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JNU पर सुब्रह्मण्यम स्वामी का प्लान: 2 साल चले ‘सफाई अभियान’, जवानों को करो तैनात

जेएनयू में हुई हिंसा को लेकर जारी गहमागहमी के बीच भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस विश्वविद्यालय को लेकर अपना प्लान सामने रखा है। बकौल स्वामी जेएनयू कैंपस में पुलिस स्टेशन बनना चाहिए। बीएसएसएफ और सीआरपीएफ जवाने की तैनाती होनी चाहिए। यूनिवर्सिटी को दो साल के लिए बंद कर जरूरी ‘सफाई अभियान’ चलाया जाए। साथ ही कहा है कि इसके बाद जब दोबारा जेएनयू को खोला जाए तो उसका नाम बदलकर सुभाष चंद्र बोस विश्‍वविद्यालय कर देना चाहिए।

स्वामी ने अहमदाबाद के थलतेज में एक निजी विश्वविद्यालय के कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से कहा कि सरकार को जेएनयू को लेकर बड़ा कदम उठाना चाहिए। इसकी सफाई के लिए इसे कम से कम दो साल के लिए बंद कर देना चाहिए और जब यह वापस से शुरू हो तो इसका नाम बदल कर सुभाष चंद्र बोस विश्वविद्यालय कर दिया जाना चाहिए।

स्‍वामी ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने जान-बूझकर जेएनयू में अयोग्य और अशिक्षित लोगों को प्रवेश दिया। इससे वहाँ के हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जेएनयू के हॉस्टल का किराया 10 रुपए है और वहाँ 35 से 40 साल तक के लोग छात्र हैं और हर साल फेल होते रहते हैं। इन लोगों का एक ही उद्देश्य होता है कि जेएनयू के हॉस्टल को रहने के ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करें और वो पूरे देश में घूम-घूम कर समाजवादी कार्यक्रमों में हिस्सा लें।

उन्होंने कहा कि बंद करने से पहले अच्छे छात्रों को दिल्ली विश्वविद्यालय और आंबेडकर विश्वविद्यालय में स्थानांतरित कर देना चाहिए एवं हुल्लड़बाजों को बाहर कर देना चाहिए। स्वामी ने कहा कि नेहरू के नाम पर पहले से ही कई संस्थान है, इसलिए जेएनयू का नाम बदल दिया जाना चाहिए। स्वामी ने दावा किया कि जेएनयू तथा अन्यत्र हो रहे नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) के हिंसक विरोध के पीछे आतंकी और विदेशी तत्वों का भी हाथ है।

साथ ही स्‍वामी ने जेएनयू में पुलिस स्टेशन बनाए जाने की माँग की है। उन्होंने कहा कि जेएनयू में सिर्फ दिल्ली पुलिस से काम नहीं चलेगा। वहाँ पर बीएसएफ और सीआरपीएफ की तैनाती जाए। इसके बाद ही वहाँ के हालात सामान्य हो सकेंगे। स्वामी ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “सुरक्षा का मतलब हरेक कैंपस के अंदर पुलिस स्‍टेशन बनाया जाना है। आज आपको पुलिस बुलाना पड़ता है जिसमें काफी समय लग जाता है। देश में विश्‍वविद्यालयों के अंदर पुलिस स्‍टेशन का होना बहुत जरूरी है। यह केवल जेएनयू के लिए नहीं है। लेकिन हमें इसकी शुरुआत जेएनयू से करनी चाहिए।”

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इंडिया टुडे चैनल ने 10 जनवरी 2020 को एक स्टिंग ऑपरेशन प्रसारित किया। इस स्टिंग ऑपरेशन को उन्होंने अपनी खोजी पत्रकारिता का कमाल बताया। इंडिया टुडे द्वारा किया गया यह स्टिंग ऑपरेशन JNU हिंसा पर आधारित था। दिल्ली पुलिस द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने के ठीक बाद इंडिया टुडे ने स्टिंग ऑपरेशन का प्रसारण किया और यह दिखाया कि JNU हिंसा के संदिग्धों के रूप में JNUSU अध्यक्ष समेत वामपंथी छात्रों को फँसाया गया है।

स्टिंग ऑपरेशन के प्रसारण के दौरान, ABVP ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि अक्षत अवस्थी, जिस व्यक्ति की पहचान ABVP कार्यकर्ता के रूप में की जा रही है, वह किसी भी तरह से ABVP से नहीं जुड़ा हुआ है। राहुल कंवल ने इसी शख़्स के लिए दावा किया कि उनके पास ABVP की रैली में अक्षत के भाग लेने का प्रमाण है।

स्टिंग ऑपरेशन के प्रसारित होने के बाद राहुल कंवल ने अक्षत को लेकर कहे अपने झूठे दावे को सच साबित करने के लिए ट्विटर का सहारा लिया। और यहीं पर राहुल कंवल और इंडिया टुडे के “स्टिंग ऑपरेशन” का ख़ुलासा या यूँ कहें कि पर्दाफाश भी हो गया।

राहुल कंवल ने दावा किया कि अक्षत ने भले ही यह कहा हो कि वो ABVP से नहीं जुड़ा है, लेकिन एक फ़ोटो में हाथ में तिरंगा लिए हुए नज़र आ रहा है और यह फ़ोटो ABVP रैली का है। 

“एबीवीपी की रैली” में भाग लेते अक्षत अवस्थी के सबूत के रूप में राहुल कंवल द्वारा साझा की गई तस्वीर

राहुल कंवल के अनुसार, फ़ोटो में भारतीय ध्वज को हाथ में थामे हुए जो शख़्स है, वो अक्षत अवस्थी है।

इसके बाद, हमारी टीम ने इस फ़ोटो से संबंधित जानकारी जुटाने की कोशिश की और यह जानने का प्रयास किया कि इस फ़ोटो का अन्य किन प्रकाशनों में इस्तेमाल हुआ है। जानकारी जुटाने का मक़सद यह भी जानना था कि क्या यह वाकई ABVP की रैली थी, और अगर थी तो इस रैली के आयोजन का मुद्दा क्या था।

मनोरमा प्रकाशन द्वारा इस्तेमाल की गई तस्वीर के अनुसार, यह फ़ोटो 11 नवंबर 2019 की है, जब पुलिस ने JNU के उन छात्रों को रोका, जो हॉस्टल की फीस वृद्धि के मुद्दे पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे। यह फ़ोटो पीटीआई के कमल सिंह ने ली थी।

मनोरमा में प्रकाशित लेख

मनोरमा और इंडिया टुडे के राहुल कंवल द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली इस फ़ोटो को हमने ध्यान से देखा और यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या वाकई दोनों फ़ोटो में अक्षत अवस्थी ही था।

