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दंगों के बाद हिंदुओं को करना पड़ा पलायन, नदी में विसर्जित करनी पड़ी मूर्तियाँ… अब खुर्जा में मिला बंद मंदिर, प्रशासन से जीर्णोद्धार और पूजा-पाठ फिर शुरू करवाने की माँग

बुलंदशहर जिले के खुर्जा कस्बे में एक ऐसा मंदिर मिला है, जो करीब 50 साल पुराना बताया जा रहा है और पिछले 30 वर्षों से बंद पड़ा था। इस मंदिर का निर्माण जाटव समुदाय ने किया था, जो वहाँ पूजा-अर्चना करते थे। साल 1990 के दंगों के बाद जाटव समुदाय ने इस इलाके को छोड़ दिया और मंदिर भी बंद हो गया। इस दौरान मंदिर की मूर्तियों को समुदाय के ही एक परिवार ने नदी में विसर्जित कर दिया था।

खुर्जा के एसडीएम दुर्गेश सिंह ने बताया कि मंदिर सलमा हकान मोहल्ले में स्थित है और इसका ढाँचा पूरी तरह सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि इस स्थल को लेकर किसी भी समुदाय के बीच कोई विवाद नहीं है। एसडीएम ने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर की मूर्तियों को नदी में विसर्जित कर दिया गया था और मामले की जाँच जारी है।

मंदिर का पता चलने के बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) और जाटव विकास मंच ने प्रशासन से मंदिर का जीर्णोद्धार कराने की माँग की है। VHP के मेरठ प्रांत के पदाधिकारी सुनील सोलंकी ने बताया कि मंदिर 1990 के बाद से बंद है। उस समय इस क्षेत्र में रहने वाले हिंदू परिवार दंगों के डर से पलायन कर गए थे। उन्होंने प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर मंदिर की सफाई और सौंदर्यीकरण कराने का अनुरोध किया, ताकि पूजा-पाठ फिर से शुरू हो सके।

जाटव विकास मंच के अध्यक्ष कैलाश भागमल गौतम ने भी मंदिर के इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि मंदिर का निर्माण जाटव समुदाय के लोगों ने किया था। यह मंदिर 50 साल पुराना है, लेकिन 1990 के दंगों के दौरान समुदाय ने पलायन कर दिया, जिससे मंदिर बंद हो गया। अब मंच और VHP के सदस्यों ने मिलकर मंदिर में धार्मिक गतिविधियाँ फिर से शुरू करने की माँग की है।

इस मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों और संगठनों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। उनका मानना है कि मंदिर का जीर्णोद्धार कर पूजा-अर्चना फिर से शुरू की जा सकती है। प्रशासन से इस मामले में जल्द निर्णय लेने की उम्मीद जताई जा रही है।

बता दें कि इससे पहले संभल और वाराणसी में भी सालों से बंद पड़े मंदिरों का पता चला था। संभल में 1978 से बंद पड़े एक मंदिर को हाल ही में खोला गया, जहाँ कार्बन डेटिंग की प्रक्रिया भी हो चुकी है। वहीं, वाराणसी के मदनपुरा इलाके में 250 साल पुराने एक मंदिर का पता चला है। अब बुलंदशहर के खुर्जा में मिला यह मंदिर भी चर्चा में है।

अल्लू अर्जुन के घर पर हमला करने वालों को मिली जमानत, कॉन्ग्रेसी CM रेवंत रेड्डी के साथ तस्वीरें वायरल: तोड़फोड़ के बाद ‘पुष्पा 2’ एक्टर ने परिवार सहित घर छोड़ा

साउथ के सुपरस्टार व सुपरहिट फिल्म पुष्पा-2 के एक्टर अल्लू-अर्जुन के आवास पर 22 दिसंबर को पत्थरबाजी करके उनकी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का प्रयास हुआ। पुलिस ने इस मामले में 6 लोगों को पकड़ा जिन्हें आज सुबह तक बेल भी मिल गई। अब इसी मामले में एक बीआरएस नेता ने दावा किया है कि आरोपितों में से एक तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का आदमी था। वहीं कॉन्ग्रेस नेता ने इन आरोपों पर कोई बयान नहीं दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 22 दिसंबर 2024 को उस्मानिया यूनिवर्सिटी की ज्वाइंट एक्शन कमेटी के लोगों ने जुबली हिल्स में जबरन घुसने की कोशिश की थी। उनकी माँग थी कि उस महिला के परिजनों को 1 करोड़ रुपए दिए जाएँ जिनकी मौत भगदड़ के दौरान हुई थी।

पुलिस ने सही समय पर आकर इन्हें गिरफ्तार किया और 6 लोगों को जज के सामने पेश किया। कोर्ट ने 10-10 हजार रुपए तथा दो जमानती पेश होने के बाद सबको छोड़ दिया गया। इस बेल के बाद ही बीआरएस नेता कृष्णक सामने आए। उन्होंने दावा किया श्रीनिवास 2019 के जिला परिषद प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र (जेडटीपीसी) चुनावों में रेवंत रेड्डी और कोडंगल कॉन्ग्रेस उम्मीदवार के ‘करीबी सहयोगी’ थे।

