कॉन्ग्रेस पार्टी की दिक्कतें ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। राजस्थान में लंबा नाटक चलने के बाद अब पंजाब से विवाद की ख़बरें आ रही हैं। कॉन्ग्रेस सांसद प्रताप सिंह बाजवा ने अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के तौर तरीक़ों पर सवाल खड़े किए हैं। कॉन्ग्रेस सांसद का कहना है कि क्या अमरिंदर सिंह को वाकई लोकतंत्र में विश्वास है? अगर ऐसा तो वह महाराजा की तरह बर्ताव क्यों कर रहे हैं?
दरअसल सांसद प्रताप सिंह बाजवा ने चंडीगढ़ के डीजीपी को एक पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने कहा था अगर उनकी सुरक्षा को किसी भी तरह का नुकसान पहुँचता है, तो इसके लिए मुख्यमंत्री और डीजीपी ज़िम्मेदार होंगे। इसके जवाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी जवाब दिया था।
कैप्टन अमरिंदर सिंह के जवाब पर सांसद प्रताप सिंह बाजवा का कहना है, “जिस तरह का जवाब उन्होंने (अमरिंदर सिंह) ने दिया है, उससे ऐसा लगता है कि वह अभी तक अपने सपनों में पटियाला के महाराजा बने हुए हैं। उनकी बातें सुन कर ऐसा लगता है, जैसे उन्हें लोगों की ज़रूरत ही नहीं है। न ही वह किसी को जवाब देना ज़रूरी समझते हैं।”
Captain saheb lost his mental balance after we raised questions on 121 deaths in hooch tragedy as he is thinking that his own party MP is questioning him: Congress’ Pratap Bajwa #Punjabhttps://t.co/b0cBcOLmD9
इसके अलावा कॉन्ग्रेस सांसद ने यह भी कहा, “जब से हमने ज़हरीली शराब पीने के बाद हुई 121 मौतों पर सवाल उठाया है, तब से ऐसा लगता है जैसे मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं। जैसे उन्हें इस बात का दुःख है कि उनकी पार्टी के सांसद ने ही उनसे सवाल कर लिया।”
कॉन्ग्रेस सांसद प्रताप सिंह बाजवा ने इस मुद्दे पर कुछ और अहम बातें कही। उनका कहना है:
“2 साल पहले अमृतसर में रेलवे दुर्घटना हुई थी। इस दुर्घटना में 60 लोगों की मौत हुई थी। मुख्यमंत्री ने जाँच के लिए एसआईटी के गठन का आदेश भी दिया था लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ। इसके बाद बाटला की पटाखे फ़ैक्टरी में धमाके हुए थे। इसकी जाँच के लिए भी एसआईटी का गठन हुआ था लेकिन इस मामले में भी कुछ नहीं हुआ था। इसलिए कच्ची शराब से हुई मौतों को लेकर मेरे कुछ सवाल हैं। क्या जालंधर के मंडलायुक्त इस मामले की जाँच कर सकते हैं?”
आबकारी विभाग अमरिंदर सिंह के पास है। गृह मंत्रालय की तरह पंजाब की पुलिस भी अमरिंदर सिंह सरकार के दायरे में आती है। इसके बाद बाजवा ने कहा आबकारी विभाग की वजह से हुए नुकसानों की जानकारी के लिए उन्होंने राज्यपाल से भी संपर्क किया। इसके बाद सासंद बाजवा के अनुसार, “हमने माँग उठाई कि कच्ची शराब की वजह से हुई मौतों के मामले की जाँच सीबीआई या सीआईडी करे। लेकिन इस बात की वजह से अमरिंदर सिंह का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और उन्होंने मेरी सुरक्षा तक छीन ली।”
प्रताप सिंह बाजवा ने डीजीपी को लिखे पत्र में कई बातों का ज़िक्र किया था। उन्होंने कहा, “मैंने पिछले कुछ समय में राजनीति-ड्रग्स-पुलिस के गठजोड़ का खुलासा किया है। कैसे इन सभी की मिलीभगत से राज्य में इतने बड़े पैमाने पर नशे का कारोबार हो रहा है। यह बेहद स्वाभाविक है कि पंजाब में ड्रग माफिया बहुत बड़े पैमाने पर अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहा है। इसमें उसे पुलिस की तरफ से पूरा सहयोग और बराबर राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है।” इन बातों को आधार बनाते हुए कॉन्ग्रेस सांसद ने सुरक्षा की माँग की थी।
राजस्थान उच्च न्यायालय की एक वर्चुअल सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील राजीव धवन को हुक्का पीते हुए देखे गए जिसके बाद यह वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो गया है। कथित तौर पर यह घटना बृहस्पतिवार (अगस्त 12, 2020) को हुई जब राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ ने कॉन्ग्रेस के साथ बसपा के छह विधायकों के विलय को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई फिर से शुरू की।
दरअसल, हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल जब बहस कर रहे थे उसी समय सीनियर एडवोकेट राजीव धवन कैमरे के सामने पेपर रखकर स्मोकिंग करते नजर आए।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई वीडियो क्लिप में वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने वकील कपिल सिब्बल की दलील के रूप में अपने चेहरे के सामने कागज का एक सेट पकड़कर दिखाया। हालाँकि, वरिष्ठ अधिवक्ता धवन इन दस्तावेजों के पीछे अपने चेहरे को छिपाते हुए देखे जा सकते हैं, फिर भी, वायरल वीडियो क्लिप में धुएँ के छल्ले आराम से नजर आ रहे हैं।
There is no smoke without fire: #Rajasthan High Court hearing on disqualification of the 6 BSP MLAs who later merged with #Congress.
