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मुस्लिमों को ख़ुश करने के लिए इंदिरा ने पागल महिला के सामने टेके थे घुटने: दे दिया था दिल्ली का महल

1970 के दशक की बात है। इंदिरा गाँधी देश की प्रधानमंत्री हुआ करती थीं। एक महिला अपने दो बच्चों के साथ दिल्ली आती है और उसका दावा है कि वह अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह की वारिस हैं। उस औरत ने अपना नाम विलायत बेग़म बताया। उस महिला ने अपने बच्चों का नाम राजकुमार रज़ा महल और राजकुमारी सकीना बताया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस महिला ने दावा किया कि एक समय उसका परिवार बेहद आलीशान जिंदगी जिया करता था। उसने सरकार से माँग रखी कि नई दिल्ली के चाणक्यपुरी में बसा मालचा महल उसे रहने के लिए दे दिया जाए।

महिला ने दावा किया कि उसके पति अवध की रियासत के नवाब वाजिद अली शाह के वंशज थे, सम्प्रदाय से वह लोग शिया थे और अवध रियासत के आखिरी नवाब के खानदान से ताल्लुक होने के चलते इसपर उनका हक है। बता दें कि नवाब वाजिद अली शाह को 1856 में अंग्रेजों ने कलकत्ता के पास माटियाबुर्ज में क़ैद कर दिया था।

न्यू-यॉर्क टाइम्स की एक खबर की मानें तो इस महिला ने इंदिरा गाँधी को चकमा देकर सरकार से दिल्ली के मालचा महल की संपत्ति ही हथिया ली। जब विलायत बेग़म ने अपनी माँग को लेकर इंदिरा सरकार पर दबाव डाला तो यूपी सरकार ने भी इस बात पर जोर दिया कि उसकी माँग को मान लिया जाए अन्यथा शिया समुदाय इसे अपनी तौहीनी समझेंगे। इसके बाद खुद इंदिरा गाँधी को अपनी सरकार के प्रति शिया समुदाय के विश्वास की चिंता होने लगी और उन्होंने इस मामले में घुटने टेकना ही मुनासिब समझा।

अपने दावे को और मज़बूत करने के लिए वह महिला विदेशी संवाददाताओं से मिलती जिनके ज़रिये उसकी कहानी दुनिया तक फैलती रही। 1984 आते-आते विलायत बेग़म ने भारत सरकार से समझौता करते-करते मालचा महल ले लिया। इंदिरा गाँधी ने भी इसको लेकर पूछे जाने पर सफाई पेश करते हुए कहा कि विलायत बेग़म ने सबसे कम लोकप्रिय मोनुमेंट मालचा महल को अपने रहने के लिए चुना है। बता दें कि यह खँडहर एक ज़माने में फ़िरोज़शाह तुगलक का हंटिंग लॉज हुआ करता था। तुगलक जब शिकार पर निकलते थे तो यहीं ठहरते थे। 1993 के बाद इस मालचा महल को लेकर कई जनश्रुतियाँ प्रचलित हुईं जिनमे कहा गया कि इस महल में रहने वाली विलायत बेग़म ने हीरे को पीसकर निगल लिया और आत्म-हत्या कर ली।

अवध के राजपरिवार का मालचा महल दरअसल नई दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में स्थित है। कहा जाता है कि वर्ष 2016 में इस खानदान के राजकुमार प्रिंस साइरस और प्रिंस अली रजा की मौत के बाद से ही यह इमारत खाली और वीरान पड़ी है। अभी तक यही माना जाता रहा है कि विलायत बेग़म के पति वाजिद अली शाह के खानदानी थे। लेकिन, न्यू-यॉर्क टाइम्स की एक पत्रकार एलेन बैरी ने यह दावा किया कि यह महज़ एक ढोंग था। खुद को बेग़म कहने वाली विलायत और उसके बच्चों ने जो दावे किए वह झूठे थे।

दरअसल विलायत बेग़म की शादी लखनऊ में हुई थी मगर बँटवारे के वक़्त हुई हिंसा के बाद उनके पति पाकिस्तान में जा बसे। एलेन के मुताबिक, पति की मौत के बाद दिन-प्रतिदिन विलायत की हालत वहाँ बिगड़ने लगी। लखनऊ से बाहर निकलने के बाद वह खुद को संभाल नहीं पाई थी। उसकी हालत इस कदर बिगड़ती चली गई कि एक बार तो उसने पाकिस्तान के पीएम को थप्पड़ तक मार दिया था (हालाँकि एलेन ने पीएम के नाम का ज़िक्र नहीं किया है)।

इस हरकत के लिए विलायत को बड़ी सज़ा से बचाने के लिए लन्दन के एक मेंटल हॉस्पिटल में 6 महीने के लिए डाल दिया गया। उसे वहाँ मेंटल करार दे दिया गया, रोज़ इंजेक्शन लगाए जाते। विलायत ने वहाँ से निकलकर नई दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और अपने चार बच्चों के साथ 1970 में हिन्दुस्तान भाग आई। अपने और अपने चार बच्चों से जुड़े कोई भी वैध दस्तावेज़ उस महिला के पास नहीं थे। न ही भारतीय प्रशासन ने इसके लिए उस महिला की कोई जाँच की।

उस महिला ने भारत में दाखिल होते ही कहा कि वह एक नवाब की खानदानी है और इंदिरा सरकार ने उसकी यह माँग मान ली। दिल्ली के मालचा महल में जाने से पहले उसने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफोर्म पर भी कुछ साल बिताए किसी ने भी इस मामले को लेकर एक सवाल तक नहीं किया।

इमरान खान को अयोग्य ठहराने की उठी माँग: लाहौर HC में दायर हुई याचिका

क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं हैं। आलम ये है अभी तक जहाँ उनके ख़िलाफ़ केवल प्रदर्शन किए जा रहे थे, तरह-तरह की बयानबाजियाँ सामने आ रहीं थी। तो वहीं, अब उनके ख़िलाफ़ खुलकर कानूनी कार्रवाई किए जाने की माँग उठने लगी है। इस वक्त उनपर दो तरफ से मुश्किलें आई हैं। एक ओर जहाँ उनकी पार्टी के संस्थापक सदस्य अकबर एस बाबर ने चुनाव आयोग से उनकी पार्टी के ख़िलाफ़ विदेशी चंदा मामले की जाँच का अनुरोध किया है, तो वहीं अब कोर्ट के खिलाफ कथित तौर पर टिप्पणी करने के मामले में उनके खिलाफ याचिका दायर की गई है। इस याचिका में इमरान खान को अयोग्य करार देने की माँग उठाई गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इमरान ने पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विदेश में इलाज कराने को लेकर कथित तौर पर कोर्ट के खिलाफ और चीफ जस्टिस आसिफ सईद पर टिप्पणी की थी। जिसके बाद एक शख्स ताहिर मसूद ने लाहौर हाईकोर्ट में इमरान के खिलाफ याचिका दायर की। याचिका में मसूद ने कहा कि इमरान खान पर कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चलना चाहिए।

प्रधानमंत्री इमरान खान के खिलाफ़ याचिका दायर करते हुए मसूद ने ये भी आरोप लगाया है कि खान ने वरिष्ठ न्यायधीशों की आलोचना की है। इसके साथ ही उन्होंने पिछली बार 2013 में कोर्ट के खिलाफ टिप्पणी करने के मामले का भी जिक्र भी याचिका में किया और कहा कि इससे पहले भी इमरान खान कोर्ट के ख़िलाफ़ टिप्पणी कर चुके हैं। मसूद ने अपनी याचिका में अन्य नेताओं को कोर्ट के ख़िलाफ़ बोलने पर हुई सजा का हवाला दिया और इमरान खान को अयोग्य करार देने की माँग उठाई।उन्होंने निर्वाचन आयोग से खान की नेशनल असेंबली सदस्यता रद्द करने को भी कहा है।

