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बच्ची की ऑनलाइन प्रताड़ना केस में जुबैर के साथ खड़े AltNews के प्रतीक सिन्हा से NCPCR ने माँगे सबूत, कहा- आयोग के सामने पेश हों

नाबालिग लड़की को ऑनलाइन प्रताड़ित करने के मामले में पिछले दिनों ऑल्ट न्यूज के सह संस्थापक मोहम्मद जुबैर के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। इसके बाद पोर्टल के दूसरे फाउंडर प्रतीक सिन्हा ने दावा किया कि जुबैर पर लगे सभी आरोप झूठे हैं। अब सिन्हा के इसी दावे का प्रमाण राष्ट्रीय बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग ने उनसे माँगा है। आयोग ने उन्हें सभी सबूतों के साथ पेश होने के लिए कहा है।

आयोग का कहना है कि अपने साथी जुबैर के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज होने के बाद प्रतीक सिन्हा ने जो उसके समर्थन में दावे किए थे, वह उसे साबित करने के लिए सभी सबूत आयोग के सामने पेश करें।

गौरतलब है कि इससे पहले प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘ऑल्टन्यूज़’ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर पर बच्ची की ऑनलाइन प्रताड़ना को लेकर मामला दर्ज होने के बाद प्रतीक सिन्हा ने सोशल मीडिया में ऐलान किया था कि ऑल्टन्यूज़ जुबैर के साथ खड़ा है। उसे डराने धमकाने की कोशिश की जा रही है।

जुबैर का समर्थन करते हुए कहा गया था कि ग़ैरकानूनी तरीकों का इस्तेमाल करके ऑल्टन्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद ज़ुबैर पर हमला करने की कोशिश की जा रही है। इन बातों को मद्देनज़र रखते हुए ऑल्टन्यूज़ अपने सह-संस्थापक के साथ खड़ा है। ज़ुबैर ने फ़ेक न्यूज़ नैरेटिव का सामना करने में अहम भूमिका निभाई है। यह बात बहुत से ऐसे लोगों को पसंद नहीं आती है जो भ्रामक ख़बरों के सहारे भारतीय लोकतंत्र को दबाने का प्रयास करते हैं।

यहाँ बता दें कि कुछ दिन पहले राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने जुबैर के खिलाफ FIR दर्ज किए जाने की जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि इस मामले में ट्विटर के निवेदन के बाद NCPCR ने उसे मोहम्मद जुबैर के ट्वीट के सम्बन्ध में और अधिक जानकारी देने के लिए 10 दिनों का अतिरिक्त समय दिया है। जुबैर के ट्वीट के बाद उसे फॉलो करने वाले ट्विटर एकाउंट्स @de_real_mak और @syedsarwar ने भी बच्ची के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया था, इसीलिए एफआईआर में उनका नाम भी शामिल है।

उल्लेखनीय है कि फैक्ट चेकिंग के नाम पर लोगों की निजी और गोपनीय जानकारियाँ सार्वजानिक करने के लिए कुख्यात समूह ऑल्टन्यूज़ के संस्थापकों में से एक मोहम्मद जुबैर ने अगस्त 07, 2020 को एक ट्विटर यूजर को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने के लिए बच्ची की तस्वीर सार्वजानिक कर दी थी। बताया गया था कि यह बच्ची उस यूजर की पोती थी और उसे जुबैर के ट्वीट के बाद रेप की धमकियाँ मिली थी।

CM उद्धव ठाकरे के मेडिकल असिस्टेंस सेल के चीफ कोरोना से बढ़ती मौतों के बारे में बताते हुए रोते बिलखते आए नजर, वीडियो वायरल

सोशल मीडिया पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के मेडिकल असिस्टेंस सेल के प्रमुख ओम प्रकाश शेटे का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो में शेटे राज्य में कोरोनावायरस महामारी की स्थिति के बारे में मीडिया से बात करते हुए रोते बिलखते हुए नजर आ रहे है। कोरोना वायरस के चलते राज्य में बढ़ते मौतों के आँकड़ों की वजह से शेटे की हालत खराब दिखाई दे रही है। फिलहाल यह वीडियो कब की है अभी इसकी जानकारी नहीं हो पाई है।

शेटे ने कहा रोते हुए कहा, “मैं सो नहीं पा रहा हूँ। आम आदमी मर रहा है। यह बुरा लगता है।” उन्होंने कहा, हर दिन उन्हें सैकड़ों संदेश मिलते हैं और वह उन पर प्रतिक्रिया देते हुए थक जाते हैं। शेटे ने कहा कि सीएम ठाकरे के पास निर्णय लेने की विवेकाधीन शक्ति है और यह उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि सभी आशाओं को खोने के बाद उन्होंने अब अदालत का दरवाजा खटखटाया है। बिलखते हुए शेटे ने लड़खड़ाती जबान में कहा, “लोग मर रहे हैं क्योंकि उनके पास पैसा नहीं है। मैंने अदालत से उनकी मदद करने का अनुरोध किया है।”

ओमप्रकाश शेटे के वीडियो का उल्लेख आज बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता द्वारा राज्य में धार्मिक स्थलों को फिर से खोलने की माँग वाली जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान किया गया।

राज्य सरकार के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए, मुख्य न्यायाधीश दत्ता ने कहा कि यदि राज्य में सरकार की लापरवाह प्रणाली के बारे में शेटे के दावे सही थे, तो इस मामले में कुछ करने की जरूरत है। CJ दत्ता ने एडवोकेट जनरल आशुतोष कुंभकोनी को वीडियो की प्रामाणिकता का सत्यापन करने और यह जानने के लिए निर्देशित किया कि क्या वास्तव में शेटे मेडिकल सेल का हिस्सा थे और यदि वीडियो असली था और शेटे राज्य प्रणाली का हिस्सा थे, तो राज्य को इस स्थिति को संबोधित करना होगा।

गौरतलब है कि चीन के वुहान शहर से फैले इस जानलेवा महामारी से महाराष्ट्र सबसे अधिक प्रभावित राज्य है। केवल महाराष्ट्र में अब तक 12.60 लाख से अधिक कंफर्म मामले दर्ज किए गए हैं। देश में इस वक्त संक्रमण के कुल मामलों की तुलना में महाराष्ट्र की भागीदारी इसमें सबसे ज्यादा है। लगभग 34000 लोग संक्रमण से अपनी जान गँवा चुके हैं, वहीं संक्रमण से सबसे ज्यादा प्रभावित दूसरे नंबर पर तमिलनाडु राज्य है। जहाँ मौतों की संख्या लगभग 9000 है।

