उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में एक मदरसा संचालक अपनी पाँच बीवियों के जरिए नकली नोट का धंधा चला रहा था। वह प्रिंटर से ही मदरसे के भीतर नकली नोट छापता था और फिर अपनी बीवियों को पकड़ा देता था। इसके यह जगह-जगह यह नोट खपा देती थीं। उसके गैंग में 4 और लोग शामिल थे। पुलिस ने उनके पास से नकली नोट छापने की मशीन और हजारों के नकली नोट बरामद किए थे। उनके पास से अवैध हथियार भी बरामद हुए हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, श्रावस्ती के हरदत्त नगर इलाके में लक्ष्मणपुर इलाके में चल रहे एक मदरसे में हाल ही में छापा मारा। यहाँ से मदरसे के संचालक मुबारक अली और उसके गुर्गे पकड़े गए। इनके पास से ₹34500 नकली नोट बरामद किए। इसके अलावा इनके पास से एक प्रिंटर भी बरामद हुआ। साथ ही नोट छापने की और सामग्री भी मिली। इनके पास से एक तमंचा भी मिला। पुलिस ने इनसे पूछताछ की तो असलियत का खुलासा हुआ।
पुलिस ने बताया कि मदरसा संचालक मुबारक अली इस गैंग का सरगना था, यही नोट छापने का पूरा काम देखता था। यह नोट पहले प्रिंटर से मदरसे के एक कमरे में छापे जाते और फिर इनको असली नोट जैसा दिखाने के लिए तैयार किया जाता। नोट छापने के लिए अच्छे क्वालिटी का कागज भी यूज होता था। यह ₹500 के अलावा छोटे नोट भी छापते थे ताकि किसी को शक ना हो। मुबारक अली की पाँच बीवियाँ हैं। इनमें से दो अलग-अलग जगह मदरसों में ही पढ़ाती हैं। मुबारक अली फर्जी नोट छाप कर इन पाँचों को देता था।
इसके बाद यह बाजार में यह नोट खपा देती थीं, इसके लिए यह रात के अँधेरे का फायदा उठाती थी। उसकी बीवियों पर पुलिस ने अभी कार्रवाई नहीं की है। गैंग में शामिल बाकी लोग भी यही काम करते थे। मुबारक अली ने यह नोट छापना यूट्यूब से सीखा था। उसके गैंग में जलील, धर्मराज, अवधेश और रामसेवक हैं। इनमें से कुछ पर आपराधिक मुकदमे भी दर्ज हैं। इनके पास से ₹500, ₹200 और ₹100 के नकली नोट पाए गए हैं। इनके पास ₹14500 के असली नोट भी मिले हैं।
यह सिर्फ नकली नोट छाप कर खुद नहीं चलाते थे बल्कि दूसरों को भी इस धंधे में शामिल होने को लेकर झाँसा देते थे। यह उन्हें ₹1000 के बदले ₹2000 के बकली नोट देने का वादा करते थे। पुलिस अब इस मामले में जाँच कर रही है। वह पता लगा रही है कि इस धंधे में और कौन शामिल रहा है।
स्विट्जरलैंड में 1 जनवरी 2025 को आधिकारिक रूप से बुर्के बैन करने वाला कानून लागू हो गया। इस कानून के लागू होने के साथ ही सार्वजनिक जगहों पर कोई भी पूरा चेहरा ढककर नहीं घूम सकेगा। अगर किसी ने इस कानून का उल्लंघन किया तो उसे 1000 स्विस फ्रैंक (तकरीबन 95 हजार रुपए) तक का जुर्माना देना पड़ सकता है।
कैसे लगा बैन
बता दें कि बुर्के पर प्रतिबंध 2021 के एक जनमत संग्रह के आधार पर लगाया गया है जिसमें नागरिकों ने चेहरा ढकने के विरोध में अपना मत दिया था। इस जनमत संग्रह में कानून के पक्ष में 51.2 प्रतिशत और कानून के विरोध में 48.8 फीसद वोट पड़े थे।
संसद में लगी मुहर
इसके बाद 20 सितंबर 2023 को स्विस संसद के निचले सदन ने इस पर मुहर लगाई। इसके मुताबिक स्विट्जरलैंड में सार्वजनिक स्थानों पर नाक, मुँह और आँखों को ढकने वाले नकाब या बुर्के को पहनना गैर कानूनी माना जाएगा। ऐसा करने पर एक हजार स्विस फ्रैंक यानी करीब 95 हजार रुपए का जुर्माना लगेगा।
These are the girls behind the burqa ban in Switzerland.
They collected enough signatures for a referendum to be held, which passed with 51% of the vote.
स्विटज़रलैंड की संसद के निचले सदन में बुर्का एवं नकाब प्रतिबंधित करने को लेकर हुए मतदान में 151 सांसदों ने इसके पक्ष में मत दिया, जबकि 29 सांसद इसके विरोध में रहे। इस प्रस्ताव को निचली सदन से पहले स्विट्जरलैंड का उच्च सदन स्वीकार कर चुका था।
कहाँ-कहाँ ढक सकते हैं चेहरा
संसद से पास कानून का आशय यह है कि कोई भी महिला या पुरुष चेहरा ढक कर अपनी पहचान न छिपा पाए। हालाँकि नए नियम में कुछ छूट भी दी गई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह छूट मजहबी आयोजनों, स्थानीय रीति-रिवाज से जुड़े कार्यक्रमों और थिएटर आदि में किए जाने वाले अभिनय आदि पर लागू होगी।
इसके अलावा सर्दी-गर्मी से बचने के लिए चेहरे को ढकने की अनुमति होगी। और तो और विज्ञापनों में भी चेहरा ढकने पर पाबंद नहीं लगेगा। यह बैन वाला कानून फ्लाइट्स या राजनयिक एवं वाणिज्य दूतावास परिसरों पर भी नहीं लागू होगा। साथ ही स्वास्थ्य और सुरक्षा कारणों से भी अगर कोई चेहरा ढकना चाहे तो ढक सकता है।
मानवाधिकार संगठनों का विरोध
गौरतलब है कि बुर्का इस्लामी रिवाज का हिस्सा है, लेकिन स्विट्जरलैंड में लोग इसे चरमपंथ का प्रतीक मानते हैं इसलिए उन्होंने इसे बैन करवाने के लिए अपना वोट दिया, लेकिन ये चीज मानवाधिकार संगठन वालों को नहीं पसंद आई। वह इस कानून का विरोध इसलिए भी करते दिखे थे क्योंकि उनका मत था कि स्विट्जरलैंड की कुल संख्या (89 लाख में) में मुस्लिमों की संख्या (5.4 फीसदी) बहुत कम है।
उनके तर्क अनुसार, चूँकि मुस्लिम महिलाओं की तादाद कम है इसलिए उन्हें मुँह छिपाकर घूमने की आजादी दी जानी चाहिए। कानून की आलोचना करने वालों का कहना है कि इससे मुस्लिम महिलाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। वहीं एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे एक खतरनाक कानून बताया।
कौन लेकर आया प्रस्ताव?
