तय तारीख के मुताबिक 14 अप्रैल तक देश में लॉकडाउन जारी है। कोरोना से जंग जीतने के लिए देश में लागू किए गए लॉकडाउन के बाद भी लगातार कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़ती चली जा रही है। ऐसे में लोगों में संदेह है कि लॉकडाउन तय समय पर समाप्त हो जाएगा या फिर कि इसकी मियाद बढ़ा दी जाएगी। वहीं मंगलवार शाम को स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना पर जानकारी देते हुए कहा कि देश में अब तक 4421 कोरोना से संक्रमित मरीज सामने आ चुके हैं।
Till now 326 persons have been discharged after recovery. Till now there are 4,421 #COVID19 positive cases in the country, including 354 cases in the last 24 hours: Lav Aggarwal, Joint Secretary, Health Ministry pic.twitter.com/fIW5i0o9JZ
देश में जारी लॉकडाउन की स्थिति पर स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने कहा कि ICMR के अध्ययन से पता चलता है कि कोविड-19 से संक्रमित एक मरीज 30 दिनों में 406 लोगों को संक्रमित कर सकता है, यदि वह लॉकडाउन, सामाजिक दूरी का पालन नहीं करता है तो। अगर हम लॉकडाउन कर दें तो एक व्यक्ति केवल 2.5 को संक्रमित कर सकता है। उन्होंने कहा कि अब तक लॉकडाउन को बढ़ाने को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ है। सोशल मीडिया की खबरों के कारण इस तरह की कोई अटकल न लगाएँ।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के रमन गंगाखेडकर ने जानकारी देते हुए बताया कि पूरे देश में अब तक कोरोना वायरस के 1,07,006 टेस्ट किए गए हैं। वर्तमान में 136 सरकारी प्रयोगशालाएँ काम कर रही हैं। इनके साथ में 59 और निजी प्रयोगशालाओं को टेस्ट करने की अनुमति दी गई है, जिससे टेस्ट मरीज के लिए कोई समस्या न बन सके। वहीं 354 केस बीते सोमवार से आज तक सामने आ चुके हैं।
लव अग्रवाल ने कहा कि भारतीय रेलवे ने 2,500 डिब्बों में 40,000 आइसोलेशन बेड तैयार किए हैं। वे प्रतिदिन 375 आइसोलेशन बेड तैयार कर रहे हैं और यह देश भर में 133 स्थानों पर चल रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार क्लस्टर नियंत्रण और प्रबंधन के लिए उत्तरदायी है। कोरोना वायरस के प्रकोप से निपटने के लिए एक रणनीति अपना रही है। यह रणनीति विशेष रूप से आगरा, गौतमबुद्ध नगर, पठानमथिट्टा, भीलवाड़ा और पूर्वी दिल्ली के दिलशाद गार्डन में सकारात्मक परिणाम दे रही है।
वहीं गृह मंत्रालय की संयुक्त सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने बताया कि आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की स्थिति संतोषजनक है। गृह मंत्री ने आवश्यक वस्तुओं और लॉकडाउन उपायों की स्थिति की विस्तृत समीक्षा की है, जमाखोरी और कालाबाजारी को रोकने के लिए सभी राज्यों को निर्देश भी दिए गए हैं। आपको बता दें कि अभी तक भारत में कोरोना से मरने वालों की संख्या 137, जबकि इससे संक्रमित लोगों की संख्या 4921 हो गई है। वहीं 326 लोग अस्पताल से डिस्चार्ज हो चुके हैं।
वहीं अगर पूरे विश्व की बात करें तो इससे मरने वालों की संख्या 76,533, जबकि इससे संक्रमित लोगों की संख्या 1,366,205 हो चुकी है।
‘रिपब्लिक टीवी’ के संस्थापक अर्नब गोस्वामी ने बदजबान शोएब जमाई को अपने शो से निकाल बाहर किया था क्योंकि उसने पैनलिस्टों पर ओछी और अपमानजनक टिप्पणी की थी। शोएब ने दावा किया था कि भारतीय मीडिया शत प्रतिशत समुदाय विशेष-विरोधी और सांप्रदायिक हो गया है। उसने धमकी दी थी कि एक दिन उन्हें कथित अल्पसंख्यकों के जीवन को ख़तरा पहुँचाने की सज़ा भुगतनी पड़ेगी। उसने मीडिया पर फेक न्यूज़ फैलाने का आरोप मढ़ा था। उसने दावा किया था कि समुदाय के 25 करोड़ मीडिया पर काफ़ी गुस्सा हैं।
शोएब ने भी धमकी दी थी कि मजहब के 25 करोड़ लोग आगे क्या करेंगे, इसका उसे कुछ नहीं पता। उस समय तो उसने धमकी दी थी कि गुस्साए लोग कुछ भी कर डालेंगे, वहीं अब वह अपने बयान का अलग-अलग अर्थ निकाल कर उसके बचाव में जुट गया है। अब उसने बताया है कि उसके कथन का मतलब है कि मजहबी संस्थाएँ अब ‘फेक न्यूज़ फ़ैलाने वाले चैनलों’ के ख़िलाफ़ एफआईआर करेंगे। वो इस बात से नाराज़ है कि ‘कोरोना बम’ और ‘कोरोना जिहाद’ जैसी बातें क्यों कही जा रही है।
उसने कहा कि ये सब शुरू हो चुका है। अपने पहले ट्वीट के क़रीब 13 घंटा बाद उसने ट्वीट करते हुए बताया कि वो न्यूज़ चैनलों की उन बातों को हलके में नहीं ले सकता और ऐसा करने वालों को क़ानून का सामना करना पड़ेगा। उसने कहा कि अब बहुत हो गया है। शोएब ने साथ ही 25 करोड़ लोगों वाली बात की भी व्याख्या की। उसने कहा कि कोरोना वायरस के संक्रमण के प्रसार के लिए मजहब को जिम्मेदार ठहराया जाएगा तो निश्चित है कि समुदाय विशेष के लोग गुस्सा होंगे। साथ ही उसने दावा किया कि वो हिंसा में विश्वास नहीं रखता लेकिन क़ानूनी लड़ाई आवश्यक है।
शोएब जमाल ने 13 घंटे बाद अपने ट्वीट की ‘व्याख्या’ की
बता दें कि अर्नब के शो में सोमवार (जनवरी 27, 2020) को PFI द्वारा सीएए के ख़िलाफ़ हुए दंगों को फंड दिए जाने के खुलासे पर डिबेट चल रहा था। इसी डिबेट के वीडियो में करीब 33 मिनट 50 सेकेंड के स्लॉट में शोएब को नेशनल टेलीवीजन पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते सुना जा सकता है। गौर करने वाली बात है कि शोएब ने डिबेट से जुड़ने के बाद ही इधर-उधर की बातें करनी शुरू कर दी थी।
