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पाकिस्तानी फौज से बचने के लिए 10 दिन पैदल चले, 20 दिन कैम्प में गुजारी: 53 साल बाद मोदी सरकार ने 10 बांग्लादेशी हिन्दू पर से मिटाया ‘घुसपैठिया’ का दाग, CAA के तहत मिली नागरिकता

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में एक हिन्दू शख्स को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आने के 53 साल बाद भारतीय पहचान हासिल हुई है। वह 1971 में पाक फ़ौज के अत्याचार के चलते अपनी माँ के साथ किसी तरह बच कर भारत भाग आए थे। उन्हें 1971 से लेकर 2024 तक का जीवन शरणार्थी के तौर पर गुजारना पड़ा। इस बीच उन्होंने कई बार नागरिकता के लिए प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हुए। अब मोदी सरकार द्वारा लाए गए CAA कानून के चलते उन्हें भारत का नागरिक मान लिया गया है।

53 साल कहलाए ‘घुसपैठिया’

अमृत विचार की एक रिपोर्ट के अनुसार, पीलीभीत जिले के न्यूरिया हुसैनपुर गाँव में रहने वाले निरंजन मंडल को अब भारतीय नागरिकता मिल पाई है। वह 74 वर्ष के हैं। निरंजन मंडल 1971 तक बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) के फरीदपुर मंडल में रहते थे। लेकिन 1971 के दौरान जब पाकिस्तान की फ़ौज ने हिन्दू और बंगालियों पर अत्याचार चालू किया तो उन्हें सब कुछ छोड़ कर भागना पड़ा। वह अपनी माँ के साथ 21 वर्ष की उम्र में यहाँ से भागे। वह अपने बाकी भाइयों को तक नहीं बता पाए कि उन्हें भारत भागना पड़ा है।

निरंजन मंडल ने बताया कि पाक फ़ौज के अत्याचार के चलते वह अपनी माँ के साथ 10 दिनों तक किसी तरह छिपते-छिपते भारतीय सीमा तक पहुँचे। यहाँ से वह कोलकाता में बनाए गए शरणार्थी कैम्प में 20 दिन तक कठिन हालात में रहे। यहाँ से वह नेपाल के रास्ते कैसे भी करके पीलीभीत पहुँचे। इसके बाद वह न्यूरिया हुसैनपुर में बस गए। पीलीभीत में बड़ी संख्या में बंगाली समुदाय रहता है। हालाँकि, भारत आने के बाद उनका जीवन कम कठिन नहीं रहा। भाषाई दिक्कत और रोजगार की समस्या उन्हें झेलनी पड़ी।

वह भारत में आकर यहाँ शरणार्थी की तरह रहने लगे। उन्हें भारतीय नागरिकता नहीं हासिल हो सकी। कानूनी अडचनों के चलते वह 53 वर्षों तक ‘घुसपैठिया’ कहलाए जाते रहे। हालाँकि, जब 2024 में CAA कानून लागू हो गया तब उन्होंने फिर से नागरिकता के लिए आवेदन किया। इसके बाद उन्हें दिसम्बर, 2024 में जाकर नागरिकता मिल पाई। इस बीच उन्होंने अपना जीवनयापन करने के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाई। अब उनका पूरा परिवार भारत में ही है।

परिवार का पता तक नहीं लगा

निरंजन मंडल को कई सालों तक यह नहीं पता रहा कि बांग्लादेश में पीछे छूट गए परिवार के बाकी लोग कैसे हैं। उन्हें तीन दशक बाद बाद यह खबर मिली कि उनके भाई सुरक्षित बच गए हैं और बांग्लादेश में ही रह रहे हैं। हालाँकि, वह इन 53 वर्षों में दोबारा अपने भाइयों से दोबारा मिल नहीं सके। निरंजन मंडल की तीन बेटियों की शादी हो चुकी है। उनका एक बेटा भी है। यहाँ उनका परिवार अब प्रसन्नता से रह रहा है। उनका कहना है कि 53 वर्ष तक घुसपैठिया होने का जो दंश झेला, अब वह झेलना पड़ेगा। उन्हें CAA पोर्टल से नागरिकता की जानकारी मिली है।

न्यूरिया हुसैनपुर में ही एक और व्यक्ति गोपाल को भी भारतीय नागरिकता मिली है। गोपाल के पिता बांग्लादेश से भारत आए थे। गोपाल का जन्म भारत में हुआ था। भारत में नागरिकता जन्म के आधार पर नहीं मिलती, इसके चलते वह अभी तक बिना पहचाना के थे। हालाँकि, CAA के चलते उन्हें भी नागरिकता मिल पाई है। वह 24 वर्ष के हैं। इस इलाके की बड़ी जनसंख्या बंगाली है। इनमें से तमाम बांग्लादेश से भाग कर आए हैं। कई लोग आज भी बिना किसी वैध नागरिकता के जूझ रहे हैं।

पीलीभीत से 7500+ आवेदन

पीलीभीत जिले से CAA लागू होने के बाद 7990 आवेदन नागरिकता के लिए किए गए हैं। इनमें से 9 को नागरिकता मिल भी गई है। हजारों आवेदन कागज पूरे ना होने या फिर सत्यापन में समस्या आने के चलते रद्द भी कर दिए गए हैं। अधिकारियों ने बताया कि पीलीभीत से आवेदन कि बड़ी संख्या के पीछे की वजह इसकी खुली सीमा का नेपाल के साथ लगा होना है। यहाँ से बड़ी संख्या में शरणार्थी अलग-अलग समय पर आई हैं।

सपा नेता कैश खाँ ने प्राचीन शिव मंदिर पर कब्जा कर बनाया 3 मंजिला मकान, शिवलिंग और मूर्तियों को कुएँ में फेंका: विरोध करने पर हिंदुओं को फर्जी मुकदमें में फँसाने की देता धमकी

कन्नौज के बालापीर मोहल्ले में 200 साल पुराने श्री जागेश्वर नाथ शिव मंदिर पर कब्जे का मामला सामने आया है। आरोप है कि समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता कैश खाँ ने प्राचीन जागेश्वर नाथ शिव मंदिर पर कब्जा कर लिया और तीन मंजिला मकान बना लिया। स्थानीय लोगों और भाजपा नेताओं ने दावा किया है कि सपा सरकार के दौरान शिवलिंग और मूर्तियों को मंदिर से हटाकर कुएँ में फेंक दिया गया और उसके ऊपर निर्माण कार्य किया गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्थानीय लोगों ने जब कैश खाँ द्वारा किए गए इस कब्जे का विरोध किया, तो सपा नेता कैश खाँ ने उन्हें धमकाया और झूठे मुकदमों में फँसाने की धमकी दी। इसके बाद सभासद भूरा खान और अन्य स्थानीय निवासियों ने इस मामले में भाजपा नेताओं से शिकायत की।

