NDTV द्वारा गुजरात के तनिष्क स्टोर पर ‘भीड़ द्वारा हमला’ करने की फेक न्यूज़ फैलाने के बचाव में आख़िरकार एक इस्लामी प्रचार वेबसाइट और स्वघोषित फैक्ट चेकर गिरोह ‘ऑल्टन्यूज़’ का संस्थापक प्रतीक सिन्हा भी आ गया है। प्रतीक सिंहा का तर्क है कि गुजरात के गृहमंत्री को NDTV द्वारा फैलाई गई साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील फेक न्यूज़ पर उन्हें दण्डित करना ‘गलत प्राथमिकता’ का चुनाव है।
ऑल्टन्यूज़ के संस्थापक प्रतीक सिंहा ने गुजरात के गृहमंत्री का ट्वीट रीट्वीट करते हुए लिखा है, “गुजरात के गृह मंत्री, जो कानून और व्यवस्था के लिए जिम्मेदार हैं, की प्राथमिकताएँ वास्तविकता से ताल्लुक नहीं रखती हैं। उन्होंने गुंडों की हरकतों की पूरी तरह से अनदेखी की, जिन्होंने तनिष्क के कर्मचारियों को धमकी दी, और वो एनडीटीवी के बारे में अधिक परेशान हैं जिन्होंने अपनी रिपोर्ट की गलतियाँ सुधार लीं।”
दरअसल, तनिष्क के विज्ञापन पर जारी विवाद के बीच NDTV द्वारा गुजरात के तनिष्क स्टोर पर हमला होने की फेक न्यूज़ के प्रसारण के बाद सोशल मीडिया पर सभी लोग ऑल्टन्यूज़ पर यह दबाव बना रहे थे कि क्या वह इस खबर का फैक्ट चेक सिर्फ इस वजह से नहीं कर रहे हैं क्योंकि यह NDTV ने फैलाई है?
लेकिन प्रतीक सिन्हा ने NDTV का फैक्ट चेक करने के बजाए गुजरात के गृहमंत्री के बयान को ही गलत साबित करने और उन्हें उनका दायित्व याद दिलाने का बचकाना प्रयास किया है। प्रतीक सिन्हा यहाँ पर निष्पक्ष रहने की अदाकारी सही तरीके से नहीं कर पाया और फैक्ट चक्र तो वो कभी था ही नहीं।
क्या है मामला?
तनिष्क द्वारा विज्ञापन वापस लेने के बाद वामपंथी मीडिया चैनल एनडीवी ने ब्रेकिंग चलाते हुए दावा किया कि विवाद के चलते गुजरात के गाँधीधाम में तनिष्क के एक स्टोर पर हमला हुआ है।एनडीटीवी के मुताबिक, हमलावरों की भीड़ ने कथित तौर पर स्टोर मैनेजर को माफी पत्र लिखने के लिए कहा था।
अब गुजरात के गृहमंत्री ने इसका खंडन करते हुए कहा, “NDTV द्वारा गाँधीधाम (गुजरात) के तनिष्क स्टोर पर हमले की फैलाई गई खबरें पूर्णतः झूठ और फ़र्ज़ी हैं। यह बिलकुल ही गलत मंशा से गुजरात में कानून-व्यवस्था बिगाड़ने और हिंसा भड़काने के उद्देश्य से किया गया कार्य है। मैंने इन लोगों पर मामला दर्ज करने को कहा है और फेक न्यूज चलाने वालों पर सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं।”
NDTV की रिपोर्ट में कहा गया था कि गुजरात के गाँधीधाम में तनिष्क स्टोर पर हमला हुआ है। हमला होने के बाद स्टोर मैनेजर के माफी पत्र में कथित तौर पर सेक्युलर विज्ञापन प्रसारित करके हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने के लिए कच्छ जिले के लोगों से माफी माँगवाई गई।
तनिष्क के विज्ञापन में एक हिंदू महिला की गोदभराई की रस्म को दिखाया गया था। इस लड़की की शादी मुस्लिम परिवार में हुई थी। इसमें हिंदू संस्कृति को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम परिवार सभी रस्मों रिवाजों को हिंदू धर्म के हिसाब से करता दिखाया गया था।
विज्ञापन को लव जिहाद को बढ़ावा देने के आरोप लगने और सोशल मीडिया पर तनिष्क के बहिष्कार की अपीलों के बाद कंपनी ने विज्ञापन को वापस ले लिया। कुछ इसी तरह का विवाद होली के दौरान सर्फ एक्सेल के एक विज्ञापन को लेकर भी हुआ था।
‘अनपढ़’, ‘जाहिल’, ‘गवार’, ‘संघी’, ‘धार्मिक कट्टरपंथी’, ‘चड्ढी पहनने वाला’ और न जाने क्या-क्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े लोगों को अक्सर सुनने को मिलता रहता है मगर सच तो यह है कि प्राकृतिक आपदा आने पर प्रभावित क्षेत्रों में जितना स्वयंसेवक सक्रिय होकर पीड़ितों की मदद करते हैं, उतनी सहायता शायद ही कोई और संगठन करता हो। इसका हालिया उदाहरण हैदराबाद में बाढ़ आने के बाद भी देखने को मिला।
जब अधिकांश लोगों को यह तक ज्ञात नहीं कि हैदराबाद बाढ़ जैसी मुसीबत से गुजर रहा है, उस समय आरएसएस के ‘चड्ढी पहनने वाले संघी’ अपनी जान को खतरे में डालकर लोगों की बुनियादी जरूरतों को उन तक पहुँचाने का काम कर रहे हैं।
जी हाँ आरएसएस से जुड़ी सेवाभारती नाम की संस्था ने ट्विटर पर कुछ वीडियोज डाली हैं। इनमें देखा जा सकता है कि स्वयंसेवक घर-घर जाकर लोगों को खाने पीने का सामान मुहैया करवा रहे हैं।
Visuals from Hyderabad.
Be it any natural calamity, Swayamsevaks of @RSSorg are the first to help the needy irrespective of caste, creed religion or ideology.
