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166 लोगों की मौत के तुरंत बाद 800 लोगों के साथ ‘पार्टी ऑल नाइट’ में मशगूल हो गए थे राहुल गाँधी

“राहुल गाँधी ने 26/11 मुंबई हमलों में वीरगति को प्राप्त हुए जवानों का तिरस्कार किया है। उन्होंने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर देने वाले हेमंत करकरे, अशोक कामटे, तुकाराम अम्बोले और विजय सालस्कर जैसे मराठा पुलिसकर्मियों की बहादुरी का अपमान किया है। उन्होंने एनएसजी के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को अपमानित किया है। जब मुंबई में हमला हुआ, तब राहुल कहाँ थे?”

ये बयान शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे का है। पुराना है। वही उद्धव ठाकरे, जिनकी उपस्थिति में सोमवार (नवंबर 25, 2019) को कॉन्ग्रेस, शिवसेना और एनसीपी के विधायकों को शपथ दिलाई गई। वह शपथ क्या थी? शपथ थी कि सभी विधायक सोनिया गाँधी, शरद पवार और उद्धव के नेतृत्व में अपनी पार्टियों के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे। इस दौरान पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता अशोक चव्हाण ने शिवसेना के साथ गठबंधन के लिए सोनिया और राहुल गाँधी को धन्यवाद दिया। ऊपर उद्धव के जिस बयान का हमने जिक्र किया है, वो फ़रवरी 2010 का है। दरअसल, राहुल गाँधी ने शिवसेना के उत्तर भारत विरोधी रुख पर प्रहार करते हुए बताया था कि कैसे उत्तर भारतीय एनएसजी कमांडोज़ ने आतंकियों को चित किया। उद्धव इसी पर प्रतिक्रिया दे रहे थे।

राजनीति है। उद्धव के उस बयान के 9 साल होने को आए। सब कुछ बदल गया है। अब उद्धव कभी राहुल से ये नहीं पूछेंगे कि वो मुंबई हमलों के वक़्त या उसके बाद वे कहाँ थे? कम से कम इन परिस्थितियों में तो बिलकुल भी नहीं पूछेंगे। तो इस बयान से सवा 2 साल और पीछे चलते हैं। नवम्बर 26, 2008 का दिन किसको याद नहीं? यही वो दिन है, जब पाकिस्तान से आए 10 आतंकियों ने मुंबई को थर्रा दिया था। इस हमले में 174 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था। यूपीए-1 की सरकार थी। राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस के महासचिव थे। मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। सोनिया गाँधी सरकार की सर्वेसर्वा थीं, कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष थीं।

मुंबई हमले के तुरंत बाद राहुल गाँधी दिल्ली के ग्रामीण इलाक़े में स्थित एक फार्महाउस में पार्टी करते पाए गए थे। तब तक बलिदानी मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की माँ की आँखों के आँसू भी नहीं सूखे थे। 174 मृत लोगों के परिजनों का गम ताज़ा ही था। 300 घायलों के परिचित अभी भी अस्पतालों के चक्कर काट रहे थे। लेकिन, कॉन्ग्रेस के भावी अध्यक्ष पार्टी करने में मशगूल थे। उन्होंने नवंबर 31, 2008 को शाम से ही पार्टी शुरू कर दी थी। पार्टी रात भर चली। भारतीय सुरक्षा बलों का ऑपरेशन नवंबर 29, 2008 तक चला था।

राहुल गाँधी की पार्टी अगले दिन सुबह 5 बजे ख़त्म हुई। मौक़ा स्पेशल था। राहुल के स्कूल के दिनों के सहपाठी समीर शर्मा की शादी थी। ये ‘संगीत’ का कार्यक्रम था। लेकिन, राहुल ये भूल गए कि वो सत्ताधारी पार्टी के महासचिव और भावी अध्यक्ष के रूप में पेश किए जा रहे थे। उनपर कुछ समाजिक जिम्मेदारियाँ बनती थीं। उनके हर क़दम पर मीडिया की नज़र थी। उन्हें जनता को सन्देश देना था। उस क्षण में भारत के साथ खड़ा होना था। लेकिन नहीं, वो दोस्तों संग रात भर मौज करने में व्यस्त हो गए।

पार्टी की जगह भी शानदार थी- छतरपुर के राधे मोहन चौक पर स्थित भव्य फार्महाउस, काफ़ी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ। उस दौरान दिल्ली में चुनाव भी चल रहे थे। जिस दिन राहुल गाँधी ने पार्टी करनी शुरू की, उससे एक दिन पहले ही उनकी बहन प्रियंका गाँधी भी वोट देने निकली थीं। प्रियंका ने इस दौरान 26/11 मुंबई हमलों पर चर्चा करते हुए कहा था कि अगर उनकी दादी इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री होतीं तो मुंबई हमले को इस तरह हैंडल करतीं, जिससे सभी को गर्व महसूस होता। एक ऐसी महिला ने ये बात कही, जिसकी माँ नेपथ्य से भारत सरकार चला रही थी। प्रियंका ने याद दिलाया कि कैसे आतंकवाद ने उनके पिता की जान ले ली थी।

आपके मन में एक सवाल ज़रूर कौंध रहा होगा कि ये समीर शर्मा कौन हैं, जिनकी शादी थी? दरअसल, वो अमेरिका में बसे फर्नीचर डिजाइनर थे। वो राजीव गाँधी के फ़्लाइंग पार्टनर कैप्टन सतीश शर्मा के बेटे हैं। सतीश शर्मा ने ही राजीव गाँधी की हत्या के बाद अमेठी से उनकी जगह लोकसभा चुनाव लड़ा था और जीत कर नरसिम्हा राव सरकार में कैबिनेट मंत्री बने थे। वो गाँधी परिवार के दूसरे गढ़ अमेठी से भी सांसद रहे हैं। यह भी जानने लायक बात है कि मुंबई हमलों के बाद कई रेस्टॉरेंट्स ने पूर्व में निर्धारित कई पार्टियाँ रद्द कर दी थी। सरकारी अधिकारियों ने आयोजनों में जाना मुनासिब नहीं समझा था।