बीआरएस नेता कृषांक ने कुछ तस्वीरें पोस्ट की, जिनमें अल्लू अर्जुन के घर तोड़फोड़ करने वाला एक आरोपित मुख्यमंत्री के साथ पोज देते हुए दिखाई दे रहे था। उन्होंने कहा, “ओयूजेएसी को साल 2009 में महान तेलंगाना के लिए शुरू किया गया था। उसे हिंसा और ब्लैकमेल के लिए इसका इस्तेमाल करना घृणित है। अल्लू अर्जुन के आवास पर हमला करने वाले रेड्डी श्रीनिवास उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्र नेता नहीं हैं। वह रेवंत के करीबी सहयोगी और 2019 जेडपीटीसी चुनाव में कोडंगल कांग्रेस के उम्मीदवार हैं।”

बता दें कि अल्लू अर्जुन रविवार को अपने घर हुए हमले के बाद परिवार को लेकर चिंतित हैं। वह अपने बच्चों के साथ सुरक्षित जगह चले गए हैं। उन्होंने अपने बच्चों को अपने पिता के घर भेज दिया है। तस्वीर सामने आई है जिसमें वह लोग गाड़ी में है और काफी चिंतित हैं। उनके बच्चे भी हैरान-परेशान होकर डरे बैठे हैं। इस घटना पर अल्लू अर्जुन के पिता ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उनके घर पर जो कुछ हुआ, उसे सभी ने देखा है। लेकिन अब समय आ गया है कि वह लोग उसके अनुसार काम करें।

इस्लामी लुटेरे अहमद शाह अब्दाली को रोका, मुगल हो या अंग्रेज सबसे लड़े: जूनागढ़ के निजाम ने जहर देकर हिंदू संन्यासियों को मारा, जो बच गए उन्होंने बना दिया जूना अखाड़ा

प्रयागराज महाकुंभ-2025 की तैयारियाँ जोरों पर हैं। वहीं विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत विश्व के सबसे बड़े धार्मिक समागम में हिस्सा लेने के लिए पहुँच रहे हैं। इन्हीं अखाड़ों में से एक अखाड़ा है भैरव अखाड़ा। 13 अखाड़ों में सबसे बड़े भैरव अखाड़े को पंचदशनाम जूना अखाड़ा के नाम से भी जाना जाता है। नागा संन्यासियों के इस अखाड़े का इतिहास आध्यात्मिकता के साथ-साथ पराक्रम से भी भरा पड़ा है।

यही कारण है कि नागा संन्यासी अपने साथ अस्त्र-शस्त्र भी रखते हैं। इनके हाथों में तलवार, त्रिशुल, भाला, फरसा जैसे कई तरह के हथियार होते हैं। कहा जाता है कि नागा संन्यासियों ने मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक के साथ युद्ध लड़े हैं। जूना अखाड़े में एक शस्त्रागार भी है, जिसमें 400 वर्ष पुराने अस्त्र-शस्त्र रखे हुए हैं। कुंभ के आयोजन के दौरान नागा साधु इन हथियारों को लेकर निकलते हैं।

जूना अखाड़े की स्थापना का उद्देश्य

जूना अखाड़े शैव संप्रदाय से 7 अखाड़ों से ताल्लुक रखता है। इसकी स्थापना 1145 ईस्वी में उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में हुआ था। यहीं पर इस अखाड़े का पहला मठ भी बना था। हालाँकि, हिंदू धर्म के कुछ जानकारों का मानना है कि इस अखाड़े की स्थापना का उल्लेख सन 1259 में मिलता है। वहीं, सरकारी दस्तावेजों में इस अखाड़े का पंजीकरण सन 1860 में कराया गया था।

जूना अखाड़े के इष्ट या अराध्य भगवान शिव या उनके रुद्रावतार भगवान दत्तात्रेय हैं। इस अखाड़े का केंद्र एवं मुख्यालय वाराणसी के हनुमान घाट पर स्थापित किया गया है। इस अखाड़े का आश्रम हरिद्वार के महामाया मंदिर के पास बनाया गया। इसके अलावे, इस अखाड़े के केंद्र उज्जैन से लेकर तमाम प्रमुख केंद्रों में स्थित है। कहा जाता है कि इस अखाड़े में 5 लाख से ज्यादा नागा साधु हैं।

कहा जाता है कि जब बौद्ध एवं जैन संप्रदाय के वर्चस्व को तोड़ने के लिए इन अखाड़ों की स्थापना की गई थी। नागा साधुओं को शास्त्र के साथ-साथ अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देकर युद्ध कौशल में पारंगत बनाया गया, ताकि वे हिंदू धर्म को स्थापित करने में सहयोग कर सकें। तब से ये अखाड़ा चले आ रही हैं। शंकराचार्य के निर्देशन में स्थापित ये अखाड़े बाद में मुस्लिम आक्रमणकारियों से भी लड़े।

अब्दाली, निजाम और मुगलों से भी लिया लोहा

कह जाता है कि इस अखाड़े के नागा साधुओं ने मंदिरों-मठों की रक्षा के लिए मुगलों से लोहा लिया था। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने अफगान आक्रांता अहमद शाह अब्‍दाली मथुरा-वृंदावन को लूटने के बाद गोकुल को लूटने के इरादे से आगे बढ़ा, लेकिन नागाओं ने इन्हें रोक दिया। इसके कारण अब्दाली का गोकुल को लूटने का सपना रह गया था।

