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IIM-A के 90 से अधिक पूर्व छात्रों ने दिया CAA को समर्थन, पूरे देश में NRC लागू करने की माँग

देश में नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के समर्थन में अब IIM अहमदाबाद के 90 से अधिक पूर्व छात्रों ने समर्थन जाहिर किया है। इन छात्रों ने पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को भी जल्द लागू करने की माँग उठाई है।

वर्तमान में पूरे विश्वभर में अलग-अलग स्थानों पर नौकरी कर रहे IIM अहमदाबाद के 90 से अधिक छात्रों ने CAA के समर्थन में एक याचिका दायर की है। इन पूर्व छात्रों का कहना है कि CAA के साथ NRC लागू किए जाने से देश में किसी भी समुदाय को कोई खतरा नहीं है और इसके विरोध में झूठ और अफवाहें सिर्फ हिंसा फैलाने के लिए गढ़े जा रहे हैं। इसके अलावा इन छात्रों ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा संशोधित किया गया NRC देश के लिए बेहद जरुरी है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन छात्रों ने देश भर में इस कानून (CAA) के विरोध में किए गए हिंसक प्रदर्शनों और पुलिस द्वारा शान्तिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ भी भारी पुलिस बल इस्तेमाल करने के लिए उनकी निंदा की है। IIM अहमदाबाद के इन पूर्व छात्रों का मानना है कि देशभर में NRC लागू किए जाने से पड़ोसी देशों से भारत में घुसने वाले अवैध आप्रवासियों पर रोक लगेगी। बांग्लादेश द्वारा अपने नागरिकों को वापस बुलाने के लिए किए गए सहयोग की ओर इशारा करते हुए पूर्व छात्रों ने याचिका में लिखा है कि भारत NRC वाला अकेला देश नहीं है।

ज्ञात हो कि नागरिकता कानून को लेकर देशभर में एवं कई विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन किए जा रहे हैं। एक बड़ा वर्ग यदि इस कानून के समर्थन में है तो वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इस कानून सम्बंधित अफवाहों के माध्यम से लगातार हिंसा भड़काने का कार्य भी कर रहे हैं।

छात्रों द्वारा दायर याचिका की प्रति –

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जिन-जिन लोगों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं, उनके नाम (ज्ञात कारणों से) छिपा लिए गए हैं

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देश भले ही मंदी के दौर से गुज़र रहा हो लेकिन देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों को चन्दा मिलने में कोई कमी नहीं आई है। कमी तो बहुत दूर दोनों ही पार्टियों को छप्पर फाड़कर चंदा मिला है। इतना ही नहीं कॉन्ग्रेस जैसी विपक्षी पार्टी भी इसमें पीछे नहीं रही। 2017-18 की तुलना में कॉन्ग्रेस ने अपनी आय में करीब चार गुना इजाफा किया है। पार्टी के चुनावी बॉन्ड की बात करें तो यह 5 करोड़ रुपए से बढ़कर 383 करोड़ रुपए पर पहुँच गई। सभी पार्टियों ने अपनी-अपनी ऑडिट रिपोर्ट को चुनाव आयोग को सौंप दिया है, वहीं से यह डेटा लिया गया है।

दरअसल कॉन्ग्रेस की पिछले वर्ष 2017-18 में आय कुल 199 करोड़ रूपए थी जो कि इस वर्ष 2018-19 में बढ़कर 918 करोड़ रुपए हो गई है। इसी के साथ कॉन्ग्रेस पार्टी की आय में करीब 361 प्रतिशत का इज़ाफा हुआ है। इस आय में 383 करोड़ रुपए चुनावी बॉन्ड से आए हैं, जो कि पिछले वर्ष यह राशि मात्र 5 करोड़ रुपए थी। हालाँकि कॉन्ग्रेस की आय भाजपा की आय के आधे से भी कम है।

वहीं देश सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी(BJP) की बात करें तो 2410 करोड़ रुपए के साथ बीजेपी की आय दो गुनी हुई है। अग़र वर्ष 2017-18 की बात करें तो बीजेपी की आय 1027 करोड़ रुपए थी। इस साल पार्टी की आय में करीब 134 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। वहीं इस आय में 1450 करोड़ यानी कि करीब 60 प्रतिशत हिस्सा चुनावी बॉन्ड के ज़रिए मिला है। वहीं पार्टी को पिछले वर्ष मात्र 210 करोड़ रुपए चुनावी बॉन्ड के जरिए मिले थे। बता दें कि बीजेपी को देश के सभी राजनीतिक दलों में सबसे अधिक चंदा मिला है।

दरअसल भारतीय स्टेट बैंक (SBI) राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने के लिए चुनावी बॉन्ड ज़ारी करता है और इन पर नोटों की तरह कीमत छपी होती है। चुनावी बॉन्ड्स एक हजार, दस हजार, एक लाख, 10 लाख और एक करोड़ रुपए के मल्टीपल्स में खरीदे जा सकते हैं और ये ब्याज मुक्त होते हैं। इसे कोई भी व्यक्ति या कंपनी ख़रीद सकती है और उसे 15 दिन के अंदर इसे अपनी मनपसंद राजनीतिक पार्टी को देना होता है। हालाँकि इस ऑडिट रिपोर्ट के आने के बाद चुनावी बॉन्ड्स को लेकर राजनीतिक दलों में विवाद छिड़ गया है।

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बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण अभिनीत फ़िल्म ‘छपाक’ तमाम विवादों के बीच अपनी तय दिन यानी शुक्रवार (10 जनवरी) को सिनेमाघरों में रिलीज़ तो हो गई, लेकिन इससे जुड़ा विवाद अभी भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल का केस लड़ने वाली वकील को क्रेडिट देने के निचली अदालत के फ़ैसले के एक दिन बाद Fox Studios और फ़िल्म की निर्देशक मेघना गुलज़ार ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक अपील दायर की है

