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India Fights Corona: PM मोदी ने जानें लोगों के विचार, कहा- इससे निपटने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना वायरस के खतरे से निपटने को गंभीर नज़र आ रहे हैं। न सिर्फ़ वो जनता को सावधानी व बचाव के उपायों से अवगत करा रहे हैं बल्कि उनकी सरकार भी विभिन्न माध्यमों से इस खतनाक वायरस के प्रसार को रोकने में जुटी है। ख़ुद मोदी दक्षिण एशियाई देशों सहित अन्य राष्ट्रों के साथ तालमेल बिठा कर काम करने में लगे हुए हैं। इसी क्रम में उन्होंने सोशल मीडिया पर बताया कि भारत किस तरह कोरोना से लड़ रहा है। उन्होंने कहा कि लोगों जिस तरह से अपने अनुभव शेयर कर रहे हैं, उससे डॉक्टरों, नर्सों, कर्मचारियों और एयरपोर्ट स्टाफों को अपना काम करने के लिए और प्रोत्साहन मिलेगा।

अंशु नामक ट्विटर यूजर ने बताया कि उन्होंने अपनी सारी बैठकें रद्द कर दी हैं और बिजनेस के सिलसिले में यात्रा करना भी बंद कर दिया है। पीएम मोदी ने इसे बुद्धिमता भरा निर्णय बताया। उन्होंने कहा कि भीड़भाड़ से जितना बच कर रहें, उतना अच्छा है।

सिंगापुर से लौटे हेमंत राठी ने बताया कि उनके घर पर मेडिकल अधिकारियों ने आकर उनका चेकअप किया। उन्होंने बताया कि माइग्रेशन के दौरान भरे जाने वाले फॉर्म्स को ही विदेश से लौटने वालों की पहचान और मेडिकल चेकअप के लिए प्रयोग किया जा रहा है। पीएम मोदी ने उनका जवाब देते हुए लिखा कि लोगों को स्वस्थ रखने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है, विभिन्न अधिकारी लगातार इस काम में लगे हुए हैं ताकि COVID-19 न फैले।

पत्रकार कुषाण मित्रा ने बताया कि उनके एक मित्र शताब्दी एक्सप्रेस से यात्रा कर रहे थे। उन्हें तुरंत अधिकारियों का मैसेज आया कि वो जल्द से जल्द अपना मेडिकल चेकअप कराएँ। पीएम मोदी ने इस ट्वीट के जवाब में एक जिम्मेदार नागरिक के कर्तव्यों को उल्लेखित करते हुए आशा जताई कि कोई भी ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा, जिससे दूसरे लोगों की जान संकट में पड़े। इसी तरह पालकी शर्मा ने अपने कुछ दोस्तों के अनुभव शेयर किए, जिन्होंने बताया था कि कोरोना वायरस से निपटने के लिए भारत में काफ़ी तैयारी है और सरकार लगातार प्रयास कर रही है।

आरके मिश्रा ने बताया कि किस तरह से न्यू जर्सी से दिल्ली लौटे एक व्यक्ति ने देखा कि वहाँ एयरपोर्ट पर जाँच की पूरी सुविधा थी और ऐरोप्लेन के दरवाजे पर ही सारे यात्रियों का सिलसिलेवार तरीके से चेकअप किया जा रहा था। इस ट्वीट का जवाब देते हुए पीएम मोदी ने लिखा कि उनकी सरकार लगातार प्रयासरत है कि सभी स्वस्थ रहें और जिनमें जरा भी इस वायरस के लक्षण दिखें, उनका तुरंत इलाज हो। इसी तरह श्रीलंका से लौटे संदीप नेगी ने बताया कि एयरपोर्ट के कोने-कोने पर सैनिटाइजर रखा हुआ है और स्क्रीनिंग के लिए पूरी व्यवस्था है। पीएम मोदी ने कहा कि सबके साझा प्रयासों से ये सब संभव हो पाया है।

इसी तरह पीएम मोदी ने लोगों के अनुभवों को जाना और अपनी राय रखी। उनका प्रमुख रूप से ये कहना था कि डॉक्टर, नर्स, सरकारी कर्मचारी और एयरपोर्ट स्टाफ मिल कर कोरोना वायरस से लड़ने और बचाव के लिए प्रयास कर रहे हैं, उसमें जनता का सहयोग भी होना चाहिए और पब्लिक को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए, ताकि दूसरो की जान पर संकट न आए। पीएम मोदी ने सार्क देशों के प्रमुखों के साथ बैठक कर के भी एक-दूसरे के विचार साझा किए थे।

हरिद्वार में गंगा स्नान कर बोले पाक हिंदू श्रद्धालु: हम वापस नहीं जाएँगे, उस देश में होता है क्रूर उत्पीड़न, बेटियों का धर्मांतरण

पिछले सप्ताह पाकिस्तान से आए 56 हिंदू तीर्थयात्रियों का एक समूह अब वापस अपने देश नहीं जाना चाहता है। इन तीर्थयात्रियों का कहना है कि वे भारत सरकार से अनुरोध करेंगे कि वे उनके वीजा की अवधि एक महीने के लिए बढ़ा दें और नागरिकता संशोधन कानून, 2019 के तहत उन्हें नागरिकता प्रदान करें। पाकिस्तान से लगभग एक माह के लिए यात्रा वीजा पर आए 56 हिन्दू श्रद्धालुओं के जत्थे ने शनिवार को हरिद्वार में गंगा स्नान किया। इसके बाद पाकिस्तान के श्रद्धालु अहमदाबाद के लिए निकल गए।

