महाराष्ट्र की सियासत में बड़ा उलटफेर हुआ। कल रात तक चले राजनीतिक समीकरण को चौंकाते हुए बीजेपी-एनसीपी ने मिलकर सरकार बना ली है। देवेंद्र फडणवीस को बतौर मुख्यमंत्री दोबारा राज्य की कमान मिल गई है।
Ajit Pawar after taking oath as Deputy CM: From result day to this day no party was able to form Govt, Maharashtra was facing many problems including farmer issues, so we decided to form a stable Govt pic.twitter.com/GucfUVBCnm
शपथ ग्रहण के बाद एनसीपी नेता अजित पवार ने कहा कि महाराष्ट्र में किसानों की समस्या प्राथमिकता है। उन्होंने कहा, “हम किसानों की समस्या को हल करने के लिए साथ आए हैं। नतीजे आने के दिन से लेकर आज तक कोई भी पार्टी सरकार बनाने में सक्षम नहीं थी, महाराष्ट्र किसान मुद्दे सहित कई समस्याओं का सामना कर रहा था, इसलिए हमने एक स्थिर सरकार बनाने का फैसला किया।”
Maharashtra Chief Minister, Devendra Fadnavis: I would like to express my gratitude to NCP’s Ajit Pawar ji, he took this decision to give a stable government to Maharashtra & come together with BJP. Some other leaders also came with us and we staked claim to form government. pic.twitter.com/eq1v9syg8z
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी एनसीपी और अजित पवार का आभार व्यक्त किया है। फडणवीस ने कहा, “मैं एनसीपी के अजीत पवार जी का आभार व्यक्त करना चाहता हूँ कि उन्होंने महाराष्ट्र में एक स्थिर सरकार देने और बीजेपी के साथ आने का यह फैसला लिया। कुछ अन्य नेता भी हमारे साथ आए और हमने सरकार बनाने का दावा पेश किया।”
BJP President & Union Home Minister, Amit Shah congratulates Devendra Fadnavis & Ajit Pawar on taking oath as Maharashtra Chief Minister and Deputy Chief Minister, respectively. pic.twitter.com/DBX3gBdPOU
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री एवं अजित पवार को उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने पर शुभकामनाएँ दी हैं। अमित शाह ने ट्वीट करते हुए लिखा कि उन्हें विश्वास है कि यह सरकार महाराष्ट्र के विकास और कल्याण के प्रति निरंतर कटिबद्ध रहेगी और प्रदेश में प्रगति के नए मापदंड स्थापित होंगे।
इससे पहले फडणवीस ने कहा था, “लोगों ने हमें एक स्पष्ट जनादेश दिया था, लेकिन परिणाम के बाद भी शिवसेना ने अन्य दलों के साथ गठबंधन बनाने की कोशिश की, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रपति शासन लगाया गया। महाराष्ट्र को एक स्थिर सरकार की जरूरत है, एक ‘खिचड़ी’ सरकार की नहीं।”
बता दें कि महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों के लिए 21 अक्टूबर को चुनाव हुए थे और नतीजे 24 अक्टूबर को आए थे। राज्य में किसी पार्टी या गठबंधन के सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करने की वजह से राज्य में 12 नवंबर को राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। शिवसेना के मुख्यमंत्री पद की माँग को लेकर बीजेपी से 30 साल पुराना गठबंधन तोड़ने के बाद से राज्य में राजनीतिक संकट खड़ा हो गया था।
महाराष्ट्र में शनिवार (नवंबर 23, 2019) सुबह भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा उलटफेर देखने को मिला।बीजेपी नेता देवेंद्र फड़णवीस ने दोबारा सीएम पद की शपथ ली है। वहीं, एनसीपी नेता अजित पवार ने डिप्टी सीएम पद पद की शपथ ली है। सुबह करीब आठ बजे राजभवन में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने दोनों नेताओं को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई।
Mumbai: Devendra Fadnavis takes oath as Maharashtra Chief Minister again, oath administered by Governor Bhagat Singh Koshyari at Raj Bhawan pic.twitter.com/PiRuq9SkYh
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देवेंद्र फड़णवीस को मुख्यमंत्री और अजित पवार को उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने पर शुभकामनाएँ दी हैं। साथ ही उन्होंने महाराष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य को लेकर भरोसा जताया है।
PM Modi: Congratulations to Devendra Fadnavis ji and Ajit Pawar ji on taking oath as the CM and Deputy CM of Maharashtra respectively. I am confident they will work diligently for the bright future of Maharashtra. pic.twitter.com/ZLFR3D0Jeh
सीएम पद की शपथ लेने के बाद फड़णवीस ने कहा, “लोगों ने हमें एक स्पष्ट जनादेश दिया था, लेकिन परिणाम के बाद भी शिवसेना ने अन्य दलों के साथ गठबंधन बनाने की कोशिश की, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रपति शासन लगाया गया। महाराष्ट्र को एक स्थिर सरकार की जरूरत है, एक ‘खिचड़ी’ सरकार की नहीं।”
Devendra Fadnavis after taking oath as Maharashtra CM again: People had given us a clear mandate, but Shiv Sena tried to ally with other parties after results, as a result President’s rule was imposed. Maharashtra needed a stable govt not a ‘khichdi’ govt. pic.twitter.com/6Zmf9J9qKc