राहुल इन चीजों से दूर थे। देश के मूड से दूर थे। वे 800 अन्य अतिथियों के साथ पार्टी कर रहे थे। इससे मुंबई हमलों को क़रीब से देखने वाले लोगों को तो ख़ासा दुख हुआ। इसकी बानगी तब देखने को मिली, जब 26/11 के दौरान ओबेरॉय होटल में फँसे कॉर्पोरेट वकील अभय बहल ने उनकी आलोचना की। बहल ने कहा कि इन्हीं हरकतों की वजह से देश का उन लोगों पर से विश्वास उठ जाता है, जिन्हें भविष्य का नेता कहा जाता है। ‘इंडिया टुडे’ की एक रिपोर्ट में उसी पार्टी के एक अतिथि का बयान प्रकाशित हुआ। उस अतिथि ने कहा कि यहाँ जो भी लोग पार्टी कर रहे हैं, उनमें से कोई भी सार्वजनिक जीवन में नहीं है। नाम न छपने की शर्त पर उसने बताया कि राहुल गाँधी ज़रूर सार्वजनिक जीवन में हैं और उन्हें किन मौक़ों पर कहाँ और कैसे दिखना है, इसका ध्यान रखना चाहिए।

यूपीए काल के दौरान बम ब्लास्ट जैसे आम बात थे। जुलाई 2011 में भी मुंबई को दहलाया गया था। 26 लोग काल के गाल में समा गए थे और क़रीब 150 घायल हुए थे। तब राहुल गाँधी ने कहा था कि सभी आतंकी हमलों को नहीं रोका जा सकता। साथ ही उन्होंने दावा किया था कि 99% आतंकी हमलों को समय रहते रोक लिया जाता है। उनका कहना था कि आतंकवाद ऐसी चीज है, जिसे हर समय के लिए रोकना असंभव है। अभी 2014 के बाद से भारत के बड़े शहरों में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ। अप्रैल 2019 में गुजरात के अमरेली में एक रैली को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया था कि 2014 के बाद से पूरे देश में कोई बड़ा आतंकी बम ब्लास्ट नहीं हुआ।

‘मेल टुडे’ के दिसंबर 1, 2008 संस्करण में छपी ख़बर: पार्टी मूड में राहुल गाँधी

राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस के उपाध्यक्ष बने। फिर अध्यक्ष बने। फिर इस्तीफा दे दिया। अब राहुल कहते हैं कि वो बस एक मामूली कार्यकर्ता हैं। पार्टी के सेवक हैं। न तो सत्ता में रहते उन्होंने जिम्मेदारी निभाई और न ही उनसे विपक्ष की राजनीति हो पाई। राहुल अब इटली और थाईलैंड जाते हैं। पार्टी करते हैं। लेकिन, अब मुंबई हमले जैसी वारदातों के बाद सरकार चुप नहीं बैठती। उरी हमले के बाद पीओके में घुस कर आतंकियों का सफाया किया जाता है। पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तान में घुस कर वायुसेना बम बरसाती है और आतंकी कैम्पों को तबाह करती है। दुश्मन वही हैं, बस उन्हें हैंडल करने का तरीका बदल गया है। अब डोजियर नहीं सौंपे जाते, स्ट्राइक किया जाता है।

हाँ, प्रियंका गाँधी अब भी दादी इंदिरा पर ही अटकी हैं। मुंबई हमलों के बाद उनके परिवार की सरकार रहते हुए भी वो इंदिरा गाँधी को याद कर रही थीं। लोकसभा चुनाव से पहले जब राजनीति में उनकी एंट्री हुई, तब उनके नैन-नक्श को इंदिरा से मिलता-जुलता बता कर उनमें दादी की छवि देखी गई। लोकसभा चुनाव में उन्हें यूपी की जिम्मेदारी मिली और कॉन्ग्रेस वहाँ फुस्स रही। प्रियंका इधर ट्वीट करती रही कि दादी कैसे उन्हें कहानियाँ सुनाया करती थीं। सब कुछ बदल गया लेकिन प्रियंका गाँधी की इंदिरा से तुलना होती रही। शायद होती ही रहेगी। तब तक, जब तक वो भी अपने भाई की तरह कॉन्ग्रेस की ‘मामूली कार्यकर्ता’ न बन जाएँ। या फिर क्या पता? राजनीति से ही निकल जाएँ।

70 साल में पहली बार J&K में संविधान दिवस: अब तक 103 संशोधन, पहला राज्यसभा के गठन से भी पहले

आज (26 नवंबर 2019) संविधान दिवस की 70वीं वर्षगाँठ है। संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को संविधान अंगीकार किया था। इसे लागू 26 जनवरी 1950 को किया गया था। 26 नवंबर को हर साल संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है।

यह पहला मौका है जब जम्मू-कश्मीर में भी संविधान दिवस मनाया जा रहा है। इसी साल अगस्त में केंद्र सरकार ने आर्टिकल 370 के अधिकतर प्रावधानों को निरस्त कर राज्य का विशेष दर्जा खत्म कर दिया था। साथ ही राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया था।

मीडिया रिपोर्टों में जम्मू-कश्मीर सामान्य प्रशासन विभाग के अतिरिक्त सचिव सुभाष सी छिब्बर के हवाले से बताया गया है कि संविधान निर्माताओं के योगदान के प्रति आभार प्रकट करने और इसमें शामिल उत्कृष्ट मूल्यों और नियमों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

बता दें कि भारतीय संसद ने संविधान में 70 साल के दौरान 103 बार संशोधन किए हैं। इनमें से केवल एक संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित किया। पहला और अंतिम, दोनों संविधान संशोधन सामाजिक न्याय से संबंधित थे। राज्यसभा सचिवालय की तरफ से जारी ब्यौरे के मुताबिक संविधान में पहला संशोधन 1951 में अस्थायी संसद ने पारित किया था। उस समय राज्यसभा नहीं थी।

राज्यसभा सचिवालय ने बताया कि पहले संशोधन के तहत ‘राज्यों’ को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के उत्थान के लिए सकारात्मक कदम उठाने का अधिकार दिया गया था। वहीं संविधान में किया गया अंतिम 103वाँ संशोधन 2019 में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को शैक्षणिक संस्थानों और नियुक्तियों में 10 फीसदी आरक्षण देने से संबंधित था।

