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न अपना नेता, न वीडियो बदल रही कॉन्ग्रेस: 11 माह पुरानी झारखंड चुनाव वाली वीडियो से ही बिहार में भी हो रहा चुनाव प्रचार

बिहार चुनावों में भी कॉन्ग्रेस की राजनीति फर्जीवाड़े पर ही टिकी हुई है। इसका खुलासा एक बार फिर पार्टी की धूर्तता से हुआ है। दरअसल पार्टी ने झारखंड चुनावों की वीडियो को बिहार चुनावों के लिए इस्तेमाल करके लोगों को बेवकूफ बनाने की कोशिश की मगर, इसका खुलासा होते ही उनका मजाक बनने लगा।

11 माह पहले झारखंड चुनावों में ‘आ रही है कॉन्ग्रेस’ कैप्शन के साथ अपने यूट्यूब पर वीडिया अपलोड करने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी ने बिहार चुनावों में उसी वीडियो का प्रयोग ‘बोले बिहार बदले सरकार, जन जन को मिलेगा अधिकार’ लिख कर शेयर किया है।

जानकारी के लिए बता दें कि कॉन्ग्रेस ने एक दिन पहले अपने ट्विटर हैंडल पर बिहार चुनाव के मद्देनजर एक वीडियो शेयर की। इस वीडियो पर उन्होंने लिखा, “बिहार को लूट राज से मुक्ति दिलाकर नए बिहार का सपना साकार करेंगे। हर वर्ग की जिंदगी में भर कर खुशियाँ, हम बिहार के नए रूप को आकार देंगे।”

इसी वीडियो को रीट्वीट करते हुए ट्विटर यूजर अंकुर सिंह लिखते हैं, “कॉन्ग्रेस की स्थिति की बिहार में कल्पना कीजिए जो झारखंड की वीडियो इस्तेमाल करके बताना चाहते हैं कि लोग उनका बिहार  में समर्थन कर रहे हैं।” इस ट्वीट के साथ उन्होंने पुरानी वीडियोज और अब की वीडियोज के स्क्रीनशॉट भी तिथि सहित शेयर किए।

ऐसे ही एक ‘बेफिटिंग फैक्ट्स’ नाम का अकॉउंट इस पर लिखता है, “कॉन्ग्रेस का आईटी सेल कॉन्ग्रेस पार्टी को बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहा है, बिलकुल वैसे ही जैसे गाँधी परिवार ने भारत को लूटा। ये लोग झारखंड की पुरानी वीडियो का इस्तेमाल बिहार चुनाव में कर रहे हैं।”

कॉन्ग्रेस द्वारा शेयर की गई वीडियो में कई चलचित्र पुराने हैं। इसमें एक लड़का नजर आ रहा है उसके चेहरे का इस्तेमाल 10 महीने पहले कॉन्ग्रेस ने “भारत बचाओ रैली” के लिए किया था और अब उसी युवा चेहरे का इस्तेमाल अपने चुनाव प्रचार के गाने में किया है।

पार्टी की ऐसी स्थिति देख कर सोशल मीडिया पर कई लोग उनका मजाक उड़ा रहे हैं। लोगों का कहना है कि इनके पास पैसे नहीं बचे दोबारा शूट और लाइसेंस वाली फोटो के लिए, सब इटली और इस्तांबुल में जा रहे हैं। एक यूजर कहता है कि ये कौन सी बड़ी बात है, पार्टी तो साल 2008 से एक ही नेता रिपीट कर रही है।

मजहबी कारणों से नहीं मिलाया महिला अधिकारी से हाथ, मुस्लिम शरणार्थी डॉक्टर को जर्मनी ने किया नागरिकता देने से इंकार

जर्मनी में एक मुस्लिम शरणार्थी ने महिला अधिकारी से हाथ मिलाने पर असहमति जताई। शरणार्थी डॉक्टर के अनुसार, उसने ऐसा मजहबी कारणों से किया। इस मामले पर जर्मनी की अदालत ने उसे नागरिकता प्रदान करने से मना कर दिया। लेबनान का रहने वाला 40 वर्षीय चिकित्सक साल 2002 में जर्मनी आया था। उसने धार्मिक आधार पर महिला अधिकारी से हाथ मिलाने के लिए मना कर दिया। 

इस पर जर्मनी की सरकार का कहना है कि धर्म और लिंग के लिहाज़ से किसी भी तरह का भेदभाव अमान्य है। यह संविधान द्वारा दिए गए समानता के अधिकारों की अनदेखी है। ऐसा करने वाले किसी भी नागरिक को नागरिकता नहीं दी जा सकती है, जिसका देश के संविधान में भरोसा नहीं हो।

लेबनान का मुस्लिम चिकित्सक पिछले दो दशकों से जर्मनी में बतौर शरणार्थी रह रहा था। साल 2012 में भी उसने नागरिकता के लिए आवेदन किया था, तब उसने जर्मनी के संविधान की मान्यता वाले दस्तावेज़ और आतंकवाद के विरोध वाले शपथ पत्र पर हस्ताक्षर भी किया था। इसके बाद जब उसने यह सारे दस्तावेज़ महिला अधिकारी को सौंपे थे तब उसने महिला अधिकारी से हाथ मिलाने के लिए स्पष्ट रूप से मना कर दिया। हालाँकि उसका यह भी कहना था कि उसने अपनी पत्नी से वादा किया है कि वह किसी दूसरी महिला से हाथ नहीं मिलाएगा इस वजह से उसने ऐसा किया। 

इन तथ्यों के आधार पर साल 2015 में जर्मनी के स्थानीय प्रशासन ने उसे वहाँ की नागरिकता देने से मना कर दिया था। इस आदेश के बाद लेबनान के मुस्लिम चिकित्सक ने लेबनान की शरणार्थी अदालत में याचिका दायर की, उस याचिका पर अब आदेश सुनाया गया है। बाडेन वुर्टेमबर्ग की अदालत ने इस मुद्दे पर कहा कि चिकित्सक को जर्मनी की नागरिकता न दिया जाने वाला आदेश सही है। अदालत के अनुसार कोई भी व्यक्ति धर्म या लिंग के आधार पर हाथ मिलाने (हैंड शेक) से मना नहीं कर सकता है। 

इसके अलावा अदालत के न्यायाधीश ने भी इस मामले पर अपनी नज़रिया रखा। उन्होंने कहा, “हाथ मिलाने (हैंड शेक) के वैधानिक मायने हैं, यह अनुबंध के निष्कर्ष का सूचक है और तो और यह जर्मनी की सरकार – मुस्लिम चिकित्सक के बीच हुआ है। इसके अलावा, हाथ मिलाना हमारे समाज, संस्कृति और कानूनी जीवन का अभिन्न अंग है, यह साथ रहने की भावना को भी आकार देता है। कोई भी व्यक्ति अगर धर्म या लिंग के आधार पर हाथ मिलाने से मना करता है तो जर्मनी के संविधान द्वारा दिए गए बराबरी के अधिकारी की अवहेलना करता है। ऐसा करने वाले किसी भी व्यक्ति को नागरिकता नहीं दी जा सकती है।”

