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करण जौहर के करीबी क्षितिज रवि को NCB ने घर से उठाया, एकता कपूर के लिए भी कर चुका है काम

सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच से बॉलीवुड में ड्रग्स के घुसपैठ की जो परतें खुलनी शुरू हुई है, उसका दायरा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने शुक्रवार (25 सितंबर, 2020) को करण के करीबी माने जाने वाले क्षितिज रवि प्रसाद के घर पर छापेमारी की और उसे अपने साथ ले गई।

क्षितिज के घर से ड्रग्स मिलने की बात भी कही जा रही है। वह करण के धर्मा प्रोडक्शन से बतौर एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर ऐंड डायरेक्टर जुड़ा हुआ है। इससे पहले वह एकता कपूर की बालाजी टेलीफिल्म्स के लिए भी काम कर चुका है।

रिपब्लिक टीवी की रिपोर्ट के अनुसार, एनसीबी को क्षितिज के पास से ‘ड्रग्स मिला’ है। यह भी दावा किया गया है कि वह भारी मात्रा में लगातार ‘ड्रग्स खरीदता’ था। हालाँकि यह साफ नहीं हो पाया कि इस ड्रग्स का उपयोग कौन करता था। उसके घर से मारिजुआना और वीड मिलने की बात कही जा रही।

एनसीबी अधिकारियों के अनुसार, क्षितिज को अभी गिरफ्तार नहीं किया गया है। पूछताछ के बाद उसे हिरासत में लिया जा सकता है। बता दें गिरफ्तार ‘ड्रग्स पैडलर्स’ अनुज केशवानी ने क्षितिज प्रसाद के नाम का खुलासा किया था।

गौरतलब है कि गुरुवार को NCB ने क्षितिज को समन जारी किया था। दिल्ली से उसके मुंबई पहुँचते ही एजेंसी ने उसके घर पर छापा मारा और अपने साथ ले गई। गुरुवार को भी उसके घर पर छापा पड़ा था।

गौरतलब है कि करण जौहर द्वारा दी गई एक पार्टी पह​ले से ही शक के घेरे में है। सोशल मीडिया में इस पार्टी की एक वीडियो वायरल हुई थी और दावा किया जा रहा था कि इसमें दिख रहे सितारों ने ड्रग्स का सेवन कर रखा था।
इस वीडियो में दीपिका पादुकोण, विक्की कौशल, मलाइका अरोड़ा, वरुण धवन, अयान मुखर्जी, अर्जुन कपूर और शाहिद कपूर जैसे बड़े एक्टर दिखाई दिए थे।

करण जौहर ने वैसे इन आरोपों को बेबुनियाद बताया था, लेकिन पिछले दिनों एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया था कि एनसीबी इसकी जाँच कर रही है। गौरतलब है कि वीडियो में दिखी दीपिका को एनसीबी पहले ही समन भेज चुकी है। ह्वाट्सएप पर कुछ ड्रग चैट सामने आने के बाद उन्हें समन भेजा गया था।

शौहर के सामने देवर ने कपड़े फाड़े, रेप करने की कोशिश: तीन तलाक हटाने की लड़ाई लड़ने वाली इशरत जहाँ

भाजपा नेता और तीन तलाक हटाने के मामले की मुख्य याचिकाकर्ता इशरत जहाँ ने अपने पति और देवर के खिलाफ पश्चिम बंगाल के हावड़ा के गोलबारी पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है।

इशरत का कहना है कि हावड़ा के पिलखाना स्थित घर में उसे बंदी बना लिया गया। शौहर की मौजूदगी में गुरुवार दोपहर करीब 12 बजे देवर ने रेप करने की कोशिश की। इस दौरान शौहर ने उसका यौन उत्पीड़न रोकने के लिए कुछ नहीं किया। उसके कपड़े भी फाड़ दिए गए थे।

पीड़िता के अनुसार, शौहर और देवर उसे शारीरिक यातना भी देते हैं। इससे पहले, इशरत ने सास पर प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था। उन्होंने ससुराल वालों पर पैसे और गहने छीनने का आरोप भी लगाया। अपनी गर्दन पर निशान दिखाते हुए उन्होंने कहा, “उन्होंने मुझे घर खाली करने के लिए मजबूर किया, क्योंकि वे संपत्ति को बेचना चाहते थे। 7-8 लोगों ने मुझे जबरदस्ती पकड़कर मारने की कोशिश की। मैं किसी तरह अपनी जान बचाकर घर से बाहर निकलने में कामयाब रही।”

पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। हालाँकि, अभी तक किसी भी आरोपित को गिरफ्तार नहीं किया गया है। बता दें कि ट्रिपल तलाक हटाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में इशरत मुख्य याचिकाकर्ता थी। बाद में इसे रोकने का केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक कानून बनाया। इशरत ने ट्रिपल तलाक को लेकर शीर्ष अदालत का रुख किया था, जब दुबई में रह रहे उसके पति ने फोन पर तीन बार तलाक बोलते हुए उससे अपने रिश्तों को खत्म कर दिया था।

पिछले साल इशरत जहाँ ने हावड़ा के डोबसन रोड में संकटमोचन हनुमान मंदिर में हुए सामूहिक हनुमान चालीसा पाठ कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। इस घटना के बाद इशरत की जान पर कथित तौर पर खतरा मँडराने लगा था। यहाँ तक कि उसके मकान मालिक मनजिर हुसैन ने भी उसे घर खाली करने के लिए कह दिया था। इशरत की शिकायत के अनुसार, जब वह अपने बच्चे के स्कूल से घर लौट रही थी, तो नंद घोष रोड पर 100 लोगों के साथ मुस्तफा अंसारी और उसके मकान मालिक मनजिर हुसैन ने उसका रास्ता रोक लिया था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मकान मालिक की धमकियों के बाद इशरत और उसके बच्चें को घर से निकल दिया गया था। जिसके बाद कथि ततौर पर उसने रोज़मेरी लेन में एक अन्य व्यक्ति के घर में शरण ली है। उसने कहा है कि वह अपने बच्चे के साथ अकेली रहती है और मुस्लिम समुदाय के सदस्यों द्वारा उसे धमकी जारी किए जाने के बाद वह अपनी सुरक्षा को लेकर डर रही है।

243 सीटें, 3 चरण में मतदान, 10 नवंबर को परिणाम: बिहार विधानसभा चुनाव में बूथ पर 1000 वोटर ही

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने शुक्रवार (सितम्बर 25, 2020) को बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के लिए कार्यक्रम की घोषणा की है। 243 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव के लिए मतदान तीन चरणों होंगे।

बिहार विधानसभा चुनाव मतदान तीन चरणों में 28 अक्टूबर, 3 नवंबर और 7 नवंबर को होंगे और इसके नतीजे नवंबर 10, 2020 को घोषित किए जाएँगे। फेज- 1 में 71 सीटें होंगी, फेज- 2 में 94 सीटें होंगी और फेज- 3 में 78 सीटें होंगी।

मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा, “बिहार राज्य में विधानसभा का कार्यकाल नवंबर 29, 2020 को समाप्त होने वाला है। बिहार विधानसभा में 243 सदस्यों की संख्या है, जिनमें से 38 सीटें एससी और दो एसटी के लिए आरक्षित हैं।”

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा कि मतदाताओं की संख्या बढ़ने के साथ इस बार सुरक्षित चुनावों पर जोर दिया जाना चाहिए। राजनीतिक दलों की कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर चुनाव स्थगित किए जाने के जवाब में चुनाव आयोग ने पूरी प्रक्रिया का पालन करने के लिए दिशानिर्देशों का एक सेट जारी किया है।

निर्वाचन प्रक्रिया में सामाजिक दूरी का सख्ती से पालन किया जाएगा और सभी को मतदान केंद्रों पर मास्क पहनना होगा। चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों में कहा गया है कि एक बूथ पर सिर्फ 1,000 मतदाता ही मदतान कर पाएँगे। इसके अलावा, ज्यादा तापमान वाले लोगों को मतदान प्रक्रिया के अंतिम एक घंटे में मतदान करना होगा और उस बूथ पर कम मतदाता होंगे।

प्रेस वार्ता में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा, “7 लाख से अधिक हैंड सेनिटाइज़र, लगभग 46 लाख मास्क, 6 लाख पीपीई किट, 6.7 लाख यूनिट फेस-शील्ड, 23 लाख (जोड़े) हैंड ग्लव्स की व्यवस्था की गई है। मतदाताओं के लिए विशेष रूप से, 7.2 करोड़ एक बार इस्तेमाल होने वाले हैंड ग्लव्स की व्यवस्था की गई।”

सुनील अरोड़ा ने कहा कि यह महत्वपूर्ण हैं क्योंकि कोरोना वायरस महामारी में यह पहला चुनाव होगा। उन्होंने कहा, “जैसे-जैसे दिन और महीने बीतते गए COVID -19 ने कम होने के कोई संकेत नहीं दिखाए, यह महसूस किया गया कि लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की रक्षा के लिए ईमानदार और व्यवस्थित प्रयास करते हुए मतदाताओं के लोकतांत्रिक अधिकारों को संतुलित करने के लिए किसी तरह का रास्ता निकालना होगा।”

