पाकिस्तानी हिंदुओं का एक समूह वाघा-अटारी बॉर्डर होते हुए सोमवार (3 फरवरी 2025) को 480 अस्थियाँ लेकर भारत आया है। ये अस्थियाँ पाकिस्तानी हिंदुओं के परिजनों की हैं जिनकी इच्छा थी कि ये गंगा नदी में ही प्रवाहित की जाएँ। भारत आने वाले समूह में कराची के श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर के महंत रामनाथ मिश्रा भी हैं जो इस काज के लिए चुने जाने पर खुद को धन्य और सौभाग्यशाली मानते हैं।
मीडिया से बातचीत में रामनाथ मिश्रा ने कहा,
“पाकिस्तान में कई हिंदुओं की इच्छा होती है कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी अस्थियाँ गंगा में विसर्जित की जाएॉँ। उनके परिजन उनकी यह अंतिम इच्छा पूरी करना चाहते हैं। ऐसे में अस्थियों को मंदिरों में कलश में सुरक्षित रखा जाता है। जब पर्याप्त संख्या में कलश इकट्ठे हो जाते हैं, तो भारत का वीजा लेने का प्रयास किया जाता है। इस तरह मृतक या उनके परिवारों की अंतिम इच्छा पूरी होती है। हम लगभग 400+ कलश लेकर आए हैं। ये अस्थियाँ पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों से एकत्रित की गई हैं। इन्हें मोक्ष के लिए गंगा में विसर्जित किया जाएगा।”
जानकारी के मुताबिक, इस समूह को महाकुंभ के वक्त अस्थियाँ लेकर भारत आने का वीजा मिला। इनके पास अभी लखनऊ और हरिद्वार जाने का वीजा है, लेकिन इन्हें प्रयागराज जाने की अनुमति मिलने का भी इंतजार है। इसे पाकर वह न केवल लखनऊ और हरिद्वार घूमेंगे बल्कि प्रयागराज जाकर संगम में डुबकी भी लगाएँगे।
वहीं अस्थियाँ विसर्जन की बात करें तो जानकारी यही है कि ये अस्थियाँ 4 से 21 फरवरी तक दिल्ली के सबसे पुराने और बड़े श्मशान घाट, निगम बोध घाट पर रखी जाएँगी। फिर यहाँ कई लोग आकर इन्हें श्रद्धांजलि देंगे और 21 फरवरी को वैदिक रीति-रिवाजों के साथ अस्थियों को हरिद्वार ले जाया जाएगा। 22 फरवरी को सीता घाट पर इनका विसर्जन होगा। इस दौरान 100 किलो दूध की आहुति दी जाएगी।
बता दें कि पाकिस्तान में लोग आर्थिक मजबूरी और अन्य वजहों के कारण अपने परिजनों की अस्थियाँ खुद भारत लाने में सक्षम नहीं होते। ऐसे में उन्हें इंतजार रहता है कि कोई ऐसा मिले तो इस काम में उनकी मदद कर दे। वैसे उनके पास सिंधु नदी का विकल्प होता है मगर फिर भी कोशिश होती है कि अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित की जाएँ।
ये तीसरी बार है जब पाकिस्तानी हिंदुओं की अस्थियाँ भारत लाई गई हैं। इससे पहले ऐसा साल 2011 और फिर साल 2016 में हुआ था। कराची मंदिर के संरक्षक रामनाथ ही 2011 में करीबन 135 अस्थियाँ और 2016 में 160 अस्थियाँ लेकर भारत आए थे। इनमें कुछ को तो 64 साल से संभालकर रखा गया था। इस बार 480 अस्थियाँ लाते हुए राम नाथ मिश्रा ने बताया कि उन्होंने अस्थियों को 8 साल से श्मशान में रखा हुआ था। जब सरकार से इन्हें भारत लाने की अनुमति दी तो उन्होंने सुरक्षा सुनश्चित करते हुए उन्हें सफेद प्लास्टिस जार में रख दिया था, फिर इनपर लाल रंग के ढक्कन लगाए गए थे।
बांग्लादेशी घुसपैठियों को लम्बे समय तक जेल में रखे जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल से जवाब माँगा है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि आखिर इन घुसपैठियों को वापस उनके देश क्यों नहीं भेजा जा रहा है। यह टिप्पणियाँ सुप्रीम कोर्ट ने इन घुसपैठियों की वकालत करने वाले एक समूह की जनहित याचिका पर की हैं।
क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस R महादेवन की बेंच ने 30 जनवरी को याचिका पर सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हम यह समझना चाहते हैं कि एक बार बांग्लादेश से आए घुसपैठिए को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए जाने के बाद क्या यह साबित नहीं हो जाता कि वह भारतीय नहीं है?”
