उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में एक 120 साल पुराने मंदिर पर मुस्लिमों के कब्जे का मामला सामने है। यह पंच शिखर शिव मंदिर एक दलित जेठूराम ने बनवाया था, जो पिछले 20 सालों से मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों के कब्जे में था। इस कब्जे के बाद मंदिर में पूजा-पाठ बंद करवा दी गई थी। ग्रामीणों की शिकायत पर प्रशासन ने जाँच शुरू कर दी है और मंदिर की मुक्ति व जीर्णोद्धार की माँग की गई है। इस बीच, संभल में एक कुएँ में जलधारा मिली है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये मामला अमेठी के मुसाफिरखाना थाना इलाके का है। यहाँ गाँव औरंगाबाद के ग्रामीणों ने एक मंदिर पर कब्ज़े की शिकायत अमेठी के ADM से की है। ग्रामीणों का आरोप है कि उनके 120 साल पुराने आस्था केंद्र पंच शिखर शिव मंदिर पर मुस्लिमों ने कब्ज़ा जमा लिया है। इस मंदिर को तब जेठूराम नाम के एक दलित ने बनवाया था। लगभग 2 दशक पहले किए गए इस कब्ज़े के बाद वहाँ पूजापाठ भी बंद करवा दी गई।
ग्रामीणों ने बताया कि औरंगाबाद के इस मंदिर की देखरेख पहले पुजारी गणेश तिवारी और उनका परिवार करता था। लेकिन करीब दो दशक पहले उन्हें पलायन करना पड़ा। ग्रामीणों का कहना है कि इसके बाद मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने मंदिर पर कब्जा कर लिया। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है।
इस मामले में भाजपा कार्यकर्ता भी सक्रिय हो गए हैं और अवैध कब्जेदारों पर कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। अमेठी की ADM ने इस मामले की जाँच स्थानीय तहसीलदार को सौंप दी है। जाँच रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
संभल के बंद पड़े कुएँ में मिली जलधारा
इस बीच संभल में कब्ज़े के शिकार कुओं की तलाश में एक नया मोड़ आया है। संभल जिले के नैमिषारण्य तीर्थ क्षेत्र में एक पुराने कुएँ से जलधारा फूटने की खबर ने लोगों को उत्साहित कर दिया है। महंत बालयोगी दीनानाथ ने खुदाई के दौरान इस कुएँ को खोजा, जिसमें 20 फीट नीचे जलधारा बहती मिली। जलधारा मिलने की सूचना पर यहाँ भक्तों की भीड़ जुटने लगी है।
बता दें कि संभल के जिलाधिकारी राजेंद्र पैंसिया और पुरातत्व विभाग (ASI) ने जिले के 19 प्राचीन कुओं और 68 तीर्थों की खोज के लिए अभियान छेड़ रखा है। अब तक 22 सूखे कुएँ खोजे जा चुके हैं। प्रशासन इन स्थानों को पुनर्जीवित करने की दिशा में प्रयासरत है।
उत्तर प्रदेश में तराई के जिले पीलीभीत में सोमवार (23 दिसम्बर, 2024) को सुबह-सुबह तीन खालिस्तानी आतंकियों का एनकाउंटर हो गया। यह तीनों पंजाब के गुरदासपुर में एक पुलिस चौकी पर ग्रेनेड हमला करके भागे थे। यह यूपी के पीलीभीत से नेपाल जाने की जुगत में थे। हालाँकि, इससे पहले ही पंजाब पुलिस को इनकी सूचना मिल गई और यूपी पुलिस ने इसके बाद इन तीनों को ढेर कर दिया। इनके एनकाउंटर के बारे में अब कई जानकारियाँ सामने आई हैं। यह भी पता चला है कि इनका हैंडलर एक ब्रिटिश सिख सैनिक है।
कैसे लगा आतंकियों का सुराग?
इन आतंकियों ने 19 दिसम्बर, 2024 को गुरदासपुर के बटाला में एक पुलिस चौकी पर हमला किया था। इसके बाद गुरविंदर, वीरेंद्र और जशनप्रीत, तीनों ही गायब हो गए थे। पंजाब पुलिस लगातार इनकी तलाश में लगी हुई थी। यह वहाँ से सैकड़ों किलोमीटर भाग कर यूपी के पीलीभीत आए थे। पंजाब पुलिस ने इनका पता लगाने के लिए सर्विलांस लगाया हुआ था। हालाँकि, इनका फोन ऑफ था। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि इन आतंकियों ने एक ऐसे एप पर हमले की वीडियो डाली थी, जो इन्हीं कामों के लिए इस्तेमाल होता है।
पंजाब पुलिस ने इस वीडियो के शेयर उनकी लोकेशन ट्रेस की। इसके बाद वह यूपी के पीलीभीत पहुँची। वहीं यह भी सामने आया कि इन आतंकियों ने कुछ समय के लिए अपना फोन ऑन किया था, इससे भी इनके बारे पता चला। इसके बाद दोनों जगह की पुलिस ने अपना ऑपरेशन चलाया और तीनों को मार गिराया गया। इन आतंकियों से जहाँ पर मुठभेड़ हुई, वह पूरनपुर का इलाका है और यहाँ सिख आबादी काफी है। यह इलाका जंगली भी है, जिससे छिपने में आसानी होती है। आतंकियों के पास से बरामद हुई बाइक भी चोरी की थी।
इनका सरगना अब पाकिस्तान में
पीलीभीत में मार गिराए गए तीनों आतंकी खालिस्तान जिंदाबाद फ़ोर्स नामक आतंकी संगठन का हिस्सा थे। इसका मुखिया रंजीत सिंह उर्फ़ नीता है। वह मूल रूप से जम्मू का रहने वाला है। वह वर्तमान में पाकिस्तान भाग चुका है और वहीं से अपनी आतंकी गतिविधि चलाता है। उसने 1993 में यह संगठन बनाया था। शुरुआत में वह अपने आतंकी जम्मू क्षेत्र से ही जुटाता था। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, इसका मुख्य निशाना जम्मू से दिल्ली चलने वालीं बसें रही हैं।
यह संगठन 2009 में एक सिख धर्मगुरु की हत्या में भी शामिल रहा है। यहाँ तक कि इसने ऑस्ट्रिया के विएना में भी एक सिख धर्मगुरु की हत्या करवाई थी। बीते कुछ समय से इस समूह ने अपना ट्रैक बदल लिया है। अब यह पुलिस को निशाना बना रहा है। पंजाब में हाल के वर्षों में कई पुलिस चौकी या थानों को निशाना बनाया गया है। हाल में गुरदासपुर में हुआ हमला भी इसी नीयत से किया गया था। इस संगठन का नेटवर्क भारत के अलावा ब्रिटेन, ग्रीस समेत बाकी कई देशों में भी है।
ब्रिटिश सैनिक था तीनों आतंकियों का हैंडलर
इस एनकाउंटर से एक और चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। पंजाब पुलिस के मुखिया गौरव यादव ने इस एनकाउंटर की सफलता के बाद बताया है कि इस पूरे आतंकी नेटवर्क को सरगना नीता के जरिए ग्रीस में बैठा जसविंदर सिंह मन्नू चलाता है। इसी से ब्रिटिश सैनिक जगजीत सिंह जुड़ा हुआ है। यह ब्रिटिश सैनिक मूल रूप से भारत का ही निवासी है। उसने अपना एक दूसरा नाम भी रख लिया है। अब वह अपने आप को फ़तेह सिंह बागी बताता है। जगजीत सिंह लगभग 10 वर्ष पूर्व भारत से इंग्लैंड पढ़ने के लिए गया था।
