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‘गोबर मूत्र पीने वाला… जिन्दा जलाओ हराम के औलाद को… रसूलल्लाह की शान में गुस्ताखी’ – बेंगलुरु दंगे के बाद खतरे में नवीन

पैगंबर मोहम्मद को लेकर सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट से बेंगलुरु में संप्रदाय विशेष की भीड़ द्वारा किए गए दंगों से ऐसी हिंसा भड़की कि इस तोड़-फोड़ और आगजनी में तीन लोगों की मौत हो गई और करीब 60 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हो गए।

गत मंगलवार, यानी 11 अगस्त की रात को बेंगलुरु के पुलाकेशी नगर में पैगंबर मोहम्मद को लेकर एक पोस्ट से नाराज संप्रदाय विशेष के लोगों ने कॉन्ग्रेस विधायक अंखंड श्रीनिवास मूर्ति के आवास के बाहर जमकर उत्पात, तोड़-फोड़ और आगजनी की।

संप्रदाय विशेष के आक्रोशित लोगों की भीड़ ने पुलाकेशी नगर के विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के आवास और डीजे हल्ली थाने को निशाना बनाया, क्योंकि कॉन्ग्रेस विधायक के भतीजे नवीन द्वारा पैगम्बर मोहम्मद को लेकर एक कथित आपत्तिजनक टिपण्णी की गई थी।

सोशल मीडिया पर अभी तक भी नवीन को लेकर संप्रदाय विशेष के युवकों में गुस्सा देखा जा रहा है और उसे जान से मारने की बातें कही जा रहीं हैं। इन्हीं में से एक ‘ज्वाइन AIMIM’ नाम के फेसबुक ग्रुप में नवीन की तस्वीर शेयर की गई हैं, जिसके कमेंट्स में नवीन को लेकर बेहद भयावह टिप्पणियाँ की जा रही हैं।

आरिफ खान नाम के युवक द्वारा नवीन की एक तस्वीर शेयर की गई है, जिसमें संदेश लिखा है – “यही वो कॉन्ग्रेस MLA का नेफ्यू है, जिसने रसूलल्लाह की शान में गुस्ताखी की है..।”

इस पोस्ट के कमेंट्स में सलमान अंसारी और सरताज ने नवीन को ‘लानत’ दी हैं। अन्सीर बाशा ने लिखा है – “इस को फॉरवर्ड मत करो, सब्र करो और इसका हश्र देखो आगे।”

मुराद आलम ने लिखा है – “इसको मारो।”

शादाब अंसारी ने पैगम्बर के कथित अपमान करने के पर नवीन के लिए लिखा है – “इसको तो चौक पर खड़ा कर के जिन्दा जला दिया जाए, वो भी सजा कम है इस हराम के औलाद को।”

वहीं, मोहम्मद सलीम मंसूरी ने नवीन के लिए उसी भाषा का इस्तेमाल किया है, जो कि पुलवामा आतंकी हमले के मुख्य अभियुक्त अहमद डार ने इस्तेमाल की । सलीम मंसूरी ने लिखा है – “शैतान की औलाद गुफाओं में पैदा हुआ है, ये हरामखोर हरामी गन्दगी पनौती गोबर मूत्र पैशाब पीने वाला हराम की औलाद सूअर शक्ल से लग रहा है गंदगी 1001 %%%%%%%%%% से ज्यादा सत्य है, सच है, इसकी मौत तय है 1001%।”

जावेद खान ने लिखा है – “गोली मारो कुत्ते को।”

इस पूरे पोस्ट में कई लोगों ने नवीन को गोली मारने और जान से मार देने की बात की हैं। जैसा कि इस स्क्रीनशॉट में आप देख सकते हैं –

उल्लेखनीय है कि बेंगलुरु में संप्रदाय विशेष की भीड़ द्वारा किए गए दंगों के दौरान संप्रदाय विशेष की उग्र भीड़ डीजे हल्ली पुलिस स्टेशन के बेसमेंट में घुस गई और कथित तौर पर 200-250 वाहनों में आग लगा दी। खबरों के मुताबिक, कॉन्ग्रेस विधायक के आवास पर तोड़फोड़ करने वाली संप्रदाय विशेष की भीड़ ने मंगलवार (अगस्त 11, 2020) को पुलिस थाने में यह मानकर तोड़फोड़ और वाहनों को क्षतिग्रस्त किया कि पुलिस ने आरोपितों को हिरासत में रखा है।

जिन पुलिसकर्मियों ने दंगाइयों को रोकने की कोशिश की, उन पर भी संप्रदाय विशेष की भीड़ ने हमला किया, जिसके परिणामस्वरूप 60 से अधिक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। मंगलवार रात पूर्वी बेंगलुरु में भड़की इस हिंसा में 3 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए।

सड़क 2 ने ‘अंग्रेजों’ को भी पिछड़ा: 58 लाख से ज्यादा डिसलाइक, यूट्यूब पर ‘Top-10’ वीडियो में शामिल

12 अगस्त को रिलीज होने के साथ ही ‘सड़क 2’ का ट्रेलर यूट्यूब पर ट्रेंड कर रहा है। महेश भट्ट द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म के ट्रेलर को 24 घंटे के भीतर ही 19 मिलियन से ज्यादा बार देखा जा चुका है। लेकिन ‘सड़क 2’ के ट्रेलर को अब तक 5.8 मिलियन (58 लाख) से ज्यादा बार डिस्लाइक किया चुका है, जो कि अपने आप में बेहद ही खराब रिकॉर्ड है। जबकि इस ट्रेलर को देखकर इसे पसंद या लाइक करने वालों की संख्या महज तीन लाख के आसपास है।

बता दें कि महेश भट्ट की यह मूवी जल्द ही दुनिया की सबसे ज्यादा डिसलाइक वीडियो में शामिल हो चुकी है। सड़क 2 के ट्रेलर ने ज़ूमिंग पास्ट के सबसे खराब प्रदर्शित वीडियो स्वीडिश गमेर पिउडाईपाई के रिकॉर्ड को भी पछाड़ दिया है। वर्तमान में सड़क 2 भारत की सबसे ज्यादा डिसलाइक वीडियो बन गई है। इसके ट्रेलर ने यूट्यूब पर कॉल ऑफ ड्यूटी: इनफिनिट वारफेयर डेविल के ट्रेलर को काफी मार्जिन के साथ पीछे छोड़ दिया है।

वहीं अब सड़क 2 सोशल मीडिया प्लेटफार्म में टॉप 10 मोस्ट डिसलाइक वीडियो में शामिल हो चुका है। यूट्यूब के सबसे डिसलाइक किरदार जेक पॉल, जिसे अब तक 4.9 मिलियन डिसलाइक मिल चुके है, सड़क 2 के इस ट्रेलर ने उसके भी रिकॉर्ड को तोड़ दिया है।

दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड के बाद से ही लोग फिल्म निर्देशक महेश भट्ट और उनकी बेटी आलिया भट्ट को सोशल मीडिया पर लगातार ट्रोल करते नजर आ रहे हैं। सुशांत के चाहने वाले इन पर नेपोटिज्म का आरोप लगा रहे हैं। सड़क 2 के लॉन्च के साथ ही लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया यूज़र्स ट्विटर पर #Sadak2dislike के साथ इस पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं।

गौरतलब है कि YouTube पर अपने प्रीमियर के कुछ ही घंटों के भीतर सड़क 2 के ट्रेलर को 1.3 मिलियन डिसलाइक मिल चुके थे। जिस वजह से वीडियो स्ट्रीमिंग साइट पर यह अब तक का सबसे अधिक नापसंद करने वाला ट्रेलर बन गया था। ज्ञात हो कि सड़क-2 फ़िल्म, 28 अगस्त को डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज करने की घोषणा हुई है।

सोशल मीडिया पर इस दौरान ‘अनइंस्टॉल हॉटस्टार’ ट्रेंड होता रहा क्योंकि लोगों का कहना है कि इस फिल्म में केवल नेपोटिज्म के प्रोडक्ट्स भरे पड़े हैं, जिन्हें महेश भट्ट आगे बढ़ा रहे हैं। चूँकि इसे ‘डिजनी हॉटस्टार’ पर रिलीज किया जाना है, इसीलिए इसका विरोध हो रहा है। सोशल मीडिया में कई लोगों ने हॉटस्टार को अनइंस्टॉल कर के स्क्रीनशॉट्स भी शेयर किए। अब एक और कारण से फिल्म का विरोध हो रहा।

ये कारण है- इस फिल्म की कहानी। हम जानते हैं कि बॉलीवुड में अक्सर पंडितों और साधु-संतों को धोखेबाज और बलात्कारी दिखाया जाता रहा है जबकि संप्रदाय विशेष के किरदारों को ईमानदार और देश के लिए मर-मिटने वाला प्रदर्शित किया जाता रहा है। इसी तरह ‘सड़क-2’ में भी महेश भट्ट एक ऐसी कहानी लेकर आ रहे हैं, जिसमें एक साधु को बुरा दिखाया जाएगा और उसके काले कृत्यों का खुलासा किया जाएगा।

