमें कुल 60 सेकेंड के भीतर ही उनके इस दावे की कलई खुल गई।