लेबनान मूल के इस शरणार्थी चिकित्सक ने जर्मनी से चिकित्सा की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उसने एक क्लीनिक में बतौर चिकित्सक काम करना शुरू कर दिया था। फ़िलहाल उसे जर्मनी की नागरिकता देने से साफ़ मना कर दिया गया है और जल्द ही उसे जर्मनी से भेजा भी जा सकता है।  

पश्चिम बंगाल: TMC नेता के घर पार्टी कर रहे कुख्यात अपराधी अब्दुल हुसैन ने पुलिस के डर से अपार्टमेंट से कूद कर दी जान

एक कुख्यात अपराधी ने शनिवार (अक्टूबर 17, 2020) की रात पुलिस की छापेमारी के दौरान तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) नेता के घर से कूदकर जान दे दी। यह घटना पश्चिम बंगाल के उत्तरी कोलकाता के चितपोर में एक आवास परिसर की है।

एबीपी आनंद की रिपोर्ट के अनुसार, मृतक अपराधी की पहचान अब्दुल हुसैन उर्फ सेंटिया के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि मृतक अपराधी के खिलाफ हुगली के भद्रेश्वर पुलिस स्टेशन में हत्या और जबरन वसूली के कई मामले दर्ज थे। पुलिस के मुताबिक, हुसैन अपने साथियों के साथ अपार्टमेंट में शराब पी रहा था, जिसमें एक पुलिस अधिकारी, ड्राइवर और अपार्टमेंट मालिक का रसोइया शामिल था। उन्होंने उक्त अपार्टमेंट में दो कॉल गर्ल को भी बुलाया था। एबीपी आनंद ने बताया कि फ्लैट मोहम्मद यासीन नाम के एक टीएमसी नेता का था।

कथित तौर पर पार्टी के दौरान हुसैन और उसके सहयोगियों के बीच किसी बात पर बहस हो गई और देखते ही देखते विवाद ने बड़ा रूप ले लिया। विवाद को शांत कराने के लिए सुरक्षा गार्ड को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। लगभग आधी रात को अपार्टमेंट में से एक कॉल गर्ल खून से लथपथ हालत में बाहर आई और मदद के लिए चिल्लाने लगी। उसकी आवाज सुनकर पड़ोसी उसके बचाव में आए और पुलिस में फोन किया।

इस बीच कुख्यात अपराधी ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। जब पुलिस ने दरवाजा खटखटाया, तो अपराधी ने अपार्टमेंट से भागने की कोशिश की, जो कि चौथी मंजिल पर था। एक पुलिस अधिकारी ने जानकारी देते हुए बताया, “जब पुलिस ने दरवाजा खटखटाया, तो हुसैन ने पर्दे का उपयोग करके बालकनी से फिसलने की कोशिश की। लेकिन जल्द ही उसने पकड़ खो दी और नायलॉन की रस्सी से लटकने की कोशिश की। लेकिन उसकी पकड़ फिर से ढीली हो गई और वह लॉन में गिर गया।” इसके बाद हुसैन को आरजी कर अस्पताल ले जाया गया, जहाँ पहुँचने पर उसे मृत घोषित कर दिया गया।

फोरेंसिक विशेषज्ञ तन्मय मुखर्जी ने एबीपी आनंद को घटना के बारे में बताते हुए कहा, “फ्लैट के भीतर लड़ाई के निशान हैं। हमने पूरे अपार्टमेंट में खून के धब्बे पाए हैं। आरोपित ने अपार्टमेंट के पर्दे का उपयोग करके भागने की कोशिश की थी लेकिन वह असफल रहा। उसने पिछले दरवाजे से भी भागने की कोशिश की थी, मगर इसमें भी वह सफल न हो सका।

पुलिस ने क्राइम सीन से सिगरेट, शराब और टूटी बोतलों का एक बड़ा भंडार बरामद किया है। उसी समय, क्राइम सीन की जाँच करने के लिए फोरेंसिक टीम को बुलाया गया। पुलिस ने पुलिस अधिकारी, कुक और टीएमसी नेता के ड्राइवर को हिरासत में लिया है। इसके अलावा दोनों कॉल गर्ल से भी पूछताछ की जा रही है।

जिन्ना समर्थक हिन्दू अर्थशास्त्री बृज नारायण: जिन्हें मजहबी भीड़ ने उनके मजहब के लिए मार डाला

जिन्ना और पाकिस्तान का समर्थन एक बार फिर चर्चा में है। इसके पीछे पहला और सबसे ताजा कारण कॉन्ग्रेस द्वारा बिहार चुनावों में एक जिन्ना समर्थक को टिकट दिया जाना है और दूसरा कारण जिन्ना को मीडिया गिरोह द्वारा निरंतर ही मिलते रहने वाली सहानुभूति और उस मजहबी विचारधारा का महिमामंडन है। ऐसे में कुछ ऐसे नाम भी हैं, जो कॉन्ग्रेस प्रत्याशियों से भी बहुत पहले से जिन्ना में यकीन रखते थे, मगर उनका दुर्भाग्य था कि जिस जिन्ना और पाकिस्तान को उन्होंने भारत के बदले चुना, वो उनके चुनाव से इन्साफ नहीं कर सके। जिन्ना और जिन्ना के ‘पाकिस्तान’ ने उन्हें तलाशा और उनकी मजहबी पहचान के लिए उनकी हत्या कर डाली।

हालाँकि, ऐसे लोग प्रभावशाली ‘बुद्धिजीवी’ लोग थे, जो ‘सेक्युलर’ होने के नाम पर पाकिस्तान के समर्थन में रहे और आखिर में उन्हें इसका नतीजा गुमनामी या फिर मजहबी भीड़ द्वारा दी गई क्रूरतम मौत के रूप में चुकाना पड़ा। इसी कड़ी में पाकिस्तान के ‘धर्मनिरपेक्ष’ जिन्ना और पाकिस्तान के हिन्दू समर्थक अर्थशास्त्री प्रोफेसर बृज नारायण (Professor Brij Narayan) की नृशंस हत्या का भी जिक्र हुआ है।

विभाजन के बाद जहाँ दूसरे समुदाय के कई लोगों ने भारत में रहना चुना तो वहीं, पाकिस्तान को चुनने वाले हिन्दुओं की संख्या भी कम नहीं थी। इन्हीं में से एक थे प्रगतिशील अर्थशास्त्री प्रोफेसर बृज नारायण, जो लाहौर यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख थे। पाकिस्तान और जिन्ना समर्थक प्रोफेसर बृज नारायण ने लाहौर में ही रहने का विकल्प चुना था। दुर्भाग्यवश बृज नारायण की उनके कार्यालय में ही हिन्दुओं को तलाश रही एक मजहबी भीड़ ने हत्या कर दी, बावजूद इसके कि बृज नारायण जिन्ना समर्थक थे।

11 अगस्त, 1947 को, जिन्ना ने पाकिस्तान संविधान सभा में एक भाषण दिया था, जिसमें सभी पाकिस्तानी नागरिकों को उनके धर्म या जातीयता के बावजूद समान अधिकारों की घोषणा की थी। हालाँकि जो उन्होंने कहा, वह पाकिस्तान की वास्तविकता से एकदम उलट था।