जिसके कारण अर्नब ने कई बार उन्हें डिबेट से हटाने की बात की। लेकिन लगातार हस्तक्षेप के कारण जब उन्हें बोलने दिया गया तो वह किसी पैनेलिस्ट की बात पर नाराज हो गए। शोएब को डिबेट में कहते सुना जा सकता है, “तवायफ के बच्चे की हिम्मत कैसे हुई औरतों और बच्चों के बारे में बोलने की।”
यूके में कोरोना महामारी ने तेजी से अपने पैर पसारे और फिर देखते ही देखते एक के बाद एक सैकड़ों, हजारों और फिर लाखों लोगों को अपनी चपेट में ले लिया। सरकार ने जब तक कठोर कदम उठाए, तब तक यह महामारी पूरे देश में फैल चुकी थी। इस बीच यूनाइटेड किंगडम के इस्कॉन मंदिर में पिछले महीने हुए एक विशेष बैठक को कुछ लोगों ने कोरोना संक्रमण का केन्द्र घोषित कर दिया है। साथ ही भारत के कुछ चिढ़े हुए अभिनेता अब इस्कॉन और यूके में कोरोनो वायरस के मामलों की तुलना भारत में तबलीगी जमात की हरकतों से करने में लगे हुए हैं।
शाहिद सिद्दीकी ने दावा किया, “अंध भक्ति, अंध विश्वास सभी समस्याओं का स्रोत है, टीजे (तबलीगी जमात) या इस्कॉन नहीं है।“
साभार-ट्विटर
विद्या कृष्णन, जोकि एक स्वास्थ्य और विज्ञान पत्रकार है, जिन्होंने पहले राजनीतिक रूप से पक्षपातपूर्ण लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वुहान कोरोना वायरस की प्रतिक्रिया के बारे में दुर्भावनापूर्ण झूठ फैलाया था, ने कहा, “लंदन में, हिंदू डायसटॉस एक क्लस्टर प्रकोप के केंद्र में है।”
साभार- ट्विटर
अन्य इस्लामिक प्रोपगैंडाबाज मैदान में उतरे हैं और दिखावा कर रहे हैं जैसे कि ब्रिटेन में इस्कॉन और भारत में तबलीगी जमात का मामला समान है, भले ही दोनों मामलों में दूर-दूर तक कोई समानता नहीं है।
साभार- ट्विटर
अब आपको इस मामले की सच्चाई बताते है। 12 और 15 मार्च को इटली के एक इस्कॉन मंदिर में दो बैठकें आयोजित की गई थीं, जिनमें करीब एक हजार से अधिक भक्तों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद हुई जाँच में इनमें से 21 श्रद्धालुओं को कोरोना पॉजीटिव पाया गया, जबकि इनमें से पाँच की मौत हो गई। दरअसल, इटली में हुई कुल मौत की तुलना में यह एक बहुत छोटा सा आँकड़ा है, जबकि अभी तक की रिपोर्ट के मुताबिक इटली में 5373 लोगों की मौत हो चुकी है और इससे संक्रमित लोगों की संख्या 51,608 हो चुकी है।
इस प्रकार यूके में सामने आए मामलों में 0.04%, जबकि कुल मौतों में 0.9% मौतें इस्कॉन मंदिर से जुड़ी हुई हैं। इस आँकडे से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कोरोना वायरस के कारण यूके में आए कुल मामलों और मौतों की संख्या में इस्कॉन की संख्या बहुत ही कम है। अब अगर बात करें भारत की तो स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। 6 अप्रैल तक भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 4067 है, जबकि इन मामलों में से 1445 इस्लामिक मिशनरी संगठन से जुड़े हैं। यानी 35.5% मामले इससे इस्लाम से जुड़े हुए हैं। इसलिए ब्रिटेन में इस्कॉन की तुलना भारत में जमातियों की घटना से जोड़ना एक हास्यास्पद है, क्योंकि ये दोनों मामले एक जैसे नहीं हैं।
वहीं यह याद रहे कि जब इस्कॉन मंदिर में 12 और 15 मार्च को कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। तो इन कार्यक्रमों ने किसी भी तरह से सरकारी दिशानिर्देश या आदेश का उल्लंघन नहीं किया था, क्योंकि यूके के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने 23 मार्च को कोरोना के लगातार बढ़ते खतरे को देखते हुए लोगों को घरों में रहने का आदेश जारी किया था, जबकि भारत में जब तबलीगी जमात के एक हजार से अधिक लोगों के साथ निजामुद्दीन मरकज में कार्यक्रम किया था, उससे पहले ही भारत सरकार द्वारा जारी विभिन्न दिशा निर्देशों के साथ दिल्ली की सरकार ने 50 से अधिक लोगों के एक स्थान पर जमा होने पर प्रतिबंध लगा दिया था। जमातियों के इस कार्यक्रम ने दोनों आदेशों का साफ तौर पर उल्लंघन किया था। इसलिए ये दोनों दो उदाहरण भी कहीं से भी समान नहीं हैं।
वहीं भारत में तबलीगी जमात और यूनाइटेड किंगडम में इस्कॉन के आचरण की अगर बात करें तो तबलीगी जमात के विपरीत, इस्कॉन भक्त जानबूझकर संदिग्ध मामलों का पता लगाने से बचने के लिए कहीं भी छिप नहीं रहे, बल्कि सामने आकर सरकार का सहयोग और अपनी जाँच भी करा रहे हैं। उन्होंने तबलीगी जमात की तरह अपने कार्यक्रम में यह भी दावा नहीं किया कि उनके भगवान किसी तरह उन्हें महामारी से बचा लेंगे या फिर यह वायरस उनके धर्म के खिलाफ एक साजिश है। वास्तव में सभी इस्कॉन मंदिरों को 16 मार्च को ही बंद कर दिया गया था, क्योंकि एक सप्ताह पहले ही बोरिस जॉनसन ने लॉकडाउन के आदेश जारी किए थे।
वहीं दूसरी ओर तबलीगी जमात के लोगों ने हर किसी के साथ गलत व्यवहार किया है। इनके सदस्यों ने अस्पताल के कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार किया है, वे अस्पताल में नग्न घूमते रहे और महिला स्वास्थ्य कर्मचारियों पर यौन अनुचित व्यवहार किया। उन्होंने भोजन के लिए नखरे किए और माँग की कि उन्हें इसके बजाय जो वो माँग कर रहे हैं वो परोसा जाए। उन्होंने अधिकारियों से दुर्व्यवहार किया और वायरस फैलाने के लिए डॉक्टरों पर तक थूक दिया।
