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3 बार असम के सीएम रहे तरुण गोगोई ने माना कॉन्ग्रेस में नहीं BJP से लड़ने का दम

तीन बार असम के मुख्यमंत्री रहे वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता तरुण गोगोई का अपनी ही पार्टी से भरोसा उठता दिख रहा है। उनकी मानें तो असम की सत्ता से भाजपा को बेदखल करने के लिए राज्य में एक वैकल्पिक राजनीतिक दल की जरूरत है। गोगोई ने शुक्रवार (जनवरी 10, 2019) को कहा कि भाजपा को असम से बाहर करने के लिए वैकल्पिक राजनीतिक पार्टी समय की आवश्यकता हो गई है। ऐसा वह निजी हितों को साधने के लिए नहीं कह रहे। नया राजनीतिक दल उनकी पार्टी को भी कुछ नुकसान पहुँचा सकता है। लेकिन, असम के लोगों की हितों की रक्षा के लिए यह जरूरी है।

बता दें कि बीजेपी को राज्य से बाहर करने के लिए एक नए राजनीतिक दल के आह्वान के बाद ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (Aasu) ने हाल ही में इस तरह का प्रस्ताव रखा है। इस बीच असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की सुरक्षा में कटौती की गई है। उनके सुरक्षा कवर को Z प्लस से घटाकर Z कर दिया गया है। मुख्यमंत्री रहते गोगोई को एनएसजी की सुरक्षा मिली हुई थी। लेकिन 2016 में जब बीजेपी असम में सत्ता में आई तो उनका एनएसजी कवर हटा लिया गया। इसके बाद उन्हें जेड प्लस सुरक्षा दी गई थी, लेकिन अब उनकी जेड प्लस सुरक्षा भी हटा ली गई है।

बता दें कि तरुण गोगोई ने इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत का “हिंदू जिन्ना” करार देते हुए उन पर पाकिस्तान के “दो-राष्ट्र सिद्धांत” का पालन करने का आरोप लगाया था। प्रधानमंत्री मोदी पर बड़ा हमला करते हुए गोगोई ने कहा था, “प्रधानमंत्री हम (कॉन्ग्रेस) पर आरोप लगाते हैं कि हम पाकिस्तान की भाषा में बात कर रहे हैं, लेकिन यही वो शख्स हैं, जिन्होंने खुद को पड़ोसी देश के स्तर तक गिरा लिया है। वह मोहम्मद अली जिन्ना के दो-राष्ट्र सिद्धांत का पालन कर रहे है और भारत के हिंदू जिन्ना के रूप में उभरे हैं।”

साथ ही गोगोई ने मोदी सरकार के तरीकों को अहंकारी करार देते हुए दावा किया कि यह नए नागरिकता कानून को लागू करने के लिए किसी भी हद तक जाएँगे। उन्होंने कहा कि असम समेत देश भर के लोगों ने संशोधित नागरिकता कानून का विरोध किया है, क्योंकि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार लोगों को धर्म, भाषा और संस्कृति के आधार पर बाँटने की कोशिश कर रही है। 

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हमारे कैमरे की सेटिंग ख़राब थी: इंडिया टुडे की JNU हिंसा के फर्जी स्टिंग पर सफाई

दिल्ली पुलिस द्वारा JNU हिंसा में शामिल अपराधियों की पहचान कर लिए जाने के बाद इंडिया टुडे समूह के पत्रकार राहुल कंवल ने एक ‘मेगा इन्वेस्टिगेशन’ स्टिंग वीडियो जारी करते हुए कहा था कि उन्होंने इस हिंसा के मुख्य आरोपितों को पकड़ लिया है। इंडिया टुडे समूह ने दावा किया कि उनके द्वारा किए गए इस खोजी स्टिंग में अक्षत अवस्थी नाम के किसी ABVP कार्यकर्ता ने स्वयं स्वीकारा है कि वह हिंसा में शामिल थास।

इंडिया टुडे के इस वीडियो पर काफी लोगों ने आपत्ति जताते हुए कहा कि यह वीडियो फेक है। यहाँ तक कि खुद ABVP ने भी किसी अक्षत अवस्थी के ABVP से जुड़े होने की खबर से साफ़ इनकार कर दिया। इंडिया टुडे इन्वेस्टिगेशन के फैक्ट चेक से जो बात सामने आई, उसके कारण इस वीडियो की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा हो गया है।

इस पर इंडिया टुडे समूह ने एक ट्वीट के माध्यम से स्पष्टीकरण देते हुए लिखा है कि उनके कैमरा की सेटिंग अपडेट न होने की वजह से ही 5 जनवरी को रिकॉर्ड किया गया वीडियो अक्टूबर 2019 दिखा रहा है।

इंडिया टुडे समूह ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए लिखा है- “हमारी #JNU टेप्स कवरेज से जुड़ी एक क्लिप में दिख रही पुरानी तारीख के संबंध में हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि उस कैमरे की सेटिंग्स (उस विशेष क्लिप को रिकॉर्ड करते समय) अपडेटेड नहीं थीं। इससे जो ग़लतफहमी पैदा हुई है, उसके लिए हमें खेद है।”

स्पष्टीकरण के दूसरे एवं अंतिम भाग में इंडिया टुडे ने लिखा है- “साथ ही, किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले इस तथ्य को ध्यान में रखा जाए कि अक्टूबर 2019 में जेएनयू में ऐसी कोई स्थिति नहीं थी, जिसे लेकर इस तरह की जोखिम भरी रिपोर्टिंग की जाती।”

