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ऑपइंडिया इम्पैक्ट: 1.4 लाख नौकरियों के लिए रेलवे की परीक्षाएँ शुरू

भारतीय रेलवे (RRB) ने विभिन्न विभागों में लगभग 1.4 लाख रिक्त पदों को भरने के लिए मेगा भर्ती अभियान चलाने की घोषणा की है। केंद्रीय रेलवे मंत्री पियूष गोयल ने ट्वीट के जरिए इसकी जानकारी देते हुए लिखा है, “भारतीय रेल विभिन्न श्रेणियों की 1.4 लाख रिक्तियों में भर्ती हेतु एक बड़ा अभियान चला रहा है, जिसकी परीक्षाएँ शुरू हो चुकी हैं। सभी परीक्षार्थियों को मेरी ओर से शुभकामनाएँ, तथा मेरा आग्रह है कि COVID के चलते सभी दिशा निर्देशों का पालन अवश्य करें।”

ऑपइंडिया ने प्रमुखता से उठाया था रेलवे भर्तियों का मुद्दा

उल्लेखनीय है कि कोरोनाकाल में जब कोई मीडिया संस्थान इस सम्बन्ध में बात नहीं कर रहा था तब रेलवे विभाग एवं सरकारी भर्तियों के विषय को ऑपइंडिया ने सख्ती से उठाया था। इसके फ़ौरन बाद मंत्रालय ने सामने आ कर इस पर न सिर्फ अपना पक्ष रखा, बल्कि परीक्षाओं का आश्वासन भी दिया था।

भारतीय रेल अपने 21 रेलवे भर्ती बोर्डों (आरआरबी) के माध्यम से तीन चरणों में मेगा भर्ती अभियान का आयोजन कर रहा है, जो दिसंबर 15, 2020 से शुरू होगा। लगभग 1.4 लाख रिक्त पदों को भरने के लिए आयोजित किए जाने वाले इस भर्ती अभियान में 2.44 करोड़ से अधिक उम्मीदवार देश के विभिन्न शहरों में परीक्षा में शामिल होंगे। विभाग द्वारा परीक्षा आयोजित करने की तैयारियाँ की जा रही हैं।

सीईएन 03/2019 (पृथक और मंत्रिस्तरीय श्रेणियाँ) के लिए परीक्षा का पहला चरण दिसंबर 15, 2020 से शुरू होकर 18 दिसंबर तक चलेगा। इसके बाद सीईएन 01/2019 (एनटीपीसी श्रेणियाँ) की परीक्षा दिसम्बर 28, 2020 से शुरू होकर संभवतः मार्च, 2021 तक चलेगी। सीईएन नंबर आरआरसी – 01/2019 (स्तर -1) के लिए तीसरी भर्ती परीक्षा संभवतः अप्रैल, 2021 से जून, 2021 के अंत तक आयोजित की जाएँगी।

अभ्यर्थियों के लिए ‘परीक्षा ट्रेन’

मंत्रालय का कहना है कि आरआरबी ने COVID-19 महामारी को ध्यान में रखते हुए बड़े पैमाने पर परीक्षा आयोजित करने के लिए व्यापक तैयारी की है और इसके लिए सरकार द्वारा जारी एसओपी का पालन किया जाएगा। परीक्षा के आयोजन में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन, मास्क और सैनिटाइज़र का आवश्यक उपयोग, और प्रतिदिन केवल दो पालियों में परीक्षा आयोजित करना आदि सुनिश्चित किया गया है।

इसके अलावा, RRB प्रयास कर रहा है कि अभ्यर्थियों को उनके गृह राज्य में ही समायोजित किया जाए, ताकि वे रातभर यात्रा कर अपने परीक्षा केंद्रों तक पहुँच सकें। परीक्षाओं और आवागमन की सुविधा को ध्यान में रखते हुए रेलवे द्वारा ‘परीक्षा ट्रेन’ चलाई जाएँगी।

कर्नाटक iPhone फैक्ट्री में लूट: SFI का स्थानीय अध्यक्ष गिरफ्तार, भाजपा सांसद ने लगाए गंभीर आरोप

भारत में आईफोन (iPhone) बनाने वाली कंपनी ‘Wistron Corporation’ की फैक्ट्री में शनिवार (दिसंबर 12, 2020) को जम कर हंगामा और तोड़-फोड़ हुआ था। कर्मचारियों और मजदूरों द्वारा किए गए इस हंगामे के कारण कंपनी को 437.4 करोड़ रुपए की हानि हुई थी। इस घटना को लेकर बड़ी ख़बर सामने आई है। इस मामले में एसएफ़आई (स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया) के स्थानीय अध्यक्ष को गिरफ्तार किया गया है। 

दरअसल भाजपा सांसद एस मुनिस्वामी ने आरोप लगाया था कि इस घटना के पीछे एसएफ़आई का हाथ है। इसके बाद कोलार में एसएफ़आई तालूक अध्यक्ष कॉमरेड श्रीकांत को गिरफ्तार किया गया

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) कर्नाटक ने एसएफ़आई नेता की गिरफ्तारी पर ट्वीट करते हुए लिखा, “एप्पल (Apple) प्लांट में हुई हिंसा के पीछे वामपंथी स्टूडेंट विंग एसएफ़आई का हाथ है: कोलार सांसद। दंगों के संबंध में स्थानीय एसएफ़आई नेता की गिरफ्तारी हुई है। वामपंथी विचारधारा हमेशा विध्वंस और सामाजिक समरसता बिगाड़ने का प्रयास करती रही है।”      

पुलिस ने बताया कि श्रीकांत ने ही विरोध वाले वॉट्सऐप मैसेज को कथित तौर पर लिखा, उसे फैलाया। यह मैसेज Wistron Corporation के कर्मचारियों में बहुत तेजी से फैला। इसके बाद ही हिंसा भड़की।

कर्नाटक के कोलार में स्थित भारत में आईफोन बनाने वाली फैक्ट्री में तोड़-फोड़ और उसमें वामपंथी ऐंगल सामने आने से यह मामला चीन के लिए भी खास रहा। चीन ने इस मामले में पूरी दिलचस्पी ली।  