NDTV एंकर ने किया दर्शकों को गुमराह: कपिल मिश्रा को चार्जशीट में नहीं कहा गया ‘व्हिसिल ब्लोअर’, दिल्ली पुलिस ने लगाई लताड़

NDTV की प्रोपगेंडायुक्त रिपोर्टिंग की पोल दिल्ली पुलिस ने आज (सितंबर 24, 2020) स्वयं खोल डाली। दिल्ली पुलिस ने अपने ऊपर लगे आरोपों के ख़िलाफ़ बयान जारी करते हुए बताया है कि एनडीटीवी की एंकर जिस तरह से अपने शो में दावा कर रही हैं कि पुलिस ने कपिल मिश्रा को ‘व्हिसिल ब्लोअर’ कहा। वह दावा सत्य से कोसों दूर हैं। दिल्ली पुलिस ने अपने बयान में कहा है कि पुलिस ने कहीं भी कपिल मिश्रा को व्हिसिल ब्लोअर नहीं कहा है और न उन्होंने ऐसा कुछ कहीं लिखा है।

बयान में आगे लिखा गया, “शायद एंकर का नैरेटिव तब पूरा होता यदि दिल्ली पुलिस ने कपिल मिश्रा का विस्तृत बयान न लिया होता। परंतु अन्वेषण स्टूडियो और कैमरा के सामने नहीं होता। कपिल मिश्रा का विस्तृत बयान रिकॉर्ड पर आ जाने से आहत एंकर ने सच्चे व्हिसिल ब्लोअर को नजरअंदाज करते हुए दर्शकों को गुमराह करने का प्रयास किया है।”

इस बयान में आगे बताया गया कि एंकर ने अपने शो में दूसरा कौन सा मुद्दा उठाया। बयान के मुताबिक, “रिपोर्ट में दूसरा मुद्दा यह उठाया गया कि कपिल मिश्रा के मौजपुर में रहते ही पत्थरबाजी शुरू हो गई थी। दिल्ली पुलिस ने तमाम अन्वेषण के बाद पाया कि दंगे और पत्थरबाजी 23 फरवरी को चाँद बाग के दंगाइयों ने सोची-समझी साजिश के तहत, लगभग 11 बजे सुबह से ही शुरू कर दी थी और प्रथम घायल पीड़ित की एमएलसी 12;15 बजे, दिन को अस्पताल में बनी थी जबकि कपिल मिश्रा 23 तारीख को 3:30 बजे दोपहर मौजपुर आए थे। इससे स्पष्ट है कि पुलिस और पब्लिक पर सीएए विरोधियों द्वारा हमला 23 फरवरी की सुबह ही शुरू हो गया था।”

दिल्ली पुलिस का दावा है कि एनडीटीवी एंकर ने इन सभी तथ्यों को छिपाते हुए एक कहानी रचने की शरारतपूर्ण कोशिश की है। परंतु NDTV के अपनी ही रिपोर्टर की यह टिप्पणी, कि डीएसपी Anti riot gear पहने हुए थे और आसपास पत्थर भी दिखाई पड़ रहे थे, से पुलिस की चार्जशीट में लिखी इस बात की जाने-अंजाने में पुष्टि होती है कि पथराव लगभग 11 बजे सुबह से ही शुरू हो गया था।

गौरतलब है कि 23 सितंबर को एनडीटीवी पर एक वीडियो सामने आई थी। इस वीडियो में एनडीटीवी की एंकर नगमा सहर कहती नजर आई थीं कि दिल्ली पुलिस ने जो चार्जशीट पेश की है। उसको लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। चार्जशीट देख कर लगता है कि नफरती भाषण देने वाले को दिल्ली पुलिस व्हिसिल ब्लोअर बता रही है। एंकर इस शो में बताती नजर आई थीं कि अब सवाल उठ रहा है कि क्या दिल्ली पुलिस बीजेपी के कपिल मिश्रा के उकसावे को कम करके पेश कर रही है।

मेरे घर से बम, पत्थर, एसिड नहीं मिला, जाकिर नाइक से मिलकर नहीं आया: आजतक के रिपोर्टर को कपिल मिश्रा ने लगाई लताड़, देखें वीडियो

दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में लगातार भाजपा नेता कपिल मिश्रा का नाम उछाला जा रहा है। इसे लेकर आज (सितंबर 24, 2020) उन्होंने स्पेशल सेल में शिकायत भी करवाई है। इसके बाद से सोशल मीडिया पर उनकी एक वीडियो वायरल हो रही है।

ये वीडियो आजतक के पत्रकार को बाइट देते वक्त की है। इस वीडियो में देख सकते हैं कि आजतक पत्रकार ने उनसे सीधे सवाल पूछ लिया कि आखिर वो क्यों छूटे हुए हैं।

पत्रकार के सवाल पूछने का ढंग ऐसा था जैसे उसका अर्थ हो कि जब इस पूरे मामले में इतने लोग गिरफ्तार किए जा रहे हैं, तो उनका (कपिल मिश्रा) नाम भी दंगे भड़काने में है, फिर पुलिस उन्हें क्यों नहीं गिरफ्तार कर रही है। पत्रकार ने कहा भी क्या उन्हें लगता है कि उनके पक्ष में चीजें जा रही है? इस सवाल को सुनते ही कपिल मिश्रा ने रिपोर्टर को करारा जवाब दिया।

कपिल मिश्रा ने कहा, “मैं बताता हूँ कि मैं क्यों छूटा हुआ हूँ। क्योंकि, मेरे घर से बम नहीं मिले। क्योंकि, मेरी छत पर पत्थर नहीं मिले। क्योंकि, मैंने गोलियाँ नहीं चलाईं। क्योंकि, मैं भीड़ लेकर मारने के लिए नहीं आया। क्योंकि, मैं तीन महीने पहले मलेशिया जाकर जाकिर नाइक से मिल कर नहीं आया। क्योंकि, मैंने भाषण नहीं दिया था कि ट्रंप के सामने आग लगा देंगे। क्योंकि, मैंने रतन लाल जी को कैसे मारना है इसके लिए चाँद बाग में मीटिंग नहीं की थी। इसीलिए मेरे खिलाफ़ सबूत नहीं मिल रहे हैं। जिन्होंने किया उनके ख़िलाफ़ सबूत मिल रहे हैं और सारी दुनिया के सामने सबूत हैं।”

