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जामिया के दंगों की तैयारी बहुत पहले हो चुकी थी, हर शुक्रवार को लगता है डर: जामिया के छात्र ने खोले कई राज़

ऑपइंडिया ने जामिया के कुछ छात्रों से बातचीत की, जिन्होंने यूनिवर्सिटी में हुई दंगेबाजी के पीछे बड़ी साज़िश का पर्दाफाश किया। उनमें से एक ने उन छात्रों की तरफ़ से ऑपइंडिया से बातचीत की लेकिन डर का आलम ये है कि वो छात्र अपना चेहरा दिखाने को राज़ी नहीं हुआ। इसीलिए, आप इस इंटरव्यू को देख सकते हैं लेकिन उस छात्र का चेहरा नहीं देख सकते। वामपंथी व कट्टर इस्लामिक ताक़तों के कारण इन छात्रों में भय का माहौल है। उस छात्र ने ऑपइंडिया को बताया कि दिसंबर में परीक्षाओं के दौरान ही सीएए को लेकर चर्चा शुरू हुई, तब जामिया में भी माहौल बनाया जाने लगा।

जामिया के छात्र ने बताया कि बाकी प्रदर्शनों व अबकी हुए विरोध प्रदर्शनों में ख़ासा अंतर था, जो एक भयंकर ट्रेंड की तरफ़ इशारा कर रहा था। उसने बताया कि इन धरनों में 600-700 की संख्या में छात्र आते थे और उन्हें भड़काया जाता था। इस्लामी मजहबी नारे लगाए गए और कलमा पढ़ा गया। इसी तरह फिलिस्तीन के कट्टरपंथी संगठन के नारे ‘इन्तिफादा’ का प्रयोग किया गया। जामिया के छात्र ने बताया कि ऐसे नारे सारे प्रदर्शनों में लगाए गए और जामिया के छात्रों ने ही लगाया। यहाँ तक कि लड़कियों ने भी इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।

उसने आयशा-लदीदा की ब्रांडिंग की सजिश की भी बात की। उसने बताया कि जामिया शिक्षक संघ ने संसद तक मार्च की योजना बनाई, जैसा जामिया में आज तक कभी नहीं हुआ था। छात्र ने कहा कि जामिया टीचर्स एसोसिएशन ने एक कमिटी बना कर सीएए और एनआरसी के विरोध के लिए कमिटी बनाई। यानी, जामिया में न सिर्फ़ उपद्रवी छात्र, बल्कि शिक्षक भी ये तय कर रहे थे कि सीएए का विरोध कैसे हो। छात्र ने एक और बात बताई, जिसकी मीडिया में चर्चा नहीं हुई। जामिया में वीसी ऑफिस के ऊपर फिलिस्तीन का झंडा लगाया गया। इस काम में पूर्व-छात्र, शिक्षक और गार्ड्स भी शामिल हैं।

जहाँ झंडा लगाया गया, वहाँ सभी को आने-जाने की अनुमति नहीं है, आईडी कार्ड्स दिखाने होते हैं- लेकिन फिर भी वो ऐसा करने में कामयाब हो गए। छात्र ने बताया कि संसद भवन तक मार्च करने के रास्ते में “कॉमरेड, बैरिकेड तोड़ो” का नारा लगाते हुए बैरिकेड तोड़ने के लिए लोगों को भड़काया गया। छात्र ने कहा कि कई बाहरी लोग भी इसमें शामिल हुए और सभी ने मिल कर पत्थरबाजी की। पत्थरबाजी में न सिर्फ़ बाहरी लोग बल्कि छात्र भी शामिल थे। पुलिसकर्मियों की पीटा गया, एक को बाथरूम में बंद कर दिया गया।

उक्त छात्र ने ऑपइंडिया को बताया कि छात्रों को वहाँ के नक़्शे का पूरा पता था लेकिन पुलिस थी, इसका फायदा उठाया गया। छात्र ने कहा कि उकसाने के लिए और मोदी सरकार से बदला लेने के लिए ‘नामर्द’ शब्द तक का भी उपयोग किया गया। उसने कुछ नेताओं का भी नाम लिया, जिन्होंने मेडिएशन के नाम पर दंगे भड़काने का काम किया। बकौल छात्र, इसमें आसिफ मोहम्मद ख़ान अमानतुल्लाह ख़ान जैसे नेताओं ने लोगों को भड़काने का काम किया। जामिया में आम आदमी पार्टी के छात्र विंग की भी अच्छी-ख़ासी उपस्थिति है। उसने बताया कि इंडियन मुस्लिम लीग के नेता कहते हैं कि वो भारतीय बाद में हैं और मुस्लिम पहले हैं। अब तो वहाँ हर शुक्रवार को डर लगता है कि कब क्या हो जाए।

इस तरह की मानसिकता पढ़े-लिखे लोगों में है, ये नेता हैं, अनपढ़-गँवार नहीं। जामिया ने सरकार से अपील करते हुए कहा था कि सीएए को वापस ले लिया जाए। इससे पता चलता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन भी उनलोगों से मिला हुआ है। साथ ही कई छात्र नेताओं ने आसपास के इलाक़ों में मुस्लिमों को भड़काने की बात कही। लेकिन, साथ ही वो विक्टिम कार्ड भी खेलते रहे। कई व्हाट्सप्प ग्रुप्स बना कर हिंसा की साज़िश रची है। ‘जिहाद’ के लिए हॉकी-बैट लेकर चले और पुलिसवालों को ‘तोड़ देने’ की बातें की गईं।

शाहीन बाग़ में चल रहे विरोध प्रदर्शन पर भी जामिया के छात्र ने अपनी राय रखी। उसने बताया कि जेएनयू के एक छात्र शर्जील इमाम ने शाहीन बाग़ में भड़काऊ भाषण दिया। इमाम ने कहा कि मुस्लिमों की इतनी भी औकात नहीं है क्या कि 500 शहरों में चक्का जाम कर सके? ऐसे कई भड़काऊ बयान दिए गए। उक्त छात्र ने बताया कि जेएनयू के वामपंथियों ने जामिया वालों को बुला कर सीएए विरोधी प्रदर्शन व अभियान में उनकी मदद ली। छात्र ने जानकारी दी कि एक उपद्रवी मुस्लिम छात्र ने इजरायल के झंडे भी जलाए। शायद ये भारतीय विदेश मंत्रालय की इमेज को ख़राब करने के लिए ऐसा कर रहे हैं। उस छात्र का नाम कासिम उस्मानी है, जो आप के स्टूडेंट विंग सीवाईएसएस के नेता है।