All this visuals should put some iota of shame to those who baselessly accuse RSS of being communal and casteist. pic.twitter.com/CjU9NhOPbZ
इस संबंध में भाजपा के राष्ट्रीय सचिव वाई सत्यकुमार ने ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा कि कोई भी प्राकृतिक आपदा में आरएसएस के स्वयंसेवक बिना जाति, धर्म और विचारधारा देखे, जरूरतमंदों की मदद करने पहुँचते हैं। ये दृश्य उन लोगों के चेहरे पर थोड़ी शर्म लेकर आए जो निराधार ही आरएसएस पर जातिवाद और सांप्रदायिक होने का आरोप मढ़ते हैं।
सेवाभारती तेलंगाना के ट्विटर अकॉउंट पर किए गए ट्वीट के मुताबिक कल तक (14 अक्टूबर) वहाँ लोगों को 7,329 किट वितरित की जा चुकी है। इनमें बिस्किट, राशन, कंबल, पका खाना, तिरपाल, पानी की बोतलें, कपड़े, बर्तन और फर्स्ट एड किट्स शामिल हैं।
अकॉउंट पर शेयर की गई वीडियो में नजर आ रहा है कि खुद बाढ़ से जूझकर स्वयंसेवक घरों में दूध पहुँचा रहे हैं। साथ ही नौकाओं के जरिए कई पीड़ितों को बचा भी रहे हैं। जानकारी के मुताबिक अभी तक मेडिपल्ली में 130 पीड़ितों को सेवाभारती स्वंय सेवकों ने बचा लिया है।
200 खाने के पैकेट भी पीड़ितों में बाँटे जा चुके हैं। ट्वीट के समय के मुताबिक यह आँकड़े कल तक के हैं। सक्रिय स्वंयसेवकों के प्रयासों से इनमें बढ़ौतरी भी हो सकती है।
शैकपेट नाला के पास एमजी नगर बस्ती में तो महिला स्वयंसेवकों ने 113 लोगों को खाना पहुँचाया।
#HyderabadFloods Many lost there Kutcha homes & govt allocated homes to backward classes due to continues heavy rainfall in MG nagar basthi, Shaikpet nala
उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ दिनों में हुई भारी बरसात के कारण हैदराबाद में बाढ़ की आफत आ गई है। कई लोगों से उनके आशियाने छिन गए हैं और कइयों के वाहनों तक को पानी का तेज प्रवाह अपने साथ बहा कर ले गया है।
आज भी भारी बारिश के कारण प्रदेश के उपनगरों में बहुत पानी भरा रहा। जिसके कारण सेना और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) के जवानों ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में बचाव और राहत कार्य जारी रखा।
हैदराबाद में भारी बारिश के कारण उपनगरों में कई कॉलोनियों में गुरुवार को पानी भरा रहा, वहीं सेना और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) के जवानों ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में बचाव और राहत कार्य जारी रखा। #HyderabadRainspic.twitter.com/Vk6GU57FeA
4 फिल्म एसोसिएशन और 34 फिल्म निर्माताओं ने रिपब्लिक टीवी और टाइम्स नाउ के खिलाफ बॉलीवुड-ड्रग नेक्सस को लेकर किए गए कवरेज के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। वहीं अब इस बात का पता चला है कि मूल याचिका में गैरजिम्मेदाराना और अपमानजनक रिपोर्टिंग को लिए और कई टीवी समाचार चैनलों का नाम शामिल था। जिन्हें कुछ याचिकाकर्ताओं को बिना बताए दाखिल करने से पहले हटा दिया गया था।
ऑपइंडिया ने सॉलिसिस लेक्स, CINTAA (Cine and TV Artists Association) का प्रतिनिधित्व करने वाली कानूनी फर्म और प्रोड्यूसर्स गिल्ड के बीच हुए ईमेल एक्सचेंज के बारे में जानकारी प्राप्त की है। ईमेल के जरिए यह पता चला है कि याचिका में और कई चैनलों के नाम जोड़ने की बात कही गई है, ताकि सिर्फ 2 चैनलों को टारगेट ना किया जा सके।
प्रोड्यूसर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के एक पदाधिकारी ने 15 अक्टूबर को सॉलिसिस लेक्स को यह कहते हुए लिखा कि याचिका में कुल 38 याचिकाकर्ता हैं, उन्होंने फैसला किया है कि केवल एक लॉ फर्म लॉजिस्टिक उनके सभी मुद्दों का प्रतिनिधित्व करेगी। अधिकारी ने लिखा कि ऐसे कई और मीडिया घराने हैं, जिन्होंने इंडस्ट्री के खिलाफ बदनामी, मानहानि और अभद्रता की है। साथ ही वे याचिका में और कई नाम जोड़ना चाहते हैं।
ईमेल का जवाब देते हुए सॉलिसिस लेक्स के मैनेजिंग पार्टनर अमीत मेहता ने CINTAA की ओर से लिखा कि याचिका के दायरे में और भी चैनल शामिल होने चाहिए। उन्होंने आगे लिखा कि हो सकता है प्रोड्यूसर्स गिल्ड से दायर याचिका में उनका नाम लिखने में चूक हो गई है। कानूनी फर्म ने निम्नलिखित चैनलों के नाम दायर याचिका में जोड़ने का सुझाव दिया:
आजतक
एनडीटीवी
सीएनएन-आईबीएन
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया
जी न्यूज़
इंडिया टीवी
इंडिया टुडे
ABP न्यूज़
गौरतलब है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया कोई नया चैनल नहीं है, लेकिन कानून फर्म द्वारा इसे सूची में शामिल किया गया था। इन अतिरिक्त चैनलों का नाम जोड़ने के मामले में जस्टिफिकेशन देते हुए ईमेल में कहा गया है, “अन्यथा दो नए चैनलों के खिलाफ दायर याचिका से ऐसा प्रतीत हो रहा मानों लक्षित दर्शकों को ही सिर्फ टारगेट किया जा रहा।”
दिलचस्प बात यह है कि CINTAA का प्रतिनिधित्व करने वाली कानूनी फर्म के मेल में कहा गया है कि मूल योजना के अनुसार, उन्हें याचिका में सभी प्रमुख समाचार चैनलों को शामिल करना था, लेकिन अंतिम याचिका में हुए बदलाव को देखकर वे हैरान हो गए। मेल में कहा, “यह बात सबको स्पष्ट थी कि हम सभी प्रमुख समाचार चैनलों को इसमें (याचिका) शामिल करेंगे। हालाँकि, हम अंतिम याचिका में केवल दो समाचार चैनलों के नाम देखकर हैरान थे।” इसका मतलब है कि रिपब्लिक टीवी और टाइम्स नाउ का उल्लेख केवल याचिका में किया गया था, इसकी जानकारी CINTAA को नहीं थी।
अमित मेहता ने कहा, “हमें या तो इसे वास्तव में सही बनाना है या फिर हम सभी को हटाते हैं और दो रखते हैं।” उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि याचिका में ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब जैसे उत्तरदाताओं को रखना सजावटी पार्टियों के रूप में दिखता है, जिसका कोई मतलब नहीं है।
मेल में आगे कहा गया, “हमें निष्पक्ष होकर आगे बढ़ना चाहिए। हालाँकि, इसमें एक संशोधन की तत्काल आवश्यकता है।” आगे लॉ फर्म यह भी बताती है कि अगर वे मामले में पार्टियों के रूप में उल्लेखित चैनलों को जोड़ना नहीं चाहते हैं, तो CINTAA को याचिकाकर्ताओं के रुप मे इसका कारण जानना चाहिए।
कोलकाता उच्च न्यायालय ने तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा को बड़ा झटका दिया है। न्यायालय ने उनके द्वारा भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के विरुद्ध दायर की गई चार्जशीट को सिरे से खारिज कर दिया। इसमें केन्द्रीय मंत्री पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने साल 2017 के दौरान हुई एक टेलीविज़न चर्चा (डिबेट) में तृणमूल कॉन्ग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा, “अभी तक हुई चर्चा से यह निष्कर्ष निकल कर आता है कि प्राथमिकी (एफ़आईआर) में जितने आरोप लगाए गए हैं और आरोपों से जुड़े तमाम पहलू के आधार पर धारा 509 का उल्लंघन नहीं हुआ है। इसलिए चार्जशीट संख्या 27, तिथि 8 मार्च 2017 जो कि धारा 509 के तहत दायर की गई थी, इसे खारिज करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है।”
इसके बाद केन्द्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो ने कोलकाता उच्च न्यायलय के इस आदेश का उल्लेख करते हुए ट्वीट किया। साथ ही उन्होंने 3 साल लगातार चली इस लड़ाई में महुआ मोइत्रा के विरुद्ध जीत दर्ज करने पर ख़ुशी भी जाहिर की।
साल 2017 में तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने बाबुल सुप्रियो के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि एक टीवी चैनल पर हुई चर्चा के दौरान केन्द्रीय मंत्री ने उनके मान सम्मान को ठेस पहुँचाई थी। आरोप यह था कि राष्ट्रीय टीवी पर हुई इस परिचर्चा में बाबुल सुप्रियो ने महुआ मोइत्रा पर टिप्पणी करते हुए कहा था, “महुआ, क्या आपने महुआ ले रखी है (महुआ से बनने वाली स्थानीय शराब)”?
