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‘वैवाहिक क्रूरता’ के पुरुष भी होते हैं शिकार, आरोपित महिला से क्यों बरतें नरमी: दिल्ली HC ने खारिज की उस महिला की बेल याचिका, जिसने सोते में पति पर डाला था गर्म पानी और मिर्च पाऊडर

दिल्ली हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के संबंधों में क्रूरता को लेकर अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि यह सोचना गलत है कि केवल महिलाएँ ही वैवाहिक क्रूरता की शिकार होती हैं। पुरुष भी पीड़ित हो सकते हैं और उन्हें भी कानून के तहत समान सुरक्षा का अधिकार है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा ने ये टिप्पणी उस महिला की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए दी, जिस पर अपने पति पर उबलते पानी और मिर्च पाउडर डालकर जलाने का आरोप है। घटना 1 जनवरी की है, जब पीड़ित पति सो रहा था। आरोपित महिला ने न सिर्फ उसे जलाने की कोशिश की, बल्कि कमरे को बाहर से बंद कर फरार हो गई। उसने पति का मोबाइल फोन भी साथ ले लिया, ताकि वह किसी से मदद न माँग सके। कमरे में उनकी तीन महीने की बच्ची भी मौजूद थी।

महिला ने कोर्ट में तर्क दिया कि वह एक महिला है, इसलिए नरम रुख अपनाया जाए। कोर्ट ने इसे लैंगिक पूर्वाग्रह मानते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि आरोपित महिला की जगह पुरुष होता, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाती। ऐसे में केवल महिला होने के आधार पर नरमी बरतना न्याय के साथ अन्याय होगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पुरुष जो अपनी पत्नियों के हाथों हिंसा का शिकार होते हैं, अक्सर सामाजिक कलंक और लोगों के अविश्वास का सामना करते हैं। ऐसे मामलों में जेंडर आधारित पक्षपात न्याय के बुनियादी सिद्धांतों को कमजोर करता है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने आरोपित महिला के तीन महीने के बच्चे की देखभाल करने के तर्क को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि महिला ने बच्चे को भी खतरे में डाल दिया था। जाँच में सहयोग न करने और पीड़ित का फोन बरामद होने की जरूरत को देखते हुए हाई कोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया।

बांग्लादेश में हिंदू छात्र की सरेआम निर्मम हत्या, दुकान पर चाय पीते समय 12 हमलावरों ने गोलियों से भूना: बुलेट सिर चीर कर हुई पार, पुलिस बोली- नहीं मिली औपचारिक शिकायत

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व वाली आवामी लीग की सरकार के तख्ता पलट के बाद हिंदुओं के खिलाफ हिंसा अपने चरम पर है। हर रोज किसी ना किसी हिंदू की हत्या, बलात्कार और मंदिरों पर हमले किए जा रहे हैं। एक और हिंदू छात्र की हत्या कर दी गई है। वहीं, मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली इस्लामी मुल्क की अंतरिम सरकार अल्पसंख्यकों के खिलाफ धार्मिक हिंसा को नकार कर रही है।

स्थानीय मीडिया के अनुसार, मृतक छात्र की पहचान 26 वर्षीय अर्नब कुमार सरकार के तौर पर हुई है। अर्नब खुलना विश्वविद्यालय में MBA के छात्र थे। अर्नब शहर के सोनाडांगा इलाके में स्थित अबू अहमद रोड के रहने वाले नीतीश चंद्र सरकार का बेटा हैं। वे बोसपुरा कॉलेजियट स्कूल के पास रहते थे। कहा जा रहा है कि एक चाय की दुकान पर चाय पीने के दौरान उनके सिर में गोली मारी गई।

सोनाडांगा पुलिस स्टेशन के इंचार्ज शफीकुल इस्लाम का कहना है कि शुक्रवार (23 जनवरी 2025) की रात करीब 9 बजे के तेंतुलतला चौराहे पर स्थित एक चाय की दुकान पर अर्नब चाय पी रहे थे। उसी दौरान मोटरसाइकिल से कुछ हमलावर आए और उन्हें गोली मार दी। गोली उनके सिर में लगी और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। इसके बाद हमलावर मौके से फरार हो गए।

इस घटना के बाद स्थानीय लोग अर्नब को सिटी मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले गए, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। वहीं, खुलना सिटी पुलिस (दक्षिणी डिवीजन) के डिप्टी कमिश्नर मोहम्मद मोनिरुज्जमां ने इसे आतंकी हमला बताया। उन्होंने कहा, “आतंकवादियों ने एक छात्र की गोली मारकर हत्या कर दी। उसकी हत्या के पीछे का मकसद जानने के लिए जाँच चल रही है।”

खुलना मेट्रोपॉलिटन पुलिस के एडीसी (मीडिया) मोहम्मद अहसान हबीब ने बताया कि हत्या करने वालों की पहचान की जा रही है और उन्हें पकड़ने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस मामले में कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं की गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई मोटरसाइकिलों पर सवार होकर 10-12 हमलावरों का एक समूह आया और घटना को अंजाम दिया।

इससे पहले 5 जनवरी को बांग्लादेश के फरीदपुर में अज्ञात हमलावरों ने एक हिन्दू पत्रकार और उसके परिवार को निशाना बनाया। इसमें उनके घर की महिलाओं को गंभीर चोट आईं। घटना मधुखली गाँव की थी। यहाँ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्यामलेंदु बोस अपने परिवार के साथ रहते हैं। उनका बेटा सौगात बोस दैनिक अजमेर पत्रिका में पत्रकार है। 

इसी तरह चटगाँव के पटेंगा काठगढ़ में प्रांत तालुकदार नाम के एक हिंदू युवक को मुस्लिम भीड़ ने पहले अगवा कर लिया और उसके बाद उसे ले जाकर खूब प्रताड़ित किया। इस्लामी कट्टरपंथियों ने प्रांत पर पहले ईशनिंदा का आरोप लगाया था। ऐसी ही घटना दिसंबर 2024 में भी हुई थी, जब मुस्लिम भीड़ ने आकाश दास नाम के युवक पर ईशनिंदा का आरोप लगाकर 130 हिंदू घरों और 20 मंदिरों में आगजनी की थी।