पूर्व सांसद मौके पर पहुँचे, डीएम को सौंपा ज्ञापन

भाजपा के पूर्व सांसद सुब्रत पाठक ने तिर्वा विधायक कैलाश राजपूत और अन्य कार्यकर्ताओं के साथ गुरुवार (26 दिसंबर 2024) को मौके का निरीक्षण किया। उन्होंने बताया कि अगर विवादित कुएँ की खुदाई की जाए तो उसमें शिवलिंग और अन्य मूर्तियाँ मिल सकती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह हिंदू आस्था पर सीधा प्रहार है। पूर्व सांसद ने जिलाधिकारी (डीएम) शुभ्रांत कुमार शुक्ल से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। उन्होंने मंदिर की जमीन पर कब्जा करने वाले सपा नेता के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की। डीएम ने इस मामले की जाँच कर उचित कार्रवाई का भरोसा दिया।

पूर्व सांसद सुब्रत पाठक ने कहा कि अगर प्रशासन मंदिर को मुक्त कराने और शिवलिंग को पुनः स्थापित करने की कार्रवाई नहीं करता, तो वे समर्थकों के साथ बालापीर मोहल्ले में धरना देंगे।

विहिप ने की अतिक्रमण मुक्त कराने की माँग

विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने भी प्रशासन से माँग की कि मंदिर की जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराया जाए। विहिप का कहना है कि इस तरह के मामलों से हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाएँ आहत होती हैं।

वहीं, सपा नेता कैश खाँ ने इन आरोपों को निराधार बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने यह जमीन खरीदी है और धार्मिक स्थल अब भी सुरक्षित है। उन्होंने भाजपा पर माहौल बिगाड़ने का आरोप लगाया।

भाजपा नेताओं ने एसडीएम सदर रामकेश पर सपा नेता के साथ मिलीभगत का आरोप लगाया है। पूर्व सांसद सुब्रत पाठक ने डीएम से कहा कि सपा नेता कैश खाँ ने नगर पालिका की भूमि पर भी कब्जा कर लिया है। शिकायत के बाद भी एसडीएम ने कार्रवाई नहीं की। इसके बाद कैश खाँ ने कोर्ट से स्टे ले लिया। इससे मंदिर की भूमि पर कब्जा कराने में एसडीएम सदर रामकेश की भी मिलीभगत है। वहीं एसडीएम ने बताया कि उनके खिलाफ झूठी शिकायत की गई है।

इस मामले में जिलाधिकारी शुभ्रांत कुमार शुक्ल ने आश्वासन दिया कि जल्द अफसरों की टीम को मौके पर भेजकर जाँच कराई जाएगी। उन्होंने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए एडीएम आशीष कुमार को जाँच सौंप दी है। उन्होंने कहा कि दो दिनों में रिपोर्ट माँगी गई है और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

शिव मंदिर पर हमला कर मूर्तियों को तोड़कर फेंका, भगवान की फोटो को लगा दी आग: मनुस्मृति जलाने के बीच एक नया बवाल, BHU में धार्मिक ग्रंथ के अपमान करने पर 13 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के मथुरा में एक स्थानीय मंदिर में कुछ युवकों ने हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ खंडित कर दी। उन्हें तोड़ कर मंदिर के बाहर फेंक दिया गया। मंदिर में लगे भगवान के फोटो भी इन युवकों ने जला दिए। इसके बाद मंदिर में डॉ भीमराव अम्बेडकर की फोटो स्थापित करने की कोशिश की गई। मंदिर पर हमला करने का आरोप अनुसूचित जाति से जुड़े युवकों पर लगा है। वहीं वाराणसी में कुछ छात्रों ने मनुस्मृति जलाने का प्रयास किया और मारपीट भी की। दोनों घटनाओं में पुलिस ने कार्रवाई की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मथुरा के नौहझील थाना क्षेत्र के उदियागढ़ी गाँव में बने मंदिर पर बुधवार (26 दिसम्बर, 2024) रात को कुछ युवक आए। उन्होंने यहाँ कलश, त्रिशूल और सर्प को तोड़ दिया। उन्होंने मंदिर में स्थापित मूर्तियाँ भी तोड़ दी और उन्हें फेंक दिया। इसके अलावा मंदिर में जितने भी भगवानों के चित्र लगे हुए थे, उनमें आग लगा दी। इसके बाद उन्होंने डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर का एक फोटो मंदिर में स्थापित करने का प्रयास किया।

इसी बीच गाँव के लोगों ने इस करतूत को देख लिया और यहाँ पहुँच गए। इसके बाद यह सभी युवक भाग गए। गाँव वालों ने इस संबंध में पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने मौके पर पहुँच कर घटनास्थल का जायजा लिया। मंदिर में मूर्तियाँ खंडित करने के आरोपित युवक अनुसूचित जाति से जुड़े बताए जा रहे हैं। गाँववालों ने इस संबंध में कड़ी कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने लोगों को शांत करने के साथ ही मंदिर में मरम्मत भी करवा दी है। मौके पर भारी पुलिस बल तैनात है। मामले में शिकायत भी दर्ज करवाई गई है। घटना के बाद का एक वीडियो भी वायरल है।

मथुरा के अलावा वाराणसी में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने हँगामा किया। यह यहाँ के एक व्यस्त चौराहे पर इकट्ठा होकर मनुस्मृति जलाने जा रहे थे और नारेबाजी कर रहे थे। इन छात्र-छात्राओं ने यहाँ मारपीट और धार्मिक उन्माद फैलाने का प्रयास भी किया। पुलिस ने इस मामले में 13 छात्र-छात्रों को गिरफ्तार किया है। इनमें से 3 छात्राएँ हैं। यह सभी BHU में अलग-अलग विषयों की पढ़ाई कर रहे हैं। इनके भगत सिंह मोर्चा नाम के एक संगठन से जुड़े होने की जानकारी सामने आई है। इन्हें जेल भेज दिया गया है।

उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार के सीतामढ़ी में भी एक व्यक्ति के मनुस्मृति जलाने की बात सामने आई है। इस संबंध में पुलिस से लोगों ने कार्रवाई की माँग की है। सीतामढ़ी पुलिस ने इस संबंध में एक्स (पहले ट्विटर) पर जानकारी दी है।

पुलिस ने बताया, “सीतामढ़ी पुलिस के ट्विटर हैंडल पर सूचना प्राप्त हुई कि जय सर्राफ नामक व्यक्ति जो संभवतः सीतामढ़ी जिले के निवासी बताए जा रहे है, और उनके द्वारा हिंदुओ की धार्मिक ग्रंथ मनुस्मति को जलाकर सोशल मीडिया पर वीडियो डाला जा रहा है जिससे समाज में सांप्रदायिक माहौल खराब हो सकता है। उक्त सूचना को संज्ञान में लेते हुए पुलिस अधीक्षक महोदय सीतामढ़ी द्वारा जिले के विभिन्न थानों को उक्त सूचना के सत्यापन हेतु निर्देशित किया गया है।”