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पूर्व कॉन्ग्रेसी अब्दुल करीम लड़ेगा पार्षदी का चुनाव, दलित की दिनदहाड़े हत्या में था शामिल

तेलंगाना के मिरियालगुडा का पूर्व कॉन्ग्रेसी नेता अब्दुल करीम जिस पर एक दलित पेरुमला प्रणय की हत्या में सहयोग करने का आरोप लगा था, उसने पार्षद के रूप में चुनाव में लड़ने के लिए शुक्रवार को नामांकन-पत्र दाखिल किया। बता दें कि पेरुमला की हत्या का कारण एक सवर्ण महिला से शादी करना था।

हालाँकि, पार्टी ने करीम को निलंबित कर दिया था और बी-फॉर्म जारी नहीं किया गया था, फिर भी उसने कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल किया। प्रणय की हत्या करने वालों में पाँचवा नाम अब्दुल करीम का था। प्रणय की हत्या दो साल पहले दिन-दहाड़े कर दी गई थी। जाति-अपराध में, करीम पर आरोप लगाया गया था कि उसने मुख्य आरोपित मारुति राव को सुविधा मुहैया कराई थी।

ख़बर के अनुसार, हत्या की वारदात में उसकी भूमिका सामने आने के बाद, कॉन्ग्रेस पार्टी ने उसे तुरंत निलंबित कर दिया था, जिसके बाद उसे गिरफ़्तार भी कर लिया गया था। लेकिन, ऐसा लगता है कि करीम और मारुति राव, जो फ़िलहाल ज़मानत पर बाहर हैं, उन्हें अपने शहर में सार्वजनिक तौर पर लोगों का समर्थन मिल रहा है।

पिछले साल अक्टूबर में, मिरियालागुडा के विधायक एन भास्कर राव और तेलंगाना विधान परिषद के अध्यक्ष गुट्टा सुखेंदर रेड्डी ने दशहरा समारोह में मारुति राव के साथ मंच साझा किया था। मरुति राव दशहरा समारोह समिति का महासचिव था, जिसने मिरयालगुडा में उत्सव का आयोजन किया था।

प्रणय अपनी गर्भवती पत्नी अमृता के साथ 14 सितंबर को मिरयालगुडा के एक निजी अस्पताल से बाहर आ रहे थे कि तभी अचानक प्रणय पर चाकू से हमला किया गया, इससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। आरोपित की पहचान सुभाष शर्मा के रूप में हुई थी। यह पूरी घटना सीसीटीवी कैमरे में क़ैद हो गई और जातिगत-हत्या की ख़बर  पूरे राज्य में इस आग की तरह फैल गई।

नलगोंडा पुलिस ने हत्या के मामले में जून में 1600 पन्नों की चार्जशीट दायर की थी। इसमें प्रणय की हत्या करने की योजना के पूरे घटनाक्रम को बताया गया था। लेकिन, इस मामले में कोई मुक़दमा शुरू नहीं हुआ।

प्रणय की हत्या के कुछ समय बाद, ‘Thalli Thandrula Parirakshana Vedika’ (अभिभावक संरक्षण मंच) के बैनर तले एक समूह, जिसमें आर्य वैश्य संघ के सदस्य शामिल थे और वो मारुति राव की जाति के सदस्य थे, उन्होंने अपना पक्ष आरोपितों के समर्थन में रखा। इतना ही नहीं उन्होंने मिरियालगुडा में उनके लिए न सिर्फ़ एक रैली निकाली, बल्कि आरोपितों से जेल में मुलाक़ात भी की। सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए उन्हें (आरोपितों) नायक की उपाधि तक दी गई।

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AMU के वीसी तारिक मंसूर को जान का खतरा, DGP से लगाई सुरक्षा की गुहार

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में बीते 15 दिसंबर को छात्रों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद से बंद कैंपस अब दोबारा खुलने को तैयार है। इस बीच यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर तारिक मंसूर ने अपनी जान का खतरा बताते हुए प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी को चिट्ठी लिखी है। इसमें उन्होंने अपनी और परिवार की सुरक्षा की बात कही है। अलीगढ़ एसएसपी आकाश कुलहरि ने कहा कि एएमयू के वाइस चांसलर को सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी।

आकाश कुलहरि ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “हमें एएमयू वीसी का पत्र मिला है जिसमें उन्होंने कहा है कि कुछ असामाजिक तत्वों ने उनके और रजिस्ट्रार के खिलाफ पोस्टर लगाए हैं। उन्होंने अतिरिक्त सुरक्षा की माँग की है। हम वीसी और रजिस्ट्रार को अतिरिक्त सुरक्षा दे रहे हैं। मैं आज शाम डीएम, वीसी और रजिस्ट्रार से मिलूँगा।”

बता दें कि विश्वविद्यालय 13 जनवरी को खुलने वाला है। इससे पहले वाइस चांसलर ने खुद के और अपने परिवार के ऊपर जान का खतरा बताते हुए कैंपस में फिर से हिंसा की आशंका जताई है। उनका कहना है कि 13 जनवरी को विश्विद्यालय के खुलने के बाद असामाजिक तत्व या फिर वो छात्र जिन्हें, निष्कासित कर दिया गया है, वो माहौल खराब करने के लिए हिंसा या उपद्रव जैसे वारदात को अंजाम दे सकते हैं। वीसी ने पुलिस प्रशासन से समय रहते सतर्क रहने के लिए कहा है, ताकि इस तरह की हिंसक कार्रवाई से बचा जा सके।