यह घटनाक्रम उस वक्त हुआ है जब एक दिन पहले ही शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस के नेताओं के बीच उद्धव ठाकरे को सीएम बनाने को लेकर सहमति बनी थी। शुक्रवार (नवंबर 22, 2019) को कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना के बीच हुई साझा बैठक के बाद एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा था कि शिवसेना सुप्रीमो उद्धव महाराष्ट्र के नए सीएम होंगे। पवार ने यह भी कहा था कि शनिवार (नवंबर 23, 2019) को भी बैठक प्रस्तावित है। मगर इस बीच महाराष्ट्र में बड़ी राजनीतिक उलटफेर देखने को मिला।
बता दें कि महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों के लिए 21 अक्टूबर को चुनाव हुए थे और नतीजे 24 अक्टूबर को आए थे। राज्य में किसी पार्टी या गठबंधन के सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करने की वजह से राज्य में 12 नवंबर को राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। शिवसेना के मुख्यमंत्री पद की माँग को लेकर बीजेपी से 30 साल पुराना गठबंधन तोड़ने के बाद से राज्य में राजनीतिक संकट खड़ा हो गया था।
नॉर्वे में इस्लाम के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हो रहा है। लोगों का आरोप है कि नॉर्वे का इस्लामीकरण हो रहा है। इस्लाम के ख़िलाफ़ हुई रैली में एक व्यक्ति ने कुरान जला दी, जिसके बाद हंगामा शुरू हो गया। प्रदर्शन में लगे एक समूह के नेतृत्व कर रहे लार्स थोर्सन ने पवित्र कुरान की पुस्तक में आग लगा दी। इसके बाद विरोध प्रदर्शन कर रहे गुट और इस्लाम समर्थक गुट के बीच जम कर झड़प हुई। ये घटना नार्वे के क्रिस्टियानालैंड की है। पुलिस ने ही इस्लाम विरोधी रैली की इजाजत दी थी। रैली के दौरान प्रदर्शनकारियों ने कुरान जलाने की इजाजत माँगी, जिसे पुलिस ने अस्वीकार कर दिया।
इंटरनेट पर वायरल हुए वीडियो में देखा जा सकता है कि जब थोर्सन कुरान जला रहे होते हैं, तब एक व्यक्ति उन पर अचानक से झपटता है और ऐसा करने से रोकता है। ये घटना शनिवार (नवंबर 16, 2019) की है। इसके बाद पुलिस ने दोनों के बीच चल रहे संघर्ष में हस्तक्षेप किया। पुलिस ने कुरान जलाने वाले थोर्सन और उनपर हमला करने वाले लोगों को गिरफ़्तार कर लिया है। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की चेतावनी के बावजूद कुरान को जला डाला। कुरान की एक प्रति को जलाया गया और 2 अन्य पुस्तकों को कूड़ेदान में डाल दिया गया।
Utterly condemn the desecration of the Quran in Norway & demand strict action against the criminals & terrorists. Has any Muslim ever desecrated the holy book of any other faith? Then why has Islam been consistently been targeted? https://t.co/lUtmrHNbUV#Norway#JummahMubarak
प्रदर्शनकारियों ने इस्लाम को हिंसा का मजहब बताते हुए पैगम्बर मुहम्मद के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक नारेबाजी की। जब थोर्सन ने कुरान जलाया, उसके बाद एक मुस्लिम व्यक्ति उन पर झपट पड़ा और उनकी पिटाई की। मुस्लिम व्यक्ति ने थोर्सन पर अंधाधुंध घूसे बरसाने शुरू कर दिए। थोर्सन ने कुछ दिनों पहले मुस्लिमों को ‘कुख्यात यौन व्यभिचारी’ बताते हुए कई पोस्टर्स बाँटे थे। इसके बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था। उन्हें 30 दिनों तक जेल में रहना पड़ा था।
Another Quran burning protest was held in Norway, and this time it took place in the largely-Muslim populated city of Kristiansand pic.twitter.com/76VZFY0xKE
नॉर्वे में मुस्लिम शरणार्थियों को लेकर हंगामा मचा हुआ है। नॉर्वे के कई लोगों का मानना है कि इस्लाम तानाशाही वाला मजहब है और जहाँ भी जाता है, वहाँ के लोकतंत्र और क़ानून की इज्जत नहीं करता। कई मुस्लिम नेताओं ने कहा कि कुरान जलाने की घटना के बाद उनकी और उनके समुदाय की भावनाएँ आहत हुई हैं।
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर को ही लेबोरेटरी में घुसने से रोक दिया गया। आनंद रंगनाथन ने ख़ुद के साथ हुए इस व्यवहार के बारे में ट्विटर पर जानकारी शेयर की। रंगनाथन ने लिखा कि ये उनके लिए काफ़ी बुरा दिन रहा। उन्होंने बताया कि उन्हें उनके ही विभाग व लैब में घुसने से रोका जा रहा है। विरोध प्रदर्शन कर रहे जेएनयू के छात्रों ने एंट्रेंस गेट को चैन से बाँध कर उसपर ताला लगा दिया। इस दौरान वहाँ उपस्थित सिक्योरिटी गार्ड्स देखते रहे और कुछ नहीं कर पाए।
आनंद रंगनाथन ने इसका वीडियो ट्विटर पर शेयर नहीं किया लेकिन यूट्यूब पर ये वीडियो वायरल हो गया। रंगनाथन ने कहा कि वो इस अवैध गतिविधियों में संलग्न छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहते, इसीलिए वो इसका वीडियो नहीं अपलोड कर रहे हैं। हालाँकि, आप इस वीडियो को यहाँ देख सकते हैं:
जेएनयू में छात्रों ने प्रोफेसर को अपने ही विभाग में घुसने से रोका
इस दौरान छात्रों ने सिक्योरिटी गार्ड को भी धमकी दी। जब गार्ड ने छात्रों के बात करने के रवैये पर ऐतराज जताया तो एक छात्रा ने उसे चुप रहने की हिदायत देते हुए कहा कि सिक्योरिटी गार्ड बात नहीं करेगा। छात्रों ने लैब के एंट्रेंस पर पोस्टर भी चिपका रखे थे। जब रंगनाथन ने छात्रों से पूछा कि उन्हें 35,000 रूपए मिलते हैं और तब भी वो हॉस्टल फी 10 रुपए से बढ़ाने को लेकर हंगामा कर रहे हैं तो उन्होंने हंगामा शुरू कर दिया।
Terribly sad day. My colleagues and I were barred from entering our department and labs at JNU by protesting students who chain-locked the entrance. The Security looked on.
Not uploading the clip as don’t want the students’ post-doctoral prospects hurt by their unlawful action.