इसके अलावा, उन्होंने क्वारटाइन के नियमों का पालन भी नहीं किया। उन्होंने क्वारंटाइन रहते समय मनोरंजन के संसाधन उपलब्ध कराने की भी माँग की औऱ जिन लोगों को कोरोना पॉजिटिव पाया गया उन लोगों ने दवा लेने तक से इंकार कर दिया, जबकि इस्कॉन के भक्तों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो कुछ का कोरोना पॉजिटिव पाए जाने में लोगों ने समानता ढूँढी और इसी का सहारा लेकर कुछ लोग तबलीगी जमात के अत्याचारपूर्ण आचरण की गंभीरता को कम करने के लिए जानबूझकर प्रोपेगेंडा चलाने में लगे हुए हैं।
भारत में तबलीगी जमात और यूनाइटेड किंगडम में इस्कॉन के आचरण की बराबरी करने वाले लोग पूरी तरह से जानते हैं कि दोनों मामले समानताओं से कोसों दूर हैं, लेकिन ये लोग सच्चाई की परवाह किए बिना दावा कर रहे हैं क्योंकि यह उनके राजनीतिक एजेंडे को पूरा करता है। आपको बता दें कि यह न केवल भारत में है कि तबलीगी जमात सुपर स्प्रेडर के रूप में उभरा है। इस्लामिक मिशनरी संगठन ने पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में और यहाँ तक कि फिलिस्तीन जैसे स्थानों में भी इस वायरस को फैला दिया है। इसलिए यह दावा करना कि दोनों मामलों के बीच समानता है तो यह बिल्कुल गलत है।
इसके अलावा कुछ बुद्धजीवी लोग आरोप लगा रहे हैं कि भारत सरकार ने ‘सांप्रदायिकता’ को महामारी बना दिया है और इसकी आड़ में समुदाय विशेष को निशाना बना रही है, क्योंकि तबलीगी जमात ने अपनी गंदी हरकतों के कारण सभी क्षेत्रों से जुड़े लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। ये वहीं लोग हैं जो हर बार एक ही बात करते हैं कि समुदाय विशेष का हर आदमी आतंकवादी नहीं होता, जबकि इन लोगों को पता रहता है कि हर एक आतंकवादी मजहब विशेष का होता है। जब भी कोई आतंकवादी हमला होता है, तबलीगी जमात के लोगों के पाए जाने के बाद भी इसकी आलोचना को पूरे समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने के रूप में प्रचारित किया जाता है। ये कुछ और नहीं बल्कि इन प्रोपेगेंडाबाजों द्वारा तबलीगी जमात की निष्पक्ष आलोचना से भी दूर करने का यह एक सुनियोजित प्रयास है।
कुछ ऐसा ही यह एक ताजा उदाहरण है कि इन लोगों ने उन पापों के लिए इस्कॉन पर अनुचित दोष लगाने का प्रयास किया है जो उन्होंने नहीं किए थे। यह तर्क दिया जा सकता है कि उन्हें 12 और 15 मार्च को कार्यक्रमों का आयोजन नहीं करना चाहिए था, यहाँ तक कि इस्कॉन ने भी कुछ किया, लेकिन उनके कार्यों को ब्रिटिश सरकार के आचरण की पृष्ठभूमि पर ही आँका जाना चाहिए, जिसने वायरस को गंभीरता से नहीं लिया और जब लिया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस प्रकार यूके में कोरोना वायरस मामलों में इस्कॉन का दूर-दूर तक कोई योगदान नहीं है। ये लोग जानबूझकर इस्कॉन को दोषी ठहरा रहे हैं और अपने कार्यों की तुलना तबलीगी जमात से कर रहे हैं। ताकि बाद में आने वाली सभी निष्पक्ष आलोचनाओं से किनारा किया जा सके।
आज कुछ वामपंथी सिर्फ़ इसीलिए चिढ़ रहे हैं क्योंकि कोरोना वायरस को वुहान वायरस, चीनी वायरस कहा जा रहा है। जबकि सालों से वायरस या रोग का नामकरण उस जगह के नाम पर किया जाता रहा है, जहाँ से ये शुरू हुआ और चीन तो हमेशा से दुनिया को ऐसी आपदा देने में अभ्यस्त रहा है। इससे पहले भी कई ऐसे रोग और वायरस रहे हैं, जो चीन से निकला और जिन्होंने पूरी दुनिया में कहर बरपाया। आइए, आज हम उन 5 चीनी आपदाओं के बारे में बात करते हैं, जिसने दुनिया भर में तहलका मचाया।
H7N9 फ्लू
इसे आप बर्ड फ्लू के नाम से जनता हैं, जिसका पहला मामला शंघाई में आया था। बात में पता चला कि एक पोल्ट्री मार्किट में ये वायरस चिकेन्स से निकल कर मनुष्य में आ गया। इस इन्फेक्शन का पता तब चला, जब कई लोग इससे बीमार हो गए। हालाँकि, इस वायरस के मामले में ह्यूमन-टू-ह्यूमन ट्रांसमिशन की उतनी ख़बर नहीं आई। इस आपदा के अब तक 5 स्टेज आ चुके हैं, जिसमें से ताज़ा 2017 में आया था। ये एक ऐसा वायरस है, जिसके प्रति प्रतिरोधक क्षमता मानवों में नहीं है, इसीलिए विशेषज्ञ कहते हैं कि इस पर नज़र नहीं रखा गया तो ये बड़ा तहलका मचाने की ताक़त रखता है।
SARS
‘Severe Acute Respiratory Syndrome (SARS)’ भी पहली बार 2002 में चीन में ही देखा गया था। चीन के युनान प्रान्त में दूर एक गुफा में चमगादड़ों को इस वायरस का स्रोत माना गया था। ये बात भी 15 साल बाद पता चली थी। ये दक्षिणी चीन से 37 देशों में फैला और इसने 750 लोगों की जान ले ली। वैज्ञानिक भी कहते हैं कि इसका कोई वैक्सीन मिलना मुश्किल है क्योंकि क्वारंटाइन से ही अब तक काम चलाया जाता रहा है। हालाँकि, अब संभव है कि इसके सम्पूर्ण इलाज की व्यवस्था हो जाए।
H5N1 बर्ड फ्लू
ये भी पहली बार हॉन्गकॉन्ग में दिखा था और उसके बाद से देश-विदेश की कई जंगली पक्षियों में पाया जाता रहा है। ये 1996 में पहली बार पाया गया था लेकिन 2002 में इसने अपना बड़ा असर दिखाया और एशिया, अफ्रीका और यूरोप से लेकर अरब जगत तक फ़ैल गया। इस वायरस के फैलने के बाद लोगों में तरह-तरह की बीमारियाँ होने लगीं और कई लोगों की मौत भी हो गई। ये वायरस भी अगर ह्यूमन टू ह्यूमन फैलने लगा तो बड़ी तबाही आ सकती है।