कराची के बाडेन क्षेत्र के एक तीर्थयात्री नारायण दास ने इस बाबत बात करते हुए कहा, “हम वापस जाने की स्थिति में नहीं हैं। पाकिस्तानी अधिकारियों ने हमें पर्याप्त धन लाने की अनुमति नहीं दी क्योंकि वे सोचते हैं कि हम वापस नहीं जाएँगे। हम उस देश में क्रूर उत्पीड़न का सामना करते हैं। हमसे सब कुछ छीन लिया गया। हमने भारत सरकार से हमें आश्रय देने की गुहार लगाई है।”

जानकारी के मुताबिक समूह के लोगों की दयनीय हालत देख स्थानीय नेता और लोगों ने आपस में रुपए, कपड़े और अन्य आवश्यक वस्तुएँ एकत्र कर उन्हें दिया, ताकि वो अहमदाबाद की यात्रा कर सकें। उन्होंने समूह के अहमदाबाद जाने के लिए बस और खाने की व्यवस्था भी की। पाकिस्तान की एक अन्य तीर्थयात्री हीरा बाई ने कहा, “हमारे परिवार के सदस्यों को मार दिया गया है, बेटियों का धार्मिक रुपांतरण करा दिया और संपत्तियाँ छीन ली गई है। वहाँ पर जिंदगी मौत से भी बदतर है। हमें भारत सरकार द्वारा बनाए गए नए कानून के तहत कुछ उम्मीद है।”

हालाँकि, राज्य सरकार के अधिकारियों ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, लेकिन नाम न छापने की शर्त पर कहा कि वे स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। राज्य के गृह विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि एक बार आवेदन दाखिल हो जाने के बाद ही राज्य सरकार कुछ कर सकती है।

इससे पहले इस साल जनवरी में, राज्य सरकार ने पाकिस्तान से कुल 200 हिंदू शरणार्थियों की पहचान की है, जिन्हें नव पारित नागरिकता संशोधन कानून के तहत नागरिकता दी जाएगी। इनमें से ज्यादातर हरिद्वार, देहरादून और उधमसिंह नगर जिलों में रहते हैं। ये लोग जीवित रहने के लिए कठिन से कठिन जॉब करते हैं और कुछ तो भीख माँग कर गुजारा करते हैं। इन्हें उम्मीद है कि वे इस देश के नागरिक बन जाएँगे और इससे उन्हें सम्मान की जिंदगी जीने में मदद मिलेगी। वे नौकरियों के लिए आवेदन कर सकते हैं और अपना खुद का व्यवसाय शुरू कर सकते हैं।

गौरतलब है कि सोमवार (दिसंबर 9, 2019) को लोकसभा में नागरिकता संशोधन बिल पास होने के बाद पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। दिल्ली में बसे पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों ने जमकर जश्न मनाया था। इन लोगों ने पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह जिंदाबाद के नारे, ‘जय श्री राम’ के नारे भी लगाए थे।

वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर रही विपक्षी पार्टियों को स्पष्ट सन्देश देते हुए कहा था कि सरकार इस पर पीछे नहीं हटेगी। शाह ने कहा था कि चाहे कॉन्ग्रेस व अन्य सीएए विरोधी पार्टियाँ कितना भी विरोध प्रदर्शन कर लें, पाकिस्तान से आए एक-एक शरणार्थी को नागरिकता दिए बिना भाजपा सरकार चुप नहीं बैठेगी। उन्होंने कहा कि भारत पर यहाँ के लोगों का उतना ही हक़ है, जितना पाकिस्तान से प्रताड़ना झेल कर आए शरणार्थियों का।

पाकिस्तान से आए हिंदूओं में से कुछ ने वहाँ हो रही ज्यादतियों के बारे में बात करते हुए कहा कि ‘चाहे जान ले लो, मगर वापस जाने के लिए न कहो।’ पाकिस्तान से आए लोगों का कहना था, “वहाँ बच्चियों को सरेआम उठाकर ले जाने की धमकियाँ मिलती रहती हैं। अब हम वापस पाकिस्तान नहीं लौटना चाहते।” एक लड़की ने कहा है कि अब हम अपने देश में आ गए हैं। एक पाकिस्तानी हिंदू महिला ने कहा था, “हम पाकिस्तान में सुरक्षित नहीं महसूस करते। हमारी लड़कियों को हमेशा डर लगा रहता है कि कोई कट्टरपंथी उनका अपहरण कर लेगा। पुलिस मूक दर्शक बनी देखती रहती है। हमारी लड़कियाँ पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में आजादी से चल भी नहीं सकती हैं।”

दुबई से लौटे 11 संदिग्ध मरीज, चकमा देकर अस्पताल से फरार: 1 की रिपोर्ट +VE, अस्पताल लौटना बेहद जरूरी

भारत में कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या का आँकड़ा 109 पहुँच गया है। सबसे ज्यादा 32 मामले महाराष्ट्र से हैं। और इसी बीच ताजा जानकारी आई है कि महाराष्ट्र में 11 संदिग्ध मरीज अस्पताल से भाग गए हैं। टाइम्स नॉऊ की खबर के अनुसार अस्पताल से भागे इन संदिग्धों का दुबई यात्रा का इतिहास है। इन्हें हॉस्पिटल के आइसोलेशन वार्ड में रखा गया था। इनकी जाँच हो चुकी थी, मगर रिपोर्ट आनी बाकी थी।

जानकारी के अनुसार, ये लोग दुबई क्रिकेट खेलने गए थे। इन्हें भारत लौटने के 2 घंटे बाद आइसोलेशन रूम में भेज दिया गया था। लेकिन ये लोग सुरक्षाकर्मियों को चकमा देकर मौके से फरार हो गए। इसके बाद नवी मुंबई म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन और स्थानीय पुलिस एक्शन में आई और इन्हें ढूँढने के लिए तलाशी अभियान शुरू हुआ।