साथ ही छात्र ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि आखिर जाँच के लिए सीसीटीवी फुटेज पुलिस को क्यों नहीं दी जा रही? उसने बताया कि इससे सबसे ज्यादा घाटा पढ़ने वाले छात्रों को हुआ है। वो इंटर्नशिप व ट्रेनिंग के लिए नहीं जा पा रहे। इससे प्लेसमेंट्स में दिक्कतें आ रही हैं क्योंकि कम्पनियाँ हिंसा के कारण जामिया की ग़लत इमेज बन रही है। गाँव वालों ने जामिया के छात्रों को भगा दिया। परीक्षाओं की तारीख अब तक 3 बार आगे बढ़ाई जा चुकी है। प्रॉक्टर ने भी उपद्रवी छात्रों की ही बात मानी और परीक्षाओं की तारीख बढ़ा दी।

उक्त छात्र ने बताया कि रोज़ कई नेता आ रहे हैं और भड़काऊ भाषण देकर छात्रों को उकसा रहे हैं। लाइब्रेरी और रीडिंग हॉल कई दिनों से बंद हैं। उसने हिंसा वाले दिन की बात करते हुए कहा कि पुलिस ने जब पत्थरबाजी को नियंत्रित करने के लिए कैम्पस में प्रवेश किया, तब लाइब्रेरी में उपद्रवियों ने टेबल-कुर्सी वगैरह को दरवाजे पर रख दिया ताकि पुलिस को रोका जा सके। अपनी ही लाइब्रेरी में तोड़फोड़ की गई। उसने आरोप लगाया कि जामिया की वीसी ने ख़ुद गर्ल्स हॉस्टल में कहा था कि सीसीटीवी फुटेज पुलिस को दे दिया जाए तो जामिया के छात्र पकड़े जाएँगे।

जामिया के छात्र से बातचीत (हम उसका चेहरा नहीं दिखा सकते)

दरअसल, अगर उक्त छात्र के बयान को मानें तो बाहरी लोगों ने छात्रों को भड़काया कि पुलिस अगर अंदर आ गई तो उन्हें पीटेगी। इसके बाद फेक न्यूज़ फैलाया गया कि जामिया के छात्र मारे गए हैं। ऐसा इसीलिए किया गया ताकि आसपास के लोगों को हिंसा के लिए भड़काया जा सके। यह भी अफवाह फैलाई गई कि पुलिस गर्ल्स हॉस्टल में घुस गई। उसने बताया कि सच्चाई ये है कि कुछ उपद्रवी ही गर्ल्स हॉस्टल में घुस गए थे, जहाँ बाहरी लड़कियों तक को जाने की अनुमति नहीं है।

कुल मिला कर उक्त छात्र से बात करने के बाद ये पता चला कि विभिन्न संगठनों के वामपंथी व इस्लामी नेता अनुच्छेद 370, राम मंदिर, तीन तलाक़ और सीएए को लेकर छात्रों को भड़काने में लगे हैं। और ये सब एक बड़ी साज़िश का हिस्सा है।

CAA विरोध में हिन्दूघृणा वाले 30 पोस्टर: अजीत भारती की राय | Ajeet Bharti on Hinduphobic Posters in CAA Protest

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में हिन्दूघृणा के कई पोस्टर और नारे लगाए गए। इसमें इनकी हिन्दुओं के खिलाफ घृणा साफ तौर पर झलकती है। विशुद्ध इस्लामिक नारों के जरिए ये भी साफ कर दिया गया कि ये राजनैतिक नहीं, बल्कि समुदाय विशेष की लड़ाई है। इसमें अल्लाह को खींचा गया, हिन्दुओं से आजादी की बातें हुईं।

इन्हें देश के विचार और कल्पना से कोई मतलब नहीं है। इन्हें तो बस गजवा ए हिंद से मतलब है।समुदाय का राज होगा, काफिरों को काटा जाएगा। ये इनके लिए अपराध नहीं है। इसके लिए कोई सजा नहीं है। एक मुस्लिम रैली में ब्राह्मण को ‘कसाई’ बताया जाता है। एक मुस्लिम टोपी पहने शख्स धमकी देते हुए लिखता है कि ज्यादा पुराने डॉक्यूमेंट्स मत माँग लेना मोदी, कहीं हमलोग हिन्दुस्तान के मालिक ना निकल जाए। CAA विरोध के नाम पर हिन्दूविरोधी एजेंडा चलाया गया।

पूरी वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें

AAP की शिक्षा क्रांति! 12वीं में घट गए बच्चे, 10वीं के नतीजे 13 साल में सबसे बदतर

दिल्ली की शिक्षा में क्रांति हो गई! यह केवल आम आदमी पार्टी या दिल्ली सरकार का ही दावा नहीं है। सोशल मीडिया पर तस्वीरें देख विशेषज्ञ बने लोग भी यह कहते सुनाई पड़ते हैं। 8 स्कूलों की मनभावन तस्वीर और बीते एक साल की कुछ गतिविधियों की बातें सोशल मीडिया पर फैलाकर माहौल ऐसा बनाया गया मानों दिल्ली के स्कूलों में कमाल हो गया। दिल्ली के स्कूलों के लिए बनाए गए हवा की मौजूदगी अगले महीने होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी महसूस किया जा रहा है।