हॉन्गकॉन्ग फ्लू
ये एक ऐसा खतरनाक फ्लू था, जिसनें क़रीब 10 लाख लोगों की जान ले ली। ये 1968-69 में अपने चरम तक पहुँचा था। वियतनाम और सिंगापुर में ये काफ़ी फैला था। इसके बाद ये भारत, फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप तक पहुँचा। 1969 में ये जापान, अफ्रीका और दक्षिण अफ्रीका तक पहुँचा। इससे 1 लाख लोग तो सिर्फ़ अमेरिका में ही मारे गए थे। हॉन्गकॉन्ग की तो इससे लगभग 15% जनसंख्या ही साफ़ हो गई थी।
एशियाई फ्लू
इसका पहला मामला फ़रवरी 1957 में सिंगापुर में आया था लेकिन इसकी उत्पति भी चीन से ही हुई थी। दक्षिण-पश्चिमी एशिया में भारत में भी इसके 10 लाख मामले सामने आए थे। इसने दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं को तबाह कर दिया था।
बता दें कि कोरोना के मामले में भी दिसंबर 10, 2019 को ही चीन में कोरोना का पहला मरीज बीमार पड़ने लगा था। इसके एक दिन बाद वुहान के अधिकारियों को बताया गया कि एक नया कोरोना वायरस आया है, जो लोगों को बीमार कर रहा है। वुहान सेन्ट्रल हॉस्पिटल के डायरेक्टर ने 30 दिसंबर को इस वायरस के बारे में वीचैट पर सूचना दी। उन्हें जम कर फटकार लगाई गई और आदेश दिया गया कि वो इस वायरस के बारे में किसी को कुछ भी सूचना न दें।
इसी तरह डॉक्टर ली वेलिआंग ने भी इस बारे में सोशल मीडिया पर विचार साझा किए। उन्हें भी फटकार लगाई गई और बुला कर पूछताछ की गई। इसी दिन वुहान हेल्थ कमीशन ने एक ‘अजीब प्रकार के न्यूमोनिया’ के होने की जानकारी दी और ऐसे किसी भी मामले को सूचित करने को कहा।
2019 में लिखे एक लेख में ‘चाइनीज एक्सप्रेस’ ने SARS या फिर MERS की तरह कोई खतरनाक वायरस के सामने आने की शंका जताई थी और कहा था कि इसकी वजह चमगादड़ ही होंगे लेकिन बावजूद इसके लगातार लापरवाही बरती गई। उस लेख में ये भी कहा गया था कि ये वायरस चीन से ही आएगा। 2019 तो छोड़िए, 2007 में ही एक जर्नल में प्रकाशित हुए आर्टिकल में बताया गया था कि साउथ चीन में चमगादड़ जैसे जानवरों को खाने का प्रचलन सही नहीं है क्योंकि उनके अंदर खतरनाक किस्म के वायरस होते हैं। उस लेख में इस आदत को ‘टाइम बम’ की संज्ञा दी गई थी। चीन में जनता बड़े स्तर पर इससे प्रभावित हुई है और इसका दोष भी वहाँ की सरकार व प्रशासन का है।
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने कोरोना वायरस से संक्रमण से उपजी आपदा के बीच पीएम केयर्स फंड में दान दिया है। ये दान राम मंदिर की तरफ से देश को दिया गया है। अब आप सोच रहे होंगे कि भव्य राम मंदिर का तो अभी निर्माण भी नहीं हुआ है लेकिन इसकी तरफ से पीएम केयर्स फंड में दान कैसे दे दिया, तो आपको बता दें कि ऐसा सच में हुआ है। श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने कहा है कि अभी राम मंदिर बनने में कितने रुपए लगेंगे इसका कोई अंदाज़ा नहीं है लेकिन मंदिर ने निर्माण से पहले ही देश के लिए दान देकर सनातन का महत्व दिखाया है।
विश्व हिन्दू परिषद् के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने बताया कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से आज ग्यारह लाख रुपए का एक चेक कोरोना महामारी की रोकथाम हेतु महामंत्री श्री चम्पतराय व अन्य ट्रष्टियों द्वारा पीएम केयर्स फण्ड के नाम ज़िलाधिकारी अयोध्या को भेंट किया। उन्होंने आगे कहा कि भगवान श्रीराम ने अपने मन्दिर से पहले देशवासियों के कुशलक्षेम हेतु पीएम केयर्स फण्ड में दान देकर बहुत बड़ी कृपा की है। अब इस फण्ड में कभी कोई कमी नहीं आएगी। विहिप ने अपील की है कि हम सभी देशवासी व प्रवासी भारतीय भी अपना-अपना अंशदान देश को शीघ्रातिशीघ्र करें।
Shri Ram Janmbhumi Teerath kshetra trust #Ayodhya yesterday donates Rs. 11,00,000 to the #PMCARESFund Shri Champat Rai Sec.Gen along with other trustees submitted the cheque from its new A/c to the DM Ayodhya.#JaiShriRampic.twitter.com/nIs1oPDTgf
विनोद बंसल ने ‘जय श्री राम’ लिखते हुए इस बात की सूचना दी और साथ ही जिलाधिकारी के साथ ट्रस्टियों की तस्वीर भी शेयर की, जिसमें वो चेक सौंपते हुए दिख रहे हैं। साथ ही उन्होंने पीएम केयर्स फंड के अकाउंट डिटेल्स शेयर किए, ताकि अन्य लोग भी डोनेट कर सकें। बता दें कि पीएम केयर्स फंड में एक हफ्ते में 6500 करोड़ रुपए की धनराशि जमा हो गई है। जहाँ तक राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की बात है, इस ट्रस्ट की घोषणा की जानकारी ख़ुद पीएम मोदी ने दी थी। राम मंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद इसका गठन किया गया था।
महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री जीतेन्द्र आव्हाड पर बड़ा आरोप लगा है। महाराष्ट्र पुलिस और आव्हाड के गुंडों ने मिल कर एक सिविल इंजीनियर की पिटाई की है। एनसीपी के बड़े नेता जितेंद्र के गुंडों ने महाराष्ट्र पुलिस के कॉन्स्टेबलों के साथ मिल कर इंजीनियर को मारा-पीटा। दरअसल, जितेंद्र ने पीएम मोदी द्वारा रविवार (अप्रैल 5, 2020) को रात 9 बजे 9 मिनट्स के लिए लाइट्स ऑफ करके दिये, मोमबत्ती जलाने के आव्हान का विरोध किया था। आव्हाड ने लोगों से कहा था कि वो पीएम मोदी का बायकाट करें। इंजीनियर ने जितेंद्र के इस बात का विरोध किया, जिसकी उसे ‘सज़ा’ दी गई।