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, “ऐसे सैकड़ों अवैध प्रवासियों को अनिश्चित काल के लिए डिटेंशन सेंटर या सुधार गृह में रखने का क्या मतलब बनता है? केंद्र सरकार को हमारे द्वारा पूछे गए सवालों का जवाब देना होगा।” कोर्ट ने अवैध बांग्लादेशियों को वापस भेजे जाने में देरी पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने कहा, “हमारे मन में केवल एक यह कन्फ्यूजन है कि एक बार जब किसी घुसपैठिए पर मुकदमा चलाया जाता है और उसे दोषी ठहरा दिया जाता है तो फिर विदेश मंत्रालय से उसकी नागरिकता के सत्यापन की क्या जरूरत पड़ती है।”
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल से भी जवाब तलब किया है। कोर्ट ने कहा, “हम पश्चिम बंगाल से भी जानना चाहेंगे कि क्या इस मामले में उनकी कोई भूमिका है। हम केंद्र सरकार से यह भी जानना चाहेंगे कि ऐसे मामले में पश्चिम बंगाल से क्या अपेक्षा रखी जाती है।”
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि जब 2009 में गृह मंत्रालय में 30 दिनों के भीतर घुसपैठियों की पहचान करने का नियम बनाया था तो अब इसे क्यों नहीं लागू किया जा रहा। उसने इनको वापस भेजने में की जा रही देरी पर भी प्रश्न उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से वर्तमान में जेलों में बंद बांग्लादेशी घुसपैठियों का ताजा आँकड़ा देने को कहा है।
NGO ने डाली है याचिका
यह सारी टिप्पणियाँ सुप्रीम कोर्ट ने कॉमनवेल्थ ह्यूमन राईट इनिशिएटिव (CHRI) नाम के NGO द्वारा दायर की जनहित याचिका पर की। CHRI ने यह याचिका सबसे पहले 2011 में कलकत्ता हाई कोर्ट में डाली थी। इस याचिका में कहा गया था कि जेलों में बंद बांग्लादेशी घुसपैठियों की स्थिति दयनीय है और उनके मामलों में राज्य और केंद्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं।
CHRI ने कह़ा था कि इन घुसपैठियों की सजा पूरी होने के बाद भी इन्हें वापस इनके देश नहीं भेजा जा रहा। इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने नोटिस जारी किया था। हालाँकि, कार्रवाई ना होती देख याचिका करने वाले सुप्रीम कोर्ट चले आए थे। इसके बाद इस पर सुनवाई चालू हुई है।
गौरतलब है कि बीते कुछ समय से सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने को लेकर तेजी से काम कर रही हैं। जनवरी महीने में ही देश के अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों रोहिंग्या और बांग्लादेशी गिरफ्तार किए गए हैं।
डेनमार्क के एक दक्षिणपंथी नेता रास्मस पलुदन ने तुर्की दूतावास के सामने कुरान जलाकर प्रदर्शन किया है। उन्होंने स्वीडन में मारे गए ईसाई सलवान मोमिका की हत्या के प्रतिरोध में कुरान जलाई है। सलवान मोमिका की स्वीडन में हाल ही में हत्या कर दी गई थी। पलुदन ने इसे सलवान मोमिका को श्रद्धांजलि बताया है।
1 फरवरी, 2025 को कोपनहेगन में तुर्की दूतावास के सामने रास्मस पलुदन कुरान की कई प्रतियाँ लेकर पहुँचे। इसके बाद उन्होंने इन्हें जलाया और सलवान मोमिका के समर्थन में भाषण दिए। इसको लेकर सोशल मीडिया पर कई वीडियो भी साझा की गई हैं।
पलुदन ने कुरान जलाने के बाद कहा, “मैं कोपेनहेगन में तुर्की के दूतावास में कुछ कुरान के साथ खड़ा हूँ। जैसा कि आप देख सकते हैं, यहाँ पहले से कुरान जल रही है।यह सलवान मोमिका के बलिदान और इस्लाम की उनकी आलोचना की याद में है… मुझे इस बड़ी किताब को जलाने में बहुत मज़ा आया।”
रास्मस पलुदन ने कहा कि वह इस्लाम की आलोचना के साथ ही सलवान मोमिका के बलिदान को नमन कर रहे हैं और इसके लिए कुरान जला रहे हैं। रास्मस पलुदन इससे पहले भी कई बार कुरान जला चुके हैं। उन्हें कुछ मामलों में सजा भी हुई है। पलुदन को लगातार इस्लामी कट्टरपंथी धमकियाँ भेजते रहे हैं।
रास्मस ने कहा, “मुस्लिम और इस्लाम हमारे देशों में कभी भी शान्ति से नहीं रह पाएंगे। इसलिए, या तो वे वापस वहीं चले जाएँ से वे आए थे, या हमें तकलीफे सह कर अपना धर्म छोड़ना होगा।यही एकमात्र विकल्प हैं। और वे हमें अपनी बातों से नहीं बल्कि हिंसा से बदलेंगे।”
कुरान जलाने की इस घटना के बाद रास्मस पलुदन की जिन्दगी को खतरा और भी बढ़ गया है। 38 वर्षीय रास्मस पलुदन एक दक्षिणपंथी नेता हैं जो लगातार यूरोप में बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथ और अवैध शरणार्थियों को लेकर बोलते रहे हैं। रास्मस पलुदन ने रमजान में कुरान जलाने का ऐलान भी किया था।
उन पर बेल्जियम और स्वीडन में घुसने को लेकर प्रतिबंध लगाया गया है। वह डेनमार्क के चुनावों में भी हिस्सा ले चुके हैं। हालाँकि, उनकी पार्टी को कम वोट मिले थे। उनके इन एक्शन के चलते दंगे भी हो चुके हैं। गौरतलब है कि सलवान मोमिका को 30 जनवरी को स्वीडन के स्टॉकहोम में उनके फ़्लैट के भीतर मार दिया गया था। मोमिका एक ईराकी ईसाई थे जिन्होंने कुरान जलाई थी।
दिल्ली चुनावों के बीच जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है जो बताती है कि राजधानी में बांग्लादेशी और रोहिंग्याओं की अवैध घुसपैठ से यहाँ की जनसांख्यिकी में परिवर्तन होने लगा है।
JNU की रिपोर्ट
114 पन्नों की इस रिपोर्ट का शीर्षक ही ये है कि ‘दिल्ली में अवैध प्रवासी: सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक परिणामों का विश्लेषण।’ दिल्ली की हालात को बयां करने वाले इस अध्य्यन में बताया गया है कि कैसे चुनाव के समय राजनैतिक पार्टियाँ वोट पाने के लिए इन लोगों का नाम रजिस्टर करवाती हैं जिससे राजधानी की धार्मिक संरचना में परिवर्तन आया है।
Kejriwal’s AAP is selling out Delhi for vote bank politics!