दिसंबर के अंतिम सप्ताह में नरैल में 52 साल की हिंदू महिला बसना मलिक की रहस्यमय तरीके से मौत हो गई। बसना के साथ मुस्लिम कट्टरपंथियों ने गैंग रेप किया था। इससे तनाव में आई बसना मलिक ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। इसके बाद पुलिस ने इस मामले में लीपापोती शुरू कर दी थी और मृतक का ही चरित्रहनन करने लगी थी। बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न की ऐसी सैकड़ों घटनाएँ हैं।

बच्चियों तक का अपहरण और धर्मांतरण के बाद निकाह, नहीं बची उम्मीद: पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने माना- मुल्क से जान बचा भाग रहे हिंदू

पाकिस्तान में हिन्दुओं का उत्पीड़न लगातार जारी है। रोज बलात्कार,धर्म परिवर्तन, बलात्कार, भेदभाव, मंदिरों को अपवित्र करना और हिंसा झेलने वाले हिन्दू किसी भी पाकिस्तान से तरह भारत आना चाहते हैं। हिन्दुओं की एक बड़ी जनसँख्या 1947 में पाकिस्तान के बनने के बाद से अपनी जान बचा कर भारत आ भी चुकी है।

पाकिस्तान के अधिकांश इलाकों में हिन्दुओं की जनसँख्या नगण्य हो चुकी है। हालाँकि, पाकिस्तान के सिंध में अब भी कुछ लाख हिन्दू बचे हैं। लेकिन यहाँ भी बीते कुछ सालों से हालात ऐसे हैं कि हिन्दू अपनी जमीन-घर और व्यापार छोड़ कर भारत में आ रहे हैं।

पाकिस्तान से हिन्दुओं का पलायन कितना तेज है, इसी को साबित करती हुई एक रिपोर्ट अब सामने आई है। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (HRCP) ने 23 जनवरी, 2025 को यह रिपोर्ट प्रकाशित की है। इस रिपोर्ट में सिंध के हिन्दुओं के सामने आने वाले समस्याएँ बताई गई हैं, जिसके चलते वह भारत भागने को मजबूर हैं।

नया नहीं हिन्दुओं का पलायन

HRCP की रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान या सिंध से हिन्दुओं का पलायन कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह दशकों से चला आ रहा है। रिपोर्ट बताती है कि 1992 के बाद से सिंध में हिन्दू विरोधी रवैये में तेजी आई है और तबसे यह समुदाय तेजी से भारत को आ रहा है।

सिंध के हिन्दू धार्मिक उत्पीड़न के साथ ही कानून व्यवस्था के चलते भी भागने को मजबूर हैं। रिपोर्ट बताती है कि 1986 में पाकिस्तान की सुक्कर जेल से वह 34 अपराधी भाग गए थे जो हिन्दू कारोबारियों का अपहरण कर उनसे वसूली करते थे। इसके बाद हिन्दुओं में डर बैठ गया और वह भारत जाने को ही एक सुरक्षित विकल्प के रूप में देखने लगे।

इसी का एक उदाहरण है कि यहाँ के कशमोर इलाके से 300 हिन्दू परिवार अब तक पलायन कर चुके हैं। इन परिवारों के पलायन के पीछे भी अपराधियों का डर और उनके ख़ास करके निशाना बनाया जाना ही कारण रहा है। कई परिवारों को सिंध के कुख्यात ‘कच्चे के डाकू’ भी लगातार परेशान करते रहे हैं।

HRCP रिपोर्ट के अनुसार, “काशमोर जिले से 300 से ज़्यादा हिंदू अराजकता और डाकुओं द्वारा अपहरण के डर से भारत चले गए हैं। ऐसी रिपोर्टों के बावजूद, सरकार इन पर ध्यान नहीं देती। और सही एक्शन लेने बजाय इसे पाकिस्तान के खिलाफ़ एक ‘साजिश’ के रूप में पेश करती है।”

ऑपइंडिया इस विषय में पहले भी बता चुका है कि पाकिस्तान में 1990 के बाद से, लगभग 95% हिंदू मंदिरों को नष्ट कर दिया गया है, इस्लामवादियों द्वारा उन पर कब्जा कर लिया गया है या पाकिस्तानी सरकारों द्वारा उन्हें मस्जिदों, मदरसों, मुर्गी की दुकानों, पशु फार्मों और कभी-कभी शौचालयों के रूप में पुनः उपयोग में लाया जाता है।

असुरक्षा बड़ा कारण

HRCP रिपोर्ट में वह कारण भी बताए गए हैं, जिनके चलते सिंध से हिन्दू पलायन कर रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि हिंदुओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा की घटनाएँ भले ही कम हुई हों लेकिन अपहरण, फिरौती और वसूली अब भी जारी है। इसके चलते हिन्दू सिंध में हिंदू लगातार डर और असुरक्षा में रहते हैं।

HRCP ने बताया कि सिंध में हिंदुओं का अपहरण और जबरन वसूली बड़े पैमाने पर होती है, यह सबसे अधिक सिंध के उत्तरी इलाकों में हो रही है। हिंदू समुदाय, विशेष रूप से तथाकथित “उच्च जाति” हिंदुओं को उनकी धार्मिक पहचान के साथ-साथ उनकी संपत्ति के लिए भी निशाना बनाया जाता है।

रिपोर्ट बताती है कि घोटकी, जैकबाबाद और काश्मोर जैसे जिलों में हिन्दुओं की ऊँची जातियों का कारोबार, ट्रांसपोर्ट समेत बाकी क्षेत्रों में दबदबा है। इसी के चलते वह इनके निशाने पर आते हैं। उनकी सम्पत्ति छीनने की कोशिश होती है।

यहाँ तक कि सिंध के इन इलाकों के कबीलाई सरगनाओं को हिन्दुओं के व्यापार में हिस्सेदार बनाने का दबाव डाला जाता है। यह मुनाफे में लगभग 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा लेते हैं और डाकुओं को रोकने के लिए हिंदू दुकानों और व्यवसायों के बोर्ड और बैनर पर उनके नाम लिखे जाते हैं।

हिन्दू लड़कियाँ भी बन रही निशाना

HRCP रिपोर्ट बताती है कि सिंध में हिंदू महिलाओं को उत्पीड़न, अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन की लगातार धमकियों का सामना करना पड़ता है, जिसके कारण हिंदू परिवार अपनी बेटियों को पढ़ाई छुड़वा कर उन्हें दूसरे शहर भेजते है। यहाँ तक कि उन्हें भारत भी भेज दिया जाता है।