वर्तक नगर पुलिस स्टेशन में इस सम्बन्ध में मामला दर्ज किया गया है। आरोप लगाया गया है कि आव्हाड ने पुलिस का ग़लत इस्तेमाल किया। महाराष्ट्र के विधान पार्षद निरंजन डावखरे ने इस मामले को मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के समक्ष उठाया है। बता दें कि महाराष्ट्र में उद्धव के नेतृत्व में शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस की गठबंधन सरकार चल रही है। एनसीपी नेता सरकार में सबसे ज्यादा हावी हैं और अक्सर नेताओं की गुंडागर्दी की ख़बर आती रहती है।
जितेंद्र आव्हाड ने ट्विटर पर इस घटना के बारे में बोलने की जगह अपना ही नितम्बों वाला फोटो शेयर कर दिया। महाराष्ट्र भाजपा के आईटी सेल के सह-संयोजक प्रतीक कार्पे ने पूछा कि क्या मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के पास इतनी हिम्मत है कि वो एनसीपी नेता के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकें? इस पर जितेंद्र ने उन्हें वो फोटो दिखाई, जो इंजीनियर अनंत करमुसे ने शेयर की थी। उन्होंने उस पोस्ट का स्क्रीनशॉट दिखा कर ये साबित करने का प्रयास किया कि उनके बॉडीगार्ड्स, गुंडों और पुलिस ने मिल कर जो किया, वो एकदम सही था।
जितेंद्र ने पूछा कि अगर प्रतीक के परिवार के किसी सदस्य की ऐसी तस्वीरें शेयर की जाए तो क्या वो इसका समर्थन करेंगे? उन्होंने कहा कि वो इस तरह की अराजकता का समर्थन नहीं करते। उन्होंने इसके बाद प्रतीक से पूछा कि इस पर उनकी क्या राय है? आरोप है कि जितेंद्र आव्हाड के गुंडों ने इंजीनियर के घर जाकर उन्हें उठाया और फिर पिटाई की। जिस चित्र को लेकर जितेंद्र बौखलाए हुए हैं, वो एडिटेड है। उसमें देखा जा सकता है कि वो माचिस लेकर अपने ही नितम्बों में आग लगा रहे हैं।
जब पूरा देश दीपक, मोमबत्ती, टॉर्च आदि जलाकर कोरोना वायरस जैसी महामारी की लड़ाई के खिलाफ एकजुटता दिखा रहा था, बिहार के मधुबनी में एक परिवार ने 70 साल की बुजुर्ग महिला काला देवी (उर्फ कैली देवी) की गला दबाकर हत्या कर दी। यह दिन था रविवार (अप्रैल 5, 2020) का। हत्या को अंजाम देने के बाद सुलेमान नदाफ, मलील नदाफ और शरीफ नदाफ फरार है। घटना जिले के रहिका प्रखंड के सतलखा मानी दास टोल की है।
इस बाबत हमने मृतक महिला काला देवी (पति: जवाहर मंडल) के बेटे सुरेंद्र मंडल से बात की। उन्होंने हमें इस घटना से संबंधित पूरी बात बताई और साथ ही कई सारे सवाल भी खड़े किए। सुरेंद्र मंडल ने बताया कि यह हिन्दू बहुल इलाका है। यहाँ पर समुदाय विशेष के सिर्फ दो ही परिवार रहते हैं और वो भी कहीं और से आकर बसे हुए हैं। शरीफ नदाफ का यहाँ पर ससुराल है। उसका घर रहिका के अंदर मजहबी बस्ती में है।
सुरेंद्र ने बताया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर रात के 9 बजे कुछ बच्चे दीपक जलाने के बाद इधर-उधर खेल रहे थे। शरीफ नदाफ ने गाली-गलौज शुरू कर दी। भद्दी और गंदी गालियाँ देने के साथ ही कहा कि इस मुहल्ले में कोई भी बच्चा हिंदू का नहीं है, सभी बच्चे समुदाय विशेष की पैदाइश हैं।
सुरेंद्र का परिवार दरवाजे पर बैठा ये सब सुन रहा था। लेकिन उन्होंने आरोपितों को जवाब नहीं दिया। बकौल सुरेंद्र आरोपित नशे में थे। इस वजह से उन लोगों ने उनके साथ उलझना मुनासिब नहीं समझा। वे लोग चुप रहे।
इसके बाद सुलेमान नदाफ का बेटा मलीन नदाफ घर से बाहर निकला और एक बच्चे को धक्का देकर वहाँ से भगा दिया। इस पर सुरेंद्र ने आपत्ति जताते हुए कहा कि आप बच्चे को धक्का क्यों दे रहे हैं, ये आपके घर के आगे तो नहीं हैं। इन्हें खेलने दीजिए। अगर आप देश के प्रधानमंत्री की बात नहीं मान सकते तो फिर उल्लंघन भी मत कीजिए। जो पालन कर रहे हैं, उनको करने दीजिए। इसके बाद उसने बच्चे को छोड़ दिया और सुरेंद्र की घर की तरफ बढ़ गया।
सुरेंद्र के घर के बाहर ही बेंच पर उनकी माँ काला देवी बैठी हुईं थीं। मलीन नदाफ ने काला देवी के सिर पर दो-तीन बार मारा। सुरेंद्र ने ये देखा लेकिन उन्होंने ये नहीं सोचा था कि वो ऐसा कुछ करेगा, इसलिए वो आगे बढ़ गए। सुरेंद्र के छोटे भाई भी वहीं पर थे। उन्होंने काला देवी के साथ हाथापाई करते हुए देखा तो वहाँ पर गए और उससे कहा कि आपने पी रखी है, आप यहाँ से जाओ। मगर इससे पहले ही मलीन नदाफ ने काला देवी के सिर पर मारने के बाद इतनी जोर से गला दबाया कि वह बेंच पर से नीचे गिर गईं।
मृतका काला देवी
उनके गिरने के साथ ही चीख-पुकार मच गई। उनको आँगन लाया गया। आँगन में काला देवी ने दो बार हिचकी ली और फिर वहीं पर दम तोड़ दिया। इसके बाद उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया, जहाँ पर डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। सुरेंद्र ने कहा, “आक्रोश तो हम लोगों में इतना था कि सोचे उसके घर में आग लगा देंगे, मार देंगे। लेकिन हम लोगों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। हम लोगों ने सब कुछ समाज के ऊपर छोड़ दिया कि वो लोग जैसा कहेंगे, वैसा ही करेंगे।”
