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कमलनाथ की सलाह पर मध्य प्रदेश गवर्नर ने 6 सिंधिया समर्थक मंत्रियों को किया बर्खास्त, बेंगलुरु से वापस भोपाल लौट रहे हैं बागी विधायक

मध्य प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन ने मुख्यमंत्री कमलनाथ की सिफारिश पर उन सभी 6 मंत्रियों को उनके पद से हटा दिया है जो सिंधिया के समर्थन में पार्टी से बगावत कर चुके हैं। जिन 6 सिंधिया समर्थक मंत्रियों को कमलनाथ मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया गया है, उनके विभाग दूसरे मंत्रियों को दे दिए गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इन बर्खास्त किए गए मंत्रियों में इमरती देवी, तुलसीराम सिलावट, गोविंद सिंह राजपूत, महेन्द्र सिंह सिसोदिया, प्रद्युमन सिंह तोमर और डॉ. प्रभुराम चौधरी शामिल हैं।

भोपाल के इस घटनाक्रम के बीच कॉन्ग्रेस से बागी हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा की ओर से राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्र भरते ही उनके समर्थक कॉन्ग्रेस विधायकों के भी बेंगलुरु से भोपाल रवाना होने की खबर आ रही हैं। सिंधिया के एक करीबी समर्थक ने एक न्यूज एजेंसी को बताया कि बेंगलुरु में ठहरे सिंधिया समर्थक विधायकों में से अधिकतर विधायक बेंगलुरु से रवाना हो चुके हैं।

वहीं कमलनाथ ने भी विधानसभा में सरकार के फ्लोर टेस्ट से पहले बागी विधायकों को बेंगलुरु से वापस बुलाने की माँग की थी। कमलनाथ ने शुक्रवार (मार्च 13, 2020) को राज्यपाल लालजी टंडन से मुलाकात की थी जिसमें उन्होंने राज्यपाल को एक पत्र सौंपा। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी विधायकों की खरीद-फरोख्‍त कर रही है।

उन्‍होंने राज्‍यपाल से अनुरोध किया था कि वह ‘बेंगलुरु में बंधक बनाए गए विधायकों को मुक्‍त कराएँ।’ इसके साथ ही कमलनाथ ने राज्यपाल से विधानसभा के आगामी सत्र में अध्यक्ष द्वारा निर्धारित तिथि पर फ्लोर टेस्ट की माँग की थी। यह मुलाकात शुक्रवार को इन विधायकों के भोपाल पहुँचने से पहले हुई थी जिसमें उन्होंने सिंधिया समर्थक 6 मंत्रियों को हटाए जाने की सिफारिश की थी। खबरों के अनुसार एयरपोर्ट के बाहर कॉन्ग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों के कार्यकर्ताओं के भारी संख्या में मौजूदगी को देखते हुए प्रशासन ने एयरपोर्ट के बाहर धारा 144 लगा दी है। भोपाल पहुँचने से पहले बागी विधायक ‘कमलनाथ सरकार गई, गई, गई…’ के नारे लगाते दिखे।

फिलहाल सत्तासीन कॉन्ग्रेस के 114 में से 22 विधायकों ने इस्तीफे दे दिए हैं। अगर इस्तीफे स्वीकार कर लिए गए तो कमलनाथ सरकार का गिरना तय है। इस्तीफा देने वाले कॉन्ग्रेस विधायकों में से 6 आज स्पीकर एनपी प्रजापति से मिलेंगे। स्पीकर ने नोटिस जारी कर इन विधायकों को हाजिर होने के लिए कहा था। इनमें से 6 विधायकों को शुक्रवार, 7 को शनिवार और बाकी 9 विधायकों को रविवार को उपस्थित होना है। स्पीकर ने इन विधायकों से मिलकर इस्तीफे की सत्यता बताने को कहा था।

राहुल गाँधी को Morona-वायरस क्यों कह रहे हैं ट्विटर यूजर्स?

राजनीति से जुड़ा कोई भी घटनाक्रम हो और उसमें राहुल गाँधी की जरा भी मौजूदगी हो तो सोशल मीडिया पर चुटकुलों और मीम्स की बहार आ जाती है। ऐसा ही नजारा मध्य प्रदेश मे ज्योतिरादित्य सिंधिया के कॉन्ग्रेस छोड़कर भाजपा जाने के बाद देखने को मिला है।

इस बार समसामयिकी में बने कोरोना वायरस के साथ कलाकारी करते हुए कुछ ट्विटर यूजर्स ने इसे ‘मोरोना वायरस’ नाम दे दिया है और वो इसका इस्तेमाल कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के लिए कर रहे हैं।

दरअसल, राहुल गाँधी ने अपने ट्विटर अकाउंट पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ शेयर की हुई एक पुरानी तस्वीर को दोबारा ट्वीट किया। यह तस्वीर मूल रूप से दिसंबर 13, 2018 को शेयर की गई थी। तस्वीर में राहुल गाँधी के साथ मध्य प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मौजूद हैं। इस फोटो में राहुल गाँधी ने मशहूर लेख लियो टॉलस्टॉय की लिखी हुई एक पंक्ति के साथ शेयर किया है, जिसमें लिखा है- ‘दो सबसे ज्यादा ताकतवर योद्धा समय और धैर्य हैं।’