स्विट्जरलैंड में बुर्का बैन का प्रस्ताव दक्षिणपंथी पार्टी स्विस पीपुल लेकर आई थी। उन्होंने बुर्के के विरोध की मुहीम ‘चरमपंथ रोको’ नारे के साथ शुरू की थी। पार्टी का कहना था कि उनकी मुहीम के जरिए इस्लाम को निशाना नहीं बनाया जा रहा है। इसका माँग का मतलब किसी से उसकी अभिव्यक्ति की आजादी छीनना नहीं है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पति द्वारा पत्नी के साथ अंतरंग पलों के वीडियो शेयर के मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि पतियों के लिए विक्टोरियन युग की पुरानी मानसिकता को त्यागने और यह समझने का समय आ गया है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी का शरीर, उसकी गोपनीयता और उसके अधिकार उसके अपने हैं। उस पर पति का नियंत्रण या स्वामित्व नहीं है।
हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विनोद दिवाकर ने कहा कि अपने अंतरंग संबंधों से संबंधित वीडियो साझा करना पति और पत्नी के बीच के बंधन को परिभाषित करने वाली अंतर्निहित गोपनीयता का उल्लंघन है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पति से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी पत्नी द्वारा उस पर जताए गए विश्वास, आस्था और भरोसे का सम्मान करे।
जस्टिस दिवाकर ने कहा, “पत्नी का शरीर उसकी अपनी संपत्ति है। उसके निजी और अंतरंग जीवन के सभी पहलुओं में उसकी सहमति सर्वोपरि है। पति की भूमिका स्वामी या मालिक की नहीं, बल्कि एक समान भागीदार की है, जो उसकी स्वायत्तता और व्यक्तित्व का सम्मान करने के लिए बाध्य है। इन अधिकारों को नियंत्रित करने या उनका उल्लंघन करने का प्रयास विश्वास और वैधता का घोर उल्लंघन है।”
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, एक महिला ने अपने पति के खिलाफ उनके अंतरंग पलों का वीडियो बनाने और फिर फेसबुक पर अपलोड करने एवं उसके चचेरे भाई को भेजने का आरोप लगाया था। इसको लेकर पत्नी ने पति के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज। कराया था। पति के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67B के तहत आपराधिक कार्रवाई की गई थी।
इसके बाद पति ने इस मामले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट से पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का आग्रह किया था। पति ने तर्क दिया कि वह कानूनी रूप से विवाहित और महिला का पति है। इसलिए उसके खिलाफ आईटी अधिनियम की धारा 67B के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। हालाँकि, हाई कोर्ट ने पति के तर्क को खारिज कर दिया।
कासगंज में चंदन गुप्ता हत्याकांड मामले में NIA कोर्ट ने 28 आरोपितों को दोषी माना है। 2 आरोपितों को बरी कर दिया गया है। यह सुनवाई उत्तर प्रदेश के लखनऊ NIA कोर्ट में गुरुवार (2 जनवरी, 2025) को हुई है। इन 28 आरोपितों को शुक्रवार (3 जनवरी, 2025) को सजा सुनाई जाएगी। चंदन गुप्ता हत्याकांड में इस फैसले को लेकर लम्बे समय से परिवार इंतजार कर रहा था। चंदन गुप्ता की हत्या मुस्लिमों ने 26 जनवरी, 2018 को कर दी थी जब वह एक तिरंगा यात्रा में शामिल थे।
NIA स्पेशल कोर्ट ने चंदन गुप्ता हत्याकांड में आसिफ कुरैशी उर्फ हिटलर, असलम, असीम, शबाब, साकिब, मुनाजिर रफी, आमिर रफी, सलीम, वसीम, नसीम, बबलू, अकरम, तौफीक, मोहसिन, राहत, सलमान, आसिफ जिम वाला, निशु, वासिफ, इमरान , शमशाद, जफर, शाकिर, खालिद परवेज, फैजान, इमरान, शाकिर, जाहिद उर्फ जग्गा को दोषी माना है। इन्हें हत्या समेत कई धाराओं में कोर्ट में दोषी ठहराया है। इन्हें शुक्रवार को सजा सुनाई जाएगी।
गणतंत्र दिवस के दिन चंदन गुप्ता बाकी युवाओं के साथ कासगंज में एक बाइक रैली निकाल रहे थे। यह बाइक रैली तिरंगों के साथ निकाली गई थी। जब यह रैली राजकीय बालिका इंटर कॉलेज के पास पहुँची तो यहीं पर मुस्लिम युवकों ने हमला कर दिया। मुस्लिम युवकों ने हिन्दुओं पर फायरिंग की और पत्थर बरसाए। चंदन गुप्ता को निशाना बना कर गोली मारी गई, इसके चलते उनकी मौत हो गई। इसके बाद कासगंज में काफी हिंसा हुई। मामले में वसीम, नसीम समेत कई आरोपित पुलिस ने पकड़े थे। इनमें से एक को छोड़ कर बाकी को जमानत भी मिल गई थी।
मामले में 7 साल बाद चंदन गुप्ता के परिवार को न्याय मिलने जा रहा है। इस बीच चंदन गुप्ता का परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से जूझता रहा है। उनके घर में सुरक्षा को लेकर चिंताएँ भी रही हैं। उनके परिवार से किए गए कई वादे भी नहीं पूरे हुए। परिवार को किया गया नौकरी का वादा भी आधा अधूरा रहा और यहाँ तक कि उनके परिवार पर दबाव भी बनाया गया। केस खत्म करने तक के ऑफर दिए गए थे। इसको लेकर ऑपइंडिया ने चंदन गुप्ता के परिवार से 2022 में बात की थी।
चंदन गुप्ता के पिता सुशील गुप्ता ने ऑपइंडिया को बताया था, “चंदन की हत्या के बाद लगभग 1 साल तक मेरे परिवार को पुलिस सुरक्षा मिली थी। बाद में यह हटा ली गई। मेरा बड़ा बेटा विवेक गुप्ता इस केस का गवाह है। पहले वो मेडिकल रिप्रेजेंटिव की नौकरी करता था। लेकिन अब हमने डर से उसकी नौकरी छुड़वा दी है। हमें कई बार धमकियाँ भी मिली है। अब घर के खर्चों की पूरी जिम्मेदारी अकेले मेरे ऊपर है। मैं एक प्राइवेट अस्पताल में कम्पाउंडर हूँ। एक बेटी की शादी की भी जिम्मेदारी है।”
भावुक हो गए थे पिता
सुशील गुप्ता ने ऑपइंडिया को बताया था कि चंदन की हत्या में आरोपित 29 नामजदों में से 28 जेल से बाहर आ गए हैं। हाई कोर्ट से इन सबको जमानत मिल गई थी। सुशील गुप्ता ने बताया था कि आरोपित आर्थिक तौर पर मजबूत हैं, इसके कारण उन्हें मुकदमा लड़ने में सहूलियत है।