छात्रों ने कहा कि चाहें तो रंगनाथन पुलिस को बुला लें लेकिन वो अड़े रहेंगे। छात्रों ने आनंद रंगनाथन के साथ बदतमीजी भी की। उन्होंने वहाँ उपस्थित सिक्योरिटी गार्ड के साथ भी दुर्व्यवहार किया।
पिछले सात दिनों से हमने लगातार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में डॉ फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध कर रहे छात्रों की बात आप तक पहुँचाई है। कल तक, ऑपइंडिया के अलावा एक भी संस्थान बच्चों का पक्ष रखने का तो छोड़िए, सुनने को भी तैयार नहीं थे। हमने अपने विस्तृत कवरेज में पूरी कोशिश की कि इसमें छात्रों की बातें, पूर्व छात्रों की बातें, शोध छात्रों की बातें आप तक लाने की। और इस मुद्दे पर मीडिया द्वारा फैलाए गए कई भ्रमों और झूठ का पर्दाफाश करते हुए आपके सामने सच्चाई प्रस्तुत की।
इसी शृंखला में हमने फैकल्टी के कई प्रोफेसरों से भी बात की। अभी हमने विशेष तौर पर बात की सौरभ द्विवेदी जी से जो कि इसी संकाय के साहित्य विभाग के पूर्व शोध छात्र रहे हैं और अभी सहायक प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवा कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत महाविद्यालय, रामटेक, नागपुर, महाराष्ट्र में कार्यरत हैं। सौरभ द्विवेदी के गाइड वहीं हैं जो इस मामले में अभी फोकस में हैं साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर उमाकांत चतुर्वेदी। सौरभ जी ने पहले भी हमसें इस मुद्दे पर बात की है। लेकिन विशेष तौर पर एक बार फिर ऑपइंडिया संपादक अजीत भारती ने उनसे फिरोज काण्ड पर विस्तृत चर्चा की। पेश है उसी इंटरव्यू के मुख्य अंश जो इस पूरे मामले में आपकी ऑंखें खोलने के लिए ज़रूरी है।
ऑपइंडिया: लोग कह रहे हैं संस्कृत को जातिवादी बनाकर रखा है आप लोगों ने। ब्राह्मणों के सिवाय किसी को बोलने देना नहीं चाहते। क्या यह ब्राह्मणवादी भाषा है, इसलिए फ़िरोज खान का विरोध हो रहा है।
सौरभ द्विवेदी: पूरे BHU में एक दूसरे मजहब के टीचर की नियुक्ति का विरोध हो रहा है। ऐसा बिलकुल नहीं है। यह विरोध एक गैर-हिन्दू का ‘धर्म-विज्ञान संकाय’ में नियुक्ति का विरोध है। अगर यह नियुक्ति विश्वविद्यालय के ही किसी अन्य संकाय में संस्कृत अध्यापक के रूप में होती तो विरोध नहीं होता। विरोध का मूल इस विशेष संकाय में गैर-हिन्दू की नियुक्ति में निहित है और विरोध करने वाले छात्र परम्परावादी हिन्दू हैं जो सनातन हिन्दू परम्पराओं, वेद, वेदांग, कर्मकाण्ड, ज्योतिष के प्रति पूरी श्रद्धा और भाव से समर्पित हैं और अब इस प्रकरण के बाद अपने भविष्य को लेकर आशंकित भी।
फ़िरोज खान के मजहब से होने का उन्हें कोई नुकसान नहीं है, बल्कि फायदा ही है। कुछ लोग मानवीय मूल्यों, संविधान और मुस्लिम होने की बात को लेकर अधिक भ्रमित हैं। आपको बता दूँ कि किसी भी संस्था की स्थापना के पीछे उसके संस्थापक का एक उद्देश्य होता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ‘हिन्दू’ शब्द और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के ‘धर्म’ शब्द में संस्थापक की बहुत सारी अवधारणाएँ निहित हैं। हमारी परम्परा नामकरण संस्कार करने की रही है, और हम सबसे सार्थक नाम चुनने की कोशिश करते हैं, यह सभी को समझना चाहिए।
देखिए अभी तो बस शुरुआत हो रही है। अगर हमने आज विरोध नहीं किया तो 15 साल बाद इस संकाय में एक दूसरे मजहब का प्रोफेसर होगा, विभागाध्यक्ष होगा, डीन होगा। जो उसी मजहब के कई अन्य लोगों की नियुक्ति करेगा, और एक ऐसा दौर भी आएगा जब हिन्दू विश्वविद्यालय के ‘हिन्दू धर्म संकाय’ का संचालन गैर-हिन्दू करेंगे। वे जिनका इन विषयों से, सनातन परंपरा से, यज्ञ और ज्योतिष से कोई आत्मीय लगाव नहीं होगा, बस यह उनकी जीविका का साधन होगा तो महामना मालवीय जी के इस बगिया में इस संकाय की स्थापना का मूल उद्देश्य ही छिन्न-भिन्न हो जाएगा।
सौरभ द्विवेदी का इंटरव्यू:
ऑपइंडिया: आपके हिसाब से ये मालवीय मूल्य क्या हैं जिनके लिये आप आवाज़ उठा रहे हैं। क्या मालवीय जी धर्म-निरपेक्ष नहीं थे!
सौरभ द्विवेदी: बार-बार डॉ. फिरोज खान के इस नियुक्ति के विरोध में ‘मालवीय मूल्यों’ का हवाला दिया जा रहा है तो समझिए हिन्दू धर्म के सन्दर्भ में मालवीय मूल्य क्या हैं इसकी बानगी बस इससे समझ लीजिए कि 1906 में ‘मुस्लिम लीग’ की स्थापना और उनकी अनावश्यक माँगों को देखकर 1915 में महामना मालवीय कॉन्ग्रेस में अपनी ऊँची साख होने के बावजूद कॉन्ग्रेस से अलग हुए और हिन्दू-हित की बात के लिए 1915 में ‘अखिल भारतीय हिन्दू महासभा’ की स्थापना की। अपने जीवनकाल में 4 बार कॉन्ग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष रहे, जिसमें से दो अधिवेशनों के समय महामना जेल में भी रहे। जब ब्रिटिश हुकूमत में कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग ने 1916 के ‘लखनऊ पैक्ट’ के तहत मजहब विशेष के लिए अतिरिक्त एवं पृथक प्रतिनिधित्व की बात की, तब मालवीय जी ने कॉन्ग्रेस के इस प्रस्ताव का तीखा प्रतिरोध किया। आज वही प्रतिरोध कहीं न कहीं ‘धर्म संकाय’ के छात्र कर रहे हैं।
ऑपइंडिया: यह संस्कृत विभाग और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में क्या अंतर है। इस संकाय में क्या ऐसी विशेषता है कि आप लोग एक ख़ास मजहब वाले को नहीं आने देना चाहते। इससे धर्म को क्या नुकसान हो सकता है!