यह भी कहा जाता है कि नागा साधुओं ने गुजरात के जूनागढ़ के निजाम के साथ एक भीषण युद्ध किया था। इस युद्ध में नागा संन्यासियों ने निजाम और उसकी सेना को धूल चटा दी थी। मान्यता है कि नागा साधुओं के सैन्य कौशल से निजाम भी प्रभावित हो गया था। आखिरकार इन संन्यासियों के आगे घुटने टेकते हुए जूनागढ़ के निजाम को इन्हें संधि के लिए आमंत्रित करना पड़ा।

जूना अखाड़े के संरक्षक महंत हरि गिरि बताते हैं कि अखाड़े के संन्यासी निजाम के पास संधि के लिए गए। इसमें संन्यासियों को जूनागढ़ सौंपने की बात कहते हुए भोजन पर आमंत्रित किया। इस दौरान निजाम ने धोखे से संन्यासियों को भोजन में जहर मिलाकर दे दिया। इससे सैकड़ों संन्यासियों की मौत हो गई। जो बच गए उन्होंने जूना अखाड़े की स्थापना की।

नागा संन्यासियों के शौर्य को लेकर एक और कथा कही जाती है। कहा जाता है कि मुगल आक्रांता जहाँगीर एक बार प्रयागराज कुंभ मेला में आने वाला था। तब वैष्णव और शैव संप्रदाय के संन्यासियों ने मिलकर एक पिरामिड बनाया और उससे एक छद्म युद्ध किया। इसमें पिरामिड पर चढ़कर एक साधु ने जहाँगीर को कटारी भोंक दी थी। इस तरह वे मुगलों के खिलाफ अपनी गुस्सा को रोक नहीं पाए थे।

पंचदशनाम जूना अखाड़े के अष्ट कौशल महंत योगानंद गिरी का कहना है कि नागा संन्यासियों जो अस्त्र-शस्त्र लेकर चलते हैं, इन्हीं उन्होंने मुगलों से लड़ाई लड़ी थी। इसके बाद अंग्रेजों के शासन के दौरान संन्यासी विद्रोह किया। योगानंद गिरि कहते हैं, “इन अस्त्रों को हम कैंची बोलते हैं, जो हमारे लिए पूजनीय होता है।”

कैसे बनते हैं नागा साधु?

अखाड़े का संन्यासी बनने के लिए एक संकल्प पूरा करना होता है। यह संकल्प 12 साल का होता है। यह संकल्प लेने वाला ब्रह्मचारी कहलाता है। ब्रह्मचर्य के दौरान उस शख्स को अखाड़े के नियम और परंपराएँ सिखाई जाती हैं। इस दौरान गुरु की सेवा करनी होती है। जब ब्रह्मचारी का 12 साल का संकल्प पूरा हो जाता है तो आने वाले कुंभ में नागा साधु के रूप में दीक्षा दी जाती है।

शुरुआत में संन्यास की दीक्षा गुरु के द्वारा दी जाती है। मंत्रोच्चार आदि से शरीर पर समस्त चीजों को धारण करवाया जाता है। इसके बाद विजय संस्कार संपन्न किया जाता है। विजय संस्कार में संन्यास लेने वाले व्यक्ति का पिंडदान और अन्य आहुतियाँ करवाकर उसे सांसारिक मोह-माया से काट दिया जाता है। आहूति दीक्षा मिलने के बाद नागा संन्यासी बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

इस संस्कार के दौरान धर्म ध्वज के नीचे सभी साधुओं को एकत्रित किया जाता है और फिर नागा साधु की दीक्षा दी जाती है। इस दौरान एक अलग गुरु बनाया जाता है, जो दिगंबर होता है। इसके बाद अच्छे नागाओं की अखाड़ों में ड्यूटी लगाई जाती है। नागा संन्यासी आमतौर पर हाथ में त्रिशूल, तलवार, शंख लिए होते हैं और गले एवं शरीर में रुद्राक्ष आदि धारण करते हैं।

पश्चिम बंगाल में शॉल बेचते पकड़ा गया आतंकी जावेद मुंशी, नदी के रास्ते बांग्लादेश भागने की फिराक में था: पाकिस्तान में ली थी आतंक की तालीम, बम बनाने में है माहिर

पाकिस्तान में आतंकी ट्रेनिंग लेने वाला और जम्मू-कश्मीर में 2011 में एक मौलाना की हत्या में वांछित आतंकी जावेद मुंशी को पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के कैनिंग इलाके से गिरफ्तार किया गया। यह गिरफ्तारी जम्मू-कश्मीर पुलिस और पश्चिम बंगाल पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में हुई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रतिबंधित आतंकी संगठन तहरीक-उल-मुजाहिदीन (TuM) का सदस्य जावेद मुंशी शॉल विक्रेता के तौर पर कैनिंग पहुँचा था। वह नदी के रास्ते से बांग्लादेश भागने की फिराक में था। पुलिस ने बताया कि हथियारों और विस्फोटक बनाने का विशेषज्ञ जावेद मुंशी लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के निर्देशों पर काम कर रहा था।