11 नवंबर के विरोध-प्रदर्शन की पीटीआई की फ़ोटो राहुल कंवल ने ट्वीट की

अपनी जाँच में हमने पाया कि राहुल कंवल जिसे ABVP की रैली कह रहे थे, वो 11 नवंबर 2019 को JNU छात्रावास शुल्क वृद्धि के विरोध में आयोजित की गई थी।

हमें इंडिया टुडे का वो लेख भी मिला जिसमें उन्होंने ख़ुद इस बात की पुष्टि की कि वो फ़ोटो 11 नवंबर के विरोध-प्रदर्शन की थी, जिसे राहुल कंवल ABVP की रैली कह रहे थे।

इंडिया टुडे का 12 नवंबर का लेख

इंडिया टुडे के लेख में पहले पैराग्राफ में कहा गया, “छात्रावास शुल्क बढ़ने के ख़िलाफ़ नारे लगाने और बैनर उठाने के कारण, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के हज़ारों छात्र सोमवार को पुलिस के साथ भिड़ गए। यूनिवर्सिटी के छात्र, जिन्हें हाल के वर्षों में कई ऐसे आंदोलन करते देखा गया, वो ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) परिसर के बाहर विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे, जहाँ यूनिवर्सिटी के तीसरे दीक्षांत समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने छात्रों को संबोधित किया था।”

इस दौरान, उप-राष्ट्रपति तो दीक्षांत समारोह में हिस्सा लेकर किसी तरह वहाँ से निकल गए, लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक वहाँ क़रीब छ: घंटे तक फँसे रहे।

एक सवाल के जवाब में इंडिया टुडे के लेख में खुद ही बताया गया कि किसने विरोध-प्रदर्शन का समर्थन कर रहे अन्य दलों को संगठित किया।

इंडिया टुडे का लेख

इंडिया टुडे के लेख में उल्लेख किया गया था कि 11 नवंबर का विरोध-प्रदर्शन JNUSU द्वारा आयोजित किया गया था। JNUSU के वर्तमान अध्यक्ष आइशी घोष हैं, जिन्हें दिल्ली पुलिस ने JNU हिंसा में एक संदिग्ध के रूप में नामित किया है और वो वामपंथी संगठन SFI से हैं।

यह विरोध BAPSA (बिरसा अम्बेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन), Kshatra राजद (RJD, लालू की पार्टी का छात्रसंघ) और कॉन्ग्रेस की NSUI जैसी पार्टियों द्वारा समर्थित था।

उन्होंने विरोध-प्रदर्शन के दौरान मिलकर, “हमें चाहिए आज़ादी” के नारे लगाए थे। 

इंडिया टुडे का लेख

ग़ौर करने वाली बात यह है कि तब के अपने लेख में इंडिया टुडे ने ABVP का ज़िक्र कहीं किसी कोने में भी नहीं किया था।

11 नवंबर 2019 को एआईसीटीई के बाहर JNUSU विरोध के बारे में इंडिया टुडे की एक वीडियो रिपोर्ट यहाँ दी गई है।

दिलचस्प बात यह है कि इस वीडियो रिपोर्ट में भी ABVP का कोई ज़िक्र नहीं था।

इससे यह बात एकदम साफ़ हो जाती है कि राहुल कंवल के फ़र्ज़ी दावे वाली फ़ोटो का संबंध दूर-दूर तक ABVP या “ABVP की रैली” से नहीं था। राहुल कंवल के खोखले दावे का सच ख़ुद राहुल कंवल द्वारा शेयर किए गए जनसत्ता के लेख से भी हो गया। इसमें विरोध-प्रदर्शन के लिए स्पष्ट तौर पर आइशी घोष और JNUSU का उल्लेख किया गया था, न कि ABVP का।

जनसत्ता का लेख

JNU में 11 नवंबर के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े JNUSU के पर्चे (Pemphlate) ऑपइंडिया के पास भी हैं।

11 नवंबर 2019 को जेएनयूएसयू विरोध का पैम्फलेट

इस तरह राहुल कंवल के दावे का कोई प्रमाण नहीं है, जो उनकी बात को सही साबित कर सके। विरोध मार्च, जिसे इंडिया टुडे के राहुल कंवल ने “ABVP रैली” करार दिया, वो विरोध-प्रदर्शन JNUSU द्वारा किया गया था, जो वामपंथियों के प्रभुत्व और कॉन्ग्रेस की छात्र शाखा NSUI सहित अन्य वाम संगठनों द्वारा समर्थित है। इसलिए यह कहना ग़लत नहीं होगा कि अक्षत अवस्थी JNUSU कार्यकर्ता तो हो सकते हैं, लेकिन ABVP के सदस्य तो बिलकुल नहीं हो सकते।

यह कई महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, जिनका राहुल कंवल और इंडिया टुडे को जवाब देना चाहिए:

1. यदि इंडिया टुडे को केवल यही साबित करना है कि अक्षत अवस्थी ABVP के सदस्य हैं, तो इस स्टिंग ऑपरेशन को हवा क्यों दी गई?

2. दिल्ली पुलिस द्वारा स्पष्ट रूप से प्रारंभिक संदिग्धों के नाम दिए जाने के बाद भी, इंडिया टुडे ने ग़लत स्टिंग ऑपरेशन का प्रसारण क्यों किया और दिल्ली पुलिस की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। क्या इसके लिए इंडिया टुडे माफ़ी माँगेगा?

3. इंडिया टुडे का इसके पीछे क्या मक़सद था, क्या ABVP के एक सदस्य के नाम पर इंडिया टुडे कोई साज़िश रचने की फ़िराक में था?

4. प्रथम वर्ष का वो छात्र कौन है, जो स्पष्ट रूप से कैमरे पर झूठ बोल रहा था कि उसने साबरमती छात्रावास में हिंसा का आयोजन किया था और कई ABVP कार्यकर्ताओं को बुलाया था?

5. इंडिया टुडे के राहुल कंवल का पैंतरा कहीं वामपंथी दलों की करतूत पर पर्दा डालने की कोशिश तो नहीं थी?

इसके अलावा, इंडिया टुडे के ग्राफ़िक्स भी एक अलग ही इतिहास गढ़ने का कुचक्र रचते दिखे। आजतक पर, अक्षत अवस्थी के बोलने के दूसरे खंड में टाइम स्टैम्प को छिपा दिया गया, इस दौरान एक अजीब सा टाइम स्टैम्प सामने आया है।

Aaj Tak द्वारा अपलोड किए गए वीडियो का स्क्रीनशॉट

अक्षत अवस्थी को दिखाए जाने वाले वीडियो के दूसरे खंड पर टाइम स्टैम्प 22 अक्टूबर 2019 अंकित है। जबकि JNU में हिंसा 5 जनवरी 2020 को हुई थी।

इस सेगमेंट में, अक्षत अवस्थी सामान्य बयान दे रहे थे कि कैसे ABVP के कार्यकर्ताओं को उनके चेहरे पर मास्क लगाने का विचार आया, दिलचस्प बात यह है कि इस सेगमेंट में अक्षत अवस्थी द्वारा 5 जनवरी की हिंसा के बारे में कोई विवरण नहीं बताया गया था।

इसके पीछे हो सकता कि कोई तकनीकी गड़बड़ी रही हो, लेकिन जिस विश्वसनीयता के साथ इंडिया टुडे ने इस ख़बर का प्रसारण किया, उससे उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं। इसलिए इस स्टिंग ऑपरेशन के सन्दर्भ में कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब चैनल और राहुल कंवल को देना होगा:

1. क्या यह सेगमेंट वास्तव में अक्टूबर में ही रिकॉर्ड किया गया था?

