बातचीत का एक ऑडियो सुर्ख़ियों में आने के बाद कॉन्ग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी के सांसद वरुण गाँधी पर हमला करना शुरू कर दिया। सामने आए इस ऑडियो में भाजपा सांसद को साफ़ तौर पर ऐसा कहते हुए सुना जा सकता है कि रात के 9:30 बजे किसी को कॉल करने का सही समय नहीं होता है और वह उस व्यक्ति की बात सुबह सुनेंगे।
क्या @narendramodi जी आपको रात ९:३० बजे फोन करते तो आप उन्हें भी इसी प्रकार का उत्तर देते ?
माना आप किसी के बाप के नौकर नहीं है पर पिलभित के जनता के लोक प्रतिनिधि तो है, लोगों ने आपको वोट देकर चुना है और आपका १००% कर्तव्य है कि आप उनसे विनम्रता से पेश आए । pic.twitter.com/aLUFGhOmZV
कॉल करने वाले व्यक्ति ने बातचीत की शुरुआत में कहा कि वह पीलीभीत का रहने वाला है। इसके जवाब में पीलीभीत सांसद वरुण गाँधी ने कहा कि अगर उसे कोई ज़रूरी काम है तो वह सुबह कॉल कर सकता है। बातचीत के बीच में एक मौके पर उन्होंने कहा, “मैं आपके बाप का नौकर नहीं हूँ कि रात के 10 बजे आप से बात करूँ। अगर आपको आधी रात गए या रात के 10 बजे कोई काम है तो माफ़ करिए। मैं आप से इस वक्त बात नहीं कर सकता हूँ। यह कोई समय नहीं होता है किसी को कॉल करने का, आप शरीफ इंसानों की तरह सुबह कॉल कर सकते हैं।”
घटना के बाद वरुण गाँधी की संसदीय सचिव इशिता यादव ने इस पूरे मामले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कॉल करने वाला व्यक्ति कम उम्र के लड़कों को नकली शराब बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उन्होंने बताया, “वरुण गाँधी इस तरह के घटिया लोगों की मदद नहीं करने वाले हैं। इसके बदले उन्होंने पीलीभीत के लोगों की सुरक्षा करने का विकल्प चुना।” इशिता यादव की तरफ से यह प्रतिक्रिया तब आई जब वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट द वायर की पत्रकार रोहिणी सिंह ने इस मामले में दखल देने का प्रयास किया।
Rohini, you should truly be ashamed of yourself. This man called the MP to prevent himself from being arrested for selling spurious alcohol to underage children. Varun Gandhi is not going to help shady people like this. He chose to protect the people of Pilibhit instead. https://t.co/AB68kYmsl8pic.twitter.com/Eb62Lyjzcc
इशिता यादव ने यह भी बताया कि बातचीत की यह ऑडियो क्लिप एडिट की गई है। द वीक द्वारा प्रकाशित ख़बर में इस बात का खुलासा किया गया था कि कॉल करने वाला व्यक्ति सर्वेश पीलीभीत स्थित सनघड़ी इलाके के शिवाजी कॉलोनी का रहने वाला है। पुलिस ने उसके पास से देसी शराब की 20 बोतलें बरामद की थीं और 20 हज़ार के 2 बेल बांड भरने के बाद उसे रिहा किया गया।
वरुण गाँधी द्वारा कॉल करने वाले इस व्यक्ति को समय नहीं देने का निर्णय सैद्धांतिक रूप से भी गलत नहीं था। स्वाभाविक सी बात है कि सर्वेश नाम के व्यक्ति ने वरुण गाँधी को पुलिस से बचाने में मदद के लिए कॉल किया था। मीडिया ने भले इस मुद्दे पर विवाद खड़ा करने का प्रयास किया लेकिन यह बात पूरी तरह मान्य है कि एक संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधि ऐसे विचित्र समय किसी से भी बात नहीं कर सकता है। ऑडियो में साफ़ सुना जा सकता है कि वरुण गाँधी उस व्यक्ति से कहते हैं कि वह सुबह परेशानी सुनने के लिए तैयार हैं।
ऐसे में एक सांसद से इस तरह की आशा करना कि वह पूरे दिन आपकी बात सुनने के लिए उपलब्ध रहे, यह तार्किक नहीं है। राजनेता, सांसद या मंत्री, सभी आखिरकार इंसान होते हैं। उनके लिए किसी व्यक्ति से किसी भी समय बात कर पाना सहज नहीं होता होगा। यह बात सभी को समझनी चाहिए।
पेरिस में एक शिक्षक के सर काटने की घटना दुनिया भर के कट्टरपंथियों के लिए ‘ये तो साला होना ही था’ मोमेंट था। एक ऐसी घटना जो आजकल किसी को भी सुनाई पड़ती है तो, भले ही उसके होने के कारण हमें अजीब और विचलित करने वाले लगते हैं, लेकिन वहाँ हाथ में छुरा लिए हुए, ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा लगाते हुए लोगों की उपस्थिति हमें सामान्य ही नहीं लगती, बल्कि हम प्रतीक्षा करते हैं कि ‘अब तो उसकी जान जानी तय है’।
ऐसी ही एक सामान्य घटना होती है ट्विटर पर वामपंथियों की चुप्पी या फिर ये कहना कि ‘ऐसे लोग मुस्लिम हैं ही नहीं‘। मतलब, आप यह समझिए कि जो व्यक्ति अपने पैगंबर के बारे में गलत सुनने पर हत्या कर देता है, वही मुस्लिम नहीं है, और जो दिन रात इस्लाम के बताए हर नियम को तोड़ते हैं, वो ये सर्टिफिकेट जारी करते हैं। जानकार कहते हैं कि असली इस्लाम तो वही है जो ऐसे कट्टरपंथी जीते हैं, क्योंकि वो काफिरों को कत्ल के योग्य मानते हैं, पैगम्बर या कुरान के खिलाफ एक शब्द बर्दाश्त नहीं करते, और मूर्तिपूजकों को घृणा की निगाह से देखते हैं।
ये सारी बातें ही तो इस्लाम को उसका सही मतलब देती है। यही तो असली इस्लाम है जो पूरी तरह से अपने पथप्रदर्शक की किताब को नुक्ते तक अपनाए हुए चलती है। वस्तुतः, वैसे लोग जो ‘मॉडरेट इस्लाम’ या ‘इस्लाम तो शांति का मजहब है’ बताते हैं, वो सच्चे मुस्लिम होते ही नहीं। आपने अगर ‘सेकुलरिज्म’ के कॉन्सेप्ट को स्वीकार लिया तो आप पूरी तरह से इस्लाम के खिलाफ खड़े हो जाते हैं।
इसलिए, इस्लाम को सही तरीके से न मानने वाले, जब इस्लाम को बिलकुल सही तरीके से मानने वाले को मुस्लिम मानने से इनकार कर देते हैं, तब बड़ी ही विचित्र स्थिति पैदा हो जाती है कि एक गैरमुस्लिम झूठे मुस्लिम के ट्विटर दर्शन को माने, या फिर एक सच्चे मुस्लिम द्वारा गर्दन काटने की घटना को इस्लाम द्वारा निर्देशित पथ मान कर इस मजहब को समझने की कोशिश करे।
इस्लाम को सही तरह से मानने वाले सेकुलर हो ही नहीं सकते
सोशल मीडिया पर मेरी एक पूर्व छात्रा ने एक लिंक शेयर किया तो उसके किसी मजहबी जानकार ने जो टिप्पणी (गलत अंग्रेजी में ही सही) की, वह बताती है कि मजहब में एक बड़े, या शायद अधिकांश, या शायद हर सच्चे मुस्लिम की सोच ऐसे हर मामले के बाद कैसी होती है।
ममून अहमद लिखता है, “ईमानदारी से कहूँ तो, कोई भी मुस्लिम अपने पैगम्बर मुहम्मद के खिलाफ किसी भी तरह की अमर्यादित टिप्पणी, अपमानजनक बात, या कार्टून आदि बर्दाश्त नहीं करेगा। इसके लिए तुम हमें आतंकवादी कहो, या कुछ और, हमें फर्क नहीं पड़ता। और हाँ, बात यह है कि वो भी (अपमान करने वाले) जानते हैं कि हमें ये सब स्वीकार्य नहीं है, फिर भी वो बारम्बार वही काम करते हैं। तब जब हम प्रतिक्रिया देते हैं (जान ले लेते हैं) तब वो हमें अपनी मर्जी से कुछ भी कह सकते हैं।”
छात्रा लिखती है, “ममून अहमद, तो इस्लाम के अनुसार मजहबी मान्यताओं के आधार पर किसी की हत्या जायज है? और हाँ, ये भी याद रहे कि (इस मामले में) परिजनों और शिक्षकों के अनुसार, (मृत शिक्षक) पैटी ने मुस्लिम विद्यार्थी को, कार्टून दिखाने से पहले, बाहर जाने का विकल्प देते हुए कहा था कि वो किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता।”
ममून ने इस पर जवाब लिखा, “किसी की हत्या मजहबी कार्य नहीं है, लेकिन ये कुछ ऐसा ही है जैसे किसी ने तुम्हारे परिजनों का अपमान किया, तो तुम उस पर किस तरह की प्रतिक्रिया दोगी। और पैगम्बर के लिए, जैसा कि मैंने कहा, हम मुस्लिम तो युद्ध के लिए तैयार रहते हैं। दुनिया के सारे लोग इस बात को जानते हैं कि हम ये बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसके बाद भी वो हमें छेड़ते रहते हैं। क्यों?”