राहुल गाँधी द्वारा रीट्वीट की गई इस तस्वीर को इशिता यादव ने शेयर करते हुए लिखा है- “Why did moronavirus just retweet this?” यानी, ‘ये मोरोनावायरस ने इसे क्यों रीट्वीट किया?’ ज्ञात हो कि ‘Moron’ का हिंदी अर्थ ‘मूर्ख’ होता है।

इशिता ने राहुल गाँधी पर तंज कसते हुए यह ट्वीट किया है। इसी ट्वीट के अन्य कमेंट में उन्होंने लिखा है कि उम्मीद है, वो सिसोदिया को पीकर मैसेज नहीं भेजेंगे। दरअसल, ड्रंक टेक्स्ट का इस्तेमाल अक्सर लोग शराब पीने के बाद पुरानी प्रेमिका को भेजे गए सन्देश के रूप में करते हैं।

यूँ भी ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद से राहुल गाँधी निरंतर प्रेम में धोखा खाए हुए इंसान की तरह ही व्यवहार करते नजर आए हैं। कल ही उन्होंने एक बयान में कहा था कि ज्योतिरादित्य सिंधिया अकेले ऐसे कॉन्ग्रेसी थे, जो कभी भी उनके घर आ-जा सकते थे।

बारामुला के रफियाबाद में हुई मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने आतंकी मुदासिर अहमद को मार गिराया, 8 दिन पहले ही बना था आतंकी

भारतीय सुरक्षाबलों ने बारामुला जिले के रफियाबाद में जारी एक मुठभेड़ में एक आतंकी को मार गिराया है। आशंका जताई जा रही है कि रफियाबाद के इस शुतलु नामक इलाके में अभी और आतंकी भी छिपे हो सकते हैं। जिसके चलते सेना और पुलिस ने इलाके की घेराबंदी कर तलाशी अभियान चला रखा है।

इस मारे गए आतंकी की पहचान मुदासिर अहमद बट पुत्र सना-उल्ला-बट निवासी शुतलु के तौर पर हुई है। मुदासिर अहमद नामक यह आतंकी आठ दिन पहले ही आतंकी संगठन में शामिल हुआ था। ये मुदासिर अहमद उन्हीं पाँच युवकों में से एक था जिन्हें पुलिस ने बारामुला जिले से रहस्यमय परिस्थितियों में लापता बताया था। इन युवकों के परिजनों ने संबंधित पुलिस थानों में इनके लापता होने की शिकायत दर्ज कराई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पुलिस को इस इलाके में आतंकियों के छिपे होने की खबर अपने विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त हुई थी जिसके बाद सुरक्षाबलों ने दोपहर बाद जॉइंट ऑपरेशन चलाया और पूरे इलाके की घेराबंदी कर तलाशी अभियान शुरू कर दी थी। इस दौरान तलाशी के लिए विशेष नाके भी स्थापित कर दिए गए थे। इस तलाशी अभियान के दौरान जैसे ही सुरक्षाबलों ने घर-घर जाकर तलाशी लेना शुरू किया, छिपे हुए आतंकवादियों ने सुरक्षाबलों पर गोलियाँ बरसाना शुरू कर दिया। जिसके कुछ ही मिनटों बाद सुरक्षाबलों ने एक आतंकी को मार गिराया।

खबरों के अनुसार जब सुरक्षाकर्मी मुठभेड़ स्थल पर पहुँचे तो वहाँ एक आतंकवादी का शव बरामद हुआ। हालाँकि, सुरक्षाबलों को आशंका है कि वहाँ और आतंकवादी भी हो सकते हैं। जिनकी तलाश में गाँव के सभी मुख्य मार्गों पर नाके लगा, सर्च आपरेशन फिर से शुरू कर दिया है।

यस बैंक खाताधारकों के लिए वित्त मंत्री ने दी अच्छी खबर, कहा- जल्द हटाए जा सकते हैं सभी प्रतिबंध

पिछले कई दिनों से पैसों के लिए लाइनों में परेशान खड़े यश बैंक के खाता धारकों के लिए एक अच्छी खबर आई है। दिल्ली में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में यश बैंक को लेकर कुछ अहम फैसले लिए गए हैं। बैठक के बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐलान किया गया कि यस बैंक के रिकन्स्ट्रक्शन स्कीम को मंजूरी दे दी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जानकारी देते हुए बताया कि यस बैंक में भारतीय स्टेट बैंक 49 फीसदी की हिस्सेदारी खरीदेगी। इस दौरान वित्तमंत्री ने साफ किया कि SBI 3 साल तक अपनी स्टेक को 26 फीसदी से कम नहीं कर सकेगी। इसके अलावा प्राइवेट लेंडर्स भी इसमें निवेश करेंगे।

वित्त मंत्री ने आगे बताया कि प्राइवेट लेंडर्स के लिए भी लॉक इन पीरियड भी 3 साल तक का ही होगा, लेकिन उनके लिए स्टेक की लिमिट 75 फीसदी तक है। साथ ही बताया कि जल्द ही यस बैंक मामले को लेकर नया नोटिफिकेशन जारी कर दिया जाएगा। वहीं यस बैंक डिपॉजिटर्स के लिए राहत की बात ये होगी कि नोटिफिकेशन जारी होने के 3 दिन के अंदर मोरेटेरियम पीरियड को खत्म कर दिया जाएगा। इससे साफ है कि नोटिफिकेशन जारी होने के 3 दिन के अंदर यस बैंक से सभी प्रतिबंध हटा लिए जाएँगे।

