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‘मुस्लिमों से शादी करने से लड़कियाँ ज्यादा खुश… मैंने भी मुस्लिम से की’: UP में शिक्षा अधिकारी बबीता सिंह पर लव जिहाद को बढ़ावा देने का आरोप, वसूली में भी फँसी

मुरादाबाद कमिश्नरी के रामपुर जिले के स्वार ब्लॉक में तैनात महिला खंड शिक्षा अधिकारी (एबीएसए) बबीता सिंह पर लव जिहाद, भ्रष्टाचार और वसूली जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। बबीता सिंह पर पहले हिंदू महिलाओं को मुस्लिम समुदाय में शादी के लिए प्रेरित करने के आरोप लगे थे। अब उन पर रिश्वत लेने का भी मामला उजागर हुआ है। इस मामले में डीएम, मंडलायुक्त और बीएसए ने जाँच के आदेश दिए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, तीन महीने पहले बबीता सिंह पर आरोप लगा था कि वे हिंदू महिला शिक्षकों को मुस्लिम युवकों से शादी करने के लिए प्रेरित कर रही थीं। शिक्षिकाओं का कहना है कि एबीएसए बबीता सिंह उन्हें इस्लाम को ज्यादा आजादी और बेहतर जीवनशैली वाला मजहब बताकर शादी के लिए बरगलाती हैं। एक शिकायत में आरोप लगाया गया कि बबीता सिंह कहती हैं, “मुस्लिम युवकों से शादी करने से लड़कियाँ ज्यादा खुश रहती हैं। मैंने भी मुस्लिम युवक से शादी की है।”

महिला शिक्षकों ने शिकायत में कहा कि बबीता सिंह अपने पद का दुरुपयोग कर न केवल लव जिहाद को बढ़ावा दे रही हैं, बल्कि जातिवाद और सांप्रदायिकता भी फैला रही हैं। उनका कहना है कि एबीएसए बच्चों को भी गुमराह करती हैं। इस मामले में प्रशासन ने बबीता सिंह से जवाब माँगा था।

लव जिहाद मामले में बीएसए की तरफ से जारी पत्र (फोटो साभार: भास्कर)

इसी दौरान सोशल मीडिया पर एक ऑडियो वायरल हुआ, जिसमें एबीएसए के कार्यालय के एक बाबू को रिश्वत माँगते हुए सुना गया। ऑडियो में शिक्षक साजिद अली से बीआरसी कार्यालय बुलाकर 10 हजार रुपये माँगने की बात हो रही थी। वहीं, एक अन्य ऑडियो में अध्यापिका रजिया से भी पैसे लेने की बातचीत का जिक्र है। इस मामले में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने संबंधित सभी पक्षों को 8 जनवरी 2025 को जिला कार्यालय में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया था।

आरोपित से माँगी गई सफाई

मामले की गंभीरता को देखते हुए मुरादाबाद के मंडलायुक्त आन्जनेय सिंह ने मण्डलीय सहायक शिक्षा निदेशक (बेसिक) बुद्धप्रिय सिंह को जाँच का आदेश दिया। इसके तहत रामपुर के बीएसए राघवेंद्र सिंह ने बबीता सिंह से स्पष्टीकरण माँगा है। इसमें शिकायत की पुष्टि और समाधान के लिए एक सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने को कहा गया है।

भ्रष्टाचार केस में जारी पत्र (फोटो साभार: भास्कर)

बताया जा रहा है कि रिश्वत और लव जिहाद के आरोपों को अलग-अलग जाँच टीम देख रही है। जिसमें बबीता सिंह के बयान और वायरल ऑडियो की फॉरेंसिक जाँच के आधार पर आगे की कार्रवाई की बात कही जा रही है।

हालाँकि बबीता सिंह ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को निराधार बताया है। उनका कहना है कि कुछ शिक्षक उनके खिलाफ गलत आरोप लगा रहे हैं क्योंकि वे विद्यालयों में अनुशासनहीनता पर कार्रवाई करती हैं।

मुस्लिम से निकाह करने वाली बेटी का भी हिंदू पिता की संपत्ति में अधिकार: दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला, जस्टिस बोले- शादी कर लेने से कोई स्वत: धर्मांतरित नहीं हो जाता है

दिल्ली हाईकोर्ट ने संपत्ति के बँटवारे मामले में सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल मुस्लिम व्यक्ति से विवाह कर लेने मात्र से कोई हिंदू धर्म का व्यक्ति इस्लाम में स्वत: धर्मांतरित नहीं हो जाता।

कोर्ट की यह टिप्पणी ‘डॉक्टर पुष्पलता एवं अन्य बनाम रामदास HUF एवं अन्य’ केस में की गई। मामला, दरअसल ये था कि फ्रेंड्स कॉलोनी में रहने वाले व्यक्ति राम दास ने दो शादियाँ (एक बीवी के गुजरने के बाद दूसरी) की थीं। पहली पत्नी से उनकी 2 बेटियाँ थीं और दूसरी पत्नी से 2 बेटे।

हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के 9 सितंबर 2005 के लागू होने के बाद से बेटियाँ भी पिता की संपत्ति में अधिकारी थीं। ऐसे में 2007 में मुकदमा दायर हुआ। पहली पत्नी से हुई बड़ी बेटी ने मुकदमा व्यक्ति की दूसरी पत्नी के दोनों बेटो पर किया।

आरोप लगाया गया कि ये लोग उनसे बिन पूछे या बिन सहमति लिए उनके पिता की संपत्ति बेचने, उसे अलग करने और उसे निपटाने की कोशिश कर रहे थे। जबकि बेटियों के पास मुकदमे की संपत्तियों में से प्रत्येक का 1/5 हिस्सा था।

पिता ने उस समय इस आधार पर बेटी द्वारा दायर किए गए मुकदमे का विरोध किया कि बेटी ब्रिटेन में पाकिस्तान मूल के किसी मुस्लिम व्यक्ति से निकाह कर चुकी थी और वहीं रहती थी। पिता का कहना था कि बेटी अब हिंदू नहीं है इसलिए उनकी संपत्ति में उनका अधिकार नहीं है।

बाद में केस की सुनवाई के बीच ही दिसंबर 2008 में व्यक्ति की मौत हो गई और उनका केस बेटों ने लड़ा। कोर्ट ने अब इसी मामले में ये पाया कि प्रतिवादियों को ये साबित करना था कि वादी की बड़ी बेटी अब हिंदू नहीं है, लेकिन वो लोग ऐसा नहीं कर पाए।

ऐसे में कोर्ट ने कहा प्रतिवादी अपना दायित्व पूरा करने में असफल रहे, क्योंकि इस दावे को प्रमाणित करने के लिए कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया कि सबसे बड़ी बेटी ने हिंदू धर्म त्याग दिया था या औपचारिक रूप से इस्लाम धर्म अपना लिया था।

अदालत ने कहा कि महिला ने हलफनामे के माध्यम से अपने साक्ष्य में स्पष्ट रूप से कहा है कि उस व्यक्ति के साथ अपने नागरिक विवाह के बाद भी वह अपने धर्म अर्थात हिंदू धर्म का पालन करती रही है।