इसके साथ ही उन्होंने बताया कि इधर वो लोग काला देवी को लेकर हॉस्पिटल गए और उधर वो तीनों फरार हो गए और 24 घंटे से ज्यादा बीतने के बाद भी प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पाई है। इतनी बड़ी घटना होने के बाद तो अब तक कार्रवाई हो जानी चाहिए। घटना के बाद सुरेंद्र ने तुरंत मुखिया को बुलाया और इसका समाधान करने के लिए कहा। उन्होंने कहा, “आज यहाँ पर दो मजहबी परिवार रहकर इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दे दिया। अगर यहाँ पर हिन्दुओं का सिर्फ दो परिवार होता तो ये लोग कब का उजाड़ कर मार दिए होते, घर में आग लगा दिए होते। लेकिन हम लोगों ने कभी उनके साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया। हमने कभी नहीं समझा कि ये लोग दूसरे समुदाय के हैं। आज हमारे साथ हुआ है। कल को किसी और के साथ हो सकता है।”
सुरेंद्र ने बताया कि घटना के बाद रात के 10-11 बजे पुलिस स्टेशन के बड़े बाबू को फोन कर जानकारी दी, लेकिन उनसे ठीक से बात नहीं हो पाई। इसके बाद उन्होंने 4 लोगों के साथ पुलिस स्टेशन जाकर तीनों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई। फिर प्रशासन घर पर आकर पूरी जानकारी लेकर गई। पुलिस ने सुलेमान से भी फोन पर बात की। सुलेमान से पुलिस ने आधे घंटे में आने की बात कही। सुरेंद्र ने यह भी बताया कि उन्होंने जब आरोपितों के घरवालों से सुलेमान के नंबर माँगे तो उन्होंने बोला कि उनके पास नंबर नहीं है, लेकिन जब पुलिस ने माँगी तो उनकी बहू ने नंबर दे दिया।
वहीं प्रशासन की तरफ से किसी तरह का मदद मिलने की बात पर सुरेंद्र ने बताया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद फिर से प्रशासन उनके घर पर आ गई और जल्दी से अंतिम संस्कार करने के लिए कहने लगी। लेकिन वो लोग भी अड़े थे कि जब तक उनको इंसाफ नहीं मिलेगा, वे अंतिम संस्कार नहीं करेंगे। इसके बाद थाने की तरफ से कहा गया कि आप शव का दाह-संस्कार कर दीजिए, जो भी प्रक्रिया होगी, वो बाद में होगी। मुखिया जय प्रकाश चौधरी ने अंतिम संस्कार के लिए 3,000 की राशि दी।
राष्ट्रीय जनता दल के स्थानीय विधायक फैयाज अहमद पर आरोपितों को बचने और मामला रफा दफा करने के लिए प्रशासन पर दबाब बनाने का आरोप लग रहा है। सुरेंद्र ने बताया , “हम लोगों को विधायक से किसी तरह की सहायता नहीं मिलती है। समुदाय विशेष के परिवारों को उनकी तरफ से हर तरह से सहायता मिलती है। उन लोगों को छोटी से छोटी समस्या होती है, तो तुरंत समाधान होता है, क्योंकि वे उनकी बिरादरी के हैं। उनके साथ कुछ भी होता है तो विधायक फ़ैयाज़ अहमद और सरपंच फकरे आलम की गाड़ी तुरंत पहुँच जाती है, लेकिन हमारे साथ इतनी बड़ी घटना हो गई कोई नहीं आया।”
इस संबंध में विधायक फैयाज अहमद का पक्ष जानने के लिए हमने कई बार संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया (बात होते ही हम उनके पक्ष से आपको अपडेट करेंगे।)। सुरेंद्र ने कहा, “वे उन दो परिवार (आरोपित)की हर समस्या में आते हैं और हमारे साथ इतना बड़ा कांड होने के बाद भी नहीं आए तो हम कैसे मान लें कि वे हमारे साथ हैं? आज अगर दूसरे मजहब के साथ कुछ होता तो विधायक फैयाज जी भी आते और फकरे आलम भी दौड़कर आता। लेकिन जब हमारे साथ हुआ तो कोई नहीं आया।”
सुरेंद्र ने सरपंच फकरे आलम पर सुलेमान नदाफ, मलील नदाफ और शरीफ नदाफ की मदद का आरोप लगाया है। उसने बताया की फरार होने से पहले आरोपित फकरे आलम के पास ही गए थे। फकरे आलम इस मामले में समुदाय के नाम न आने देने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। हालत देखते हुए प्रशासन की तरफ से मौके पर एक कोतवाल को तैनात किया गया है।
विहिप के जिलाध्यक्ष महेश प्रसाद और बीजेपी के विधानपार्षद सुमन महासेठ ने भी घटना की पुष्टि की है।हमने रहिका थाना प्रभारी के नंबर पर भी कई बार कॉल किया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।
कोरोना वायरस को देश के राज्य-राज्य तक पहुँचाने का काम करने वाले तबलीगी जमात के लोग अब प्रशासन की नाक में दम करने लगे हैं। अभी तक केवल इनके जगह-जगह छिपे होने की सूचना पाकर पुलिस इनकी तलाश कर रही थी। पर अब इन्होंने स्थिति ऐसी कर दी है कि प्रशासन इनकी पहरेदारी करने पर मजबूर है।
जानकारी के मुताबिक, जमातियों से जुड़ा नया मामला उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के खेकड़ा से आया है। जहाँ एक 60 वर्षीय बुजुर्ग सफीद मियाँ कोरोना पॉजिटिव होने के बावजूद अस्पताल की ख़िड़की से निकलकर भाग गया। इसने इस काम को अंजाम देने के लिए चादर और अपने कपड़ों की रस्सी बनाई और फिर उसी के सहारे खिड़की के रास्ते से उतरकर फरार हो गया।
पुलिस-प्रशासन को जब इसकी सूचना मिली तो उनमें हड़कंप मच गया। पुलिस ने उसे खोजने के लिए कई टीमों को लगाया और मंगलवार सुबह तक यानी 12 घंटे के भीतर उसे खोज निकाला।
नेपाल से आए इस जमाती को 3 अप्रैल को अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। यह कोराना पॉजिटिव मरीज दिल्ली से आई 17 नेपालियों की जमात में शामिल था, जो रटौल गाँव के एक मदरसे मे ठहरा हुआ था। जाँच में इसकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। पिछले चार दिनों से इसका बागपत जिले के खेखड़ा सीएचसी में इलाज चल रहा था। मगर, सोमवार की रात ये सबको चकमा देकर भाग गया।