दरअसल, इस पूरे तोड़फोड़ का कारण कर्मचारियों को वेतन समय पर न देने को बताया गया और यही आरोप लगा कर ‘Wistron Corporation’ की फैक्ट्री में इस घटना को अंजाम दिया गया था। ये कंपनी Apple की वैश्विक निर्माता कॉन्ट्रैक्टर्स में से एक है। ये iPhone 7 के साथ-साथ SE के सेकेण्ड जनरेशन के फोन्स का निर्माण करती है। इस तोड़फोड़ के दौरान 1।5 करोड़ रुपए के तो सिर्फ स्मार्टफोन्स ही लूट लिए गए थे।

इस मामले में कुल 7000 लोगों के खिलाफ कंपनी ने मामला दर्ज कराया है। इनमें से 5000 कंपनी में काम करते हैं और 2000 ऐसे हैं, जो बाहर से आए थे। 2021 के अंत तक कंपनी 25,000 लोगों को हायर करने वाली थी, लेकिन अब ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है। फिलहाल उसके 12,000 कर्मचारी हैं, जिनमें से 2000 स्थायी हैं। Apple अपने कर्मचारियों को सुरक्षित माहौल और उचित सम्मान देने की बात करती है, इसीलिए उसने जाँच समिति गठित कर दी है।

3 दिन से मेरे दाँत में दर्द था, तिहाड़ जेल में इलाज नहीं: उमर खालिद ने कोर्ट को सुनाया अपना दर्द

जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद, जिसे कि दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों के मामले में गिरफ्तार किया गया है, ने बुधवार (दिसंबर 16, 2020) को एक अदालत के समक्ष आरोप लगाया कि उसे पिछले तीन दिनों से उसके दाँतों में दर्द है इसके बावजूद भी तिहाड़ जेल अधिकारियों द्वारा कोई मेडिकल उपचार नहीं दिया गया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, उमर खालिद की इस शिकायत के बाद मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट दिनेश कुमार ने जेल अधीक्षक को जेल नियमों के अनुसार खालिद को उचित मेडिकल सहायता देने का निर्देश दिया। इसके साथ ही, अदालत ने जेल अधिकारियों को दो दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को भी कहा है।

अदालत ने अपने निर्देश में कहा कि अगर अगले दिन तक भी दाँत के डॉक्टर जेल में नहीं भेजे जाते, तो उमर खालिद को जेल के बाहर दाँत के डॉक्टर के पास जाँच के लिए और यदि आवश्यक हो, उपचार के लिए ले जाया जा सकता है।

साल के शुरुआत में दिल्ली के खजूरी खास इलाके में हुए दंगे से संबंधित एक मामले में अदालत ने जेएनयू के पूर्व छात्रनेता की न्यायिक हिरासत की अवधि 14 दिनों के लिए बढ़ा दी है। ज्ञात हो कि दाँतों के दर्द से जूझ रहे उमर खालिद को इस मामले में एक अक्टूबर माह में गिरफ्तार किया गया था।

दिल्ली सरकार ने दी राजद्रोह (Sedition Charges) के आरोप को मंजूरी

उल्लेखनीय है कि दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार ने बुधवार को दिल्ली दंगे मामले में आरोपित 18 लोगों को भारतीय दंड संहिता की धाराओं के अंतर्गत राजद्रोह और आपराधिक षड्यंत्र का केस चलाने के लिए पुलिस को अपनी मंजूरी दे दी है।

इसमें जेएनयू के पूर्व छात्र शरजील इमाम, ‘पिंजरा तोड़’ समूह की एक्टिविस्ट नताशा नरवाल, देवांगना कालिता, जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और आम आदमी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और इशरत जहाँ के नाम शामिल हैं।

उमर खालिद को इस मामले में 1 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें सितंबर माह में दंगों की एक बड़ी साजिश से जुड़े एक अन्य मामले में भी गिरफ्तार किया गया। उल्लेखनीय है कि 24 फरवरी को पूर्वोत्तर दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी। नागरिकता कानून (CAA) के विरोध प्रदर्शन के बाद कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई और लगभग 200 लोग घायल हुए।

देर से आना, जल्दी जाना… टाइम वेस्ट करने का आरोप लगाना: सेना-रक्षा मामलों की मीटिंग पर राहुल गाँधी का रवैया

देश से संबंधित रक्षा मामलों की संसदीय समिति की मीटिंग थी। समिति के अध्यक्ष जुएल उराँव के साथ CDS जनरल बिपिन रावत भी आ गए थे। लेकिन इस समिति के एक सदस्य मीटिंग में लेट से आए। इस सदस्य का नाम है – राहुल गाँधी, जो कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भी रहे हैं।

रक्षा मामलों की संसदीय समिति की मीटिंग का एजेंडा था – थल सेना, नौसेना और वायुसेना कर्मियों के रैंक, स्ट्रक्चर, वर्दी, स्टार व बैज के मुद्दे पर चर्चा। यह एजेंडा पहले से फिक्स था। लेकिन राहुल गाँधी संसदीय समिति से ऊपर की चीज हैं, उन्होंने खुद के लिए ऐसा सोचा होगा।

राहुल गाँधी इसी सोच के साथ मीटिंग में लेट से घुसने के बावजूद समिति पर सेना के रैंक, स्ट्रक्चर, वर्दी, स्टार व बैज के मुद्दे पर चर्चा को समय की बर्बादी बता दी। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के अनुसार समिति को सिर्फ सैनिकों को बेहतर उपकरण, चीन मुद्दे आदि पर बात करनी चाहिए।

रक्षा मामलों की संसदीय समिति के अध्यक्ष जुएल उराँव ने सदस्य राहुल गाँधी को एजेंडे से इतर बात करने से मना कर दिया। इस बात से राहुल गाँधी आहत हो गए। बैठक छोड़ कर चल दिए। बैठक में शामिल कॉन्ग्रेसी सांसद राजीव सातव और रेवंत रेड्डी भी राहुल गाँधी से साथ ही बाहर चले गए।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार राहुल गाँधी का कहना था कि वर्दी आदि पर फैसला सेना से जुड़े लोगों को लेना चाहिए। नेताओं को इसकी बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए।