जस्टिस जसमीत सिंह मामले की सुनवाई करते हुए बोले- “मेरे विचार से, किसी मुस्लिम से विवाह करने मात्र से हिंदू धर्म से इस्लाम में स्वतः धर्मांतरण नहीं हो जाता। वर्तमान मामले में, प्रतिवादियों द्वारा किए गए मात्र कथन के अलावा, प्रतिवादियों द्वारा कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया है जिससे यह साबित हो सके कि वादी संख्या 1 ने इस्लाम में धर्मांतरण की मान्यता प्राप्त प्रक्रिया अपनाई है।”

न्यायालय ने कहा कि चूँकि महिला ने अपना धर्म नहीं बदला है, इसलिए वह एचयूएफ संपत्तियों में अपना हिस्सा “दावा करने की हकदार” है। कोर्ट ने माना कि नियमानुसार बेटियाँ एचयूएफ के नाम पर पीपीएफ खाते में जमा राशि में से प्रत्येक को केवल 1/4 हिस्सा पाने की हकदार थीं। वहीं प्रॉपर्टी में 2 संपत्तियों की हकदार हैं।

जापान के मंदिर में रखी हुई है नेताजी की अस्थियाँ, बेटी ने घर लाने की PM मोदी से की अपील: सुभाषचंद्र बोस के साथ कॉन्ग्रेस के ‘अन्याय’ को भी उजागर कर चुकी हैं अनीता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (23 जनवरी 2025) को पराक्रम दिवस के अवसर पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस को श्रद्धांजलि दी। यह नेताजी की 128वीं जयंती है। इस अवसर पर वे संसद भवन के सेंट्रल हॉल में स्कूली बच्चों से भी मिले। उधर, नेताजी बोस की बेटी अनीता बोस फाफ ने पीएम मोदी से सुभाषचंद्र बोस की पार्थिव अवशेषों को जापान से भारत लाने की अपील की है।

अनीता बोस ने एक प्रेस रिलीज जारी करके कहा कि नेताजी की अस्थियाँ पिछले आठ दशकों से टोक्यो के रेंकोजी मंदिर में रखी हुई हैं। भारत की पिछली सरकारों के इरादे पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि दशकों तक देश की सरकारें नेताजी सुभाषचंद्र बोस के पार्थिव अवशेषों को वापस लाने के मामले पर झिझकती रहीं या फिर इनकार करती रहीं।

उन्होंने आगे कहा, “एक समय तो रेंकोजी मंदिर के पुजारी और जापान की सरकार उनके (नेताजी सुभाषचंद्र बोस) के अवशेषों को उनकी मातृभूमि वापस भेजने के लिए इच्छुक, तैयार और उत्सुक थे। हमें यह स्वीकार करना होगा कि उस दिन ताइवान के ताइपेई (तब जापान के कब्जे में था) में उड़ान भरते समय हुई विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।”

नेताजी की बेटी अनीता बोस के अनुसार, सरकारों की यह झिझक शायद इस उम्मीद के कारण थी कि नेताजी की मौत 1945 में नहीं हुई थी। उन्होंने आगे लिखा, “नेताजी को अब और निर्वासित न रखें! उन्हें घर लौटने की अनुमति दें। कई हमवतन आज भी उन्हें याद करते हैं, उनका सम्मान करते हैं और उनसे प्यार करते हैं।”

तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने नेताजी को मरणोपरांत भारत रत्न देने का फैसला किया था, लेकिन दबाव की वजह से उन्हें यह फैसला वापस लेना पड़ा था। नेताजी को भारत रत्न नहीं देने के पीछे सरकार ने वजह बताई कि अगर ऐसा किया जाएगा तो इस बात की पुष्टि हो जाएगी कि नेताजी की वास्तव में मृत्यु हो गई है।

इससे पहले अनीता बोस ने अगस्त 2019 में पीएम मोदी से जापान के रेनकोजी मंदिर में रखी नेताजी की अस्थियों की डीएनए जाँच कराने का अनुरोध किया था। उन्होंने कहा कि इससे उनके पिता की मौत की सच्चाई सामने आ जाएगी। उन्होंने दावा किया था कि पिछली सरकारों में कुछ ‘खास लोग’ नहीं चाहते थे कि नेताजी की मृत्यु पर से रहस्य का पर्दा कभी उठे।

इसी तरह साल 2022 में अनीता बोस ने एक भारतीय चैनल को इंटरव्यू देते हुए कहा था कि उनके पिता और भारत में उनके पिता की विरासत के साथ काफी गलत किया गया। वो कहती हैं कि नेताजी एक धर्मनिष्ठ हिंदू थे और वो धर्म के नाम पर लोगों की हत्या नहीं कर सकते थे, जैसा कि देश के बँटवारे के बाद हुआ था। बता दें कि विभाजन के दौरान लाखों हिंदुओं की हत्याएँ हुई थीं।

नेताजी की बेटी के मुताबिक, उनके पिता विद्रोही स्वभाव के थे। इसके कारण महात्मा गाँधी उन्हें अपने बस में नहीं कर पा रहे थे। गाँधीजी ने पंडित नेहरू का पक्ष लिया था। उन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस के एक धड़े ने नेताजी के साथ गलत किया, उनके साथियों की निंदा की गई। नेताजी के सहयोगियों को वो लाभ भी नहीं मिला, जो कि अंग्रेजों के लिए लड़ने वालों को मिला। 

ढाबा मुस्लिमों का, नाम हिंदू देवी-देवताओं पर: गुजरात में बस यात्रियों के साथ 27 हॉल्ट पर चल रही थी धोखाधड़ी, रोडवेज ने रद्द किया अनुबंध

गुजरात में मुस्लिम मालिक हिन्दू नामों से ढाबा लाइसेंस लिए हुए थे। वह इन हिन्दू नामों के आधार पर गुजरात राज्य सड़क परिवहन निगम (GSRTC) से अनुबंध भी कर चुके थे। यहाँ गुजरात की सरकारी बसें आकर रुकती थीं। यात्री इन्हें हिन्दू ढाबा समझ कर खाना खाते थे। अब इस मामले में सरकार ने कार्रवाई की है।

GSRTC ने राज्य के ऐसे 27 ढाबों के साथ अपना अनुबंध रद्द कर दिया हैं। इन ढाबों पर अब सरकारी बसें नहीं रुका करेंगी। इनमें से कुछ ढाबे ऐसे थे, जिनके मालिक मुस्लिम हैं लेकिन ढाबों के नाम हिन्दू देवी-देवताओं पर रखे गए थे।

यह ढाबे वडोदरा, राजकोट, गोधरा, मेहसाणा, भुज, भरूच, अहमदाबाद, नाडियाड और पालनपुर जैसे डिवीजन में बने हुए है। इस लिस्ट में भुज-ध्रगंधरा-अहमदाबाद रोड पर स्थित होटल शिवशक्ति भी है। इस होटल का नाम हिंदू देवता के नाम पर रखा गया था और इसका लाइसेंस भी हिन्दू के नाम पर था लेकिन इसके मालिक और प्रबंधक मुसलमान थे।