In a joint operation against, #Pakistan's ISI operative in Punjab, a collaborative effort between UP Police & Punjab Police led to an encounter with three operatives of KZF in the jurisdiction of PS Puranpur, Pilibhit. Recovery: Two AK rifles and two Glock pistols
इसके बाद वह यहाँ की सेना में शामिल हो गया। उसने अफगानिस्तान में भी ब्रिटिश फ़ौज को अपनी सेवाएँ दी हैं। आशंका है कि इसी जगजीत सिंह ने गुरदासपुर में चौकी पर ग्रेनेड से हमला करवाया है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि उसका परिवार भारतीय सेना में रहा है। उसके पिता और दादा भी भारतीय सेना में अलग-अलग पदों पर रहे हैं जबकि उसका एक भाई भी भारतीय सेना में रहा है। बताते हैं कि वह इन खालिस्तानी हमलों को सोशल मीडिया पर डालता है और सिख युवाओं को बरगलाता है। उसके ISI से भी लिंक तलाशे जा रहे हैं।
कई सवालों के जवाब अब भी नहीं
इस एनकाउंटर के बाद भी कई सवालों के जवाब अभी नहीं मिले हैं। पुलिस अभी यह नहीं बता पाई है कि आखिर यह पंजाब से यूपी के भीतर कैसे पहुँचे। इसके अलावा यह भी नहीं सामने आया अहि कि आखिर इन्होने भागने के लिए पीलीभीत ही क्यों चुना। हमले के दो दिन तक वह यहाँ रहे तो उन्हें यहाँ शरण किसने दी और वह किस होटल में रुके। इसके अलावा उनके खाने-पीने से लेकर बाकी इंतजाम किसने किया। पुलिस को यह भी नहीं मालूम हो पाया है कि यह नेपाल किस रस्ते से जाने वाले थे।
पुलिस को एनकाउंटर में आंतकियों के पास से 2 AK-47 समेत विदेशी पिस्टल भी मिली हैं। इन हथियारों का स्रोत क्या है, यह जानकारी भी अभी सामने नहीं आई है। इन आतंकियों के स्थानीय स्तर पर क्या कनेक्शन थे, इन सवालों के जवाब पुलिस तलाश रही है। जिस खालिस्तानी आतंकी संगठन से यह जुड़े हुए थे, क्या उसकी जड़ें यूपी के पीलीभीत या फिर सिख जनसंख्या वाले लखीमपुर खीरी में भी हैं, इस बात की जाँच भी हो रही है।
एनकाउंटर तो हुआ, लेकिन खतरा बरकरार
पीलीभीत में तीन आतंकियों का एनकाउंटर से और कई चिंताएँ सामने आ गई हैं। दरअसल, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत और लखीमपुर खीरी ऐसे जिले हैं, जहाँ लाखों में सिख जनसंख्या है। यह दोनों जिले 1980 और 1990 में खालिस्तानी आंतक से ग्रसित रहे हैं। लखीमपुर खीरी और पीलीभीत में 1980 और 1990 में खालिस्तानियों ने बड़े हमले किए हैं। ऐसे ही एक हमले में 29 तो दूसरे में 7 लोगों की हत्या कर दी थी। इसके अलावा भी कई बड़े हमले हुए, जिनमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए।
दोनों ही जिलों में बड़े जंगल हैं और यहाँ सिखों के जनसंख्या से दूर बने हुए झाले (फ़ार्महाउस) भी हैं। बीते कुछ सालों में गाड़ियों पर भिंडरावाले की फोटो भी दिखी है। पूरनपुर में बीते दिनों एक मोटरसाइकिल पर सवाल कुछ सिख छात्रों ने काले झंडे लहराए थे और नारे भी लगाए थे। इसके अलावा यहाँ से कुछ वर्ष पहले भी खालिस्तानी आतंकी पकड़े गए थे। इन्होने पंजाब के नाभा में जेल से आतंकियों को भागने में मदद की थी। लखीमपुर में जब गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के कायर्क्रम में बवाल हुआ था तो भी यहाँ एक युवक भिंडरावाले की टीशर्ट पहने नजर आया था।
यहाँ तक कि खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह को जब पुलिस तलाश रही थी तो उसके भी पीलीभीत में होने की बात सामने आई थी। ऐसे में इस चरमपंथ के फिर से सर उठाने का खतरा अब भी बरकरार है। सुरक्षा एजेंसियों की चौकसी के चलते बीते कुछ वर्षों में कोई घटना नहीं हुई है। यदि वह यही चौकसी बनाए रखती हैं तो तराई का इलाका शांत रहेगा।
बांग्लादेश में एक चौंकाने वाली घटना में प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल हई कानू का अपमान किया गया। कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी के समर्थकों ने उन्हें जूतों की माला पहनाई और धमकाया। यह घटना कॉमिल्ला जिले के चौद्ग्राम में हुई, जहाँ ‘बीर प्रतीक’ से सम्मानित अब्दुल हई कानू को उनके गाँव लुडियारा में लौटने के बाद निशाना बनाया गया।
इस अपमानजनक कृत्य का वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया है। जिसमें 10-12 लोग कानू को घेरकर उनसे माफी माँगने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इनमें से कुछ लोगों ने उन्हें गाँव छोड़ने की धमकी दी।
A proud freedom fighter, Abdul Hai Kanu, who served during the Liberation War, has been humiliated by being forced to wear a garland of shoes! Kanu, a revered freedom fighter from the Chauddagram upazila of Comilla, was abducted from his own home this morning by a group of… pic.twitter.com/qEIyIjKJ7Q
खबरों में बताया गया है कि कानू को धमकाने वाले लोगों में एक व्यक्ति दुर्दांत आतंकी था जो 2006 में दुबई चला गया था और यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार बनने के बाद वापस लौटा है। कानू ने आरोप लगाया कि जमात की राजनीति से जुड़े अबुल हाशम मजूमदार और वाहिद मजूमदार ने हमले का नेतृत्व किया। जमात-ए-इस्लामी साल 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान का समर्थन करने के लिए कुख्यात रही है।
बांग्लादेशी न्यूज पोर्टल ने कानू के हवाले से कहा, “मैंने सोचा था कि इस बार मैं गांव में आराम से रह सकूँगा। मगर उन्होंने मेरे साथ पाकिस्तानी जंगली जानवरों से ज्यादा हिंसक व्यवहार किया।”
साल 1971 में पाकिस्तान से मुक्ति के लिए लड़े गए संग्राम की वजह से कानू को बांग्लादेश के चौथे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘बीर प्रतीक’ से सम्मानित किया गया था। कानू को 426 लोगों के साथ ये सम्मान मिला था।
चौद्दाग्राम पुलिस थाने के इंचार्ज अख्तरुज जमान ने कहा कि हम आरोपितों को पकड़ने के लिए तलाशी अभियान चला रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई पकड़ में नहीं आया है। उन्होंने कहा, ‘हमने 12-14 अपराधियों की पहचान कर ली है और उन्हें पकड़ने के लिए छापेमारी कर रहे हैं।”
बहरहाल, घटना की जाँच के आदेश दिए गए हैं। वहीं, कानू के परिवार ने बताया कि वे मानसिक रूप से टूट चुके हैं और अपने घर छोड़कर चले गए हैं।
जमात-ए-इस्लामी क्या है?