सरकारी स्कूलों के साथ काम करने वाले बखूबी जानते हैं कि दिल्ली के सरकारी स्कूल देश के बाकी हिस्सों के स्कूलों से पहले से ही बेहतर हैं। दिल्ली के प्रतिभा विकास विद्यालय की गिनती देश के अच्छे स्कूलों में बीते दो दशकों से होती आई है। जब देश के बाकी हिस्सों में बच्चे पेड़ की छॉंव में बैठ पढ़ते थे, दिल्ली के सरकारी स्कूलों के पास तब भी अच्छे भवन हुआ करते थे। इसलिए दिल्ली के स्कूलों को 5 साल में ही बदतर से विश्व स्तरीय बनाने का दवा हास्यास्पद है। वैसे भी एक चौथाई बजट से महज हजार स्कूल चलाने वाले दिल्ली की तुलना देश के बाकी राज्यों से करने का काम भी एक निहायत बेवकूफ ही कर सकता है। यह कुछ वैसा ही है जैसे बस्तर के स्कूलों की तुलना बोस्टन (अमेरिका) के स्कूलों से की जाए।

दिल्ली के स्कूलों में अभी हाल के महीनों में शिक्षा के नाम पर हुए राजनीतिक प्रयोग को बगैर किसी रिसर्च के सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया और इसे आदर्श शिक्षा मॉडल मानते हुए बाकी जगहों पर लागू करने की वकालत हुई। लेकिन जिस दिल्ली में शिक्षा क्रांति होने की बात लोग करते हैं, वह खूबसूरत तस्वीरों की आड़ में कई ऐसे तथ्य छुपाए हुए है जो मुख्यधारा की चर्चा से गायब है या लोग इससे अनजान हैं।

स्कूली शिक्षा से दूर किए जा रहे लाखों बच्चे

वर्ल्ड क्लास शिक्षा के दावों के उलट दिल्ली के लगभग आधे बच्चे हर साल नौवीं कक्षा में ही फेल कर दिए जाते हैं। कुछ यही हाल 11वीं का है, जहाँ एक तिहाई बच्चे हर साल फेल हो रहे हैं। ऐसी स्थिति देश के किसी राज्य में नहीं है। बात केवल पास-फेल तक सीमित नहीं है। सरकार की अघोषित नीति के तहत फेल हुए बच्चों को दुबारा परीक्षा में बैठने से भी वंचित किया जा रहा है। केवल सत्र 2017-18 में ही 66 फीसदी बच्चों को दुबारा नामांकन नहीं लेने दिया गया और एक लाख से भी अधिक बच्चे स्कूली शिक्षा से बाहर हो गए। सबसे अधिक प्रभावित 10वीं और 12वीं में फेल हुए बच्चे थे, जिनमें से 91 फीसदी बच्चों को दुबारा नामांकन नही मिला। ये बात सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय को खुद बताई है।

ये केवल एक सत्र की बात नहीं है। यही हाल 5 साल रहा। शिक्षा क्रांति के नाम पर देश की राजधानी में ही लाखों बच्चों को चुपचाप स्कूली शिक्षा से निकाल दिया गया, लेकिन कहीं आवाज़ नहीं उठी। अगर ऐसी स्थिति किसी और राज्य में होती तो कोहराम मच जाता। बाल अधिकार के झंडेबरदार सरकार से सवाल पूछते। बुद्धिजीवी लेख लिखते। मसला सुप्रीम कोर्ट में होता।

परीक्षा के नतीजे क्या कहते हैं?

12वीं के परिणाम में आंशिक सुधार पर आप सरकार अपनी पीठ खूब थपथपाती है। लेकिन यह नहीं बताती कि जबसे उसकी सरकार बनी है, हर साल 12वीं की परीक्षा में बैठने वाले बच्चे बड़ी तेजी से क्यों घट रहे हैं? दिल्ली सरकार के आँकड़ों को ही देखे तो 2005 से 2014 तक परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की जो संख्या 60,570 से बढ़कर 1,66,257 हो गई थी, वह 2015 के बाद हर साल घटते-घटते 2018 में 1,12,826 तक पहुँच गई! क्या यह एक चिंताजनक स्थिति नहीं है! यही नहीं सरकारी स्कूलों के द्वारा प्राइवेट को पहली बार पछाड़ने का दावा भी गलत है। 2005 में 13 अंकों से पिछड़ने के बाद दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने प्राइवेट स्कूलों से न केवल बराबरी की, बल्कि उन्हें 2009 और 2010 में लगातार पछाड़ा भी है। अगर बीते 10 सालों का ही आँकड़ा देखें तो 12वीं के परिणाम कभी 85 फीसदी से कम नहीं रहा।

आप सरकार 12वीं के परिणाम का श्रेय लेना चाहती है। शिक्षकों और बच्चों की मेहनत की बजाए इसे अपनी उपलब्धि बताती है। लेकिन जैसे ही बात 10वीं के ख़राब परिणाम की आती है तो चुप्पी छा जाती है। कोई नहीं बताता कि सरकारी स्कूल के परिणाम प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले में कहीं नहीं टिकते और उनके बीच का फासला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस वर्ष दिल्ली के सरकारी स्कूलों का परिणाम 71.58 फीसदी और प्राइवेट स्कूलों का 93.12 फीसदी था। पिछले सत्र में यह आँकड़ा क्रमशः 69.32 फीसदी और 89.45 फीसदी था। अंतर साफ़ है। पिछले साल 20 अंक से पीछे थे, इस साल 21 अंकों का फासला है। वर्ष 2001-02 में 45 अंकों से पीछे रहने वाले जिन सरकारी स्कूलों ने 2013 में प्राइवेट स्कूलों को पीछे छोड़ दिया था, आज दो सालों से राष्ट्रीय औसत से भी काफी कम और 13 साल के न्यूनतम परिणाम के आँकड़ें से भी पीछे हैं। बावजूद इसकी जिम्मेवारी लेने के लिए कोई तैयार नहीं है।

क्यों घट रहे हैं नामांकन?