वह कहते हैं, “देश में पहली बार हुआ है कि किसी दंगे के खुल कर सबूत दिख रहे हैं। उमर खालिद ने, खालिद सैफी ने, सफूरा जरगर ने, अपूर्वानंद ने कब मीटिंग की, कब कॉल की, कितने बजे फंड इकट्ठा किया, कितने बजे लोगों को मारने को कहा, कहाँ से पत्थर ऑर्डर किए, कहाँ से तेजाब ऑर्डर किया… अगर ये सारे सबूत मेरे खिलाफ़ मिल जाएँ तो मेरे ख़िलाफ़ भी केस कर देना।”

बता दें, आज तक पत्रकार से कपिल मिश्रा की इस बातचीत का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। खुद कपिल मिश्रा ने इसे शेयर किया है। साथ ही अन्य लोग भी अपने अकॉउंट से इसे शेयर करके सुनने की अपील कर रहे हैं।

एक यूजर ने सरकार से निवेदन किया है कि कपिल मिश्रा को वाई कैटेगरी की सुरक्षा मुहैया करवाई जाए, क्योंकि वह कई लोगों के निशाने पर हैं।

कश्मीर उच्च न्यायालय के वकील बाबर कादरी को आतंकियों ने गोली से भूना: दो दिन पहले ही जताई थी हत्या की आशंका

जम्मू कश्मीर में आतंकी लगातार आम लोगों को निशाना बना रहे हैं। गुरूवार को आतंकवादियों ने श्रीनगर में कश्मीर उच्च न्यायालय के अधिवक्ता बाबर कादरी की गोली मार कर हत्या कर दी। खबरों के मुताबिक, वकील कादरी श्रीनगर के हवाल इलाके में थे, जब आतंकियों ने पॉइंट ब्लैंक रेंज से उनपर गोलियों की बौछार कर दी। जिससे घटनास्थल पर ही उनकी मौत हो गई।

घटना के बाद उन्हें फ़ौरन शेर-आई-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती कराया गया था। स्थानीय समाचार एजेंसी जीएनएस ने चिकित्सा अधीक्षक डॉ. फारूक जान के हवाले से कहा कि बाबर कादरी को गोली लगी थी और अस्पताल में जब उन्हें लेकर आए थे तभी उनकी मौत हो चुकी थी।

बता दें, एक वकील होने के अलावा बाबर कादरी एक लेखक और एक टीवी पैनलिस्ट भी थे, जो नियमित रूप से टीवी समाचार चैनलों पर चर्चा में दिखाई देते थे।

उल्लेखनीय है कि दो दिन पहले कादरी ने आशंका व्यक्त की थी कि एजेंसियों के साथ काम करने का आरोप लगने के बाद उनकी जान को खतरा हो सकता है। उन्होंने 2 दिन पहले एक मैसेज का स्क्रीनशॉट पोस्ट किया था जहाँ शाह नजीर नामक एक व्यक्ति ने कहा था कि उन्हें एजेंसियों द्वारा प्रोजेक्ट किया जा रहा है, और इसीलिए उन्हें टीवी डिबेट में आने का चांस दिया गया था। बाबर कादरी ने संदेश का जवाब देते हुए कहा था कि वह एफआईआर दर्ज करने के लिए मैसेज का स्क्रीनशॉट साइबर सेल को भेजेंगे।

ट्विटर पर पोस्ट करते हुए उन्होंने कहा था, “मैं राज्य पुलिस प्रशासन से इस शाह नजीर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आग्रह करता हूँ, जिन्होंने मेरे खिलाफ दुष्प्रचार किया है कि मैं एजेंसियों के लिए काम करता हूँ। यह झूठा बयान मेरे जीवन के लिए खतरा बन सकता है।”

गौरतलब है कि कुछ साल पहले बाबर कादरी को कश्मीर बार एसोसिएशन ने निलंबित कर दिया था। वह वकीलों के क्लब ऑफ कश्मीर के अध्यक्ष थे। इस महीने की शुरुआत में बार एसोसिएशन ने निलंबन हटाने के उनके आवेदन को खारिज कर दिया था। विकास पर टिप्पणी करते हुए क़ादरी ने कहा था, “जब मैंने ‘वकील क्लब’ का गठन किया, तो मुझ पर भारतीय एजेंसियों की इशारों पर नाचने का आरोप लगाया गया था और अब जब मैं एकता के लिए काम करता हूँ और उनसे जुड़ना चाहता हूँ तो मेरे लिए रास्ते को ब्लॉक कर दिया गया है।”

बेंगलुरु दंगा मामले में NIA ने 30 जगहों पर की छापेमारी: मुख्य साजिशकर्ता सादिक अली गिरफ्तार, आपत्तिजनक दस्तावेज जब्त

बेंगलुरु हिंसा मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने दंगे के मुख्य साजिशकर्ता सयैद सादिक़ अली को गिरफ्तार कर लिया है। बता दें पिछले महीने डीजे हल्ली और केजी हल्ली क्षेत्रों में हुई हिंसा के संबंध में NIA ने बेंगलुरु के 30 स्थानों पर छापेमारी की थी।

NIA ने 44 वर्षीय सादिक अली के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि, जानलेवा दंगा भड़काने के बाद सब ही सादिक पुलिस की गिरफ्त से बाहर था। लगातार एजेंसी और स्थानीय पुलिस द्वारा उसकी खोजबीन जारी थी। 30 जगहों पर मारी गई छापेमारी को लेकर एनआईए ने बताया, तलाशी के दौरान एयरगन, छर्रों, तेज हथियार और लोहे की छड़ों को बरामद किया गया है। यह भी कहा कि छापों में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) से जुड़े कुछ डिजिटल डिवाइस और कई आपत्तिजनक दस्तावेज जब्त किए गए।

गौरतलब है कि इससे पहले NIA ने अपने बयान में कहा था, “SDPI के राज्य सचिव मुजम्मिल पाशा ने पहले एक मीटिंग बुलाई थी और इसमें उसने PFI/SDPI के सदस्यों को भीड़ को भड़काने और हिंसा के लिए उकसाने का निर्देश दिया था। इसके बाद उग्र भीड़ ने बेंगलुरु शहर के अंतर्गत आने वाले डीजे हल्ली, केजी हल्ली और पुलकेशी नगर इलाकों में दंगा भड़काया।”

