महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने के लिए उद्धव ठाकरे को 28 मई से पहले किसी सदन की सदस्यता लेनी होगी। उनको एमएलसी नामित करने का प्रस्ताव महाराष्ट्र कैबिनेट दो बार गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी को भेज चुकी है। कोश्यारी ने अब तक कोई फैसला नहीं किया है। लिहाजा उद्धव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हस्तक्षेप की अपील की है।
उद्धव ने बुधवार को मोदी को फोन कर महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया था। पीएम ने उन्हे मामले पर गौर करने का भरोसा दिलाया है।
Maharashtra CM Uddhav Thackeray called PM about his nomination. He asked for help, saying if it doesn’t happen he will have to resign. PM said he will look at the matter and get more details: Sources tell ANI (File pics) pic.twitter.com/GPUgx62CG8
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ठाकरे ने महाराष्ट्र विधान परिषद में अपने मनोनयन को लेकर मोदी से फोन पर बात की और सरकार बचाने के लिए मदद माँगी। कथित तौर पर कहा कि अगर वह उच्च सदन में नामित नहीं होते हैं, तो उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना होगा।
उद्धव ठाकरे ने पीएम मोदी से यह भी कहा कि राज्य में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की जा रही है। इससे पहले, ठाकरे द्विवार्षिक चुनावों के माध्यम से परिषद के लिए निर्वाचित नहीं हो सकते थे क्योंकि कोरोनोवायरस प्रकोप के कारण चुनाव स्थगित कर दिए गए थे। चूंकि ठाकरे विधायक नहीं हैं, इसलिए उन्हें अपने पद को बचाने के लिए 28 मई तक विधान परिषद की सदस्यता हासिल करनी होगी।
प्रधानमंत्री को फ़ोन करने से पहले महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (Maharashtra Vikas Aghadi) सरकार का समर्थन करने वाले चार छोटे दलों के नेताओं ने बुधवार को राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को एमएलसी नामित करने के राज्य मंत्रिमंडल के प्रस्ताव पर निर्णय लेने का आग्रह किया था। कोश्यारी को भेजे पत्र में, सत्तारूढ़ एमवीए का समर्थन करने वाले दलों के नेताओं ने कहा कि राज्यपाल को कारणों को स्पष्ट करना चाहिए कि उन्होंने अब तक ठाकरे को क्यों नामित नहीं किया है।
पत्र में कहा गया था कि विधान परिषद में ठाकरे की नियुक्ति का प्रस्ताव 9 अप्रैल को भेजा गया। 28 अप्रैल को इस संबंध में दोबारा गवर्नर से आग्रह किया गया। लेकिन, उन्होंने कोई फैसला नहीं लिया है।
महाराष्ट्र के सियासी संकट के बीच अब सबकी नजरें राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी पर टिकी हुई हैं। उद्धव कैबिनेट के सदस्य ने कहा कि कोश्यारी ने हमारी बात सुनी लेकिन उनका रवैया टाल-मटोल वाला रहा। हमें नहीं पता कि वे इसे स्वीकार करेंगे या नहीं। उन्होंने कहा कि ठाकरे के नामांकन पर अनिश्चितता के मद्देनजर सरकार विधान परिषद चुनावों के लिए चुनाव आयोग से संपर्क करने पर विचार कर रही है।
ठाकरे ने 28 नवंबर, 2019 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। संविधान के अनुसार उन्हें छह महीने के भीतर सदन की सदस्यता लेनी होगी।
ऋषि कपूर और इरफान खान की मौत की खबरों के बीच भी कट्टरपंथी मुस्लिमों के साथ-साथ सोशल मीडिया के वाम-उदारवादियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अपनी घृणा का निशाना बनाया है। कल ही बॉलीवुड अभिनेता इरफान खान की मौत की खबर के बाद कुछ लोगों को यह भी लिखते हुए देखा गया कि इरफान खान की जगह अक्षय कुमार को होना चाहिए था।
आज सुबह ही ऋषि कपूर की कैंसर से हुई मौत की खबरों के बाद सोशल मीडिया पर मोदी-विरोधियों ने अपनी घृणा को नया स्तर देते हुए लिखा कि ऋषि कपूर की जगह उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौत की खबरों का इंतजार है। खास बात यह है कि इस तरह के ‘मज़ाक’ करने वालों में अधिकतर नाम मुस्लिम हैं।
वास्तव में इन लोगों ने यही साबित करने का प्रयास किया है कि इनके लिए किसी भी व्यक्ति की मौत सिर्फ और सिर्फ उनके निजी प्रोपेगेंडा को सफल बनाने का अवसर मात्र है।
प्रोपेगेंडा चैनल NDTV की पत्रकार निधि राजदान ने अभिनेता ऋषि कपूर की मौत की खबर पर दुख व्यक्त करते हुए एक ट्वीट किया, जिसके जवाब में सैयद आतिब बुख़ारी नाम के ट्विटर हैंडल ने लिखा – “अब मोदी का इंतजार है”
That Kashmiri Guy नाम के ट्विटर हैंडल ने लिखा है -“ईश्वर हमें इरफान खान और ऋषि कपूर दे दे और इसके बदले में मोदी को ले ले।”
मुस्लिमों ने मोदी को हर उस ट्वीट में अपनी नफरत का निशाना बनाया है, जहाँ-जहाँ पर लोग ऋषि कपूर की मृत्यु पर अपनी संवेदनाएँ प्रकट कर रहे थे।