एएमयू वीसी ने शुक्रवार (जनवरी 10, 2019) को प्रदेश के मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी, डीएम, एसएसपी को लिखे पत्र में कहा है कि 13 जनवरी को एएमयू खुलने के बाद असामाजिक व गुंडा तत्व कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। ये लोग उन्हें व उनके परिवार को भी नुकसान पहुँचा सकते हैं। विश्विद्यालय के वीसी ने पत्र के साथ सोशल मीडिया पर उनको लेकर फैलाए जा रहे दुष्प्रचार का स्क्रीन शॉट भी अटैच किया है। इसमें उन्हें संघ व भाजपा का समर्थक बताते हुए आपत्तिजनक बातें लिखी गई हैं।

अलीगढ़ के डीएम चंद्रभूषण सिंह ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि एएमयू वीसी द्वारा लिखे गए पत्र में एसएसपी को यूनिवर्सिटी खुलने पर पर्याप्त सुरक्षा के इंतजाम करने को कहा गया है। बता दें कि नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध के नाम पर बीते दिसंबर में AMU ने अपने नारों से देश को चौंका दिया था। प्रदर्शनकारी छात्रों ने “हिन्दुत्व की क़ब्र खुदेगी AMU की धरती पर” जैसे नारे लगाए थे। AMU के इन नफरती नारों को लेकर देशभर में आक्रोश देखा गया। इस घटना पर संज्ञान लेते हुए पुलिस ने 50-60 छात्रों के ख़िलाफ़ धारा-153 ए के तहत मुक़दमा दर्ज किया है।

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‘जिन्ना वाली आज़ादी’ बेटी ने भी नहीं की कबूल, अपने ही Pak में बुरी मौत मरा ‘कायदे आजम’

दिल्ली के शाहीन बाग़ में एक नारा लगता है- जिन्ना वाली आज़ादी। जिन्ना वो शख्स था, जिसने देश को दो हिस्सों में बाँटने के लिए मुहिम चलाई और ख़ुद कहीं का न रहा। मोहम्मद अली जिन्ना ने मजहब के आधार पर पाकिस्तान तो ले लिया, लेकिन उसी पाकिस्तान में ‘क़ायदे आज़म’ एक भिखारी से भी बदतर मौत मरा। वो सितम्बर 11, 1948 का दिन था, पाकिस्तान के जन्म के एक साल बाद का समय। क्वेटा से एक प्लेन पाकिस्तान की तत्कालीन राजधानी कराची पहुँचा। उस फ्लाइट में एक टीबी का मरीज पड़ा हुआ था। वही मोहम्मद अली जिन्ना था, जिसे अपने ही बनाए मुल्क़ में किसी नेता ने पूछा तक नहीं

उसे डॉक्टरों ने क्वेटा की पहाड़ियों में भेजा था, ताकि वहाँ के मौसम से स्मोकिंग के आदी रहे जिन्ना को टीबी से कुछ राहत मिले। जब वहाँ भी उसकी बीमारी ठीक नहीं हुई तो उसे कराची भेज दिया गया। अबकी डॉक्टरों को लगा कि समुद्र किनारे हवाओं में नमी होने के कारण उसकी हालत ठीक हो जाए। इस बारे में एयर मार्शल असगर ख़ान की बातें गौर करने लायक है। जब वो एक बार अपनी पत्नी के साथ सड़क पार कर रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि एक ख़राब एम्बुलेंस में जिन्ना का मृत शरीर पड़ा हुआ है और उसकी बहन फातिमा भी बैठी हुई है।

उन दोनों ने जिन्ना के बहन की मदद करनी चाही लेकिन ब्रिटिश सिक्योरिटी वालों के कारण ऐसा नहीं कर पाए। यहाँ तक कि मरने के बाद जिन्ना को वापस ले जाने के लिए एक बैकअप एम्बुलेंस की व्यवस्था भी नहीं की गई। वो भी उस पाकिस्तान में, जिसकी नींव उसने ही रखी थी। बाद में एक अंग्रेज सैन्य अधिकारी ने आकर जिन्ना के मृत शरीर को दूसरे एम्बुलेंस में शिफ्ट किया। यहाँ भारत में जो लोग ‘जिन्ना वाली आज़ादी’ जैसे नारे लगाते हैं और एएमयू में जिन्ना की तस्वीर लगाने की वकालत करते हैं, क्या उन्हें पता भी है कि जिन्ना के पाकिस्तान में जिन्ना की मौत गुमनामी में हुई थी।

इन वामपंथी उपद्रवियों को ये पता नहीं है कि जब पाकिस्तान अपने मुल्क़ के ‘क़ायदे आज़म’ को ही उचित सम्मान नहीं दे पाया। अगर जिन्ना के पाकिस्तान में ‘जिन्ना वाली आज़ादी’ होती तो जिन्ना का परिवार भारत में आकर न रहता। जिन्ना की बेटी दीना वाडिया की शादी मुंबई के एक पारसी खानदान में हुई। जिन्ना की एकमात्र संतान ने अपनी बाकी ज़िंदगी भारत में गुजारी और उनका पूरा परिवार भी आज भारत में ही व्यापार कर रहा है। दीना के पोते नेस वाडिया का कारोबार मुंबई से लेकर ब्रिटेन तक फैला हुआ है और आईपीएल टीम ‘किंग्स इलेवन पंजाब’ में भी उनका मालिकाना हिस्सा है।