इस फिल्म में आलिया भट्ट का किरदार एक ऐसी महिला का होगा, जो एक ‘फेक बाबा’ से पंगा लेती है। दिखाया जाएगा कि दुनिया के सामने अच्छा बना रहे वाला गुरु कितना बड़ा अपराधी है और उसका असली चेहरा कुछ और है। ये आलिया बनाम एक आश्रम चलाने वाले बाबा की कहानी है। संजय दत्त का किरदार बाबा को ‘एक्सपोज’ करने में आलिया की मदद करेगा।

संबित पात्रा पर टूट पड़े लिबरल्स: कॉन्ग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी की टीवी चैनल पर बहस के बाद हुई मौत को बनाया हथियार

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी को टीवी में जारी एक परिचर्चा के दौरान कार्डियक अरेस्ट आया। उसके कुछ ही समय बाद उनकी मृत्यु हो गई लेकिन लिबरल गैंग और कॉन्ग्रेस समर्थकों का काम यहीं से शुरू हो गया। उन्होंने इसके लिए भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा को ज़िम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। क्योंकि टीवी की उस परिचर्चा में संबित पात्रा भी शामिल हुए थे। कॉन्ग्रेस समर्थकों ने राजीव त्यागी की मृत्यु को हथियार बना कर संबित पात्रा के खिलाफ़ ज़हर उगलना शुरू कर दिया।  

कॉन्ग्रेस समर्थक साकेत गोखले ने नफ़रत फैलाने के इस अभियान की अगुवाई की। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि संबित पात्रा को गिरफ्तार किया जाना चाहिए। क्योंकि राजीव त्यागी ने साँस संबित पात्रा की मौजूदगी में ली।  

इसके बाद मोहम्मद आसिफ़ खान नाम के व्यक्ति ने भी संबित पात्रा को राजीव त्यागी की मृत्यु के लिए दोषी ठहराया।  

इसके बाद हंसराज मीणा नाम के ट्विटर एकाउंट ने भी राजीव त्यागी को इंसाफ़ दिलाने की बात लिखी। इसके लिए संबित पात्रा को गिरफ्तार करने की माँग उठाई।  

कॉन्ग्रेस समर्थक सिर्फ इतने पर ही नहीं रुके। इसके बाद उन्होंने संबित पात्रा को हत्यारा तक घोषित कर दिया।  

कॉन्ग्रेस समर्थकों के बाद आम आदमी पार्टी के समर्थक भी इस अभियान में उतर गए।  

स्वघोषित फैक्ट चेकर ने भी इस घटना पर अपना फैसला सुनाने में देरी नहीं की।  

राजीव त्यागी 52 साल के थे और पिछले कई सालों से टीवी परिचर्चाओं में कॉन्ग्रेस का पक्ष रखते थे। ख़बरों के मुताबिक़ परिचर्चा के बाद उन्होंने चाय माँगी और इसके बाद तकलीफ़ होने पर आराम करने के लिए लेट गए। जैसे उन्हें चाय दी गई तब उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।  

अफ़सोस की बात है कि यह ऐसा पहला मौक़ा नहीं है जब किसी की मौत पर इस तरह की गंदी राजनीति की जा रही है। 2 साल पहले आतंकवादियों ने शुजात बुख़ारी की गोली मार कर हत्या कर दी थी। इसके बाद लिबरल्स ने वैज्ञानिक और स्तंभकार आनंद रंगनाथन को घेरना शुरू कर दिया। लिबरल्स का कहना था कि घटना के एक दिन पहले रंगनाथन बुख़ारी के साथ परिचर्चा में शामिल हुए थे। आनंद रंगनाथन ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि बुख़ारी के धार्मिक विचार कुछ भी कहे जा सकते हैं लेकिन उदारवादी नहीं। इसके बाद लिबरल्स ने बुख़ारी की हत्या का आरोप आनंद रंगनाथन पर लगा दिया था।  

संबित पात्रा और राजीव त्यागी 11 अगस्त 2020 को बेंगलुरु में हुए दंगों पर चर्चा कर रहे थे। जो सोशल मीडिया पर प्रोफेट मोहम्मद के संबंध में टिप्पणी करने के बाद शुरू हुआ था। दंगों के दौरान बेंगलुरु के कई इलाकों में आग लगाई गई, तोड़-फोड़ हुई, 3 लोगों की जान गई और कई लोग घायल हुए। राजीव त्यागी इस्लामी आक्रांताओं पर बहस के दौरान गुस्सा हुए।  

उन्होंने कहा इतने हमलों के बाद भी देश संरक्षित है फिर “हिंदू असुरक्षित है” जैसा प्रचार किया जाता है। इसके अलावा राजीव त्यागी ने यह भी कहा जिस व्यक्ति ने मोहम्मद पर टिप्पणी की है उसे सलाख़ों के पीछे ही होना चाहिए। दंगे इसलिए हुए क्योंकि पुलिस ने शिकायत दर्ज करने में देरी की। लेकिन सबसे ज़्यादा हैरानी की बात यह थी कि आखिर कैसे राजीव त्यागी की मृत्यु को आधार बना कर संबित पात्रा को निशाना बना गया।  

टैक्स रिफॉर्म्स के लिए ‘विवाद से विश्वास’: खुलासा करने पर 70% तक की छूट, आय कर में पारदर्शिता

केंद्र सरकार के प्रति करदाताओं का भरोसा बढ़े, इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईमानदार करदाताओं के लिए आज नई घोषणा की है। इसके साथ ही केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने आयकर विभाग के कामकाज को बेहतर बनाने एवं पारदर्शिता लाने के लिए हाल में कई तरह के कदम उठाए हैं।

आयकर को लेकर अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विभाग की ओर से डॉक्युमेंट आइडेंटिफिकेशन नंबर की शुरुआत की गई है। इसी तरह आधिकारिक संवाद की सही पहचान सुनिश्चित करने के लिहाज से भी कई कदम उठाए गए हैं।

प्रत्यक्ष कर रिफॉर्म्स (Direct Tax Reforms)

टैक्‍स रिफॉर्म्‍स के तहत दरों में कमी करने और प्रत्यक्ष टैक्स कानूनों को आसान बनाने पर सरकार का जोर रहा है। आयकर विभाग के काम में दक्षता और पारदर्शिता लाने के लिए भी केंद्रीय प्रत्‍यक्ष कर बोर्ड (CBDT) की ओर से कई पहल की गई हैं।

कॉर्पोरेट टैक्स

यह सरकार की घोषित नीति रही है कि एक ही समय में करों की दरों को कम करते हुए छूट और इंसेंटिव को हटाकर आयकर अधिनियम, 1961 को सरल बनाया जाए। वित्त अधिनियम, 2016 से शुरू करते हुए, कॉर्पोरेट्स को मिलने वाली छूट और इन्सेंटिव्स को चरणबद्ध करते हुए धीरे-धीरे कॉर्पोरेट टैक्स रेट्स को कम कर दिया गया है।

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने हाल के वर्षों में प्रत्यक्ष करों में कई बड़े टैक्‍स सुधार लागू किए हैं। पिछले वर्ष कॉरपोरेट टैक्स की दर को 30% से घटाकर 22% कर दिया गया था। साथ ही, नई विनिर्माण इकाइयों के लिए इस दर को और भी अधिक घटाकर 15% कर दिया गया।

पर्सनल इनकम टैक्स

इनकम टैक्‍स के कामकाज में दक्षता और पारदर्शिता लाने के लिए भी सीबीडीटी ने कई पहल की हैं। लंबित कर विवादों का समाधान प्रदान करने के उद्देश्य से विभाग ने प्रत्यक्ष कर ‘विवाद से विश्वास अधिनियम, 2020’ पेश किया है। इसके तहत वर्तमान में विवादों को निपटाने के लिए डेक्‍लेरेशन दाखिल किए जा रहे हैं।

डिविडेंड डिस्‍ट्रीब्‍यूशन टैक्‍स

‘डिविडेंड डिस्‍ट्रीब्‍यूशन टैक्‍स’ को भी हटा दिया गया है। फरवरी 01, 2020 को पेश किए बजट में केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स (Dividend Distribution Tax) हटा दिया गया है। मौजूदा वित्त वर्ष में टैक्स का नियम पूरी तरह से बदल गया है। अब कंपनियों को डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स नहीं देना होगा, लेकिन अब ये टैक्स करदाताओं से वसूला जाएगा। इसका अर्थ यह होगा कि यह अब करदाताओं की कुल आमदनी में जुड़ जाएगा और उस पर स्लैब के हिसाब से टैक्स चुकाना होगा।