जमात-ए-इस्लामी एक कट्टरपंथी इस्लामी राजनीतिक दल है, जो 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना के साथ खड़ा था। इसे देशद्रोही गतिविधियों और बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। शेख हसीना की सरकार ने इसे आतंकवाद से जोड़कर प्रतिबंधित कर दिया था। हालाँकि शेख हसीना सरकार के पतन के बाद इस पर से युनुस सरकार ने बैन हटा लिया, जिसके बाद से ये पूरे बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं और आवामी लीग से जुड़े लोगों को निशाना बना रही है।
अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने विवादास्पद बयानों और साहसिक फैसलों के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में उन्होंने फिर से पनामा नहर और ग्रीनलैंड को लेकर चर्चा छेड़ दी। ट्रंप ने न केवल पनामा नहर को अमेरिका के नियंत्रण में लेने की इच्छा जताई बल्कि ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने का भी प्रस्ताव रखा। यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने इन मुद्दों पर अपनी दिलचस्पी दिखाई है। इस लेख में हम इन दोनों स्थानों की सामरिक और आर्थिक महत्ता को विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।
पनामा नहर: एक ऐतिहासिक और सामरिक धरोहर
पनामा नहर एक 82 किलोमीटर लंबा जलमार्ग है जो अटलांटिक महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है। यह नहर समुद्री व्यापार का एक मुख्य केंद्र है, जो वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पनामा नहर बनाने का सपना 16वीं सदी से देखा जा रहा था। 1513 में वास्को नुनेज़ डी बाल्बोआ ने इस विचार को जन्म दिया। उन्होंने पाया कि एक ऐसा जलमार्ग जो अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ सके, व्यापार और यात्रा को सरल बना सकता है। क्योंकि अगर किसी को पानी के रास्ते एशिया से अमेरिका महाद्वीपों के पूर्वी इलाकों में जाना होता तो उसके लिए एकमात्र विकिल्प यही थी की वह पहले दक्षिणी अमेरिका के निचले सिरे तक जाता और फिर उत्तर की ओर जाता। इसमें उसे हजारों किलोमीटर का सफर करना होता था, लेकिन नहर बनने के बाद 12874 किलोमीटर का सफर बचने लगता। ऐसे में फ्रांस ने 1881 में इस परियोजना को शुरू किया, लेकिन कठिन भौगोलिक स्थितियों, बीमारियों और वित्तीय समस्याओं के कारण इसे पूरा नहीं कर सका।
साल 1904 में अमेरिका ने इस परियोजना को अपने हाथ में लिया और 10 वर्षों की कड़ी मेहनत और 375 मिलियन डॉलर के निवेश के बाद 1914 में इसे पूरा किया गया। इस नहर के निर्माण में 5,609 मजदूरों ने अपनी जान गंवाई। इसे बनाने में गेट और लॉक सिस्टम जैसी नई तकनीकों का इस्तेमाल किया गया, जो जलस्तरों के अंतर को संतुलित करने के लिए उपयोगी साबित हुई। नहर के जरिए एशिया और अमेरिका के बीच व्यापारिक दूरी 12,874 किलोमीटर तक घट जाती है।
पहले अमेरिका ही करता था नहर का संचालन
इस नहर का संचालन पहले अमेरिका ही करता था, लेकिन साल 1977 में अमेरिका और पनामा के बीच हुए टोरीजोस-कार्टर संधि के तहत धीरे-धीरे साल 1999 से नहर का संचालन पूरी तरह से पनामा को सौंप दिया गया। पनामा नहर प्राधिकरण (Panama Canal Authority) इसका प्रबंधन करता है। यह नहर पनामा की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है, जिससे देश को वार्षिक आय का लगभग पाँचवाँ हिस्सा मिलता है। हर साल लगभग 14,000 जहाज इस नहर से गुजरते हैं। मोटे अनुमानों के मुताबिक, वैश्विक समुद्री व्यापार का 6% हिस्सा इस नहर से होकर गुजरता है।
पनामा नहर का सामरिक महत्व: पनामा नहर केवल व्यापार के लिए ही नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह नहर समुद्री मार्गों की लंबाई को हजारों किलोमीटर तक घटा देती है। इसके अलावा, इसका उपयोग युद्धपोतों और आपातकालीन राहत सामग्री को जल्दी से ले जाने के लिए किया जा सकता है।
दरअसल, अमेरिकी दक्षिणी कमान ने इन चीनी निवेशों के बारे में चिंता व्यक्त की थी। उसका कहना है कि पीपीसी के माध्यम से नहर के दोनों छोर की बंदरगाहों पर चीन के नियंत्रण ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है। पीपीसी एक हांगकांग स्थित कंपनी है, जिसका बीजिंग के साथ मजबूत संबंध है। इस नियंत्रण से चीन को नहर पर पर्याप्त नियंत्रण मिलता है।
ग्रीनलैंड में भी डोनाल्ड ट्रंप की दिलचस्पी
पनामा नहर ही नहीं, डोनाल्ड ट्रंप की नजर ग्रीनलैंड पर भी है। दरअसल, ग्रीनलैंड, आर्कटिक महासागर के पास स्थित, दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। यह डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है और प्राकृतिक संसाधनों, जैसे खनिज, तेल और गैस के लिए जाना जाता है। ग्रीनलैंड का भौगोलिक महत्व इसकी आर्कटिक स्थिति के कारण है। यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन और वैश्विक सुरक्षा के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
साल 2019 में डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव दिया था, जिसे डेनमार्क ने खारिज कर दिया। ट्रंप का तर्क था कि ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधन और भू-राजनीतिक स्थिति अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। दरअसल, ग्रीनलैंड में तेल, गैस और खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों के बड़े भंडार हैं। यह भविष्य में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। वहीं, आर्कटिक क्षेत्र में ग्रीनलैंड की स्थिति इसे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। अमेरिका इस क्षेत्र में चीन और रूस के प्रभाव को कम करना चाहता है।
पनामा नहर को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के दी कैसी धमकी?