विज्ञप्ति में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल 99वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक करार दिया था। यह संशोधन राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन के संबंध में था। 1952 में गठन होने के बाद से राज्यसभा ने 107 संविधान संशोधन विधेयक पारित किए हैं। इनमें से एक को लोकसभा ने अस्वीकार कर दिया था। चार संविधान संशोधन विधेयक निचले सदन के भंग होने की वजह से निष्प्रभावी हो गए।

राज्यसभा ने 1990 में पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगाने संबंधी विधेयक पारित किया था जो लोकसभा में पास नहीं हो सका। लोकसभा से अब तक 106 संविधान संशोधन विधेयक पारित हुए हैं, जिसमें से तीन को राज्यसभा ने अमान्य कर दिया था। इनमें 1970 में तत्कालीन देसी रियासतों के पूर्व शासकों के प्रिवी पर्स और विशेषाधिकार को खत्म करने वाला विधेयक और 1989 में पंचायतों और नगर निकायों तथा नगर पंचायतों में सीधा चुनाव कराने के लिए लाए गए दो विधेयक शामिल हैं।

राज्यपाल को सौंपे पत्र में कॉन्ग्रेस विधायक दल के नेता ने नहीं किया हस्ताक्षर: 162 विधायकों का शक्ति प्रदर्शन

महाराष्ट्र में राजनीतिक घटनाक्रम पल-पल बदल रहा है। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के फ़ैसले को ग़लत साबित करने के लिए तीनों विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट तक गए। शीर्ष अदालत मंगलवार (नवंबर 26, 2019) को इस सम्बन्ध में फ़ैसला देगी। अब कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना ने तीनों दलों के 162 विधायकों की मीडिया के सामने परेड कराई है। तीनों दल लगातार सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत होने का दावा कर रहे हैं। उधर भाजपा भी बहुमत साबित कर दिखाने का दावा कर रही है। ऐसे में तीनों दलों द्वारा मीडिया के सामने शक्ति प्रदर्शन से भाजपा की मुश्किलें बढ़ भी सकती हैं।

मुंबई के बांद्रा में स्थित ग्रैंड हयात होटल में शिवसेना अध्यक्ष शरद पवार, एनसीपी के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और कॉन्ग्रेस नेता व पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने विधायकों को सम्बोधित किया। उद्धव ने इस दौरान आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए कहा कि शिवसेना क्या चीज है, अब पता चलेगा। उन्होंने एनसीपी के साथ गठजोड़ को सही बताते हुए यहाँ तक कह दिया कि उनका गठबंधन अगले 30 सालों तक चलेगा। उद्धव ने कहा कि वो सत्ता में जय नहीं बल्कि सत्यमेव जयते होना चाहिए।

वहीं अशोक चव्हाण ने कहा कि तीनों दलों के 162 नहीं बल्कि उससे भी ज्यादा विधायक हैं। उन्होंने कहा कि शिवसेना के साथ गठबंधन सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी का सराहनीय फ़ैसला है। हालाँकि, राज्यपाल को सौंपे गए समर्थन पत्र में कॉन्ग्रेस विधायक दल के नेता का हस्ताक्षर नहीं है। इसकी जगह प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष बालासाहब थोराट के हस्ताक्षर हैं। साथ ही उस पत्र में ये भी नहीं बताया गया है कि सरकार किसके नेतृत्व में बनेगी और मुख्यमंत्री कौन होगा?

मीडिया के सामने तीनों दलों के शक्ति प्रदर्शन में शरद पवार भी पहुँचे। शिवसेना नेता संजय राउत उन्हें लेकर होटल में पहुँचे। समाजवादी पार्टी के नेता अबू आजमी ने भी इस शक्ति प्रदर्शन में हिस्सा लिया। सपा ने अपने दोनों विधायकों को शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस को समर्थन देने को कहा है। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल ने भी इस दौरान अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन, इस दौरान सबसे ज्यादा सक्रिय शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले दिखीं। उन्होंने एक-एक कर कई विधायकों से मुलाक़ात की। आदित्य ठाकरे भी इस दौरान काफ़ी सक्रिय दिखे।

ग्रैंड हयात होटल में तीनों दलों ने ‘वी आर 162’ लिखे हुए बैनर लगाए। इससे पहले संजय राउत ने ट्वीट कर राज्यपाल कोश्यारी को टैग किया था और इस शक्ति प्रदर्शन की जानकारी दी थी। मंच पर संविधान के कवर पेज की फोटो लगाई गई थी। विधायकों को शपथ भी दिलाई गई कि वे उद्धव ठाकरे, शरद पवार और सोनिया गाँधी के नेतृत्व में अपनी पार्टियों के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे।

अजित पवार को जाँच एजेंसियों ने दी क्लीन चिट: मीडिया व कॉन्ग्रेस के दुष्प्रचार का Fact Check

मीडिया में ऐसी ख़बरें चल रही हैं कि एंटी-करप्शन ब्यूरो ने अजित पवार के ख़िलाफ़ चल रहे सारे मामलों में जाँच बंद कर के उन्हें क्लीन चिट दे दिया है। साथ ही सोशल मीडिया में इस ख़बर को आधार बना कर यह पूछा गया कि क्या भाजपा के साथ आते ही अजित पवार ‘क्लीन’ हो गए हैं और उन्हें देवेंद्र फडणवीस की सरकार का समर्थन करने के बदले यह इनाम दिया गया है? आजतक और न्यू इंडियन एक्सप्रेस जैसे मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों का अलावा नेशनल हेराल्ड जैसे प्रोपेगंडा पोर्टल्स तक, सबने झूठ फैलाया। पत्रकार राजदीप सरदेसाई और कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला भी नहीं चूके।

आजतक ने पूछा कि क्या भाजपा के साथ आते अजित पवार ‘क्लीन’ हो गए हैं? साथ ही लिखा कि उनसे जुड़े सिंचाई घोटाले के 9 मामलों को बंद कर दिया गया है।