2018-19 में आई दिल्ली के इकॉनोमिक सर्वे की रिपोर्ट कहती है कि स्कूलों में नामांकन लगातार घट रहे हैं। सत्र 2013-14 में जहाँ दिल्ली के 992 स्कूलों में 16.10 लाख विद्यार्थी पढ़ते थे, 2017-18 आते-आते स्कूलों की संख्या बढ़कर 1,019 तो हो गई, लेकिन बच्चों की संख्या घटकर 14.81 लाख पर पहुँच गई। इसी दौरान प्राइवेट स्कूलों की संख्या 2,277 से घटकर 1,719 हो गई। लेकिन नामांकित बच्चों की संख्या 13.57 लाख से बढ़कर 16.21 लाख हो गई। सरकारी स्कूल बढ़े, नामांकन नही बढ़ रहे। ये क्या है!

इकॉनोमिक सर्वे इस ओर भी इशारा करती है कि दिल्ली में आज भी अनेकों बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित हैं। 2014-15 में दिल्ली के सभी शैक्षिक संस्थानों में स्कूली शिक्षा ले रहे बच्चों की संख्या 44.13 लाख थी, वह 2017-18 में घटकर 43.93 लाख पर आ गई। चिंता की बात है कि दिल्ली की जनसँख्या बढ़ी तो बच्चे कहाँ गए!

निगम के स्कूलों से भेदभाव

दिल्ली सरकार के पास केवल 1,030 स्कूल हैं। वहीं दिल्ली नगर निगम के जिम्मे लगभग 1,700 स्कूल हैं। प्राथमिक कक्षाएँ अब तक नगर निगम के स्कूलों में लगती थी। वहीं माध्यमिक शिक्षा के लिए बच्चे दिल्ली सरकार के स्कूलों में जाते थे। 2017 में एमसीडी चुनाव में जब करारी हार मिली तो अपने अधीन के स्कूलों में घटते नामांकन को रोकने और निगम के स्कूल बंद करने के इरादे से आप सरकार ने बड़ी संख्या में अपने स्कूलों में प्राथमिक कक्षाओं में नामांकन लेना आरंभ कर दिया। 2014-2018 के बीच रिकॉर्ड 319 स्कूलों में प्राथमिक कक्षाएँ शुरू की गई। आज 720 सर्वोदय विद्यालयों में प्राथमिक कक्षा चल रही है। यही नहीं 144 स्कूलों में नर्सरी की पढ़ाई शुरू कर दी गई ताकि दिल्ली नगर निगम के स्कूल धीरे-धीरे खत्म हो जाए। निगम के स्कूलों से राजनीतिक बदला लेने की नीयत से शिक्षकों के वेतन में देरी, स्कूलों के विकास पर ध्यान देने की बजाए उसे ख़राब साबित करने में ही सरकार जुटी रही। इन सबके बावजूद सरकारी स्कूल की बजाए बच्चे प्राइवेट का ही रुख कर रहे हैं।

साइंस, गणित की पढ़ाई का बुरा हाल

जब पूरी दुनिया विज्ञान और तकनीकी के अध्ययन पर जोर दे रही है, आज दिल्ली के एक तिहाई से भी कम सरकारी स्कूलों में विज्ञान की पढ़ाई उपलब्ध है। संसाधन की कमी का बहाना बनाकर आज दो तिहाई स्कूलों में बच्चों को सामाजिक विज्ञान या फिर चुनिंदा स्कूलों में वाणिज्य विषय लेकर पढ़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। गरीब के बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक बनने का केवल स्वप्न ही देख सकते हैं, उसे पूरा नहीं कर सकते।

दिल्ली में अच्छी शिक्षा की कल्पना में विज्ञान के साथ-साथ गणित भी शामिल नहीं है। 2020 में सीबीएसई ने 10वीं की परीक्षा में बेसिक मैथ को गणित विषय के एक आसान विकल्प के रूप में दिया तो देश भर से 30 फीसदी बच्चों ने इसे चुना। वहीं दिल्ली के रिकॉर्ड 73 फीसदी बच्चों ने बेसिक मैथ चुना ताकि वे गणित में फेल न हो सकें। दिल्ली सरकार ने बजाप्ता सर्कुलर निकाल कर शिक्षकों को कहा कि वे बच्चों को समझाकर बेसिक मैथ लेने को कहें।

शिक्षकों की भारी कमी, गुणवत्ता पर भी सवाल

दिल्ली में विज्ञान, गणित, पंजाबी, संस्कृत, उर्दू जैसे विषयों को पढ़ाने वाले शिक्षकों की भारी कमी है। हजारों शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। इनकी भरपाई भारी संख्या में नियुक्त उन अतिथि शिक्षकों से की जा रही है जिनकी गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया कि 21,135 अतिथि शिक्षकों में से 16,383 शिक्षक नियुक्ति के लिए हुई परीक्षा में न्यूनतम अंक भी नही ला सकें। इस परीक्षा में केवल 1,335 शिक्षक ही अंतिम रूप से चयनित हुए। आप इन्हीं शिक्षकों को स्थायी करने का दावा करती है। केवल शिक्षक ही नही, स्थायी प्राचार्य की कमी से भी दिल्ली के विद्यालय बेहद प्रभावित हैं। आज लगभग दो तिहाई स्कूलों में प्राचार्य के पद खाली हैं। ये स्कूल आधे-अधूरे अधिकार लिए उप-प्राचार्यों के सहारे चल रहे हैं।

बहुचर्चित शिक्षा बजट भी आँकड़ों की बाजीगरी ही है, जो विधानसभा के पटल पर कुछ और जबकि वास्तविक खर्च में कुछ और दिखता है। दिल्ली की आर्थिक क्षमता बढ़ी लेकिन पहले की तरह आज भी दिल्ली कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 2 फीसदी भी शिक्षा के लिए आवंटित नही करता।

500 नए स्कूल, 17000 शिक्षकों की बहाली, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के वादे भूल गिने-चुने स्कूलों की तस्वीर दिखाकर यह बताने की कोशिश हो रही है कि शिक्षा में क्रांति आ गई है। असल मुद्दे गायब हैं! सवाल है इस कथित क्रांति से बच्चों को क्या फायदा हुआ जब आज भी दिल्ली के लाखों बच्चें स्कूली शिक्षा से वंचित किए जा रहे हैं।