रकुल प्रीत और करिश्मा प्रकाश से पूछताछ शुरू: रणवीर ने NCB से पूछताछ के दौरान दीपिका के साथ होने की माँगी छूट, कहा- आता है पैनिक अटैक

बॉलीवुड अभिनेता और दीपिका पादुकोण के पति रणवीर सिंह ने एनसीबी से एक निवेदन किया है। उन्होंने एनसीबी से गुज़ारिश की है कि ड्रग्स मामले में पूछताछ के दौरान उन्हें भी मौजूद रहने दिया जाए। एनसीबी ड्रग्स मामले में शनिवार यानी 26 सितंबर 2020 को दीपिका पादुकोण से पूछताछ करने वाली है। पहले यह पूछताछ शुक्रवार (25 सितंबर 2020) यानी आज तय की गई थी। वहीं दूसरी तरफ रकुल प्रीत सिंह से आज इस मामले में पूछताछ होनी है। रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल वह एनसीबी के दफ्तर पहुँच चुकी हैं। 

रिपब्लिक टीवी द्वारा प्रकाशित ख़बर के अनुसार, अभिनेता रणवीर सिंह ने नारकोटिक्स नियंत्रण ब्यूरो से निवेदन किया था। जिसमें उन्होंने कहा, “दीपिका को तनाव और घबराने की परेशानी है, दीपिका को पैनिक अटैक्स भी आते हैं। इन बातों को मद्देनज़र रखते हुए मेरा निवेदन है कि एनसीबी की पूछताछ में मुझे भी मौजूद रहने दिया जाए।” दीपिका पादुकोण गोवा में एक फिल्म की शूटिंग कर रही थीं, एनसीबी द्वारा समन भेजे जाने के बाद गुरूवार (24 सितंबर 2020) मुंबई वापस आई थीं।

रणवीर सिंह ने एनसीबी से किए गए निवेदन में यह भी कहा कि वह क़ानून का पालन करने वाले नागरिक हैं। वह इस बात को भी बहुत अच्छे से समझते हैं कि पूछताछ में किसी भी व्यक्ति का शामिल होना वैधानिक नहीं है लेकिन हालातों को देखते हुए वह इसकी माँग कर रहे हैं। हालाँकि, एनसीबी ने अभी तक रणवीर सिंह के इस निवेदन का कोई जवाब नहीं दिया है। कल यानी शनिवार को दीपिका पादुकोण ड्रग्स मामले में पूछताछ के लिए एनसीबी के सामने पेश होंगी। दीपिका के अलावा सारा अली खान और श्रद्धा कपूर भी शनिवार को ही एनसीबी के सामने पेश होंगी।

वहीं दूसरी तरफ रकुल प्रीत सिंह ड्रग्स मामले में पूछताछ के लिए एनसीबी के एसआईटी दफ्तर पहुँच चुकी हैं। 

उनके अलावा दीपिका पादुकोण की मैनेजर करिश्मा प्रकाश ड्रग्स मामले में पूछताछ के लिए एनसीबी के एसआईटी दफ्तर पहुँच चुकी हैं। 

एनसीबी ने हाल ही में अभिनेत्री दीपिका पादुकोण और रकुल प्रीत सिंह को ड्रग्स मामले में समन भेजा था। इसके अलावा एनसीबी ने सारा अली खान और श्रद्धा कपूर को भी पूछताछ के लिए समन भेजा था। अभी तक एनसीबी ड्रग्स मामले में सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर श्रुति मोदी और फैशन डिज़ाइनर सिमोन खंबाटा का बयान दर्ज कर चुकी है।    

गौरतलब है कि रिया चक्रवर्ती से पूछताछ के दौरान दीपिका, दीया, सारा अली खान, रकुलप्रीत सिंह और श्रद्धा कपूर का नाम सामने आया था। दीया का नाम पूछताछ के दौरान ड्रग तस्कर अनुज केशवानी ने लिया था। केशवानी ने बताया कि दीया की मैनेजर ड्रग्स खरीदती थी। उन्होंने इसके सबूत भी दिए थे। अब इस मामले में एनसीबी जल्द ही दीया मिर्जा को पूछताछ के लिए समन भेज सकती है।

बता दें कुछ न्यूज चैनलों ने कई बड़े बॉलीवुड सेलेब्स के बीच ड्रग्स को लेकर हुई व्हाट्सएप चैट का खुलासा किया था। इस चैट में बॉलीवुड के 5 टॉप ऐक्टर्स के नाम सामने आए थे। चैट के दौरान जो नाम दिख रहे हैं वह सब एक अक्षर (जैसे- N,J,S,D,K) में हैं। इस चैट में ड्रग्स के लेन-देन की बात हुई थी। कथित तौर पर ये सभी A ग्रेड के कलाकार हैं। अब बताया जा रहा है कि ड्रग चैट की D यानी दीपिका पादुकोण हैं और जिस K से ‘माल’ यानी ड्रग्स मॉंग रही हैं, वह असल में करिश्मा हैं।

पंडित दीनदयाल और एकात्म मानववाद: पश्चिम की बजाय भारत को भारत की ही दृष्टि से देखना आवश्यक

सहृदयता, बुद्धिमता, सक्रियता एवं अध्यवसायी वृत्ति वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक व्यक्ति नहीं, अपितु एक विचार और जीवन-शैली हैं। भारत और भारतीयता उनके जीवन और चिंतन का आवृत्त है। राष्ट्रसेवा को सर्वोपरि मानने वाले और राष्ट्र एवं समाज के प्रति आजीवन समर्पित रहने वाले पंडित जी ने अपने मौलिक चिंतन से राष्ट्र-जीवन को प्रेरित और प्रभावित किया।

पंडित दीनदयाल ‘राष्ट्रधर्म प्रकाशन’ के संस्थापक एवं ‘राष्ट्रधर्म’, ‘पांचजन्य’, ‘दैनिक स्वदेश’ व ‘तरुण भारत’ जैसी राष्ट्रवादी पत्रिकाओं के प्रेरणास्रोत भी रहे हैं। भारतीय समाज-जीवन को सुखी, संपन्न एवं मंगलकारी बनाने के निमित्त उन्होंने ‘एकात्म मानव-दर्शन’ व ‘अन्त्योदय’ की अद्भुत संकल्पना प्रस्तुत की।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारत के सबसे तेजस्वी, तपस्वी एवं यशस्वी चिंतक रहे हैं। उनके चिंतन के मूल में लोकमंगल एवं राष्ट्र-कल्याण का भाव समाहित है। उन्होंने राष्ट्र को धर्म, अध्यात्म एवं संस्कृति का सनातन पुंज बताते हुए राजनीति की नई व्याख्या की।

वह गाँधी, तिलक एवं सुभाष की परंपरा के वाहक थे। वह दलगत एवं सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर वास्तव में एक ऐसे राजनीतिक दर्शन को विकसित करना चाहते थे, जो भारत की प्रकृति एवं परंपरा के अनुकूल हो एवं राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने में समर्थ हो।

अपनी व्याख्या को उन्होंने ‘एकात्म मानववाद’ का नाम दिया। एक ओर उन्होंने जहाँ समाजवाद, मार्क्सवाद एवं पूँजीवाद सरीखे अभारतीय विचारधाराओं को भारतीय चिंतन-परंपरा, भारतीय दृष्टिकोण एवं भारतीय जीवन-शैली के सर्वथा प्रतिकूल माना है। उन्हें अस्वीकार किया है। वहीं, दूसरी ओर भारतीय मानस के अनुकूल ‘एकात्म मानव-दर्शन’ व ‘अन्त्योदय’ की संकल्पना प्रस्तुत कर ‘भारत को भारत की दृष्टि से’ देखने-समझने का एक सार्थक सूत्र भी दिया है।

पंडित जी का यह दर्शन अपनी संपूर्णता में मानव-जीवन को संतुलित, सुखी, संपन्न व आनंदमय बनाने का सूत्र प्रस्तुत करता है। इसमें संयमित उपभोग,अर्थायाम, अन्त्योदय, सृष्टि, व्यष्टि, समष्टि, परमेष्टि एवं ‘पुरुषार्थ चतुष्ट्य’ जैसे सूत्रों का प्रणयन किया गया है। ये सर्वथा दुर्लभ एवं अनिवार्य सूत्र हैं। ये सूत्र हमें मानव-मात्र के सम्यक मूल्याङ्कन की दिशा प्रदान करते हैं। कदाचित् अभारतीय विचारधाराओं के अनुशीलन से हमें यह दिशा प्राप्त नहीं हो सकती।