आजतक जैसे बड़े मीडिया संस्थान भी नहीं रहे पीछे

राजदीप सरदेसाई ने ‘गोलमाल है भाई, सब गोलमाल है’ गाने का प्रयोग करते हुए तंज कसा कि केस को बंद करने की टाइमिंग संदेहास्पद है।

इसी तरह कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने लिखा कि भ्रष्टाचार के मामलों को बंद किए जाने के एवज में समर्थन माँगा जा रहा है। उन्होंने इसे लोकतंत्र पर धब्बा करार किया।

इधर कॉन्ग्रेस मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ ने लिखा कि अजित पवार को इरीगेशन स्कैम मामले में क्लीन चिट दे दी गई है।

नेशनल हेराल्ड ने फैलाया झूठ: अजित पवार को मिली क्लीन चिट

लेकिन, सच्चाई कुछ और ही निकली। दरअसल, जिन 9 सिंचाई घोटालों की फाइलें बंद की गई थीं, उनमें से एक भी अजित पवार से सम्बंधित नहीं थीं। उन घोटालों का अजित पवार से दूर-दूर तक नाता नहीं था लेकिन मीडिया ने इसे ग़लत तरीके से फैलाया। हालाँकि, जिन केसों को बंद किया गया, वो भी सशर्त रूप से। अगर कुछ और आता है तो उन्हें फिर से खोला जा सकता है।

महाराष्ट्र एंटी-करप्शन ब्यूरो के डायरेक्टर परमबीर सिंह ने मीडिया के सामने आकर इस दुष्प्रचार का ख़ुद खंडन किया। उन्होंने बताया कि एजेंसी सिंचाई घोटाले से जुड़े 3000 टेंडरों की जाँच कर रही है। उन्होंने 9 मामले बंद होने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ये रूटीन इन्क्वाइरी थी। साथ ही उन्होंने साफ़ कर दिया कि इनमें से कोई भी मामला महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री अजित पवार से जुड़ा नहीं है।

आने वाले पाँच वर्षों में विकास की गति बनाए रखने के लिए स्थिर सरकार की ज़रूरत: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झारखंड के डालटनगंज में एक चुनावी रैली के दौरान तीन दिन पूर्व लातेहार में नक्सली हमले में शहीद पुलिसवालों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि उनके परिवार वालों के साथ अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करता हूँ। उन्होंने कहा कि आज अगर पूरे भारत में कमल शान से खिला है, तो इसकी बहुत बड़ी भूमिका यहाँ की जनता की है, यहाँ के भाजपा कार्यकर्ताओं की रही है। उन्होंने कहा कि यहाँ के लोग हमेशा कमल के निशान के साथ खड़े रहे हैं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डालटनंगज और गुमला के चुनावी सभा में कॉन्ग्रेस पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस ने अनुच्छेद-370 को हटाने और राम मंदिर विवाद को 70 साल से लटकाए रखा है। वह चुनावी राज्य झारखंड के पलामू में एक सार्वजनिक रैली को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस को मुद्दों को लटकाए रखने की आदत है। उसने अनुच्छेद-370 को हटाने और राम मंदिर विवाद को 70 वर्षों तक लंबित रखा। कॉन्ग्रेस ने ऐसे मुद्दों को केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए बनाए रखा। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने हल करने का वादा किया था। इस तरह के मुद्दों और हमने अपने वादों को पूरा किया। भाजपा अखंड भारत और महान भारत के लिए काम करती है।”

बता दें कि यह झारखंड में मोदी की पहली चुनावी रैली थी। इस दौरान उन्होंने कहा, “राम मंदिर विवाद सुलझ गया है और अब हर कोई ख़ुश है”।

पीएम मोदी ने कहा, “झारखंड को एक मज़बूत और स्थिर सरकार की ज़रूरत है। यह पिछले पाँच वर्षों में विकास की ओर बढ़ा है और आने वाले पाँच वर्षों में गति बनाए रखने की ज़रूरत है।”

इसके आगे उन्होंने कहा, “झारखंड सरकार पाँच सिद्धांतों पर चल रही थी- स्थिरता, सुशासन, विकास, स्वाभिमान और राष्ट्रीय सुरक्षा। भाजपा ने भ्रष्टाचार मुक्त, पारदर्शी सरकार प्रदान की और राज्य को लुटने से बचाया। माओवादी ख़तरे को समाप्त करने के प्रयास किए गए। राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के कारण माओवाद फल-फूल गया था।”

प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्षी गठबंधन पर हमला किया और कहा कि कॉन्ग्रेस, झामुमो और राजद भाजपा के ख़िलाफ़ एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा, “महागठबंधन सिर्फ़ सत्ता हथियाने के लिए बनाया गया था। अगर विपक्ष जीत गया, तो राज्य की स्थिति फिर से अस्थिर हो जाएगी।”

इस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं को भी सूचीबद्ध किया, जिसमें उन्होंने बताया कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोगों के जीवन में किस तरह से बदलाव आया है।

NRC के विरोध में ममता बनर्जी: कहा- बांग्लादेशी घुसपैठियों को देंगे यहीं रहने का अधिकार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घुसपैठियों से एक लुभावना वादा किया है। ममता ने साफ़ कर दिया है कि वह एनआरसी से उलट घुसपैठियों को भगाने के पक्ष में नहीं हैं। कैबिनेट मीटिंग से निकलकर उन्होंने कहा कि राज्य में उनकी सरकार सभी शरणार्थियों को रहने का अधिकार देगी।

एक रिपोर्ट के मुताबिक एनआरसी के जवाब में ममता ने यह कदम उठाने का फैसला किया है। दरअसल, ममता एनआरसी योजना की सबसे कठोर आलोचकों में से एक हैं। बता दें कि बंगाल में घुसपैठियों और शरणार्थियों की अधिकांश बस्तियाँ उन जगहों पर बसी हुई हैं जोकि राज्य सरकार की हैं। मगर यहाँ बसने वाले लोग दरअसल मूल रूप से भारतीय नहीं हैं इसीलिए उन्हें अक्सर विरोध का सामना करना पड़ता है।