करदाताओं के लिए आसानी

फेसलेस एसेसमेंट और टैक्सपेयर्स चार्टर आज से लागू हो गए हैं। पीएम मोदी ने आज के सम्बोधन में कहा कि फेसलेस असेसमेंट स्कीम के जरिए टैक्स सिस्टम भले ही फेसलेस हो रहा है, लेकिन टैक्सपेयर को ये निष्पक्षता और निडरता का विश्वास देने वाला है। इस प्लेटफॉर्म में फेसलेस एसेसमेंट, फेसलेस अपील और टैक्सपेयर्स चार्टर जैसे बड़े रिफॉर्म हैं।

आयकर रिटर्न की पूर्व-भुगतान

टैक्स अनुपालन को अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए, व्यक्तिगत करदाताओं को पूर्व भुगतान (आईटीआर) प्रदान किया गया है। ITR फॉर्म में अब कुछ आय, जैसे कि वेतन आय के पूर्व-भुगतान विवरण शामिल हैं।

यानी, करदाताओं की सुविधा को देखते हुए आयकर विभाग ने आयकर रिटर्न की प्रि-फिलिंग की शुरुआत की है। इससे टैक्सपेयर्स को इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने में आसानी होती है। स्टार्टअप कंपनियों के लिए अनुपालन के नियमों को सरल बनाया गया है।

कोरोना वायरस की महामारी के बीच करदाताओं को कुछ राहत देने के लिए, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने हाल ही में वित्तीय वर्ष 2019 के लिए आयकर रिटर्न दाखिल करने की समय सीमा बढ़ा दी है। यानी, जिन लोगों ने वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए अपना आईटीआर दाखिल नहीं किया है, वे अब ऐसा सितंबर 2020 तक ऑनलाइन कर सकते हैं।

इससे पहले, सरकार ने पहले ही कई मौकों पर वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए एक आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करने की समय सीमा बढ़ा दी थी। पहली समय सीमा मार्च 31, 2020 से 30 जून और फिर जुलाई 31, 2020 तक करदाता इनकम टैक्स ई-फाइलिंग वेबसाइट के माध्यम से अपना रिटर्न ऑनलाइन दर्ज कर सकते हैं। अब करदाताओं को राहत देते हुए CBDT ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरने की आखिरी तारीख नवंबर 30, 2020 निर्धारित की है।

‘विवाद से विश्वास’ स्कीम

केंद्र सरकार द्वारा आयकर से जुड़े सभी मामलों को जल्द निपटाने के लिए खास स्कीम ‘विवाद से विश्वास’ स्कीम (Vivad se Vishwas Scheme) शुरू की हुई है। इसके अंतर्गत, अगर टैक्सपेयर इसका खुलासा करता है कि उस पर एक्साइज और सर्विस टैक्स का बकाया है और वो उसे चुकाना चाहता है, तो सरकार उसको टैक्स में 70% (Rebate in tax) तक की छूट देगी। साथ ही, सरकार उसके बाद करदाता से ना कोई ब्याज वसूलती है, ना ही कोई जूर्माना वसूलती है।

सबका विश्वास स्कीम का मुख्य उद्देश्य पुराने मामले खत्म करना है। ऐसे में आम टैक्सपेयर्स पर कोई छापा नहीं पड़ेगा। इसका लाभ यह होगा कि अब टैक्सपेयर को विवाद से निपटने का मौका दिया जाएगा। यह स्कीम पुराने बकाया डिस्क्लोजर का मौका देता है। इस स्कीम को अलग-अलग 2 थ्रेसहोल्ड में बाँटा गया है- 50 लाख तक के स्लैब में 70% तक टैक्स छूट है जबकि 50 लाख तक स्लैब में सिर्फ 30% टैक्स लगेगा।

इसके अलावा, नई मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों के लिए इस दर को और भी अधिक घटाकर 15% किया गया और लाभांश वितरण टैक्स को भी हटाया गया। डिजिटल लेनदेन और भुगतान के इलेक्ट्रॉनिक मोड या तरीकों को बढ़ावा देने के लिए भी कई उपाय किए गए हैं। वहीं, विदेशों में जमा काले धन के प्रवाह को रोकने के लिए, काले धन (अघोषित विदेशी आय और संपत्ति) और कर अधिनियम, 2015 (काला धन अधिनियम) को लागू किया गया है।

‘ट्रांसपेरेंट टैक्सेशन: ऑनरिंग द ऑनेस्ट’

पीएम मोदी द्वार आज ‘ट्रांसपेरेंट टैक्सेशन: ऑनरिंग द ऑनेस्ट’ नामक प्लेटफॉर्म का उदघाटन किया गया है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह प्लेटफॉर्म 21वीं सदी के टैक्स सिस्टम की शुरुआत है, जिसमें फेसलैस एसेसमेंट,अपील और टैक्सपेयर्स चार्टर जैसे बड़े सुधार शामिल हैं।

पीएम मोदी ने कहा, “देश का ईमानदार टैक्सपेयर राष्ट्रनिर्माण में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। जब देश के ईमानदार टैक्सपेयर का जीवन आसान बनता है, वह आगे बढ़ता है, तो देश का भी विकास होता है, देश भी आगे बढ़ता है।”

मणिपुर का शेर बीर टिकेंद्रजीत सिंह: अंग्रेजों ने जिन्हें कहा था ‘खतरनाक बाघ’, दी थी खुली जगह पर फाँसी

मणिपुर राज्य की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएँ और प्राकृतिक सौन्दर्य भारतवासियों के लिए गौरव के विषय हैं, तो उसका शौर्य, साहस एवं त्याग-बलिदान से परिपूर्ण इतिहास भारतवासियों के लिए प्रेरणास्रोत है। सन् 1891 के एंग्लो-मणिपुर युद्ध में मणिपुर के बहादुर लोगों ने औपनिवेशिक शक्तियों का प्रतिरोध जिस वीरता और साहस के साथ किया; वह इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। भारत माता की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए सन् 1891 के युद्ध में शहीद होने वाले वीरों के हम सदा ऋणी रहेंगे।

आज हम उन असंख्य वीरों को श्रद्धांजलि दे रहे हैं, जिन्होंने सन् 1891 में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लड़ते हुए अपना जीवन दाँव पर लगा दिया था। सन् 1891 में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ हुए एंग्लो-मणिपुर युद्ध में शहीद होने वाले राज्य के वीर नायकों को श्रद्धांजलि देने के लिए मणिपुर राज्य प्रत्येक वर्ष 13 अगस्त के दिन “देशभक्त दिवस” मनाता है। बीर टिकेंद्रजीत सिंह भारत माँ के लिए प्राण उत्सर्ग करने वाले ऐसे ही एक जाँबाज सपूत थे।

मणिपुर के तत्कालीन साम्राज्य के राजकुमार टिकेंद्रजीत महान देशभक्त और ब्रिटिश साम्राज्यवादी योजना के घोर विरोधी तथा देश की एकता-अखंडता के कट्टर समर्थक थे। उन्होंने स्वातंत्र्य-वेदी में सहर्ष अपनी सभी राजसी सुख-सुविधाओं और अंततः जीवन की आहुति दी। उनका जीवन वीरता की साक्षात प्रतिमूर्ति था और उनका विश्वास था कि –“वीरभोग्या वसुन्धरा” अर्थात् वीर ही इस भूमि को भोगने के सच्चे अधिकारी हैं।

उन्होंने साहसपूर्वक ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्ति के कूटनीतिक और विस्तारवादी कृत्यों से जनमानस को अवगत कराया तथा अदम्य साहस और निर्भीकता के साथ अंग्रेजी साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के विरुद्ध युद्ध किया। इसी कारण उन्हें ‘मणिपुर का शेर’ कहा जाता है। यहाँ तक कि ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सरकार ने उनकी वीरता, निडरता तथा पराक्रम की तुलना एक ‘खतरनाक बाघ’ से की थी।

कहा जा सकता है कि वे दैवीय शक्तियों का संयोग थे। क्योंकि –“उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्” अर्थात् जहाँ उद्योग, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम ये छः (गुण) होते हैं, वहाँ दैव भी सहायक होते हैं। इस परम पराक्रमी और बुद्धिमान सपूत को आमने-सामने के युद्ध में अंग्रेजों द्वारा नहीं हराया जा सका तो छल-बल का सहारा लेकर एक औपनिवेशिक कानून की आड़ में विशेष अदालत द्वारा उन्हें दोषी ठहराया गया। और सन् 1891 में 13 अगस्त के दिन बीर टिकेंद्रजीत को सार्वजनिक रूप से मौत के घाट उतार दिया गया।