पुलिस ने रविवार (22 दिसंबर 2024) को जावेद मुंशी को गुलशन हाउस नाम के किराए के मकान से पकड़ा, जहाँ वह अपनी रिश्तेदार तबस्सुम बीवी और उसके शौहर गोलाम मोहम्मद के साथ रह रहा था। तबस्सुम ने बताया कि मुंशी उसकी बहन का शौहर है और वह पिछले 25 वर्षों से उनके परिवार का हिस्सा है।

मुंशी को कोलकाता की अलीपुर अदालत में पेश किया गया, जहाँ अदालत ने उसे जम्मू-कश्मीर पुलिस को ट्रांजिट रिमांड पर सौंप दिया। अब उसे श्रीनगर ले जाकर पूछताछ की जाएगी और उस पर UAPA के तहत मामला दर्ज होगा।

जाँच में पता चला कि जावेद मुंशी ने पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश की कई यात्राएँ की हैं और इसमें उसने फर्जी पाकिस्तानी पासपोर्ट का इस्तेमाल किया। वह पहले भी कई बार आतंकी गतिविधियों के चलते जेल जा चुका है।

बता दें कि 2011 में श्रीनगर में अहल-ए-हदीस के नेता शोकत अहमद शाह की हत्या में उसका नाम सामने आया था। उस समय एक साइकिल में लगे आईईडी विस्फोट में शाह की जान गई थी। इस घटना के बाद से ही वह फरार चल रहा था।

STF के अधिकारियों ने बताया कि मुंशी बांग्लादेश भागने की तैयारी कर रहा था, लेकिन कश्मीर पुलिस से मिली सटीक सूचना के आधार पर उसे समय रहते गिरफ्तार कर लिया गया। उसकी गिरफ्तारी ने सुरक्षा एजेंसियों को बड़ी राहत दी है।

मौलाना की बेटी ने 12 साल की उम्र में छोड़ा घर, बन गई शांति देवी: स्वामी श्रद्धानंद के अभियान से हिरोइन तबस्सुम की माँ ने खुद को किया ‘शुद्ध’, चिढ़ गए इस्लामी कट्टरपंथी

सदी भर पहले भारत में ‘शुद्धि अभियान’ चलाकर धर्मांतरित लोगों को वापस से हिंदू धर्म में लाने की शुरुआत करने वाले स्वामी श्रद्धानंद को कुछ समय बाद गुजरे हुए 100 साल बीत जाएँगे। स्वामी श्रद्धानंद ने अपना पूरा जीवन जिस तरह इस्लामी धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई थी उसके कारण उन्हें आज भी याद किया जाता है।

आज की स्थिति देख अंदाजा लगा सकते हैं कि उस दौर में इस्लामी ताकतों से लड़कर अपने धर्म की अलख जगाना कितना कठिन रहा होगा। ऐसा नहीं है कि उन्हें इस शुद्धि अभियान के कारण धमकियाँ नहीं आती थीं। 1915 में जब उन्होंने धर्म के प्रति लोगों को जगाना शुरू किया, उसकी के बाद से अक्सर इस्लामी ताकतें उन्हें अपने निशाने पर रखती थीं, लेकिन ये उनकी अपने धर्म के प्रति निष्ठा थी कि वो कभी पीछे नहीं हटे।

वैसे तो जाहिर है कि कई घटनाओं के कारण स्वामी श्रद्धानंद से कट्टरपंथी असुरक्षित महसूस करते होंगे, लेकिन एक घटना जिसका जिक्र बहुत कम सुनने को मिलता है आज हम उसे फिर साझा कर रहे हैं।

ये घटना टीवी जगत की जानी-मानी हस्ती तबस्सुम से जुड़ी है। तबस्सुम 80 के दशक में अपने शो ‘फूल खिले हैं गुलशन-गुलशन’ के जरिए हर घर मशहूर हुई थी। 2022 में उनका निधन हुआ तो लोग उनकी आवाज और अंदाज को याद करने लगे। इसी दौरान उनके द्वारा बताई उनकी माँ की एक कहानी स्वराज्य पप सामने आई जिसके तार स्वामी श्रद्धानंद से जुड़े थे।

तबस्सुम और उनकी माँ अजहरी बेगम जो बाद में शांति देवी बनीं
(फोटो साभार: स्वराज्य)

दरअसल, तबस्सुम की माँ का नाम अजहरी बेगम था जो कि एक मौलाना ताज मोहम्मद की बेटी थीं। शुरुआत में उन्हें तालीम के नाम पर कुरान को पढ़ाया गया, लेकिन अजहरी बेगम के मन में न जाने क्या आई, उन्होंने हिंदू धर्म के ग्रंथों को जानने की इच्छा जताई।

बचपन में परिवार के साथ अजहरी बेगम की तस्वीर (फोटो साभार: )

अजहरी की बात सुन उनके घरवाले बहुत नाराज हुए। उन्होंने अजहरी को अपने मजहब की बातें बताने का प्रयास किया लेकिन वह हिंदू धर्म के बारे में जानने की ठान चुकीं थीं। 12 साल की उम्र में अजहरी ने अपना घर छोड़ा और स्वामी श्रद्धानंद तक जा पहुँचीं। शुद्धि अभियान के तहत अजहरी बेगम का मार्गदर्शन हुआ और उनको शांति देवी नाम दिया गया।