संसद में राहुल गाँधी कितने एक्टिव

16 वीं लोकसभा कार्यकाल के दौरान सदन में राहुल गाँधी की उपस्थिति 52% रही है। यही नहीं राहुल ने सदन के अंदर महज 14 चर्चाओं में ही हिस्सा लिया है। और तो और, राहुल गाँधी सदन के अंदर एक भी प्राइवेट मेंबर बिल लेकर नहीं आए

राहुल गाँधी की कॉन्ग्रेस पार्टी के सहयोगी NCP के लीडर शरद पवार भी इस ‘युवा’ नेता को लेकर संसद में उनके परफॉर्मेंस की ही लाइन पर सोचते हैं। महाराष्ट्र की मौजूदा सरकार में भी दोनों दल शामिल हैं। फिर भी राकांपा प्रमुख शरद पवार समय-समय पर कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाते रहते हैं। कुछ दिन पहले ही उन्होंने कहा था कि राहुल गाँधी में एक राष्ट्रीय नेता के रूप में कुछ हद तक ‘निरंतरता’ की कमी लगती है।

काली मंदिर की जमीन पर कब्जा: AIMIM के गुंडों के साथ पुलिस की मिलीभगत का आरोप, DCP के निलंबन की माँग

काली माता मंदिर विवाद के बाद, तेलंगाना भाजपा के अध्यक्ष बंडी संजय पटेल (Bandi Sanjay Kumar Patel ) ने बुधवार (दिसंबर 16, 2020) को माँग की है कि केसीआर सरकार मंदिरों के स्वामित्व वाली भूमि की रक्षा करे। साथ ही, उन्होंने कब्जाधारियों का साथ देने वाले स्थानीय डीसीपी को निलंबित करने की भी माँग की।

भाजपा नेता ने सवाल किया कि सरकारी (धर्मस्व विभाग) जमीन बचाने की कोशिश करने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं को पुलिस कैसे गिरफ्तार कर सकती है? हिन्दू महिलाओं से बदसलूकी और पुलिस की कार्रवाई की कड़ी निंदा करते हुए बंडी संजय ने कहा कि आज की घटना से स्पष्ट होता है कि पुलिस कब्जा करने वालों के साथ खड़ी है।

तेलंगाना के भाजपा विधायक टी राजा सिंह के साथ एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए, तेलंगाना भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बंडी संजय ने कहा कि अगर सरकार ने 24 घंटे के भीतर इस मुद्दे पर जवाब नहीं दिया, तो मुख्यमंत्री केसीआर को ओल्ड सिटी में मंदिर की जमीन पर भाजपा के आंदोलन के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

भाजपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि स्थानीय डीसीपी ने काली माता मंदिर स्थल पर विरोध कर रही महिलाओं के साथ गैरजिम्मेदाराना व्यवहार किया। संजय ने कहा, “पुलिस अधिकारियों ने अतिक्रमणकारियों का साथ देते हुए निचली अदालत के आदेश का समर्थन किया, भले ही अतिक्रमणकारियों के खिलाफ उच्च न्यायालय का आदेश पहले से ही था।”

उन्होंने कहा, “जैसे ही डीसीपी ने मुझे रोका, सैकड़ों एमआईएम के गुंडे इकट्ठा हुए और नारे लगाए। जिस डीसीपी को कानून और व्यवस्था को बनाए रखना था, उसने एमआईएम कार्यकर्ताओं का समर्थन करने की कोशिश की।”

विधायक राजा सिंह ने कहा कि ओल्ड सिटी में सुबह से तमाशा चल रहा था। भू-माफिया काली माता मंदिर से जुड़ी 8 एकड़ और 15 गुंटा जमीन छीनने की कोशिश कर रहे थे, जिसकी कीमत 150 करोड़ रूपए है।

उन्होंने कहा पुलिस अधिकारियों और अतिक्रमणकारियों पर मिलीभगत का भी आरोप लगाया। रजा सिंह ने कहा कि एंडॉवमेंट डिपार्टमेंट ने निचली अदालत में इस मामले में सुनवाई नहीं की, जिससे पता चलता है कि वे अतिक्रमणकारियों के साथ मिले हुए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने सांप्रदायिक माहौल बनाने की योजना बनाई और इसका दोष भाजपा पर मढ़ने का प्रयास किया, लेकिन वे विफल रहे।

काली मंदिर जमीन पर कब्जे को लेकर हुई थी झड़प

उल्लेखनीय है कि हैदराबाद ओल्ड सिटी के उप्पुगुड़ा कालिका माता मंदिर (Kalika Mata temple, Uppuguda) से जुड़ी करीब 8 एकड़ 13 गुंटा जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, धर्मस्व विभाग की इस जमीन को अपनी बताते हुए एक व्यक्ति के सिटी सिविल कोर्ट से पुलिस प्रोटेक्शन ऑर्डर लेकर आने और घटनास्थल पर पुलिस की मौजूदगी में निर्माण शुरू करने पर भाजपा नेताओं सहित स्थानीय लोगों ने निर्माण कार्य को रोकने की कोशिश की।

इस पर भाजपा नेताओं ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर निर्माण कार्य को रोकने की कोशिश की, तो पुलिस ने भाजपा नेताओं व महिलाओं को घसीटते हुए ले जाकर वाहनों में चढ़ाया, जिसे लेकर वहाँ तनाव की स्थिति बन गई। पुलिस ने कहा कि अदालत के आदेशों का ही पालन किया जा रहा था, लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि आठ एकड़ और 13 गुंटा जमीन कालिका मंदिर और एक हिंदू कब्रिस्तान की है।

जिस समय विवादित जमीन के चारों ओर बाड़ बनाई जा रही थी, तभी भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ता और स्थानीय लोग बुधवार को घटनास्थल पर जमा हुए और नारेबाजी शुरू कर दी। लोगों ने वहाँ पर विरोध प्रदर्शन किया। इसके बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया और उन्हें दबीरपुरा और फलकनुमा पुलिस थानों में भेज दिया गया।

