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‘फारूख अब्दुल्ला ने कब हमारी परवाह की, जो हम उसकी रिहाई पर खुश हों’ – J&K के स्थानीय लोग

सात महीने बाद हुई फारुख अब्दुल्ला की रिहाई से जम्मू-कश्मीर के लोग खुश नहीं हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई खुशी की बात नहीं है। वहीं नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने अपनी नजरबंदी से रिहाई के बाद गुप्कार रोड स्थित अपने आवास के बाहर इंतजार कर रहे मीडियाकर्मियों से शुक्रवार को कहा, ”मैं आजाद हूँ… मैं आजाद हूँ।

शुक्रवार को जब अब्दुल्ला 7 महीनों बाद अपनी पत्नी मौली और बेटी साफिया के साथ बाहर आए तो मीडिया के सामने बात करते हुए सहज दिखाई दिए। जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा पीएसए हटाया जाना लोगों के लिए एक कौतूहल का विषय रहा, जिसके तहत फारुख अब्दुल्ला पिछले 7 महीनों से अपने ही घर में नजरबंद थे।

मीडियाकर्मियों के अब्दुल्ला के आवास पर पहुँचने से पहले तक वहाँ मौजूद स्थानीय लोग और पुलिसकर्मी फारुख की रिहाई की खबर से बेखबर थे। इसी बीच वहाँ मौजूद पुलिस के एक अधिकारी ने पत्रकारों को अब्दुल्ला के आवास से पीछे की ओर हटाते हुए कहा, “हमें उनके नजरबंदी आदेश के निरस्त होने की जानकारी नहीं थी, अगर हमें पहले से पता होता तो हम मीडियाकर्मियों को अब्दुल्ला के आवास के इतने नजदीक आने ही नहीं देते।”

इसके बाद स्थानीय निवासियों ने अपने घरों के बाहर हँगामा होता हुआ देखकर इसके कारणों के बारे में जानना शुरू किया। जानकारी मिलते ही नेशनल कॉन्फ्रेस के कुछ समर्थक भी मौके पर पहुँच गए। इनमें से एक पार्टी के हल्का अध्यक्ष मोहम्मद हुसैन ने कहा “मैं अपने नेता की एक झलक देखना चाहता हूँ। मैंने पिछले कई महीनों से उन्हें नहीं देखा है।” इसी बीच पुलिस ने दो समर्थकों को संदिग्ध दिखाई देने पर हिरासत में ले लिया, हालाँकि दोनों को थोड़ी देर बाद ही छोड़ दिया गया।

वहीं फारुख अब्दुल्ला की सात महीने बाद हुई रिहाई के बाद भी अधिकांश स्थानीय लोग उत्साहित नहीं दिखे। पास में खड़े एक रिक्शा चालक ने कहा कि ये कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि फारुख अब्दुल्ला ने स्थानीय निवासियों की कभी कोई परवाह ही नहीं की है।

वहीं मौजूद एक युवा कद्दावर नेता फारुख की रिहाई से असहमत दिखा और अपना नाम न छापने की शर्त बोला “उनको राजनीति से दूर होने के लिए यह अच्छा समय है क्योंकि अब उनके करने के लिए कुछ नहीं बचा है और सब कुछ अब लेफ्टिनेंट गवर्नर के हाथ में है।” उत्तरी कश्मीर के निवासी जावेद अहमद ने कहा, “अब्दुल्ला की रिहाई का कश्मीर में जश्न मनाने का कोई औचित्य नहीं है, क्या वह अब आजादी की माँग रख पाएँगे, जिसको नेशनल कॉन्फ्रेस वर्ष 1953 से उठाती रही है।”

दरअसल, घाटी में अनुच्छेद-370 के कुछ प्रावधानों को निरस्त करने के बाद अगस्त 05, 2019 को फारूक अब्दुल्ला को उनके ही घर पर नजरबंद किया गया था। करीब 7 महीने बाद सरकार ने उनकी नजरबंदी को खत्म किया है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 के कुछ प्रावधानों को निष्क्रिय करने और विशेष राज्य का दर्जा समाप्त होने के बाद से घाटी में किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए वहाँ के स्थानीय नेताओं को नजरबंद कर लिया गया था। इनमें फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और सज्जाद लोन सहित कई अन्य नेता शामिल थे।

इंडोनेशिया-दुबई-पाकिस्तान-लश्कर-ए-तैयबा… दिल्ली हिन्दू-विरोधी दंगों की फंडिंग का इंटरनेशनल कनेक्शन

भारतीय जाँच एजेंसियों ने दिल्ली दंगों के नाम पर धन जुटाने के लिए इंडोनेशिया के एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) को चिन्हित किया है। इस NGO का पूर्व में पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा की तथाकथित चैरिटी विंग फलाह-ए-इन्सानियत (FIF) के साथ लिंक था। 

यह पैसा 24-25 फरवरी को दिल्ली में हुए दंगों के दौरान पीड़ित मुस्लिमों को भेजा जाना था। हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक ये पैसे उन मुस्लिमों को भेजे जाने थे, जो या तो इन दंगों में अपने परिवार के सदस्य को खो देते, घायल हो जाते या फिर जिनकी संपत्तियाँ नष्ट हो जाती। बता दें कि इन दंगों में 53 लोग मारे गए थे, जबकि 500 से अधिक घायल हो गए थे।

जानकारी के मुताबिक यह धन दिल्ली दंगों के नाम पर और इंटरनेट पर उपलब्ध फोटो और मैसेज को प्रोपेगेंडा की तरह इस्तेमाल करके जुटाए गए थे। यह धन हवाला के जरिए दुबई से भारत भेजा जा रहा था।