विवादित नेता महुआ मोइत्रा को यह टिप्पणी बेहद अपमानजनक लगी थी। नतीजतन उन्होंने इसके विरुद्ध अलीपुर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराया था। जिसके बाद पश्चिम बंगाल पुलिस ने इस सम्बंध में मुकदमा दर्ज किया था और एक चार्जशीट भी दायर की थी। स्थानीय अदालत ने इस मामले में पुलिस को आदेश दिया था कि वह धारा 509 के तहत बाबुल सुप्रियो पर कार्रवाई करे।
उत्तरी दिल्ली नगर निगम के तहत आने वाले डॉक्टर्स पिछले चार महीनों से वेतन का भुगतान नहीं करने पर आंदोलन कर रहे हैं। इस पर दिल्ली के हिंदू राव अस्पताल के डॉक्टर और कर्मचारियों ने कल, 16 अक्टूबर को दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन करने का फैसला लिया है। उत्तरी दिल्ली नगर निगम के मेयर जय प्रकाश का कहना है कि दिल्ली में 6 साल से अरविंद केजरीवाल सरकार है और पिछले 6 सालों से ही ये संकट है।
ज्ञात हो कि अभी तक मेडिकल स्टाफ सिर्फ अस्पताल परिसर में ही विरोध-प्रदर्शन कर रहा था, लेकिन अब उन्होंने सड़क पर उतरने का फैसला लिया है। हिन्दू राव अस्पताल के साथ ही उत्तरी दिल्ली नगर निगम द्वारा संचालित कस्तूरबा अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) ने भी वेतन न मिलने के कारण बुधवार (अक्टूबर 14, 2020) से एक सप्ताह की हड़ताल पर जाने का फैसला किया और वेतन न मिलने पर इस्तीफा देने की धमकी भी दी है।
डॉक्टर्स और मेडिकल स्टाफ की इस समस्या पर बृहस्पतिवार (अक्टूबर 15, 2020) को उत्तरी दिल्ली नगर निगम के महापौर जयप्रकाश ने कहा है कि उन्होंने कल ही हिंदू राव और कस्तूरबा गाँधी समेत करीब 6 अस्पतालों के कर्मचारियों की 1 महीने की सैलरी जारी कर दी है और बकाया सैलरी भी जल्द से जल्द दे दी जाएगी।
समाचार एजेंसी एनआई के मुताबिक, हिंदू राव अस्पताल के डॉक्टरों की हड़ताल पर उत्तरी दिल्ली नगर निगम के मेयर जय प्रकाश ने कहा, “डॉक्टरों की तीन महीने की सैलरी बकाया थी, उसमें से एक महीने का वेतन मैंने कल रात को जारी करा दिया। सिर्फ दो महीने का वेतन बकाया है, जैसे महीना पूरा होगा एक महीने का वेतन हम और जारी कर देंगे।”
जयप्रकाश ने इसके पीछे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को दोषी ठहराते हुए कहा, “दिल्ली में 6 साल से अरविंद केजरीवाल सरकार है और पिछले 6 सालों से ही ये संकट है। दिल्ली सरकार ज़िम्मेदार रवैया अपनाते हुए हमारे इस साल के जो 1600 करोड़ रुपए और पिछले साल के 9,000 करोड़ रुपए रोक रखे हैं, उसे जारी करे और दिल्ली की जनता के साथ खिलवाड़ न करे।”
उन्होंने कहा कि नगर निगम की कमाई के 2 ही साधन हैं, पहला- राजस्व, संपत्ति कर, विज्ञापन, कार पार्किंग, लाइसेंस, नक्शे पास करने की फीस, चालान और जुर्माने इकट्ठा होने वाला पैसा और दूसरा साधन वो पैसा, जो ग्रांट के तौर पर दिल्ली सरकार से मिलता है। जयप्रकाश का कहना है कि पिछले 4-5 महीने से दिल्ली सरकार ने एक भी रुपया नहीं दिया है।
केरल के सोना तस्करी मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने हैरान कर देने वाला खुलासा किया है। कोच्चि की विशेष अदालत में एनआईए ने इस बात का संकेत देते हुए कहा है कि सोना तस्करी मामले में भारत के मोस्ट वांटेड आतंकवादी दाऊद इब्राहिम की भूमिका हो सकती है।
एनआईए ने बताया कि यह जानकारी खुफ़िया इनपुट से मिली है कि सोने की तस्करी के दौरान मिले रुपयों का इस्तेमाल आतंकवादी और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए किया गया था। इसके अलावा एनआईए ने विशेष अदालत में इस बात पर भी ज़ोर दिया कि फ़िलहाल इस संदिग्ध भूमिका की जाँच करने की ज़रूरत है।
बुधवार (14 अक्टूबर 2020) को एनआईए ने केरल सोना तस्करी मामले में कोच्चि की विशेष अदालत के सामने अपना पक्ष रखा। एनआईए ने बताया कि सोना तस्करी के कुछ आरोपितों के सम्बंध दाऊद गिरोह से हैं और वह कई बार तंज़ानिया भी जा चुके हैं। तंज़ानिया में दाऊद का नेटवर्क काफी बड़े पैमाने पर काम करता है। आने वाले समय में इस पूरे मामले में हमें और बड़े नतीजे हासिल हो सकते हैं। इसके अलावा एनआईए ने यह भी कहा कि मामले में जाँच आगे बढ़ाने के लिए सभी आरोपितों को 180 दिन की न्यायिक हिरासत में रखा जाना अत्यंत आवश्यक है।
दरअसल, आरोपितों ने अदालत में गैर क़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती दी थी। चुनौती देने के लिए यह तर्क पेश किया गया था कि तस्करी आर्थिक अपराध की श्रेणी में आती है लिहाज़ा इस प्रकरण का कोई आतंकवादी पहलू नहीं है। एनआईए ने इस दलील के जवाब में कहा था कि सोना तस्करी मामले के कुछ आरोपितों के सम्बंध राष्ट्र विरोधी ताकतों से है।
अदालत में एनआईए ने यह भी कहा कि इस मामले के आरोपित नंबर 5 केटी रमीज़ और आरोपित नंबर 13 शराफुद्दीन ने कई बार तंज़ानिया का दौरा किया था। इसके अलावा उन्होंने दाऊद के सम्पर्क वाले फिरोज़ ‘ओएसिस’से मुलाक़ात की और देश में हथियारों की तस्करी पर चर्चा की। इसके अलावा एनआईए के मुताबिक़ रमीज़ ने बताया कि तंज़ानिया में उसका हीरे का कारोबार था और उसने सोना यूएई में बेचा था।
एनआईए ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सैंक्शन कमेटी की तरफ से दाऊद पर की गई टिप्पणी का उल्लेख भी किया था। साथ ही अफ्रीका में अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ़ ट्रेज़री की तरफ से दाऊद गैंग की गतिविधियों पर प्रकाशित फैक्ट शीट भी जोड़ी गई है। इसके पहले रमीज़ कोझिकोड हवाई अड्डे पर रिवॉल्वर के साथ पकड़ा जा चुका था और पकड़े जाने पर उसने कहा था कि वह शूटिंग एसोसिएशन का सदस्य था।
बिहार की राजनीति में एक लंबे समय से अपराध और राजनीति एक सिक्के के दो पहलू माने जाते रहे हैं। शायद इसी वजह से नेता दबंगों और अपराधियों की ओट में वोट से अपनी झोली भरने को आतुर दिखते थे। वैसे बिहार में तो बाहुबलियों का शुरू से ही बोलबाला रहा है। चाहे सिवान का शहाबुद्दीन हो या मोकामा का अनंत सिंह। इनके जुर्म की कहानियाँ पूरे देश में कुख्यात हैं।
हालाँकि अब भी राजनीति में बाहुबलियों का बोलबाला है, मगर कई चीजें वक्त के साथ सीमित हुई हैं और बदलाव देखा जा सकता है। कई पुराने बाहुबली अब भी ठसक के साथ राजनीति में मौजूद हैं। लेकिन कई पुराने आरोपों से निकल कर पूरी तरह ‘जनता के सेवक’ बन चुके हैं। इन्हीं में से एक हैं- जन अधिकार पार्टी के मुखिया और पूर्व सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव (Pappu Yadav)।