NIA ने आगे मामले में यह भी कहा, कॉन्ग्रेस विधायक अखण्ड श्रीनिवास मूर्ति के कावेल बारासंडा में 11 अगस्त को उनके भतीजे नवीन द्वारा फेसबुक पर अपलोड किए गए कथित अपमानजनक पोस्ट के बाद 1000 से अधिक लोग वहाँ पर हो गए थे। नवीन के फेसबुक पोस्ट ने कथित तौर पर ‘मजहब विशेष की धार्मिक भावनाओं का अपमान’ किया था।

वहीं पिछले दिनों यह रिपोर्ट भी सामने आई थी कि बेंगलुरु में हुए दंगे पूर्व नियोजित थे, जिसमें जानबूझकर कर हिंदुओं और उनके घरों और वाहनों को निशाना बनाया गया था। दंगों में सुरक्षित बचे लोगों में से एक का दावा था कि उन्हें उर्दू में चेतावनी देते हुए कहा गया था कि वे अपने घरों के अंदर चले जाएँ वरना वे मारे जाएँगे। दंगों के दौरान, खास मजहब की किसी भी कार जिसमें चाँद या HKGN (हज़रत ख्वाजा ग़रीब नवाज़) का प्रतीक लगा था, उसपर हमला नहीं किया गया। हमला करने से पहले दंगाइयों ने सड़क पर खड़ी कारों के कवर तक को उठाकर यह पता लगाने की कोशिश की थी कि कार किसकी थी।

उन्होंने कहा, “दंगाइयों ने खासकर उस जगह हमला किया था जहाँ सीसीटीवी नहीं लगे थे। इसका साफतौर यह मतलब हुआ कि दंगों में स्थानीय लोग शामिल थे, जिन्हें पहले से पता था कि सीसीटीवी कहाँ-कहाँ लगे है। दंगाइयों ने पहले से यह सुनिश्चित किया था कि केवल दूसरे धर्म वालों को ही निशाना बनाना है। मजहब विशेष की गाड़ियों को छोड़कर,दूसरे धर्म से संबंधित सभी वाहनों पर हमला किया गया और क्षतिग्रस्त किया गया था।”

संसद के इतिहास में सबसे उत्पादक रहा यह मानसून सत्र: 10 दिन में पास हुए 25 विधेयक, उत्पादकता रही 167%

कोरोना वायरस के कारण संसद का मानसून सत्र 10 दिन में ही खत्म कर दिया गया। लोकसभा और राज्यसभा भी अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। इससे पहले 14 सितंबर से 23 सितंबर तक बिना किसी साप्ताहिक छुट्टी के संसद में रोज कार्यवाही चली। इस बीच 25 बिल पास किए गए।

इन विधेयकों के पास होने के साथ ही 17वीं लोकसभा के दूसरे मानसून सत्र ने संसद में एक नया इतिहास रच दिया। बता दें, इस सत्र की उत्पादकता 167 फीसद रही। अब से पहले केवल 8 वीं लोकसभा के तीसरे मानसून सत्र की उत्पादकता 163 फीसदी पहुँची, जिसे आज तक रिकॉर्ड माना जाता था।

आइए बताते हैं कि इस सत्र में पास होने वाले ये बिल कौन-कौन से हैं व इन्हें कौन सी तारीख को पास किया गया?

14 सितबंर 2020:

लोकसभा के मानसून सेशन में आयुष मंत्रालय (Ayush Ministry) के दो बिल सर्वसम्मति से पास कर दिए गए। लोकसभा में नेशनल कमीशन फॉर होम्योपैथी बिल 2020 और नेशनल कमीशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन बिल 2020 को पास कर दिया गया। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने आयुष मंत्री श्रीपद नायक की अनुपस्थिति में दोनों बिल निचले सदन में पेश किए थे।

15 सितंबर 2020

लोकसभा में द सैलरी एंड अलाउंस ऑफ मिनिस्टर्स अमेंडमेंट बिल- 2020 पास किया गया। इस बिल के अनुसार अब मंत्रियों व सांसदों के वेतन और भत्तों में 30 फीसदी की कटौती की जा सकती है।

16 सितंबर 2020

बैंकिंग रेगुलेशन बिल 2020, इस नए कानून के तहत अब देशभर के सहकारी बैंक आरबीआई की देखरेख में काम करेंगे। इस बिल में यह संशोधन जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए लाया गया है, ताकि पीएमसी बैंक घोटाला जैसे स्कैम से बचा जा सके।

केंद्र सरकार ने देश में co-operative banks की लगातार बिगड़ती वित्तीय स्थिति और घोटाला (Scam) के मामले सामने आने के बाद बैंकिंग रेगुलेशन ऐक्ट, 1949 में संशोधन का फैसला किया था।

17 सितंबर 2020

कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020: इस विधेयक के तहत सरकार की योजना है कि एक फसल उत्पाद को लेकर ऐसा तंत्र विकसित हो जहाँ किसान मनचाहे स्थान पर फसल बेच सकें। इसके जरिए किसान अपनी फसल का सौदा सिर्फ अपने ही नहीं बल्कि दूसरे राज्य के लाइसेंसी व्यापारियों के साथ भी कर सकते हैं।

कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक में, किसानों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था का प्रावधान है। भुगतान सुनिश्चित करने हेतु प्रावधान है कि देय भुगतान राशि के उल्लेख सहित डिलीवरी रसीद उसी दिन किसानों को दी जाएँ। मूल्य के संबंध में व्यापारियों के साथ बातचीत करने के लिए किसानों को सशक्त बनाने हेतु प्रावधान है कि केंद्र सरकार, किसी भी केंद्रीय संगठन के माध्यम से, किसानों की उपज के लिए मूल्य जानकारी और मंडी आसूचना प्रणाली विकसित करेगी।

18 सितंबर 2020

इस संसद सत्र में विनियोग विधेयक (संख्या 3), विनियोग विधेयक (संख्या 4) भी पारित किए गए। विनियोग (संख्या 4) विधेयक, 2020 वित्त वर्ष 2020-21 की सेवाओं के लिए भारत की संचित निधि से कुछ और धन के भुगतान को अधिकृत करता है। वहीं विनियोग (संख्या 3) विधेयक, 2020 भारत की संचित निधि से 31 मार्च, 2017 को समाप्त हुए वित्त वर्ष के दौरान कुछ सेवाओं पर खर्च राशि की पूर्ति के लिए धन के विनियोजन को अधिकृत करता है। ये राशि इन सेवाओं के लिए और उस वर्ष के लिए प्रदान की गई राशि के अतिरिक्त है।