इसका खुलासा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संसद में दिए बयान के बाद हुआ है। अमित शाह ने संसद में कहा था कि दिल्ली में दंगा भड़काने के लिए विदेशों से पैसे भेजे गए थे। उन्होंने बताया कि दंगे से पहले धन बाँटने के लिए पाँच लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसके साथ ही अमित शाह ने कहा कि कुछ सोशल मीडिया अकाउंट ऐसे थे, जो दंगों से पहले शुरू किए गए और हिंसा के बाद बंद कर दिए गए। इनसे दंगा, नफरत और घृणा फैलाने का काम किया गया। 

उन्होंने कहा, “दिल्ली में हुए दंगों की जाँच पड़ताल में सोशल मीडिया में 60 ऐसे अकाउंट मिले हैं, जो 22 फरवरी को शुरू हुए और 26 फरवरी को बंद हो गए। अगर ये लोग सोचते हैं कि अकाउंट बंद करके वो बच जाएँगे तो मैं बता दूँ कि वो जहाँ पर भी हैं, पुलिस उनको ढूँढ निकालेगी।”

मिली जानकारी के मुताबिक इंडोनेशिया स्थित यह NGO दिल्ली दंगा पीड़ितों को 25 लाख रुपए भेजने की कोशिश में था। इसके लिए संस्था के ट्रस्टी ने दिल्ली के स्थानीय मुस्लिम संस्थानों से संपर्क भी किया था, ताकि वो उनको सहायता प्रदान कर सकें। 

बता दें कि यह NGO अपने ट्विटर हैंडल और अन्य प्लेटफार्मों के माध्यम से दंगा से संबंधित चुनिंदा फोटो एवं मैसेज को अपने प्रोपेगेंडा के हिस्से के रूप में प्रसारित कर रहा है। इसके अलावा यह NGO इंडोनेशिया से एक टीम को भी भेजने की योजना बना रहा है, ताकि ये यहाँ पर आकर उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की समीक्षा कर सके और ‘पीड़ितों’ को आर्थिक मदद दे सके।

इस NGO को एक अत्यधिक कट्टरपंथी ग्रुप माना जाता है और संस्था अपनी इस्लामी प्रसार के हिस्से के रूप में विभिन्न देशों में मुस्लिम समुदायों को आर्थिक सहायता प्रदान करता है। इसने म्यांमार की सीमा के पास सांप्रदायिक झड़पों के बाद बांग्लादेश में कॉक्स बाजार में विस्थापित रोहिंग्याओं के लिए एक शिविर भी स्थापित किया था।

इसके अलावा इस NGO ने 2015 में लश्कर के मूल संगठन जमात-उद-दावा (JUD) को इंडोनेशिया के बांदा आचे क्षेत्र में रोहिंग्या शिविरों में बाहरी गतिविधियों को अंजाम देने में भी मदद की थी। NGO के इस तरह की गतिविधियों के फोटोग्राफिक रिकॉर्ड इनके ट्विटर हैंडल पर उपलब्ध हैं। यह इस तथ्य को दर्शाता है कि लश्कर ए तैयबा रोहिंग्या समुदाय और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच अपना विस्तार बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

कोरोना वायरस से भारत में दूसरी मौत: सरकार ने उठाए अहम कदम, अमेरिका में भी आपातकाल की घोषणा

राजधानी दिल्ली में कोरोना वायरस से पीड़ित एक 68 वर्षीय बुजुर्ग महिला मरीज की मौत हो गई है। स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना वायरस की वजह से मौत की पुष्टि की है। जानकारी के मुताबिक मृतक महिला राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती थी। संक्रमित महिला का इलाज दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में चल रहा था, जहाँ शुक्रवार (मार्च 13, 2020) को उसने दम तोड़ दिया। महिला को डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर की भी समस्या थी। 

ये महिला उस संक्रमित व्यक्ति की माँ थीं, जो स्विट्जरलैंड और इटली होते हुए भारत आया था। 8 मार्च को मृतक महिला के सैंपल लिए गए थे और 9 मार्च को उनकी हालत बिगड़ गई थी। शुरुआत में महिला को निमोनिया हुआ फिर साँस लेने में दिक्कत होने लगी। इसके बाद उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया और वेंटीलेटर पर रखा गया था। महिला में कोविड-19 का संक्रमण भी पाया गया था। 13 मार्च को हालत और ज्यादा बिगड़ने के बाद महिला की मौत हो गई।

कोरोना के संक्रमण से भारत में यह दूसरी और दिल्ली में पहली मौत है। इससे पहले कर्नाटक के कलबुर्गी में 76 वर्षीय शख्स की मौत हुई थी। उनकी मौत मंगलवार (मार्च 10, 2020) को हुई थी, लेकिन उसके कोरोना वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि गुरुवार (मार्च 12, 2020) को हुई। भारत में कोरोना वायरस से करीब 82 मामले सामने आ चुके हैं।

कोरोना के संक्रमण में तेजी से बढ़त को देखते हुए देश के कई राज्‍यों में स्‍कूलों को बंद करने का ऐलान कर दिया गया है। इस क्रम में राजधानी दिल्‍ली, उत्‍तराखंड, छत्‍तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, हरियाणा, बिहार, उत्‍तर प्रदेश, राजस्थान और मणिपुर ने गुरुवार को राज्‍यों में तमाम स्‍कूलों और कॉलेजों को एहतियातन बंद करने का ऐलान कर दिया। देश भर में इस वायरस के कारण संक्रमण की संख्‍या में इजाफे को देखते हुए यह फैसला लिया गया है।

