जब ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ में वैदिक मंगलाचरण की जगह कुरान-हदीस की आयतें गूँजेगी तो ‘हम’ याद आएँगे

जब बीबीसी, वायर, क्विंट, प्रिंट जैसे तमाम मीडिया गिरोह इस मुद्दे को ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने वाला बताकर इस विरोध को कुंद करने में लगे हैं और यहाँ ये स्पष्ट करना ज़रूरी है कि डॉ. फिरोज खान को देश ने नहीं बल्कि बीबीसी ने अपने झूठ को प्रामाणिक बनाने के लिए 'पद्म श्री' दे डाला......

डॉ फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध काशी हिन्दू विश्विद्यालय के कुलपति आवास के बाहर जारी है। संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों की कुलपति से हुई मुलाकात भी बेनतीजा रही लेकिन छात्र अभी भी अपनी माँगों और मूल्यों को लेकर धरने पर हैं। यहाँ एक बात गौर करने वाली यह भी है कि छात्रों का विरोध JNU के प्रोफ़ेसर वर्तमान वाईसचांसलर राकेश भटनागर के सामने JNU की तर्ज पर न होकर अपने आपमें सभी नैतिक मूल्यों को समाहित किए हुए वैदिक परंपरागत रीति से ही जारी है। छात्र कभी बुद्धि-शुद्धि यज्ञ कर रहे हैं तो कभी रुद्राभिषेक तो कभी प्रदर्शन के तौर पर हनुमान चालीसा का पाठ जारी है। यही वो मूल्य हैं जिनके रक्षार्थ ये छात्र इतनी सर्दी में भी वहाँ दिन-रात डटे हैं। कई छात्रों की इस दौरान तबियत भी ख़राब हो गई लेकिन अपने संकल्पों हेतु डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध जारी है।

विरोध का तरीका भी वैदिक

ऑपइंडिया से बात करते हुए शशिकांत मिश्रा, कृष्णा, शुभम, चक्रपाणि ओझा सहित SVDV के कई छात्रों ने बताया, “हम इसलिए संघर्ष कर रहे हैं कि यदि हम आज फेल भी हो गए तो आज से 20 साल बाद जब हम अपने मातृ संस्थान की तरफ देखेंगे तो अफ़सोस थोड़ा कम होगा कि हमने संघर्ष किया था लेकिन धनलोलुपता और ‘छद्म सेक्युलरिज्म’ की आड़ में महामना मालवीय जी के भावनाओं और दृष्टिकोण के साथ खिलवाड़ किया गया वो भी उसी जगह जहाँ आज भी उनकी आत्मा बसती है।”

कई शोध छात्रों ने यह बात डंके की चोट पर कही कि बेशक आज बीबीसी, वायर, क्विंट, प्रिंट जैसे पोर्टल और कई मीडिया संस्थान इसे हिन्दू-मुस्लिम का स्वरुप देकर ये खुलेआम लिख रहे हों कि BHU में एक मुस्लिम संस्कृत के प्रोफ़ेसर का विरोध हो रहा है वो भी ‘संस्कृत विभाग’ में, मंगलेश डबराल के लेख में दो हाथ और आगे जाते हुए बीबीसी ने डॉ. फिरोज खान को ‘पद्म श्री’ भी दे डाला है ताकि वो ‘ज़्यादा योग्य’ लगें लेकिन क्यों दिया गया इस पर मौन है। यही वामपंथियों और देश की पारम्परिक संस्कृति, वैदिक धर्म, सनातन परंपरा का विरोध करने वालों की बहुत पुरानी चाल है कि हर बात को ब्राह्मणवाद से जोड़ देना। जिसे बीबीसी ने इस बार भी बखूबी अंजाम दिया है। झूठ और फेक न्यूज़ को कैसे परोसा जाता है इसे आप अक्सर बीबीसी पर देख सकते हैं जिसे वो तथाकथित बड़े नामों की चाशनी में लपेट कर परोसता है कि झूठ न पकड़ा जाए लेकिन बार-बार पकड़े जाने के बावजूद बीबीसी बाज नहीं आता।