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने सरकारी आवास में बने हनुमान मंदिर को तुड़वाया: बार एसोसिएशन ने लगाया आरोप, कार्रवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट को लिखी चिट्ठी

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत पर आधिकारिक आवास के भीतर बने हनुमान मंदिर को ध्वस्त करवाने का आरोप लगा है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिख कर शिकायत की है और जाँच तथा कार्रवाई की माँग की है। बार एसोसिएशन ने कहा कि इससे पहले कई मुस्लिम चीफ जस्टिस तक उस बंगले में रहे हैं लेकिन उन्होंने मंदिर बना रहने दिया और यहाँ तक कि उसका जीर्णोद्धार भी करवाया। जस्टिस कैत बौद्ध धर्म के अनुयायी बताए गए हैं।

बार एसोसिएशन के पत्र के अनुसार, जबलपुर के पचपेड़ी में बने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के बंगले में एक पुराना हनुमान मंदिर था। एसोसिएशन ने कहा है कि इस मंदिर में जस्टिस बोबडे,जस्टिस खानविलकर समेत बाकी पूर्व चीफ जस्टिस पूजा किया करते थे। एसोसिएशन ने कहा है कि इस मंदिर में उनके स्टाफ भी पूजा करते थे जिससे किसी को कोई परेशानी नहीं थी। पत्र में कहा गया है कि यहाँ जस्टिस रफत आलम और जस्टिस रफीक अहमद भी अपने कार्यकाल के दौरान रहे हैं, उन्होंने भी कभी इस मंदिर पर कोई आपत्ति नहीं जताई।

एसोसिएशन की शिकायत में कहा गया है कि यह मंदिर सरकारी था और इसकी समय-समय पर मरम्मत भी सरकारी पैसे से करवाई जाती रही है। शिकायत के अनुसार, जस्टिस सुरेश कुमार कैत के यहाँ आने के बाद इस मंदिर को तोड़ दिया गया और मूर्तियाँ हटा दी गईं। यह कार्रवाई बिना किसी सरकारी या न्यायिक आदेश के की गई।

जस्टिस कैत हनुमान मंदिर

पत्र में कहा गया है कि इस कृत्य से हिन्दू धर्म में आस्था रखने वालों की भावनाओं का अपमान हुआ है तथा सरकारी सम्पत्ति का भी नुकसान हुआ है। एसोसिएशन ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव खन्ना से माँग की है कि वह जाँच करवाएँ और दोषियों पर कार्रवाई करें। अभी जस्टिस कैत का पक्ष सामने नहीं आया है।

इस मामले में ऑपइंडिया ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट धन्य कुमार जैन से बात की है। धन्य कुमार जैन ने कहा, “यह मंदिर यहाँ चीफ जस्टिस का बँगला बनने से पहले से था। यह एक नीम के पेड़ के पास बना था। बाद में यह बंगले में शामिल हो गया। इसमें समय के साथ छोटा-मोटा निर्माण भी करवाया गया। मंदिर लगभग 5×6 फीट के साइज का था, इसमें हनुमान जी और शिवलिंग स्थापित थे। यहाँ पूर्व में रहे चीफ जस्टिस पूजा करते थे, उनके स्टाफ भी यहाँ पूजा करते थे।”

सीनियर एडवोकेट जैन ने बताया, “यहाँ तक कि जस्टिस पटनायक यहाँ रोज सुबह धोती पहन कर पूजा करने आते थे चीफ जस्टिस रहे रफत आलम साहब ने इसका जीर्णोद्धार तक करवाया था। वह इसके सामने चप्पल उतार देते थे। किसी को इससे आपत्ति नहीं थी। लेकिन तीन महीने पहले यहाँ जस्टिस कैत आए और इसके बाद इस मंदिर को तोड़ दिया गया। अब कहा जा रहा है कि यहाँ कुछ था ही नहीं। संविधान में सभी धर्मों को आजादी दी गई है, लेकिन जब न्यायपालिका से जुड़े लोग मंदिर हटवा देंगे तो संवैधानिक अधिकारों की रक्षा कौन करेगा।”

उन्होंने इस मामले में जाँच करवाने की माँग की है और कहा है कि यदि संभव हो तो सुप्रीम कोर्ट जस्टिस कैत का ट्रांसफर किसी दूसरे हाई कोर्ट में करे। ऑपइंडिया ने एडवोकेट जैन से पूछा कि मंदिर तुड़वाने का कारण क्या रहा होगा। इसके जवाब में उन्होंने कहा, “जस्टिस कैत साहब बौद्ध धर्म को मानते हैं। हमें उससे कोई समस्या नहीं है, यह इसी धरती से जन्मा हुआ धर्म है। लेकिन इसके चलते मंदिर तोड़ा जाना ठीक नहीं है। इसका दोबारा निर्माण करवाया जाना चाहिए।”

गौरतलब है कि इस मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के बार एसोसिएशन को एक वकील रवीन्द्र नाथ त्रिपाठी की तरफ से शिकायत मिली थी। वकील त्रिपाठी ने इसी के साथ उस PIL की सुनवाई से भी जस्टिस कैत को अलग करने की माँग की है, जिसमें मध्य प्रदेश के पुलिस थानों के भीतर मंदिर बनाने का विरोध किया गया है। इस PIL में अनुरोध किया गया है कि थानों में बने मंदिर संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हैं और इन्हें हटाया जाना चाहिए। वकील त्रिपाठी ने माँग की है कि जस्टिस कैत के खिलाफ आरोप सिद्ध होने पर आपराधिक कार्रवाई भी चालू की जाए।

जस्टिस सुरेश कुमार कैत मूल रूप से हरियाणा के रहने वाले हैं। वह इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट और तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में जज रह चुके हैं। सितम्बर, 2024 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त किया था।

‘अयोध्या, काशी और मथुरा हमें सौंप देते मुस्लिम तो बाकी जगहों पर विवाद नहीं होता’: मंदिर-मस्जिद विवाद पर बोली वीएचपी, कहा- 1984 के धर्म संसद की बातें नहीं मानने से नाराज हैं हिंदू

विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने गुरुवार (26 दिसंबर 2024) को हिंदू समाज में मुस्लिम स्मारकों पर अधिकार के दावों और अदालतों में दायर याचिकाओं की वजह बताई। विहिप के महासचिव मिलिंद परांडे ने कहा कि मुस्लिम समुदाय द्वारा अयोध्या, काशी और मथुरा के विवादित स्थलों को हिंदुओं को स्वेच्छा से नहीं सौंपने से हिंदू समाज में नाराजगी है।