कोरोना वायरस के खतरे के मद्देनजर आईआईटी दिल्ली ने अपने सभी छात्रों को 15 मार्च की आधी रात तक हॉस्टल खाली करने का आदेश दिया है। हॉस्टल प्रशासन ने कहा है कि छात्र घर जा सकते हैं और सुरक्षित रह सकते हैं। इसके साथ ही आईआईटी दिल्ली में पठन-पाठन से जुड़ी सारी गतिविधियों को अगले आदेश तक रोक दिया गया है। इससे पहले शुक्रवार को ही जेएनयू, जामिया और दिल्ली विश्वविद्यालय को भी 31 मार्च तक बंद कर दिया गया है। इसके अलावा आज से भारत-बांग्लादेश की बस और ट्रेन सर्विस बंद कर दी जाएगी।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने कोराना वायरस के संकट को देखते हुए राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। अमेरिकी सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए किए जा रहे प्रयासों के तहत 50 अरब अमेरिकी डॉलर का संघीय कोष भी जारी किया है। देर रात स्पेन ने भी राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारतीय समयानुसार शुक्रवार देर रात एक बजे एक प्रेस कांफ्रेंस में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोरोना वायरस को लेकर कहा, “आने वाले कुछ हफ्तों में हम सभी को कुछ बदलाव और बलिदान करने होंगे, लेकिन इन अल्पावधि बलिदानों से लंबे समय के लिए लाभ मिलेंगे। अगले 8 हफ्ते महत्वपूर्ण हैं।” डोनाल्ड ट्रंप ने खुद भी जाँच करवाने की बात कही है।

भारत सरकार ने इससे निपटने के लिए कुछ कदम उठाए हैं। जैसे कि कोरोना वायरस प्रभावित देशों से आने वाले भारतीय नागरिकों की एयरपोर्ट और बंदरगाहों पर यूनिवर्सल स्क्रीनिंंग की जा रही है और उन्हें निगरानी में रखा जा रहा है। इसके अलावा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पर्याप्त मात्रा में सामुदायिक निगरानी, आइशोलेशन, वार्ड, पर्याप्त पीपीई वगैरह की व्यवस्था की गई है। 

मालदीव, म्यांमार, बांग्लादेश, चीन, अमेरिका, मेडागास्कर, श्रीलंका, नेपाल, दक्षिण अफ्रीका और पेरू के 1031 व्यक्तियों को देश से निकाला गया है। भारत ने कोरोना वायरस से प्रभावित देशों से अपने नागरिकों को वापस लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ईरान में फँसे भारतीयों को लाने के लिए वायुसेना की कई उड़ानें भरी गई। वहाँ पर वैज्ञानिकों को लैब इक्विपमेंट के साथ भेजा गया। वो वहाँ से टेस्टिंग के लिए 1199 सैंपल लेकर भारत आए। इसके साथ ही डॉक्टरों की एक टीम को पर्याप्त मेटेरियल के साथ रोम भेजा गया, ताकि वो वहाँ के भारतीयों का सैंपल ले सकें और फिर उसकी जाँच कर सकें।

बता दें कि अभी तक 30 एयरपोर्ट के 10,876 उड़ानों से 11,71,061 यात्रियों की स्क्रीनिंग की गई है। इसके अलावा सामुदायिक निगरानी के तहत 42,296 यात्रियों को भारत लाया गया है। 2,559 संक्रमित यात्रियों को आइशोलेशन वार्ड में रखा गया, जबकि 522 यात्रियों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसमें 17 विदेशी नागरिक भी थे। लैंड पोर्ट पर 14 लाख से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग की गई है।

‘जय श्रीराम वाली भीड़ ने की अंकित की हत्या’ – इस खबर वाले फिरंगी पत्रकार को देश से निकालने पर कंफ्यूजन दूर

भारत के विदेश मंत्रालय ने वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार के खिलाफ आई उस शिकायत पर अमेरिका स्थित अपने संबंधित अधिकारी को गौर करने को कहा है, जिसमें उसे भारत से तुरंत निकाल देने की बात कही गई थी। वॉल स्ट्रीट जर्नल के साउथ एशिया ब्यूरो के डिप्टी चीफ एरिक बेलमैन नामक इस पत्रकार ने दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों के बारे में झूठी और भ्रामक रिपोर्टिंग की थी।

भारतीय विदेश मंत्रालय की इस पहल के बाद नेशनल पब्लिक ब्रॉडकास्टर प्रसार भारती ने अपने आधिकारिक पेज से कुछ ट्वीट्स, किए जिनमें यह दावा किया गया कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने अमरिका स्थित भारतीय दूतावास से वॉल स्ट्रीट जर्नल के इस रिपोर्टर को भारत से तुरंत डिपोर्ट करने के मामले में कुछ करे, जिसका बाद में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने खंडन किया।

मीडिया खबरों के अनुसार इस मुद्दे पर शुक्रवार देर शाम प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि बेलमैन के खिलाफ यह शिकायत सरकार के ऑनलाइन शिकायत निवारण प्लेटफॉर्म ‘ऑनलाइन ग्रीवांस रिड्रेसल प्लेटफॉर्म’ पर एक व्यक्ति ने निजी हैसियत से की। रवीश कुमार ने आगे कहा कि संबंधित विभाग को शिकायत फॉरवर्ड करना एक रूटीन प्रक्रिया है और इस जर्नलिस्ट के डिपोर्टेशन पर विदेश मंत्रालय ने कोई फैसला नहीं लिया है। जिसके बाद प्रसार भारती ने अपने ट्वीट्स हटा लिए।

इस विदेशी पत्रकार की शिकायत ‘लीगल राइट्स ऑब्ज़र्वेट्री’ नामक एक्टिविस्ट ग्रुप ने की थी। याद रहे कि विदेशी मीडिया पोर्टल ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ)’ ने अपने लेख में लिखा था कि अंकित के भाई अंकुर ने उसे बताया कि ‘जय श्री राम’ बोलते हुए आई भीड़ ने अंकित की हत्या कर दी। बाद में अंकित के भाई अंकुर ने प्रोपेगेंडा पोर्टल की इस ख़बर को नकार दिया था। अंकुर ने ऑपइंडिया से बात करते हुए स्पष्ट कहा था कि डब्ल्यूएसजे में उनके हवाले से जो बातें लिखी है, वह उन्होंने कही ही नहीं है।