गौरतलब है कि इससे पहले इमरान खान को उनकी पार्टी के संस्थापक सदस्य अकबर एस बाबर द्वारा भी आड़े हाथों लिया जा चुका है और चुनाव आयोग ने भी उनकी ओर कड़ा रुख अपनाया है। जहाँ बाबर ने चुनाव आयोग से विदेशी चंदा मामले की जाँच का अनुरोध किया है। वहीं, चुनाव आयोग इस माँग से तीन दिन पहले ही पार्टी के खिलाफ़ 5 साल पुराने विदेशी चंदा मामले की सुनवाई रोजाना करने का फैसला कर लिया है।

बता दें, इस संबंध में बाबर ने नवंबर, 2014 में पार्टी को मिले विदेशी चंदे के खिलाफ एक मामला दायर किया था। इसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि 21 करोड़ रुपए की रकम पार्टी को 2 विदेशी कंपनियों से हुंडी के जरिए मिली और बाद में इसे पश्चिम एशिया से पाकिस्तान स्थित खातों में भेजा गया था।

‘BJP ने अजित के रूप में एक भैंसा अपने बाड़े में बाँध दिया और दूध दुहने के लिए ऑपरेशन कमल की योजना बनाई’

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना लगातार भाजपा पर हमला कर रहे हैं। इन सबके बीच शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के जरिए एक बार फिर भाजपा पर तीखा वार किया है। ‘लड्डू हजम होंगे क्या? बगावत असफल!!’ नाम के शीर्षक से लिखे गए इस लेख में कहा गया है कि कुछ भी हो जाए, बीजेपी विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाएगी।

इस लेख में बीजेपी का नाम लेते हुए कहा गया है, “अजित पवार के रूप में उन्होंने एक भैंसे को अपने बाड़े में लाकर बाँध दिया है और भैंसे से दूध दुहने के लिए ‘ऑपरेशन कमल’ योजना बनाई है। यही लोग सत्ता ही उद्देश्य नहीं है, ऐसा प्रवचन झाड़ते हुए नैतिकता बघार रहे थे। अब तुम्हारे पास बहुमत है ये देखकर ही राज्यपाल ने शपथ दिलाई है, ऐसा तुम कह रहे हो न? तो फिर ‘ऑपरेशन कमल’ जैसी ‘उठाईगिरी’ क्यों? हम उन्हें इस उठाईगिरी और भैंसागिरी के लिए शुभकामनाएँ देते हैं।”

लेख में आगे कहा गया है कि अजित पवार की यह कथित बगावत बालू पर गधे के मूतने पर हुई गंदगी जैसी हो गई है। महाराष्ट्र में जो कुछ हो रहा है उसे ‘नाटक’ कहना रंगमंच का अपमान है। पहले उन्होंने (बीजेपी) शिवसेना जैसा मित्र खो दिया और अब वे शातिर चोर की तरह रात के अंधेरे में अपराध कर रहे हैं। सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में राज्यपाल के समक्ष भाजपा के पास सरकार बनाने का मौका था। राज्यपाल उन्हीं की पार्टी और उन्हीं की नीति के होने के कारण भगतसिंह कोश्यारी ने भाजपा के नेताओं को निमंत्रित किया ही था। उन्होंने नकार दिया। शिवसेना को बुलाया गया। लेकिन सरकार बनाने के लिए 24 घंटे भी नहीं दिए गए। इसलिए पर्दे के पीछे जो तय किया गया था उसके अनुसार राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लाद दिया।

संपादकीय में लिखा गया है, “कॉन्ग्रेस, शिवसेना और राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी की आने वाली सरकार नैतिक या अनैतिक की बात छोड़ो लेकिन देवेंद्र फडणवीस और उनकी पार्टी ने ये किसको जन्म दिया है? सिर गधे का और धड़ भैंसे का ऐसा प्रारूप महाराष्ट्र के माथे पर मार कर ये लोग एक-दूसरे को लड्डू खिलाते हैं। लेकिन लड्डू खिलाते समय वो उनके गले के नीचे नहीं उतर रहा था और उनके चेहरे पर आनंद के भाव भी नहीं थे। असली सवाल ये है कि ये लड्डू उन्हें हजम होंगे क्या और इसका उत्तर है- नहीं।”

सामना के संपादकीय में अंत में लिखा गया है कि भाजपा के साथ जाकर अजित पवार ने राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस के विधायकों को फँसाया है। भाजपा ने अजित पवार को फँसाया और सबने मिलकर महाराष्ट्र को फँसाया। इस धोखाधड़ी में राजभवन का दुरुपयोग हुआ। ये पाप है। लेकिन पाप-पुण्य की बजाय जिनके लिए सत्ता महत्वपूर्ण है, ये उनका आखिरी दौर है। थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए।

175, 162, 154… कितने MLA हैं साथ, यह शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस को खुद नहीं पता

288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में बहुमत का आँकड़ा 145 है। विधानसभा चुनाव में शिवसेना को 56, कॉन्ग्रेस को 44 और एनसीपी को 54 सीटें मिली थी। तीनों दलों की सीटें जोड़ दें तो यह आँकड़ा 154 होता है। शिवसेना का दावा है कि कुछ निर्दलीय भी उसके साथ हैं। इसके अलावा कुछ छोटे दलों का समर्थन होने की बात भी कही जा रही है। लेकिन, शायद ही तीनों दलों में किसी नेता को पता है कि असल में उनके साथ कितने विधायक हैं।

इसका कारण यह है कि शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस के खेमे से आज ही समर्थक विधायकों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान इनके वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने 154 विधायकों के समर्थन का दावा किया। वहीं, शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे ने बताया कि गवर्नर को 162 विधायकों के समर्थन का पत्र सौंपा गया है।

वैसे, शिंदे जिस नंबर का दावा कर रहे हैं वह उनके ही पार्टी के सांसद संजय राउत की ओर से बार-बार किए जा रहे दावे से अलग है। ढाई साल के लिए सीएम पद की शिवसेना की मॉंग जब भाजपा ने ठुकराई उसके बाद से ही राउत 175 के करीब विधायकों के समर्थन का दावा करते रहे हैं। 3 नवंबर को राउत ने कहा था, “170 विधायक हमारा समर्थन कर रहे हैं। यह आँकड़ा 175 भी हो सकता है।” इसके बाद से वे लगातार इस नंबर को दुहराते रहे हैं। यहॉं तक कि अजित पवार के नेतृत्व वाले एनसीपी के धड़े के बीजेपी के साथ जाने के बाद से भी वे इस आँकड़े को दोहराते रहे हैं।

शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस के नेता आज यानी 25 नवंबर को राज्यपाल के पास गए। इसके बाद एनसीपी नेता जयंत पाटिल ने कहा कि उनके साथ 162 विधायक हैं। यही संख्या शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे ने भी दुहराया।

25 नवंबर को ही सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस की ओर नया शपथ-पत्र पेश किया गया, जिसमें 154 विधायकों के समर्थन की बात कही गई थी। हालॉंकि कोर्ट ने इसे लेने से मना कर दिया। इसके बाद कॉन्ग्रेस नेता और याचिकाकर्ताओं के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि वे इस शपथ-पत्र को वापस ले रहे हैं।

इन तीनों दलों का गठबंधन भले बहुमत होने, 10 मिनट में बहुमत साबित करने का दावा कर रहे हों, लेकिन, समर्थक विधायकों को लेकर जिस तरह हर मौके पर इनकी संख्या बदली है, उससे जाहिर होता है कि वे खुद भी नहीं जानते कि उनके साथ कौन है और कौन नहीं। अजित पवार के बीजेपी के साथ जाने के बाद से एनसीपी दावा कर रही है कि 54 में से 52 विधायक पार्टी के साथ हैं। लेकिन, 24 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सिंघवी ने कहा था कि मात्र 42-43 विधायकों के समर्थन से अजित पवार उप मुख्यमंत्री कैसे बन सकते हैं?