दरअसल आप की शिक्षा क्रांति, उस खूबसूरत सी दिखने वाली रंगीन बैलून की तरह है, जो बाहर से देखने में मनभावन तो लगती है लेकिन अंदर से बिल्कुल खोखला है। प्रचार तंत्र के साए में वाहवाही बटोरने वाली ये बैलून जब फूटेगी तो शिक्षा के क्षेत्र में कुछ बदल जाने की आस पाले कइयों के भरोसे टूटेंगे। फिलहाल दिल्ली के गरीब लोगों के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा एक स्वप्न ही है।

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निर्भया के बलात्कारियों को 22 जनवरी को फाँसी नहीं: दिल्ली सरकार ने कोर्ट को बताई ये वजह

निर्भया गैंगरेप के दोषियों को 22 जनवरी को फाँसी नहीं दी जाएगी दिल्ली सरकार ने जानकारी दी है कि आरोपितों द्वारा दायर की गई क्षमा याचिका के आलोक में तय तारीख को फाँसी नहीं दी जा सकती। हालाँकि, दिल्ली सरकार के वकील ने ये भी कहा है कि दोषी मुकेश द्वारा दायर की गई क्षमा याचिका असामयिक है। बुधवार (जनवरी 15, 2020) को आरोपितों की क्षमा याचिका को उपराज्यपाल कार्यालय को भेजा जाएगा। जब उनकी क्षमा याचिका को नकार दिया जाएगा, उसके बाद उन्हें पुलिस द्वारा 14 दिनों की नोटिस दी जाएगी।

बता दें कि दिल्ली सरकार की तरफ़ से इस मामले में राहुल मेहरा जिरह कर रहे हैं। मेहरा ने अदालत में बताया कि निर्भया के गुनहगारों को 22 जनवरी की तय तारीख़ पर फाँसी नहीं दी जा सकती। उन्होंने कारण बताते हुए कहा कि क्षमा याचिका खारिज होने के बाद 14 दिनों की नोटिस थमाई जाएगी और तब फाँसी दी जा सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि दोषियों ने क़ानूनी प्रक्रिया में गड़बड़ी करने और केस को लम्बा खींचने के लिए क्षमा याचिका दाखिल किया है।

बता दें कि निर्भया के गुनहगारों के फाँसी की ‘प्रैक्टिस’ भी की जा चुकी है। उन सभी के परिवारों को उनसे मिलाया जा चुका है। जेल प्रशासन ने बताया था कि उन सबसे पूछा जाएगा कि वो अपने परिवारों से अंतिम बार कब मिलना चाहते हैं। अगर उन्होंने जवाब नहीं दिया तो 20 जनवरी को स्वतः परिवार से अंतिम बार मिलाने की तारीख तय की जाएगी।

गर्भवती शमीमा को ले भारी बर्फबारी में 4 घंटे चलते रहे 100 जवान, PM मोदी भी हुए मुरीद

भारतीय सेना आज यानी 15 जनवरी को अपना 72वाँ सेना दिवस मना रही है। सोशल मीडिया पर तरह-तरह के पोस्ट लिखकर देश के नागरिक सेना के अदम्य साहस के लिए उनकी तारीफ कर रहे हैं। इसी बीच जम्मू-कश्मीर से भी एक ऐसी वी़डियो सामने आई है, जिसे देखने के बाद आपको भी अपनी सेना के जवानों पर गर्व महसूस होगा। साथ ही उन लोगों को भी जवाब मिलेगा, जो वक्त-बेवक्त सेना की कार्रवाई के कारण उनकी आलोचना करते रहते हैं।

जम्मू-कश्मीर की इस वीडियो को भारतीय सेना के चिनार कॉर्पर्स ने अपने ट्विटर अकॉउंट से शेयर किया। इसमें देखा जा सकता है कि सेना के 100 जवानों ने आखिर कैसे चार घंटे तक बर्फ में पैदल चलकर एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुँचाया। गर्भवती महिला का नाम शमीमा है।

जानकारी के अनुसार, सेना के चिनार कॉर्प्स ने मंगलवार को बताया गया कि घाटी में बर्फबारी होने के कारण एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुँचाने में दिक्कत हो रही थी। कमर तक बर्फ गिरी होने के कारण कोई भी साधन उसे लेकर अस्पताल तक नहीं पहुँच सकता था। इसलिए, महिला के परिजनों ने सेना को बुलाया। इसके बाद चिनार कॉर्प्स के 100 जवान, 30 स्थानीय लोगों के साथ मदद के लिए पहुँचे। वे अपने साथ स्ट्रेचर लेकर पहुँचे। गर्भवती को स्ट्रेचर पर लिटाकर जवान 4 घंटे बाद सुरक्षित अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहाँ महिला ने एक बच्चे को जन्म दिया। अब दोनों स्वस्थ्य हैं।  

गौरतलब है कि सेना की वीडियो सोशल मीडिया पर आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस वीडियो को ट्वीट करते हुए सेना के जवानों को सलाम किया और कहा कि जब भी लोगों को मदद की जरूरत पड़ती है, तो आर्मी हर मुमकिन तरीके से उनकी मदद करती है। पीएम मोदी ने इस दौरान शमीमा और उनके बच्चे की अच्छी सेहत की कामना की।

बता दें, ये पहला मौक़ा नहीं है, जब सेना ने इस तरह किसी गर्भवती महिला की मदद के लिए तत्परता दिखाई हो। इससे पूर्व अभी कुछ दिन पहले ही एक मामला कुपवाड़ा जिले से भी प्रकाश में आया था। जहाँ एक गर्भवती महिला तस्लीमा को सेना के जवानों ने न सिर्फ़ नई ज़िंदगी दी थी बल्कि उसके नवजात शिशु को जीवन प्रदान करने में भी एक अहम भूमिका निभाई थी।

…जब आसिफा अपने बच्चों के साथ फँस गईं तो CRPF ने बर्फ में 12 Km पैदल चल पहुँचाया खाना: मिसाल नहीं, परंपरा है यह

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सबरीमाला: पवित्र यात्रा के रास्ते में फेंके माँस के टुकड़े व जानवरों के कंकाल, श्रद्धालुओं में आक्रोश