दिल्ली निवासी (ट्विटर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार) बुरहान ने ऋषि कपूर की मृत्यु पर किए गए एक ट्वीट को शेयर करते हुए लिखा है – “नरेंद्र मोदी को भी ले जाओ, वो भी अच्छा कलाकार है।”
ज्ञात हो कि कल ही रचिता तनेजा नामक कॉमिक आर्टिस्ट ने इरफान खान की मृत्यु की खबर सुनने के बाद ट्विटर पर शोक जताते हुए लिखा, “अक्षय कुमार को ले लो और हमें इरफान खान वापस दे दो।”
वास्तव में सोशल मीडिया पर अक्सर यह देखा गया है कि केंद्र सरकार का समर्थन करने वाले लोगों और तार्किक बातें करने वालों को ही लेफ्ट-लिबरल गिरोह के द्वारा निशाना बनाया जाता है। इस द्वैष के पीछे मुख्य मकसद सत्ता का विरोध से लेकर उन लोगों को खुश करना होता है, जो कि इस तरह की बातें सुनना पसन्द करते हैं।
मुंबई स्थित द नीड्स आफ लाइफ को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड पर लागू प्रतिबंधों को भारतीय रिजर्व बैंक ने छह महीने के लिए बढ़ा दिया है। प्रतिबंध अब 31 अक्टूबर 2020 तक लागू रहेंगे। रिजर्व बैंक ने बैंक पर नया कर्ज देने और पुराने कर्ज का नवीनीकरण करने पर रोक लगा दी है। साथ ही बैंक से धन निकासी पर भी प्रतिबंध लगा दिया है।
बैंक को उसकी वित्तीय स्थिति में सुधार होने के साथ प्रतिबंधों के तहत ही बैंकिंग कारोबार करने की अनुमति दी गई है। केन्द्रीय बैंक ने अपने आदेश में कहा है कि उसके द्वारा 26 अक्टूबर 2018 को जारी किए गए निर्देश बैंक पर और छह माह (30 अप्रैल 2020 से 31 अक्टूबर 2020 तक) लागू रहेंगे।
दरअसल बैंक पर लगाए गए प्रतिबंधों के पीछे अभी तक पुलिस जाँच में जो बातें सामने आई हैं, वह बेहद चौंकाने वाली हैं। पुलिस जाँच में सामने आया है कि ‘द नीड्स आफ लाइफ को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड’ के अधिकारियों ने कथित तौर पर डायरेक्टर के पद पर एक चपरासी का नाम दिया हुआ था। चेयरपर्सन के तौर पर एक ऐसी महिला की नियुक्त थी, जो कि खुद ही इस बात से अंजान थी।
अमिता महाजन नाम की महिला ने पुलिस को बताया कि बैंक की सीईओ मनीषा जाधव के साथ उसकी दोस्ती एक लोकल ट्रेन में हुई थी। इस बीच मनीषा ने महिला से कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए, जिसके बदले मनीषा ने महिला को प्रति माह एक हजार रुपए देने की बात कही थी, जबकि महिला इस बात से एकदम अनजान थी कि वह उस बैंक की चेयरपर्सन है।
वहीं मुंबई मिरर से बात करते हुए बैंक की सीईओ मनीषा जाधव ने कहा है कि हमने अपने ग्राहकों को नहीं ठगा है, बल्कि हमने सिर्फ फंड को विभिन्न एनपीए खातों में भेजा है। बैंक वित्तीय तौर पर मजबूत है और कोई धोखाधड़ी नहीं हुई है। जब मनीषा से अमिता महाजन के बारे में पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि केस दर्ज होने के बाद अमिता महाजन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और अब वह इस बैंक का हिस्सा नहीं है।
इसी बीच बैंक के वाइस चेयरमैन घनशानी और मनीषा जाधव की अंतरिम जमानत सत्र न्यायालय द्वारा खारिज कर दी गई है और उन्हें फिलहाल हाईकोर्ट द्वारा 7 दिसंबर तक अंतरिम संरक्षण प्राप्त है। आपको बता दें कि रिजर्व बैंक ने मडगांव अर्बन को-आपरेटिव बैंक लिमिटेड पर लागू प्रतिबंधों को भी तीन माह बढ़ाकर दो अगस्त तक कर दिया गया है। बैंक पर लागू प्रतिबंध दो मई 2020 को समाप्त हो रहे थे।
इतिहास में 30 अप्रैल की तारीख दुनिया के नक्शे पर जर्मन नेता अडोल्फ हिटलर की मौत के दिन के तौर पर दर्ज है। नाजी और ‘आर्यों’ के उद्भव (Good Aryan blood) का सपना लेकर अप्रैल 1945 में अडोल्फ़ हिटलर पचास फुट नीचे बने बंकर में भूमिगत हो गया था। उसने अपनी प्रेमिका ईवा ब्राउन को सलाह दी कि उसे शहर छोड़कर चला जाना चाहिए लेकिन ईवा ने उसकी बात नहीं मानी और आखिरी समय तक उसके साथ रहने का फैसला किया।
मरने से कुछ दिन पहले, 20 अप्रैल को एक वीभत्स दृश्य में, हिटलर ने अपने सैनिकों और साथियों के छोटे समूह के साथ अपना 56वाँ जन्मदिन मनाया। यह उसका आखिरी जन्मदिन होने वाला था। हिटलर उस दिन बंकर से बाहर आखिरी बार नजर आया था। उसने सोवियत संघ की रेड आर्मी से लड़ने वाले अपने सैनिकों को आइरन क्रॉस भेंट किए।
आखिरकार, हिटलर ने खुलकर अपने अंत के बारे में बात करनी शुरू करते हुए कहा-
“मैं व्यक्तिगत रूप से नहीं लड़ूँगा। हमेशा यह खतरा रहेगा कि मैं केवल घायल होकर रूस के लोगों के हाथों लग जाउँगा। मैं नहीं चाहता कि मेरे दुश्मन मेरे शरीर को अपमानित करें। मैंने आदेश दिया है कि मेरा अंतिम संस्कार किया जाए। ब्राउन ने मेरे साथ जीवन का अंत करने का फैसला किया है…।”
बर्लिन का युद्ध 16 अप्रैल को शुरू हुआ था। इसके बाद मित्र राष्ट्रों की सेनाएँ धीरे-धीरे बर्लिन की ओर बढ़ रही थीं। अब हिटलर के पास प्रतिक्रिया करने के लिए सेना नहीं थी। आखिर में उसने घोषणा की कि हम जंग हार चुके हैं।
आत्महत्या: सायनाइड या गोली से?