टिकेंद्रजीत सिंह महाराजा चंद्रप्रकाश सिंह और चोंगथम चानु कूमेश्वरी देवी की चतुर्थ संतान थे। उनका जन्म 29 दिसंबर, 1856 को हुआ था। उन्हें “कोइरेंग” भी कहते थे क्योंकि वे बचपन से ही लोकप्रिय तथा स्वतंत्रता प्रेमी थे। धैर्यवान होने के साथ-साथ वे कुशाग्र बुद्धि वाले थे। बाद में वे मणिपुरी सेना के कमाण्डर नियुक्त हुए थे। भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में उनका अद्वितीय स्थान है। 

प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण मणिपुर का अपना प्राचीनतम एवं गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। मणिपुर के राजाओं ने सन् 1891 में अंग्रेजों से पराजित होने तक अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता के लिए लगातार संघर्ष किया था। एक लंबे और अनवरत संघर्ष के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने मणिपुर पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। मणिपुर के आंतरिक संकट और उसके बर्मा के साथ चले 18 वर्ष लंबे संघर्ष का लाभ उठाकर वे ऐसा करने में सफल हुए।

प्रिंस गंभीर सिंह के नेतृत्व में प्रथम एंग्लो-बर्मी युद्ध (1824-1826) में मणिपुर ने बर्मा पर विजय प्राप्त की। नतीजतन, मणिपुर तबाही से उबर गया और गंभीर सिंह को मणिपुर का राजा बनाया गया। परन्तु उस समय राज्य की सभी महत्वपूर्ण शक्तियाँ अंग्रेजों के हाथ में थीं। राजा ब्रिटिश हस्तक्षेप का विरोध नहीं कर सकता था।

राजा चंद्रकांत सिंह के उत्तराधिकारी महाराजा सुरचंद्र सिंह के शासनकाल में अंग्रेजों का हस्तक्षेप बहुत अधिक बढ़ गया था। जिसके परिणामस्वरूप 24 अप्रैल, 1891 को खोंगजोम युद्ध (अंग्रेज-मणिपुरी युद्ध ) हुआ। जिसमें वीर सेनानी टिकेंद्रजीत और पाओना ब्रजवासी जैसे अनेक योद्धाओं के जबर्दस्त संघर्ष और जनसामान्य के मजबूत प्रतिरोध के बावजूद मणिपुर अंग्रेजों के पूर्णतया अधीन हो गया।

राजपरिवार का सदस्य होने के नाते टिकेंद्रजीत अंग्रेजों के कूट स्वभाव से परिचित थे। अत: वे मणिपुरवासियों को उनके वास्तविक दृष्टिकोण और अंतरतम दुर्भावनाओं के बारे में सचेत करते रहते थे। महाराज गंभीर सिंह की मृत्यु के उपरान्त उनके बड़े बेटे, सुरचंद्र ने मणिपुर के सिंहासन का दायित्व संभाला। अन्य राजकुमारों को राज्याधिकारी, सेना के जनरल और पुलिस प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया।

बाद में, झलकारी की मृत्यु के बाद टिकेंद्रजीत को सेना का जनरल नियुक्त किया गया था। लेकिन राजकुमारों के बीच आपसी गलतफहमी और मनमुटाव पैदा हो गया। इसने अंततः राज-परिवार को दो गुटों में विभाजित कर दिया। एक गुट टिकेंद्रजीत के साथ था तो दूसरा पाकसाना के नेतृत्व में कार्यरत था।

राजा इस स्थिति से अनजान रहे और अराजकता बहुत ज्यादा बढ़ती चली गई। टिकेंद्रजीत को लगता था कि राजा पाकसाना के पक्षधर हैं। अंग्रेज सूदखोरी से अपने साम्राज्य का विस्तार करते थे। वे मोटी ब्याज पर राजा और राजपरिवार को कर्ज देकर धीरे-धीरे उनके राज्य के हिस्सों को हड़पते चले जाते थे।

यही नीति उन्होंने मणिपुर के राजपरिवार के प्रति भी अपनाई। इसे राजकुमार टिकेंद्रजीत ने स्वीकार नहीं किया। वे इस तथ्य से भी भलीभाँति अवगत थे कि ब्रिटिश लोग मणिपुर को अपनी एक “कॉलोनी” बनाने के लिए अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने अपने राज्य की संप्रभुता तथा स्वतंत्रता की रक्षा हेतु एक योजना बनाई।

22 सितंबर, 1890 को टिकेंद्रजीत ने दो अन्य राजकुमारों एंगुसन और जिलंगंबा के साथ सुरचंद्र सिंह के खिलाफ विद्रोह किया और राजा सुरचंद्र को सिंहासन से हटा दिया। सुरचंद्र सिंह ने ब्रिटिश निवास में शरण ले ली। तब कुलाचंद्र ने राज्यभार संभाला और टिकेंद्रजीत उसके उत्तराधिकारी बने। इस घटना को मणिपुर के इतिहास में ‘पैलेस विद्रोह’ के रूप में जाना जाता है।

बाद में, पूर्व शासक सुरचंद्र सिंह कलकत्ता के लिए रवाना हुए। लेकिन उन्होंने टिकेंद्रजीत को सूचित किया कि वे धार्मिक-यात्रा पर वृंदावन जा रहे हैं। कलकत्ता पहुँचने के बाद उन्होंने मणिपुर राज्य का अपना सिंहासन पुन: पाने के लिए ब्रिटिश सरकार को एक याचिका भेजी। उनकी इस याचिका के परिणामस्वरूप अंग्रेज मणिपुर की आतंरिक फूट और संकट से बखूबी अवगत हो गए। वास्तव में, इस याचिका ने ब्रिटिशों को मणिपुर के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का मौका प्रदान किया।

भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लैंड्सडाउन ने कुलाचंद्र को राजा बनाए रखने का निर्णय लिया। लेकिन मणिपुर सिंहासन के उत्तराधिकारी पद से टिकेंद्रजीत को हटाने का आदेश दिया गया। क्योंकि अंग्रेज जानते थे कि टिकेंद्रजीत जैसा राष्ट्रवादी उनकी औपनिवेशिक योजनाओं में बहुत बड़ी अड़चन है। उसकी अनुपस्थिति में ही मणिपुर को ब्रिटिश उपनिवेश में रूपांतरित किया जा सकता है।

अत: 22 मार्च, 1891 को मुख्य आयुक्त जेडब्ल्यू क्विंटन सैनिकों की टुकड़ी के साथ मणिपुर पहुँचा। टिकेंद्रजीत को गिरफ्तार करने के लिए अंग्रेजों द्वारा एक गोपनीय योजना बनाई गई थी। लेकिन उनकी यह गुप्त योजना उजागर हो जाने के कारण विफल हो गई। राजनीतिक एजेंट ग्रिमवुड ने तब राजा कुलाचन्द्र को टिकेंद्रजीत को अंग्रेजों को सौंपने के लिए कहा। राजा कुलाचंद्र ने इसके लिए साफ इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने टिकेंद्रजीत को गिरफ्तार करने के लिए बल प्रयोग किया।

24 मार्च, 1891 की शाम को ब्रिटिश सैनिकों ने पैलेस कंपाउंड, विशेष रूप से टिकेंद्रजीत के निवास पर हमला किया। इस हमले में सांस्कृतिक कार्यक्रम देख रहे महिलाओं और बच्चों सहित अनेक निर्दोष नागरिक मारे गए। हालाँकि, मणिपुरी सेना अपने आक्रामक प्रतिरोध में सफल रही और अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा।

पाँच अंग्रेज अधिकारियों- क्विंटन, ग्रिमवुड, लेफ्टिनेंट कर्नल सिम्पसन, कोसिन और बुलेर को भागकर तहखाने में शरण लेनी पड़ी। जिन मणिपुरवासियों के निर्दोष बच्चे, पत्नियों और रिश्तेदारों को अंग्रेजों द्वारा मार दिया गया था, उनके मन में बदले की भावना इतनी प्रबल हो गई कि उन्होंने इन पाँचों अंग्रेजों को मार डाला।

इसके परिणामस्वरूप 1891 में एंग्लो-मणिपुरी युद्ध हुआ। इस भयानक युद्ध में अंग्रेजों ने मणिपुर को तहस-नहस कर दिया। 27 अप्रैल, 1891 को कंगला पैलेस को अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले लिया और मेजर मैक्सवेल मुख्य राजनीतिक एजेंट बन गया। ब्रिटिश भारत सरकार ने जाँच-पड़ताल और सजा-निर्धारण के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन मिशेल के अधीन एक विशेष आयोग का गठन किया। इस जाँच में टिकेंद्रजीत को दोषी ठहराया गया और अंग्रेजी अदालत द्वारा उन्हें मौत की सजा सुनाई गई।