यही कारनामा सूरत-अहमदाबाद रोड पर स्थित होटल तुलसी ने भी किया था। इसके अलावा भरूच डिवीजन में आने वाले सूरत-अहमदाबाद रोड पर स्थित होटल मारुति का परमिट भी रद्द कर दिया गया है। वडोदरा-गोधरा-मोडासा रोड पर स्थित होटल वृंदावन का परमिट भी रद्द हो गया है।

इसके अलावा अहमदाबाद-राजकोट रूट पर होटल सर्वोदय, अहमदाबाद-बालासिनोर-गोधरा-झालोद रूट पर होटल श्रीजी, अहमदाबाद-सूरत रोड पर होटल सहयोग, होटल गैलेक्सी, होटल रोनक, अहमदाबाद-ध्रगंधा-भुज रूट पर होटल सर्वोदय, सूरत- अहमदाबाद रोड पर बने होटल सतीमाता का भी परमिट रद्द हुआ है।

गौरतलब है कि GSRTC गुजरात सरकार की रोडवेज सेवा है। इसके पास 8 हजार से ज्यादा बसें हैं। इनमें से तमाम बसें लम्बे रूट पर चलती हैं। यह लम्बी रूट की बसें रास्ते में कुछ जगह ढाबों पर रुकती हैं ताकि याती ब्रेक ले सकें। यह ढाबे GSRTC तय करती है और इसके लिए टेंडर निकलते हैं।

इन्हीं में मुस्लिमों ने गड़बड़ी की। इससे पहले भी सोशल मीडिया पर मुस्लिम मालिकों द्वारा हिंदू नामों से चलाए जा रहे होटलों-ढाबों की जाँच की माँग लगातार उठती रही है। अब GSRTC ने कार्रवाई कर दी है।

न मामला ऊँच-नीच का, न दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने से रोका: टाइम्स ऑफ इंडिया ने फैलाया झूठ, जानिए राजस्थान के एक गाँव में हुई शादी में क्यों मौजूद था पुलिस बल

राजस्थान के अजमेर के लवेरा गाँव में दलित दूल्हे की बारात को लेकर भारत के जाने-माने मीडिया संस्थान टाइम्स ऑफ इंडिया ने झूठ फैलाने का काम किया है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी खबर में बताया कि लवेरा में एक अनुसूचित जाति के दूल्हे की बारात में भारी पुलिस बल (100 से अधिक) साथ-साथ था क्योंकि गाँव में ऊँची जाति के लोगों ने उसके घोड़ी चढ़ने का विरोध किया था…।

देख सकते हैं कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी खबर को शेयर करते हुए ट्वीट में भी यही लिखा। अब सच्चाई असल में क्या है आइए बताते हैं।

लवेरा गाँव में जिस दूल्हे की बारात में पुलिस की मौजूदगी को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया ने झूठ फैलाया है, उस दूल्हे का नाम विजय रैगर है, जिनकी शादी लवेरा गाँव के रहने वाले नारायण खोरवाल की बेटी अरुणा से 21 जनवरी 2025 को हुई।

विजय की बारात में पुलिस की मौजूदगी का कारण ये नहीं था कि गाँव में किसी ऊँची जाति वाले ने उन्हें घोड़ी पर बैठने से रोका, बल्कि ये मामला तो ऊँची-नीची जाति का था ही नहीं।

रिपोर्टों के अनुसार, गाँव की बहुल आबादी गुर्जरों की है यानी ओबीसी समुदाय की। सबसे दिलचस्प बात ये है कि खबरें भी यही बताती हैं कि गुर्जर समाज ने दूल्हे को घोड़ी से नहीं उतारा। उलटा उसका ऐसा स्वागत किया कि गुर्जर समाज के पंच पटेल व ग्रामीण खुद उसकी बारात में शामिल हो गए। वहीं दुल्हन को भी इसी समुदाय के लोगों ने ऐसे विदा किया जैसे वो इनकी अपनी बेटी हो।

अब रही बात पुलिस कर्मियों की मौजूदगी की… तो बारात में पुलिस वाले सिर्फ इसलिए शामिल थे ताकि किसी भी तरह के विवाद की आशंका न रहे। ये आशंका भी इसलिए क्योंकि 20 साल पहले गाँव में ऐसी घटना हुई थी। साल 2005 में नारायण की बहन सुनीता की शादी खरवा निवासी दिनेश के साथ हो रही थी, मगर ग्रामीणों ने बारात आने पर विरोध कर दिया था।

बताया जा रहा है कि तब दिनेश को चूँकि घोड़ी पर बैठने नहीं दिया गया था, इसलिए पुलिस उसे जीप से लेकर आई थी। उस वक्त भी शादी में जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन मौजूद था। इसी घटना को देखते हुए विजय रैगर की बारात में विवाद की आशंका उठी। अरुणा के पिता ने पुलिस प्रशासन से अपील की और पुलिस सुरक्षा लिहाज से बारात के साथ रही।

हालाँकि, बाद में दुल्हन के पिता ने खुद ये बोला कि उन्हें डर था कि कहीं ऐसा विवाद न हो, लेकिन बारात वाले दिन किसी ने कुछ नहीं कहा।बारात 2:30 बजे लवेरा गाँव के राजकीय आयुर्वेद औषधालय पहुँची। वहाँ से 5 ढोल वालों के साथ बारात में शामिल लोग नाचते गाते अलग-अलग मार्ग से होते हुए वधू के घर पहुँचे और फिर शादी रीति-रिवाज से संपन्न हुई।

खबरों से स्पष्ट है कि 20 साल पहले हुए विवाद के कारण पुलिस ने एहतियातन कदम उठाए थे लेकिन न तो 20 साल पहले हुए विवाद में इसमें ऊँची जाति के लोग इसमें शामिल थे और न अब उनके कारण ऐसी कोई आशंका थी… जैसा कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने ऊँची जाति लिखकर पाठकों को भ्रमित करने की कोशिश की।

झुंड बनाकर आए इस्लामी शासक, फिर भी भारी पड़ा विजयनगर; लेकिन मुस्लिम कमांडरों की गद्दारी ने बदल दिया ‘तालीकोटा युद्ध’ का परिणाम: मंदिरों-भव्य इमारतों की जमीन बन गई बंजर

भारत अपनी सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान, परंपरा और विपुल धन संपदा के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध रहा है। यही कारण है कि धन के लोभी और उन्नत संस्कृति से घृणा करने वाले कबायलियों की नजरों में भारत अक्सर खटकता रहा और उन्होंने यहाँ कई हमले भी किए। इस दौरान उन्होंने ना सिर्फ भारत की धन-संपदा को लूटा, बल्कि यहाँ की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को भी रौंदने की कोशिश की।

हालाँकि, उन्हें भारतीय शासकों की ओर से बड़ी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, जिसके कारण भारत में आज भी सनातन अपनी प्राचीन परंपरा एवं वैभव के साथ जिंदा है। भारतीय राजा-महाराजा युद्ध भूमि में अपने धर्मशास्त्रों में वर्णित आचरण का पालन करते हुए युद्ध लड़ते, जिनमें रात्रि में हमला नहीं करना, निहत्थों को नहीं मारना, भागते हुए दुश्मन का पीछा नहीं करना, स्त्रियों-बच्चों एवं आम लोगों को नुकसान नहीं पहुँचाना शामिल था।