पटियाला हाउस कोर्ट में अपने आपराधिक मुक़दमे में एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल का केस लड़ने वाली अपर्णा भट्ट ने फ़िल्म ‘छपाक’ की रिलीज़ से ठीक पहले उसकी रिलीजिंग पर रोक लगाने की याचिका दायर की थी।

फ़िल्म में क्रेडिट न दिए जाने को लेकर महिला वकील अपर्णा भट्ट ने फेसबुक पर लिखा था कि कैसे वे इस बात से नाराज़ हैं कि फ़िल्म छपाक के मेकर्स ने उन्हें अपनी फ़िल्म में कोई क्रेडिट नहीं दिया। उन्होंने ये भी कहा था कि वे इस मामले में क़ानून की मदद लेंगी। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया था कि वो दीपिका पादुकोण और बाकी लोगों के बराबरी की नहीं हैं, लेकिन इस मामले में वे चुप नहीं बैठेंगी।

एसिट अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल का केस लड़ने वाली महिला वकील अपर्णा भट्ट की याचिका पर सुनवाई के बाद, दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने गुरुवार (9 जनवरी) को छपाक की निर्देशक मेघना गुलज़ार को मूवी में वकील को उचित क्रेडिट देने का आदेश दिया था।

कोर्ट के आदेश में महिला वकील के दावों को वैध पाए जाने का उल्लेख था। कोर्ट का कहना था, “यह आवश्यक है कि वास्तविक फुटेज और चित्र प्रदान करके वकील के योगदान को स्वीकार किया जाए।” साथ ही कोर्ट ने निर्माताओं से फ़िल्म स्क्रीनिंग में लाइन जोड़ने के लिए भी कहा कि “अपर्णा भट्ट महिलाओं के प्रति यौन और शारीरिक उत्पीड़न के मामलों से लड़ती रहती हैं।”

इस आदेश में उल्लेख किया गया था कि अगर अपर्णा भट्ट को क्रेडिट दिए बिना वास्तविक फुटेज और छवियों को फ़िल्म की स्क्रीनिंग दिखाई जाती है, तो यह महिला वकील के साथ एक गंभीर अन्याय होगा और यह भट्ट के योगदान और उनके प्रयासों को जनता तक पहुँचाने से भी रोकेगा।

बॉलीवुड फ़िल्म ‘छपाक’ लगातार विवादों से घिरती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ़ अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने फ़िल्म के प्रमोशन का दाँव खेलते हुए मंगलवार (7 जनवरी) को JNU हिंसा में वामपंथी छात्रों से मिलकर एक और विवाद को हवा दे डाली। दीपिका पादुकोण उन वामपंथी छात्रों के समर्थन में खड़ी थीं, जिन्होंने शीतकालीन सेमेस्टर के लिए पंजीकरण कराने वाले छात्रों के साथ न सिर्फ़ हिंसा की बल्कि सर्वर रूम पर क़ब्ज़ा कर पूरी पंजीकरम व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया था।

पादुकोण ने, छात्रों के साथ अपनी एकजुटता दिखाने के लिए, पंजीकरण की प्रक्रिया के दौरान वामपंथी गुंडों द्वारा पीटे गए असली पीड़ितों की अनदेखी करते हुए आरोपित आइशी घोष और उसके दोस्तों से मुलाक़ात की।

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प्रियंका गाँधी के साथ UP कॉन्ग्रेस अध्यक्ष नाव से गंगा के रास्ते जा रहे थे रामघाट, लहरों में जा गिरे

कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव व यूपी प्रभारी प्रियंका गाँधी शुक्रवार (जनवरी 10, 2019) को वाराणसी पहुँचीं। वो यहाँ पर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ गिरफ्तार हुए लोगों से मिलने गईं थीं। उन्होंने पहले राजघाट पर स्थित रविदास मंदिर में दर्शन किया। इसके बाद वह नाव से गंगा के रास्ते रामघाट पहुँचीं।

इस दौरान प्रियंका के साथ नाव पर जाते वक्त यूपी कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अजय सिंह लल्लू गंगा की लहरों में जा गिरे। नाव पर चढ़ते समय संतुलन बिगड़ गया, जिससे अजय सिंह का पाँव फिसला और वो गंगा में गिर गए। हालाँकि वहाँ मौजूद सुरक्षाकमिर्यों और कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने उन्हें तुरंत संभाल लिया। 

रविदास मंदिर में दर्शन करने के बाद प्रियंका गाँधी ने विजिटर बुक में लिखा, “मैं लंबे समय से यहाँ आना चाहती थी। रविदास मंदिर में दर्शन करने की मेरी इच्छा आज पूरी हो गई है। रविदास समुदाय के लोगों और मंदिर के सभी सेवादारों को बहुत-बहुत बधाई और धन्यवाद।” इसके बाद उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर में भी दर्शन किया।

इस दौरान प्रियंका गाँधी ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्रों समेत 59 लोगों से मिली, जो कि 19 दिसंबर 2019 को सीएए के खिलाफ विरोध करने को लेकर जेल गए थे। हाल ही में वो जमानत पर रिहा हुए थे। प्रियंका गाँधी ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी एक ऐसी लीगल सेल बनाएगी, जो सीएए के विरोध में देश भर में जेल जाने वाले लोगों को मुकदमा लड़ने में न्यायिक सहायता दे सके। आगे प्रियंका ने कहा कि CAA के विरोध में जेल जाने वालों के साथ उनकी पार्टी खड़ी है। कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार आएगी तो सभी के मुकदमे खत्म किए जाएँगे। इस समय मुकदमा लड़ने में कॉन्ग्रेस पार्टी मदद करेगी। 