वहीं वित्त मंत्री ने यह भी बताया कि स्कीम के नोटिफिकेशन के 7 दिन के अंदर ही यस बैंक के नए बोर्ड का गठन कर दिया जाएगा। नए बोर्ड के गठन के बाद RBI द्वारा नियुक्त किए गए प्रशासक प्रशांत कुमार को हटा लिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि नए बोर्ड बोर्ड में SBI के दो निदेशक भी सदस्य होंगे।

गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने यस बैंक पर सख्ती बरतते हुए इससे निकासी की सीमा 50 हजार रुपए तय कर रखी है। दरअसल, RBI का ये आदेश अगले एक महीने के लिए है। एनएसई ने यस बैंक के फ्यूचर और ऑप्शन सौदों पर रोक लगा दी है। इसकी वजह से देश भर के यस बैंक ग्राहकों में डर कायम हो गया। इसके बाद शहरों में यस बैंक के एटीएम में ग्राहकों की लंबी-लंबी कतारें देखने को मिलीं।

इससे पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था, कि मैं RBI गवर्नर के साथ बातचीत कर रही हूँ। किसी को भी कोई नुकसान नहीं होगा। सभी ग्राहकों का पैसा पूरी तरह से सुरक्षित है। इस संकट के दौरान बैंक ग्राहकों को बिल्कुल घबराना नहीं चाहिए। वित्त मंत्री ने आगे कहा कि अगर किसी को इमरजेंसी है तो वो नियमों के तहत ज्यादा रकम भी निकाल सकते हैं। नोटिफिकेशन में दी गई जानकारी के मुताबिक, कुछ विशेष परिस्थितियों में अकाउंट होल्डर्स अपने खाते से 50,000 रुपए से अधिक रकम विड्रॉ कर सकते हैं। 

फैक्ट चेक: इटली में कोरोना वायरस किसी पाकिस्तानी नागरिक से फैला या ‘हग अ चायनीज’ कैंपेन से, क्या है ‘पेशेंट जीरो’?

इटली में घातक कोरोना वायरस COVID-19 के फैलते जाने के बीच सोशल मीडिया में इस वायरस के फैलने के पीछे पाकिस्तानी प्रवासी को जिम्मेदार ठहराने की खबरें चल पड़ीं हैं। सोशल मीडिया में “पेशेंट जीरो” यानी वो मरीज जिसे किसी बीमारी के फैलने पर सबसे पहले डॉक्टरों द्वारा चिन्हित किया गया, एक ऐसे पाकिस्तानी प्रवासी को बताया गया जिसने कोरोना वायरस से संक्रमण की पुष्टि के बाद भी, खुद को और लोगों से अलग नहीं रखा।

विभिन्न मीडिया संगठन ने रिपोर्ट किया कि इटली में एक अज्ञात पाकिस्तानी व्यक्ति ने कोरोना वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि के बाद भी लगातार चायनीज फूड की डिलीवरी चालू रखी।

न्यूज़ रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तानी प्रवासी ने खुद को दूसरों से अलग नहीं रखा जबकि उसके कोरोना वायरस से ग्रस्त होने की पुष्टि हो चुकी थी।

हालाँकि अब यह पक्का हो चुका है कि इस तरह की खबरें सिर्फ अफवाह हैं। एसोसिएट प्रेस इटली के अनुसार, इटली को अभी भी “पेशेंट जीरो” की पहचान करनी बाकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रवक्ता स्टीफेनी ब्रिकमैन ने एसोसिएट प्रेस (एपी) से बात करते हुए इस बात की पुष्टि की कि अभी तक इटालवी प्राधिकरणों ने इस वायरस के लिए “पेशेंट जीरो” की शिनाख्त नहीं की है।

एक दूसरी खबर जो लगातार चर्चा में बनी हुई है, के अनुसार चीनी नागरिकों के खिलाफ पूर्वाग्रह खत्म करने के लिए इटली के फ्लोरेंस शहर के मेयर ने जो ‘हग अ चायनीज’ कैम्पेन चलाया था। पहली नजर में ‘हग अ चायनीज कैम्पेन’ की ये खबर फेक न्यूज़ लगती है क्योंकि ऐसे समय में जब इस वायरस को फैलने से रोकने के लिए लोगों से शारीरिक सम्पर्कों को कम किए जाने की सलाह दी जा रही, अनजान लोगों को गले लगाने का ऐसा कोई कैम्पेन हास्यास्पद ही दिखता है लेकिन ऐसा है नहीं।

‘हग अ चायनीज ‘ कैम्पेन

इटली के मेयर डेरियो नरदेला ने 1 फरवरी को ट्विटर पर ‘हग अ चायनीज’ कैम्पेन चलाया था।

इसने ऐसा चीनी नागरिकों के खिलाफ “मनोवैज्ञानिक आतंकवाद” से लड़ने के लिए किया था। और यह कोई व्यंग्य नहीं है।