जिन्ना ने दावा किया था कि उनके समुदाय की सरकार स्वतः ही निष्पक्ष होगी क्योंकि लोकतंत्र उनके खून में है। इसके साथ ही उन्होंने यही सलाह समुदाय के उन लोगों को भी दी जो भारत में ‘वफादार भारतीय नागरिक’ बनने के लिए रहे और उन्होंने उम्मीद की कि भारत सरकार (कॉन्ग्रेस के तहत) उनके प्रति निष्पक्ष और सुरक्षात्मक होगी।

आश्चर्य की बात यह है कि कुछ हिंदू भी जिन्ना की धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करते रहे और उनमें से कुछ पाकिस्तान में ही रहकर अपनी सेवा देना चाहते थे। इन्हीं में से जिन्ना के एक ऐसे ही हिंदू प्रशंसक थे- लाहौर के प्रमुख अर्थशास्त्री प्रोफेसर बृज नारायण, जिनकी भीड़ ने निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी। भीड़ ने निकोलसन रोड स्थित उनके घर पर धावा बोला और उनकी नृशंस हत्या कर दी। इस दौरान वो उस हिंसक भीड़ से मिन्नतें करते रह गए कि वह पाकिस्तान और जिन्ना के समर्थक हैं, मगर भीड़ ने उनकी एक न सुनी और मौत के घाट उतार दिया।

प्रोफेसर बृज नारायण की मॉब लिंचिंग एक सुनियोजित हत्या थी या नहीं यह नहीं कहा जा सकता, लेकिन जिस भीड़ ने उन्हें अपना शिकार बनाया, उसे सिर्फ हिंदुओं को मारना था। 2 दिन पहले जहाँ लाहौर आधा हिन्दू और आधा सिखों से भरा हुआ था, उसी लाहौर में महज 2 दिन में सिर्फ मुस्लिम बाकी रह गए।

बृज नारायण सिंह भीड़ से यही कहते रहे कि वो पाकिस्तान और जिन्ना समर्थक हैं। बताया जाता है कि इस्लामी भीड़ की पहली टुकड़ी ने उन्हें छोड़ भी दिया था, लेकिन उन्मादियों की दूसरी भीड़ शायद दलीलें नहीं चाहती थीं, ना ही उन्हें हिन्दुओं की किसी मुल्क और उसके कानून के प्रति आस्था का सबूत चाहिए था।

हिन्दू और प्रगतिशील होने के साथ-साथ सेक्युलर विचारधारा में यकीन रखने वाले अर्थशास्त्री प्रोफेसर बृज नारायण ने तर्क दिया था कि पाकिस्तान बनने से आर्थिक स्थिति को मजबूती ही मिलेगी। उनके द्वारा लिखे गए कई लेख भी इसकी पुष्टि करते हैं, मगर जब कट्टरपंथियों ने दंगे करने और हिन्दुओं को चुन-चुनकर मारना शुरू किया तो उन्होंने पाकिस्तान समर्थक सेक्युलर हिन्दुओं को भी नहीं छोड़ा। मुस्लिम लीग और कॉन्ग्रेस के कैडरों ने निर्दोष लोगों पर हिंसक हमलों में भाग लिया।

जिन्ना ने उन्हें यकीन दिलाया था कि एक बार पाकिस्तान अस्तित्व में आया और सत्ता की बागडोर उसके हाथों में थी, तो हालात सामान्य हो जाएँगे। प्रोफ़ेसर बृज नारायण जैसे कितने ही लोगों ने जिन्ना के शब्दों पर यकीन भी जताया और अपना भाग्य एक हिंसक मजहब के सेकुलर आवरण के भरोसे रख दिया।

इसी तरह बंगाल के दलित नेता थे जोगेंद्र नाथ मंडल। पाकिस्तान के जन्मदाताओं में से वो भी एक थे। सन 1940 में कलकत्ता म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में चुने जाने के बाद से ही खास समुदाय की उन्होंने खूब मदद की। उन्होंने बंगाल की एके फज़लुल हक़ और ख्वाजा नज़ीमुद्दीन (1943-45) की सरकारों की खूब मदद की और 1946-47 के दौरान मुस्लिम लीग में भी उनका योगदान खूब था। इस वजह से जब कायदे आज़म जिन्ना को अंतरिम सरकार के लिए पाँच मंत्रियों का नाम देना था तो एक नाम उनका भी रहा।

जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान के पहले श्रम मंत्री भी थे। सन 1949 में जिन्ना ने उन्हें कॉमनवेल्थ और कश्मीर मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी। इस 1947 से 1950 के बीच ही पाकिस्तान में हिन्दुओं पर लौमहर्षक अत्याचार होने शुरू हो चुके थे। दरअसल हिन्दुओं को कुचलना कभी रुका ही नहीं था। बलात्कार आम बात थी। हिन्दुओं की स्त्रियों को उठा ले जाना जोगेंद्र नाथ मंडल की नजरों से भी छुपा नहीं था। वो बार-बार इन पर कार्रवाई के लिए चिट्ठियाँ लिखते रहे।

इस्लामी हुकूमत को ना उनकी बात सुननी थी, ना उन्होंने सुनी। हिन्दुओं की हत्याएँ होती रहीं। जमीन, घर, स्त्रियाँ लूटी जाती रहीं। कुछ समय तो जोगेंद्र नाथ मंडल ने प्रयास जारी रखे। आखिर उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने किस पर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है। जिन्ना की मौत होते ही 1950 में जोगेंद्र नाथ मंडल भारत लौट आए। पश्चिम बंगाल के बनगांव में वो गुमनामी की जिन्दगी जीते रहे। अपने किए पर 18 साल पछताते हुए आखिर 5 अक्टूबर 1968 को उन्होंने गुमनामी में ही आखरी साँसें लीं।

समझिए गणित के 100 समीकरणों से कैसे बना माँ दुर्गा का चित्र: प्राचीन भारत, जिसने गणित से ईश्वर को प्राप्त करना सिखाया

आज हम आपको एक वीडियो दिखाने वाले हैं, जिसमें गणित के समीकरणों (Equations) की मदद से माँ दुर्गा की तस्वीर उकेरी जाता है। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि जैसे-जैसे गणित के अलग-अलग समीकरण डाले जाते हैं, वैसे-वैसे अलग-अलग आकृतियाँ बनती हैं और अंत में माँ दुर्गा के चेहरे की तस्वीर बन कर उभरती है। यहाँ हम ये तो जानेंगे ही कि ये कैसे हो रहा है, लेकिन साथ में ही भारत में गणित और ईश्वर के साथ आध्यात्मिक जुड़ाव की भी बात करेंगे।

गणित के समीकरणों की मदद से कैसे बनी माँ दुर्गा की तस्वीर?