हालाँकि, इस दौरान कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं और मीडिया को मंदिर से दूर रखा गया, जिसका कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं ने विरोध किया। कार्यकर्ताओं ने अपनी ही पार्टी के नेताओं पर आरोप लगाया कि वे उन्हें प्रियंका से मिलने नहीं दे रहे। पंचगंगा घाट और राजघाट पर प्रियंका गाँधी से मिलने गए कार्यकर्ता रोके जाने पर नाराज होकर आपस में ही भिड़ गए और वहाँ उत्पात भी मचाया जिससे थोड़ी देर के लिए अफरा-तफरी मच गई। कार्यकर्ता इतने पर भी नहीं रूके और राजघाट पर प्रियंका से मिलने के लिए जमकर धक्का-मुक्की भी की। 

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इंडिया टुडे के जासूस पत्रकार जमशेद खान ने ‘पैदा किया’ ABVP छात्र नेता, ABVP ने किया इंकार

इंडिया टुडे ने दावा किया है कि उनकी खोजी पत्रकारों की एक टुकड़ी ने JNU हिंसा के आरोपित को पकड़ लिया है। हालाँकि ABVP ने किसी अक्षत अवस्थी के ABVP से जुड़े होने की खबर से साफ़ इंकार कर दिया है।

इंडिया टुडे ने एक वीडियो ट्वीट करते हुए कहा है कि JNU हिंसा पर उनके द्वारा की गयी ‘मेगा इन्वेस्टिगेशन’ का यह पहला पार्ट है। इंडिया टुडे समूह के पत्रकार राहुल कंवल इस वीडियो में बता रहे हैं कि किस प्रकार उनके 2 खोजी पत्रकारों- जमशेद खान और नितिन जैन की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ने कथित ABVP कार्यकर्ता अक्षत अवस्थी का पर्दाफाश किया है।

इंडिया टुडे के अनुसार, अक्षत अवस्थी JNU में BA प्रथम वर्ष के छात्र हैं और वो JNU में 5 जनवरी को हुई हिंसा के पहले आरोपित हैं। इस वीडियो में अक्षत नाम का यह युवक बता रहा है कि हिंसा की रात उसने पेरियार हॉस्टल से डंडा निकाला था। इस वीडियो में अक्षत नाम के युवक को यह भी कहते देखा जा रहा है कि वह कानपुर से है और वहाँ यह सब आम है।

इसके जवाब में ABVP ने अपने ट्विटर अकाउंट से ट्वीट में लिखा है कि अक्षत अवस्थी नाम का कोई भी छात्र ABVP से नहीं जुड़ा हुआ है। ट्वीट में स्पष्टीकरण देते हुए लिखा गया है- “जैसा कि इंडिया टुडे समूह दवा कर रहा है, अक्षत अवस्थी ना ही ABVP कार्यकर्ता है और ना ही उनके पास ABVP में कोई पद है। इंडिया टुडे समूह द्वारा यह कैम्पेन सिर्फ तथ्यों से ध्यान भटकाने के लिए चलाया जा रहा है।”

ख़ास बात यह है कि इंडिया टुडे अपनी इन्वेस्टिगेशन का यह वीडियो लेकर ऐसे समय में आया है जब दिल्ली क्राइम ब्रांच के डीसीपी ने JNU में हुई हिंसा का खुलासा करते हुए इसमें 4 लेफ्ट ग्रुप का हाथ बताया है। उन्होंने कहा कि व्हाट्सएप ग्रुप, प्राइम विटनेस के आधार पर आरोपितों तक पहुँचना मुमकिन हो सका, क्योंकि विश्विद्यालय के छात्रों ने 4 जनवरी को सीसीटीवी को डैमेज कर दिया था।

डीसीपी का कहना है कि 4 जनवरी को ही जेएनयू के सीसीटीवी को डैमेज कर दिया गया था, जिसकी वजह से जाँच करने में काफी दिक्कतें हुईं। हालाँकि वहाँ पर मौजूद लोगों के द्वारा मोबाइल से बनाए वीडियो और विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसमें काफी मदद की। पुलिस ने अब तक सभी आरोपितों की तस्वीरें भी जारी कर दी है।

ऐसे में इंडिया टुडे समूह की इस ‘मेगा इन्वेस्टिगेशन’ की सच्चाई संदेहास्पद ही मानी जा सकती है।

शिकारा: कश्मीरी पंडितों की कहानी के वो हिस्से जो अब तक छुपाए गए हैं!

पहली बार ऐसा है, जब एक महीने का इंतज़ार काफी लंबा लग रहा है। पहली बार लग रहा है कि हर एक दिन गिनना पड़ेगा शायद, या दिन मुश्किल से कटे। वो भी किसलिए? एक मूवी के लिए। मूवी, एक ऐसे सब्जेक्ट पर है जिस पर कभी किसी ने मुँह खोला तो आस-पास से सबने होंठों पर उंगलियाँ रखवाईं। ऐसा सब्जेक्ट जिस पर देश की सरकारों ने अपना मुँह तो सिला ही साथ ही उस समय की मीडिया ने भी मुँह सिल लिया था और तथाकथित सेक्युलरों, बुद्धिजीवियों ने तो हमेशा ही इस विषय को लेकर गाँधी जी के तीन बंदरों की तरह आँख, कान और मुँह ढँक लिया। बस उनका संदेश उन बंदरों से अलग था।