– A JNU report exposes how AAP is enabling illegal Rohingya & Bangladeshi migration.
– Fake voter registrations & IDs are being handed out to illegals.
रिपोर्ट में बताया गया है कि बांग्लादेश से आए घुसपैठियों के कारण मुस्लिम आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इनसे न केवल राजधानी में भीड़भाड़ बढ़ी है बल्कि शहर के संसाधन जैसे स्वास्थ्य, सेवा और शिक्षा पर भी दबाव बढ़ा है।
ये लोग आते हैं और दिल्ली के सीलमपुर, जामिया नगर, जाकिर नगर, सुल्तानपुरी, मुस्तफाबाद, जाफराबाद, द्वारका, गोविंदपुरी और इलाकों में बस जाते हैं।
फर्जी दस्तावेज बनवाकर ले रहे श्रमिकों की नौकरी
इनके यहाँ रहने की व्यवस्था करवाने में पूरा नेटवर्क चलता है, जिसमें दलाल से लेकर मजहबी का प्रचार-प्रसार करने वाले लोग शामिल होते हैं। इनकी मदद से घुसपैठिए फर्जी दस्तावेज बनवाने में कामयाब हो जाते हैं और जगह-जगह अपने रोजगार करने लगते हैं। वहीं रहने के लिए इनकी अनाधिकृत बस्तियों की संख्या बढ़ती जाती है और राजधानी के बुनियादी ढाँचे पर असर दिखने लगता है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि ये अवैध प्रवासी कम वेतन वाली नौकरियों में स्थानीय श्रमिकों की जगह ले रहे हैं, जिससे सामाजिक और आर्थिक संरचना पर प्रभाव पड़ रहा है। वहीं जनसंख्या की दृष्टि से बात करें तो स्टडी में साफ तौर पर कहा गया है कि राजधानी में मुस्लिम आबादी की वृद्धि हुई है और धार्मिक संरचना में भी बदलाव आया है।
सब्सिडी देख और बढ़ रहे अवैध प्रवासी
उधर, दिल्ली सरकार जो रोहिंग्याओं को सब्सिडी देने का काम करती है उसे लेकर भी रिपोर्ट में चिंता जाहिर की गई है। कहा गया है कि ऐसे संसाधन उपलब्ध कराने से दिल्ली में और अधिक अवैश प्रवासियों आने की कोशिश करेंगे। ऐसे दिल्ली की समस्या घटने की जगह और बढ़ जाएगी।
दिल्ली विधानसभा चुनाव के 5 फरवरी, 2025 को मतदान होना है। नतीजे 8 फरवरी को आने वाले हैं। मतदान से पहले सारी पार्टियों ने पूरा जोर लगा दिया है कि वोटरों को अपने पक्ष में किया जाए। भाजपा और AAP अपने बड़े नेताओं समेत मैदान में उतरी हुई हैं। कॉन्ग्रेस भी इस बार जोर लगा रही है। भाजपा जहाँ ढाई दशक का सूखा खत्म करना चाहती है तो वहीं AAP हैट्रिक लगाना चाहती है। कॉन्ग्रेस भी अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की जुगत में है।
सर्वे ने बढ़ाई AAP की चिंता
इस बीच सर्वे एजेंसी सी वोटर का एक सर्वे सामने आया है, जिससे AAP की चिंता बढ़ सकती है। 1 फरवरी तक जुटाए गए डाटा के हिसाब से सी वोटर ने यह सर्वे दिया है। सी वोटर के सर्वे के अनुसार, दिल्ली की 43.9% जनता मौजूदा AAP सरकार के कामकाम से नाराज है। इन लोगों ने कहा है कि वह सरकार में बदलाव चाहते हैं।
वहीं 38.3% लोगों का कहना है कि वह सरकार के कामकाज से नाराज नहीं हैं और उसे बदलना नहीं चाहते। वहीं 10.9% आबादी ऐसी भी है जो सरकार के कामकाज से नाराज तो है लेकिन सरकार में बदलाव नहीं चाहती। ऐसे में सबसे अधिक तादाद उनकी ही है, जो सरकार से नाराज हैं।
सी वोटर के ही सर्वे में जनवरी में 46.9% लोगों ने कहा था कि वह सरकार से नाराज नहीं है और कोई बदलाव नहीं चाहते। बदलाव ना चाहने वालों की संख्या अब घट गई है। यह AAP के लिए चिंता का सबब बन सकती है। क्योंकि अगर वो लोग, जो नाराज हैं, बदलने के मूड में आते हैं तो AAP को दिक्कत होगी।
5 बड़े फैक्टर तय करेंगे चुनाव
दिल्ली चुनाव 5 बड़े फैक्टर तय करेगे कि सत्ता में AAP बनी रहेगी या बदलाव होगा। इसमें सबसे पहला फैक्टर मुस्लिम वोट का बँटवारा होगा। दिल्ली में लगभग 13% मुस्लिम वोट है। यह वोट AAP के दिल्ली की राजनीति में आने से पहले कॉन्ग्रेस के पास था। 2015 और 2020 के चुनाव में यह वोट AAP के पास चला गया।
इसमें अगर कॉन्ग्रेस सेंध लगाती है तो AAP को सीट और वोट शेयर, दोनों का नुकसान होना तय है। इस बार कॉन्ग्रेस चुनाव में सीधे हमले केजरीवाल पर कर रही है, ऐसे में AAP को नुकसान हो सकता है। वहीं दूसरा बड़ा फैक्टर दलित वोट है।