इस ग्राफ का सोर्स ऑनलाइन ग्राफ़िंग प्लेटफॉर्म ‘Desmos’ है, जहाँ से इसे बनाया गया है। लेकिन, इसमें सबसे कमाल की बात है कि अलग-अलग आकृतियों के लिए अलग-अलग समीकरणों को डिराइव करना और फिर उसे सटीक क्रम में लगाना। ग्राफ में एक-एक बिंदु का महत्व होता है और पिक्सेल्स व स्क्रीन के आकर के हिसाब से इसे सजाने के लिए अलग-अलग गणितीय समीकरणों को लगाना ही इस वीडियो की खासियत है।

अर्थात, जिसने भी ‘Desmos’ पर ये समीकरण डाले होंगे उसे क्रमशः उसी तरह से ग्राफ प्राप्त होता गया होगा और अंत में ये तस्वीर बनी। इस तस्वीर के लिए गणित के एक-दो नहीं, बल्कि लगभग 100 समीकरण प्रयोग में लाए गए हैं और उन्हें देख कर लगता नहीं कि ये आसान हैं। सभी समीकरण अपने-आप में कई गणितीय कैलकुलेशंस समाए हुए हैं। इसके बाद एक-एक करके हर समीकरण को एक्टिवेट किया जाता है, और उसका ग्राफ मिलता चला जाता है।

जैसे, एक स्ट्रेट लाइन का ग्राफ बनाने के लिए आप ‘y = 2x+1‘ लीनियर एक्वेशन का प्रयोग कर सकते हैं। ये एक बेसिक और साधारण उदाहरण है। इसी तरह से वृत्त और त्रिभुज से लेकर पैराबोला और हायपरबोला तक के लिए अलग-अलग समीकरणों का प्रयोग किया जाता है और उन्हें कैसे और कहाँ एडजस्ट करना है ताकि मनपसंद ग्राफ आए, इसमें दिमाग लगाना पड़ता है। इसी तरह से माँ दुर्गा की भौं और आँखें वगैरह बनाने के लिए समीकरणों का प्रयोग किया गया है।

जैसे माँ दुर्गा की नाक में जो नथुनी है, वो वृत्ताकार है। इसी तरह से समीकरणों के हिसाब से ग्राफ कहाँ मिलना चाहिए, उसी हिसाब से उन्हें शिफ्ट किया जाता है। ये तो थी तकनीकी चीजें कि कैसे इस ग्राफ को बनाया गया। 20वीं सदी के पहले और दूसरे दशक में अपने ज्ञान और प्रतिभा से पूरी दुनिया को लोहा मनवाने वाले भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन भी गणित और ईश्वर को एक साथ जोड़ कर देखते थे।

उन्होंने कहा था कि उनके लिए किसी भी गणितीय समीकरण का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक वो ईश्वरीय विचार को व्यक्त न करे। यानी, हर समीकरण को वो ईश्वर से जोड़ कर देखते थे और फिर आगे बढ़ते थे। जो नास्तिक हैं और ईश्वर में विश्वास नहीं रखते, उनके लिए भी एक तरह से कहा जा सकता है कि गणित जो है, वो इस ब्रह्मांड की भाषा है। किसी भी चीज को गणितीय समीकरण के रूप में डिराइव किया जा सकता है।

श्रीनिवास रामानुजन किसी भी फिजिकल या मेटा-फिजिकल चीज को गणितीय समीकरणों के रूप में देखा करते थे। इसीलिए, उन्होंने ऐसे-ऐसे समीकरण बनाए, जो सभी के पल्ले भी नहीं पड़ती थी और उन्हें समझने के लिए आज भी लगातार रिसर्च हो ही रहे हैं। इसी तरह आप स्विस गणितज्ञ लियोनार्ड ओइलर का उदाहरण भी ले सकते हैं। यहाँ ये समझने की ज़रूरत है कि जितने भी ईश्वरीय रूप हैं, उनका मूल प्रकृति ही है।

भारत, जिसने हमेशा गणित को ईश्वर को प्राप्त करने का माध्यम माना

भारत में तो हमेशा से प्रकृति की पूजा होती आई है। यहाँ वैदिक काल से ही ये चला आ रहा है। दुनिया की सबसे प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद में अग्नि की स्तुति के साथ ही शुरुआत की जाती है। तो, हम कह सकते हैं कि गणित एक ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा एक नास्तिक भी ईश्वर की पूजा कर सकता है। इसी मामले में हम हमेशा से सभ्यताओं से आगे रहे हैं। हमने गणित और प्रकृति के संबंधों को समझा है और ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम बनाया है।

पश्चिमी सभ्यता की सोच हमेशा से ‘बिजनेस ड्रिवेन’ रही है, लीनियर रही है। हमारे साथ ऐसा नहीं है। हम अनिश्चितताओं के साथ खुद का तालमेल बिठाने में हमेशा से अभ्यस्त रहे हैं। यही कारण है कि हम शून्य (0) और अनंत (∞) के साथ तालमेल बिठाते आए हैं। हमने ईश्वर और मनुष्य के अंतर को इस रूप में देखा है कि जहाँ ईश्वर अनंत है, वहीं मनुष्य अनंत बार जन्मता-मरता है। और ये क्रम, ये सायकल, चलता ही चला जाता है।

भारत में हमेशा से शून्य (0) और अनंत (∞) की चर्चा होती आई है और इन दोनों के माध्यम से हर चीज को समझने की कोशिश होती आई है। पूरी दुनिया में आज भी एक हिस्सा है, जो अपने मजहब के आधार पर दुनिया को गोल मानता है। लेकिन, हम कभी इस बात पर आश्चर्यचकित नहीं रहे कि दुनिया गोल है। क्यों? क्योंकि हमें ये बातें आदिकाल से मालूम थी। ये गणित को लेकर हमारी समझ का ही कमाल था।

हालाँकि, पश्चिमी सभ्यता के लिए ये काफी बड़ा शॉक बन कर आया था कि अरे, पृथ्वी गोल है? आज भी ‘वर्ल्ड इज फ्लैट’ कर के एक संस्था है, जो इन बातों को नकारती है। तो भले ही ये पश्चिमी जगत के लिए एक खोज था, प्राचीन भारत के लिए एक ऐसी चीज थी, जो उनकी समझ में पहले से समाई हुई थी। आप भारत की प्राचीन संरचनाओं को ही ले लीजिए, आपको पता चलेगा कि हम शुरू से ही ज्योमेट्री और सीमेट्रीसिटी को लेकर अच्छी समझ रखते हैं।

हजारों उदाहरण हैं लेकिन गुजरात स्थित मोढेरा का सूर्य मंदिर को हम यहाँ देख सकते हैं। साल में दो बार ऐसा होता है, जब पृथ्वी की भूमध्य रेखा से सूर्य के केंद्र का आमना-सामना होता है। इसे Equinox कहते हैं। 20 मार्च और 23 सितम्बर के आसपास हर साल यह होता है। सीधे शब्दों में कहें तो यही वो मौका होता है जब सूर्य का केंद्र सीधा भूमध्य रेखा के ऊपर होता है। जब Equinox के दिन सूर्योदय होता था तो सूर्य की किरणें सबसे पहले यहाँ सूर्य की प्रतिमा के सिर पर स्थित हीरे के ऊपर पड़ती थी। इसके बाद पूरा मंदिर स्वर्ण प्रकाश से नहा जाता था।

सीमेट्रीसिटी हमारी पुरानी संरचनाओं का एक अहम भाग रहा है। क्यों? क्योंकि एक ऐसा ही समभाव, एक ऐसी ही सीमेट्रीसिटी आपको प्रकृति हर जगह दिखाती है। ये प्रकृति की एक खासियत है। इसीलिए, प्राचीन भारत की हर संरचनाओं में इसका इस्तेमाल किया जाता था, परफेक्शन के साथ। हम प्रकृति के साथ कितने सहज थे और कितने अच्छे तरीके से उसे समझते थे, उसका ये एक अहम प्रमाण है।