इस बीच, एआईएमआईएम कार्यकर्ता बालसेट्टी खेत पहुँछे, जहाँ वे भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ भिड़ गए और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बंडी संजय को रोकने की कोशिश की, जो कि दबीरपुरा पुलिस स्टेशन जा रहे थे। हालाँकि, मिर्चचौक एसीपी ने हस्तक्षेप किया और दोनों समूहों को वहाँ से खदेड़ दिया।

विधायक राजा सिंह ने बाद में मीडिया से बात करते हुए कहा कि एक कब्रिस्तान काली माता मंदिर, कंधीगल से सटा हुआ है, जिसमें चंद्ररंगुट्टा निर्वाचन क्षेत्र में 8.23 ​​एकड़ जमीन है। अतीत में, भूमि-अधिग्रहणकर्ताओं और बंदोबस्ती विभाग के अधिकारियों ने तीन बार उस जमीन को अलग करने की कोशिश की थी, जिसे स्थानीय लोगों ने नहीं होने दिया।

राजा सिंह ने कहा कि जब वे इस संपत्ति हथियाने में विफल रहे, तो जमीन हड़पने वालों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और बंदोबस्ती अधिकारियों ने भी मामले में कोई बाधा नहीं डाली। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और एक आदेश प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट के आदेशों को लागू करने के बजाय, जमीन हड़पने वालों ने पुलिस सुरक्षा के तहत निचली अदालत के आदेशों को लागू करने की कोशिश की जिस कारण विवाद हुआ।

‘…तो गाँधी बन जाओगे’ – लाला लाजपत राय के अंग्रेज हत्यारे को मारने की प्लानिंग में क्यों और किसने लिया गाँधी का नाम?

भगत सिंह और उनके क्रन्तिकारी साथियों राजगुरु और सुखदेव ने मिल कर अंग्रेज अधिकारी सांडर्स को मौत के घाट उतारा था। ये हम सभी जानते हैं कि भारत माँ के बलिदानी सपूतों ने वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी और विचारक लाला लाजपत राय के साथ हुई क्रूरता और उनकी हत्या का बदला लेने के लिए ऐसा किया था। यहाँ हम इस पूरे प्रकरण के कुछ अनछुए पहलुओं पर बात करते हुए सिलसिलेवार तरीके से घटनाओं को देखेंगे।

वो अक्टूबर 1928 का अंतिम सप्ताह था, जब साइमन कमीशन लाहौर आने वाला था। अंग्रेजों ने इस आयोग को भारत इसीलिए भेजा था, ताकि वो जनता के आक्रोश को देखते हुए स्थितियों का अध्ययन करे और जनता को शांत करने की कोई तरकीब निकाले। लेकिन उसके आते ही लाहौर बंद कर दिया गया और नौजवानों की टोली ने साइमन कमीशन के रास्ते घेर लिए। स्कॉट उस समय लाहौर का एसपी था और स्टेशन से लेकर सड़कों तक क्रांतिकारियों की फ़ौज देख कर उसे कुछ नहीं सूझ रहा था।

लाला लाजपत राय खुद बाहर प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे थे और कई नौजवान उनके साथ थे। एक तो उनके पीछे छाता ताने भी चल रहा था। बस सब किसी न किसी तरह मातृभूमि के काम आना चाहते थे। भगत सिंह अंग्रेजों की पकड़ से दूर थे, ऐसे में स्कॉट डरा हुआ था कि कमीशन के लोगों को एक खरोंच भी आई तो कइयों की नौकरी जाएगी। एक तरफ पंजाब के सर्वमान्य नेता लालाजी, दूसरी तरफ चतुर-चालाक भगत सिंह।

साइमन कमीशन के पहुँचते ही स्टेशन को घेर लिया गया और ‘साइमन गो बैक’ के नारे लगने लगे। काले झंडे चारों तरफ लहराने लगे। पुलिसकर्मियों के लाख प्रयास के बावजूद क्रन्तिकारी नहीं हटे। लाला लाजपत राय के चारों तरफ घेरा बना हुआ था, जिसमें सुखदेव भी शामिल थे। उसके बाद नौजवानों का एक और व्यूह था, जो उनकी सुरक्षा में लगा था। डिप्टी एसपी सांडर्स ने अंत में लाठीचार्ज का निर्णय लिया और ऊपर से भी उसे ऐसा ही आदेश मिला।

उसने बेरहमी से लाठीचार्ज शुरू करवा दिया। कई प्रदर्शनकारी खून से लथपथ हो गए। लेकिन, प्रदर्शनकारियों का हुजूम रुका नहीं और बढ़ता रहा। क्रूर सांडर्स खुद हाथों में लाठी लेकर निहत्थे लोगों को अपना निशाना बना रहा था। कहते हैं, लाला लाजपत राय के पीछे छाता लेकर खड़े युवक को और उस छात्र पर ऐसी लाठी मारी कि वो टूट ही गया। लालाजी को घेर कर जो युवक खड़े थे, अंग्रेजों ने उन्हें एक-एक कर पीटना शुरू कर दिया।

उनके पास मुकाबला करने के लिए कुछ भी नहीं था। वो खाली हाथों से मुकाबला कर रहे थे और पंजाब के वयोवृद्ध नेता को बचाने की कोशिश भी कर रहे थे, जो प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता के लिए प्रेरणा थे। सांडर्स ने तभी एक लाठी जोर से लालाजी के कंधे पर मारी, जिससे वहाँ की हड्डी टूट गई। इस पर भी उसका दिल नहीं भरा तो उसने उनके सीने पर भी लाठी से एक जोरदार वार किया।

भयानक दर्द से कराह रहे लाला लाजपत राय का खड़ा होना भी मुश्किल था और उन्हें भी लग गया था कि सांडर्स उन्हें ज़िंदा नहीं छोड़ेगा, इसीलिए उन्होंने युवकों की भी सुरक्षा का ख्याल करते हुए पीछे हटने का विचार किया। पूरे लाहौर में दुकानें बंद थीं। एक अंग्रेजपरस्त राय बहादुर ने अपनी दुकान खुली रखी थी और लठैतों से देशभक्तों को पिटवाना चाहा, लेकिन युवकों ने उन गुंडों को मार-मार कर भगा दिया।