HRCP की रिपोर्ट में बताई गई ऐसी ही एक घटना के विषय में एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया, “एक शादी में, एक कबीलाई सरदार के बेटे ने एक हिंदू दुल्हन को अनुचित तरीके से छुआ, जिससे उसे अपमानित होना पड़ा। इसका बदला ना ले पाने के चलते परिवार तीन महीने के भीतर चुपचाप भारत चला गया।”

HRCP के अनुसार, सिंध में जबरन धर्म परिवर्तन और निकाह एक बड़ा मुद्दा है, इसका केंद्र घोटकी है। HRCP ने बताया कि सिंध का एक मौलाना मियां अब्दुल हक उर्फ ​​मियां मिट्ठू लगातार हिन्दू लड़कियों को निशाना बनवाता है।

रिपोर्ट बताती है, “मियां मिठू अपने प्रभाव का लाभ उठाकर नाबालिग हिंदू लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन और निकाह करवाता है। घोटकी के दहारकी में स्थित उसकी दरगाह भरचुंडी शरीफ में यह काम धड़ल्ले से हो रहा है…, यहाँ कथित तौर पर इस तरह के अपहरण और धर्मांतरण होते हैं।”

HRCP रिपोर्ट बताती है कि मियां मिठू इन सभी निकाह को लड़कियों की मर्जी बताता है। जबकि असल में नाबालिग लड़कियों पर दबाव डाल कर ही उनके निकाह करवा दिए जाते हैं। यहाँ तक कि हिन्दू लड़कियों को सिंध से पंजाब ले जाया जाता है, ताकि उनका 18 साल से कम ही निकाह करवाया जाए।

मंदिरों पर भी हो रहा हमला

सिंध लगातार हिंदू विरोधी हिंसा का केंद्र रहा है। जून 2024 में, इस्लामी कट्टरपंथियों ने कच्ची कॉलोनी में भगवान राम के जीर्ण-शीर्ण मंदिर में रात को हमला किया था। उन्होंने हिंदू मंदिर को अपवित्र किया और मंदिर के दरवाज़े बंद होने के बावजूद हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और गीता लूट कर ले गए।

उन्होंने ओम सहित पूजनीय हिंदू धार्मिक प्रतीकों को स्प्रे पेंट से नुकसान पहुँचाया। इससे पहले, इस्लामी कट्टरपंथियों ने नवाबशाह जिले में सोची पाड़ा, टांडो आदम में एक प्राचीन हिंदू मंदिर को लूटा और अपवित्र किया। ऑपइंडिया ने न केवल सिंध बल्कि पाकिस्तान के अन्य इलाकों से सामने आई ऐसी ही घटनाएँ लगातार बताई हैं।

HRCP की रिपोर्ट में यह तो माना गया है कि हिन्दू मंदिर लगातार निशाना बनाए जा रहे हैं लेकिन इस बार से इनकार किया गया है कि यह सब जानबूझ कर हो रहा है। इसके अलावा हिन्दुओं पर ईशनिंदा का झूठा आरोप लगाकर भी उन्हें निशाने पर लिया जाता है।

रिपोर्ट में आगे बताया गया कि ईशनिंदा के आरोप, अक्सर झूठे होते हैं और हिन्दुओं पर आपसी दुश्मनी के चलते लगाए जाते हैं। हालाँकि, आरोप लगाने के बाद हिन्दुओं की कोई नहीं सुनता और उन्हें या तो भागना पड़ता है या फिर वह हिंसा झेलते हैं। इसके चलते भी बड़ी संख्या में हिन्दू भारत की तरफ आए हैं।

HRCP रिपोर्ट कहती है ,”ईशनिंदा के आरोपों के बाद, कुछ हिंदू सिंध को पूरी तरह से छोड़ देते हैं। घोटकी में एक हिंदू पंचायत नेता ने बताया कि ईशनिंदा का आरोप लगने के बाद के दो हिन्दू भारत भाग गए थे। शुरू में माना गया था कि वे कराची गए हैं, लेकिन बाद में पता चला कि वे भारत के इंदौर में बस गए हैं।”

CAA बना आशा की किरण

मजबूरी में पलायन करने वाले पाकिस्तानी हिन्दुओं के लिए भारत CAA नागरिकता क़ानून आशा की किरण जैसा है। CAA के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे देशों से आने वाले गैर मुस्लिमों को भारत नागरिकता देता है। इसका फायदा वही ले सकते हैं, जो 2014 से पहले भारत आ गए थे। हालाँकि, इसके चलते बने सकारात्मक रवैये से भी हिन्दू भारत आ रहे हैं।

इस बात को HRCP ने भी माना है। HRCP की रिपोर्ट कहती है, “CAA ने सिंध के हिन्दुओं को खास तौर पर प्रभावित किया है। मध्य प्रदेश में, इन शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या को नागरिकता दी गई है। NDTV ने 2021 में जैकबाबाद के एक परिवार के बारे में रिपोर्ट की थी, जिसे इंदौर में नागरिकता प्रमाण पत्र मिला था। पिछले 5 सालों में सिंध के लगभग 2,000 हिंदू शरणार्थियों ने भारतीय नागरिकता प्राप्त पाई है और 1200 से अधिक इस मामले में आवेदन कर चुके हैं।

3 बच्चियों के हत्यारे को 52 साल की जेल, अल-कायदा से सीखा हत्या का तरीका… इंग्लिश कोर्ट ने फिर भी नहीं माना ‘मजहबी मकसद’

ब्रिटेन के साउथपोर्ट में टेलर स्विफ्ट-थीम पर आधारित डांस क्लास में तीन मासूम बच्चियों की चाकू से गोदकर हत्या करने वाले एक्सल रुदाकुबाना को 52 साल की जेल की सजा सुनाई गई है। उसके हमले में 3 बच्चियों की मौत हो गई थी, तो 10 लोग घायल हो गए थे, जिसमें 8 बच्चे थे। हैरानी की बात है कि उसके पास अलकायदा का ‘चाकू से सार्वजनिक जगहों पर कैसे हमला करें’ जैसा ट्रेनिंग मैनुअल भी मिला था, इसके बावजूद उसकी करतूत को न तो आतंकी कृत्य माना गया और न ही उसके खिलाफ आतंकवादी के तौर पर केस चला।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 18 वर्षीय आरोपित एक्सल रुदाकुबाना को गुरुवार (23 जनवरी 2024) को अदालत ने सजा सुनाई। जज ने कहा कि उसने निर्दोष और खुशहाल बच्चों का नरसंहार करने का प्रयास किया था। अपराध के समय आरोपित 17 साल का था। उसने छह साल की बेबे किंग, सात साल की एल्सी डॉट स्टैनकॉम्ब और नौ साल की ऐलिस दा सिल्वा अगुइआर की हत्या कर दी थी। इसके अलावा उसने आठ अन्य बच्चों और दो वयस्क लोगों को घायल किया। जज ने सजा सुनाते हुए कहा कि रुदाकुबाना को कम से कम 52 साल जेल में रहना होगा और हो सकता है कि वह कभी जेल से बाहर न आ सके।