हालाँकि, इस बात के कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं है कि इस ‘हग अ चायनीज’ कैम्पेन के कारण ही इटली में कोरोना वायरस का संक्रमण फैला, क्योंकि सभी चीनी नागरिक इस वायरस से संक्रमित नहीं हैं, जिसके कारण उनसे भेदभाव किया जाए। साथ ही यह भी सही है कि इस तरह के कैम्पेन को कोरोना वायरस के संक्रमण को देखते हुए फिलहाल टाला जा सकता था। इस तरह का कैम्पेन एक ‘पॉलिटिकल करेक्टनेस’ के सामान्य समझ पर भारी पड़ने का क्लासिक उदाहरण है।

ध्यातव्य है कि चीन के बाद इटली ही इस वायरस से सबसे ज्यादा संक्रमित है जहाँ अबतक 1000 लोगों की मौत इस वायरस के कारण हो चुकी है जबकि पूरे विश्व में इससे मरने वालों की संख्या 4600 है। पिछले 24 घंटों में ही इटली में 200 लोगों की मौत इस वायरस की वजह से हुई है।

बढ़ती आबादी से चिंतित BJP सांसद ने राज्यसभा में उठाई जनसंख्या नियंत्रण के लिए कठोर कानून बनाने की माँग

देश में लगातार और तेजी से बढ़ती जनसंख्या से चिंतित बीजेपी के एक सांसद ने शुक्रवार को राज्यसभा में जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की माँग उठाई है। बीजेपी से राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने शून्यकाल के दौरान सदन में यह माँग करते हुए कहा कि जनसंख्या विस्फोट के कारण संसाधनों पर दबाव बढ़ा है जिसके कारण न सिर्फ बेरोजगारी बढ़ी है बल्कि हर स्थान पर भीड़ ही भीड़ दिखती है। उन्होंने आँकड़ा पेश करते हुए कहा कि वर्ष 1951 में देश की आबादी 10 करोड़ 38 लाख थी, जो वर्ष 2011 में बढ़कर 121 करोड़ के पार पहुँच गई और वर्ष 2025 तक इसके बढ़कर 150 करोड़ के पार पहुँचने का अनुमान है।

सांसद ने आगे चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जनसंख्या कई गुना बढ़ती है, जबकि संसाधनों में बहुत कम बढोत्तरी हो पाती है। उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसा जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाना चाहिए जो ‘हम दो हमारे दो’ पर आधारित हो और इसका पालन नहीं करने वालों को हर तरह की सुविधाओं से न सिर्फ वंचित किया जाना चाहिए बल्कि उन्हें किसी भी प्रकार के चुनाव लड़ने से भी रोका जाना चाहिए। यादव ने आगे कहा कि वर्तमान में ही सभी को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना संभव नहीं हो रहा है, जबकि आने वाले समय में आबादी 150 करोड़ के पार पहुँच जाएगी तब पीने का पानी मिलना कैसे संभव हो पाएगा? इसके साथ ही अधिक आबादी के कारण बेरोजगारी भी अधिक है और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लिए संसाधन भी उपलब्ध नहीं होंगें।

इससे पहले बीजेपी से राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने जुलाई 2019 में जनसंख्या विनियमन विधेयक को एक निजी विधेयक के रूप में पेश किया था। वहीं वर्ष 2018 सितंबर माह में कॉन्ग्रेस के राजनेता जितिन प्रसाद ने भी जनसंख्या वृद्धि की जाँच के लिए एक कानून बनाने की माँग की थी। वहीं पिछले साल मई में दिल्ली बीजेपी के एक नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें जनसंख्या नियंत्रण के लिए कड़े कानून की माँग की गई थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले को खारिज कर दिया था। अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के पास है। वहीं वर्ष 2018 में ही लगभग 125 सांसदों ने राष्ट्रपति से पत्र लिखकर भारत में दो बच्चों की नीति लागू करने का आग्रह किया था।

वर्ष 2016 में भी बीजेपी सांसद प्रह्लाद सिंह पटेल ने भी जनसंख्या नियंत्रण पर एक निजी सदस्य बिल पेश किया था। 2015 में गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ ने एक ऑनलाइन पोल आयोजित कर पूछा था कि क्या मोदी सरकार को जनसंख्या नियंत्रण के लिए कोई नीति बनानी चाहिए। हालाँकि, वह उस समय गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद थे, जोकि वर्तमान में देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।

वहीं बात करें कुछ राज्यों की तो देश के कई राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए या छोटे परिवारों को प्रोत्साहित करने के लिए पहले से ही दंडात्मक प्रावधान लागू कर रखे हैं। बात करें असम की तो असम सरकार ने दो साल से अधिक समय पहले पारित असम जनसंख्या और महिला सशक्तिकरण नीति को लागू करने का फैसला किया था, जिसके तहत, “जनवरी 2021 से असम में दो से अधिक बच्चे वाला कोई भी व्यक्ति सरकारी नौकरी के लिए पात्र नहीं होगा।” कुल मिलाकर 12 राज्यों में ऐसे ही प्रावधान लागू हैं जो दो-बाल नीति की शर्तों को पूरा न कर पाने की स्थिति में योग्यता व अधिकार से जुड़े प्रतिबंध लगाते हैं। इन प्रतिबंधों में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव लड़ने से लोगों पर रोक लगाना भी शामिल है। कुछ इसी प्रकार उत्तराखंड में कानून बनाया गया, लेकिन इसे बाद में हटा दिया गया।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से अपने संबोधन में जनसंख्या नियंत्रण का जिक्र किया था साथ ही मोदी ने इसे देशभक्ति से भी जोड़ा था।