2. यदि यह सेगमेंट अक्टूबर में रिकॉर्ड किया गया था, तो क्या इंडिया टुडे के जाँचकर्ताओं ने ABVP को फँसाने के लिए एक तरह की साज़िश रची थी?

3. यदि यह एक तकनीकी गड़बड़ी थी, तो इंडिया टुडे या आजतक ने कोई डिस्क्लेमर क्यों नहीं जोड़ा?

कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब इंडिया टुडे को अपने JNU स्टिंग ऑपरेशन के लिए देना चाहिए और यह स्पष्ट करना चाहिए कि जब दिल्ली पुलिस ने JNU हिंसा के लिए में वामपंथियों के होने का ख़ुलासा कर दिया, बावजूद इसके इंडिया टुडे ने ABVP के छात्र को बदनाम कर वामपंथी छात्र की तरह दिखाने की कोशिश क्यों की?

राहुल कंवल ने आरोप लगाया कि उनके चैनल ने “डर या पक्षपात” के बिना अपना काम किया है। लेकिन अगर JNU की हिंसा पर ​इंडिया टुडे के स्टिंग ऑपरेशन की बात की जाए तो उसका मक़सद दिल्ली पुलिस की छवि को धूमिल करने का था, ऐसा करना चैनल और राहुल कंवल को किसी भी तरह से शोभा नहीं देता।

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JNU हिंसा में धरे गए वामपंथी, 9 की तस्वीर जारी: AISA, AISF, DSF, SFI के कई रंगरूट

मौखिक दस्त से ग्रस्त गालीबाज अनुराग कश्यप शायद पागलपन के कगार पर, CAA को करेंगे f**k

यह मूल ख़बर OpIndia English की एडिटर नुपुर जे शर्मा की है, जिसका अनुवाद प्रीति कमल ने किया है।

हिंदू बनकर छिपा था दाऊद इब्राहिम का शूटर एजाज, आधार कार्ड बनवाने जा रहा था दरभंगा

कुख्यात गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम के शूटर रहे एजाज लकड़वाला की गिरफ्तारी के बाद से कई चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पुलिस की आँखों में धूल झोंकने के लिए एजाज ने तमाम जतन किए। रूप-रंंग बदला। अपनी फर्जी पहचान के हिसाब से जीवनशैली भी बदली। असली पहचान छिपाने के लिए हिंदू नामों का इस्तेमाल किया। इनमें अक्षय प्रीतमदास भाटिया और मनीष आडवाणी जैसे नाम प्रमुख हैं।

फरारी के दौरान अलग-अलग वेशभूषा वह विभिन्न देशों में घूमता रहा। वह फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने लगा था। लेकिन करीब 22 साल की लंबी जद्दोजहद के बाद मुंबई पुलिस ने उसे पटना के मीठापुर बस स्टैंड से पिछले दिनों दबोच लिया था। उसके ख़िलाफ़ हत्या व हत्या के प्रयास के 27 मामले दर्ज हैं। वह 1998 से ही भारत के मोस्ट वॉन्टेड की सूची में शामिल है। उसके ख़िलाफ़ रंगदारी के 80 मामले दर्ज हैं। मुंबई में पले-बढ़े लकड़वाला ने अपने चाचा के ट्रैवेल कम्पनी से करियर की शुरुआत की थी। लेकिन कुछ दिन बाद वह अंडरवर्ल्ड से जुड़ गया। 22 वर्ष की उम्र में ही उसने पहला ख़ून किया था।

एजाज लकड़वाला के बारे में पता चला है कि वो कई वर्षों से काठमांडू में छिपा हुआ था। उसका कारोबार नेपाल की राजधानी काठमांडू से लेकर पोखरा तक फैला हुआ है। उसने होटलों में निवेश से लेकर सोने की तस्करी तक अपने धंधे फैला रखे हैं। मुंबई के सिनेमाई हस्तियों और कारोबारियों से उगाही गई रंगदारी की रकम उसके पास हवाला के जरिए पहुँच रही थी। बेटी सोनिया भी उसके इस धंधे में शामिल थी। उसने हाल ही में एक फ़िल्म कारोबारी से रंगदारी माँगी थी।

बता दें कि सोनिया पहले ही गिरफ़्तार की जा चुकी है। उससे मिली जानकारियों के आधार पर ही एजाज पकड़ा गया था। जब उसे पकड़ा गया तो वह दरभंगा जा रहा था। बताया जा रहा है कि वह दरभंगा से आधार कार्ड बनवाने की फ़िराक़ में था। असल में एजाज एक नई पहचान के लिए बेचैन था। उसे इस बात की भनक मिल गई थी कि मुंबई पुलिस को उसके ठिकाने की खबर लग चुकी है। गृह मंत्रालय से हरी झंडी मिलने के बाद नेपाल में भी भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी ने उस पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया था। आईबी की एक टीम ने एजाज का पता लगा लिया था। एजेंसी को पता था कि वो बिहार के रास्ते भागने का प्रयास करेगा और यही हुआ भी। एजाज लगातार अपनी गाड़ी बदल रहा था और आईबी के लोग भी उसका पीछा करते हुए गाड़ियाँ बदल रहे थे।

एजाज ने पूछताछ में बताया है कि उसने वीरगंज के रास्ते भारत में एंट्री की। वह पटना से दरभंगा जाने वाला था। इससे पहले कि वह फ़र्ज़ी आधार कार्ड बनवाता, वह पकड़ा गया। 3 जनवरी को भी एजाज ने एक उद्योगपति से फोन पर रंगदारी माँगी थी। लकड़वाला इससे पहले भी गिरफ़्तार किया जा चुका है। उसे 1995 में गिरफ़्तार किया गया था लेकिन मात्र 2 साल जेल में रहने के बाद उसे बरी कर दिया गया था। उसे दोबारा फिर गिरफ़्तार कर नासिक जेल में रखा गया। उसने जेल से भागने के लिए मनीष श्याम आडवाणी के नाम से पासपोर्ट बनवाया था।