गुप्ता ने कहा था, “कासगंज कोर्ट में जब सुनवाई होती थी तो हमारी तरफ से 3-4 लोग होते थे, जबकि आरोपितों की तरफ से 100-200 लोग जमा हो जाते थे। वे दवाब बनाने की कोशिश करते थे। इसलिए हमने अपने पैसे से हाई कोर्ट में मुकदमा लड़ा और केस लखनऊ ट्रांसफर करवाया है। अब हम पैरवी के लिए लखनऊ बिना सुरक्षा के जाते हैं।”
सुशील गुप्ता के मुताबिक, “चंदन की हत्या के केस में आधे दर्जन से अधिक गवाह थे। लेकिन, अब एकाध को छोड़ अन्य गवाही देने से पीछे हट रहे हैं। अब उनका ही बेटा चश्मदीद गवाह बचा है। इसलिए परिवार उसकी सुरक्षा को लेकर भी चिंतित रहता है।”
सुशील गुप्ता लोग इस बातचीत में भावुक भी हो गए थे। रोते हुए उन्होंने बताया, “चंदन के न रहने के बाद वादों की झड़ी लगा दी गई थी। मेरी बेटी को सरकारी नौकरी और शहर के एक चौराहे का नाम चंदन के नाम पर रखने की बात कही गई थी। मेरी बेटी MSc की पढ़ाई पूरी कर चुकी है। उसको ब्लॉक स्तर पर एक नौकरी दी गई जो 5 महीने बाद खत्म कर दी गई।”
रक्षाबंधन के दिन नहीं बना घर में खाना
सुशील गुप्ता ने बताय, “रक्षाबंधन के दिन मेरी बेटी अपने भाई को याद कर लगातार रोती रही। उस दिन दुःख में हमारे घर में खाना नहीं बना। बहन ने अपने भाई की फोटो के आगे राखी और मिठाई रखी हुई है। चंदन की माता अक्सर उस दिन को याद करते हुए बीमार पड़ जाती हैं। सरकार ने तब हमें 20 लाख रुपए की मदद की थी, वो पैसे इस केस की पैरवी और आरोपितों को सजा दिलाने में ही काम आ रहे हैं।”
सुशील गुप्ता ने आरोप लगाया था कि लेकिन उन पर केस खत्म करने का दबाव बनाने के लिए जो लोग भेजे जा रहे हैं, वे हिन्दू ही हैं। वे उनके पास तमाम तरह के ऑफर और प्रलोभन लेकर आते हैं। उन्होंने बताया था कि मेरा बेटा नहीं रहा तो मैं भी मरने को तैयार हूँ लेकिन दोषियों को सजा दिलाने के लिए अंतिम साँस तक लड़ूँगा।
ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग की समस्या आज की नहीं है। सालों से इस गैंग का शिकार हुई पीड़िताओं की कहानी लोगों को चौंकाती रही है। इस गैंग का कनेक्शन सीधा पाकिस्तान के इस्लामी कट्टरपंथियों से था जो चुन-चुन कर छोटी उम्र की गोरी और गैर मुस्लिम लड़कियों को अपना शिकार बनाते, फिर उनका शोषण करते, उनसे अप्राकृतिक रूप से बलात्कार करते, उनकी तस्करी करते और उन्हें हिंसक धमकियाँ देते थे। ग्रूमिंग गैंग चलाने वाले दरिंदों का साफ मानना था कि श्वेत लड़कियाँ कचरा और वेश्या हैं इनका इस्तेमाल कैसे भी हो सकता है।
हैरानी की बात ये है कि लड़कियों को टारगेट करने वाले अपना धंधा एक दशक तक ब्रिटेन के अलग-अलग शहरों (लंदन, ब्रिस्टल, बर्मिंघम, रोशडेल, रोदरहैम आदि) में चलाते रहे लेकिन पुलिस प्रशासन ने इस पर कोई एक्शन तक नहीं लिया। नतीजतन 1997 से 2013 तक एशियाई देशों (मुख्यत: पाकिस्तान) के इस्लामी कट्टरपंथी 1400 लड़कियों को अपने निशाना बना चुके थे। मामले का खुलासा आखिर में तब हुआ कुछ पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पर ध्यान दिया। इन्हीं लोगों की पहल से इस मामले में एक स्वतंत्र रिपोर्ट आई जिसने इस मुद्दे को उठाया।
पीड़ितों की आपबीती
आज एक बार फिर अगर ये मामला दोबारा चर्चा में है तो इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया पर रॉदरहैम बाल यौन शोषण कांड की रिपोर्ट शेयर हो रही है। लोगों को फिर बताया जा रहा है कि कैसे इस्लामी कट्टरपंथियों ने पीड़िताओं को अलग-अलग ढंग से प्रताड़ित किया और जब वो अपनी शिकायतें लेकर पुलिस के पास गईं तो उनकी कोई सुनवाई तक नहीं हुई। यहाँ तक पीड़िताओं के अभिभावकों के साथ भी अभद्रता की गई।
रिपोर्ट में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए एक पीड़िता का बयान है। इस बयान के अनुसार 15 साल की उम्र में लड़की किसी बशरत हुसैन के साथ रिश्ते में थी। इस रिश्ते के दौरान ही उसे पता चला था कि बशरत के भाइयों के बीच और साउथ योर्कशायर पुलिस थाने के अधिकारियों का आपस में उठना-बैठना है।
इसी तरह एक अन्य मामले में एक रेप पीड़िता के पिता ने बताया कि उनकी बेटी के साथ जो हुआ उसके बाद उसे सर्जरी तक करवानी पड़ी थी, लेकिन न्याय की माँग लेकर जब वो पुलिस के पास गए तो एक अधिकारी ने कार्रवाई करने की बजाय उन्हें कहा कि इस घटना से उनकी बेटी को सबक मिलेगा।
The grooming gangs specifically targeted girls who were white and non-muslim.
"White girls are trash, they're whores"
It was racism, but not the right kind of racism for the mainstream media to care. pic.twitter.com/o0X05aGFlp
अन्य मामले में एक लापता हुई लड़की के पिता को अधिकारी द्वारा कहा गया था कि रोथरहैम में तो अपनी उम्र से बड़े एशियाई बॉयफ्रेंड बनाने को लड़कियों ने फैशन बना लिया है। घबराने की बात नहीं है लड़की खुद आ जाएगी।
So many people at all levels of power in the UK need to be in prison for this. https://t.co/PtM39RGrFi
एक वीडियो भी वायरल है जिसमें एक पीड़ित पिता अपनी आपबीती बता रहा है। सुन सकते हैं कि पीड़ित पिता कहता है कि एक बार उन्हें कॉल आई कि उनकी बेटी को कहाँ रखा गया है। वो चूँकि उस जगह के करीब ही थे तो वो उस अपार्टमेंट में गए। उन्होंने दरवाजा खटखटाया और फिर अंदर देखा तो कुछ लोग पर्दे के पीछे थे। इसके बाद पुलिस भी वहाँ 5 मिनट के भीतर आ गई लेकिन उन्होंने आरोपितों को पकड़ने की बजाय उन्हें ही गिरफ्तार कर लिया और सवाल पूछा- “तुम यहाँ क्या कर रहे हो।” इसके बाद पुलिस फिर उस पिता को उनके घर लेकर गई और वहाँ भी उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
The father of a grooming gang victim.
He tried to rescue his daughter from the apartment she was being held in and the Police arrested HIM.