19 सितंबर 2020

कराधान और अन्य कानून विधेयक 2020: इसमें विधेयक में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कानूनों में नियमों के अनुपालन संबंधी कुछ बदलाव किए गए हैं। विधेयक में आयकरदाताओं को पिछले वित्त वर्ष (2019- 20) की रिटर्न दाखिल करने के मामले में समयसीमा को बढ़ाया गया है।

इसके साथ ही स्थायी खाता संख्या (पैन) को आधार से जोड़ने की समयसीमा को भी बढ़ा दिया गया है। विधेयक में प्रधानमंत्री के आपात स्थिति नागरिक सहायता एवं राहत कोष (पीएम केयर्स फंड) में दिए गए अनुदान पर कर लाभ देने का भी प्रावधान किया गया है।

कंपनी (संशोधन) विधेयक, मॉनसून सत्र के छठे दिन लोकसभा में कंपनी संशोधन विधेयक 2020 भी पास हुआ। यह कंपनी अधिनियम में संशोधन कर तकनीकी और अन्य छोटी गलतियों को फौजदारी अपराध की श्रेणी से हटाकर दीवानी अपराध की श्रेणी में डालने, छोटी कंपनियों पर जुर्माना कम करने और उनके लिए कारोबार आसान बनाने के लिए पास हुआ।

20 सितंबर 2020

सत्र के एक हफ्ते बाद राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय विधेयक, 2020 को संक्षिप्त चर्चा के बाद मंजूरी मिली। इस विधेयक में गुजरात में एक राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है।

इसी प्रकार राष्ट्रीय न्यायालयिक विज्ञान विश्वविद्यालय विधेयक, 2020 में गुजरात फॉरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय फॉरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय के रूप में उन्नयन करने का प्रस्ताव किया गया है।

इसके अलावा मंत्रियों के वेतन और भत्ते (संशोधन) विधेयक, अर्हित वित्तीय संविदा द्विपक्षीय नेटिंग विधेयक को भी इसी दिन मंजूरी मिली।

21 सितंबर 2020

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक; दि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (दूसरा संशोधन) विधेयक; महामारी रोग (संशोधन) विधेयक; फैक्टरिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक पास किए गए।

22 सितंबर 2020

सत्र के 9वें दिन कई विधेयकों को पारित किया गया। इनमें केंद्रीय परिषद (संशोधन) विधेयक; भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद (संशोधन) विधेयक; जम्मू और कश्मीर आधिकारिक भाषा बिल व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य की स्थिति कोड; औद्योगिक संबंध कोड; सामाजिक सुरक्षा कोड शामिल थे।

23 सितंबर 2020

महापत्तन प्राधिकरण विधेयक (The Major Port Authorities Bill) 2020 को मंजूरी दे दी जिसमें देश में बंदरगाहों के विनियमन, प्रचालन और योजना के लिए तथा महापत्तन प्राधिकरण के बोर्डों में ऐसे बंदरगाहों के प्रशासन, नियंत्रण और प्रबंधन के संबंध में प्रावधान हैं।

महिलाओं को समानता, फिक्स्ड टर्म रोजगार, रिस्किलिंग फंड सहित मोदी सरकार द्वारा श्रम कानून में सुधार के बाद उठ रहे 5 सवालों के जवाब

वर्तमान संसद सत्र में मोदी सरकार ने श्रम कानून सुधार के लिए तीन विधेयक राज्यसभा में पास कर दिए । इनके नाम- ‘व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य कोड (OSH Code), औद्योगिक संबंध कोड (Industrial Relations Code), सामाजिक सुरक्षा कोड (Code on Social Security) हैं।

केंद्र सरकार ने कहा है कि 100 से ज्यादा राज्य और 40 से ज्यादा केंद्र के कानून हैं जो श्रम के विभिन्न पहलुओं को नियंत्रित करते हैं जैसे औद्योगिक विवाद, कार्य करने की स्थिति, सामाजिक सुरक्षा और मजदूरी का संकल्प आदि। उन्होंने बताया कि श्रम पर बने दूसरे राष्ट्रीय आयोग (2002) ने मौजूदा कानूनों को पुराने प्रावधानओं और असंगत परिभाषा के साथ बहुत जटिल पाया, इसलिए इनमें सुधार लाने के लिए आयोग ने केंद्र से इस संबंध में सिफारिश की।

साल 2019 में श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने 29 कानून को खत्म करने के लिए 4 बिल बनाए। इनमें वेतन सुरक्षा संहिता साल 2019 में संसद से पास हो गई थी जबकि अन्य को स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजा गया। इसके बाद कमेटी ने तीनों विधेयकों पर अपनी रिपोर्ट जमा की और मोदी सरकार ने उन विधेयकों को नए बिल के साथ 19 सितंबर को रिप्लेस कर दिया और फिर उपरोक्त तीनों संहिताएँ भी पास हो गईं।

अब इन्हीं संहिताओं को लेकर तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं। इसीलिए आज हम आपको इनसे जुड़े पाँच सवालों का जवाब देने जा रहे हैं।

औद्योगिक संबंध संहिता 2020: यह संहिता श्रम कानून के मुख्य तीन कानून को रिप्लेस करती है

  1. औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947।
  2. द ट्रेड यूनियंस एक्ट, 1926।
  3. औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946।

प्रश्न-1: 300 से ज्यादा श्रमिक रखने वाली यूनिटें बिना सरकार की अनुमति के श्रमिकों को नियुक्त और बर्खास्त कर सकती हैं, इसलिए हो सकता है इससे श्रमिकों की नियुक्ति और उनकी बर्खास्तगी में बढ़ोतरी हो?