दरअसल, अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पनामा से पनामा नहर पर शुल्क कम करने और इसे अमेरिकी नियंत्रण में वापस करने की माँग की है। उन्होंने मध्य अमेरिकी देश पर अमेरिकी शिपिंग और नौसैनिक जहाजों से ‘अत्यधिक कीमत’ वसूलने का आरोप लगाया।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रविवार को एरिजोना में समर्थकों की भीड़ से उन्होंने कहा, “पनामा द्वारा लगाए जा रहे शुल्क हास्यास्पद और बेहद अनुचित हैं।” उन्होंने कहा, “हमारे देश के साथ यह पूरी तरह से धोखा तुरंत बंद हो जाएगा।” उनका इशारा अगले महीने पदभार ग्रहण करने पर था। इससे पहले शनिवार को उन्होंने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर लिखा कि पनामा नहर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा में ‘महत्वपूर्ण भूमिका’ निभाती है।
पनामा के राष्ट्रपति होजे राउल मुलिनो ने ट्रंप के बयान को उनकी संप्रभुता पर हमला बताया। पनामा के राष्ट्रपति जोस राउल मुलिनो ने कहा कि नहर ‘पनामा के हाथों में बनी रहेगी।’ उन्होंने कहा कि नहर का हर इंच पनामा का है और रहेगा। पनामा नहर प्राधिकरण ने भी ट्रंप के आरोपों को खारिज किया और कहा कि शुल्क का निर्धारण व्यावसायिक जरूरतों और विशेषज्ञों की राय के आधार पर किया जाता है।
ट्रंप की विदेश नीति और कूटनीतिक प्रभाव
ट्रंप का बयान उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा है। वैसे, ट्रंप का यह कदम चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। हांगकांग स्थित कंपनियों का नहर के प्रवेश द्वारों पर नियंत्रण अमेरिका के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
पनामा नहर और ग्रीनलैंड दोनों ही सामरिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। ये दोनों स्थान भू-राजनीतिक रणनीतियों के केंद्र में हैं। भले ही डोनाल्ड ट्रंप के बयान महत्वपूर्ण हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अमेरिका द्वारा अब पनामा नहर को वापस लेना संभव नहीं है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप के ये बयान अमेरिका-पनामा, अमेरिका-डेनमार्क के बीच के संबंधों को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस की सरकार ने सोमवार (23 दिसंबर 2024) अपदस्थ प्रधानमंत्री एवं आवामी लीग की नेता शेख हसीना के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया। उसने भारत से शेख हसीना को उसे सौंपने की भी माँग की है। इसके लिए यूनुस सरकार ने भारत को एक राजनयिक पत्र भी लिखा है। दरअसल, 5 अगस्त 2024 को तख्तापलट के बाद शेख हसीना भारत आ गई थीं। तब से यहीं हैं।
दरअसल, यूनुस सरकार ने शेख हसीना के खिलाफ हत्या, अपहरण और देशद्रोह जैसे गंभीर आरोपों में 225 से अधिक केस दर्ज किए हैं। इन मामलों में सुनवाई के तहत बांग्लादेश के अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) ने शेख हसीना और उनकी कैबिनेट के कई मंत्रियों, सलाहकारों तथा सैन्य एवं सिविल अधिकारियों के खिलाफ मानव अपराध और नरसंहार के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं।
बांग्लादेश ने यह भी शेख हसीना को लेकर यह भी चेतावनी दी है कि पूर्व प्रधानमंत्री की भारत में रहने और लगातार बयान देने से भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन ने कहा, “हमने भारत सरकार को एक मौखिक नोट भेजा है, जिसमें कहा गया है कि बांग्लादेश न्यायिक प्रक्रिया के लिए हसीना को वापस चाहता है।”
वहीं, बांग्लादेश के गृह सलाहकार जहाँगीर आलम ने कहा कि उनके कार्यालय ने भारत से शेख हसीना के प्रत्यर्पण के लिए विदेश मंत्रालय को एक पत्र भेजा है। बांग्लादेश और भारत के बीच प्रत्यर्पण संधि पहले से ही मौजूद है। बांग्लादेश के कानून सलाहकार आसिफ नजरूल ने कहा था कि अगर संधि के किसी प्रावधान का हवाला देकर भारत प्रत्यर्पण से इनकार करता है तो बांग्लादेश इसका विरोध करेगा।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने पिछले महीने अपनी सरकार के 100 दिन पूरे होने पर कहा था कि वे 77 वर्षीय शेख हसीना के प्रत्यर्पण की माँग करेंगे। उन्होंने कहा था, “हमें हर हत्या में न्याय सुनिश्चित करना है।” बता दें कि 5 अगस्त को बांग्लादेश के छात्रों ने 16 साल पुरानी उनकी सरकार का तख्ता पलट दिया था।
भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण समझौता
भारत और बांग्लादेश के बीच साल 2013 से ही प्रत्यर्पण संधि है। साल 2016 में इसे संशोधित किया गया था। यह संधि उग्रवाद और आतंकवाद के मुद्दे से निपटने के उद्देश्य से किया गया था। उस समय भारत के उत्तर-पूर्व राज्यों के उग्रवादी समूह के अपराधी किसी घटना को अंजाम देने के बाद भागकर बांग्लादेश में छिप जा रहे थे। वहीं, बांग्लादेश के प्रतिबंधित जमात उल मुजाहिदीन के आतंकी भारत में आ जा रहे थे।
इस प्रत्यर्पण संधि में अपराधियों, उग्रवादियों और आतंकियों आदि के प्रत्यर्पण की बात है। इसमें राजनीतिक प्रत्यर्पण की बात नहीं है। इसमें साफ कहा गया है कि भारत राजनीति से जुड़े किसी भी व्यक्ति के प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है, लेकिन अगर उस व्यक्ति पर हत्या और किडनैपिंग जैसे संगीन मामले दर्ज हो तो उसके प्रत्यर्पण को रोका जा नहीं सकता है। हालाँकि, साल 2016 में इस संधि में एक संशोधन किया गया।
इस संशोधन के मुताबिक, प्रत्यर्पण की माँग करने वाले देश को अपराध के सबूत देने की जरूरत भी नहीं है। इसके लिए कोर्ट से जारी वारंट ही काफी है। ये संशोधन हसीना के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती हैं। प्रत्यर्पण समझौते के अनुच्छेद 8 में कहा गया है कि ऐसे मामले, जिनमें आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हों या फिर अगर आरोप सैन्य अपराधों से जुड़े हों जो सामान्य आपराधिक कानून के तहत मान्य नहीं हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है।
बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटाए जाने के बाद हिन्दुओं पर अत्याचार लगातार जारी है। मोहम्मद यूनुस सरकार के अंतर्गत हिन्दू लगातार निशाना बन रहे हैं, उनके मंदिर तोड़े जा रहे हैं। विदेशी मीडिया हमेशा की तरह हिन्दुओं के विरुद्ध हो रहे अत्याचारों पर आँख मूँद चुकी है। लेकिन इस पूरे खेल में भारत का वामपंथी मीडिया पोर्टल द वायर भी पीछे नहीं है। वायर लगातार प्रयास कर रहा है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को लेकर पर्दा डाला जाए।
द वायर का ध्यान बांग्लादेश में हो रहे हिन्दुओं की पीड़ा दिखाने बजाय इस बात पर ज्यादा रहा कि आखिर कौन दूसरा भारतीय पोर्टल कथित तौर पर झूठ फैला रहा है। अगस्त 2024 के बाद द वायर द्वारा प्रकाशित 10 रिपोर्टों, इंटरव्यू और लेखों का विश्लेषण हमने किया है। इसमें साफ दिखता है कि वायर ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों को कम करके दिखाया है।
21 दिसंबर, 2024 को ही, द वायर ने लोकसभा में विदेश मंत्रालय के एक जवाब पर बांग्लादेशी सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया का हवाला देते हुए एक रिपोर्ट छापी। विदेश मंत्रालय ने बताया था कि 2024 में बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की 2,200 घटनाएँ हुई हैं।
स्रोत: द वायर
यहाँ पर द वायर ने भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के विरोध में बांग्लादेश सरकार की जानकारी रखी। द वायर ने बांग्लादेशी प्रेस विंग के हवाले से दावा किया कि जनवरी और नवंबर 2024 के बीच हिंसा की केवल 138 घटनाएँ हुई हैं। वायर ने ले-देकर वही कहा जो बांग्लादेश दावा कर रहा है।
इसी तरह 12 दिसंबर, 2024 को वायर में पार्थ एस घोष ने एक लेख लिखा। इस लेख में घोष ने बांग्लादेश में हिंदुओं तथा अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों को लगभग नकार दिया। उन्होंने पड़ोसी देश में बिगड़ती स्थिति के बारे में चिंताओं को किनारे करते हुए हिन्दुओं पर हुए हमलों को ‘राजनीति से प्रेरित’ बताया। उन्होंने कहा कि यह हमले बढ़ा-चढ़ा कर दिखाए गए हैं।
स्रोत: द वायर
घोष ने बांग्लादेशी राजनीति में इस्लामी ताकतों के मजबूत होने को स्वीकार तो किया लेकिन हिंसा को लेकर कुछ नहीं कहा। उन्होंने हिन्दुओं पर होने वाले हमलों को लेकर बांग्लादेश से आने वाली रिपोर्टों पर सवाल उठा दिए और उन्हें फर्जी खबर और ‘हिंदुत्व प्रोपेगेंडा’ बता दिया।
घोष ने यहाँ तक दावा किया कि बांग्लादेश की स्थिति भारत से कोई ख़ास अलग नहीं है। उन्होंने इस दौरान बांग्लादेश पर लिखने बताने के बजाय भारत की आलोचना में अपनी कलम घिसनी चालू कर दी। उन्होंने दावा किया कि भारत में मुस्लिमों पर अत्याचार होता है और ऐसे में भाजपा को बांग्लादेश पर प्रश्न नहीं उठाने चाहिए।
वायर ने लेख और विशेष रिपोर्ट में ही नहीं बल्कि रोजमर्रा की खबरों में भी अपना प्रोपेगेंडा जारी रखा। वायर ने इस बात को दिखने में एड़ी चोटी का जोर लगाया कि बांग्लादेश में सब कुछ एकदम बढ़िया चल रहा है। इसी तरह 10 दिसम्बर,2024 को भारत और बांग्लादेश के बीच घटते व्यापार को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की।
स्रोत: द वायर
इसमें वायर ने बोनगांव के एक व्यापारी तपन साहा का हवाला दिया। वायर ने बताया कि तपन साहा को ढाका को रोजमर्रा की जिन्दगी काफी सामान्य लगी और भारत में जैसा बताया गया, वैसा कुछ भी नहीं है। यहाँ तक कि वह हिंसा के वीडियो भी बांग्लादेशी मीडिया से गायब थे।
इसी तरह से 5 दिसंबर, 2024 को प्रकाशित एक अन्य रिपोर्ट में, वायर ने मुहम्मद यूनुस के बयान को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। यूनुस लगातार कहते आए हैं कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों की रिपोर्ट ‘बढ़ा-चढ़ाकर’ बताई गई है और यह भारत और अन्य वैश्विक शक्तियों द्वारा फैलाई गई ‘मनगढ़ंत कहानी’ का हिस्सा है।
स्रोत: द वायर
वायर लगातार प्रयास कर रहा है कि हिन्दुओं के खिलाफ प्रताड़ना को किसी तरह दबाकर बताए। 3 दिसंबर, 2024 को द वायर ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान का हवाला देते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें रहमान का दावा था कि भारत में ‘बांग्लादेश विरोधी भावना’ को बढ़ावा दिया गया है।
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गौरतलब है कि रहमान, जो वर्तमान में निर्वासन के तहत यूनाइटेड किंगडम में रह रहे हैं। वह 21 अगस्त,2004 को अवामी लीग की राजनीतिक रैली पर हुए आतंकवादी ग्रेनेड हमले का मुख्य आरोपित और मास्टरमाइंड हैं। उन्हें 2008 में बांग्लादेश में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। हाल ही में बांग्लादेश में उन्हें राहत मिली है।
वायर ने हिन्दुओं पर अत्याचार दबाने की बात के लिए बांग्लादेशी मीडिया का भी सहारा लिया है। 29 नवंबर, 2024 को द वायर के लिए करन थापर के साथ एक इंटरव्यू में, ढाका ट्रिब्यून के संपादक जफर सोभन ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों को काफी कम बताया।
इस्कॉन नेता चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी पर चर्चा के दौरान, सोभन ने राजद्रोह के आरोपों की आलोचना की लेकिन इस बीच उन्होंने मोहम्मद यूनुस वाला ही राग अलापा। उन्होंने इस दौरान मोहम्मद यूनुस वाली बात कही कि बांग्लादेश हिन्दुओं की प्रताड़ना की बात मनगढ़ंत है।