अंकुर ने ऑप इंडिया को बताया था कि गुरुवार (फरवरी 25, 2020) को उनके भाई अंकित ड्यूटी से लौट कर बाइक पार्क करने के बाद मोहल्ले के लोगों से बातचीत करने निकल गए थे। उन्होंने कहा था कि वे इलाक़े के लोगों को जानते हैं और दंगा रोकने में कामयाब होंगे। परिवार के लाख मना करने के बावजूद अंकित हिन्दुओं और मुस्लिमों- दोनों से ही बातचीत करने और उन्हें समझाने निकल गए। हालाँकि, हिन्दुओं ने तो अंकित की बात मान ली लेकिन मुस्लिम समुदाय शांति के लिए राजी नहीं हुआ। तभी ताहिर हुसैन के इमारत से पत्थरबाजी शुरू हो गई और मुस्लिम भीड़ ने अंकित को पकड़ कर घसीटना शुरू कर दिया। वे उन्हें पकड़ कर हुसैन की इमारत में ले गए थे।

दिल्ली दंगों में जिन मुस्लिमों को गिरफ्तार किया, उन्हें रिहा करो: कानूनी प्रक्रिया में शाहीन बाग की भीड़ का दबाव

दिल्ली में करीब तीन महीने पहले सीएए विरोध के नाम पर शुरू हुए धरना प्रदर्शन से एक नई माँग उठी है। वह यह कि दिल्ली दंगों में गिरफ्तार किए गए मुस्लिमों को रिहा किया जाए।

शाहीन बाग में प्रदर्शन कर रहे लोगों ने शुक्रवार देर रात एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अपनी एक नई माँग मीडिया के माध्यम से सरकार के सामने रख दी। प्रदर्शनकारियों ने पहले तो उसी पुरानी माँग को दोहराया और सरकार से CAA, NRC और NPR को वापस लेने की माँग की। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने इसकी आड़ में एक नई माँग और रख दी। वह ये कि हाल ही में हुए दिल्ली दंगों में जिन मुस्लिम लोगों को गिरफ्तार किया है, उन्हें रिहा किया जाए।

प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि सरकार के इशारे पर निर्दोष लोगों को भी दंगे का आरोपित बनाकर गिरफ्तार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अब तक दिल्ली हिंसा के नाम पर दो हजार से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि ये लोग दंगों में शामिल भी नहीं थे।

23 फरवरी को दिल्ली में शुरू हुई हिंसा के 19 दिन बाद शाहीन बाग से प्रदर्शनकारियों द्वारा गिरफ्तार आरोपित मुस्लिमों की रिहाई की माँग करना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। आरोपित की रिहाई कानूनी प्रक्रिया के तहत होती है, भीड़ की माँग पर नहीं। फिर आखिर क्या वजह है कि शाहीन बाग में धरने पर बैठी भीड़ आरोपितों को छोड़ने के लिए दबाव बना रही है?

इससे पहले हिंदू विरोधी दंगों में अंकित शर्मा की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किए गए AAP के निलंबित निगम पार्षद ताहिर हुसैन का भी शाहीन बाग से कनेक्शन सामने आया था। चॉंदबाग और खजुरी खास के लोगों का कहना था कि ताहिर लोगों को गाड़ियों में भरकर शाहीन बाग भेजता था। ‘TV9 भारतवर्ष’ के एक रिपोर्टर को एक चश्मदीद ने बताया था कि रात को उसने कई बार देखा था कि ताहिर हुसैन के घर के सामने टैक्सियों को हायर कर शाहीन बाग़ ले जाया जाता था। ये गाड़ियाँ हर रोज करीब 100 लोगों को और सामान को ताहिर हुसैन के घर से शाहीन बाग ले कर जाया करती थीं।

वहीं दिल्ली हिंसा के बाद शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने शाहीन बाग पर निशाना साधते हुए कहा था कि ये हिंसा शाहीन बाग में बैठी दादी और नानियों की जिहालत का नतीजा है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से हाथ जोड़कर अपील की थी कि कॉन्ग्रेसी जहर का प्याला लोग न पिएँ। आपस में लड़कर मरने वाले को कोई शहीद नहीं कहता। रिजवी ने इससे पहले यह भी कहा था कि शाहीन बाग का धरना हक माँगने की लड़ाई नहीं है, बल्कि हिंदुओं का हक छीनने की जिद है।

जब दुनिया उलझी हुई थी… तो भारत की तैयारी थी ऐसी: PM मोदी को वर्ल्ड लीडर इसलिए कह रहे Thank You

चीन के वुहान से शुरू हुआ कोरोना वायरस (Corona Virus – COVID-19) 122 देशों में पहुँच गया है। इसके संक्रमण से मरने वाले लोगों की संख्या 5000 को पार कर गई है और अब विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे महामारी घोषित कर दिया है।

चीन ने पूरे विश्व को यह संक्रमण दिया है या यूँ कहें कि चीन से पूरे विश्व में यह महामारी फैली। जहाँ अन्य देश इस संक्रमण से बहुत तेजी से बड़े स्तर पर प्रभावित हुए, वहीं भारत की कोरोना को लेकर तैयारियाँ अन्य देशों की तुलना में कहीं ज्यादा प्रभावी और कारगर रही हैं।

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है कि करीब दो महीने पहले, जनवरी के महीने से ही जब पूरा विश्व कोरोना को लेकर इतना सक्रिय नहीं था, भारत सरकार ने उसी समय से आने वाले और भारत से चीन जाने वालों पर सख्त निगरानी रखनी शुरू कर दी थी। यह तब की बात है, जब चीन के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार करीब 41 लोग संक्रमित पाए गए थे और एक की मौत हो चुकी थी।