ममता ने ऐलान किया है कि इन लोगों को उसी ज़मीन का अधिकार दिया जाएगा जिस पर यह रह रहे हैं। गौरतलब है कि ममता सरकार पहले ही बंगाल में ऐसी 94 कालोनियों को रेगुलर कर चुकी है जहाँ घुसपैठिये और रिफ्यूजी रहते हैं। दरअसल 1971 से ही भारत के बंगाल से सटी बांग्लादेश सीमा को पार कर घुसपैठिए इन इलाकों में बसने लगे थे। उस वक़्त आज का बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान हुआ करता था। उस समय बांग्लाभाषी लोगों पर पश्चिमी पाकिस्तान के इशारे पर हुए ज़ुल्म के चलते कई परिवारों ने पलायन कर भारत में शरण ले ली थी। इनमें से अधिकतर रिफ्यूजी असम और पश्चिम बंगाल में जाकर बस गए।

रिफ्यूजियों के सन्दर्भ में भी भारत सरकार ने यह स्पष्ट किया था कि भारतीय सीमा के अन्दर किसी भी रिफ्यूजी को हमेशा के लिए शरण नहीं मिलेगी। यही वजह है कि 1971 युद्ध के बाद जब बांग्लादेश बना, तो रिफ्यूजियों को भारत से उनके अपने देश रवाना कर दिया गया। बावजूद इसके इनमें कई ऐसे थे जो वापस नहीं गए। यहीं परिवार बसा लेने के बाद आज उन रिफ्यूजियों की एक अच्छी खासी तादाद बांग्लादेश की सीमा से जुड़े राज्य बंगाल में रहती है।

देश-विदेश में एड देने वाले AAP के पास चुनाव लड़ने के लिए फंड नहीं: केजरीवाल ने कहा- चंदा दे दो जी

आम आदमी पार्टी के पास दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए फंड नहीं है। रविवार (24 नवंबर) को बुराड़ी की जनसभा में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लोगों से चंदा देने की अपील की। 

रैली को संबोधित करते हुए, केजरीवाल ने कहा, “हमने दिल्ली में पिछले पाँच वर्षों में बहुत काम किया है। आगामी चुनाव लड़ने के लिए हमारे पास पैसे नहीं हैं। मैंने पिछले पाँच वर्षों में एक रुपया भी नहीं कमाया है।” 

2019 के आम चुनावों से पहले, आम आदमी पार्टी को भारत के अलावा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और ओमान में दान विज्ञापन चलाते हुए पकड़ा गया था।

बता दें कि आम आदमी पार्टी के अतीत में दान के साथ एक संदिग्ध संबंध रहा है। मई 2017 में यह आरोप लगाया गया था कि AAP ने हवाला लेनदेन के माध्यम से शेल कंपनियों से करोड़ों का फंड प्राप्त किया। इससे पहले, भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना हज़ारे ने AAP प्रमुख को पार्टी द्वारा मिले दान पर सफाई देने के लिए पत्र लिखा था।

यह ​​आरोप भी लगाया गया कि 2014 के आम चुनावों से पहले केजरीवाल को संदिग्ध चैनलों के माध्यम से पैसा मिला था। आप में रह चुके भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने आरोप लगाया था कि केजरीवाल के वाराणसी से 2014 के आम चुनावों के लिए अपना नामांकन दाखिल करने से एक हफ्ते पहले 5 अप्रैल, 2014 को चार शेल कंपनियों ने AAP के खाते में 2 करोड़ रुपए जमा किए थे। इन 4 कंपनियों में से 3 कंपनियों के डायरेक्टर हेम प्रकाश शर्मा थे। दिल्ली में जीके में किए गए प्रदर्शन के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापे के दौरान 13 करोड़ रुपए की करेंसी बरामद हुई थी। इस कंपनी के निदेशकों में से एक हेम प्रकाश शर्मा भी हैं। कपिल मिश्रा ने केजरीवाल और हेम प्रकाश के बीच गहरे रिश्ते को भी उजागर किया था।

ख़बर के अनुसार, ऑपइंडिया ने जब रहस्यमय हेम प्रकाश शर्मा के बारे में पड़ताल की, तो पता चला कि आधिकारिक रिकॉर्ड यह बताते हैं कि जिन चार कंपनियों ने अप्रैल 2014 में AAP को दान दिया था, उनके पास दिखाने के लिए किसी लेन-देन का कोई रिकॉर्ड नहीं था। इन कंपनियों के तीन कॉमन डायरेक्टर हेम प्रकाश शर्मा, धर्मेन्द्र कुमार और मुकेश कुमार थे। रजिस्ट्रार हाउस में जो पता था उसके मुताबिक़ वहाँ एक डाकघर, एक किराने की दुकान जिसका शटर डाउन था और एक छोटा सिलाई कारखाना था। विवरण से, ऐसा पता चला था कि वो शेल कंपनियाँ थी।

इसके अलावा, डीएनए इन निदेशकों में से एक मुकेश कुमार को ट्रैक करने में सक्षम था, जिन्होंने इस बात से इनकार कर दिया था कि उन्होंने AAP को कभी कोई दान दिया था। उन्होंने इन कंपनियों के मालिक होने की बात स्वीकार की, जो केवल कागज पर मौजूद हैं, लेकिन AAP को दान देने से उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया। डीएनए के अनुसार, जब उन्होंने आधिकारिक रिकॉर्ड में वर्णित हेम प्रकाश शर्मा के पते का दौरा किया, तो उन्हें वहाँ दो मंज़िला घर मिला। उसमें दीपिका शर्मा नाम की एक महिला अपने परिवार के साथ 60 के दशक से रह रही थी। उस महिला ने हेम प्रकाश शर्मा के बारे में कुछ भी पता होने से इनकार कर दिया।

अब सवाल यह उठता है कि फिर ये रहस्यमय पुरुष आख़िर है कौन? क्या वो काल्पनिक हैं? अगर हाँ, तो इन कार्यों का वित्तपोषण कौन कर रहा है? आख़िर अरविंद केजरीवाल, हमसे ऐसा क्या छिपा रहे हैं?