ऑपइंडिया को सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार अजित पवार के साथ कम से कम 27 विधायक हैं। एनसीपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री छगन भुजबल ने सोमवार की सुबह उनसे बात की थी। बताया जाता है कि भुजबल ने अजित पवार से कहा कि पार्टी के 30 से 35 विधायक उनके न होने से असहज महसूस कर रहे हैं और यह आँकड़ा बढ़ भी सकता है।

ऑपइंडिया Exclusive: अजित पवार के पक्ष में 27 विधायक, मतदान से दूर रह सकते हैं कॉन्ग्रेस MLA

41 सालों में 4 बार CM रहे लेकिन कभी जनता ने शरद पवार को बहुमत नहीं दिया: बोया पेड़ बबूल का…

रोहतगी ने SC में उड़ाई विपक्ष की धज्जियाँ: बोले- तीनों पार्टियों का एक वकील तक नहीं, एक पवार BJP के साथ

ध्रुव राठी, आकाश बनर्जी, पीईंग हृयूमन, कुणाल कामरा… तुम करो तो प्यार-व्यार, हम करें तो…

वामपंथी-लिबरल गिरोह के नैरेटिव पर लगातार प्रहार करने की जरूरत है क्योंकि ये रक्तबीज बन कर समाने आए हैं। एक प्रपंच को काटिए, दूसरा पैदा कर देंगे, उसको काटिए, तीसरा आ जाएगा। प्रपंच और प्रोपगेंडा बनाना एक सतत प्रक्रिया है जिसमें, अपने तंत्र के कारण, राठी-बनर्जी-कामरा टाइप के फेक न्यूज फैलाने वाले नवलौंडे भी लाखों लोगों द्वारा ‘तथ्य और आँकड़ों’ के साथ बात करने वाले के तौर पर देखे जाते हैं।

चाहे वो ध्रुव राठी हो या लम्पट आकाश बनर्जी, इन्होंने इस पूरे साल, और उससे पहले भी, इतना ज्यादा झूठ बोला है, अपने विडियो में जिसकी न तो आदि है, न अंत। इन्हें लगता है कि सामने वाला तो मूर्ख है, विडियो के कोने में कुछ भी जोड़-घटाव और कुछ संख्या दिखा दो, वो उसे तथ्यात्मक आँकड़ा मान लेगा। और दुर्भाग्य देखिए वामपंथियों का कि वे सच में इन चिरांधों की विष्ठा को सुगंधित पुष्प मान कर चरमसुख पाने लगते हैं।

इनका क्या है, इन्हें आम आदमी पार्टी जैसों से लगातार प्रश्रय मिलता रहा है, केजरीवाल इनके प्रपंच को ट्वीट करते हैं, अजेंडाबाज रवीश अपने शो में बुला कर इन्हें सर्टिफाय करता है और बीबीसी तक इन जैसों को चुनाव में वैचारिक रैलियाँ करने के लिहाज से पैसे देता है। ये पूरा तंत्र है, और उसके बाद अकादमिक संस्थानों में वामपंथियों के वर्चस्व से स्कूल से निकल कर, कॉलेज पहुँचे विद्यार्थी इनका सबसे पहला शिकार बनते हैं। इन्हें सत्यान्वेषी मानने वालों की सबसे बड़ी भीड़ दिल्ली जैसे जगहों के कॉलेजों के 20-22 साल के अंडरग्रेजुएट छात्र-छात्राओं की है।

कैसे काम करता है यह तंत्र?

इनमें बच्चों का ज्यादा दोष नहीं है। इस उम्र में जब आपको अचानक से उस ‘यूनिफॉर्म’ से छूट मिलती है, जो न सिर्फ एक कपड़ा था बल्कि हर बच्चा एक ही तरह से उठता-बैठता-सोचता था, क्योंकि विद्यालयों में यही होता है, तब आप इस अचानक से मिली स्वच्छंदता से एक सुंदर आघात महसूस करते हैं। आप उस मोड में चले जाते हैं जहाँ ‘हाँ’ कहने वाले से ज्यादा वजन ‘ना’ कहने वाले की बातों में होता है।

ये मनोविज्ञान है और आप स्वयं इसे महसूस करते होंगे कि किसी भी समूह में, अगर अधिकतर व्यक्ति कह रहे हों ‘सुबह का सूरज लाल होता है’, लेकिन एक व्यक्ति कह दे कि वो ऐसा नहीं मानता, तो सब उसकी तरफ देखने लगते हैं। उसके बाद वो अपने बोलने के तरीके से आपसे मनवा लेगा कि सूरज होता तो पीला है, लेकिन हवाओं में मौजूद फलाने अवयवों के कारण हमें लगता है कि वो लाल है।

वैसे ही, अन्य मौकों पर भी एकदम अलग विचार रखने वालों को ‘रेबेल’ के रूप में इज्जत मिलती है, चाहे वो विचार सच्चाई से दूर और तथ्यहीन ही क्यों न हों। ऐसे में कॉलेज में पहुँचे बच्चों को यह मनाने में बहुत आसानी होती है कि सरकार बेकार है। भारत जैसे देश में सरकार का बेकार होना, हर काल और परिस्थिति में एक अकाट्य सत्य है। आप गरीबी का आँकड़ा ले आइए, टूटी सड़क दिखा दीजिए, हॉस्पिटल के कोने में जमा कूड़ा दिखा दीजिए, देखने वाले को हमेशा लगेगा कि भारत बेकार है।

यही होता है कि इन बच्चों के साथ। ये बच्चे स्कूल छोड़ कर आते हैं, ऊर्जा भरी होती है, चार विलक्षण सीनियर या शिक्षक आपसे कह देते हैं कि सवाल करना चाहिए, और इससे पहले कि आप यह सोच पाएँ कि क्या सवाल करना चाहिए, आपको वामपंथी-लिबरल समूह अपने सवाल थमा देगा। फिर वो आपको समझाएगा कि विद्यार्थी जीवन पढ़ाई के लिए नहीं है, विद्रोह के लिए है, पोस्टर बनाने के लिए है, सत्ता से संघर्ष के लिए है। आपको कोई यह कह देगा कि पढ़ने से क्या हो जाएगा, पास करने भर नंबर लाओ, उतनी ही ज़रूरत होती है परीक्षा का फॉर्म भरने के लिए।

आप उनके जाल में फँसते जाते हैं। फिर आपको बताया जाता है कि जवानी बर्बाद मत करो, वैचारिक क्रांति करो। आप उनके ऐसे गुलाम बन चुके होते हैं कि स्वच्छंदता का मतलब अपने इस तरह के सीनियरों की हर बात को मानना हो जाता है। आपकी वैचारिक स्वतंत्रता का मतलब होता है कि ये वामपंथी-लिबरल गिरोह जिस तरह से सोचता है, आप भी वही सोचें। उसके बाद थोड़ा सा सेक्स का तड़का लगा दिया जाता है, थोड़ी शराब मिला दी जाती है, और अभी तक हर चीज माँ-बाप से डर कर करने वाले बच्चे, सेक्स को ही लिबरेशन मानने लगते हैं।

एक तरह से सीनियर आपको यूज करते हैं, आप यूज होते हैं, और आपको लगता है कि आप स्वतंत्र सोच रखने वाले वामपंथी हैं। आपको उकसाया जाता है क्योंकि आप झंडा उठा सकते हैं, कुर्सियाँ लगा सकते हैं, पोस्टर बना सकते हैं, खुले में दारू पी सकते हैं। आपको समझाया जाता है कि यही असली जीवन है, माँ-बाप और परिवार एक बंधन है। इस तरह से चक्रीय तरीके से साल-दर-साल इनके पैदल सिपाहियों की खेप तैयार होती रहती है।

आज के दौर में कॉलेजों की क्रांति से ही बात नहीं बनती। कॉलेज और यूनिवर्सिटी के बच्चे तो बस भीड़ होते हैं। तकनीक ने सीमाओं को तोड़ा है इसलिए सोशल मीडिया पर वामपंथियों ने अपने वर्चस्व के लिए वैचारिक आतंकियों की नियुक्ति की। इन्हें बुद्धिजीवी कहा गया जो कि ‘उदारवादी’ विचार रखने के नाम पर, ‘जो हम कह रहे हैं वही अभिव्यक्ति की आजादी है, बाकी सब कुछ हेट स्पीच, यानी घृणा फैलाने वाली बात है’, जैसे ध्येय वाक्य के साथ चलते हैं।

