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तोड़ दिए जाएँगे हनुमान और शिव मंदिर? चाँदनी चौक के विकास के लिए दिल्ली HC का आदेश

दिल्ली के चाँदनी चौक इलाक़े में पुनर्विकास योजना से जुड़े कार्यों में बाधा बनने वाले दो मंदिरों को वहाँ से हटाना होगा – यह आदेश दिल्ली की हाई कोर्ट का है। दरअसल, दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार के उस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया, जिसमें धार्मिक ढाँचों के साथ ही पुनर्विकास के काम को जारी रखने यानी मंदिरों को वहीं बने रहने की माँग की गई थी।

ख़बर के अनुसार, जस्टिस एस मुरलीधर और जस्टिस तलवंत सिंह की बेंच ने आम आदमी पार्टी सरकार और विशेष तौर पर गृह विभाग के एडिशनल चीफ़ सेक्रेटरी सत्य गोपाल को निर्देश दिया है कि वे अपनी वैधानिक और संवैधानिक ज़िम्मेदारी का पालन करें। आदेश में यह भी कहा गया है कि वो सुनिश्चित करें कि दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के संबंधित आदेशों का पालन हो। आदेश यह है कि चाँदनी चौक में पुनर्विकास योजना के कार्यों में बाधा बनने वाले हर अतिक्रमण को वहाँ से हटाया जाए।

नवभारत टाइम्स के दिल्ली संस्करण में प्रकाशित ख़बर

बता दें कि इन दो मंदिरों में एक हनुमान मंदिर है और दूसरा शिव मंदिर। कोर्ट ने इन दोनों ही मंदिरों को हटाने का आदेश देते हुए कहा कि लॉ एन्फ़ोर्समेंट एजेंसी फ़ैसला लें कि यह कैसे और किस तरीक़े से संभव हो सकेगा। साथ ही कोर्ट ने इन आदेशों की एक तय अवधि के अंदर पूरा करने की ज़िम्मेदारी व्यक्तिगत तौर पर गृह विभाग के एडिशनल चीफ़ सेक्रेटरी सत्य गोपाल को सौंपी है।

जानकारी के अनुसार, भाई मति दास स्मारक के बारे में कोर्ट को यह बताया गया था कि फ़िलहाल अभी तक तो उसकी वजह से कार्य में किसी तरह की बाधा नहीं आई है। इसके बाद, हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को चाँदनी चौक के आड़े आ रहे पाँच धार्मिक ढाँचों से जुड़े अपने 30 अप्रैल 2015 के आदेश का स्मरण कराया। इन आदेशों के तहत पुनर्विकास के कार्यों में बाधा बनने वाले इन पाँचों धार्मिक ढाँचों को हटाए जाने का फ़ैसला लिया गया था।

रात तक थी डील पक्की, अब पवार ने कहा – अभी और वक्त लगेगा: बिगड़ रही शिवसेना-कॉन्ग्रेस-NCP की बात?

महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन के बीच सरकार गठन को लेकर जद्दोजहद जारी है। कयासों के अलावा सहमति जैसा फिलहाल राज्य की राजनीति में दिख नहीं रहा। कल रात तक भाजपा का साथ छोड़ शिव सेना की कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ डील पक्की हो गई थी। सत्ता के समझौते के कथित मसौदे के मुताबिक शिव सेना को मुख्यमंत्री की कुर्सी और 16 मंत्री पद मिलने थे, वहीं एनसीपी को 14 और कॉन्ग्रेस के 12 विधायकों को मंत्री बनना था। लेकिन जैसा गडकरी ने कहा था कि राजनीति और क्रिकेट में कुछ असंभव नहीं, वैसा ही आज सुबह से दिख रहा है।

डील पक्की होने के बावजूद अभी तक सरकार के गठन का रास्ता साफ नहीं दिख रहा। वो इसलिए क्योंकि शिवसेना-कॉन्ग्रेस और एनसीपी के बीच अभी भी पशोपेश जारी है। एक तरफ जहाँ बाला साहेब ठाकरे की पुण्यतिथि (17 नवंबर) को सरकार बनाने की बात सामने आ रही है वहीं एनसीपी प्रमुख शरद पवार का कहना है कि सरकार बनने में अभी वक्त लगेगा। इससे साफ झलक रहा है कि अभी भी इनके बीच विचारों की सहमति नहीं बन पाई है।