यह वोट भी कभी कॉन्ग्रेस के पास हुआ करता था। इसमें AAP के अलावा भाजपा ने भी सेंध लगाई है। दलित वोट पर भाजपा दिल्ली में हरियाणा और महाराष्ट्र की तरह स्थानीय स्तर पर काम कर रही है। भाजपा ने दलितों को भरोसा दिया है कि वह पहले से चल रही स्कीम जारी रखेंगे और नई स्कीम भी लाएँगे।
जो दलित बस्तियां झुग्गी-झोपड़ी वाली हैं, उनमें भाजपा ने पक्का घर देने का वादा किया है। इससे भी बड़ा फर्क पड़ने का अनुमान है। वहीं इस चुनाव में चेहरे की लड़ाई भी बड़ी है। पिछले चुनाव के मुकाबले केजरीवाल की छवि को धक्का लगा है।
शराब घोटाला मामले में आरोप और जेल के चलते उनका पर्सनल ब्रांड उतना मजबूत नहीं रहा है, वहीं कुछ ही महीनों के लिए सीएम बनाई गई आतिशी भी उस तरह की लोकप्रियता नहीं बटोर सकी हैं। वहीं दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी का जलवा बरकरार है। वोटर के मन में उसको लेकर कोई बदलाव नहीं है।
चुनाव में वादे भी बड़ा रोल निभा रहे हैं। भाजपा इस बार केजरीवाल के ‘मुफ्त वादों’ की राजनीति का मुकाबला नहले पे दहला मार के कर रही है। उसने दिल्ली में महिला योजना के तहत सबसे अधिक ₹2500 का वादा किया है। पुरानी स्कीमें भी चलाते रहने का वादा भाजपा ने किया है।
कॉन्ग्रेस का वोट भी पलट सकता है सत्ता
दिल्ली विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन चुनाव का रुख मोड़ सकता है। कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन दिल्ली में लगातार गिरा है। इसका सीधा फायदा AAP को हुआ है। कॉन्ग्रेस का वोट पूरी तरह से AAP को शिफ्ट हुआ है। भाजपा के चुनाव ना जीतने के बाद भी राज्य में 35%-40% वोट उसका लगातार बना हुआ है।
वहीं दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस का 2008 के चुनाव के बाद से वोट लगातार खिसका है। 2008 में जहाँ कॉन्ग्रेस को 35% वोट मिला था तो वहीं 2013 में यह घट कर 24% हो गया। 2015 के चुनाव में कॉन्ग्रेस 9.7% पर आ गई और 2020 में तो वह 4% पर आकर अटक गई।
कॉन्ग्रेस का ख़ोया हुआ वोटबैंक सीधे तौर पर AAP को फायदा पहुँचा रहा है। कॉन्ग्रेस ने 2025 चुनाव में ‘करो या मरो’ वाली रणनीति से काम किया है। वह केजरीवाल से अपना वोट बैंक वापस लेना चाहती है। उसका मानना है कि केजरीवाल भले ही हार जाएँ पर यदि उसका वोट बैंक बढ़ा तो भविष्य में उसे फायदा मिल सकता है।
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी तक केजरीवाल पर सीधे हमले कर रहे हैं। शीशमहल, शराब घोटाल और यमुना को लेकर केजरीवाल को घेरा जा रहा है। कॉन्ग्रेस स्थानीय स्तर पर AAP को नुकसान पहुँचाना चाहती है। अगर कॉन्ग्रेस का वोट शेयर वापस 10% पार हुआ तो केजरीवाल को काफी दिक्कत होगी।
समय-समय पर भारत विरोधी प्रोपगेंडा फैलाने वाली इंडो-अमेरिकी अर्थशास्त्री क्षमा सावंत भारत आने को परेशान हैं। उनका कहना है कि वह तीन हफ्तों से इमरजेंसी वीजा के लिए अप्लाई करके उसका इंतजार कर रही हैं लेकिन अभी तक वह मंजूर नहीं हुआ। क्षमा ने अपने वीजा मंजूर न होने का गुस्सा भारत सरकार पर इल्जाम लगाकर निकाला। उन्होंने दक्षिणपंथियों के खिलाफ कुंठा दिखाते हुए पीएम मोदी पर आरोप लगाया कि ये सब उनसे द्वेष भावना के कारण किया जा रहा है।
क्षमा सावंत ने अपने एक्स अकॉउंट परट्वीट करते हुए साफ यही लिखा है कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा सरकार उन्हें उनकी बीमार माँ को देखने जाने के लिए वीजा नहीं दे रही है। उन्होंने कहा है कि वो अकेली नहीं है, कई अन्य एक्टिविस्ट और पत्रकार भी हैं जिन्हें भारत में घुसने से रोका जा रहा है।
India's PM Modi & the BJP government are denying me a visa to see my ill mother.
I’m not alone. Modi has retaliated against other activists & journalists, denying or revoking entry into India.