ऐसे परिदृश्य में इन कच्ची उम्र के युवाओं को उन्हीं के उम्र के लोगों द्वारा इस भेड़चाल का डिजिटल सिपाही बनाने के लिए ध्रुव राठी, आकाश बनर्जी, कुणाल कामरा जैसे लोगों से ले कर पीईंग ह्यूमन जैसे सोशल मीडिया हैंडल तैयार किए गए। ये लोग कहीं से आए नहीं, इन्हें योजनाबद्ध तरीके से, धीरे-धीरे, स्वतंत्र विचारों के नाम पर लाया गया। उसके बाद इन्हें राजनैतिक धक्के लगा कर, रवीश कुमार और केजरीवाल के गिरोह द्वारा ऊपर उठाया गया। बाकी का काम कॉलेज के इन बच्चों ने किया जिन्हें ‘व्यवस्था के खिलाफ’ होने के नाम पर कुछ भी दे दो, वो ले लेंगे। वो इसलिए ले लेंगे क्योंकि पहले से स्थापित नामों ने इन्हें अपना समर्थन दिया है। केजरीवाल राजनीति में मसीहा बन कर आए थे, रवीश पत्रकारिता के मसीहा थे, इन्होंने समर्थन दे दिया तो बाकी ज्यादा करना बचा नहीं।

इस प्रक्रिया के बाद ‘उदारवादी’ विचारधारा के नाम पर, ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर, इन्हें जो सबक सबसे पहले दिया जाता है, वो यह होता है कि दूसरे लोगों को तो दिमाग ही नहीं है, वो न तो पढ़े-लिखे हैं, न ही उन्हें बात करने की तमीज है। इन्हें कहा जाता है कि उन्हें तुरंत नकार दिया करो। इसलिए आप देखेंगे कि जेएनयू छाप लम्पट माओवंशी फेसबुक के कमेंट में भी अगर सवालों के घेरे में फँस जाता है तो वो लिखेगा, ‘थोड़ा पढ़ लिया करो कि मार्क्स ने क्या कहा है, भारत का संविधान क्या है’।

कहानी एक वामपंथी की

उसके बाद वो आपसे बात नहीं करेंगे। सोशल मीडिया पर ऐसा करना आसान है। लेकिन अगर बात आमने-सामने हो रही हो, तब वामपंथी बुरी तरह से फँस जाता है। यहाँ मैं एक कहानी सुनाना चाहूँगा, जो बीस दिन पहले ही मेरे साथ घटित हुई। एक वामपंथी थे, सीनियर हैं तो किसी के कहने पर मिलने चला गया। उन्होंने कहा कि वो मेरे विचारों का समर्थन नहीं करते, मैंने कहा कोई बात नहीं, सबको करना भी नहीं चाहिए। मैं चाह रहा था कि बातें वैयक्तिक ही रहे, राजनैतिक दिशा न लें, वरना दोनों के लिए असहज हो जाता।

लेकिन वामपंथी हर जगह अपनी राजनीति जरूर घुसा देते हैं, ये उनकी मजबूरी है। बात आ गई कि मोदी ने तो बर्बाद कर दिया है। मैंने पूछा कि क्या बर्बाद कर दिया। कहने लगे कि समाज में देखो कितनी समस्याएँ हैं, सब बर्बाद कर रहा है, लोग हिंसक हो गए हैं, अल्पसंख्यकों में डर है, सताया जा रहा है लोगों को। मैंने कहा कि अगर इतनी बर्बादी है, लोग डर रहे हैं तो समुदाय विशेष के इलाकों की आधी सीटों पर भाजपा कैसे जीत गई, लगातार हर राज्य में और केन्द्र में पहले से ज्यादा सीटें कैसे पा रही है?

वो कहने लगे कि हिटलर को भी इसी तरह का समर्थन हासिल था, मोदी भी वही है। मैंने दोबारा पूछा कि किस आधार पर हिटलर कह रहे हैं? वो कहने लगे कि कहना क्या है, वो है, गोधरा देख लो। मैंने पूछा कि ट्रेन में आग भी मोदी ने ही लगवाई थी जिसमें 59 कारसेवक जल गए? उस एक दंगे के अलावा बाकी के हर बड़े दंगे में उसी की सरकार रही है जिसमें आपको अचानक से आशा नजर आने लगी है, कम्यूनिस्टों ने बंगला और केरल में कितनी हत्याएँ करवाई हैं, वो भी पता कीजिए।

अब वो चर्चा से भागने की कोशिश करने लगे कि ये सब फासिज्म है, लोगों पर कानून थोपा जा रहा है, एक खास धर्म के लोगों को ही फायदा हो रहा है। मैंने फिर से पूछा कि सिलिंडर जो बाँटे गए, वो क्या हिन्दुओं को ही मिले? बिजली जो पहुँची वो हिन्दुओं के ही घर में पहुँची? बैंक खाते में जो सब्सिडी पहुँचती है वो हिन्दुओं का ही होता है? शौचालय जो बने वो हिन्दुओं के ही घरों में बने? ट्रिपल तलाक पर कानून हिन्दू महिलाओं के हित में आया? अगर ये फासिज्म है, तो बिलकुल सही है, सबको ऐसे फासिज्म का सपोर्ट करना चाहिए।

कहने लगे कि तुम आर्टिस्ट हो, क्रिएटिव व्यक्ति हो, तुम्हें सत्ता के खिलाफ होना चाहिए। मेरा सवाल था कि ऐसा किस तर्क से सही है? मतलब, कोई सरकार अगर अच्छे काम कर रही है तो हम उसकी इतनी आलोचना करें, ऐसा नैरेटिव बनाएँ कि वो अगली बार सत्ता में न आए, फिर दूसरी आए तो उसकी आलोचना करो… ये कैसा कुतर्क है? चोरों को सत्ता इसलिए दे दो क्योंकि क्रिएटिव लोगों को सत्ता के खिलाफ होना चाहिए! हद है!

जब कोई जवाब नहीं मिला, तो वामपंथियों का अंतिम जुमला आया, देख लेना आने वाले समय में इस देश का क्या होगा। मैंने पलट कर कह दिया कि जिनकी उम्मीद राहुल गाँधी पर टिकी हो, उन्हें भविष्य की चिंता नहीं करनी चाहिए। फिर चिकन चिली आ गई, और हम खाने लगे। ऐसा मेरे साथ एक बार नहीं, कई बार हुआ है। वामपंथियों से, या इन बच्चों से, आप सिर्फ सवाल पूछिए और वो कुछ नहीं बोल पाएँगे। कॉलेज में भी क्लास लेने गया था, वहाँ के बच्चों का भी यही हाल था। मैंने कहा कि जो कह रहा हूँ, वो मत मानो, इंटरनेट पर सर्च कर लो। फिर चुप हो गए सब।

अभिव्यक्ति की आजादी का ढोंग

वापस, पीईंग-राठी-बनर्जी-कामरा पर आते हैं जिन्होंने बौद्धिक आतंकवाद फैला रखा है। उनका मूल हथियार है निःसंकोच, चेहरे पर बिना किसी शिकन के, झूठ बोलते रहना। ऐसा ये लगातार करते रहे हैं। साथ ही, फ्रीडम ऑफ स्पीच के नाम पर आतंकवादियों और नक्सलियों के समर्थन में आने वाले ये लोग, कभी तक फ्रीडम ऑफ स्पीच में विश्वास दिखाते हैं जब तक वो बात इनके मतलब की हो। जहाँ बात इनके खिलाफ होती है, उसे ये सेकेंड भर में ‘फेक न्यूज’ कह कर खारिज कर देते हैं।

