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उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू, UCC लागू करने वाला भारत का पहला राज्य बना: शादी विवाह से लेकर लिव-इन तक के लिए बदला कानून, जानिए डिटेल

उत्तराखंड सरकार ने बुधवार (22 जनवरी 2025) को समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी। यह कानून व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी शादियों, तलाक, संपत्ति उत्तराधिकार और विरासत जैसे मामलों में स्पष्टता और समानता लाने का काम करेगा। उत्तराखंड ऐसा करने वाला भारत का पहला राज्य बन गया है।

सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यह कानून राज्य के सभी निवासियों पर लागू होगा, चाहे वे राज्य के अंदर रह रहे हों या बाहर। हालाँकि, संविधान के अनुच्छेद 342 और 366 (25) के तहत अधिसूचित अनुसूचित जनजातियों और संरक्षित प्राधिकृत व्यक्तियों तथा समुदायों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।

समान नागरिक संहिता अधिनियम- 2024, व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा और सामाजिक सामंजस्य को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया गया है। इसके तहत शादी सिर्फ उन्हीं व्यक्तियों के बीच हो सकती है जिनमें से किसी का भी जीवनसाथी जीवित न हो, दोनों मानसिक रूप से सक्षम हों, पुरुष की उम्र 21 वर्ष और महिला की उम्र 18 वर्ष पूरी हो चुकी हो और वे प्रतिबंधित संबंधों की श्रेणी में न आते हों।

उत्तराखंड यूसीसी (फोटो साभार: Canva/OPIndia Hindi Team)

शादी किसी भी धार्मिक रीति-रिवाज या कानूनी प्रक्रिया के तहत की जा सकती है, लेकिन इसे लागू होने के 60 दिनों के भीतर रजिस्टर कराना अनिवार्य है। जिनकी शादी 26 मार्च, 2010 से लागू होने की तिथि तक हुई है, उन्हें 6 महीने के भीतर रजिस्ट्रेशन कराना होगा। हालाँकि, पहले से रजिस्टर्ड शादियों को दोबारा रजिस्टर करने की जरूरत नहीं है, लेकिन पहले किए गए रजिस्ट्रेशन का सत्यापन जरूरी है।

जो शादियाँ 26 मार्च, 2010 से पहले या राज्य से बाहर हुई हैं और जहाँ दोनों पक्ष तब से साथ रह रहे हैं और सभी कानूनी योग्यता पूरी करते हैं, वे भी (हालाँकि यह अनिवार्य नहीं है) इस अधिनियम के लागू होने के 6 महीने के भीतर रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं।

अधिनियम के तहत शादी का रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीके से किया जा सकता है। आवेदन करने के बाद उप-पंजीयक को 15 दिनों के भीतर निर्णय लेना होगा। अगर तय समय सीमा में निर्णय नहीं होता है, तो आवेदन अपने आप रजिस्ट्रार के पास चला जाएगा।

रजिस्ट्रेशन आवेदन को खारिज किए जाने पर अपील की पारदर्शी प्रक्रिया भी उपलब्ध है। झूठी जानकारी देने पर जुर्माने का प्रावधान किया गया है, लेकिन रजिस्ट्रेशन न होने पर शादी को अवैध नहीं माना जाएगा।

उत्तराखंड सरकार इस अधिनियम को लागू करने के लिए रजिस्ट्रार जनरल, पंजीकरण और उप-पंजीयक की नियुक्ति करेगी। यह अधिकारी संबंधित रिकॉर्ड्स का रखरखाव और निगरानी सुनिश्चित करेंगे।

हिंदू मंदिर के बाद जैन गुफाओं को हरे रंग से पोता, वक्फ की जमीन बता मुस्लिम लीग के सांसद ने पवित्र पहाड़ी पर खाया मांस: तमिलनाडु पुलिस के रोकने पर बवाल

तमिलनाडु के मदुरई में स्थित पवित्र थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी पर मुस्लिम बकरियों और मुर्गों की कुर्बानी देना चाहते हैं। यह पहाड़ी भगवान मुरुगन के 6 घरों में से एक है। यहाँ एक शिव मंदिर भी है। इसी पहाड़ी में स्थित जैन गुफाओं को भी कट्टरपंथियों ने हरा रंग दिया। इसका नाम ‘सिकंदर पहाड़ी’ करने का भी प्रयास चल रहा है। भगवान मुरुगन के निवास वाली पहाड़ी पर जाकर IUML के एक सांसद ने मांसाहारी खाना भी खाया। IUML कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन में है। कई बार इसके चलते झड़पें भी हो चुकी हैं।

सबसे ताजा विवाद बुधवार (21-22 जनवरी, 2025) का है। थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी पर मुस्लिम लीग के सांसद नवास कानी ने जाकर कई लोगों के साथ मांसाहारी खाना खाया। वह उन लोगों के समर्थन में पहुँचे थे जो इस पहाड़ी पर जानवरों की कुर्बानी देना चाहते हैं। यह कुर्बानी एक दरगाह पर दी जानी है जो मंदिर से कुछ दूर स्थित है। नवास कानी ने दावा किया है कि यहाँ सालों से कुर्बानी दी जाती रही है और इसे अब रोकना गलत है। वहीं पुलिस ने कहा है कि पहाड़ी के ऊपर कुर्बानी नहीं दी सकती और केवल खाना ले जाया जा सकता है।

इससे पहले 18 जनवरी, 2025 को भी मुस्लिमों ने पहाड़ी पर जानवर ले जाने का प्रयास किया था। इन्हें दरगाह के पास कुर्बानी देकर इनका मांस पकाया जाता। लेकिन पुलिस-प्रशासन ने इन्हें रोक दिया था। यहाँ मुस्लिमों को इकट्ठा करने के लिए कई सोशल मीडिया पोस्ट भी की गईं थी। बाद में यहाँ बवाल भी हुआ। कुर्बानी का मामला अभी प्रशासन के पास लटका है। मुस्लिम MP नवास कानी का कहना है कि जल्द ही थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी पर कुर्बानी की अनुमति दी जाएगी। MP ने दावा किया है कि दरगाह का जमीन वक्फ बोर्ड की है।