गणित और उसके समीकरणों पर आधारित रहा है हमारा आध्यात्मिक इतिहास

हमारी जो ‘Thought Process’ थी, यानी हमारी जो सोच-विचार की प्रक्रिया थी, हमारा जो दर्शन था, वो हमेशा से गणित पर आधारित रहा है। कहा जाता है कि गणित ‘प्राकृतिक दर्शन (Natural Philosophy)’ का ही एक भाग है। यहाँ तक कि अध्यात्म में भी हम गणित का इस्तेमाल करते थे। दुनिया की कई सभ्यताओं में 16वीं शताब्दी से पहले भी एक से बढ़ कर एक गणितज्ञ हुए हैं, जो मेटा-फिजिक्स में भी पारंगत रहे हैं।

भारत में 7वीं शताब्दी में ही ब्रह्मगुप्त हुए थे, जिन्होंने गणित और खगोलीय ज्ञान से दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया। उन्होंने इस पर पुस्तकें लिख कर शून्य (0) की गणना की प्रक्रियाएँ समझाईं। उनके सारे टेक्स्ट अंडाकार, या दीर्घवृत्तीय रूप में हैं। उस समय संस्कृत में ऐसा ही किया जाता है। यानी, हमारी भाषा और उसका साहित्य भी गणित की समझ के हिसाब से लिखे जाते थे। खगोलीय विज्ञान भी प्लेनेट मोशन का कैलकुलेशन है।

गैलीलियो ने भी इसकी गणना की थी। हालाँकि, खगोलीय विज्ञान को व्यक्ति के जीवन के साथ कैसे जोड़ा जाता है या फिर इसका किसी के जन्म-मरण पर क्या प्रभाव है – इस पर बहस हो सकती है। लेकिन, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इन सबका आधार गणित ही रहा है। किसी भी सिद्धांत को साबित करने के लिए ‘causality’ या कारण स्पष्ट होना चाहिए। कोई भी चीज क्यों और कैसे हो रही, उसे गणितीय ढंग से साबित किया जा सकता है।

आप कह सकते हैं कि महान ब्रिटिश वैज्ञानिक न्यूटन से पहले ‘नेचुरल फिलॉसोफी’ और विज्ञान एक-दूसरे के साथ ही चलते थे लेकिन उसके बाद वैज्ञानिकों ने इन दोनों को अलग-अलग रूप में लेना शुरू किया और विज्ञान एक अलग ब्रांच बन कर उभरा। इसीलिए, प्राचीन भारतवर्ष में जो गणितज्ञ रहे हैं, वो ऋषि भी रहे हैं। क्योंकि वो गणित और ईश्वर को साथ में देखते थे। वो प्रकृति का अध्ययन करते थे, इसीलिए गणित और ईश्वर को साथ में देखते थे।

भारत में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे विद्वानों ने हमेशा से गणित और ईश्वर को साथ में देखा। यहाँ आपको एक काफी रोचक चीज भी बताना चाहेंगे। केरल में 14-16वीं शताब्दी में ही ‘केरला स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी’ (केरलीय गणित समुदाय) का संचालन होता था, जिसकी स्थापना ‘संगमग्राम के माधव’ ने की थी। उनका त्रिकोणमिति, बीजगणित और ज्यामिति के अध्ययन में अहम योगदान था।

उन्होंने ही दुनिया में सबसे पहले π (Pi) की गणना ट्रिगोनोमेट्री के रूप में दी थी। केरल के इस गणितीय समुदाय ने एक के बाद एक आगे बढ़ कर कई समीकरण दिए, जिनका काफी बाद में अध्ययन हुआ और दुनिया भर में लोकप्रिय हुए। यानी, हमारी प्राचीन सभ्यता गणित को लेकर निश्चितता (समीकरण और डेरिवेशन) और ईश्वर को लेकर अनिश्चितता, इन दोनों के साथ ही तारतम्य बिठाने में काफी कुशल हुआ करते थे।

इसी तरह ‘Metaphysics’ दर्शन की वह शाखा है जो किसी ज्ञान की शाखा के वास्तविकता (Reality) का अध्ययन करती है। भारतीय सभ्यता में ‘Personification’ का एक ट्रेंड रहा है, जैसे उन्होंने नदियों, पहाड़ों और प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों को जहाँ एक व्यक्ति के रूप में देखा, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने गणित के माध्यम से ईश्वर को डिराइव करने की चेष्टा भी जारी रखी। आज जब गणितीय समीकरणों से माँ दुर्गा की तस्वीर बनाना संभव है, तो ऐसी चीजों को विकसित करने में भारत का बड़ा योगदान है।

राजस्थान: 2 नाबालिग बहनों को 4 युवकों ने बनाया अपनी हवस का शिकार, अपहरण, गैंगरेप के बाद पहाड़ियों पर फेंका

राजस्थान से आए दिन रेप की घटनाएँ सामने आ रही हैं। ताजा मामला जालोर के भीनमाल थाना क्षेत्र का है। यहाँ दो नाबालिग बहनों का अपहरण करके 4 युवकों (कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक 6 युवक) ने उनके साथ गैंगरेप किया। बाद में पहाड़ की झाड़ियों में घायल अवस्था में छोड़कर फरार हो गए। स्थानीय लोगों ने इसकी सूचना पुलिस को दी। फिर ऑटोरिक्शा से लड़कियों को अस्पताल पहुँचाया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भीनमाल क्षेत्र के एक गाँव से इन दोनों चचेरी बहनों का अपहरण शनिवार रात (अक्टूबर 17, 2020) उस समय हुआ जब वह अपने घर सो रही थी। चार युवकों ने इनका पहले अपहरण किया फिर बच्चियों को एक सुनसान स्थान पर ले जाकर उनके साथ दुष्कर्म किया।

वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपित इन दोनो बच्चियों को राजपुरा की पहाड़ियों पर फेंककर फरार हो गए। वहीं परिजन पूरी रात बच्चियों की खोजबीन करते रहे। काफी मशक्कत के बाद दोनों बच्चियाँ पहाड़ियों पर मिलीं। इन्हें इलाज हेतु अस्पताल ले जाया गया। वहाँ एक पीड़िता की हालत गंभीर बनी हुई है।

जी न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस अधिकारियों ने बताया कि पूरी वारदात के मद्देनजर लड़कियों के परिजनों ने 4 युवकों (चेतनराम, अशोक, तेजाराम, पीराराम) को नामजद किया है। उनकी तलाश में पुलिस लगातार दबिश दे रही है। फिलहाल, उनका कोई सुराग नहीं है।

बता दें कि राजस्थान पुलिस को इस संबंध में सूचना कल सुबह-सुबह ही मिल गई थी, लेकिन पुलिस पहले तो लड़कियों को तलाशने की बात कहकर इधर-उधर करती रही। फिर करीब 11 बजे जाकर लड़कियाँ राजपुरा की पहाड़ियों पर खून से लथपथ हालत में मिली। इनमें एक बच्ची की हालत बेहद गंभीर थी कि वह अपने पैरों पर भी नहीं उठ पा रही थी।