4 फरवरी को, जब भारत को अपने पहले 2 संक्रमित व्यक्ति के बारे में पता चला था, तभी केंद्र सरकार ने इसको लेकर आपातकाल की स्थिति घोषित कर दी थी। ये दोनों संक्रमित व्यक्ति वो थे, जिन्हें वुहान से लाया गया था। और जब 4 मार्च को 10 और लोगों के संक्रमित होने की बात पता चली तब तक भारत के पास एक बड़ा टास्कफोर्स इससे निपटने को तैयार हो चुका था – इससे संबंधित लैब की संख्या तीन गुना बढ़ा दी गई थी, आवश्यक दवाओं के निर्यात पर रोक लगा दी गई थी।

इसके अलावा भारत सरकार ने दिल्ली, मुंबई और कोलकाता एयरपोर्ट पास विशेष तौर पर थर्मल स्कैनर के द्वारा यात्रियों की जाँच की। ख़ास बात यह है कि कोरोना वायरस के संक्रमण को लेकर सबसे ज्यादा उदासीनता यूरोप के देशों ने दिखाई और वर्तमान में इटली और ब्रिटेन जैसे देश इसकी चपेट में सबसे ज्यादा हैं। यहाँ तक कि ब्रिटेन की स्वास्थ्य मंत्री नदीन डॉरिस ने कहा है कि कोरोना वायरस संक्रमण के उनके टेस्ट का नतीजा पॉज़िटिव आया है।

इसके बाद पता चला है कि अब तक ब्रिटेन में कोरोना वायरस के कारण छह लोगों की मौत हो चुकी है और 373 मामलों में संक्रमण की पुष्टि हुई है। कोरोना वायरस को लेकर लापरवाही का नतीजा ही है कि अभी तक कई दिग्गज नेता और अभिनेता भी कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं। इनमें हॉलीवुड अभिनेता टॉम हैंक्स और उनकी पत्नी भी शामिल हैं।

यही नहीं, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की पत्नी सोफी वायरस से संक्रमित पाई गई हैं। इसके अलावा स्पेन की मंत्री इरीन मोंटेरो, ईरान के उप स्वास्थ्य मंत्री इराज हरीर्शी, ब्रिटेन की स्वास्थ्य मंत्री नडाइन डोरिस और ऑस्ट्रेलिया के गृह मंत्री पीटर डटन भी संक्रमित हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से एक हफ्ते मिला ब्राजीलियन अधिकारी भी संक्रमित पाया गया है।

वहीं भारत सरकार ने कोरोना वायरस को लेकर किसी भी प्रकार की ढील नहीं बरती और शुरुआत से ही निरंतर ट्रेवल एडवाइजरी से लेकर अभी तक संक्रमित पाए गए लोगों पर त्वरित चिकित्सीय देखरेख की। कोरोना वायरस प्रभावित देशों से आने वाले भारतीय नागरिकों की एयरपोर्ट और बंदरगाहों पर यूनिवर्सल स्क्रीनिंंग की जा रही है और उन्हें निगरानी में रखा जा रहा है। इसके अलावा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पर्याप्त मात्रा में सामुदायिक निगरानी, आइशोलेशन, वार्ड, पर्याप्त पीपीई वगैरह की व्यवस्था की गई है। 

मालदीव, म्यांमार, बांग्लादेश, चीन, अमेरिका, मेडागास्कर, श्रीलंका, नेपाल, दक्षिण अफ्रीका और पेरू के 1031 व्यक्तियों को देश से निकाला गया है। भारत ने कोरोना वायरस से प्रभावित देशों से अपने नागरिकों को वापस लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ईरान में फँसे भारतीयों को लाने के लिए वायुसेना की कई उड़ानें भरी गई। वहाँ पर वैज्ञानिकों को लैब इक्विपमेंट के साथ भेजा गया। वो वहाँ से टेस्टिंग के लिए 1199 सैंपल लेकर भारत आए। इसके साथ ही डॉक्टरों की एक टीम को पर्याप्त मेटेरियल के साथ रोम भेजा गया, ताकि वो वहाँ के भारतीयों का सैंपल ले सकें और फिर उसकी जाँच कर सकें।

बता दें कि अभी तक 30 एयरपोर्ट के 10,876 उड़ानों से 11,71,061 यात्रियों की स्क्रीनिंग की गई है। इसके अलावा सामुदायिक निगरानी के तहत 42,296 यात्रियों को भारत लाया गया है। 2,559 संक्रमित यात्रियों को आइशोलेशन वार्ड में रखा गया, जबकि 522 यात्रियों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसमें 17 विदेशी नागरिक भी थे। लैंड पोर्ट पर 14 लाख से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग की गई है।

इसके अलावा केंद्र सरकार ने बुधवार (मार्च 11, 2020) को कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने के उपायों के तहत 15 अप्रैल तक सभी वीजा रद करने की घोषणा की। एक आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, विदेशी राजनियकों, आधिकारिक, संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय संगठन और रोजगार परियोजनाओं को छोड़कर अन्य सभी वीजा 15 अप्रैल तक निलंबित रहेंगे।

कोरोना वायरस की चुनौती से निपटने के लिए हर स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। सरकारी स्तर पर जहाँ संदिग्धों की पहचान कर उन्हें आइसोलेशन में रखा जा रहा है वहीं बाहर से आने वाले लोगों पर भी कड़ी निगरानी रखी जा रही है। इसके लिए कई राज्यों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की पूरी टीम लगाई गई है। इसके लिए कोरेनटाइन बेड आरक्षित किए गए हैं।