दंगों की फंडिंग और प्लानिंग पर कसा शिकंजा, मंदर-नक़वी गिरोह ने शाहीन बाग प्रदर्शन खत्म करने को कहा

कोर्ट और सरकार के खिलाफ विरोध करने के लिए समुदाय विशेष को सड़कों पर उतरने के लिए  खुलेआम उकसाने का वीडियो वायरल होने के बाद अब हर्ष मंदर ने शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों से प्रदर्शन खत्म करने के लिए कहा है।

टाइम्स नाउ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर्ष मंदर ने कहा कि शाहीन बाग में पिछले कुछ महीनों से हो रहे विरोध प्रदर्शन को अब वापस ले लेना चाहिए, क्योंकि इसका इस्तेमाल आरएसएस और उसके सहयोगियों द्वारा समुदाय विशेष के खिलाफ हेट कैंपेन को बढ़ावा देने के लिए ट्रिगर के रूप में किया गया। हर्ष मंदर ने दावा किया कि पिछले दिनों उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगे भी समुदाय विशेष के खिलाफ हेट कैंपेन का ही सीधा परिणाम था।

मंदर और उसके गिरोह के अनुसार, शाहीन बाग विरोध प्रदर्शन आरएसएस और उनके सहयोगियों के लिए एक हथियार बन गया है। वो इसका इस्तेमाल समुदाय विशेष के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए कर रहे हैं। टाइम्स नाउ की रिपोर्ट में कहा गया है कि 27 फरवरी को सामने आए एक वीडियो में मंदर ने शाहीन बाग विरोध में हो रहे प्रदर्शनों को वापस लेने के लिए कहा है। इसमें दावा किया गया कि हिंदू समूहों द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए उनका शोषण किया गया।

एक अन्य सेकुलर-लिबरल-बुद्धिजीवी सबा नकवी ने भी ट्वीट किया है कि कोरोनोवायरस के डर के कारण सभी विरोध प्रदर्शन वापस लेना चाहिए।

बता दें कि इससे पहले हर्ष मंदर का एक वीडियो सामने आया था। जिसमें प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कहते हैं, “ये लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में नहीं जीती जाएगी, क्योंकि हमने सुप्रीम कोर्ट को देखा है- एनआरसी के मामले में, कश्मीर के मामले में, अयोध्या के मामले में। उन्होंने (सुप्रीम कोर्ट) इंसानियत, समानता और सेक्युलरिज्म की रक्षा नहीं की है।” वे आगे कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में हम कोशिश जरूर करेंगे। लेकिन इसका फैसला न संसद में होगा, न सुप्रीम कोर्ट में होगा, बल्कि ये फैसला सड़कों पर होगा।

उन्होंने कहा था, “न्यायपालिका में सुप्रीम कोर्ट की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन जिस तरह उसने कश्मीर मामले में जवाब दिया। अलीगढ़ और जामिया में पीटे जा रहे छात्रों की याचिकाओं पर प्रतिक्रिया दिखाई। अयोध्या मामले में फैसला दिया। जाहिर है कि हाल के वर्षों न्यायपालिका अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा करने में नाकाम रही है।”

गौरतलब है कि गुरुवार (मार्च 12, 2020) को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने कट्टरपंथी संगठन पीएफआई के सरगना परवेज़ और सेक्रेटरी इलियास को धर-दबोचा। दोनों पर शाहीन बाग प्रदर्शन की फंडिंग और दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को भड़काने का आरोप है। हाल ही में गिरफ्तार किए गए आईएसआईएस से जुड़े दंपति के लगातार संपर्क में भी दोनों थे। अब जाँच की आँच आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस तक पहुँच रही है। आप के सांसद संजय सिंह और ख़ुद को सबसे बड़ा दलित नेता बताने वाले कॉन्ग्रेस के उदित राज से भी परवेज़ लगातार संपर्क में था। पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि संजय सिंह के तार दंगाइयों से जुड़े हैं।

इसके अलावा पीएफआई और दंगाइयों की फंडिंग की भी जाँच की जा रही है। पीएफआई ने 73 बैंक एकाउंट्स खोल रखे थे, जिनमें 120.5 करोड़ रुपए जमा किए गए। रेहाब इंडिया फाउंडेशन से भी इसके लिंक जुड़े हुए हैं। 17 विभिन्न बैंकों में एकाउंट्स खोले गए थे। पीएफआई के बारे में ये बात भी पता चली है कि पिछले कुछ महीनों में उसे अधिकतर डोनेशन कैश के रूप में मिले हैं। इनमें से दो तिहाई धन बैंक में जमा किया गया था। चौंकाने वाली बात ये है कि एक तिहाई धन पीएफआई के शाहीन बाग स्थित मुख्यालय में रखा गया था।