वहीं, इस्लामी आक्रमणकारी युद्ध भूमि में मानवीय मूल्यों को ताक पर रखते थे। इसके कारण वे भारत के हिस्सों को जीतने में समय-समय पर कामयाब भी रहे। इस्लामी हमलावर आम लोगों में दहशत फैलाने के लिए नरसंहार को अंजाम देते और महिलाओं एवं बच्चों को बंधक बनाकर खरीद-फरोख्त का भी काम करते थे। इन बर्बरता के बावजूद भारत मजबूती से लड़ा और वह इस्लामी मुल्क नहीं बन पाया।

ऐसी ही एक लड़ाई दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य द्वारा लड़ी गई। 16वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य के मंत्री राम राय के खिलाफ अहमदनगर, बरार, बीदर, बीजापुर और गोलकुंडा के मुस्लिमों के शासकों ने संघ बनाकर हमला किया। इसमें राम राय के भरोसेमंद कमांडरों- गिलानी भाइयों ने उनकी मदद की। युद्ध में राम राय की मृत्यु हो गई और विजयनगर साम्राज्य का पतन हो गया।

‘तालीकोटा (तालिकोटा) का युद्ध’ या ‘राक्षसी-तांगड़ी का युद्ध’ के नाम से प्रसिद्ध यह लड़ाई 1565 ईस्वी में तालीकोटा और राक्षसी-तांगड़ी गाँव के पास लड़ी गई थी। ये उत्तरी कर्नाटक में स्थित है। तालीकोटा नाम का शहर बीजापुर शहर से 80 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। इस युद्ध में 23 जनवरी 1565 को राम राय की मृत्यु हो गई। इसके बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों ने लगभग पाँच महीनों तक विजयनगर को लूटा और उसे नष्ट कर दिया। कर्नाटक में हम्पी का खंडहर इसका उदाहरण है।

मंत्री राम राय (साभार: Notes on Indian History)

विजयनगर देश के दक्षिणी भाग का सबसे उन्नत एवं वैभवशाली साम्राज्य था और हम्पी उसकी राजधानी थी। इस साम्राज्य की स्थापना 1336 ईस्वी में हरिहर और बुक्का नाम के दो भाइयों ने की थी। उनके पिता का नाम संगम था और उसी के आधार पर यह संगम वंश कहलाया। इस साम्राज्य के पहले राजा हरिहर हुए। इसी साम्राज्य में आगे चलकर राजा कृष्णदेव राय जैसे प्रभावशाली शासक भी हुए।

इतिहासकार हरमन कुलके और डाइटमार रॉदरमंड ने ‘हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ के नाम से भारतीय इतिहास का सर्वेक्षण लिखा था। इसमें इन दोनों इतिहासकारों ने लिखा है कि आलिया (दामाद) राम राय के नेतृत्व में विजयनगर साम्राज्य तालीकोट की लड़ाई जीत रहा था, लेकिन अचानक विजयनगर सेना के दो मुस्लिम सेनापतियों ने अपना पक्ष बदल लिया और वे मुस्लिम सुल्तानों के संघ में जा मिले।

युद्ध के पीछे कोई सांप्रदायिक मंशा नहीं: ‘इतिहासकारों’ का तर्क

तालीकोटा युद्ध को लेकर रिचर्ड ईटन, मुजफ्फर आलम और संजय सुब्रह्मण्यम जैसे इतिहासकारों का कहना कि युद्ध के पीछे कोई सांप्रदायिक इरादे नहीं थे। यह अहमदनगर के निज़ामों के खिलाफ़ राजा राम राय के पुराने युद्ध के कारण शुरू हुआ था। युद्ध के मैदान में विजयनगर के दो मुस्लिम सेनापतियों के मुस्लिम सुल्तानों के साथ मिल जाने को भी वे सांप्रदायिक रूप से नहीं देखते और उसे उचित ठहराने की कोशिश करते हैं।

इन इतिहासकारों का मानना है कि सल्तनतों द्वारा अचानक दिखाई गई एकता का सबसे प्रमुख कारण राम राय की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं, विशेष रूप से कल्याण को नियंत्रित करने की उनकी इच्छा थी। कल्याण उत्तरी दक्कन में एक पुराना शहर था, जो 11वीं और 12वीं शताब्दी के दौरान चालुक्य साम्राज्य की राजधानी थी। बता दें कि चालुक्य सोलंकी वंश के क्षत्रिय (राजपूत) से संबंधित थे।

तालीकोटा का युद्ध

16वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य पर कृष्णदेवराय का शासन था। वे एक योग्य प्रशासक और कुशल कूटनीतिज्ञ थे। राम राय उनके दामाद (जिन्हें स्थानीय भाषा में आलिया कहा जाता है) थे। वे एक बहादुर सेनापति और एक चतुर योद्धा थे। उनके नेतृत्व में कई सैन्य अभियानों को सफलता से अंजाम दिया गया था। राजा कृष्णदेवराय की मृत्यु के बाद विजयनगर की गद्दी उनके भाई अच्युतदेव राय को सौंप दी गई।

राजा अच्युतदेव राय की सन 1542 में मृत्यु हो गई। आगे चलकर इस गद्दी पर अच्युतदेव राय के बेटे एवं कृष्णदेव राय के भतीजे सदाशिव राय बैठे। उस समय वे नाबालिग थे। इसलिए राम राय उनके संरक्षक की भूमिका में थे। मंत्री के तौर पर राम राय ने अपने भरोसेमंद लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया। उस दौरान विजयनगर साम्राज्य आस-पड़ोस के निजामों की आँखों में खटक रहा था।

कहा जाता है कि धर्म के प्रति राम राय का दृष्टिकोण व्यापक और उदार था। उन्होंने अपनी सेना में बहुत से मुस्लिम सैनिकों को भर्ती किया था। राम राय ने बीजापुर के निजाम आदिल शाह द्वारा हटाए गए कई लोगों को अपने साम्राज्य में शरण दी थी। दरअसल, राम राय की रणनीति में राज्य का विस्तार करना और कूटनीतिक निर्णय लेना शामिल था, क्योंकि विजयनगर साम्राज्य पाँच मुस्लिम शासकों से घिरा हुआ था।

मुस्लिम बहमनी शासकों का विजयनगर के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया था। राजा राम अपनी कूटनीति की वजह से इन पाँचों मुस्लिम शासकों में दो को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिए थे। राम राय ने बीजापुर के निजाम आदिल शाह के अनुरोध पर अहमदनगर पर हमला किया। इसके बाद आदिल शाह को सबक सिखाने के लिए अहमदनगर के निज़ाम और गोलकुंडा के निजाम कुतुब शाह की सहायता की।

इस तरह राम राय लगातार मुस्लिम सल्तनतों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देकर विजयनगर के साम्राज्य की रक्षा कर रहे थे। हालाँकि, यह रणनीति लंबे समय तक काम नहीं आई, क्योंकि पाँचों मुस्लिम सल्तनत के निजामों को एहसास हो गया कि राम राय उन्हें आपस में लड़ा रहे हैं और उन पाँचों का साझा दुश्मन एक ही है और वह है विजयनगर साम्राज्य। इनमें से कुछ निजाम आपस में रिश्तेदार भी थे।