ऑपइंडिया ने लगातार वैसे अपराधों की रिपोर्टिंग की है जहाँ पीड़ित हिन्दू हो, और अभियुक्त मजहब विशेष से, क्योंकि बाकी लोग ऐसी रिपोर्ट में नाम छुपा लेते हैं, इसे ‘समुदाय विशेष’ लिखकर निपटा दिया करते हैं और कभी-कभी तो घटना को ही गायब कर देते हैं। हमने आँकड़े जुटाने शुरू किए, इस पर बात करने की कोशिश की कि मंदिरों पर आज भी हमला कौन करता है, मूर्तियाँ कौन तोड़ रहा है, गौरक्षकों को किस मजहब के लोग मार रहे हैं, काँवड़ियों पर रात के एक बजे छत पर बैठ कर पत्थरबाजी कौन करता है… और हर बार एक ही मजहब के लोगों के नाम सामने आए। बलात्कारियों के नामों में जब एक खास मजहब के लोग सामने आने लगे, और उस पर चर्चा होने लगी तो, एक लाइन में कहा जाने लगा कि ऑपइंडिया तो फेक न्यूज फैलाता है, कम्यूनल है।

हमने पूछा कि मजहब का आदमी बलात्कारी है, तो इसमें कम्यूनल क्या है? कट्टरपंथी मंदिर तोड़ रहा है तो इसमें साम्प्रदायिकता कहाँ हैं? कट्टरपंथियों ने घेर कर दसियों हिन्दुओं की लिंचिंग की है, तो इसमें धर्मांधता या बिगट्री कहाँ है? हिन्दुओं के त्योहारों पर अगर पत्थरबाजी हुई है तो इसमें झूठी बात क्या है, बिलकुल मजहबी घृणा से ओतप्रोत कट्टरपंथियों ने ये काम किया है, और वो हर बार रिपोर्ट किया जाएगा।

लेकिन इस तरह की रिपोर्टिंग से वामपंथियों की अधोजटाएँ सुलगने लगीं और स्थान विशेष से धुआँ निकलने लगा। वो सब इसलिए क्योंकि अभी तक बलात्कार की घटनाएँ तभी रिपोर्ट होती थी, जब अभियुक्त हिन्दू हो। हमने दूसरा पक्ष भी दिखाया। हमने बताया कि लिंचिंग तो भरत यादव, अंकित सक्सेना, ध्रुव त्यागी, प्रशांत पुजारी, डॉक्टर नारंग की भी हुई है। हमने बताया कि गौतस्करों ने तो बीस महीने में बीस हिन्दुओं की हत्या की है। पिछले सालों में 50 घटनाएँ ऐसी हुई हैं जो डरा हुआ ‘शांतिप्रिय’ के फर्जी नैरेटिव को ध्वस्त करता है। तब ये कहने लगे कि हम तो घृणा फैलाते हैं। अगर तथ्यों के साथ रिपोर्ट करना, वैचारिक स्तंभ लिखना घृणा फैलाना है, क्योंकि उसमें अपराधी की संलिप्तता है, तो ये काम जारी रहेगा।

अचानक से प्रेस के फ्री होने पर कोई चर्चा नहीं हो रही। मैं इन सब चम्पुओं को खुला चैलेंज देता रहा हूँ कि आओ, पूरी साइट पड़ी हुई है, हिन्दी में ही है, एक खबर निकाल दो जो गलत हो, तुम्हारी बात मान जाऊँगा। इनका दुर्भाग्य यह है कि हमने इनके फैक्टचेकरों का फैक्टचेक किया हुआ है। इनके ‘हेट क्राइम’ का डेटा इकट्ठा करने वालों का सच हम सामने लाए कि ये हिन्दुओं द्वारा, सामान्य अपराध में भी, समुदाय विशेष के पीड़ित होने पर उसे हेट क्राइम मान लेते हैं।

इसके उलट, पूरी तरह से मजहबी कारणों से की हुई हत्याएँ भी जिसमें हत्यारा मजहब विशेष से हो, पीड़ित हिन्दू, उसे हेट क्राइम नहीं मानते। सुप्रीम कोर्ट में इन वामपंथियों के वकील ने उसी साइट का नाम ले कर गलत आँकड़े दिखाने की कोशिश की, और सॉलिसिटर जनरल ने ऑपइंडिया की वो रिपोर्ट जजों के सामने रख दीं जहाँ उस साइट की फैक्ट चेकिंग कर हमने उसे झूठा साबित कर रखा था।

अभिव्यक्ति सिर्फ मेरी सही है, तुम्हारी नहीं

हाल ही में रेडियो जॉकी रौनक को इन निकम्मों के गैंग ने निशाने पर लिया। आरजे रौनक ने जेएनयू के आंदोलन पर एक विडियो बनाते हुए अपनी बात रखी और उसमें त्रुटिवश एक तस्वीर शेयर की जो कि उस आंदोलन का नहीं था। किसी ने जब उसकी ओर ध्यान दिलाया तो भूल-सुधार करते हुए, विडियो को संपादित करने के बाद, माफीनामे के साथ रौनक ने उसे सही किया। लेकिन आकाश बनर्जी जैसे चतुर चम्पू, जिनका फेक न्यूज फैलाने का इतिहास रहा है, ध्रुव राठी और पीईंग ह्यूमन के साथ इस बात के लिए उसे ऐसे टार्गेट करने लगे जैसे कि दुनिया की सारी समस्याओं की जड़ तो रौनक ही है।

ध्रुव राठी कई बार गलत आँकड़े देता पकड़ा जा चुका है। आम आदमी पार्टी की चाटुकारिता में इसकी जीभ और केजरीवाल जी का पृष्ठ भाग, दोनों ही, छिल चुके होंगे, लेकिन मजाल है कि चाटने में कोई कमी आई हो! बनर्जी भी कई बार लोगों द्वारा दुत्कारा जा चुका है, लेकिन मजाल है कि सुधरने की कोशि की हो, फेक न्यूज फैलाने पर कभी माफी माँगी हो! बिलकुल नहीं, क्योंकि तंत्र इनके झूठ को तथ्य की तरह फैलाता है, और हिटलर के प्रोपगेंडा मंत्री गोएबल्स के सारे दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए, एक ही प्रपंच को इतने जगह से चलाता है कि वो सच लगने लगता है।

लेकिन आम जनता इन रक्तबीजों को उन्हीं के प्लेटफॉर्म पर, उन्हीं की भाषा में जवाब देने लगी है। रौनक वाले मामले में, एक भूल के लिए, उसके बहिष्कार का जब ट्विटर ट्रेंड चला, तो उससे दुगुने लोगों ने उसके समर्थन का हैशटैग चला दिया। साथ ही, इन सारे लम्पटों के ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब पर आप कभी भी कमेंट सेक्शन में जाइए, इनके वैचारिक पैगम्बर रवीश के भी, तो आप पाएँगे कि कमेंट की संख्या तो बहुत ज्यादा होती है, लेकिन अधिकतर लोग उन्हें लानतें देने जाते हैं वहाँ।

इसलिए, बेचारे अब बिलबिला रहे हैं। लेकिन इन पर दया न करें। कॉलेज के बच्चों को बताएँ कि ये लोग प्रपंच फैलाते हैं। उनसे कहिए कि वो सिर्फ एक तरह की विचारधारा वालों को न पढ़ें, चाहे वो वाम हो या दक्षिण, हर तरफ से आँकड़े लें। सबको पढ़िए, और तब विचार बनाइए कि कौन सही है, कौन गलत। वामपंथियों की जड़ों में मट्ठा नहीं, हायड्रोक्लोरिक या सल्फ्यूरिक एसिड डालने की जरूरत है। इनके भीतर ट्यूमर नहीं है, ये कैंसर के ट्यूमर का मानवीय रूप हैं।

इन्हें बर्दाश्त मत कीजिए, जहाँ मिले तोड़ दीजिए। इनको काटिए अपने प्रश्नों से, तैयार रहिए अपने आँकड़ों के साथ। कहें कि ‘थोड़ा पढ़ लो’, तो जवाब में पूछिए कि क्या उसके बाप के ही पुस्तकालय में सारी किताबें हैं कि बाकियों ने पढ़ी ही नहीं होंगी? इन नक्सलियों को तब तक तोड़िए जब तक ये क्षितिज और परिधि से गायब न हो जाएँ। दोबारा दिखें, फिर जलील कीजिए। इनका समूल नाश ही समय की माँग है और इसमें आपको उतरना ही होगा।