इसके साथ ही दिल्ली हिंसा को लेकर गिरफ्तार PFI के सदस्य दानिश ने दिल्ली पुलिस की पूछताछ में खुलासा करते हुए बताया था कि PFI ने शाहीन बाग और दिल्ली हिंसा के लिए धन जुटाया था और साथ ही PFI ने दंगाइयों को हथियार भी सौंपे थे।

ओवैसी, वारिस पठान, कपिल मिश्रा पर भड़काऊ बयान देने के मामले में तेलंगाना पुलिस ने दर्ज की एफआईआर

नागरिकता कानून संशोधन कानून के खिलाफ लगातार उकसावे वाले और भड़काऊ बयान देने के मामले में तेलंगाना पुलिस ने AIMIM लीडर असदुद्दीन ओवैसी, उसकी पार्टी के प्रवक्ता वारिस पठान और भाजपा नेता कपिल मिश्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है। इन तीनों नेताओं के खिलाफ यह कार्यवाही बालकिशन राव नामधारी की शिकायत के बाद की गई है। बालकिशन नामधारी ने गुरुवार को यह शिकायत दी थी। बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून को लेकर दिल्ली समेत पूरे देश में अलग-अलग जगहों पर उपद्रव और दंगे करने की कोशिश हुई, जिसमें दिल्ली में भड़के एंटी हिन्दू दंगे भी शामिल हैं जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई।

दिल्ली के इन दंगों और नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ होते पिछले तीन महीनों के उपद्रवों और फसादों के पीछे विपक्षी दलों की भड़काऊ बयानबाजी का सबसे महत्त्वपूर्ण रोल रहा है। पहले कॉन्ग्रेस की सोनिया गाँधी आदि का “आर-पार” की लड़ाई जैसे बयान आए, जिसमें उन्होंने सीएएए का विरोध करने के लिए सड़क पर उतरने की बात कही थी। साथ ही कहा था कि कॉन्ग्रेस इस तरह का विरोध करने वाले लोगों के साथ खड़ी है।

हाल ही में संसद में भी भड़काऊ बयानों (Hate Speech) को लेकर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जमकर बहस हुई, जिसके दौरान बीजेपी नेताओं ने दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों को कपिल मिश्रा के माथे फोड़ने का जोरदार विरोध किया। गृह मंत्री अमित शाह ने हेट स्पीच पर बोलते हुए कहा कि 14 दिसंबर को रामलीला मैदान में 1 पार्टी ने एंटी CAA रैली की, उसमें पार्टी की अध्यक्ष महोदया भाषण में कहती हैं कि घर से बाहर निकलो, आर-पार की लड़ाई करों, अस्तित्व का सवाल है। उसके बाद उनके एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि अभी नहीं निकलोगे तो कायर कहलाओगे। ये हेट स्पीच नहीं है तो क्या है? शाह ने वारिश पठान पर भी निशाना साधा और कहा कि जो यह कहता हो 15 करोड़ 100 करोड़ पर भारी हैं तो ये क्या है? उन्होंने यह भी कहा कि शाहीन बाग का धरना कपिल मिश्रा के बयान के बाद से नहीं बल्कि उससे बहुत पहले यानी की 15 दिसंबर से जारी है।

याद रहे कि दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगे फैलने के बाद भाजपा नेता कपिल मिश्रा का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वे पुलिस के सामने ही कह रहे थे कि अगर ट्रम्प की वापसी तक सड़क खाली नहीं हुई तो वे लोग सड़क पर उतरेंगे। जिसे विपक्ष ने दंगे भड़काने वाली घृणात्मक बयानबाजी बताया था। जबकि सरकार ने उनका बचाव करते हुए सोनिया गांधी, असदुद्दीन ओवैसी, वारिस पठान सहित शरजील इमाम आदि के बयानों की याद दिलाई थी।

102 साल पहले: कोरोना की तरह ही आया था स्पेनिश फ्लू, 5 करोड़ लोग हुए थे शिकार

कोरोना वायरस इस समय पूरे विश्व के लिए एक चुनौती बन चुका है। दिन पर दिन इसके कारण हो रही मौतों का आँकड़ा बढ़ता जा रहा है। यदि मात्र 24 घंटों की बात करें तो करीब 321 लोगों की इस वायरस के कारण मौत हो चुकी है। कुल आँकड़ा देखें, तो ये संख्या 5000 के करीब पहुँच चुकी है। अब तक कोरोना से 4,973 लोगों की मौत हुई है। इसके बढ़ते प्रभाव को देखते हुए हर देश इससे बचने के लिए अलग-अलग तरीके अपना रहा है। भारत भी इन्ही प्रयासों की ओर अग्रसर है।

भारत ने एक तरह से खुद को दुनिया से अलग-थलग करते हुए 15 अप्रैल तक ट्रैवल वीजा रद्द कर दिए हैं। कारोबार इससे सबसे ज्यादा प्रभावित है। भारत में भी इस वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर 74 हो चुकी है। साथ ही एक भारतीय की इसके कारण मौत भी हो गई है।