अहमदनगर के निज़ाम की बेटी चाँद बीबी का निकाह बीजापुर के सुल्तान आदिल शाह से हुई और आदिल शाह की बहन का निकाह निज़ाम के बेटे से हुई थी। निकाह समारोह में इस्लामी सल्तनत एकजुट हुए और समारोह के बाद विजयनगर साम्राज्य के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने का फैसला किया। आदिल शाह ने राम राय के पास एक दूत भेजा और विजयनगर के दो प्रमुख किलों- रायचूर और मुदगल की माँग की।

हालाँकि, राम राय ने आदिल शाह के दूत को मना कर दिया। उसके बाद कई अन्य लोगों ने भी ऐसा ही किया। इसके बाद दक्कन की पाँचों सल्तनत की सेनाएँ विजयनगर की ओर बढ़ीं और तालीकोटा में आकर रूकी। यह आज के राक्षसी-तांगड़ी कहलाती है। इधर राम राय ने विजयनगर में सैनिकों को इकट्ठा कर युद्ध की तैयारी शुरू कर दी थी। सेना में एक लाख घुड़सवार और पाँच लाख पैदल सैनिक शामिल थे।

इन लोगों को सल्तनत की सेना को कृष्णा नदी में प्रवेश करने से रोकने का काम सौंपा गया था। हालाँकि, सेना आगे बढ़ गई। राम राय को पाँचों सल्तनतों को इकट्ठा होने की उम्मीद नहीं थी। इसलिए उन्होंने पहले से इसकी तैयारी नहीं की थी। इतिहासकारों के अनुसार, उन्होंने अपनी सेना को सल्तनत पर सीधे हमले करने का आदेश दिया और कहा, “हम इस तुच्छ युद्ध से डरने वाले कायर नहीं हैं! आगे बढ़ो, लड़ो।”

आखिरकार यह रणनीति कारगर साबित नहीं हुई, क्योंकि बड़ी संख्या में हिंदू सैनिक मरने लगे। हालाँकि, बाकी लोग पूरे धैर्य के साथ युद्ध लड़ते रहे। विजयनगर की इस सेना ने ने बहमनी सल्तनतों के बाएँ हिस्से की पूरी सेना को मार गिराया। इससे सल्तनत शासकों में चिंता पैदा हो गई। इनमें से कुछ ने अपने शिविरों के सामने ‘रहतानात’ (इस्लामी शपथ कि जिहाद में मरने पर जन्नत होगी) के बोर्ड भी लगा दिए।

हालाँकि निजाम शाह, कुतुब शाह, आदिल शाह और अली बरीद की संयुक्त सेना ने हिम्मत जुटाई और हिंदू सैनिकों पर हमला कर दिया। अली आदिल शाह ने राम राय के भाई तिरुमाला राय पर हमला किया, जबकि अन्य ने राम राय के अन्य महत्वपूर्ण सैनिकों पर हमला किया। बाद में आदिल शाह ने राम राय पर हमला किया और निजाम शाह और कुतुब शाह को सीधे उसका सामना करने दिया।

विजयनगर के मुस्लिम सेनापतियों ने पाला बदल लिया

इस बीच विजयनगर साम्राज्य के कई मुस्लिम सैनिकों ने राम राय के लिए लड़ने से इनकार कर दिया। उन्होंने या तो अपने हथियार डाल दिए या राम राय के खिलाफ सल्तनत में शामिल हो गए। उन्होंने हिंदू राजा की तरफ से लड़ने से साफ इनकार कर दिया। उल्लेखनीय है कि उनकी यह कार्रवाई गिलानी भाइयों द्वारा निर्देशित थी, जो राम राय के दो भरोसेमंद सेनापति थे।

इसके बाद सल्तनत ने विजयनगर सेना पर दो तोपें चलाईं, जिसमें अधिकांश सैनिक मारे गए। एक गोली उस हाथी पर मारी गई, जिस पर राम राय बैठे थे। वे घायल हो गए। इसके बाद उन्हें निज़ाम के पास ले जाया गया। निजाम शाह ने राम राय का सिर काट दिया और विजयनगर जैसे विशाल हिंदू साम्राज्य का पतन हो गया। इसके बाद जिहादी सेना बचे हुए सैनिकों का पीछा किया और उन्हें मार डाला।

इस्लामी सैनिकों ने विजयनगर को खूब लूटा

पाँचों मुस्लिम राज्यों के सुल्तानों ने इसे अल्लाह की जीत बताते हुए जीत वाली जगह पर 20 दिनों तक रहकर जश्न मनाते रहे। कहा जाता है कि लगभग बीस मील का क्षेत्र शवों से अटा पड़ा था। धरती खून से लथपथ थी। कहा जाता है कि 10 लाख लोग मारे गए थे। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, युद्ध के मैदान में पड़े शवों की संख्या गिनने में 12 दिन का समय लगा था।

जब इस्लामी सैनिकों को घाव भर गए तो वे बदला लेने की कसम खाते हुए राजधानी हम्पी की ओर बढ़े। उन्होंने सभी ऊँची, भव्य इमारतों, मंदिरों को लूटा और जला कर उसे ध्वस्त कर दिया। इस्लामी सेना वहाँ 6 महीने तक डेरा डाले रही और 20 मील दायरे के हर घर, मंदिर, इमारत और बस्ती लूटा और जला दिया। इस्लामी सेना ने हम्पी को बंजर भूमि और खंडहर में तब्दील कर दिया।

आज भी हम्पी को कन्नड़ में ‘हालूहम्पी’ (बर्बाद हम्पी) के नाम से जाना जाता है। अपनी पुस्तक ‘द फॉरगॉटेन एम्पायर‘ में रॉबर्ट सेवेल ने लिखा है, “आग और तलवार के साथ वे (मुस्लिम) विनाश को अंजाम दे रहे थे। शायद दुनिया के इतिहास में ऐसा कहर कभी नहीं ढाया गया। इस तरह एक समृद्ध शहर का लूटने के बाद नष्ट कर दिया गया और वहाँ के लोगों का बर्बर तरीके से नरसंहार कर दिया गया।”

हम्पी का हजारों साल पुराना इतिहास

विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी को कभी ‘मंदिरों का नगर’ (City of Temple) कहा जाता था, आज इसे ‘खंडहरों का शहर’ (City of Ruins) कहा जाता है। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची (UNESCO World Heritage Sites) में शामिल इस स्थान को देखकर इसके अतीत के वैभव का अंदाजा लग सकता है। इस शहर का हजारों वर्ष पुराना इतिहास है।

हम्पी का वर्णन रामायण और पुराणों में ‘पम्पा देवी तीर्थ क्षेत्र’ के रूप में किया गया है। इसे ‘किष्किंधा’ भी कहा गया है। यहाँ ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के अशोक महान के समय के भी प्रमाण मिल चुके हैं। तुंगभद्रा नदी के तट पर बसा हम्पी आज 1,600 से अधिक जीवंत अवशेषों का साक्षी है, जिनमें दुर्ग, राजमहल, राजप्रासाद, मंदिर, स्तंभ, मंडप, स्मारक, जल संरचनाएँ आदि शामिल हैं। 