यहाँ बता दें कि इन 11 लोगों में एक की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई है और चूँकि पूरी टीम उसके साथ थी, तो उनकी भी रिपोर्ट पॉजिटिव आने के आसार हैं। इसलिए इन लोगों को वापस अस्पताल लौटना बेहद जरूरी है।

गौरतलब है कि ये पहला मामला नहीं है जब कोरोना सस्पेक्टेड द्वारा इस प्रकार का लापरवाही वाला रवैया दिखाया गया हो। इससे पहले नागपुर में भी मामला सामने आया था। वहाँ कुछ संदिग्धों को आइसोलेशन वार्ड में रखा गया था। बाद में 5 में से 3 संदिग्ध वापस आ गए थे। उस समय कहा गया था कि पुलिस बाहर तैनात रहेगी। इसके अलावा बिहार के दरभंगा से भी ऐसा मामला सामने आया था। जहाँ संदिग्ध मरीज अस्पताल से भाग गया था।

वहीं कर्नाटक में भी दुबई से लौटे 4 मुस्लिम लोगों ने स्वास्थ्य अधिकारियों को धमकाया था और कोरोना वायरस का टेस्ट करवाने से मना कर दिया था। इन चारों युवकों ने इस मनाही के पीछे इस्लाम को वजह बताया था और कहा था कि इस्लाम उन्हें मेडिकल टेस्ट करवाने की इजाजत नहीं देता।

‘हमें कोरोना नहीं होगा, मोदी को होगा, हमारे साथ अल्लाह है’ – जामिया प्रदर्शन पर बैठी बुजुर्ग महिला

‘इस्लाम इजाजत नहीं देता’: दुबई से लौटे 4 युवकों का कोरोना टेस्ट से इनकार, कर्नाटक में ही हुई थी पहली मौत

भारतीय मुस्लिमों के पूर्वज हिन्दू ही थे: अंत समय में नेहरू ने बयाँ की थी ‘सच्चाई’

देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अक्सर आलोचना होती रही है कि उन्होंने जम्मू कश्मीर के मुद्दे को अटका दिया, पाकिस्तान व चीन पर ढुलमुल रवैया अपनाया, सावरकर-राजर्षि-बोस जैसे बड़े स्वतंत्रता सेनानियों से उनकी नहीं पटी और सत्ता के लिए उन्होंने हर तिकड़म आजमाई। हालाँकि, नेहरू ख़ुद कई बार सही बात बोल जाते थे, जिन्हें आज न सिर्फ़ उनके अनुयायियों बल्कि कॉन्ग्रेस के लोगों को भी जानना चाहिए। ये जवाहरलाल नेहरू का अंतिम इंटरव्यू था। हो सकता है उस समय तक उन्हें चीजें समझ आ गई हों लेकिन उनके पास उन्हें ठीक करने का समय न रहा हो।

ये इंटरव्यू मई 1964 का है। इसी महीने की 27 तारीख को वो चल बसे थे। ऐसे में उनकी कुछ अंतिम वाक्यों की ओर आपका ध्यान दिलाना आवश्यक है। उन इंटरव्यू में हिन्दुओं के बारे में तत्कालीन पीएम नेहरू ने स्वीकार किया था कि ये एक धर्मान्तरण करने वाली प्रजाति नहीं है। नेहरू ने कहा था कि हिन्दू समाज में धर्मान्तरण का कॉन्सेप्ट नहीं रहा है। उन्होंने माना था कि हिन्दुओं को धर्मान्तरण से कोई मतलब नहीं था लेकिन ‘दूसरे पक्ष’ को था। मुस्लिमों के बारे में हमारे प्रथम प्रधानमंत्री ने कहा था कि वो धर्मान्तरण कराने या किसी का धर्म बदलवाने के हमेशा से इच्छुक रहे थे।

एक और बात की चर्चा होती रही है कि क्या भारत में जितने भी मुस्लिम हैं, वो सब बाहर अरब से आए हैं? अधिकांश ऐसा ही दावा करते हैं। जबकि सच्चाई ये है कि इस्लामी आक्रांताओं ने सैकड़ों सालों तक भारत में धर्मान्तरण का कार्य जारी रखा। इसके लिए प्रलोभन दिए गए या फिर क्रूरता अपनाई गई। हिन्दुओं को काफिर समझ कर काटा गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू एक इतिहासकार भी थे। ऐसे में इन कथनों पर भी उनकी राय इसी इंटरव्यू में सामने आई थी। नेहरू ने इस बात से साफ़ इनकार कर दिया था कि भारत में जितने भी मुस्लिम रहते हैं, वो सभी बाहर से ही आए हुए हैं।

जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि, वो सभी हिन्दुओं के ही वंशज हैं। इन मुस्लिमों के पूर्वज हिन्दू ही थे। उन्होंने स्वीकार किया था कि बाहर से तो काफ़ी कम संख्या में मुस्लिम आकर यहाँ बसे थे। नेहरू की मानें तो मुट्ठी भर विदेशी मुस्लिम ही यहाँ आकर बसे थे। इस इंटरव्यू में भारत विभाजन को लेकर भी नेहरू ने अपने विचार रखे थे। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम लीग की स्थापना ही भारत में विभाजन पैदा करने के लिए हुई थी। हालाँकि, उन्होंने ये भी कहा था कि महात्मा गाँधी या वो भारत-पाकिस्तान विभाजन के पक्ष में नहीं थे लेकिन अंत में उन्होंने निर्णय लिया कि लगातार परेशानी झेलने से अच्छा है कि विभाजन का फ़ैसला स्वीकार कर लिया जाए।