बंकर में उन लोगों के बीच चर्चा का विषय यह था कि आत्महत्या करने का सबसे अच्छा तरीका क्या हो सकता है- जहर या बंदूक की गोली? वहाँ पसरी उदासी के बीच भी जश्न का माहौल था। ईवा ब्राउन, हिटलर के बरगॉफ रिट्रीट में बिताए खुशनुमा पलों की यादें साझा कर रही थी।
हिटलर और ईवा ब्राउन
हिटलर ने एक चिकित्सक से सुझाव माँगा कि आत्महत्या किस तरह से की जाए। इस पर चिकित्सक ने उसे सायनाइड की गोली लेने या सिर में गोली मार लेने का सुझाव दिया था। हिटलर चाहता था कि सायनाइड की गोली से मौत का उसके पास प्रमाण हो, इसके लिए उसने इस दवा का प्रयोग अपनी प्यारी पालतू बिल्ली ब्लॉन्डी पर किया। उसके सैनिकों ने उसे बताया कि प्रयोग सफल रहा और बिल्ली ने बस कुछ ही पलों में दम तोड़ दिया था।
अप्रैल 25, 1945 के बाद से हिटलर पूरी तरह से अपनी मौत की तैयारियाँ करने लगा था। इसी दिन उसने अपने निजी अंगरक्षक हींज़ लिंगे को बुला कर खुद को गोली मारने के बाद उसके शव को जलाने की अपनी इच्छा के बारे में विस्तृत तरीके से समझाया। उसने कहा कि जब मैं खुद को गोली मारूँ तो वो मृत शरीर को चांसलरी के बगीचे में ले जा कर उसमें आग लगा दे ताकि मौत के बाद कोई उसे देख ना सके और न ही पहचान पाए।
हिटलर चाहता था कि उसके खुद को गोली मारते ही उससे जुड़ी सभी वस्तुओं को समाप्त कर दिया जाए। उसकी वर्दी, कागज़ और हर चीज़, जिसे उसने इस्तेमाल किया हो, उसे एकसाथ आग के हवाले कर दिया जाए। इसके साथ ही हिटलर ने अपने बॉडीगार्ड हींज़ लिंगे से कहा कि उसे सिर्फ़ अंटन ग्राफ़ के बनाए गए फ़्रेडरिक महान की आयल पेंटिंग को नहीं छूना है। हिटलर ने अपने ड्राइवर को उसकी मौत के बाद सुरक्षित बर्लिन से बाहर ले जाने का निर्देश दिया था।
आखिरी दिनों में बूढ़े गिद्ध जैसा दिखने लगा था हिटलर
हिटलर का आखिरी दिनों में बर्ताव पूरी तरह से हार चुके व्यक्ति के समान था। उसका शरीर जर्जर था, उसके कपड़े मैले थे। हिटलर के आखिरी दिनों की हालत का वर्णन हिटलर पर लिखी मशहूर पुस्तक ‘द लाइफ़ एंड डेथ ऑफ़ अडोल्फ़ हिटलर’ लिखने वाले रॉबर्ट पेन ने कुछ इस तरह लिखा है-
“तब तक हिटलर का चेहरा सूज गया था और उसमें असंख्य झुर्रियाँ पड़ गई थीं। उनकी आँखों में जीवन जाता रहा। कभी-कभी उसका दायाँ हाथ बुरी तरह से काँपने लगता और उस कंपकपाहट को रोकने के लिए वो उसे अपने बाएँ हाथ से पकड़ता था।”
रॉबर्ट पेन ने लिखा कि हिटलर किसी बूढ़े गिद्ध की तरह अपने कंधों के बीच अपने सिर को झुकाता था और उसकी चाल लडखड़ाने लगी थी। किताब में लिखा है- “शायद एक बम विस्फोट में उनके कान की एक बारीक झिल्ली को हुए नुकसान की वजह से ऐसा हुआ था। वो थोड़ी दूर चलते और रुक कर किसी मेज़ का कोना पकड़ लेते। छह महीनों के अंदर वो दस साल बूढ़े हो गए थे।”
ईवा हिटलर ब्राउन से शादी
हिटलर ने बंकर में बिताए अपने अंतिम दिनों में ही फैसला किया था कि वो ईवा ब्राउन से शादी कर उस रिश्ते को वैधता देगा। रॉबर्ट पेन ने इस पुस्तक में लिखा है कि किस तरह से शादी के लिए गवाह और आवश्यक लोगों को बंकर तक लाया गया। इसके बाद रॉबर्ट पेन इन दोनों की शादी के बारे में लिखते हैं –
“शादी के सर्टिफ़िकेट पर अडोल्फ़ हिटलर का हस्ताक्षर एक मरे हुए कीड़े की तरह नजर आ रहा था। ईवा ब्राउन ने एक बार शादी से पहले वाला अपना नाम ब्राउन लिखना चाहा। उसने ‘बी’ लिख भी दिया, लेकिन तभी उसे याद आया कि आखिरकार हिटलर के नाम के साथ अपना नाम लेने का सौभाग्य उसे प्राप्त हो रहा था। फिर उसने ‘बी’ को काटा और फिर साफ़-साफ़ ‘ईवा हिटलर ब्राउन’ लिखा। नाजी प्रोपेगेंडा मंत्री जोसेफ़ गोएबेल्स ने मकड़ी के जाले जैसा हस्ताक्षर किया और नाम के पहले वह डॉक्टर लगाना नहीं भूला। सर्टिफ़िकेट पर तारीख लिखी थी 29 अप्रैल जो कि ग़लत थी, क्योंकि शादी होते-होते रात के बारह बज कर 25 मिनट हो चुके थे। कायदे से उस पर 30 अप्रैल लिखा जाना चाहिए था।”
शादी की औपचारिकताएँ पूरी होने के बाद ईवा हिटलर के साथ वहाँ मौजूद लोगों ने शराब और शैंपेन पी। हिटलर ने बंकर के अंदर ही ईवा से शादी की और उसे अपनी पत्नी का दर्जा दिया। उनके आस-पास का इलाका आग में जल रहा था और वे बंकर में शादी कर रहे थे। हिटलर ने भी शैंपेन का एक घूंट लिया और वो भावुक होकर उन पुराने दिनों के बारे में बातें करने लगा, जब वो जोसेफ़ गोएबेल्स की शादी में शामिल हुए थे। बात करते हुए अचानक हिटलर का मूड बदल गया और उसने कहा- “सब ख़त्म हो गया, मुझे हर एक ने धोखा दिया।”
आखिरी दिन
अप्रैल 30, 1945 की दोपहर एक बजे दोनों ने अपने साथियों से विदा ली और बंकर में चले गए। कुछ देर बाद बाहर खड़े लोगों ने गोली की आवाज सुनी, दरवाजे पर खड़े गार्ड को जले हुए बारूद की बू आई। उन्हें आभास हुआ कि अंदर गोली चली है और सायनाइड का इस्तेमाल भी हुआ है।
जब वो लोग अंदर गए तो वहाँ दुल्हा-दुल्हन के शव पड़े हुए थे। हिटलर ने खुद को गोली मार ली थी और ईवा ने साइनाइड कैप्सूल खा कर अपने प्रेमी के साथ जान दे दी थी। यह बीसवीं सदी की एक प्रेम कहानी थी, जिसका नायक एक क्रूर तानाशाह था।