जानकारी मिलने पर स्वयं रानी विक्टोरिया ने बीर टिकेंद्रजीत को बचाने के प्रयास किए लेकिन वे असफल रहीं। टिकेंद्रजीत अपने विलक्षण युद्ध-कौशल, अद्भुत पराक्रम तथा सक्षम प्रशासन के कारण अत्यंत लोकप्रिय थे।

कहा भी गया है कि – “प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् । नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्” अर्थात् प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है; अर्थात् जब प्रजा सुखी अनुभव करे तभी राजा को संतोष करना चाहिए। प्रजा का हित ही राजा का वास्तविक हित है। 

अत: मणिपुरवासियों ने अपने प्रिय राजकुमार की प्राण-रक्षा के लिए उनकी फाँसी का पुरजोर विरोध किया। परन्तु लोगों की प्रबल भावना और उनके सक्रिय विरोध के बावजूद अंग्रेजों ने बीर टिकेंद्रजीत को 13 अगस्त, 1891 को आम जनता के सामने एक खुली जगह पर फाँसी लगाई ताकि लोगों में डर पैदा किया जा सके।

मणिपुर राज्य की महिलाओं ने भी उनके बचाव में एक आंदोलन शुरू किया था, परन्तु उनका यह आन्दोलन मणिपुर के भविष्य बीर टिकेंद्नजीत को नहीं बचा सका। उनका बलिदान मणिपुर की स्वतंत्रता, सम्मान और जनकल्याण की भावना के लिए था। उन्होंने विदेशी शक्ति का विरोध करते हुए स्वदेश रक्षा हेतु अपने प्राण गँवाए।

बीर टिकेंद्रजीत सिंह की यह उदात्त भावना आज की युवा पीढ़ी को भी राष्ट्र की स्वतंत्रता, सम्मान और जनकल्याण हेतु जीवन-बलिदान करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करती है। बीर टिकेंद्रजीत सिंह जैसे बलिदानी योद्धाओं से प्रेरित हुए लाखों-करोड़ों युवाओं ने भारतमाता को 200 वर्ष लंबी अंग्रेजी दासता से मुक्त कराया।

इसलिए भारतमाता के ऐसे सपूतों को स्मरण किए बिना स्वतंत्रता-दिवस समारोह अर्थहीन और अधूरा है। इस महानायक को सम्मानित करते हुए मणिपुर विधानसभा ने अगस्त, 2019 में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर तुलीहल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम बदलकर ‘बीर टिकेंद्रजीत अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा’ कर दिया है।

बेंगलुरु दंगों पर कर्नाटक सरकार सख्त: न्यायिक जाँच का आदेश, पहले किया दंगाइयों से नुकसान वसूलने का ऐलान

मंगलवार की शाम (11 अगस्त 2020) को बेंगलुरु की सड़कों पर संप्रदाय विशेष की उग्र भीड़ पत्थर चलाते हुए और जम कर तोड़-फोड़ करती हुई नज़र आई। अब कर्नाटक की राज्य सरकार और प्रशासन दंगाइयों पर कार्रवाई करने की पूरी तैयारी कर चुका है। राज्य सरकार ने इस मामले में न्यायिक जाँच के आदेश जारी कर दिए हैं।

न्यायिक जाँच का फैसला कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदुराप्पा, गृहमंत्री बसवराज बोम्मई और पुलिस अधिकारियों की बैठक में लिया गया था। इस जाँच की अगुवाई मजिस्ट्रेट करेंगे। बेंगलुरु के पूर्वी और उत्तर पूर्वी इलाक़ों में हुए इन दंगों में 3 लोगों की जान जा चुकी है। साथ ही कई लोग घायल भी हुए हैं।  

कर्नाटक के गृहमंत्री बोम्मई ने इस बारे में जानकारी देते हुए कहा, “बेंगलुरु में हुई दंगों की न्यायिक जाँच होगी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के तमाम नीति-निर्देशों को मद्देनज़र रखते हुए पूरे घटनाक्रम की जाँच मजिस्ट्रेट की निगरानी में होगी। इस जाँच के बाद षड्यंत्र रचने वाले असल आरोपित सामने आएँगे।”  

मंगलवार की शाम कॉन्ग्रेस विधायक अखंडा श्रीनिवास मूर्थी के आवास पर संप्रदाय विशेष की हज़ारों की भीड़ इकट्ठा हुई। कुछ ही देर में भीड़ ने पूरे घर को तबाह कर दिया। इसके बाद डीजे हल्ली और केजी हल्ली पुलिस थाने पर भी जम कर तोड़ फोड़ की। पुलिस द्वारा की गई जवाबी कार्रवाई में कुल 3 लोगों की जान गई थी और 6 लोग घायल हुए थे। दंगे की घटनाओं में 60 पुलिसकर्मी घायल हुए थे जिसमें से 15 नज़दीकी अस्पतालों में भर्ती हैं।  

बेंगलुरु में हुए दंगों का एक और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया था। इस वीडियो में केजी हल्ली पुलिस स्टेशन के कर्मचारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों से आत्मरक्षा के लिए गोली चलने की इजाज़त मांग रहे थे। वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि इस्लामियों की अनियंत्रित भीड़ पुलिस वालों पर टूट पड़ती है। हालात इतने भयावह हो जाने के बाद पुलिसकर्मियों ने वरिष्ठ अधिकारियों से अनुमति माँगी।  

जिस पर अधिकारियों ने साफ़ तौर पर कहा कि वह भीड़ को नियंत्रित करने के लिए जो ज़रूरी समझें वह करें। वीडियो में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा “आपको जो सही लगे वह करिए! इस समय आपको कोई और नहीं बचा सकता है। आपको अपनी सुरक्षा खुद से ही करनी होगी।” टीवी 9 द्वारा प्रसारित इस वीडियो में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि कैसे संप्रदाय विशेष की भीड़ ने पूरे बेंगलुरु शहर को आग में झोंक दिया।  

इसके अलावा कर्नाटक के गृह मंत्री बसवराज बोम्मई ने बुधवार (अगस्त 12, 2020) को कहा था कि राज्य सरकार बेंगलुरु हिंसा की घटना में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। बोम्मई ने एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि सार्वजनिक संपत्ति और वाहनों को नुकसान की भरपाई क्षति पहुँचाने वाले दंगाइयों को करना होगा

मीडियाकर्मियों को संबोधित करते हुए, कर्नाटक के गृह मंत्री ने कहा, “मैं संपत्ति की वसूली को लेकर एक महत्वपूर्ण घोषणा करना चाहता हूँ कि सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि हिंसा के दौरान क्षतिग्रस्त हुई सार्वजनिक संपत्ति की भरपाई उन व्यक्तियों द्वारा किया जाना चाहिए जिन्होंने नुकसान पहुँचाया है। हम तुरंत कार्रवाई करने जा रहे हैं। हम व्यक्तियों की पहचान कर रहे हैं और नुकसान का आकलन कर रहे हैं। इसके बाद दंगाइयों द्वारा नुकसान की वसूली की जाएगी।”

ट्रांसपैरेंट टैक्सेशन – ऑनरिंग द ऑनेस्ट: PM मोदी ने लॉन्च किया प्लेटफॉर्म, ईमानदार टैक्सपेयर्स को प्रोत्साहन

ईमानदार करदाताओं की कई मौकों पर तारीफ कर चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब उनके लिए एक खास गिफ्ट लेकर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज ईमानदारी से कर चुकाने वालों के लिए पारदर्शी कराधान-ईमानदार का सम्मान (‘ट्रांसपेरेंट टैक्सेशन- ऑनरिंग द ऑनेस्ट) नामक एक प्लेटफॉर्म का शुभारंभ किया।

पीएम मोदी के नए प्रोग्राम का मुख्य फोकस इंडिविजुअल टैक्सपेयर्स यानी व्यक्तिगत आयकरदाताओं पर है। इसमें ईमानदार टैक्सपेयर्स को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।

पीएम मोदी ने ट्वीट के माध्यम दे इसकी जानकारी दी है। बृहस्पतिवार (अगस्त 13, 2020) सुबह 11 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से होने वाले इस आयोजन में केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट कार्य मंत्री निर्मला सीतारमण और वित्त एवं कॉर्पोरेट कार्य राज्य मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर भी उपस्थित हैं।

बृहस्पतिवार सुबह ही पीएम मोदी ने अपने ट्वीट में कहा कि कहा कि इससे कर व्यवस्था में सुधार करने और इसे आसान बनाने के हमारे प्रयासों को बल मिलेगा। साथ ही, लिखा कि इससे ईमानदार करदाताओं को लाभ मिलेगा जिनकी कड़ी मेहनत से देश की प्रगति को ताकत मिलती है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब 3-4 हफ्तों से पीएम मोदी वरिष्ठ टैक्स अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे हैं और वह इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि देश में एक पारदर्शी टैक्सेशन की जरूरत है। इन बैठकों में आयकर रिटर्न को लेकर काफी चर्चा हुई है। माना जा रहा है कि पीएम मोदी के नए प्रोग्राम का मुख्य फोकस इंडिविजुअल टैक्सपेयर्स पर होगा।