अजहरी के परिजनों को जब इस संबंध में पता चला तो सब के सब बौखला उठे। उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद के पास जाकर उन्हें कहा कि वो उनकी बेटी को लौटा दें। लेकिन स्वामी जी ने जवाब दिया कि कोई शांति देवी को बिना उनकी मर्जी से कहीं नहीं ले जा सकता। वहीं शांति देवी ने भी कहा कि वह वापस अपने घर नहीं लौटेंगी।

इस घटना के बाद इस्लामी कट्टरपंथी तिलमिला चुके थे। उन्होंने मौका देख स्वामी श्रद्धानंद के खिलाफ झूठा अपहरण का केस दर्ज करा दिया, लेकिन कोर्ट में आरोप सिद्ध नहीं कर पाए। 4 दिसंबर 1926 को वह हर आरोप से बरी हो गए और दोबारा अपने अभियान पर आगे बढ़े।

उनकी यह जीत इस्लामी कट्टरपंथी बर्दाश्त नहीं कर पाए। ख्वाजा हसन निजामी और अब्दुल बारी जैसे लेखक उनके खिलाफ अपने मजहब के लोगों को भड़काने लगे। नतीजन 23 दिसंबर 1926 को एक अब्दुल राशीद नाम पर इस्लामी कट्टरपंथी उनकी बीमार अवस्था का फायदा उठाकर घर में घुसा और उन्हें एक साथ तीन गोली मारी…।

बताया जाता है कि स्वामी श्रद्धानंद उस समय तक 60 हजार लोगों को घरवापसी करवा चुके थे। ये भी मालूम हो कि उनके धर्म के प्रति निष्ठा के कारण महात्मा गाँधी ने उनसे दूरी भी बना ली थी। वो उन्हें भड़काऊ भाषण देने वाला कहते थे और उनकी तुलना उस इस्लामी विचारधारा से करते थे जो हर किसी को धर्मातरित करके मुस्लिम बनाने की बात कहती है। इतना ही नहीं गाँधी ने स्वामी जी के हत्यारे को ‘भाई’ तक कहकर संबोधित किया था।

जनसंख्या 13.8 लाख, आधार कार्ड बने 14.53 लाख… बांग्लादेशियों की घुसपैठ के लिए बदनाम झारखंड में एक और ‘कमाल’, रिपोर्ट में दावा- 5 जिलों में सामने आई गड़बड़ी

झारखंड के संथाल परगना समेत बाकी इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठ के संकेत लगातार मिल रहे हैं। एक रिपोर्ट में सामने आया है कि झारखंड के कई जिलों में जनसंख्या से कहीं अधिक आधार कार्ड बनाए जा चुके हैं। इसका आँकड़ा भी मौजूद है। इससे पहले वोटरों की संख्या में असामान्य बढ़ोतरी की बात भी सामने आई थी।

जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड के संथाल परगना के हिस्से साहिबगंज और पाकुड़ में अनुमानित जनसंख्या से कहीं अधिक आधार कार्ड बनाए जा चुके हैं। रिपोर्ट में आधार कार्ड बनाने वाली एजेंसी UIDAI और अनुमानित जनसंख्या के आँकड़ों की तुलना की गई है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि साहिबगंज की अक्टूबर, 2024 तक अनुमानित जनसंख्या 13.8 लाख थी जबकि यहाँ 14.53 लाख आधार कार्ड बन चुके हैं। इसी तरह पाकुड़ में भी अनुमानित जनसंख्या 10.89 लाख है लेकिन यहाँ 11.36 लाख आधार कार्ड बन चुके हैं। यानि इन दोनों जिलों में जनसंख्या किए मुकाबले 104% आधार कार्ड बने हैं।

इसी तरह का मामला लोहरदगा से भी सामने आया है। यहाँ 5.58 लाख की जनसंख्या पर 6.08 लाख आधार कार्ड बन चुके हैं। यानी यहाँ जनसंख्या के मुकाबले 108% आधार बने हैं। कमोबेश यही मामला कुछ और जिलों में हैं। इन आँकड़ों पर अब चिंता जताई गई है।

यह भी प्रश्न उठे हैं कि जब इन जिलों की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा खुद बाहर काम करने के लिए रहता है तो यहाँ आधार कार्ड में कैसे बढ़ोतरी हो गई। इस पूरे मामले के सामने आने के बाद सीधी सुई बांग्लादेशी घुसपैठियों की तरफ जा रही है। साहिबगंज और पाकुड़ जैसे इलाके पश्चिम बंगाल से सटे हुए हैं और यहाँ से बांग्लादेश भी दूर नहीं है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि केंद्र सरकार ने खुफिया एजेंसियों की एक टीम को संथाल परगना के जिलों में हाल ही में कुछ दिन के लिए भेजा था। यह टीम यहाँ से बांग्लादेशी घुसपैठ के सबूत लेकर लौटी है। इसने साहिबगंज के कई इलाकों का दौरा भी किया है।

यह पहला मामला नहीं है जब सरकारी आँकड़ों में असामान्य वृद्धि हुई हो। इससे पहले वोटर लिस्ट में भी असामान्य वृद्धि की बात कही गई थी। भाजपा ने इसको लेकर एक रिपोर्ट भी पेश की थी। भाजपा ने पाया था कि झारखंड की 10 विधानसभा सीटों के कुछ बूथ पर (विशेष कर मुस्लिम आबादी वाले बूथ) पर वोटरों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि पाँच वर्षों में हुई है।