बाद में उसकी बेटी सोनिया शेख की आईडी कार्ड में उसके पिता का नाम मनीष श्याम पाया गया था। लकड़वाला 1998 में नासिक जेल से भाग निकला। 2003 में उसके और छोटा शकील के गैंग के बीच लड़ाई चलती थी। उसने डी-कम्पनी के सबसे बड़े फिनांसर शरद शेट्टी को मार डाला था। उससे पूछताछ के दौरान कई और राज खुलने की संभावना है।

पटना में क्या कर रहा था दाऊद का गुर्गा एजाज लकड़ावाला, बेटी ने खोल दिए राज

भगोड़े गैंगस्टर एजाज लकड़ावाला की बेटी सोनिया शेख गिरफ़्तार, फर्जी पासपोर्ट पर बच्चे के साथ भाग रही थी विदेश

13 साल की बच्ची से बार-बार संभोग की इच्छा, मना करने पर हुसैन ने किया रेप और एनल सेक्स

हुसैन अब्दुकर ने इन्सजॉन के एक अपार्टमेंट में 13 साल की लड़की का बलात्कार किया। हुसैन ने पीड़ित लड़की के साथ यौन अपराध को इस हवस के साथ अंजाम दिया कि पीड़िता दो दिन तक बैठ नहीं पाई। अपराध के समय आरोपित हुसैन की उम्र 19 वर्ष थी और वह यह बात अच्छी तरह से जानता था कि लड़की की उम्र 15 साल से कम है। बलात्कार की यह घटना 7 मार्च, 2019 को हुई। अब्दुकर सोमालिया का रहने वाला है, जबकि पीड़ित लड़की स्वीडन की है।

हुसैन को 9 मार्च, 2019 को हिरासत में लिया गया और 12 मार्च, 2019 को गिरफ्तार किया गया। आरोपित हुसैन ने नाबालिग पीड़िता के साथ न सिर्फ बलात्कार (वेजाइनल संभोग) किया बल्कि जबरन अप्राकृतिक सेक्स (गुदा मैथुन) भी किया। हैरतअंगेज बात यह रही कि इतने विभत्स अपराध के बावजूद हुसैन को बच्ची के साथ बलात्कार का दोषी नहीं, बल्कि बाल यौन शोषण अपराध का दोषी ठहराया गया। और उसे सजा कितनी मिली? सिर्फ 75 घंटों के लिए समाज सेवा करने का आदेश!

6 मई 2019 को मोरा जिला परिषद ने इस मामले पर फैसला सुनाया और सोमालिया के नागरिक हुसैन अब्दिकादिर अब्दुकर को बाल यौन शोषण के लिए 75 घंटे सेवा करने के साथ ही पीड़िता को 15000 स्वीडिश करेंसी देने की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद इस मामले में सेवा उच्च न्यायालय ने भी फैसला सुनाया। यहाँ भी पीड़िता के साथ उच्च न्यायालय ने न्याय नहीं किया और जिला अदालत की तरह हुसैन को बच्ची के साथ बलात्कार के बजाए बच्ची के यौन शोषण के लिए दोषी ठहराया।

बता दें कि अभियोजक पक्ष ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए तर्क दिया था कि अदालत को हुसैन को बच्चों के यौन शोषण के बजाए बच्चों के साथ बलात्कार के लिए दोषी ठहराया जाना चाहिए, और जेल की सजा दी जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने पीड़िता के असह्य दर्द को मुआवजा देकर रफा-दफा करने पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस वारदात के बाद पीड़िता की मन:स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ा है और यह उसकी पढ़ाई को भी प्रभावित करता है। 

जानकारी के मुताबिक पीड़िता जानती थी कि हुसैन हाईस्कूल के तीसरे वर्ष का छात्र था। पीड़िता ने पुलिस द्वारा की गई पूछताछ के दौरान यह बातें कहीं। उसने बताया कि कुछ महीने पहले वो दोनों मिले थे, जिसके बाद वह चाहता था कि वे केवल एक-दूसरे के साथ समय बिताएँ। मगर लड़की ने इसके लिए मना कर दिया, क्योंकि वह उससे उम्र में काफी बड़ा था। जिसके बाद दोनों की स्नैपचैट पर बात होने लगी। इस दौरान लड़की के उम्र बताने के बावजूद भी हुसैन ने लड़की के सामने बार-बार संभोग की इच्छा जाहिर की थी।

एक दिन जब वो अपनी दोस्तों के साथ मस्ती कर रही थी तो हुसैन ने उससे मिलने की इच्छा जाहिर की। इसके बाद वो लोग ICA में मिले और फिर अपार्टमेंट में गए। इसके बाद पीड़िता ने हुसैन द्वारा जबरन उसे बिस्तर पर लिटाने, उसका कपड़े उतारने और फिर पेनेट्रेशन करने का दर्द बयाँ करती है। पेनेट्रेशन के दर्द के दौरान वो बार-बार अपने दाँतों से जीभ काट लेती थी, जिसकी वजह से उसकी जीभ पर भी लाल निशान हैं। जब लड़की का भाई अपार्टमेंट में आया तो हुसैन ने उसे रोक दिया। हुसैन के हवस का शिकार होने के बाद लड़की दो दिनों तक बैठ नहीं पाई और सोने में भी काफी कठिनाई हुई।

60 सालों तक कॉन्ग्रेस को सत्ता तो जनता समझदार… मोदी को चुना तो ‘मासूम’ या बेवकूफ: वाह चिदंबरम जी वाह!

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का मानना है कि भारतीय लोग काफी भोले-भाले होते हैं, जो सरकार द्वारा जारी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को लेकर किए गए दावों पर आसानी से विश्वास कर लेते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने भारतीय जैसे मासूम कहीं नहीं देखे, जो अखबार में कुछ भी छप जाने पर तुरंत विश्वास कर लेते हैं।

पहली दफा आपको भी उनकी बातों पर विश्वास करना होगा। अब 70 सालों तक देश की जनता पर राज करने वाली पार्टी के वरिष्ठ नेता कह रहे हैं, तो सही ही कह रहे होंगे न! आखिर इन्हें मासूम जनता को इतने सालों तक बेवकूफ बनाने का अच्छा-खासा अनुभव जो है। इनकी पार्टी हर चुनाव में इन ‘मासूम’ जनता को बरगला कर सत्ता में आई और सालों तक देश की जनता का फायदा उठाया।

मगर मेरी समझ में यह बात नहीं आ रही कि उनके शासनकाल में भी यही जनता थी, या फिर बदल गई… क्योंकि इसी जनता ने जब इनकी बातों पर, इनके झूठे वादों पर, इनके कार्यक्रमों पर आसानी से विश्वास कर लिया तो समझदार, लेकिन जब इन्होंने तत्कालीन मोदी सरकार की योजनाओं, कार्यक्रमों पर विश्वास कर लिया तो ‘मासूम’ कैसे? दरअसल इनकी नज़र में मोदी सरकार और उनकी योजनाओं पर विश्वास करने वाली यह जनता मासूम नहीं बेवकूफ है।