इसके बाद हिटलर और ईवा ब्राउन के शव को बंकर के बाकी लोग एक बागीचे में ले गए, जैसा कि हिटलर ने कहा था। वहाँ उस पर पेट्रोल डालकर जलाने की कोशिश की लेकिन पहली कोशिश नाकाम हो गई। सोवियत के सैनिक उनकी तरफ तेजी से बढ़ रहे थे। हिटलर के सैनिक उनके शव को बमों से बने एक गड्ढे में खींचकर ले गए जहाँ उसे आखिर में जला दिया गया।
अगले दिन रेडियो से हिटलर की मौत की घोषणा की गई। स्टालिन को जब हिटलर की आत्महत्या के बारे में पता चला तो उसने पहले इस बात की पुष्टि करनी चाही। हिटलर के जीवनी लिखने वाले इयान करशॉ (Ian Kershaw) लिखते हैं- “जैसे ही शवों को आग लगाई गई, वहाँ मौजूद सभी लोगों ने हाथ ऊँचे कर ‘हेल हिटलर’ कहा और वापस अपने बंकर में लौट गए।”
इयान ने इस जीवनी में आगे लिखा है – “जब लपटें कम हुई तो उन पर और पेट्रोल डाला गया। ढाई घंटे तक लपटें उठती रहीं। कुछ दिनों बाद जब सोवियत जाँचकर्ताओं ने हिटलर और उनकी पत्नी ईवा के अवशेषों को बाहर निकाला तो सब कुछ समाप्त हो चुका था। वहाँ एक डेंटल ब्रिज ज़रूर मिला। 1938 से हिटलर के दंत चिकित्सक के लिए काम करने वाले एक शख़्स ने इस बात की पुष्टि की कि वो डेंटल ब्रिज हिटलर के ही थे।”
हिटलर की मौत के बाद मई 08, 1945 को जर्मनी ने सरेंडर कर दिया। इसके लिए जर्मनी की ओर से किसी तरह की शर्त नहीं रखी गई थी। आख़िर में यहूदियों का नरसंहार करने वाले हिटलर के अध्याय को विराम मिला। वह नीली आँखों और ऊँचे कद वाले आर्यन्स की नस्ल का सपना देखता था।
अडोल्फ़ हिटलर के अंदर ‘शुद्ध नस्ल’ से लेकर अच्छी नई नस्ल का बीजारोपण वर्साय की संधि की निराशा ने किया था। यही वो समय था जब वो मानने लगा कि यहूदियों को अच्छे फैसले लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए और उसने यहूदियों के खिलाफ फतवा जारी कर एक क्रूरतम अध्याय की नींव रखी।
विधाता के दरबार में जब भक्ति और भक्ति के तमगे का बँटवारा हो रहा था तब तमगा बीजेपी के हिस्से आया और भक्ति कॉन्ग्रेस के। दरअसल इस बँटवारे की नौबत इसलिए आई क्योंकि अन्य कालों में अनेक प्रकार की भक्तियों का बोलबाला था- मातृभक्ति, पितृभक्ति, गुरुभक्ति, गोभक्ति, मित्रभक्ति, ज्ञानभक्ति, विज्ञानभक्ति, राष्ट्रभक्ति, राजभक्ति। आपको ऐसे महापुरुषों के नाम भी याद होंगे, जिन्होंने इनमें से एक-एक भक्ति पर दृढ़ रहते हुए महानता हासिल की और नाम कमाया, लेकिन वर्तमान युग में राजभक्ति को छोड़कर बाक़ी भक्तियाँ इतनी शक्तिहीन हो गई हैं कि वो राजभक्ति के सहारे के बिना अकेले दम पर कुछ नहीं कर सकतीं। इसलिए आज भक्ति का मतलब ही है राजभक्ति। अब भक्ति एक थी और दावेदार दो-दो। अत: मजबूर होकर विधाता को इस बँटवारे का फैसला लेना पड़ा।
पूरे माजरे को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। हिन्दी कविता के बाद विपरीत काल व परिस्थितियों के थपेड़ों से बची थोड़ी-सी भक्ति ने भारत के स्वातंत्र्य समर व भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलनों में राष्ट्रभक्ति के रूप में अपना स्थान बनाया। जब देश आजाद हो गया तब चारों ओर अंग्रेजी हुकूमत की बेदर्दियों को समेटते भारत माँ के लाल भूखे भजन न होई गोपाला के तहत भक्ति से महरूम रह गए। तब और कोई स्थान न पाकर भक्ति ने राजसत्ता का सहारा लिया। उस समय सत्ता में बस कॉन्ग्रेस ही थी इसलिए वही उसका स्थायी निवास बन गई।
भक्ति को राजसत्ता और कॉन्ग्रेस में फर्क करने की कभी ज़रूरत महसूस नहीं हुई और उसने कोशिश भी नहीं की। उसका काम बढ़िया चल रहा था। धीरे-धीरे भक्ति कॉन्ग्रेस के साथ इतनी एकाकार हुई कि उसका स्वाभाविक अंग बन गई, मानो ये उसका जन्मजात गुण हो। कुछ समय बाद भक्ति के सामने असमंजस की स्थिति भी आई, जब उसे कॉन्ग्रेस-O/सिंडिकेट, कॉन्ग्रेस-R/कॉन्ग्रेस-I, वगैरह में से किसी एक को चुनना था, किन्तु इसका निर्णय तो डार्विन की थ्योरी के अनुसार स्वयं हो गया- ‘Survival of the Fittest’। यानी भक्ति के हिसाब से जो समूह सबसे अनुकूल था, वो बच गया। बची कॉन्ग्रेस-आई बाक़ी सब धराशाई।
फिर एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, न केवल कॉन्ग्रेस के लिए बल्कि देश के लिए भी। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री का निधन हो गया। देश ने खुद को आहत महसूस किया। बाकियों के लिए यह एक अहैतुकी वेदना थी, किन्तु कॉन्ग्रेस का नज़रिया अपनी मूल प्रवृत्ति के आस-पास ही मंडरा रहा था। इसलिए जब भक्ति का प्रतीक वृक्ष गिरा, तब धरती हिली, भूकंप आया, चीखें उठीं, जानें गईं, किन्तु भक्ति अडिग रही।