‘वसुधैव कुटुम्बकं’ की मान्यता से अनुप्राणित उनका चिंतन ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ भाव-साधना का सिद्धांत है। उन्होंने राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की प्रस्तावना करते हुए बताया कि ये अन्यान्योश्रित हैं। वे उत्पादन में वृद्धि,उपभोग में संयम और वितरण में समानता के पक्षधर थे।

व्यष्टि,समष्टि, सृष्टि और परमेष्टि की एकात्मता और शरीर,मन, बुद्धि और आत्मा के उन्नयन की चिंता उनका मूल ध्येय है। अभारतीय विचारधाराओं में मानव-मात्र को टुकड़ों में बाँट कर देखने की पद्धति अपनाई गई है। अतः वहाँ सम्यक मूल्याँकन का कोई अवकाश नहीं होता।

दीनदयाल जी का स्पष्ट मत है कि एकांगी होकर मनुष्य को केवल ‘आर्थिक प्राणी’ के रूप में देखने की परंपरा नितांत अभारतीय है। इससे मानव-सभ्यता के विकास के उन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता, जो किसी राष्ट्र को ‘परम वैभव’ तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध होते हैं।

उनकी दृष्टि में मनुष्य को सर्वप्रथम ‘मनुष्य’ ही माना जाना चाहिए। उसकी समस्त आवश्यकताओं, उसके जीवन के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक आयामों को ध्यान में रखकर चिंतन करते हुए संतुलित-विकास के पथ पर निरंतर आगे बढ़ना चाहिए।

पंडित जी सदैव इस बिंदु को रेखांकित करते थे कि समाजवाद, साम्यवाद एवं पूँजीवाद जैसी अभारतीय विचारणाएँ व्यक्ति के एकांगी विकास को महत्त्व देती हैं। तथापि व्यक्ति की समस्त आवश्यकताओं एवं उसके जीवन के विविध आयामों का मूल्याङ्कन किए बिना कोई भी दर्शन या विचार भारत व भारतीय समाज-जीवन के विकास के अनुकूल नहीं हो सकता। अतः पाश्चात्य वैचारिक दिग्भ्रमिता से भारतीय जनमानस को सचेत रहना चाहिए। यही कारण है कि उन्होंने अपने चिंतन-मनन में भारत की मूल आत्मा को ध्यान में रखा है। भारतीय समाज-जीवन के अनुकूल विशुद्ध भारतीय चिंतन के रूप में ‘एकात्म मानव-दर्शन’ की संकल्पना प्रस्तुत की है।

भारत में स्वाधीनता के सत्तर वर्षों के पश्चात् भी आज एक तिहाई जनता स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सम्मान आदि अपनी मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित है। विगत कई दशकों में सत्ता के माध्यम से अनेक अभारतीय विचारधाराएँ भारत में आरोपित की गईं हैं। किंतु भारतीय समाज की स्थिति सुखद एवं स्वस्थ होने के स्थान पर अधिक दुखद एवं समस्याग्रस्त होती चली गई है। इसका कारण क्या है? इसे समझना आवश्यक है।

पाश्चात्य विचारधाराएँ मूलतः ‘उपभोगवाद’ पर आधारित हैं। ऐसी विचारधाराओं का क्रियान्वयन कर भारत में उपलब्ध अपार प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित व असंयमित उपभोग किया जाता रहा है। इसके कारण कुछ भौतिक विकास तो अवश्य हुआ है, किंतु साथ ही अनेक प्रकार की समस्याएँ व्यक्ति के जीवन को संकटग्रस्त बना चुकी हैं। पर्यावरण असंतुलन इनमें से सर्वाधिक गंभीर संकट है।

आज विश्व समुदाय द्वारा पर्यावरण संकट से निपटने के लिए अनेक विचार-गोष्ठियाँ और सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं। किंतु इन सबका परिणाम शून्य ही है। कदाचित् ‘उपभोगकेन्द्रित’ विचारधाराओं ने समाज को अराजकता की स्थिति में धकेल दिया है। समाज निरंतर बिखर रहा है। सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का विघटन चरम पर है। ‘परिवार’ एवं ‘विवाह’ जैसी पारंपरिक एवं महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्थाएँ क्रमशः टूट रही हैं। बच्चे ‘क्रेच’, तो बुजुर्ग माता-पिता ‘वृद्ध आश्रम’ में रहने को विवश हैं। मनुष्य के अंतःकरण में एक भिन्न प्रकार की उद्विग्नता एवं असंयम की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। शीघ्र-अति-शीघ्र सफलता एवं समृद्धि प्राप्त कर लेने की कामना लोगों का स्थाईभाव बन चुकी है।

दीनदयाल जी को इस प्रकार की अनेक समस्याओं का पूर्व-बोध था। उन्होंने समाज-जीवन में उत्पन्न होने वाले ऐसे संकटों की परिकल्पना अपने समय में ही कर ली थी। वे इन सबके प्रति सावधान एवं सचेत थे। यही कारण है कि उन्होंने भारतीय समाज-जीवन के सर्वथा अनुकूल प्रमाणित होने वाले ‘एकात्म मानव-दर्शन’ की संकल्पना प्रस्तुत की। इसके द्वारा भारतीय समाज के ऐसे तमाम संकटों के समाधान का मार्ग प्रस्तुत किया।

दीनदयाल जी भारतीय चिंतकों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इसका कारण यह है कि उनके सारग्रही चिंतन-दर्शन में भारतीय चिंतन-परंपरा का सार और सर्वश्रेष्ठ है। वैदिक चिंतन से लेकर स्वामी विवेकाननद, गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर,महामना पंडित मदनमोहन मालवीय,महात्मा फूले, महात्मा गाँधी, डॉ हेडगेवार, श्री गुरूजी, वीर सावरकर और डॉ अम्बेडकर के चिंतन से दीनदयाल जी ने अपने ‘एकात्म मानव-दर्शन’ को समृद्ध किया है।

दीनदयाल जी भारत की ‘चिति’ और ‘विराट’ को अपने चिंतन-मनन के केंद्र में रखते हैं। भारतीय समाज-जीवन की समस्याओं के मूल्याँकन एवं उनके हल के लिए भारतीय ‘चित्तवृत्तियों’ से अनुप्राणित दर्शन के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता। यही कारण है कि डॉ महेश चन्द्र शर्मा ने दीनदयाल जी के विचारों का अध्ययन करते हुए इसकी प्रासंगिकता पर बल दिया है। वे लिखते हैं-

“स्वतंत्रता के तुरंत बाद जब देश का राजनीतिक व बौद्धिक जगत पाश्चात्य विचारों से पूरी तरह आच्छादित था। राजनेता भारतीय परंपरा के ऋषि व्यक्तित्व महात्मा गाँधी को भुलाते जा रहे थे। राजनीति लोकमान्य तिलक, श्री अरविंद व स्वामी विवेकानंद की विचार परंपरा से अपना नाता तोड़ रही थी। स्वतंत्रता-संग्राम व भारतीय पुनर्जागरण की विभूतियाँ राजनीति में प्रतिबिंबित नहीं हो रही थीं। राजनीतिक दल पाश्चात्य विचारों से अभिभूत हुए जा रहे थे, तब पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने हस्तक्षेप करते हुए भारतीय प्रज्ञा को झकझोरा तथा आह्वान किया कि हम विदेशी परिस्थिति एवं विदेशी चित्त में उत्पन्न विचारों का अध्ययन तो करें, किंतु स्वतंत्र भारत की विचारधारा का स्रोत तो भारतीय चित्त ही होना चाहिए।”

दीनदयाल जी के इसी आग्रह को सामान्य भावबोध के स्तर पर उतारने के अनेक प्रयत्न आज भारत में किए जा रहे हैं। अनेक तपस्वी विचारक पंडित जी के चिंतन-मनन को जन-जन तक पहुँचाने हेतु सक्रिय हैं। परमपूजनीय डॉ हेडगेवार एवं दीनदयाल जी के सपनों को साकार करने के लिए भारत की वर्तमान राजनीतिक सत्ता भी उनके दर्शन से अनुप्राणित होकर भारतीय समाज-जीवन एवं राजनीति को एक नया आयाम दे रही है। यह भारत के उज्ज्वल एवं सुखद भविष्य का शुभ संकेत है। दीनदयाल जी ने भारतीय संस्कृति को ‘खंडित संस्कृति’ नहीं, अपितु ‘एकात्मवादी संस्कृति’ माना है।

उनकी दृष्टि में भारतीय संस्कृति की पहली विशेषता यह है कि वह संपूर्ण जीवन का, संपूर्ण सृष्टि का संकलित विचार करती है। उसका दृष्टिकोण एकात्मवादी है। टुकड़े-टुकड़े में विचार करना विशेषज्ञ की दृष्टि से ठीक हो सकता है, परंतु व्यावहारिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं। पश्चिम की समस्या का मुख्य कारण उनका जीवन के संबंध में खंडशः विचार करना तथा फिर उन सबको थेगली लगाकर जोड़ने का प्रयत्न है।