That’s Sr Adv Rajeev Dhavan, using a hookah. He is also the lawyer for adv Prashant Bhushan in the latter’s contempt case. pic.twitter.com/iF0FmeUuaV
इसके बाद अधिवक्ता दस्तावेजों को अलग रख देते हैं। लेकिन जैसे ही वह दस्तावेजों को किनारे रखते हैं, राजीव धवन सुनवाई के दौरान हुक्का पीते हुए दिखाई पड़ते हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि इस वर्चुअल सुनवाई के दौरान अधिवक्ता धवन द्वारा हुक्का पीने की इस घटना को राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा नोटिस किया गया था या नहीं।
शुक्रवार (अगस्त 13, 2020) को सुनवाई फिर से शुरू होने पर, वरिष्ठ वकील राजीव धवन का वीडियो अचानक गायब हो गया। इसके लिए राजस्थान HC ने उनसे पूछा कि क्या उनके द्वारा वीडियो को बंद कर दिया गया था?
बसपा के टिकट पर चुनाव जीत विधानसभा पहुँचने के बाद कॉन्ग्रेस में विलय करने वाले 6 विधायकों को सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य घोषित करने का अनुरोध करते हुए भाजपा विधायक मदन दिलावर ने राजस्थान उच्च न्यायालय में अर्जी दी है।
इस अर्जी में उन्होंने कहा है कि इन विधायकों ने अपनी पार्टी के व्हिप का उल्लंघन किया है। अभी यह याचिका उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। जिसकी सुनवाई के दौरान अधिवक्ता राजीव धवन हुक्का पीते और धुएँ के छल्ले बनाते देखे गए।
कर्नाटक के गृहमंत्री बसवराज बोम्मई ने गुरुवार (13 अगस्त, 2020) को बेंगलुरु में हुए दंगों के पीछे कट्टरपंथियों का हाथ बताया है। मंगलवार रात हुए दंगों को एक बड़ी साजिश का हिस्सा बताते हुए उन्होंने जाँच के आदेश भी दिए है।
गौरतलब है कि कर्नाटक की राजधानी बंगलुरू में हुए दंगे में 3 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग जख्मी हुए हैं। इसके साथ ही दंगाइयों ने दर्जनों गाड़ियों को आग लगा दी और करोड़ों की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है।
टाइम्स नाउ के दीपक बोपन्ना के साथ एक विशेष बातचीत में, कर्नाटक के गृह मंत्री ने कहा, “कॉन्ग्रेस विधायक और उनके फॉलोवर्स के बीच इंटरनल डिफरेंस है, उनके और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के बीच मतभेद है, ये सभी चीजें सामने आ रही हैं। इसके अलावा, यह एक बड़ी साजिश का हिस्सा था और बड़े पैमाने पर एसडीपीआई की भूमिका सामने आ रही है।”
उन्होंने आगे कहा, “हम इस घटना की गहराई से जाँच कर रहे हैं। हमने वीडियो फुटेज में पाया है कि पड़ोसी क्षेत्रों के एसडीपीआई के लोग भी दंगे में शामिल हुए थे।”
गृह मंत्री ने आगे कहा कि सभी नुकसान दंगाइयों से सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार वसूल किए जाएँगे। बोम्मई ने कहा कि, सभी एंगल की जाँच कर यह भी पता लगाया जाएगा कि कहीं इस घटना का देश की किसी पिछली घटना से कोई संबंध तो नहीं है।
गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस विधायक श्रीनिवास मूर्ति के भतीजे नवीन के फेसबुक पोस्ट को लेकर सारा विवाद शुरू हुआ था। उस पर पैगम्बर मुहम्मद को लेकर विवादित पोस्ट डालने का आरोप है। अब तक हिंसा करने वालों में से 150 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। बेंगलुरु के पुलिस कमिश्नर कमल पंत ने लोगों को शांति बनाए रखने की अपील की है। इस घटना में 3 लोग मारे गए और 60 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं।
बता दें कि 200-300 के क़रीब संप्रदाय विशेष की भीड़ ने न सिर्फ कॉन्ग्रेस विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के घर पर तोड़फोड़ की थी बल्कि बाहर खड़ी गाड़ियों को भी जला डाला था। विधायक आवास में तोड़फोड़ का नज़ारा अभी भी देखा जा सकता है। दंगाइयों ने मजहबी नारे लगाते हुए पत्थरबाजी और आगजनी की। जिसके बाद बोम्मई ने एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा था कि सार्वजनिक संपत्ति और वाहनों को नुकसान की भरपाई क्षति पहुँचाने वाले दंगाइयों को करना होगा।
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) ने पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (PoJKL) की मेडिकल शिक्षा को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। भारत में मेडिकल एजुकेशन संबंधी मानकों को देखने वाली संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से जारी सर्कुलर के मुताबिक, पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर और लद्दाख स्थित मेडिकल कॉलेजों से शिक्षा प्राप्त करने वाला कोई भी व्यक्ति भारत में आधुनिक चिकित्सा की प्रैक्टिस करने के योग्य नहीं होगा।