भाजपा की रिपोर्ट में सामने आया था कि मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में वोटरों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़त 20% से 123% तक की है। यह बढ़त इन 10 विधानसभा के कुल 1467 बूथ पर हुई है। भाजपा ने कहा है कि सामान्यतः पाँच वर्षों में 15% से 17% की वृद्धि होती है, इसीलिए यह वृद्धि असामान्य है। भाजपा ने हिन्दू बूथों पर आबादी घटने की बात भी कही थी।

झारखंड में होने वाली अवैध घुसपैठ को लेकर हाई कोर्ट में एक मामला भी चल रहा है। दान्याल दानिश की याचिका पर हाई कोर्ट राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों के सर्वे और उनको बाहर निकले जाने के निर्देश तक दे चुका है। हालाँकि, राज्य की हेमंत सोरेन सरकार किसी भी प्रकार की घुसपैठ से इनकार करती आई है।

हेमंत सोरेन की सरकार ने इसको लेकर लीपापोती का प्रयास किया है। हाल ही में हाई कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान पूरे राज्य में सत्यापन का आदेश दिया था। सोरेन सरकार ने आनन-फानन में इस संबंध में समितियाँ बनाई और कुछ ही दिनों के भीतर हलफनामा दायर कर दिया कि राज्य कोई घुसपैठिया नहीं है।

केरल के सरकारी स्कूल में मन रहा था क्रिसमस, हिंदू कार्यकर्ताओं ने पूछा- जन्माष्टमी क्यों नहीं मनाते: टीचरों ने लगाया अभद्रता का आरोप, पुलिस ने किया गिरफ्तार

केरल के एक सरकारी स्कूल में ईसाई त्यौहार क्रिसमस मनाए जाने के दौरान कुछ हिन्दू कार्यकर्ता पहुँचे। उन्होंने सरकारी संस्थान में क्रिसमस मनाए जाने को लेकर प्रश्न खड़े किए। उन्होंने यह भी पूछा कि आखिर स्कूल में जन्माष्टमी क्यों नहीं मनाई जाती। इसके बाद उन्हें अभद्रता के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केरल के पलक्कड़ जिले के नल्लेपिल्ली में स्थित एक सरकारी स्कूल में शिक्षक और बच्चे शुक्रवार (20 दिसम्बर, 2024) को क्रिसमस मना रहे थे। यहाँ बच्चों ने क्रिसमस के लिए विशेष कपड़े पहन रखे थे और सजावट भी की गई थी।

इसी दौरान यहाँ बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े तीन कार्यकर्ता पहुँच गए। उन्होंने यहाँ कार्यक्रम के दौरान शिक्षकों से पूछताछ की। उन्होंने महिला प्रधानाचार्य से भी कुछ प्रश्न पूछे। उन्होंने कहा कि आखिर क्रिसमस का ही त्यौहार स्कूल में क्यों मनाया जा रहा है और इसी तरह हिन्दू त्यौहार क्यों नहीं मनाए जाते।

उन्होंने पूछा कि स्कूल में कृष्ण जन्माष्टमी क्यों नहीं मनाई जाती। कथित तौर पर इस दौरान उनकी यहाँ के शिक्षकों से बहस भी हुई। हालाँकि, यह मामला यहीं नहीं थमा। उनके खिलाफ इसके बाद मामला दर्ज कर लिया गया। उनके ऊपर आरोप लगाया गया कि उन्होंने शिक्षकों को अभद्र बातें बच्चों के सामने बोली।

रविवार (22 दिसम्बर, 2024) को तीनों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने इसके बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया, जिसने उन्हें 14 दिन की रिमांड पर भेज दिया। उन पर सरकारी कामकाज में बाधा डालने और धमकियाँ देने का आरोप लगाया गया है। पुलिस उनसे पूछताछ करके मामले की आगे जाँच कर रही है।

गिरफ्तार किए गए तीनों हिन्दू कार्यकर्ताओं का नाम K अनिलकुमार, मनमकुझी सुशासनन और थेक्कुमुरी वेलायुधन है। इनमें से अनिलकुमार पलक्कड़ जिले में विश्व हिन्दू परिषद के सचिव हैं जबकि सुशासनन बजरंग दल के जिला संयोजक हैं। वेलायुधन भी विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता हैं।

जिन 3 खालिस्तानी आतंकियों ने गुरदासपुर पुलिस चौकी पर फेंके थे ग्रेनेड, उनका UP के पीलीभीत में एनकाउंटर: 2 एके-47 के साथ ग्रोक पिस्टल और कारतूस बरामद