विजयनगर साम्राज्य में वर्तमान के कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के भूभाग आते थे। हम्पी राजधानी के अलावा विजयनगर साम्राज्य का प्रमुख व्यापारिक एवं धार्मिक केंद्र भी था। यहाँ रोम से लेकर पुर्तगाल के व्यापारी आते थे। कहा जाता है कि विजयनगर साम्राज्य में हम्पी अपने वैभव के चरमोत्कर्ष पर था और उसे रोम से भी सुंदर शहर कहा जाता था।

रोम से भी सुंदर थी राजधानी हम्पी

15वीं शताब्दी में विजयनगर का दौरा करने वाले फ़ारसी यात्री अब्दुर रज्जाक ने अपने संस्मरणों में हम्पी और विजयनगर का वर्णन किया है। रज्जाक ने लिखा है, “यह देश इतनी आबादी वाला है कि एक इसके बारे में एक विचार व्यक्त करना असंभव है। राजा के खजाने में कई कक्ष हैं, जिनमें पिघलाए हुए सोने भरे हए हैं। देश के सभी निवासी, चाहे उच्च हों या नीच, पूरे तन पर आभूषण पहनते हैं।”

अब्दुर रज्जाक ने राजधानी की भव्यता को लेकर कहा था, “विजयनगर के समान दुनिया में कोई शहर नहीं है। यह ऐसा है कि आँख की पुतली ने कभी इस तरह की जगह नहीं देखी और ना ही बुद्धि के कान को कभी यह सूचित गया है कि पूरी दुनिया में इसके बराबर भी कुछ मौजूद है।” यहाँ 1600 से अधिक हिंदू, बौद्ध और जैन मंदिर थे। यहाँ का विट्ठल मंदिर और विरुपाक्ष मंदिर विश्व प्रसिद्ध है।

मंत्रियों की गाड़ियों पर फूँके करोड़ों, पर फोरेंसिक लैब के लिए पैसे नहीं: महीनों से अटकी है एक CD की जाँच, हाई कोर्ट ने पंजाब की AAP सरकार से विज्ञापन का माँगा हिसाब

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब की AAP सरकार को लताड़ लगाई है। हाई कोर्ट ने भगवंत मान की सरकार से सरकारी विज्ञापन पर खर्च किए गए पैसे की जानकारी देने को कहा है। भगवंत मान सरकार ने हाई कोर्ट को बताया था कि फोरेंसिक लैब्स अपग्रेड करने का पैसा उसके पास नहीं है। हाई कोर्ट ने यह भी पूछा है कि पुलिस अधिकारियों के लिए कितनी गाड़ियाँ सरकार ने इस ‘फंड की कमी’ के बीच खरीदी।

एक CD की जाँच से जुड़ा है मामला

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक CCTV वीडियो की CD से जाँच के मामले में की है। दरअसल, पंजाब पुलिस ने विनय कुमार नाम के एक व्यक्ति को ड्रग्स से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार किया था। विनय के वकील ने दावा किया था कि जहाँ पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी 16 सितम्बर, 2023 को दिखाई है, वहीं उसे असल में 14 तारीख को ही दोस्त के घर से पकड़ लिया गया था। इस बात के सबूत के लिए उसने घर के CCTV वीडियो भी कोर्ट को एक CD में दिए थे।

हाई कोर्ट ने इस CD को जाँच के लिए दिया था। यह CD सेंट्रल फोरेंसिक चंडीगढ़ भेजी थी। हालाँकि, हाई कोर्ट तब काफी नाराज हुआ जब इसकी जाँच रिपोर्ट नहीं आई। हाई कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि आखिर पंजाब के भीतर बनी 4 फोरेंसिक लैब में CD जाँच जैसी सुविधाएँ तक नहीं है। इस बीच भगवंत मान सरकार ने कोर्ट को यह बताने की कोशिश की कि उसने सभी लैब को अपग्रेड करने के लिए काफी पैसा दिया है लेकिन इस बीच यह भी स्वीकार कर लिया कि उसके पास CD जाँच करने की सुविधा अभी नहीं है।

हाई कोर्ट ने लगाई लताड़

हाई कोर्ट ने इस मामले में भगवंत मान सरकार से यह भी पूछा था कि वह राज्य की फोरेंसिक लैब्स को क्यों नहीं अपग्रेड कर रहे और इस काम के लिए उन्हें कितना और समय चाहिए। इसको लेकर पंजाब में फोरेंसिक विभाग के मुखिया अश्विनी कालिया ने राज्य के चीफ सेक्रेटरी के साथ ने 21 जनवरी, 2025 को एक जवाब दाखिल किया था।

इसमें उन्होंने फोरेंसिक विभाग में वीडियो की जाँच के लिए खरीदे फोरेंसिक वाले उपकरणों को लेकर लिए गए एक्शन का विवरण दिया था। उन्होंने बताया था कि 9 जनवरी, 2025 को इस संबंध में एक बैठक हुई थी और 4 सप्ताह के भीतर ये प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। उन्होंने बताया था कि यह वीडियो की जाँच करने वाले उपकरण केवल एक ही लैब के लिए खरीदे जाएँगे।

कालिया ने कहा था कि बाकी तीनों लैब को अपग्रेड करने का पैसा भगवंत मान सरकार के पास नहीं है और इसको लेकर बजट नहीं दिया गया है। इस बात हाई कोर्ट नाराज हो गया। हाई कोर्ट ने कहा कि वह राज्य सरकार से ऐसे जवाब की आशा नहीं रखते थे।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मुदगिल ने कहा, “यदि राज्य सरकार ने आधुनिक जाँच/नई तकनीकों से खुद को लैस करने की इच्छा दिखाई होती, तो बजट की मंजूरी 1-2 दिन यहाँ तक कि कुछ घंटों में दी जा सकती थी। खासकर इस डिजिटल समय और AI के दौर में।

विज्ञापन पर खर्च का हिसाब भी पूछा

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने फंड की कमी का रोना रोने पर भगवंत मान की सरकार से यह भी पूछ लिया कि आखिर वह विज्ञापन पर इस बीच कितना खर्च कर रही है। हाई कोर्ट ने सरकार से कहा कि वह एक सप्ताह के भीतर अप्रैल, 2024 से जनवरी, 2025 के बीच विज्ञापन पर खर्च पैसे की जानकारी दे।

हाई कोर्ट ने कहा, “राज्य सरकार को अपने मुख्य सचिव के माध्यम से चालू वित्तीय वर्ष में यानी 01 अप्रैल, 2024 से 20 जनवरी, 2025 तक सरकार के काम और उपलब्धियों के बारे में विज्ञापनों के प्रकाशन और पुलिस अधिकारियों के लिए खरीदी गई गाड़ियों पर किए गए खर्च का ब्योरा देने का आदेश दिया जाता है।”