ब्रिटेन के क्राउन प्रॉसिक्यूशन सर्विस ने सजा के बाद बयान जारी करते हुए कहा, “एक्सल रुदाकुबाना को एल्सी डॉट स्टैनकॉम्ब, बेबे किंग और ऐलिस दा सिल्वा अगुइआर की हत्या और 10 अन्य लोगों की हत्या की कोशिश के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। यह हमला 29 जुलाई 2024 को साउथपोर्ट में हुआ था।” इस हमले के बाद ब्रिटेन में अफवाह फैल गई थी कि प्रवासी व्यक्ति ने ‘शरण (Asylum)’ न देने की वजह से ये हमला किया, जिसके बाद पूरे ब्रिटेन में वैध-अवैध प्रवासियों के खिलाफ लोगों का गुस्सा भड़क उठा था और कई जगहों पर हिंसा भी हुई थी। ऑपइंडिया ने हिंसा पर रिपोर्ट भी प्रकाशित की थी।

बेबे किंग, एल्सी डॉट स्टैनकॉम्ब और ऐलिस दा सिल्वा अगुइआर की हुई थी हत्या (फोटो साभार : Merseyside Police, UK)

सोमवार (20 जनवरी 2025) को रुदाकुबाना ने अपना अपराध स्वीकार किया और 10 हत्या के प्रयास, राइसिन तैयार करने और अल-कायदा ट्रेनिंग मैनुअल रखने के आरोपों में दोषी ठहराया गया। हालाँकि, अभियोजन पक्ष ने जोर देकर कहा कि उसके कृत्य का कोई राजनीतिक या धार्मिक मकसद नहीं था। उनका कहना था कि वह हिंसा और नरसंहार को लेकर जुनूनी था। अदालत में पेशी के दौरान आरोपित ने बार-बार हंगामा किया, जिसके चलते उसे कोर्टरूम से हटा दिया गया।

रवांडा मूल के माता-पिता ईसाई

रुदाकुबाना का जन्म कार्डिफ में रवांडा के ईसाई माता-पिता के घर हुआ था। हालाँकि, उसके अपराधों के पीछे का मकसद अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। घटना से पहले अधिकारियों को उसकी हिंसक प्रवृत्तियों की जानकारी दी गई थी। घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने इस मामले में सार्वजनिक जाँच का आदेश दिया है, ताकि इस मामले से जुड़े अहम सवालों का जवाब मिल सके।

हालाँकि अह अभियोजन पक्ष द्वारा अपराध को ‘मजहबी मकसद’ से अलग बताने के प्रयास पर सवाल उठ रहे हैं। लिवरपूल मुस्लिम काउंसिल के नेता तौहीद इस्लाम ने एक इंटरव्यू के दौरान इस मामले को ‘महिलाओं के खिलाफ अपराध’ बताते हुए इसे मजहबी चरमपंथ से जोड़ने की बात को नकारने की कोशिश की, जबकि साफ तौर पर उसके पास से अल-कायदा का ट्रेनिंग मैनुअल मिला था और वो खून बहाने को लिए ‘ऑबसेस्ड’ था। ब्रिटेन की मर्सीसाइड पुलिस ने पीड़ित बच्चों को श्रद्धांजलि अर्पित की है।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने इसे देश के सबसे भयावह मामलों में से एक बताया और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने कहा, “हम इन मासूम बच्चियों और प्रभावित परिवारों के लिए वह बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जिसके वे हकदार हैं।”

इस मामले को लेकर साउथपोर्ट के सांसद ने सजा की समीक्षा की माँग की है। रिपोर्ट्स के अनुसार, रुदाकुबाना ने न तो अपने अपराध पर कोई पछतावा जताया और न ही अदालत की कार्यवाही में सहयोग किया। वह बार-बार मेडिकल सहायता की माँग को लेकर हंगामा करता रहा, जबकि उसे बताया गया था कि उसका इलाज किया जा चुका है। आखिरकार जज ने उसे कोर्टरूम से हटाने का आदेश दे दिया और उसकी गैर-मौजूदगी में सजा सुनाई।

भगवान राम, माता जानकी और भ्राता लक्ष्मण की तस्वीर…: संभल में वीर बुंदेला अल्हा-ऊदल के गुरु की समाधि के पास मिले 400 सिक्के, अब तक सबसे बड़ा कुँआ भी मिला; प्राचीन धरोहरों की खोज जारी

संभल में लगातार तीर्थ और कुएँ मिलने का सिलसिला जारी है। संभल के ही एक मुहल्ले में अब तक का सबसे बड़ा कुआँ हाल ही में मिला है। प्रशासन ने इसकी खुदाई करवाई है। एक और ऐतिहासिक स्थल पर राम दरबार वाले सिक्के तथा पुराने बर्तन भी मिले हैं। प्रशासन संभल के 87 तीर्थ में से 41 को ढूँढने में सफल रहा है। उसने प्राचीन सभी 19 कुएँ भी ढूँढ लिए हैं।

संभल के सरायतरीन में अब तक सबसे बड़ा कुआँ मिला है। यह कुआँ जामा मस्जिद से 50 मीटर ही दूर स्थित है। इसे स्थानीय लोगों ने पाट दिया था। यह जिस मोहल्ले में स्थित है, उसे दरबार कहते हैं। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि यहाँ टोंक के नवाब का दरबार लगता था।

इस कुएँ का निरीक्षण डीएम-एसडीएम ने किया था। इसके बाद प्रशासन ने इस पर खुदाई चालू कर दी। कुएँ को पूरा खोदने के बाद यह अच्छी अवस्था मिला है। डीएम ने कहा है कि यह दर्शनीय है। यह कुआँ लगभग 70 फीट गहरा है।