सौरभ द्विवेदी: डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति संस्कृत विभाग में हुई, स्पष्ट कर दूँ कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग कला संकाय के अंतर्गत आता है और फिरोज खान की नियुक्ति ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ में हुई है। हम यहाँ अपनी परम्पराओं और मालवीय मूल्यों की रक्षा हेतु विरोध कर रहे हैं। हमारा विरोध सिर्फ किसी मजहब का विरोध नहीं है। यहाँ हुई नियुक्ति सिर्फ संस्कृत भाषा से नहीं जुड़ी इस संकाय का मूल ‘धर्म विज्ञान’ में छिपा है।
ऑपइंडिया: कोई दूसरे मजहब वाला कर्मकांड की शिक्षा क्यों नहीं दे सकता? कुछ लोग यही पूछ रहे हैं कि क्या बुराई है इसमें?
सौरभ द्विवेदी: आज मीडिया के वो तमाम लोग जो इस मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम में समेटते हुए इसे ब्राह्मणवाद से जोड़ कर ध्वस्त करने में जी-जान से लगे हुए हैं। आज उदारवाद के नाम पर वामपंथी और उनका गिरोह जो जहर हर जगह बोने का काम कर रहे हैं वस्तुतः उनकी उदारवादिता एक ढोंग है, अदूरदर्शिता है। बनारस में आप कहीं भी निकल जाइए संस्कृत के श्लोक बच्चा-बच्चा पढ़ता और बोलता नजर आ जाएगा है, वैदिक मन्त्रों और ऋचाओं से घाट गुंजायमान मिलेंगे लेकिन उन्हें कभी इसे किसी दूसरे मजहब वाले से पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ी। या उनसे जिनकी उन श्लोकों और मंत्रो के प्रति न भाव हो, न श्रद्धा हो, वह उनके लिए शब्दों संयोजन भले हो सकता है लेकिन उसके प्राण को वो कभी महसूस नहीं कर सकते। क्योंकि उनके अंदर इन मन्त्रों, श्लोकों के प्रति समर्पण और भक्ति का भाव कभी नहीं आएगा।
ऑपइंडिया: इस पूरे मुद्दे को जान बूझकर या अनजाने में ही, लोगों ने संस्कृत भाषा और इस्लाम तक उतार दिया है। ऐसे में लोग यह कहते नजर आ रहे हैं कि कोई हिन्दू धर्म को जानता-समझता है, तो उसे हमें वसुधैव कुटुम्बकम के नाम पर स्वाकारना चाहिए न कि बवाल कर के सनातन धर्म की परंपरा का अपमान करना चाहिए। इस पर आप क्या कहेंगे?
सौरभ द्विवेदी: यहाँ सिर्फ संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने का मसला है ही नहीं, उन्हें आज की चिन्ता भी नहीं है। लेकिन जब 20 साल बाद ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ में वैदिक मंगलाचरण की जगह कुरान और हदीस की आयतें गूँजेगी, विश्व हिन्दू पंचांग की जगह कुरान और बाइबिल का प्रकाशन होगा, तो बुढ़ापे में आप इस कुण्ठा से जरूर गुजरेंगे कि जब मालवीय मूल्यों और हिन्दू सनातन धर्म और संस्कृति के रक्षार्थ कुछ छात्र लड़ रहे थे, जब संविधान की कोई एक पंक्ति उनके पक्ष में नहीं थी, शायद एक ढंग का तर्क भी उनके पास नहीं था, और महामना के नाम पर जीवनयापन करने वाले अधमर्ण मौन थे, तब भावनाओं के बल पर, अन्तरात्मा की आवाज पर, महामना के आदर्शों और मूल्यों की रक्षा के लिए पुलिस की लाठी खाने और खून का कतरा गिरने तक कुछ निहत्थे एक धर्मयुद्ध लड़ते रहे थे। और हम मौन थे तो आज की अपनी दुर्गति के लिए जिम्मेदार कोई और नहीं हम खुद हैं।
ऑपइंडिया: आप वहीं से पढ़ कर निकले हैं और अध्यापन का कार्य कर रहे हैं, क्या आपके कुछ मित्र हैं जो वहाँ से पढ़ने के बाद जीवनयापन हेतु पुरोहित आदि का काम कर रहे हों? क्या आपसे उनकी कोई बातचीत हुई है? वो इसे कैसे देखते हैं?
सौरभ द्विवेदी: विश्वविद्यालय के दीवारों और पत्थरों पर मालवीय जी के संदेश पढ़ते हुए हम जवान हुए हैं। हिन्दू विश्वविद्यालय के हम जैसे छात्र उन विचारों को आत्मसात् करने की कोशिश करते हैं। विश्वविद्यालय की दीवारों पर वेदों उपनिषदों के मन्त्र पढ़े हैं हमने। विश्वनाथ मंदिर में खुदे 18 अध्याय गीता को देखकर नतमस्तक हुए हैं। हिन्दू मूल्यों के संरक्षण में मालवीय जी जैसा बनने का सपना देखा है। हमेशा आदर्श माना है। जो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ा है, या पढ़कर भी श्रद्धाविहीन हैं, हम उनसे इस आस्था की उम्मीद बिल्कुल नहीं करते। उनकी धर्म-निरपेक्षता ईमानदार है। लेकिन जो लोग इस आस्था से जुड़े हैं, उनका चुप रहना आज जरूर अखर रहा है।
ऑपइंडिया: डॉ फिरोज की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी कुछ सवाल आपने उठाए हैं। उन बातों का आधार क्या है?