घायल होने के बावजूद लाला लाजपत राय प्राथमिक उपचार के बाद शाम को एक सभा में बोलने गए। वो ओजस्वी वक्ता थे और उनसे लोगों को हिम्मत मिलती थी। उन्होंने वहीं पर घोषणा की कि उन्हें जो चोटें आई हैं, वो भारत में ब्रिटिश राज के ताबूत की आखिरी कीलें साबित होंगी। उन्होंने ये बात अंग्रेजी में कही थी, जिसे सुन कर एक अंग्रेज पुलिसकर्मी ने उनका मजाक भी बनाया। उम्र के इस मोड़ पर इतनी बड़ी शख्सियत का लाठी खाना भारत माँ की अस्मिता पर चोट थी।

चोट के घाव और इस सदमे, दोनों से ही वो उबर न सके। इलाज के दौरान ही अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई। ये खबर सुनते ही सारे अंग्रेज अपने-अपने घरों और दफ्तरों की सुरक्षा बढ़ा कर दुबक गए, सड़क से सारे अंग्रेजों को हटा दिया गया। घर-घर से लोग लालाजी के घर की ओर चल पड़े और पूरे पंजाब में लोगों ने शोक मनाया। उनके घर से 4 मील दूर रावी नदी के तट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें डेढ़ लाख लोग उपस्थित रहे।

भगवतीचरण और यशपाल ने रात भर चिता की रक्षा की, क्योंकि उन्हें डर था कि अंग्रेज लालाजी की चिता का अपमान कर सकते हैं। क्रान्तिकारी हिन्दू रीति-रिवाज से अस्थियों को चुन कर विसर्जित करना चाहते थे। कड़ी ठण्ड में भी उन्होंने पहरा दिया। लोग अपने पुराने महाराजा रणजीत सिंह को याद करने लगे थे, जिनके दरबार में अंग्रेज तक हाजिरी लगाते थे। चितरंजन दास की पत्नी बासंती देव ने एक शोक सभा में ऐलान कर दिया कि कोई युवक अंग्रेजों के इस क्रूर कृत्य का बदला लेगा।

भगत सिंह, राजगुरु या सुखदेव? आखिर कौन होगा वो, लोगों में यही चर्चा थी। लालाजी की मृत्यु के बाद के एक प्रसंग का उल्लेख जौनपुर के महान लेखक प्रोफेसर बच्चन सिंह ने किया है, जो वाराणसी के ‘नगरी प्रचारिणी पत्रिका’ के लगभग एक दशक तक अवैतनिक संपादक रहे थे। दर्जनों पुस्तकें लिख चुके बच्चन सिंह ने लिखा है कि लालाजी की मौत के दिन ही क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से बदला लेने की शपथ ले ली थी।

उनके लिखे प्रसंग के अनुसार, उस दिन चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह अन्य साथियों के साथ बन्दूक से अपने निशाने का अभ्यास कर रहे थे। जहाँ आजाद का निशाना हमेशा की तरह अचूक था, बाकियों के एकाध इधर-उधर हो जाते थे। चंद्रशेखर आजाद ने उम्र में खुद से छोटे भगत सिंह से कहा, “यदि तुम्हारा निशाना सही नहीं लगा तो तुम गाँधी बन जाओगे।” भगत सिंह ने जवाब दिया कि सेनापति काबिल हो तो फ़ौज संगठित रहती है, एक भी व्यक्ति टस से मस नहीं होता।

चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि भगत सिंह एक बहादुर क्रन्तिकारी होने के साथ-साथ एक विचारशील विद्वान भी हैं, इसीलिए उनसे पार पाना मुश्किल है। आज़ाद ने भगत सिंह को निरंतर अभ्यास की महत्ता समझाते हुए कहा कि एक भी निशाना चूकने का अर्थ है कि व्यक्ति अपने जीवन से हाथ धो सकता है। भगत सिंह ने उन्हें भरोसा दिलाया कि निरंतर अभ्यास के बल पर वो हवा में उड़ते हुए तिनके को भी धराशायी कर देंगे।

लालाजी की मृत्यु के 3 सप्ताह बाद क्रांतिकारियों की बैठक हुई, जिसमें लाठीचार्ज का आदेश देने वाले स्कॉट को ठिकाने लगाने की योजना बनी, पर उसके लिए जरूरत थी धन की। क्रांतिकारियों ने बैंक पर डाका डालने का निर्णय लिया। हालाँकि, ये योजना विफल हो गई। अब क्रन्तिकारी इस पर विचार करने में लगे थे कि स्कॉट को निशाना बनाया जाए, सांडर्स को, या दोनों को। दोनों अलग-अलग समय पर गाड़ियों से दफ्तर आते थे, इसीलिए उनका मत था कि दोनों को नहीं मार सकते।

ऊपर से एक की हत्या के बाद हो सकता है कि सुरक्षा व्यवस्था खासी कड़ी हो जाए और उन्हें लाहौर छोड़ कर भागना पड़े, इसीलिए दूसरे की हत्या का शायद मौका ही नहीं आए। चंद्रशेखर आजाद ने निर्णय लिया कि सांडर्स को ही ठोका जाएगा, क्योंकि सीधे तौर पर लालाजी की हत्या के लिए वही जिम्मेदार है। गोपाल और राजगुरु को पुलिस की एक-एक गतिवधि का आकलन कर रिपोर्ट देने को कहा गया। राजगुरु और भगत सिंह को उस पर गोली चलाने के लिए चुना गया।

अंततः राजगुरु और गोपाल ने अपनी रिपोर्ट सौंपी और दिसंबर 17, 1928 को सांडर्स की हत्या का दिन चुना गया। वो दोपहर के बाद का समय था और हल्की-हल्की धूप निकली हुई थी। डीएवी कॉलेज में शीतकालीन अवकाश हो चुका था। सड़क पर सन्नाटा जरूर पसरा हुआ था, लेकिन उस पार पुलिस थी। जयदेव साइकल से पहुँचे और उसे खड़ी कर के ठीक करने लगे। आजाद और भगत सिंह भी साइकल से आए और छात्रावास में ही अपनी साइकलें लगा दीं। राजगुरु को साइकल चलाना नहीं आता था।