चुरू विधायक राजेंद्र राठौर ने इस घटना के मद्देनजर लिखा, “जालोर के भीनमाल में दो नाबालिग लड़कियों को अगवा कर आधा दर्जन युवकों द्वारा गैंगरेप की घटना को अंजाम देना मानवता को शर्मसार करने वाला है। ऐसे कृत्य स्वयं ही प्रदेश में सरकार द्वारा राज्य में महिलाओं और बच्चियों के लिए किए जा रहे सुरक्षा इंतजामों पर सवालिया निशान है।”

पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे लिखती हैं, “राजस्थान में हर रोज़ हो रहे दुष्कर्म की घटनाओं ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। भीनमाल (जालोर) में दो नाबालिग बच्चियों के साथ किए गए गैंगरैप ने यह साबित कर दिया है कि राजस्थान में ना कोई कानून – व्यवस्था दिखाई देती और ना ही कोई सरकार।”

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों राजस्थान में महिलाओं की सुरक्षा पर सख्ती की पोल खोलती एनसीआरबी की रिपोर्ट सामने आई थी। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि राजस्थान में महिलाएँ सबसे ज्यादा बलात्कार का शिकार होती हैं। इसमें दिए आँकड़ों के अनुसार वहाँ पिछले साल 5997 मामले दर्ज किए गए थे। यानी प्रतिदिन का औसत देखा जाए तो प्रदेश में हर दिन 16 रेप की घटना हुईं। सूची, रेप पीड़िताओं की संख्या भी प्रदेश में 6051 बताती है। इतना ही नहीं प्रदेश में प्रति लाख जनसंख्या पर अपराध की दर 15.9 है।

पेरिस घटना की निंदा को ट्विटर ने ‘हेट स्पीच’ बताकर अकाउंट किया सस्पेंड

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्विटर’ की अच्छी समझ और बड़ी फॉलोवर्स संख्या होने के बाद भी यदि आप गैर वामपंथी विचाराधारा के हैं, तो आपका वहाँ टिका रह पाना बेहद मुश्किल है। यह बात पेरिस में हुए अटैक के बाद एक बार फिर तब साबित हुई जब इस घटना की निंदा करने पर एक ट्विटर अकॉउंट को सस्पेंड कर दिया गया। यह ट्विटर अकॉउंट मिक्कू (@effucktivehumor) नाम के युवक का है। इन्होंने पेरिस में पैगम्बर मोहम्मद का चित्र दिखाने पर एक छात्र द्वारा अपने शिक्षक का गला काट देने की घटना की निंदा की थी और दिल्ली, बेंगलुरु, मल्मो और पेरिस में हुई घटनाओं को एक जैसा बताया था। 

इस अकॉउंट के सस्पेंड किए जाने के बाद यूजर को बताया गया कि उन्होंने हेट स्पीच के कारण ट्विटर के नियमों का उल्लंंघन किया है। हालाँकि इस सफाई में यह नहीं बताया गया कि आखिर कैसे एक आतंकी हमले का विरोध करने से कोई सोशल मीडिया यूजर ‘हेट स्पीच’ का दोषी हो जाता है। बता दें कि जिस समय मिक्कू का अकॉउंट सस्पेंड किया गया उस समय उनके प्लैटफॉर्म पर 20,000 फॉलोवर्स थे।

ट्विटर द्वारा अकाउंट सस्पेंड करने पर दिया गया स्पष्टीकरण

इस अकॉउंट के बंद किए जाने के बाद ऐसा अनुमान है कि यूजर को सुनियोजित ढंग से निशाना बनाया गया क्योंकि ट्विटर ने यूजर को बताया है कि उनके कुछ अन्य ट्विट्स को लेकर भी रिपोर्ट की गई है जबकि, ये ट्वीट किसी भी तरह के नियम का उल्लंघन नहीं करते थे।

ऑपइंडिया ने इस संबंध में यूजर से संपर्क किया। हमसे बातचीच में मिक्कू ने बताया कि अकॉउंट सस्पेंड होने के बाद उन्होंने अपील फाइल की है। अपनी अपील में उन्होंने कहा कि उन्हें पक्का नहीं पता कि किस कारण अकॉउंट सस्पेंड हुआ। वह कहते हैं:

“मैनें कभी किसी व्यक्ति, समुदाय और धर्म के ख़िलाफ़ अपशब्द नहीं कहे, धमकी नहीं दी और घृणा भी नहीं फैलाई। मैंने कभी अपने अकॉउंट या बहुत सारे अकॉउंट को किसी भी गलत कारण से प्रयोग नहीं किया। मैं ट्विटर की सीमाओं में रहकर अपने अकॉउंट को बढ़ा रहा था। मैं अपनी सामग्री के प्रति बहुत सजग था और इस बात का ख्याल रखता था कि मेरे ट्वीट से कोई आहत न हो। फिर भी मेरे अकॉउंंट को सस्पेंड कर दिया गया। समझ नहीं आ रहा क्या गलती हुई।

गौरतलब है कि ट्विटर अमूमन किसी भी अपील का रिप्लाई करने में 1 से 2 दिन लगाता है। ऐसे में यूजर प्लैटफॉर्म के एकतरफा रवैये को बेहद निराशजनक बताता है और कहता है कि यहाँ वामपंथियों के अकॉउंट को बनाए रखकर नफरत फैलाने की आजादी है लेकिन पॉपुर ट्विटर अकॉउंट्स जो वामपंथी विचारधारा का अनुसरण नहीं करते उन्हें उनके सामान्य ट्वीट के लिए सस्पेंड कर दिया जाता है।

बता दें कि हाल में पेरिस में एक शिक्षक ने क्लास के दौरान ‘शार्ली एब्दो’ अख़बार में प्रकाशित पैगम्बर मोहम्मद का कार्टून दिखाया था, जिसके बाद उसका सिर कलम कर के उसकी हत्या कर दी गई। बाद में पुलिस ने भी हत्यारे को मार गिराया। उसने एक किचेन नाइफ का प्रयोग करते हुए शिक्षक का सिर कलम किया था। पुलिस ने जानकारी दी थी कि हत्यारा मॉस्को चेचन्या मूल का मुस्लिम था।

रिपब्लिक टीवी के खिलाफ बड़ी रणनीति तैयार, कोई नहीं रोक सकता बैन होने से: कॉन्ग्रेस नेता ने स्टिंग में किया खुलासा

महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस से खींचतान के बीच रिपब्लिक टीवी कॉन्ग्रेस हेडक्वार्टर के भीतर से एक स्टिंग लेकर आया है। इस स्टिंग को लेकर मीडिया चैनल का दावा है कि इससे मालूम पड़ रहा है कि महाआघाड़ी सरकार ने रिपब्लिक टीवी को सुनियोजित ढंग से टारगेट किया।

उन्होंने इस स्टिंग के आधार पर अभी तक हुई कार्रवाई को राजनीतिक षड्यंत्र बताया। यह वीडियो कॉन्ग्रेस हेडक्वार्टर के भीतर की बताई जा रही है। इसमें कॉन्ग्रेस नेता राघवेंद्र शुक्ला बताते नजर आ रहे हैं कि कैसे रिपब्लिक टीवी को बंद करने के प्रयास उद्धव सरकार की ओर से किए जा रहे हैं।