इस बीच इसी पहाड़ी पर दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से बनी जैन गुफाओं को हरा रंग से रंगने का एक मामला भी सामने आया है। इन गुफाओं में ब्राह्मी लिपि में शिलालेख भी हैं। यह गुफाएँ ASI संरक्षित हैं। गुफाओं में हरा रंग किए जाने के मामले में ASI अधिकारियों ने शिकायत दर्ज करवाई है। अब इसकी जाँच चल रही है। इस पहाड़ी को थिरुपरनकुन्द्रम से बदल कर सिकंदर पहाड़ी करने के प्रयास भी चल रहे हैं। इसको लेकर भी विवाद हो चुका है।

बीते कुछ दिनों में यहाँ कई बार मुस्लिम संगठन प्रदर्शन कर चुके हैं। इसमें प्रतिबंधित आतंकी संगठन PFI से जुड़ा राजनीतिक दल SDPI भी शामिल है। इसके अलावा जमात जैसे संगठन भी इस मामले में कुर्बानी को लेकर अड़े हैं। वहीं हिन्दुओं का कहना है कि पहाड़ी पर कुर्बानी करना मतलब भगवन मुरुगन के शीर्ष पर कुर्बानी करना होगा क्योंकि उनका मंदिर पहाड़ी की तलहटी में स्थित है। हिन्दुओं ने आरोप लगाया कि नाम बदलना और क़ुरबानी को लेकर झगड़े करना उन्हें मंदिर जाने से रोकने का प्रयास है।

इस मामले में मद्रास हाई कोर्ट में दरगाह पर नमाज रोकने के लिए एक याचिका भी डाली गई थी। लेकिन हाई कोर्ट ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि 30 मिनट के लिए नमाज की अनुमति देने में कोई हर्ज नहीं है। यहाँ विवाद लम्बे समय से चला आ रहा है। थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी हिन्दुओं के लिए काफ़ी पवित्र है और भगवान मुरुगन के 6 निवास स्थलों में से एक है। लम्बे समय से यहाँ हिन्दू पूजा अर्चना के लिए आते रहे हैं। अब यहाँ विवाद खड़ा करने का प्रयास हो रहा है।

जातिवाद का इल्जाम, झूठी जानकारी… UP के जिस अधिकारी ने CM योगी पर आपत्तिजनक संदेश किया फॉर्वर्ड, उसकी बर्खास्तगी का ऑर्डर HC ने रद्द किया

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आपत्तिजनक मैसेज फॉर्वर्ड करने के आरोप में राज्य सचिवालय में कार्यरत अतिरिक्त निजी सचिव अमर सिंह की सेवाएँ साल 2020 में बर्खास्त की गई थी। अब इसी मामले में खबर है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने आरोपों के पुख्ता सबूत न मिलने पर उस आदेश को रद्द कर दिया।

क्या था मैसेज में

साल 2018 में एक व्हॉट्सएप संदेश शेयर किया गया जिसमें लिखा था:

“यूजीसी के नियमों के अनुसार, ओबीसी और अनुसूचित जाति समुदायों के लिए अवसर प्रभावी रूप से बंद कर दिए गए हैं। रामराज्य के इस युग में, मुख्यमंत्री ठाकुर अजय सिंह योगी और उपमुख्यमंत्री पंडित दिनेश शर्मा ने जातिवाद को खत्म करते हुए गोरखपुर विश्वविद्यालय में कुल 71 पदों में से 52 पदों पर अपनी ही जाति के लोगों को सहायक प्रोफेसर नियुक्त किया है।”

इस संदेश को ही अमर सिंह ने दूसरे ग्रुप में शेयर किया था। हालाँकि जाँच हुई तो पता था कि पहले ये संदेश उस ग्रुप में आया था जिसके वो एडमिन थे, उन्होंने इसे हटाने का प्रयास किया, लेकिन उसी चक्कर में उनसे ये संदेश फॉर्वर्ड हो गया।

उन्होंने बाद में इसे लेकर मुख्य सचिव को पत्र लिखकर माफी भी माँगी लेकिन संदेश फॉर्वर्ड करने के लिए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक जाँच शुरू की गई और पाया गया कि इस संदेश के आगे बढ़ने से सरकार की छवि धूमिक होती। इसके बाद साल 2020 में उनकी सेवाएँ बर्खास्त कर दी गईं।

कोर्ट ने क्या कहा

अमर सिंह इसके बाद हाई कोर्ट पहुँचे। कोर्ट ने मामले में सुनवाई की। पक्षों को सुना। उसके बाद जस्टिस आलोक माथुर ने कहा कि अनजाने में फॉर्वर्ड किए गए मैसेज के लिए बर्खास्तगी की सजा बहुत ही ज्यादा है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने यह स्वीकार कर लिया है कि संदेश को अनजाने में आगे बढ़ा दिया गया। इसलिए जस्टिस ने राय दी कि सजा बेहद नरम होनी चाहिए। जैसे उनकी सेवा रिकॉर्ड में इसका उल्लेख या निंदा आदि।

जस्टिस ने कहा कि निस्संदेह ही एक सरकारी कर्मचारी के रूप में याचिकाकर्ता को ऐसी आपत्तिजनक सामग्री से निपटने में सावधानी बरतनी चाहिए थी, लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने ये कार्य दुर्भावना से किया।

कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर वो संदेश प्रसारित नहीं किया और चूँकि इस बात के सबूत भी नहीं मिलते कि आगे वो संदेश बढ़ाया गया इसलिए ये सिर्फ अटकलें होंगीं कि संदेश के प्रसारित होने से सरकार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा।

लखनऊ से मुंबई जा रही थी पुष्पक एक्सप्रेस, आग की अफवाह से यात्री कूदे: कर्नाटक एक्सप्रेस की चपेट में आकर कई के हुए टुकड़े, 12 मौतें