यानी कि जब तक जनता ने पूर्व केंद्रीय मंत्री माननीय पी चिदंबरम की पार्टी की योजनाओं और झूठे वादों को बिना कोई सवाल किए, बिना कोई जाँच-पड़ताल किए आँख मूँदकर माना, तो समझदार… लेकिन जैसे ही जनता ने सच्चाई को देख-समझकर, देश हित को देखकर फैसला लेना शुरू किया, तो वो बेवकूफ। सच्चाई तो यह है कि जब से जनता जागरूक हुई है, इन्हें तकलीफ होने लगी, इनके पेट में दर्द होने लगा है, और इसी का विकार इनके मुँह से निकल रहा है।

इनकी पीड़ा को समझा जा सकता है। तकलीफ होने वाली तो बात है ही। इन्हीं ‘मासूम’ जनता ने इन्हें सत्ता से इस कदर खींचकर फेंक निकाला, कि ये फिर वापस से सत्ता सुख पाने का स्वप्न ही देखते रह गए। क्या कीजिएगा चिदंबरम जी! मासूम जनता है, समझ नहीं पा रही है। अगर इन्हें समझ होती तो ये और काफी पहले आपको निकाल फेंकती, जब आपकी सरकार घोटाले पर घोटाले किए जा रही थी और उसके बाद भी आप लगातार सत्ता में आ रहे थे। आपने और आपकी सरकार ने मासूम जनता को बेवकूफ बनाकर इतने घोटाले किए कि आज भी आप और आपकी पार्टी के आलाकमान, शीर्ष नेता जमानत पर घूम रहे हैं।

आज जब जनता सजग हो गई और हर चीज को क्रॉस चेक करके विश्वास करती है, सरकार से सवाल करती है और सच्चाई की तह तक जान के बाद ही सरकार पर विश्वास करती है तो यह मासूम कैसे हो गई। और ये जनता क्यों न करें मोदी सरकार की योजनाओं पर विश्वास… तब जब उन्हें सारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है। किसानों को उनकी सब्सिडी मिल रही है, महिलाओं को उज्जवला योजना के तहत गैस की सुविधा मिली है, बुजुर्गों को वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है, गरीबों को घर मिलने के साथ ही कई अन्य योजनाओं का भी लाभ मिल रहा है।

जहाँ तक आपने बात की आयुष्मान योजना की, तो लोगों को इस योजना का भी बखूबी लाभ मिल रहा है। अगस्त 2019 तक आयुष्मान भारत योजना के तहत जितने मरीजों को अब तक मुफ्त इलाज मिला है, अगर वो अगर इसके दायरे में ना होते तो उन्हें 12 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक खर्च करने पड़ते। यानी कि एक तरह से देश के लाखों गरीब परिवारों के 12 हज़ार करोड़ रुपए की बचत हुई है।

चिदंबरम जी आपने कहा कि आपके ड्राइवर को अस्पताल ने बताया कि उन्हें आयुष्मान भारत जैसी किसी योजना के बारे में जानकारी नहीं है। माफ कीजिएगा, लेकिन कहीं आप अमेठी में राजीव गाँधी चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा संचालित अस्पताल की बात तो नहीं कर रहे! मैं ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्योंकि कुछ दिन पहले ही इस अस्पताल में मौत से लड़ाई लड़ रहा एक गरीब जब आयुष्मान कार्ड लेकर अपना इलाज कराने गया, तो उस गरीब से कहा गया कि ये मोदी का अस्पताल नहीं, जहाँ आयुष्मान कार्ड चल जाए।

मृतक के भतीजे ने बताया था, “जब मैंने अपने चाचा को अस्पताल में भर्ती कराया और कार्ड दिखाया तो अस्पताल के लोगों ने कहा कि यह राहुल गाँधी का अस्पताल है और यहाँ मोदी और योगी का कार्ड नहीं चलता है। हमने कार्ड पर दिए हेल्पलाइन नंबर से भी शिकायत की लेकिन, मदद नहीं मिली और इलाज न हो पाने के कारण मेरे चाचा की मौत हो गई।”

माननीय चिदंबर जी आपका कहना है कि हम मासूम बन रहे हैं। जबकि कई समाचार और आँकड़े सच्चाई से परे होते हैं। आप मासूम तो कतई नहीं हैं। वैसे आपने ये बात बिलकुल सही कही है कि कई समाचार और आँकड़े सच्चाई से परे होते हैं। आपको भी लंबी-लंबी फेंकने से पहले अपनी पार्टी के कृत्यों के बारे में सोच लेना चाहिए, और सच को परखकर ही बोलना चाहिए।

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15 जनवरी के बाद Chhapaak की रिलीज पर रोक: दिल्ली HC का आदेश – चलानी है मूवी तो करो एडिट

दिल्ली हाई कोर्ट ने बॉलिवुड फ़िल्म ‘छपाक’ में एसिड अटैक सर्वाइवर की शिकार हुई लक्ष्मी अग्रवाल का केस लड़ने वाली महिला वकील अपर्णा भट्ट को क्रेडिट देने का आदेश दिया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अपर्णा को क्रेडिट दिए बिना फ़िल्म रिलीज़ पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इसके लिए 15 जनवरी तक मल्टिपलेक्स और अन्य जगहों पर 17 जनवरी तक की मोहलत दी गई है।

दरअसल, बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण अभिनीत फ़िल्म ‘छपाक’ तमाम विवादों के बीच शुक्रवार (10 जनवरी) को सिनेमाघरों में रिलीज़ तो हो गई थी, लेकिन इससे जुड़ा विवाद थमा नहीं था। एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल का केस लड़ने वाली वकील को क्रेडिट देने के निचली अदालत के फ़ैसले के एक दिन बाद Fox Studios और फ़िल्म की निर्देशक मेघना गुलज़ार ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक अपील दायर की थी

फ़िल्म में क्रेडिट न दिए जाने को लेकर महिला वकील अपर्णा भट्ट ने फेसबुक पर लिखा था कि कैसे वे इस बात से नाराज़ हैं कि फ़िल्म छपाक के मेकर्स ने उन्हें अपनी फ़िल्म में कोई क्रेडिट नहीं दिया। उन्होंने ये भी कहा था कि वे इस मामले में क़ानून की मदद लेंगी। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया था कि वो दीपिका पादुकोण और बाकी लोगों के बराबरी की नहीं हैं, लेकिन इस मामले में वे चुप नहीं बैठेंगी।