इन्हीं ग्रूमिंग गैंग की रिपोर्ट देखकर मामले पर प्रतिक्रिया एलन मस्क से लेकर हैरी पॉटर को लिखने वाली जे के रॉलिंग तक ने दी है। एलन मस्क ने इस पर ट्वीट करते हुए कहा है कि ब्रिटेन में तो सत्ता के सभी स्तरों के बहुत से लोगों को इसके लिए जेल में होना चाहिए। उन्होंने खुलेआम ये प्रतिक्रिया ब्रिटिश लेबर पार्टी की मंत्री रही जेस फिलिप्स को लेकर दी जिन्होंने एक समय में मुस्लिम ग्रूमिंग गैंग के खिलाफ जाँच का विरोध किया था। वहीं जेके रॉलिंग भी कहती हैं कि इस पूरे मामले में पुलिस का भ्रष्टाचार विश्वास से भी परे है। उन्होंने इस गैंग का नाम ग्रूमिंग गैंग रखे जाने पर भी सवाल उठाए।
ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग के संदिग्धों पर कार्रवाई
बता दें कि ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग के खिलाफ की गई कार्रवाई में पिछले वर्ष तक 550 से अधिक संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया था। यह कार्रवाई एक विशेष पुलिस टास्कफोर्स द्वारा की गई, जिसे अप्रैल 2023 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक द्वारा स्थापित किया गया था। इस टास्कफोर्स का उद्देश्य बाल यौन शोषण और ग्रूमिंग से संबंधित मामलों की जाँच को बेहतर बनाना और बच्चों को सुरक्षा प्रदान करना था।
Just a reminder for the civic nationalists discussing the UK's pedo grooming gangs today that the men responsible were the sons of LEGAL immigrants. pic.twitter.com/G9oy2KqMyo
यह टास्कफोर्स इंग्लैंड और वेल्स के सभी 43 पुलिस बलों के साथ मिलकर काम कर रही है। इसमें विशेषज्ञ अधिकारी और डेटा विश्लेषक शामिल हैं, जो ग्रूमिंग गैंग के मामलों की जाँच पहले भी कर चुके हैं। इस टास्कफोर्स की वजह से 4,000 से अधिक पीड़ितों की पहचान हो चुकी है और उन्हें सुरक्षा भी प्रदान की जा चुकी है।
बिहार के मुजफ्फरपुर में स्थित गरीबनाथ मंदिर को दी गई एक जमीन को लेकर वक्फ बोर्ड ने नोटिस भिजवा दिया। यह जमीन मंदिर को शासन द्वारा आवंटित हुई थी। मंदिर को यह जमीन नैवेद्यम प्रसाद की बिक्री के लिए दी गई थी। हालाँकि, इस पर वक्फ बोर्ड को आपत्ति हो गई और उसने शिकायत दर्ज करवा दी। जिस जमीन पर विवाद है, वह एक मस्जिद के सामने है।
यह पूरा मामला मुजफ्फरपुर के मुशहरी में स्थित गरीबनाथ शिव मंदिर से जुड़ा हुआ है। मंदिर में पूरे साल भर बिहार समेत बाकी जगहों से लाखों श्रद्धालु आते हैं। यह भीड़ सावन माह में कई गुने बढ़ जाती है, यहाँ कई जिलों से काँवड़ लाकर चढ़ाई जाती है। इसके चलते मंदिर में जगह का अभाव हो जाता है। ऐसे में यहाँ नैवेद्यम प्रसाद बेचने के लिए जगह कम पड़ रही थी।
गरीबनाथ मंदिर न्यास के सचिव एनके सिन्हा ने बताया, “इसी समस्या को देखते हुए मंदिर न्यास के मुखिया रहे एक IAS अधिकारी ने मुजफ्फरपुर के DM को नैवेद्यम प्रसाद बिक्री के लिए जगह आवंटित करने को कहा था। इसके लिए मंदिर के बाहर जमीन का 270 स्क्वायर फीट का टुकड़ा दिया गया था। यह जमीन तीन माह के लिए अस्थायी रूप से आवंटित की गई थी।”
उन्होंने ऑपइंडिया से बताया, “जमीन मस्जिद के सामने स्थित है और इसके साथ ही वक्फ बोर्ड की जमीन का कुछ हिस्सा है। यह जमीन मंदिर के न्यास ने वक्फ बोर्ड की जमीन छोड़ कर ली थी। हालाँकि, मस्जिद के लोगों को इससे ऐतराज हो गया। उन्होंने इस पर आपत्ति जताते हुए वक्फ ट्रिब्यूनल में मुकदमा दर्ज करवा दिया।”
एनके सिन्हा ने बताया कि जमीन राजस्व रिकॉर्ड में नगर निगम मुजफ्फरनगर के नाम है और इसीलिए हमें आवंटित हुई थी। उन्होंने कहा, “जमीन मात्र तीन महीने के लिए हमें दी जानी थी और उसे पहले भी यह खाली ही पड़ी थी लेकिन मस्जिद को इस बात से समस्या थी कि आखिर मंदिर के उपयोग में यह जमीन क्यों आ रही है।”
जमीन पर नगर निगम और मस्जिद तथा वक्फ बोर्ड के बीच विवाद होने पर यहाँ नैवेद्यम की अस्थायी दुकान नहीं बनाई गई। इसके चलते यहाँ नैवेद्यम की बिक्री ही बंद हो गई और अब श्रद्धालुओं को समस्या उठानी पड़ रही है। एनके सिन्हा ने बताया कि मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए नैवेद्यम प्रसाद की व्यवस्था हाल ही में स्वर्गवासी हुए आचार्य कुणाल किशोर ने करवाई थी।
उन्होंने कहा, “प्रसाद बिकने से दो फायदे थे, एक तो श्रद्धालुओं को गुणवत्ता वाला प्रसाद यहाँ मिलता था तथा दूसरी ओर मंदिर को इससे हर वर्ष न्यास को लगभग ₹5 लाख की कमाई होती थी। लेकिन अब यह पूरी व्यवस्था ठप हो गई है और जिस जमीन को लेकर विवाद हुआ है, उस पर कुछ और लोग आकर दुकान लगा रहे हैं।”
इस मामले में वक्फ ट्रिब्यूनल सुनवाई कर रहा है। उसने इस मामले में नोटिस भी जारी किया है। इसको लेकर नगर निगम जवाब दे रहा है। वहीं मंदिर के पक्ष से भी वकील इस मामले में ट्रिब्यूनल में पेश होंगे। एनके सिन्हा ने बताया है कि असल लड़ाई वक्फ और नगर निगम के बीच है। अब इसको लेकर अगली सुनवाई 23 जनवरी, 2025 को है।
मंदिर के पुरोहित आनंद शास्त्री ने बताया है कि यहाँ जो शिवलिंग स्थापित है, वह स्वयंभू है और वह कैसे प्रकट हुआ, इसके विषय में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। उन्होंने बताया कि मंदिर के भीतर मुंडन, गोदभराई समेत तमाम सामाजिक कार्यक्रम होते हैं और बिहार में सबसे अधिक सत्यनारायण कथा यहीं होती हैं।
हिमाचल प्रदेश अल्पसंख्यक कल्याण परिषद के प्रदेश अध्यक्ष एसएनए गिलानी ने राज्य में अशांति के लिए दूसरे राज्यों के मुस्लिमों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग राज्यों से आए मुस्लिम लोग मस्जिद और कब्रिस्तान बनाकर हिमाचल प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ रहे हैं। उन्होंने राज्य में हिंदू महिलाओं की सुरक्षा पर चिंता जताई।
हिमाचल प्रदेश में भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष और भाजपा राष्ट्रवादी समिति के सदस्य रहे गिलानी ने दावा किया कि इन मुस्लिमों ने हजारों हिंदू महिलाओं को अपने साथ दूसरे राज्यों में ले गए। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित धरमपुर जामिया मस्जिद को राज्य में हो रही सभी हिंदू विरोधी गतिविधियों का मुख्यालय बताया।