हिन्दू धर्मान्तरण नहीं करते: देखें 17.00 के बाद

दरअसल, नेहरू से सवाल पूछा गया था कि भारत में तो सालों से आपसी भाईचारे और सद्भाव का माहौल रहा है, ऐसे में वो इस इतिहास को कैसे देखते हैं? इसके जवाब में ही उन्होंने ये बातें कही थीं। उन्होंने पाकिस्तान पर भी गंभीर आरोप लगाए थे। जम्मू कश्मीर को लेकर उन्होंने पाकिस्तान पर वहाँ नियमों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया था।

मस्जिद में था मजहबी कार्यक्रम, हिस्सा लेने गए 16000 लोग, लौटे तो 243 लोग हुए कोरोना वायरस से संक्रमित

कोरोना के कहर से मलेशिया भी अछूता नहीं रहा है। मलेशिया में रविवार (मार्च 15, 2020) को 190 नए संक्रमित मामले सामने आए हैं। इनमें सबसे अधिक संक्रमण तब्लीगी इज्तेमा से जुड़े हुए समुदाय में हुआ। यह मस्जिद में एक इस्लामिक कार्यक्रम था, जिसमें कई देशों के 16,000 से अधिक लोग शामिल हुए थे। बता दें कि इज्तेमा इस समुदाय की एक धर्मसभा है, जो तब्लीगी जमात का एक अनिवार्य हिस्सा है। अक्सर समुदाय की ताकत दिखाने के लिए इस तरह का 3 दिन का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। 

जानकारी के मुताबिक मस्जिद से आने के बाद 243 लोगों को कोरोना वायरस से संक्रमित पाया गया। इसमें से 9 लोगों को गंभीर रूप से बीमार माना जा रहा है। उन्हें निगरानी में रखा गया है। मलेशिया के स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा कि इस्लामिक इवेंट में शामिल होने वाले सभी प्रतिभागियों और उनके करीबियों को 14 दिनों के लिए अनिवार्य रूप से आइसोलेसन वार्ड में रखा जाएगा।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि मलेशिया में कुल 428 संक्रमित मामले सामने आ चुके हैं। मलेशियाई स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया कि 27 फरवरी से 1 मार्च के बीच कुआलालंपुर की एक मस्जिद में आयोजित धार्मिक सभा में लगभग 16,000 लोग शामिल हुए। प्रतिभागियों में से लगभग 14,500 लोग मलेशियाई हैं।

तब्लीग समूह ने कुआलालंपुर के बाहरी इलाके में मस्जिद जमीक श्री पेटालिंग में एक विशाल सभा आयोजित की गई थी, जिसमें हजारों लोग शामिल थे। इसकी वजह से घातक कोरोना वायरस का काफी प्रसार हुआ। प्रधान मंत्री मुहीदीन यासिन ने शुक्रवार को कहा कि देश संक्रमणों की ‘सेकेंड वेब’ का सामना कर रहा था। इसके साथ ही उन्होंने आर्थिक विकास पर इसके प्रभाव की चेतावनी भी दी।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने रविवार को कहा कि पड़ोसी ब्रुनेई में कुल 50 मामलों में से 45 धार्मिक सभा से जुड़े हुए थे। सिंगापुर ने भी इस कार्यक्रम से जुड़े कुछ संक्रमण मामलों की पुष्टि की। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि ब्रूनियन और विदेशी निवासियों को कोरोनावायरस के प्रकोप के कारण देश छोड़ने पर रोक है।

बता दें कि घातक कोरोना वायरस की वजह से अब तक 6,000 से अधिक लोगों की जानें जा चुकी है और दुनिया भर में अब तक इसके संक्रमण के 1,59,0000 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। कोरोना वायरस बीमारी (COVID-19) का प्रकोप सबसे पहले चीन के वुहान से 31 दिसंबर 2019 को हुआ था।

‘मूर्तियों को गिरा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’ – फैज की ‘अनुपयुक्त’ शायरी पर IIT कमिटी का ‘हथौड़ा’

पिछले साल नागरिकता संशोधन कानून (CAA) बनने के साथ ही इसके खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए। विरोध प्रदर्शन के नाम पर कई जगहों पर हिंसा और दंगे हुए। इसी कड़ी में IIT कानपुर के कुछ गिने-चुने छात्रों ने 17 दिसंबर को एक प्रदर्शन का आयोजन किया था। आयोजन में फैज अहमद फैज की एक कविता (लाज़िम है कि हम भी देखेंगे… सब बुत उठवाए जाएँगे… सब तख़्त गिराए जाएँगे… बस नाम रहेगा अल्लाह का) गाई गई।

इसको लेकर काफी विरोध प्रदर्शन हुआ था। जिसके बाद मामले की जाँच के लिए आईआईटी प्रशासन ने 6 सदस्यों की कमिटी का गठन किया था। अब उस पैनल ने अपनी जाँच रिपोर्ट दी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि फैज की शायरी पढ़ना ‘समय और स्थान के लिहाज से अनुपयुक्त’ था।

इसके साथ ही पैनल ने इस मामले में 5 शिक्षक और 6 छात्रों को भी आरोपित ठहराया। उन्होंने इन संस्थान से आरोपितों की काउंसलिंग करवाने की सिफारिश करते हुए कहा कि जाँच में पाया गया कि इन लोगों ने विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा लिया था, जो कि वांछनीय नहीं था।