यूपी के पीलीभीत जिले में सोमवार (23 दिसंबर 2024) को खालिस्तानी कमांडो फोर्स के तीन आतंकियों को पुलिस एनकाउंटर में मार गिराया गया। ये आतंकी कुछ समय पहले पंजाब के गुरदासपुर पुलिस चौकी पर ग्रेनेड से हमला करने में शामिल थे। इस ऑपरेशन को यूपी और पंजाब पुलिस की संयुक्त टीम ने अंजाम दिया। मारे गए आतंकियों की पहचान गुरविंदर सिंह, वीरेंद्र सिंह उर्फ रवि और जसप्रीत सिंह उर्फ प्रताप सिंह के रूप में हुई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एनकाउंटर पीलीभीत के पूरनपुर इलाके में देर रात हुआ। पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि ये आतंकी इलाके में छिपे हुए हैं। इसके बाद पुलिस ने इलाके की घेराबंदी कर उन्हें आत्मसमर्पण के लिए कहा, लेकिन उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में तीनों आतंकी घायल हो गए। उन्हें तुरंत पूरनपुर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

पुलिस ने आतंकियों के पास से दो एके-47 राइफल, दो ग्लॉक पिस्टल और भारी मात्रा में कारतूस बरामद किए हैं। डीजीपी प्रशांत कुमार ने इस ऑपरेशन को बड़ी सफलता बताया। उन्होंने कहा कि यह दो राज्यों की पुलिस के बीच बेहतरीन तालमेल का परिणाम है। ऑपरेशन की अगुवाई पीलीभीत के एसपी अविनाश पांडेय ने की।

पुलिस के मुताबिक, मारे गए तीनों आतंकी गुरुदासपुर के रहने वाले थे। उनकी उम्र 18 से 25 साल के बीच थी। ये लोग खालिस्तानी कमांडो फोर्स के सदस्य थे और उत्तर प्रदेश के तराई इलाके में छिपे हुए थे।

इस ऑपरेशन में यूपी पुलिस की एसओजी और सर्विलांस टीम के साथ पंजाब पुलिस की टीम भी शामिल थी। डीजीपी ने कहा कि एनकाउंटर अपराधियों के लिए सख्त संदेश है कि कानून से बच पाना नामुमकिन है। उन्होंने कहा कि रविवार (22 दिसंबर 2024) की देर रात यूपी पुलिस और पंजाब पुलिस की टीम के साथ एनकाउंटर में तीनों आतंकियों को ढेर कर दिया गया।

किसी का पूरा शरीर खाक, किसी की हड्डियों से हुई पहचान: जयपुर LPG टैंकर ब्लास्ट देख चश्मदीदों की रूह काँपी, जली चमड़ी के साथ पीड़ित चिल्लाते हुए सड़कों पर भागे

राजस्थान की राजधानी जयपुर में शुक्रवार (20 दिसंबर 2024) को एलपीजी टैंकर में ब्लास्ट हुआ था। इस हादसे में अब तक 13 मौतें हो चुकी हैं। मृतकों में एक रिटायर्ड IAS भी शामिल हैं। लगभग 30 लोग बुरी तरह से झुलस गए हैं जिनका इलाज चल रहा है। अब इस हादसे के चश्मदीदों की आँखों देखी आपबीती सामने आ रही हैं। कई लोग तो ऐसे भी थे जो जान बचाने के लिए जलते हुए 2 किलोमीटर तक भागते रहे।

शुक्रवार की सुबह जयपुर के भांककोटा इलाके में एलपीजी गैस से भरे टैंकर को ट्रक ने टक्कर मार दी थी। इस टक्कर से लगभग 18 टन ज्वलनशील गैस सड़क सहित आसपास के पूरे इलाके में जोरदार धमाके से फ़ैल गई थी। धमाका इतना तेज था कि टैंकर से लगभग 300 मीटर दूर तक आग फ़ैल गई। इन परिधि में तमाम बस, ट्रक और बाइक के साथ खेतों में मौजूद किसान और आसपास के मकानों में रहने वाले लोग भी आ गए।

कई लोगों दिखे देवदूत की भूमिका में

TOI के मुताबिक सड़क पर जब आग फ़ैल गई थी तो टैंकर के आसपास मौजूद कई वाहनों से लोग उतर कर खेतों की तरफ भागे। इसमें कई लोग ऐसे भी थे जिनके कपड़े और खाल जल चुकी थी। हालाँकि जान बचाने के लिए वो मदद की आस में बदहवास हो कर भागते रहे। काफी दूर चल कर उन्हें एक फार्म हाउस में शरण मिली। फार्म हाउस के मालिक भंवर लाल ने भी हादसे में शिकार लोगों को लहूलुहान हालत में अपने दरवाजे पर देखा। लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे। भंवर लाल ने उनकी यथासंभव मदद भी की।

जिस जगह टैंकर में ब्लास्ट हुआ वहाँ पास ही कंडोई अस्पताल है। इस अस्पताल की तरफ खेतों की दिशा से भाग रहे कई लोग अंत में यहाँ की चारदीवारी के पास आ कर रुक गए। ये सभी जल्द से जल्द अस्पताल में घुसना चाह रहे थे लेकिन लगभग झुलसी अवस्था में लगभग 8 फ़ीट ऊँची चारदीवारी को फाँद पाना उनके लिए सम्भव नहीं था। इसी दौरान पास ही के एक किसान राकेश सैनी ने पीड़ितों के लिए सीढ़ी का इंतजाम किया। इसी सीढ़ी से तमाम घायल अस्पताल कैम्पस में पहुँच पाए। खुद राकेश ने उन्हें सहारा दिया।