WHO ने कोरोना वायरस को एक महामारी घोषित कर दिया है, क्योंकि विश्व भर में इससे संक्रमित लोगों की संख्या 1,24,330 से अधिक पहुँच चुकी है। लेकिन क्या आप जानते हैं 102 साल पहले यानी 1918 में इससे भी खतरनाक वायरस भारत में आया था। इसने पूरी दुनिया में करीब 5 करोड़ लोगों की जानें ली थी। इसका नाम स्पेनिश फ्लू था। पूरी दुनिया में इस फ्लू से करीब 50 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हुए थे। हैरानी की बात ये है कि उस समय पूरी दुनिया की आबादी 180 करोड़ के लगभग थी। इसका मतलब है कि दुनिया का हर चौथा शख्स इस फ्लू का शिकार था। इस फ्लू के कारण मरने वालों में आधे से ज्यादा मृतक 20 से 30 की उम्र में थे। भारत में इससे 1 से 2 करोड़ लोगों की मौत हुई थी।

स्पेनिश फ्लू का पहला मामला 1918 के मार्च में अमेरिका में सामने आया था। संक्रमित शख्स का नाम Albert Gitchell था। ये मरीज यूएस आर्मी में रसोइए का काम करता था। मगर, एक दिन 104 डिग्री बुखार के साथ उसे कंसास के अस्पताल में भर्ती कराया गया। जल्द ही ये बुखार सेना के 54 हजार टुकड़ियों में फैल गया। मार्च के आखिर तक हजारों सैनिक अस्पताल पहुँच गए और 38 सैनिकों की गंभीर न्यूमोनिया से मौत हो गई।

उस समय दुनिया आपस में अभी की तरह जुड़ी हुई नहीं थी। समुद्री मार्गों से ही एक देश से दूसरे देश आना-जाना होता था। मगर, फिर भी यह बीमारी काफी तेजी से फैली और दूर-दराज देशों में बैठे लोगों को अपनी गिरफ्त में लेते गया। बताया जाता है करीब दो सालों तक इस फ्लू का कहर जारी रहा, जिसके कारण 1.7 फीसद आबादी की मौत हो गई।

ऐसा माना जाता है उस समय पहला विश्वयुद्ध चल रहा था। सैनिकों के बंकरों के आसपास गंदगी की वजह से यह महामारी सैनिकों में फैली और जब सैनिकों अपने-अपने देश लौटे तो वहाँ भी यह बीमारी फैल गई। मई तक इंग्लैंड, फ्रांस, स्पेन और इटली के सैनिक और आम लोग भी स्पेनिश फ्लू का शिकार हो चुके थे। ये बीमारी उस समय सबसे पहले अमेरिकी और फ्रांसीसी सैनिकों में नजर आई। बावजूद इसके इस बीमारी का नाम स्पेनिश फ्लू पड़ने के पीछे एक दिलचस्प इतिहास है।

दरअसल, पहले वर्ल्ड वार के दौरान स्पेन युद्द में न के बराबर जुड़ा हुआ था। फ्रांस, इंग्लैंड और अमेरिका की तरह यहाँ के अखबार भी सेंसरशिप से आजाद थे। ऐसे में सबसे पहले स्पेनिश अखबारों ने ही वायरस की खबर छापी, इसी वजह से इस बीमारी को स्पेनिश फ्लू नाम मिला।

आज विश्व भर के लोगों को डराने वाला कोरोना वायरस की तरह स्पेनिश फ्लू भी सीधे फेफड़ों पर हमला करता था। हालांकि कोरोना और इसमें एक बड़ा फर्क था। कोरोना वायरस जहाँ कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को संक्रमित करता है, वहीं स्पेनिश फ्लू इतना खतरनाक था कि लक्षण सामने आने के 24 घंटों के भीतर ये एकदम स्वस्थ व्यक्ति की भी जान ले सकता था। दुनिया में इसके बाद भी कई महामारियाँ फैलीं लेकिन स्पेनिश फ्लू जितनी खतरनाक और जानलेवा कोई भी बीमारी नहीं दिखी।

बताया जाता है इस बीमारी ने 5 करोड़ से भी अधिक लोगों की जान ली। लेकिन मेडिकल स्टॉफ भी इसके लिए कोई टीका तैयार नहीं कर सका, क्योंकि उस समय में किसी वायरस को देखने वाला माइक्रोस्कोप मौजूद नहीं था। साल 1930 में पहली बार इतने सूक्ष्म वायरस को देख सके, ऐसा माइक्रोस्कोप तैयार हुआ। तब उस दौर के टॉप डॉक्टरों का मानना था कि ये बीमारी Pfeiffer’s bacillus नामक बैक्टीरिया से फैलती है, जबकि असल में ये बीमारी Influenza A virus subtype H1N1 नामक वायरस से फैलती है जो इंफ्लुएंजा वायरस की एक श्रेणी है। बैक्टीरिया जन्य बीमारी मानते हुए वैज्ञानिकों ने इलाज में करोड़ों रुपए बहाए। लेकिन बीमारी वायरसजन्य थी इसलिए इसका इलाज नहीं हो सका और जानें जाती रहीं।