बता दें कि क्षमा सावंत ने समय-समय पर मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का काम करती रही है। मौजूदा जानकारी के अनुसार, साल 2020 में भारत में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को भेदभावपूर्ण बताते हुए इसके खिलाफ एक प्रस्ताव पास कराया था। इसके बाद सावंत ने पीएम नरेंद्र मोदी की कठोर आलोचना की थी। उन्होंने भारत में चले किसान आंदोलन के समर्थन में भी एक प्रस्ताव पारित कराया था।
अब अपनी ही हरकतों को याद करके उन्हें लग रहा है कि शायद उनके वीजा पर सुनवाई इसी कारण से नहीं हो रही है और इसीलिए वो इस मामले को आधार बनाकर फिर नए ढंग से नफरत फैला रही हैं।
क्षमा सावंत, एक इंडो-अमेरिकी अर्थशास्त्री और सिएटल सिटी काउंसिल की सदस्य हैं। उनका बचपन भारत में ही गुजरा था। बाद में पीएचडी करने वो सिएटल गई और वहाँ सेंट्रल कम्युनिटी कॉलेज, सिएटल विश्वविद्यालय और वॉशिंगटन टैकोमा यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू किया। वह 2006 में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव में शामिल हुई। इसके बाद उन्होंने फेडरेशन ऑफ टीचर्स लोकल में कार्यकर्ता के तौर पर भी काम खिया। साल 2012 में क्षमा ने राज्य विधानमंडल के लिए समाजवादी वैकल्पिक उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था।
मोदी विरोधी क्षमा सावंत
आज भारत की राजनीति में उनका दखल सिर्फ इसलिए है क्योंकि वो मोदी विरोधी है। वरना अगर देखा जाए तो उन्होंने जो भी प्रस्ताव पारित किए वो 2020-21 की बात है और साल 2022 में उन्हें भारत में अपनी बीमार से मिलने के लिए वीजा दिया गया था। उस समय वह इंडिया भी आई थीं। अगर ऐसा होता कि मोदी सरकार को प्रतिशोध लेना था तो उस समय ही ऐसा किया गया होता।
खबरें बताती हैं कि इस बार क्षमा सावंत की एप्लिकेशन खारिज हुई है। पहले 29 मई को उनका वीजा खारिज किया गया था, जबकि उनके पति को एंट्री की मंजूरी मिल गई थी। इसके बाद 9 जनवरी को तीसरी बार क्षमा सावंत और उनके पति केल्विन प्रीस्ट ने सिएटल में भारत के महावाणिज्य दूतावास में इमरजेंसी एंट्री वीजा के लिए आवेदन किया। इस बार उनका वीजा खारिज नहीं हुआ है, लेकिन उन्हें अनुमति नहीं मिली है इसलिए वो नाराज हैं।
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू होने के बाद किसी से भी निकाह कर लेना आसान नहीं होगा। यूसीसी अधिनियम में 74 ऐसे रिश्तों का उल्लेख है जिनके साथ न निकाह हो सकता है और न ही उनके साथ लिव-इन रिलेशन में रहा जा सकता है। अगर ऐसा करते हैं तो इस बारे में मौलानाओं/पुजारियों को बताना होगा। वहीं रजिस्ट्रार को भी सूचना देनी होगी ताकि वह तय करें कि रिश्ता सार्वजनिक नैतिकता के खिलाफ है या नहीं। अगर रिश्ता नियमों के विरुद्ध पाया जाता है तो रजिस्ट्रेशन कैंसिल होगा।
किन रिश्तों में नहीं हो सकता निकाह
UCC के अंतर्गत किन रिश्तों में निकाह को कानूनी रूप से निषिद्ध किया गया है, इसे आप नीचे दी गई सूची से समझ सकते हैं। ये सूची बताती है कि UCC लागू होने के बाद पुरुष किन महिलाओं और महिलाएँ किन पुरुषों से विवाह नहीं कर सकेंगी।
कोई भी पुरुष इन महिलाओं से विवाह नहीं कर सकेगा
कोई भी महिला इन पुरुषों से विवाह नहीं कर सकेगी
बहन
भाई
भांजी
भांजा
भतीजी
भतीजा
मौसी
चाचा/ताऊ
चचेरी बहन
फुफेरा भाई
फुफेरी बहन
मौसेरा भाई
मौसेरी बहन
ममेरा भाई
ममेरी बहन
नातिन का दामाद
माँ
पिता
सौतेली माँ
सौतेला पिता
नानी
दादा
सौतेली नानी
सौतेला दादा
परनानी
परदादा
सौतेली परनानी
सौतेला परदादा
माता की दादी
परनाना (पिता का नाना)
माता की दादी
सौतेला परनाना
दादी
नाना
सौतेली दादी
सौतेला नाना
पिता की नानी
परनाना
पिता की सौतेली नानी
सौतेला परनाना (माता का सौतेला परनाना)
पिता की परनानी
माता के दादा
पिता की सौतेली परनानी
माता का सौतेला दादा
परदादी
बेटा
सौतेली परदादी
दामाद
बेटी
पोता
बहू (विधवा)
बेटे का दामाद
नातिन
नाती
पोती
बेटी का दामाद
पोते की विधवा बहू
परपोता
परनातिन
पोते का दामाद
परनाती की विधवा
बेटे का नाती
बेटी के पोते की विधवा
पोती का दामाद
बेटे की नातिन
बेटी का पोता
परपोती
नाती का दामाद
परपोते की विधवा
नातिन का बेटा
नाती की विधवा
माता का नाना
इन सभी रिश्तों में किए गए विवाह को UCC के अंतर्गत वैध रिश्ते नहीं माना जाएगा। गौरतलब है कि हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत यह बंदिशें पहले से देश की बहुसंख्यक आबादी पर लागू थीं। अब यह उत्तराखंड के भीतर पूरी जनता पर और हर समुदाय पर लागू होंगी।
UCC एक्ट में क्या होता है लिव-इन का अर्थ?