यह उन्हीं 19 कुओं का हिस्सा है, जो संभल में स्थित हैं। लोगों ने यह शिकायत की थी कि इस कुएँ को दबंगों ने पाटा था और इस पर होने वाली पूजा भी रुक गई थी। हालाँकि, अब इसका पुराना स्वरुप लौटा दिया गया है। इसका निरीक्षण ASI की एक टीम ने भी किया है।

संभल के एक और इलाके में पुराने समय के सिक्के और बर्तन भी मिले हैं। यह सभी सिक्के अमरपति खेड़ा की समाधि के पास मिली है। अमरपति खेड़ा सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समकालीन थे। वह आल्हा ऊदल के गुरु भी बताए जाते हैं। उनकी समाधि के पास पहले भी खुदाई में कई सिक्के वगैरह मिलते रहे हैं।

इन सिक्कों को प्रशासन ने अपने संरक्षण में ले लिया है। सिक्कों की संख्या 300-400 है। इन पर भगवान राम और माता सीता की आकृति उकेरी है। इन पर लक्ष्मण की आकृति भी उकेरी है। इसके अलावा कुछ और भी डिजाइन वाले सिक्के सामने आए हैं। इनकी धातु क्या है, यह स्पष्ट नहीं हुआ है।

संभल में प्रशासन के प्रयास से 87 तीर्थ में से 41 तीर्थ ढूंढ निकाले गए हैं। इसके अलावा सभी 19 कूप भी ढूंढ कर खोदे गए हैं। इन सभ तीर्थों और कूपों के जीर्णोद्धार का काम भी चल रहा है। कई ऐसी जगह हैं, जहाँ ASI ने सर्वे किया है।

सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर लगे रोक: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने UP सरकार को पॉलिसी बनाने के दिए निर्देश, बोले- मरीजों को प्राइवेट में रेफर करना बड़ा खतरा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वो एक ऐसी पॉलिसी लेकर आएँ जिससे राज्य के अस्पतालों में पोस्टेड डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगे। जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने इस मामले में चिंता जताते हुए कहा कि आज यह एक बड़ी समस्या है कि मरीज सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए जाता है और उसे निजी संस्थान में रेफर कर दिया जाता है।

अदालत ने कहा, “यह एक खतरा बन गया है कि मरीजों को इलाज के लिए निजी नर्सिंग होम और अस्पतालों में रेफर किया जा रहा है और राज्य सरकार द्वारा प्रांतीय चिकित्सा सेवाओं या राज्य मेडिकल कॉलेजों में नियुक्त डॉक्टर, मरीजों का इलाज और देखभाल नहीं कर रहे हैं। सिर्फ पैसे के लिए उन्हें निजी नर्सिंग होम और अस्पतालों में रेफर किया जा रहा है।”

गौरतलब है कि कोर्ट ने यह आदेश मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज के विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ अरविंद गुप्ता से जुड़ी याचिका पर पारित किया। डॉ गुप्ता के खिलाफ एक मरीज ने राज्य उपभोक्ता फोरम में शिकायत दी थी कि उन्होंने उस मरीज को प्राइवेट नर्सिंग होम भेजा और वहाँ उसका गलत इलाज हुआ। इसके बाद वो हाई कोर्ट पहुँचे।

इसके बाद ये मामला न्यायालय के समक्ष 2 जनवरी को उठा। कोर्ट ने सबसे पहले सवाल उठाया कि क्या डॉ गुप्ता को सरकारी सेवा में होने के बावजूद निजी सुविधा में मरीजों का इलाज करने की अनुमति दी जा सकती है? इसके बाद न्यायालय ने राज्य सरकार को यह भी आदेश दिया था कि वह जाँच करे कि सरकारी डॉक्टर किस प्रकार निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं।

अदालत ने उस समय भी कहा था, “यह एक गंभीर मामला है। राज्य को नर्सिंग होम और मेडिकल दुकानों में निजी प्रैक्टिस करने वाले सरकारी डॉक्टरों के बारे में भी जाँच करनी चाहिए, जिन्हें विभिन्न राज्य मेडिकल कॉलेजों में नियुक्त किया गया है।”

8 जनवरी को कोर्ट को चिकित्सा स्वास्थ्य एवं शिक्षा के प्रधान सचिव द्वारा 1983 के नियमों का हवाला देते हुए जानकारी दी गई कि कि ये नियम सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में कार्यरत डॉक्टरों को निजी प्रैक्टिस करने से रोकते हैं। वहीं सरकारी वकील ने बताया कि 6 जनवरी को उन सभी जिलाधिकारियों को प्राइवेट प्रैक्टिस रोकने के 30 अगस्त 1983 के शासनादेश का पालन कराने का निर्देश जारी किया गया है, जिन जिलों में मेडिकल कॉलेज स्थित है। इसको लागू करने का कोर्ट ने प्रमुख सचिव से हलफनामा मांगा गया है।

इसके बाद ही न्यायालय ने प्रधान सचिव को नियमों के क्रियान्वयन पर व्यक्तिगत हलफनामा दायर करने को कहा। कोर्ट ने प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा एवं स्वास्थ्य को निर्देश दिया कि वे 1983 के आदेशों के प्रवर्तन का विवरण देते हुए व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करें। इसके साथ ही, राज्य सरकार को एक नीति तैयार करने का भी निर्देश दिया गया ताकि सभी सरकारी डॉक्टरों पर निजी प्रैक्टिस पर प्रतिबंध लगाया जा सके। अब इस मामले की अगली सुनवाई 10 फरवरी को होगी।

गौरक्षक पर गोतस्कर हुसैन गैंग का हमला, पुलिस ने वसीम, मुबीन समेत 5 को दबोचा: अहमदाबाद में बीफ तस्करी की शिकायत के बाद पाली थी दुश्मनी

गुजरात के अहमदाबाद में एक गौरक्षक पर घातक हमला किया गया। उसने कुछ समय पहले गोतस्करों के खिलाफ बीफ (गोमांस) तस्करी की शिकायत दर्ज कराई थी। पीड़ित गौरक्षक ने पुलिस की शिकायत में बताया है कि बीफ पकड़वाने की वजह से हमला किया गया। इस हमले का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। गौरक्षक की शिकायत के बाद पुलिस ने इस मामले में मोहम्मद हुसैन समेत पाँच लोगों को गिरफ्तार किया है और आगे की कार्रवाई शुरू की है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, गौरक्षक पर हमले की घटना लाल दरवाजा इलाके में हुई, जो करण्ज पुलिस स्टेशन के तहत आता है। गौरक्षक मनोज बारिया ने पुलिस स्टेशन में जो शिकायत दर्ज कराई। पीड़ित के मुताबिक, वह घटना के दिन सुबह करीब 8 बजे एक दोस्त के साथ रुपाली सिनेमा के पास खड़ा था। इसी दौरान चार से पाँच लोग मास्क पहने और धारदार हथियारों व डंडों से उस पर हमला कर दिया।