“Any medical qualification obtained from medical colleges located in Pakistan Occupied Jammu-Kashmir & Ladakh (PoJKL) will not be registered & persons possessing such certificates won’t be allowed to practice modern medicine in India”
बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (BoG) ने अगस्त 10, 2020 को एक सार्वजनिक सूचना में कहा कि समूचा जम्मू कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है। पाकिस्तान ने इन क्षेत्रों के हिस्सों पर अवैध और जबरन कब्जा कर रखा है।
बीओजी के महासचिव डॉक्टर आरके वत्स ने जारी नोटिस में कहा है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र स्थित किसी भी चिकित्सा संस्थान को भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम 1956 के तहत अनुमति और मान्यता की जरूरत है। पीओजेकेएल स्थित ऐसे किसी भी चिकित्सा संस्थान को इस तरह की अनुमति नहीं दी गई है।
जारी सूचना में कहा गया है कि पीओजेकेएल के इन इलाकों में स्थित चिकित्सा कॉलेजों से शिक्षा प्राप्त करने वाला व्यक्ति भारत में आधुनिक चिकित्सा की प्रैक्टिस करने के लिए भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम 1956 के तहत पंजीकरण हासिल करने के योग्य नहीं होगा।
उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान बीते कई सालों से कश्मीरी युवाओं तक अपनी पहुँच बनाने के लिए कश्मीरी स्टूडेंट्स को कम कीमत में शिक्षा का लालच देता रहा है। जिसके बाद कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जब कश्मीरी युवा पढ़ाई के लिए लीगल चैनल से पाकिस्तान या पीओजेके गए, लेकिन उसके बाद आतंकी कैंपों में ट्रेनिंग लेकर लाइन ऑफ कंट्रोल के रास्ते से लौटे।
जम्मू-कश्मीर के बहुत सारे युवक पाकिस्तान में मेडिसिन की पढ़ाई करने जाते थे, जिनमें से कई सारे अलगाववादी नेताओं की सिफारिश पर जाया करते थे और पाकिस्तान सरकार ने उन मेडिकल इंस्टीट्यूट्स में जम्मू-कश्मीर के छात्रों के लिए आरक्षण भी तय कर दिया था। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के इस नीतिगत फैसले से पाकिस्तान को गहरी चोट लगी है।
बेंगलुरु में मंगलवार (अगस्त 11, 2020) को हिंसा भड़कने के मामले में 5 लोगों का नाम FIR में शामिल किया गया है। इन पाँचों पर आरोप है कि इन्होंने ही 200-300 लोगों की इस्लामिक भीड़ को एकत्रित करके बेंगलुरु में दंगे करवाए।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस एफआईआर पर रिपोर्ट की है। रिपोर्ट के मुताबिक FIR में बताया गया है कि भीड़ के पास पहले से माचिसें, पत्थर, रॉड जैसे हथियार थे। ये भीड़ कथित तौर पर नारे लगा रही थी, “पुलिस को मारो और खत्म करो।”
इन लोगों ने केजी हल्ली और डीजे हल्ली थाने में 11 अगस्त को आ गजनी करके हड़कंप मचाया था। इन्होंने पेट्रोल से भरी प्लास्टिक की बोतलें थाने में पुलिस के ऊपर फेंकीं थी।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि यह दंगे संप्रदाय विशेष के कुछ स्थानीय नेताओं की एक बैठक के बाद शुरू हुए। इस बैठक का एजेंडा ही नवीन के पोस्ट पर विचार करना था। सदस्यों ने इस बैठक के बाद निर्णय लिया कि वह इस मामले को पुलिस में लेकर जाएँगे। वहीं, कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन SDPI के सदस्य समेत कई इस्लामिक नेताओं ने विधायक के भतीजे के ख़िलाफ़ एक्शन लेने की ठानी।
पुलिस बताती है कि यह जानकारी फर्जी है कि पुलिस वाले नवीन के ख़िलाफ़ कंप्लेन नहीं स्वीकार कर रहे थे, जिसके कारण दंगे हुए और 3 लोग मारे गए व 60 पुलिस वाले घायल हुए।
इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, इस मामले में अब तक 9 FIR दर्ज हुई हैं और कहा जा रहा है कि साइबर पुलिस इस केस में और शिकायत दर्ज कर सकती है।
गौरतलब है कि हमने पहले इस बात की जानकारी दी थी कि कैसे संप्रदाय विशेष की भीड़ ने डीजे हल्ली थाने के बेसमेंट इलाके में घुसकर हिंसा की और 200-250 वाहनों को आग के हवाले झोंक दिया।