1984 का धर्म संसद और 2025 की स्थिति

रिपोर्ट्स के मुताबिक, विहिप के महासचिव मिलिंद परांडे ने 1984 में आयोजित धर्म संसद का जिक्र करते हुए कहा, “तब यह प्रस्ताव रखा गया था कि अयोध्या, काशी और मथुरा हमें दे दी जाएँ, और इसके बाद अन्य मुद्दों पर कोई हलचल नहीं होगी। लेकिन 2025 आने को है और यह प्रस्ताव अब तक लागू नहीं हो सका। इसी कारण समाज में जो नाराजगी दिख रही है, वह स्वाभाविक है।”

मोहन भागवत के बयान पर भी दी प्रतिक्रिया

संघ प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान को लेकर परांडे ने कहा, “भागवत जी ने काशी और मथुरा के संदर्भ में जो बात कही, उसे समझने की जरूरत है। उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर को हिंदुओं के विश्वास का प्रतीक बताया था और कहा था कि रोजाना नए मुद्दे उठाना नफरत और द्वेष पैदा कर सकता है।” हालाँकि, कुछ हिंदू संतों द्वारा उनके बयान के विरोध करने के सवाल पर उन्होंने कहा, “हम संतों के विरुद्ध टिप्पणी नहीं करते।”

मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण का विरोध

परांडे ने मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के मुद्दे पर कहा कि विहिप 5 जनवरी 2025 से देशव्यापी जन जागरूकता अभियान शुरू करेगी। यह अभियान विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश में आयोजित होने वाली ‘हैंदव शंखावरम’ नाम की विशेष सभा से शुरू होगा। विहिप ने मंदिर प्रबंधन को समाज को सौंपने के लिए एक मसौदा कानून भी तैयार किया है, जिसे हाल ही में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को सौंपा गया।

विहिप की प्रमुख माँगें

विहिप ने मंदिरों को समाज को सौंपने से पहले कुछ प्रमुख माँगें रखी हैं:

  • मंदिरों और एंडोमेंट विभागों से सभी गैर-हिंदू कर्मचारियों को हटाना।
  • पूजा और सेवा के कार्यों में केवल धर्म का पालन करने वाले हिंदुओं को नियुक्त करना।
  • मंदिर प्रबंधन और ट्रस्ट बोर्ड में राजनीतिक दलों से जुड़े व्यक्तियों की नियुक्ति पर प्रतिबंध।
  • मंदिर परिसर में दुकानों के संचालन की अनुमति केवल हिंदुओं को देना।
  • मंदिरों की भूमि पर गैर-हिंदुओं द्वारा किए गए अतिक्रमण को हटाना।

विहिप का कहना है कि उनकी यह पहल हिंदू समाज को मंदिरों के संरक्षण और प्रबंधन में सशक्त बनाने के लिए है। उनका मानना है कि मंदिर हिंदू संस्कृति और परंपरा का आधार हैं और इनका सही प्रबंधन जरूरी है।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब हिंदू-मुस्लिम विवादित स्थलों पर चर्चा और मंदिर निर्माण की मांग तेज हो रही है। विहिप ने स्पष्ट किया कि उनका अभियान सांप्रदायिकता फैलाने के लिए नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकार सुनिश्चित करने के लिए है।

तमिलनाडु पुलिस ने रेप पीड़िता की पहचान उजागर की, खुद को मारूँगा कोड़े: अन्नामलाई ने ली शपथ, कहा- जब तक DMK को सत्ता से बाहर नहीं करूँगा, तब तक नंगे पैर रहूँगा

तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष के अन्नामलाई तब तक नंगे पैर रहेंगे, जब तक डीएमके को राज्य की सत्ता से बेदखल नहीं कर देते। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने पैर के जूते निकालते हुए उन्होंने यह शपथ ली। साथ ही चेन्नई की अन्ना यूनिवर्सिटी की रेप पीड़ित छात्रा की पहचान उजागर करने का आरोप पुलिस पर लगाते हुए कहा कि इसके विरोध में वह खुद को 6 कोड़े भी मारेंगे।

अन्नामालाई ने 26 दिसंबर 2024 को कोयम्बटूर में पत्रकारों से बात करते हुए कहा, “मैं कल सुबह 10 बजे अपने घर के सामने खुद को छह बार कोड़े मारूँगा। जब तक DMK सरकार सत्ता से बाहर नहीं हो जाती, मैं जूते नहीं पहनूँगा… फरवरी के दूसरे सप्ताह में मैं सभी छह अरुपदाई वीडू (भगवान मुरुगन के छह प्रमुख स्थल) जाऊँगा और तमिलनाडु की स्थिति के बारे में उनसे शिकायत करूँगा।” अन्नामलाई ने कहा कि अब भाजपा के कार्यकर्ता घरों के बाहर बैठ कर प्रदर्शन करेंगे।

अन्नामलाई का यह गुस्सा चेन्नई स्थित अन्ना यूनिवर्सिटी में 23 दिसम्बर, 2024 को हुई घटना पर फूटा है। यूनिवर्सिटी के भीतर ही इंजीनियरिंग की एक 19 वर्षीय छात्रा से एक ठेले वाले ने रेप किया। अपने दोस्त से मिलने गई एक लड़की का उसने पहले वीडियो बनाया और फिर उसके दोस्त को मारपीट कर भगा दिया। इसके बाद उसके साथ रेप किया और फोन नम्बर लेकर कहा कि जब जहाँ बुलाए वहाँ वह लड़की आ जाए। लड़की ने जब इस घटना की रिपोर्ट दर्ज करवाई तब यह मामला खुला।

घटना का आरोपित ज्ञानशेखरन गिरफ्तार कर लिया गया है। 37 वर्षीय ज्ञानशेखरन कैम्पस में ही बिरयानी बेचता है। अन्नामलाई ने आरोप लगाया कि ज्ञानशेखरन सत्ताधारी DMK का पदाधिकारी है। उसकी तस्वीरें भी DMK के बड़े नेताओं के साथ मौजूद हैं। हालाँकि, DMK ने उससे पल्ला झाड़ा है। ज्ञानशेखरन ने 2011 में एक ऐसी ही घटना को अंजाम दिया था। उस पर 15 मामले दर्ज हैं। भाजपा को आरोप है कि ज्ञानशेखरन कार्रवाई से इसलिए बचता रहा क्योंकि उसे DMK का वरदहस्त प्राप्त था।

भाजपा मुखिया अन्नामलाई ने इस मामले में पुलिस की लापरवाही पर भी प्रश्न उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने इस मामले की FIR को लीक कर दिया, इससे पीड़िता की पहचान जगजाहिर हो गई। उसका फोन नम्बर और पता तक सामने आ गया। उनका आरोप है कि FIR भी इस तरीके से लिखी गई जिससे पीड़िता का अपमान हो। उन्होंने कहा कि DMK के राज में तमिलनाडु अपराधियों के लिए स्वर्ग बन गया है और पुलिस का इस्तेमाल कानून-व्यवस्था के लिए नहीं बल्कि विपक्ष को चुप करवाने में किया जाता है।