इस स्टिंग में देख सकते हैं कि शुक्ला पहले सीएम ठाकरे की पैरवी करते हैं और फिर दावा करते हैं कि रिपब्लिक टीवी बैन होगा। इसे तय कर लीजिए। उसको बैन होने से कोई नहीं बचा सकता है। इसके बाद स्टिंग करने वाली महिला साफ शब्दों में पूछती है कि मतलब ये सब सरकार की ओर से चल रहा है, तो व्यक्ति कहता है -“हाँ।”

फिर कॉन्ग्रेस नेता बताते है कि उद्धव ठाकरे ने रिपब्लिक टीवी के पीछे पूरी एक टीम लगाई है। उन्हें निर्देश दिए गए हैं कि उन्हें कोई दूसरा काम नही करना है। उसे समझ आना चाहिए कि वो क्या बोलता है।

फिर स्टिंगर पूछती है कि ये सब महाराष्ट्र सरकार की ओर से हो रहा है या पुलिस की ओर से इस पर शुक्ला कहते हैं कि ये सरकार की ओर से चल रहा है। इसके लिए पूरी टीम तैयार है। इसमें आईएसएस, आईपीएस समेत पूरा महकमा है। टीम काम पर लग चुकी है। जैसे अभी टीआरपी का मामला आया। अभी एक मामला दो दिन बाद भी आ जाएगा।

जब आगे स्ट्रिंगर रिपब्लिक टीवी के पीछे लगी टीम के संबंध किस ब्यूरो से है पूछती हैं तो राघवेंद्र जवाब देते हैं कि बात ब्यूरोक्रेसी की नहीं है। प्रशासन में ही बहुत टीमें होती हैं। वह कहते हैं कि इन टीमों में पुलिस को लेकर वह कुछ नहीं कह सकते, मगर ये पक्का है कि कोई न कोई शामिल है।

राघवेंद्र अपनी वीडियो में बताते हैं कि अर्नब गोस्वामी को उनके स्वभाव के कारण टारगेट किया जा रहा है। वह कहते हैं कि अर्नब किसी को कुछ भी समझने की कोशिश नहीं करते। वह (उद्धव ठाकरे) आज सीएम हैं। कुछ तो काबिलियत होगी कि वह मुख्यमंत्री बने। इसके बाद रिपब्लिक भारत के ख़िलाफ़ रणनीति का खुलासा करते हुए शुक्ला कहते हैं कि रिपब्लिक टीवी प्रतिबंधित तो होगा।

बता दें, इस खुलासे के बाद से लगातार कई क्षेत्रों के दिग्गज महाआघाड़ी सरकार की निंदा कर रहे हैं। धर्मगुरू आर्चाय तुषार भोसले ने कहा, “रिपब्लिक मीडिया के खिलाफ सोनिया सेना और उद्धव ठाकरे द्वारा जो साजिश की जा रही है उसकी महाराष्ट का संत समाज निंदा करता है।”

वहीं प्रदीप भंडारी कहते हैं, “अगर किसी मीडिया चैनल को बंद करने की साजिश सरकार द्वारा खुले तौर पर की जा रही है, तो सुप्रीम कोर्ट को कार्रवाई करनी चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट के वकील केके मनन कहते हैं, “मैंने इस तरह का अत्याचार कभी नहीं देखा, बता दें कि देश के वकील इसके खिलाफ खड़े हैं।”

पत्रकार शाजिया इल्मी कहती हैं, “वाक-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अभियान चलाने वालों में से कोई नहीं इस पर बोल रहा, मैं अपने साथी पत्रकारों पर शर्मिंदा हूँ।”

2009: चीन ने जवानों पर चलाई गोली, तब 15 मिनट में राहुल गाँधी ने 100 किलोमीटर दूर फिंकवाया था चीनियों को

कॉन्ग्रेस के पूर्व-अध्यक्ष राहुल गाँधी मात्र 15 मिनट में चीन को भगाने का दावा करते हैं लेकिन ये भी याद करने की ज़रूरत है कि जब उनकी सरकार थी, तब क्या सच में ऐसा होता था? सितम्बर 2009 में यूपीए की दोबारा सरकार बनने के कुछ ही महीने बाद भारत-चीन तनाव शुरू हो गया था और तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सरकार ने सारा दोष मीडिया को ही मढ़ दिया था। उनका कहना था कि मीडिया ने जवानों की मौत को लेकर भ्रम फैलाया है।

आज जब कई पोर्टल्स चीन पर राहुल गाँधी के सेना और सरकार विरोधी स्टैंड को प्लेटफॉर्म देते हुए मोदी सरकार के खिलाफ लम्बे-लम्बे लेख लिखते हैं, तब के पीएम मनमोहन सिंह ने कहा था कि मीडिया भारत-चीन सीमा पर परिस्थितियों का ‘त्रुटिपूर्ण चित्रण’ कर रहा है। सरकार ने तब बीते साल से इसकी तुलना करते हुए दावा किया था कि 2009 में सीमा पर घुसपैठ का अतिक्रमण की घटनाएँ समान ही हुईं, उनमें बढ़ोतरी नहीं हुई।

2009 की खबर

दरअसल, सितम्बर 5, 2009 को एक अख़बार में खबर प्रकाशित हुई थी कि चीन द्वारा सीमा पर की गई फायरिंग में ITBP के दो जवान घायल हुए हैं। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने इसका खंडन किया था। तब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा था कि उन्होंने इस खबर को गंभीरता से लिया है और इसे आपराधिक कृत्य मानते हुए वो FIR दर्ज कराने जा रहा है। आज ऐसी हजारों रिपोर्ट्स प्राकशित होती हैं और देश के विरोध में लिखा जाता है।

बावजूद इसके किसी पत्रकार के खिलाफ फैक्ट्स के साथ जवाब भी दे दिया जाए तो इसे ‘FoE’ का हनन मान लिया जाता है। 11 साल पहले ऐसा नहीं था। तब उन पत्रकारों से यहाँ तक कह दिया गया था कि वो अदालत में प्रस्तुत हों और बताएँ कि उनका सूत्र क्या है, ये खबर कहाँ से आई? NSA एमके नारायणन ने तो इस मुद्दे को ही मीडिया हाइप करार दिया था। उनका कहना था कि ऐसी खबरों से कोई अपना नियंत्रण खो सकता है और सचमुच में बड़ी घटना हो सकती है।

आज राहुल गाँधी सहित सभी कॉन्ग्रेस नेता रोज चिल्ला-चिल्ला कर सरकार और सेना के खिलाफ स्टैंड लेते हुए चीन के कथित घुसपैठ की बात करते हैं, वो भी बिना तथ्यों के साथ। मीडिया में रोज सैकड़ों लेख छपते हैं, जिनमें चीन का एजेंडा फैलाया जाता है। किसी पर कार्रवाई नहीं हुई। लेकिन, यूपीए काल में एक खबर पर FIR हो जाया करती थी। आज राहुल गाँधी ‘हमारी सरकार होती तो..’ वाला राग अलापने में लगे हुए हैं।