मंत्रियों को दी थी 20 गाड़ियाँ

जहाँ पंजाब सरकार अपराध नियंत्रण के लिए जरूरी फोरेंसिक लैब के लिए पैसे की कमी बता रही है तो वहीं उसने 2024 में ही मंत्रियों को 20 गाड़ियाँ दी हैं। भगवंत मान की सरकार में शामिल 15 में से 10 मंत्रियों को जनवरी, 2024 में 1-1 इनोवा और 1-1 बोलेरो दी थी। यह उनके काफिले में चलेंगी। इनकी कीमत लगभग ₹4 करोड़ बताई गई है।

पंजाब सरकार ने हाल ही में पुलिस के लिए भी 100 से ज्यादा टोयोटा हाईलक्स गाड़ियाँ खरीदी थीं। सरकार ने बताया था कि यह नई फ़ोर्स के लिए हैं। महँगी गाड़ियाँ खरीदने का मामला केवल मंत्रियों और पुलिस तक सीमित नहीं है। दिसम्बर, 2024 में ही यह खबर आई थी कि मुख्यमंत्री भगवंत मान के लिए नई लैंड क्रूजर गाड़ियाँ खरीदी जानी हैं।

इससे पहले सितम्बर, 2023 में पंजाब सरकार ने 10 सीटों वाले एक हवाई जहाज के लिए टेंडर निकाला था। यह टेंडर तब निकाला गया था जब राज्य सरकार के पास एक हेलिकॉप्टर पहले से है। विरोध के बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। यह जानकारी देने वाले RTI एक्टिविस्ट को भी पुलिस ने धमकाया था।

क्लेम कमीशन की सिफारिश के अनुसार पीड़ितों को जारी करो मुआवजा: दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में AAP सरकार को हाई कोर्ट का निर्देश, नई योजना बनाने से किया था इनकार

दिल्ली दंगों के पीड़ितों को जल्द से जल्द मुआवजा दिलाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि ‘क्लेम कमीशन’ की सिफारिश के मुताबिक दिल्ली सरकार उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के पीड़ितों को सहायता राशि जारी करे।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, 20 याचिकाओं के समूह का यह मामला जस्टिस सचिन दत्ता की पीठ के समक्ष सुना गया। इसमें याचिकाकर्ताओं ने ‘दंगा पीड़ितो की सहायता के लिए सहायता योजना’ के अनुसार मुआवजा माँगा गया था। कुछ याचिकाकर्ता इसमें बढ़ाकर मुआवजा देने की माँग भी कर रहे थे।

15 जनवरी को इन याचिकाओं के बाबत कोर्ट को जानकारी देते हुए बताया गया कि उत्तर-पूर्वी दंगा दिल्ली आयोग ने बैच में से 14 याचिकाओं के संबंध में दावों के संबंध में सिफारिशें की हैं। अदालत को ये भी बताया गया कि उत्तर-पूर्वी दंगा दिल्ली आयोग द्वारा निर्धारित और अनुशंसित राशि याचिकाकर्ताओं के हक की राशि का एक अंश थी। फिर भी जल्द से जल्द अनुशंसित राशि जारी करने के लिए दिल्ली सरकार को निर्देश जारी किए जाने चाहिए।

कोर्ट में जब दिल्ली सरकार के वकील द्वारा इस माँग का विरोध नहीं किया गया तो अदालत ने इस संबंध में आदेश पारित किया। कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी नंबर 2 यानी दिल्ली सरकार को वर्तमान मामलों के समूह में याचिकाकर्ताओं के लिए उत्तर पूर्व दंगा दिल्ली आयोग द्वारा अनुशंसित राशि जारी करने का निर्देश दिया जाता है।” यह आदेश यह सुनिश्चित करता है कि मुआवजे की राशि याचिकाकर्ताओं के अधिकारों और तर्कों को ध्यान में रखते हुए दी जाएगी।

इस मामले की अगली सुनवाई 29 मई को होगी। इससे पहले, अदालत ने स्पष्ट किया था कि वह कोई नई योजना नहीं बनाएगी, बल्कि केवल यह देखेगी कि क्या दिल्ली सरकार ने पहले से बनाई गई योजना के अनुसार काम किया है या नहीं।

गौरतलब है कि दिल्ली के उत्तर पूर्वी इलाके में साल 2020 में हिंदू विरोधी दंगे हुए थे। इस दौरान 53 लोगों की मौत हुई थी। पुलिस की जाँच में सामने आया था कि ये दंगा पूर्व नियोजित था। दंगों को लेकर करीबन 750 एफआईआर दर्ज हुई थी और कई आरोपित गिरफ्तार हुए थे। ताहिर हुसैन उन्हीं आरोपितों में से एक है।

बाहुबल ऐसा कि कहलाते हैं ‘छोटे सरकार’, फिर कौन है सोनू-मोनू जिसने कर दी फायरिंग: पंचायती करने गए अनंत सिंह पर हमले की पूरी डिटेल, AK-47 का भी इस्तेमाल

बिहार के मोकामा में बुधवार (22 जनवरी 2025) को ताबड़तोड़ फायरिंग की बड़ी घटना हुई, जिसमें मोकामा के बाहुबली नेता और पूर्व विधायक अनंत सिंह और कुख्यात सोनू-मोनू गैंग के बीच गोलीबारी हुई। बताया जा रहा है कि इस घटना में करीब 60-70 राउंड गोलियाँ चलीं। घटना मोकामा प्रखंड के नौरंगा-जलालपुर गाँव में हुई। फायरिंग के दौरान अनंत सिंह बाल-बाल बच गए। वहीं, उनके एक समर्थक उदय यादव को गोली लगने की खबर है, जिन्हें इलाज के लिए पटना के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना तब शुरू हुई जब सोनू-मोनू गैंग ने गाँव के एक परिवार को धमकाकर उनके घर से बाहर निकाल दिया और उनके घर पर ताला लगा दिया। इसकी सूचना मिलने पर अनंत सिंह अपने समर्थकों के साथ गाँव पहुँचे। अनँत सिंह के गाँव में पहुँचते ही सोनू-मोनू गैंग ने फायरिंग शुरू कर दी। गोलीबारी के दौरान अनंत सिंह बाल-बाल बच गए। हालाँकि उनके एक समर्थक उदय यादव को गर्दन में गोली लगी और उन्हें गंभीर हालत में पटना के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। फायरिंग की इस घटना के बाद नौरंगा गाँव को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है। प्रशासन ने इलाके में शांति बनाए रखने के लिए कड़े इंतजाम किए हैं।

इस घटना के बाद तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई हैं। एक एफआईआर पुलिस ने अनंत सिंह और सोनू-मोनू गैंग के समर्थकों के खिलाफ दर्ज की है। दूसरी एफआईआर सोनू-मोनू के पिता ने अनंत सिंह और उनके समर्थकों पर दर्ज कराई है। वहीं, तीसरी एफआईआर पीड़ित ग्रामीण ने सोनू-मोनू और उनके समर्थकों के खिलाफ कराई है।

बाढ़ डीएसपी राकेश कुमार ने कहा, “घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची। घटनास्थल से तीन खोखे बरामद किए गए हैं। अब तक तीन एफआईआर दर्ज की गई हैं, जिनमें एक पुलिस ने सोनू-मोनू और अनंत सिंह दोनों के खिलाफ की है। घटना में शामिल सभी आरोपितों की पहचान की जा रही है।” उन्होंने कहा कि घटना के बाद गाँव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। बाढ़ अनुमंडल के कई थानों की पुलिस मौके पर कैंप कर रही है।