बता दें कि उत्तराखंड में लिव-इन रिलेशनशिप को एक ऐसे संबंध के रूप में परिभाषित किया गया है जिसमें एक पुरुष और एक महिला एक साझा घर में रहते हैं, जो विवाह के समान होता है। इस संबंध को कानूनी मान्यता देने के लिए कुछ विशेष नियम बनाए गए हैं। जैसे, लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है और इसे एक महीने के भीतर करना होगा। इसके लिए लोगों को 16 पन्नों का फॉर्म भरना होगा।
अगर जोड़ा चाहे तो अपने समुदाय के प्रमुखों से प्रमाण पत्र जारी करवाकर उसे रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल कर सकता है। लिव-इन पंजीकरण के दौरान आवेदकों से पूछा जाता है कि क्या वे ऐसे रिश्तों की श्रेणी में आते हैं जिसमें संबंध निषिद्ध हैं। यदि वे आते हैं, तो उनसे पूछा जाता है कि क्या उनके रीति-रिवाज जोड़े के बीच ऐसे विवाह की अनुमति देते हैं। फिर उन्हें समुदाय के प्रमुखों द्वारा एक प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। इसी के बाद अगले चरण में रजिस्ट्रार को यह प्रमाणपत्र की संक्षिप्त जाँच करनी होती है और आगे फैसले लिया जाता है।
कितने साल में लागू हुआ UCC
उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में यूसीसी 27 जनवरी 2025 से लागू हुआ है। इस कानून को राज्य में लागू करने के लिए पूर्व में काफी तैयारी की गई थी। उत्तराखंड सरकार ने 27 मई 2022 को सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। इसके बाद राज्य के अंदर और बाहर रह रहे 60,000 से ज्यादा लोगों के साथ 70 अलग-अलग मंचों पर विस्तार से चर्चा की। बाद में 700 पन्नों से ज्यादा की एक रिपोर्ट तैयार की, जिसे 2 फरवरी 2024 को उत्तराखंड सरकार को सौंप दिया गया।
प्रयागराज महाकुंभ में वसंत पंचमी के मौके पर लाखों श्रद्धालु और साधु संत जुटे हैं। संगम समेत प्रयागराज के बाकी गंगा घाटों पर लगातार स्नान जारी है। वसंत पंचमी (3 फरवरी, 2025) को शाम 4 बजे तक महाकुंभ में 1.98 करोड़ से अधिक श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगा चुके थे। इस बीच मौनी अमावस्या को मची भगदड़ को लेकर सुरक्षा एजेंसियों को AI कैमरों की वीडियो हाथ लगी है, इसमें कुछ संदिग्ध चेहरे दिखाई पड़े हैं। दावा है कि इनके घुसने के बाद ही संगम पर भगदड़ हुई।
वसंत पंचमी के मौके पर अखाड़ों समेत बाकी श्रद्धालुओं ने सुबह से ही अमृत स्नान चालू कर दिया था। पिछले हादसे को देखते हुए राज्य सरकार ने व्यवस्था चाक चौबंद कर दी है। महाकुंभ में अमृत स्नान के मौके पर योगी सरकार ने पुष्प वर्षा भी करवाई है। हेलिकॉप्टर से श्रद्धालुओं पर फूल फेंके गए। मकर संक्रांति से चालू हुए महाकुंभ में वसंत पंचमी तक लगभग 36 करोड़ श्रद्धालु स्नान कर चुके हैं। संभावना है कि कुछ ही दिनों में यह आँकड़ा 40 करोड़ हो जाएगा, जैसा उत्तर प्रदेश सरकार ने अनुमान लगाया था।
अखाड़ों ने बताया है कि यह उनका अंतिम अमृत स्नान है। उन्होंने इसके बाद वाराणसी जाने का ऐलान किया है। हालाँकि, अभी महाकुंभ आयोजन जारी रहेगा। महाकुंभ में मौनी अमावस्या को हुई भगदड़ के बाद वसंत पंचमी पर सरकार ने सुरक्षा के अतिरिक्त इंतजाम किए गए हैं। बसंती पंचमी के अमृत स्नान पर्व पर श्रद्धालुओं को सुरक्षित स्नान कराने के लिए 28 स्ट्रैटेजिक प्वाइंट बनाए गए हैं। यहाँ कई और अफसरों की तैनाती की गई थी जिन्हें पूर्व में ऐसे आयोजन का अनुभव है। भीड़ प्रबन्धन के लिए भी नए नियम लाए गए हैं।
मौनी अमावस्या पर हुई भगदड़ की जाँच भी तेज कर दी गई है। मामले की जाँच UPSTF कर रही है। भगदड़ के समय संगम घाट पर मौजूद मोबाइल नम्बरों की जाँच के साथ ही अब यहाँ लगे AI कैमरों की जाँच की जा रही है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, STF को इन कैमरों की जाँच में 120 ऐसे संदिग्ध दिखे हैं। इससे पहले भगदड़ में फंसे लोगो ने बताया था कि भीड़ में कुछ लोगों के घुसने के बाद ही भगदड़ मची थी। पुलिस ने जिन चेहरों की पहचान की है, उन पर जाँच की जाएगी।
सुरक्षा एजेंसियों घटना के समय की वीडियो की फोरेंसिक जाँच करवा रही हैं। STF ने घटना के समय मौजूद 16 हजार मोबाइल नम्बरों को भी खंगाला है। इनमें से उन नम्बरों पर फोकस ज्यादा है, जो महाकुंभ के बाद से बंद आ रहे हैं। महाकुंभ में शामिल साधुओं ने भी साजिश को लेकर चिंता जताई है और दुष्प्रचार पर बात की है। मौनी अमावस्या पर हुई भगदड़ की जाँच के लिए बनाए गए न्यायिक आयोग ने भी सभी पहलू जांचने की बात कही है।
भारत और हिन्दुओं के विरुद्ध लगातार प्रोपेगेंडा करने वाले ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने अब देश के लोगों के बीच नई खाई पैदा करने की कोशिश की है। अपने नए हमले में वाशिंगटन पोस्ट ने हिन्दुओं और जनजातीय समुदाय को भड़का कर झारखंड में संघर्ष को बढ़ावा देने का प्रयास किया है।