महाराष्ट्र के जलगाँव जिले में बुधवार (22 जनवरी 2024) की शाम एक भयावह ट्रेन हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इस हादसे में 12 लोगों की मौत हो गई, जबकि 40 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। यह घटना पचोरा के पास महेजी और परधाडे रेलवे स्टेशनों के बीच हुई, जब लखनऊ से मुंबई जा रही पुष्पक एक्सप्रेस ट्रेन के यात्रियों ने आग लगने की अफवाह के चलते घबराकर ट्रेन से कूदना शुरू कर दिया। इसी दौरान दूसरी ओर से आ रही कर्नाटक एक्सप्रेस ने उन्हें कुचल दिया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना तब हुई जब लखनऊ से मुंबई जा रही पुष्पक एक्सप्रेस के एक कोच में पहियों से चिंगारी निकलने लगी। यात्रियों में किसी ने अफवाह फैला दी कि ट्रेन में आग लग गई है। इससे डरे-सहमे यात्रियों ने तुरंत अलार्म चेन खींची और ट्रेन को रुकवा दिया। अफरातफरी के बीच कुछ यात्री ट्रेन से कूदकर ट्रैक पार करने की कोशिश करने लगे। उसी समय पास वाले ट्रैक पर बेंगलुरु से दिल्ली जा रही कर्नाटक एक्सप्रेस गुजरी और उसकी चपेट में आने से 12 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। रेलवे अधिकारियों ने बताया कि हादसे की वजह ‘हॉट एक्सल’ से उठी चिंगारी हो सकती है, जिसे यात्रियों ने आग समझ लिया।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, घटना के बाद पटरियों पर शव बिखरे पड़े थे। चारों तरफ चीख-पुकार मची हुई थी और लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे। कई यात्री खून से लथपथ हालत में दिखाई दिए। जलगाँव सिविल अस्पताल के डीन ने बताया कि अस्पताल में अब तक 12 शव लाए गए हैं और 40 घायलों का इलाज किया जा रहा है।

घटना के तुरंत बाद रेलवे और जिला प्रशासन हरकत में आ गया। नासिक के डिविजनल कमिश्नर प्रवीण गेदाम ने कहा कि 8 एंबुलेंस और रेलवे की बचाव टीमें मौके पर भेजी गईं। रेलवे अधिकारियों ने पुष्पक एक्सप्रेस में चेन पुलिंग की पुष्टि करते हुए कहा कि यह हादसा पूरी तरह से घबराहट और अफवाह की वजह से हुआ। रेलवे के प्रवक्ता स्वप्निल नीला ने बताया, “हादसे की वजह अफवाह के कारण यात्रियों का घबराना और ट्रैक पर उतरना था। हमने घटना की जाँच शुरू कर दी है और घायलों को बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।”

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस हादसे को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए संवेदनाएँ प्रकट कीं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से भी उन्होंने बात की। उन्होंने एक्स पर लिखा, “महाराष्ट्र के जलगाँव में हुआ रेल हादसा अत्यंत दुःखद है। इस संबंध में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जी से बात कर हादसे की जानकारी ली। स्थानीय प्रशासन घायलों को हर संभव मदद पहुँचा रहा है। इस दुर्घटना में जान गँवाने वाले लोगों के परिजनों के प्रति गहरी संवेदनाएँ व्यक्त करता हूँ और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूँ।”

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि राज्य सरकार स्थिति पर कड़ी नज़र रखे हुए है। उन्होंने ट्वीट किया, “जलगाँव जिले के पचोरा के पास हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना बहुत ही हृदयविदारक है। घायलों को हर संभव चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।” मुख्यमंत्री फडणवीस ने मृतकों के परिजनों के लिए 5-5 लाख रुपए मदद की घोषणा भी की।

फिलहाल, जलगाँव जिला प्रशासन ने घटनास्थल पर तुरंत कार्रवाई करते हुए बचाव अभियान शुरू कर दिया। जिला कलेक्टर ने बताया कि नजदीकी अस्पतालों को अलर्ट पर रखा गया है और गंभीर घायलों को बेहतर इलाज के लिए मुंबई भेजा जा सकता है।

‘भारत की तारीफ अपराध’: पाकिस्तान में ‘फाँसी’ पाने वाले यूट्यूबर सोहैब चौधरी-सना अमजद ने लौटकर सुनाई प्रताड़ना की कहानी, कहा- हर दिन लगता था यह मेरा आखिरी दिन

पाकिस्तान के दो बड़े यूट्यूबर्स के बारे में ये अफवाहें उड़ रही थी कि पाकिस्तानी सेना ने उन्हें फाँसी दे दी। अब 21 दिन बाद दोनों यूट्यूबर- सोहैब चौधरी और सना अमजद वापस आ गए हैं। उन्होंने 21 और 22 जनवरी 2025 को वीडियो जारी किए और अपने ऊपर ढाए गए जुल्मों के बारे में पूरी दुनिया को बताया।

बता दें कि दोनों यूट्यूबर अचानक कई दिनों तक लापता रहे। जिसके बाद सोशल मीडिया पर कई अफवाहें फैली। कुछ ने कहा कि वो पाकिस्तान से भाग गए हैं, तो कुछ ने दावा किया कि प्रो-इंडिया कंटेंट की वजह से पाकिस्तानी सेना ने उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया। हालाँकि अब दोनों वापस आ गए हैं। अपनी वापसी के बाद दोनों ने अपने-अपने यूट्यूब चैनल पर वीडियो शेयर करते हुए बताया कि उनकी आवाज़ दबाने और उनके परिवार को धमकाने के लिए पूरी प्लानिंग करके खास अभियान चलाया गया।

सोहैब चौधरी ने सुनाई टॉर्चर की कहानी

राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय के लिए जाने-जाने वाले सोहैब चौधरी ने खुद पर की गई ज्यादतियों के बारे में विस्तार से बताया। सोहैब ने कहा, “रात के करीब 2 बजे, हथियारबंद लोग मेरे घर में घुस आए, मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दी और मुझे एक अज्ञात स्थान पर ले गए।” उन्होंने आगे बताया कि अगले तीन हफ्तों तक उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।