ममून अहमद की बातचीत का स्क्रीनशॉट
ममून या ममून जैसों की ये बातें उनके ज्ञान के स्तर से गलत नहीं हैं। उन्हें ही नहीं, चाहे वो पीएचडीधारी शरजील हो, या सड़क किनारे मेहनत कर के पंचर का काम करता जुबैर, वो भी यही मानता है, जो ऊपर ममून ने लिखा है। वो ऐसा इसलिए मानता है कि क्योंकि ऐसी शिक्षा उसे बचपन से अपने घर, मदरसे, मस्जिद और टेंट के नीचे हो रही मजहबी बैठकों में मिलती है।
उनके लिए ऐसा मानना बहुत ही सामान्य है कि पैगम्बर के बारे में गलत लिखने, बोलने वाले का ‘सर तन से जुदा’ करना ही उचित कार्य है। और तो और, उन्हें किसी भी राष्ट्र के कानून की बाध्यता नहीं रोक सकती क्योंकि वो इसके लिए पहले से ही तैयार रहते हैं। ट्विटर पर आज ही एक वीडियो सामने आया, जो भोपाल के किसी मस्जिद का बताया जाता है। वहाँ लाउडस्पीकर पर कहा जा रहा है कि एक ईसाई ने कुरान को ले कर गुस्ताखी की, तो एक भोपाली खड़ा हुआ, जिब्बह कर के सर काट कर अलग कर दिया। लोग आह्लादित होते हैं कि वो आम लोग नहीं है, वो ‘सैयद, शेख, पठान हैं’।
This is real life as opposed to the well-funded propaganda industry of Bollywood that shows all violence comes to stop at sound of azaan
Iqbal Maidan, Bhopal, 4 Dec 2015: Fatwa calling for beheading those who insult Rasool & Quran as reaction to Kamlesh Tiwari. #parisbeheadingpic.twitter.com/s3bsfAocqQ
क्या आपको ऐसा लगता है कि इस हजारों की भीड़ का उन्माद किसी भारतीय दंड विधान की राह देखता है? क्या आपको लगता है कि यूरोप के शहरों में शार्ली एब्दों के 12 कार्टूनिस्टों की एक बार में हत्या करने वाला, या फिर किसी की गर्दन काट कर अलग करने वाला, किसी भी देश के कानून को मानता है? वस्तुतः, वो किसी भी कानून को मान ही नहीं सकता, यही उसकी मजबूरी है। वो विवश है क्योंकि उसके अस्तित्व के लिए, उसके व्यक्तित्व के लिए यह स्वीकारना असंभव है कि अल्लाह के कानून के इतर कोई और कानून भी है।
आप याद कीजिए कि साल भर पहले ही कमलेश तिवारी की भी हत्या हुई थी। आपने, हमने, पूरे भारत ने उसकी गर्दन के घाव, छाती में छुरे के घुसने से बने निशान और लाश देखी। हत्या की योजना कितनी गहनता और विस्तार लिए बनी थी कि जान-पहचान बढ़ाते हैं, हिन्दू नाम रखते हैं, पार्टी का काम करते हैं, फिर गुजरात से चलते हैं, उत्तर प्रदेश पहुँचते हैं, और मिठाई के डब्बे में रखे छुरे से गर्दन रेत देते हैं। पकड़े जाने पर कहते हैं कि उनका इरादा तो काटते हुए ‘फेसबुक लाइव’ पर पूरी दुनिया को दिखाना था कि इस्लाम में पैगम्बर के बारे में गलत लिखने का परिणाम कैसा होता है।
हत्यारे के परिवार वाले उसकी मदद कर रहे हैं, पत्नी बोल रही है कि बस तुम आ जाओ, बाप कह रहा है कि वो देख लेगा, लोग मदद को तैयार हैं। आपको इसमें कुछ अजीब नहीं लगता? आप हिन्दू अपराधियों के मामले में जाइए, सबसे पहले उसके परिवार के लोग ही उसे त्याग देते हैं और कहते हैं कि उसका बेटा दोषी है तो गोली मार दो उसको। यहाँ, चाहे कश्मीर हो या उत्तर प्रदेश, हमें दसियों उदाहरण मिलते हैं कि एक और बेटा होता तो उसे भी कुर्बान कर देता।
जब कोई व्यक्ति या समाज इस हद तक, ऐसे मामलों में, मोटिवेटेड हो, अपनी अस्थि-मज्जा तक ऐसी मजहबी आस्था से जकड़ा हुआ हो, वो गैरइस्लामी समाज, राष्ट्र या व्यक्ति की किसी भी बात को कैसे मान लेगा? यह असंभव है। अगर वो काफिरों को कत्ल के लायक नहीं समझता, तो वो सच्चा मुस्लिम है ही नहीं। क्योंकि काफिरों को मारने के लिए घात लगा कर बैठने से ले कर, क्यों और कैसे मारें, सारी बातें उनकी किताब में लिखी हुई हैं।
एक और वाकया याद आता है जो हाल ही में बनारस के एक मित्र से बात करते हुए पता चली। वो बताते हैं कि बचपन में वो लोग क्रिकेट खेला करते थे। उनके साथ मुस्लिम बच्चे भी खेलते थे। खेलते वक्त, अगर इन बच्चों को कहीं भी गिरगिट दिख जाए, उसे वो लोग मार डालते थे। कभी ईंट से कुचलना, कभी बैट से, कभी उनके ऊपर बम (पटाखा वाला) फेंक देना आदि आम बात थी। अगर किसी दिन ये काम उनके गैरमुस्लिम मित्रों की अनुपस्थिति में होता था, तब वो उन्हें बताते थे कि कैसे मारा।
मित्र बताते हैं कि उस समय हमें समझ में नहीं आता था कि गिरगिट मारने पर ऐसी खुशी किसी को क्यों मिलती थी, बाद में पता चला कि ऐसा करना किसी हदीस के अनुसार सही है क्योंकि गिरगिट ने इब्राहिम नाम के पैगम्बर को नमरूद द्वारा आग में फेंक देने पर, उस आग को हवा दी थी। इस हदीस में कितनी सच्चाई है, ये मैं नहीं जानता, पर कुरान में ऐसा कोई जिक्र नहीं मिलता। साथ ही, कई दूसरे लोग यह भी बताते हैं कि चूँकि गिरगिट एक नुकसान पहुँचा सकने वाला जीव है, तो उसे मार देना ही उचित है।
यह कोई बहुत बड़ी घटना नहीं है। आपके भी कई ऐसे जानकार होंगे जो कोई कारण बताएँगे कि गिरगिट को देखते ही मार देने की बात कही गई है। किसने, किसको कही, कब क्या हुआ, ये सब अनावश्यक बातें हैं, आवश्यक यह है कि ऐसा वास्तव में होता है। जो जीव आपको ‘नुकसान पहुँचा सकता है’ उसको मारने की बात को बचपन से ही सामान्यीकृत किया जाता है।
तो, वैसा ही एक जीव काफिर होता है। काफिरों को इस्लाम में सबसे हेय दृष्टि से देखा जाता है। आज की दुनिया जब ‘सेक्स’ और ‘जेंडर’ के डिबेट में ‘ही, शी, दे’ आदि लिंगसंबंधी विशेषणों पर व्याख्यान प्रस्तुत कर रही है, ब्लैक लाइव्स मैटर के नाम पर लड़ रहे हैं, वहीं काफिर जैसे संबोधन आम हैं। जबकि, इस संबोधन पर वैश्विक प्रतिबंध लगना चाहिए, और किसी को भी इस नाम से पुकारने पर सजा निर्धारित होनी चाहिए क्योंकि यह विशेषण किसी भी जातिसूचक, रंगभेदी, नस्लभेदी विशेषण से ज्यादा खराब है।
तो, जब काफिर को कुरान ने ही वाजिब-उल-कत्ल माना है, तो धरती पर के आम मुस्लिम कैसे इस बात को झुठला देंगे? क्योंकि इस्लाम में सबसे ऊँची पदवी पैगम्बर मुहम्मद की है, उसके बाद कुरान आता है। इन दोनों के बारे में आप एक शब्द, सोच कर, या अनायास गलत बोल दें, और आपके लिए कोई फतवा किसी दूसरे मुल्क में निकल आए, तो आप अपने दिन गिनने शुरु कर दीजिए।
ऑस्ट्रेलियाई एक्टिविस्ट इमाम तौहिदी इसी विषय पर एक टॉक शो में डेव रूबिन से बात करते हुए कहते हैं, “आम तौर पर हर मुस्लिम दो देशों का नागरिक होता है- एक उस देश का जिसका वह राजनीतिक रूप से नागरिक होता है, और दूसरा मुस्लिम ‘उम्माह’। जब दुनिया के किसी भी कोने में बैठा कोई भी मुल्ला किसी का सर कलम कर देने का फ़तवा जारी करता है तो वह अँधेरे में तीर नहीं मार रहा होता है। उसे यह पता होता है कि उसके इस फ़तवे को पूरा करना किसी न किसी मुस्लिम का फ़र्ज़ होगा।”
तो बात यह है कि फ्रांसिसी शिक्षक पैटी की अकाल मृत्यु तो निश्चित थी, बस माध्यम कौन बनता, किस दिन बनता, यह तय नहीं था। कई बार, कमलेश तिवारी का उदाहरण लें, सालों लग जाते हैं, कई बार तत्क्षण किसी के भीतर का इस्लाम जगता है और ‘जिब्बह करके गर्दन अलग’ कर दी जाती है। एक और उदाहरण सलमान रश्दी का है जो बिना खिड़कियों वाले घरों में, एक जगह से दूसरे जगह, छिपता फिर रहा है क्योंकि उसकी जान लेने का फतवा सालों पहले जारी हो गया है। कोई सच्चा मुस्लिम कहीं ताक में बैठा होगा कि उस फतवे को अंजाम तक कैसे पहुँचाया जाए।
सेकुलर देश में शरीयत वाले लोग
ये सारी बातें मूलतः एक बिंदु पर ही टकराती दिखती हैं: आदमी के बनाए कानून बनाम अल्लाह का बनाया कानून। एक सच्चा मुस्लिम अल्लाह का ही कानून मानता है, और अगर उसे चुनना पड़े (भले ही इसके लिए कानूनन उसकी जान क्यों न ले ली जाए) वो हमेशा अल्लाह के कानून को ही मानेगा जो उसे बताता है कि पैगंबर के खिलाफ लिखे एक शब्द के लिए गर्दन अलग कर दो।
आपको टीवी डिबेट पर, कमलेश तिवारी की हत्या पर, खुल्लमखुल्ला जश्न मनाने वाले मुल्ले-मौलवी दिख जाएँगे। आपको ऐसा लिखने वाले पूरे सोशल मीडिया पर दिख जाएँगे कि भाई, उसने तो वो बात कर दी जो मना है हमारे में, इसमें तो यही होना ही था। आपने लोगों को ‘सर काट कर लाने पर लाख और करोड़ के ईनाम’ की बात भी सुनी होगी।
अब बात यह है कि ऐसा तो है नहीं कि लोगों के पास विकल्प नहीं हैं इस्लामी मुल्कों में जाने के, जहाँ इस तरह की व्यवस्था है कि आदमी का कानून नहीं चलेगा, अल्लाह वाला चलेगा। जो लोग ममून अहमद की तरह के हैं, वो ऐसे मुल्कों में अपनी व्यवस्था के बिना कैसे रह रहे हैं? क्योंकि यहाँ तो चोरी पर, बलात्कार पर, हत्या पर राष्ट्र का कानून चलता है, जबकि अल्लाह वाले कानून में तो बड़ी ही कष्टकारी सजाएँ निर्धारित हैं।
मतलब, शरीयत तभी तक मानो जब तक अपना फायदा दिखे, बाकी समय ‘पत्थरों से मार कर हत्या’, ‘चौराहे पर कोड़े मारने की सजा’, ‘हाथ काट देने की सजा’ आदि स्वीकार्य नहीं? ये तो एक तरह से इस्लाम के खिलाफ होना हुआ। कोई भी सच्चा मुस्लिम एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में कैसे रह सकता है? ये तो उसकी मजहबी अवधारणा के बिलकुल ही विरोध में है।
तरीका तो यह है कि आप एक इस्लामी मुल्क में रहें, और काफिर देशों पर हमेशा चढ़ाई करते रहें, और अंत में पूरी दुनिया पर इस्लाम का राज कायम कर लें। यही बताया गया है, यही सोचा जाता है, यही लक्ष्य है। लेकिन काफिरों के देश में रहना, हर तरफ मंदिर, चर्च या अन्य धार्मिक स्थलों को देखना, हर बड़े पेड़ के नीचे मूर्तियाँ देखना तो किसी भी सच्चे मुस्लिम को अत्यधिक पीड़ा पहुँचाती होगी, फिर वो ऐसे देशों में कर क्या रहा है!