दूरदर्शन न्यूज़ के पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने भी तब छपी ‘द हिन्दू’ की खबर की कटिंग शेयर की, जिसमें पत्रकारों पर FIR करने की बात की गई है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि राहुल गाँधी के चीन को 15 मिनट में भगाने का फॉर्मूला यही है कि 1 मिनट में घुसपैठ की खबर का खंडन और 14 मिनट में रिपोर्ट करने पत्रकारों पर FIR दायर हो जाती थी। उन्होंने कहा कि इसी तरह चीन को राहुल गाँधी ने ’15 मिनट में भगा दिया।’

याद कीजिए कि एक दौर था जब चीन ने हमला किया तो रिपोर्टिंग कैसे होगी यह कॉन्ग्रेस सरकार न सिर्फ तय करती थी बल्कि पत्रकारों पर केस दर्ज करने की बातें होती थीं। तब पत्रकारों की अभिव्यक्ति या फिर पत्रकारिता पर सत्ता का नियंत्रण, रिपोर्टरों को धमकाने जैसी ज्ञानवाणी नहीं निकलती थी। आज भी इसे ‘छोटी-मोटी’ बात कह दी जाती है। वहीं, दूसरी ओर अगर सरकार एक निजी संस्था (PTI) का अस्थायी कॉन्ट्रैक्ट रद्द होता है तो ये लोग हर तरह के विशेषण ले आते हैं और स्टेटमेंट प्रसारित की जाती है।

इससे पता चलता है कि ये संस्थाएँ, जो तथाकथित तौर पर पत्रकार या पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व करती दिखती हैं, वास्तव में कॉन्ग्रेस के चाटुकारों की फौज है जो स्लीपर सेल की तरह बाकी समय सुसुप्तावस्था में रहती है, लेकिन जब मोदी सरकार का कोई निर्णय नैतिक, कानूनी और तकनीकी, हर तौर पर, उचित हो, तब ये जग जाते हैं और प्रोपेगेंडा ढकेने लगते हैं। असली बात ये है कि अब इन्हें सत्ता के साथ मिल कर मलाई चाटने का मौका नहीं मिल रहा।

कमाल की बात यह है कि FIR की बात ‘द हिन्दू’ ने हेडलाइन की जगह छोटे फॉन्ट में लिख कर पूरी बात को ‘एँवई’ बनाने की कोशिश की है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि तब सरकार का पक्ष उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण रहा होगा और मीडिया की कथित स्वतंत्रता का मुद्दा बैकसीट पर। वहीं अब जब सरकार हर मामले में देशहित में ‘आउट ऑफ द बॉक्स’ फैसले कड़ाई से ले रही है, इन्हें मीडिया की आजादी याद आ रही है।

हाथरस में हुए सियासी ड्रामे और हरियाणा में कृषि बिलों में विरोध में ट्रैक्टर रैली करने के बाद पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी एक बार फिर से चीन वाले राग पर लौट आए थे और पीएम मोदी के लिए भी आपत्तिजनक भाषा का उपयोग किया था। उन्होंने दावा किया था कि भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ किसी दूसरे देश की सेना ने घुस कर यहाँ की जमीन पर कब्ज़ा कर रखा है। राहुल गाँधी ने कहा था कि अगर उनकी सरकार होती तो वो चीन को 15 मिनट में उठा कर बाहर फेंक देते।

उन्होंने कहा था कि पूरा देश जानता है कि चीन भारत के अंदर घुसा हुआ है। उन्होंने पीएम मोदी पर तंज कसते हुए कहा था कि वो अपने आप को देशभक्त कहते हैं और साथ ही पूछा था कि वो कैसे देशभक्त हैं? राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री के लिए ‘कायर’ शब्द का भी इस्तेमाल किया। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में शेखी बघारते हुए राहुल गाँधी ने कहा था कि अगर उनकी सरकार होती तो चीन को भारत में एक कदम भी नहीं रखने देती।

जम्मू कश्मीर को चीन का हिस्सा बता रहा है Twitter, रक्षा विशेषज्ञ ने लेह से ‘Live’ कर किया खुलासा

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर (Twitter) अब जम्मू कश्मीर को चीन का हिस्सा बता रहा है। रविवार (अक्टूबर 18, 2020) को रक्षा विशेषज्ञ नितिन गोखले ने एक लाइव ब्रॉडकास्ट के जरिए दिखाया कि कैसे ट्विटर (Twitter) अपनी ‘लोकेशन’ में जम्मू कश्मीर को चीन का हिस्सा बता रहा है। वो लेह के लोकप्रिय युद्ध स्मारक ‘हॉल ऑफ फेम’ से लाइव थे और इसी दौरान उन्होंने ट्विटर (Twitter) की इस गड़बड़ी को पकड़ा।

उन्होंने ट्विटर (Twitter) से पूछा कि आखिर वो जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा न बता कर चीन का भाग क्यों बता रहा है? ‘इन्क्रेडिबल इंडिया’ वेबसाइट के अनुसार, कारगिल युद्ध में भारतीय सूरमाओं की गाथा सुनाने वाला ये ‘हाल आफ फेम पर्यटकों’ का सिर गर्व से ऊँचा कर देता है। सैनिकों द्वारा उनके परिवारों को लिखे गए पत्र इस क्षेत्र में लड़े गए युद्धों के दौरान ली गई तस्वीरें और कारगिल युद्ध पर 30 मिनट की डॉक्यूमेंट्री हमारे सैनिकों की शौर्य गाथा की याद दिलाते हैं।

गोखले की ट्वीट के बाद कई यूजर्स ने अपने-अपने फोन में ट्विटर (Twitter) के लोकेशन में लेह को पिन किया और उनके भी वही परिणाम आए, जिसके बाद लोगों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जवाब माँगना शुरू कर दिया। लोगों का कहना है कि ये न सिर्फ भारत के आधिकारिक नक़्शे का अपमान है, बल्कि भारतीय नियमों का उल्लंघन भी है। आखिर, भारत में करोड़ों यूजर्स के साथ रुपए कमाने वाला ट्विटर ऐसा क्यों कर रहा है?

इससे ही जुड़ा एक मामला शाओमी (Xiaomi) मोबाइल फोन कम्पनी से जुड़ा है, जिसका मौसम का हाल बताने वाली एप्लीकेशन अरुणाचल प्रदेश के मौसम के बारे में जानकारी नहीं देता है। जब इस पर अरुणाचल की राजधानी ‘ईटानगर’ टाइप किया जाता है, तब कोई परिणाम नहीं आता है। इसके साथ ही ट्विटर पर ‘शाओमी जवाब दो’ ट्रेंड होने लगा, जिसमें लोगों ने कम्पनी से इस मामले में जवाब माँगा।

शाओमी अब ‘मेड इन इंडिया’ फोन्स बनाने का दावा तो करता है लेकिन लगता है कि पॉलिसी वो चीन की ही चला रहा है। अरुणाचल प्रदेश के शहरों के मौसम के बारे में नहीं बताने और जम्मू कश्मीर को चीन का भाग बताने के बाद शाओमी (Xiaomi) के खिलाफ सोशल मीडिया में कई ट्रेंड्स चल रहे हैं। वहीं लोगों ने जब नोकिया व अन्य नॉन-चीन कम्पनी के फोन्स में अरुणाचल प्रदेश के शहरों के मौसम का हाल शेयर किया, तब सब कुछ ठीक-ठीक बताया जा रहा था।