आईआईटी-कानपुर के अस्थायी शिक्षक वाशी मंत शर्मा ने अपनी शिकायत में दावा किया था कि संस्थान में फैज की शायरी के पाठ से उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची है। शर्मा ने अपनी शिकायत में दावा किया था कि शायरी की इन दो पंक्तियों से उन्हें ठेस पहुँची है, “जब अरज़-ए-खुदा के काबे से, सब बुत उठवाए जाएँगे, हम अहल-ए-सफा मरदूद-ए-हराम, मनसंद पे बिठाए जाएँगे, सब ताज उछाले जाएँगे, सब तख्त गिराए जाएँगे।”

द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में शर्मा ने कहा था, “वे एक कविता कैसे गा सकते हैं जो कहती है कि मूर्तियों को गिराया जाएगा? यह मुगलों द्वारा भारत के आक्रमण को संदर्भित करता है और मेरी धार्मिक भावनाओं को आहत करता है।” आईआईटी प्रशासन ने समिति को यह जाँच करने का काम सौंपा था कि क्या सभा के दौरान कही गई बातें या सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए वीडियो में “भड़काऊ, अपमानजनक और डराने वाली भाषा” का इस्तेमाल किया गया था या नहीं?

समिति के अध्यक्ष और संस्थान में उप निदेशक मनिंद्र अग्रवाल ने द इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए पुष्टि की कि समिति ने पिछले सप्ताह ही रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है। फैज की शायरी पढ़ने पर उन्होंने कहा, “समिति ने यह पाया कि जब शायरी पढ़ी गई तब शायद, समय और स्थान उपयुक्त नहीं थे। जिस व्यक्ति ने उसका (कविता) पाठ किया, वह इस दृष्टिकोण से सहमत हुआ और उसने एक नोट लिखा कि किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचने पर उसे पछतावा है। तो ऐसे में अब यह मामला बंद हो चुका है।”

यह पूछे जाने पर कि पैनल को ऐसा क्यों लगा कि यह अनुपयुक्त है, उन्होंने कहा, “यह एक विविधतापूर्ण वातावरण था। लोग अलग-अलग भाषा, विचार और संस्कृति से आते हैं। ऐसे में लोगों को ऐसे काम नहीं करने चाहिए, जो दूसरे को उत्तेजित, क्षुब्ध या व्यथित करे। अपनी रोजमर्रा की जिंंदगी में मैं ऐसे बहुत सी चीजें कर सकता हूँ, जो घातक है, लेकिन मुझे नहीं करना चाहिए।” हालाँकि, अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि समिति ‘कविता की व्याख्या’ में नहीं गई थी।

समिति ने 5 शिक्षकों और 6 छात्रों को विशेष रूप से उनके अवांछनीय व्यवहार के लिए दोषी ठहराया है, जिसमें 17 दिसंबर को आईआईटी-कानपुर द्वारा अनुमति वापस लेने के बाद भी विरोध मार्च के साथ आगे बढ़ने का उनका निर्णय शामिल है।

मनिंद्र अग्रवाल ने बताया कि मार्च के आयोजन के लिए जिम्मेदार लोगों को लगभग 11-12 बजे के आस-पास सूचित किया था कि संस्थान द्वारा मार्च की अनुमति वापस ले ली गई। साथ ही यह भी बताया गया था कि शहर में धारा 144 लगा दी गई है। लेकिन फिर भी इस जानकारी को बड़े पैमाने पर छात्रों को सूचित नहीं किया गया था, जो यह मानते रहे कि मार्च दोपहर 2 बजे होने वाला है।

उन्होंने आगे कहा कि कई फैकल्टी मेंबर्स ने यह जानने के बावजूद कि अनुमति वापस ले ली गई थी और धारा 144 लगा दी गई थी, फिर भी आगे बढ़े और मार्च में भाग लिया। कई लोगों ने अप्रिय वीडियो बनाए और सोशल मीडिया पर तथ्यों के भ्रामक चित्रण भी किए। संस्थान द्वारा उन्हें सलाह देने के बाद भी इसे ठीक नहीं किया गया। ये कुछ ऐसी गतिविधियाँ थीं, जो आउट ऑफ लाइन थी और समिति ने इन पर गौर किया है।

‘सभी मूर्तियों को हटा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’: IIT कानपुर में हिंदू व देश विरोधी-प्रदर्शन

‘सभी मूर्तियों को हटा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’: IIT कानपुर में जाँच कमिटी गठित, 15 दिन में रिपोर्ट

कमल का ‘नाथ’ बना कोरोना: 26 तक विधानसभा स्थगित, उसी दिन राज्यसभा के लिए मतदान

मध्य प्रदेश में आखिरकार वही हुआ, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। कोरोना की वजह से कमलनाथ सरकार को फ्लोर टेस्ट से फिलहाल राहत मिल गई है। स्पीकर ने मध्य प्रदेश विधानसभा को 26 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी है। उसी दिन राज्यसभा के लिए मतदान भी होना है। राज्यपाल के अभिभाषण के बाद विधानसभा 26 मार्च तक के लिए स्थगित हो गई है। यानी कि कुछ दिनों के लिए कमलनाथ सरकार के ऊपर से फ्लोर टेस्ट का खतरा टल गया है। सोमवार (मार्च 16, 2020) को मध्य प्रदेश विधानसभा में कार्यवाही शुरू होने पर राज्यपाल लालजी टंडन ने अभिभाषण दिया। उन्होंने सभी विधायकों से कहा कि वह अपना दायित्व निभाएँ। उन्होंने कहा कि सभी को संविधान के तहत नियमों का पालन करना चाहिए ताकि मध्य प्रदेश की गरिमा संरक्षित रहे।