ऐसी वीडियोज भी सामने आई जहाँ इस्लामिक भीड़ के सामने लाचार पुलिस अधिकारी अपने वरिष्ठों से रो रोकर गोली चलाने की अनुमति माँग रहे हैं। लेकिन, तब भी घटना के अगले ही दिन SDPI पूरी घटना के लिए संप्रदाय विशेष की भीड़ की जगह बेंगलुरु पुलिस पर इल्जाम मढ़ देती है।
सुवर्ण न्यूज के अनुसार, संगठन के राज्य अध्यक्ष इलियास मुहम्मद थाम्बे ने बुधवार को दावा किया कि बेंगलुरु पुलिस ने आरोपित की गिरफ्तारी में देरी की, जिससे संप्रदाय विशेष की भीड़ नाराज हो गई और बेंगलुरु की सड़कों पर हिंसा करने के लिए विवश हो गई।
बता दें इस पूरी घटना में 60 से ज्यादा पुलिसकर्मी पत्थरबाजी और दंगों के दौरान घायल हुए हैं। कम से कम 10 वाहन जिसमें दो डीसीपी की इनोवा गाड़ी थी, थाने के सामने तोड़ी गई। इसके बाद भीड़ ने डीजे हल्ली थाने के सामने ही वाहनों में आग भी लगाई।
पूर्व नियोजित दंगे में संप्रदाय विशेष की भीड़ ने थाने पर पेट्रोल बम और हथियारों से हमला किया। इस दौरान भीड़ अल्लाह हू अकबर और नारा ए तकबीर के नारे लगाती रही। मामला शांत पड़ने पर कर्नाटक गृहमंत्री ने आदेश दिए कि वह इन दंगों की जाँच करवाएँगें और जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई भी दंगाइयों से की जाएगी। इस पूरे केस में अभी तक 146 लोग गिरफ्तार हुए हैं।
बेंगलुरु में इस्लामिक हिंसा भड़कने के बाद जेएनयू प्रोफेसर आनंद रंगनाथन ने एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में उन्होंने समुदाय विशेष से अपील की कि जो भी लोग कुरान की एक ऐसी आयत का विरोध करते हैं, जिसमें अल्लाह या अल्लाह के बंदों को दुत्कारने पर सजा मिलने की बात है, उन्हें अब मुखर होकर बोलना चाहिए।
आनंद रंगनाथन का यह ट्वीट उन लोगों पर एक निशाने की तरह था, जो आम दिनों में मजहब और दीन की बातें करते हैं लेकिन जब बेंगलुरु जैसी कोई मजहबी हिंसा घट जाती है तो मानवता की बात करके उनके अपराधों से ध्यान भटकाने में लग जाते हैं।
जेएनयू के प्रोफेसर ने इसी रवैये पर कुरान की इस आयत को कोट किया था- “जो भी अल्लाह और उसके बंदे को दुत्कारेगा, अल्लाह उन्हें इस जहां में लानत देता है और उनके लिए अपमानजनक दंड भी तैयार रखता है।”
डॉ रंगनाथन ने कुरान की इन पंक्तियों को लिखते हुए कहा था कि जो कुरान की इन बातों में विश्वास नहीं रखते, उन्हें यह बात मुखर हो कर कहना चाहिए। मगर, ट्विटर ने उनके इस ट्वीट को नियमों का उल्लंघन बताकर उनका अकाउंट लॉक कर दिया।
कारण में ट्विटर ने आनंद रंगनाथन के ट्वीट को ‘घृणा वाला’ बताया। जिस पर जेएनयू प्रोफेसर ने अपील करते हुए ट्विटर को लिखा कि उन्होंने जो भी ट्वीट किया है, वह कुरान की एक आयत है। तो क्या इसका मतलब ये है कि कुरान में लिखी आयात घृणा वाली है। किस मामले में ये निर्धारित होगा कि किसी आयत का हवाला देना आपके नियमों का उल्लंघन है।
Meanwhile Twitter has locked account of @ARanganathan72 for posting a verse from The Holy Quran in reference to violence in Bangalore. Twitter says it violated their rules. Ranga Sir has appealed. The verse can be found here https://t.co/blw8NlUOhWpic.twitter.com/hpWpTh0tZ3
आपको बता दें कि डॉ आनंद रंगनाथन ने अपने ट्वीट में जिस कुरान की आयत का उल्लेख किया है, उसे https://quran.com/33/57 पर यहाँ पढ़ा जा सकता है। फिर सवाल उठता है कि ट्विटर के नियमों का उल्लंघन किससे हुआ। क्या बस आनंद रंगनाथन के ट्वीट से? या फिर आयात में मौजूद आदेश से?
इस घटना के बाद आनंद रंगनाथन के ट्विटर पर वापस लाने की माँग तेज हो गई है। लोग अपने-अपने ट्विटर हैंडल से #BringBackAnandRanganathan ट्वीट करके उनकी वापसी की माँग करने लगे। लोगों ने उन्हें सबसे समझदार आवाज बताते हुए ट्विटर से अपील की कि उन्होंने कोई भी नियम उल्लंघन नहीं किया। उन्हें वापस लाया जाए।
He is one of the most knowledgeable voices I know. All he did was quote verses from the Quran. @ARanganathan72 did not violate any rules. This is censorship of the worst kind @TwitterIndia. Bring him back!#BringBackAnandRanganathan
एक ने आनंद रंगनाथन के अकॉउंट ब्लॉक सुनकर कहा कि मतलब कुरान की आयत ट्विटर पर न डाली जाए, क्योंकि ट्विटर उसे हेटस्पीच मानता है। एक यूजर ने ट्विटर को वामपंथियों का उपकरण बताया। एक अन्य नेटिजन ने पूछा कि क्या कुरान की आयत कोट करना ईशनिंदा हो गई?