हर मुस्लिम की यही इच्छा होती है कि वो जहाँ रह रहा है वो इस्लाम के कायदे-कानूनों के मुताबिक रहे। जहाँ यह संभव नहीं, और एक मौका मिले कि वो वैसी जगह पर जा सकता है जहाँ ऐसे कायदे-कानून लागू होंगे, तो सच्चे मुस्लिमों को तो वहीं जाना चाहिए था। जो बच गए हैं, और इस तरह के कत्लों को यह कह कर जायज ठहराते हैं कि भाई रसूल का अपमान किया तो उसको तो मारेंगे ही।
इनके तर्क आप देखिए कि ‘जब तुम्हें पता है कि हम यही करेंगे, तो तुम ऐसा करते क्यों हो?’ ये तो वहीं बात हो गई कि कोई आदमी, जो सीरियल किलर है, वो अपने बचाव में यह कहे कि ‘तुम्हें जब पता है कि मैं रातों को चाकू ले कर गलियों में घूमने वालों को बलात्कार के बाद मार देता हूँ, तो तुम गलियों में घूमते ही क्यों हो?’
ये तो कुतर्क है जो किसी भी विवेकशील मनुष्य या अन्य जीवों को (अगर उन्हें समझाया जा सके किसी तकनीक से) स्वीकार्य नहीं होगा। ये तो सीधे तौर पर यह कहना हुआ कि हम तुम्हारे कानून को नहीं मानते, हमें जो बचपन में घर में, मदरसों में, मस्जिदों में सिखाया गया है, वही अखंड सत्य है, और हम उसका पालन करने को बाध्य हैं।
फिर तो, वैसे देशों से ऐसे सारे मुस्लिमों को बाहर निकाला जाना चाहिए, या वो स्वयं ही निकल जाएँ, जहाँ कोई और रिलीजन या धर्म बहुसंख्यक है, या जो भी देश स्वयं को पंथनिरपेक्ष कहता है। सीधा कारण यह है कि इस्लाम न सिर्फ एक मजहब है, बल्कि आज के परिदृश्य में एक राजनैतिक पहचान है। अगर एक कदम और बढ़ कर कहा जाए तो इस्लाम अपने शुरुआत से ही साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का मजहब रहा है जहाँ जमीन जीतने से ले कर, काफिरों को मारने, उनके घरों, धार्मिक स्थानों पर कब्जा करने आदि के लिए जाना जाता है। उसका तो लिखित लक्ष्य है पूरी धरती को इस्लाम के नीचे लाना।
फिर ऐसे में, इस तरह के लोग एक सामान्य व्यवस्था में हमेशा फँसे हुए पाएँगे स्वयं को। मुझे तो उनकी स्थिति सोच कर ही अत्यंत कष्ट की अनुभूति होती है कि बलात्कारी, बच्चाबाज, हत्यारे, लुटेरे मुगलों के द्वारा इतनी तबाही के बाद भी कुछ मंदिर रह गए, और कुछ तो बनने वाले हैं, सच्चे मुस्लिम कितना कुछ सहते होंगे। जिन लोगों को पाकिस्तान में शिया, अहमदिया आदि भी काफिर ही नजर आते हैं, उन्हें इतने करोड़ हिन्दुओं के बीच रहना, उनकी पूजा को सुनना, आरती को देखना, उनकी गंगा को बहते देखना कितना पीड़ा पहुँचाता होगा!
हिन्दुओं की एक और समस्या है कि वो गाय, गोबर, गंगा, पेड़, जानवर, फूल, पत्थर किसी को भी देवी-देवता मान लेते हैं। अगर न मानते तब तक किसी सच्चे मुस्लिम को समस्या नहीं होती क्योंकि उनके लिए तो ये सब अल्लाह की बनाई चीजें हैं। जबकि हिन्दुओं ने चीजों को तब और जटिल बना दिया जब वो इन्हें पूजने लगे। जैसे ही आप किसी वस्तु की पूजा करने लगते हैं, वो मूर्ति पूजा हो जाती है, और फिर किसी भी सच्चे मुस्लिम के लिए वो इस्लाम के खिलाफ नजर आने लगती है।
ऐसे में, दो ही रास्ते हैं। पहला तो यह है कि अल्लाह का कोई अज़ाब आए जिससे सारी धरती के सारे काफिर रातों-रात मर जाएँ। दूसरा यह कि सच्चे मुस्लिम हर दिन की पीड़ा से बचने के लिए किसी दूसरे इस्लामी मुल्क में चले जाएँ जहाँ गाय खाने की वस्तु है, और मूर्तियाँ तोड़ने के लिए, जहाँ आईना देखना, सजना-सँवरना हराम है। पहले विकल्प के भी होने की पूरी संभावना है क्योंकि पुस्तक में कई जगह ऐसा जिक्र है कि जब भी ईमान वालों ने युद्ध किया है, और पिछड़ने लगे हैं, तब अल्लाह ने अज़ाब भेज कर काफिरों का सफाया करने में मुस्लिमों की मदद की है क्योंकि वो अत्यंत दयावान है, परम विवेकशील है और पूर्ण प्रभुत्व वाला है।
हाँ, ये तय नहीं है कि ऐसा कब होगा। तो इंतजार करने से बेहतर है कि स्वयं ही वैसी जगह चले जाएँ, जहाँ से काफिरों के खिलाफ जंग की तैयारी में राष्ट्र पूरी तरह आपकी सहायता करे। अभी समस्या ये है कि, कश्मीर का ही उदाहरण लें तो, सुबह में कोई एरिया कमांडर बनता है, शाम तक मारा जाता है, वैकेंसी वैसी ही खाली रह जाती है। ये तो सीधे अनुपातहीन स्थिति है क्योंकि काफिर पाँच गुणा ज्यादा भी हैं, और यहाँ इस्लाम वाले कानून को भी राष्ट्र मान्यता नहीं देता।
जैसा कि किताब भी कई जगह कहती है कि काफिरों के लिए कैसे घात लगाना है, तो उस स्थिति के प्रतिफलित होने के लिए आपको अपने इलाके में होना आवश्यक है। क्योंकि घात तो आप तभी लगा पाएँगे जब इलाका आपका हो। जब तक ऐसी स्थिति न आए, तब तक ऐसे जगह चले जाओ जहाँ संख्या बढ़ा सको, इकट्ठा हो सको और तलवारों की जगह मिसाइल, परमाणु हथियारों से काफिरों पर हमला कर सको।
यूरोप का भविष्य
पिछले दो दशक में यूरोप में जिस तरह के हमले हुए हैं, और ये हमले हर जगह हुए हैं, उसके बाद भी ‘पोलिटिकली करेक्ट’ वामपंथी विचारों की सत्ताओं ने शरणार्थियों के तौर पर आए लोगों के लिए जैसी व्यवस्थाएँ की, और गले लगाया, वो अब अपने विकृत परिणाम सामने ला रहा है। लंदन लंदनिस्तान बन चुका है, बर्मिंघम के पार्क में अब नमाजें होती हैं, रोम की सड़कों पर लोग चटाई डाल कर नमाज पढ़ते दिख रहे हैं, और मजहबी आतंक की छाप हर शहर तक पहुँच चुकी है।
कुछ एक राष्ट्रों ने इस्लामी आतंक की गंभीरता को समझते हुए ऐसे शरणागतों के लिए बॉर्डर बंद कर दिए हैं, वहीं कई देश ऐसे हैं जो दयालु दिखने के चक्कर में ऐसे लोगों को अपने यहाँ जगह दी और अचानक से वहाँ अपराधों में वृद्धि होने लगी। चाहे स्वीडन हो, जर्मनी हो, फ्रांस, इटली या इंग्लैंड हो, इन जगहों पर कट्टरपंथी हमलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।
मानवता की बात एक तरफ है, लेकिन आँखें मूँद कर मानवता की दुहाई देना और अपना सर कटवा लेना मूर्खता है। सत्ता तो अभी भी ऐसे ही अपने बयानों में ‘टेरर हैज नो रिलीजन’ के गीत गाती रहेगी, लेकिन यूरोप के मूल नागरिक जल्द ही सड़कों पर उतरेंगे। चाहे वो फ्रांसिसी शिक्षक पैटी की हत्या हो या शॉर्ली एब्दो के कार्टूनिस्टों की, लोगों ने इसके खिलाफ बोलना शुरु कर दिया है। सरकार भले चुप रहे, लोग सड़कों पर आ रहे हैं।
जब सरकार हाथ खड़े कर देती है, क्योंकि उसे वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता चाहिए कि वो बड़े संवेदनशील और सुलझी हुई बातें करते हैं कि आतंक का कोई मजहब नहीं होता, तब आम जनता ऐसे आतंक से तंग आ कर कानून हाथ में ले लेती है, क्योंकि सामने वाले ने तो वहाँ का कानून तभी तक माना जब तक वो उसके मतलब को साधने में सहायक था।
अगले पाँच सालों में इस्लामी आतंक के खिलाफ यूरोपीय शहरों में आम लोग विद्रोह पर उतरेंगे और फिर स्थिति किसी भी सरकार के नियंत्रण से बाहर हो जाएगी। सरकारों को अपने शहर की गलियों में ‘तुम्हारे कपड़े हमारे मजहब की उम्मीदों के विरोध में हैं’ जैसी बातें नहीं सुननी पड़ती। क्योंकि एक मजहब की प्रकृति ही यही है कि उन्हें अपने तरीकों से तो चलना ही है, साथ ही जो उनके तरीकों से नहीं चलते, उनको भी उँगली करते रहना है।
जिनके लिए शिया भी काफिर हो चुका हो, अहमदिया भी, उनके लिए ईसाई तो सबसे पहला दुश्मन सदियों से रहा है। ये तो वो युद्ध है जो ये बीच में हार गए थे, लेकिन कहा तो यही जाता है कि वो तब तक लड़ते रहेंगे जब तक जीतेंगे नहीं, चाहे सौ साल लगे या हजार। जिसकी लड़ाई का काल भविष्य में इतना लम्बा और अनिश्चित है, वो तुम्हारी सभ्यता को मान ही नहीं सकता।