बीबीसी में छपा मंगलेश डबराल का लेख
बीबीसी में ही छपा वुसअतुल्लाह खान का लेख
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यहाँ ये स्पष्ट करना ज़रूरी है कि डॉ. फिरोज खान को देश ने नहीं बल्कि बीबीसी ने अपने झूठ को प्रामाणिक बनाने के लिए ‘पद्म श्री’ दे डाला। इस बात की तस्दीक SVDV के पूर्व शोध छात्र और वर्तमान में असिस्टेंट प्रोफेसर (कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक, नागपुर, महाराष्ट्र) सौरभ द्विवेदी ने भी की। उन्होंने साफ-साफ यह आरोप दोहराया कि बीबीसी सहित कई मीडिया संस्थान ये झूठ फैला रहे हैं कि डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति संस्कृत विभाग में हुई, उन्हें स्पष्ट कर दूँ कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग कला संकाय के अंतर्गत आता है और फिरोज खान की नियुक्ति ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ में हुई है। हम यहाँ अपनी परम्पराओं और मालवीय मूल्यों की रक्षा हेतु विरोध कर रहे हैं। हमारा विरोध सिर्फ किसी मुसलमान का विरोध नहीं है। यहाँ हुई नियुक्ति सिर्फ संस्कृत भाषा से नहीं जुड़ी इस संकाय का मूल ‘धर्म विज्ञान’ में छिपा है।

इस पूरे खेल के मुख्य अभियुक्त चतुर्वेदी जी के ही शोध छात्र सौरभ द्विवेदी ने ये दावे के साथ कहा, “SVDV में फिरोज खान की यह नियुक्ति पैसों और नेक्सस के सिवाय और किसी आधार पर नहीं हुई है। पैसों के लालची साहित्य विभागाध्यक्ष ने अपने 5 साल पुराने विश्वसनीय स्टूडेंट को पैसे लेकर नियुक्त किया है, बस इतनी सी बात है।” सौरभ द्विवेदी सहित सभी शोध छात्रों ने माँग की कि इस नियुक्ति का विश्वविद्यालय प्रशासन से इतर किसी स्वतंत्र संस्था से जाँच होनी चाहिए, फिर अपने आप सारा कच्चा चिट्ठा खुल जाएगा।

ऑपइंडिया से बात करते हुए डॉ. सौरभ द्विवेदी ने बताया, “फ़िरोज खान के मुसलमान होने का उन्हें कोई नुकसान नहीं है, बल्कि फायदा ही है। कुछ लोग मालवीय मूल्यों, संविधान और मुसलमान होने की बात को लेकर अधिक भ्रमित हैं। आपको बता दूँ कि किसी भी संस्था की स्थापना के पीछे उसके संस्थापक का एक उद्देश्य होता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ‘हिन्दू’ शब्द और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के ‘धर्म’ शब्द में संस्थापक की बहुत सारी अवधारणाएँ निहित हैं। हमारी परम्परा नामकरण संस्कार करने की रही है, और हम सबसे सार्थक नाम चुनने की कोशिश करते हैं, यह सभी को समझना चाहिए।”

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सौरभ द्विवेदी ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि एक घर बनाने में जब हम सबकी जिंदगी खप जाती है। तब संसाधन-विहीन एक व्यक्ति मदन मोहन मालवीय ने आज के एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय की नींव रखी। भीख माँगकर 40 हजार लोगों के पढ़ने और रहने की जगह बनाई। जब भारत में ब्रिटिश शासन अंग्रेजी मूल्यों वाली शिक्षा को मानक शिक्षा के तौर पर स्थापित कर रही थी तब उन्होंने ‘हिन्दू’ मूल्यों के संरक्षण के लिए एक विश्वविद्यालय की परिकल्पना की थी। महात्मा गाँधी ने उन्हें ‘महामना’ कहा। आज संविधान में स्पष्ट निर्देश न होने का बहाना करके उनके मूल्यों की जो अनदेखी की गई है, वह मर्माहत करने वाला है।