आज सोशल मीडिया के दौर में कोरोना वायरस के बारे में बड़े व्यापक स्तर पर लोगों को मालूम पड़ रहा है। लेकिन शायद माध्यमों का अभाव होने के कारण उस समय में स्पेनिश फ्लू से संबंधित जानकारी लोग नहीं जुटा पाते थे और न ही सचेत हो पाते थे। लेकिन आज तकनीक ने इसे संभव कर दिया है। विश्व भर में लोग इसके प्रति सचेत है और साथ ही सरकारें अपने-अपने स्तर पर इससे जनता को बचाने के लिए रास्ते खोज रही हैं। भारत में तो कॉलरट्यून से पहले कोरोना से बचने के लिए कॉलरट्यून लगा दी गई है। साथ ही इसका वैक्सीन तैयार करने के लिए भी कोशिशें जारी हैं।

राजस्थान को लेकर यूँ ही नहीं लग रहे कयास: जानिए, गहलोत सरकार के विज्ञापनों से कैसे गायब हुए पायलट

राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार के भविष्य को लेकर तरह-तरह के कयास लग रहे हैं। इसका कारण मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच की दूरी बताई जाती है। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के कॉन्ग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल होने और उनके समर्थक विधायकों के इस्तीफे से इन अटकलों को हवा भी मिली है। जिस तरह मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के वक्त कॉन्ग्रेस ने सिंधिया का चेहरा आगे कर रखा था, वैसे ही राजस्थान में पायलट चेहरा थे। लेकिन, नतीजों के बाद दोनों प्रदेशों में युवा नेतृत्व को निराशा ही हाथ लगी थी।

ऐसा नहीं है कि गहलोत और पायलट में अचानक से दूरियॉं बढ़ी है। सरकार गठन के बाद से ही पायलट की उपेक्षा की जा रही है। आरटीआई से सामने आई एक जानकारी से भी इसकी पुष्टि होती है। जानकारी के अनुसार, एक साल का कार्यकाल पूरा करने पर गहलोत सरकार ने करोड़ों रुपए का विज्ञापन दिया था। मगर, इन विज्ञापनों में सचिन पायलट को जगह नहीं दी गई थी। इसमें सिर्फ़ गहलोत नजर आ रहे थे। सूचना का अधिकार कानून (RTI) के तहत दाखिल आवेदन के जवाब में प्रदेश के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने बताया कि दिसंबर 2018 से नवंबर से 2019 के बीच 25.08 करोड़ रुपए का विज्ञापन दिया गया। इन विज्ञापनों में सिर्फ CM अशोक गहलोत की तस्‍वीरें थीं। डिप्टी सीएम सचिन पायलट की तस्वीर कहीं नहीं थी।

इस RTI को दाखिल करने वाले का नाम वकील सहीराम गोदारा है। उन्होंने अपनी अर्जी में राजस्‍थान के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से प्रदेश सरकार द्वारा दिसंबर 2018 से नवंबर 2019 के बीच विज्ञापनों पर किए गए खर्च का ब्‍यौरा माँगा था। साथ ही उन्‍होंने विज्ञापनों में सीएम गहलोत और सचिन पायलट की तस्‍वीरों की जानकारी भी माँगी थी।

इसी आरटीआई के जवाब में जनसंपर्क विभाग ने बताया कि विभिन्‍न राष्‍ट्रीय और क्षेत्रीय अख़बारों में इस दौरान कुल 62 विज्ञापन दिए गए थे। इनमें सिर्फ गहलोत सरकार की तस्‍वीरें होने की जानकारी दी गई। राजस्‍थान सरकार द्वारा दिए गए विज्ञापनों में डिप्‍टी सीएम सचिन पायलट का स्‍थान नहीं दिया गया। गहलोत के अलावा स्‍थान, तस्‍वीर की साइज और मौकों (जिन अवसरों पर विज्ञापन दिया गया) की जानकारी दी गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जब इस संबंध में गहलोत से पूछा गया तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया। उन्होंने कहा, “सरकार सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार काम करती है। शीर्ष अदालत ने पहली बार विज्ञापनों में मुख्‍यमंत्रियों की तस्‍वीर लगाने पर भी रोक लगा दी थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को संशोधित करते हुए विज्ञापनों में सीएम का फोटो इस्‍तेमाल करने की अनुमति दे दी थी। मुख्‍यमंत्री यह थोड़े ही कहता है कि सिर्फ मेरी ही फोटो लगाओ किसी और की नहीं।”

इस मामले पर सचिन पायलट की ओर से कोई बयान नहीं आया है। लेकिन प्रदेश में लगातार होती उपेक्षा को देखकर कयास लगाए जा रहे हैं कि वे देर-सबेर ज्योतिरादित्य सिंधिया के रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं। कॉन्ग्रेस विधायक पीआर मीणा ने भी अपने बयान से इन अटकलों को हवा दी है। उन्होंने गुरुवार को विधानसभा पहुँचने के बाद कहा कि राजस्थान की स्थिति भी ज्यादा बेहतर नहीं है। मंत्री अपने को राजा समझ रहे है। विधायकों की कोई सुन नहीं रहा।

मीणा ने प्रदेश सरकार की कार्यपद्धति पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि प्राकृतिक आपदा से किसानों की फसलें बर्बाद हो गई हैं। इसके बाद भी पीड़ित किसानों का दर्द नहीं सुना जा रहा है। उन्होंने कहा कि मंत्रियों को टाइट करने की जरूरत है। साथ ही उन दो-तीन विधायकों को भी जो खुद को मुख्यमंत्री से भी ऊपर समझ रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस हालत से ज्यादातर विधायक नाराज हैं।