सोहैब ने कहा, “हर दिन मुझे लगता था कि यह मेरा आखिरी दिन होगा। उन्होंने मुझे डराने के लिए नकली फाँसी भी दी। मेरा एनकाउंटर भी किया।” सोहैब ने यह भी आरोप लगाया कि उनको किडनैप करने वाले लोग एक राजनीतिक पार्टी से जुड़े हैं, और उन्हें इस पार्टी में शामिल होने के लिए मजबूर कर रहे थे। आने वाले समय में वो पार्टी का भी नाम बताएँगे।

सोहैब ने कहा, “उन्होंने मुझ पर तीन झूठे मुकदमे दर्ज कराए और धमकी दी कि अगर मैंने उनकी बात नहीं मानी तो वे मेरी ज़िंदगी तबाह कर देंगे।” लेकिन इन धमकियों के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने कहा, “उन्होंने मेरा डर खत्म कर दिया। मैं अब और मजबूत हो गया हूँ। मैं सच बोलता रहूँगा और न्याय के लिए लड़ाई जारी रखूँगा।” सोहैब ने अपने अपहरणकर्ताओं को चुनौती दी, “आप मुझे 21 साल तक जेल में डाल सकते हैं, लेकिन मेरी आवाज़ नहीं दबा सकते। मैं पाकिस्तान में भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ बोलना बंद नहीं करूँगा।”

सना अमजद को परिवार के नाम पर धमकाया

सना अमजद ने भी अपने वीडियो में बताया कि उन्हें प्रताड़ित करने के लिए उनके परिवार को निशाना बनाया गया। उन्होंने कहा, “उन्होंने मेरी बेवा वालिदा (अम्मी) को धमकाने की कोशिश की ताकि मैं उनकी बात मान लूँ।” सना ने आगे बताया, “उन्होंने मेरी बेवा वालिदा के घर तक पहुँचने के लिए फर्जी कॉल किए और यहाँ तक कि शादी का कार्ड देने का बहाना बनाकर उनके घर गए। जब मेरी अम्मी मेरा पता बताने से इनकार कर दिया तो उन्होंने उन्हें धमकाया। इस घटना की वजह से मेरी अम्मी सदमें में चली गई।”

भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत और बेहतर संबंधों की वकालत करने वाली सना ने कहा कि उनके वीडियो अक्सर पाकिस्तान के ताकतवर लोगों को नाराज करते हैं। सना ने कहा, “वे मानते हैं कि पाकिस्तान में भारत की तारीफ करना अपराध है। लेकिन अगर प्रधानमंत्री समेत कई नेता भारत की तारीफ कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं?” उन्होंने यह भी बताया कि उनकी गुमशुदगी के दौरान उन्हें लगातार गालियाँ और धमकियाँ दी गईं। सना ने कहा, “उन्होंने मुझे डराने के लिए कहा कि वे मेरी आवाज़ बंद कर देंगे। लेकिन अब उनका डर मेरे अंदर से खत्म हो गया है। मैं सच बोलना जारी रखूँगी।”

आलोचकों को चुप कराने की साजिश

दोनों यूट्यूबर्स का मानना है कि उनके अपहरण का मकसद पाकिस्तान में स्वतंत्र आवाजों को दबाना था। सना ने कहा, “2019 में, मैं लिबर्टी मार्केट में खड़ी होकर लोगों से भारत के बारे में उनकी राय पूछती थी। तब यह कोई मुद्दा नहीं था। लेकिन 2024 में यह इतनी बड़ी समस्या क्यों बन गई?”

सोहैब ने कहा, “पाकिस्तान में किसी पर झूठे मुकदमे लगाकर या उन्हें ‘भारतीय एजेंट’ करार देकर चुप करा दिया जाता है। मुझ पर भी यही आरोप लगाया गया, लेकिन मैं सच बोलता रहूँगा। भारत की जीडीपी पाकिस्तान से आगे है, और यह सच है।” सोहैब ने यह भी कहा कि पाकिस्तानी मीडिया और यूट्यूबर्स ने उनकी गुमशुदगी पर चुप्पी साधी। “जो लोग आजादी की बात करते हैं, वे कहाँ हैं? डर या स्वार्थ के कारण कई लोग खामोश रहे।”

भारतीय मीडिया का अदा किया शुक्रिया

दोनों यूट्यूबर्स ने भारतीय मीडिया और समर्थकों का शुक्रिया अदा किया। सना ने कहा, “भारतीय मीडिया ने हमारा साथ दिया, लेकिन हमारी अपनी मीडिया ने खामोशी बरती। यह चुप्पी दिखाती है कि पाकिस्तान में स्वतंत्र आवाजों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।” सोहैब ने कहा कि वह आगे और वीडियो जारी करेंगे, जिनमें उन लोगों के खिलाफ सबूत पेश करेंगे जो उनके अपहरण में शामिल थे। उन्होंने कहा, “मैं हर सबूत के साथ दिखाऊँगा कि कैसे राजनीतिक पार्टियाँ अपने आलोचकों को चुप कराने के लिए धमकी का सहारा लेती हैं।”

खतरे में है दोनों की जिंदगी

सोहैब और सना दोनों ने माना कि उनकी ज़िंदगी अब भी खतरे में है। सोहैब ने कहा, “मेरी जान को अब भी खतरा है। वे मुझे खत्म करने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन सच को मार नहीं सकते।” सना ने कहा, “अगर मेरी आवाज़ बंद हो भी जाए, तो मेरे वीडियो हमेशा मेरे लिए बोलते रहेंगे।”

जो द्वारका अब हुई कब्जा मुक्त, वहाँ बने अवैध ढाँचों से ड्रग्स और विस्फोटकों की होती थी तस्करी: हाई कोर्ट को गुजरात सरकार ने बताया क्यों बुलडोजर एक्शन जरूरी

गुजरात सरकार ने हाई कोर्ट के समक्ष द्वारका में धार्मिक संरचनाओं पर कार्रवाई को यथास्थिति बनाए रखने के आदेश का विरोध किया है। सरकार ने तर्क दिया कि इन संरचनाओं का उपयोग मादक पदार्थों और विस्फोटकों की तस्करी के लिए किया जाता है। राज्य सरकार ने कहा कि क्षेत्र में बम विस्फोट हो चुके हैं और कुछ दरगाहों को विस्फोटकों के भंडारण का उपयोग करते हुए पाया जा चुका है।