दिल्ली को दहलाने की साजिश हुई नाकाम: IED के साथ 3 आतंकी इस्लाम, अली और जमाल दबोचे गए

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आज (नवंबर 25, 2019) राजधानी में एक बड़ी आतंकी साजिश को नाकाम करते हुए IED के साथ 3 संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार किया है। तीनों आतंकी ISIS से जुड़े बताए जा रहे हैं। पुलिस ने इनके पास से भारी मात्रा में विस्फोटक सामान बरामद किया है।

दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के डीसीपी प्रमोद कुशवाहा ने इस खबर की जानकारी देते हुए बताया कि, राजधानी में एक बड़े आतंकी हमले को नाकाम किया गया है। साथ ही IED विस्फोटक के साथ 3 आतंकी गिरफ्तार भी किए गए हैं, जो ISIS से प्रेरित मॉड्यूल से थे। ये आतंकी दिल्ली और असम के लोकल मेले गोलपारा में बड़ा हमला करने की साजिश रच रहे थे। इन पकड़े गए आतंकवादियों के नाम इस्लाम, रणजीत अली और जमाल है। इन्हें असम से गिरफ्तार किया गया है।

गौरतलब है कि बीते दिनों दिल्ली में जैश के 4 आतंकियों के घुसने की सूचना मिलने के बाद से राष्ट्रीय राजधानी अलर्ट पर रह चुकी हैं और अब इन आतंकियों की गिरफ्तारी ने इस बात को और पुख्ता कर दिया है कि अलग अगल संगठन के आतंकी इस समय दिल्ली पर घात लगाए बैठे हैं।

पाकिस्तान में हिंदू छात्रा की मौत के मामले में लैब नहीं भेजे गए जरूरी सबूत, लापरवाही उजागर

पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना में हिंदू लड़की नमृता चंदानी की संदिग्ध परिस्थितियों पर हुई मौत मामले में पुलिस द्वारा की गई लापरवाही का एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। अभी तक जहाँ रिपोर्ट्स का हवाला देकर कहा जा रहा था कि नमृता के शरीर पर पुरुष का डीएनए पाया गया है। तो वहीं दूसरी ओर, ताजा जानकारी के अनुसार पाकिस्तानी मी़डिया द्वारा खुलासा किया गया है कि नमृता के डीएनए जाँच के लिए बेहद जरूरी चीजें फॉरेंसिक लैब में समय से भेजी ही नहीं गईं। इसमें उसका दुपट्टा और उसके फिंगरप्रिंट्स जैसी चीजें शामिल थीं। जिनके समय से लैब में न पहुँचने के कारण रिपोर्ट में सारी बातें स्पष्ट नहीं हो पाईं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नमृता के गले से बंधे दुपट्टे की डीएनए रिपोर्ट लरकाना पुलिस को मिल गई है। जिसे लाहौर स्थित फरेंसिक लैब के महानिदेशक ने जारी किया है। हालाँकि, पुलिस ने इसे न्यायिक जाँच अधिकारी को सौंप दिया है। लेकिन वहाँ की मीडिया रिपोर्ट्स ने खुलासा किया है कि फ़ोरेंसिक विशेषज्ञों को दुपट्टे से त्वचा के टुकड़े या खून के धब्बे नहीं मिले, जिसके कारण उनका डीएनए हासिल नहीं किया जा सका। उनका कहना है कि कपड़े पर मौजूद त्वचा के टुकड़ों से 72 घंटे के अंदर डीएनए हासिल किया जा सकता है, लेकिन अगर इससे देर हो तो फिर डीएनए मिलना नामुमकिन हो जाता है।

बता दें, नमृता चंदानी की मौत के बाद परिवारजनों द्वारा बार-बार गुहार लगाने के बाद भी उसके गले में बंधे दुपट्टे को मौत के एक हफ्ते बाद फॉरेंसिक लैब भेजा गया था, जिसकी वजह से डीएनए नहीं लिया जा सका।

इसके अलावा पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट में यह भी खुलाया किया गया है कि नेशनल डेटाबेस ऐंड रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी (नादरा) ने नमृता मामले में भेजे गए उँगलियों के निशान को वापस लरकाना पुलिस को यह कहते हुए भेज दिया है कि उसके डेटाबेस में मौजूद निशानों से इन उंगलियों के निशान का मिलान नहीं हो सका है और अब इनकी आगे जाँच के लिए जरूरत नहीं है।

जानकारी के अनुसार नादरा ने लरकाना पुलिस को भेजी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पुलिस द्वारा भेजे गए उँगलियों के निशानों की गुणवत्ता बेहद खराब थी। बता दें, पुलिस ने नमृता की मौत के एक महीने बाद उंगलियों के इन निशानों को भेजा था।

उल्लेखनीय है कि इस खुलासे के बाद पुलिस पर उठ रहे मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए लरकाना के एसएसपी मसूद बंगश ने सफाई पेश की है। उन्होंने कहा है कि पुलिस को घटना की जानकारी 3 घंटे बाद मिली थी। पुलिस जब तक हॉस्टल पहुँची, तब तक वहाँ कई लोग क्राइम सीन (नमृता के कमरे में) जा चुके थे। उसकी सहपाठियों ने खुद बताया कि उन्होंने नमृता को देखकर उसके गले से दुपट्टा निकाल दिया था और उसके शव को ठीक से लिटाया था। जिस कारण से पुलिस तत्काल कोई फिंगरप्रिंट जाँच के लिए नहीं भेज सकी।

गौरतलब है कि नमृता का शव दो महीने पहले 16 सितंबर को लरकाना के शहीद मोहतरमा बेनजीर भुट्टो मेडिकल यूनिवर्सिटी में उनके हॉस्टल के कमरे में छत के पंखे पर लटका मिला था। वह विश्वविद्यालय में बैचलर ऑफ डेंटर सर्जरी की पढ़ाई कर रही थीं और घोटकी के मीरपुर मथेलो की रहने वाली थीं, जहाँ इस घटना से कुछ दिन पहले ही दंगे हुए थे।

नमृता की मृत्यु पर उनके भाई डॉ विशाल सुंदर का कहना था कि उनकी बहन के शरीर के अन्य हिस्सों पर भी निशान मिले हैं, जैसे कोई उसे पकड़ रहा हो। इसके अलावा पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी ये बताया गया था कि गला घोंटने के साफ़ निशान दिखाई दे रहे थे। लेकिन फिर भी वहाँ की पुलिस और प्रशासन शुरू से इस घटना को आत्महत्या साबित करने की कोशिश करता रहा। कुछ दिन बाद वहाँ की एक अदालत ने इस मामले में न्यायिक जाँच की इजाजत देने से भी इंकार कर दिया था और अब ये रिपोर्ट जो बताती है नमृता ने जहर खाया।

ऑपइंडिया Exclusive: अजित पवार के पक्ष में 27 विधायक, मतदान से दूर रह सकते हैं कॉन्ग्रेस MLA

महाराष्ट्र में राजनीतिक घटनाक्रम पल-पल बदल रहा है। चुनाव से पहले भाजपा-शिवसेना एक साथ लड़ी और कॉन्ग्रेस ने एनसीपी के साथ मिल कर चुनाव लड़ा। चुनाव के बाद शिवसेना ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री का पद लेने के लिए अड़ गई और उसने कॉन्ग्रेस व एनसीपी के साथ बातचीत शुरू कर दी। पहले आदित्य ठाकरे को सीएम बनाने की बात कही गई, बाद में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के नाम पर सहमति बनी। तभी अजित पवार के साथ एनसीपी का एक धड़ा भाजपा से जा मिला और देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। अजित पवार उप-मुख्यमंत्री बने। अब एनसीपी द्वारा अजित पवार को मनाने की कोशिशें जारी हैं।