जब आम आदमी पार्टी भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में आई, तो यह भारत में राजनीतिक दलों के काम करने के तरीके को बदलने के वादे के साथ मैदान पर आई। इसने अपने कार्यों में पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता का वादा किया, और अधिकांश लोगों ने उनके इस वादे पर भरोसा भी किया। लेकिन इस पार्टी ने जो एक अभिनव का काम किया, वह यह था कि उसने अपनी वेबसाइट पर मिलने वाले दान की एक सूची प्रकाशित की, जिससे उसकी वित्तीय गतिविधियों की पारदर्शिता सबके सामने रहे।

वर्ष 2016 में, पार्टी ने अपनी वेबसाइट से इस दान सूची को हटा लिया। उस समय, सूची वाला वेबपेज अभी ‘under construction’ है और ‘New Version coming soon..’ जैसा मैसेज दिख रहा था। लेकिन वो New Version… कभी नहीं आया।

दान सूची को हटाने के लिए योगेंद्र यादव और अन्ना हजारे सहित कई लोगों से बातचीत की गई थी। पार्टी के पूर्व सदस्य यादव ने आरोप लगाया था कि पार्टी नकद चंदा इकट्ठा कर रही थी जो कि दर्ज नहीं था।

इसके बाद पार्टी ने अपनी वेबसाइट पर अपने दान पृष्ठ को फिर से जारी किया, लेकिन उसमें एक बदलाव भी शामिल था। उन्होंने पृष्ठ के लिए वेबपेज का पता बदल दिया। पहले पेज का नाम donate.aamaadmiparty.org था, लेकिन बाद में उसे aamaadmiparty.org से बदल दिया। 

पिछले साल नवंबर में, दिल्ली में ज़हरीले प्रदूषण की चपेट में आने के बाद केजरीवाल दुबई की निजी यात्रा पर गए थे। यह भी पता चला था कि दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन भी एक सप्ताह के लिए दुबई गए थे। केजरीवाल इससे पहले भी दुबई की यात्राएँ कर चुके हैं, जिसमें बिजनेस क्लास भी शामिल है।

इस बात का भी पता चला था कि सऊदी अरब स्थित भारतीय समुदाय आम आदमी पार्टी के प्रमुख समर्थकों में से एक है। पता चला था कि फरवरी 2015 में दिल्ली राज्य विधानसभा चुनावों में भाजपा को हराने पर वहाँ उन्होंने जश्न मनाया था। इसके ठीक एक साल बाद, उन्होंने दिल्ली में AAP सरकार के एक साल पूरे होने पर भी वहाँ जश्न मनाया था।

‘नरक से भी बदतर है दिल्ली, एक बार में बम से ही उड़ा दो’: 21 शहरों में सबसे दूषित पानी दिल्ली में

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट लम्बे समय से चिंता जता रहा है। इस बार कोर्ट ने राजधानी में जल प्रदूषण को लेकर टिप्पणी की है। दिल्ली में पानी की समस्या पहले से ही विकट है, तो वहीं दिल्ली में गंदे पानी से फैलने वाले रोगों की भी कमी नहीं हैं। इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है और कहा है कि राजधानी दिल्ली की हालत नरक से भी बदतर है। एक रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाते हुए कहा है कि लोगों को दम घोंट कर मारने से अच्छा है कि एक साथ बारूद से उड़ा दिया जाए।

इस मामले में कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी नोटिस जारी किया है। अपने नोटिस के ज़रिए कोर्ट ने लोगों को पीने का साफ़ पानी और साफ़ हवा उपलब्ध न करा पाने पर मुआवज़ा देने की बात भी कही है। कोर्ट ने कहा कि क्यों न इसके लिए सरकार को ज़िम्मेदारी दे दी जाए। बता दें कि एक जाँच रिपोर्ट के अनुसार भारत में 21 शहरों के पानी का सैम्पल जाँच के लिए लिया गया था। इनमें सबसे दूषित और खराब पानी दिल्ली का पाया गया।

दिल्ली के चीफ सेक्रेट्री ने भी इस बात को माना है कि दिल्ली की सत्ता के दो केंद्र होने के चलते प्रदूषण जैसे गंभीर विषय पर कोई सार्थक निर्णय नहीं लिया जा रहा। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यहाँ तक कह दिया, “लोगों को गैस चैंबर में रहने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है। 15 बोरों में बारूद लाकर सबको उड़ा दीजिए। लोगों को इस तरह क्यों घुटना पड़े।”

वही पंजाब और हरियाणा में पराली जलाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रवैय्या दिखाया। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के मुख्य सचिव से सवाल किया कि आखिर आप ऐसा कर कैसे सकते हैं, ऐसा कर के आप लोगों को मरने के लिए छोड़ दे रहे हैं।

मुख्या सचिव से सीधा सवाल करते हुए कोर्ट ने पूछा कि आप इस पर क्यों नियन्त्रण नहीं कर पा रहे? क्या यह मान लिया जाए कि आप इसमें विफल हो गए हैं ? कोर्ट ने आगे कहा कि आप यह बताइए कि आदेश के बाद और भी ज्यादा पराली क्यों जलाई जा रही है?

इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के मुख्यासचिव से भी जवाब तलब किया। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ” सभी को यह पता होना चाहिए है कि इस मामले को लेकर हम आपको बिलकुल भी छोड़ने वाले नहीं हैं” बता दें कि जस्टिस अरुण मिश्र ने यूपी के चीफ सेक्रेटरी को पराली जलने के सम्बन्ध में कड़ी चेतवानी दी है। वहीं उत्तर प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी ने बताया कि पराली जलाने को लेकर राज्य में तकरीबन 1000 एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं साथ ही एक करोड़ का जुर्माना भी लगा दिया गया है।

मुंबई चलाने में नाकाम पार्टी महाराष्ट्र कैसे चलाएगी: अजित पवार ने मनाने आए NCP नेताओं से कही ये 5 बातें

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और एनसीपी के अजित पवार अपनी पार्टी से बगावत कर के उप-मुख्यमंत्री बने। अजित को मनाने के लिए शरद पवार ने अपने विश्वस्त क्षत्रपों को भेजा लेकिन सब नाकाम हुए। अजित पवार ने सोशल मीडिया पर मिल रही बधाइयों का जवाब देते हुए सबका धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि पूरे 5 साल सरकार चलेगी। हालाँकि, एनसीपी ने उन्हें विधायक दल का नेता पद से तो हटा दिया है लेकिन पार्टी से नहीं निकाला है। जयंत पाटिल, छगन भुजबन और वलसे पाटिल सहित कई नेताओं ने अजित के साथ बैठक कर उन्हें मनाने की कोशिश की।

इस दौरान अजित पवार ने एनसीपी नेताओं के सामने कई तर्क रखे। उन्होंने ख़ुद को सही साबित करने के लिए 5 बिंदुओं को एनसीपी नेताओं के सामने रखा। वो 5 बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. पाँच सालों के लिए NCP का मुख्यमंत्री क्यों नहीं?