ऐसे में, गृहयुद्ध की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि सरकार पाँच साल में अपनी प्रकृति नहीं बदल पाएगी, लेकिन आम जनता पाँच साल में ऊब जाएगी और जवाब देने के लिए योजनाएँ बनाने लगेगी। जो नहीं होगा, वो यह है कि भारत जैसे देश में, जहाँ बहुसंख्यक समाज सहिष्णु है, वो लड़ने का तो छोड़िए, कमलेश तिवारी की हत्या पर एक आक्रोश जुलूस तक नहीं निकाल पाया।
ऐसा समाज सिर्फ संख्या बल के कारण ही जीवित बचा रहता है, और हर दिन लव जिहाद, रेप जिहाद, मजहबी हमले आदि के छोटे-छोटे घाव सहता रहता है। फिर यह समाज ट्विटर पर दूसरे समाज के लोगों से पूछता है कि ‘फलाँ आज क्यों चुप है?’ अरे भाई, फलाँ, तुम्हारे लिए क्यों बोलेगा? वो जब अपने चोर की आकस्मिक हत्या पर, सीट के झगड़े वाली हत्या पर, गौरक्षकों द्वारा पकड़े जाने की बात को मजहबी बना कर पूरी दुनिया में तुम्हें असहिष्णु बताता है, तो फिर वो तुम्हारे लिए ट्वीट करेगा!
वो तो इस बात से ही संतुष्ट है कि ‘इस्लाम शांति का मजहब है’, ‘जिसने किसी की गर्दन काट दी वो मुस्लिम नहीं है’। इस गूढ़ बात को समझो, तभी कहीं पहुँच पाओगे कि कैसे हर आतंकी हमला एक मजहब से जुड़ा आतंकवादी करता है, फिर भी वो मजहब आतंक का मजहब नहीं, फिर भी वो मजहब शांतिप्रिय मजहब है।
फिर, गौर करने पर लगता है कि बिलकुल सही बात है कि इस्लाम शांति का मजहब है। लेकिन ये शांति, कयामत की तरह ही, वर्तमान की शांति की बात नहीं करती, ये उस शांति की बात करती है जब हर काफिर मर चुका होगा, धरती पर एक भी गैरमजहबी व्यक्ति नहीं बचा होगा, तब जो मुर्दा शांति आएगी, वही शांति इन ट्वीटों में वर्णित है।
राजनीति के अपराधीकरण को रोकने की चर्चा खूब होती है, लेकिन जब टिकट बाँटने की बारी आती है तो राजनीतिक दल अपराधियों को टिकट देने से पीछे नहीं हटते। इसका उदाहरण एक बार फिर से बिहार चुनाव में देखने को मिल रहा है। बिहार में होने वाले मतदान के लिए पार्टियों ने जिन उम्मीदवारों को खड़ा किया है, उनमें अपराधी नेताओं की संख्या काफी ज्यादा है। कॉन्ग्रेस ने जिन्ना समर्थक को टिकट देने के बाद अब रेप आरोपित उम्मीदवार प्रवीण सिंह कुशवाहा को टिकट दिया है।
प्रवीण सिंह कुशवाहा 1988 के पापरी बोस रेप कांड में आरोपित हैं। प्रवीण सिंह पर आरोप लगा कि उन्होंने एक डॉक्टर की बेटी पापरी बोस को अगवा कर लिया। अगले दिन जबरन शादी कर ली। पापरी बोस को गोड्डा के जिस ओंकारनाथ राम इंजीनियर के घर में छिपाकर रखा गया था, वह तत्कालीन सीएम भगवत झा आजाद के करीबी थे।
रेप कांड में आजाद के एक करीबी रिश्तेदार के साथ ही उनके बेटे कीर्ति झा आजाद का भी नाम जुड़ा था। बहुत विवाद हुआ। प्रवीण उस समय भागलपुर जिला एनएसयूआई के अध्यक्ष थे। संगठन के प्रदेश अध्यक्ष प्रेमचंद्र मिश्रा ने उन्हें पद से हटा दिया। महीनेभर तक उस कांड की चर्चा रही।
पापरी से न सिर्फ बंदूक की नोंक पर शादी की गई, बल्कि विश्वसनीयता के लिए घटना की एक तस्वीर भी ली गई थी। इतना ही नहीं, लड़की को अपने माता-पिता को यह कहते हुए एक नोट लिखने के लिए मजबूर किया गया था कि उसने अपनी मर्जी के लड़के से शादी की। पुलिस ने लड़की के ठीक होने तक इंतजार किया, और राम को अंडरग्राउंड होने की अनुमति दे दी।
अपहरण, जिला एनएसयूआई प्रमुख और आजाद के करीबी लोगों की संलिप्तता और पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई के कारण लोगों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया। तीन दिनों तक मुख्यमंत्री के गृह नगर भागलपुर में सड़क बंद रखा गया। भागलपुर की घटना के ठीक चार दिन बाद, NSUI ने पटना में एक रैली का आयोजन किया। इसमें नेताओं की भरमार थी, लेकिन पार्टी की छवि को सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए। इसे राज्य में कॉन्ग्रेस शासन के पतनकाल का कांड भी कहा जाता है। कॉन्ग्रेस ने 2005 में भी कुशवाहा को टिकट दिया था, तब भी कॉन्ग्रेस को पीड़ित परिवार और जनता की नाराजगी का सामना करना पड़ा था।
यही कॉन्ग्रेस हाथरस केस में कथित रूप से गैंगरेप पीड़िता को न्याय दिलाने की झूठी लड़ाई लड़ रही थी लेकिन यहाँ रेप आरोपित को टिकट देकर उसने एक बार फिर साबित किया कि उसे पापरी बोस रेप कांड से कोई मतलब नहीं है बल्कि उसके आरोपित को टिकट देकर वह ऐसे घृणित अपराध का इनाम दे रही है।
इसके अलावा पार्टी की तरफ से जेल में बंद बाहुबलियों आनंद मोहन और पप्पू यादव की पत्नियों लवली आनंद और रंजीता रंजन को भी टिकट दिए जाने की संभावना है।
इससे पहले जिन्ना के समर्थक मश्कूर उस्मानी को कॉन्ग्रेस प्रत्याशी बनाने पर विवाद हुआ था। गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस ने जाले विधानसभा सीट पर मशकूर अहमद उस्मानी को टिकट दिया है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्रसंघ का अध्यक्ष रहते हुए साल 2018 में मशकूर अहमद उस्मानी ने विश्वविद्यालय में लगी मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर हटाने का विरोध किया था। इसपर अब बिहार की सियासत गरमा गई है।
बताया जा रहा है कि उस्मानी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र संघ में रहते हुए जिन्ना की तस्वीर लगाई थी। इस यूनिवर्सिटी से जिन्ना की तस्वीर हटाए जाने पर उन्होंने काफी बवाल मचाया था। मुकदमे के बाद जब पुलिस ने छापेमारी की थी तो कार्यालय से जिन्ना की तस्वीर बरामद हुई थी।
लोगों का कहना है कि जिन्ना को आदर्श मानने वाले व्यक्ति को अपना प्रत्याशी बनाकर कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उनके मन में गाँधी नहीं बल्कि जिन्ना वास करता है। इस तरह के व्यक्ति को टिकट देना न सिर्फ कार्यकर्ताओं बल्कि जनता का भी अपमान है।
‘फेक TRP स्कैम’ मामले में अब तक की सबसे बड़ी बात सामने आई है। इस मामले में रिपब्लिक टीवी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार (अक्टूबर 19, 2020) को कहा कि रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी TRP मामले में आरोपित नहीं हैं। इसके बाद रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क और अर्नब गोस्वामी की तरफ से इस मुद्दे पर प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई है। जिसमें उन्होंने मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह पर 200 करोड़ के मानहानि के मुक़दमे की बात कही है।
News Release: Arnab & Republic to sue Param Bir Singh for Rs. 200 cr, as Maharashtra Govt and Mumbai Police admit in court that Network is not named in the TRP case FIR. pic.twitter.com/iNSoasmyaa
विज्ञप्ति के मुताबिक़, महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस ने अदालत में यह बात स्वीकार ली कि टीआरपी मामले में दर्ज की गई एफ़आईआर में रिपब्लिक टीवी का नाम शामिल नहीं है। रिपब्लिक टीवी मीडिया नेटवर्क के एडिटर इन चीफ और मैनेजिंग डायरेक्टर अर्नब गोस्वामी ने अपने क़ानूनी सलाहकार समूह फीनिक्स लीगल को निर्देश दिया है कि वह परमबीर सिंह पर 200 करोड़ रुपए की मानहानि का मुकदमा दर्ज कराएँ। इसमें से 100 करोड़ अर्नब गोस्वामी की छवि को नुकसान पहुँचाने के लिए और 100 करोड़ रिपब्लिक टीवी मीडिया नेटवर्क की छवि को नुकसान पहुँचाने के लिए।