इस बीच बीजेपी ने एक बार फिर सरकार बनाने की अपनी घोषणा करते हुए कहा कि बीजेपी के बिना महाराष्ट्र में कोई सरकार नहीं हो सकती। महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष चंद्रकांत पाटील ने मीडिया के सामने राज्य में सरकार बनाने का दावा किया है। उन्होंने कहा कि उनके पास सबसे ज्यादा विधायक हैं। चंद्रकांत पाटील ने कहा कि उनके पास 119 (105 बीजेपी और 14 निर्दलीय) विधायकों का समर्थन है। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि पार्टी राज्य को एक स्थिर सरकार देने के लिए प्रतिबद्ध है। बीजेपी के बिना महाराष्ट्र में कोई सरकार नहीं हो सकती। पाटील ने आगे कहा कि बीजेपी के सभी विधायक अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में जाएँगे और किसानों की दुर्दशा को समझेंगे।

गौरतलब है कि 288 विधानसभा सीटों वाले राज्य में 24 तारीख को चुनाव के नतीजे आए थे और किसी भी दल या गठबंधन के सरकार न बना पाने के बाद राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया है। बता दें कि बीजेपी और शिवेसना ने एक साथ चुनाव लड़ा था और 161 सीटें जीती थीं। हालाँकि चुनाव के बाद शिवसेना ने बीजेपी से सीएम पद साझा करने की बात कही, जिस पर सहमति न बनने के बाद दोनों दलों ने अपने रास्ते अलग कर लिए।

चंद्रकांत पाटील ने कहा कि बीजेपी ने चुनाव में 1.42 करोड़ मतदाताओं के वोट हासिल किए, जबकि एनसीपी 92 लोख वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। शिवसेना को 90 लाख वोट मिले और मत प्रतिशत के लिहाज से वह तीसरे नंबर पर रही। उन्होंने कहा कि 1990 के बाद से महाराष्ट्र में बीजेपी के अलावा कोई भी दल 100 से ज्यादा सीटें नहीं जीत सका है। 

मो. सोनू ने किया नाबालिग का रेप, लोगों ने घेरा तो हथियारों से लैस अब्बू व गैंग भगा कर ले गया

बिहार के अररिया ज़िले में हथियार के बल पर एक नाबालिग से दुष्कर्म का मामला सामने आया है। जानकारी के अनुसार, जोकीहाट थाना क्षेत्र के सिसौना दरगाह टोला निवासी एक पीड़िता ने 6 नवंबर 2019 को महिला थाने में शिक़ायत दर्ज करवाई थी। अपनी शिक़ायत में उसने बताया कि 5 नवंबर की रात को जब वो अपने घर में सो रही थी, तो उसी समय अचानक सिसौना गाँव के वार्ड 12 के रहने वाले मोहम्मद सोनू पिता तैबुल उसके घर में ज़बरदस्ती घुस आया। इसके बाद उसने दरवाज़ा बंद करके हथियार के बल पर नाबालिग से दुष्कर्म किया। इस बीच नाबालिग ने शोर मचाया, जिससे आस-पास के लोग वहाँ इकट्ठा हो गए।

प्रभात खबर में प्रकाशित ख़बर

रिपोर्ट के अनुसार लोगों ने बड़ी मुश्किल से नाबालिग को मोहम्मद सोनू के क़ब्जे से छुड़ाया। इसके बाद घटना की जानकारी नाबालिग के पिता को दी गई। मामला यहीं नहीं थमा, क्योंकि जब अपने बेटे की क़रतूत की ख़बर सोनू के अब्बू तैबुल को लगी तो वो हथियार के साथ उसे बचाने के लिए अपने साथ कई लोगों को लेकर घटना-स्थल पर पहुँचा।

ख़बर के अनुसार, इन लोगों में तनवीर, बाबरस राजा, अफ़सर, मुर्तजा और दिलशाद शामिल थे, जो हथियार के ज़ोर पर सोनू को वहाँ से बचाकर ले गए। साथ ही उन्होंने लोगों को धमकी भी दी कि इस मामले को लेकर पुलिस में किसी तरह की कोई शिक़ायत दर्ज नहीं करवाई जानी चाहिए।