विकेन्द्रित विचारों की केन्द्रीयता ही सार्वजनिक जीवन की सहजता का दर्शन है। दीनदयाल जी इस दर्शन से भली-भाँति परिचित थे। यही कारण है कि उन्होंने ‘एकात्म-दर्शन’ की अनिवार्यता पर बल दिया है। कई अभारतीय चिंतक भारतीय जनमानस को पुरातनपंथी एवं परंपरावादी कह कर पिछड़ा हुआ एवं आधुनिक मूल्यों से असंपृक्त मानने की भूल करते हैं। पंडित जी ने उन्हें सटीक उत्तर भी दिया है। भारतीय जनमानस को उसकी सही दिशा एवं क्षमता का स्मरण भी कराया है।

उन्होंने लिखा है, “हम अतीत के गौरव से अनुप्राणित हैं, परंतु उसको भारत के राष्ट्र-जीवन का सर्वोच्च बिंदु नहीं मानते हैं। हम वर्तमान के प्रति यथार्थवादी हैं, किंतु उससे बंधे नहीं हैं। हमारी आँखों में भविष्य के स्वर्णिम स्वप्न हैं, किंतु हम निद्रालु नहीं हैं, बल्कि उन स्वप्नों को सच करने वाले कर्मयोगी हैं। अनादि, अतीत, अस्थिर, वर्त्तमान एवं चिरंतन भविष्य की कालजयी संस्कृति के हम पुजारी हैं। विजय का विश्वास, तपस्या का निश्चय लेकर चलें।”

इस प्रकार, दीनदयाल जी ने अभारतीय चिंतकों एवं विचारधाराओं द्वारा भारत में आरोपित की जाने वाली एकांगिकता, कालबाध्यता तथा निहित स्वार्थपरता सरीखी संक्रमित धारणाओं एवं षड्यंत्रों के प्रति भारतीय जनमानस को सचेत किया है। साथ ही पारंपरिक श्रेष्ठता के नाम पर ‘यथास्थितवाद’ बनाए रखने वाली सांस्कृतिक बुद्धि का भी निषेध किया है।

उनकी स्पष्ट धारणा थी कि हमें अपनी प्राचीन संस्कृति का विचार अवश्य करना चाहिए। किंतु हम इस बात के प्रति भी सचेत रहें कि हम पुरातत्ववेत्ता नहीं हैं। हमारा ध्येय अपनी संस्कृति का संरक्षण करना ही नहीं, अपितु उसे गति देकर सजीव व सक्षम बनाए रखना भी होना चाहिए। हमें अपनी रूढ़ियाँ समाप्त करनी चाहिए। अपनी कमियों की परख कर उनमें सुधार करना चाहिए। सामाजिक जीवन में मौजूद भेदभाव, छुआछूत एवं अस्पृश्यता जैसी विभेदकारी धारणाओं को तोड़ना चाहिए। हमें प्रत्येक मनुष्य से सबसे पहले मनुष्य के रूप में जुड़ना चाहिए। क्योंकि सांस्कृतिक एकता एवं राष्ट्र की एकता के लिए उपरोक्त विभेदकारी विचार सर्वथा घातक हैं।

‘संस्कृति’ शब्द अपने आप में ‘एकात्म’ का अर्थ ध्वनित करती है। कदाचित्, इसीलिए दीनदयाल जी ने भारतीय संस्कृति को ‘एकात्मवादी’ कहा है। वे लिखते हैं, “सृष्टि की विभिन्न सत्ताओं तथा जीवन के विभिन्न अंगों के दृश्य-भेद स्वीकार करते हुए वह उनके अंतर में एकता की खोज कर उनमें समन्वय की स्थापना करती है। परस्पर विरोध एवं संघर्ष के स्थान पर वह परस्परावलंबन, पूरकता, अनुकूलता एवं सहयोग के आधार पर सृष्टि की क्रियाओं का विचार करती है। वह एकांगी न होकर सर्वांगीण है। उसका दृष्टिकोण सांप्रदायिक अथवा वर्गवादी न होकर सर्वात्मक एवं सर्वोत्कर्षवादी है। एकात्मकता उसकी धुरी है।”

अनेक भारतीय वांग्मयकारों ने समय-समय पर इस ‘एकात्मकता’ को एक ‘मूल्य’ के रूप में स्थापित करते हुए इस विचार को आत्मसात करने पर बल दिया है। मानव-जीवन को सहज एवं आनंदमय बनाने के लिए अपने आत्म का विस्तार करना आवश्यक है। अपने आत्म का विस्तार करके ही हम सर्वात्मक एवं सर्वोत्कर्षवादी हो सकते हैं। करुणा का भाव जब मनुष्य के जीवन का सार तत्व बन जाता है, तभी वह ममस्य एवं परस्य के बंधन से मुक्त होकर सुख एवं आनंद का अनुभव कर पाता है।

ऐसी स्थिति में ही वह अपने ‘अहं’ की सत्ता को ‘वयं’ की सत्ता में बदल देता है। दीनदयाल जी का संस्कार-निर्माण ऐसे वैदिक वांग्मय के अनुशीलन से ही हुआ था। वे पश्चिमी समाज की त्रासद स्थितियों से भी अनभिज्ञ न थे। वे लिखते हैं –

“व्यष्टि एवं समष्टि के बीच संघर्ष की कल्पना कर दोनों में से किसी एक को प्रमुख एवं संपूर्ण क्रियाओं का अंतिम लक्ष्य मानकर पश्चिम में अनेक विचारधाराओं का जन्म हुआ है। किन्तु दृश्य व्यक्ति अदृश्य समष्टि का भी प्रतिनिधित्व करता है। ‘अहं’ के साथ ‘वयं’ की सत्ता भी प्रत्येक ‘अहं’ के द्वारा जीती है। प्रत्येक ‘इकाई’ में समुदाय की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है। व्यक्ति ही समष्टि के उपकरण हैं, उसके ज्ञान तंतु हैं।”

इस प्रकार दीनदयाल जी ने व्यष्टि एवं समष्टि के बीच के समीकरण को स्पष्ट किया। मानव जाति की संकटग्रस्त स्थितियों को सामने रखा। पश्चिम के समाज में मनुष्य के जीवन की त्रासदी का कारण यह है कि वहाँ व्यष्टि एवं समष्टि, ज्ञान एवं क्रिया के बीच संतुलन को महत्त्व नहीं दिया गया है। यही कारण है कि विकसित होने के बावजूद वहाँ के समाज-जीवन में अस्थिरता की स्थिति लगातार बनी रही है।

भारत में भी कुछ राजनीतिक दुराग्रहों के कारण उत्पन्न वैचारिक दिग्भ्रमिता व अंधानुकरण से ऐसी त्रासद स्थितियाँ उत्पन्न होती रही हैं। यही कारण है कि वे अपने दर्शन-चिंतन में व्यष्टि एवं समष्टि, ज्ञान एवं क्रिया, शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा के बीच के संतुलन एवं सामंजस्य पर बल देते हैं।

वे व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के सूत्र को स्पष्ट करते हुए कहते हैं – “व्यक्ति शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा का समुच्चय है। व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में चारों का ध्यान रखना होगा। चारों की भूख मिटाए बिना व्यक्ति न तो सुख का अनुभव एवं न अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है। भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उन्नति आवश्यक है। आजीविका के साधन, शांति, ज्ञान एवं तादात्म्य भाव से ये भूखें मिटती हैं। सर्वांगीण विकास की कामना ही व्यक्ति को समाज-हित में कार्य की प्रेरणा देती है।”

इसके साथ ही पुरुषार्थ चतुष्ट्य को महत्त्व देते हुए वे कहते हैं – “व्यक्ति के विकास एवं समाज के हित का संपादन करने के उद्देश्य से धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की कल्पना की गई है। धर्म, अर्थ एवं काम एक-दूसरे के पूरक एवं पोषक हैं। मनुष्य की प्रेरणा का स्रोत तथा उसके कार्यों का मापक किसी एक को ही मानकर चलना अधूरा होगा।”

आज अभारतीय विचारधाराओं के आरोपण एवं पश्चिम के अंधानुकरण के कारण भारतीय मानस इन सबके मध्य के संतुलन एवं सामंजस्य को तोड़ता हुआ केवल भौतिक एवं शारीरिक सुख-भोगी बनने की होड़ में हांफ रहा है। यह भारतीय समाज-जीवन के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

मनुष्य के जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएँ क्या हैं? इनकी आवश्यकता एवं पूर्ति के बीच सामंजस्य स्थापित करना क्यों आवश्यक है? दीनदयाल जी ने ऐसे महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर भी विचार किया है। उनकी दृष्टि में धर्म, अर्थ एवं काम की पूर्ति व इनके सामंजस्य से मोक्ष की प्राप्ति ही मनुष्य जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं। इनमें से किसी एक के प्रति भी विशेष आग्रह या असंतुलन व्यक्ति के जीवन को समस्याग्रस्त बना सकता है।