रिपब्लिक टीवी मीडिया नेटवर्क की क़ानूनी टीम मानहानि का मुकदमा करने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। अपने ही कमिश्नर के दावों में विरोधाभास पैदा करते हुए मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार के वकील ने कहा कि एफ़आईआर में रिपब्लिक टीवी का नाम शामिल नहीं है। इतना ही नहीं महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस परमबीर सिंह द्वारा किए गए दावों से किनारा करते हुए नज़र आए। अदालत में महाराष्ट्र सरकार द्वारा यह बात स्वीकार किए जाने के बाद अर्नब गोस्वामी ने कहा है कि वह परमबीर सिंह पर हर ज़रूरी कार्रवाई करेंगे (ज़रूरत पड़ने पर अन्य लोगों पर भी)। घटनाक्रम के दौरान हुई हानि की भरपाई मानहानि के मुक़दमे से किया जाएगा।
इसके अलावा रिपब्लिक स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट और असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर सुधीर जम्बावाडेकर के विरुद्ध अवमानना की याचिका दायर करेगा। इसका सबसे बड़ा आधार होगा कि उन्होंने एफ़आईआर मामले की मनमानी से शुरुआत की, जिसे बॉम्बे उच्च न्यायालय ने पहले ही रद्द कर दिया था। फिर परमबीर सिंह द्वारा रचे गए झूठ के आधार पर रिपब्लिक टीवी के विरुद्ध तैयार किया गया अभियान लगातार चला, खासकर 8 अक्टूबर 2020 को हुई प्रेस वार्ता के बाद।
परमबीर सिंह ने मीडिया के सामने आकर रिपब्लिक टीवी के नाम को नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया जबकि उनके पास ऐसा करने के लिए पर्याप्त सबूत तक नहीं थे। इसका एक और मतलब साफ़ है कि यह कार्रवाई सिर्फ बदले की भावना से की जा रही थी। तमाम कोशिशों के बावजूद सच सामने आ चुका है और सच वही लोग सामने लेकर आए हैं जो अदालत में हमारे विपरीत मौजूद थे। महाराष्ट्र सरकार द्वारा यह बात स्वीकार करने का मतलब है कि रिपब्लिक टीवी ने किसी भी तरह की धाँधली नहीं की।
सर्वोच्च न्यायालय ने टीआरपी मामले की सुनवाई के दौरान परमबीर सिंह द्वारा दिए जाने वाले साक्षात्कारों की शैली पर भी चिंता जताई। बॉम्बे उच्च न्यायालय का भी इस मुद्दे पर यही कहना था। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने पालघर लिंचिंग बांद्रा एफ़आईआर मामले में मुंबई पुलिस की गतिविधियों पर स्टे लगाई थी। इस देश की अदालतों ने हमेशा न्याय को अहमियत दी है और सच हमेशा सामने आया है। इसके अलावा हम इस बात के भी आभारी हैं जो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के अधिकारों की रक्षा हुई और देश के सबसे मशहूर मीडिया नेटवर्क के विरुद्ध शिकायतों पर विराम लगा।
अंत में वही इस मुद्दे पर सच सामने लेकर आए जो इसे छिपा रहे थे, हम देश के लोगों के प्रति भी आभारी हैं जो ऐसे मुश्किल समय में हमारे साथ खड़े हुए। रिपब्लिक इस तरह के दमनकारी प्रयासों के सामने कभी नहीं झुकेगा जिनके ज़रिए मीडिया की आवाज़ दबाने की कोशिश हो रही है। रिपब्लिक सच सामने लेकर आने की लड़ाई में निडर होकर आगे बढ़ेगा और इस लड़ाई में देश के लोग हमारे साथ खड़े हैं।
सुनील पांडेय बिहार की राजनीति का जाना-माना नाम और आपराधिक छवि वाले दंबग नेता हैं। सुनील पांडेय ने हाल ही में लोजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष सह बाहुबली विधायक सुनील पांडेय ने इस्तीफा दे दिया है और अब वे तरारी सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे।
सुनील पांडेय के लोजपा छोड़ने के पीछे की वजह ये बताई जा रही है कि वो इस बार तरारी से लोजपा के टिकट पर मैदान में आना चाहते थे, लेकिन एनडीए में यह सीट बीजेपी के खाते में चली गई। इसके बाद से ही सुनील पांडेय के इस इलाके से निर्दलीय चुनाव लड़ने के कयास लगाए जा रहे थे। इसके बाद सुनील पांडेय ने लोजपा से इस्तीफा देकर इस कयासबाजी पर अपनी मुहर लगा दी है।
इससे पहले वो जनता दल यूनाइटेड (जदयू) की टिकट पर दो बार विधायक बने हैं। सुनील पांडेय बिहार के ऐसे नेता हैं, जिनका नाम हमेशा ही सर्खियों में रहा। सुनील पांडेय का नाम कभी रणवीर सेना के सुप्रीमो ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या में आया, तो कभी बिहार के चर्चित आरा सिविल कोर्ट बम ब्लास्ट में आया, तो कभी पटना के एक होटल में खुलेआम गोली मारने की धमकी देने का वीडियो वायरल हुआ, तो कभी अपराधी को जेल से भगाने के मामले में गिरफ्तार होते हैं, तो कभी यूपी के बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी को मारने के लिए 50 लाख रुपए की सुपारी देने के आरोपों से घिर जाते हैं। सुनील पांडेय की आधी जिंदगी जेल में बीती है तो आधी फरार रहने में। ये तो था सुनील पांडेय का इंट्रो। अब कहानी जानिए…
कॉलेज में लड़के को मार दिया था चाकू
90 का दशक था। बिहार के रोहतास के नावाडीह गाँव में रहते थे कमलेशी पांडेय। भूमिहार जाति से थे। इंजीनियरिंग की हुई थी। सोन नदी से बालू निकालने के लिए मामूली ठेके लिया करते थे। हालाँकि, आसपास के इलाकों में उनकी छवि दबंग की थी। कमलेशी पांडेय के बेटे का नाम था नरेंद्र पांडेय, जिन्हें लोग सुनील पांडेय के नाम से भी जानते हैं। पिता चाहते थे कि बेटा भी पढ़-लिखकर इंजीनियर बन जाए। इसलिए बेंगलुरू भेज दिया, लेकिन कहते हैं ना किस्मत के आगे किसी की नहीं चलती। सुनील की कुछ दिनों बाद वहाँ एक लड़के से लड़ाई हो गई। इस दौरान सुनील ने उस लड़के को चाकू मार दिया। फिर क्या था पढ़ाई-लिखाई छोड़कर नावाडीह वापस आ गए।
कैसे उतरे जुर्म की दुनिया में
जब पिता की छवि दबंग की थी तो बेटा पीछे कैसे रहता। सुनील पांडेय भी अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलते हुए काफी आगे निकल गए। उस वक्त रोहतास के आसपास के इलाकों में सिल्लू मियाँ का सिक्का चलता था। वह आरा का निवासी था और शहाबुद्दीन का करीबी था। सुनील की धीरे-धीरे सिल्लू से दोस्ती हुई और बहुत जल्दी वो उसका राइट हैंड बन गया।
कहा जाता है कि जुर्म की दुनिया की क्लास सुनील ने सिल्लू की पाठशाला में ही ली थी। लेकिन फिर बाद में ऊपर उठने की चाह में सुनील की सिल्लू से दुश्मनी हो गई। इसी बीच एक दिन सिल्लू का मर्डर हो गया। नाम सुनील का आया। लेकिन सबूत ना होने के कारण केस दर्ज नहीं हुआ। इस तरह से बालू के ठेके पर सुनील पांडेय का एकछत्र राज हो गया।
जब ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या में आया नाम
90 का दशक बिहार में रणवीर सेना का माना जाता है। भूमिहार जाति का इस सेना में दबदबा था और ब्रह्मेश्वर सिंह उसके मुखिया थे। एक वक्त वो भी आया, जब सुनील रणवीर सेना का कमांडर बन गया। लेकिन सुनील और ब्रह्मेश्वर के बीच लंबी दुश्मनी भी चली। 1993 में एक ईंट भट्टे मालिक की हत्या हो गई। इसके बाद सुनील और ब्रह्मेश्वर सिंह में खूनी जंग छिड़ गई।