गिलानी ने कहा, “धर्मपुर के आसपास कई आर्मी स्टेशन हैं, जिनमें आर्मी स्टेशन हेडक्वार्टर कसौली, आर्मी स्टेशन ढिकसाई, सपाटू और सोलन शामिल हैं। धर्मपुर में सीआरपीएफ का भी एक सेंटर है। इन सभी को धर्मपुर जामिया मस्जिद से खतरा है।” उन्होंने उस राज्य में इतनी बड़ी संख्या में मस्जिदों के निर्माण की जरूरत पर सवाल उठाया, जहाँ मुस्लिम आबादी ना के बराबर है।
गिलानी ने दावा किया, “हर शुक्रवार को सैकड़ों लोग (मुस्लिम) बाहर से धरमपुर मस्जिद आते हैं। उनमें से कोई भी धरमपुर में नहीं रहता। धरमपुर में एक भी स्थायी निवासी (मुस्लिम) नहीं है। मुश्किल से 3-4 परिवार (मुस्लिम) धरमपुर में किराए के घरों में रहते हैं।” उन्होंने कहा कि किसी भी शुक्रवार को धर्मपुर मस्जिद में आने-जाने वाले की मुस्लिमों की बड़ी संख्या को देखा जा सकता है।
एसएनए गिलानी ने कहा कि अगर हिमाचल प्रदेश सरकार राज्य में सैन्य केंद्रों को बचाना चाहती है और हिंदू महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहती है तो उसे धर्मपुर जामिया मस्जिद को बंद कर देना चाहिए। उन्होंने राज्य सरकार को इस बात की भी जाँच करने का आग्रह किया कि धर्मपुर मस्जिद का निर्माण करने के लिए आवश्यक अनुमति ली गई थी या नहीं।
गिलानी ने कहा कि अगर जाँच में पाया जाता है कि मस्जिद के निर्माण के लिए कोई अनुमति नहीं ली गई थी तो इसे उसी तरह गिरा दिया जाना चाहिए, जैसे संजौली में अवैध मस्जिद को गिराया गया था। पिछले साल अक्टूबर में हिमाचल प्रदेश की एक अदालत ने संजौली में एक मस्जिद के अनधिकृत हिस्सों को गिराने का आदेश दिया था।
स्थानीय हिंदुओं ने मस्जिद के अवैध निर्माण का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया था। उसके बाद कोर्ट ने यह आदेश दिया था। हाल ही में हिमाचल प्रदेश के स्थानीय लोगों में राज्य के विभिन्न शहरों में कई अवैध मस्जिदों के निर्माण को लेकर चिंता जताई है। लोगों का कहना है कि इन अवैध मस्जिदों में राज्य के बाहर से बड़ी संख्या में मुस्लिम आते रहते हैं।
मस्जिद-मदरसों की संख्या तेजी से बढ़ी
हिमाचल प्रदेश में मात्र मुस्लिम आबादी और बाहरी घुसपैठ ही एक समस्या नहीं है। राज्य में मस्जिद-मदरसे भी तेजी से बढ़े हैं। हिन्दू जागरण मंच ने एक रिपोर्ट में बताया है कि राज्य कोरोना काल से पहले 393 मस्जिदें थी। लेकिन कोरोना के बाद इनकी संख्या 520 हो गई। बताया गया कि सिरमौर जिले में सबसे अधिक 130 मस्जिदें बन गई हैं। इसके अलावा चंबा में 87 और ऊना में 52 मस्जिदें हैं। प्रदेश में मदरसों की संख्या भी 35 है।
अमेरिका के लुइसियाना राज्य के न्यू ऑरलियंस शहर में गाड़ी से रौंद और फायरिंग करके 15 लोगों की हत्या करने वाले शमसुद दीन (शम्सुद्दीन) जब्बार को लेकर कई तथ्य सामने आए हैं। जब्बार ने यह आतंकी हमला टाइम्स स्क्वायर पर इजरायल विरोधी प्रदर्शनकारियों द्वारा ‘इंतिफादा क्रांति’ का आह्वान करने के एक घंटा बाद किया। आतंकी जब्बार का संबंध उसके पड़ोसी ‘मस्जिद बिलाल’ से भी बताया जा रहा है।
जब्बार ह्यूस्टन के बाहरी इलाके में एक गंदे ट्रेलर पार्क में रहता था, जहाँ ज़्यादातर मुस्लिम अप्रवासी रहते हैं। जब्बार ने अपने घर में बत्तख, मुर्गे-मुर्गियाँ और भेड़ें पाल रखी थीं और हमले के बाद जब मीडिया उसके घर के पास पहुँचे तो ये जीव वहाँ खुलेआम घूम रहे थे। जब्बार का स्थानीय मस्जिद ‘मस्जिद बिलाल’ से कुछ ही दूरी पर रहता था।
आतंकी हमले के बाद मस्जिद बिलाल के लोगों के मीडिया और एजेंसियों ने संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन वहाँ किसी ने जवाब नहीं दिया। खुद को आतंकवाद विशेषज्ञ एवं पूर्व मुस्लिम बताने वाले ब्रदर रैचिड (ब्रदर राशिद नाम से X हैंडल) ने अपने सोशल मीडिया पर कहा कि जब्बार ने आतंकी हमले से पहले इस मस्जिद में गया था।
जब्बार ने अपने पोस्ट में कहा, “पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करने, अधिकारियों के साथ सहयोग करने या अपनी शिक्षाओं के बारे में मीडिया को पारदर्शिता के साथ संबोधित करने के बजाय, उनका (मस्जिद बिलाल से जुड़े लोगों का) प्राथमिक ध्यान मुस्लिम समुदाय की सुरक्षा पर था (सभी अमेरिकियों की सुरक्षा पर नहीं)। उन्होंने (मस्जिद के अधिकारियों ने) अपने सदस्यों को सलाह दी कि वे कट्टरपंथी इस्लामी संगठन CAIR (The Council on American-Islamic Relations) से परामर्श किए बिना मीडिया से बात न करें या एफबीआई के साथ सहयोग न करें।”
ब्रदर राशिद नाम के हैंडल ने अपने पोस्ट के साथ एक नोट साझा किया है। इसमें लिखा है, “अस्सल्लाम वलैकुम भाइयों एवं बहनों। मुझे विश्वास है कि आप लोगों में से बहुत से लोगों ने न्यू ऑरलियंस में हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बारे में सुना होगा, जिसे FBI ने आतंकी हमला करार दिया है। हमें अपने आसपास को लेकर चौकन्ना रहना होगा। हमारे समुदाय की सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। अगर मीडिया द्वारा किसी को संपर्क किया जाए तो आप लोग उनका जवाब ना दें। अगर FBI द्वारा संपर्क किया जाए और जवाब देना जरूरी हो तो उन्हें CAIR या ISGH भेज दें।”
The mosque possibly attended by the New Orleans terrorist in Houston, Texas, chose a troubling response. Instead of offering condolences to the victims’ families, pledging cooperation with authorities, or addressing the media with transparency about their teachings, their primary… pic.twitter.com/sMJ4BVxo2z
— Brother Rachid الأخ رشيد (@BrotherRasheed) January 2, 2025
फिलिस्तानियों के ‘इंतिफादा क्रांति’ वाले प्रदर्शन के घंटे भर बाद आतंकी हमला
बता दें कि यह हमला न्यू ईयर सेलिब्रेशन के दौरान जब्बार नाम के आतंकी द्वारा किया गया है। वह ह्यूस्टन का रहने वाला था और अमेरिकी सेना में भी रह चुका था। हाल फिलहाल में वह कुरान का संदर्भ देते हुए कई वीडियो भी बनाए थे। इन्हें अमेरिका की सुरक्षा एजेंसियों ने हासिल किया है और उसकी पर्याप्त जाँच कर रही है। उसकी गाड़ी से ISIS के झंडे भी मिले हैं।
दरअसल, नए साल के आगमन पर दुनिया के भर लोग पार्टी कर रहे थे। वहीं, टाइम्स स्क्वॉयर पर सैकड़ों फिलिस्तीन एवं आतंकी संगठन हमास समर्थक प्रदर्शनकारी एकत्र हुए थे। वे इजरायल के विरोध में फिलिस्तीनी झंडे लहराते हुए ‘इंतिफादा क्रांति’ का आह्वान कर थे। इस घटना के एक घंटे के अंदर न्यू ऑरलियन्स के फ्रेंच क्वार्टर में एक आतंकी हमला कर दिया गया।
सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए वीडियो में दिख रहा है कि बुर्का या हिजाब पहनी एक महिला प्रदर्शनकारी ने बाहर मौजूद प्रदर्शनकारियों पर चिल्लाते हुए कहा, “हम तुम्हें वापस यूरोप भेज रहे हैं, तुम गोरे कमीने। वापस यूरोप जाओ! वापस यूरोप जाओ।” एक अन्य कहता है, “2024 यहूदियों के अपराधों के विरुद्ध संघर्ष का वर्ष था। हम पूर्ण मुक्ति तक यहाँ साल दर साल आएँगे।”
इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने ‘इज़राइल को दी जाने वाली सभी अमेरिकी सहायता बंद करो’, ‘यहूदीवाद को खत्म करो’ और ‘ईरान पर कोई युद्ध नहीं’ जैसे संदेशों वाले पोस्टर ले रखे थे। इस दौरान प्रदर्शनकारी भीड़ ने ‘इंतिफादा क्रांति’ का नारा लगाया। इसके साथ हीयह भी कहा, “हम अपने सभी शहीदों का सम्मान करेंगे।” उसके एक घंटे बाद न्यू ऑरलियंस की यह घटना हो गई।
टाइम स्क्वायर पर फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारी (साभार: NYP)
यह विरोध प्रदर्शन फिलिस्तीनी युवा आंदोलन ‘सोशलिज्म एंड लिबरेशन पार्टी एंड पीपुल्स फोरम’ द्वारा आयोजित इस विरोध प्रदर्शन में इंतिफादा क्रांति के नारे लग रहे थे। प्रदर्शनकारी चिल्ला रहे थे, ‘सिर्फ एक ही समाधान है: इंतिफादा क्रांति’। ‘इंतिफादा’ शब्द फिलिस्तीन के आतंकी हमास से नहीं, बल्कि कई मुस्लिमों की गैर-मुस्लिमों के शासन के खिलाफ बगावत से जुड़ा है।
इंतिफादा एक अरबी शब्द है, जिसका मतलब होता है बगावत या विद्रोह। इंतिफादा शब्द का सबसे ज्यादा इस्तेमाल ‘तख्तापलट’ जैसे कामों में मिडिल-ईस्ट से लेकर उत्तरी-पश्चिमी अफ्रीकन देशों में हुआ है और पिछले कुछ दशकों से इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध में इसे ‘इजरायल’ के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है। इजरायल के खिलाफ ‘इंतिफादा’ का ऐलान किया जाता है।
एक तरफ इसे प्रतिरोध बताया जाता है, तो दूसरी तरफ कायराना हमले भी इजरायल पर किए जाते हैं। इस समय हमास-इजरायल के बीच चल रहे युद्ध को पाँचवाँ इंतिफादा भी कहा जा रहा है। इजरायल-फिलिस्तीन संकट के संदर्भ में इसे धर्मयुद्ध से भी जोड़ सकते हैं। एक तरफ यहूदी इजरायल का विरोध कर रहे मुस्लिम फिलिस्तीनी और अरबी हैं, तो दूसरी तरफ उन्हें समर्थन दे रहे मुस्लिम देश।
अमेरिका के न्यू ओर्लियंस शहर में बुधवार (1 जनवरी, 2025) को आतंकी हमला करने वाले की पहचान इस्लामी आतंकी शमसुद-दीन जब्बार के तौर पर हुई है। उसकी गाड़ी में ISIS का झंडा भी मिला है। जब्बार अमेरिकी नागरिक था और आर्मी में भी सेवाएँ दे चुका था।
अमेरिकी जाँच एजेंसियाँ उसके बारे में और भी जानकारियाँ जुटाने में लगी हुई हैं। इस बात की भी आशंका जताई गई है कि वह अकेला नहीं था बल्कि उसके साथ इस हमले में कई और लोग भी शामिल थे। इस इस्लामी आतंकी हमले में मरने वालों की संख्या 15 हो चुकी है।
अमेरिकी मीडिया के अनुसार, शमसुद-दीन जब्बार (Shamsud-Din Jabbar) अमेरिकी नागरिक था और टेक्सास का निवासी था। उसकी उम्र 42 साल थी। वह 2007 से 2020 तक अमेरिकी सेना में भी अपनी सेवाएँ दे चुका था। वह 2007 से 2015 तक स्थायी सैनिक रहा था।
वह अमेरिकी सैनिक के तौर पर अफगानिस्तान भी भेजा गया था। 2009 से 2010 के बीच वह अफगानिस्तान में तैनात रहा था। उसे सेवा के दौरान 15 मैडल और सम्मान दिए गए थे। उसे आतंक से लड़ने के लिए भी एक मेडल दिया गया था।
जब्बार 2015 में सेना से रिटायर होने के बाद सैन्य रिजर्व बटालियन में काम करता था। 2015-20 के बीच उसने अमेरिकी सेना के लिए IT विशेषज्ञ के तौर पर काम किया था। सेना में जाने से पहले उसने अमेरी नौसेना में जाने का प्रयास भी किया था।
अमेरिकी सेना के लिए काम करने के अलावा वह डेलोइट जैसी कम्पनियों के लिए भी काम करता था। यहाँ वह लगभग $1,20,000 (लगभग ₹1 करोड़) कमाता था। उसकी पहली बीवी से उसका तलाक 2012 जबकि दूसरी बीवी से 2022 में हो गया था।
जब्बार ने हमले के लिए जो ट्रक इस्तेमाल किया, वह किराए का था। इसके अलावा उसने न्यू ओर्लियंस में एक कमरा भी कथित तौर पर किराए पर लिया था। कमरे और ट्रक दोनों में ही सुरक्षा एजेंसियों को विस्फोटक मिले हैं। जिस कमरे में वह रुका था वहाँ बम बनाने की तैयारी थी।
उसकी गाड़ी में ISIS का एक झंडा मिला है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि वह बीते कुछ वर्षों में कट्टर इस्लामी बना और हमास के इजरायल पर हमले के बाद ही उसने यह कदम उठाने का फैसला किया। जब्बार की एक पुरानी वीडियो भी सामने आई है जिसमें वह खुद को रियल एस्टेट एजेंट बता रहा है।
FBI को शक है कि इस आतंकी हमले में उसके साहत कुछ और लोग शामिल थे। एक CCTV फुटेज में उसकी गाड़ी में कुहक लोग विस्फोटक भी रखते दिखे हैं। इनकी पहचान नहीं हो पाई है। इन विस्फोटकों को रिमोट से उड़ाने की योजना थी। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन ने इस हमले पर दुख जताया है।
शमसुद-दीन का ताल्लुक ISIS से कैसा था और उसे कहाँ से बम बनाने और यह हमला करने को लेकर निर्देश दिए गए थे, यह अभी सामने नहीं आया है। जब्बार को लेकर और भी जानकारी जुटाने का प्रयास चल रहा है। इस आतंकी हमले में अब तक 15 लोग मारे जा चुके हैं। 35 लोग घायल हैं। शमसुद-दीन हमले के बाद मारा जा चुका है।
बीते साल यानी नवंबर 2024 में मोदी सरकार ने Wikipedia को एक नोटिस भेजा, जिसमें इस कथित ‘फ्री इनसाइक्लोपीडिया’ द्वारा प्रकाशित भ्रामक और पक्षपाती जानकारी पर सवाल पूछे गए।
यह नोटिस केंद्र सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय (I&B) द्वारा जारी किया गया। इसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया कि Wikipedia की सामग्री पर एक छोटे समूह के संपादकों का नियंत्रण है, जो इसमें हेरफेर करने में सक्षम होते हैं और एकपक्षीय जानकारियाँ उपलब्ध कराते हैं।
सरकार ने Wikipedia से पूछा है कि उसे मध्यस्थ (Intermediary) की बजाय एक प्रकाशक (Publisher) क्यों न माना जाए। बता दें कि ऑपइंडिया ने 9 सितंबर 2024 को प्रकाशित किए अपने 187 पन्नों के डोजियर में भी इस मुद्दे को उठाया था।