आपको बता दूँ कि जब SVDV का एक प्रतिनिधि मंडल कुलपति से मिलने गया तो उन्होंने इस बात को ढाल बनाना चाहा कि “मालवीय जी एक व्यक्ति हैं वो गलत हो सकते हैं और मेरे पास 1969 का संशोधित BHU एक्ट है जिसमें यह नहीं लिखा है कि वहाँ मुसलमान की नियुक्ति नहीं होगी। शिलालेख मैं नहीं जानता मेरे लिए संविधान सब-कुछ है।”

जानकारी के लिए बता दूँ कि मैं भी उसी विश्विद्यालय का छात्र हूँ और आज जिस देश के संविधान और कॉन्ग्रेस के दौर में BHU के संशोधित संविधान का वाईसचांसलर हवाला दे रहे हैं तो यहाँ इस बात का जिक्र करना ज़रूरी है कि मालवीय जी का 1946 में गुलाम भारत में महाप्रयाण हुआ और वे संविधान-निर्माण का हिस्सा नहीं रहे। लेकिन जिन विचारों और उद्देश्यों को लेकर उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की नींव रखी वो आज भी ज़िंदा है, आज भी उनके विचार जीवित हैं और उतने ही प्रासंगिक है, जितने तब थे।

सौरभ द्विवेदी भी इस बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि विश्वविद्यालय के दीवारों और पत्थरों पर उनके संदेश पढ़ते हुए हम जवान हुए हैं। हिन्दू विश्वविद्यालय के हम जैसे छात्र उन विचारों को आत्मसात् करने की कोशिश करते हैं। विश्वविद्यालय की दीवारों पर वेदों उपनिषदों के मन्त्र पढ़े हैं हमने। विश्वनाथ मंदिर में खुदे 18 अध्याय गीता को देखकर नतमस्तक हुए हैं। हिन्दू मूल्यों के संरक्षण में मालवीय जी जैसा बनने का सपना देखा है। हमेशा आदर्श माना है। जो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ा है, या पढ़कर भी श्रद्धाविहीन हैं, हम उनसे इस आस्था की उम्मीद बिल्कुल नहीं करते। उनकी धर्म-निरपेक्षता ईमानदार है। लेकिन जो लोग इस आस्था से जुड़े हैं, उनका चुप रहना आज जरूर अखर रहा है।

आगे बढ़ने से पहले एक बात और जान लेते हैं कि बार-बार डॉ. फिरोज खान के इस नियुक्ति के विरोध में ‘मालवीय मूल्यों’ का हवाला दिया जा रहा है तो समझिए हिन्दू धर्म के सन्दर्भ में मालवीय मूल्य क्या हैं इसकी बानगी बस इससे समझ लीजिए कि 1906 में ‘मुस्लिम लीग’ की स्थापना और मुसलमानों के अनावश्यक माँगों को देखकर 1915 में महामना मालवीय कॉन्ग्रेस में अपनी ऊँची साख होने के बावजूद कॉन्ग्रेस से अलग हुए और हिन्दू-हित की बात के लिए 1915 में ‘अखिल भारतीय हिन्दू महासभा’ की स्थापना की। अपने जीवनकाल में 4 बार कॉन्ग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष रहे, जिसमें से दो अधिवेशनों के समय महामना जेल में भी रहे। जब ब्रिटिश हुकूमत में कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग ने 1916 के ‘लखनऊ पैक्ट’ के तहत मुसलमानों के लिए अतिरिक्त एवं पृथक प्रतिनिधित्व की बात की, तब मालवीय जी ने कॉन्ग्रेस के इस प्रस्ताव का तीखा प्रतिरोध किया। आज वही प्रतिरोध कहीं न कहीं ‘धर्म संकाय’ के छात्र कर रहे हैं।