हत्या-अपहरण जैसे 31 संगीन केसों में आरोपित बाहुबली पप्पू यादव विधानसभा चुनाव में लोगों से अपराध मुक्त बिहार बनाने का वादा कर रहे हैं। तीन दशक पहले 1990 में मधेपुरा के सिंहेश्वर विधानसभा सीट से चुनाव जीत कर अपनी सियासी पारी का आगाज करने वाले पप्पू यादव की गिनती बिहार के उस बाहुबली नेता के तौर पर होती है, जिसके नाम का खौफ एक जमाने में बिहार से लेकर दिल्ली तक नेता खाते थे। एक बार के विधायक और पाँच बार के सांसद पप्पू यादव इस बार विधानसभा चुनाव में मधेपुरा से चुनावी मैदा में उतर रहे हैं, वो भी मुख्यमंत्री के प्रत्याशी के तौर पर।
लालू यादव के साथ ही बिहार की राजनीति में बाहुबली पप्पू यादव का भी सियासी उदय
साल 1990 का बिहार एक ओर लालू यादव के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी का गवाह बन रहा था, तो दूसरी ओर अपराध की दुनिया के कई नामों के सियासी उदय होने का साक्षी भी बन रहा था। लालू यादव के साथ ही बिहार की राजनीति में बाहुबली पप्पू यादव का भी सियासी उदय होता है।
बिहार में अस्सी के दशक में जिस जातीय टकराव की शुरुआत होती है, वह नब्बे के दशक आते-आते अपने चरम पर पहुँच जाती है। जाति की राजनीति के लिए पहचाना जाने वाला बिहार अब जातीय संघर्ष की आग में जलने लगा था। भूमिहारों और यादवों की जंग की धमक बिहार ही नहीं पूरे देश में सुनाई देने लगी थी। बिहार की पावन धरती एक के बाद एक नरसंहार से लाल होती जा रही थी। जातीय संघर्ष की इस जंग में भूमिहारों का नेतृत्व रणवीर सेना कर रही थी तो उसको चुनौती देने का काम पिछड़ों के नेता पप्पू यादव कर रहे थे, जिन्होंने यादवों की अपनी अलग सेना का ही निर्माण कर डाला था।
पूर्णिया का रंगबाज
कोसी का बेल्ट, जहाँ हर बारिश में कोसी नदी अपने रौद्र रूप में तबाही मचाती थी वह इलाका अब पप्पू यादव और रणवीर सेना के टकराव में गोलियों से अक्सर गूँजता था। अगड़े और पिछड़े की जंग में पप्पू यादव ने कोसी बेल्ट में अपना वर्चस्व कायम किया और पिछड़ी जाति के युवा उनके साथ जुड़ते चले गए। 80 के दशक के अंत तक पूर्णिया, सहरसा, सुपौल, कटिहार ज़िलों में पप्पू यादव का अच्छा ख़ासा दबदबा बन चुका था।
1990 में देश में आरक्षण की आग लगी और मंडल-कमंडल की जंग सड़क पर आ चुकी थी। इसको लेकर बिहार में समाज बँट चुका था। ठाकुर, भूमिहार, अहीर, सबने एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। कोसी बेल्ट में आनंद मोहन ने अपनी प्राइवेट आर्मी बना ली थी और उसे चुनौती देने के लिए पप्पू यादव भी अपनी सेना को लेकर तैयार थे। आए दिन वारदातें होती रहती थीं। यह वो समय था, जब पप्पू यादव और आनंद मोहन को कोसी बेल्ट का टेरर ट्विन कहा जाने लगा था।
आनंद मोहन Vs पप्पू यादव: कोसी बेल्ट का टेरर ट्विन
बिहार में गंगा के उत्तर में भूमिहारों के खिलाफ पप्पू यादव ने मोर्चा खोल रखा था। एक गाँव में एक यादव की कथित तौर पर पिटाई हुई और पप्पू यादव 60 बसों में असलहों से लैस लड़कों को लेकर उस गाँव तक पहुँच गए, वहाँ फायरिंग भी की। कहते हैं कि पप्पू यादव और उनके समर्थकों ने गाँव को लूटने की कोशिश की, लेकिन गाँव वालों ने उनकी कार को आग के हवाले कर दिया और साथ में उनके हथियारों को भी छीन लिया था। ये सिर्फ भूमिहारों और यादवों की ही जंग नहीं थी, ये जंग दो बाहुबलियों की भी थी।
मोकामा से लेकर वैशाली तक 150 किलोमीटर के एरिया में भूमिहारों और यादवों की जंग गृह युद्ध का रूप ले चुकी थी। वैशाली के कुछ गाँवों ने तो अपनी सीमाएँ सील कर दी थीं और हथियार उठा लिए थे। पप्पू यादव और आनंद मोहन के बीच की इस जंग ने जातीय हिंसा फ़ैला दी थी।
जातीय संघर्ष के सहारे अपनी सियासी रोटियाँ सेंकने वाले पप्पू यादव लगातार राजनीति की सीढ़ियाँ भी चढ़ रहे थे। विधायक बनने के एक साल बाद ही 1991 में पूर्णिया लोकसभा सीट से बतौर निर्दलीय चुनावी मैदान में वो उतरे और चुनाव जीतकर संसद भी पहुँच गए। इसके बाद 1996 के लोकसभा चुनाव में भी पप्पू यादव पूर्णिया से फिर रिकॉर्ड तीन लाख से अधिक वोटों से जीत दर्ज कर संसद पहुँचे।
डीएसपी को चलती कार के सामने धकेला
सांसद बनने के साथ ही पप्पू यादव खुलेआम कानून का मखौल उड़ाने लगे। खाकी के पहरेदार उनसे खौफ खाने लगे। यह वह दौर था, जब पप्पू यादव ने एक डीएसपी को चलती कार के सामने धकेल दिया और एक पुलिसकर्मी की मूँछ जबरन मुंड़वा दी थी। पप्पू यादव पर एक के बाद एक हत्या और अपहरण के मामले दर्ज होने लगे। सत्ता से नजदीकी होने के चलते पुलिस भी पप्पू यादव पर हाथ डालने से डरती थी। आखिरकार मुख्यमंत्री लालू यादव के आदेश पर पप्पू यादव को गिरफ्तार किया गया।
यह वह दौर था, जब पप्पू यादव के नाम से लोग खौफ खाते थे लेकिन वक्त बदलता है और 1998 के लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव पहली बार पूर्णिया से चुनाव हार जाते हैं। बाहुबली पप्पू यादव अपनी हार के लिए माकपा नेता अजीत सरकार को जिम्मेदार मानते हैं। अजीत सरकार पूर्णिया में काफी लोकप्रिय थे और चार बार विधायकी का चुनाव जीत चुके थे।
अजीत सरकार हत्याकांड में उम्रकैद
इसी बीच जून 1998 में दिनदहाड़े माकपा नेता अजीत सरकार के साथ-साथ उनके ड्राइवर और एक साथी को पूर्णिया में गोलियों से छलनी कर दिया जाता है। अजीत सरकार का जब पोस्टमॉर्टम किया जाता है, तो उनके शरीर से 107 गोलियाँ निकलती है। कहा जाता है कि अजीत सरकार और उनके सथियों पर एके-47 से गोलियाँ बरसाईं गई थीं।
अजीत सरकार की हत्या का आरोप पप्पू यादव पर लगता है और पप्पू यादव को गिरफ्तार कर लिया जाता है। पप्पू यादव जेल जाने से बचने के लिए हर बार की तरह अपने पुराने हथकंडे अपनाते हैं लेकिन वह सलाखों के पीछे पहुँच जाते हैं।
इस बीच 1999 में दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार गिर जाती है और फिर लोकसभा चुनाव होते हैं और पप्पू यादव एक बार फिर जेल में रहते हुए भी पूर्णिया लोकसभा सीट से चुनाव जीत कर संसद पहुँच जाते हैं। पप्पू यादव का नाम इतना बदनाम हो चुका था कि प्यार में नहीं बल्कि डर में जनता का वोट उनकी झोली में पड़ता था।
2004 का लोकसभा चुनाव पूर्णिया से हारने वाले पप्पू यादव जो उस वक्त लालू प्रसाद यादव के सबसे करीबी नेताओं में से एक माने जाते थे, उनकी किस्मत फिर बदलती है – साल 2004 में ही। होता यह है कि 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू यादव छपरा और मधेपुरा दो सीटों से लोकसभा चुनाव लड़ता है और दोनों से ही जीत दर्ज करता है। लालू बाद में मधेपुरा सीट छोड़ देता है और उपचुनाव में पप्पू यादव मधेपुरा से चुनाव जीतकर फिर संसद पहुँच जाते हैं।