उनके अनुसार, “उपनिषद् में तो स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ‘नाsयमात्मा बलहीनेन लभ्यः’—-दुर्बल (व्यक्ति) आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर सकता। इसी प्रकार की सूक्ति है कि ‘शरीरमाद्यम खलु धर्मसाधनम’—-अर्थात् शरीर धर्म का प्रधान साधन है। दूसरे लोगों से हमारा यही अंतर है कि उन्होंने शरीर को साध्य माना है, परन्तु हमने उसे साधन समझा है। इस नाते से हमने शरीर का विचार किया है। जितनी भौतिक आवश्यकताएँ हैं, उनकी पूर्ति का महत्त्व हमने माना है, परन्तु उन्हें सर्वस्व नहीं माना। मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा की आवश्यकताओं की पूर्ति, उसकी विविध कामनाओं, इच्छाओं तथा ऐषाणाओं की संतुष्टि एवं उसके सर्वांगीण विकास की दृष्टि से व्यक्ति के सामने कर्त्तव्य के रूप में हमारे यहाँ चतुर्विध पुरुषार्थ की कल्पना रखी गई है।”

स्पष्ट है कि दीनदयाल जी व्यक्ति को केवल शरीर के रूप में देखने के पक्षधर नहीं हैं। उनके लिए शरीर एक साधन मात्र है, जबकि साध्य है – मोक्ष की प्राप्ति। जहाँ व्यक्ति चरम आनंद का साक्षात्कार करता है। यहाँ पहुँचने से पूर्व वह निष्काम भाव से भौतिक आकर्षण एवं असंयमित उपभोग की आकांक्षा से मुक्त हो जाता है।

वास्तव में, इन चारों पुरुषार्थों में दीनदयाल जी ‘धर्म’ को आधारभूत पुरुषार्थ मानते हैं। ‘धर्म’ चारों पुरुषार्थों में आधारभूत पुरुषार्थ इसलिए है, क्योंकि वह उस व्यवस्था को जन्म देता है जो लोकमंगल का विधान करने में सहायक होती है। धर्म की धारणा व्यक्ति एवं समाज का उत्थान करती है। वह व्यष्टि एवं समष्टि के बीच संबंध कायम करने का मार्ग प्रशस्त करती है। धर्म परमेष्टि की आकांक्षा रखने वाले व्यक्ति को ‘साधनावस्था’ में ले जाता है।

दीनदयाल जी के चिंतन की पृष्ठभूमि ऐसे महान साहित्य व साहित्यकारों के अनुशीलन से निर्मित हुई है। इसीलिए वह कहते हैं कि ‘धर्म’ चारों पुरुषार्थों में आधारभूत पुरुषार्थ है। किंतु वे आगाह भी करते हैं कि धर्म को महत्त्व देते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘अर्थ के अभाव’ में धर्म टिक नहीं पाता। इस संदर्भ में पंडित जी ‘बुभुक्षितः किं न करोति पापं, क्षीणा नराः निष्करुणः भवन्ति,’ अर्थात् भूखा सब पाप कर सकता है’ का उदाहरण सामने रखते हैं।

इसके साथ ही वे सावधान करते हैं कि ‘अर्थ के प्रभाव’ से भी व्यक्ति का धर्म संकट में पड़ सकता है। ‘अर्थ का अभाव’ व ‘अर्थ का प्रभाव’ दोनों ही धर्म के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। यहाँ ‘अर्थ के प्रभाव’ को समझना आवश्यक है।

पंडित जी लिखते हैं – “अर्थ के प्रभाव का अभिप्राय आधिक्यमात्र नहीं है। जब व्यक्ति और समाज में अर्थ साधन न रहकर साध्य बन जाए तथा जीवन की सभी विभूतियाँ अर्थ से ही प्राप्त हों, तो वहाँ अर्थ का प्रभाव उत्पन्न हो जाता है और वह अर्थ संचय के लिए नानाविध पाप करता है। इसी प्रकार जिस व्यक्ति के पास अधिक धन हो, उसके विलासी बन जाने की संभावना बनी रहती है। जहाँ व्यक्ति को अर्थ के सदुपयोग का ज्ञान नहीं होता, वहाँ भी अर्थ का प्रभाव होता है। जहाँ ‘गौण अर्थ’ अर्थात् मुद्रा तथा उपभोक्ता वस्तुओं के लिए लगनेवाली उत्पादक वस्तुओं का आधिक्य हो, वहाँ भी अर्थ का प्रभाव होता है।”

दीनदयाल जी व्यक्ति को इन सभी प्रकार के ‘अर्थ के प्रभावों’ से सचेत रहने व बचने की सलाह देते हैं। इसके लिए ‘अर्थायाम’ की आवश्यकता पर बल देते हैं। क्योंकि अर्थ के उत्पादन, विनिमय एवं योगक्षेम को व्यवस्थित करने के लिए ‘अर्थायाम’ अनिवार्य है। किंतु यह तभी संभव है, जब व्यक्ति में उसके बाल्यावस्था से ही औचित्यपूर्ण शिक्षा-दीक्षा, ज्ञान व संस्कार का बीजारोपण किया जाए। इनके द्वारा समाज में दैवी संपदायुक्त प्रेरक व्यक्तित्वों का निर्माण किया जाए। अर्थव्यवस्था का उपयुक्त, प्रभावी व संतुलित ढाँचा खड़ा किया जाए।

इस प्रकार ‘एकात्म मानव-दर्शन’ में पंडित जी ने ‘धर्म’ तथा ‘अर्थ’ के बीच के संबंधों तथा संतुलन को व्याख्यायित किया है। ‘अर्थ द्वारा अनर्थ की संभावनाओं’ पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। ‘धर्म’ तथा ‘अर्थ’ के पश्चात् ‘धर्म’ एवं ‘काम’ के बीच के संबंध-सूत्रों व इनके संतुलन-असंतुलन के प्रभावों-दुष्प्रभावों को भी दीनदयाल जी ने इस दर्शन में व्याख्यायित किया है।

आनंदमय जीवन व्यतीत करने के निमित्त शेष दो पुरुषार्थों सहित ‘काम’ रूपी पुरुषार्थ भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। किंतु उनकी दृष्टि में इसका आधार भी धर्मसम्मत होना चाहिए। इन तीनों का सामंजस्य एवं संतुलन ही चतुर्थ पुरुषार्थ अर्थात् ‘मोक्ष’ का मार्ग प्रशस्त करता है। इनके सामंजस्य एवं संतुलन से ही व्यक्ति अपने जीवन को आनंदमय बना सकता है। वहाँ व्यक्ति कहीं ‘धार्मिक’ व्यक्ति है, तो कहीं ‘आर्थिक’। कहीं ‘कामुक’ व्यक्ति है, तो कहीं ‘साधक’।

पश्चिम का व्यक्ति ‘संपूर्ण-व्यक्ति’ नहीं है, जिसमें इन चारों पुरुषार्थों की उपस्थिति एक साथ हो। व्यक्ति वहाँ टुकड़ों में विभाजित है। यही कारण है कि भौतिक विकास के पश्चात् भी वहाँ मनुष्य का जीवन अवसादग्रस्त बना रहा है। भारत में भी ऐसी विचारधाराओं के प्रति एक आकर्षण उत्पन्न करने की होड़ निरंतर दिखती रही है। कदाचित् इस होड़ पर अंकुश लगाने के निमित्त पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानव-दर्शन’ के भीतर इन चारों पुरुषार्थों के महत्त्व को रेखांकित किया है। संयमित उपभोग एवं संतुलित जीवन का एक विकल्प हमारे सामने रखा है। फलतः पंडित जी द्वारा प्रणीत ‘एकात्म मानव-दर्शन’ का अनुशीलन और अनुपालन वर्तमान परिवेश में अत्यंत अनिवार्य एवं प्रासंगिक हो जाता है।

ऐसा इसलिए है, क्योंकि दीनदयाल जी अपने पूरे चिंतन में बारंबार इस विचार पर बल देते हैं – “मानव केवल एक व्यक्ति मात्र नहीं है। शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा का समुच्चय है। व्यक्ति केवल एकवचन ‘मैं’ तक सीमित नहीं, उसका बहुवचन ‘हम’ से भी अभिन्न संबंध रखता है। अतः हमें समाज व समष्टि का विचार करना होगा।”

वास्तव में, दीनदयाल जी व्यष्टि एवं समष्टि या कहें कि व्यक्ति एवं समाज को एक-दूसरे की सापेक्षता में देखने के आग्रही हैं। यह विचार पश्चिम के दार्शनिक-विचारों से सर्वथा भिन्न है। उनकी दृष्टि में, “मानव न केवल व्यक्ति है, मानव न केवल समाज है, वरन मानव व्यक्ति एवं समाज की एकात्मता में से पैदा होता है। व्यक्ति एवं समाज को बाँट दें तो मानव मर जाता है। अस्तित्व में ही नहीं आता। व्यष्टि एवं समष्टि एकात्म इकाई है। इस एकात्म इकाई का नाम मानव हैI इसलिए मानव को सुखी करना है तो व्यक्तिवादी होकर नहीं कर सकते, क्योंकि व्यक्तिवादी समाज की उपेक्षा करता है। समाजवादी होकर भी नहीं कर सकते, क्योंकि समाजवाद व्यक्ति के व्यक्तित्व को कुचल देता है।”