उन तथाकथित सेक्युलरों, बुद्धिजीवियों का संदेश था कि, देश में अगर कहीं बहुसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है तो चुप रहो, उधर मत देखो, उनकी मत सुनो फिर भले ही वो दर्द से चीख-चिल्ला रहे हों; उनका सब लुट चुका हो, वो अपने ही मकानों से उजाड़े जा रहे हों; कोई उनके ही घर में घुस कर उनके घरों को जला दे, उनकी बहु-बेटियों का बलात्कार करे लेकिन उधर मत देखो, इस पर मत बोलो, उनकी चीखें मत सुनो। 

आखिर क्यों? क्योंकि इस देश में वो बहुसंख्यक हैं। इनके लिए बोलने पर देश की धर्मनिरपेक्षता खतरे में आ जाएगी, इनका साथ दे देने पर ‘बुद्धिजीवी’ नाम का तमगा हाथ से छीन जाएगा। क्योंकि ये कभी न तो बुद्धिजीवी रहे न ही धर्मनिरपेक्ष। क्यों इस देश में धर्मनिरपेक्ष होने का मतलब सिर्फ ’एंटी मेजोरिटी’ बन कर रह गया? ये सवाल उन तथाकथित सेक्युलरों और बुद्धिजीवियों के तबके के मुँह पर ऐसा सवाल है, जिसका जवाब शायद उन्हें कहीं और कभी नहीं मिलेगा।

लेकिन आज उस घटना के 29 सालों के बाद कुछ लोगों ने हिम्मत जुटाई है। जब जनता इन तथाकथित सेक्युलरों और बुद्धिजीवियों के साज़िश से निकल रही है। आज इनका घिनौना सच सामने आ रहा है क्योंकि आज जनता के सामने सोशल मीडिया से लेकर कई तरह के अन्य साधन हैं, जहाँ से वो सटीक जानकारियों तक पहुँच सकते हैं। आज जनता को सूचनाओं के लिए बिके हुए मीडिया संस्थान के आसरे नहीं रहना पड़ रहा है।

आज जब ऐसी सरकार है, जो वाकई धर्मनिरपेक्षता को धर्मनिरपेक्षता के रूप में ही देखती है न कि बहुसंख्यकों के बेवज़ह विरोध को या मुस्लिमों के तुष्टिकरण को धर्मनिरपेक्षता कहती है, तब किसी ने इस विषय को छुआ है और इस पर एक फिल्म बनाई है। वो फिल्म है ‘शिकारा’ और इसका विषय है वर्ष 1990 में कश्मीर से निकाले गए कश्मीरी पंडित।

जनवरी 1990 में अलगाववादियों और आतंकियों ने मिलकर कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को उन्हीं के घर से उन्हें निकाल दिया, उन्हीं की ज़मीन से उन्हें बेदखल किया, कश्मीरी पंडितों की औरतों से नृशंसतापूर्वक बलात्कार किया, उनकी हत्याएँ की। ऐसा न केवल साधारण कश्मीरी पंडित बल्कि, ऐसे कश्मीरी पंडितों के भी साथ हुआ, जो सरकारी ओहदे पर थे। उन दिनों में चरमपंथी, अलगाववादी इश्तिहारों, पोस्टरों के ज़रिए कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने के लिए धमकाते थे, फिर सामने आकर लोग डराने लगे तब भी उन्हें आशा थी कि ये 7-8 लाख लोगों का मामला है, सरकार जल्द ही कुछ करेगी।

सरकार जल्द ही कोई भरोसेमंद कदम उठाएगी, बुद्धिजीवी कुछ तो बोलेंगे, मीडिया लोगों तक उनकी बात पहुँचाएगी। यह सोचकर वो कश्मीरी पंडित कश्मीर में रुके रहे किंतु कहीं से कोई मदद नहीं आई और अंततः 19 जनवरी 1990 की रात को लाखों कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से भागना पड़ा।

जाइए जम्मू के जगती कैंप में और देखिए अपने ही देश में अपने ही घर, अपनी जमीन से भगा दिए गए लोग कैसे रह रहे हैं! जाइए दिल्ली के मजनू का टीला और देखिए वहाँ के कश्मीरी पंडितों के कुछ परिवारों की हालत। देखिए उनकी महिलाएँ क्या काम करने को मजबूर हैं! इनके लिए संविधान क्या कहता था 1990 में? इनके लिए संविधान अब क्या कहता है? इसके लिए न्यायपालिका क्या कह रही थी 1990 में? इनके लिए न्यायपालिका अब क्या कह रही है? इनको फिर से बसाने के लिए क्या किया जा रहा है?

ऐसा नहीं कि विस्थापित कश्मीरी पंडित अपने-अपने घरों को नहीं लौटना चाहते, लेकिन उनका सवाल है और जायज सवाल है, “हमारी सुरक्षा की गारंटी कौन देगा और वापस लौटकर हम अपनी रोज़ी रोटी कैसे कमाएँगे? वो लोग इस समय कहीं नहीं हैं, उनका अपना कुछ नहीं है। उनका रेजिडेंस प्रूफ रोज बदलता है, जिनके अपने ढेर सारे कमरों वाला मकान था।

कहाँ हैं वो धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी? कहाँ है वो प्रगतिशील मुस्लिमों का झुंड, जो तब तो हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई की माला जपने लगते हैं जब कम संख्या में होते हैं और संख्या में बढ़ते ही उस जगह को हिन्दुओं या अन्य धर्म के लोगों के लिए नरक बना देते हैं? क्यों नहीं उस वक़्त उन्होंने वो एकता दिखाई? क्यों नहीं वो सड़कों पर आए? आखिर क्यों?