वाशिंगटन पोस्ट ने शनिवार (1 फरवरी, 2025) को इसी से सम्बन्धित एक लेख प्रकाशित किया है। वाशिंगटन पोस्ट ने आरोप जड़ दिया है कि हिन्दू संगठन झारखंड के जनजातीय समुदाय को ‘सनातन धर्म’ में धर्मान्तरित करना चाहते हैं और इसके लिए प्रचार अभियान भी चला रहे हैं।
वाशिंगटन पोस्ट ने आरोप जड़ा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और अन्य हिन्दू संगठन जनजातीय समुदाय को यह विश्वास दिला रहे हैं कि वह भी ‘वृहत्तर हिन्दू धर्म’ का हिस्सा है। वाशिंगटन पोस्ट ने आरोप लगाया कि इससे वह इन जनजातियों की पहचान छीन रहे हैं।
वाशिंगटन पोस्ट ने यह दावे तब किए हैं जब झारखंड में ईसाई मिशनरियां तेजी से अपनी घुसपैठ बढ़ा रही हैं और साथ ही कमजोर तबकों के लोगों को इस्लाम में धर्मांतरण के लिए भी प्रयास चल रहे हैं। राज्य में इस बीच बांग्लादेशी घुसपैठ बढ़ी है, इसके चलते जनजातीय समुदाय घटा है।
वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा, “यहाँ तक कि घने जंगलों में भी, भारत का दक्षिणपंथी हिंदू आंदोलन ऐतिहासिक रूप से सेक्युलर देश को हिंदू राष्ट्र में बदलने के अपने प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, और वह लंबे समय से मुख्यधारा के धर्म से बाहर रहे लाखों जनजातीय लोगों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा है कि वे भी हिंदू ही हैं।”
अमेरिकी अखबार ने जनजातीय समुदाय की प्रथाओं और उनके रीति रिवाजों को बचाने के लिए हिन्दू संगठनों के प्रयास का मजाक भी उड़ाया है। वाशिंगटन पोस्ट के प्रोपेगेंडा से लगता है कि वह झारखंड में ईसाई मिशनरियों के दुष्प्रचार को जवाब मिलने पर बौखलाया हुआ है।
धर्मांतरण रोकने को ‘मिशनरी अभियान’ बता रहा वाशिंगटन पोस्ट
झारखंड को बिहार से अलग करके बनाया गया था। झारखंड को इस उद्देश्य के साथ बनाया गया था कि यहाँ रहने वाले जनजातीय समुदाय का विकास हो सके। 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में रहने वाले 67.8% लोग (बहुमत) हिंदू है।
‘द वाशिंगटन पोस्ट’ के दावों के उलट, यहाँ काम करने वाले हिन्दू संगठन किसी को हिन्दू बनाने नहीं आए हैं, क्योकि यह राज्य पहले से ही हिन्दू बहुल है। बल्कि हिन्दू संगठन यहाँ उन मिशनरियों को रोकने और धर्मांतरण के नेक्सस को तोड़ने के लिए काम कर रहे हैं।
हिन्दू संगठन लगातार राज्य में उन संगठनों के खिलाफ भी अभियान चला रहे हैं, जो गरीब जनजातीय जनता को किसी प्रकार का लालच देकर धर्मांतरित करते हैं। बहला फुसला कर ले जाए गए लोगों को वापस रास्ते पर लाने का काम भी हिन्दू संगठन कर रहे हैं।
‘वनवासी कल्याण आश्रम’ और ‘विकास भारती’ को भी बनाया निशाना
वाशिंगटन पोस्ट ने अपने लेख में झारखंड में जनजातीय समुदाय के विकास के लिए काम करने वाली संस्थाओं ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ और ‘विकास भारती’ को भी निशाना बनाया और इन पर झूठ फ़ैलाने की कोशिश की। वाशिंगटन पोस्ट ने आरोप लगाया कि विकास भारत संगठन जनजातीय समुदाय को प्रकृति पूजक, हिन्दू और ईसाई में बाँट रहा है।
वाशिंगटन पोस्ट ने विकास भारत द्वारा शिवरात्रि पर आयोजित किए गए एक कार्यक्रम को भी निशाना बनाया। इस कार्यक्रम में स्थानीय जनजातीय समुदाय को भी शामिल किया गया था।वाशिंगटन पोस्ट ने दावा किया कि यह कार्यक्रम प्रकृति पूजकों को हिन्दू धर्म में लाने का एक प्रयास था।
वाशिंगटन पोस्ट ने झारखंड में जनजातीय समुदाय के कल्याण के लिए काम करने वाले ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ को भी निशाना बनाया और दावा किया कि यह धर्मांतरण के लिए काम करता है। वाशिंगटन पोस्ट ने कहा कि वनवासी कल्याण आश्रम कथित तौर पर ‘हिन्दू धर्म’ से अलग रहे जनजातीय समुदाय को हिन्दू बना रहा है।
सरना कोड के सहारे विवाद का प्रयास
वाशिंगटन पोस्ट ने हिंदुओं और ‘प्रकृति पूजकों’ के बीच और अधिक खाई पैदा करने के लिए ‘सरना कोड’ का मुद्दा उठाया और इसे RSS के लिए ‘नया विवाद’ और ‘चुनौती’ बताया। वाशिंगटन पोस्ट ने दावा किया, “छत्तीसगढ़ के जशपुर और बिशुनपुर में हिन्दू संगठन के लिए काम करने वाले जनजातीय लोग भी अलग धार्मिक पहचान सरना कोड की वकालत कर रहे हैं।”
वाशिंगटन पोस्ट ने ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के साथ काम करने वाली एक ‘प्रकृति पूजक’ जनजातीय नर्स का उदाहरण दिया। वाशिंगटन पोस्ट के साथ बातचीत में कथित तौर पर नर्स ने आरोप लगाया कि उसे खुद को हिन्दू बताने पर मजबूर किया जा रहा है जबकि वह ‘सरना’ धर्म मानती है।