इस मामले में अन्ना यूनिवर्सिटी के बाहर छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किया है। उन्होंने यूनिवर्सिटी में सुरक्षा इंतजाम ना होने का आरोप लगाया है। छात्रों ने कहा कि यूनिवर्सिटी में लगे कैमरे सिर्फ दिखाने के लिए हैं और कोई भी उनकी मोनिटरिंग नहीं करता है। छात्रो नें आरोप लगाया कि यूनिवर्सिटी में कोई भी घुसा चला आता है। अन्ना यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन के बाद कई लोगों को हिरासत में लिया गया। इस मामले का संज्ञान महिला आयोग से लेने की भी माँग की गई है।

नागा संन्यासियों ने दिखाया पराक्रम, महाराणा प्रताप ने मुगलिया फौज के छुड़ा दिए छक्के: छापली तालाब-राणाकड़ा घाट की समाधियाँ आज भी सुना रहीं शौर्य की गाथाएँ

प्रयागराज महाकुंभ-2025 शुरू होने वाले हैं। इसमें देश भर के संतों के 13 अखाड़े भाग लेंगे। महाकुंभ में आमतौर पर नागा साधु आकर्षण का केंद्र है, क्योंकि इनकी दुनिया इतनी रहस्यमयी होती है कि इनके बारे में आम लोग बहुत कम लोग जानते हैं। नागा साधु को आमतौर पर संन्यासियों का सैन्य पंथ कहा जाता है। इनके कुल सात अखाड़े हैं, जो सैन्य रेजिमेंट की तरह बँटे हैं।

नागा साधुओं के ये अखाड़े हैं- पंचदशनामी जून अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, महानिर्वणी अखाड़ा, अटल अखाड़ा, अग्नि अखाड़ा, आनंद अखाड़ा और आह्वान अखाड़ा। नागा साधु साधु वैरागी होते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए हथियार उठाने से भी नहीं कतराते हैं। नागा साधुओं को शस्त्रों की भी शिक्षा दी जाती है। नागा साधुओं से जुड़े ऐसे अनेकों किस्से हैं, जो मशहूर हैं।

कहा जाता है कि जब मुगल आक्रांता अकबर के खिलाफ मेवाड़ के महाराणा प्रताप युद्ध कर रहे थे, उस समय नागा साधुओं ने भी उनका साथ दिया था। जिस युद्ध में नाग संन्यासियों ने महाराणा प्रताप का साथ दिया था, वह युद्ध राजस्थान के पंचमहुआ में छापली तालाब और राणाकड़ा घाट के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध में मुगलों के छक्के छूट गए थे। बलिदान संन्यासियों की समाधियाँ आज भी वहाँ मौजूद हैं।

सन 1666 में भी हरिद्वार कुंभ के मेले पर औरंगजेब के सेना ने हमला करके हिंदू धर्म के खिलाफ अपना इस्लामी अभियान तेज किया था। उस दौरान नागा संन्यासियों ने साधु-संतों को एकत्र करके युद्ध किया और मजहबी फौज को भगा दिया। इसी तरह 1751 में अहमद अली बंगस ने प्रयागराज कुंभ के दौरान हमला कर दिया। उस समय 50 हजार नागा संन्यासियों ने बंगस की सेना को भागने पर मजबूर कर दिया।  

वाराणसी में जब औरंगज़ेब ने विश्वनाथ मंदिर हमला करवाया था तो इन्हीं सन्यासियों ने मंदिर की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए थे। वाराणसी को औरंगज़ेब के कहर से इन्हीं सन्यासियों ने बचाया था। औरंगज़ेब की फ़ौज और इन संन्यासियों के बीच भीषण लड़ाई हुई थी। इसमें भीषण रक्तपात हुआ था। नागा संन्यासियों की युद्ध कला को देखते हुए औरंगजेब ने इनके अस्त्र-शस्त्र रखने पर रोक लगा दी थी।

जून अखाड़े के नागा साधुओं ने 1757 ईस्वी शताब्दी में अफगान आक्रांता अहमद शाह अब्‍दाली को मथुरा-वृंदावन को लूटने से रोक दिया था। इसके कारण अब्दाली का गोकुल लूटने का सपना सपना ही रह गया था। नागा साधुओं ने गुजरात के जूनागढ़ के निजाम के साथ एक भीषण युद्ध किया था। इस युद्ध में नागा संन्यासियों ने निजाम और उसकी सेना को धूल चटा दी थी।

नागा संन्यासियों ने अंग्रेजों से भी लोहा लिया था। बंगाल में अत्याचारियों के खिलाफ संन्यासी युद्ध बहुत प्रसिद्ध है। इस पर बांग्ला कथाकार एवं कवि बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपनी किताब ‘आनंद मठ’ लिखी है। इसी किताब का गीत वंदे मातरम आज हमारा राष्ट्रीय गीत है। अयोध्या के रामजन्मभूमि के लिए भी नागा संन्यासियों ने अपना खून खूब बहाए।

कैसे बनते हैं नागा साधु?

अखाड़े का संन्यासी बनने के लिए एक संकल्प पूरा करना होता है। यह संकल्प 12 साल का होता है। यह संकल्प लेने वाला ब्रह्मचारी कहलाता है। ब्रह्मचर्य के दौरान उस शख्स को अखाड़े के नियम और परंपराएँ सिखाई जाती हैं। इस दौरान गुरु की सेवा करनी होती है। जब ब्रह्मचारी का 12 साल का संकल्प पूरा हो जाता है तो आने वाले कुंभ में नागा साधु के रूप में दीक्षा दी जाती है।

शुरुआत में संन्यास की दीक्षा गुरु के द्वारा दी जाती है। मंत्रोच्चार आदि से शरीर पर समस्त चीजों को धारण करवाया जाता है। इसके बाद विजय संस्कार संपन्न किया जाता है। विजय संस्कार में संन्यास लेने वाले व्यक्ति का पिंडदान और अन्य आहुतियाँ करवाकर उसे सांसारिक मोह-माया से काट दिया जाता है। आहूति दीक्षा मिलने के बाद नागा संन्यासी बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

इस संस्कार के दौरान धर्म ध्वज के नीचे सभी साधुओं को एकत्रित किया जाता है और फिर नागा साधु की दीक्षा दी जाती है। इस दौरान एक अलग गुरु बनाया जाता है, जो दिगंबर होता है। इसके बाद अच्छे नागाओं की अखाड़ों में ड्यूटी लगाई जाती है। नागा संन्यासी आमतौर पर हाथ में त्रिशूल, तलवार, शंख लिए होते हैं और गले एवं शरीर में रुद्राक्ष आदि धारण करते हैं।

भजन के नाम पर घुसपैठ है ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’, अटल जयंती में गायिका ने माफी माँग सुधारी भूल: जानिए ‘रघुपति राघव राजा राम’ को गाँधी ने कैसे और क्यों किया विकृत