अजित पवार ने पूछा कि जब 56 सीटों वाली शिवसेना 105 सीटों वाली भाजपा से ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री माँग रही थी तो अब उसे एनसीपी और कॉन्ग्रेस के साथ वाले गठबंधन में पूरे 5 सालों के लिए मुख्यमंत्री का पद क्यों दिया जाए?

अजित पवार ने एनसीपी नेताओं को कहा कि उद्धव ठाकरे 54 सीटों वाली एनसीपी को ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद क्यों नहीं देगी? उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि एनसीपी नेताओं का शिवसेना के सामने झुकना उन्हें पसंद नहीं है।

2. गठबंधन लोकतंत्र विरोधी नहीं

अजित पवार ने एनसीपी नेताओं से पूछा कि अगर भाजपा और एनसीपी के गठबंधन को अलोकतांत्रिक बताया जा रहा है तो फिर शिवसेना के साथ उसका गठबंधन लोकतान्त्रिक कैसे हुआ? उन्होंने नेताओं को याद दिलाया कि कैसे शिवसेना नेताओं ने चुनाव के दौरान कई बार सीमाएँ लाँघते हुए एनसीपी व एनसीपी नेताओं के ख़िलाफ़ ओछी भाषा का प्रयोग किया।

3. टिकाऊ होगा भाजपा-एनसीपी गठबंधन

अजित पवार ने कहा कि तीन दल मिल कर सरकार बनाएँ, इससे अच्छा है कि दो पार्टियों की एक स्थिर सरकार हो। उन्होंने शंका जताई कि तीन दलों की सरकार ठीक से नहीं चल पाएगी। उन्होंने शिवसेना के व्यवहार की चर्चा करते हुए कहा कि उसके साथ गठबंधन टिकाऊ नहीं होगा।

4. महाराष्ट्र के साथ वफादार नहीं है शिवसेना

अजित पवार ने उदाहरण देते हुए बताया कि शिवसेना ने कॉन्ग्रेस की आपत्ति के कारण ‘महा शिव अघाड़ी’ नाम में से ‘शिव’ हटा दिया। उन्होंने पूछा कि ऐसी पार्टी महाराष्ट्र के गर्व के साथ न्याय कैसे करेगी? उन्होंने कहा कि शिवसेना मराठा स्वाभिमान को आगे ले जाने वाली पार्टी नहीं है।

5. मुंबई संभालने में नाकाम हो रही शिवसेना

बृहन्मुम्बई महानगरपालिका में एक अरसे से शिवसेना काबिज है। अजित पवार ने कहा कि शिवसेना उसे चलाने में ही नाकाम सिद्ध हो रही है। उन्होंने उन्हें मनाने आए एनसीपी नेताओं से पूछा कि जो शिवसेना मुंबई संभालने में नाकाम हो रही है, वो पूरे राज्य को कैसे संभालेगी? उन्होंने कहा कि राज्य चलाने के मामले में शिवसेना पर भरोसा करना सही नहीं है।

जब चमकी मारवाड़ी तलवार तो सलावत खान के दिल के हो गई पार, दरबार छोड़ नंगे पाँव भागा शाहजहाँ

इतिहास में कई योद्धाओं के नाम प्रचलित हैं। उनमें से कई ऐसे भी थे, जिन्हें मज़बूरी में इस्लामिक आक्रांताओं की तरफ से लड़ाइयाँ लड़नी पड़ी थी। कुछ मज़बूरी में गए थे तो कुछ अपनों से ही बदला लेने के लिए। कुछ गद्दार भी थे, जिन्होंने विदेशियों के साथ लड़ते हुए अपनों का ख़ून बहाया। मेवाड़ के शक्ति सिंह ने अकबर के दरबार में हाजिरी लगाई, लेकिन जब उनका जमीर जागा तो उन्होंने बड़े भाई प्रताप के प्राणों की रक्षा की। इसी तरह नागौर के अमर सिंह राठौड़ का नाम भी लोकप्रिय है, जिसे राजस्थान में आज भी याद किया जाता है।

अमर सिंह ने मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के भरे दरबार में ऐसा कारनामा किया था कि ये ख़बर पूरे देश में पहुँची और उनके सहस को देख कर इस्लामिक आक्रांता थर्रा उठे। इस घटना के बारे में विस्तार से बताने से पहले अमर सिंह के बारे में बताना ज़रूरी है। वो राठौड़ राजवंश के राजा गज सिंह प्रथम के पुत्र थे। गज सिंह को ‘दलथम्मन’ भी कहा जाता था। ये उपाधि उन्हें तत्कालीन मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने दी थी। हालाँकि, गज सिंह की मृत्यु के बाद अमर सिंह बड़ा पुत्र होने के बावजूद मारवाड़ के सिंहासन पर नहीं बैठ पाए। सत्ता उनके छोटे भाई जसवंत के साथ में गई। अमर सिंह उनलोगों की नज़र में काफ़ी उद्दंड थे।

उन्हें मारवाड़ से निकाल दिया गया और वो मुगलों के पास गए। शाहजहाँ ने उन्हें नागौर की जागीर दी। लेकिन, अमर सिंह स्वतंत्र विचारों वाले और स्वाभिमानी किस्म के व्यक्ति थे। मारवाड़ में भले ही वो राजा नहीं बन पाए लेकिन वो राजा से भी ज्यादा लोकप्रिय थे। दक्षिण में उनके पिता ने जितने भी युद्ध लड़े थे, उसमें अमर सिंह ने अदम्य सहस और पराक्रम दिखाया था। फिर भी बाहर निकाले जाने पर उन्होंने आगरा के मुग़ल दरबाद में शरण ली। उनके साथ राठौड़ राजवंश के कई अन्य लोग भी अगवा आए।