अब भक्ति के नए प्रतीक पुरुष को सत्ता के शिखर पर चढ़ाया गया। हालाँकि ये कोई श्रमसाध्य प्रक्रिया नहीं थी क्योंकि अगर आपकी चढ़ाई एवरेस्ट से शुरू होकर एवरेस्ट पर ही ख़त्म होनी हो तो पर्वतारोहण एक सपाट प्रक्रिया बन जाती है। भक्ति देवी की असीम अनुकम्पा से राजीव का बेस कैम्प एवरेस्ट पर ही मौजूद था। पायलट बाबू ने हवाई जहाज से सीधे कैम्प में लैंडिंग की और दो कदम चलकर सिंहासन तक पहुँच गए। मतलब किसी को नीचे से जोर लगाकर ऊपर ठेलने-चढ़ाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। भक्ति ने देश को नेतृत्व हीनता की एक नई मुसीबत से बचा लिया।
भक्तिकाल के नाम पर अक्सर हमारा ध्यान हिन्दी-साहित्य की ओर ही जाता है। इस लिहाज से देखें तो वहाँ कालों में एक काल था भक्तिकाल, लेकिन यहाँ तो भक्ति में काल हैं- नाना काल, दादी काल+चाचा काल, पितृ काल, मातृ काल, पुत्र काल, पुत्री काल। अब चेहरा-मोहरा इन्हीं का मिलता है तो दूसरों को बीच में लाकर समदर्शी नाक की इज्जत दाँव पर थोड़ी लगानी है।
इस तरह सब ठीक चल रहा था, स्वाभाविक था, जायज था। लेकिन ये क्या हुआ? अचानक बीच में नमो-नमो की आवाजें कहाँ से आ गईं? वो भी एवरेस्ट की चोटी से नहीं बल्कि तलहटी से। कौन है ये नया देवता? नया भक्तिकेंद्र सा? वाजिब सवाल था। जन्मना सेठ की संपत्ति चर्चा का विषय नहीं होती। नई दौलत कमा कर लाया नया सेठ सबको शंका में डाल देता है। सवाल उठता है, कहाँ से लाया? कैसे कमाया? ज़रूर कोई धांधली की होगी।
खैर, जाँच-पड़ताल पूरी हुई। रिपोर्ट आई कि हुजूर ये कमल तो साक्षात् कीचड़ से ही निकला है। फिर पूरी कोशिशें शुरू हो जाती हैं कि किस तरह उस गरीबी, अभाव और वंचनाओं के कीचड़ को रक्त से सने कीचड़ में परिवर्तित किया जाए और शुरुआत होती है ‘मौत के सौदागर’ के विशेषण के साथ। उसके बाद लहु-पुरुष, हिटलर, गद्दाफी, मुसोलिनी, जवानों के खून का दलाल, जहर बोने वाला, चोर… विरुदावली बहुत लंबी है, अगर सारे कसीदे पढ़ दिए तो पक्का किसी न किसी खेमे की भक्ति का तमगा हासिल हो जाएगा। कुल मिलाकर उस कीचड़ को रक्त रंजित कीचड़ दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई, लेकिन आप इसकी आलोचना करोगे तो सीधे भक्त कहलाओगे।
देखा जाए तो भक्ति के मामले में बीजेपी कॉन्ग्रेस के आगे दूर-दूर तक नहीं टिकती। लेकिन भक्ति अपने पुश्तैनी निवास स्थान में प्रश्नों से परे है। उसे छोड़ कहीं और यदि भक्ति की सुगबुगाहट भी हुई तो शोर मच जाएगा। फब्तियाँ कसी जाएँगी। गाँव के रामलाल ने नवाब की गली में धर्मार्थ प्याऊ लगा दिया। अब ताने तो स्वाभाविक हैं- ‘क्यों भई! आज कल तू बड़ा नवाब बना फिर रहा है?’ नवाब तो वही है पुराना वाला, इस पर तो बस नवाबी का आरोप लग रहा है। भक्ति तो वहीं टिकी हुई है जहाँ उसका पुश्तैनी मकान था, थोड़ी सी खरोंच लगते ही बाहर भी निकल आती है। बस तमगा किसी और के हिस्से है।
देश और देश की जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले गरिमामय पद को गरिया दिया जाए तो कोई समस्या नहीं। आपसे कोई मामूली सा सवाल पूछ लो बवाल होना तय है। स्तरहीन गालियाँ सहन करना चायवाले की जन्मसिद्ध जिम्मेदारी है। और उधर जन्मसिद्ध अधिकार है देश के प्रधानमंत्री को इतना तक कह देना- ‘ये जो नरेन्द्र मोदी भाषण दे रहा है, छः महीने बाद ये घर से बाहर नहीं निकल पाएगा। हिन्दुस्तान के युवा इसको ऐसा डंडा मारेंगे, इसको समझा देंगे…’। और कुछ नहीं तो कम से कम इंसान उम्र का ख़याल तो करता ही है। लेकिन नहीं, बड़े विचित्र संस्कार हैं। संस्कृत की एक सूक्ति याद आ गई- ‘आचार: कुलमाख्याति’ यानी आपका आचरण आपके कुल का परिचायक होता है।
सच्चाई तो ये है कि आजादी के बाद से ही कॉन्ग्रेस ने दुनिया भर में एक परिवार का नाम रौशन किया है जबकि उसी समय देश को दुनिया में हीन दृष्टि से देखा जाता रहा। आज स्थिति यह है कि हाशिए से आए एक इंसान ने, जिसे दुनिया भर में बदनाम करने की भरपूर कोशिशें हुईं, जिसके परिवार का नाम न पहले था, न अब है, न बाद में होगा, उसने खुद गालियाँ खाकर देश का नाम ऊँचा किया है, जिसे देखकर हर भारतीय का सीना छप्पन इंच चौड़ा हो जाता है।
अंत में एक जेंटल रिमाइंडर- ये जो कुछ लिखा है उसे भक्ति नहीं, सच्चाई कहते हैं।
CRPF कमांडो सचिन सावंत के साथ जेल में मारपीट, गिरफ्तारी और अमानवीय व्यवहार किया गया। इस मामले में कर्नाटक सरकार और पुलिस प्रशासन के खिलाफ लोगों का आक्रोश चरम पर है। सीआरपीएफ अधिकारियों के कड़े विरोध के बाद कोबरा कमांडो पर दर्ज मुकदमे को पुलिस प्रशासन द्वारा वापस लेने की बात सामने आ रही है। राज्य पुलिस ने इस मामले में जाँच के आदेश दिए हैं। पीड़ित CRPF जवान सचिन सावंत के मित्र ने ऑपइंडिया को बताया कि पुलिस ने एक पुलिसकर्मी को सस्पेंड भी कर दिया है।
कर्नाटक के पुलिस महानिदेशक ने सीआरपीएफ (CRPF) के अधिकारियों को आश्वस्त किया है कि कोबरा कमांडो के खिलाफ दर्ज मुकदमे को वापस ले लिया जाएगा और आरोपित पुलिसकर्मियों की उचित जाँच की जाएगी।
उल्लेखनीय है कि कर्नाटक के बेलगावी (बेलगाम) जिले के CRPF की कोबरा बटालियन के कमांडो सचिन सावंत को कुछ पुलिसकर्मियों ने लॉकडाउन के नियमों की अवहेलना करने के आरोप में तब गिरफ्तार कर लिया था, जब वो अपने घर के सामने अपनी बाइक साफ कर रहे थे।