आईआर संहिता में छटनी, क्लोजर या जबरन छटनी में थ्रेसहोल्ड को 100 श्रमिक से बढ़ाकर 300 श्रमिक करने की बात है। इस पर श्रम मंत्री ने खुद बताया है कि श्रम एक समवर्ती सूची का विषय है और संबंधित राज्य सरकारों को भी अपनी परिस्थितियों के अनुरूप श्रम कानूनों में परिवर्तन करने का अधिकार है।

इसी अधिकार का उपयोग करते हुए 16 राज्य, पहले ही अपने यहाँ यह सीमा बढ़ा चुके हैं। संसदीय स्थायी समिति ने भी यह सिफारिश की थी कि इस सीमा को बढ़ा कर 300 कर दिया जाए।

इसके अतिरिक्त इस प्रावधान का एक पक्ष यह भी होता है कि ज्यादातर संस्थान, 100 से अधिक श्रमिकों को अपने संस्थान में नहीं रखना चाहते हैं, जिससे अनौपचारिक रोजगार को बढ़ावा मिलता है।

श्रम मंत्री ने इस विषय में बताते हुए उल्लेख किया कि आर्थिक समीक्षा-2019 के अनुसार राजस्थान राज्य में इस सीमा को 100 से 300 करने के बाद, बड़ी फैक्ट्रियों की संख्या के साथ-साथ, श्रमिकों के रोजगार सृजन में भी बढ़ोत्तरी हुई है तथा छटनी के मामलों में अभूतपूर्व कमी आई है।

इसलिए इससे यह स्पष्ट होता है कि इस एक प्रावधान को बदलने से देश में बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों को स्थापित करने के लिए निवेशक प्रेरित होंगे और ज्यादा संख्या में बड़ी फैक्ट्रियों के स्थापित होने से, रोजगार के कहीं ज्यादा अवसर, हमारे देश के श्रमिकों के लिए उत्पन्न होंगे।

यहाँ यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि इसमें ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि 300 श्रमिकों तक संख्या बढ़ाने से श्रमिकों की नियुक्ति और उनका निलंबन में बढ़ोतरी होगी। हाँ, इसमें यह जरूर स्पष्ट किया गया है कि यदि किसी भी श्रमिक की नौकरी छूट जाती है तो दोबारा उसके रोजगार की संभावना बढ़ाने के उद्देश्य से आईआर संहिता में पहली बार पुनः कौशल (रि स्किलिंग) फंड का प्रावधान किया गया है। इन श्रमिकों को इसके लिए 15 दिन का वेतन दिया जाएगा।

प्रश्न- 2: क्या ‘फिक्सड टर्म एंप्लॉयमेंट’ से नियुक्ति और बर्खास्तगी की शुरुआत नहीं होगी?

कई लोगों द्वारा, ‘फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट’ की शुरुआत को एक नए नियम के रूप में देखा जा रहा है, जिसे मोदी सरकार लेकर आई। हालाँकि, बता दें कि केंद्र सरकार और 14 अन्य राज्यों द्वारा फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट को पहले ही अधिसूचित किया जा चुका है। इन राज्यों में असम, बिहार, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, एमपी, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, यूपी, और उत्तराखंड शामिल हैं।

पहले एक नियोक्ता केवल पर्मानेंट एंप्लॉय या कॉन्ट्रैक्ट पर एंप्लॉय को रख सकता था। इससे कई बाध्यता उत्पन्न होती थीं। कई बार नियोक्ता को अकुशल श्रमिक को बिना किसी कमिटमेंट के भी रखना पड़ता था। इसके अलावा यह भी आरोप लगते थे कि ठेकेदार न्यूनतम वेतन, ईपीएफ, और ईएसआईसी जैसे लाभों के मामले में खुद तो पूरी राशि ले लेता मगर कॉन्ट्रैट वाले श्रमिकों को वही चीज पास नहीं करता।

हालाँकि, अब फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट की शुरुआत के साथ, नियोक्ता सीधे बिचौलिए के बिना कर्मचारी के साथ एक निश्चित अवधि का कॉन्ट्रैक्ट कर सकता है। एक फिक्सड टर्म कर्मचारी को नियमित कर्मचारी जैसे फायदे देने की बात भी इसमें है। इसलिए फिक्सड टर्म एंप्लॉयमेंट श्रमिकों या कर्मचारियों के हित में हुआ सुधार है, जिसे इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड ने प्रस्तावित किया है।

Fixed Term Employment को मान्यता से, अब श्रमिकों को ठेका मजदूरी के स्थान पर Fixed Term Employment का विकल्प मिलेगा। यानी अब उन्हें Regular Employee के समान काम के घंटे, वेतन वा सामाजिक सुरक्षा मिलेगी।

व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य कोड

इस संहिता ने 13 कानूनों को अपने में समेकित किया है जो स्वास्थ्य सुरक्षा और काम करने की स्थिति आदि को नियंत्रित करते थे। इनमें फैक्ट्रीज एक्ट 1948, द माइन्स एक्ट 1952 और कॉन्ट्रैक्ट लेबर एक्ट, 1970 मुख्य रूप से शामिल हैं।

प्रश्न-3: अंतर-राज्य प्रवासी कर्मचारी की परिभाषा अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिक अधिनियम, 1979 अधिनियम और नए कोड में भिन्न है – क्या यह भ्रम पैदा करेगा?

अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिक अधिनियम, 1979 को व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य कोड में रखा गया है। वहीं, पूर्ववर्ती अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों को OSH कोड में और मजबूत किया गया है। ऐसे ही अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिक की परिभाषा सामाजिक सुरक्षा कोड और OSH कोड में समान है।

अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिक की परिभाषा अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिक अधिनियम, 1979 में बहुत ही सीमित थी। यह बताता था कि एक व्यक्ति जो एक राज्य में एक ठेकेदार के माध्यम से दूसरे राज्य में रोजगार के लिए भर्ती किया जाता है, एक ‘अंतर-राज्य’ प्रवासी कर्मचारी’ है।

वहीं, OSH कोड प्रवासी कार्यकर्ता की परिभाषा को उन श्रमिकों को शामिल करने के लिए विस्तारित करता है, जिन्हें कॉन्ट्रैक्टर के अलावा नियोक्ता द्वारा सीधे नियुक्त किया जाएगा। इसके अलावा, अब यह भी संभव हो गया है कि एक प्रवासी, जो किसी राज्य में अपने दम पर आता है, आधार की मदद से इलेक्ट्रॉनिक पोर्टल पर पंजीकरण करके खुद को एक प्रवासी श्रमिक घोषित कर सकता है। ये प्रक्रिया बेहद आसान है और इसके लिए आधार के सिवा कोई डॉक्यूमेंट की आवश्यकता नहीं होती।