प्लेटफॉर्म के उद्घाटन के अवसर पर पीएम मोदी ने कहा – “देश में चल रहा स्ट्रक्चरल रिफॉर्म का सिलसिला आज एक नए पड़ाव पर पहुँचा है। ट्रांसपैरंट टैक्सेशन- ऑनरिंग द ऑनेस्ट, 21वीं सदी के टैक्स सिस्टम की इस नई व्यवस्था का आज लोकार्पण किया गया है।”

पीएम मोदी ने कहा कि पिछले 6 सालों में हमारा उद्देश्य सरकार का कम से कम हस्तक्षेप करना रहा है। पहले दबाव में लिए गए फैसलों को ‘रिफोर्म कहा जाता था लेकिन हमारे लिए रिफोर्म का मतलब नीति आधारित फैसला लेना और उसे दूसरे रिफोर्म का आधार बनाना है।

पीएम मोदी के भाषण की कुछ प्रमुख बातें –

आज हर नियम-कानून को, हर पॉलिसी को प्रोसेस और पॉवर सेंट्रिक अप्रोच से बाहर निकालकर उसको पीपल सेंट्रिक और पब्लिक फ्रेंडली बनाने पर बल दिया जा रहा है। ये नए भारत के नए गवर्नेंस मॉडल का प्रयोग है और इसके सुखद परिणाम भी देश को मिल रहे हैं।

ईमानदार का सम्मान। देश का ईमानदार टैक्सपेयर राष्ट्रनिर्माण में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। जब देश के ईमानदार टैक्सपेयर का जीवन आसान बनता है, वो आगे बढ़ता है, तो देश का भी विकास होता है, देश भी आगे बढ़ता है।

टैक्स पेयर के लिए अधिकार और कर्तव्य, दोनों को संतुलित करने और सरकार की जिम्मेवारी पक्की करने का यह बहुत अहम कदम है। टैक्स पेयर को सम्मान देने वाले दुनिया में बहुत कम देश हैं लेकिन अब भारत भी इस महत्वपूर्ण कदम में शामिल हो गया है। अब टैक्स पेयर को उचित व्यवहार और सम्मान का लाभ दिया जाएगा। विभाग अब बिना कसी आधार के उसे शक की नजर से नहीं देखेगा। यदि कोई संदेश है तो टैक्स पेयर को अपील और समीक्षा का भी अधिकार होगा।

जहाँ कॉम्प्लेक्सिटी होती है, वहाँ कम्प्लायंस भी मुश्किल होता है। कम से कम कानून हो, जो कानून हो वो बहुत स्पष्ट हो तो टैक्सपेयर भी खुश रहता है और देश भी। बीते कुछ समय से यही काम किया जा रहा है। अब जैसे, दर्जनों टैक्सों की जगह जीएसटी आ गया।

अभी तक होता यह है कि जिस शहर में हम रहते हैं उसी शहर का टैक्स डिपार्टमेंट टैक्स से जुड़ी सभी बातों को हैंडल करता है। स्क्रूटनी हो, नोटिस हो, सर्वे हो जब्ती हो, इसमें उसी शहर के आईटी अधिकारी की मुख्य भूमिका रहती है। यह भूमिका अब खत्म हो गई है।

अब इसे टेक्नॉलजी की मदद से बदल दिया गया है। अब स्क्रूटनी के मामलों को देश के किसी भी क्षेत्र में किसी भी अधिकारी के पास रैंडम तरीके से भेजा जाएगा। अब मुंबई के टैक्सपेयर का मामाला मुंबई के अधिकारी के पास नहीं जाएगा, संभव है कि वह चेन्नै या रायपुर या फिर किसी अन्य जगह चला जाए।

करदाता और इनकम टैक्स दफ्तर को जान पहचान बनाने का, प्रभाव और दवाब का मौका अब जीरो हो गया है। सब अपने अपने दायित्व के हिसाब से काम करेंगे। विभाग को इससे लाभ यह होगा कि अनावश्यक मुकदमेबाजी खत्म होगी। ट्रांसफर-पोस्टिंग वाली गैरजरूरी ऊर्जा से भी राहत मिलेगी। इससे टैक्स के जुड़े मामलों की जाँच के साथ-सात अपील भी फेसलेस होगी।

इंदिरा गाँधी बाबर की कब्र पर गईं, सिर झुकाया और बोलीं – ‘मैंने इतिहास को महसूस किया…’

पाँच अगस्त को अयोध्या की हलचल के दौरान एक कॉन्ग्रेसी ने पुण्य भाव से खुलासा किया कि प्रधानमंत्री राजीव गाँधी राम मंदिर निर्माण के पक्ष में थे। ऐसा कहकर उन्होंने कॉन्ग्रेस की छवि पर ठोस हो चुकी बदबूदार सेक्युलर गर्द को एक फूँक से साफ करने की कोशिश की।

वर्ना आजादी के तुरंत बाद सोमनाथ में मंदिर निर्माण की पहल पर पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के महान विचारों और सरदार पटेल से घृणापूर्ण असहमतियों से सारा देश भलीभाँति परिचित है। वह सब कुछ रिकॉर्ड पर है। बीच में इंदिरा गाँधी भी लंबे अरसे तक प्रधानमंत्री रहीं। इतिहास को महसूस करने की उनकी अपनी दिशा और सोच थी। कुँवर नटवरसिंह ने इंदिरा गाँधी से जुड़ा एक चौंकाने वाला वाकया लिखा है।

यह अगस्त 1969 की बात है। वे काबुल के दौरे पर थीं। उनके साथ राजीव और सोनिया भी थे, जहाँ 1947 के बाद खान अब्दुल गफ्फार खान से उनकी मुलाकात हुई थी। नटवरसिंह इस दौरे में उनके साथ ही थे। वे बताते हैं कि एक दोपहर थोड़ा समय खाली था और उन्होंने तय किया कि वे मेरे साथ ड्राइव पर चलेंगी।

काबुल से बाहर कुछ मील की दूरी पर उन्हें एक जीर्ण-शीर्ण इमारत दिखाई दी, जो कुछ पेड़ों से घिरी थी। उन्होंने अफगान सुरक्षा अधिकारी से पूछा कि वह क्या था। उसने बताया कि वह बाग-ए-बाबर (बाबर का मकबरा) है। श्रीमती गाँधी ने वहाँ जाने का निर्णय लिया। प्रोटोकॉल विभाग के लिए मुसीबत हो गई, क्योंकि उन्होंने वहाँ कोई सुरक्षा प्रबंध नहीं किए थे।

नटवर सिंह के अनुसार वो बाबर के मकबरे की ओर चल दिए। वे मकबरे के सामने खड़ी हुईं और हल्का सा सिर झुकाया। नटवर उनके पीछे खड़े थे। बाद में वे बोलीं – “मैं इतिहास को महसूस कर रही थी।” नटवरसिंह ने उनसे कहा कि मैं दो इतिहासों को महसूस कर रहा था। जब वे समझी नहीं तो उन्होंने विस्तार से बताया कि भारत की साम्राज्ञी की उपस्थिति में बाबर को श्रद्धांजलि अर्पित करना मेरे लिए बहुत बड़े गौरव की बात है।

भरतपुर रियासत से संबंद्ध रहे नटवरसिंह कॉन्ग्रेस के दूसरे नेताओं से इस मायने में अलग थे कि वे बुनियादी रूप से नेता नहीं थे। करीब तीस-पैंतीस साल वे विदेश सेवाओं में अपने चमकदार करिअर के बाद कॉन्ग्रेस की राजनीति में सक्रिय हुए थे और राजीव गाँधी ने उन्हें पहली ही बार में केंद्र में मंत्री बनाया था। विदेश सेवाओं में उनका चयन पंडित नेहरू के समय ही हो गया था।

नटवरसिंह इंदिरा गाँधी के समय राजनीति में आए लेकिन पहला चुनाव लड़ने के पहले ही इंदिरा गाँधी की हत्या हो गई। इस तरह पंडित नेहरू से लेकर सोनिया गाँधी तक सीधे संपर्क में काम करने का दीर्घकालीन विलक्षण अनुभव उनके पास है। अगर यूपीए-2 के समय कड़वे अनुभवों के साथ पहले केबिनेट और फिर कॉन्ग्रेस से उनकी अपमानजनक विदाई न हुई होती तो हम नहीं कह सकते कि वर्ष 2014 में आई उनकी आत्मकथा ‘वन लाइफ इज नॉट एनफ’ किस तरह लिखी गई होती।