कुछ पुलिसकर्मी उनके पास गए और मास्क पहनने को लेकर उनके बीच बहस हुई। इस घटना के संबंध में वीडियो भी चर्चा का विषय रहा, जिसमें एक पुलिस कॉन्स्टेबल कमांडो सचिन सावंत को धक्का देते दिखाई दे रहा है। इसके बाद पुलिस सचिन को जंजीरों से बाँध कर थाने ले गई। थाने में सचिन सावंत के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया और उन्हें बुरी तरह से पीटा गया।
CRPF ने इस घटना पर कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद कर्नाटक पुलिस व सरकार के कई मंत्री हरकत में आए। बेलगावी जिले के चिकोडी तालुका स्थित एक अदालत ने मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) को ही CRPF के कमांडो सचिन को जमानत दे दी थी। हालाँकि सचिन सावंत के करीबियों का मानना है कि इस मामले में पुलिस सिर्फ अपने अधिकारियों को बचाने का ही प्रयास कर रही है।
It’s unfortunate and shameful that even Karnataka police Higher Offices are trying to shield their policemen brutality. IPS Officers will come in future to CAPF and will give lecture on professionalism,Human touch and Human Rights #apnatimeayyegaCAPF@MITHANSHU@HMOIndiahttps://t.co/TBVhC8N1fS
Sir, the way your police has beaten the CRPF commando in police custody reflects directly on your poor leadership. A dynamic DG wud have taken harsh action on his own without prodding by political leadership. Had it been Army, your PS wud have gone for a six by now. https://t.co/X1Ydi9xwhb
सचिन के मित्र ने फोन पर ऑपइंडिया को बताया कि इसके बाद से सचिन CRPF के साथ ही हैं और उनका मोबाइल फोन भी उनके पास नहीं है। सोशल मीडिया पर पुलिस के इस व्यवहार की काफी आलोचना हो रही है। ऐसे चित्र भी जारी किए गए हैं, जिनमें सचिन सावंत को टॉर्चर किए जाने के बाद उनके शरीर के घावों को आसानी से देखा जा सकता है।
बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ऋषि कपूर का निधन हो गया। कल शाम ही उनकी तबीयत अचानक खराब हो गई थी, जिसके कारण उन्हें दक्षिण मुम्बई के सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कल ही बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता इरफ़ान खान की भी लम्बी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई थी।
अमेरिका के कैंसर अस्पताल में ऋषि कपूर ने 11 महीने और 11 दिन गुजारे थे। अमिताभ बच्चन सहित ही कई अन्य बॉलीवुड की हस्तियों ने उनकी मृत्यु पर श्रद्धांजलि दी है।
Reports : Actor Rishi Kapoor passes away in a Mumbai hospital. #RishiKapoor
67 साल के ऋषि कपूर पिछले साल सितंबर में ही न्यूयॉर्क में लगभग एक साल कैंसर का इलाज करवाने के बाद भारत लौटे थे। ऋषि कपूर को 2018 में कैंसर का पता चला था। जिसके बाद वो इलाज के लिए न्यूयॉर्क चले गए। वहाँ करीब एक साल उनका इलाज चला।
कल ही इरफान खान की मौत के बाद आज ऋषि कपूर की मौत ने सबको सदमे में डाल दिया है। यह बॉलीवुड के लिए लगातार दूसरे दिन में हुई बड़ी क्षति है। ऋषि कपूर बीते दौर के सबसे सफल अभिनेताओं में से एक थे। बॉबी, मेरा नाम जोकर, चाँदनी, हीना, अमर अकबर एन्थोनी आदि उनकी कुछ बेहद लोकप्रिय फ़िल्में थीं। वह समसामयिक घटनाओं को लेकर भी काफी मुखर रहा करते थे।
हरियाणा के मेवात जिला स्थित पुन्हाना में मुक्तिधाम आश्रम के प्रमुख महंत रामदास महाराज के साथ मुस्लिम बहुल इलाके में कुछ लोगों द्वारा कथित तौर पर बदसलूकी, मारपीट और जान से मारने की नीयत से हमला करने का मामला सामने आया है। महंत के समर्थन में आए हिंदूवादी संगठनों ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि बुधवार (अप्रैल 29, 2020) की सुबह महंत रामदास महाराज पर आरोपितों ने धार्मिक भावनाओं को निशाना बनाते हुए अभद्र धार्मिक टिप्पणियाँ की। साथ ही इलाके के सभी साधु-संतों को पुन्हाना से भगा देने की धमकी भी दी।
महंत रामदास महाराज जब इस हमले के बाद किसी तरह जान बचाकर पुलिस के पास पहुँचे तो उसने कथित तौर FIR दर्ज करने से इनकार कर दिया। ऑपइंडिया ने इस मामले में जब पुलिस का पक्ष जानने की कोशिश की तो पुन्हाना थाना SHO ने इस मामले में किसी भी जानकारी के लिए हेडक्वार्टर से बात करने कहा। उन्होंने कहा कि उन्हें इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी नहीं है। वहीं हिंदूवादी संगठनों का आरोप है कि पुलिस FIR की बजाए हमलावरों से बातचीत कर मामले को सुलझाने की राय दे रही है।
हरियाणा के मेवात जिले स्थित पुन्हाना में आज सुबह हुई इस वारदात के बाद पुन्हाना के साथ साथ पिनगवां, नगीना, फिरोजपुर झिरका, नूंह, फरीदाबाद, पलवल, होडल सहित अन्य शहरों के धार्मिक व सामाजिक संगठनों में गहरा रोष व्याप्त है।