बिहार के पटना में बुधवार (25 दिसंबर 2024) को बापू सभागार में अटल जयंती समारोह के दौरान देवी नाम की गायिका ने ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ गाया तो हंगामा मच गया। खुद कार्यक्रम में मौजूद केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने उनका विरोध किया और मंच से ‘जय श्रीराम’ के नारे लगे। आखिर में गायिका को मंच से माफी माँगनी पड़ी और उन्होंने ‘छठी मैया आई ना दुअरिया’ गाया और कार्यक्रम से चली गईं।

बता दें कि गायिका के गीत पर इसलिए इतना बवाल हुआ क्योंकि गीत के लिरिक्स असल में ये नहीं है जो गाए गए। इस गीत की असली पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम।
सुन्दर विग्रह मेघश्याम,
गंगा तुलसी शालिग्राम।
भद्रगिरीश्वर सीताराम,
भगत जन-प्रिय सीताराम।
जानकीरमणा सीताराम,
जय जय राघव सीताराम है…

उक्त पंक्तियाँ श्री हरि के मानव अवतार पुरुषोत्तम श्री राम को समर्पित भजन श्री लक्ष्मणाचार्य द्वारा रचित श्री नम: रामायणम् का एक अंश है।

सवाल है कि जब भजन की पंक्तियाँ विशुद्ध रूप से सीताराम पर हैं, तो फिर इसमें समय के साथ ‘ईश्वर अल्लाह’ जैसे शब्द आए कहाँ से? तो जवाब है कि ये सब किया गया महात्मा गाँधी के द्वारा। उन्होंने सेकुलर माहौल बनाने के नाम पर राम भजन के साथ छेड़छाड़ की और उसे विकृत करने का प्रयास किया। उनके उसी प्रयास का नतीजा है कि आज बच्चों की जुबान पर सही पंक्तियाँ होने की बजाय विकृत पंक्तियाँ हैं। जैसे-

रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम,
भज प्यारे तू सीताराम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सबको सन्मति दे भगवान।

समय के साथ देखते-देखते धार्मिक भजन का यह घटिया संस्करण घर-घर में लोकप्रिय हो गया। लोग इसे स्वतंत्रता के समय रचित गीत बताने लगे जबकि हकीकत यह है कि शुरुआत में गाँधी ने भी राम भजन के साथ छेड़छाड़ करके उसका इस्तेमाल अपनी सभाओं में किया और बाद में तो बॉलीवुड ने इसे और मशहूर कर दिया। हिंदी फिल्मों, जैसे ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ और ‘कुछ कुछ होता है’ में इसका इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा, यह 1982 में अफ्रोबीट बैंड के एल्बम ओसिबिसा- अनलेशेड – लाइव का शुरुआती ट्रैक भी था।

लिरिक्स में इस हेरफेर के साथ मुस्लिमों को अपना समर्थन गाँधी को देने और उन प्रार्थना सभाओं में शामिल होने में कोई समस्या नहीं होती थी, जिसका उद्देश्य दोनों समुदायों के बीच मतभेदों को सुलझाना और सांप्रदायिक सद्भाव बनाना था। हालाँकि, मुस्लिम अल्पसंख्यक की माँगों के साथ सामंजस्य बैठाने की जिम्मेदारी हमेशा हिंदू बहुसंख्यकों की ही रही।

गाँधी ने मुस्लिमों द्वारा रखे गए आरक्षण को संबोधित करने के लिए एक हिंदू धार्मिक गीत के लिरिक्स को विकृत करने में बेजोड़ निपुणता दिखाई, लेकिन उन्होंने कभी भी पवित्र कुरान के आयतों की निंदा नहीं की, जो मूर्ति-पूजा को पाप कहता है और मूर्तिपूजा के लिए मृत्युदंड का आदेश देता है। 

गाँधी ने मुस्लिमों को खुश करने के लिए हिंदुओं के राम जाप वाले भजन को विकृत कर दिया। बता दें कि गाँधी के सामुदायिक प्रार्थना में मुस्लिमों का कलमा जाप भी शामिल था। हालाँकि, ऐसी कोई रिपोर्ट या ऐतिहासिक सबूत नहीं हैं, जो यह बताता हो कि गाँधी ने हिंदुओं की चिंताओं को दूर करने के लिए कुरान की आयतों को बदल दिया या कलमा में बदलाव किया था, ताकि इसे आपसी सह-अस्तित्व और सांप्रदायिक सद्भाव के अपने स्वीकृत रुख के अनुकूल बनाया जा सके। शायद इस दोहरेपन के कारण ही विभाजन के दौरान गाँधी की प्रार्थना सभाओं का ध्रुवीकरण हो गया और प्रार्थना सभाओं के दौरान कलमा को शामिल करने पर सवाल उठाए जाने लगे।

राम धुन में मिलावट एक ऐसी घटना थी, जिसमें गाँधी ने हिंदुओं की भावनाओं के प्रति बेहद कम संवेदनशीलता दिखाई। अटल जयंती पर आयोजित समारोह में गायिका का भजन के नाम पर इस धुन को दोहराना भी ठीक उसी तरह असंवेदनशीलता थी। इसके लिए माफी माँग उन्होंने अपनी भूल दुरुस्त करने का कार्य किया है।

मुस्लिम शासकों से शुरू नहीं होता भारत, सभ्यतागत न्याय के लिए इतिहास की खुदाई जरूरी: मोहन भागवत से अलग नहीं ऑर्गेनाइजर के विचार, क्योंकि राष्ट्रीय पहचान की ही लड़ाई लड़ रही RSS

नवम्बर, 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद का सर्वे हुआ। इसके बाद बदायूँ की एक मस्जिद का भी सर्वे करने के लिए याचिका डाली गई। इसी तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में कई याचिकाएँ और अदालती मामले सामने आए। संभल में हिंसा भी हुई। इसके बाद यहाँ हुई जाँच में मंदिर मिलने लगे। बाकी कई जगह पर हिन्दुओं ने उन मस्जिदों-दरगाहों और बाकी ढाँचों के जाँच की माँग की, जिनका धार्मिक स्वभाव आक्रान्ताओं द्वारा बदला गया है।

इसके बाद सेक्युलर और लिबरल जमात ने 1991 के वर्शिप एक्ट और सेक्युलरिज्म का हवाला दिया और देश में धार्मिक स्थलों की सच्चाई जानने के प्रयासों का विरोध करना चालू कर दिया। उनका दावा है कि अब इतिहास की बातों को जानने से कोई फायदा नहीं है और हर जगह सर्वे-खुदाई नहीं होनी चाहिए। इसी बीच 19 दिसम्बर, 2024 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने भी एक कायर्क्रम में सर्वे और खुदाई जैसे कामों को लेकर संयम बरतने की सलाह दी।