अजीत सरकार हत्याकांड में जमानत पर बाहर चल रहे पप्पू यादव की जमानत सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो जाती है और पप्पू यादव को बेऊर जेल भेज दिया जाता है, लेकिन जेल में उनके ऐशोआराम में कोई कमी नहीं आती है। पप्पू यादव की बैरक पर छापा मारा जाता है और उनके जूते से मोबाइल फोन बरामद होता है। उसकी डिटेल में कई नेताओं के साथ बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव के निजी सचिव के नंबर पर भी बात होने की डिटेल सामने आती है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पप्पू यादव को दिल्ली की तिहाड़ जेल में शिफ्ट किया जाता है और जेल में पप्पू यादव पर अंकुश लगाने के लिए तिहाड़ में पहली बार मोबाइल जैमर लगाया जाता है।
अजीत सरकार हत्याकांड में 14 फरवरी 2008 को पप्पू यादव को पटना की सीबीआई कोर्ट में उम्रकैद की सजा सुनाई जाती है लेकिन इस मामले में 2013 में हाईकोर्ट से पप्पू यादव को बरी कर दिया जाता है। हाईकोर्ट से बरी होने के बाद पप्पू यादव 2014 का लोकसभा चुनाव फिर मधेपुरा से आरजेडी के टिकट पर लड़ते हैं और राजनीति के दिग्गज शरद यादव को हराकर फिर संसद पहुँच जाते हैं।
2015 में लालू यादव से विवाद के बाद पप्पू यादव को आरजेडी से निकाल दिया जाता है और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पप्पू यादव अपनी खुद की पार्टी जन अधिकार पार्टी बनाते हैं। 2019 के चुनाव में मधेपुरा से चुनाव भी लड़ते हैं। हालाँकि इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस बार पप्पू यादव सिर्फ 8 फीसदी वोट ही हासिल कर पाए।
पूरा राजनीतिक सफर देखें तो पप्पू यादव ने आरजेडी के टिकट पर पहली बार 1991 में चुनाव जीता और फिर 1996, 1999 और 2004 में भी आरजेडी से वो चुनाव जीतने में सफल रहे। लेकिन 2019 में वो अपनी जमानत तक नहीं बचा सके।
1986-87 में लालू प्रसाद यादव की राजनीति ऊपर की ओर बढ़ रही थी। इस दौर में वह बिहार में विरोधी दल का नेता बनना चाहता था। कहते हैं कि लालू की राजनीति को जमाने में तब दलित-पिछड़ा समाजवादी नेताओं के साथ बाहुबलियों ने भी काफी मदद की। इन्हीं में से पप्पू यादव और मोहम्मद शहाबुद्दीन भी था। लालू की वजह से ही पप्पू यादव राजनीति में सक्रिय हुए थे और एक समय आरजेडी चीफ से उनकी इतनी करीबी थी कि लोग उन्हें लालू का उत्तराधिकारी भी कहने लगे थे और पप्पू यादव ने भी इसकी मंशा पाल रखी थी, लेकिन वो कामयाब नहीं हो सके और 2015 में उन्हें राजद से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
अपनी कुख्यात छवि के लिए लालू को ठहराया दोषी
एक इंटरव्यू में पप्पू यादव ने कहा था, “मैं तो एक सीधा-सादा छात्र था। लालू का प्रशंसक था। उनको अपना आदर्श मानता था, लेकिन लालू मेरे साथ बार-बार छल करते गए। मुझे बिना अपराध किए ही कुर्सी का नाजायज फायदा उठाते हुए कुख्यात और बाहुबली बना दिया। जब लालू विरोधी दल का नेता बनना चाहते थे, उस समय इस दौड़ में अनूप लाल यादव, मुंशी लाल और सूर्य नारायण भी शामिल थे। मैं अनूप लाल यादव के घर में ही रहता था।”
पप्पू यादव आगे बताते हैं, “इसके बावजूद मैं लालू का समर्थन कर रहा था। मैंने नवल किशोर से बात कर लालू के लिए जमीन तैयार किया। लालू के नेता विरोधी दल बनने के अगले ही दिन पटना के सभी अखबारों में एक खबर प्रकाशित हुई कि कॉन्ग्रेस नेता शिवचंद्र झा की हत्या करने के लिए पूर्णिया से एक कुख्यात अपराधी पप्पू यादव पटना पहुँचा है। मैं इन सब से बेखबर था। मेरे एक मित्र नवल किशोर मुझे पटना विश्वविद्यालय के पीजी हॉस्टल ले गए।”
पप्पू यादव याद करते हुए बताते हैं कि वहाँ जाकर उन्हें पता चला कि वह एक कुख्यात अपराधी बन चुके हैं। वह आगे बताते हैं, “मैं एक ऐसा कुख्यात अपराधी था, जिसके खिलाफ तब तक किसी थाने में कोई केस तक नहीं दर्ज था। मैं तीन दिनों तक अपने एक मित्र गोपाल के कमरे में रहा। वहाँ से कोलकाता गया। पुलिस मेरे पीछे पड़ गई। मेरे घर की कुर्की हो गई। माँ-बाप को सड़क पर रात गुजारनी पड़ी। मेरे पिता लालू से मिले, लेकिन उन्होंने मदद से इनकार कर दिया।”
इंस्पेक्टर की हत्या का आरोप
12 फरवरी 1999 को दिल्ली पुलिस ने एक कुख्यात अपराधी और श्री प्रकाश शुक्ला गैंग से ताल्लुक रखने वाले गैंगस्टर राजन तिवारी को गिरफ़्तार किया। उसने दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को पूछताछ में बताया कि उसे 15 लाख रुपयों में समाजवादी पार्टी के नेता डीपी यादव और सांसद पप्पू यादव ने हायर किया था और गाज़ियाबाद में तैनात यूपी पुलिस के इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह की सुपारी दी थी, जिन्हें नवम्बर 1998 में राजन तिवारी और उसकी गैंग में शामिल मुन्ना शुक्ला, रितेश तिवारी और लल्लन सिंह ने मार दिया था।
राजन तिवारी ने ये भी बताया कि इसका प्लान पप्पू यादव के घर पर बना था और प्लान में डीपी यादव और पप्पू यादव के साथ राजपाल त्यागी भी शामिल था। दरअसल डीपी यादव को ख़बर मिली थी कि उसके भाई को मारने वाले अपराधी को इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह ने ही जेल से बाहर निकाला था, इसीलिए डीपी यादव ने प्रीतम की हत्या कर अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश की थी। राजन तिवारी ने एक और खुलासा दिल्ली पुलिस के सामने किया कि पप्पू यादव, डीपी यादव और प्रताप मलिक ने नैनी जेल में बंद मुन्ना बजरंगी को भी मारने की सुपारी उसे दी थी लेकिन वो इसे पूरा नहीं कर सका।
दोस्त की बहन को दिल दे बैठे थे पप्पू यादव, सुसाइड की भी कोशिश की
पप्पू यादव का जेल जाना भी उनकी जिंदगी में एक अहम पड़ाव साबित हुआ। बांकीपुर जेल में बंद पप्पू यादव की मुलाकात विक्की से होती है और विक्की की बहन रंजीत को एक एलबम में टेनिस खेलते हुए देख पप्पू यादव उन्हें दिल दे बैठते हैं। जिस पप्पू यादव के नाम से पूरा बिहार थर्राता था, वह रंजीत के प्यार में ऐसा दीवाना हुआ कि नींद की गोलियाँ खाकर खुदकुशी की कोशिश भी की थी। आखिरकार कॉन्ग्रेस नेता एसएस अहलूवालिया के दखल के बाद पप्पू यादव और रंजीत 1990 में शादी के बंधन में बँध गए। पप्पू यादव ने खुद इस वाकये का जिक्र अपनी आत्मकथा ‘द्रोहकाल का पथिक’ में भी किया है। रंजीत रंजना कॉन्ग्रेस की नेता और पूर्व सांसद हैं।
खुद को भगवान भी बता चुके हैं पप्पू यादव