पीड़िता ने बताया कि वो इस मामले को लेकर जोकीहाट थाना गई। जहाँ उसने अपनी आप बीती सुनाई, इसके बाद जोकीहाट थाने की पुलिस ने पीड़िता को महिला थाने में भेज दिया। महिला थाने में दर्ज इस मामले की संख्या 164/19 है। पुलिस ने बताया कि इस मामले में अग्रेतर कार्रवाई की जा रही है।

हमारे हवाले करो पाकिस्तान में छिपे बैठे जिहादी, बेहतरी इसी में है: विदेश मंत्री जयशंकर

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पाकिस्तान के खिलाफ मोदी सरकार के कड़े रुख को दोहराते हुए कहा है कि अगर पाक को भारत के साथ रिश्तों में बेहतरी की इतनी ही ज़रूरत है तो रिश्तों की बेहतरी के लिए उसे अपने पास छिपे बैठे जिहाद-आरोपित भारतीयों को हमारे हवाले कर देना चाहिए। उन्होंने यह बात फ्रेंच दैनिक समाचार पत्र ल मोंड के साथ विस्तार से बात करते हुए कही है।

“रिश्ते कई सालों से मुश्किल मुख्यतः इसलिए हैं क्योंकि पाक ने एक महत्वपूर्ण जिहादी इन्डस्ट्री बना ली है और भारत में हमले करने के लिए दहशतगर्द भेजता रहता है। पाक खुद इस स्थति को नकारता नहीं यही।” जयशंकर ने यह बात शाह महमूद कुरैशी, पाकिस्तानी विदेश मंत्री के उस बयान पर प्रतिक्रिया में कही जिसमें कहा गया था कि आज भारत और पाक के कूटनीतिक रिश्ते शून्य के करीब हैं।

“आप ये बताइए कौन सा देश ऐसे पड़ोसी से बातचीत और लेनदेन करना चाहेगा जो उसके खिलाफ आतंकी गतिविधियों में हो… हम कार्रवाई चाहते हैं जो सहयोग की असली इच्छा को प्रदर्शित करे।”

“उदाहरण के तौर पर, पाकिस्तान में ऐसे भारतीय रह रहे हैं जिनकी भारत को आतंकी गतिविधियों के मामले में तलाश है। हम पाकिस्तान से कह रहे हैं कि उन्हें हमारे हवाले कर दो।” उनका इशारा भारत के नंबर 1 वांछित दाऊद इब्राहिम की ओर था, जिसे भारत मुंबई में 1993 के बम धमाकों के मामले में वापिस लाकर सज़ा देना चाहता है।

भारत के राष्ट्रवाद के बारे में जयशंकर ने एक बार फिर दोहराया कि भारत के राष्ट्रवाद को पाश्चात्य नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए। “हर देश में राष्ट्रवाद की अलग समझ और एक अलग इतिहास होता है। अमेरिका में यह अलग-थलग पड़ने की वकालत का टोन लिए रहता है। एशिया में, कम से कम भारत में, राष्ट्रवाद एक सकारात्मक शब्द है।”

इसके अलावा राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों के बारे में सवाल पर उन्होंने कहा कि राष्ट्रीयता देश तय करता है, आस्था, जाति या भाषा नहीं।

₹100 करोड़ की टैक्स फाइल खुली: मुश्किल में सोनिया-राहुल, नेशनल हेराल्ड से जुड़ा है मामला

इनकम टैक्स अपील ट्रिब्यूनल ने कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्षा सोनिया गाँधी और उनके बेटे व पूर्व कॉन्ग्रेस प्रमुख राहुल गाँधी की अपील नामंज़ूर कर दी है। उनके विरुद्ध ₹100 करोड़ की टैक्स अनियमितता की फाइल फिर से खोली जाएगी। माना जा रहा है कि इस निर्णय का दोनों के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के नेता डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर किए गए नेशनल हेराल्ड मामले पर भी असर पड़ने की संभावना है।

रियायती दर पर कॉन्ग्रेस राजनीतिक दल को मिली सम्पत्ति को कथित तौर पर अवैध तरीके से गाँधियों की निजी सम्पत्ति में परिवर्तित करने का इन दोनों पर आरोप है। फ़िलहाल दोनों इस मामले में कॉन्ग्रेस कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा और अन्य कॉन्ग्रेस पदाधिकारियों समेत जमानत पर चल रहे हैं।