RSS प्रमुख मोहन भागवत के बयान के कुछ दिन बाद ही संगठन का मुखपत्र कही जाने वाली पत्रिका आर्गेनाइजर में हिन्दुओं के संभल जैसे प्रयासों का समर्थन किया गया है। पत्रिका में देश में धार्मिक स्थलों को लेकर चल रही बहस को नए नजरिए से देखने की बात कही गई है। मीडिया इसे ऐसे प्रचारित कर रहा है कि यह विचार RSS प्रमुख भागवत से असहमति का है। जबकि असल में यह बात अपने धर्मस्थल वापस लेने के प्रश्न पर दूसरी तरीके से विचार करने की है। लड़ाई के प्रश्न को दूसरा अर्थ किए जाने की है।

आर्गेनाइजर में यह लेख सम्पादक प्रफुल्ल केतकर ने लिखा है। उन्होंने इस लेख में कहा है कि अब जो बहस शुरू हुई है, उसे हमें क्षद्म-सेक्युलरिज्म के चश्मे से हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे तक नहीं सीमित कर देना चाहिए। बल्कि हमें अब अपनी सभ्यता के साथ हुए अन्याय को लेकर चल रही लड़ाई पर एक समावेशी बहस की जरूरत है, जिसमें समाज के सभी वर्गों को शामिल किया जाए।

संभल में मिला मंदिर इस बार आर्गेनाइजर की कवर स्टोरी है

लेख में कहा गया है कि संभल में मस्जिद सर्वे पर पत्थरबाजी, मुस्लिम इलाकों में बिजली चोरी का पकड़ा जाना और फिर बंद पड़े हिन्दू मंदिरों का निकलना, इन सब बातों ने देश में चल रहे कथित सेक्युलरिज्म का भंडाफोड़ कर दिया है और उसकी खामियाँ जगजाहिर हो गई हैं। आर्गेनाइजर का कहना है कि देश में जो संघर्ष धर्मस्थलों की पहचान और उन्हें वापस लिए जाने को लेकर चल रहा है, असल में वह हिन्दू-मुस्लिम का प्रश्न है ही नहीं। ना ही वह यह प्रश्न है कि किसका धर्म दूसरे से श्रेष्ठ है।

असल में यह प्रश्न राष्ट्रीय पहचान और हमारी सभ्यता के साथ हुए अत्याचार का न्याय माँगने का है। लेख में यह भी कहा गया है कि अब तक सही इतिहास बताने और सभ्यता के साथ न्याय करने के बजाय कम्युनिस्ट और कॉन्ग्रेस लगातार आक्रान्ताओं को महान बताते रहे। उन्होंने इस देश के मुसलमानों को यह समझाया कि अंग्रेज आने से पहले वह इस देश के मालिक थे। मुस्लिमों को बताई गई यह बात आधा सच है। उन मुस्लिम आक्रान्ताओं के आने से सैकड़ों साल पहले तक भारत में हिन्दू राजा ही थे।

मुस्लिमों को बात यह बताई जानी चाहिए कि वह इस देश आक्रान्ताओं की विरासत संभालने वाले लोग नहीं बल्कि उनके पीड़ित हैं। लेख में कहा गया है कि देश में मुस्लिमों को समझाया जाना चाहिए कि वह इन बाबर और औरंगजेब को अपना हीरो ना मानें, असल में वह तो भारतीय समाज से ही निकले लोग हैं। लेख में कहा गया है कि जिस तरह बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने जाति के प्रश्न का असल कारण निकाला और उसका हल संविधान के जरिए निकाला, उसी तरह इस धर्मस्थलों के प्रश्न और सभ्यता के साथ हुए अन्याय का हल निकाला जाना चाहिए।

अगर सेक्युलरिज्म के चलते इस प्रश्न को हल ना किया गया तो इससे देश में कट्टरपंथ ही बढ़ेगा। जो राय आर्गेनाइजर ने दी है, वही विश्व हिन्दू परिषद का कहना है। विश्व हिन्दू परिषद के एक पदाधिकारी ने वह कारण बताया है जिस कारण से आज हिन्दू अपने सारे धर्मस्थल वापस लेने की बात कह रहे हैं।

VHP के संयुक्त महासचिव सुरेन्द्र कुमार ने कहा, “1984 में भारत के संतों ने एक बढ़िया ऑफर मुस्लिम समाज को दिया था कि आप हमें सिर्फ अयोध्या, काशी और मथुरा दे दीजिए, हम लाखों को भूल जाएँगे। लेकिन आज जो स्थिति बनी है, उसके जिम्मेदार मुस्लिम नेता और सेक्युलर हैं।”

सुरेन्द्र कुमार ने कहा, “अयोध्या हमने लिया है, कोर्ट से लड़ कर लिया है। अब दो बचे हैं, अगर अब भी आगे बढ़ कर उन्हें मुस्लिम समाज सौंप दे तो हम समाज के जागृत वर्ग को समझा सकेंगे कि सब जगह पर ऐसे (खुदाई-सर्वे) के प्रयास नहीं हो सकते। पूज्य सरसंघचालक जी ने सही ही कहा है। उन्होंने सबके लिए बात कही है… अब भी समय है मुस्लिम समाज के पास, काशी मथुरा सौंप दें तो हिन्दू समाज सौहार्द के लिए रुक सकता है।”

देश के आजाद होने के बाद से अब पहली बार ऐसा समय आया है कि जब हिन्दुओं ने अपने धर्मस्थल वापस लेने के संघर्ष को गति दी है और वह सेक्युलरिज्म के झाँसे में नहीं आ रहे। संभल जैसी जगहों पर इन प्रयासों की वजह से 1978 के दंगे तक की सच्चाई बाहर आ गई। लेकिन यह प्रश्न सिर्फ धर्म का नहीं बल्कि हमारी हिन्दू सभ्यता के अवशेष बचाने और उसको संरक्षित करने का है। सरसंघचालक मोहन भागवत और आर्गेनाइजर का विचार एक ही है, बस उसे व्यक्त अलग तरीके से किया गया है।

हम गुरु गोविंद सिंह के पुत्र हैं, अपना धर्म नहीं छोड़ सकते… जब साहिबजादों ने इस्लाम की जगह चुना बलिदान: वीर बाल दिवस पर राष्ट्र का नमन, राष्ट्रपति ने 17 बच्चों को दिए राष्ट्रीय बाल पुरस्कार

26 दिसंबर को आज जब पूरा देश वीर बाल दिवस मना रहा है, ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गुरु गोबिंद सिंह के साहिबजादों को याद किया। उन्होंने कहा कि छोटी सी उम्र में जिस तरह साहिबजादे अपने विश्वास और सिद्धांतों पर अडिग रहे थे, उनका वो साहस पीढ़ियों को प्रेरित करने वाल है। पीएम मोदी ने माता गुजरी को भी याद करते हुए लिखा कि वो प्रार्थना करते हैं कि माता गुजरी और गुरु गोबिंद सिंह हमेशा समाज निर्माण में उनका मार्ग दर्शन करते रहें।