एसिट अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल का केस लड़ने वाली महिला वकील अपर्णा भट्ट की याचिका पर सुनवाई के बाद, दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने गुरुवार (9 जनवरी) को छपाक की निर्देशक मेघना गुलज़ार को मूवी में वकील को उचित क्रेडिट देने का आदेश दिया था।

कोर्ट के आदेश में महिला वकील के दावों को वैध पाए जाने का उल्लेख था। कोर्ट का कहना था, “यह आवश्यक है कि वास्तविक फुटेज और चित्र प्रदान करके वकील के योगदान को स्वीकार किया जाए।” साथ ही कोर्ट ने निर्माताओं से फ़िल्म स्क्रीनिंग में लाइन जोड़ने के लिए भी कहा कि “अपर्णा भट्ट महिलाओं के प्रति यौन और शारीरिक उत्पीड़न के मामलों से लड़ती रहती हैं।”

इस आदेश में उल्लेख किया गया था कि अगर अपर्णा भट्ट को क्रेडिट दिए बिना वास्तविक फुटेज और छवियों को फ़िल्म की स्क्रीनिंग दिखाई जाती है, तो यह महिला वकील के साथ एक गंभीर अन्याय होगा और यह भट्ट के योगदान और उनके प्रयासों को जनता तक पहुँचाने से भी रोकेगा।

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176 लोगों की मौत… ईरान ने मानी ग़लती, कहा- यूक्रेन के विमान को हमारे ही मिसाइल ने गिराया

तेहरान से उड़ान भरने के कुछ ही मिनट बाद क्रैश हुए यूक्रेन के विमान हादसे की ज़िम्मेदारी ईरान ने ले ली है। ईरान की सरकार की तरफ़ से जारी एक बयान में कहा गया है कि ईरानी मिसाइलों ने ही विमान को ग़लती से निशाना बनाया था। इस विमान हादसे में 176 लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें अधिकतर नागरिक कनाडा और ईरान के थे। अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देश पहले से ही ग़लती से विमान को निशाना बनाए जाने की बात कर रहे थे।

दरअसल, ईरान की नागरिक उड्डयन विभाग के साथ बैठक के बाद पहले से ही इसकी उम्मीद जताई जा रही थी। अब ईरान प्रशासन ने बयान जारी कर यह स्पष्ट कर दिया है कि यूक्रेन का विमान मानवीय भूल के कारण निशाने पर आ गया था। इस हादसे में सवार सभी लोगों की मौत हो गई थी। यूक्रेन इंटरनैशनल के विमान बोइंग 737-800 टेक ऑफ़ के कुछ मिनट बाद ही क्रैश हो गया था। शुरुआत में विमान हादसे का कारण ईरान ने तकनीकी खामी बताया था

शुक्रवार (10 जनवरी) को, न्यू यॉर्क टाइम्स ने एक वीडियो जारी किया था, इसमें तेहरान के हवाई अड्डे के पास एक ईरानी मिसाइल को एक विमान को मार गिराते हुए दिखाया गया। इस वीडियो में दिखाया गया कि हवाई अड्डे के पास एक शहर, परांड के ऊपर एक विमान को निशाना बनाते हुए एक मिसाइल ने उसे निशाना बनाया और तभी एक छोटा धमाका हुआ, लेकिन विमान में विस्फोट नहीं हुआ। जेट कई मिनटों तक उड़ान भरता रहा और हवाई अड्डे की ओर मुड़ गया। वो विमान तब तक अपना सिग्नल संचारित करना बंद कर चुका था, विस्फोट होने से पहले ही हवाई अड्डे की ओर उड़ गया और तेजी से दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

ख़बर के अनुसार, इससे पहले ईरान कई दिनों तक इस बात से इनकार कर रहा था कि उनकी एक मिसाइल ने यूक्रेन के विमान को मार गिराया। लेकिन, अमेरिका और कनाडा ने ख़ुफ़िया जानकारी का हवाला देते हुए कहा था कि उनका मानना है कि ईरान ने ही यूक्रेन के विमान को मार गिराया है। अधिकारियों के अनुसार यूक्रेनी विमान में 167 यात्री और 9 क्री मेंबर मौजूद थे। इनमें 82 ईरानी, कम से कम 63 कनाडाई और 11 यूक्रेनियन नागरिक शामिल थे।

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मौखिक दस्त से ग्रस्त गालीबाज अनुराग कश्यप शायद पागलपन के कगार पर, CAA को करेंगे f**k

‘डरा हुआ मुस्लिम नैरेटिव’ गढ़ने में शुमार रहे गालीबाज अनुराग कश्यप ने 9 अगस्त 2019 को यह कहते हुए अपना ट्विटर अकाउंट डिलीट कर दिया था कि “आप सभी की ख़ुशी और सफलता की कामना करता हूँ। यह मेरा आख़िरी ट्वीट है क्योंकि मैं ट्विटर अकाउंट डिलीट कर रहा हूँ। जब मुझे मेरे दिमाग में जो चल रहा है वो बिना डर के बोलने नहीं दिया जाएगा तो बेहतर है मैं कुछ भी ना बोलूँ। गुड बाय।”

मगर जैसे ही जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंसा हुई, उन्होंने ट्विटर पर वापसी कर ली और आते ही एक बार फिर से ‘डरा हुआ मुस्लिम’ को बचाने के लिए मोदी सरकार और दिल्ली पुलिस पर भड़ास निकाली। इसके बाद अनुराग कश्यप लगातार मोदी सरकार के खिलाफ जहर उगलने में जुटे हुए हैं और साथ ही अपनी मूर्खता का भी परिचय दे रहे हैं।

इसी कड़ी में शनिवार (जनवरी 11, 2019) तड़के एक ट्वीट करते हुए अनुराग कश्यप ने लिखा, “आज CAA लागू हो गया। मोदी को बोलो पहले अपने कागज, अपनी डिग्री इन “entire political science” दिखाए, और अपने बाप का और ख़ानदान का birth सर्टिफ़िकेट दिखाए सारे हिंदुस्तान को। फिर हमसे माँगे। #f**k CAA”

अनुराग कश्यप के इस ट्वीट से साफ नज़र आ रहा है कि वो पागलपन के चरम पर पहुँच चुके हैं। इस पागलपन में प्रधानमंत्री के लिए अभद्र और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते नज़र आ रहे हैं और साथ ही ये स्पष्ट दिख रहा है कि इन्हें चीजों को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है, और न ही इसका ज्ञान है, इन्हें तो बस मोदी सरकार का विरोध करके अपने प्रोपेगेंडा की दुकान चलानी है। क्योंकि अगर इन्होंने एक बार भी अच्छी तरह से नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के बारे में पढ़ा होता, तो इन्हें समझ में आता कि ये कानून देश में रह रहे नागरिकों के लिए नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक आधार पर प्रताड़ित हुए अल्पसंख्यकों को नागरिकता देना है।