बता दें कि इससे पहले मुख्यमंत्री कमलनाथ ने रविवार देर रात को राज्यपाल लालजी टंडन से राजभवन में मुलाकात की थी। उसके बाद संवाददाताओं से चर्चा करते हुए कहा था कि विधानसभा में क्या होगा यह तो विधानसभा अध्यक्ष तय करेंगे। सीएम कमलनाथ ने राज्यपाल को चिट्ठी लिखकर फ्लोर टेस्ट रोकने की माँग की थी। पत्र में उन्होंने कहा था कि वर्तमान परिस्थिति में फ्लोर टेस्ट कराना अलोकतांत्रिक होगा। कमलनाथ ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने कॉन्ग्रेस के कई विधायकों को कर्नाटक में बंदी बना लिया है। ऐसी स्थिति में फ्लोर टेस्ट कराना अलोकतांत्रिक है।

राज्यपाल से मुलाकात के बाद कमलनाथ ने कहा था, “लालजी टंडन ने फोन पर मुझे मिलने के लिए बुलाया था। वे विधानसभा की कार्यवाही सुचारू रूप से चलने के लिए मुझसे चर्चा करना चाहते थे। मैंने उनसे कहा कि मैं स्पीकर से बात करूँगा। फ्लोर टेस्ट पर फैसला स्पीकर करेंगे। यह मेरा काम नहीं है। मैंने राज्यपाल को बता दिया है कि मैं फ्लोर टेस्ट के लिए तैयार हूँ, पर इससे पहले बेंगलुरु में बंधक बनाए गए विधायकों को रिहा किया जाए।”

कमलनाथ के बयान के बाद शिवराज सिंह ने कहा था, “राज्यपाल ने निर्देश दिए हैं कि सरकार फ्लोर टेस्ट करवाए, लेकिन मुख्यमंत्री कहते हैं कि यह मेरा काम नहीं। वे कह रहे हैं कि यह स्पीकर का काम है। मुख्यमंत्रीजी! सदन में क्या कामकाज होगा, यह सरकार तय करती है। उसे पूरा करवाने के लिए स्पीकर कार्रवाई करते हैं। राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है कि आप विश्वास मत हासिल करें। मुख्यमंत्री फ्लोर टेस्ट की बात नहीं कर रहे। इधर-उधर की बात कर रहे हैं। फ्लोर टेस्ट करवाओ, फैसला हो जाएगा। सरकार डर भी रही है और फ्लोर टेस्ट से भाग रही है। किसी को बंधक नहीं बनाया गया है।”

‘हमें कोरोना नहीं होगा, मोदी को होगा, हमारे साथ अल्लाह है’ – जामिया प्रदर्शन पर बैठी बुजुर्ग महिला

कोरोना वायरस के कहर से देश की जनता को बचाने के लिए जहाँ भारत सरकार और राज्य सरकारें हर मुमकिन प्रयास करने में जुटी हैं, वहीं दिल्ली के ओखला में जामिया के गेट नंबर 7 पर मुस्लिम महिलाओं का सीएए-एनआरसी-एनपीआर के ख़िलाफ़ प्रदर्शन जारी है। इन महिलाओं का कहना है कि इन्हें कोरोना से कोई भय नहीं है। वे यहाँ पर सबसे हाथ मिला रही हैं। नमाज पढ़ रही हैं और आपस में साथ में बैठ रही हैं। इनका कहना है कि इन्हें कोरोना का कोई डर नहीं है क्योंकि कोरोना उन्हें नहीं होगा बल्कि नरेंद्र मोदी को होगा।

जामिया नगर में चल रहे इस प्रोटेस्ट की एक विडियो सोशल मीडिया पर सामने आई है। ये विडियो लाइव टीवी है। विडियो में देख सकते हैं कि बुजुर्ग से लेकर बच्चियाँ तक यहाँ प्रदर्शन में शामिल हैं और जोर जोर से अल्लाह-मौला का नाम लेकर प्रोटेस्ट आदि करने की आजादी माँग रही हैं।

विडियो में सर्वप्रथम एक युवक की बाइट है। जो बताता है कि उसने देश भर के सभी राज्यों का सिलसिलेवार दौरा किया है और देखा है कि शाहीन बाग तथा जामिया की तर्ज पर लोग जगह-जगह अपने घरों से बाहर निकले हैं और प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी माँग सिर्फ़ इतनी है कि सरकार आकर उनकी बात सुने। और कुछ भी नहीं। लेकिन सरकार उनकी बात नहीं सुन रही।

इसके बाद इसमें एक बुजुर्ग महिला की बाइट है। जो कैमरे पर आने के बाद सबसे पहले मोदी सरकार की जमकर आलोचना करती है और कहती है कि मोदी सरकार उन लोगों से आकर मिलें, तभी वह हटेंगे। फिर रिपोर्टर बुजुर्ग महिला से कहता है कि उन लोगों को भटकाने के लिए कोरोना का खौफ फैलाया जा रहा है। तो वो लोग इससे कैसे लड़ेंगी। इस पर बुजुर्ग महिला कहती हैं, “हमें अल्लाह का खौफ है और किसी का खौफ नहीं है। हम हाथ भी खूब मिला रहे हैं और हम आपस में मिलकर बैठ रहे हैं। नमाज पढ़ते हैं। हमें अल्लाह पर भरोसा है। हमें कुछ नहीं होगा। मोदी को होगा। क्योंकि मोदी जाते हैं बाहर। उन्हें डर है। हमें कोई डर नहीं है। हम दिन रात एक साथ हैं सारे… और अल्लाह हमारे साथ है।”