आज के दिन राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने भी राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में 17 बच्चों को उनकी असाधारण उपलब्धियों के लिए राष्ट्रीय बाल पुरस्कार प्रदान किया। साथ ही उनकी असीमित क्षमताओं और अतुलनीय गुण के लिए उनकी तारीफ की। राष्ट्रपति ने कहा कि 2047 में जब हम भारत की स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएँगे, तब ये पुरस्कार विजेता देश के प्रबुद्ध नागरिक होंगे। ऐसे प्रतिभाशाली लड़के-लड़कियाँ विकसित भारत के निर्माता बनेंगे।

बता दें कि वीर बाल दिवस के दिन गुरु गोबिंद सिंह के दोनों बेटों को यूँ ही याद नहीं किया जाता। आज के समय में जिस धर्म को बचाने की बात लोग सिर्फ सोशल मीडिया पर करते हैं, उसी धर्म की रक्षा में गुरु गोबिंद सिंह के साहिबजादों ने 26 दिसंबर 1704 को अपने प्राण बलिदान कर दिए थे। आइए आज उनके उस बलिदान को फिर याद करें…

साहिबजादों को दीवार में चुनवाया गया

वैसे तो सिख गुरु गोबिंद सिंह ने औरंगजेब के भेजे वजीर खान से कई युद्ध लड़े थे और उसे कई बार धूल भी चटाई थी, लेकिन 1704-05 में वजीर खान ने आनंदपुर साहिब को घेरकर गुरु गोबिंद सिंह पर धोखे से आघात करने की साजिश रची थी। मौजूदा जानकारी बताती है कि उस समय वजीर खान की फौज ने सिख सैनिकों से बार-बार पराजय झेलने के बाद आनंदपुर साहिब को चारों ओर से घेर लिया था और रसद-पानी की किल्लत पैदा करके उन्हें कमजोर करने की कोशिश की थी। इसके बाद उन्होंने संधि का प्रस्ताव देकर कहा था कि अगर गुरु गोविंद सिंह दुर्ग छोड़ देते हैं तो उन्हें और उनके परिवार को सुरक्षित निकलने के लिए रास्ता दिया जाएगा। इसके लिए मुग़ल सूबेदारों ने कुरान तक की कसम खाई थी।

हालाँकि, गुरु गोविंद सिंह ने पहले ही शर्त रख दी थी अगर वो ऐसा करते हैं तो गुरु-शिष्य का रिश्ता नहीं रहेगा। इसके बाद लगभग आठ महीने के समय तक आनंदपुर साहिब को मुगलों ने घेरे रखा और एक दिन कुरान की सौगंध को धता बताते हुए खालसा सेना पर आक्रमण कर दिया। इस दौरान सिख सेना ने गुरु गोविंद सिंह, उनकी माँ गुजरी देवी और चारों साहिबजादों (अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह) के साथ दुर्ग छोड़ने की योजना बनाई।

वो 21 दिसंबर, 1704 की रात थी। स्थान था सरसा नदी का तट। मौसम था ठंड और बारिश का। ऐसे कठिन समय में भी अजीत सिंह (19) और जुझार सिंह (14) को लेकर गुरु गोविंद सिंह किसी तरह चमकौर की गढ़ी तक पहुँचने में कामयाब रहे, लेकिन परिवार के बाकी लोग उनसे बिछुड़ गए। जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह के साथ उनकी दादी थीं, माँ गुजरी देवी।

गुरु गोविंद सिंह का एक पुराना रसोइया था, जिसके गाँव में जाकर इन तीनों ने शरण ली। लेकिन, उसने विश्वासघात किया और दोनों बच्चों को वजीर खान को सौंप दिया। क्रूर वजीर खान ने इन दोनों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद ठंड के मौसम में उन्हें ठंडी जगह में रखा गया। वजीर खान ने दोनों साहिबजादों, जोरावर सिंह(9) और फतेह सिंह(6) के समक्ष शर्त रखी कि वो इस्लाम अपना लें, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। वजीर खान ने उन दोनों को ज़िंदा दीवार में चुनवाने का आदेश दिया। दोनों छोटे बच्चों ने कहा कि वो अपना धर्म कभी नहीं छोड़ सकते।

इस दौरान उन्होंने अपने दादा गुरु तेग बहादुर के बलिदान को भी याद किया और कहा- “हम गुरु गोविंद सिंह के पुत्र हैं, जो अपना धर्म कभी नहीं छोड़ सकते।” असल में पहले वजीर खान ने इन दोनों बच्चों को दीवार में चुनवाने के लिए मलेरकोटला के नवाब को सौंपना चाहा, जिसका भाई सिखों के साथ युद्ध में मारा गया था। लेकिन, उसने ऐसा करने से इनकार करते हुए कहा कि उस युद्ध में इन दोनों बालकों का क्या दोष? वजीर खान को लगा था कि वो बदले की आग में जल रहा होगा।

दोनों साहिबजादों में जोरावर सिंह बड़े थे। जब दीवार ऊपर उठने लगी तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। इस पर छोटे भाई ने पूछा कि क्या वो बलिदान देने से डर गए, इसीलिए रो रहे हैं? जोरावर सिंह ने जवाब दिया कि ऐसी बात नहीं हैं। वो तो ये सोच कर दुःखी हैं कि छोटा होने के कारण फ़तेह सिंह दीवार में पहले समा जाएँगे और उनकी मृत्यु पहले हो जाएगी। उन्होंने कहा- “दुःख यही है कि मेरे से पहले बलिदान होने का अवसर तुम्हें मिल रहा है।” उन्होंने कहा- “मैं मौत से नहीं डरता, वो मुझसे डरती है।”

इतिहास के किसी युद्ध में बच्चों के साथ इस तरह की अमानवीयता का उदाहरण फिर कहीं नहीं मिलता। इसके बाद फिर चमकौर की गढ़ी में भी युद्ध हुआ, जिसमें वीरता का प्रदर्शन करते हुए गुरु गोविंद सिंह के बाकी दोनों बेटों अजीत सिंह और जुझार सिंह का भी निधन हो गया। वहीं गुरु गोविंद सिंह की माँ गुजरी देवी की बात करें तो कहते हैं, अपने दोनों पोतों की मृत्यु की खबर सुनते ही उन्हें ऐसा सदमा लगा था कि उनका भी निधन हो गया था।

यही कारण है कि दिसंबर महीने का सिख पंथ में एक अलग स्थान है। चमकौर के युद्ध में तो अंतिम सिख सैनिक भी बलिदान हो गया था लेकिन लड़ते-लड़ते। इस तरह गुरु गोविंद सिंह के चारों बेटों और माँ का बलिदान हुआ, लेकिन सिख सेना ने उन्हें कुछ नहीं होने दिया। इसके बाद ही वजीर खान को अपनी क्रूरता के कारण डर का एहसास होने लगा था और ये चार साहिबजादों का बलिदान ही था कि आगे के सिखों में वीरता और बहादुरी कई गुनी हो गई और उनका साहस आसमान छूने लगा।