वो पैदल ही वहाँ पहुँचे। राजगुरु और भगत सिंह कॉलेज के बाहर बातें करने लगे। चंद्रशेखर आजाद अपनी माउजर लिए छिप कर खड़े थे। बाकियों से जरा भी चूक हुई तो उनकी पिस्तौल तैयार थी, जिससे अंग्रेज खौफ खाते थे। वो 1000 गज दूर तक निशाना लगा कर ठोकने की क्षमता रखते थे। उसमें उन्होंने 10 गोलियाँ भर रखी थीं, साथ ही कई अपने साथ भी लेकर आए थे। 4:20 में सांडर्स बाहर निकला और अपनी लाल बाइक पर सवार हुआ। राजगुरु ने जय गोपाल के इशारे पर सीधे गोली मारी, जो सांडर्स के सर में लगी।

वो वहीं धड़ाम हो गया। इसके बाद दौड़ कर राजगुरु और भगत सिंह उसके समीप पहुँचे और धड़ाधड़ 5 गोलियाँ उसके सीने में उतार दीं। बाद में क्रांतिकारियों ने पोस्टर्स चिपका कर बताया कि किस तरह देश के एक बहुत बड़े नेता को एक मामूली अंग्रेज पुलिस अधिकारी ने मार डाला और हमारी अस्मिता को खरोंचा। लोगों के मन में क्या भावनाएँ थीं, समझा जा सकता था। भगत सिंह का मानना था कि गाँधीजी ने चौरीचौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन वापस लेकर देश की पीठ में छुरा घोंपा है, इसीलिए लोगों की साहसहीनता को खत्म करने के लिए ये ज़रूरी था। इस तरह लाला लाजपत राय के हत्यारे सांडर्स को मार कर ये तीनों ही क्रन्तिकारी अमर हो गए।

बता दें कि पंजाब के मोंगा जिले में 28 जनवरी 1865 को उर्दू के अध्यापक के घर में जन्मे लाला लाजपत राय बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। एक ही जीवन में उन्होंने विचारक, बैंकर, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी की भूमिकाओं को बखूबी निभाया था। पिता के तबादले के साथ हिसार पहुँचे लाला लाजपत राय ने शुरुआत के दिनों में वकालत भी की। स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ जुड़ कर उन्होंने पंजाब में आर्य समाज को स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई थी।

हिन्दू युवा वाहिनी के नेता ने बनाए गधे की लीद से मिलावटी मसाले: मीडिया की खबर का DM ने किया खंडन

हाथरस के जिलाधिकारी ने एक ऐसी खबर का खंडन किया है जिसमें दावा किया जा रहा था कि हिन्दू युवा वाहिनी के नेता अनूप वार्ष्णेय की मसाले बनाने वाली फैक्ट्री में गधे की लीद और भूसे से मिलावटी मसाले तैयार किए जाते थे। यह फर्जी खबर कई समाचार समूह, समाजवादी पार्टी जैसे कुछ राजनीतिक दलों और फैक्ट चेकर वेबसाइट ऑल्टन्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने भी सोशल मीडिया पर शेयर की है।

क्या है मामला

बुधवार (दिसंबर 16, 2020) को एक खबर को मुख्यधारा की मीडिया और सोशल मीडिया पर खूब देखा गया। इस खबर में दावा किया गया कि उत्तर प्रदेश के हाथरस की एक फैक्ट्री में यूपी पुलिस द्वारा गधे की लीद से बने मसाले पकड़े गए हैं।

इन खबरों के अनुसार, पुलिस ने सोमवार (दिसंबर 14, 2020) रात को कुछ बहुत ही असामान्य सामग्रियों, जैसे कि गधे की लीद, भूसा, गोबर या फिर अलग-अलग तरीके के तेल और रंग का इस्तेमाल करके मिलावटी मसाले बनाने वाले एक कारखाने पर छापा मारा जिसमें पुलिस ने कारखाने से 300 किलोग्राम नकली मसाले भी जब्त किए।

कुछ फैक्ट चेकर गिरोह और राजनीतिक दलों ने इस खबर की पुष्टि करने का भी इन्तजार सिर्फ इस कारण भी नहीं किया क्योंकि इस मसाला निर्माण कारखाने के मालिक की पहचान अनूप वार्ष्णेय के रूप में की गई, जो कि हिन्दू युवा वाहिनी के सह प्रभारी हैं। ज्ञात हो कि इस संगठन की स्थापना यूपी के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2002 में की थी।

लल्लनटॉप डेविड की ‘तूफानी फर्जी रिपोर्ट’ का स्क्रीनशॉट

क्या है वास्तविकता

हाथरस के नवीपुर इलाके में चल रही इस फैक्ट्री के खिलाफ शिकायतों के बाद खाद्य विभाग ने इससे कुछ सैंपल कलेक्ट किए थे। नमूमों की जाँच के बाद हाथरस जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया है कि मसलों में किसी भी जानवर की लीद की पुष्टि नहीं हुई है और यह एकदम फर्जी खबर है जो कि मीडिया और कुछ राजनीतिक दलों द्वारा शेयर की गई।

वहीं सोशल मीडिया पर इस फर्जी खबर को शेयर करने वाले फैक्ट चेकर वेबसाइट ऑल्टन्यूज़ के सह संस्थापक मोहम्मद जुबैर के इस ट्वीट पर मजे लेते हुए बेफिटिंग फैक्ट्स नाम के एक ट्विटर अकाउंट ने लिखा है कि ऑल्ट न्यूज़ ने व्यक्तिगत तौर पर मसलों को चखने के बाद इनमें गधे की लीद होने की पुष्टि की थी।

दरअसल, मोहम्मद जुबैर ने इस फर्जी खबर को ट्वीट करते हुए लिखा था- “क्या यार, राष्ट्रवाद की आड़ में गोबर खिला दिया।”