इस पूरे मामले को समझने के लिए Wikimedia Foundation की पूर्व CEO कैथरीन माहेर के दो मुख्य भाषणों और Wikipedia के प्रोपेगैंडा टूल के रूप में काम करने के तरीके की पड़ताल करते हैं।
कैथरीन माहेर ने गलती से खोली थी विकिपीडिया की पोल
अगस्त 2021 में कैथरीन माहेर ने एक TED टॉक में अनजाने में यह खुलासा किया कि Wikipedia के माध्यम से फैलाई गई जानकारी सत्य पर आधारित नहीं होती।
कैथरीन माहेर ने अपने TED टॉक में कहा कि भले ही मीडिया और विज्ञान पर जनता का भरोसा कम हो, लेकिन लोग Wikipedia पर विश्वास करते हैं। उन्होंने इसे ‘सामान्य लोगों’ द्वारा ‘स्वैच्छिक’ रूप से किए गए संपादन(एडिटिंग) का नतीजा बताया।
हालाँकि, ऑपइंडिया अपने डोजियर में यह साबित कर चुका है कि कैसे Wikipedia पर कुछ गिने-चुने लोगों (एडिटरों) का कंट्रोल होता है। यही लोग तय करते हैं कि कौन-सी जानकारी प्रकाशित की जाए और कौन सी नहीं। अगर कोई लेख इनके प्रोपेगेंडा की पोल खोल सकता है, तो उसे तुरंत हटा दिया जाता है।
विकिपीडिया के इन एडिटर्स यानी मुट्ठी भर लोगों के पास एडिटिंग पर बैन लगाने, एडिटर्स को बैन करने, विवाद सुलझाने, पेज हटाने, पेज लॉक करने और सामग्री को ओवरराइड करने की ताकत होती है। दुनिया भर में केवल 435 सक्रिय एडमिनिस्ट्रेटर्स हैं, जो Wikipedia पर व्यापक नियंत्रण रखते हैं। ये 435 लोग चाहें तो विकिपीडिया पर मौजूद किसी भी जानकारी को तुरंत बदल सकते हैं और इन्हें कोई चुनौती भी नहीं दी जा सकती, क्योंकि वो उसे खुद ही खारिज कर देंगे।
कैथरीन माहेर ने अपने TED टॉक में दावा किया कि Wikipedia की जानकारी इस पर आधारित है कि “ज्यादातर लोग क्या उचित और सही मानते हैं।” लेकिन OpIndia इसे गलत ठहराते हुए बता चुका है कि Wikipedia की कार्यप्रणाली पारदर्शी होने के बजाय एक ठोस व्यवस्था के तहत चलती है, जो किसी भी पब्लिशिंग हाउस की तरह ही सख्त एडिटोरियल नियंत्रण और अनुशासन के साथ काम करती है।
अपने टेडटॉक में माहेर ने यह भी स्वीकार किया कि Wikipedia का उद्देश्य सत्य की खोज या दूसरों को सत्य के लिए राज़ी करना नहीं है। उन्होंने इसे ‘ध्यान भटकाने वाला’ बताया।
माहेर ने जोर देकर कहा, “हो सकता है कि हमारे सबसे कठिन मतभेदों के लिए, सत्य की खोज और दूसरों को सत्य के लिए मनाने की कोशिश सही जगह न हो। वास्तव में सत्य के प्रति हमारा सम्मान, साझा आधार खोजने और चीजों को पूरा करने में बाधा बन सकता है।”
विकिपीडिया ‘सत्य’ की बजाय ‘लोगों के लिए उपयुक्त जानकारी’ का साधन
कैथरीन माहेर ने अपने TED टॉक और अन्य सार्वजनिक भाषणों में स्पष्ट किया कि विकिपीडिया पर लिखने वाले लेखक ‘सत्य’ पर ध्यान केंद्रित नहीं करते। उन्होंने कहा, “जो लोग इन लेखों को लिखते हैं, वे सत्य पर नहीं, बल्कि वर्तमान समय में जो सबसे अच्छा संभव ज्ञान है, उस पर ध्यान केंद्रित करते हैं।”
उन्होंने ‘सत्य के कई वर्जन(संस्करण)’ की बात की और कहा कि सत्य की कठोर खोज लोगों के बीच विभाजन पैदा कर सकती है। माहेर ने तर्क दिया कि “हमारी सच्चाई हमारे अनुभवों से आती है, और जब हम सत्य पर जोर देते हैं, तो यह हमें विभाजन की ओर ले जाता है, न कि एकता की ओर।”
उन्होंने सुझाव दिया कि साझा समझ के लिए, ‘एक सत्य’ को आधार बनाने की बजाय ‘न्यूनतम व्यवहार्य सत्य’ (Minimum Viable Truth) को अपनाना चाहिए। माहेर के अनुसार, “न्यूनतम व्यवहार्य सत्य का मतलब है इतनी सटीक जानकारी देना, जो पर्याप्त समय तक पर्याप्त लोगों के लिए उपयोगी हो।”
कैथरीन माहेर ने स्वीकार किया कि विकिपीडिया में ‘वास्तविकता के सही और अंतिम रूप’ की खोज का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विकिपीडिया की कार्यप्रणाली एक प्रकाशित सत्य की बजाय ज्ञान को वितरित करने के माध्यम के रूप में काम करती है।
उन्होंने कहा, “विकिपीडिया सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यह ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है जहाँ सत्य को विकसित, अस्थिर और परिवर्तनीय (बदलता) माना जाता है। यह प्लेटफ़ॉर्म इंसानों की दुनिया को समझने की प्रक्रिया को दर्शाता है, जो जटिल और समय के साथ बदलने वाली होती है।”
उन्होंने गैलीलियो, कोपरनिकस और मार्टिन लूथर जैसे ऐतिहासिक उदाहरणों का हवाला देकर यह समझाने की कोशिश की कि सत्य समय के साथ विकसित होता है और इसकी खोज हमेशा आसान या परिणाम रहित नहीं होती।
विकिपीडिया में संपादकीय नियंत्रण
माहेर ने यह भी स्वीकार किया कि विकिपीडिया में पक्षपात और गलतियाँ मौजूद हैं। उन्होंने कहा, “मेरे विकिपीडिया के प्रति प्रेम के बावजूद, मैं इसकी पूर्णता का दावा नहीं करती। यह बहुत बार सही हो सकता है, लेकिन यह त्रुटिपूर्ण और अधूरा भी हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि यह उतना ही पक्षपाती है, जितना हम सभी हैं।”
कैथरीन माहेर ने यह भी कहा कि शुरुआत में विकिपीडिया पर पश्चिमी गोरे मर्दों(श्वेत पुरुषों) का दबदबा था, जिसके लेखन में कई महत्वपूर्ण पूर्वाग्रह और खामियाँ थीं। माहेर ने जोर देकर कहा कि इस व्यवस्था को बदलने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं ताकि अधिक विविध आवाजें शामिल हो सकें।
उन्होंने कहा, “हमने महसूस किया कि विकिपीडिया में लेखन के तरीके और लेखों की दिशा पर गोरे पुरुषों का प्रभाव था। इसे सुधारने और इसे और अधिक समावेशी बनाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।”
विकिपीडिया एकदम ‘सच’ नहीं है: कैथरीन माहेर
कैथरीन माहेर नवंबर 2021 में हाउस ऑफ ब्यूटीफुल बिजनेस ‘कंक्रीट लव’ में भी शामिल हुईं थी और उन्होंने विकिपीडिया के कामकाज को व्यापक तरीके से समझाने की कोशिश की थी। माहेर ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु उठाया कि विकिपीडिया की जानकारी ‘वर्तमान समय के सबसे अच्छे संभव ज्ञान’ पर आधारित है। उन्होंने कहा कि विकिपीडिया के लेखों को लिखने वाले सत्य की खोज में नहीं हैं, बल्कि लोगों के लिए उपयोगी और प्रासंगिक जानकारी पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, “हमारे विवाद आमतौर पर इस बात पर होते हैं कि किसी मुद्दे का सत्य क्या है। विकिपीडिया पर भी राजनीति और धर्म पर चर्चा कठिन होती है। लेकिन विकिपीडिया के लेखक इन विषयों पर किसी अंतिम सत्य को खोजने के बजाय वर्तमान में सबसे अच्छी जानकारी देने का प्रयास करते हैं।”