इस घटना की शिकायत स्थानीय सिटी चौकी पुलिस को दे दी गई है। इस बाबत धार्मिक व सामाजिक संगठनों के प्रमुख लोगो ने बैठक कर घटना की कड़ी निंदा करते हुए पुलिस-प्रशासन से कार्रवाई की माँग की है। साथ ही कहा है कि यदि पुलिस-प्रशासन इस मामले में लापरवाही बरतता है तो वे प्रशासन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।
हमले के समय दुकान से लौट रहे थे महंत
पीड़ित पक्ष ने ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए कहा कि पुलिस को दी शिकायत में मुक्तिधाम आश्रम के प्रमुख महन्त रामदास महाराज ने बताया कि बुधवार (अप्रैल 28, 2020) सुबह महंत नजदीकी मेडिकल स्टोर से दवाई लेने के लिए गए थे तो वहाँ एक दुकान पर बैठे कुछ लोगों ने उन्हें देखकर अभद्र धार्मिक फब्तियाँ कसनी शुरू कर दीं।
महंत ने अपने साथ हुई घटना की जानकारी देते हुए बताया कि वहाँ मौजूद लोगों ने कहा कि इन बाबा और साधु-संतों ने ही माहौल खराब कर रखा है, ऐसे बाबाओं को पुन्हाना से भगा दो। अगर ये यहाँ से नहीं भागते हैं तो इन्हें जलाकर जान से मार दो, ये लोग ‘फितना-फ़सादी’ होते हैं।
इन टिप्पणियों पर महंत रामदास के विरोध करने पर वहाँ मौजूद लोगो ने हाथों में लाठी-डंडे लेकर महंत का पीछा किया और उन्हें जान से मारने की धमकी देते हुए उन पर हमला करने की कोशिश की। महंत वहाँ से किसी तरह जान बचाकर भागने में सफल रहे।
महंत रामदास महाराज
हिंदूवादी संगठनों ने की गिरफ्तारी की माँग
शिकायत में महन्त रामदास महाराज ने उक्त आरोपियों की पहचान कर उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करने की माँग की है। महंत पर हमले की इस घटना की सूचना पाकर सैकड़ों की संख्या में शहर के सामाजिक व धार्मिक संगठनों से जुड़े लोग चौकी में एकत्रित हो गए। इस मौके पर डीएसपी अशोक कुमार, एसएचओ अजयवीर भड़ाना व चौकी प्रभारी जगदीश चंद ने मौजूद लोगों को कड़ी कानूनी कार्यवाही का भरोसा भी दिलाया। हालाँकि हिंदूवादी संगठनों ने यह भी कहा कि पुलिस कार्रवाई की जगह पर आरोपितों के साथ समझौता का मामले को रफा-दफा करने पर जोर दे रही है।
इसके बाद धार्मिक व सामाजिक संगठनों को एक बैठक कर मुक्तिधाम आश्रम में हुई। बैठक में साधु संतों ने एक स्वर में कहा कि किसी भी सूरत में इस तरह का अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
महंत पर हुए इस हमले की घटना से आक्रोशित लोगों ने कहा कि पुन्हाना की आज हुई यह घटना बहुत ही निंदनीय है और यह सिर्फ महन्त रामदास महाराज के साथ नहीं बल्कि पूरे हिन्दू समाज के ऊपर प्रहार है। संगठन से जुड़े लोगों ने पुलिस प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि इस मामले में पुलिस कड़ी कार्यवाही करें, यदि पुलिस लापरवाही बरतती है तो समाज पुलिस-प्रशासन के विरोध में प्रदर्शन करने को उतारू हो जाएगा।
इस बैठक में सामाजिक कार्यकर्ता धर्मवीर सैनी, पूर्व चेयरमैन कपूर चंद गोयल, बृज मोहन सैनी, वाइस चेयरमैन बलराज सिंगला, राजकुमार नैवनिया, रत्न लाल मेम्बर, बिजेंद्र साहू, रिंकू कुमार प्रधान, लालाराम भारद्वाज, दीपक राजस्थानी पार्षद, भाजपा मंडलाध्यक्ष खिलौनी राम पण्डित, अशोक गोयल प्रधान, भोलाराम दिवाकर, महेश चंद गोयल सहित काफी संख्या में लोग उपस्थित थे।
शाम 8.30 तक भी पुलिस की ओर से नहीं की गई कोई पहल
ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय हिंदूवादी संगठनों ने बताया कि दिन में पुलिस के आश्वासन के बाद शाम 8.30 बजे तक भी पुलिस ने इस मामले में कोई गिरफ्तारी तो दूर, किसी प्रकार की कोई कार्रवाई की पहल भी नहीं की है। इस से आक्रोशित लोगों ने कहा है कि यदि पुलिस कल सुबह 9 बजे तक भी कोई कार्रवाई नहीं करती है तो वो लोग थाने के सामने ही विरोध-प्रदर्शन करेंगे।
हिन्दुओं पर हमले की सप्ताह भर में तीसरी घटना
ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय जनता ने बताया कि वो जहाँ रहते हैं वह मुस्लिम बहुल इलाका है और इस सप्ताह में हिन्दुओं पर हुए हमले की यह तीसरी घटना है। पुलिस भी इस बारे में कोई कार्रवाई करने से कतराती रही है। कुछ दिन पहले ही एक हिन्दू के घर पर सोशल मीडिया पर किए गए किसी पोस्ट को लेकर हुई बहस के बाद 200-300 लोगों की भीड़ उसके घर पर एकत्रित हो गई और उनके परिवार के लोगों के साथ बदसलूकी की।
घटना से सम्बंधित बयान एवं मौजूद लोगों के हस्ताक्षर
विकिपीडिया पर हिंदुओं को नीचा दिखाने की फिर से कोशिश की गई है। एक इस्लामी यूजर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS के पेज के साथ छेड़छाड़ की कोशिश की। उसने RSS के परिचय में हिंदू आतंकी संगठन लिख दिया।
विकिपीडिया पर छेड़छाड़ Ahmedfalah7711 नामक अकाउंट से किया गया। इसी अकाउंट से RSS को ‘राष्ट्रवादी संगठन’ की जगह ‘आतंकी संगठन’ लिखा गया। इसके बाद कई अन्य संपादकों ने इस जानकारी को संपादित किया। लेकिन अहमद के अकाउंट से बार-बार छेड़छाड़ जारी रहा। जब काफी कोशिश के बाद भी जानकारी सही नहीं हो पाई तो आर्टिकल को सेमी प्रोटेक्शन में रख दिया गया। लेकिन, इसके बाद एडिटिंग का यह खेल जारी रहा। ऐसा इसलिए, क्योंकि Ahmedfalah7711 नाम का यूजर इस जानकारी को संपादित करने के लिए लॉग इन वेबसाइट का इस्तेमाल कर रहा था।