अपने इस प्रोपेगेंडा लेख में वाशिंगटन पोस्ट ने दावा किया कि हिन्दू सरना कोड इस लिए नहीं चाहते क्योंकि इससे जनजातियों के विदेशी मिशनरियों से खतरे की बात कमजोर होती है। हालाँकि, यह बात सच ही है क्योंकि ईसाई मिशनरियों को जनजातीय और गरीब तबकों में ज्यादा सफलता मिली है।
सरना कोड का मामला
भारत का क़ानून हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन जैसे 6 धार्मिक समुदायों को मान्यता देता है। कॉन्ग्रेस-JMM सरकार ने ने इसके अतिरिक्त सरना धर्म के लिए भी धार्मिक संहिता लागू करने का वादा किया है। नवम्बर, 2020 में झारखंड की INDI गठबंधन सरकार ने इस संबंध में एक प्रस्ताव विधानसभा से पारित करवाया था।
इसको भाजपा ने भी समर्थन दिया था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस संबंध में पत्र लिखा था। भाजपा ने झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान अपने घोषणापत्र में सरना संहिता पर विचार करने का वादा किया था। झारखंड भाजपा चुनाव प्रभारी शिवराज सिंह चौहान ने कई मौकों पर इस रुख को दोहराया।
सरना कोड जनजातीय समुदाय समाज को एक अलग धार्मिक समूह के रूप में मान्यता देता है। भाजपा इसका सार्वजनिक रूप से विरोध नहीं करती। भाजपा ने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध नहीं किया है, लेकिन RSS जनजातीय समाज को हिंदू धर्म का हिस्सा मानता है।
RSS वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों में इसी मान्यता के साथ काम करता है। RSS से जुड़े आदिवासी सुरक्षा मंच के क्षेत्रीय समन्वयक (बिहार-झारखंड) संदीप उरांव का दावा है कि सरना कोड लागू करने से विभिन्न स्तरों पर कई समस्याएं पैदा होंगी।
असम पुलिस ने राज्य में लगभग 170 बीघे में लगी अफीम की खेती को नष्ट कर दिया। इस ड्रग्स की अनुमानित कीमत 27 करोड़ रुपए है। इसकी जानकारी ग्वालपाड़ा पुलिस और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने दी है। वहीं, असम राइफल्स ने मणिपुर में भारत-म्यांमार सीमा पर स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर लगभग 30 एकड़ (लगभग 50 बीघा) की अवैध अफीम की खेती को नष्ट कर दिया।
असम के सीएम सरमा ने सोशल मीडिया साइट X पर अपने पोस्ट में लिखा, “प्रिय स्थानीय पाब्लो एस्कोबार्स (कोलंबिया का कुख्यात ड्रग माफिया), आपकी योजनाबद्ध उड़ता असम पार्टी को बिगाड़ने के लिए क्षमा करें! क्योंकि ग्वालपाड़ा पुलिस ने जनवरी में चार इलाकों में ₹27.20 करोड़ मूल्य की 170 बीघा अफीम की खेती नष्ट कर दी थी। तो अगली बार जब आप ड्रग्स के बारे में सोचें तो सबसे पहले असम पुलिस के बारे में सोचें।”
Dear Local Pablo Escobars,
Sorry to spoil your planned Udta Assam party!
Because @Goalpara_Police destroyed 170 Bighas of poppy cultivation in the Char areas worth ₹27.20 crore in January.
वहीं, ग्वालपाड़ा पुलिस ने अपने ट्वीट में कहा, “नशीली दवाओं के खिलाफ अपने अभियान को जारी रखते हुए चुनारी थाने के अंतर्गत सीतलमारी चार में 100 बीघा भूमि पर अवैध अफीम की खेती को एएसपी (मुख्यालय) जीएलपी और ओसी एलपीआर पीएस के नेतृत्व में ग्वालपाड़ा पुलिस टीम ने सीओ लखीपुर, आबकारी निरीक्षक और अन्य अधिकारियों की मौजूदगी में नष्ट कर दिया।”
Continuing with our drive against drug’s, Illegal poppy cultivation on 100 bigha land at Sitalmari Char under Chunari PS have been destroyed by Goalpara Police Team led by ASP(HQ) GLP & OC LPR PS in the presence of CO Lakhipur, Excise Inspector and other officials.@assampolicepic.twitter.com/4TzlcpvqY6
बता दें कि पिछले सप्ताह 30 जनवरी 2025 को ग्वालपाड़ा पुलिस ने सोनारी सर में 40 बीघा क्षेत्र में अफ़ीम की खेती को नष्ट कर दिया था। ग्वालपाड़ा प्रशासन ने 2021 और 2023 में शियालमारी में बड़े पैमाने पर अफ़ीम की खेती को नष्ट किया था। सर क्षेत्र में अफ़ीम की खेती सबसे पहले 2010 में दरंग ज़िले के मगुरमारी सर में सामने आई थी।
सूत्रों के अनुसार, राज्य के बाहर का एक गिरोह राज्य में सर की दुर्गमता का फायदा उठाकर स्थानीय निवासियों के एक वर्ग के साथ मिलकर अफीम की खेती करता है। यह गिरोह स्थानीय निवासियों को अफीम के बीज और अन्य सामग्री सहित हर चीज की आपूर्ति करता है। दरअसल, सर के इलाकों में रहने वाले लोगों को असल पता ही नहीं है कि अफीम वास्तव में होता क्या है।
द सेंटिनेल की रिपोर्ट के मुताबिक, सर निवासी अशरफ अली ने कहा, “लोगों को लगता है कि यह फूलों की खेती है। सर के इलाकों के कुछ नेता इसका फायदा उठाकर स्थानीय लोगों को मज़दूर के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। अगर ज़िला प्रशासन अफीम की खेती देखने के लिए बाहर से आने वाले रैकेट के लोगों और उन्हें पनाह देने वाले लोगों पर नज़र रखे तो उनके ठिकानों का पता लगाया जा सकता है।”