ऑपइंडिया को सूत्रों ने बताया है कि एनसीपी के 27 विधायक अजित पवार के साथ हैं। सूचना मिली है कि ये 27 विधायक फ्लोर टेस्ट के दौरान भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के पक्ष में वोट करेंगे। अजित पवार लगातार ट्विटर पर मिल रही बधाइयों का धन्यवाद दे रहे हैं, इसीलिए लगता नहीं है कि उन्हें मनाने की कोशिशें कामयाब होंगी। पूर्व उप मुख्यमंत्री छगन भुजबल ने अजित पवार को बताया है कि पार्टी में 30-35 ऐसे विधायक हैं, जो अजित की अनुपस्थिति में असहज महसूस कर रहे हैं। ये आँकड़ा बढ़ भी सकता है।

मिलिंद नार्वेकर शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के पर्सनल असिस्टेंट हैं। शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे पूर्व मंत्री हैं। ऑपइंडिया के सूत्रों ने पुष्टि की है कि शनिवार (नवंबर 23, 2019) की देर शाम ये दोनों नेता आपस में ही लड़ बैठे। नार्वेकर ने शिंदे पर भाजपा का एजेंट होने का आरोप लगाया। इससे पहले भी ख़बर आ चुकी है कि शिवसेना के कई विधायक उद्धव ठाकरे से असंतुष्ट हैं और भाजपा के साथ गठबंधन के पक्षधर हैं। एनसीपी और शिवसेना के इस आंतरिक कलह से कॉन्ग्रेस भी सकते में आ गई है। उद्धव ने सोनिया से मुलाक़ात के दौरान भी उन्हें आश्वस्त किया कि उनकी पार्टी में सब ठीक है।

मीडिया लगातार ऐसी ख़बरें चला रही है कि एनसीपी की बैठक उसके कुछ ही विधायक अनुपस्थित थे, जबकि उस बैठक में एनसीपी के कई विधायक नहीं पहुँचे थे। उस बैठक में उद्धव ने भी एनसीपी के विधायकों को ढाँढस बँधाया कि सब ठीक हो जाएगा।

कॉन्ग्रेस की स्थिति और भी बुरी है। राहुल गाँधी, सोनिया गाँधी और अहमद पटेल विधायक दल के नेता के चुनाव को लेकर एकमत नहीं हैं। कॉन्ग्रेस के विदर्भ क्षेत्र के कई विधायक असंतुष्ट हैं। हो सकता है कि वो फ्लोर टेस्ट के दौरान सदन में आएँ ही नहीं। राहुल गाँधी धड़ा चाहता था कि शिवसेना के साथ किसी भी तरह की बातचीत नहीं हो, जबकि सोनिया गाँधी का धड़ा गठबंधन के पक्ष में था। अहमद पटेल इस धड़े का नेतृत्व कर रहे थे। पटेल की इच्छा है कि बीएमसी में कॉन्ग्रेस का प्रभाव बने। इसका कारण बीएमसी का भारी-भरकम बजट है। उद्धव ने भी सोनिया को आश्वस्त किया था कि बीएमसी में कॉन्ग्रेस को हिस्सा दिया जाएगा।

ऑपइंडिया ने भाजपा के विश्वस्त सूत्रों से बातचीत की, जिसके बाद पता चला कि पार्टी सदन में बहुमत साबित करने को लेकर एकदम आश्वस्त है। विश्वासमत के दौरान 170 वोट हासिल करने का उसे पूरा यकीन है। भाजपा न सिर्फ़ एनसीपी और निर्दलीय, बल्कि शिवसेना के कई विधायकों को भी अपने पाले में मान रही है। चूँकि शिवसेना के कई विधायकों की आपस में लड़ाई की ख़बरें सार्वजनिक हो चुकी हैं, भाजपा की उधर भी नज़रें हैं। ख़बर आई थी कि कई शिवसेना विधायकों ने उस होटल को छोड़ दिया था, जिसमें वो पहले रुके हुए थे।

41 सालों में 4 बार CM रहे लेकिन कभी जनता ने शरद पवार को बहुमत नहीं दिया: बोया पेड़ बबूल का…

फडणवीस के लिए बहुमत जुटाने निकले ठाकरे के ‘नारायण’: महाराष्ट्र के रण में BJP का सबसे बड़ा दाँव

अजित पवार के साथ हैं NCP के 43 विधायक: शरद पवार के दावों की सुप्रीम कोर्ट में खुली पोल

रोहतगी ने SC में उड़ाई विपक्ष की धज्जियाँ: बोले- तीनों पार्टियों का एक वकील तक नहीं, एक पवार BJP के साथ

महाराष्ट्र का सियासी संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है तो वहीं दूसरी ओर विपक्ष अपनी आबरू बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने पहुँच गया है। फडणवीस सरकार के गठन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चली सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से तीखी बहस हुई। मामले में बहस पूरी होते ही अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

दरअसल अदालत में बहस के दौरान देवेन्द्र फडणवीस का पक्ष रखते हुए वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि विपक्ष ने सरकार बनाने का दावा तक पेश नहीं किया। उन्होने यहाँ तक कह दिया कि विपक्ष के इन दलों ने एक भी साझा प्रेस कांफ्रेंस नहीं की, न ही इन तीन दलों का कोई एक वकील है।

बता दें कि महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आने के बाद शिवसेना और भाजपा के बीच मतभेद गहरा गए थे। हालाँकि चुनाव में दोनों दलों ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन के नाम वोट माँगा था लेकिन बाद में दोनों दलों के बीच सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर मतभेद के चलते यह गठबंधन टूट गया। शिवसेना इस सरकार में आधे कार्यकाल के लिए उद्धव ठाकरे को सीएम बनाने की माँग कर रही थी जबकि भाजपा की ओर से यही कहा गया कि पूरे पाँच साल तक मुख्यमंत्री तो फडणवीस ही रहेंगे।

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रोहतगी ने कहा कि चुनाव नतीजे आने के बाद शिवसेना और भाजपा में मतभेद गहरा गए। इसके बाद अजित पवार ने उन्हे समर्थन देने की बात कही थी। उन्होंने कहा कि अजित ने दावा किया कि उनके पास 53 विधायक हैं और वह उन विधायकों के दल के नेता। इसके बाद ही उन्होंने (भाजपा ने) राज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश किया।

रोहतगी ने अपनी दलील में विधायकों की खरीद-फरोख्त की बात को झूठा बताया। उन्होंने कहा कि एनसीपी के एक पवार हमारे साथ हैं तो दूसरे उनके विरोध में, मगर इनके पारिवारिक झगडे से हमें (भाजपा को) कोई लेना देना नहीं है।

उन्होंने आगे कहा कि अजित पवार ने उन्हें (भाजपा को) 53 विधायकों के समर्थन की चिट्ठी भी दिखाई थी। इस चिट्ठी में उन्होंने कहा था कि विधानसभा में मत-विभाजन होगा मगर हम चाहते हैं कि देवेन्द्र फडणवीस को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई जाए। उन्होंने कहा कि यहाँ एक संवैधानिक पहलू शामिल है, हो सकता है कि विपक्ष विधायकों के दस्तखत वाली चिट्ठी को ही फर्जी कह दे।

भाजपा को सरकार बनाने से रोकने की वो साजिश जब डिप्टी सीएम को हवाई जहाज पर छापेमारी के लिए भेजा गया

हरियाणा में भाजपा ने दुष्यंत चौटाला की जेजेपी और महाराष्ट्र में अजित पवार के नेतृत्व वाले एनसीपी के धड़े के साथ सरकार क्या बनाई, फिर से पुराना रोना रोया जा रहा है। गोवा और मणिपुर में भाजपा ने किस तरह सरकार बनाई, इसे याद किया जा रहा है। इन दो राज्यों में ज्यादा वोट पाने के बावजूद भाजपा को सीटें कम मिली थी और उसने छोटे दलों को साध कर सरकार बना ली।

दूसरे शब्दों में कहे तो यह हमारी चुनावी लोकतंत्र की वो विशेषता है जिसके कारण कम वोट पाने के बावजूद कॉन्ग्रेस को ज्यादा सीटें मिली। संसदीय प्रणाली की इसी ​अनूठेपन का फायदा उठा भाजपा ने दोनों राज्यों में सरकार बना ली।

यकीनन, अपनी दलगत निष्ठा के आधार पर लोग यह तय करेंगे कि किस पार्टी ने ‘लोकतंत्र की हत्या’ की। इसी दरम्यान मेरी नजर इस ट्वीट पर पड़ी;