बांग्लादेशी अखबार प्रथम अलो द्वारा पहले प्रकाशित और 19 अगस्त, 2024 को द वायर पर छपी एक कथित फैक्ट-चेक रिपोर्ट में, एक रूमर स्कैनर की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया। इस रिपोर्ट में भारतीय मीडिया आउटलेट्स पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमलों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया गया।
स्रोत: द वायर
रिपोर्ट में कई सोशल मीडिया पोस्ट की जाँच की गई थी, जिसमें कथित तौर पर बांग्लादेश में हुई घटनाओं को हिंदुओं पर हमले के रूप में गलत तरीके से पेश किया गया था। इस रिपोर्ट में पूरा फॉक्स इस बात पर था कि कैसे भारतीय मीडिया को झूठा साबित किया जाए। रिपोर्ट में ऑपइंडिया पर तक गलत सूचना फैलाने का आरोप लगाया।
वायर ने अपना प्रोपेगेंडा बढ़ाने के लिए कथित फैक्ट चेक का भी हवाला कर दिया। इसमें मदद भी उसने उस ऑल्टन्यूज की ली, जिस पर खुद फर्जी खबर फ़ैलाने के आरोप है। वायर ने एक फैक्ट चेक के सहारे गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान को गलत साबित करने की कोशिश की जिसमें उन्होंने बांग्लादेश में हिन्दुओं की घटती जनसंख्या के बारे में बात की थी।
स्रोत: द वायर
असल में तो सच्चाई यह है कि बांग्लादेश का खुद का आँकड़ा यही बात दिखाता है। जनसंख्या आँकड़ों के अनुसार, हिन्दू जनसंख्या 1901 में 33% से 1991 में 10.5% तक की गिरावट आई है, जबकि 2022 की जनगणना में इसमें और कमी आई है और यह सिर्फ़ 7.95% है।
बांग्लादेश में सत्ता के तख्तापलट के कुछ ही दिनों बाद 17 अगस्त, 2024 को वायर में मानश फिराक भट्टाचार्जी ने एक लेख लिखा। इसमें उन्होंने विदेशी मीडिया की तरह वही राग अलापा कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार मजहबी आधार पर नहीं हुआ है बल्कि इसका कारण राजनीतिक और उनका आवामी लीग से जुड़ाव है।
स्रोत: द वायर
15 अगस्त को द वायर में प्रकाशित राम पुनियानी के लेख में भी यही बात कही गई। हालाँकि, हिन्दुओं की पीड़ा बताने के बजाय पुनियानी ने यह बताया कि कैसे बांग्लादेश में लोकतंत्र बहाल हो गया है। उन्होंने यहाँ तक दावा कर दिया कि यूनुस सरकार मंदिरों को बचा रही है।
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द वायर का कुल मिलाकर एजेंडा यह रहा कि भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता कम करे। इसके अलावा उसने वह हर स्रोत नकारने की कोशिश की जो हिन्दुओं पर हमलों को बताती है और उसके बराबर में बांग्लादेशी दावा खड़ा किया है। वह बांग्लादेश सरकार का भोंपू बना हुआ हुआ है।
वायर ने जहाँ खुद तो हिन्दुओं की पीड़ा नहीं बताई, उन्होंने सभी मीडिया पोर्टल और लोगों को घृणा फ़ैलाने वाला घोषित कर दिया जो अपने स्तर पर यह काम कर रहे थे। इसे वायर ने इस्लामोफोबिया करार दिया। वायर ने इस दौरान हिन्दुओं पर हमलों का कारण भी राजनीतिक बता दिया, यही प्रयास विदेशी मीडिया करती आई है।
(मूल रूप से अनुराग ने यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी है। आप इस लिंक पर क्लिक कर इसे विस्तार से पढ़ सकते हैं)
कनाडा में यहूदियों के खिलाफ बढ़ रहे अपराध मामलों के बाद कनाडाई हिंदुओं ने सड़कों पर उतरकर यहूदियों के प्रति एकजुटता दिखाई है। उन्होंने टोरंटो के बाथसर्ट और शेपर्ड में यहूदी समुदाय की रक्षा के लिए प्रदर्शन किया।
कड़ाके की ठंड के बीच हुए प्रदर्शन की कुछ वीडियोज डेनियल बोर्डमैन ने अपने इंस्टा पर भी साझा की है। उन्होंने बताया कि बाथसर्ट और शेपर्ड में जिहादियों से यहूदियों की रक्षा के लिए हिंदू कनाडाई नागरिक सड़कों पर उतरे हैं। वीडियो में देख सकते हैं कि उनके हाथ में भारत, कनाडा, इजरायल का झंडा होने के साथ ‘जय श्रीराम’ लिखी पताका भी है जिसमें हनुमान जी भी बने हैं।
वीडियो में देख सकते हैं कि प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि वह यहूदियों के अधिकार के लिए सड़कों पर उतरे हैं क्योंकि यहूदियों के पास भी उतना ही जीने का अधिकार है जितना कि किसी और समुदाय के व्यक्ति के लिए है। हिंदू न केवल यहूदियों का समर्थन करते हैं बल्कि उनके शांति से जीने को भी पूरा सपोर्ट करते हैं।
प्रदर्शनकारी हिंदुओं ने कहा कि वह इजरायली और यहूदी भाइयों के साथ खड़े होकर ये बताना चाहते हैं कि वे कनाडा में सुरक्षित हैं। वहीं एक अन्य व्यक्ति ने यहूदियों को विश्वास दिलाया कि वह कनाडा में हिंदू यहूदियों के साथ हैं।
Jai Ho!?
In the heart of Toronto, at Bathurst and Sheppard, Hindus and Jews came together to celebrate unity, music, and shared values at the weekly rally for Israel. The sounds of Indian music filled the air as two vibrant communities danced and celebrated shoulder to… pic.twitter.com/TpPLpVxSHq
गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों में कनाडा में यहूदियों के खिलाफ काफी हिंसा होती देखी गई है। पिछले सप्ताह की बात है यहूदियों के धर्मस्थल पर आगजनी के बाद उनके एक प्राथमिक विद्यालय में गोलीबारी की घटना सामने आई थी।
ब्रेकिंग
हिंदू फोरम कनाडा ने 'कैनेडियन यहूदी संगठनों' के साथ एकजुटता के एक शक्तिशाली प्रदर्शन में भाग लेने के लिए पूरे भारतीय समुदाय को सफलतापूर्वक संगठित किया। हमास आतंकवादियों के कार्यों का दृढ़ता से विरोध करने के लिए इज़राइल की यहूदी आबादी और निर्दोष नागरिकों के साथ कई हजार… pic.twitter.com/f7SVoZciJZ
ये पहली बार नहीं है जब कनाडा में हिंदू इजरायल के यहूदियों के लिए एकजुट हुए हो। पिछले साल भी जब हमास ने इजरायल के ऊपर हमला किया था उस समय भी हमास आतंकियों के खिलाफ कनाडा के हिंदुओं ने यहूदियों के साथ एकजुटता दिखाई थी और इस्लामी कट्टरपंथियों, आतंकियों के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। साथ ही जोर-जोर से नारेबाजी भी हुई थी।