एक जनसंवाद रैली के दौरान उन्होंने खास परिस्थित में खुद को भगवान भी बता दिया था। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा था कि नीतीश, लालू और भालू ने मिलकर बिहार के हिंदू और दूसरे मजहब वालों के हाथों में पत्थर थमा दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जुमलेबाज तक करार दे दिया। पप्पू यादव ने तब यह भी कहा था कि अगर वो साउथ में होते तो आज की तारीख में भगवान होते।
पूर्व सांसद ने कहा था, “अगर मैं दक्षिण भारत में पैदा होता तो 20 साल पहले मैं भगवान होता। अगर लालू यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान से पहले पैदा होता तो ये तीनों कभी नहीं पैदा होते। मेरे पास मगध का इतिहास है, जो दुनिया बदल सकती है।”
बिहार में पप्पू यादव के साथ PFI और SDPI का गठबंधन
बिहार की सियासत में असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने अभी पैर जमाए भी नहीं थे कि दक्षिण भारत की दूसरी मजहबी पार्टी ने दस्तक दे दी। एआईएमआईएम के बाद अब पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की सियासी विंग सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) बिहार में किस्मत आजमाने के लिए मैदान में उतर रही है।
एसडीपीआई बिहार में जन अधिकार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पप्पू यादव के अगुवाई में बनने वाले प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक अलायंस (PDA) का हिस्सा है, जिसमें दलित नेता चंद्रशेखर आजाद की पार्टी भीम आर्मी पार्टी भी शामिल है। पप्पू यादव ने तीन छोटी पार्टियों को एक साथ लाकर बिहार में दलित-मुस्लिम-यादव वोटों का समीकरण बनाने की कवायद की है।
पप्पू यादव ने एक सभा के दौरान इसकी घोषणा करते हुए कहा था कि बिहार को बाढ़ और अपराध से मुक्ति दिलाने के लिए JAP ने पॉपुलर फ्रंट और एसडीपीआई के साथ मिलकर चलने का निर्णय लिया है। JAP, SDPI और PFI मिलकर बिहार की राजनीति में बदलाव लाएँगे और विकसित बिहार बनाएँगे। सीएए और एनआरसी के खिलाफ हुए प्रदर्शन में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का नाम तेजी से उभरा था। इन पर दंगा भड़काने और फंडिंग करने के आरोप लगे थे।
क्या है इस बार की तैयारी?
बिहार में होने वाले आगामी चुनाव में पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी (JAP) ने 150 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। पार्टी के प्रमुख पप्पू यादव ने अगस्त में ही इसकी घोषणा की है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी जन अधिकार पार्टी ने 64 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। तब JAP, समाजवादी पार्टी, NCP, समरस समाज पार्टी, समाजवादी जनता दल और नेशनल पीपुल्स पार्टी ने मिलकर तीसरे मोर्चा का गठन किया था।
सुशांत सिंह राजपूत के दोस्त संदीप सिंह ने रिपब्लिक टीवी और अर्नब गोस्वामी को 200 करोड़ रुपए का मानहानि नोटिस भेजा है। यह नोटिस आईपीसी की धारा 499 के तहत भेजा गया है जो धारा 500 के अंतर्गत दण्डनीय है। अपने इंस्टाग्राम पर संदीप ने यह पत्र शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा, “यह भुगतान का समय है।”
नोटिस में संदीप की ओर से लिखा गया कि उन्हें रिपब्लिक टीवी व उसके एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी ने ‘मुख्य साजिशकर्ता’ और ‘हत्यारा’ बताया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके खिलाफ चैनल पर चल रही न्यूज को रुकवाने के लिए चैनल के ही किसी शख्स ने उनसे मॉनेट्री बेनेफिट्स के लिए संपर्क किया था। हालाँकि उनके मना करने के बाद चैनल ने उनके खिलाफ़ कई रिपोर्ट्स लिखीं और कई संगीन आरोप लगाए।
वसूली करने का आरोप लगाते हुए नोटिस में कहा गया कि रिपब्लिक भारत ने जो संदीप सिंह पर आरोप लगाए वह सब निराधार हैं और उन्हें साबित करने के लिए कोई सबूत भी नहीं है। इसमें यह भी लिखा है कि चैनल ने स्मिता प्रकाश को बुलाकर संदीप को बदनाम करवाने का प्रयास किया। वहीं उन रिपोर्ट्स का भी जिक्र है जिनमें उनकी छवि धूमिल करने की कोशिश हुई।
नोटिस के अनुसार, 3, 5, 14, और 20 अगस्त की रिपोर्टस में आपत्तिजनक सामग्री का इस्तेमाल करके संदीप को बदनाम करने की कोशिश हुई। शो के एक सेगमेंट में उन पर यह भी आरोप लगाए गए कि उन्होंने ही एंबुलेंस से कहा था कि बॉडी को कूपर अस्पताल लेकर जाया जाए।
इसमें यह भी कहा गया कि संदीप की पीआर टीम ने मीडिया में डिस्ट्रिब्यूट करने के लिए उस समय तस्वीर क्लिक की थी। नोटिस के अनुसार रिपब्लिक टीवी की कुछ रिपोर्टों ने दावा किया कि संदीप सीबीआई जाँच के खिलाफ थे। इसमें एक #ArrestSandeepSingh हैशटैग का भी उल्लेख है जिसे रिपबल्कि भारत ने चलाया था।
नोटिस में लिखा है कि 22 से 24 अगस्त में रिपब्लिक टीवी संवाददाता उनके आवास में घुसे और उनके सिक्योरिटी गार्ड व डोमेस्टिक हेल्पर्स को परेशान किया। सुशांत के तथाकथित दोस्त संदीप के अनुसार, यह दूसरा प्रयास था उन्हें बदनाम करने का।
नोटिस में कहा गया है कि चैनल अपने प्लैटफॉर्म से इस तरह की सारी सामग्री हटाए और वास्तविक तथ्यों के साथ उनसे माफी माँगे। इस नोटिस में रिपब्लिक टीवी को 15 दिन का समय दिया गया है वरना यह मामला कोर्ट में फाइल किया जाएगा।
गौरतलब है कि 14 जून को सुशांत सिंह राजपूत का शव उनके घर में फंदे से लटका मिलने के बाद इस मामले में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले। उनकी प्रेमिका रिया चक्रवर्ती पर इस मामले में कई गंभीर आरोप लगे। इसके अलावा कई बॉलीवुड हस्तियाँ भी चर्चा में आईं। एक्टर के निधन के बाद उनके घर सबसे पहले पहुँचने वाले दोस्तों में संदीप का नाम होने के कारण उन पर भी कई इल्जाम लगाए गए।
इसके बाद संदीप सिंह, रिया चक्रवर्ती समेत कई लोग शक के घेरे में आ गए। वर्तमान में इस पूरे मामले की जाँच तीन जाँच एजेंसियों द्वारा की जा रही है- ईडी, एनसीबी, और सीबीआई। ड्रग मामले में गिरफ्तार होने के बाद रिया को हाल ही में बेल मिली है और उनका भाई शौविक अब भी जेल में है।
तनिष्क के विवादित वीडियो ने लव-जिहाद, हिन्दू-मुस्लिम विवाह, इनके पीछे छुपे नैरेटिव आदि विषयों को बहस का विषय बना दिया। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि देश के विचारकों ने किसी भी बहस के बीच महात्मा गाँधी का जिक्र न किया हो। इसी कड़ी में सेक्स और टीनएज कॉलेज रोमांस की फिक्शन कथाएँ लिखने वाले चेतन भगत ने भी लगे हाथ एक ट्वीट कर कहा कि आज अगर महात्मा गाँधी होते तो वो इस विषय पर क्या कहते?