सौरभ द्विवेदी: SVDV में फिरोज खान की यह नियुक्ति पैसों और नेक्सस के सिवाय और किसी आधार पर नहीं हुई है। पैसों के लालची साहित्य विभागाध्यक्ष ने अपने 5 साल पुराने विश्वसनीय स्टूडेंट को पैसे लेकर नियुक्त किया है, बस इतनी सी बात है। समझिए, साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर उमाकान्त चतुर्वेदी हैं। मेरे शोध-निर्देशक हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 5 साल पहले एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में आए। इसके पहले राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के जयपुर कैम्पस में कार्यरत थे। पूर्व संस्था से इनका लगाव भी है और इनके विश्वस्त लोग आज भी वहीं हैं। इनका व्यक्तित्व धनलोलुपता की पराकाष्ठा है। इनकी धनलोलुपता को समझने के लिए इनसे किसी भी विषय पर 15 मिनट बात करना ही पर्याप्त है। अगर इनका वश चले तो BHU के शोधार्थियों के JRF के पैसों में भी अपना हिस्सा निश्चित कर लें।
इस नियुक्ति की सारी फिल्डिंग इन्होंने ही सेट की है। 6 महीने पहले से, मेरा मानना है कि अगर निष्पक्ष जाँच हो जाए तो ये रंगे हाथ पकड़े भी जा सकते हैं। इस नियुक्ति का सबसे बड़ा कारण है पैसा। सुरक्षित और गोपनीय ढंग से पैसे लेने के लिए प्रोफेसर उमाकान्त चतुर्वेदी के लिए सबसे उपयुक्त अभ्यर्थी हैं डॉ फ़िरोज खान, जो कि संस्थान के जयपुर कैंपस के छात्र हैं, OBC केटेगरी से हैं। 10 अभ्यर्थियों का साक्षात्कार हुआ उनमें से कई हिन्दू विश्वविद्यालय के भी पूर्व शोधछात्र थे। लेकिन इन 5 वर्षों में विभागाध्यक्ष को किसी पर इतना विश्वास न था कि पैसे की बात चला सकें। विभागाध्यक्ष को इस बात का भी अंदेशा नहीं था कि बस चयनित अभ्यर्थी के मजहब विशेस से होने की वजह से भी विवाद हो सकता है।
इन्होंने इंटरव्यू एक्सपर्ट के रूप में जयपुर के ही एक प्रोफेसर ताराशंकर शर्मा पाण्डेय को बुलाया, जो संभवतः इनके सबसे विश्वस्त और हाँ में हाँ मिलाने वाले मित्र हैं। इनके बारे में मैं अधिक नहीं जानता। दूसरे एक्सपर्ट एक्स प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी को बुलाया गया। विचारधारा के संदर्भ में अवसरवादी रूप से कभी ‘वामपंथी-कॉन्ग्रेसी’ कभी ‘पारंपरिक विद्वान’ कभी संस्कृत साहित्य के ‘आधुनिक समालोचक’ हैं। कॉन्ग्रेस के शासनकाल में ये राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के कुलपति रहे हैं। बहुत सारे पदों को अलंकृत कर चुके हैं। इनका वैदुष्य निर्विवाद है। इन्होंने संस्कृत साहित्य को समृद्ध करने के लिए बहुत परिश्रम भी किया है। लेकिन स्याह पक्ष यह है कि इन्होंने अपने सम्पूर्ण विद्वत्ता और पद-प्रतिष्ठा का दुरुपयोग विश्वविद्यालयों में ‘अपने’ लोगों की नियुक्तियों में किया है।
लगभग 20 वर्षों से विश्वविद्यालय स्तर की सभी नियुक्तियों पर इनके ‘गैंग’ का एकाधिपत्य है। संस्कृत के हर संस्थान में इनके नियुक्त किए हुए लोगों का एक नेक्सस है। यह नेक्सस अपने झुण्ड से इतर किसी अन्य को संस्कृत प्रोफेसर बनने की मान्यता नहीं देता। इनकी तुलना एक समय के जाने माने हिन्दी समालोचक से कुछ अंश तक की जा सकती है।
इसी नेक्सस के ये तीनों लोग विद्वान हैं, योग्य हैं। इसलिए इनके द्वारा नियुक्त अभ्यर्थी की योग्यता पर प्रश्नचिह्न लगाना तार्किक रूप से सामान्य व्यक्ति की दृष्टि में गलत है। और इनका पूरा गैंग किसी भी अपने गुट के व्यक्ति को प्रोफेसर बनने के लिए सर्वाधिक योग्य मानता है, साबित भी करता है। प्रोफेसर उमाकान्त चतुर्वेदी के अध्यक्ष रहते यह नियुक्ति बिना पैसे के नहीं हो सकती थी, लेकिन यह अभ्यर्थी एक ‘हिन्दू OBC’ होता तो विरोध नहीं होता, यह बात भी सच है। दिलचस्प यह भी है कि सरकार किसी की भी हो विश्वविद्यालय की नियुक्तियाँ एक विशिष्ट विचारधारा (वामपंथी) के लोग ही करते हैं।
इस नियुक्ति का विश्वविद्यालय प्रशासन से इतर किसी स्वतंत्र संस्था से जाँच होनी चाहिए, फिर अपने आप सारा कच्चा चिट्ठा खुल जाएगा। देखिए, संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग के एक OBC पद हेतु 27 अभ्यर्थियों ने आवेदन किया। 26 हिन्दू OBC थे – यादव, पटेल, चौधरी आदि आदि। एक मुस्लिम OBC था – खान और हिन्दू विश्वविद्यालय के नास्तिक कुलपति राकेश भटनागर और भ्रष्ट साहित्य विभागाध्यक्ष और उनके गैंग ने मुस्लिम OBC को ज़्यादा योग्य माना। 26 OBC हिन्दू मूर्ख साबित किए गए। और OBC-SC/ST के हक़ के लिए लड़ने वाले प्रोपोगंडावादी झुण्ड ने एक स्वर में उसका धर्म देखकर 26 हिन्दू OBC को लात मार दिया।
महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना के बीच चल रही साझा बैठक ख़त्म हो गई है। एनसीपी के मुखिया शरद पवार ने बैठक के बाद जानकारी देते हुए बताया कि उद्धव ठाकरे के नाम पर सभी दलों में सहमति बन गई है। इससे साफ़ हो गया है कि शिवसेना सुप्रीमो उद्धव महाराष्ट्र के नए सीएम होंगे। पवार ने आगे बताया कि अभी तीनों दलों के बीच और भी बैठकें होंगी। शनिवार (नवंबर 33, 2019) को भी बैठक प्रस्तावित है।
Consensus on Uddhav to lead Maha govt; talks in progress on other issues: Pawar
उद्धव ठाकरे ने बैठक के बाद कहा कि तीनों दल किसी भी मुद्दे को टालना नहीं चाहते हैं और सभी मसलों पर आम सहमति के बाद ही काम किया जाएगा। शरद पवार ने साफ़ कर दिया है कि महाराष्ट्र की नई सरकार का नेतृत्व उद्धव ठाकरे करेंगे। इससे पहले एनसीपी के प्रवक्ता नवाब मलिक ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा था कि पवार ने ‘चाणक्य’ को पटखनी दे दी।
उधर शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी इस बात की पहले ही पुष्टि कर दी थी। उनसे जब पूछा गया था कि क्या शरद पवार उद्धव को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं, तो उन्होंने कहा कि ये सूचना ग़लत है। साथ ही राउत ने कहा कि महाराष्ट्र की जनता उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनते देखना चाहती है। पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पृथ्वीराज चौहान ने कहा कि देवेंद्र फडणवीस के ख़राब शासन का अंत करने के लिए शिवसेना का समर्थन करना ज़रूरी था। उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी ने शिवसेना को समर्थन देने का निर्णय लिया है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राजस्थान सरकार के उस आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दिया है, जिसमें पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थियों को वापस भेजने की बात कही गई थी। गृह मंत्रालय ने बड़ा क़दम उठाते हुए अशोक गहलोत सरकार के आदेश पर रोक लगा दी है। विदेशियों के प्रत्यर्पण के सम्बन्ध में गृह मंत्रालय ने अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए इस आदेश पर रोक लगाई है। गृह मंत्रालय के कुछ अधिकारियों के साथ-साथ सीमावर्ती क्षेत्रों के कुछ अधिकारियों को भी इस सम्बन्ध में निश्चित अधिकार दिए गए हैं। अब मंत्रालय ने दखल देते हुए हिन्दुओं के प्रत्यर्पण को रोक दिया है।
बता दें कि राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने हिन्दुओं के लिए भारत छोड़कर पाकिस्तान चले जाने का आदेश निकाला था। राज्य सरकार का यह आदेश उनके लिए था जो पाकिस्तान के सिंध प्रांत से धार्मिक वीजा पर भारत आए थे। दरअसल यह सभी हिन्दू हैं जो पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत में रह रहे हैं।
#Breaking | MASSIVE TIMES NOW IMPACT.@PIBHomeAffairs has put a stay on Rajasthan Govt’s order to deport persecuted Hindus.
इन सभी के परिवार जैसलमेर और उसके आसपास के सीमावर्ती इलाकों में रह रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा वक़्त में इन परिवारों के 19 सदस्य यहाँ रह रहे हैं। इनमें से तीन सदस्यों को सीबीआई और जिला प्रशासन की टीम पाकिस्तान चले जाने का नोटिस थमा चुकी थी। इन शरणार्थियों के पक्ष में आवाज़ बुलंद करते रहे जयपुर के अमरेंद्र रत्नू ने बताया-
“राजस्थान पुलिस इन लोगों को वाघा-अटारी बॉर्डर के रास्ते पाकिस्तान डिपोर्ट करना चाहती है मगर हम पूरा प्रयास कर रहे हैं कि इसे रुकवाया जाए। इसके लिए सुबह से ही लगतार हम ट्वीट भी कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में हमारी बात अरुण कुमार और संघ के अन्य बड़े नेताओं से हुई है। होम मिनिस्टर तक बात चली गई है। हम इन्हें डिपोर्ट तो नहीं होने देंगे, हमें सतत प्रेशर बना कर रखना है।”
अब गृह मंत्रालय के इस क़दम से ये हिन्दू शरणार्थी भारत में रह पाएँगे। पाकिस्तान में हिन्दुओं व सिखों की स्थिति काफ़ी बदतर है और उनके साथ मानवीय व्यवहार किया जाता है। वहाँ अल्पसंख्यकों पर फ़र्ज़ी ईशनिंदा क़ानून लगा कर उन्हें सज़ा देने की कई घटनाएँ सामने आई हैं।