सौरभ द्विवेदी इस बात में आगे जोड़ते हुए कहते हैं, “विनायक दामोदर सावरकर और डॉ केशव बलिराम हेडगवार इस हिन्दू महासभा का अहम हिस्सा रहे। बाद में इस संस्था से ‘हिन्दुत्व-बीज’ को लेकर डॉ हेडगेवार ने हिन्दू महासभा से इतर एक संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की। आज उस ‘हिन्दुत्व’ मूल वाले ‘संघ’ के पदाधिकारी जब एक ‘हिन्दू’ विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिए JNU के प्रोफ़ेसर राकेश भटनागर जैसे एक ‘नास्तिक’ या धार्मिक रूप से तटस्थ व्यक्ति की सिफारिश करते हैं उस विश्वविद्यालय में जहाँ आज भी शिक्षा में मूल्य और धर्म की रक्षा भी एक ज़रूरी अंग है तो हृदय असीम वेदना से भर जाता है।”

आज मीडिया गिरोह के वो तमाम लोग जो इस मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम में समेटते हुए इसे ब्राह्मणवाद से जोड़ कर ध्वस्त करने में जी-जान से लगे हुए हैं। जो बनारस से परिचित नहीं हैं वे शायद न जानते हों मैं वहीं का हूँ उन्हें आज यह कह सकता हूँ कि उदारवाद के नाम पर वामपंथी और उनका गिरोह जो जहर हर जगह बोने का काम कर रहे हैं वस्तुतः उनकी उदारवादिता एक ढोंग है, अदूरदर्शिता है। बनारस में आप कहीं भी निकल जाइए संस्कृत के श्लोक बच्चा-बच्चा पढ़ता और बोलता नजर आ जाएगा है, वैदिक मन्त्रों और ऋचाओं से घाट गुंजायमान मिलेंगे लेकिन उन्हें कभी इसे किसी मुसलमान से पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ी। या उनसे जिनकी उन श्लोकों और मंत्रो के प्रति न भाव हो, न श्रद्धा हो, वह उनके लिए शब्दों संयोजन भले हो सकता है लेकिन उसके प्राण को वो कभी महसूस नहीं कर सकते। क्योंकि उनके अंदर इन मन्त्रों, श्लोकों के प्रति समर्पण और भक्ति का भाव कभी नहीं आएगा।

आज मीडिया गिरोह के लोग इस बात पर जोर दे रहे हैं कि विश्विद्यालय प्रशासन ने डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति उनकी योग्यता के आधार पर किया है। जिसका हम आगे खंडन करेंगे उससे पहले यहाँ एक घटना का जिक्र करना भी समीचीन होगा, ये वही काशी है जहाँ जब पण्डितराज जगन्नाथ शाहजहाँ की पुत्री लवंगी से विवाह करके दिल्ली से बनारस आए और विद्वत्-सभा में जाने की कोशिश की तब उन्हें ‘यवनीसंसर्गदूषित’ कहकर संस्कृत-विद्या के अपय्य दीक्षित जैसे दृढ़ धार्मिक आचार्योंं ने बहिष्कार किया, और उनकी सारी विद्वत्ता प्रतिपादित करते रहने के बावजूद नहीं अपनाया। शायद आप अब यह समझ सकते हैं कि मालवीय जी ने ‘हिन्दू विश्वविद्यालय’ और ‘धर्म विज्ञान संकाय’ के लिये बनारस को यूँ ही नहीं चुना था। उन्हें पता था धर्म की दृढ़ता बनारस में है।

सौरभ द्विवेदी भी कहते हैं कि आज जब SVDV के छात्र विरोध में सड़कों पर हैं और इस बात का अफ़सोस जता रहे हैं कि आज जब एक तरफ धर्म, संस्कृति, वेद, वेदांग और प्राचीन मूल्यों के विरोधी वामपंथी फिरोज खान के समर्थन में खड़े हैं और इस नियुक्ति को जी-जान से सही ठहराने की हर संभव कोशिश में लगे हैं और बाकी लोग, यहाँ तक की संकाय के आचार्य भी नौकरी बचाने के लिए अपनी धार्मिक दृढ़ता को गिरवी रख चुके हैं। उनकी चुप्पी बनारस को सदियों तक सालती रहेगी। महामना का कहना था कि मुझे मोक्ष नहीं चाहिए। मेरी आत्मा यहीं विश्वविद्यालय में मौजूद रहेगी। अगर ऐसा है तो संकाय के जिम्मेदार आचार्यों को देखकर उनकी आत्मा बहुत ग्लानि महसूस कर रही होगी।