आखिर क्यों हर बार इस देश में बहुसंख्यकों से ही उम्मीद कि जाती है कि वही चुप रहे? क्यों बहुसंख्यक, बहुसंख्यक होने की कीमत चुका रहा? क्यों बहुसंख्यक को कहा जाता है कि वो अपनी रोटी का हिस्सा मुस्लिमों को दे जबकि वही मुस्लिम जैसे ही किसी जगह पर बहुसंख्यक की स्थिति में आते हैं, वैसे ही हिन्दुओं के हिस्से की रोटी तो छीन कर खा ही जाते हैं, साथ में उनकी बहू-बेटियों को भी नहीं बख्शते हैं।

आज भी उन सबके मुँह सिले हुए हैं, जिनके मुँह आज से 29 साल पहले सिले हुए थे। लेकिन आज एक सरकार है, जो अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करने के लिए बहुसंख्यकों को सताती नहीं है कम से कम। मेजॉरिटी को मेजॉरिटी होने की कीमत चुकानी नहीं पड़ती है कम से कम। इसलिए किसी ने कोशिश की है इस विषय पर मूवी बनाने की और वाकई हर दिन उंगली पर गिना जाएगा अब तो। पहली बार किसी मूवी को पहले ही दिन देखना है। नोट किया जाए, 7 फरवरी, 2020 को ‘शिकारा’ रिलीज़ हो रही है।

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ईसाई प्रचारक का अपहरण कर 4 मुस्लिमों ने की लूटपाट, कहा- इस्लाम कबूल करो, नहीं तो चाकू मार देंगे

नॉर्वे के ट्रोंडहेम में इस्लामिक कट्टरपंथी का चेहरा पर्दाफाश हुआ है। जहाँ चार मुस्लिम युवकों ने एक ईसाई मार्ग-उपदेशक (स्ट्रीट प्रीचर) के साथ पहले मारपीट की, उन्हें लूटा और फिर उनके आगे विकल्प रखा कि या तो वो इस्लाम कबूल कर लें, नहीं तो वे उन्हें जान से मार देंगे। पीड़ित की पहचान रोर फ्लॉटम के रूप में हुई है और घटना 28 नवंबर की है।

बार्नाबस फंड की रिपोर्ट के अनुसार रोर ने बताया कि वे लगातार घूम-घूमकर लोगों को धार्मिक उपदेश देते हैं। साथ ही बीमार लोगों के लिए सड़कों पर प्रार्थना भी करते हैं। लेकिन, 28 नवंबर को उनकी मुलाकात चार लोगों से हुई, जो चाहते थे कि फ्लॉटम उनके घायल दोस्त के लिए प्रार्थना करें।

हालाँकि, पहले इन लोगों ने रोर से कहा कि उनके दोस्त के पाँव में चोट आई है, जो एंबुलेंस का इंतजार कर रहा है। लेकिन बाद में इन्होंने फ्लॉटम को सीढ़ी से नीचे ढकेल दिया। उनसे मारपीट की। उनका मोबाइल फोन, बैंक कार्ड छीन लिया। उनके बैंक अकॉउंट से 10,000 क्रोना (1000$) निकाले और उन्हें बंधक बना लिया। इसके बाद अपहरणकर्ताओं ने धर्म उपदेशक पर दबाव बनाया कि वे अरबी शब्दों को उनके पीछे दोहराएँ। दरअसल, वे चाहते थे कि रोर इस्लाम कबूल कर लें।

फ्लॉटम के अनुसार, “वे चारों लोग चाहते थे कि मैं अरेबिक में वो शब्द बोलूँ। मैं डर गया था और मेरे मन में ख्याल आ रहा था कि वे मुझे मार देंगे क्योंकि उन्होंने कहा था कि उनके पास चाकू है और उन्हें कोई गवाह नहीं चाहिए।”

गौरतलब है कि ये पूरा मामला लगभग डेढ़ महीने पुराना हो चुका है। इसपर जाँच अभी भी चल रही है। लेकिन फिलहाल अभी तक इसमें कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है।

फ्लॉटम आज भी काफी इस घटना पर यकीन नहीं कर पाते कि उनके साथ ऐसा कुछ हुआ। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उनका कहना है कि वे बतौर उपदेशक दोबारा सड़कों पर निकलकर अपना कार्य करने पर विचार कर रहे हैं।

उनका कहना है, “मैं सड़कों पर बहुत निकलता हूँ, लेकिन ऐसा मैंने कभी महसूस नहीं किया था। मेरे लिए वो दिन अभी भी कल जैसा है। इस घटना के बाद मैं बहुत आघात हूँ। लेकिन मुझे नहीं लगता कि ये घटना मुझे मेरा काम करने से रोकेगी। मैं सिर्फ़ लोगों को ईश्वर के प्रेम के बारे में बताता हूँ।” बता दें कि नॉर्वे में 5.7 प्रतिशत जनता मुस्लिम की है। जिनमें सुन्नी समुदाय के मुस्लिम बहुसंख्यक हैं और शिया मुस्लिम अल्पसंख्यक।

महबूर मियाँ ने नाबालिग लड़की को प्रेमजाल में फँसाया, फिर 2 दोस्तों के साथ रेप के बाद पेट्रोल से जला डाला

पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर के कुमारगंज इलाके में 17 साल की लड़की (राधा, बदला हुआ नाम) के साथ गैंगरेप के बाद हुई हत्या मामले ने अब न सिर्फ पूरे राज्य बल्कि देश भर में तूल पकड़ लिया है। सोमवार को मामला प्रकाश में आने के बाद पुलिस ने तीन लोगों को शक के आधार पर गिरफ्तार किया। आरोपितों की पहचान महबूर मियाँ, पंकज बर्मन और गौतम बर्मन के तौर पर हुई थी।