मामले की सुनवाई के दौरान 20 जनवरी को राज्य सरकार की ओर से पेश सरकारी वकील जीएच विर्क ने जस्टिस मौना एम भट्ट के समक्ष तर्क प्रस्तुत किया। वकील ने कहा कि राज्य ने संरचना को छोड़कर सभी अतिक्रमण हटा दिए हैं। यह कोर्ट के यथास्थिति के आदेश के तहत है। उन्होंने तर्क दिया कि रिट याचिका अदालत को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं था।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने तर्क दिया कि जिन संरचनाओं को यथास्थिति में रखा जा रहा है, उनका उपयोग मादक पदार्थों की तस्करी, विस्फोटकों की तस्करी के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में बम विस्फोट हो चुके हैं और कुछ दरगाहों के मुजाहिदों (दीन के लड़ने वाले मुस्लिम) को विस्फोटकों के भंडारण के लिए इनका उपयोग करते हुए पाया गया है।

इस पर कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का दावा किया है कि संबंधित संपत्ति वक्फ संपत्ति है। वहीं, राज्य सरकार का दावा है कि यह भूमि गौचर भूमि (चारागाह भूमि) है। कोर्ट के सवालों का जवाब देते हुए वकील विर्क ने कहा कि विर्क ने कहा कि पब्लिक ट्रस्ट रजिस्टर से पता चलता है कि जिस संपत्ति पर सवाल उठाया जा रहा है, वह वक्फ संपत्ति नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि एक याचिका में यह गौचर भूमि (चारागाह भूमि) है और दूसरी याचिका में यह कब्रिस्तान है। उन्होंने सवाल किया कि कब्रिस्तान पर कोई विशाल भव्य संरचना कैसे बना सकता है। उन्होंने इंटेलिजेंस ब्यूरो के माध्यम से रिकॉर्ड पर रखे गए उपग्रह चित्रों के बारे में जानकारी दी और हर तरफ से निर्माण किए हुए ऐसे परिसरों में ड्रग्स तस्करी की बात कही।

इस कोर्ट ने सवाल किया कि कब्रिस्तान तो आमतौैर पर वक्फ संपत्ति होती है। इसका जवाब देते हुए वकील विर्क ने कहा कि ये सारी सरकारी भूमि है, जो राजस्व दस्तावेजों में अंकित है और सरकार ने इस भूमि को कब्रिस्तान के उद्देश्य से आवंटन किया था। विर्क ने कहा कि तीन मामलों में से दो मामलों में राजस्व सर्वे नंबर दिया जा चुका है।

बता दें कि गुजरात में श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका के 7 द्वीपों को अतिक्रमण से मुक्त कर दिया गया है। यहाँ अवैध रूप से बनाए गए 36 ढाँचे तोड़ दिए गए हैं। यह कार्रवाई राज्य सरकार ने तेजी के साथ की है। राज्य के गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने 21 जनवरी 2025 को बताया है कि द्वारका के द्वीप अब अतिक्रमण से शत प्रतिशत मुक्त हैं।

उन्होंने वहाँ के वीडियो भी सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर शेयर कीं। इन वीडियो में दरगाह जैसे कुछ ढाँचे पहले खड़े दिखाई देते हैं, जिन्हें बाद में जमींदोज कर दिया गया है। यह ढाँचे 7 अलग-अलग द्वीपों पर बने हुए थे। इन अतिक्रमण वाले ढांचों ने जमीन का बड़ा हिस्सा कब्जाया हुआ था। द्वारका के बाकी इलाकों में भी अतिक्रमण पर कार्रवाई करते हुए सैकड़ों ढाँचे गिराए जा चुके हैं।

छत्तीसगढ़ सरकार सब कुछ करने को तैयार, फिर भी ईसाइयों के कब्रिस्तान में पादरी रहे पिता को दफन नहीं कर रहा बेटा: अपनी जिद में सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, 15 दिन से मुर्दाघर में पड़ा है शव

जनजातीय हिन्दू समुदाय के लिए बनाए गए श्मशान में पिता का अंतिम संस्कार करने पर अड़े एक ईसाई की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि है कि वह सभी पक्ष को स्वीकार हो, ऐसा फैसला चाहता है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि यदि ईसाई व्यक्ति का अंतिम संस्कार हिन्दुओं के श्मशान में किया गया, तो इससे विवाद पैदा होगा। सुप्रीम कोर्ट से पहले छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने ईसाई व्यक्ति को राहत देने से मना कर दिया था। ईसाई व्यक्ति का शव पिछले 15 दिन से मोर्चरी में रखा हुआ है।

क्या है मामला?

छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के रहने वाले रमेश बघेल के पिता सुभाष बघेल की मौत 7 जनवरी, 2025 को हो गई थी। रमेश बघेल एक ईसाई है और उसके दादा हिन्दुओं की महरा जाति से ईसाई बन गए थे। मृतक सुभाष बघेल एक ईसाई पादरी भी रहा था।

सुभाष बघेल की मौत के बाद बेटे रमेश बघेल ने गाँव के श्मशान में उसका ईसाई रीति रिवाज से अंतिम संस्कार करना चाहा था। यहाँ रहने वाले हिन्दुओं और बाकी समुदाय ने इसका कड़ा विरोध किया। हिन्दुओं ने रमेश बघेल से कहा कि वह अपने पिता का अंतिम संस्कार 20 किलोमीटर दूर एक ईसाई श्मशान में करें।

मामले में घटनास्थल पर पहुँची पुलिस ने भी रमेश बघेल से कहा कि वह बिना विवाद के ईसाइयों के श्मशान में अपने पिता का अंतिम संस्कार कर दें। हालाँकि, रमेश बघेल इस बात पर अड़ गया कि उसे इस जनजातीय श्मशान में ही अपने पिता का अंतिम संस्कार करना है।

वह इस मामले में याचिका लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पहुँच गया। उसने माँग की कि हाई कोर्ट पुलिस और प्रशासन को आदेश दे कि वह इसी जनजातीय श्मशान में अंतिम संस्कार करवाएँ।

क्या बोला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट?