स्पष्ट है कि व्यष्टि से समष्टि एवं परमेष्टि तक पहुँचने की मनुष्य की यात्रा अलग-अलग खण्डों में विभाजित नहीं है। उसे अलग-अलग घेरे हुए नहीं है। यह एक-दूसरे से पूर्णतः असंबद्ध नहीं है। वह एक ही केंद्र से निसृत समग्र जीवन में सातत्य के साथ प्रवाहमान कहीं पर भी खंडित न होने वाला आवृत है। ‘एकात्म मानव-दर्शन’ व्यष्टि, समष्टि,सृष्टि व परमेष्टि तक की इसी यात्रा, इसी संबद्धता, मानव-जीवन की इसी समग्रता, इसी सातत्य व प्रवाह एवं इसी आवृत को समझने का सहज-सूत्र है।

‘एकात्म मानव-दर्शन’ की संकल्पना दीनदयाल जी के चिंतन का फलक बहुत व्यापक एवं सुगठित है। वे एक साथ व्यक्ति, समाज, राजनीति, धर्म, राष्ट्र आदि न जाने कितने विषयों पर विचार करते हैं। किंतु प्रत्येक जगह उनके विचारों में एक सह-संबंध, पारस्परिकता एवं नयापन परिलक्षित होता है। समाज के विषय में वे लिखते हैं कि “….समाज ‘स्वयंभू’ है। जिस प्रकार व्यक्ति पैदा होता है, उसी प्रकार समाज भी पैदा होता है। व्यक्ति मिलकर कभी समाज को नहीं बनाते। ……वास्तव में समाज तो एक ऐसी सत्ता है, जिसकी अपनी आत्मा है, जिसका अपना एक जीवन है, इसलिए यह भी उसी प्रकार से जीवमान सत्ता है, जैसे मनुष्य जीवमान सत्ता।”

वास्तव में, यह समाज की भौतिक व्याख्या नहीं, अपितु तात्विक व्याख्या है। इसलिए यहाँ समाज को पश्चिम के ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ के सूत्र के आधार पर स्पष्ट नहीं किया जा सकता। ‘राष्ट्र’ पर चिंतन करते हुए पंडित जी ने लिखा है कि किसी राष्ट्र का अस्तित्व उसके नागरिकों के जीवन का ध्येयभूत आधार है। जब एक मानव-समुदाय के समक्ष एक व्रत, विचार या आदर्श रहता है एवं वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह राष्ट्र कहलाता है। इनमें से एक का भी अभाव रहा तो राष्ट्र नहीं बनेगा।

स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन परंपरा में ‘राष्ट्र’ केवल भौतिक सीमाओं पर आधारित भौगोलिक इकाई या भौतिक सरणि नहीं है। इसका संबंध समानधर्मी, समनादर्शी एवं समानुभूति पर आधारित सामूहिक समभाव से है। यही कारण है कि पंडित जी ‘राष्ट्र’ की ऐसी परिकल्पना कर ‘भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को महत्त्व देते हैं।

‘भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की विचार-सरणि को मानने वाला प्रत्येक व्यक्ति समान व्रती, सामान दर्शन व सामान मूल्यों को मानने वाला होता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, कच्छ से कामरूप तक प्रत्येक भारतीय एक-दूसरे से ‘एकात्म-भाव’ से जुड़ा हुआ है। भले ही उसकी भाषा अलग हो, संस्कृति अलग हो, रहन-सहन अलग हो, पंथ-संप्रदाय अलग हो—-किंतु वह संपूर्ण भारत-भूमि के कण-कण को पवित्र मनाता है। सबके हित की कामना करता है।

इतना ही नहीं, समान व्रत, समान दर्शन, समान मूल्यों को मानने वाले व्यक्ति संसार में जहाँ भी उपस्थित हैं, वे सभी इस भारत-भूमि, इस राष्ट्र के समभाव एवं संकल्पना में समाहित हैं। इस प्रकार दीनदयाल जी की ‘राष्ट्र’ की संकल्पना व ‘भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की विचार-प्रणाली भी संपूर्णता एवं सामूहिकता की भावना से अनुप्राणित है। यह दृष्टि पश्चिम की ‘नेशन’ एवं ‘नेशनलिज्म’ अर्थात ‘राष्ट्र’ एवं ‘राष्ट्रवाद’ की दृष्टि से सर्वथा भिन्न है। वे ‘एकात्म मानव-दर्शन’ के तहत ‘राष्ट्र’ की भी तात्विक व्याख्या प्रस्तुत करते हैं।

उनके अनुसार, “राष्ट्र की भी एक आत्मा होती है। उसका एक शास्त्रीय नाम है। इसे ‘चिति’ कहा गया है।” इस प्रकार दीनदयाल जी ‘राष्ट्र’ की संकल्पना में व्यक्ति को एक साधन के रूप में देखते हैं। व्यक्ति स्वयं के अतिरिक्त अपने राष्ट्र का भी प्रतिनिधित्व करता है। स्पष्ट है कि दीनदयाल जी द्वारा प्रस्तावित ‘एकात्म मानव-दर्शन’ एक वायवीय विचार नहीं है, बल्कि एक कालजयी सिद्धांत हैI

एजाज़ ने प्रिया सोनी से कोर्ट मैरिज के बाद इस्लाम कबूल करने का बनाया दबाव, मना करने पर दोस्त शोएब के साथ रेत दिया गला

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र स्थित चोपन थाना क्षेत्र में लगभग 5 दिन पहले एक युवती की सिर कटी लाश बरामद हुई थी। पुलिस ने इस मामले में जाँच पूरी करके आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस की जाँच में जो बात सामने आई है वह हैरान कर देने वाली है। ख़बरों के मुताबिक़ एजाज़ नाम का युवक उस युवती पर इस्लाम धर्म कबूल करने का दबाव बना रहा था। जब युवती ने ऐसा करने से मना कर दिया तो एजाज़ अहमद ने अपने साथी शोएब के साथ मिल कर उसकी हत्या कर दी। 

सोनभद्र जिले के प्रीत नगर इलाके में 21 सितंबर की शाम को झाड़ियों में एक युवती की सिर कटी लाश मिली थी। इसके बाद पुलिस ने युवती का सिर भी बरामद किया था, उसकी पहचान चोपन थाना क्षेत्र निवासी प्रिया सोनी के रूप में हुई थी। पुलिस का इस मामले में कहना था कि लगभग 1 महीने पहले प्रिया ने पड़ोस में रहने वाले एजाज़ नाम के युवक से कोर्ट मैरिज की थी। युवती के परिजन इस बात से बिलकुल भी सहमत नहीं थे। 

ख़बरों की मानें तो कुछ दिन तक दोनों के बीच हालात सामान्य थे। थोड़े ही समय बाद एजाज़ ने प्रिया पर धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया लेकिन युवती ने इससे साफ़ इनकार कर दिया था। इस मुद्दे पर प्रिया और एजाज़ के बीच काफी विवाद हुआ था, एजाज़ ने इस बात पर कई बार प्रिया से मारपीट भी की थी। आखिरकार एजाज़ ने अपने एक साथी के साथ मिल कर प्रिया का गला काट कर हत्या कर दी और शव झाड़ियों में फेंक दिया। 

21 सितंबर को उसकी लाश बरामद होने के बाद पूरे इलाके में हड़कंप मच गया। पुलिस ने चोपान थाना क्षेत्र में धारा 302 और 201 के तहत अज्ञात लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की। इसके अलावा पुलिस ने युवती की जल्द से जल्द पहचान करने के लिए सोशल मीडिया पर भी इसकी जानकारी साझा की थी। सोशल मीडिया की ज़रिए पता चला की युवती का नाम प्रिया सोनी (उम्र 22 वर्ष) है। परिवार वालों ने भी इस बारे में जानकारी दी थी, उन्होंने बताया कि प्रिया ने 7 जुलाई को एजाज़ अहमद से कोर्ट मैरिज की थी। इस जानकारी के आधार पर पुलिस ने आगे की जाँच शुरू की।

इस मामले में पुलिस की जाँच पूरी होने के बाद एसपी आशीष श्रीवास्तव ने घटनाक्रम की जानकारी दी। उन्होंने कहा, “एजाज़ के परिवार वाले प्रिया को बिना धर्म परिवर्तन के स्वीकार नहीं करना चाहते थे। इसके चलते एजाज़ ने प्रिया पर इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाना शुरू किया। एजाज़ ने प्रिया को एक लॉज में बंद करके रखा था, वह प्रिया पर लगातार धर्म परिवर्तन का दबाव बनाता था। जब वह अपने इरादों में कामयाब नहीं हुआ तो उसने चोपन में दोस्त शोएब को बुलाया और उसके साथ मिल कर प्रिया का गला रेत दिया।”