अमर सिंह की बहादुरी से प्रभावित होकर शाहजहाँ ने उन्हें 3000 घोड़ों वाली सेना का कमांडर बनाया। उन्हें ‘मंसब’ और ‘राव’ के टाइटल से नवाजा गया। नागौर एक स्वतंत्र जागीर था, जिसे शाहजहाँ की गद्दी से चलाया जाता था। अमर सिंह का बढ़ता क़द कई दरबारियों को रास नहीं आया और वो उनसे जलने लगे। शाहजहाँ के दरबार के अन्य दरबारी उन्हें ठिकाना लगाने का उपाय तलाशने लगे। एक बार वो शिकार पर गए और 2 सप्ताह तक नहीं लौटे। अमर सिंह इस दौरान शाहजहाँ के दरबार से भी ग़ैर-हाजिर रहे।

अब यहाँ एक दूसरे किरदार की एंट्री होती है, जिसका नाम था सलावत ख़ान। सलावत ख़ान शाहजहाँ का कोषाधिकारी था। एक तरह से पूरे खजाने का इंचार्ज वही था। जब अमर सिंह वापस आए तो सलावत ख़ान उन पर हुक्म चलाने लगा। उसने दादागिरी दिखाते हुए पूछा कि वो इतने दिनों तक कहाँ थे और दरबार से अनुपस्थित क्यों रहे। अमर सिंह को ये पसंद नहीं आया और उन्होंने कहा कि वो सीधे बादशाह को जवाब देंगे। लेकिन, सलावत ख़ान उनसे जुर्माना वसूलने की बात करने लगा। अमर सिंह ने अपनी तलवार और म्यान दिखाते हुए कहा कि उनके पास यही एक धन है और अगर चाहिए तो सलावत ख़ान आकर ले जाए।

जब यह सब हो रहा था, तब पूरा दरबार भरा हुआ था। शाहजहाँ ख़ुद गद्दी पर बैठा हुआ था। सलावत ख़ान ने अमर सिंह को गँवार बताया और पूछा कि वो बादशाह के सामने अपनी आवाज़ ऊँची कैसे कर सकता है? इसके बाद अमर सिंह ने जो किया, वो इतिहास में दर्ज हो गया। गालियाँ न सिर्फ़ उन्हें बल्कि हिंदुत्व को भी दी गई थी, उनके धर्म को लेकर ओछी बातें कही गई थीं। अमर सिंह ने तुरंत अपने म्यान में से तलवार निकाली और अगले ही क्षण उनकी तलवार सलावत ख़ान के दिल को छेद कर उस पार निकल गई।

पूरे दरबार में हाहाकार मच गया। कुछ लोग वहाँ से उठ कर भागने लगे तो कुछ लोग सन्न रह गए। ख़ुद शाहजहाँ गद्दी से उठ कर अपने कक्ष में भाग खड़ा हुआ। मुग़ल सिपाहियों ने इसके बाद अमर सिंह को बंदी बनाने के लिए उन्हें घेर लिया। उसे एक पल के लिए ऐसा लगा कि अमर सिंह उस पर ही झपट रहे हैं, इसलिए वो वहाँ से नंगे पाँव भाग खड़ा हुआ। अमर सिंह वहाँ से भाग निकले। आगरा किले के दरवाजों को बंद कर दिया गया। लेकिन, बहादुर अमर सिंह घोड़ा सहित दीवार फाँद कर वहाँ से निकल लिए।

जब-जब भारतीय सूरमाओं ने अपनी बहादुरी से इस्लामिक आक्रांताओं को चित कर दिया, तब-तब भारत-विरोधी ताक़तों ने धोखे और छल का तरीका अपनाया। इसलिए, शाहजहाँ ने भी छल का रास्ता अपनाया। अमर सिंह को संधि के बहाने आगरा बुलाया गया और फिर पीछे से मार डाला गया। अमर सिंह के घोड़े की प्रतिमा भी किले के पश्चिमी दरवाजे पर लगवाई गई। अमर सिंह की याद में उनकी बहादुरी को सलाम करने के लिए अकबर दरवाजा का नाम बदल कर अमर सिंह दरवाजा कर दिया गया।

लेकिन, मुगलों ने अमर सिंह जैसे वीर योद्धा के मृत शरीर के साथ जो किया, उसके लिए इतिहास उन्हें शायद ही माफ़ कर पाए। अमर सिंह के मृत शरीर को नदी में फेंक दिया गया- उस जगह पर, जहाँ पर भिखारियों की लाशें पड़ी रहती थीं। अमर सिंह के शरीर को चील-कौवों के खाने के लिए छोड़ दिया गया। अमर सिंह की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी को सती होना पड़ा। अमर सिंह की पत्नी ने पहले ख़ुद तलवार निकाल कर पति का मृत शरीर लाने की ठानी थी, लेकिन भतीजे राम सिंह के आग्रह पर उन्होंने उसे वहाँ जाने दिया। उस वक़्त राम सिंह की उम्र मात्र 15 वर्ष थी।

राम सिंह ने भी अपने चाचा की तरह ही बहादुरी का परिचय दिया और अमर सिंह का मृत शरीर लेकर आए। रोका, लेकिन वो नहीं रुके। हजारों मुग़ल सिपाहियों के बीच से अपने चाचा के पार्थिव शरीर को वे अंतिम संस्कार के लिए वापस लेकर आए। इतिहास में ऐसे योद्धा शायद कहीं गुम हो गए हैं। रह गया है तो शाहजहाँ और उसका ताजमहल। वही ताजमहल, जिसे अपने अंतिम दिनों में वह एक किले में नज़रबंद होकर देखा करता था। वहीं, नागौर और मारवाड़ में आज भी अमर सिंह और राम सिंह के किस्से सुनाए जाते हैं। आज भी ‘अमर सिंह दरवाजा’ उस वीरता की गाथा कहता है।

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