मेरठ जोन के आईजी प्रवीण कुमार ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि नेपाली बुजुर्ग रात को ही भागा था। उसकी खोज में कई टीमें लगाई गईं थी आखिरकार वह एक गाँव के पास बने ईंट के भट्ठे से पकड़ा गया। जिसके बाद उसे दोबारा अस्पताल भेज दिया गया।
बता दें अपराधियों की तरह अस्पताल से फरार हुए इस नेपाली बुजुर्ग के भागने की खबर सुनते ही एसएसपी बागपत ने आसपास के सभी जिलों में कोरोना पाॅजिटिव की तलाश के लिए लोगों से अपील की थी। एसएसपी के निर्देश पर जारी अपील में लिखा था कि अस्पताल से भागे कोरोना पाॅजिटिव नेपाल के सुनसारी निवासी 60 वर्षीय जमाती सफीद मियाँ का उपचार सीएचसी खेकड़ा में चल रहा था। यह उपचार के दौरान अस्पताल से भाग गया है। यह व्यक्ति जिन-जिन लोगों से मिला उन्हें जानलेवा कोरोना वायरस से संक्रमित कर देगा। जिस कारण इस व्यक्ति का उपचार होना अत्यधिक आवश्यक है।
दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में शामिल हुई 5 महिलाओं को उत्तरप्रदेश के कुशीनगर से ढूँढ निकाला गया है। खुफियाँ एजेंसियों से इनपुट मिलने के बाद इनकी तलाश यहाँ शुरू हुई थी। मगर, कल देर रात जाकर पुलिस को इन्हें खोज निकालने में सफलता मिली।
बता दें, पाँचों औरतों के अलावा पुलिस ने इनके शौहरों को भी हिरासत में लिया है। इनमें से 2 लोगों को परसों चिह्नित किया गया था और 3 को कल सुबह पकड़ा गया। पतियों के गिरफ्तारी के बाद भी ये महिलाएँ पुलिस से छिपी हुईं थी। लेकिन कल रात इन्हें भी धर पकड़ा गया। पुलिस के अनुसार ये सभी असम के निवासी हैं। जो 9 मार्च को मरकज़ से निकले और कुशीनगर में जाकर छिप गए।
कुशीनगर के पुलिस अधीक्षक के अनुसार, “एक ईमेल आया था, जिसमें ये सूचना थी कि असम के रहने वाले 10 लोग दिल्ली के जमात में शामिल होकर 9 मार्च को वहाँ से निकले थे। वे जनपद कुशीनगर में छिपे हो सकते हैं। पहले जब सूचना के आधार पर तलाशी कराई गई, तो ये लोग नहीं मिल पाए। बाद में इनके पीछे सूचना तंत्र और विश्वासपात्र लोगों को लगाया गया। जिससे 2 लोग पकड़ में आए और इनको चिह्नित करके क्वारंटाइन कराया गया। बाद में 3 व्यक्ति पकड़े गए। उन्हें भी एंबुलेंस से भिजवाकर क्वारंटाइन कराया गया। इसके बाद पाँच महिलाएँ शेष थीं। पर उन्हें भी (रात में) चिह्नित करते सेंटर भेजा गया।”
?जनपद कुशीनगर में दिल्ली के जमात से फरार 10 जमाती चिन्हित करके कोरेंटाइन एवं अन्य आवश्यक कार्यवाही हेतु अस्पताल भेजे गए। अभियोग पंजीकृत कर पुलिस द्वारा विधिक कार्यवाही जारी तथा शरणदाताओं पर भी अभियोग पंजीकृत, जिसके सम्बन्ध में पुलिस अधीक्षक कुशीनगर की बाइट.. @Uppolicepic.twitter.com/7djIFAmfYA
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, देर रात पकड़ी गई इन औरतों की पहचान राहिमा खातून, शकीना खातून, जाहूरा खातून, रजीफा खातून व एफ खातून के रूप में हुई है। अब इन्हें और इनके पतियों को अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कराया गया है। सभी के सैंपल जाँच के लिए गोरखपुर भेजे गए हैं। रिपोर्ट आने के बाद इनपर आगे की कार्रवाई होगी।
खबर के अनुसार, इन महिलाओं को सोमवार देर रात नगर से सटे गाँव अमवा जंगल में उसी मकान से पकड़ा गया जहाँ दो दिन पूर्व दो जमाती पकड़े गए थे। बाद में पता चला कि ये महिलाएँ पकड़े गए जमातियों की खातूनें हैं। पुलिस ने महिलाओं के पकड़े जाने के बाद इनके ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज कर लिया और फिर जाँच के लिए जिला अस्पताल भेज दिया।
एसपी कुशीनगर विनोद कुमार मिश्र ने बताया कि जमाती दिल्ली से 9 मार्च को कुशीनगर के लिए चले। 11 मार्च को हाटा के एक हाजी ने उन्हें शरण दी। लॉकडाउन होने के बाद वहीं इन्हें अलग-अलग गाँवों में अपने मददगारों के जरिए शरण दे रहा था। उनके मुताबिक सभी के सैंपल जाँच के लिए भेजे गए हैं। यदि जाँच रिपोर्ट पॉजिटिव आई तो इन सभी पर कोरोना अपराधी का भी केस दर्ज किया जाएगा।
यहाँ बता दें 2 दिन पहले यानी रविवार रात को पुलिस ने अमवा गाँव के जंगल स्थित एक मकान में छापेमारी कर हाशिम तथा यशोधर अली को पकड़ उन्हें जाँच के लिए जिला अस्पताल भेजा था। पूछताछ में मालूम हुआ था दोनों मरकज में शामिल होने के बाद हाटा फिर पडरौना पहुँचे थे। इसके बाद पुलिस ने जमातियों व उनके मददगारों सलाउद्दीन, साहिल, खुदाद्दीन, शाकिर अली व हाजी हमीद के विरुद्ध धारा 188, 269, 271 आइपीसी व 51 बी आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया था।
फिर, सोमवार शाम को ही नेबुआ-नौरंगिया थाने के गाँव पटेरा बुजुर्ग से भी दो जमाती पकड़े गए। इनकी पहचान अब्दुल सलाम व फकरूद्दीन के रूप में हुई। दोनों ने पुलिस के सामने निजामुद्दीन मरकज में शामिल होने की बात स्वीकार की। दोनों के साथ रहे एक अन्य जमाती ऐनुलहक ने देर शाम पडरौना कोतवाली में पहुँच खुद के मरकज में शामिल होने की जानकारी दी। उसने बताया था कि वह भटक गया है। पुलिस की जाँच में पाँचों के तार आपस में जुड़े मिले।