ब्रह्मेश्वर गुट ने जनवरी 1997 को बोजपुर के तरारी प्रखंड के बागर गाँव में 3 लोगों को मौत के घाट उतार डाला। ये लोग भूमिहार जाति से थे। इनमें एक महिला भी थी, जो सुनील की करीबी रिश्तेदार थी। ब्रह्मेश्वर और सुनील की दुश्मनी 1 जून 2012 तक जारी रही, क्योंकि इसी दिन ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या हुई थी।
जिसका आरोप सुनील पांडेय पर लगा। केस तो चला लेकिन सबूत नहीं मिला। ब्रह्मेश्वर मर्डर केस की जाँच में सीबीआई अभी तक किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुँची है। हत्या के पहले ब्रह्मेश्वर तकरीबन 9 सालों तक जेल में बंद थे। अगस्त, 2002 में 227 लोगों की हत्या के जुर्म में ब्रह्मेश्वर गिरफ्तार हुए थे। लेकिन मई 2011 में जमानत पर रिहा कर दिया गया था। जिसके बाद एक जून 2012 को उनकी हत्या कर दी गई। लेकिन इन 9 सालों में सुनील पांडेय ने अपराध के साथ-साथ राजनीति में भी अपनी पैठ जमा ली थी।
फिर उतरे राजनीति में…
साल था 2000, मार्च में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। समता पार्टी ने सुनील पांडेय को रोहतास के पीरो से टिकट दिया। उन्होंने आरजेडी के प्रत्याशी काशीनाथ को हराया और विधायक बन गए। उस चुनाव में किसी को भी बहुमत नहीं मिला। जब समता पार्टी का बीजेपी से गठबंधन था, तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने को कहा।
बताया जाता है कि इस शपथ में सुनील पांडेय की भूमिका बहुत अहम थी। जब किसी को बहुमत नहीं मिला तो पांडेय ने राजन तिवारी, मुन्ना शुक्ला, रामा सिंह, अनंत सिंह, धूमल सिंह और मोकामा के सूरजभान जैसे निर्दलीय बाहुबलियों की फौज को नीतीश के खेमे में खड़ा कर दिया। लेकिन फिर भी सरकार नहीं बच पाई, हालाँकि, बिहार की राजनीति में सुनील का कद जरूर बढ़ गया।
लंबी है जुर्म की फेहरिस्त
बात मई 2003 की है। पटना के एक नामी न्यूरो सर्जन रमेश चंद्रा का अपहरण हो गया। फिरौती में 50 लाख रुपए माँगे गए। लेकिन पुलिस ने तेजी दिखाई और नौबतपुर इलाके से डॉक्टर को खोज निकाला। केस में नाम आया पीरो के विधायक सुनील पांडेय का। उस वक्त RJD की सरकार थी और समता पार्टी से सुनील विधायक थे। साल 2008 में सुनील पांडेय को तीन अन्य लोगों के साथ उम्रकैद की सजा हुई। लेकिन जब मामला हाई कोर्ट पहुँचा तो उन्हें बरी कर दिया गया।
बात 28 जून 2006 की है, जब सुनील पांडेय पटना के सबसे आलीशान होटलों में से एक मौर्या में रुके। अगली सुबह जब वे होटल से चेक आउट कर रहे थे तो होटल के पैसे नहीं दिए। दावा किया कि होटल के मालिक ने उनके दोस्त से 47 लाख रुपए लिए हुए हैं। इसलिए वो पैसे नहीं देंगे। जब पत्रकारों ने उनसे इस बारे में पूछा तो उन्होंने एक टीवी चैनल के कैमरामैन को जान से मारने की धमकी दी। यह घटना कैमरे में रिकॉर्ड हो गई। नीतीश कुमार ने पांडेय को पार्टी से निकाल दिया।
साल 2010 में जब नीतीश कुमार ने सुनील पांडेय को दोबारा टिकट दिया तो सब हैरान रह गए। वो इसलिए क्योंकि जो चुनावी हलफनामा दिया, उसमें सुनील पर 23 आपराधिक मुकदमे थे, जिसमें रंगदारी, हत्या की कोशिश, डकैती, लूट और अपहरण के मामले थे। 2014 में नीतीश कुमार ने बीजेपी से अलग होकर चुनाव लड़ा और वह हार गए। इस हार के बाद सुनील ने जदयू पार्टी छोड़ दी। पार्टी छोड़ने के बाद मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा था, “मैंने नीतीश कुमार को आगाह किया था कि एनडीए से बाहर ना जाएँ क्योंकि 2010 के विधानसभा चुनाव में जो जीत मिली थी, वो सिर्फ जदयू की नहीं थी इसमें एनडीए भी था।”
जब 1 जून 2012 को रणवीर सेना के मुखिया ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या हुई तो पहला शक सुनील पांडेय पर गया। पुलिस ने छापा मारकर उनके ड्राइवर को अरेस्ट कर लिया। साथ ही उनके भाई और तत्कालीन विधान परिषद के निर्दलीय सदस्य हुलास पांडेय को हिरासत में लेकर पूछताछ की। लेकिन बाद में रिहा कर दिया गया।
23 जनवरी 2015 को आरा के सिविल कोर्ट में बम ब्लास्ट हुआ। दो लोगों की मौत हो गई। कोर्ट से दो कैदी लंबू शर्मा और अखिलेश उपाध्याय फरार हो गए। जाँच हुई तो पता चला कि लंबू सिंह ने ही धमाके को अंजाम दिया था। दिल्ली पुलिस ने जून 2015 में लंबू सिंह को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में उसने बताया कि जेल से फरार होने में सुनील पांडेय ने उसकी मदद की थी। इसके बाद पांडेय को एसपी ऑफिस बुलाया गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। हालाँकि, कोर्ट ने बाद में सुनील पांडेय को बरी कर दिया।
लंबू ने पूछताछ में यह भी बताया कि पांडेय ने यूपी के बाहुबली मुख्तार अंसारी को मारने के लिए 50 लाख रुपए की सुपारी दी थी। लंबू के इकबालिया बयान के बाद सुनील पांडेय गिरफ्तार तो हुए, लेकिन तीन महीने में ही उन्हें जमानत मिल गई। जमानत पर बाहर निकलने के कुछ दिनों बाद ही नवंबर 2015 विधानसभा चुनाव हुए। राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ने सुनील की पत्नी गीता को टिकट दिया। लेकिन वो भी चुनाव जीत नहीं पाईं। सुनील पांडेय फिलहाल जमानत पर बाहर हैं।
सुनील पांडेय ने भगवान महावीर की अहिंसा पर पीएचडी की है
राजनीति और अपराध के अलावा सुनील को पढ़ाई में भी काफी दिलचस्पी थी। बिहार के रोहतास के नावाडीह गाँव में जन्मे सुनील पांडेय ने अपनी शुरुआती पढ़ाई तो रोहतास में ही की, लेकिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए बेंगलुरु गए थे। उसी दौरान मामूली विवाद में एक लड़के को चाकू मार दी और वापस लौट आए। इसके बाद से ये अपराध जगत में ये आगे तो बढ़े लेकिन पढ़ाई से नाता कभी नहीं तोड़ा। सुनील पांडेय का एक परिचय यह भी है कि वो पीएचडी हैं। अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाते हैं। हैरानी वाली बात तो यह है कि इन्होंने पीएचडी भगवान महावीर की अहिंसा पर की है।
‘मुझे शिक्षित होना ही होगा। मैं जेल में हूँ तो क्या हुआ’: सुनील पांडेय
सुनील पांडेय ने पीएचडी का इंटरव्यू भी जेल में रहने के दौरान दिया था। सुनील पांडेय जब जेल से हथियारबंद पुलिसवालों के साथ पीएचडी का इंटरव्यू देने गए थे तो मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा था, ”मैं नेता हूँ, जिससे उम्मीद की जाती है कि वो समाज का नेतृत्व करे। मुझे शिक्षित होना ही होगा। मैं जेल में हूँ तो क्या हुआ, हमारे बहुत से नेताओं ने जेल में रहते हुए ही किताबें लिखी हैं।”
सुनील पांडेय लोजपा से 4 बार विधायक रह चुके हैं। इससे पहले वह जदयू में थे। मार्च 2000 मे बिहार में विधानसभा के चुनाव थे। समता पार्टी के टिकट पर सुनील पांडेय भी चुनावी मैदान में उतर गए। रोहतास के पीरो विधानसभा से चुनाव लड़े। राजद प्रत्याशी काशीनाथ को चुनाव में मात दी और पहली बार विधायक बने।
भाई के अपराधों की भी है लंबी फेहरिस्त
सुनील पांडेय के भाई और बिहार के पूर्व एमएलसी रह चुके हुलास पांडेय को आरा और बक्सर में बाहुबली के तौर पर जाना जाता है। हुलास पांडेय मूल तौर पर बालू का कारोबार करते हैं। बालू माफिया सुभाष यादव के साथ अपने संबंधों को लेकर इलाके में चर्चा में रहते हैं।