वाडिया परिवार मूलतः सूरत का है, जो कारोबार के सिलसिले में मुंबई में ही जा बसा। टेक्सटाइल, शिपिंग, आभूषण और कई अन्य कारोबार में धाक रखने वाले वाडिया परिवार के लोग राजनीति और प्रशासन से भी जुड़े हुए हैं। दीना जिन्ना के बेटे नुस्ली वाडिया ने अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ाया। नेस वाडिया उनके ही बेटे हैं। इस तरह से जिन्ना, नुस्ली के नाना हुए। वाडिया परिवार सदियों से गुजरात और महाराष्ट्र में एक प्रभावशाली उद्योगपति खानदान रहा है। सत्रहवीं शताब्दी से ही उनके व्यापार लगातार फलते-फूलते रहे हैं।

ऐसे में इस सवाल का उठना जायज है कि अगर जिन्ना के पाकिस्तान में सच में आज़ादी रहती तो क्या उनका परिवार वहाँ जाकर अपने कारोबार नहीं चलाता? अगर जिन्ना के पाकिस्तान में ‘जिन्ना वाली आज़ादी’ होती तो क्या उनकी बहन की वहाँ संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होती। फातिमा जिन्ना ने 1965 में तानाशाह जनरल अयूब ख़ान के ख़िलाफ़ चुनावी ताल ठोकी थी। फातिमा की मौत के बाद परिवार ने जाँच की लाख माँग की, पाकिस्तान सरकार ने सब ठुकरा दिया। जिन्ना के पाकिस्तान में तो उनकी बहन ‘मदर-ई-मिल्लत’ को ही इंसाफ नहीं मिला, आज़ादी ख़ाक मिलेगी।

जिस व्यक्ति ने ‘डायरेक्ट एक्शन’ की बात कर के इस देश को दो हिस्सों में बाँट दिया, उस व्यक्ति का नाम लेकर आज़ादी की माँग करने वालों को समझना चाहिए कि अगर उन्हें ऐसी ‘आज़ादी’ मिल गई तो वो उससे अच्छा भारत के किसी क़ैदख़ाने में ज़िंदगी बिताना ज़्यादा सुरक्षित महसूस करेंगे। आप सोचिए, किसी महिला के पिता एक पूरे के पूरे मुल्क़ के ‘बाबा-ए-क़ौम’ अर्थात राष्ट्रपिता कहे जाते हैं, संस्थापक हैं, फिर भी वो महिला या उसका परिवार पाकिस्तान नहीं जाता। क्यों?

ऐसा इसीलिए, क्योंकि उन्हें पाकिस्तान जाने का अंजाम पता है। बँटवारे के बाद जहाँ एक तरफ़ जिन्ना ये कहते रहे कि पाकिस्तान में सभी मजहब के लोगों का स्वागत है, वहाँ से लाखों हिन्दुओं व सिखों को भगा दिया गया। महिलाओं के साथ बलात्कार हुए, लोगों की हत्या की गई और कत्लेआम मचाया गया। वहीं भारत में विभिन्न शिविरों में घूम-घूम कर जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आज़ाद मुस्लिमों को समझाते रहे कि उन्हें देश नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि भारत में उनके पास वही सारे अधिकार होंगे, जो किसी अन्य धर्म के लोगों के पास होंगे।

जहाँ ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ के नारे लगते हों, वहाँ ‘जिन्ना से आज़ादी’ वाली बात तो छोटी सी ही है। जिनलोगों को सच में जिन्ना वाली आज़ादी चाहिए, वो दिखावा न करें और एक बार जिन्ना के बनाए पाकिस्तान में जाकर देखें। वो जिन्ना की बहन के बारे में पढ़ें। उनकी बेटी के बारे में पढ़ें। जिन्ना की बेटी के परिवार के बारे में पढ़ें। इतिहास पढ़ें, वर्तमान देखें। यूएन की रिपोर्ट पढ़ें, जिसमें पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति के बारे में बताया गया है। उन्हें पता चल जाएगा कि ‘जिन्ना वाली आज़ादी’ का क्या परिणाम निकलता है?

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‘पोस्टर से जुटाओ बड़े हिंदू नेता की जानकारी, फिर हमला कर मार दो’ – पकड़ाए 3 आतंकियों का खुलासा

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आईएसआईएस के तीन संदिग्ध आतंकियों को धर दबोचा। अब खुफिया एजेंसियों से पूछताछ में इन्होंने गुरुवार (जनवरी 9, 2019) को चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। इन गिरफ्तार आतंकियों को लोकप्रिय हिंदू नेताओं की हत्या करने की ‘सुपारी’ दी गई थी। इसके साथ ही इनसे सेना और पुलिस के अधिकारियों को भी अपने निशाने पर रखने को कहा गया था।

पकड़े गए तीन संदिग्ध आईएसआईएस आतंकियों में से जफर नाम के आतंकी ने पूछताछ में बताया कि वो कई बड़े हिंदू नेताओं की हत्या करने के मकसद से आया था। उसने खुलासा किया कि उसे इन हत्याओं के बाद अपनी शहादत देनी थी। उसने खुलासा किया कि उसे बड़े और नामी हिंदू नेताओं के मर्डर का लक्ष्य दिया गया था। 

इन आतंकियों को टास्क दिया गया था कि बड़े नेताओं की जानकारी उसे शहर की दीवारों पर लगे पोस्टरों से जुटानी थी। इसके बाद पूरी योजना के साथ उनके ऊपर हमला किया जाता। साथ ही उन्हें उनके आकाओं (हैंडलर) से कहा गया था कि यदि कोई वर्दी पहने हुए बड़ा अधिकारी दिखे तो उसकी हत्या कर दो।