So please do not quote any verse from the Quran as it will be considered Hate Speech. However, you are free to mock, deride, insult anything Hindu. #BringBackAnandRanganathan
वहीं, डॉ रंगनाथन ने खुद भी टाइम्स नाऊ में एक डिबेट में अपने साथ हुई घटना पर बात करते हुए कुछ उन पुराने मुद्दों का जिक्र किया, जब पैगंबर का नाम आने के कारण इस्लामिक भीड़ भड़क गई। वह रंगीला रसूल की किताब का जिक्र करते हैं और बताते हैं कि कैसे इल्मुद्दीन नामक कट्टरपंथी ने उन्हें मारा और बाद में जिन्ना ने उसी हत्यारे का केस लड़ा।
वह कहते हैं कि यह पहली बार नहीं हुआ है। कमलेश तिवारी की हत्या की माँग भी कॉन्ग्रेस विधायक समेत संप्रदाय विशेष के सैंकड़ों द्वारा की जा रही थी। वह पूछते हैं कि क्या एक पोस्ट मात्र से भड़क जाना असहिष्णुता नहीं है? साजिद बुखारी नामक पत्रकार की बात का जिक्र करते हुए आनंद रंगनाथन बताते हैं कि उसने भी कहा था, “जब बात पैगंबर की आती है जो मुझे गर्व है असहिष्णु होने पर।”
आनंद रंगनाथन शार्ली ऐब्दो मैग्जीन पर हुए हमले की ओर ध्यान आकर्षित करवाते हैं और कमलेश तिवारी मामले में ओवैसी की उस बात को कोट करते हैं, जिसमें ओवैसी ने कमलेश तिवारी को गाली देते हुए कहा था कि अब उनकी गुस्ताखी ने बर्बादी को दावत दी है।
श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। 5 अगस्त यानी आज से 8 दिन पहले महंत नृत्य गोपाल दास प्रधानमंत्री मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के साथ अयोध्या में राम मंदिर के भूमिपूजन में शामिल हुए थे। इसके साथ उन्होंने उनके साथ मंच भी साझा किया था।
नृत्य गोपाल दास बुधवार को जन्माष्टमी मनाने मथुरा पहुँचे थे। जहाँ उन्हें कृष्ण जन्माष्टमी समारोह के दौरान साँस लेने में तकलीफ हुई। गोपाल दास को आगे के इलाज के लिए मेदांता अस्पताल, गुरुग्राम शिफ्ट किया जा रहा है। 5 अगस्त 2020 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और आनंदीबेन पटेल भी उनके साथ मंच पर थे।
इस समय देश में कुल कोरोना मरीजों का आँकड़ा 24 लाख के करीब पहुँच गया है। पिछले 24 घंटे में करीब 67 हजार नए मामले सामने आए हैं और 942 लोगों की मौत हो गई है। गुरुवार को स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी अपडेट के मुताबिक, कुल मरीजों की संख्या 23 लाख 96 हजार 637 है।
कोरोना से अब तक 47 हजार 33 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं अब तक 16 लाख 95 हजार 982 लोग ठीक हो चुके हैं, जबकि एक्टिव केस की संख्या 6 लाख 53 हजार 622 है। आँकड़ो के मुताबिक देश में कोरोना से औसत रिकवरी दर 70 फीसदी से ज्यादा हो गई है। इसके साथ ही देशभर में एक दिन में सबसे ज्यादा 7 लाख 33 हजार 449 टेस्ट किए गए।
फरवरी के दौरान दिल्ली में हुआ, अगस्त में ठीक वही बेंगलुरु में हुआ। 11 अगस्त की रात जब बेंगलुरु जल रहा था तब भारत की धर्म निरपेक्ष आबादी उर्दू शायर को याद कर रही थी। निशाने पर था कॉन्ग्रेस विधायक। इस पार्टी ने सालों मेहनत करके धर्म निरपेक्ष आबादी से जो रिश्ता बनाया था। वह पल भर में समाप्त हो गया। वह भी एक किसी ऐसी चीज़ के लिए जो उन्होंने (कॉन्ग्रेस विधायक) ने की भी नहीं। लेकिन भीड़ के लिए उससे मिलता-जुलता ही बहुत है।
सच्चाई यही है कि भीड़ के लिए एक नास्तिक किसी दूसरे की तुलना में कहीं बेहतर है। आखिर यह कहाँ तक जा सकता है? लेकिन दूसरों के अपराध की सज़ा एक नास्तिक को देने के लिए किस दर्जे तक टकराव की ज़रूरत है। बेंगलुरु यह बहुत अच्छे से जानता है लेकिन शायद बेंगलुरु को यह याद नहीं है। बात साल 2007 की है जब सद्दाम हुसैन को फाँसी दी जाने वाली थी। सद्दाम हुसैन एक निर्दयी तानाशाह, जिसे मानवता पर किए गए अपराधों की सज़ा मिलने वाली थी।
लेकिन उस इलाके में और भी कई निर्दयी तानाशाह हैं (कभी सोचा है क्यों?)
खैर आप ईराक युद्ध और सद्दाम हुसैन की फाँसी के बारे में कुछ भी सोचते हों। लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि हम एक बात से ज़रूर सहमत हो सकते हैं। भारत वहाँ पर हुए विवादों के बाद बने हालातों के लिए किसी भी सूरत में ज़िम्मेदार नहीं था। कम से कम बेंगलुरु के आम लोगों को छोड़ कर। लेकिन फिर भी बेंगलुरु की सड़कों पर कुछ लोग उतरे और उन्होंने सद्दाम हुसैन की फाँसी का विरोध किया। विरोध में निकाली गई इस रैली के मुखिया थे कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व मंत्री सीके शरीफ़। बहुत जल्द रैली में शामिल भीड़ हिंसक हुई, उनका पुलिस से टकराव हुआ। दुकानें और गाड़ियाँ जलाई जाने लगीं।
अब कुछ सुना-सुना सा लग रहा होगा?