सोमवार तक आशंका जताई जा रही थी कि इन्हीं तीनों ने नाबालिगों के साथ हुई पूरी वारदात को अंजाम दिया। लेकिन अब आशंका की जगह पुष्टि हो चुकी है कि इस जघन्य अपराध को अंजाम देने के पीछे इन्हीं तीनों का हाथ है। महबूर, पंकज, गौतम ने ही रविवार को लड़की का पहले बलात्कार किया। फिर उसे तेजधार वाले हथियार से मारा। उसके बाद उसमें पेट्रोल छिड़ककर आग लगाई और बाद में शव कुत्तों के पास नोचने के लिए छोड़ गए। सुबह आधे बचे शव को गाँव वालों ने देखा और पुलिस को सूचना दी। जिसके बाद पूरे मामले पर जाँच शुरू हुई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने बताया कि पीड़िता और इस अपराध के पीछे का मास्टमाइंड महबूर मियाँ खान पिछले एक साल से संबंध में थे। रविवार को लड़की अपने घर से बाजार जाने को कहकर निकली थी। लेकिन महबूर उसे अपने साथ बेलखोर इलाके में सुनसान जगह ले गया। यहाँ उसने अपने दोस्त पंकज बर्मन और गौतम बर्मन को भी आने को कहा हुआ था।

पुलिस के मुताबिक इन्हीं तीनों ने लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उसे मारा। फिर सबूत मिटाने के लिए उस पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी। सोमवार को लड़की का शव स्थानीय लोगों को सफानगर और अशोकग्राम के बीच एक पुलिया के नीचे से बरामद हुआ। स्थानीय लोगों के अनुसार इलाके से गुजरते हुए उन्होंने पहले कुछ कुत्तों को माँस के टुकड़े के लिए लड़ते देखा, फिर उन्हें पुलिया पर खून नजर आया। जब उन्होंने पास जाकर देखा तो वहाँ एक शव पड़ा था। जिसे कुत्ते और सियार आधा खा चुके थे।

बता दें कि इस मामले में पुलिस ने शुरुआती जाँच के बाद तीनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया था। साथ ही बलूरघाट सत्र अदालत के समक्ष पेश करके इन्हें 10 दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया था।

गौरतलब है कि इस मामले के तूल पकड़ने के बाद सोशल मीडिया पर भी 17 साल की लड़की के लिए न्याय दिलाने की गुहार लगाई जा रही है। भाजपा भी इस पूरे मामले पर ममता सरकार को लगातार कटघरे में खड़ा कर रहा है और बंगाल को दुष्कर्म राज्य करार दिया है।

बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और पश्चिम बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने ट्वीट ममता बनर्जी पर निशाना साधा। उन्‍होंने कहा, “जिस राज्य की मुख्यमंत्री (ममता) महिला हो, वहाँ महिला सुरक्षा का खास ध्यान रखा जाता है लेकिन पश्चिम बंगाल में मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म की वारदात लगातार हो रही है। कानून व्यवस्था भंग है। बेलूरघाट की बच्ची को न्याय कब मिलेगा।”

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नेता किसी भी देश, समाज और समय की रफ्तार और दिशा पर पूरा नियंत्रण रखते हैं और यही वजह है कि जब भी इतिहास लिखा जाता है, अच्छा या बुरा, उसे इन नेताओं की छाया से होकर गुजरना ही होता है। भारत को तोड़कर पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुल्क की रूपरेखा रखे जाने और मजहब के नाम पर इस नए देश के सृजन के बहुत किस्से और कहानियाँ हैं। इन्हीं किस्सों में सबसे अहम योगदान तत्कालीन नेताओं का भी देखने को मिलता है। इसमें मोहम्मद अली जिन्ना से लेकर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी अक्सर चर्चा का विषय रहे हैं।

यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि जवाहरलाल नेहरू को एक ओर जहाँ दूरदर्शी और कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा नए भारत का शिल्पकार कहा जाता है, वहीं नेहरू द्वारा की गई अनेकों हिमालयी भूलों को इन्हीं नेहरूवियन सभ्यता के इतिहासकार और दरबारी लेखकों ने नेहरू के भक्ति-गीतों के बीच दफ़्न कर दिया।

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जिक्र आते ही याद आता है कि भारत में तुष्टिकरण जैसे शब्द का बीजारोपण करने वाले ऐसे भी नेता हुए, जिन्होंने स्वयं की छवि को भारत देश से भी ऊपर रखकर खूब वाहवाही लूटी। इसमें साथ देने के लिए दरबारी इतिहासकार तो कॉन्ग्रेस के साथ आजादी के बाद से हमेशा से ही रहे हैं।

‘नया भारत’ अभी प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस जैसी बर्बर ऐतिहासिक घटना से घायल ही था कि जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर जैसी महान समस्या का तौहफा भारत देश को सौंप दिया। यह समस्या इतनी बड़ी थी कि इसके नीचे ही नेहरू को अपनी ‘उदारवादी’ और तुष्टिकरण की छवि को मजबूत करने के लिए और भी कई भूल करने का मौका मिल गया।

सिंधु जल समझौता यानी भारत बनाम नेहरू

साठ साल पहले वियना समझौते का हासिल सिंधु जल समझौता इस देश का एक ऐसा समझौता है, जिस पर आज भारत स्वयं बैकफुट पर नजर आता है। पाकिस्तान द्वारा किसी भी आतंकी हमले के बाद यह चर्चा का विषय बन जाता है कि भारत को इस संधि को तोड़ देना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस समझौते की मजबूरी भारत को सौंपी किसने?