कैथरीन माहेर के भाषणों से यह स्पष्ट होता है कि विकिपीडिया का प्राथमिक उद्देश्य सत्य को परिभाषित करना नहीं, बल्कि जनता के लिए सुविधाजनक और उपयोगी जानकारी प्रदान करना है। उनके शब्दों में, “विकिपीडिया चीजों को सही करने का प्रयास करता है, लेकिन यह यह दावा नहीं करता कि वह सत्य का प्रतिनिधित्व करता है।”
कैथरीन माहेर ने अपने भाषण में सत्य को “एक अस्थिर और व्यक्तिगत अवधारणा” बताया। उन्होंने कहा, “मुझे पता है कि आप में से प्रत्येक के लिए सत्य मौजूद है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि आपके बगल में बैठे व्यक्ति के लिए वही सत्य हो।”
माहेर ने दावा किया कि सत्य व्यक्तिगत होता है और इसका उपयोग सामूहिक रूप से काम करने और एक मध्य मार्ग तक पहुंचने के लिए किया जाना चाहिए, भले ही वह सत्य का पूर्ण प्रतिनिधित्व न करे। उन्होंने कहा, “अगर हम यह तय करने लगें कि किसका सत्य सबसे अच्छा है, तो हम शुरुआत से अधिक दूरियाँ बना लेंगे। यह हमें मूल्यों और पहचान के सवालों में उलझा देगा और असहमति पर ध्यान केंद्रित करेगा, बजाय इसके कि हमें क्या जोड़ता है।”
माहेर ने कहा कि विकिपीडिया संपादकों के बीच सहयोग, जो अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं, वास्तविक सत्य के प्रचार से अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, “सहयोगपूर्ण अस्तित्व, सहमति और कार्रवाई के लिए हमें एक सत्य की आवश्यकता है।” उन्होंने आगे कहा, “हमें एकीकृत सत्य पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, पर्याप्त सहमति खोजने की आवश्यकता है ताकि हम आगे बढ़ सकें। विकिपीडिया में हमारा उद्देश्य सब कुछ हल करना नहीं था, बल्कि अधिकांश लोगों के लिए इतनी सटीकता प्राप्त करना था कि यह उपयोगी हो सके।”
माहेर ने विकिपीडिया पर तटस्थता की अवधारणा पर भी बात की। उन्होंने कहा, “विकिपीडिया यह मानता है कि हम सभी में पूर्वाग्रह होते हैं। यही कारण है कि आपको अपने बारे में लेख लिखने की अनुमति नहीं है, क्योंकि आपके लिए खुद को निष्पक्ष दिखाना मुश्किल होगा।” हालाँकि, विकिपीडिया के सह-संस्थापक लैरी सेंगर सहित अन्य शोधों ने विकिपीडिया की स्पष्ट वैचारिक पक्षपात को उजागर किया है।
जून 2024 में डेविड रोज़ाडो द्वारा मैनहट्टन इंस्टीट्यूट के शोध के अनुसार, विकिपीडिया का झुकाव वामपंथ की ओर अधिक है। ‘द क्रिटिक’ नाम के रिसर्च ने इसके लिए विकिपीडिया की दो नीतियों – ‘न्यूट्रल पॉइंट ऑफ व्यू’ और ‘रिलायबिलिटी’ पर ध्यान केंद्रित किया।
1- शोध ने निष्कर्ष निकाला कि विकिपीडिया पर कौन से स्रोत विश्वसनीय हैं, यह संपादकों द्वारा तय किया जाता है। वामपंथी स्रोतों को विश्वसनीय माना जाता है, जबकि दक्षिणपंथी स्रोतों को ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है।
2- इसी तरह से ‘न्यूट्रल पॉइंट ऑफ व्यू’ का मतलब केवल ‘विश्वसनीय स्रोतों’ का प्रतिनिधित्व करना होता है, न कि सभी दृष्टिकोणों को शामिल करना।
विकिपीडिया का असली चेहरा : इन शोधों और माहेर के भाषणों से यह स्पष्ट होता है कि विकिपीडिया की ‘तटस्थता’ और ‘सत्य’ की धारणा केवल दिखावा है। इसका वास्तविक उद्देश्य ऐसी जानकारी प्रदान करना है, जो संपादकों के विचारों के अनुरूप हो और जो बहुसंख्यक लोगों को ‘उपयुक्त’ लगे।
लैरी सेंगर भी खोल चुके हैं पोल: विकिपीडिया के सह-संस्थापक लैरी सेंगर मंच पर वामपंथी झुकाव, अविश्वसनीयता और पूर्वाग्रह होने का आरोप लगा चुके हैं। सेंगर का मानना है कि विकिपीडिया तटस्थ ज्ञान का स्रोत होने के बजाय वैचारिक एजेंडा के लिए एक मशीनरी बन चुका है।
ऑपइंडिया की डोजियर में विकिपीडिया और Wikimedia Foundation का पर्दाफाश
सितंबर 2024 में ऑपइंडिया अपने डोजियर में विकिपीडिया और Wikimedia Foundation का पर्दाफाश कर चुका है। ऑपइंडिया ने अपने रिसर्च में पाया है कि विकिपीडिया न तो मुफ्त(फ्री) है और न ही ये वैचारिक हस्तक्षेप से मुक्त है। विकिपीडिया भारत में मुफ्त सामग्री देने के नाम पर डोनेशन लेता है और फिर भारत के खिलाफ ही उसे इस्तेमाल करता है। हालाँकि वो बताता है कि वो अपने एडिटरों यानी संपादकों को कोई पैसा नहीं देता। विकिपीडिया से जुड़े कुछ अहम रहस्यों को इस तरह से जान सकते हैं –
Wikimedia और Tides Foundation का गठजोड़: Wikimedia Foundation का वित्तीय संबंध Tides Foundation से है, जिस पर अमेरिका में हमास समर्थक विरोध प्रदर्शनों और जॉर्ज सोरोस से जुड़े संगठनों को वित्तीय सहायता देने के आरोप हैं। Tides Foundation और Wikimedia Foundation ने कई संगठनों को वित्तीय सहायता दी है जो भारत के हितों के खिलाफ काम करते हैं, जैसे Hindus For Human Rights, Equality Labs, आर्ट+फेमिनिज्म, एक्सेस नाउ, भारतीय उद्योगपतियों के खिलाफ हिंडेनबर्ग जैसे संगठनों की वो मदद करता है।
भारत में Wikimedia की भूमिका: Wikimedia Foundation की भारत में 2019 से कोई औपचारिक उपस्थिति नहीं है। इसके बावजूद, यह भारत से भारी मात्रा में डोनेशन पाता है और इसे वो उन एनजीओ में बाँटता है, तो भारत में Wikimedia Foundation के व्यावसायिक हितों को बढ़ावा देते हैं।
विकिपीडिया में एडिटिंग एकतरफा: शोध में पाया गया कि भारत से जुड़े विषयों पर विकिपीडिया के लेख सीमित संपादकों और प्रशासकों के एक ग्रुप द्वारा कंट्रोल किए जाते हैं। विकिपीडिया के इन संपादकों में से एक को मणिपुर राज्य में वैमनस्य फैलाने के आरोप में पकड़ा जा चुका है।
विकिपीडिया का स्पष्ट वैचारिक झुकाव: विकिपीडिया के लेखों में हिंदू विरोधी और भारत विरोधी पूर्वाग्रह स्पष्ट रूप से दिखते हैं। यह पक्षपात Google और Wikimedia Foundation के साझेदारी के कारण और बढ़ता है, जो विषयों को परिभाषित करने में एकतरफा दृष्टिकोण अपनाते हैं।
विकिपीडिया और Wikimedia Foundation का दावा है कि वो तटस्थ है और अपने कामकाज में पारदर्शिता बरतता है, वो पूरी तरह से भ्रामक है और सच्चाई से कोसों दूर है। क्योंकि विकिपीडिया के संचालन और कंटेंट में इसका वामपंथी झुकाव, वैचारिक पक्षपात और भारत विरोधी रुख गहराई तक साफ तौर पर दिखता है।