अब कुछ रोचक सा सामने आया है। यह लेख लिखने से पहले मैंने उस घटना के बारे में पुख्ता होने के लिए गूगल पर खोजबीन की। यह बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए ना? एक मेट्रोपोलिटन शहर में हुए दंगों के बारे में जानकारी मिलना कैसे मुश्किल हो सकता है। सही तो है? जी नहीं! बिलकुल गलत है। मेरी हैरानी की कल्पना करिए जब मैंने उस घटना के बारे में गूगल पर खोजने की कोशिश की।
सद्दाम हुसैन को हुई फाँसी की ख़बर का शीर्षक
यह रिपोर्ट The Reuters द्वारा 21 जनवरी 2007 को प्रकाशित की गई थी। जिसमें घटना के बारे में कुछ इस तरह जानकारी दी गई है। “हिंसा की घटना तब हुई जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता प्रदर्शन करने के लिए आगे आए।” इसके बाद संप्रदाय विशेष की दुकानों को एक-एक करके निशाना बनाया गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि हिंसा की घटनाएँ इसलिए भी बढ़ी क्योंकि राज्य में भारतीय जनता पार्टी और एक स्थानीय राजनीतिक दल का प्रभाव है।
इस कवरेज की शैली और व्याख्या का एक दशक से ज़्यादा का समय गुज़र जाने के बाद भी नहीं बदली। The Reuters की रिपोर्ट के भीतर यह भी बताया गया था कि 21 जनवरी की हिंसा के पहले क्या हुआ था। रिपोर्ट में यह लिखा था, “शुक्रवार को सद्दाम हुसैन की फाँसी के विरोध में संप्रदाय विशेष के हज़ारों प्रदर्शनकारी इकट्ठा हुए। उनका पुलिस से टकराव हुआ और उसके बाद शहर की दुकानें और वाहन जला दिए गए।”
लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद 19 जनवरी को प्रकाशित उस रिपोर्ट में “संप्रदाय विशेष के कार्यकर्ताओं” को आरोपित बताने वाला शीर्षक नहीं नज़र आया। यहाँ तक कि 19 जनवरी के दिन हुई उस घटना की कोई स्पष्ट रिपोर्ट तक नहीं नज़र आई। इसके अलावा किसी दिग्गज मीडिया समूह ने भी 19 जनवरी की घटना पर कोई रिपोर्ट तैयार नहीं की थी। जबकि इस घटना में कॉन्ग्रेस नेता सीके शरीफ़ का नाम सामने आया था। मुझे अपनी याद्दाश्त और ज़हन पर शक था फिर भी मैंने गूगल पर खोजबीन करना जारी रखा। अंततः Daijiworld नाम की वेबसाइट पर 19 जनवरी साल 2007 की घटना की जानकारी मिली।
देश के इतने बड़े शहर में हुई घटना के बारे में केवल इतनी ही जानकारी मिली। जिसके अंत में लिखा था ‘अभी और जानकारी मिलना बाकी है’। बेंगलुरु में हुई हिंसा के बारे में इंटरनेट पर इससे ज़्यादा कुछ और मौजूद नहीं है। अगर आपको इस बारे में गूगल पर कुछ मिले तो ज़रूर बताइए। शैली लगभग एक जैसी ही थी। जिन मीडिया समूहों ने जनवरी 2007 के दौरान हुई हिंसा की घटना पर रिपोर्ट प्रकाशित की है। उन्होंने भी इसके लिए हिंदू कार्यकर्ताओं को ज़िम्मेदार ठहराया है।
The Reuters की रिपोर्ट में अक्सर शुरुआत करने वाले को छिपा दिया जाता है। फ्रंटलाइन में प्रकाशित इस रिपोर्ट में साफ़ देखा जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं की तस्वीर लगाई गई है। इसके अलावा उन्हें ही हिंसा के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया है। इस लेख के भीतर कहीं छिपा कर लिखा गया है “19 जनवरी को हिंसा की पहली घटना हुई। जब पूर्व कॉन्ग्रेस नेता सीके शरीफ़ ने सद्दाम हुसैन की फाँसी का विरोध करने के लिए भीड़ एकत्रित की।
सद्दाम हुसैन को हुई फाँसी के विरोध के दौरान हिंसा के लिए विश्व हिंदू परिषद को ज़िम्मेदार ठहराया गया
ठीक इससे मिलती जुलती रिपोर्ट द टेलीग्राफ ने भी प्रकाशित की।
टेलीग्राफ की रिपोर्ट
अब सवाल यह उठता है कि 19 जनवरी को हुई हिंसा की सीधी कवरेज कहाँ है? अगर यह आपको मिलती है तो मैं उसे ज़रूर पढ़ना पसंद करूँगा। क्या भारतीय मीडिया ऐसी घटनाओं पर रिपोर्ट करने के पहले “हिंदू एंगल” खोजती है। असल मायनों में यही है धर्म निरपेक्षता कि हिंदुओं को चिल्ला-चिल्ला कर दोषी ठहराओ। अगर संप्रदाय विशेष के किसी व्यक्ति ने कुछ गलत किया है तब दोनों समुदायों को दोषी कहो। ऐसा करके लोग अपनी रिपोर्टिंग चमकाते रहते हैं। उसके बाद धीरे-धीरे लोग ऐसी घटनाओं का एक पहलू भूल ही जाएँगे।
ऐसा सिर्फ भारत की छोटी बड़ी घटनाओं के मामले में नहीं होता है। न्यूयॉर्क टाइम्स की एलेन बैरी का ट्वीट देखा जा सकता है।
एलन बैरी का ट्वीट
ठीक ऐसे ही एनसीईआरटी ने गोधरा में जलाए गए 59 हिंदुओं की घटना का उल्लेख ही ख़त्म कर दिया है। इसके बाद वह सीधे साल 2002 में हुए गुजरात दंगों का ज़िक्र करते हैं जिसे वह “संप्रदाय विशेष विरोधी दंगा” बताते हैं। यह प्रचार इतना प्रभावी था कि न्यूयॉर्क टाइम की पत्रकार ने मोदी सरकार पर इस घटना को छिपाने का आरोप लगा दिया। वहीं एनसीईआरटी ने इसका ज़िक्र “गुजरात दंगों” के नाम से किया है।