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने 9 जनवरी, 2025 को इस याचिका की सुनवाई की। हाई कोर्ट में इस मामले में राज्य सरकार ने बताया कि गाँव के श्मशान में ईसाइयों के लिए कोई अलग जगह निर्धारित नहीं है और अगर रमेश बघेल अपने पिता का अंतिम संस्कार ईसाई तरीके से करना चाहता है तो वह 20 किलोमीटर दूर स्थित ईसाई श्मशान में जा सकता है।

राज्य सरकार ने बताया कि इस स्थिति में ग्राम पंचायत को भी कोई शिकायत नहीं है और इसे कोई समस्या भी खड़ी नहीं होगी। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की यह दलील मानते हुए रमेश बघेल की याचिका पर कोई आदेश पारित करने से मना कर दिया।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “इस रिट याचिका में याचिकाकर्ता द्वारा माँगी गई राहत प्रदान करना उचित नहीं होगा, इससे आम जनता में अशांति और असामंजस्य पैदा हो सकता है।” हाई कोर्ट ने कहा कि पास में ही ईसाई श्मशाम उपलब्ध है, ऐसे में वह राहत नहीं देगा। इस फैसले के खिलाफ रमेश बघेल सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 17 जनवरी, 2025 को छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा था। मामले में 20 जनवरी, 2024 को भी बहस हुई थी। इस दौरान राज्य सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया था कि ईसाई तौर तरीकों से अंतिम संस्कार किए जाने की इजाजत जनजातीय हिन्दू श्मशान में नहीं दी जा सकती।

उन्होंने रमेश बघेल की तरफ से पेश वकील कोलिन गोंसाल्वेस पर आरोप लगाया था कि वह उन जनजातीय लोगों में विवाद पैदा कर रहे हैं, जो ईसाइयत में धर्मान्तरित हो चुके है और जो अभी भी हिन्दू हैं। उन्होंने कहा था कि विवाद से बचने के लिए ईसाई व्यक्ति को 15-20 किलोमीटर दूर स्थित ईसाई श्मशान में ले जाया जाए।

मामले में वकील गोंसाल्वेस ने आरोप लगाया था कि ईसाई व्यक्ति को इसलिए नहीं अनुमति दी जा रही है क्योंकि वह धर्मांतरित है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर दुख जताया था कि अंतिम संस्कार के लिए व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट तक आना पड़ा था।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (22 जनवरी, 2025) को इस मामले की दोबारा सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह जल्द ही अपना फैसला दे देगा क्योंकि मृत व्यक्ति का शरीर लम्बे समय से मोर्चरी में रखा हुआ है।

मंगलवार को सुनवाई के दौरान SG मेहता ने कहा , “मान लीजिए कल कोई हिन्दू यह तर्क रखता है कि ‘मैं अपने परिवार के शव का अंतिम संस्कार मुस्लिम कब्रिस्तान में करना चाहता हूँ, क्योंकि उसके पूर्वज मुस्लिम थे या और कुछ थे तथा उसने धर्म परिवर्तन कर हिन्दू धर्म अपना लिया तो स्थिति क्या होगी?”

SG मेहता ने कहा कि इससे कानून व्यवस्था का मुद्दा खड़ा हो जाएगा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ईसाई व्यक्ति को एम्बुलेंस देने को तैयार है और वह दूसरी जगह स्थित ईसाई कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार कर सकता है। उन्होंने साफ़ किया कि गाँव का कब्रिस्तान जनजातीय हिन्दुओं के लिए है, ना कि ईसाइयों के लिए।

वकील गोंसालेवेस ने सुनवाई के दौरान आरोप लगाया कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है। इस पर जस्टिस शर्मा ने कहा कि ऐसा कोई मामला नहीं है। SG तुषार मेहता ने यह भी साफ़ किया कि निजी भूमि पर भी अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे जमीन की प्रकृति कृषि या आवासीय से बदल कर पवित्र हो जाती है।

इस मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर जोर दिया कि ईसाइयों के लिए अलग श्मशान हर जगह होने चाहिए। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ से एक हलफनामा दायर करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह इस मामले में सबको स्वीकार होने वाला निर्णय चाहता है।

गौमूत्र पीने से 15 मिनट में ठीक हुआ बुखार… IIT मद्रास के डायरेक्टर के बाद Zoho के श्रीधर वेम्बु ने भी ‘औषधीय गुण’ माना, कहा- पारंपरिक ज्ञान के मूल्य को अब पहचान रहा आधुनिक विज्ञान भी

आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर वी. कामकोटी के गौमूत्र पर दिए गए बयान ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने गौमूत्र से जुड़ा एक किस्सा शेयर किया, जिसके बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया हुई। लोगों ने इसे वैज्ञानिक तौर आधारहीन करार दिया और कहा कि ऐसे दावे प्रमाणित शोध पर आधारित होने चाहिए। इसी बीच Zoho कंपनी के CEO श्रीधर वेम्बु ने आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर वी कामकोटी का समर्थन करते हुए कहा कि आधुनिक विज्ञान हमारे पारंपरिक ज्ञान को मान्यता दे रहा है।

वेम्बु ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “IIT मद्रास के डायरेक्टर प्रोफेसर कामकोटी एक सम्मानित शोधकर्ता और शिक्षक हैं। उन्होंने गौमूत्र के फायदों पर आधारित वैज्ञानिक शोध के उदाहरण दिए हैं। आधुनिक विज्ञान अब हमारे पारंपरिक ज्ञान का महत्व समझने लगा है। लेकिन ऑनलाइन आलोचक केवल अपने पूर्वाग्रह दिखा रहे हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। प्रोफेसर कामकोटी, मजबूत बने रहिए। इन आलोचनाओं के आगे झुकने की जरूरत नहीं है।”

इसके अलावा वेम्बु ने अपने एक अन्य ट्वीट में लिखा, “जो लोग गौमूत्र का मजाक उड़ा रहे हैं, वे नहीं जानते कि स्वस्थ व्यक्तियों (खासतौर पर पुराने समाजों, जो आधुनिक खानपान से अछूते रहे हैं) से ली गई फीकल ट्रांसप्लांट और फीकल पिल्स पर वैज्ञानिक रुचि बढ़ रही है। यह प्रक्रिया लाभकारी आंत बैक्टीरिया को बहाल करने में मदद करती है।”