सबरीमाला मंदिर में हर वर्ष की तरह इस बार भी तिरुवाभरणम यात्रा की शुरुआत हुई लेकिन कुछ शरारती तत्वों ने यात्रा के रास्ते में जानवरों के माँस व कंकाल डाल कर सबरीमाला मंदिर के इस जुलूस में बाधा पहुँचाने का प्रयास किया। सबरीमाला के मुख्य देवता स्वामी अयप्पा अपने शरीर पर कई आभूषण धारण करते हैं। इन आभूषणों को प्रत्येक वर्ष पंडालम से लेकर सबरीमाला के मुख्य मंदिर तक ले जाया जाता है। ये यात्रा काफ़ी धूमधाम से होती है और इसमें कई लोग शिरकत करते हैं। इसी कार्यक्रम को तिरुवाभरणम कहा जाता है। पवित्र बक्सों में रख कर आभूषण को ले जाया जाता है।

इन आभूषणों को भगवान अयप्पा के पालक पिता और पंडालम के राजा राजशेखर ने इन गहनों को तैयार किया था। सो भगवान अयप्पा के पालक-पिता भी थे। इस यात्रा को हज़ारों लोग 83 किलोमीटर पैदल चल कर तय करते हैं। इन बक्सों को 12 लोगों द्वारा अपने सिर पर ढोया जाता है। ‘ऑर्गनाइजर’ में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, कुछ शरारती तत्वों ने इस पवित्र प्रक्रिया में विघ्न डालने के लिए यात्रा के रास्ते में जानवरों के माँस व कंकाल फेंक दिए ताकि हिन्दुओं की भावनाएँ आहत की जा सके।

ग्रामीणों ने जब माँस के टुकड़ों व जानवरों के कंकाल को यात्रा के रास्ते में पड़ा हुआ देखा तो अफरातफरी मच गई। लोगों ने जल्दी-जल्दी किसी तरह रास्ते को साफ़ किया। जहाँ ये घटना हुई, वहाँ के रास्ते को धोया गया और सफाई की गई। पंचायत ने 6 जनवरी को ही आदेश पारित किया था कि 13-14 जनवरी को होने वाली इस पवित्र यात्रा के रास्ते में पड़ने वाली माँस की दुकानों को बंद किया जाए। स्थानीय इस्लामी और वामपंथी समूहों ने इस आदेश पर आपत्ति जताई थी। वामपंथियों ने दावा किया था कि ये सब केरल सरकार की ‘प्रगतिशील सोच’ के विरुद्ध है।

कई वामपंथियों ने सोशल मीडिया पर इस आदेश को ‘सेक्युलर विचारधारा’ के ख़िलाफ़ बताया था। वहीं श्रद्धालुओं का कहना है कि इस यात्रा से पहले माँस की दुकानों को बंद रखना एक पुरानी परंपरा है क्योंकि श्रद्धालुओं को शिकायत रहती थी कि रास्ते में ऐसे दुकानों के खुले रहने से कचरों के कारण रास्ता अपवित्र हो जाता था। पंचायत सचिव एस. ज्योति ने बताया कि ग्रामीण तन-मन-धन लगा कर रास्ते को साफ़ करते हैं लेकिन फिर भी माँस के टुकड़ों से इसे अपवित्र करने की कोशिश की गई।

पंचायत के डिप्टी डायरेक्टर ने बताया कि यात्रा शांतिपूर्वक संपन्न कराने के लिए ये आदेश जारी किया गया लेकिन कुछ लोग बिना वजह इसे मुद्दा बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये आदेश एक ‘रूटीन अफेयर’ था और इसमें कुछ भी नया नहीं है।

​सिसोदिया ने माँगे ₹10 करोड़, नहीं दिए तो नेताजी को बेच दिया टिकट: AAP विधायक

दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी ने मंगलवार को अपने उम्मीदवारों का ऐलान किया था। कई नए चेहरों को मौका देते हुए पार्टी उस कुछ विधायकों का पत्ता साफ़ कर दिया है। इसके कारण पार्टी में बगावत तेज हो गई है। पार्टी नेतृत्व पर टिकट बेचने के आरोप भी लगे हैं। जिन विधायकों का टिकट पार्टी ने काट दिया है उनमें एक नाम एनडी शर्मा का भी है। शर्मा बदरपुर से विधायक हैं। आप ने इस बार उनकी जगह राम सिंह नेताजी को टिकट दिया है।

इससे नाराज शर्मा ने आप को देश की सबसे भ्रष्ट पार्टी करार देते हुए निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। मीडिया से बात करते हुए आप विधायक शर्मा ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री अ​रविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने 21 करोड़ रुपए लेकर राम सिंह को टिकट दिया है। उन्होंने कहा, “मनीष सिसोदिया ने मुझे अपने घर पर बुलाया और बताया कि राम सिंह 20-21 करोड़ रुपए देकर मेरी विधानसभा सीट से टिकट माँग रहा है। उन्होंने मुझसे 10 करोड़ रुपए माँगे, लेकिन मैं वहाँ से मना करके चला आया।”

शर्मा ने अपने ट्विटर अकॉउंट से भी आम आदमी पार्टी की निंदा की हैं। उन्होंने लिखा, “जिन भूमाफियाओं के खिलाफ लड़ाई में कार्यकर्ताओं ने लाठियाँ खाई। गालियाँ मिली। थाने गए। जेल गए। अपमान सहा। आज, आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के त्याग और बलिदान का सौदा कर लिया गया।”

उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि पार्टी ने जिस नेता को टिकट दिया है, 2015 के चुनाव में उसकी जमानत जब्त हो गई थी। एनडी शर्मा ने कहा कि वह बदरपुर की जनता के साथ खड़े हैं। साथ ही चेतावनी दी कि वह चुनाव मैदान में उतरेंगे। राम सिंह नेताजी हाल ही में कॉन्ग्रेस छोड़ आप में शामिल हुए थे।