वास्तव में यह विवाद वर्ष 1947 में भारत के बँटवारे के पहले से ही शुरू हो गया था, खासकर पंजाब और सिंध प्रांतों के बीच। वर्ष 1947 में भारत-पाकिस्तान के नौकरशाहों ने पाकिस्तान की तरफ़ जाने वाली कुछ प्रमुख नहरों पर ‘स्टैंडस्टिल समझौते’ पर हस्ताक्षर कर पाकिस्तान के लिए पानी का बंदोबस्त कर दिया। यह समझौता मार्च 31, 1948 तक कायम रहा।

अप्रैल 01, 1948 को भारत ने इन दो प्रमुख नहरों का पानी रोक दिया, जिससे पाकिस्तान स्थित पंजाब में करीब 17 लाख एकड़ ज़मीन के बुरे दिन शुरू हो गए। पाकिस्तान के इस क्षेत्र के मरुस्थल में तब्दील होने के हालात बन गए।

तत्कालीन विचारकों ने बताया कि नेहरू की अगुवाई वाली भारत सरकार ऐसा कर के पाकिस्तान पर कश्मीर मुद्दे को लेकर दबाव बना रही थी। लेकिन इसी वक़्त वर्ष 1951 में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने पत्राचार के पुराने शौक के चलते विश्व बैंक (तत्कालीन ‘पुनर्निर्माण और विकास हेतु अंतरराष्ट्रीय बैंक’) प्रमुख और पाकिस्तान के प्रमुखों से इस बारे में संपर्क किया।

कश्मीर की तरह ही इस बार भी नेहरू ने अपने देश के अंदरूनी मुद्दों के लिए विदेशी शरण ली और इसे भी भारत के गले की हड्डी बना दिया। नेहरू के इस पत्राचार के बाद दोनों पक्षों के बीच करीब एक दशक तक बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया। आखिरकार 1960 को कराची में सिंधु नदी समझौते पर हस्ताक्षर हुए। भारत की ओर से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान की तरफ से फील्ड मार्शल मुहम्मद अयूब खाँ ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस संधि का परिणाम यह हुआ कि साझा करने के बजाय नदियों का विभाजन हो गया।

इस समझौते से एक ‘फायदा’ यह भी हुआ कि देश की अवश्यकताओं की जगह जवाहरलाल नेहरू की शांति के कबूतर उड़ाने और कूटनीति की छवि को खूब वाहवाही मिली। नेहरू ने इस संधि द्वारा ऐतिहासिक नारे दिए कि इंजीनियरिंग और अर्थशास्त्र, राष्ट्रवाद और राजनीति से ऊपर रहेंगे। जाहिर सी बात थी कि अंततः इससे नेहरू की कबूतर उड़ाने की (शांति के)अंतरराष्ट्रीय छवि को ही बल मिला।

इस समझौते के अनुसार यह तय हुआ कि पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए होगा और बदले में इन नदियों के पानी का कुछ सीमित इस्तेमाल का अधिकार भारत को दिया जाएगा। इसमें भारत को बिजली बनाने और कृषि के लिए सीमित पानी मिला।

हो सकता है कि दूरदर्शी नेता जवाहरलाल नेहरू ने 1960 में यह सोचकर पाकिस्तान के साथ इस संधि पर हस्ताक्षर किए हों कि शायद भारत देश को पानी के बदले आतंकवाद से मुक्ति और शांति मिलेगी। लेकिन, हुआ यह कि इस संधि के लागू होने के महज पाँच साल बाद ही पाकिस्तान ने भारत पर 1965 में हमला कर दिया।

भारत पर संधि के बदले आर्थिक जुर्माना

1960 में ही इस संधि के तहत तय किया गया कि भारत द्वारा पाकिस्तान को £62 मिलियन पाउंड (आज की राशि में 575 करोड़ रुपए) दिया जाएगा, जिससे पाकिस्तान इस संधि में वर्णित नई नहरों और प्रोजेक्ट्स का निर्माण करेगा। इसके अलावा पाकिस्तान को विश्व बैंक द्वारा $1.101 बिलियन की भी आर्थिक मदद उपलब्ध की गई। यानी, इस संधि के अनुसार, दोनों देशों इस बात पर सहमत हुए कि पाकिस्तान में इस पानी से सम्बंधित हर नए निर्माण और योजनाओं का आर्थिक भार भारत देश वहन करेगा। नेहरू के अनुसार यह उनकी बड़ी कूटनीतिक जीत थी क्योंकि अब विज्ञान ने राष्ट्रवाद को पीछे छोड़ दिया था।

इस सहमति के बाद इस संधि पर दोनों ही देशों राजनीतिक रूप से खूब आलोचना हुई। हालाँकि पाकिस्तान जैसे सैन्य देश में इस आलोचना को काफी हद तक दबा दिया गया। हालाँकि, मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना, जो कि जनरल अयूब खान की बड़ी आलोचक रहीं, ने जनरल अयूब खान पर पानी के अधिकारों से वंचित कर देने का आरोप भी लगाया। समय के साथ पाकिस्तान में इस संधि से असहमति दर्ज करने वाले कई लोग सामने आए। उनके अनुसार यह संधि पाकिस्तान के लिए संतोषजनक सहमति नहीं थी।

भारत में नेहरूवियन विचारकों का तब भी मानना था कि यह आलोचना सिंधु जल समझौते के लिए किसी भी प्रकार से हानिकारक नहीं थी। हालाँकि, भारत में लोगों के मन में नेहरू की सरकार के विरुद्ध पाकिस्तान को संधि के बदले पानी के साथ ही आर्थिक मदद देने पर सहमत होने के कारण रोष व्याप्त था। यहाँ के लोगों ने इस संधि को सरकार की ‘तुष्टिकरण और आत्मसमर्पण’ की संधि बताया।