राज्य सरकार के निर्देशों के बावजूद भी इस प्रदर्शन में इस विडियो में सभी महिलाओं को एक साथ बैठे देखा जा सकता है और सुना जा सकता है कि यहाँ मौजूद महिलाओं का कहना है कि उन्हें एनआरसी-सीएए-एनपीआर के बारे में कुछ मालूम नहीं था। उन्हें तो जामिया की बच्चियों ने इंस्पायर किया है और अब वे तब तक यहाँ से नहीं उठेंगी जब तक कि मोदी सरकार लिखित में नहीं देगी कि वे इस कानून को वापस लेंगे।

महिलाओं की बातें और भाषा सुनकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनके दिमाग में सिर्फ़ मोदी सरकार के प्रति नफरत भरी गई है। उन्हें तो यह भी नहीं पता कि उनकी तरह सैकड़ों लोगों को ईरान से बचाकर केंद्र सरकार ही लाई है। एक महिला तो यहाँ तक बोलती सुनी जा सकती है कि हिंदुस्तान में मुस्लिमों पर बहुत ज्यादा जुल्म हुआ है और वे केवल हिंदुस्तान की आजादी की माँग कर रही हैं।

सबसे शर्मनाक चीज जो इस विडियो के जरिए मालूम चलती है, वो ये कि एक महिला जिसने कुछ दिन पहले इसी प्रदर्शन के कारण अपने बेटे को खोया, वो एक बार फिर से अपने हाथ में अपना एक और बच्चा लिए इस प्रदर्शन में मौजूद है और जब रिपोर्टर उससे इस संबंध में सवाल करता है तो वह लगातार कहती है कि वो यही चाहती है कि काले कानून को वापस ले लिया जाए।

विडिया के इस भाग में गौर देने वाली ये चीज है कि माँ की लापरवाही से जान गँवाने वाले बच्चे के लिए शहादत का प्रयोग किया जाता रहता है और महिला भी कहती है कि उसे अब ये प्रदर्शन अपने घर जैसे लगने लगा है। वे यहाँ आती है और लोग उसे खूब सपोर्ट करते हैं।

कोरोना के नाम पर NDTV ने ‘बेचा जहर’, बाबा रामदेव और योग को लेकर भ्रामक हेडलाइन से फैलाया प्रोपेगेंडा

कोरोना वायरस जैसे गंभीर मामले पर भी एनडीटीवी अपना प्रोपेगेंडा फैलाने से बाज नहीं आ रहा। शनिवार को रामदेव बाबा ने कोरोना वायरस पर बातचीत करते हुए कहा था कि कोरोना से डरने की आवश्यकता नहीं है। केवल सख्ती से सावधानियाँ बरतें। लेकिन एनडीटीवी ने इसे लेकर ऐसी हेडलाइन बनाई कि जो भी उसे पढ़े, वो बाबा रामदेव का उपहास ही उड़ाए।

दरअसल, शनिवार को बाबा रामदेव ने कोरोना वायरस का भय लोगों के भीतर से कम करने के लिए इस पर अपनी बात रखी थी। साथ ही इससे बचे रहने के लिए तरीके बताए थे। उन्होंने कहा था , “कोरोना वायरस से डरने की ज़रूरत नहीं है लेकिन इसके प्रसार और संक्रमण को रोकने के लिए सख्ती से सावधानी बरतें। जब आप सार्वजनिक स्थानों पर हों या बस, ट्रेन और फ्लाइट से यात्रा कर रहे हों तो आप अपने हाथों के लिए सेनिटाइज़र का उपयोग करें।”

अब हालाँकि, बाबा रामदेव ने यहाँ वही राय दी थी जो शायद कोई भी जानकार इंसान अपने फॉलोवर्स को दे। लेकिन एनडीटीवी ने इस पर रिपोर्ट करते हुए इसकी हेडलाइन इस प्रकार दी जैसे बाबा रामदेव ने कहा है कि कोरोना वायरस से डरने की जरूरत नहीं है, सिर्फ़ योगा का अभ्यास करें।

आखिर, ऐसे समय में जब पूरा विश्व कोरोना वायरस के कहर से डरा हुआ है, हर देश की सरकार हर स्तर पर किसी न किसी प्रकार से इससे लड़ने की कोशिश कर रही है। उस समय जाहिर है कोई भी आम व्यक्ति अगर बाबा रामदेव का ये सुझाव पढ़ेगा, तो उसे उनकी बात पर गुस्सा ही आएगा कि आखिर ऐसे समय में भी वो केवल अपना प्रचार (योग) कैसे कर सकते हैं।

लेकिन, वास्तविकता देखी जाए तो पता चलेगा कि बाबा रामदेव ने केवल कोरोना वायरस से बचने के लिए योग करने की सलाह नहीं दी। बल्कि उन्होंने तो लोगों से अपील करते हुए कहा था कि सार्वजनिक स्थानों पर लोगों से 4 से 5 फीट की दूरी बनाएँ रखें। चेहरे को मास्क से ढकें। इसके अलावा योगा की भी प्रैक्टिस करें और नैचुरल लाइफस्टाइल फॉलो करें। ताकि इम्यून सिस्टम अच्छा हो और शरीर को किसी भी प्रकार के संक्रमण आदि से बचाया जा सके।

ट्विटर पर यदि देखें, तो काफी हद तक एनडीटीवी अपनी इस हेडलाइन के साथ अपने दर्शकों को अपने पक्ष में भी करता दिखा। भ्रामक हेडलाइन देखकर, लोग बाबा रामदेव को लेकर अनाप-शनाप बोलने लगे। किसी ने उन्हें कनियाँ कहकर उनकी आँखों का मजाक उड़ाया, तो कोई उन्हें ये हेडलाइन देखकर फ्रॉड कहने लगा। एक यूजर ने तो ये तक लिखा कि जहाँ कोरोना पीड़ित हैं, वहाँ पर बाबा को योगा के लिए भेजना चाहिए। अब आखिर एनडीटीवी को यही सब तो चाहिए था! हेडलाइन के साथ खेल कर उसने प्रोपेगेंडा के अपने स्तर को बनाए रखा।