गौरतलब है कि एक समय में आम आदमी पार्टी को खड़ा करने में अपनी जी जान लगाने वाले कुमार विश्वास अब पार्टी से आहत होकर पार्टी से अलग हो चुके हैं। वे एनडी शर्मा के ट्वीट को शेयर करके भी पार्टी पर तंज कस रहे हैं और दिलीप पांडे जैसे लोगों को टिकट देने पर उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। वे दिलीप पांडे को टिकट दिए जाने पर लिखते हैं, “जिन लोगों से हम 2013 में पिटे, हमने संघर्ष किया, 2020 में उन्हें ही बुलाकर टिकट दे दिया। “

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चीनियों ने पहले उइगर महिलाओं संग बिस्तर बाँटा, अब मुस्लिमों के घर ही बदल डाले

चीन में उइगर मुस्लिमों की प्रताड़ना का कोई अंत नहीं दिख रहा। शिनजियांग प्रान्त में ‘चीनीकरण’ के नाम पर उन्हें डिटेंशन सेंटर में रखा गया है। इस्लामिक रीति-रिवाजों और इस्लामी टोपी लगा कर घूमने पर पाबंदी है। नमाज भी पुलिस की निगरानी में अनुमति लेकर ही पढ़ी जा सकती है। इतना ही नहीं ‘पेअर अप एंड बिकम फैमिली’ योजना के तहत चीनी जबरन उइगरों के घर में घुसे। अब मामला उनके घरों की साज-सज्जा बदलने तक पहुॅंच चुका है।

रेडियो फ्री एशिया की खबर के अनुसार, उइगर मुस्लिमों पर अपना घर चीनी परंपरा के अनुरूप डेकोरेट करने का दबाव बनाया जा रहा है। उन्हें धमकी दी जा रही है कि अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें डिटेंशन कैंप में डाल दिया जाएगा। जानकारी के अनुसार, चीन ने 575 मिलियन डॉलर का फंड केवल उइगर मुस्लिमों के आधुनिकीकरण के लिए जारी किया है। इसके तहत उनके पारंपरिक डिजाइन के घरों को नष्ट करना भी शामिल है। चीन के जारी फरमान के मुताबिक उइगर समुदाय के लोगों से अपनी संस्कृति छोड़ चीनी परंपरा के हिसाब से घर सजाने बनाना होगा। इसमें उन्हें अपने कालीनों से लेकर तकियों और बिस्तर से लेकर फर्नीचर तक को बदलना होगा।

रिपोर्ट के अनुसार उइगर लोगों ने इस फरमान पर अमल भी शुरू कर दिया है। करीब 80 से 90 प्रतिशत लोग अपने घरों की साज-सज्जा बदल चुके हैं। एक उइगर महिला के मुताबिक अब उसके घर को कोई पहचान ही नहीं सकता। उसने फरमान के अनुसार हर चीज को बारीकी से बदल दिया है।

गौरतलब है कि यूएस स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा लगाए गए अनुमानों के अनुसार इस समय चीन में करीब 30 लाख उइगर मुस्लिम ऐसे हैं जिन्हें शिनजयांग स्थित कैंप में और जेलों में कैदी बनाकर रखा गया है। हालाँकि चीन इन्हें रीएड्यूकेशन का नाम देकर अपने कृत्यों पर पर्दा डालता रहता है। लेकिन, कई ऐसे प्रमाण मौजूद हैं, जो चीन की बर्बरता की पुष्टि करते हैं।

चीन पर आरोप है कि वो उइगर मुस्लिमों से उनकी सभ्यता- संस्कृति को छीनना चाहता है। साथ ही एक “Pair Up and Become Family” नाम से एक प्रोग्राम भी चलाता है। इसके तहत चीनी आदमियों को ऐसी उइगर मुस्लिम औरतों के साथ रहने भेजा जाता है, जिनके पतियों को वे कैंप में डाल चुके हैं।

बता दें रेडियो फ्री एशिया इससे पहले अपनी रिपोर्ट में बता चुका है कि चीन के आदमी इन महिलाओं के साथ एक ही बिस्तर पर सोते हैं और उनके साथ रहते हुए चीन की कम्युनिस्ट पार्टियों के बारे में बात करते हैं। इसके अलावा ये भी बताया जाता है कि चीन में हान समुदाय के लोगों को उइगर मुस्लिम महिलाओं से शादी करने के लिए वहाँ की सरकार पैसा, घर, नौकरी तक देती है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले चाइना उइगर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अख़्तियार करने की कड़ी में अपने ‘समाजवादी मूल्यों’ (Socialist Values) को प्रतिबिंबित करने के लिए बाइबल और क़ुरान को फिर से लिखने का फैसला भी ले चुका है।

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पायलट के माँझे में उलझी गहलोत की परंपरा, कहा- आँसू पोंछने के लिए तेरहवीं का इंतजार क्यों?

राजस्थान में एक बार फिर से मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच का टकराव सतह पर आ गया है। कोटा, जोधपुर और बीकानेर के हॉस्पिटलों में सैकड़ों बच्चों की मौत के बाद अशोक गहलोत ने कहा था कि राजस्थान में किसी बच्चे की मौत पर उसके घर जाकर पीड़ित परिजनों से मिलने की परंपरा नहीं रही है। इस बयान का जवाब देते हुए प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने कहा कि अगर ऐसी परंपरा नहीं रही है, तो ये परंपरा डालनी चाहिए। उन्होंने पूछा कि क्या पीड़ित माँ-बाप का दुःख बाँटने और उनके आँसू पोंछने के लिए सरकार बच्चे की तेरहवीं होने तक इंतजार करेगी?