इस विरोध में तत्कालीन सरकार में नियुक्त राजनयिकों से लेकर पदाधिकारी भी शामिल थे। बीके नेहरू (पीएम नेहरू के भाँजे), जो कि उस समय भारतीय राजनयिक और संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय राजदूत थे, से लेकर तत्कालीन विदेश मंत्री कृष्ण मैनन इस संधि से नाराज थे और खुलकर इसका विरोध करते रहे।

उस समय इस संधि से असहमति और विरोध का सबसे प्रमुख कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पाकिस्तान को आर्थिक मदद देने के लिए राजी होना था। यहाँ तक कि मोरारजी देसाई, जो कि उस समय कैबिनेट मंत्री थे, ने विपक्षी दलों को भी इस संधि के खिलाफ एकसाथ होने की सलाह दी। तत्कालीन गृहमंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त भी पाकिस्तान को दी जाने वाली इस आर्थिक सहमति से नाखुश थे। वो चाहते थे कि इस आर्थिक राशि का उस धन के साथ सामन्जस्य बैठाया जाए, जो हिन्दू शरणार्थी पाकिस्तान में छोड़ कर आ चुके हैं।

1965 के भारत-पाक युद्ध तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को संसद में यह स्पष्टीकरण देना पड़ा कि पाकिस्तान, भारत सरकार और विश्व बैंक द्वारा पाकिस्तान को उस संधि के बदले दी गई धनराशि से हथियार नहीं खरीद रहा है।

इस तरह से, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सिर्फ अपनी शांतिप्रिय छवि गढ़ने के लिए ही सिंधु जल समझौते के रूप में कश्मीर जितनी ही भयानक भूल कर चुके थे। यह हर हाल में भारत की कमजोर कूटनीति और अदूरदर्शी सोच का ही परिणाम था कि इस जल समझौते का घाव आज तक भारत के सीने पर बना हुआ है। जम्मू कश्मीर (लेह-लद्दाख) में ही बगलिहार और किशनगंगा जैसे बाँध स्थित हैं और हकीकत यह भी है कि पाकिस्तान अक्साई चीन इलाके में ऐसे कई छोटी-बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जो हर दृष्टि से भारत के लिए भविष्य में खतरनाक साबित हो सकते हैं।

वास्तव में इस संधि के बदले पाकिस्तान को दिया जाने वाला सिंधु नदी के कुल पानी का 80 प्रतिशत पानी नेहरू की ‘अति-उदारवादी’ छवि और ‘दूरदर्शी व्यक्तित्व’ का जुर्माना है, जिसे भारत देश हमेशा भरता ही रहेगा।

इस लेख में शामिल किए गए तथ्य भारत के पूर्व राजनयिक टीसीए राघवन द्वारा लिखित पुस्तक The People Next Door: The Curious History of India-Pakistan Relations पुस्तक से लिए गए हैं।

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मैथिली में क्यों वायरल हो रही ‘हम देखेंगे’, क्या मिथिला से भी है फैज का कनेक्शन!

फैज़ अहमद फैज़ की कविता ‘हम देखेंगे’ को लेकर आजकल एक नई बहस छिड़ी हुई है। इसकी शुरुआत आईआईटी कानपुर द्वारा एक समिति बनाने से हुई। समिति को यह जॉंचने का जिम्मा दिया गया है कि जिस विरोध-प्रदर्शन के दौरान फैज की नज्म का पाठ हुआ उस दौरान संस्थान के किस नियम-कानून का उल्लंघन तो नहीं हुआ। लेकिन, इस बात से वामपंथियों को मिर्ची लग गई। फैज़ को ‘भारत का राष्ट्रभक्त’ साबित करने पर उन्होंने पूरा जोर लगा रखा है। ट्विटर पर जावेद अख्तर सरीखे लोगों ने फैज़ के गुणगान में ट्वीट्स किए। फैज़ की कविताएँ शेयर की गईं।

अब फैज के इस नज्म का मैथिली अनुवाद अचानक से वायरल हो रहा है। इसके पीछे की वजह जानने से पहले ‘हम देखेंगे’ का मैथिली अनुवाद पढ़िए;

हमहूँ देखबै!
देखबे करबै!
एकटा वादा छल सभ स’
अछि बिधिनाक बनायल जे
हमहूँ देखबै!

जुलुमक ई दुष्कर पहाड़
रुइक फाहा सन जेना उड़ि जायत
आ दुखिया जनता के तरबा तर
ई धरती जखन धड़-धड़ धड़कत
सत्ता के मद में चूर जे छथि
हुनका माथा ठनका बजरत
हमहूँ देखबै!

गोसाईं बनल जे बैसल छथि
गरदनियाँ द’ फेकल जयताह
भलमानुष जे सदा उपेक्षित
तोशक पर बैसाओल जयताह
मुकुट हवा में उछलि खसत
आ सिंघासन खंडित होयत

रहि जेतै नाम त’ ओकरे टा
जे सगुण आ निर्गुण दुनू अछि
जे नजरिक संग नजारो अछि
लागत ‘हमहीं ब्रह्म’क जयकारा
जे हमहूँ छी आ अहूँ छी
जनता जनार्दन करत राज
जे हमहूँ छी आ अहूँ छी

साभार: whatsapp

यह मैथिली की खूबसूरती है कि ‘हम देखेंगे’ की ‘बुतपरस्ती’ सगुण-निर्गुण ब्रह्म में बदल जाती है। लेकिन, फैज कट्टर पाकिस्तानी थे। यह बात सालों पहले हरिशंकर परसाई दुनिया को बता चुके हैं।

ऑपइंडिया की पड़ताल से पता चला कि हम देखेंगे का यह मैथिली अनुवाद बुतपरस्त मैथिल मजे लेने के लिए वायरल कर रहे हैं। विदेह की धरती से फैज का दूर-दूर तक कोई कनेक्शन नहीं है।

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