जाँच एजेंसी के मुताबिक तीनों आतंकियों की योजना देश के विभिन्न शहरों में बड़े हमले करने की थी। उनके निशाने पर आरएसएस के कई बड़े नेता भी हैं। पकड़े गए आईएसआईएस आतंकवादियों की योजना में यूपी में भी कई बड़े हमले की साजिश शामिल थी। साथ ही खुफिया एजेंसी द्वारा किए गए पूछताछ में यह भी खुलासा हुआ है कि ये तीनों आतंकी आपस में बातचीत करने के लिए ऐसे ऐप का इस्तेमाल करते थे, जिसमें कम्युनिकेशन खत्म होते ही टेक्स्ट अपने-आप डिलीट हो जाते थे।

गौरतलब है कि गिरफ्तार तीनों तमिलनाडु से फरार चल रहे थे। जिनमें से दो संदिग्ध को प्रसिद्ध हिंदू मुनानी नेता केपी सुरेश कुमार की हत्‍या मामले में कोर्ट से बेल मिली हुई है। बेल के बाद यह लोग तमिलनाडु से नेपाल भाग गए और वहाँ से फिर दिल्‍ली आए। इसके बाद यहाँ से फिर नेपाल और वहाँ से पाकिस्‍तान जाने की फिराक में थे। तीनों आतंकियों पर आरोप है कि ये दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में टेरर स्ट्राइक करने वाले थे। ये आतंकी संगठन आईएसआईए से प्रभावित थे। इन्‍हें पकड़ने के लिए स्‍पेशल सेल की टीम को लगाया गया था।

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शेखी बघारने के लिए ख़ुद को बताया ABVP का सदस्य: इंडिया टुडे को दिए बयान से पलटा JNU छात्र अक्षत

दिल्ली पुलिस ने जेएनयू हिंसा मामले में चार वामपंथी संगठनों का नाम लिया था, जिनमें SFI, AISA, AISF और DFI शामिल थे। वहीं 9 आरोपियों की ज़ारी तस्वीर में से जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आईशा घोष को भी दिल्ली पुलिस ने नामजद किया था। लेकिन, इस बीच इंडिया टुडे द्वारा किए गए एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद जेएनयू छात्र अक्षत अपने ही बयान से पलट गया है। उसने कहा है कि मैंने शेखी बघारने के लिए झूठ बोला था और खुद को ABVP का सदस्य बताया था।

दरअसल 5 जनवरी को इंडिया टुडे ने अपने चैनल पर एक “स्टिंग ऑपरेशन” प्रसारित किया था। इसमें 5 जनवरी को जेएनयू परिसर में हुई बड़े पैमाने पर हिंसा में शामिल गुंडों को बेपर्दा करने का दावा भी किया गया था। इंडिया टुडे ने दावा किया था कि बिना मास्क पहने जेएनयू के साबरमती हॉस्टल में हिंसा कर रहा छात्र एबीवीपी का कार्यकर्ता है। उधर स्टिंग में अक्षत अवस्थी ने दावा किया कि वह एक एबीवीपी का कार्यकर्ता है और उसने जेएनयू में हुई हिंसा के बाद पेरियार छात्रावास में वामपंथियों को करारा जवाब देने के लिए अन्य एबीवीपी कार्यकर्ताओं को एकत्र किया था।

हालाँकि, राहुल कँवल ने ट्विटर पर यह साबित करने की कोशिश की कि अक्षत वास्तव में एक एबीवीपी कार्यकर्ता है। लेकिन, ऑपइंडिया के फैक्ट चैक में यह दावा फेल हो गया और अक्षत अवस्थी ने अपने बयान को वापस लेते हुए साफ़ कर दिया कि उसने शेखी बघारने के़ लिए झूठ बोला था। अक्षय अवस्थी ने अब दावा किया है कि इंडिया टुडे के रिपोर्टर को जो भी बताया वे सब झूठे थे। बस दिखावा करने के लिए मैंने वे बातें कही थी।

अब अक्षत अवस्थी ने इंडिया टुडे और ‘आज तक’ के ‘स्टिंग ऑपरेशन’ में दिए गए अपने ही बयान से पलटी मारते हुए कहा है कि वह एबीवीपी से जुड़ा हुआ नहीं है। अवस्थी ने कहा है कि वह एबीवीपी का सदस्य भी नहीं है।

इंडिया टुडे ने अपने ‘स्टिंग ऑपरेशन’ में जेएनयू हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस से पहले ही केस सॉल्व करने का दावा करते हुए अपनी पीठ थपथपाई थी। साथ ही चैनल ने इसे 2020 का सबसे बड़ा खुलासा बताया था। दिल्ली पुलिस ने जेएनयू हिंसा मामले में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर 9 संदिग्धों के नाम उजागर किए थे। इसके एक घंटे बाद ही स्टिंग ऑपरेशन का प्रसारण किया गया। इसमें शामिल किए गए 9 संदिग्धों में, 7 वामपंथी संगठनों के और 2 एबीवीपी के संगठन थे।

पुलिस ने यह भी कहा था कि जेएनयू के पेरियार छात्रावास में चुनिंदा कमरों को चिन्हित किया था। दिलचस्प बात यह है कि पेरियार छात्रावास के अधिकांश घायल छात्र एबीवीपी के ही थे।

अब तक तीन मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनकी जाँच दिल्ली पुलिस द्वारा की जा रही है। हालाँकि, नौ आरोपितों में से अब तक किसी को भी हिरासत में नहीं लिया गया है। दिल्ली पुलिस ने अब सभी आरोपितों को नोटिस जारी करने का फैसला किया है।