मगर इन्हें इन बातों से क्या… इन्हें तो बस मोदी विरोधी राजनीति करके अपने जहरीले प्रोपेगेंडा को हवा देनी है। हालाँकि, अनुराग के इस ट्वीट के बाद यूजर्स ने उनकी जमकर क्लास लगाई। एक यूजर ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “दूसरों को क्यूँ कह रहे हो मोदी को बोलने को? हिम्मत है तो उनको सामने जाकर बोलो कि उनके बाप में दम है या नहीं? और “F**K” को अपनी सड़ी फ़िल्मों में दिखाने के लिए रखो ! #CAA पूरे देश में लागू #IndiaSupportsCAA #CAAJanJagran”

राकेश त्रिपाठी नाम के एक यूजर ने लिखा, “निरा मूर्ख है तू, काश कि तेरे अध्यापक ने कान के नीचे जमा कर कनपुरिया कंटाप दिया होता तो तेरी बुद्धि ठिकाने आ गई होती। #CitizenshipAmendmentAct में किससे सर्टिफिकेट माँगा गया है? मूर्खतापूर्ण बयानबाजी के बाद तेरा सर्टिफिकेट जरूर माँगा जाना चाहिए और शिक्षक पर जुर्माना लगाना चाहिए।”

वहीं एक यूजर ने लिखा कि इस तरह की मूर्खतापूर्ण टिप्पणी करके कृपया वो अपनी स्कूली पढ़ाई का अपमान न करें, क्योंकि स्कूल जाता बच्चा भी जानता है कि CAA किसी भारतीय से संबंधित नहीं है।

कृष्ण कौशिक नाम के एक यूजर ने लिखा, “बेटा तू तो कहाँ से बताएगा। पैदा नहीं assemble हुआ था तू।” एक अन्य यूजर ने लिखा, “तब चीख-चीख वो कहते थे भारत में “डर” लगता है..! अब निकलने की बारी आई तो भारत “घर” लगता है..!!”

गैरतलब है कि अनुराग कश्यप इससे पहले भी पीएम मोदी को अनपढ़ बताया था। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा था, “CAA/CAB कहीं नहीं जाने वाला है। इनके लिए कुछ भी वापस लेना नामुमकिन है क्योंकि वो उनके लिए हार होगी। यह सरकार हर चीज़ को हार-जीत में ही देखती है। इनका ईगो ऐसा है कि सब जल जाएगा, राख हो जाएगा लेकिन मोदी कभी ग़लत नहीं हो सकता। क्यों? क्योंकि अनपढ़ लोग ऐसे ही होते हैं।” हालाँकि इस ट्वीट के बाद भी इनकी काफी फजीहत हुई थी और हालिया ट्वीट के बाद ये साफ हो गया कि कौन अनपढ़ है!

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मैं अनुराग ‘समय’ कश्यप हूँ, मुझे हक़ीक़त से क्या, मेरी जिंदगी का एक्के मकसद है – प्रपंच और प्रलाप चलता रहे

आतंकियों की गिरफ्तारी का बदला! शमीम और तौफिक ने पूरी प्लानिंग के साथ दिन-दहाड़े सब-इंस्पेक्टर को मार डाला

केरल की सीमावर्ती कन्याकुमारी ज़िले में एक वरिष्ठ सब-इंस्पेक्टर की रहस्यमय तरीक़े से हत्या करने के दो दिन बाद, जाँचकर्ताओं ने दोनों आरोपितों की पहचान कर ली है – अब्दुल शमीम (25 वर्ष) और तौफिक (27 साल)। जाँचकर्ताओं ने शमीम को “स्व-घोषित जिहादी” करार दिया है। उन्होंने शक़ जताया है कि इस सप्ताह बेंगलुरु में तीन कथित आतंकवादी संदिग्धों की गिरफ़्तारी का बदला लेने के लिए सब-इंस्पेक्टर की हत्या की गई।

ख़बर के अनुसार, सब-इंस्पेक्टर विल्सन (57 वर्ष) की बुधवार (8 जनवरी) को सुबह साढ़े नौ बजे के क़रीब तमिलनाडु के कालियाक्कविलाई के पास एक चेकपोस्ट पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इसके अलावा, उनके शरीर पर चोट के भी निशान थे। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज से आरोपित की पहचान कन्याकुमारी के शमीम और तौफ़िक (27) के रूप में की है।

पुलिस ने बताया कि शमीम 2014 में एक हिन्दू मुन्नानी नेता की हत्या के मामले में पिछले महीने ज़मानत मिलने के बाद से फ़रार था। एक पुलिस अधिकारी ने बताया, “उसके आत्मसमर्पण करने की संभावना नहीं है। वह एक ऐसा व्यक्ति है, जिसे अगर मौक़ा मिला तो वो गिरफ़्तारी से पहले आत्महत्या कर लेगा।

पुलिस को शुरुआती जाँच में लगा था कि दोनों आरोपित एक SUV कार से चेकपोस्ट पर पहुँचे थे। और कहीं सब-इंस्पेक्टर शमीम को पहचान न ले, इस डर से उसने विल्सन पर गोली चला दी होगी। लेकिन, अब पुलिस का मानना कि अपने संदिग्ध सहयोगियों मोहम्मद हनीफ़ खान (29), इमरान खान (32) और मोहम्मद जैद (24) को बेंगलुरु में गिरफ़्तार किए जाने का बदला लेने के लिए शमीम ने योजनाबद्ध होकर हत्या की वारदात को अंजाम देने की साज़िश रची थी।

पुलिस उप-महानिरीक्षक (तिरुनेल्वेली क्षेत्र) प्रवीण कुमार अबिनपु ने बताया,

“हमने दोनों आरोपितों (विल्सन की हत्या में शामिल) की पहचान कर ली है, हम जल्द ही उन्हें गिरफ़्तार कर लेंगे। हमारे पास जानकारी है कि बुधवार की देर रात हत्या के बाद वो दोनों केरल भाग गए हैं। वाहन जाँच के दौरान हत्या नहीं की गई थी।”

यह पूछे जाने पर कि क्या शमीम के सहयोगियों को गिरफ़्तार किया जाना इस हत्या का मक़सद था और इस हत्या के ज़रिए तमिलनाडु पुलिस को एक संदेश देना भी शामिल था? इसके जवाब में अबिनापु ने कहा, “हमें लगता है कि इस हमले के पीछे वही (सहयोगियों की गिरफ़्तारी) कारण है।”

इंडियन एक्सप्रेस के सूत्रों ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज में शमीम और तौफ़िक को चेकपोस्ट के पास एक जमात कार्यालय की ओर भागते देखा गया। पुलिस ने बताया कि दोनों दूसरे दरवाज़े से भाग गए, जो केरल को जोड़ने वाली सड़क पर खुलता है।