उन्होंने आगे लिखा, “आँत बैक्टीरिया हमारी रोग प्रतिरोधक प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसलिए ‘गौमूत्र और गोबर के फायदेमंद गुण’ कोई अंधविश्वास नहीं है। आधुनिक विज्ञान भी अब इस पर सहमति जताने लगा है। ऑनलाइन आलोचना करने वाले संकीर्ण सोच वाले लोग ही इसे नकारते हैं।”

बता दें कि आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर वी. कामकोटी ने एक कार्यक्रम के दौरान दावा किया था कि एक सन्यासी ने बुखार के इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाने की बजाय गौमूत्र का सेवन किया और 15 मिनट के भीतर उनका बुखार उतर गया। यह कार्यक्रम पोंगल के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में उन्होंने गौमूत्र को ‘महत्वपूर्ण दवा’ बताया और इसके एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुणों का जिक्र करते हुए कहा कि यह इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) जैसी बीमारियों में मदद कर सकता है। उन्होंने इसके बाकी औषधीय गुण भी बताए।

ताहिर हुसैन पर क्यों बँटे सुप्रीम कोर्ट के जज, क्यों चुनाव प्रचार के लिए जमानत देना चाहते थे जस्टिस अमानुल्लाह, जस्टिस मित्तल ने क्यों जताई आपत्ति: अब आगे क्या, जानिए सब कुछ एक साथ

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच दिल्ली दंगों के सरगना ताहिर हुसैन को दिल्ली चुनावों में प्रचार के लिए अंतरिम जमानत देने पर एकमत फैसला देने में नाकाम रही। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ताहिर को अंतरिम जमानत देने के पक्ष में थे, लेकिन जस्टिस पंकज मित्तल इसके पक्ष में नहीं थे। अब इस मामले को बड़े बेंच के पास सुनवाई के लिए भेजा जाएगा।

दरअसल, आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने मुस्तफाबाद से टिकट दिया है। इसको लेकर ताहिर हुसैन ने नामांकन दाखिल करने और दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचार तक अंतरिम जमानत की माँग की थी। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय जजों की यह बेंच सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस मित्तल ने हुसैन की याचिका खारिज कर दी। वहीं, जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि हुसैन को अंतरिम जमानत दी जानी चाहिए। जस्टिस अमानुल्लाह द्वारा असहमति जताए जाने के बाद जस्टिस मित्तल ने कहा, “चूँकि हमारी राय अलग-अलग है, इसलिए रजिस्ट्री को इस मामले को तीसरे न्यायाधीश के गठन के लिए CJI के समक्ष रखना चाहिए।”

न्यायमूर्ति मित्तल ने कहा, “अगर चुनाव लड़ने के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो इससे भानुमती का पिटारा खुल जाएगा। चूँकि देश में साल भर चुनाव होते रहते हैं, इसलिए हर कैदी यह दलील लेकर आएगा कि वह चुनाव में भाग लेना चाहता है और इसलिए उसे अंतरिम जमानत चाहिए। इससे मुकदमेबाजी के द्वार खुल जाएँगे और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।”

जस्टिस मित्तल ने यह भी कहा कि हुसैन के खिलाफ गंभीर आरोप हैं और इस बात की बहुत अधिक आशंका है कि अगर उन्हें जेल से बाहर आकर प्रचार करने की अनुमति दी जाती है तो वे गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने दोहराया कि चुनाव प्रचार करने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। इस बात का फैसला अदालत के विवेक पर निर्भर करता है कि अंतरिम जमानत दी जानी चाहिए या नहीं।

वहीं, जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि ताहिर हुसैन को कुछ शर्तों के साथ अंतरिम जमानत पर रिहा किया जा सकता है। उन्होंने कहा, “यह स्थापित कानून है कि अपराध की गंभीरता ही जमानत के मामलों के लिए एकमात्र मानदंड नहीं है। मेरा मानना ​​है कि उचित शर्तों के अधीन याचिकाकर्ता को जमानत दी जानी चाहिए। जमानत केवल 4 फरवरी 2025 की दोपहर तक ही दी जा सकती है।”

जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि अंतरिम जमानत की शर्तों के रूप में हुसैन पर चुनाव प्रचार के दौरान दिल्ली दंगों के मामलों पर नहीं बोलने का सख्त दायित्व दिया जा सकता है। न्यायाधीश ने कहा, “वह दी गई अवधि समाप्त होने के बाद तुरंत जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण भी करेंगे।”

जस्टिस मित्तल ने हुसैन के खिलाफ आरोपों की गंभीरता को देखते हुए, खासकर इंटेलिजेंस के अधिकारी की मौत से संबंधित मामले में, उन्हें राहत देने पर कड़ी आपत्ति जताई। जस्टिस मित्तल ने कहा कि अगर चुनाव प्रचार अंतरिम जमानत के लिए आधार बनते हैं तो यह भारत जैसे देश में नए मुकदमों का द्वार खोल सकता है।

जस्टिस मित्तल ने यह भी कहा कि अगर हुसैन को वर्तमान मामले में जमानत मिल भी जाती है तो भी वह जेल में ही रहेगा, क्योंकि उसे मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अभी तक जमानत नहीं मिली है। जस्टिस मित्तल ने कहा, “यह (वर्तमान अंतरिम जमानत मामला) एक अकादमिक अभ्यास है! अगर आपको सभी मामलों में जमानत नहीं मिलती है तो इस जमानत का मतलब यह नहीं है कि आप बाहर चले जाएँगे।”

इस जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट को ट्रायल कोर्ट के फैसले का इंतजार क्यों करना चाहिए? हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि उसे जमानत नहीं मिलेगी… अगर हम (सुप्रीम कोर्ट) ट्रायल कोर्ट का इंतजार करेंगे तो यह ऐसा होगा जैसे हम ट्रायल कोर्ट के अधीन हैं।” जस्टिस अमानुल्लाह ने ताहिर हुसैन के खिलाफ मुकदमे की धीमी प्रगति पर भी सवाल उठाया।

जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, “चार साल में केवल चार या पाँच चश्मदीद गवाहों की जाँच और उनसे पूछताछ की गई। अगर यह मामला इतना महत्वपूर्ण था तो… । वह एक दिन भी बाहर नहीं रहा। आपको किसी को दोषी ठहराने की असीमित स्वतंत्रता नहीं हो सकती। यह संविधान का अनुच्छेद 21 नहीं है, इसे नकार दिया गया है।”

जवानों से लेकर विधायक तक को मरवाया, फिर भी 35 साल तक बचता रहा: बीवी के साथ सेल्फी ने नक्सल कमांडर चलापति को करवा दिया ढेर, जंगल में हुई थी शादी

ओडिशा की सीमा पर स्थित छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में हुई मुठभेड़ में नक्सलियों का बड़ा कमांडर चलापति मारा गया। चलापति ₹1 करोड़ का इनामी नक्सली था और बीते लगभग 35 वर्षों से सुरक्षाबलों से बच कर भाग रहा था। चलापति नक्सलियों की सेंट्रल कमिटी का सदस्य था। आंध्र प्रदेश में 2 बड़े नेताओं की दिनदहाड़े हत्या करवाने से लेकर सुरक्षाबलों पर दर्जनों हमलों करने में उसका हाथ था। चलापति के मरने के पीछे उसका नक्सली पत्नी अरुणा के साथ सेल्फी लेना बड़ा कारण रहा।

गरियाबंद में सोमवार (20 जनवरी, 2025) को चालू हुए इस ऑपरेशन में सुरक्षाबलों ने कुल्हाड़ीघात इलाके में नक्सलियों को घेरा था। इस इलाके में ओडिशा की सीमा से भी सुरक्षाबल घुसे थे। सुरक्षाबलों के ऑपरेशन में 60 नक्सलियों का जत्था फंस गया। इसके बाद दोनों तरफ से हुई फायरिंग में 29 नक्सली मारे गए। यह ऑपरेशन मंगलवार को भी चला। इस ऑपरेशन में मारे गए नक्सलियों में सबसे बड़ा नाम चलापति का था। सुरक्षाबलों को सर्च अभियान के दौरान उसकी लाश मिली।

कौन था नक्सली चलापति?

आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में जन्मे चलापति का असल नाम रामचन्द्र रेड्डी था। उसने विज्ञान से स्नातक और मैसुरु में डिप्लोमा की पढ़ाई भी की हुई थी। दावा है कि यहाँ तक कि वह आंध्र प्रदेश सरकार में भी काम कर चुका था। कुछ जगह दावा किया गया है कि चलापति स्कूल ही नहीं गया था लेकिन हिंदी, अंग्रेजी, उड़िया और तेलुगु पढ़ सकता था।

1990-91 के आसपास वह वामपंथी विचारधारा से प्रेरित होकर नक्सली बन गया और आतंक मचाने वाले संगठन पीपल्स वॉर ग्रुप (PWG) में शामिल हो गया। चलापति इसके बाद धीमे-धीमे बड़ा नाम बनता गया। 2004 में जब कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) बनी तो उसे इसमें प्रमुख जगह दी गई। चलापति इस पार्टी की सेंट्रल कमिटी में शामिल था।

ओडिशा में 13 जवान, आंध्र में MLA मरवाए

चलापति गुरिल्ला आतंक में विशेषज्ञ था। फरवरी, 2008 में उसने ओडिशा के नयागढ़ में एक हमला किया था जिसमें 13 जवान मारे गए थे। यहाँ से वह तमाम हथियार भी लूट ले गया था और सुरक्षाबल घटनास्थल पर ना पहुँच सके, इसके लिए सारे रास्ते पेड़ काट कर ब्लॉक कर दिया था।

चलापति ने ओडिशा और आंध्र प्रदेश की सीमा पर नक्सलियों को मजबूत किया था। उसने सर्वाधिक हमले ओडिशा में ही किए थे। ऐसे ही एक हमले में 2011 में उसने कंधमाल जिले में पुलिस शस्त्रागार को निशाना बनाया था। हालाँकि, पुलिस ने उसे खदेड़ दिया था।

2016 में सुरक्षाबलों के एक बड़े ऑपरेशन, जिसमें 31 नक्सली मारे गए थे, उसका बदला लेने के लिए चलापति ने 2018 में TDP के एक विधायक और एक पूर्व विधायक की विशाखापत्तनम में हत्या करवा दी थी। उनकी गाड़ी को घेर कर नक्सलियों ने फायरिंग की थी। उस पर 2003 में ओडिशा और आंध्र में पुलिस स्टेशन उड़ाने का भी आरोप है।

जंगल में की शादी, सेल्फी से मरा

चलापति ने 2010 के आसपास एक और महिला नक्सली अरुणा से शादी कर ली थी। दोनों जंगल में साथ रहते थे। उनकी सुरक्षा के लिए 15-20 नक्सली लगे रहते थे। उसके बारे में सुरक्षाबलों के पास कोई नई फोटो और जानकारी नहीं थी। हालाँकि, 2016 में सुरक्षाबलों को एक ऑपरेशन के बाद एक स्मार्टफोन मिला था।

इस स्मार्टफोन में अरुणा और चलापति की एक फोटो थी। दोनों ने जंगल के किसी ठिकाने में एक सेल्फी ली थी। इसी से उसके वर्तमान के हावभाव और गतिविधियों की जानकारी सुरक्षाबलों को हुई। सुरक्षाबलो ने इसके बाद उसके ऊपर इनाम भी घोषित किया था।

2024 में लगातार बढ़ती सुरक्षाबलों की कार्रवाई से बचने के लिए उसने हाल ही में छत्तीसगढ़ की गरियाबंद की पहाड़ियों पर अपना ठिकाना बनाया था। लेकिन इस ऑपरेशन में वह मारा गया। इस ऑपरेशन के बाद सुरक्षाबलों को बड़ी मात्रा में हथियार भी बरामद हुए हैं।