अहमद ने सबसे पहले आरएसएस के परिचय में एडिटिंग रात के 12 बजे की। जब इसकी जानकारी अन्य एडिटर्स को मिली तो उनमें से कइयों ने उसे सुधारना चाहा। लेकिन बार-बार वही लिखा लौट के आता रहा। यानी आरएसएस को आतंकी संगठन साबित करने के लिए उक्त यूजर लगातार सक्रिय रहा।
Ahmedfalah7711 के टॉक पेज को देखने पर मालूम चलता है कि वे ऐसे कारनामों वह लगातार ऐसी हकरतें करता रहता है। इसके लिए कई बार उसे चेतावनी मिल चुकी है। पिछले महीने की बात करें तो उसने गृह मंत्री अमित शाह की छवि को धूमिल करने के लिए लिख दिया था कि अमित शाह जैन परिवार में पैदा हुए थे और वे खुद को हिंदू कहते हैं। उन्हें कई बार जैन मंदिरों में अर्चना करते भी देखा गया है।
इसके अलावा इस यूजर पर ये भी आरोप है कि इसने विकिपीडिया पर मौजूद उस पेज से भी छेड़खानी की, जहाँ इस बात की जानकारी मौजूद थी कि कौन-कौन से गैर-इस्लामिक धार्मिक स्थलों को मस्जिदों में बदला गया। इतना ही नहीं, इस शख्स ने इस आर्टिकल से राम जन्मभूमि के पूरे सेक्शन को ही गायब कर दिया था।
गौरतलब है कि इस्लामिक कट्टरपंथियों की ये हरकत विकिपीडिया पर हैरान करने वाली नहीं है। विकिपीडिया पर इन्हें समय-समय पर कोई भी एडिंटिंग करने की आजादी है। अभी दो हफ्ते पहले नोआखाली दंगों में हिंदू-मुस्लिम शब्दों में हेर-फेर कर दिया गया था और हिंदू विरोधी दंगों को मुस्लिम विरोधी दंगे दर्शाने की कोशिश हुई थी। इसके अलावा विकिपीडिया के लेखों में संपादन करने का अधिकार रखने वालों ने तबलीगी जमातियों के कोरोना हॉटस्पॉट होने की जानकारी को भी डिलीट किया था और इसे मुस्लिम विरोधी कहा था।
आईआईटी (IIT) हैदराबाद में निर्माण स्थल पर काम कर रहे लगभग 2,400 प्रवासी मजदूरों ने बुधवार (अप्रैल 29, 2020) सुबह घर वापस भेजने की माँग को लेकर विरोध-प्रदर्शन किया। देखते ही देखते मजदूरों की भीड़ उग्र हो गई और कुछ मजदूरों ने वहाँ तैनात पुलिस टीम पर पथराव किया। इसमें एक पुलिसकर्मी को चोट आई और पुलिस की गाड़ी क्षतिग्रस्त हुई। यह जानकारी संगारेड्डी ग्रामीण पुलिस ने दी।
पहले दिल्ली, फिर सूरत और मुंबई के बाद अब तेलंगाना में फँसे मजदूर घर वापस जाने के लिए इकट्ठा हो गए। इस दौरान लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जी उड़ाई गई और पुलिसकर्मियों पर भी हमला किया गया। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि इस हमले में तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए।
Few of the migrant labourers pelted stones at police team deployed there; one cop received injuries & police vehicle was also damaged: Sangareddy Rural Police. #Telanganapic.twitter.com/8svEwLKSXT
जानकारी के मुताबिक संगारेड्डी जिले के कंडी स्थित आईआईटी हैदराबाद में वेतन ना मिलने से गुस्साए सैकड़ों प्रवासी मजदूरों ने पहले निर्माण कम्पनियों के कुछ अधिकारियों पर हमला किया और बाद में मौके पर पहुँची पुलिस पर भी पथराव किया, जिसमें एक उप-निरीक्षक और दो पुलिस कर्मी घायल हो गए।
पुलिस ने बताया कि निर्माण स्थल के पास ये मजदूर प्रदर्शन कर रहे थे। ये दिहाड़ी माँग रहे थे और कोरोना वायरस से निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के दौरान अपने घर वापस जाने देने की माँग कर रहे थे। संगारेड्डी जिले के पुलिस अधीक्षक एस चंद्रशेखर रेड्डी ने बताया कि प्रवासी मजदूरों ने कथित तौर पर पुलिस पर पथराव किया। इसमें पुलिस का एक वाहन क्षतिग्रस्त हो गया और एक उप-निरीक्षक ताथा दो पुलिस कर्मी घायल हो गए।
अधिकारियों के अनुसार मजदूरों का आरोप है कि आईआईटी से जुड़ी एक निर्माण कंपनी ने उन्हें मार्च का वेतन नहीं दिया था और उनसे बुधवार को आगे का काम शुरू करने को कह रहे थे। उग्र मजदूरों ने निर्माण कंपनी के अधिकारियों पर हमला कर दिया। मजदूरों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस फोर्स को बुलानी पड़ी।
पुलिस अधीक्षक ने बताया कि अब मामला नियंत्रण में है। उन्होंने कहा कि इस बात की जाँच की जा रही है कि इस हमले में कौन-कौन लोग शामिल थे। जिला कलेक्टर हनुमंत राव ने बताया कि यहाँ पर झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा समेत 10 जिलों के मजदूर हैं, जो अपने घर वापस जाना चाहते हैं। जिला अधिकारियों ने प्रवासी श्रमिकों और निर्माण कंपनी के प्रतिनिधियों के बीच एक बैठक बुलाई।
प्रदर्शनकारी मजदूरों को प्रबंधन की ओर से कल शाम तक उनके बकाया वेतन के भुगतान का आश्वासन दिया गया था। इसके वे काम फिर से शुरू करने के लिए सहमत हुए। कलेक्टर ने कहा, “हम फिर से उनके साथ बातचीत करेंगे और उनकी सहमति देने के बाद काम शुरू किया जाएगा।” कलेक्टर ने बताया कि मजदूरों की मुख्य माँग घर जाने देने की थी।