जून महीने में NIA ने हुलास पांडेय के पटना, आरा और बक्सर के ठिकानों पर आय से अधिक संपत्ति के मामले में छापा मारा था। हुलास पांडेय पर पैसों के फर्जी लेनदेन से लेकर अवैध हथियारों की तस्करी तक के आरोप हैं। हुलास पांडेय के पटना स्थित घर पर जब एनआईए ने छापेमारी की थी तो वहाँ से करीब डेढ़ किलो सोना और 45 लाख रुपए कैश बरामद हुआ था।
हुलास पांडेय पर अवैध अथियार रखने, खतरनाक हथियार से नुकसान पहुँचाने, हत्या की कोशिश, जान से मारने की धमकी, आपराधिक षड़यंत्र, शांति भंग करने, सरकारी अधिकारी को परेशान करने, वसूली और रंगदारी माँगने जैसे कई संगीन मामले अलग-अलग थानों में दर्ज हैं। हालाँकि, उन्हें किसी भी मामले में कोर्ट के द्वारा दोषी नहीं ठहराया गया है।
कितनी है संपत्ति
हुलास पांडेय के अगर संपत्ति की बात करें तो 2015 के हलफनामा के मुताबिक उनकी संपत्ति 4 करोड़ रुपए से ज्यादा है और उन पर 10 लाख रुपए का कर्ज है। हुलास पांडेय के पास दो एसयूवी स्कॉर्पियो और पजेरो है जिनकी कुल कीमत करीब 32 लाख रुपए हैं। इनके पास पटना के पॉश इलाके बोरिंग रोड में अपना घर है जबकि आरा और बक्सर में भी कई संपत्तियाँ हैं।
क्योंकि जीत की गणित में ‘दाग अच्छे हैं’…
भले ही चुनाव से पहले राजनीतिक पार्टियों के आका बाहुबल, आपराधिक छवि जैसे नेताओं को अपने साथ रखने में परहेज करते हों, लेकिन बात जब चुनाव की आती है तो यही राजनीतिक पार्टियाँ जीत के लिए इन मानकों को तोड़ने में कोई गुरेज नहीं करती।
इस बार के विधानसभा चुनाव में भी अधिकतर पार्टियों ने बाहुबली, दागियों को सिंबल देने में कोई कोताही नहीं बरती है। अगर, किसी कारणवश दागी चुनाव नहीं लड़ पा रहे हों, तो पार्टियों ने उनके परिजनों को टिकट दे दिया है, क्योंकि बात जब सत्ता तक पहुँचने की होती है, तो जीत की गणित में ‘दाग अच्छे होते हैं’।
इस्लामी कट्टरपंथी द्वारा शिक्षक का गला काटने की घटना के बाद फ्रांस ने इस तरह की समस्याओं का सामना करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। फ्रांस 231 विदेशी कट्टरपंथी नागरिकों को बाहर निकालने की तैयारी कर रहा है। फ्रांस सरकार की तरफ से होने वाली यह कार्रवाई कट्टरपंथ और आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में एक अहम कदम माना जा रहा है।
रायटर्स में प्रकाशित ख़बर में इस पूरी कार्रवाई की विस्तृत जानकारी दी गई है। फ्रांस सरकार में मंत्री गेरल्ड डरमानिन (Gerald Darmanin) ने कहा, “निष्कासन की यह कार्रवाई 47 वर्षीय इतिहास शिक्षक सैमुएल पैटी की गला काटकर हत्या करने के बाद की जा रही है। जिन्होंने पढ़ाने के दौरान कक्षा में पैगंबर मोहम्मद के कार्टून दिखाए थे।”
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्क्रों ने भी इस घटना पर रोष जताया था। उन्होंने कहा था, “यह एक इस्लामी आतंकवादी हमला है। देश के हर नागरिक को इस चरमपंथ के विरोध में एक साथ आगे आना होगा। इसे किसी भी हालत में रोकना ही होगा क्योंकि यह हमारे देश के लिए बड़ा ख़तरा साबित हो सकता है।”
फ्रांस कट्टरपंथियों को कुछ इस तरह परिभाषित करता है, “इस तरह के लोग जो कट्टरता को बढ़ावा देने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं। जो देश के बाहर जाकर आतंकवादी समूहों में शामिल होते हैं और आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देते हैं।” फ़ाइल ऑफ़ अल्टर्सफ़ॉर द प्रिवेंशन ऑफ़ टेररिस्ट अटैक्स (एफ़एसपीआरटी) की रिपोर्ट के अनुसार 231 विदेशी नागरिकों में से 180 कारावास में कैद हैं। इसके अलावा बचे हुए 51 को अगले कुछ घंटों में गिरफ्तार किया जाना था। एफ़एसपीआरटी की रिपोर्ट के तहत कुल 850 गैर क़ानूनी अप्रवासी पंजीकृत हैं।
इस महीने की शुरुआत में फ्रांस के राष्ट्रपति ने फ्रांस के धर्म निरपेक्ष मूल्यों को कट्टरपंथी इस्लामी ताकतों से सुरक्षित रखने की योजना का ऐलान किया था। इसके बाद उन्होंने कहा था कि इस्लाम एक ऐसा मज़हब है जो फ़िलहाल पूरी दुनिया में संकट का सामना कर रहा है। हाल ही में मैक्रों ने कहा था कि उनकी सरकार दिसंबर में एक विधेयक (बिल) लेकर आएगी जो साल 1905 के एक क़ानून को और मज़बूत करेगा।
यह क़ानून चर्च और स्टेट को अलग करता है जिससे देश में धर्म के प्रति उदासीनता बनी रहे। उन्होंने अपने भाषण में यहाँ तक कहा कि आगामी कुछ समय में इस बात को सुनिश्चित किया जाएगा कि मज़हब, फ्रांस की शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक सेक्टर) से दूर रहे। मैक्रों के मुताबिक़ यह सभी निर्णय कट्टरपंथ और अलगाववाद को रोकने के लिए लिए जा रहे हैं। इतना ही नहीं फ्रांस के इमामों को फ्रांसीसी भाषा भी सीखनी होगी। उन्होंने कहा कि इस्लाम को विदेशी प्रभाव से मुक्ति पानी होगी।
मैक्रों ने कहा, “इस्लाम एक ऐसा मज़हब है जिस पर पूरी दुनिया में संकट है, ऐसा सिर्फ हम अपने देश में नहीं देख रहे हैं।” इसके बाद उन्होंने युवाओं की शिक्षा पर भी ज़ोर दिया जिससे उन्हें धर्मनिरपेक्ष आदर्शों वाला बनाया जा सके। इसकी शिक्षा बच्चों को शुरूआती स्तर से या उनके स्कूल के समय से ही देनी होगी। उन्होंने इस बात के भी संकेत दिए कि फ्रांस इस्लाम को विदेशियों के प्रभाव से भी आज़ाद करेगा, इसके लिए मस्जिदों को मिलने वाली फंडिंग में सुधार किया जाएगा।
राष्ट्रपति मैक्रों ने यह बातें उस घटना के ठीक कुछ दिन बाद कही हैं जिसमें एक आदमी ने धारदार हथियार से दो लोगों पर हमला कर दिया था। घटना ठीक उस जगह पर हुई थी जहाँ कट्टरपंथी इस्लामियों ने साल 2015 में शार्ली हेब्दो के कर्मचारियों का नरसंहार किया था। फ्रांस की सरकार ने इस हरकत को भी इस्लामी आतंकवाद का नतीजा बताया था। साल 2015 में इस्लामी कट्टरपंथियों ने शार्ली हेब्दो के कार्यालय पर आतंकवादी हमला किया था जिसमें कई मशहूर कार्टूनिस्ट समेत कुल 12 लोगों की मौत हो गई थी।
पाकिस्तान में कट्टरपंथियों का कहर हर अल्पसंख्यक आबादी पर बराबर बरस रहा है। खबर है कि पाकिस्तान के दावत-ए-इस्लामी और पीर शाह काकू चिश्ती मकबरे के लोगों ने शहीद भाई तारू सिंह के गुरुद्वारे के बाहर पोस्टर चिपकाए हैं और गुरुद्वारे को वहाँ से हटाने के लिए धमकी दी है। यह पोस्टर शाहमुखी भाषा में प्रिंट किए गए हैं जो पंजाबी की उपबोली है।
सिख 24 पर प्रकाशित आज की रिपोर्ट के अनुसार, सुहेल बट अटारी जिसने एक वीडियो जारी करके गुरुद्वारे से सटी जमीन लेने की अपनी साजिशों को उजागर किया था, अब उसी ने और उसके समर्थकों ने कहा कि पाकिस्तान सिर्फ मुस्लिमों का है और वह पाकिस्तान में गुरुद्वारे नहीं बनने देंगे। अपनी वीडियो में उसने पंजाब सिख संगत के अध्यक्ष गोपाल सिंह चावला और भाई फौजा सिख का जिक्र भी किया था।
इनका दावा है कि शहीद भाई तारू सिंह और सिंह सिंघानिया गुरुद्वारे की जमीन पीर शाह काकू चिश्ती और शहीद गंज मस्जिद के मकबरे से जुड़ी हैं।
उन्होंने कहा है कि सिखों को यदि शहीद भाई तारु सिंह गुरुद्वारा में श्रद्धांजलि देने आना है तो पहले शहीद भाई तारु सिंह की शहादत के बारे में सबूत पेश करने होंगे। उन्होंने यह भी कहा है कि पाकिस्तान की पूरी जमीन एक ही मजहब की है।
Another example of persecution of minorities in #Pakistan
A Maulvi of Lahore captured the land of the Gurudwara Shaheed Bhai Taru Singh by saying that Pakistan is only for Muslims.