कॉन्ग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने कोरोना महामारी से लड़ने के लिए स्थापित किए गए PM केयर्स के अंतर्गत अब तक जमा हुई संपूर्ण धनराशि को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) में ट्रांसफर करने के लिए प्रधानमंत्री से कहा है। सोनिया गाँधी के अनुसार बेहतर पारदर्शिता, जवाबदेही के लिए यह कदम उठाया जाना बेहद जरूरी है।
Transfer all money under ‘PM Cares’ fund to ‘Prime Ministers National Relief Fund’ for efficiency, transparency, accountability: Sonia to PM
भले ही सोनिया गाँधी का यह बयान सामान्य लग रहा हो, लेकिन ऐसे समय में जब देश एक वैश्विक महामारी से निपटने की कोशिश कर रहा है, यह बयान राजनीति से प्रेरित है। इस संदर्भ में बताना जरूरी है कि PMNRF हमेशा एक प्रबंधन समिति की देखरेख में संचालित होता है, जो जमा हुई धनराशि का नियोजन प्रधानमंत्री के विवेकानुसार सुनिश्चित करती है। बता दें कि पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा PMNRF की स्थापना के समय से लेकर आज तक इसकी प्रबंध समिति में कॉन्ग्रेस पार्टी का अध्यक्ष भी हमेशा शामिल रहता है, जो कि वर्तमान में सोनिया गाँधी हैं।
PMNRF की स्थापना के समय निम्नलिखित लोगों को प्रबंध समिति में शामिल किया गया था
i) प्रधानमंत्री ii) भारत की राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष। iii) उप प्रधानमंत्री। iv) वित्त मंत्री। v) टाटा ट्रस्टीज़ का एक प्रतिनिधि। vi) फिक्की द्वारा चुने जाने वाले उद्योग और वाणिज्य का प्रतिनिधि।
यहाँ तक की 1985 में राजीव गाँधी कार्यकाल के दौरान इस कोष की मैनेजिंग कमेटी ने कोष के प्रबंधन से संबंधित सभी अधिकार प्रधानमंत्री को सौंप दिए। प्रधानमंत्री को अधिकार मिल गया कि वह अपने प्रतिनिधि के रूप में किसी को ‘कोष का सचिव’ नियुक्त कर सकते हैं जिसके पास अन्य बातों के अलावा इस कोष के बैंक अकाउंट संचालित करने का भी अधिकार था।
वुहान कोरोना वायरस के इस संकट के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने PM CARES फंड लॉन्च किया है, जिसमें सहयोग करने के लिए उन्होंने पूरे देश का आह्वाहन किया है। यह एक आपातकालीन कोष है जिसका उपयोग कोरोना वायरस से निपटने के लिए किया जाएगा। PM CARES यानी ‘प्राइम मिनिस्टर सिटीजन्स असिस्टेंस एंड रिलीफ इन इमरजेंसी सिचुएशन’ कोष की स्थापना पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में की गई है। प्रधानमंत्री जहाँ इस ट्रस्ट के चेयरमैन हैं, वहीं देश के रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री तथा गृह मंत्री इस ट्रस्ट के सदस्य हैं।
जैसे ही यह कोष लॉन्च हुआ, देश के हर ख़ास ओ आम से इसे अपार सहयोग मिलना प्रारम्भ हो गया। जिसमें आम जनता से लेकर उद्योगपतियों फिल्म स्टार्स आदि ने अपना अपना अंशदान करना शुरू कर दिया। यहाँ ये सवाल लगातार पूछा जा रहा कि आखिर PM CARES फंड नामक नए फंड की जरूरत क्या थी जब कि PMNRF मौजूद था ही।
यह दिलचस्प है कि सोनिया गाँधी पीएम केयर्स में अब तक जमा हुई धनराशि ₹6500 करोड़ को PMNRF में ट्रांसफर करने की माँग करेंगी, जबकि पीएम केयर्स सिर्फ कोरोना महामारी से लड़ने के लिए स्थापित किया गया है और PMNRF हर एक आपदा से निपटने के लिए बनाया गया है।
शायद ऐसा इसलिए है, क्योंकि PMNRF सीधे प्रधानमंत्री के नियंत्रण में है और सोनिया गाँधी को उम्मीद है कि भविष्य में एक दिन देश का पीएम गाँधी परिवार से ही होगा। इस तरह यह धनराशि पीएम के नियंत्रण में होगी। यह कहना गलत नहीं होगा कि पीएम केयर्स PMNRF की तुलना में कहीं अधिक उचित और पारदर्शी है।
संक्षेप में PM CARES, PMNRF की तुलना में कहीं ज्यादा पारदर्शी और सक्षम है हालाँकि, PMNRF भी समय-समय पर नागरिकों की मदद के लिए आगे आता रहा है। यहाँ यह भी बताते चलें कि PM CARES में 13 विशेषज्ञों को भी शामिल करने का प्रावधान है जो अपनी सेवाएँ देश के लिए निःशुल्क प्रदान करेंगे। इसमें सलाहकारी बोर्ड के तौर पर भी 10 व्यक्तियों को शामिल करने की व्यवस्था है, जिन्हें ट्रस्टीज द्वारा डॉक्टरों, स्वास्थ्य सेवा प्रोफेशनलों, अकादमिक जगत के लोगों, अर्थशास्त्रियों और वकीलों में से चुना जाएगा।
वरिष्ठ अधिकारी ने इकनॉमिक टाइम्स को बताया कि “PMNRF के विपरीत, पीएम केयर्स में ट्रस्टियों की जिम्मेदारी परिभाषित की गई है। PMNRF में सलाहकार बोर्ड का कोई प्रावधान नहीं है। इसमें ट्रस्ट के सदस्यों के रूप में प्रधानमंत्री, उप प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और टाटा ट्रस्ट के प्रतिनिधि और फिक्की का चुना गया उद्योग प्रतिनिधि हैं।”
बीजेपी के एक सीनियर नेता ने PM CARES पर कॉन्ग्रेस के विरोध को खुद के स्वार्थों से प्रेरित बताते हुए कहा कि वे सिर्फ इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि PM CARES में PMNRF की भाँति कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को जगह नहीं दी गई है। बीजेपी नेता ने आगे कहा, ”इस फंड में बीजेपी से भी कोई नहीं है- ट्रस्ट में जो भी लोग हैं वो सरकार में अपनी पोजीशन की वजह से हैं।” उन्होंने आगे कहा कि पीएम केयर्स का उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल या किसी अन्य प्रकार की आपातकालीन आपदा जैसे कि संकट में राहत या सहायता और मानव निर्मित या प्राकृतिक आपदाओं के बीच स्वास्थ्य एवं दवा जैसी सुविधाएँ शामिल हैं।