कोयम्बटूर में एक सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल के एक 65 वर्षीय कैथोलिक पादरी एंटनी राज को पुलिस ने गुरुवार (21 नवंबर) को गिरफ़्तार कर लिया। पादरी की गिरफ़्तारी इसलिए हुई क्योंकि उसने कुछ छात्राओं को कथित तौर पर अपने मोबाइल फोन पर सेक्सुअल कंंटेंट (यौन सामग्री) खोलने के लिए मजबूर किया था।
कैथोलिक पादरी, जो शहर में एक सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल के कॉरस्पॉण्डेन्ट के रूप में सेवा दे रहा था। पुलिस ने बताया कि मारिया एंटनी राज, जो शहर के गाँधीपुरम में सेंट मैरी हाई स्कूल में कॉरस्पॉण्डेन्ट के तौर पर कार्यरत था, उसने कई बार छात्राओं को अपने मोबाइल फोन पर सेक्सुअल कंटेंट खोलने के लिए मजबूर किया था। उसकी इस हरक़त से क़रीब पाँच छात्राएँ प्रभावित थी।
छात्राओं की शिक़ायत के बाद, उनके माता-पिता ने कॉरस्पॉण्डेन्ट को हटाने के लिए स्कूल प्रबंधन से कहा था। जब उसे स्कूल से नहीं निकाला गया, तो माता-पिता ने पुलिस से सम्पर्क किया। स्कूल के एक अधिकारी ने कहा कि अभिभावकों ने सोमवार (18 नवंबर) को उनसे सम्पर्क किया और कॉरस्पॉण्डेन्ट की शिकायत की। अधिकारी ने कहा, “उन्होंने बुधवार को फिर से इस मुद्दे का उठाया और हमें उसे हटाने के लिए कहा।”
इस मामले की छानबीन के लिए गुरुवार (21 नवंबर) को पुलिस ने स्कूल का दौरा किया और प्रभावित छात्रों, उनके माता-पिता और स्कूल प्रबंधन से पूछताछ की। बाद में आरोपित को ऑल वुमेन पुलिस स्टेशन, कोयम्बटूर सेंट्रल ले जाया गया। वहाँ उसके ख़िलाफ़ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (POCSO) एक्ट, 2012 की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
ख़बर के अनुसार, पुलिस उपायुक्त (क़ानून-व्यवस्था) एल बालाजी सरवनन ने बताया कि आरोपित को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। पुलिस सूत्रों ने कहा कि इस बात की जाँच भी की जा रही है कि स्कूल में इस तरह की घटनाएँ हुई थी या नहीं। सूत्रों ने यह भी कहा कि वे प्रभावित बच्चों को परामर्श और चिकित्सा जाँच के लिए भेजेंगे ताकि यह पता चल सके कि कहीं, वो किसी तरह की मानसिक पीड़ा से ग्रसित तो नहीं थी।
स्कूल की हेडमिस्ट्रेस एसी अनीता ने कहा कि राज एक सेवानिवृत्त व्यक्ति थे, जो कॉरस्पान्डन्ट के रूप में सेवा दे रहे थे। इस घटना के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया था, और आगे उनकी सेवा बहाल नहीं की जाएगी। वहीं, इस बात का भी पता चला कि राज कोयम्बटूर सूबे (लैटिन संस्कार) से जुड़ा हुआ है।
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) के संस्कृत विद्या धर्म-विज्ञान संकाय में फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर विरोध को आज 16वें दिन छात्रों ने पीएमओ के दखल पर विराम दे दिया है। लगातार प्रशासन छात्रों पर दबाव बना रहा है कि छात्र धरना ख़त्म कर दें लेकिन छात्र विराम देने के बाद भी अभी अपनी माँगों पर बने हुए हैं। छात्रों से पीएमओ और BHU प्रशासन ने इस मुद्दे के समाधान के लिए 10 दिन का समय माँगा है।
छात्रों ने कल ही प्रशासन को अपना माँग पत्र सौंपते हुए कई सवालों का विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब माँगा था। जिसे लेकर देर रात SVDV के संकाय प्रमुख, अन्य विभागाध्यक्षों और VC के बीच मीटिंग चली थी लेकिन किसी भी नतीजे पर नहीं पहुँचा गया। छात्रों का कहना है जब तक हमारी माँगों का समाधान नहीं होता और फिरोज खान को यहाँ से हटाया या स्थान्तरित नहीं किया जाता तब तक छात्र कक्षा और 2 दिसंबर से होने वाली परीक्षाओं का बहिष्कार जारी रखेंगे। छात्र कल पीएमओ को ज्ञापन और अपनी माँगों की कॉपी भी सौंपने जाएँगे।
आंदोलनरत SVDV के छात्रों का वाइसचांसलर से सवाल
इस नियुक्ति प्रक्रिया में विश्वविद्यालय ने यूजीसी के किस शार्ट लिस्टिंग प्रक्रिया को अपनाया है?
विश्वविद्यालय संविधान के अनुसार नियुक्ति प्रक्रिया सम्पन्न हुई है?
क्या बीएचयू एक्ट के 1904, 1096, 1915, 1955, 1966 व 1969 एक्ट को केंद्र में रखकर यह नियुक्ति की गई है?
संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग में क्या संकाय के अन्य सभी विभागों के अनुरूप ही शार्ट लिस्टिंग हुई है?
क्या संकाय के सनातन धर्म के नियमों को ध्यान में रखकर शार्ट लिस्टिंग की गई है?