अनंत सिंह ने ‘किडनैपर’ और ‘चोर’ कहा

इस घटना को लेकर अनंत सिंह ने मीडिया से बात करते हुए सोनू-मोनू को ‘किडनैपर’ और ‘चोर’ बताया। उन्होंने कहा, “सोनू-मोनू जैसे अपराधी गाँव वालों का जीवन नरक बना रहे हैं। पुलिस अगर समय पर कार्रवाई करती, तो यह घटना नहीं होती। मुझे किसी केस की परवाह नहीं है। मैं लोगों के साथ खड़ा हूँ।” अनंत सिंह ने यह भी कहा कि वह गाँव के गरीब लोगों की समस्याओं का समाधान करने पहुँचे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सोनू-मोनू गैंग ने पहले गोली चलाई, जिसके बाद उनके समर्थकों ने जवाबी कार्रवाई की।

सोनू-मोनू गैंग का रिएक्शन, 68 के होकर 34 वाले से भिड़ने चले आए

जानकारी के मुताबिक, सोनू और मोनू मोकामा के ही जलालपुर गाँव के निवासी हैं। दोनों भाइयों ने 2009 में अपराध की दुनिया में कदम रखा और पहले अनंत सिंह के लिए काम किया करते थे। अनंत सिंह के जेल जाने के बाद उन्होंने अपनी अलग गैंग बना ली। इनका नाम कई आपराधिक मामलों में सामने आ चुका है। दोनों पर जमीन कब्जाने, ट्रेनों में आपराधिक वारदातों को अंजाम देने, हत्या, वसूली और स्थानीय लोगों को धमकाने के आरोप हैं। बताया जाता है कि इनके संबंध उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी से भी रहे हैं।

दरअसल, अनंत सिंह के जेल से निकलने के बाद मोनू सिंह उनसे मिलने पहुँचा था। लोगों को लगा कि रिश्ते में सुधार होने लगा, लेकिन इसके बाद फिर से वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई। बताया ये भी जा रहा है कि सोनू-मोनू ने अनंत सिंह को मारने के लिए सुपारी भी ली थी, और कई बार हमले की कोशिश भी हो चुकी है। इसके लिए गैंग ने एके-47 भी खरीदी थी, जिसका इस्तेमाल इस गोलीबारी में भी होने का अनुमान है।

इस घटना के बाद सोनू-मोनू गैंग का भी रिएक्शन सामने आया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि अनंत सिंह की तरफ से पहले फायरिंग हुई।

गौरतलब है कि बिहार के मोकामा क्षेत्र में अनंत सिंह को ‘छोटे सरकार’ के नाम से जाना जाता है। उनकी राजनीतिक ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ कथित रूप से चुनावी सिंबल से ज्यादा उनका नाम काम करता है। उनकी पत्नी नीलम देवी फिलहाल राजद की विधायक हैं, हालाँकि वो जेडीयू के खेमे में मानी जाती हैं।

पीलीभीत में ढेर हुए थे जिस खालिस्तानी संगठन के आतंकी, उसने ही ली महाकुंभ में आग की जिम्मेदारी: ATS-NIA की रडार पर 1000 संदिग्ध, NSUI नेता शाहिद से पूछताछ

प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ में हाल ही में लगी आग की जिम्मेदारी खालिस्तान जिंदाबाद फ़ोर्स (KZF) ने ली है। इस संगठन के ही तीन आतंकी हाल में पीलीभीत में पुलिस ने मार गिराए थे। KZF ने अग्निकांड को एनकाउंटर का बदला करार दिया है। इस अग्निकांड की जाँच अब NIA और यूपी ATS कर रही हैं। कई संदिग्धों को इस मामले में पकड़ा भी गया है।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, 19 जनवरी, 2025 को प्रयागराज महाकुंभ के कुछ टेंटों में लगी आग में खालिस्तानी एंगल सामने आया है। लंदन और ग्रीस से चलने वाले KZF आतंकी समूह ने इस आग का कारण ब्लास्ट बताया था और दावा किया था कि उसने ही यह काम किया है।

KZF ने दावा किया है कि वह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहते थे और केवल यह दिखाना चाहते थे कि क्या करने की क्षमता रखते हैं। यह पूरी बात उन्होंने मीडिया संस्थानों को भेजे गए एक ईमेल में लिखी है। उन्होंने इसे एक शुरुआत बताया है और पीलीभीत एनकाउंटर को फर्जी करार दिया है। पुलिस अभी इस खालिस्तानी एंगल को नकार रही है।

हालाँकि, NIA और ATS ने आग लगने के दौरान आसपास मौजूद 1000 लोगों पर जाँच चालू की है। यह भी बताया गया है कि इन 1000 में से लगभग 900 हिन्दू नहीं हैं। ऐसे में शक और भी गहरा हो गया है। इनसे पूछताछ के लिए नोटिस भेजे जा रहे हैं।

दावा है कि ATS वाराणसी से 10 लोगों को हिरासत में ले चुकी है। इनसे पूछताछ चल रही है। संदिग्धों से पूछताछ के लिए सवालों की एक लिस्ट तैयार की गई है। इसमें उनकी महाकुंभ में आस्था से लेकर घटनास्थल के वीडियो फोटो से जुड़े सवाल तक हैं।

वाराणसी में NSUI नेता शाहिद से भी पूछताछ हुई है। उन्हीं लोगों से मुख्य तौर पर पूछताछ हो रही है जिन्होंने घटना के दिन महाकुंभ को सोशल मीडिया पर दिखाया था और लोकेशन भी साझा की थी। इनमें से शक उन पर अधिक है जिन्होंने बाद में फोटो वीडियो डिलीट किए।

मामले में दूसरे प्रदेशों की पुलिस को भी अलर्ट भेज दिया गया है। जिनसे पूछताछ हुई है, उन्हें शहर ना छोड़ने को कहा गया है। धमकी में फ़तेह सिंह बागी का नाम भी लिखा है। सुरक्षा एजेंसियों को शक है कि यह वही बागी है जिसका हाल ही में गुरदासपुर हमले में नाम आया था। वह ब्रिटिश आर्मी का एक सैनिक रहा है और आतंकियों का हैंडलर है।

महाकुंभ शुरू होने से पहले खालिस्तानी आतंकी पन्नू ने भी हमला करने की बात कही थी। उसने भी पीलीभीत एनकाउंटर को फेक बताया था और बदला लेने की बात कही थी। इसको लेकर उसने वीडियो जारी किए थे।

गौरतलब है कि 19 जनवरी, 2025 को प्रयागराज महाकुंभ में आग लगी थी। यह आग सेक्टर 19 में लगी थी। इसमें कई टेंट जल गए थे। आग पर कुछ ही मिनटों के भीतर काबू पा लिया गया था। इसका कारण एक खाना बनाने वाले सिलेंडर का फटना बताया गया था। आग में किसी की जान नहीं गई थी।