हमारे कैमरे की सेटिंग ख़राब थी: इंडिया टुडे का JNU हिंसा के फर्जी स्टिंग पर सफाई

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सऊदी अरब से आई कुरान: कोच्चि में होगी नीलामी, 21 जनवरी को लगाएँ बोली

केरल के कोच्चि में इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट कंटेनर टर्मिनल (वल्लारपाद) पर 25 टन क़ुरान की नीलामी की जाएगी। इन्हें सऊदी अरब से 6 महीने पहले भेजा गया था। मल्लापुरम के वाज़हक्कड़ स्थित दारुल उलूम अरेबिक कॉलेज के प्रिंसिपल अब्दुल सलाम ने इन्हें मँगवाया था। अब उन्होंने आयात शुल्क का भुगतान करने में असमर्थता जताई है। इसलिए 21 जनवरी को 25 टन क़ुरान को नीलाम कर दिया जाएगा।

ख़बर के अनुसार, बड़ी संख्या में क़ुरान की खेप 6 महीने पहले वल्लारपदम इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) में आई थी। विदेश में अत्याधुनिक प्रेस में छपी हुई ये क़ुरान तब से पड़ी हुई है। मलप्पुरम में दारुल उलूम अरबी कॉलेज के प्रिंसिपल अब्दुल सलाम ने बताया कि कॉलेज ने आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके के मुस्लिमों को मुफ़्त क़ुरान बाँटने के लिए इन्हें सऊदी अरब से मँगवाया था।

सलाम का कहना था, “जब हम खेप को स्वीकार करने गए, तो हमसे खेप हासिल करने के लिए सीमा शुल्क के रूप में लगभग 8 लाख रुपए का भुगतान करने के लिए कहा गया। हमारे पास इतना पैसा नहीं था और हमने इसे कबूल नहीं करने का फ़ैसला किया। बाद में सीमा शुल्क एजेंट ने सूचित किया कि लावारिस खेप की नीलामी की जाएगी।”

सलाम ने यह भी बताया कि उन्होंने क़ुरान की खेप को वापस सऊदी अरब भेजने का अनुरोध किया था, लेकिन उन्हें सूचित किया गया कि इसके लिए माल भाड़ा शुल्क का भुगतान करना होगा। उसके बाद, उन्होंने टर्मिनल अधिकारियों को क़ुरान की नीलामी के लिए एक पत्र दे दिया। इस पत्र में कहा गया था कि कॉलेज 8 लाख रुपए का शुल्क अदा करने में असमर्थ है। सलाम ने बताया कि इतनी बड़ी संख्या में क़ुरान की प्रतियाँ सऊदी अरब से निशुल्क भेजी गई थी। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें पता चला था कि 2018 में केरल में आई बाढ़ के दौरान बहुत सारी क़ुरान खो गई थीं।

अब जब कॉलेज ने क़ुरान को लेने से इनकार कर दिया है, तो MIV लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड ने क़ुरान की खेप की नीलामी करने संबंधी एक नोटिस जारी किया है। लॉजिस्टिक कंपनी का कहना था कि उन्होंने सीमा शुल्क विभाग से कार्रवाई आगे बढ़ाने के आदेश पर क़ुरान की नीलामी करने का फ़ैसला लिया है। 

MIV लॉजिस्टिक्स के अधिकारियों ने बताया कि कंसाइनमेंट किसी भी छूट की श्रेणी में नहीं आता है और आयातक के लिए शुल्क का भुगतान करना ज़रूरी होता है। उन्होंने बताया कि सभी आयातित सामानों को कम्प्यूटरीकृत भारतीय सीमा-शुल्क EDI प्रणाली से गुज़रना पड़ता है। सीमा शुल्क के तहत मूल्यांकनकर्ताओं की एक समिति ने क़ुरान की खेप की नीलामी के लिए आधार मूल्य के रूप में 1 लाख रुपए की राशि तय की है, इसकी ई-नीलामी 21 जनवरी को होगी।

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जिसके साथ घर बसाना चाहती थी आरती, उसी बॉयफ्रेंड मोहम्मद शाहिद ने गला रेत कर मार डाला

तेलंगाना के वारंगल में नवम्बर 2019 में एक किशोरी के बलात्कार और हत्या की ख़बर आई थी। अब जिले से एक और आपराधिक घटना की ख़बर आई है। शुक्रवार (जनवरी 10, 2019) को एक 25 वर्षीय युवती की उसके बॉयफ्रेंड ने बेरहमी से हत्या कर दी। मृतक युवती एमबीए कर चुकी थी। आरोपित मोहम्मद शाहिद लश्कर सिंगारम का रहने वाला है। वह किराए के मकान में रहता था, जहाँ उसने इस हत्याकांड को अंजाम दिया। इसके बाद वो सीधा वारंगल सेंट्रल जेल पहुँचा और उसने पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। ख़बर के अनुसार, आरोपित और मृतक युवती कॉलेज के समय से ही रिलेशनशिप में थे।

आरोपित शाहिद से युवती के परिवार वाले भी अच्छी तरह परिचित थे। जहाँ एक तरफ शाहिद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगा हुआ था, उसकी गर्लफ्रेंड के परिवार वाले शादी के लिए लड़का ढूँढने में व्यस्त थे। इसी बीच शाहिद को शक हुआ कि उसकी गर्लफ्रेंड का किसी और से अफेयर चल रहा है और उसने इस पर बात करने के लिए उसे अपने घर बुलाया। दोनों के बीच तीखी नोंक-झोंक हुई। इसके बाद गुस्साए शाहिद ने युवती का गला काट दिया। हंस इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों लिव-इन रिलेशनशिप में भी रह चुके थे।