मगर, ईटी नॉउ की पत्रकार चंद्र आर श्रीकांत ने इस हेडलाइन की ओर सबका ध्यान आकर्षित करवाया और बाबा रामदेव के वास्तविक बयान को ट्विटर पर शेयर किया। जिसके बाद लोगों ने एनडीटीवी की हेडलाइन पर ध्यान देना शुरू किया और कहा कि ऐसी भ्रामक हेडलाइनों से बचने का केवल एक उपाय है कि हेडलाइन से अपनी समझ न बनाई जाए, बल्कि न्यूज कंटेंट से सारी बात समझने का प्रयास किया जाए।

JNU में वीर सावरकर मार्ग, 12 अन्य प्रसिद्ध हस्तियों के नाम भी शामिल: बोर्ड देख बौखलाए वामपंथी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सुबनसर हॉस्टल के नजदीक एक सड़क का नाम बदलकर वीर सावरकर मार्ग कर दिया गया। इसे देखने के बाद जेएनयू के वामपंथी छात्र काफी नाराज हुए। वामपंथी छात्रों के संघ ने इस कदम को शर्मनाक कहा। साथ ही सावरकर के नाम पर मार्ग का नाम रखे जाने की निंदा की।

जेएनयूसू की अध्यक्ष आइशी घोष ने अपने ट्विटर हैंडल से इसकी एक तस्वीर शेयर की। इस तस्वीर में साफ दिखा कि सुबनसर हॉस्टल को जाने वाली सड़क को वीडी सावरकर मार्ग नाम दिया गया है।

आइशी घोष ने इसी पर अपना गुस्सा जाहिर करते हुए लिखा, “ये जेएनयू की विरासत के लिए शर्म की बात है कि इस आदमी का नाम इस विश्वविद्यालय में रखा गया है। सावरकर और उनके लोगों के लिए विश्वविद्यालय के पास न कभी जगह थी और न ही कभी होगी।”

जुलाई 2019 में जेएनयू कैंपस डेवलपमेंट कमिटी ने एग्जिक्यूटिव काउंसिल के समक्ष विभिन्न सड़कों के नामकरण के लिए कई स्वतंत्रता सेनानियों व प्रसिद्ध हस्तियों के नामों की सिफारिश की थी। वो थे:

  1. गुरु रविदास मार्ग (Guru Ravidas Marg)
  2. वीडी सावरकर मार्ग (V. D. Savarkar Marg)
  3. रानी अब्बक्का मार्ग (Rani Abbakka Marg)
  4. अब्दुल हमीद मार्ग (Abdul Hamid Marg)
  5. महर्षि वाल्मीकि मार्ग (Maharishi Valmiki Marg)
  6. गार्गी वाचक्नवी मार्ग (Gargi Vachaknavi Marg)
  7. रानी झाँसी मार्ग (Rani Jhansi Marg)
  8. महर्षि दयानंद सरस्वती मार्ग (Maharishi Dayananda Saraswati Marg)
  9. गोपीनाथ बोरदोलोई मार्ग (Gopinath Bordoloi Marg)
  10. वीर शिवाजी मार्ग (Veer Shivaji Marg)
  11. महाराणा प्रताप मार्ग (Maharana Pratap Marg)
  12. सरदार पटेल मार्ग (Sardar Patel Marg)
  13. लोकमान्य तिलक मार्ग (Lokmanya Tilak Marg)

13 नवंबर 2019 को समिति की उपरोक्त सिफारिशों को विचार और अनुमोदन के लिए आयोजित 283वीं एग्जिक्यूटिव काउंसिल की बैठक से पहले रखा गया था। ज्ञात हो कि काउंसिल ने इन सिफारिशों को मंजूरी दे दी है।

गौरतलब है कि वीर सावरकर को लेकर जेएनयू में मामला गर्माने से पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) में भी हंगामा हुआ था। उस समय विनायक दामोदर सावरकर की मूर्ति लगाए जाने को लेकर मामले ने तूल पकड़ा था।

दरअसल, तब तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष शक्ति सिंह ने बगैर अनुमति लिए नॉर्थ कैंपस स्थित आर्ट्स फैकल्टी के गेट पर वीडी सावरकर, सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह की प्रतिमाएँ लगवा दी थीं। जिसके बाद कई छात्र संगठनों ने इस पर ऐतराज जताया था।

साथ ही कॉन्ग्रेस की छात्र इकाई NSUI ने तो सावरकर की मूर्ति पर काली स्याही तक पोत दी थी और उन्हें जूतों का हार भी पहनाया था। भारी हँगामे के बाद और एनएसयूआई की ऐसी हरकतों को देखते हुए आखिरकार मूर्तियों को वहाँ से हटाना पड़ा था।

उल्लेखनीय है कि वीर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे, जिन्हें अंग्रेजों ने कालापानी की कठिन सज़ा दी थी। वह हिंदुत्व विचारक और एक प्रखर लेखक भी थे। वह कॉन्ग्रेस के आलोचक थे, जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना पर जोर दिया। उनके सम्मान में पोर्ट ब्लेयर एयरपोर्ट का नाम 2002 में ‘वीर सावरकर इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ रखा गया था। साथ ही इंदिरा गाँधी ने भी वीर सावरकर को अपने एक पत्र में भारत का वीर सपूत कहा था।