इसी बीच पीड़ित ने एक हमलावर की आवाज से उसे पहचान लिया। वह हमलावर मोहम्मद हुसैन उर्फ लाइट उस्मान घाँची था। करीब तीन महीने पहले मनोज बारिया ने हुसैन और उसके साथियों के खिलाफ गाँधीनगर में 700 किलो बीफ की शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप है कि हुसैन और उसके साथियों ने इस घटना से दुश्मनी निकालते हुए गौरक्षक मनोज बारिया पर हमला किया।

इस हमले में मोहम्मद वसीम कुरेशी, मुबीन खान पठान और दो अन्य लोग शामिल थे। इस हमले का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में देखा जा सकता है कि आरोपित अपने चेहरे पर कपड़े बाँधकर गौरक्षक को घेरकर उसे पीट रहे हैं। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया और आरोपितों को गिरफ्तार किया।

पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद पुलिस हमलावरों को घटनास्थल पर ले गई और पूरे हमले के सीन को री-क्रिएट कराया गया। करण्ज पुलिस स्टेशन ने ऑपइंडिया से बताया कि पुलिस ने जैसे ही शिकायत मिली, कार्रवाई शुरू कर दी थी। सीसीटीवी फुटेज और शिकायतकर्ता के विवरण के आधार पर पुलिस ने आरोपितों को ट्रेस किया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। सभी के खिलाफ आईपीसी की धारा 189(2), 191(2), 191(3), 190, 115(2), 118(1) और गुजरात पुलिस एक्ट की धारा 135(1) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

अधिकारी ने आगे बताया, “रात में घटना के समय पकड़े गए आरोपितों की पूछताछ ने बाकी तीन आरोपितों की पहचान भी स्पष्ट की और बाकी तीन आरोपितों को सुबह जल्दी गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार होने के बाद सभी पाँच आरोपितों के खिलाफ नियमों के अनुसार कार्रवाई की गई और उन्हें कोर्ट में पेश किया गया। वहाँ से उन्हें रिमांड पर भेज दिया गया। रिमांड मिलने के बाद हम आरोपितों को घटना स्थल पर ले गए और घटना के सीन को री-क्रिएट भी कराया।”

दलितों को लालच देकर बुलाते और बाइबिल पढ़ाते, फिर करा देते धर्मांतरण: SC-ST कोर्ट ने ईसाई दंपती को सुनाई 5 साल की सजा, ₹25-25 हजार जुर्माना भी लगाया

उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर में जाकर गरीब दलितों को लालच देकर उनका धर्म परिवर्तन कराने के आरोप में एक ईसाई दंपती को एससी-एसटी कोर्ट के विशेष न्यायाधीश राम विलास सिंह ने 5 साल की सजा सुनाई है और उनके ऊपर 25-25 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है। ईसाई धर्मांतरण मामले में उत्तर प्रदेश धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत ये पहली सजा है।

जानकारी के मुताबिक, केरल से आए और मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के पिपरिया बैंक कॉलोनी में रहने वाले जोस पापाचन व उसकी पत्नी शीजा एएमएन के खिलाफ जलालपुर के जमौली निवासी भाजपा नेता चंद्रिका प्रसाद ने 18 जनवरी 2023 को केस दर्ज कराया था। चंद्रिका ने अपनी शिकायत में कहा था कि जोस और शीजा 2022 में 3 माह तक शाहपुर फिरोज गाँव की दलित बस्ती में आए-गए और वहाँ गरीब परिवारों को टारगेट करके उन्हें बरगलाया। इसके बाद 25 दिसंबर 2022 को दोनों पति-पत्नी ने दलितों को बड़ी संख्या में इकट्ठा करके धर्म परिवर्तन कराने का प्रयास किया।

चंद्रिका की शिकायत के बाद पुलिस ने दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया था। वहीं पड़ताल में इनके पास से ईसाई सामग्री बरामद हुई थी। इनके खिलाफ सबूत इकट्ठा करने के क्रम में ये जानकारी भी सामने आई थी कि ये लोग दलित बस्ती में पहुँचकर दलित समाज के लोगों को बाइबल का पाठ पढ़ाते थे, ईसा मसीह के बारे में बताते थे, रुपया पैसा का लालच देकर ईसाई धर्म से जुड़ने को कहते थे और आखिर में उनका ईसाई धर्म में परिवर्तन करवाकर उन्हें अपनी किताब देते थे। इतना ही नहीं ये लोग जनसभा करवाकर भी लोगों को बरगलाते थे।

कोर्ट ने यही सारे सबूत देखते हुए माना कि इन दोनों ने दलित समाज के लोगों को प्रलोभन देकर सामूहिक धर्म परिवर्तन करने के लिए प्रेरित किया। साथ ही विधि विरुद्ध ढंग से उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित कराया। इसके बाद उन्होंने दंपती को दलितों का धर्मांतरण कराने का दोषी पाते हुए धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत कारावास के साथ अर्थदंड की सजा सुनाई। अब शीजा को 18 जनवरी और जोस को 22 जनवरी को जेल भेजा गया।

बांग्लादेश में दुर्गा माता मंदिर और शीतला मंदिर पर कट्टरपंथियों का हमला, पुआल डालकर प्रतिमा को जलाया: मोहम्मद यूनुस की सरकार बोली- ‘मुल्क में नहीं हो रहा अल्पसंख्यक हिंदुओं का उत्पीड़न’

बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और उनके धार्मिक स्थलों पर हमले थमने का नाम नहीं ले रहे। ताजे मामले में ग़ोपालगंज जिले के काशियानी उपजिला के तराइल नॉर्थपारा गाँव में दुर्गा मंदिर और शीतला मंदिर को गुरुवार (21 जनवरी 2025) की सुबह आग के हवाले कर दिया गया। इस आगजनी में दोनों मंदिरों को भारी नुकसान हुआ। दुर्गा मंदिर की पूजा सामग्री जलकर खाक हो गई और शीतला देवी की मूर्ति को पुआल जलाकर खंडित कर दिया गया। घटना के बाद गाँव में दहशत का माहौल बन गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रोज़ाना मंदिर में पूजा करने वाले तराइल गाँव के निवासी प्रमोथ विश्वास ने बताया कि जब वे सुबह पूजा के लिए पहुँचे तो दुर्गा मंदिर का बाँस का दरवाजा खुला हुआ था। अंदर जाने पर उन्होंने देखा कि मंदिर के भीतर सब कुछ जला हुआ था। वहीं पास के शीतला मंदिर में मूर्ति को जलाने के लिए पुआल का इस्तेमाल किया गया था। प्रमोथ ने तुरंत गाँव के अन्य लोगों को इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा, “हमारे लिए यह केवल मंदिर नहीं, हमारी आस्था और संस्कृति का प्रतीक है। यह देखकर दिल टूट गया।”

पुलिस मौके पर पहुँची और घटना की पुष्टि की। काशियानी पुलिस थाने के प्रभारी मोहम्मद शफीउद्दीन खान ने कहा कि पुलिस कानूनी कार्रवाई कर रही है, लेकिन अब तक न तो किसी ने शिकायत दर्ज कराई है और न ही आरोपितों की पहचान हो सकी है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि घटना की जाँच गंभीरता से की जाएगी।

इस बीच, बांग्लादेश सरकार ने इन घटनाओं को धार्मिक हिंसा मानने से इनकार कर दिया है। गृह मामलों के सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) जहाँगीर आलम चौधरी ने ढाका में अमेरिकी चार्ज डी’अफेयर्स ट्रेसी ऐनी जैकब्सन से मुलाकात के दौरान दावा किया कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर कोई अत्याचार नहीं हो रहा। उन्होंने कहा, “हम बांग्लादेश में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करते। यहाँ सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं। जो कुछ भी हो रहा है, वह धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से हो रहा है। भारतीय मीडिया झूठ फैला रहा है कि अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे हैं।”

हालाँकि, बांग्लादेश में हिंदू मंदिरों पर हमले और अल्पसंख्यकों पर हिंसा की घटनाएँ कुछ और ही कहानी बयाँ करती हैं। कथित ‘स्टूडेंट्स रिवोल्यूशन’ के बाद खासकर जब शेख हसीना सरकार को सत्ता से हटाया गया, तब से अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं पर हमलों में बढ़ोतरी हुई है। ग़ोपालगंज की घटना इस हिंसा का ताज़ा उदाहरण है, लेकिन सरकार इसे स्वीकार करने से लगातार बच रही है।

मंदिरों पर हमलों और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के बावजूद बांग्लादेश सरकार ने भारतीय मीडिया पर झूठे आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया देश की छवि खराब करने के लिए गलत सूचनाएँ फैला रहा है।

इसके अलावा, अमेरिकी चार्ज डी’अफेयर्स ट्रेसी ऐनी जैकब्सन के साथ हुई इस बैठक में बांग्लादेश ने रोहिंग्या शरणार्थियों के पुनर्वास का मुद्दा भी उठाया गया। जहाँगीर आलम चौधरी ने अमेरिका से और अधिक रोहिंग्या मुस्लिमों को अपने देश में बसाने की अपील की। उन्होंने कहा कि अमेरिका पहले भी रोहिंग्या के पुनर्वास और सहायता में बड़ी भूमिका निभा चुका है। इस पर ट्रेसी ऐनी जैकब्सन ने बताया कि अब तक 17,000 रोहिंग्या अमेरिका में बसाए जा चुके हैं और यह प्रक्रिया अभी भी जारी है।

बैठक में सीमा सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ सहयोग, और पुलिस सुधार जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। बांग्लादेश ने अपने पुलिस और कोस्ट गार्ड के लिए मानवाधिकार और मानव तस्करी जैसे मामले में ज्यादा ट्रेनिंग देने की माँग की। ट्रेसी ऐनी जैकब्सन ने भरोसा दिलाया कि अमेरिका इस दिशा में अपनी मदद जारी रखेगा।

इसके साथ ही, बांग्लादेश सरकार ने यह भी दावा किया कि सीमा पर स्थिति सामान्य है। उन्होंने बताया कि अगले महीने भारत और बांग्लादेश के सीमा सुरक्षा बलों (बीएसएफ और बीजीबी) के बीच दिल्ली में बैठक होगी, जहाँ दोनों देशों के सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा होगी।

हालाँकि, ज़मीनी हकीकत इन दावों से काफी अलग है। बांग्लादेश में मंदिरों पर हमले और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की घटनाएँ यह साबित करती हैं कि वहाँ की सरकार इस मुद्दे को सुलझाने में नाकाम रही है। यही कारण है कि बांग्लादेशी सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि बचाने के प्रयास में भारतीय मीडिया पर लगातार झूठे आरोप लगा रही है।

तुर्की नहीं भारत से शुरू हुआ ‘लौह युग’, तमिलनाडु में मिले 5300 साल पुराने साक्ष्य: लोहे को गला कर बनाए गए थे चाकू-तलवार, अमेरिकी लैब ने भी की पुष्टि

मानव सभ्यता द्वारा लोहे का उपयोग सबसे पहले भारत में हुआ था। तमिलनाडु से मिले लोहे के औजारों और बर्तनों से इस बात की पुष्टि हुई है। लैब में की गई जाँच से यह 5 हजार साल से अधिक पुराने पाए गए हैं। इससे पहले माना जाता था कि तुर्की में सबसे पहले लोहे का उपयोग चालू हुआ। ‘लौह युग’ का जनक अब भारत को माना जा सकता है।

तमिलनाडु में लौह युग के प्रमाण देने वाली रिपोर्ट मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने जारी की है। उन्होंने लिखा, “मैं बड़े गर्व के सामने विश्व के सामने यह घोषणा करता हूँ कि लौह युग की शुरुआत तमिल धरती पर हुई। विश्व-प्रसिद्ध संस्थानों के परिणामों के आधार पर, तमिलनाडु में लोहे का उपयोग ईसा पूर्व 4000 वर्ष की शुरुआत से होता है, जिससे यह स्थापित हो गया है कि दक्षिण भारत में लोहे का उपयोग 5,300 साल पहले जोरशोर से हो रहा था।”

तमिलनाडु में क्या मिला?