दुनिया में अब तक 1,27,700 से ज़्यादा लोगों में COVID-19 के संक्रमण की पुष्टि हुई है। इटली में अब तक कोरोना वायरस के 10,149 मामले सामने आ चुके हैं और इस कारण 631 मौतें हो चुकी हैं। यदि अन्य देशों की तुलना में भारत के आँकड़ों को देखें तो भारत में अब तक कोरोना वायरस के 82 मामले सामने आए हैं। जिनमें से एक 76 साल के व्यक्ति और एक 68 साल की महिला की मौत हो चुकी है और 4 लोगों को इलाज के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। नए मामले केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के हैं।

इसके साथ ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (मार्च 13, 2020) को कोरोना वायरस के संकट को देखते हुए एक अहम प्रस्‍ताव दिया। उन्‍होंने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) देशों से इस वायरस के संक्रमण से निपटने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए चर्चा की अपील की। प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्‍ताव का SAARC के सदस्‍य देशों ने प्रशंसा किया और उन्‍हें धन्‍यवाद कहा।

भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम अन्य विकसित देशों की तुलना में कहीं बेहतर नजर आ रहे हैं। हालाँकि कम से कम कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ऐसा नहीं मानते हैं। लेकिन उन्होंने साथ ही यह भी स्पष्ट किया था कि उन्हें इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है लेकिन वो इसे लेकर भारत सरकार का विरोध करना चाहते हैं।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगा में बुर्का पहनकर पुलिस पर हमला करने वाली 6 महिलाओं की हुई पहचान, जल्द हो सकती है गिरफ्तारी

दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में पुलिस के हाथ अहम् जानकारी लगी है। क्राइम ब्रांच SIT ने चाँद बाग इलाके में हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल मर्डर केस, DCP अमित शर्मा और एसीपी अनुज कुमार पर हमले में शामिल 6 महिलाओं की पहचान की है।

एसआईटी जल्द ही इन महिलाओं को हिरासत में लेकर पूछताछ कर सकती है। इन महिलाओं के ठिकानों पर छापे मारे जा रहे हैं। बता दें कि करीब 70 से 80 महिलाएँ चाँद बाग इलाके में घटना के वक्त मौजूद दिखी हैं। जिसमे ज्यादातर महिलाओं ने पुलिस टीम पर हमला किया था। हमला करने वाली अधिकतर महिलाओं ने बुर्के पहन रखे थे, इसलिए उन्हें पकड़ना पुलिस के लिए मुश्किल हो रहा है। हालाँकि, मौके से मिले वीडियो फुटेज और सर्विलांस के जरिए 6 महिलाओं की पहचान कर ली गई है, जिनको लेकर पुलिस जल्द खुलासा और गिरफ्तारियाँ कर सकती है।

हिन्दू विरोधी दंगों में दिल्ली पुलिस दंगों में शामिल अपराधियों की तलाश में लगातार जुटी हुई है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के दौरान IB के अंकित शर्मा की निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई थी। इस मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने कल (मार्च 12, 2020) सलमान उर्फ मुल्ला उर्फ़ नन्हे को गिरफ्तार किया।

गिरफ्तारी के बाद मालूम चला कि मुल्ला ने न केवल अन्य दंगाइयों के साथ मिलकर अंकित शर्मा को ताहिर हुसैन के घर में खींचा, बल्कि उन्हें जान से मारने से पहले उनके मुँह पर काला  कपड़ा डाला और साथ ही उन्हें निर्वस्त्र भी किया। सलमान के मुताबिक दंगाइयों ने उनका मजहब जानने के लिए उनके कपड़े उतारे। धर्म पुख्ता कर उन्हें चाकूओं से गोद डाला।

सलमान नेबताया कि उसने खुद अंकित पर 14 बार चाकू से वार किए। सलमान ने पुलिस को पूछताछ में बताया, “हत्या करने वाले सभी लोगों कोपता था कि अंकित IB में काम करते हैं। साजिश कर उनकी हत्या की गई। पहले उन्हें घसीटकर ताहिर हुसैन के घर ले गए और फिर 1 दर्जन से भी ज्यादा लोगों ने चाकुओं से वार किया।”

इससे पहले, दिल्ली में हुए दंगों पर राज्यसभा में गुरुवार (मार्च 12, 2020) को जोरदार बहस हुई। इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाहने दिल्ली दंगों पर विपक्ष के सवालों के जवाब दिए। राज्यसभा में अमित शाह ने कहा कि दिल्ली में गहरी साजिश के तहत दंगा करायागया। उन्होंने कहा कि कुछ सोशल मीडिया अकाउंट्स ने दंगे के दौरान सिर्फ नफरत फैलाने का काम किया।

शाह ने कहा कि कुछ सोशल मीडिया अकाउंट ऐसे थे जो दंगों से पहले शुरू किए गए और हिंसा के बाद बंद कर दिए गए। इनसे दंगा, नफरत और घृणा फैलाने का काम किया गया। उन्होंने कहा, “दिल्ली में हुए दंगों की जाँच पड़ताल में सोशल मीडिया में 60 ऐसे अकाउंटमिले हैं जो 22 फरवरी को शुरू हुए और 26 फरवरी को बंद हो गए। अगर ये लोग सोचते हैं कि अकाउंट बंद करके वो बच जाएँगे तो मैंबता दूँ कि वो जहाँ पर भी हैं पुलिस उनको ढूँढ निकालेगी।”

मेरी सरकार से हाथ जोड़ के विनती है कि NRC-NPR वापस ले लें, मेरे पूरे परिवार के पास नहीं है जन्म प्रमाण पत्र: केजरीवाल

दिल्ली विधानसभा ने NPR और NRC के खिलाफ शुक्रवार (मार्च 13, 2020) को प्रस्ताव पारित किया। NPR और NRC पर चर्चा के लिए बुलाए गए एक दिवसीय विशेष सत्र में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार से इन्हें वापस लेने की भी अपील की।