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आज जब बीबीसी, वायर, क्विंट, प्रिंट जैसे तमाम मीडिया गिरोह इस मुद्दे को ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने की तरफ मोड़ कर इस विरोध को कुंद करने में लगे हैं जितना हाइप मीडिया में आज JNU के अपने ‘सौभाग्य’ को ‘अधिकार’ समझकर हिंसक आंदोलन को मिल रहा है ऐसे दौर में सत्य हमारे साथ है। हमारा विरोध भी गाँधी – महामना की इस धरती पर इतिहास में बेशक दर्ज न हो पर उसकी ताप दूर तक जाएगी। सौरभ द्विवेदी ने मीडिया के ब्राह्मणवाद वाली थ्योरी को ख़ारिज करते हुए सभी तथ्य सामने रख दिए ताकि लोग सत्य से परिचित हों और ऐसे मीडिया समूहों के बहकावे में न आएँ।

सौरभ ने पूरा आँकड़ा समझाते हुए बताया कि हिन्दू धर्म संकाय के साहित्य विभाग के एक OBC पद हेतु 27 अभ्यर्थियों ने आवेदन किया। 26 हिन्दू OBC थे – यादव, पटेल, चौधरी आदि आदि। एक मुसलमान OBC था – खान और हिन्दू विश्वविद्यालय के नास्तिक कुलपति राकेश भटनागर और भ्रष्ट साहित्य विभागाध्यक्ष और उनके गैंग ने मुसलमान OBC को ज़्यादा योग्य माना। 26 OBC हिन्दू मूर्ख साबित किए गए। और OBC-SC/ST के हक़ के लिए लड़ने वाले प्रोपोगंडावादी झुण्ड ने एक स्वर में मुसलमान का धर्म देखकर 26 हिन्दू OBC को लात मार दिया। दूसरी ओर उन 26 OBCs के हक़ के लिए और उनको योग्य सिद्ध करने के लिए ‘संकीर्ण मानसिकता’ की उलाहना लिए आज ‘हिन्दू’ एक ‘हारी हुई लड़ाई’ भजन कीर्तन, मन्त्रों और यज्ञ के सहारे शांतिपूर्ण ढंग से गाँधीवादी तरीके से लड़ रहे हैं।

यह सब देखकर लगता कि SVDV के धरनारत छात्र सही मायने में आज के ‘धर्मयोद्धा’ हैं। यहाँ सिर्फ संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने का मसला है ही नहीं, उन्हें आज की चिन्ता भी नहीं है। लेकिन जब 20 साल बाद ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ में वैदिक मंगलाचरण की जगह कुरान और हदीस की आयतें गूँजेगी, विश्व हिन्दू पंचांग की जगह कुरान और बाइबिल का प्रकाशन होगा, तो बुढ़ापे में आप इस कुण्ठा से जरूर गुजरेंगे कि जब मालवीय मूल्यों और हिन्दू सनातन धर्म और संस्कृति के रक्षार्थ कुछ छात्र लड़ रहे थे, जब संविधान की कोई एक पंक्ति उनके पक्ष में नहीं थी, शायद एक ढंग का तर्क भी उनके पास नहीं था, और महामना के नाम पर जीवनयापन करने वाले अधमर्ण मौन थे, तब भावनाओं के बल पर, अन्तरात्मा की आवाज पर, महामना के आदर्शों और मूल्यों की रक्षा के लिए पुलिस की लाठी खाने और खून का कतरा गिरने तक कुछ निहत्थे एक धर्मयुद्ध लड़ते रहे थे। और हम मौन थे तो आज की अपनी दुर्गति के लिए जिम्मेदार कोई और नहीं हम खुद हैं।

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