यह किताब नेहरू से लेकर सोनिया गाँधी के कामकाज के ढंग और उनकी पसंद-नापसंद का खुलासा बहुत सलीके से करती है। नटवरसिंह चूँकि एक राजनयिक रहे हैं। वैश्विक स्तर पर एक बड़े फलक पर काम करने वाले हाजिर जवाब अफसर के रूप में उनकी सक्रिय भूमिका शानदार पारी खेलने की रही है। वे पटियाला राजघराने के दामाद हैं।

लेखन में उनके इस पद और कद की राजसी झलक साफ है। कालिख से भरी कॉन्ग्रेस की राजनीति के अंदर के सच को ऐसी साफगोई से कोई पूर्णकालिक नेता शायद ही रख पाता। राजनीति को तटस्थ भाव से जीने वाला शख्स ही अपने आसपास घटित होने वाली घटनाओं को देखने की ऐसी दृष्टि रखता है।

नेहरू ने चीन यात्रा का ब्यौरा एडविना को लिख भेजा

अक्टूबर 1954 में पंडित नेहरू चीन की चर्चित यात्रा पर थे, जहाँ उनकी खुली कार के दोनों तरफ सड़कों पर लाखों लोग स्वागत में खड़े थे। नटवर बताते हैं कि बाद के वर्षों में जब मैंने इन वार्तालापों के बारे में पढ़ा तो पाया कि वहाँ वास्तव में कुछ भी सार्थक नहीं हुआ था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि सीमा से जुड़े मसलों पर बात तक नहीं की गई।

लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण जानकारी यह है – “वापसी पर पंडित नेहरू कलकत्ता में ठहरे। उन्होंने पहला पत्र एडविना माउंटबेटन को लिखा और उनके साथ अपने चीन के अनुभव बाँटे। यदि कड़े शब्दों में कहा जाए तो चीनी नेताओं से हुई बातचीत को एडविना के साथ बाँटना उनके द्वारा ली गई गोपनीयता की शपथ के विरुद्ध था। नि:संदेह तब तो उस पत्र के बारे में कोई नहीं जानता था और वह तभी प्रकाश में आया, जब उनके लेखन को एस गोपाल ने प्रकाशित किया।”

कश्मीर मसले पर नेहरू की अत्यंत घातक नीतियों के बारे में वे कहते हैं कि माउंटबेटन ने नेहरू को अंधेरे में रखा। यह पंडित नेहरू की भूल थी कि उन्होंने भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन को भारत के प्रथम गवर्नर जनरल के रूप में नियुक्त किया। जिन्ना उनसे ज्यादा व्यवहारिक था, जो उसने ऐसा नहीं किया। नेहरू को यह पश्चाताप रहा कि उन्होंने माउंटबेटन की सलाहें क्यों मानीं!

ब्लादमीर की खास यात्रा, जहाँ सोनिया गाँधी के पिताश्री कैद में थे

साल 2004 में यूपीए सत्ता में आया और डॉ मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। अगले ही साल गर्मियों में एक कन्वेंशन के लिए सोनिया गाँधी एक खास प्लेन से मास्को गईं। नटवरसिंह लिखते हैं:

“इस मीटिंग के बाद मैं और सोनिया गाँधी एक हेलीकॉप्टर से एक छोटे से शहर व्लादमीर के लिए रवाना हो गए। मैं समझ नहीं पा रहा था कि सोनिया ने क्यों इस छोटे से शहर का चुनाव किया है, जिसके बारे में मैंने कुछ सुना भी नहीं था। ब्लादमीर एक जंगल के मध्य स्थित शहर था, शांत और सुकून भरा। सोनिया एक बड़ी इमारत की तरफ पैदल चल दीं, जिसको एक छोटे से म्युजियम में तब्दील कर दिया गया था। हम एक अष्टकोणीय कमरे में दाखिल हुए, जिसकी दीवारों पर हस्तलिखित पर्चियाँ चिपकी थीं। विश्व युद्ध के दौरान सोनिया के पिता बतौर युद्ध बंदी इसी कमरे में रहे थे। यहाँ से वे भाग निकले और इटली तक पैदल ही पहुँचे। हम लोग गाँव के चारों तरफ घूमते रहे। रिटायरमेंट के बाद चैन से जिंदगी बिताने के लिए व्लादमीर एक आदर्श जगह थी।”

सोनिया गाँधी भय पैदा करने वालीं रहस्यमय और संदेहपूर्ण

यह वही समय था, जब नटवरसिंह को रक्षा सौदों में कथित हिस्सेदारी के पचड़े में फँसाया गया। सोनिया गाँधी पर यहाँ नटवर की एक बेबाक टिप्पणी है – “सोनिया की सार्वजनिक छवि अच्छी नहीं है। इसके लिए बहुत हद तक वह स्वयं ही दोषी हैं। वह कभी मुक्त भाव से नहीं बैठती और अपने मन की बात किसी को बताती नहीं। बेहद रहस्यमय और संदेहपूर्ण व्यक्तित्व वाली यह महिला भय तो पैदा करती है पर श्रद्धा नहीं।”

सोनिया गाँधी के बारे में वे बताते हैं कि न तो वह अच्छी संप्रेषक थीं, न वक्ता और किसी अग्रणी राजनीतिज्ञ के लिए यह दोनों ही अपरिहार्य गुण होते हैं। अपना पहला भाषण तैयार करने में उन्हें कई घंटे कड़ी मेहनत करनी पड़ी थी।

नटवरसिंह बताते हैं कि सोनिया गाँधी को हर भाषण तैयार करने में 6 से 8 घंटे लगते थे। कभी-कभी तो यह तकलीफदेह भाषण सत्र आधी रात तक चलते थे। सोनिया अपना भाषण पढ़तीं और नटवरसिंह उसका समय नोट करते। फिर वह हिंदी में अनुवादित किया जाता था। फिर हिंदी का भाषण रोमन लिपि में बड़े-बड़े अक्षरों में छापा जाता।

जब तक लिखित पाठ (वो भी रोमन में) सामने न हो, वह हिंदी नहीं बोल पातीं। नटवरसिंह ने तब सुझाव दिया कि तुलसीदास की एकाध चौपाई या कबीर के दोहे अच्छी तरह से रट लें, जो वह अपने भाषणों में प्रयोग कर सकती हैं। पर उन्होंने हथियार डाल दिए और कहा:

“सामने लिखित पाठ होने पर भी मैं कुछ नहीं बोल पाऊँगी। तुम चाहते हो कि मैं अपने आप कुछ बोलूँ। इसे भूल जाओ।”

हमारा अपराध था मैडम को नाखुश करना!

जब कथित फायदे का विवाद गहराया तो रिश्तों में बढ़ती कड़वाहट को नटवरसिंह जैसा स्पष्टवादी और अपनी शर्तों पर जीने वाला आदमी खामोश होकर सहन कर ही नहीं सकता था। वे कहते हैं – “प्रधानमंत्री और कॉन्ग्रेस प्रेसिडेंट ने मिलकर यह निर्णय लिया कि जब तक यह विवाद खत्म नहीं हो जाता, मैं विदेश मंत्रालय छोड़कर बिना विभाग का मंत्री बना रहूँ। पार्टी और सरकार में उच्च पदस्थ कुछ पुराने घाघों ने मुझे निशाना बनाने की ठान ली थी। कॉन्ग्रेस में तो बिना सोनिया गाँधी के इशारे या अनुमति के पत्ता भी नहीं खड़कता। यह था बिना जिम्मेदारी की सत्ता को भोगना और गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे-बैठे कार ड्राइव करने की कला।”

जयपुर की एक रैली के बाद नटवरसिंह के बेटे को भी कॉन्ग्रेस से निकाल दिया गया। इस पर वे कहते हैं:

“हमारा अपराध था – मैडम को नाखुश करना!”