एजाज़ ने प्रिया का धड़ प्रीत नगर स्थित झाड़ियों में फेंक दिया और सिर चोपन क्षेत्र में छिपा दिया था। पुलिस ने आरोपित एजाज़ और उसके दोस्त शोएब के पास से हत्या के दौरान इस्तेमाल की गई कई चीज़ें बरामद की हैं। इसमें लोहे की रॉड, चाक़ू, फावड़ा और आल्टो कार मुख्य हैं, इसके अलावा पुलिस ने एजाज़ के पास से प्रिया का मोबाइल फोन भी बरामद किया है। पुलिस का कहना है घटना की वजह से इलाके में तनाव है। मामला गंभीर है इसलिए आरोपितों पर एनएसए के तहत कार्रवाई की जाएगी। 

कर्नाटक: HC के आदेश के बाद हटाया गया सरकारी भूमि पर स्थापित अवैध क्रिश्चियन क्रॉस और जीसस की विशाल मूर्ति

कर्नाटक के चिक्काबल्लापुर में सुसाई पलिया हिल पर मौजूद एक अवैध क्रिश्चियन क्रॉस और यीशु मसीह की एक मूर्ति को बुधवार (सितम्बर 23, 2020) को जिला प्रशासन ने हटा दिया है। जनहित याचिका (पीआईएल) के जवाब में कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश के बाद यह कार्रवाई की गई।

सरकारी भूमि के अतिक्रमण के लिए बड़े आकार के क्रॉस और स्टैचू को सरकारी स्वामित्व वाली चरागाह भूमि, जिसे गोमला भी कहा जाता है, पर अवैध रूप से स्थापित किया गया था। अवैध कब्जे को हटाने की इस कार्रवाई को सहायक आयुक्त रघुनंदन, तहसीलदार तुलसी ने पुलिस अधीक्षक (चिक्काबल्लापुर) मिथुन कुमार की निगरानी में किया गया।

प्रशासनिक कार्रवाई की पुष्टि करते हुए, रघुनंदन ने बताया कि कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेशों पर कार्रवाई की गई थी, क्योंकि यह पाया गया था कि अधिकारियों की पूर्व स्वीकृति के बिना, सरकारी भूमि पर मूर्ति और क्रॉस का निर्माण किया गया था।

इसाई प्रदर्शनकारियों ने किया कार्रवाई के खिलाफ विरोध

इस दौरान इलाके में कानून व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए सैकड़ों पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था। कथित तौर पर, सैकड़ों इसाई प्रदर्शनकारियों ने जिला प्रशासन के संचालन के खिलाफ मौके पर प्रदर्शन किया। इसाई प्रदर्शनकारी, प्रशासन और कर्नाटक सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते रहे। पुलिस ने मामले को अपने हाथ में ले लिया और उन सभी स्थानीय इसाईयों को पीछे किया, जिन्होंने प्रशासन को न्यायालय के आदेशों को लागू करने से रोकने की कोशिश की।

केरल में भी चर्च ने किया था कब्जा करने का प्रयास

पिछले साल एक चर्च पर केरल की कम्युनिस्ट सरकार की मदद से, केरल में ‘पूनकवनम’ के नाम से जाने जाने वाले सबरीमाला मंदिर से जुड़े ‘पवित्र वनों’ का अतिक्रमण करने का आरोप लगाया गया था। मलयालम अख़बार ‘जन्मभूमि’ की एक रिपोर्ट ने बताया था कि इडुक्की ज़िले के सबरीमाला जंगलों के एक हिस्से पाँचालिमेडु के पास वनभूमि का भारी अतिक्रमण किया गया था। पूरे क्षेत्र को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम के तहत पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील के रूप में नामित किया गया है।

चिंताजनक विषय यह था कि चर्च ने ऐसे बोर्ड लगाए हुए थे जिनमें वन क्षेत्र को एक इसाई तीर्थस्थल होने का दावा किया गया था। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि इस कारनामे का उद्देश्य सबरीमाला मंदिर था, जो पिछले सत्तर सालों से धर्मांतरण वाले गिरोह के रडार पर रहा है।

मारपीट, धमकी से तंग पूनम पांडेय ने शादी के बाद दो हफ्ते में ही पति सैम अहमद बॉम्बे से अलग होने का लिया फैसला, विवादों से नाता पुराना

बीते कुछ दिनों से बॉलीवुड अभिनेत्री और मॉडल पूनम पांडेय चर्चाओं में बनी हुई हैं। लगभग 2 हफ्ते पहले उन्होंने सैम अहमद बॉम्बे से शादी की थी। पूनम पांडेय ने पिछले हफ्ते अपने पति सैम अहमद बॉम्बे पर उत्पीड़न (मोलेस्टेशन), मारपीट और धमकी देने का आरोप लगाया था। अब उन्होंने इस शादी को ख़त्म करने का फैसला किया है। पूनम पांडेय ने कहा कि अब वह सैम अहमद बॉम्बे के पास वापस नहीं जाएँगी। उन्होंने इस बात के भी संकेत दिए कि वह बहुत जल्द आधिकारिक तौर पर अपना रिश्ता ख़त्म कर लेंगी। 

पूनम पांडेय ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए इस बारे में विस्तार से जानकारी दी थी। पूनम ने कहा था, “हमारे बीच किसी मुद्दे पर बात हो रही थी, कुछ ही समय में बात बहस में तब्दील हुई और उसने (सैम अहमद बॉम्बे) मुझ पर हाथ उठा दिया। इसके बाद उसने मुझे पीटा और गला तक दबा दिया, एक बार के लिए लगा मेरी जान चली जाएगी। उसने मेरे चेहरे पर मुक्का मारा, मेरा बाल खींचा और मेरा सिर दीवार से लड़ा दिया। फिर भी मैं किसी तरह लड़ झगड़ कर कमरे से बाहर आ गई। होटल के कर्मचारियों ने पुलिस को बुलाया और मैंने शिकायत दर्ज कराई। इतना सब कुछ झेलने के बाद मुझे ऐसा लगता है कि मैं इस बात का सबसे बेहतर उदाहरण हूँ कि प्यार अंधा होता है।” 

यह पहला ऐसा मौक़ा नहीं है जब पूनम पाण्डेय विवादों के कारण चर्चा में बनी हुई हैं। 2011 में हुए क्रिकेट विश्व कप के दौरान पूनम पाण्डेय ने एक बयान दिया था जिसने खूब सुर्खियाँ बटोरी थीं। पूनम ने अपने बयान में कहा था, “भारत यह मैच जीतता है तो मैं सारे कपड़े उतार दूँगी।” पूनम के इस बयान पर काफी विवाद हुआ था, तमाम लोगों ने इस बयान पर प्रतिक्रिया दी थी। बीसीसीआई ने भी पूनम पाण्डेय के इस बयान की आलोचना की थी।

इसके अलावा पूनम पाण्डेय ने इस साल राज कुंद्रा के विरुद्ध बॉम्बे उच्च न्यायालय में मामला दर्ज कराया था। पूनम ने अपने आरोप पत्र में कहा था कि उन्हें पाकिस्तान और देश के कई हिस्सों से कॉल आती हैं। उन कॉल्स में आपत्तिजनक और अश्लील बातें की जाती हैं। पूनम की एप्लीकेशन राज कुंद्रा की एक कंपनी देखती थी, उनके बीच साल 2019 में कॉन्ट्रैक्ट हुआ था। पूनम का आरोप था कि राज कुंद्रा की कंपनी ने उनका निजी नंबर सार्वजनिक कर दिया था, जिसके बाद उनके साथ इस तरह की परेशानी हुई थी।     

बॉलीवुड अभिनेत्री पूनम पांडे के पति सैम अहमद को बॉम्बे पुलिस ने गोवा में 22 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया था। उनके ख़िलाफ़ पूनम ने मोलेस्टेशन, धमकी देने और मारपीट करने का आरोप लगाया था। पुलिस में दर्ज श‍िकायत के मुताबिक, दक्ष‍िण गोवा के कानाकोना गाँव में पूनम पांडे किसी फिल्‍म की शूटिंग कर रही थीं। यह घटना तभी हुई। कानाकोना पुलिस थाने के इंस्‍पेक्‍टर तुकाराम चव्‍हाण के अनुसार, पूनम ने अपनी श‍िकायत में कहा है कि सोमवार (सितंबर 21, 2020) की रात सैम अहमद ने उन्‍हें मोलेस्‍ट किया और मारपीट की। इतना ही नहीं, पूनम ने यह भी कहा कि सैम अहमद बॉम्‍बे ने उन्‍हें अंजाम भुगतने की भी धमकी दी है।

उल्लेखनीय है कि अभिनेत्री के 46 वर्षीय पति सैम अहमद पेशे से एक फिल्म डायरेक्टर हैं, जिनका घर दुबई में है। उनके एक प्रोडक्शन हाउस का नाम बॉम्बे मैटिनी फिल्म्स भी है। वहीं, पूनम पांडे कानपुर से हैं। उन्होंने साल 2013 में फिल्म नशा से अपने करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद से वह अपने बोल्ड फोटोशूट के कारण अक्सर चर्चा में रहीं। उन्होंने कई तेलुगु और कन्नड़ फिल्मों में भी काम किया। सैम अहमद बॉम्बे के साथ उनका रिलेशन करीब तीन साल पुराना है। बीती 27 जुलाई को दोनों ने सगाई की थी और 10 सितंबर को सोशल मीडिया पर खबर दी थी कि उन्होंने शादी कर ली है।

जब इंडिया टुडे प्राइवेट चैट निकाले तो चमत्कार, दूसरे चैनल निकालें तो हाहाकार… ऐसे कैसे राहुल कँवल?