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का नाम लिए बिना उनके ‘परंपरा’ वाले बयान की पायलट ने धज्जियाँ उड़ा दी। उन्होंने कहा कि एक तरफ घूँघट को ग़लत परंपरा बना कर उसे ख़त्म किया जा रहा है तो दूसरी तरफ बच्चों की मौत पर घर न जाने वाली परंपरा का बचाव क्यों किया जा रहा है? ये दोहरा रवैया क्यों? उन्होंने कहा कि पीड़ितों का दुःख बाँटने और उनके आँसू पोछना सरकार की जिम्मेदारी है, ये परंपरा डाली जानी चाहिए।

इस दौरान सचिन पायलट ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि ज़मीन पर पतंग उड़ाने की बजाए पार्टी हवा में पतंगबाजी कर रही है। पायलट ने कहा कि नौजवान नाराज़ हैं और संवाद की कमी है, फिर भी बहुमत के दम पर केंद्र सरकार अपनी मनमानी जनता पर थोपने में लगी हुई है। पायलट के साथ कई कॉन्ग्रेस पदाधिकारी भी थे, जिनके साथ उन्होंने पतंगबाजी की। सचिन पायलट ने गहलोत पर उनके घूँघट वाले बयान को लेकर कटाक्ष किया। गहलोत ने कहा था:

“महिलाओं को घूंघट में देखकर मुझे अच्छा नहीं लगता। जहाँ एक तरफ आज पूरी दुनिया तरक्की कर रही है, वहीं दूसरी तरफ हमारे प्रदेश की महिलाएँ घूँघट में हैं। इस परंपरा को ख़त्म किया जाना चाहिए। महिला सशक्तिकरण की दिशा में ये आवश्यक है।”

उनके इसी बयान को ‘परंपरा’ वाले बयान से जोड़ते हुए सचिन पायलट ने अशोक गहलोत को कठघरे में खड़ा किया। इससे पहले जब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने पायलट को पार्टी आलाकमान की तरफ से कोटा में बच्चो की मौत का जायजा लेने भेजा था, तब भी उन्होंने गहलोत की आलोचना की थी। गौरतलब है कि राजस्थान में सत्ता और संगठन के बीच चल रहे इस संघर्ष में जनता पिस रही है। पार्टी आलाकमान भी लाचार नज़र आ रहा है।

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अंग्रेज को आर्मी चीफ बनाना चाहते थे नेहरू, लेफ्टिनेंट जनरल राठौड़ ने नहीं करने दी मनमानी

15 जनवरी, यानी सेना दिवस (Army Day)। हर वर्ष इस तारीख को सेना दिवस इसीलिए मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन 1949 में जनरल कोडनान मडप्पा करियप्पा को स्वतंत्र भारत का पहला सेना प्रमुख नियुक्त किया गया था। तीन दशक तक भारतीय सेना में सेवा देने वाले जनरल केएम करियप्पा रिटायर होने के बाद भी किसी न किसी रूप में सेना को अपनी सेवाएँ देते रहे। वो 1953 में रिटायर हुए थे। वो न सिर्फ़ आज़ाद भारत के पहले सेना प्रमुख थे, बल्कि भारतीय सेना के पहले 5 स्टार रैंक के अधिकारी भी थे।

5 स्टार रैंक का अधिकारी होना बहुत बड़ी बात है, क्योंकि उनके अलावा सिर्फ़ जनरल जनरल मॉनेकशॉ को ही ये उपलब्धि हासिल हुई है। लेकिन, क्या आपको पता है कि देश के पहले सेनाध्यक्ष के रूप में जनरल करियप्पा तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहली पसंद नहीं थे। दरअसल, नेहरू चाहते थे कि किसी अंग्रेज अधिकारी को सेनाध्यक्ष बनाया जाए। देश की आज़ादी के बाद से सरकार लगातार इस पर विचार कर रही थी कि सेना की कमान किसे सौंपी जाए? इस सम्बन्ध में नेहरू द्वारा बुलाई गई एक बैठक का जिक्र करना ज़रूरी है।

पंडित नेहरू की उस बैठक में कई बड़े नेता व अधिकारी शामिल थे। बैठक को सम्बोधित करते हुए तत्कालीन पीएम ने कहा कि किसी भी भारतीय के पास सेना के नेतृत्व का अनुभव नहीं है, इसीलिए ये पद किसी अंग्रेज को ही देना चाहिए। बैठक में सबने नेहरू की हाँ में हाँ मिलाई लेकिन एक सैन्य अधिकारी ऐसे भी थे जो नेहरू की राय से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते थे। वो शख्स थे- लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राठौड़। उन्होंने कहा– “मैं कुछ कहना चाहता हूँ” और नेहरू के विचारों से आपत्ति जताई।

लेफ्टिनेंट जनरल राठौड़ ने कहा कि अगर किसी भारतीय के पास अनुभव नहीं है तो इसका अर्थ ये नहीं है कि भारत को गुलाम रखने वाले अंग्रेजों में से ही किसी एक को सेनाध्यक्ष की पदवी दे दी जाए। तब नेहरू ने उनसे ही सवाल दाग दिया कि क्या वो इस जिम्मेदारी का निर्वाहन करने को तैयार हैं? लेकिन, राठौड़ अपने बारे में न सोच कर देश के बारे में सोच रहे थे। इसीलिए, उन्होंने सेनाध्यक्ष के पद को ठुकरा दिया और कहा कि उनकी नज़र में एक व्यक्ति है जो इस पद के लिए योग्यता की कसौटी में एकदम खड़ा उतरता है। उनका नाम है- केएम करियप्पा।

केएम करिअप्पा तब लेफ्टिनेंट हुआ करते थे। उन्हें लोग ‘ब्राउन साहब’ भी कहते थे, क्योंकि उनकी हिंदी उतनी अच्छी नहीं थी। हाँ, उनकी कन्नड़ पर अच्छी-ख़ासी पकड़ थी। फील्ड मार्शल जनरल करियप्पा को उनकी बाहदुरी के लिए कई सम्मान मिल चुके हैं।

जनरल करियप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को कर्नाटक के कोडागू में हुआ था। उन्होंने 15 मई 1993 को आखिरी साँस ली थी। करियप्पा की शादी मुथू माचिया से हुई थी। उस समय करियप्पा कैप्टन थे और उनकी उम्र 37 साल थी। हालाँकि, उनकी पत्नी की उम्र लगभग आधी थी। जनरल करियप्पा अपने कठोर फैसलों को लिए जाने जाते हैं।

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जिसने किया भारत पर सबसे पहला हमला, उसी संग नेहरू ने किया समझौता: इसी कारण बनी CAB

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