नटवरसिंह की यह किताब एक बेबाक बयान है, जो हमारी राजनीति के कुछ ऐसे दिलचस्प पहलुओं को उजागर करता है, जिसके बारे में हमें पता होना चाहिए। एक तरह से करिअर के पतन से उपजी अपनी निजी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए नटवरसिंह के शब्द हैं – “मनमोहन सिंह और उनके कैबिनेट मिनिस्टरों की मुझे छूने की हिम्मत भी न पड़ती अगर सोनिया की अनुमति न होती। कॉन्ग्रेस तो मुझे व्यक्तित्व विहीन बनाने पर उतारू थी पर सफल नहीं हो पाई। वे जो मेरे चारों तरफ राजनीतिक कृपा पाने की फिराक में घूमते रहते थे – गवर्नर बनवा दो, कैबिनेट में घुसवा दो, पार्टी में पद दिलवा दो – आज मुझसे कतराते हैं और मुँह फेरकर चले जाते हैं। सोनिया गाँधी की उपलब्धि यह रही: संसार की एक महानतम राजनीतिक पार्टी को लोकसभा में सिर्फ 44 सांसद के ठूँठ पर बैठा दिया गया।”

लेखक: विजय मनोहर तिवारी

उतावले राजदीप ने चलाई प्रणब मुखर्जी की मौत की ‘ब्रेकिंग’ खबर, फिर फेक न्यूज बता कर ट्वीट किया डिलीट

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की हालत गंभीर बनी हुई है और वे वेंटिलेटर सपोर्ट पर बने हुए हैं। लेकिन इंडिया टुडे के कर्मचारी राजदीप सरदेसाई ने बृहस्पतिवार (अगस्त 13, 2020) की सुबह आदतन उतावलेपन में उनकी मौत की फेक न्यूज़ को ‘ब्रेकिंग’ बताते हुए अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर कर डाली।

प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी ने अपने पिता के स्वास्थ्य के बारे में ‘अटकलों’ और उनके देहांत की फेक खबर को खारिज करते हुए कहा कि पूर्व राष्ट्रपति अभी भी जीवित हैं और उनकी हालत स्थिर है। राजदीप सरदेसाई का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि उनके पिता की मौत को लेकर सोशल मीडिया पर प्रतिष्ठित पत्रकारों द्वारा फर्जी खबरें प्रसारित की जा रही हैं।

राजदीप सरदेसाई ने इसे ‘ब्रेकिंग’ न्यूज़ कहते हुए अपने ट्विटर पर लिखा – “ब्रेकिंग: पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का निधन हो गया है.. विदाई प्रणब दा.. इंदिरा पीढ़ी के राजनेता और जीवंत राजनीति का हिस्सा रह चुके एक शख्स की कई यादें मौजूद हैं .. RIP.”

राजदीप द्वारा डिलीट किए गए ट्वीट का स्क्रीनशॉट

लेकिन प्रणब मुखर्जी के बेटे द्वारा इस खबर को फेक बताने के तुरंत बाद राजदीप सरदेसाई ने अपनी ‘ब्रेकिंग’ न्यूज़ को डिलीट कर दिया। राजदीप द्वारा फैलाई गई इस फर्जी खबर को कई लोगों ने सच मानकर प्रणब मुखर्जी की आत्मा के लिए शान्ति की कामना तक कर डाली, इनमें से एक कॉन्ग्रेस AICC के सचिव चल्ला वामसी चंद रेड्डी भी थे।

प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी के बेटे द्वारा किए गए ट्वीट पर मोहम्मद शाहिद मेवाती ने जवाब में कॉन्स्पिरेसी थ्योरी को ऊपर रखते हुए लिखा है – “हमें पता है कि इसकी आधिकारिक घोषणा 15 अगस्त के बाद ही होगी।”

ज्ञात हो कि प्रणब मुखर्जी को 10 अगस्त को दिल्ली छावनी के अस्पताल में भर्ती कराया गया था और उनके दिमाग में खून का थक्का हटाने के लिए सर्जरी की गई थी। 84 वर्षीय पूर्व राष्ट्रपति सर्जरी से पहले COVID -19 जाँच में भी पॉजिटिव पाए गए थे।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी और कॉन्ग्रेस नेता शर्मिष्ठा मुखर्जी ने भी अपने पिता के लिए प्रार्थना करते हुए कहा कि भगवान उनके लिए सब ठीक कर देंगे। शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपने पिता के बारे में राजदीप द्वारा फैलाई गई फेक न्यूज़ को लेकर लताड़ लगाते हुए यह भी कहा कि यह ख़बरें झूठी हैं और मैं खासकर मीडिया वालों से निवेदन करती हूँ कि मुझे कॉल ना करें क्योंकि मुझे अस्पताल से आने वाली अपडेट के लिए अपने फोन की जरूरत है।

शर्मिष्ठा मुखर्जी ने ट्विटर पर कहा, “उनके लिए जो सबसे अच्छा हो, भगवान वही करें और भगवान मुझे जीवन के सुख और दुख, दोनों को समान भाव से स्वीकार करने की शक्ति दें। मैं उन सभी को इमानदारी से धन्यवाद देती हूँ, जो उनके लिए चिंतित हैं।”

उन्होंने कहा, “पिछले साल 8 अगस्त मेरे लिए सबसे खुशी के दिनों में से एक था क्योंकि मेरे पिता को भारत रत्न मिला था। ठीक एक साल बाद 10 अगस्त को वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गए।”

…जब पुलिस वालों ने रोते हुए सीनियर ऑफिसर से माँगी गोली चलाने की इजाजत: बेंगलुरु दंगे का सच

मंगलवार की शाम (11 अगस्त 2020) को बेंगलुरु की सड़कों पर संप्रदाय विशेष की भीड़ पत्थर चलाते हुए और जम कर तोड़-फोड़ करती हुई नज़र आई। हमने इस घटना की रिपोर्ट की थी। कैसे डीजे हल्ली पुलिस स्टेशन के भीतर संप्रदाय विशेष की भीड़ दाखिल हुई। इसके बाद लगभग 200 से 250 वाहन मौके पर ही जला दिए गए।  

इस घटना का एक नया वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है। इस वीडियो में डीजे हल्ली पुलिस स्टेशन के कर्मचारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों से आत्मरक्षा के लिए गोली चलाने की इजाज़त माँग रहे हैं। वीडियो में साफ़ सुना जा सकता है कि इस्लामी भीड़ पुलिस वालों पर टूट पड़ी है। हालात इतने भयावह हो जाने के बाद पुलिस कर्मियों ने वरिष्ठ अधिकारियों से आत्मरक्षा में गोली चलाने की अनुमति माँगी।  

जिस पर अधिकारियों ने साफ़ तौर पर कहा कि वह भीड़ को नियंत्रित करने के लिए जो ज़रूरी समझें, वह करें। वीडियो में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा, “आपको जो सही लगे वह करिए! इस समय आपको कोई और नहीं बचा सकता है। आपको अपनी सुरक्षा खुद से ही करनी होगी।” टीवी 9 कर्नाटक द्वारा प्रसारित इस वीडियो में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि कैसे संप्रदाय विशेष की उग्र भीड़ ने पूरे बेंगलुरु शहर को आग में झोंक दिया।  

जिस इस्लामी भीड़ ने मंगलवार की शाम कॉन्ग्रेस विधायक का घर तहस-नहस किया, उसी भीड़ ने कुछ समय बाद शहर के दो पुलिस थाने भी तबाह किए।  इसके अलावा उन्होंने आस-पास मौजूद गाड़ियों को भी जला कर दिया। उन्हें इस बात का अंदेशा था कि पुलिस ने उनके साथियों को इन पुलिस थानों में बंद करके रखा है।  

पूरे बेंगलुरु में हुई तोड़-फोड़ और आगजनी की घटनाओं में कई पुलिस वाले घायल तक हुए और उनकी गाड़ियों में तोड़-फोड़ भी हुई। घटना नियंत्रित करने के लिए कुछ समय बाद KSRP प्लाटून्स को मौके पर बुलाया गया था। उनके द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक़ दंगाइयों ने उन पर छतों से पत्थर फेंके। कई मौक़ों पर पुलिस वालों को हालात नियंत्रित करने के लिए आँसू गैस के गोले तक चलाने पड़े।  

हिंसा की इन घटनाओं में अब तक कुल 3 लोगों के मारे जाने की ख़बर है। घटना के बाद डीजे हल्ली पुलिस थाने के इर्द-गिर्द काफी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। इस मामले में अब तक कुल 145 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। साथ ही पूरे क्षेत्र में धारा 144 लागू कर दी गई है।   

इस मुद्दे पर कर्नाटक के गृह मंत्री बसवराज बोम्मई ने बुधवार (अगस्त 12, 2020) को कहा कि राज्य सरकार बेंगलुरु हिंसा की घटना में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। बोम्मई ने एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि सार्वजनिक संपत्ति और वाहनों को नुकसान की भरपाई क्षति पहुँचाने वाले दंगाइयों को करना होगा

मीडियाकर्मियों को संबोधित करते हुए, कर्नाटक के गृह मंत्री ने कहा, “मैं संपत्ति की वसूली को लेकर एक महत्वपूर्ण घोषणा करना चाहता हूँ कि सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि हिंसा के दौरान क्षतिग्रस्त हुई सार्वजनिक संपत्ति की भरपाई उन व्यक्तियों द्वारा किया जाना चाहिए जिन्होंने नुकसान पहुँचाया है। हम तुरंत कार्रवाई करने जा रहे हैं। हम व्यक्तियों की पहचान कर रहे हैं और नुकसान का आकलन कर रहे हैं। इसके बाद दंगाइयों द्वारा नुकसान की वसूली की जाएगी।”