इतना ही नहीं, इसमें असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का राष्ट्रीय डाटा बेस बनाया जाएगा, जहाँ पर सेल्फ रजिस्ट्रेशन करना होगा। इस संहिता में प्रवासी मजदूरों के लिए हेल्पलाइन का कानूनी प्रवाधान है। इन्हें राशन, भवन निर्माण कामगारों के लिए ईपीएफओ, ईएसआईसी, मातृत्व लाभ, ग्रेच्युटी तथा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा फंड से संबंधित उपबंध शामिल हैं।

प्रश्न-4: महिलाओं के लिए रात की शिफ्ट रखना क्या उनकी सुरक्षा से समझौता नहीं है।

कार्यस्थलों पर लिंग समानता की माँग बहुत लंबे समय से उठ रही थी। OSH कोड यह सुनिश्चित करता है कि कार्यस्थलों और महिलाओं में लैंगिक समानता बनी रहे। श्रम एवं रोजगार मंत्री ने कहा है कि महिलाओं को पुरुषों के समान ही कार्य करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए तब ही हम नवीन भारत का निर्माण कर पाएँगे। इसलिए पहली बार हमने यह प्रावधान किया है कि महिलाएँ किसी भी प्रकार के संस्थान में अपनी स्वेच्छानुसार रात में भी काम कर सकेंगी। परन्तु, नियोक्ता को इसके लिए, उपयुक्त सरकार द्वारा निर्धारित, सभी आवश्यक सुरक्षा प्रबंध करने पड़ेंगे।

प्रश्न 5: क्या नई संहिताओं में कल्याणकारी प्रावधान कम किए गए हैं?

नई संहिता को लेकर कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि इसमें कल्याणकारी प्रावधानों को कम कर दिया गया है। या इससे श्रमिकों के अधिकार और कल्याण प्रभावित होंगे। हालाँकि यह सभी आरोप सच्चाई से बहुत दूर हैं क्योंकि इन सुधार विधेयकों के जरिए नए कर्मचारियों के कल्याण का ही काम हुआ है

संहिताओं में कल्याणकारी प्रावधान

  • ESIC का विस्तार किया जाएगा।
  • देश के 740 जिलों में ESIC की सुविधा होगी, अभी ये सुविधा फिलहाल 566 जिलों में ही है।
  • खतरनाक क्षेत्र में काम कर रहे संस्थानों को अनिवार्य रूप से ESIC से जोड़ा जाएगा, चाहे 1 ही श्रमिक काम क्यों ना करता हो।
  • पहली बार 40 करोड़ असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को ESIC से जोड़ा जाएगा। 
  • बागान श्रमिक भी ESI के दायरे में आएँगे।
  • दस से कम श्रमिक वाले संस्थानों को भी स्वेच्छा से ESI का सदस्य बनने का विकल्प होगा।
  • बीस से अधिक श्रमिकों वाले संस्थान EPFO की कवरेज में आएँगे।
  • असंगठित क्षेत्र के स्वरोजगार से जुड़े श्रमिकों को भी EPFO में लाने की योजना बनाई जाएगी।
  • जिस भी कंपनी में 20 से अधिक श्रमिक काम कर रहे हैं। उस संस्थान को रिक्त पदों की जानकारी Online Portal पर देनी अनिवार्य होगी।

आंध्र प्रदेश में 6 हिंदू मंदिरों पर हुए हमले, क्या यह सब जगन रेड्डी सरकार की मर्जी से हो रहा: TDP नेता ने लगाए कई गंभीर आरोप

तेलुगु देशम पार्टी के नेता जयदेव गल्ला ने राज्य में हिंदू मंदिरों पर हालिया हमलों के लिए आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ युवजन श्रमिक रायथू (YSR) कॉन्ग्रेस पार्टी को दोषी ठहराया है। गल्ला ने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के लिए राज्य सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि वाईएसआर पार्टी ऐसे हमलों से लाभान्वित हो रही है।

TDP नेता जयदेव गल्ला ने कहा, “इस साल फरवरी महीने के बाद से आंध्र प्रदेश में हिंदू मंदिरों पर 6 हमले हुए हैं। अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं की गई है। अपराधी अब डर नहीं रहे हैं। क्या यह सब राज्य सरकार की मर्जी से हो रहा है? क्या YSR पार्टी इस प्रकार की हिंसा का लाभ उठा रही है? हाँ, वह लाभ उठा रही है।”

राज्य में हाल ही में हिंदू मंदिरों पर हमले की घटनाएँ बढ़ रही हैं। अभी कुछ दिन पहले कृष्णा जिले के वत्सवई मंडल में मककपेटा गाँव में ऐतिहासिक काशी विश्वेश्वर स्वामी मंदिर के अंदर नंदी की मूर्ति को कुछ बदमाशों ने खंडित कर दिया था।

आए दिन हो रहे हमलों को रोकने में नाकामयाब वाईएसआर सरकार पर विपक्ष ने हमला किया था। पूर्व सीएम चंद्रबाबू नायडू ने मंदिरों पर हमलों की निंदा नहीं करने के लिए सीएम वाईएस जगन मोहन रेड्डी की आलोचना की थी। वहीं विपक्षी नेताओं द्वारा मंदिरों पर हमले की अनुमति देने के आरोपों से घिरे सीएम रेड्डी ने आज तिरुमाला चित्तूर में बालाजी मंदिर का दौरा किया।

पवन कल्याण और बीजेपी कार्यकताओं द्वारा भूख हड़ताल

इस महीने की शुरुआत में, आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के अंटारवेडी में प्रसिद्ध श्री लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर के परिसर में 62 साल पुराने प्राचीन रथ को आग लगा कर नष्ट कर दिया गया था। जिस पर सख्त कार्रवाई की माँग को लेकर टॉलीवुड अभिनेता और जन सेना प्रमुख पवन कल्याण कई भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ भूख हड़ताल पर बैठ गए थे।

कल्याण ने आरोप लगाया था कि राज्य में रेड्डी शासन के तहत हिंदू मंदिरों पर हमले बढ़ गए है। उन्होंने कहा कि सरकार ने समय पर कार्रवाई की होती तो ऐसे हमलों से बचा जा सकता था। राज्य सरकार ने बाद में इस मामले में सीबीआई जाँच के आदेश दिए थे।

अक्षरधाम मन्दिर हमला: 18 साल पहले जब 2 आतंकवादियों ने हमारी आस्था पर किया था प्रहार

इस हमले में 30 श्रद्धालुओं, एक राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी व एक कमांडो ने अपनी जान की आहुति दी थी। गंभीर रूप से घायल एक और कमांडो ने दो वर्षों तक अस्पताल में अपने जीवन के लिए संघर्ष करते हुए मृत्यु का वरण किया। 