मृत युवती का नाम आरती (Harathi) है। उसकी मौत घटनास्थल पर ही हो गई थी। पुलिस ने आरोपित को हिरासत में ले लिया है और मामले की जाँच की जा रही है। युवती के पिता ने कहा कि इस बात से उन्हें गहरा आघात लगा है कि उनकी बेटी को हत्या करने वाला परिवार का परिचित ही था। उन्होंने बताया कि वो शाहिद को लंबे समय से जानते हैं और वो युवती के सबसे विश्वस्त दोस्तों में से एक था। मृतक युवती के परिवार वालों ने बताया कि उन्हें कुछ दिनों पहले ही पता चला था कि आरती और शाहिद एक-दूसरे से प्यार करते हैं। उन्होंने बताया कि ख़ुद आरती ने उन्हें इस बारे में बताया था।

परिवार वालों के अनुसार वो इन दोनों के रिश्ते के लिए राज़ी भी हो गए थे और सही समय पर शाहिद के साथ बात आगे बढ़ाने के बारे में सोच रहे थे। दोनों का एक-दूसरे के घर आना-जाना लगा रहता था। शुक्रवार को आरती ने अपने परिवार वालों को बताया कि वो कुछ काम से बाहर जा रही है। वो शाहिद के घर गई, जहाँ उसकी हत्या हो गई। आरती की हत्या के बाद आरोपित शाहिद 4 किलोमीटर का सफर ऑटो रिक्शा से तय कर सेंट्रल जेल सरेंडर करने पहुँचा। जेल कर्मचारी को लगा कि वो किसी क़ैदी का रिश्तेदार है और उसे बताया कि मुलाक़ात का समय ख़त्म हो गया है।

जब शाहिद ने बताया कि वो हत्या कर के आ रहा है तो कर्मचारियों ने तुरंत स्थानीय पुलिस को सूचना दी। इसके बाद पुलिस की टीम शाहिद को हिरासत में लेकर थाने ले गई। पुलिस आरोपित को लेकर उसके कमरे पर गई, जहाँ आरती का मृत शरीर पड़ा हुआ था और ख़ून था। शाहिद ने ही पुलिस को आरती के घरवालों के बारे में बताया। इसके बाद पुलिस ने पीड़ित परिवार को सूचना दी।

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कबीरा इस संसार में भाँति-भाँति के कामरेड्स: कथा कामरेड क्रांति कुमार की

CAA के विरोध से शुरू हुई क्रांति, छपाक फिल्म देखकर विरोध जाहिर करने में सिमट चुकी है। लड़ना फासीवाद से था, और लड़ टिकट खिड़की पर PVR में पानी की बोतल और झालमूड़ी ले जाने की परमिशन के लिए रहे हैं। इस सब किस्से से मुझे क्रांति कुमार की याद आती है। सीधा-सादा सर्वहारा क्रांति कुमार किस तरह से साथियों की देखा-देखी कामरेड क्रांति कुमार में तब्दील हो गया लेकिन क्रांति फिर भी न आई।

क्रांति कुमार एक आम इंसान हुआ करते थे, इसके बाद क्रांति कुमार ने सोशल मीडिया पर देखा कि व्यवस्था से हर वक़्त नाराज रहने वाले खूब डिमांड में हैं। यहाँ से क्रांति कुमार के जीवन में बड़ा बदलाव आया। अब क्रांति कुमार आम इंसान नहीं रहे। अब क्रांति कुमार कामरेड क्रांति कुमार हो गए हैं। कामरेड क्रांति कुमार ने ट्विटर पर संविधान पढ़ा था और राजनीति शास्त्र की बारीकियाँ उसने एक बुर्जुआ मित्र के साथ पिज्जा ऑर्डर करते वक़्त मुफ्त कूपन इस्तेमाल करते हुए सीखीं थीं।

कामरेड ने फेसबुक पुस्तकालय पर सुना था कि भगत सिंह भी कामरेड हुआ करते थे। क्रांति कुमार ने यह भी सुना था कि महिलाओं के वस्त्र पहनकर उनके विरोध को HD कैमरा जल्दी कैद कर लेता है। अब कामरेड ने सबसे पहले एक ढपली ली और एक पेटीकोट खरीद लिया, जिसके उसके हाल ही में उसके एक साथी ने ही बताया था कि जब सभी मर्द पेटीकोट पहनने लगेंगे तो यह नया कूल हो जाएगा। बुर्जुआ कामरेड ने फिर नव-कामरेड को गाँधी जी की याद दिलाते हुए कहा कि परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करो, यह कहते कहते नव-कामरेड ने वह वस्त्र धारण कर लिया और माथे पर बिंदी भी लगा ली।

अब कामरेड बनने का आखिरी चरण था- विरोध। कामरेड क्रांति कुमार ने बुर्जुआ साथी से पूछा- “अब लगभग सभी औपचारिकताएँ पूरी हुईं साथी, ये बताओ अब विरोध किसका किया जाए?” साथी कामरेड ने क्रांति कुमार को तुरंत उसकी भूल याद दिलाते हुए कहा- “सुनो साथी, एक कामरेड कभी यह सवाल नहीं कर सकता कि किसका विरोध करें? याद रखो कि तुम्हें बस विरोध करना है, फिर चाहे किसी का भी हो।” क्रांति कुमार को शुरू में बात अटपटी लगी लेकिन यह सोचते हुए कि अगर उसने इसी बात का विरोध कर दिया तो कहीं उसकी नई-नई कामरेड वाली सदस्यता भंग ना हो जाए, क्रांति कुमार ने सर हिलाकर ‘ठीक’ का इशारा किया।