दिवंगत बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह और रिया चक्रवर्ती के प्रकरण के बाद अब दीपिका पादुकोण, जिसे कि इंडिया टुडे के जर्नलिस्ट राहुल कँवल बॉलीवुड की महारानी बताते हैं, ड्रग्स के मामले में घिरती नजर आ रही हैं। ‘अपने पक्ष’ को फंसता देख इंडिया टुडे के न्यूज़ एंकर्स ने ‘नैतिकता’ को याद किया है। लेकिन इंडिया टुडे के न्यूज़ रिपोर्टर राहुल कँवल अपने ही ट्वीट और अपने ही बयान याद नहीं रख पाते।

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच का सिलसिला आगे बढ़ा और बॉलीवुड में व्याप्त ड्रग्स के कारोबार का भी खेल लोगों के सामने आया। इस बीच समाचार चैनल्स का दोहरापन खुलकर सामने आया है।

राहुल कँवल ने NCB (नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो) की जाँच में बॉलीवुड अभिनेत्रियों की ड्रग्स की माँग को लेकर सामने आई व्हाट्सएप चैट के सम्बन्ध में ट्विटर पर सवाल उठाए हैं। सितम्बर 24, 2020 के दिन राहुल कँवल ने एक ट्वीट कर हैरानी जाहिर करते हुए लिखा है कि दीपिका पादुकोण की व्हाट्सएप चैट लीक होना लोगों की गोपनीयता और निजता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

राहुल कँवल ने अपने इसी ट्वीट में सवाल किया है कि आखिर NCB दीपिका और करिश्मा की व्हाट्सएप पर हुई निजी बातचीत तक कैसे पहुँची? क्या NCB, उनकी डिलीट की हुई चैट को वापस निकाल पाने के लिए किसी पर दबाव बना सकती है?

नैतिकता पर ज्ञान देता हुआ राहुल कँवल का ट्वीट

राहुल कँवल की जिज्ञासा और सवाल अपनी जगह पर सही होते अगर उन्होंने इस ट्वीट से कुछ ही दिनों पहले एक और ट्वीट में इसी काम के लिए अपनी पीठ न थपथपाई होती। दरअसल, अगस्त 31, 2020 को राहुल कँवल ने ही एक ट्वीट में इस बात को लेकर वाहवाही लूटने के लिए दावा किया था कि इंडिया टुडे समूह ने सुशांत सिंह और उनकी बहन के बीच हुई व्हाट्सएप चैट हासिल की है।

व्हाट्सएप चैट हासिल करने के बाद वाहवाही लूटता हुआ राहुल कँवल का ट्वीट

ऐसे में, जब अगस्त 31, 2020 को इंडिया टुडे खुद यह दावा कर रहा था कि उन्होंने सुशांत सिंह की एक चैट खोज कर निकाली है, तब राहुल कँवल की निजता को लेकर यह नैतिकता कहाँ छुपी रह गई थी? सोशल मीडिया पर भी राहुल कँवल के कारनामे को ‘चमत्कार’ और ‘हाहाकार’ बता रहे हैं-

इंडिया टुडे के दुःख का कारण अन्य चैनल्स की TRP तो नहीं?

बॉलीवुड के दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने सबसे ज्यादा अगर किसी को बेनकाब किया है, तो वह भारत के कुछ स्वघोषित समाचार चैनल हैं। इन चैनल्स में भी इंडिया टुडे जैसे गिरोह का स्थान सबसे पहले ही रखा जाना चाहिए। इसके पीछे कई वजह हैं।

इंडिया टुडे चैनल ने इस प्रकरण के शुरुआत से ही अपने हिस्से का ‘सच’ पकड़ा और उसे सही साबित करने का हर संभव प्रयास कर रहा है। इस कारनामे में उन्होंने सुशांत सिंह की मौत के मामले में मुख्य आरोपित उनकी प्रेमिका रिया चक्रवर्ती की प्यार एजेंसी की तरह काम किया और कभी साक्षात्कार, तो कभी ट्विटर के जरिए उसे निर्दोष और सुशांत सिंह को एक दर्ज एडिक्ट बताने का कारनामा किया।

यही इंडिया टुडे, जिसके ‘गिद्ध’ जर्नलिज्म पर दूसरों को ज्ञान देते नजर आ रहे थे, अब खुद भी दीपिका पादुकोण की कार का पीछा करते हुए देखा जा सकता है। कल तक यही लोग रिपब्लिक भारत की रिपोर्ट्स की शैली पर सवाल उठा रहे थे।

राहुल कँवल और राजदीप सरदेसाई ने इस पूरे प्रकरण में खुद को खुलकर बेनकाब किया है। स्वयं को गिद्ध बता चुके राजदीप सरदेसाई तो बृहस्पतिवार (सितम्बर 24, 2020) को ही रिपब्लिक भारत के पत्रकार के साथ ABP न्यूज़ के पत्रकार द्वारा की गई हाथापाई तक को जायज बता चुके हैं। ऐसे में, यह लोग जब TRP की दौड़ में कहीं पीछे छूटने के बाद नैतिकता का प्रश्न उठाते देखे जाते हैं तो समझा जा सकता है कि इनका वास्तविक मर्म क्या हो सकता है।

शिवसेना बंगाल के गवर्नर जगदीप धनखड़ के खिलाफ चाहती है FIR: ममता सरकार के अपमान को लेकर की कार्रवाई की माँग

शिवसेना की पश्चिम बंगाल इकाई ने राज्य पुलिस को पत्र लिखकर प्रदेश के राज्यपाल जगदीप धनखड़ के खिलाफ जाँच करने को कहा है। ममता बनर्जी की अगुवाई वाली राज्य सरकार को अपमानित करने का आरोप लगाते हुए शिवसेना ने गवर्नर के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की माँग की है।

पश्चिम बंगाल शिवसेना राज्य इकाई के महासचिव अशोक सरकार ने बिधाननगर पूर्व पुलिस स्टेशन के इंचार्ज अफसर को एक चिट्ठी लिखी है। पत्र में उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के गवर्नर लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई राज्य सरकार के खिलाफ फर्जी अफवाहें फैला रहे हैं। धार्मिक कार्ड खेलते हुए शिवसेना नेता ने आगे कहा कि राज्यपाल द्वारा दिए गए कई बयानों से बंगालियों और बंगाल की संस्कृति का अपमान हो रहा है, जो उनके भावनाओं को आहत कर रहा है

उन्होंने राज्य पुलिस से आग्रह किया कि उक्त व्यक्ति (गवर्नर) के खिलाफ़ जाँच शुरू हो और उन्हें ऐसी गतिविधियों में लिप्त होने से मना किया जाए।

उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ और सीएम ममता बनर्जी के बीच मतभेदों के बारे में सबको मालूम है। धनखड़ ने जिस दिन से राज्य के राज्यपाल का पद संभाला है, उस दिन से दोनों एक दूसरे के विरोध में हैं।

जगदीप धनखड़ ने ममता सरकार के प्रशासन के तहत राज्य पुलिस को राज्य में कानून और व्यवस्था के बारे में “शुतुरमुर्ग रुख” के लिए हमेशा लताड़ा है। वहीं पश्चिम बंगाल में कोरोना वायरस से मुकाबला करने में विफल और बढ़ते प्रसार को लेकर कई बार सरकार पर आरोप लगाया है। पश्चिम बंगाल में ममता सरकार के रुख को लेकर जगदीप धनखड़ कटाक्ष करने से कभी पीछे नहीं हटे।

हाल ही में, जगदीप धनखड़ ने अल-कायदा के पाकिस्तान-प्रायोजित मॉड्यूल से जुड़े नौ आतंकवादियों की गिरफ्तारी के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था में “चिंताजनक गिरावट (alarming decline)” पर सवाल उठाए थे। उन्होंने राज्य पुलिस पर ममता सरकार की तुष्टिकरण की राजनीति से बेहद पक्षपातपूर्ण और सरकार के लिए राज्य के साथ छल करने का आरोप भी लगाया था।