याद दिला दें कि पिछले दिनों पाकिस्तान के लाहौर से इसी मौलवी को लेकर खबर आई थी कि सुहैल नामक इस मौलवी ने गुरुद्वारे की जमीन पर कब्जा कर लिया था। साथ ही धमकी देते हुए कहा था कि पाकिस्तान इस्लामी देश है, यहाँ सिर्फ मुस्लिम रह सकते हैं।
इस वीडियो में उसने पाकिस्तान गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पूर्व अध्यक्ष गोपाल सिंह चावला को धमकी दी थी। गोपाल चावला ने गुरुद्वारा में पिछले साल सिखों के प्रतीक श्री निसाल साहिब को फहराया था। सोहेल ने दावा किया था कि गुरुद्वारा और उसके आसपास की 4 से 5 कनाल जमीन हजरत शाह काकू चिश्ती दरगाह और शहीदगंज मस्जिद की है।
इस मामले के उजागर होने के बाद भारत ने भी पाक अल्पसंख्यकों के लिए चिंता जाहिर की थी। भारत ने घटना का कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए कहा था कि लाहौर के नौलखा बाजार में भाई तारू सिंह जी की शहीदी स्थल पर मस्जिद शहीद गंज के नाम दावा किए जाने की घटना पर पाकिस्तान के उच्चायोग में कड़ा विरोध दर्ज कराया गया। इसे मस्जिद बनाए जाने की कोशिश की जा रही है। पाकिस्तान से यह भी कहा गया है कि वह अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की सुरक्षा, हितों के साथ ही उनके धार्मिक अधिकारों और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करे।
पंजाब की अलग-अलग जेलों में पिछले 22 महीने से कैद बहुजन समाज पार्टी के विधायक मुख्तार अंसारी को 50 पुलिसकर्मियों की टीम के साथ मंगलवार (अक्टूबर 20, 2020) को उत्तरप्रदेश वापस लाया जाएगा। इस बात की जानकारी पुलिस अधिकारी ने रविवार (अक्टूबर 18, 2929) को दी। उन्होंने बताया कि मुख्तार अंसारी को वापस लाने वाली टीम का नेतृत्व डीएसपी करेंगे।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना है कि वह अंसारी के ख़िलाफ़ लंबित मामले में उसको 21 अक्टूबर को एमपी/एमएलए कोर्ट में पेश करना चाहते हैं। अधिकारियों की मानें तो बाहुबली नेता अंसारी, उनकी पत्नी, उनके बेटों और करीबियों के खिलाफ कार्रवाई के दौरान पिछले 6 महीनों में उस पर कई नए केस दर्ज हुए हैं। अंसारी को पुलिस टीम के साथ बख्तरबंद गाड़ी में लेकर आया जाएगा।
50-member UP police team to bring back Mukhtar Ansari from Punjab jail in armoured vehiclehttps://t.co/z8Y4AiJWTX
बता दें कि पिछले साल के जनवरी महीने से ही गैंगस्टर अंसारी को पंजाब की जेल में कैद किया गया है। उनकी गिरफ्तारी एक बिल्डर से फिरौती माँगने के मामले में हुई थी। बाद में उसे रोपर जेल में डाल दिया गया और फिर मोहाली जेल में उसे शिफ्ट किया गया।
अधिकारियों का कहना है कि अंसारी ने अपनी जान को खतरा देखते हुए पंजाब की जेल में खुद को शिफ्ट करवाया था। उससे पहले उसका एक करीबी प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी बागपत जेल में दूसरे गैंगस्टर सुनील राठी के हाथों 9 जुलाई 2018 को मारा गया था।
पुलिस अधिकारी ने बताया कि राज्य प्रशासन को बिना सूचित किए जब पंजाब पुलिस को बड़ी आसानी ने अंसारी को ले जाने की अनुमति मिली तब कई उत्तरप्रदेश के जेल अधिकारियों पर सवाल उठे थे।
गौरतलब है कि उत्तरप्रदेश में योगी सरकार लगातार अंसारी की अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई कर रही है। पिछले कुछ महीनों में राज्य प्रशासन ने करीब 68 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी सीज की है। इनकी गैंग की वार्षिक आय 45 करोड़ थी। पुलिस की ताबड़तोड़ कार्रवाई में 96 सदस्य गिरफ्तार हुए हैं व कई मुठभेड़ में मारे भी गए हैं।
यहाँ बता दें कि मुख्तार अंसारी के करीबियों पर कार्रवाई के मद्देनजर कल अभिषेक सिंह उर्फ बाबू की गिरफ्तारी हुई है। इससे पहले बाबू सिंह के गोमती नगर स्थित घर पर तलाशी में बम बनाने का सामान मिला था। उसके ख़िलाफ़ कई मुकदमे दर्ज हैं। इलाके में उसके कारण दहशत भी थी। अभिषेक के अलावा जानकीपुरम निवासी शोएब अहमद, रोहित सिंह उर्फ मोहित, मड़ियांव निवासी अनमोल रावत, इन्दौराबाग बीकेटी निवासी पवन सिंह उर्फ लकी सिंह, अस्ती रोड बीकेटी निवासी सूरज सिंह पर भी गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है।
टीआरपी घोटाला मामले में रिपब्लिक टीवी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार (अक्टूबर 19, 2020) को कहा कि रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी TRP मामले में आरोपित नहीं हैं।
इस दौरान मुंबई पुलिस ने कोर्ट में परमबीर का सिंह का साथ देने से इनकार कर दिया। कोर्ट में मुंबई पुलिस पीछे हट गई। कोर्ट में उनके वकील ने भी माना कि रिपब्लिक आरोपित नहीं हैं। बता दें कि महाराष्ट्र राज्य और मुंबई पुलिस की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल पेश हुए थे।
#BREAKING | Mumbai police refuses to back Param Bir Singh in court on TRP case, lawyer admits ‘Republic not an accused’.
मुंबई पुलिस के रिपब्लिक टीवी प्रमुख अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार करने के इरादे के बारे में मीडिया हाउस की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे के सवालों का जवाब देते हुए अदालत ने कहा कि चूँकि अर्नब मामले में आरोपित नहीं हैं, इसलिए उनकी गिरफ्तारी का सवाल ही नहीं उठता। इसलिए, मीडिया हाउस प्रमुख के लिए सुरक्षा के अंतरिम आदेश को पारित करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
रिपब्लिक टीवी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे से कोर्ट ने कहा, “जहाँ तक अंतरिम संरक्षण का सवाल है, पीठ का मानना है कि यह आवश्यक नहीं है, क्योंकि एफआईआर में रिपब्लिक का कोई उल्लेख नहीं है और तात्कालिकता के मामले में, हम आपको यहाँ तत्काल स्थानांतरित करने की स्वतंत्रता प्रदान करेंगे।”
#TRPScam : Bombay HC to consider today the writ petition filed by ARG Outlier Media Ltd(company running #RepublicTV) and #ArnabGoswami to quash the Mumbai police FIR alleging manipulation of TRP ratings.
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस को टीआरपी हेरफेर मामले के आरोप में दर्ज एफआईआर में आरोपित बनाने से पहले रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी को समन भेजने का निर्देश दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि वह इस तरह का समन मिलने पर जाँच में शामिल होंगे और सहयोग करेंगे।
पुलिस द्वारा मीडिया को इंटरव्यू देने पर चिंतित होते हुए न्यायमूर्ति एसएस शिंदे की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “हम केवल वर्तमान मामले के बारे में नहीं कह रहे हैं। यह अन्य संवेदनशील मामलों में भी हो रहा है जहाँ जाँच लंबित है। अधिकारियों से भड़काऊ चीजें बोलने की अपेक्षा नहीं रखी जाती है।”
#TRPScam : Bombay HC to consider today the writ petition filed by ARG Outlier Media Ltd(company running #RepublicTV) and #ArnabGoswami to quash the Mumbai police FIR alleging manipulation of TRP ratings.
पीठ ने याचिका पर 5 नवंबर को दोपहर 3 बजे से अंतिम सुनवाई शुरू करने पर सहमति जताई है। कोर्ट ने मुंबई पुलिस को 4 नवंबर को सीलबंद कवर में इन्वेस्टिगेशन के दस्तावेज पेश करने का भी निर्देश दिया है।
गौरतलब है कि 8 अक्टूबर को आयोजित की गई प्रेस वार्ता में मुंबई पुलिस कमिश्नर ने रिपब्लिक टीवी और अर्नब गोस्वामी पर कई गम्भीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि चैनल ने टीआरपी से जुड़ी जानकारी में बदलाव करने के लिए आम लोगों को रुपए दिए थे और उनसे कहा गया था कि वह चैनल लगा कर अपना टीवी चालू रखें। उसी दिन रात तक यह बात भी सामने आ गई कि एफ़आईआर में कहीं भी रिपब्लिक टीवी का ज़िक्र नहीं है बल्कि उसमें इंडिया टुडे का नाम शामिल था।
इसके बाद टीआरपी घोटाला मामले में मुंबई पुलिस द्वारा चैनल के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की माँग करते हुए रिपब्लिक टीवी ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया। रिपब्लिक टीवी द्वारा दायर याचिका में निष्पक्ष और पारदर्शी जाँच सुनिश्चित करने के लिए मामले को केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को स्थानांतरित करने के निर्देश देने की माँग की गई थी।
अयोध्या पूरी तरह सज चुकी है, नवरात्र का वक्त है इसलिए रामलीला भी हो रही है। दूरदर्शन पर रामलीला का लाइव प्रसारण (स्ट्रीमिंग) हो रहा है। इस साल यह प्रसारण सीधे अयोध्या से किया जा रहा है। रामलीला का प्रसारण 17 अक्टूबर से शुरू हुआ जिसे उत्तर प्रदेश के पर्यटन और सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है।
दूरदर्शन के यूट्यूब चैनल पर प्रसारित किए पहले वीडियो पर 1 मिलियन (लगभग 10 लाख) बार देखा जा चुका है। प्रसार भारती के सीईओ शशि एस वामपती ने ट्वीट करके बताया कि डिजिटल माध्यम से हो रहे इस प्रसारण (स्ट्रीमिंग) पर ‘मल्टी मिलियन डिजिटल व्यूज़’ हो चुके हैं।
Ram Leela from Ayodhya already clocking multi-million digital watch minutes https://t.co/i8qf52dbXE
लाइव स्ट्रीमिंग के कार्यक्रम का लॉन्च पर्यटन, संस्कृति और धार्मिक मामलों के मंत्री नीलकंठ तिवारी और भाजपा के ही सांसद प्रवेश साहिब सिंह वर्मा ने किया था। इसे टीवी या यूट्यूब किसी पर भी देखा जा सकता है। रामलीला का आयोजन 10 दिनों के लिए होता है और इसका अंत मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम द्वारा रावण वध के साथ होता है। रामलीला के पहले एपिसोड पर 1 मिलियन यानी लगभग 10 लाख से ज़्यादा व्यूज़ आ चुके हैं। जबकि दूसरे एपिसोड के वीडियो पर लगभग 7 लाख से अधिक व्यूज़ आ चुके हैं।
रामलीला के हर एपिसोड की अवधि 2 घंटे 45 मिनट से ज़्यादा की है।
अयोध्या में भव्य रामलीला
इस साल अयोध्या में सितारों से भरी रामलीला का आयोजन हो रहा है, सरयू नदी के तट पर स्थित लक्षमण किला में भव्य रामलीला। रामलीला में इस बार असरानी और बिन्दु दारा सिंह, नारद मुनि और हनुमान का किरदार निभा रहे हैं। इसके अलावा भोजपुरी सुपरस्टार और भाजपा संसद मनोज तिवारी और रवि किशन अंगद और भरत की भूमिका निभा रहे हैं। बॉलीवुड के मशहूर कलाकार रज़ा मुराद और शाहबाज़ खान भी अहम भूमिका में नज़र आने वाले हैं।
हाल ही में रामायण की वापसी ने तोड़े थे कई रिकॉर्ड
मार्च 2020 में जब कोरोना वायरस महामारी की शुरुआत के चलते पूरे देश में लॉकडाउन लगाया गया था। तब दूरदर्शन ने रामायण और महाभारत के पुनः प्रसारण का फैसला लिया था। रामानंद सागर कृत रामायण का प्रसारण पहली बार दूरदर्शन पर 1987 से 1988 के बीच किया गया था। रामायण के पुनः प्रसारण पर दर्शकों की प्रतिक्रिया अप्रत्याशित थी और 16 अप्रैल को इसे लगभग 7.7 करोड़ बार देखा गया। प्रसारण के दौरान पूरे सोशल मीडिया पर रामायण से जुड़े पोस्ट और मीम्स चर्चा में बने हुए थे। सबसे उल्लेखनीय बात है कि रामायण को हर आयु वर्ग के लोगों ने पसंद किया था।