आज से 18 वर्ष पहले 24 सितम्बर 2002 को, दो आतंकवादियों ने गुजरात के गाँधीनगर स्थिति अक्षरधाम मन्दिर पर हमला किया था, जिसमें 30 व्यक्ति मारे गए तथा 80 घायल हुए थे। माना जाता है कि इस हमले के पीछे लश्कर-ए-तोयबा का हाथ था। यहाँ उन घटनाओं का क्रमानुसार वर्णन पढ़िए, जो हमले के समय घटित हुई थी।

24 सितम्बर को 2 आतंकियों का मन्दिर परिसर में प्रवेश 

रिपोर्ट्स के अनुसार, हमले के दिन शाम 4 बज कर 45 मिनट पर अक्षरधाम मंदिर परिसर के द्वार संख्या 3 पर दोनों आतंकियों को छोड़ा गया। जहाँ से उन्होंने परिसर में घुसने का प्रयास किया लेकिन उन्हें वहाँ BAPS के स्वयंसेवकों द्वारा सुरक्षा जाँच हेतु रोक लिया गया। बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) वो संस्था है, जो मंदिर का प्रबंधन संभालती है। 

आतंकवादी सुरक्षा जाँच को छोड़ कर एक ऊँची बाड़बंदी को फाँद कर मंदिर परिसर में दाखिल हुए। वे मंदिर परिसर में निर्मित मनोरंजन पार्क से होते हुए गोलीबारी करते हुए आगे बढ़े। वे निर्दोष श्रद्धालुओं पर गोलाबारी करते हुए, ग्रेनेड फेंकते हुए तेजी से मंदिर के मुख्य मार्ग की ओर बढ़ने लगे। इस हमले को देखते हुए मंदिर के पर्यवेक्षक खोद सिंह जाधव व बीएपीएस स्वयंसेवकों ने मुख्य मंदिर में स्थिति स्वयंसेवकों को सम्पर्क किया तथा तुरंत मुख्य मंदिर का द्वार बंद करने के लिए कहा। 

मुख्यमंत्री कार्यालय को हमले की सूचना दी गई 

लगभग 4 बज के 48 मिनट पर मुख्यमंत्री कार्यालय को इस हमले की सूचना दी गई। इसके 15 मिनट बाद राज्य पुलिस तथा कमांडो इकाइयाँ मंदिर परिसर में पहुँच गई। उन्होंने मंदिर में स्थिति सैकड़ों श्रद्धालुओं को सुरक्षित बाहर निकाला तथा अनेक स्थानीय लोग भी स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सहायता के लिए आगे आए, जिन्होंने घायलों को अस्पताल पहुँचाने में मदद की।

आतंकियों ने बदला अपना लक्ष्य

जब आतंकियों को यह लगने लगा कि वो मंदिर के मुख्य दरवाजे को नहीं खोल सकते तो वो प्रदर्शनी हॉल संख्या 1 में पहुँचे, जहाँ एक मल्टीमीडिया शो चल रहा था। उन्होंने हॉल में मौजूद पुरुषों, महिलाओं और बच्चों पर अंधाधुंध गोलीबारी की, जिससे कइयों की मृत्यु हुई, कुछ घायल हुए। प्रदर्शनी हॉल में मारकाट मचाने के बाद वे परिक्रमा मार्ग में छुप गए। 

फँसे हुए श्रद्धालुओं को निकालने का काम जारी रहा 

सुरक्षा बलों के जवानों ने मंदिर में परिसर में छिपे आतंकियों को खोजने के साथ हमले में फँसे श्रद्धालुओं को धीरे-धीरे सुरक्षित निकालना प्रारंभ किया। मुख्य मंदिर में उपस्थित श्रद्धालुओं को भी लगभग 7:30 बजे तक सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। जब आतंकियों को ये लगा कि अब उनके बचने का कोई मार्ग शेष नहीं है, तो वो परिक्रमा क्षेत्र से बाहर कूद कर मौजूदा कमांडो बल पर गोलाबारी करने लगे।

NSG को बुलाया गया

शाम के लगभग 5:15 बजे तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने तब के उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवानी से बात की तथा इस स्थिति से निपटने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के जवानों की माँग की। रात के लगभग 10:10 बजे तक NSG गार्ड्स अक्षरधाम पहुँचे तथा करीब 11:30 बजे से उन्होंने अपना ऑपरेशन प्रारंभ कर दिया। आतंकी आधी रात के समय अपनी जान बचाने के लिए परिसर में निर्मित शौचालय में छिप गए। तब तक रैपिड एक्शन फ़ोर्स, सीमा सुरक्षा बल, राज्य रिजर्व पुलिस तथा आतंकवाद निरोधक दस्ते सहित कई सुरक्षा एजेंसियाँ मंदिर परिसर में पहुँच चुकी थीं। 

अगले दिन सुबह मारे गए आतंकी

सूरज के उगते ही आतंकियों की अधीरता बढ़ने लगी। वे सुरक्षा बलों पर लगातार गोलीबारी करने लगे। सुबह के लगभग 6:45 बजे कमांडो इन आतंकियों को मारने में सफल रहे, जो प्रदर्शनी हॉल संख्या 3 के समीप झड़ियों में छिपे हुए थे। 

अनेक जानें चली गईं

इस हमले के दौरान 30 श्रद्धालुओं, एक राज्य पुलिस अधिकारी तथा एक कमांडो ने अपनी जान गँवाई। एक अन्य कमांडो गंभीर रूप से घायल हुए, जो दो वर्षों तक अस्पताल में जीवन-मृत्यु का युद्ध लड़ने के बाद अंततः वीरगति को प्राप्त हुए।

अक्षरधाम मन्दिर को पुनः खोला गया 

राज्य सरकार व मंदिर प्रबंधन द्वारा मंदिर की सुरक्षा हेतु विभिन्न नए उपाय करने तथा सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने के बाद 7 अक्टूबर 2002 को मंदिर परिसर पुनः श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया।

इस मामले में अदालत ने 6 व्यक्ति को दोषी ठहराया और उन्हें सजा भी दी लेकिन 2014 में सबूतों की कमी के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें छोड़ दिया। इस मामले में फरार एक अन्य आरोपी को ATS ने बाद में 2019 में जम्मू-कश्मीर से गिरफ्तार किया।