कंडोई अस्पताल डॉ रमन का है। वो मौके पर मौजूद मिले। डॉ रमन के मुताबिक लगभग 30 लोग बुरी तरह से झुलसे हुए थे जो दर्द से कराह रहे थे। इन सभी को तत्काल उपलब्ध संसाधनों से इलाज दिया गया। ज्यादा गंभीर घायलों को SMS (सवाई मान सिंह) अस्पताल में शिफ्ट करवाया गया।

मंजर याद कर के सिहर रहे हैं पीड़ित

जिस ट्रक से टैंकर में टक्कर हुई उसे मैनपुरी UP के संजेश यादव चला रहे थे। संजेश यादव के अंतिम संस्कार के लिए उनके भाई को पोटली में बँधी कुछ हड्डियाँ मिल पाईं। उनका पूरा शरीर जल गया। हड्डियाँ पाने के लिए भी संजेश के भाई इंद्रजीत को अपना DNA सैम्पल देना पड़ा था। वहीं घटनास्थल से गुजर रही एक बस में सवार नरेश कुमार मीणा ने भास्कर को बताया कि उनको पहले एलपीजी की तेज गंध आई। कोई कुछ समझ पता इसे से पहले जोरदार धमाका हुआ और हर तरफ आग ही आग फ़ैल गई।

नरेश कुमार मीणा ने बताया कि आग लगते ही भगदड़ और चीख पुकार मच गई। जिसे जिधर भी जगह दिखी वो उसी तरफ भगा। जिस स्लीपर बस में नरेश सवार थे वो आग का गोला बन गई। लगभग आधे दर्जन झुलसे साथियों के साथ नरेश कुमार अस्पताल में अपना इलाज करवा रहे हैं। घटनास्थल से अपनी पिकअप ले कर गुजर रहे गजराज सिंह तंवर ने बताया कि उनको चारों तरफ धूल का गुबार नजर आया था। तभी आग लग गई। लगभग 400 मीटर भाग कर गजराज सिंह ने अपनी जान बचाई।

गजराज की दोनों जाँघें बुरी तरह से झुलस गई हैं। उनके पीछे लगभग 1 दर्ज लोग जान बचाने के लिए चिल्लाते हुए दौड़ रहे थे। हालाँकि उनमें से कुछ दीवाल तक नहीं पहुँच पाए। एक अन्य चश्मदीद दीवान सिंह ने बताया कि धमाके के समय वो एक स्लीपर बस में सवार थे। कुछ ही देर में बस के अंदर धुँआ ही धुँआ हो गया। अंदर दम घुटने लगा तो दीवान सिंह ने बस का काँच तोड़ दिया और बाहर निकल गए। अफरातरफरी में कई कई लोग ऐसे भी रहे तो तमाम कोशिशों के बावजूद बस से बाहर नहीं आ पाए।

बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस आई एक्शन में, अब तक 175 की हुई पहचान: LG ऑफिस के आदेश के बाद कार्रवाई, जल्द सब भेजे जाएँगे अपने मुल्क

दिल्ली पुलिस ने राष्ट्रीय राजधानी में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चलाते हुए 175 संदिग्ध व्यक्तियों की पहचान की है। अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ ये अभियान शनिवार (21 दिसंबर 2024) की शाम 6 बजे से बाहरी दिल्ली क्षेत्र में शुरू हुआ और लगातार 12 घंटे तक चला। पुलिस का यह कदम दिल्ली में बिना वैध दस्तावेजों के रह रहे व्यक्तियों पर सख्त कार्रवाई के आदेश के बाद आया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजधानी दिल्ली में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान के लिए यह अभियान 11 दिसंबर को शुरू किया गया था। इससे ठीक एक दिन पहले उपराज्यपाल सचिवालय ने इन व्यक्तियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए थे। पुलिस ने बिना दस्तावेज वाले प्रवासियों की बढ़ती संख्या को लेकर चिंता जाहिर करते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है।

बाहरी जिले के पुलिस अधिकारी ने बताया कि स्थानीय थानों, विशेष इकाइयों और जिला विदेशी प्रकोष्ठ के अधिकारियों की विशेष टीमों को गठित किया गया है। इन टीमों को घर-घर जाकर जाँच करने और संदिग्ध प्रवासियों की जानकारी जुटाने का निर्देश दिया गया है। अभियान के दौरान 175 लोगों की पहचान की गई, जो बिना वैध दस्तावेजों के रह रहे थे।

दिल्ली पुलिस ने बताया कि जिन व्यक्तियों की पहचान की गई है, उनसे गहन पूछताछ की जा रही है। उनके दस्तावेजों की जाँच की जा रही है और उनके स्थानीय संपर्कों के माध्यम से सत्यापन किया जा रहा है। इन जाँचों के परिणामों के आधार पर कानूनी प्रावधानों के तहत आगे की कार्रवाई की जाएगी।

पुलिस ने यह भी कहा कि दिल्ली में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों की संख्या में इजाफा हो रहा है, जिससे सुरक्षा को खतरा हो सकता है। बाहरी जिला पुलिस ने इन व्यक्तियों को हिरासत में लेने और उन्हें उनके मूल स्थान पर वापस भेजने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि किसी भी अवैध गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और अवैध प्रवासियों के खिलाफ यह अभियान आगे भी चलता रहेगा, जिससे सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।