क्रांति कुमार ने सोशल मीडिया स्क्रॉल किया तो देखा कि नाराजगी से भरे हुए उसी के जैसे ही करोड़ों अन्य लोग किसी ना किसी मुद्दे से नाराज थे। कुछ व्यवस्था से नाराज थे, कुछ सरकार से, कुछ मनुवाद से, कुछ हिंदुत्व से, कुछ पितृसत्ता से, कुछ फासीवाद से… दूर कोने में एक छोटा सा ‘अल्पसंख्यक’ वर्ग ऐसा भी था जो सिर्फ पेटीकोट-बिंदी लगाए हुए इंसानों की पहचान न हो पाने से नाराज था। ख़ास बात यह थी कि नाराज होने के बावजूद भी यह वर्ग कामरेड नहीं था, इसने अपनी पहचान ‘अर्बन ट्रोल’ के रूप में बताई।

ट्रेंडिंग परेशानियों में CAA का विरोध और मोदी-शाह का विरोध देखकर क्रांति कुमार को मानो नाराज होने की दवा ही मिल गई। क्रांति कुमार को ध्यान आया कि कुछ चुनिंदा लोग तो मात्र मोदी-शाह के नाम से ही 2014 से नाराज हैं। उसे ध्यान आया कि रवीश कुमार जी से लेकर स्वरा भास्कर और अब अनुराग कश्यप जैसे बड़े नाम भी मोदी-शाह से नाराज हैं और निरंतर नाराज ही हैं, इस नाराजगी से एक दिन का भी अवकाश नहीं। उसके मन में तुरंत विचार आया कि यह सबसे सही ‘गोची’ है।

तुरंत क्रांति कुमार ने JNU जाकर CAA का विरोध करने की प्रतिज्ञा ली। और इसके लिए उसने सबसे पहले एक ढपली खरीद ली। ढपली के साथ उन्हें एक फिल्म का टिकट मुफ्त मिला। कामरेड क्रांति कुमार को लगने लगा कि JNU में ढपली हाथ में लेते ही वह भगत सिंह बन जाएगा, लेकिन वो यह भूल गया कि महज ढपली बजाने से अगर भगत सिंह बन जाते तो ऋषि कपूर को आज यूनेस्को ने बेस्ट भगत सिंह घोषित कर दिया होता।

एक समय था जब बाप सीना चौड़ा कर कहता था कि उसका बेटा क्रांति कुमार फलां कॉलेज से टॉपर निकला है। टॉपर ना सही तो बेटे के ग्रेजुएट होने में भी वह गर्व महसूस कर लेता था। अब बाप की खुशी इस बात में सिमट गई है कि क्रान्ति कुमार किसी कॉलेज में गया और वहाँ पेटीकोट पहनते हुए ढपली बजाकर प्रोग्रेसिव नजर आने लगा है। मने, बाप भी खुश और बेटे के भी शौक पूरे।

एक रोज क्रान्ति कुमार कॉलेज जाता है। शाम होते कामरेड क्रांति कुमार फैज़ को गुनगुनाते हुए घर लौटता है… ‘हम भी देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे।’ मांँ कहती है- हाथ-मुँह धुलकर खाना खा ले। कामरेड बेटा जवाबी हमले में कहता है- “माँ के हाथ का बना नहीं खाऊँगा, जब तक बाप किचन में जाकर खाना नहीं बनाएगा, तब तक वो भूख हड़ताल करेगा, गाँधी जी भी यही करते।”

इतना सुनकर दिल्ली की सर्दी में टीवी पर प्राइम टाइम में बर्निंग क्वेश्चन वाली डिबेट की अलाव ताप रहा बाप तिलमिलाया हुआ बिस्तर से फ़ौरन कम्बल त्यागकर उठता है। बेटे क्रांति कुमार के पिछवाड़े पर जोर की लात मारते हुए कहता है- “नालायक, हमारी तो पितृसत्ता में ही खूब निभी, मैं दफ्तर जाता, मेरी बीवी घर संभालती। तूझे परेशानी है तो आज से ही किचन में जाकर खाना-पकाना, चूल्हा-चौका सब तेरे हिस्से। अब लड़ पितृसत्ता से। गाँधी जी भी तो कहते थे- बी दी चेंज दैट यू विश टू सी इन दी वर्ल्ड।”

बापू का यह रूप देखकर और कुछ करने का नाम सुनकर क्रांति कुमार रूठ जाता है। जब लात पड़ी तब फैज़ भी नहीं आए, न बापू आए। अब मम्मी उसे मना रही है, क्रांति कुमार आज भी भूखा नहीं सोएगा।

पिछवाड़े पर पड़ी बाप की लात के दर्द से कराहते हुए क्रांति कुमार बस याद कर रहा है- कितना विरोध पेंडिंग रह जाएगा। सिस्टम और व्यवस्था से लड़ने के लिए उसने जो नारे लगाने के सपने देखे थे। स्वरा और दीपिका की फिल्म देखकर सत्ता पलटनी थी, क्रांति वाले हैशटैग चलाने थे। दर्द के इन पलों में फैज़-वैज की जगह कामरेड क्रांति कुमार को बस कबीर का वह दोहा याद आया, जो उसके साथियों ने ‘हम भी देखेंगे’ वाले व्हाट्सएप्प ग्रुप में शेयर किया था- “कबीरा इस संसार में भाँति-भांति के लोग… “

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