क्या आपको ऐसा लगता है कि इस तरह की करतूत सोशल मीडिया के दौर में नहीं की जा सकती है? फिर से सोचिए, दिल्ली दंगों के बारे में याद करिए। जहाँ एक तरफ दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग सोशल मीडिया पर बहस में उलझे हुए थे। वहीं दूसरी तरह वामपंथी मानसिकता के लोग विकिपीडिया पर इस बारे में एक लेख साझा करने की तैयारी में होंगे। जिसमें दंगे और हिंसा के लिए हिंदुओं को दोषी ठहरा रहे होंगे।
आज से ठीक 10 साल बाद सोशल मीडिया पर उठा यह गुस्सा लगभग सभी भूल जाएँगे। लोगों को 11 अगस्त 2020 को क्या हुआ था इस बारे में सही जानकारी इकट्ठा करने के लिए अच्छी भली मेहनत करनी पड़ेगी। उसके बावजूद सही नतीजे मिले या न मिलें इसका कुछ भरोसा नहीं। ठीक वैसे ही जैसे मुझे साल 2007 की बेंगलुरु में हुई घटना के बारे में जानने के लिए संघर्ष करना पड़ा।
यह अभी से ही शुरू भी हो गया है। बेंगलुरु हिंसा से संबंधित रिपोर्ट्स को धुँधला करना शुरू कर दिया गया है। यह तभी से ही शुरू हो गया था जब तमाम मीडिया समूहों ने मानव शृंखला बना कर मंदिर को बचाने वाली घटना का महिमामंडन करना शुरू कर दिया। यह एक रिपोर्ट में जिसमें पत्रकारों पर दंगाइयों और पुलिस कर्मियों द्वारा हमले की बात कही गई है। इसके अलावा एक और रिपोर्ट है जिसमें कॉन्ग्रेस नेता के प्रति लोगों का गुस्सा दिखाया गया है। घटना को दो दिन भी नहीं हुए हैं और झूठी नैरेटिव फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। सोच कर देखिये आज से 10 साल बाद बेंगलुरु में हुए दंगों को हमारे सामने किस तरह पेश किया जाएगा।
पैगंबर मोहम्मद को लेकर सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट से बेंगलुरु में संप्रदाय विशेष की भीड़ द्वारा किए गए दंगों से ऐसी हिंसा भड़की कि इस तोड़-फोड़ और आगजनी में तीन लोगों की मौत हो गई और करीब 60 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हो गए।
गत मंगलवार, यानी 11 अगस्त की रात को बेंगलुरु के पुलाकेशी नगर में पैगंबर मोहम्मद को लेकर एक पोस्ट से नाराज संप्रदाय विशेष के लोगों ने कॉन्ग्रेस विधायक अंखंड श्रीनिवास मूर्ति के आवास के बाहर जमकर उत्पात, तोड़-फोड़ और आगजनी की।
संप्रदाय विशेष के आक्रोशित लोगों की भीड़ ने पुलाकेशी नगर के विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के आवास और डीजे हल्ली थाने को निशाना बनाया, क्योंकि कॉन्ग्रेस विधायक के भतीजे नवीन द्वारा पैगम्बर मोहम्मद को लेकर एक कथित आपत्तिजनक टिपण्णी की गई थी।
सोशल मीडिया पर अभी तक भी नवीन को लेकर संप्रदाय विशेष के युवकों में गुस्सा देखा जा रहा है और उसे जान से मारने की बातें कही जा रहीं हैं। इन्हीं में से एक ‘ज्वाइन AIMIM’ नाम के फेसबुक ग्रुप में नवीन की तस्वीर शेयर की गई हैं, जिसके कमेंट्स में नवीन को लेकर बेहद भयावह टिप्पणियाँ की जा रही हैं।
आरिफ खान नाम के युवक द्वारा नवीन की एक तस्वीर शेयर की गई है, जिसमें संदेश लिखा है – “यही वो कॉन्ग्रेस MLA का नेफ्यू है, जिसने रसूलल्लाह की शान में गुस्ताखी की है..।”
इस पोस्ट के कमेंट्स में सलमान अंसारी और सरताज ने नवीन को ‘लानत’ दी हैं। अन्सीर बाशा ने लिखा है – “इस को फॉरवर्ड मत करो, सब्र करो और इसका हश्र देखो आगे।”
मुराद आलम ने लिखा है – “इसको मारो।”
शादाब अंसारी ने पैगम्बर के कथित अपमान करने के पर नवीन के लिए लिखा है – “इसको तो चौक पर खड़ा कर के जिन्दा जला दिया जाए, वो भी सजा कम है इस हराम के औलाद को।”
वहीं, मोहम्मद सलीम मंसूरी ने नवीन के लिए उसी भाषा का इस्तेमाल किया है, जो कि पुलवामा आतंकी हमले के मुख्य अभियुक्त अहमद डार ने इस्तेमाल की । सलीम मंसूरी ने लिखा है – “शैतान की औलाद गुफाओं में पैदा हुआ है, ये हरामखोर हरामी गन्दगी पनौती गोबर मूत्र पैशाब पीने वाला हराम की औलाद सूअर शक्ल से लग रहा है गंदगी 1001 %%%%%%%%%% से ज्यादा सत्य है, सच है, इसकी मौत तय है 1001%।”
जावेद खान ने लिखा है – “गोली मारो कुत्ते को।”
इस पूरे पोस्ट में कई लोगों ने नवीन को गोली मारने और जान से मार देने की बात की हैं। जैसा कि इस स्क्रीनशॉट में आप देख सकते हैं –