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चिदंबरम के इस ट्वीट को देख कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि इसमें कितनी गंभीरता छिपी है। ऐसा लगता है कि यह ट्वीट ‘बूरा ना मानो होली है’ वाले मूड में की गई है। महाराष्ट्र के सियासी उठापठक के बाद भी कुछ इसी तरह की बातें सुनाई पड़ रही। खैर, इन बातों को छोड़िए। मैं आपको 2005 के एक राजनीतिक घटना के बारे में बताता हूँ। यह पॉलिटिकल थ्रिलर उसी झारखंड में देखने को मिला था जहॉं हाल ही में विधानसभा चुनाव होने हैं।

फरवरी 2005 में झारखंड विधानसभा चुनाव (कुल 81 सीटें) के परिणाम (PDF लिंक) यहाँ दिए गए हैं।

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उस चुनाव में भाजपा सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी थी। उसने 63 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 30 पर जीत हासिल की थी। भाजपा के चुनाव पूर्व गठबंधन सहयोगी जद (यू) ने 18 सीटों पर चुनाव लड़ा और 6 जीते। इस तरह 81 सदस्यीय विधानसभा में एनडीए को 36 सीटें मिली थी।

यूपीए में शामिल दल उनसे काफी पीछे थे। जेएमएम को 17 और कॉन्ग्रेस को 9 सीटें मिली थी। यदि एनसीपी को मिली 1 सीट भी इनके खाते में जोड़ दे तो संख्या 27 ही हो रही थी।

नतीजों के बाद भाजपा को पाँच अन्य विधायकों का समर्थन प्राप्त हुआ: 2 AJSU (ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन) से, झारखंड पार्टी के इकलौते विधायक और दो अन्य निर्दलीय का। इस तरह एनडीए का आँकड़ा 41 सीटों तक पहुँच गया, जो स्पष्ट बहुमत था।

(नोट: सांगठनिक ढॉंचे और कायदों के अभाव के कारण कई मीडिया रिपोर्टों में भाजपा को समर्थन करने वाले पॉंच विधायकों को निर्दलीय बताया जाता है)

भाजपा ने विधिवत रूप से सरकार बनाने का दावा किया और झारखंड के माननीय राज्यपाल के समक्ष पाँच समर्थक विधायकों की परेड करवाई।

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लेकिन, राज्यपाल सैयद सिब्ते रज़ी ने कुछ ऐसा किया जिसने पूरे झारखंड को स्तब्ध कर दिया। उन्होंने झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) सुप्रीमो शिबू सोरेन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। सोरेन को सीएम और स्टीफन मरांडी को डिप्टी सीएम के रूप में शपथ दिलाई गई

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यह कितना अनैतिक था इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि डिप्टी सीएम बने मरांडी जेएमएम से बगावत कर चुनाव जीते थे। वे सीएम बने शिबू सोरेन के बेटे हेमंत को हराकर विधानसभा पहुॅंचे थे। असल में हेमंत उस चुनाव में दुमका की सीट पर 20 ह​जार वोट हासिल कर तीसरे नंबर पर रहे थे। दूसरे नंबर पर भाजपा का उम्मीदवार था।

राज्यपाल के इस कदम के विरोध में एनडीए ने राज्यव्यापी बंद और आंदोलन का आह्वान किया, लेकिन यह बेहद कारगर नहीं रहा। उनके लिए एकमात्र विकल्प यह था कि 41 विधायकों की राष्ट्रपति कलाम के सामने परेड करवाने के लिए दिल्ली ले जाया जाए, जो जनता के दृष्टिकोण में “नैतिक जीत” होती। इसके लिए  3 मार्च 2005 की तारीख चुनी गई। रांची से दिल्ली की उड़ान 90 मिनट की है। 5 निर्णायक निर्दलीयों के साथ 41 विधायकों को दिल्ली लाना पहली नजर में सामान्य सी बात लगती है।

वाकई! यह इतना आसान था?

यक़ीनन नहीं!

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हाँ, आपने सही पढ़ा है! उप मुख्यमंत्री स्टीफन मरांडी और उनके लोगों ने रांची के बिरसा मुंडा हवाई अड्डे के रनवे पर उस चार्टर्ड विमान को रोक दिया जो उड़ान भरने के लिए तैयार था! विमान को वापस लौटने का आदेश दिया गया और फिर विमान में सवार निर्दलीय विधायकों पर अपने कब्जे में लेने के लिए छापा मारा गया। यह कोई हॉलीवुड फ़िल्म की स्क्रिप्ट नहीं है। यह हमारी यूपीए सरकार द्वारा निर्मित एक कम बजट की थ्रिलर फ़िल्म थी।

यूपीए ने इन पाँच विधायकों को पकड़ने के बाद क्या किया?

कुछ भी तो नहीं, क्योंकि विमान में पाँच विधायक बिल्कुल भी नहीं थे।

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जब कॉन्ग्रेस सरकार रांची हवाई अड्डे पर व्यस्त थी, पाँच निर्दलीय राज्य की सीमा से बाहर निकल रहे थे। वे कहॉं जा रहे थे? स्वभाविक तौर पर भाजपा शासित पड़ोसी प्रदेश छत्तीसगढ़। वे वहॉं मह​फूज रह सकते थे। लेकिन, वे छत्तीसगढ़ नहीं जा रहे थे। यूपीए सरकार को जब अहसास हुआ कि विधायक उनके दायरे से निकल चुके हैं तो छत्तीसगढ़ पहला राज्य था जिससे लगी सीमा सील की गई। तो यकीनन वे ओडिशा जा रहे होंगे? उस समय एनडीए के हिस्सा रहे वहॉं के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के पास भी खुद को महफूज मान सकते थे।

आपकी सोच एक बार फिर गलत साबित हो सकती है। असल में विधायक माकपा शासित पश्चिम बंगाल की तरफ निकल चुके थे। उन्हें रोकने के लिए हर तिकड़म में जुटी यूपीए सरकार ने बंगाल की सीमा से सटे इलाकों में सबसे कम निगरानी रख रखी थी। शायद यह सोचकर कि भाजपा कभी भी वाम शासित प्रदेश को विधायकों को भेजने के लिए नहीं चुन सकती!

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दुर्गापुर पहुॅंचने के बाद विधायकों को वेंकैया नायडू का संदेशा मिला। उन्होंने विधायकों से खड़गपुर रेलवे स्टेशन जाने को कहा। वहॉं से 3 मार्च को रात के 2:30 बजे उन्होंने भुवनेश्वर की ट्रेन पकड़ी। तीन मार्च की सुबह पॉंच बजे आखिरकार वे पूरी तरह महफूज हो चुके थे।

इस बीच, भाजपा लगातार अपने बयानों से यूपीए के रणनीतिकारों को गुमराह करती रही। उन्हें बार-बार भ्रम में डालती रही। अफवाह उड़ी कि विधायक अभी भी रांची में हैं। इसके बाद कहा गया कि वे दिल्ली में हैं। एक मौके पर भाजपा ने यह भी हवा उड़ाई कि विधायक अहमदाबाद में हैं।

उस दोपहर, पाँच समर्थक विधायकों ने आख़िरकार भुवनेश्वर से दिल्ली के लिए इंडियन एयरलाइंस की फ़्लाइट पकड़ी। फिर उनकी राष्ट्रपति के सामने परेड कराई गई।

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नौ दिन बाद, झारखंड के राज्यपाल सिब्ते रज़ी ने शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री के पद से बर्खास्त कर दिया और अर्जुन मुंडा को राज्य में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया।

नोट: निजी तौर पर मैं गोवा में सरकार बनाने के लिए भाजपा के प्रयासों का समर्थन नहीं करता। यदि वे सरकार नहीं बनाते तो वह पर्रिकर और पार्टी की छवि के लिए ज्यादा बेहतर होता।

अभिषेक बनर्जी की मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई खबर पढ़ने के लिए आप यहॉं क्लिक कर सकते है। इसका हिंदी अनुवाद प्रीति कमल ने किया है।