तमिलनाडु के थूथुकोड़ी जिले में सिवागालाई समेत कई इलाकों में 2019 से 2022 के बीच आठ अलग-अलग जगह खुदाई की गई थी। यह खुदाई एक कब्रिस्तान के आसपास हुई थी। यहाँ खुदाई में तमिलनाडु पुरातत्व विभाग को 160 बड़े मिट्टी के कलश मिले थे। इनमें से एक कलश पूरी तरीके से बंद मिला, जिसमे सदियों के बाद भी मिट्टी नहीं गई थी।

इस कलश के भीतर एक मानव कंकाल, कुछ लोहे के औजार और धान के बीज भी मिले थे। सबसे पहले पुरातत्विकों ने धान की जाँच करवाई जो लगभग 3 हजार साल पुराना निकला। इसके बाद इस कलश और बाकी जगह से इकट्ठा हुए लोहे के सामान की जाँच हुई। यह सभी 2953 ईसा पूर्व से 3345 ईसा पूर्व (लगभग 5000 साल पुराने) के निकले।

इन कलश से इनमें चाकू, तलवार, छेनी, अंगूठी और कुल्हाड़ी जैसे सामान मिले हैं। यह लोहे को गला कर बनाए गए थे। इनकी जाँच एक्सेलरेटर मास स्पेक्ट्रोमेट्री (AMS) तकनीक से करवाई गई। यह तकनीक कार्बन डेटिंग का एक हिस्सा है। इससे पता चलता है कि कोई वस्तु कितनी पुरानी थी।

‘एंटिक्विटी ऑफ़ आयरन: रीसेंट रेडिओमेट्रिक डेट्स फ्रॉम तमिल नाडु’ नाम से जारी की गई इस रिपोर्ट में इस पूरी खुदाई और जाँच तथा क्या-क्या मिला, इसकी जानकारी दी गई है। इसे K राजन और R सिवानंथन ने लिखा है।

तुर्की का दावा बदला

सिवागालाई में मिली वस्तुओं की जाँच केवल एक ही जगह नहीं हुई। बल्कि इसे लखनऊ में स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान लैब, फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी अहमदाबाद और अमेरिका स्थित बीटा लैब्स में टेस्ट करवाया गया। तीनों ने ही साफ़ किया कि तमिलनाडु में मिले लोहे के औजार 5000 साल से अधिक पुराने हैं।

अब तक माना जाता रहा है कि तुर्की और सीरिया के इलाकों में गलाए हुए लोहे का सबसे पहले उपयोग हुआ। तुर्की में लगभग 3700-4000 वर्ष पहले रहने वाले हित्तित लोगों को लोहा उपयोग करने का श्रेय दिया जाता रहा है। इन इलाकों में खुदाई से लोहे के तीर-तलवार आदि मिले हैं।

तमिलनाडु में मिले लोहे के सामान और अलग-अलग लैब से उनके 5000 साल से अधिक पुराने होने की पुष्टि के बाद अब तुर्की का दावा पलट गया है। भारतीय पुरातत्व विशेषज्ञों ने भी इसे बड़ी खोज करार दिया है। पुरातत्व विशेषज्ञ दिलीप चक्रबर्ती ने इसे दुनिया के लिए बड़ी खोज बताया है।

दिलीप कुमार ने कहा, “दुनिया में पहली बार, गले लोहे का इतिहास 3 हजार साल पहले का पाया गया है। यह ना केवल भारत के इतिहास में, बल्कि विश्व के पुरातत्व के संदर्भ में भी एक महत्वपूर्ण खोज है।” ASI के पूर्व मुखिया राकेश तिवारी ने कहा है कि भारतीय पुरातत्व के मामले में एक नया मोड़ है।

डॉक्टर तिवारी ने कहा है कि अब तक भारत में लोहे का उपयोग ज्यादा से ज्यादा 1500 ईसा पूर्व में माना गया है। यह साबित करने के लिए आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में मिली वस्तुओं की जाँच भी हुई है। उन्होंने कहा कि अब नई खोज से यह 3000 साल पहले पहुँच गया है, जो कि एकदम अविश्वसनीय है।

गौरतलब है कि अब तक यह दावा होता रहा है कि भारत के लोगों का लोहे से परिचय तुर्की के लोगों ने करवाया। इस खोज के बाद यह दावा कमजोर पड़ गया है। उल्टे इस बात की अधिक संभावना है कि भारत से ही लोहा तुर्की या बाकी विश्व के इलाकों में पहुँचा हो।

उत्तर में ‘ताम्र युग’, दक्षिण में ‘लौह युग’

तमिलनाडु में ‘लौह युग’ के बारे में नई जानकारी देने वाली रिपोर्ट से भारत के इतिहास के विषय में और भी बातें सामने आई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जब उत्तर भारत में सिन्धु घाटी सभ्यता में ताँबे का उपयोग हो रहा था, लगभग उसी समय तमिलनाडु में लोहे का उपयोग हो रहा था।

रिपोर्ट में कहा गया है, “जब विंध्य के उत्तर (उत्तर भारत) में स्थित इलाकों में ने ताम्र युग चल रहा था, तो विंध्य के दक्षिण का क्षेत्र (विंध्य भारत) कामकाज में लाए जाने वाले ताँबे की कमी के चलते लौह युग में प्रवेश कर गया होगा।”

रिपोर्ट लिखने वाले K राजन ने कहा, “रेडियोकार्बन डेटिंग दर्शाती हैं कि जब सिंधु घाटी में ताम्र युग था, तब दक्षिण भारत लौह युग में था। इस अर्थ में, दक्षिण भारत का लौह युग और सिंधु का ताम्र युग एक ही समय में चल रहे थे।

उन्होंने कहा, “अब, हमने पाया है कि शिवगलाई और आदिचनल्लूर से मिले लोहे के औजार 2,500-3,000 ईसा पूर्व के हैं। आगे न केवल तमिलनाडु में बल्कि देश भर में अन्य स्थानों पर और अधिक स्थलों की खोज और खुदाई होनी चाहिए, ताकि अब तक जो कुछ भी हमने प्राप्त किया है, उसे और मजबूत किया जा सके।”

तमिलनाडु के पुरातत्व विभागके मुखिया उदयचंद्रन ने कहा, “अन्य धातुओं की तुलना में, लोहे को गलाने के लिए आपको 1,200 से 1,400 डिग्री सेल्सियस तक के उच्च तापमान की आवश्यकता होती है। इसके लिए बेहतर तकनीक चाहिए होती है। यह दर्शाता है कि तमिल लोगों ने 5,300 साल पहले भी इस कौशल में महारत हासिल कर ली थी।”