उल्लेखनीय है कि बेंगलुरु में संप्रदाय विशेष की भीड़ द्वारा किए गए दंगों के दौरान संप्रदाय विशेष की उग्र भीड़ डीजे हल्ली पुलिस स्टेशन के बेसमेंट में घुस गई और कथित तौर पर 200-250 वाहनों में आग लगा दी। खबरों के मुताबिक, कॉन्ग्रेस विधायक के आवास पर तोड़फोड़ करने वाली संप्रदाय विशेष की भीड़ ने मंगलवार (अगस्त 11, 2020) को पुलिस थाने में यह मानकर तोड़फोड़ और वाहनों को क्षतिग्रस्त किया कि पुलिस ने आरोपितों को हिरासत में रखा है।
जिन पुलिसकर्मियों ने दंगाइयों को रोकने की कोशिश की, उन पर भी संप्रदाय विशेष की भीड़ ने हमला किया, जिसके परिणामस्वरूप 60 से अधिक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। मंगलवार रात पूर्वी बेंगलुरु में भड़की इस हिंसा में 3 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए।
12 अगस्त को रिलीज होने के साथ ही ‘सड़क 2’ का ट्रेलर यूट्यूब पर ट्रेंड कर रहा है। महेश भट्ट द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म के ट्रेलर को 24 घंटे के भीतर ही 19 मिलियन से ज्यादा बार देखा जा चुका है। लेकिन ‘सड़क 2’ के ट्रेलर को अब तक 5.8 मिलियन (58 लाख) से ज्यादा बार डिस्लाइक किया चुका है, जो कि अपने आप में बेहद ही खराब रिकॉर्ड है। जबकि इस ट्रेलर को देखकर इसे पसंद या लाइक करने वालों की संख्या महज तीन लाख के आसपास है।
बता दें कि महेश भट्ट की यह मूवी जल्द ही दुनिया की सबसे ज्यादा डिसलाइक वीडियो में शामिल हो चुकी है। सड़क 2 के ट्रेलर ने ज़ूमिंग पास्ट के सबसे खराब प्रदर्शित वीडियो स्वीडिश गमेर पिउडाईपाई के रिकॉर्ड को भी पछाड़ दिया है। वर्तमान में सड़क 2 भारत की सबसे ज्यादा डिसलाइक वीडियो बन गई है। इसके ट्रेलर ने यूट्यूब पर कॉल ऑफ ड्यूटी: इनफिनिट वारफेयर डेविल के ट्रेलर को काफी मार्जिन के साथ पीछे छोड़ दिया है।
वहीं अब सड़क 2 सोशल मीडिया प्लेटफार्म में टॉप 10 मोस्ट डिसलाइक वीडियो में शामिल हो चुका है। यूट्यूब के सबसे डिसलाइक किरदार जेक पॉल, जिसे अब तक 4.9 मिलियन डिसलाइक मिल चुके है, सड़क 2 के इस ट्रेलर ने उसके भी रिकॉर्ड को तोड़ दिया है।
The amount of dislike for sadak 2 trailer is not just because of people boycotting nepotism but also the fact that this is the worst trailer in the history of bollywood. It will be easier 2 watch Tees Maar Khan now since I haveseen the worst @aliaa08@MaheshNBhatt#Sadak2dislike
दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड के बाद से ही लोग फिल्म निर्देशक महेश भट्ट और उनकी बेटी आलिया भट्ट को सोशल मीडिया पर लगातार ट्रोल करते नजर आ रहे हैं। सुशांत के चाहने वाले इन पर नेपोटिज्म का आरोप लगा रहे हैं। सड़क 2 के लॉन्च के साथ ही लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया यूज़र्स ट्विटर पर #Sadak2dislike के साथ इस पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं।
गौरतलब है कि YouTube पर अपने प्रीमियर के कुछ ही घंटों के भीतर सड़क 2 के ट्रेलर को 1.3 मिलियन डिसलाइक मिल चुके थे। जिस वजह से वीडियो स्ट्रीमिंग साइट पर यह अब तक का सबसे अधिक नापसंद करने वाला ट्रेलर बन गया था। ज्ञात हो कि सड़क-2 फ़िल्म, 28 अगस्त को डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज करने की घोषणा हुई है।
सोशल मीडिया पर इस दौरान ‘अनइंस्टॉल हॉटस्टार’ ट्रेंड होता रहा क्योंकि लोगों का कहना है कि इस फिल्म में केवल नेपोटिज्म के प्रोडक्ट्स भरे पड़े हैं, जिन्हें महेश भट्ट आगे बढ़ा रहे हैं। चूँकि इसे ‘डिजनी हॉटस्टार’ पर रिलीज किया जाना है, इसीलिए इसका विरोध हो रहा है। सोशल मीडिया में कई लोगों ने हॉटस्टार को अनइंस्टॉल कर के स्क्रीनशॉट्स भी शेयर किए। अब एक और कारण से फिल्म का विरोध हो रहा।
ये कारण है- इस फिल्म की कहानी। हम जानते हैं कि बॉलीवुड में अक्सर पंडितों और साधु-संतों को धोखेबाज और बलात्कारी दिखाया जाता रहा है जबकि संप्रदाय विशेष के किरदारों को ईमानदार और देश के लिए मर-मिटने वाला प्रदर्शित किया जाता रहा है। इसी तरह ‘सड़क-2’ में भी महेश भट्ट एक ऐसी कहानी लेकर आ रहे हैं, जिसमें एक साधु को बुरा दिखाया जाएगा और उसके काले कृत्यों का खुलासा किया जाएगा।
इस फिल्म में आलिया भट्ट का किरदार एक ऐसी महिला का होगा, जो एक ‘फेक बाबा’ से पंगा लेती है। दिखाया जाएगा कि दुनिया के सामने अच्छा बना रहे वाला गुरु कितना बड़ा अपराधी है और उसका असली चेहरा कुछ और है। ये आलिया बनाम एक आश्रम चलाने वाले बाबा की कहानी है। संजय दत्त का किरदार बाबा को ‘एक्सपोज’ करने में आलिया की मदद करेगा।