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट ने हिजाब पहनी एक महिला वकील की बात सुनने से इनकार कर दिया। महिला वकील ने अपना चेहरा ढक रखा था। जब जज ने महिला वकील से अपना चेहरा दिखाने को कहा तो उस महिला वकील ने चेहरा दिखाने से इनकार कर दिया। जज ने कहा कि कोई भी महिला वकील अपना चेहरा ढक कर अदालत में बहस नहीं कर सकती।
न्यायमूर्ति मोक्ष खजुरिया काज़मी और न्यायमूर्ति राहुल भारती की ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि महिला वकीलों को अपना चेहरा ढककर अदालत में उपस्थित होने की अनुमति नहीं है। इसके बाद खंडपीठ ने महिला वकील की बातें सुनने से इनकार कर दिया और इस केस में अगली तारीख दे दी।
दरअसल, यह मामला 27 नवंबर का है। उस दिन ‘मोहम्मद यासीन खान बनाम नाज़िया इकबाल’ से जुड़े घरेलू हिंसा के मामले की सुनवाई हो रही थी। इसी दौरान एक महिला हाई कोर्ट में पेश हुई। उसने खुद को सैयद ऐनैन कादरी नाम की एक वकील बताया और कोर्ट को कहा कि इस मामले को रद्द करने से जुड़ी याचिका में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हो रही है।
वह कोर्ट में वकील की पोशाक में आई, लेकिन उसने अपना चेहरा ढक रखा था। उस समय मामले की सुनवाई जस्टिस राहुल भारती कर रहे थे। जब न्यायाधीश राहुल भारती ने उस महिला वकील से अपना चेहरा दिखाने का अनुरोध किया तो उसने इनकार कर दिया। महिला वकील ने जोर देकर कहा कि चेहरा ढककर आना उनका मौलिक अधिकार है। इसलिए कोर्ट उससे नकाब हटाने के लिए नहीं कह सकता।
इसके बाद जज राहुल भारती ने 27 नवंबर के अपने आदेश में कहा, “यह न्यायालय याचिकाकर्ताओं के वकील के रूप में खुद को अधिवक्ता सुश्री सैयद ऐनैन कादरी बताने वाली महिला की उपस्थिति पर विचार नहीं करता, क्योंकि कोर्ट के पास एक व्यक्ति और एक पेशेवर के रूप में उनकी वास्तविक पहचान की पुष्टि करने का कोई आधार/अवसर नहीं है।” कोर्ट ने मामले को 5 दिसंबर तक के लिए स्थगित कर दिया।”
इसके बाद कोर्ट ने न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से पूछा कि क्या ऐसा कोई नियम है, जो महिला अधिवक्ताओं को अपना चेहरा ढककर पेश होने या अपना नहीं चेहरा ढकने के न्यायालय के अनुरोध को अस्वीकार करने का अधिकार देता है। इसके बाद रजिस्ट्रार जनरल ने 5 दिसंबर को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट की जाँच करने के बाद न्यायमूर्ति मोक्ष खजूरिया काजमी ने 13 दिसंबर को कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) द्वारा निर्धारित नियमों में ऐसे किसी अधिकार का उल्लेख नहीं है। बीसीआई नियमों के अध्याय IV (भाग VI) की धारा 49(1) (जीजी) के तहत महिला अधिवक्ताओं के लिए ड्रेस कोड का विवरण दिया गया है।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने पाया कि BCI की इन प्रावधानों में महिला अधिवक्ताओं को काले रंग की पूरी आस्तीन वाली जैकेट या ब्लाउज, सफेद बैंड, साड़ी या अन्य मामूली पारंपरिक पोशाक के साथ-साथ काला कोट पहनने की अनुमति है। हालाँकि, न्यायालय ने बताया कि निर्धारित न्यायालय पोशाक में चेहरा ढकना शामिल नहीं है या इसकी अनुमति नहीं है।
इसके बाद न्यायालय ने कहा, “नियमों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए इस तरह की कोई पोशाक (चेहरा ढकना) स्वीकार्य है।” हालाँकि, बाद में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक अन्य वकील आगे आए। बाद में न्यायमूर्ति काज़मी ने 6 दिसंबर को मामले में निर्णय सुरक्षित रख लिया और 13 दिसंबर को उसे खारिज कर दिया।
उत्तर प्रदेश स्थित संभल जिले के चंदौसी क्षेत्र में राजस्व विभाग ने एक प्राचीन बावड़ी को भी खोज निकाला है। इसे ‘रानी की बावड़ी’ कहा जा रहा है। इसकी साफ-सफाई का काम जोर-शोर से जारी है। चंदौसी नगरपालिका की सफाई एवं खाद्य निरीक्षक प्रियंका सिंह का कहना है कि यहाँ खुदाई मैन्युअली की जा रही है। 40-50 मजदूर काम कर रहे हैं।
प्रियंका सिंह का कहना है कि ये बावड़ी है और इसकी खुदाई में किसी प्रकार की हानि ना हो इसलिए मशीनों का प्रयोग नहीं किया जा रहा है। खुदाई का ये काम चंदौसी के लक्ष्मणगंज इलाके में हो रहा है। साल 1857 तक ये क्षेत्र हिन्दू बहुल हुआ करता था। हालाँकि, हिंदुओं के पलायन के बाद इस बावड़ी पर कब्जा कर लिया गया और उसे भर दिया गया।
#WATCH | Uttar Pradesh | Priyanka Singh, Cleaning & Food inspector, Chandausi Municipality says, "The team has been working here and the excavation is being carried out manually…40-50 labourers are carrying out the work manually as we cannot use the machinery for the work… https://t.co/h1OpPhQJ6Ppic.twitter.com/27YUHz6THR
दरअसल, इस जगह की खुदाई की माँग को लेकर संभल के जिलाधिकारी को एक प्रार्थना पत्र मिला था। प्रार्थना पत्र में लक्ष्मणगंज के अंदर बिलारी की रानी की प्रचीन बावड़ी होने का दावा किया गया था। इसी शिकायत का संज्ञान लेकर राजस्व विभाग की टीम लक्ष्मणगंज पहुँची थी। बस्ती के बीच में एक जगह चिन्हित कर के खुदाई शुरू हुई। कुछ ही देर बाद जमीन के नीचे प्राचीन इमारतें मिलनी शुरू हो गईं।
रामपुर से सटे सहसपुर-बिलारी राजपरिवार द्वारा इसे बनवाया गया था। रानी की बावड़ी की खुदाई के बाद से यहाँ तीन मंजिला बावड़ी मिली है। वहीं, यहाँ रानी रहीं सुरेंद्र बाला की पोती राजकुमारी शिप्रा बाला ने बताया कि यह इलाका पहले हिंदू बहुल था। बाद में इस राजपरिवार के कई हिस्सेदार होने के बाद यहाँ की जमीनों को बदायूँ के अनेजा को बेच दिया। अनेजा ने इसकी प्लॉटिंग करके मुस्लिमों के बेच दिया।
राजकुमारी शिप्रा ने बताया, “यह दादी सुरेंद्र बाला और बाबा जगदीश कुमार की संपत्ति है। उनके बेटे लल्ला बाबू विष्णु कुमार की पाँच बेटियों में मैं सबसे छोटी हूँ। यहाँ हमारा पुश्तैनी फार्म हाउस था। फार्म हाउस में गन्ने की खेती हुआ करती थी। हम लोगों के लिए यहाँ एक कुआँ भी था। हम लोग यहाँ मम्मी-पापा के साथ पिकनिक मनाते थे। हमारा बचपन यहीं बीता है। यहाँ पर कोठी से जुड़ा हुआ लक्ष्मणगंज है।”