सोनू बनकर साकिब दलित किशोरी को भगा ले गया, जबरन धर्म परिवर्तन और निक़ाह का बनाया दबाव

उत्तर प्रदेश में लव जिहाद के खिलाफ सख्त कानून बनने के बावजूद यह अपराध थमने का नाम नहीं ले रहा। एक तरफ कुछ लोगों द्वारा इस कानून का विरोध किया जा रहा, वहीं आए दिन इसके नए मामले सामने आ रहे। ताजा मामला बिजनौर जिले का है। जहाँ साकिब नाम के युवक ने सोनू बनकर दलित नाबालिक किशोरी को अपने प्रेमजाल में फँसाया, फिर मौका देखते ही उसे भगा ले गया।

पुलिस के अनुसार थाना धामपुर के एक गाँव में 14 दिसंबर की रात मुस्लिम धर्म का एक युवक 16 वर्षीय दलित किशोरी को भगा ले गया था। लड़के ने अपना असली नाम छिपाकर सोनू बता रखा था। किशोरी को बाद में उसकी असली पहचान का पता चला।

परिजनों द्वारा दर्ज एफआईआर के अनुसार, थाना धामपुर के एक गाँव में मुस्लिम धर्म के 18 वर्षीय युवक ने 16 वर्षीय दलित किशोरी को अपना नाम सोनू बता कर दोस्ती की। फिर उसका ब्रेनवाश कर उसे अपने प्यार में फँसा लिया। 14 दिसंबर की रात वह किशोरी को लेकर फरार हो गया और निकाह करने की फिराक में था।

परिजनों ने अपनी नाबालिक लड़की को ढूँढने की बहुत कोशिश की, लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला। थक हार कर परिवारवालों ने मामले की जानकारी पुलिस थाने में दी। जिस पर तुरंत कार्रवाई करते हुए पुलिस ने आरोपित युवक साकिब उर्फ सोनू को नहटौर में धर दबोचा और लड़की को भी सकुशल बरामद किया।

परिजनों का आरोप है कि मुस्लिम युवक लड़की के स्कूल से आते-जाते समय अक्सर उससे मिलने पहुँच जाता था। जान-पहचान बढ़ाने के लिए साकिब ने अपना नाम सोनू बताकर उनकी बेटी से दोस्ती कर ली थी। जिसके बाद उसने किशोरी को झाँसा देकर अपने प्रेम में फँसाया और फरार हो गया। इसके साथ ही वह जबरन धर्म परिवर्तन कराने का दबाव डालकर निक़ाह करना चाहता था।

कोतवाल अरुण कुमार त्यागी ने बताया कि आरोपित को नहटौर क्षेत्र से दबोचा गया है। लव जिहाद के तहत मामला दर्ज किया गया है। लड़की को उसके स्वजनों को सौंपने की कार्रवाई की जा रही है।

पुलिस अधीक्षक ग्रामीण संजय कुमार ने जानकारी देते हुए बताया है कि गायब हुई लड़की को बरामद कर लिया गया है। इसके साथ ही आरोपित साकिब पर धर्मांतरण और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम (एससी-एसटी) के तहत मुकदमा दर्ज कर अरेस्ट कर लिया गया है। आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

गौरतलब है कि इससे पहले भी बिजनौर में एक मुस्लिम युवक अफजल ने सोनू बनकर हिन्दू युवती को प्रेमजाल में फँसाया। फिर उसका ब्रेनवाश कर अपने साथ भगा ले गया था। पीड़िता के परिजनों ने मामले में पुलिस थाने में तहरीर दी थी।

पुलिस पूछताछ में युवती ने बताया कि अफजल ने सोनू बन कर उससे दोस्ती की थी। पिता की तरह सोनू भी चंड़ीगढ़ में रहकर कारपेंटर का काम करता है। अफजल बना सोनू चंडीगढ़ में उसी के घर के पास ही काम करता था। धीरे-धीरे सोनू ने उसे अपने प्रेमजाल में फँसा लिया। और उनका रिश्ता प्यार में बदल गया। जिसके चलते अफजल उसे झाँसे में लेते हुए अपने साथ भगा ले गया। पीड़िता ने बताया कि उसे इसकी सच्चाई उसके साथ रहने के बाद पता चली।

गुजरात कॉन्ग्रेस की करारी हार को देखते हुए दिग्गज नेता छोड़ रहे पार्टी का दामन: प्रदेशाध्यक्ष और नेता विपक्ष ने भी दिया इस्तीफा

कॉन्ग्रेस पार्टी की हालत आए दिन बद से बदतर होती नजर आ रही है। बिहार में करारी हार के बाद अब गुजरात में पार्टी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, गुजरात कॉन्ग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा और राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता परेश धानाणी ने सभी आठ विधानसभा सीटों पर कॉन्ग्रेस के उपचुनाव हारने के बाद अपने इस्तीफे की पेशकश की है।

गुजरात कॉन्ग्रेस के प्रभारी राजीव सातव को उन्होंने अपना त्याग पत्र सौंपा है। सातव ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी महीने के अंत तक इस्तीफा पर फैसला करेगी। संगठन द्वारा इस्तीफे और पार्टी में अन्य परिवर्तनों के बारे में घोषणा दिल्ली से किया जाएगा।

गौरतलब है कि जिन आठ निर्वाचन क्षेत्रों के लिए उपचुनाव हुए उनमें अब्दसा, कर्जन, मोरबी, गढ़ा, धारी, लिंबडी, कपराडा और डांग शामिल हैं। ये सीटें पहले कॉन्ग्रेस पार्टी के पास थी। जिन पर कॉन्ग्रेस के 8 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था। उनके इस्तीफे के बाद पिछले महीने विधानसभा के उपचुनाव हुए थे। जिनमें से पाँच विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे। कॉन्ग्रेस पार्टी में बिखराव के चलते पार्टी ने अपनी राज्यसभा की सीट भी गँवा दी थी।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में चावड़ा और अन्य कॉन्ग्रेस नेताओं और समर्थकों को अहमदाबाद हवाई अड्डे के बारे में फर्जी खबर साझा करने पर भारी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। दरअसल, एक ट्वीट में कॉन्ग्रेस नेता ने दावा किया था कि सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का नाम अडानी हवाई अड्डों से बदल दिया गया। जबकि केंद्र द्वारा अहमदाबाद स्थित ‘सरदार वल्लभभाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ के संचालन का काम अडाणी समूह को दिया गया है, पर उसका नाम नहीं बदला गया है। यह ग्रुप जीएमआर समूह की तरह हवाई अड्डे के संचालन की देखरेख करेगा।