SVDV BHU के छात्रों का माँग पत्र SVDV BHU के छात्रों का माँग पत्र
बता दें कि इस विरोध प्रदर्शन के विराम की कहानी पीएमओ के दखल के बाद लिखी गई। आज ही इस मामले की गूँज प्रधानमंत्री तक पहुँची थी। और प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस सम्बन्ध में रिपोर्ट तलब की है। पीएमओ ने इस पूरे बवाल को लेकर BHU प्रशासन से रिपोर्ट भी माँगी। आनन-फानन में मंडलाधिकारी दीपक अग्रवाल ने विदेश दौरे पर होने के बावजूद पीएमओ को रिपोर्ट भेजी। अब प्रशासन एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहा है, जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा जाएगा। छात्रों ने आरोप लगाया है कि कई विभागों में अयोग्य नियुक्तियों के जरिए विश्वविद्यालय को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।
बता दें कि पहली बार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय (SVDV) के साहित्य विभाग में एक मुस्लिम सहायक प्रोफेसर डॉ फिरोज खान की नियुक्ति 5 नवम्बर को हुई। संकाय के विद्यार्थियों को जैसे ही इसकी जानकारी हुई, इस नियुक्ति के खिलाफ विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था और तब से लगातार प्रदर्शन जारी था।
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के ‘धर्म विज्ञान संकाय’ में फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति के ख़िलाफ़ चल रहे छात्रों के विरोध प्रदर्शन को दबाने की कोशिश हो रही है। छात्रों का कहना है कि हिन्दू कर्मकांड के विषय को एक मुस्लिम कैसे पढ़ा सकता है, जो यज्ञोपवीत और शिखा धारण नहीं करता। कई तबकों में अफवाह फैलाई जा रहा है कि संस्कृत पढ़ाने के लिए फ़िरोज़ ख़ान का विरोध हो रहा है जबकि छात्र साफ़-साफ़ कहते हैं कि अगर फ़िरोज़ ख़ान संस्कृत पढ़ाते हैं तो उनका स्वागत है। इस सम्बन्ध में ऑपइंडिया ने बीएचयू के ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान’ संकाय के छात्र आनंद मोहन झा से बात की। झा इस विरोध प्रदर्शन के नेतृत्वकर्ताओं में शामिल हैं।
इस पूरे प्रकरण के दौरान ‘इंडिया टुडे’ का एक इंटरव्यू चर्चित हुआ, जिसमें पत्रकार राहुल कँवल ने विरोध-प्रदर्शन में शामिल छात्रों का नेतृत्व कर रहे चक्रपाणि ओझा से बातचीत की। इसमें राहुल कँवल ने छात्रों की बात सुनने से इनकार कर दिया और उनका ऑडियो म्यूट कर दिया। इस दौरान उन्होंने महोपनिषद के श्लोक का एक भाग ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का ग़लत उच्चारण करते हुए छात्रों को नीचा दिखाया। आनंद मोहन ने बताया कि जहाँ छात्रों ने अपनी बात रखी, वहाँ ‘इंडिया टुडे’ ने उनकी आवाज़ म्यूट कर दी।
आनंद मोहन झा ने बताया कि ‘इंडिया टुडे’ के शो में राहुल कँवल व अन्य अतिथियों का लहजा काफ़ी ग़लत था, जिसका बीएचयू के छात्र सख्त विरोध करते हैं। उन्होंने कहा कि राहुल कँवल ने बीएचयू के छात्रों के साथ काफ़ी गन्दा व्यवहार किया। प्रदर्शनकारी छात्रों पर दबाव पैदा किया जा रहा है ताकि वो आंदोलन से पीछे हट जाएँ। झा ने बताया कि छात्र कहीं न कहीं ख़ासा दबाव का सामना कर रहे हैं। ऑपइंडिया से बात करते हुए बीएचयू के ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान’ संकाय के छात्र आनंद मोहन झा ने बताया कि व्याकरण विभाग के प्रोफेसर बृजभूषण ओझा ने छात्रों के साथ गुंडागर्दी की।
The tone & manner in which @rahulkanwal spoke to the BHU student is the reason why Lutyens/the Delhi lot are despised by the rest of India. I may disagree with the student,but this is no way for an anchor to talk to anyone. Boorish elitism on display https://t.co/Yslln6DH1y
विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों में से एक का प्रोफेसर ओझा ने हाथ पकड़ लिया और उसे खींचने लगे। इस स्थिति को देख अन्य छात्रों ने अपने साथ को वापस खींचना शुरू किया। उक्त छात्र का हाथ पकड़ कर जबरदस्ती खींचते हुए प्रोफेसर ओझा ने कहा- “चलो, तुम मेरे साध उधर अंदर चलो।” ओझा ने सभी छात्रों के सामने खुलेआम ऐसा किया। इसके अलावा एक अन्य प्रोफेसर रामनारायण द्विवेदी का भी नाम सामने आया है। आनंद मोहन झा ने बताया कि प्रोफेसर द्विवेदी विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर दबाव बनाने में लगे हुए हैं। उन्होंने धमकी दी कि छात्रों का करियर चौपट कर दिया जाएगा।
प्रोफेसरों ने छात्रों से कहा कि जो हो रहा है उसे होने दो और जैसा विश्वविद्यालय प्रशासन चाहता है, वैसा करो।प्रोफेसरों ने धमकी देते हुए कहा- “हम लोग तो बाहर बैठे रहेंगे फिर भी हमें रुपए मिलते रहेंगे, तुमलोग अपना सोचो।” आनंद मोहन झा के अनुसार, प्रोफेसरों ने कहा कि इधर धरना जितना लम्बा चलेगा, वो लोग बैठ कर आराम से पैसा खाते रहेंगे। उन्होंने बताया कि बाद में प्रोफेसर अपने ही बयान से पलट गए। बीएचयू के कई पुराने छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मुलाक़ात की है। छात्रों की वीसी के साथ भी बैठक हुई। झा ने बताया कि इस बैठक के दौरान भी वीसी का रवैया काफ़ी दबावपूर्ण था।
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन करते छात्र
रिसर्च कर रहे छात्रों के गाइड होते हैं, जिसके लिए किसी प्रोफेसर को असाइन किया जाता है। उन्हें सुपरवाइजर भी कहा जाता है। संकाय के छात्र आनंद मोहन झा ने बताया कि जितने भी जिन प्रोफेसरों (गाइड) ने कभी छात्रों को डाँटा तक नहीं, उनका रवैया भी अब काफ़ी दबावपूर्ण हो गया है। उन्होंने आशंका जताई कि सुपरवाईजरों पर भी ऊपर से काफ़ी दबाव बनाया गया है। उन्होंने बताया कि ये प्रोफेसर लगातार छात्रों के आत्मविश्वास को कम करने में लगे हुए हैं।
फिलहाल जेएनयू के छात्रों का आंदोलन जारी है क्योंकि आनंद मोहन झा और चक्रपाणि ओझा सहित सभी छात्रों ने पीछे हटने से इनकार कर दिया है। इन्हें शंकराचार्य का भी समर्थन प्राप्त हुआ है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी प्रशासन से इन पूरे कांड की रिपोर्ट तलब की है। छात्रों ने 15 दिनों के आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय के निवेदन पर धरना ख़त्म कर दिया लेकिन कहा कि लड़ाई जारी रहेगी। अब छात्र प्रधानमंत्री को ज्ञापन देने के लिए कार्यालय जाएँगे। हालाँकि, तब तक परीक्षाओं का बहिष्कार किया जाएगा।