वास्तव में, महात्मा गाँधी खुद भी अपने हिन्दू बेटे मणिलाल का विवाह दूसरे मजहब की फातिमा से करने के खिलाफ थे। ख़ास बात यह थी कि मणिलाल फातिमा के प्रेम में पागलपन की हद तक डूबे हुए थे।
एमके गाँधी के बेटे मणिलाल और फातिमा का प्रेम सम्बन्ध तकरीबन 12 वर्षों तक चला। गाँधी के बेटे मणिलाल फातिमा से शादी करना चाहते थे। लेकिन जब उन्होंने अपने पिता एमके गाँधी से ‘परमिशन’ माँगी तो उन्होंने कई तर्क देते हुए इस शादी से स्पष्ट रूप से मना कर दिया और फ़ौरन मणिलाल का विवाह अपनी ही जाति में करवाकर मामले को ‘शांत’ कर दिया था।
गाँधी अंतरधार्मिक या अंतरजातीय विवाह के खिलाफ थे इस बात का प्रमाण अपने बेटे मणिलाल को लिखा गया उनका एक पत्र है। उनका मानना था कि ये उचित नहीं है। इससे सामाजिक संरचना और धार्मिक सदभावना को ठेस लगेगी, लिहाजा हिंदू धर्म में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों पर प्रतिबंध उचित है।
मणिलाल करना चाहते थे ‘टिम्मी’ उर्फ़ फातिमा से विवाह
मणिलाल ने 1926 में अपने से छोटे भाई रामदास के जरिए पिता एमके गाँधी को संदेश भेजा कि वो टिम्मी (फातिमा) से शादी करना चाहते हैं। दरअसल फातिमा और उसके परिवार से एमके गाँधी के परिवार का दक्षिण अफ्रीका में रहने के दौरान गहरा रिश्ता था। इसी कारण मणिलाल को यकीन था कि उनके पिता इस शादी के लिए मान जाएँगे। लेकिन मणिलाल के पिता ने जवाब में जो पत्र भेजा, वो उनके लिए आशा के विपरीत था।
मोहनदास करमचंद गाँधी के इस पत्र में उन्होंने अपने पुत्र मणिलाल को संबोधित करते हुए लिखा था। इस पत्र को एमके गाँधी ने ‘एक मित्र के रूप में’ मणिलाल की इच्छा को ‘धर्म के विपरीत इच्छा’ कहते हुए शुरू किया! पत्र में उन्होंने जो लिखा, वह एक ‘आज्ञाकारी बेटे’ के लिए और अधिक चौंकाने वाला था। उसका सपना चकनाचूर हो गया।
एमके गाँधी इस पत्र में लिखते हैं-
“यदि तुम हिंदू होकर फातिमा के इस्लाम से जुड़े रहते हो, तो यह एक म्यान में दो तलवारें डालने जैसा होगा; या तुम अपनी आस्था से विमुख हो जाओगे। और फिर तुम्हारे बच्चों का धर्म क्या होना चाहिए? वे किस धर्म और आस्था के प्रभाव में बड़े होंगे? यह धर्म नहीं है, लेकिन केवल धर्म है, अगर फातिमा सिर्फ तुमसे शादी करने के लिए धर्मांतरण के लिए सहमत है। विश्वास एक परिधान जैसी चीज नहीं है जिसे हमारी सुविधा के अनुरूप बदला जा सकता है।”
“…धर्म के लिए एक व्यक्ति वैवाहिक जीवन को त्याग देगा, अपने घर को त्याग देगा, क्यों? यहाँ तक कि अपने जीवन को भी त्याग देगा।…ये धर्म नहीं अधर्म होगा, अगर फातिमा केवल शादी के लिए अपने धर्म को बदलना भी चाहे तो भी ठीक नहीं होगा। आस्था कोई कपड़ा नहीं, जो आप इसे कपड़े की तरह बदल लें। अगर कोई ऐसा करता है तो धर्म और घर से बहिष्कृत कर दिया जाएगा। ये कतई उचित नहीं..।”
“…ये रिश्ता बनाना समाज के लिए भी हितकर नहीं। ये शादी हिंदू मुस्लिमों पर अच्छा असर नहीं डालेगी। अंतरधार्मिक शादी करने के बाद तुम देश की सेवा के लायक नहीं रह जाओगे और शायद फीनिक्स आश्रम में रहकर ‘इंडियन ओपिनियन’ वीकली निकालने के लिए सही व्यक्ति नहीं रह सकोगे। तुम्हारे लिए भारत आना मुश्किल हो जाएगा। मैं ‘बा’ से तो इस बारे में कह भी नहीं सकता, वो तो इसकी अनुमति देने से रहीं। उसकी जिंदगी में यह हमेशा के लिए ही सबसे कड़वा अनुभव होगा।”
एमके गाँधी ने अपने बेटे को इस पत्र में लिखा, “तुम क्षणिक सुख के लिए ही ऐसी शादी के बारे में सोच रहे हो, जबकि तुम्हे मालूम नहीं कि वास्तविक सुख क्या है।”
दिलचस्प बात यह है कि मणिलाल की फातिमा से शादी तो नहीं हुई लेकिन एमके गाँधी के सबसे बड़े बेटे हरिलाल ने आगे चलकर 1936 में इस्लाम धर्म अपनाया और अपना नाम बदलकर अब्दुल्ला रख लिया था।
हैरानी की बात है कि एमके गाँधी ने कभी भी अपने परिवार से बाहर दूसरों के मामले में हिंदू-मुस्लिम विवाह के बारे में यही नजरिया नहीं अपनाया और खुलकर उन्हें समर्थन दिया। उन्होंने ऐसे ही दो विवाह- हुमायूँ कबीर (एक मुस्लिम की हिंदू बंगाली लड़की से शादी) और बीके नेहरू (जवाहर लाल नेहरू के चचेरे भाई की हंगरी की एक यहूदी से शादी) को संरक्षण दिया और इन विवाहों पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
तनिष्क के विज्ञापन से शुरू हुआ विवाद
तनिष्क के जिस विज्ञापन से में एक हिंदू महिला की गोदभराई की रस्म को दिखाया गया था। इस लड़की की शादी मुस्लिम परिवार में हुई थी। इसमें हिंदू संस्कृति को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम परिवार सभी रस्मों रिवाजों को हिंदू धर्म के हिसाब से करता दिखाया गया था।
विज्ञापन को लव जिहाद को बढ़ावा देने के आरोप लगने और सोशल मीडिया पर तनिष्क के बहिष्कार की अपीलों के बाद कंपनी ने विज्ञापन को वापस ले लिया। कुछ इसी तरह का विवाद होली के दौरान सर्फ एक्सेल के एक विज्ञापन को लेकर भी हुआ था।