अरविंद केजरीवाल ने प्रस्ताव पर बहस के दौरान कहा कि उनके परिवार और पूरी कैबिनेट के पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं हैं तो क्या सभी को NPR के तहत डिटेंशन सेंटर भेज दिया जाएगा? उन्होंने कहा कि ये डर सबको सता रहा है।

वहीं भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने केजरीवाल पर एक बार फिर झूठ बोलने का आरोप लगाया है। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “चुनाव जीतते ही झूठ शुरू। केजरीवाल जी का कहना है, उनके, उनकी वाईफ के, पूरी कैबिनेट के पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं। मतलब कोई भी दसवीं पास नही हैं? सब नौवीं फेल हैं? बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को बचाने के लिए कुछ भी करेंगे ये लोग। CAA और NPR तो लागू होकर रहेगा।”

एक और ट्वीट करते हुए कपिल मिश्रा ने लिखा कि केजरीवाल में हिम्मत थी तो चुनाव घोषणापत्र में लिखते कि CAA, NPR, NRC का विरोध करेंगे। उन्होंने कहा कि केजरीवाल दिल्ली की जनता की पीठ पे खंजर घोप रहे हैं।

केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली विधानसभा में 70 विधायक हैं, लेकिन सिर्फ 9 विधायकों ने कहा की उनके पास जन्म प्रमाण पत्र है। उन्होंने पूछा कि 90% लोगों के पास ये साबित करने के लिए कोई सरकारी जन्म प्रमाण पत्र नहीं है तो क्या सबको डिटेंशन सेंटर भेजा जाएगा?

उत्तर प्रदेश में दंगाइयों से हर्जाना वसूलने के लिए अध्यादेश लाएगी योगी सरकार, कैबिनेट ने लगाई मुहर

उत्तर प्रदेश सरकार और देश के सुप्रीम कोर्ट के बीच बढ़ते पोस्टर विवाद के बीच प्रदेश सरकार ने हिंसा अथवा दंगे के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को आगजनी या तोड़फोड़ के जरिए नुकसान पहुँचाने वालों के खिलाफ अध्यादेश लाने का फैसला किया है। आज शुक्रवार 13 मार्च को यूपी सरकार ने कैबिनेट की बैठक में ‘उत्तर प्रदेश रिकवरी फ़ॉर डैमेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट अध्यादेश-2020’ अध्यादेश के मसौदे को मंजूरी दे दी। संभावना जताई जा रहा कि इस अध्यादेश में नुकसान की वसूली के साथ ही सज़ा आदि का प्रावधान भी होगा। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कबीना मंत्री सुरेश खन्ना ने एक न्यूज़ एजेंसी को ये जानकारी दी।

याद रहे कि उत्तर प्रदेश में नए नागरिकता कानून के विरोध में 20 दिसंबर को हुई हिंसा के दौरान बड़े पैमाने पर आगजनी की गई थी जिसमें करोड़ों की सार्वजनिक व निजी संपत्ति को दंगाइयों ने नुकसान पहुँचाया था। प्रदेश सरकार ने इस नुकसान की भरपाई के लिए वसूली की प्रक्रिया शुरू की थी लेकिन उसमें मौजूदा कानूनों के तहत कुछ विधिक दिक्कतें आ रही थीं।

योगी सरकार ने हिंसा के आरोपितों के पोस्टर भी लगाए थे जिसे लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपत्ति जताते हुए पोस्टर हटाने के आदेश दिए थे। इसके खिलाफ प्रदेश सरकार फिलहाल सुप्रीम कोर्ट गई हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार के इस कदम को जायज करार देने से इंकार किया था और इस मामले को बड़ी बेंच को सौंप दिया था। इसी के बाद योगी सरकार ने इस संबंध में अध्यादेश लाने का निर्णय लिया है जिसे विधानसभा सत्र शुरू होने पर इस अध्यादेश को विधिक रूप दिया जाएगा।

गौरतलब है कि नए नागरिकता कानून के विरोध के नाम पर प्रदर्शनकारियों ने 19 दिसंबर को लखनऊ में हिंसा की घटना को अंजाम दिया था। इस दौरान दंगाइयों ने शहर में हिंसा फैलाते हुए सरकार की करोड़ों रुपए की सम्पत्ति को तहस-नहस कर दिया था। लखनऊ में 19 दिसंबर को हुई हिंसा के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डीजीपी ओपी सिंह ने कहा था कि वे हिंसा में किसी भी निर्दोष को हाथ नहीं लगाएँगे, लेकिन जिन्होंने हिंसा की है, उन्हें किसी कीमत पर नहीं छोड़ा जाएगा। उन्होंने यह भी कहा था कि प्रदेश में सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया है, उसकी भरपाई उपद्रवियों की संपत्ति से ही की जाएगी।

‘स्वामी’ चक्रपाणि की बकैती पर काशी विद्वत परिषद के मंत्री का बयान, जिसका मन होता है लाल कपड़ा पहनकर खुद को हिन्दू महासभा का अध्यक्ष बता देता है

अक्सर देखा जाता है कि भारतीय मीडिया हिन्दू विरोध से लेकर हिन्दुओं की धार्मिक आस्था का मजाक बनाने का एक भी मौका नहीं छोड़ना चाहता है। सोशल मीडिया के दौर में मीडिया को ऐसे अवसर बहुत मिल जाते हैं और मीडिया को उसे सनसनी बनाते देर नहीं लगती। इस बार मीडिया द्वारा तैयार की गई सनसनी का नाम है- चक्रपाणि महाराज।

मीडिया द्वारा चक्रपाणि महाराज नाम के किसी व्यक्ति को लगातार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष के रूप में सम्बोधित किया गया है। लेकिन काशी विद्वत परिषद की इस बारे में राय कुछ और ही है। ऑपइंडिया ने चक्रपाणि महराज की वास्तविकता जानने के लिए जब काशी विद्वत परिषद के डॉ. रामनारायण द्विवेदी से सम्पर्क किया तो उन्होंने चक्रपाणि महाराज को स्पष्ट शब्दों में तथाकथित महात्मा बताया।

ऑपइंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “ये गाजीपुर के रहने वाले श्रीवास्तव जी हैं, ये चक्रपाणि महराज कब और कैसे बन गए किसी को पता नहीं। इसी प्रकार से कई तथाकथित संत हमारे धर्म और हिंदुत्व को बदनाम करते आए हैं। गोमूत्र निश्चित रूप से कई सारी व्याधियों से सुरक्षा करता है। लेकिन कोरोना वायरस के उपचार जैसी बातें कर के इसका उपहास करना, हमें इस तरह से, इस तरह की हल्की बातें और मजाक करने से बचाना चाहिए। उनके पास ऐसी बात कहने का क्या आधार है? उन्हें बताना चाहिए अगर इस तरह की कोई रिसर्च उन्होंने की है और उसके बाद उन्होंने यह बात कही हो। इस तरह के ढोंगी लोगों से हमारे देश के लोगों को सावधान रहने की जरूरत है।”

उन्होंने कहा कि वो प्रधानमंत्री मोदी को भी इस सम्बन्ध में पत्र लिखने जा रहे हैं कि देश में जिसे मन होता है वो अपने नाम के साथ संत लगाकर देश में अनाचार-कदाचार फैलाते हैं, इन पर भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे फर्जी संतों से हिंदुत्व की बदनामी को रोकने के लिए जरुरी है कि इन तथाकथित संतों का भी प्रमाण पात्र हो, उनका अखाड़ा क्या है, उन्होंने किस परम्परा से दीक्षा ली है, इन सभी बातों की जानकारी के बाद ही कोई निर्णय लिया जाना चाहिए।

डॉ. द्विवेदी ने कठोर शब्दों में कहा कि जिसका मन हो रहा है वो लाल कपड़ा पहनकर संत बन रहा है और बाद में पूरा हिन्दू समाज बदनाम हो रहा है। प्रोफेसर राम नारायण द्विवेदी वर्तमान में काशी विद्वत परिषद में मंत्री हैं और इसके साथ ही काशी विश्वविद्यालय में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में प्रोफेसर के पद पर हैं।

एक अन्य कार्यकर्ता ने बताया कि चक्रपाणि महाराज जैसे ही कुछ लोगों के कारण हिन्दू महासभा अलग-अलग गुटों में बँट रही है और सभी खुद को महासभा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने को लेकर झगड़ा करते रहे हैं।

वास्तव में चक्रपाणि महाराज जैसी हस्तियाँ सिर्फ वामपंथी मीडिया की ही खोज हुआ करती हैं। क्योंकि ऐसे लोग इनके मकसद को, जिसमें कि हिंदुत्व की गरिमा को ठेस पहुँचाना सबसे ऊपर है, साधने में इनकी मदद करते हैं। चक्रपाणि महाराज की वास्तविकता पर अक्सर प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं। सोशल मीडिया पर उन्हें समाजवादी पार्टी का एजेंट भी बताया जाता है, हालाँकि, ऐसे आरोपों पर एक ही बार में यकीन करना भी उचित नहीं है लेकिन फिर वामपंथी मीडिया गिरोह भी इसी प्रणाली पर काम करते देखे जाते हैं, यानी बेहद अप्रासंगिक से किसी एक व्यक्ति के वाहियात से मत को भुनाने का! इनका उद्देश्य सिर्फ एक ही होता है- अपने हिन्दू विरोधी प्रोपेगैंडा को हवा देना।

आमतौर पर हिंदुत्व के साथ ही तमाम हिन्दू साधुओं को नकारने वाले वामपंथी मीडिया गिरोह चक्रपाणि महाराज जैसे पाखंडियों की ओर दौड़े-दौड़े फिरते हैं, जिसका उदाहरण दी प्रिंट जैसे तमाम अन्य मीडिया गिरोह हैं।

दरअसल दी प्रिंट के साथ ही कुछ अन्य मीडिया गिरोहों ने भी कोरोना वायरस पर चक्रपाणि महाराज को हिन्दू महासभा का अध्यक्ष बताते हुए खबर प्रकाशित की है कि वो कोरोना से लड़ने के लिए गोमूत्र पार्टी करने जा रहे हैं, जिससे कि कोरोना वायरस से उपचार मिल सकेगा। इसमें दावा किया गया है कि इस पार्टी में गाय के गोबर से बना केक काटा जाएगा।

वामपंथी प्रोपेगैंडा मीडिया के इस कारनामे में उनका साथ देने के लिए एक पूरी बटालियन हर समय तैयार रहती है –

चक्रपाणि महाराज के चुटकुलों को गंभीरता से लेने वाले कम से कम 2 मीडिया गिरोह तो रोजाना तत्परता से अपने काम में लगे हैं –

सोशल मीडिया पर रोज ही लोग दी प्रिंट के इस फर्जी खबर पर स्पष्टीकरण देते हुए देखे जाते हैं कि यह चक्रपाणि महाराज मात्र एक पाखंडी और ढोंगी है, जिसे कि हिन्दू महासभा पहले ही नकार चुकी है। इसके बावजूद भी मीडिया उसे हिन्दू महसभा का अध्यक्ष बताते हुए ही खबर प्रकाशित कर रहा है। क्योंकि वह भी जानता है कि बिना हिन्दू महसभा के साथ इस नाम को जोड़े, चक्रपाणि की बात इतनी गंभीर नहीं है कि उसे लेकर एक रिपोर्ट ही प्रकाशित कर दी जाए। लेकिन मीडिया प्रमुखों का वास्तविक मकसद हिंदुत्व और उससे जुड़ी संस्थाओं की छवि को नुकसान पहुँचाना मात्र है।