2020 में कॉन्ग्रेस की बढ़ती मुश्किलें

कॉन्ग्रेस के आठ विधायकों ने पार्टी के कामों से नाखुश होते हुए हुए पार्टी से दूरी बना ली। जिनमें से पाँच भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। आठ विधायकों के दलबदल के कारण पार्टी एक राज्यसभा सीट भी हार गई। दिग्गज नेता अहमद पटेल की मौत गुजरात कॉन्ग्रेस के लिए एक और बड़ा सदमा था। वहीं कोविड-19 महामारी की वजह से भरतसिंह सोलंकी और शक्तिसिंह गोहिल जैसे प्रभावशाली नेताओं ने भी जमीनी स्तर के काम से दूरी बनाई रखी।

गुजरात बीजेपी के लिए अच्छे दिन

गुजरात भाजपा राज्य में अच्छा प्रदर्शन कर रही है। हाल के उप-चुनावों में पार्टी ने सभी आठ सीटें जीत हासिल की हैं। गुजरात के भाजपा अध्यक्ष सी आर पाटिल और सीएम विजय रूपानी जनता के बीच अपनी लोकप्रियता बनाए रखने में कामयाब रहे। बता दें गुजरात में फरवरी 2021 में स्थानीय निकाय चुनाव होंगे। राज्य में कॉन्ग्रेस पार्टी की वर्तमान स्थिति स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा के लिए एक और बड़ी जीत की ओर इशारा कर रही है।

समस्तीपुर में गोभी की फसल पर हल चलाने वाले किसान को नए कृषि कानून से मिला 10 गुना भाव: जानिए कैसे हुआ संभव

अपनी गोभी की फसल का कौड़ी का भाव मिलने के कारण खेत में हल चलवा कर फसल खत्म करने वाले बिहार के समस्तीपुर के किसान को सही भाव मिल गया है। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने गोभी किसान का हाल जानने के बाद पहल की। अब उनकी गोभी 10 रुपए प्रति किलो बिक गई है। रविशंकर प्रसाद का कहना है कि यही नए कृषि कानून का फायदा है।

क्या है पूरा मामला

दरअसल, समस्तीपुर के मक्तापुर गाँव के किसान की कहानी पूरे देश में मीडिया की सुर्खियाँ बन गई थी। ओम प्रकाश यादव नाम के इस किसान का कहना था कि उन्हें गोभी की फसल का कौड़ी के बराबर भाव मिल रहा है। उनकी गोभी सिर्फ एक रुपए प्रति किलो के हिसाब से बिक रही है। ऐसे में गोभी काट कर बेचने से ज्यादा बेहतर है उसे खेत में ही नष्ट कर देना। किसान ने गोभी की फसल पर ट्रैक्टर चलवा दिया था।

रविशंकर प्रसाद ने की पहल

समस्तीपुर के किसान की दुर्दशा की कहानी केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी पढ़ी। रविशंकर ने बुधवार (दिसंबर 16, 2020) को एक साथ कई ट्वीट कर किसान की मदद की पूरी कहानी बताई। रविशंकर प्रसाद के मुताबिक उन्हें मीडिया से खबर मिली थी कि बिहार के समस्तीपुर के मुक्तापुर गाँव के किसान ओम प्रकाश यादव को अपने खेत में उगाई गोभी की फसल का स्थानीय आढ़त में मात्र एक रुपया प्रति किलो भाव मिल रहा था। निराश हो कर उन्होंने अपने खेत के कुछ हिस्से पर ट्रैक्टर चलवा कर फसल को नष्ट कर दिया।

दस रुपए किलो का मिला भाव

रविशंकर प्रसाद ने बताया है कि खबर पढ़ने के बाद उन्होंने अपने विभाग के कॉमन सर्विस सेंटर को निर्देश दिया कि वे किसान से संपर्क साधें और उनकी फसल को देश के दूसरे राज्य में सही दाम पर बेचने का बंदोबस्त करें। सरकार ने कृषि उत्पादों की बिक्री के लिए डिजिटिल प्लेटफार्म बना रखा है। इसी प्लेटफार्म पर दिल्ली के एक खरीददार ने किसान की गोभी 10 रुपए प्रति किलो खरीदने का ऑफर दिया।

किसान ओम प्रकाश यादव ने दस रुपए किलो के हिसाब से अपनी गोभी बेचने पर सहमति जताई। रविशंकर प्रसाद ने बताया कि किसान और खरीदार की आपसी सहमति के बाद कुछ ही घंटों में किसान के बैंक खाते में आधी राशि एडवांस के रूप में पहुँच गई। उन्हें पता चला है कि खरीददार ने न सिर्फ ट्रांसपोर्ट उपलब्ध करवाया बल्कि बची हुई राशि भी किसान के बैंक खाते में जमा कर दी है। समस्तीपुर के मुक्तापुर गाँव से गोभी दिल्ली के लिए रवाना हो गई है।

नए कृषि कानून का फायदा

रविशंकर प्रसाद ने कहा कि यही नए कृषि कानून का फायदा है। केंद्र सरकार ने नए कृषि कानून के जरिए किसान को अपनी फसल कहीं भी बेचने की आज़ादी दे दी है। बिहार के इस किसान को स्थानीय मंडी में मिल रहे दाम से निराश हो कर अपनी फसल नष्ट करने पर मजबूर होना पड़ा था, लेकिन नए कृषि कानून के तहत ही वह स्थानीय दाम से दस गुना अधिक दाम पर दिल्ली में अपनी फसल बेच पाया है।