पुलिस के अनुसार, आरोपित शमीम और दो अन्य- एस सैयद अली नवास (25) और सी खाजा मोइदीन (52) को बेंगलुरु में गिरफ़्तार किया गया था। ये तीनों पाँच साल पहले हिन्दू मुन्नानी नेता केपी सुरेश कुमार की हत्या के आरोप में जेल गए थे। पुलिस अधिकारी ने बताया, “वे तीनों ज़मानत पर बाहर आने के बाद एक महीने से अधिक समय से फ़रार थे। शमीम और नवास दोनों कन्याकुमारी से हैं, और मोइद्दीन कुड्डालोर से है।”

हिन्दू नेता सुरेश कुमार की हत्या के अलावा, मोईदीन का हाजा फकरुदीन (42) के साथ भी गहरा रिश्ता था। उसके सम्पर्क में आने के बाद वो आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट में कथित तौर पर युवाओं को भर्ती करने का काम करता था।

2017 में, NIA ने मोईदीन, फकरुदीन और अन्य के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था और 13 मार्च, 2018 को एक आरोप पत्र भी दायर किया था। इसमें आरोप लगाया गया कि था कि मोईदीन ने “जनवरी, 2014 के दौरान सीरिया में ISIS/ ISIL/ Daish में शामिल होने के लिए हाजा फकरुदीन की असलियत जानते हुए उसकी सहायता की।” 12 दिसंबर, 2019 को ज़मानत पर छूटने के बाद, मोईदीन पर आरोप है कि उसने संभावित भर्तियों को जारी रखने के लिए दक्षिण बेंगलुरु क्षेत्र में कई बैठकें कीं।

बेंगलुरु में आयोजित बैठकों का हिस्सा आरोपित शमीम और तौफ़िक भी होते थे, इसमें मोइदीन हिस्सा लेता था। कन्याकुमारी में हत्या की वारदात को अंजाम देने के बाद से पुलिस आरोपितों की तलाश में जुट गई है। जानकारी के अनुसार, हत्या की घटना के करीब तीन दिन पहले शमीम और तौफिक बेंगलुरु में थे।

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फ्री कश्मीर फ्रॉम इस्लामिक टेररिज़्म: कश्मीरी पंडित ने 15 देशों के राजनयिकों को दिखाई ‘हकीकत’

आपने अक्सर कश्मीर में पाकिस्तान जिंदाबाद का नारे लगाते हुए, कभी सेना पर पत्थरबाजी होते हुए तो कभी प्रदर्शनकारियों द्वारा आईएसआई के समर्थन में झण्डा या पोस्टर को लहराते हुए देखा होगा। लेकिन शुक्रवार को जम्मू से एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसे हर एक देशभक्त अपनी आँखों से देखना चाहता है। इसमें दो कश्मीरी पंडित हाथों में एक पोस्टर लहराते हुए देखे गए। कश्मीरी पंडितों के हाथों में लगे इस पोस्टर पर लिखा हुआ था ‘फ्री कश्मीर फ्रॉम इस्लामिक टेररिज़्म’। यह तस्वीर ऐसे समय में सामने आई, जब कश्मीर की हालातों को जायजा लेने के लिए 15 देशों के राजनयिकों का एक प्रतिनिधिमंडल दौरे पर था।

अपने दौरे के दूसरे दिन यानी शुक्रवार (10 जनवरी,2020) को ये राजनयिक जम्मू के जगती प्रवासी टाउनशिप पहुँचे। जब राजनयिक टाउनशिप की ओर जा रहे थे तभी दो कश्मीरी पंडित फ्री कश्मीर फ्रॉम इस्लामिक टेररिज्म का पोस्टर लिए देखे गए।

आए दिन कश्मीर में पाकिस्तानी समर्थक हाथों में पत्थर लिए भारत से आज़ादी की माँग करते हैं। इसकी माँग के लिए वह हिंसक विरोध प्रदर्शन करने से नहीं चूकते। यहाँ तक कि इस दौरान प्रदर्शनकारी सेना पर पत्थरबाजी करने से भी नहीं चूकते। और ऊपर से पाकिस्तान आए दिन भारत की सेना पर कश्मीर में बेगुनाहों पर गोली चलाने और उनके साथ बर्बरता करने का झूठा आरोप लगाता रहता है। यहाँ तक कि पाकिस्तान इस झूठ को विश्व के विभिन्न मंचों पर भी उठाता रहा है। हालाँकि पाकिस्तान को हर जगह से मुँह की खानी पड़ी है।

अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने के बाद पहली बार 15 देशों के राजनयिक केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के दौरे पर हैं। कश्मीर घाटी का जायजा लेने के बाद विदेशी प्रतिनिधियों ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में स्थानीय लोगों ने पाकिस्तान के उन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिनमें पड़ोसी मुल्क द्वारा कहा जा रहा था कि घाटी में रक्तपात हो रहा है। इसके अलावा प्रतिनिधियों ने बताया कि कश्मीर के लोग पाकिस्तान के झूठ को पूरी तरह से खारिज करते हैं और वहाँ के लोगों का कहना है कि वो पाकिस्तान को एक इंच भी जमीन नहीं देंगे। साथ ही लोगों ने जम्मू-कश्मीर में हत्याओं के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया और विदेशी राजनयिकों को पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए कहा। इससे पहले यूरोपीय संसद के सांसदों के एक समूह ने जमीनी हकीकत जानने के लिए जम्मू-कश्मीर का दौरा किया था।

दो दिवसीय यात्रा के पहले दिन के दौरान प्रतिनिधिमंडल श्रीनगर में सामान्य स्थिति के गवाह भी बने। उन्होंने कहा कि श्रीनगर की सड़कों पर आम दिन की तरह ही दुकानें खुलीं और सब कुछ बिलकुल सामान्य रहा। प्रतिनिधिमंडल ने जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक नेताओं से भी मुलाकात की थी। उनको सेना के 15 कोर मुख्यालय भी ले जाया गया, जहाँ उन्हें सेना के शीर्ष कमांडरों द्वारा कश्मीर में सुरक्षा स्थिति के बारे में जानकारी दी गई। विदेशी राजनयिकों के प्रतिनिधिमंडल ने सिविल सोसायटी के सदस्यों और स्थानीय मीडिया से भी मुलाकात की।

पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का नहीं? शशि थरूर ने भारत का ग़लत नक़्शा पोस्ट कर तो यही संदेश दिया!

जम्मू-कश्मीर में इस ‘साहसिक’ कदम के लिए अमेरिकी कॉन्ग्रेस के सांसद ने की मोदी की सराहना

जम्मू-कश्मीर में वर्षों से बंद 50 हजार मंदिर खोलने की तैयारी में सरकार, जल्द होगा सर्वे: गृह राज्यमंत्री