शिप्रा बाला का कहना है कि कोई भाई नहीं था। बकौल राजकुमारी, “अकेला आदमी अपनी संपत्ति पर ध्यान नहीं दे पाता है। इसके कारण लोग उसकी जमीन हथियाना शुरू कर देते हैं।” यही हाल परिवार से जुड़ी जमीनों का भी यही हुआ। ये मामला सहसपुर राजपरिवार से जुड़ा हुआ है। 1857 के सिपाही विद्रोह के समय सहसपुर की रानी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में इसे छावनी के तौर पर इस्तेमाल करती थीं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह बावड़ी बिलारी के राजा के नाना (सहसपुर के राजा) के समय की है। इसमें एक कूप और 4 कमरे हैं। बावड़ी के अंदर का दृश्य मंदिर जैसा दिखाई देता है। इसके अंदर एक सुरंग भी है। लगभग 150 साल पुरानी इस बावड़ी का प्रयोग पानी जमा करने और सैनिकों के आराम करने के लिए किया जाता था। इसके सिर्फ 150 मीटर दूर इलाके का सबसे प्रसिद्ध क्षेमनाथ तीर्थ मंदिर भी है।
यह बावड़ी करीब 10-12 मीटर लंबी और 28 फीट गहरी बताई जा रही है। संभल के डीएम राजेंद्र पैंसिया ने बताया कि इस बावड़ी में नीचे के दो मंजिल मार्बल के हैं और सबसे ऊपर का मंजिल ईंटों का बना है। उन्होंने बताया कि यह 400 वर्गमीटर क्षेत्र में फैला है। वर्तमान में 210 वर्गमीटर ही है और बाकी हिस्सों पर कब्जा किया गया है। जिलाधिकारी ने बताया कि जल्द ही उन्हें भी खाली करा लिया जाएगा।
इंग्लैंड का कानून इस्लामी कट्टरपंथ के आगे घुटने टेक रहा है। कभी दुनिया के एक बड़े हिस्से पर राज करने वाला इंग्लैंड अब मुस्लिम कट्टरपंथियों के नतमस्तक है। जिस इंग्लैंड ने ‘कानून का राज’ की अवधारणा दी थी, उस देश में अब इस्लामी अदालतें चल रही हैं। ब्रिटेन में दशकों से आदर्शवादी और लिबरल बनने के चक्कर में कट्टरपंथ पर मुंह बंद रखा गया था।
इस्लामी कट्टरपंथ के पैर पसारने को लेकर अगर कोई बोलता है तो उसे इस्लामोफोब करार दिया जाता है। इस्लाम पर इस चुप्पी का सबसे ज्वलंत उदाहरण ग्रूमिंग गैंग रहे हैं, जिन्होंने हजारों ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाया। यह निशाना बनाने वाले मुस्लिम थे और उनके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
अब शरिया अदालतें खुल्लम-खुल्ला ब्रिटिश कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रही हैं। ‘शरिया कोर्ट’ के नाम पर चलाई जा रहीं यह अदालतें ब्रिटेन 4 निकाह जैसी सामजिक कुरीतियों को बढ़ावा दे रही हैं। इन अदालतों पर ब्रिटिश सरकार अंकुश नहीं लगा पा रही है। यह अदालतें अवैध निकाह भी करवा रही हैं जिनका कानूनन कोई रिकॉर्ड नहीं है।
ब्रिटिश अखबार द टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंग्लैंड में वर्तमान में 85 ऐसी शरिया अदालतें चल रही हैं। मुस्लिमों के मसलों से निपटने के लिए बनाई गई यह शरिया अदालतें पूरे इंग्लैंड में फैली हुई हैं। यह अदालतें निकाह, तलाक, खुला और चार निकाह जैसे मामलों पर फैसले दे रही हैं। यह अदालतें ब्रिटिश कानून के खिलाफ जाकर तमाम फैसले देती हैं।
रिपोर्ट बताती है कि ऐसी पहली शरिया अदालत इंग्लैंड में लंदन में 1982 में खोली गई थी। तब से यह लगातार बढ़ रही हैं। इनमें से एक अदालत ने एक ऐसे एप को मंजूरी दे रखी थी जो मुस्लिम पुरुषों से उनकी बीवियों की संख्या पूछता था। इसके अलावा इंग्लैंड में चलने वाले एक और एप में भी मुस्लिम युवा निकाह के बाद कितनी बीवियाँ रखेंगे, इसकी जानकारी भर सकते हैं।
गौरतलब है कि ब्रिटिश कानून के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति एक से अधिक शादी/निकाह नहीं कर सकता। ऐसा करने के लिए तलाक और उसका कानूनी आदेश जरूरी है। हालाँकि, यहः शरियाई अदालतें इन सब बातों को नहीं मानती हैं और धड़ल्ले से इन सब कामों में मशगूल हैं।
इन शरिया अदालतों ने लगभग 100000 ऐसे निकाह करवाए हुए हैं, जिनका ब्रिटिश कानून में कोई पंजीकरण नहीं हुआ है। इंग्लैंड के भीतर शरिया अदालतों की धाक इतनी बढ़ गई है कि अब यूरोप के बाकी देशों और अमेरिका से मुस्लिम यहाँ अपने इस्लामी मसले लेकर पहुँच रहे हैं।
यह अदालतें चार निकाह को बढ़ावा दे रही हैं लेकिन ब्रिटिश एजेंसियाँ इनके आगे लाचार हैं। लगातार मुस्लिम तुष्टिकरण में लगे रहने वाले ब्रिटिश नेताओं ने इस मसले पर आँखे मूँद ली हैं। इसी के चलते इंग्लैंड अब शरिया कोर्ट के पश्चिमी देशों का प्रमुख केंद्र है।
इंग्लैंड में इन शरिया अदालतों को लेकर धर्मनिरपेक्षता को लेकर काम करने वाले संगठन विरोध कर रहे हैं। इंग्लैंड के ऐसे ही एक संगठन नेशनल सेक्युलर सोसायटी ने माँग की है कि ब्रिटेन में चल रही इस समानांतर कानून व्यवस्था पर नकेल कसी जाए। उन्होंने कहा है कि इससे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों पर असर पड़ रहा है। हालाँकि, सरकार इस मामले पर शांत है।
ब्रिटेन में इस्लामी कट्टरपंथ पर सरकार और लिबरल समाज का चुप रहना कोई विचित्र बात नहीं है। ग्रूमिंग गैंग के हाथों जब हजारों ब्रिटिश लड़कियाँ शिकार बन गईं तो एक टास्क फ़ोर्स बनाई गई। लेकिन इसी के साथ अब ब्रिटेन में इस्लामी कानून नाफ़िज करने की तैयारी है। ब्रिटिश सरकार ने इस दौरान शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन धँसा ली है।
ब्रिटिश सरकार इस पूरे इस्लामी कट्टरपंथ के तंत्र पर प्रहार नहीं करना चाहती। उसे लगता है कि इससे उसकी कथित उदार छवि पर असर पड़ेगा, जबकि सच्चाई यह है कि इसी का फायदा उठा कर इस्लामी कट्टरपंथी अपनी धाक इंग्लैंड में जमा रहे हैं। वह हिन्दुओं पर हमला करते हैं, महिलाओं को छेड़ते हैं यहाँ तक कि इंग्लैंड में धमाके भी हो चुके हैं।