तनिष्क का विज्ञापन आता है, जिसमें एक हिन्दू महिला की मुस्लिम परिवार में शादी दिखा कर ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा दिया गया। तनिष्क के इस विज्ञापन पर काफी विवाद हुआ और आम लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं। नतीजा यह निकला कि तनिष्क ने इस मामले पर सफाई जारी की और बिना माफ़ी माँगे विज्ञापन हटा लिया। कुल मिला कर देश के बड़े ब्रांड के लिए विज्ञापन की मदद से धार्मिक समरसता को बढ़ावा देने की आड़ में नैतिक उपदेश देने का ज़रिया बन गया है।
तनिष्क ने अपने विज्ञापन में अंतर धार्मिक विवाह की आदर्श तस्वीर दिखाने का प्रयास किया, जो कि भारत में होने वाले असल अंतर धार्मिक विवाहों की सच्चाई से कहीं अलग है। विज्ञापन में ऐसा दिखाया गया कि एक मुस्लिम परिवार हिन्दू बहू की परम्पराओं के क्रियान्वन में मदद कर रहा है। एक बार के लिए हम ऐसे मामलों की सामाजिक सच्चाई को नज़रअंदाज़ भी कर दें तो एक हिन्दू और मुस्लिम के बीच शादी का क़ानूनी पहलू बहुत साफ़ तस्वीर पेश करता है। मुस्लिम क़ानून के अनुसार हिन्दू और मुस्लिम के बीच होने वाली शादी की सच्चाई कुछ ऐसी है:
हिन्दू धर्म से हट कर इस्लाम शादी को बराबर बढ़ावा देता है और ब्रह्मचर्य के सिद्धांत को सिरे से खारिज करता है। इस्लाम धर्म के अनुसार शादी समझौते या अनुबंध जैसा है, जबकि हिन्दू धर्म में इसे पवित्र प्रक्रिया और बंधन माना गया है। मुस्लिम क़ानून के अनुसार एक मुस्लिम और हिन्दू के बीच होने वाली शादी को वैधानिक नहीं माना जाता है। इसलिए बहुत से अधिकार ऐसे हैं, जिनका शादी के दौरान या शादी के बाद कोई उल्लेख ही नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार ऐसी शादियों से होने वाले बच्चों का पिता की संपत्ति पर पूरा अधिकार होता है।
इस्लाम में कुल 3 तरह के निकाह होते हैं, साही, बाटिल और फ़ासिद।
साही निकाह को मुस्लिम क़ानून के अनुसार वैधानिक माना गया है, जिसमें हर प्रकार के नियमों और दिशा-निर्देशों का पालन किया जाता है। इस तरह के निकाह में पति और पत्नी दोनों के पास हर ज़रूरी अधिकार होते हैं। इस तरह के निकाह से होने वाले बच्चों का अपने माता-पिता की सम्पत्ति पर पूरा अधिकार होता है और उनके पास अपने घर वालों की पहचान होती है।
बाटिल निकाह में दम्पति को समान अधिकार नहीं मिलते हैं और इनसे होने वालो बच्चों को भी अवैध माना जाता है। इस्लामी क़ानून में निम्न कारणों के चलते इस निकाह को व्यर्थ माना जाता है:
जब दम्पति में रक्त सम्बंध हो या पूर्वज समान हों रिश्ते में ही सम्बंध हुआ हो पालन पोषण किसी दूसरे व्यक्ति की पत्नी से निकाह या क़ानूनी अटकल मौजूद होने के बावजूद विधवा से निकाह।
इस तरह के निकाह में विरासत सम्बंधी अधिकारों के लिए कोई मान्यता नहीं होती है। किसी सूरत में निकाह समाप्त होने पर पत्नी रिवाज़ी दहेज़ की अधिकारी होती है।
फ़ासिद निकाह में हिन्दू और मुस्लिम के बीच होने वाले निकाह शामिल होते हैं। इस तरह के निकाहों को मुस्लिम क़ानून के अनुसार अस्थायी माना जाता है क्योंकि इसमें तमाम औपचारिकताएँ और दिशा-निर्देश नहीं हैं। हालाँकि इस तरह की अनियमितताएँ निकाह को क़ानून के दायरे से बाहर नहीं करती हैं लेकिन उन्हें वैधानिक बनाने के लिए अनियमितताओं को हटाना पड़ेगा।
इस तरह के तमाम कारण, जिनके तहत निकाह अस्थायी या फासिद बनता है, उसमें सबसे बड़ा कारण है धर्म। हालाँकि धर्म का अंतर तब आड़े नहीं आता जब एक गैर-मुस्लिम पत्नी धर्म परिवर्तन करके इस्लाम स्वीकार कर लेती है या यहूदी अथवा ईसाई धर्म स्वीकार कर लेती है। जबकि एक गैर-मुस्लिम पति के मामले में उसे इस्लाम कबूल करना होता है। यानी एक मुस्लिम व्यक्ति के साथ मूर्ति पूजा या अग्नि की पूजा करने वाले व्यक्ति की शादी को इस्लाम के मुताबिक़ सही नहीं माना जाता है।
ऐसे में अगर हम इस क़ानून को विज्ञापन पर लागू करते हैं तो हिन्दू बहू और मुस्लिम पति के चलते यह निकाह फ़ासिद माना जाएगा। जब तक यह ख़त्म नहीं होता, तब तक इसमें कोई वैधानिक पहलू शामिल नहीं होता है और ख़त्म होने के बाद भी पत्नी सिर्फ दहेज़ की हक़दार होगी और उसका अपने पति की सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा। यानी तनिष्क में जिस तरह की शादी दिखाई गई है वह इस्लाम के अनुसार मान्य नहीं है क्योंकि उसका अपने पति की सम्पत्ति पर बराबर का अधिकार ही नहीं होगा।
इसके अलावा एक मूटा होता है, जिसका एक ही मतलब होता है इस्तेमाल या मज़ा। इस तरह की शादियाँ अस्थायी रूप से सिर्फ और सिर्फ क्षणिक सुख के लिए की जाती हैं। इस तरह की शादी मुस्लिमों के किसी भी वर्ग में मान्य नहीं हैं सिवाय शिया मुस्लिमों के। हालाँकि उनमें भी इस तरह की शादी का चलन लगभग न के बराबर है। इस शादी में साथ रहने की समयावधि भी तय होती है।
एक मुस्लिम व्यक्ति इस तरह की शादी का समझौता मुस्लिम, ईसाई, यहूदी या हिन्दू धर्म की महिला के साथ कर सकता है। वहीं मुस्लिम महिला किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ इस तरह की शादी का समझौता नहीं कर सकती है। इसके अलावा शादी में समान अधिकारों के लिए कोई जगह नहीं होती है। इतना ही नहीं, एक मुस्लिम व्यक्ति इस तरह की शादी कितनी भी महिलाओं के साथ कर सकता है।