टाइम्स नाउ की मैनेजिंग एडिटर नविका कुमार के मुताबिक यह अपील यंग इंडियन नामक कम्पनी द्वारा दायर की गई थी, जिसे ख़ारिज कर दिया गया है। कम्पनी ने चैरिटेबल ऑर्गनाइज़ेशन के तौर पर टैक्स में छूट का दावा किया था। इससे वर्तमान में कॉन्ग्रेस के मुखपत्र और ऐतिहासिक समाचारपत्र नेशनल हेराल्ड के मालिकाना हक पर सवालिया निशान लग गया है। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा शुरू किया यह अख़बार आज़ादी के पहले अंग्रेजी सरकार पर हमले और विभिन्न नेताओं के लेखों के लिए जाना जाता था लेकिन आज़ादी के बाद बाकी की कॉन्ग्रेस की तरह नेहरू-गाँधी परिवार की छाया में दब गया।

टाइम्स नाउ के अनुसार वह यह दावा उसके हाथ लगे टैक्स ट्रिब्यूनल के 175 पन्नों के आदेश के आधार पर कर रहा है।

राहुल गाँधी, सोनिया गाँधी और मामले के अन्य आरोपित कॉन्ग्रेस नेता यंग इंडियन और इस मामले से जुड़ी एक दूसरी कम्पनी एसोसिएटेड जर्नल्स के शेयर होल्डर हैं। स्वामी का आरोप है कि ऐतिहासिक महत्व वाले नेशनल हेराल्ड और इसे सरकार से रियायती दरों पर मिली दिल्ली की महंगी सम्पत्तियों का स्वामित्व गाँधी परिवार और अन्य कॉन्ग्रेस नेताओं को औने-पौने दामों पर कानून को ताक पर रखते हुए किया गया है।

कॉन्ग्रेस के सहयोगी एनसीपी के नेता माजीद मेमन ने टाइम्स नाउ एंकर पद्मजा जोशी से बात कर मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि मामले में गड़बड़ियाँ भले ही दिख रहीं हों, लेकिन फिर भी अदालत में आपराधिक केस का फैसला आने तक राहुल गाँधी को दोषी नहीं कहा जाना चाहिए।

‘शराब’ पीने की वजह से पृथ्वीराज चौहान, प्रताप के क़िले में अब चमगादड़ें ब्याही जा रही: कॉन्ग्रेस MLA

मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस के विधायक बैजनाथ कुशवाह के एक बयान से बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल, उन्होंने कहा कि शराब ने दिल्ली के पृथ्वीराज चौहान और महाराणा प्रताप जैसे राजाओं के राज्य को बर्बाद कर दिया। सत्तारूढ़ दल के विधायक ने गुरुवार (14 नवंबर) को बाल दिवस कार्यक्रम के दौरान स्कूली बच्चों को संबोधित करते हुए यह टिप्पणी की।

मध्य प्रदेश के मुरैना ज़िले के एक स्कूल में बाल दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए, मुरैना ज़िले की सबलगढ़ सीट से कॉन्ग्रेस विधायक बैजनाथ कुशवाह ने कहा,

“दिल्ली के पृथ्वीराज चौहान से लेकर कन्नौज के शासक जयचंद तक, सभी राजा अतुलनीय शासक थे। लेकिन केवल एक कारण की वजह (विधायक ने शराब पीने की आदत की ओर इशारा किया) से अपने राज्यों को बर्बाद कर दिया, उनके क़िले में चमगादड़ें ब्याह रही हैं।”

विधायक ने इसके आगे कहा कि आज इन राजाओं का कोई नाम लेने वाला नहीं बचा है। उन्होंने कहा, “इसलिए, कभी भी शराब को हाथ न लगाएँ।”

बैजनाथ कुशवाह ने ये टिप्पणी छात्रों को समझाने के लिए की थी कि शराब कितनी बुरी है। लेकिन विधायक द्वारा प्रस्तुत अजीब आरोप ने उन्हें परेशानी में डाल दिया क्योंकि राजपूत करणी सेना के नाराज़ सदस्यों ने अपने पूर्वजों को बदनाम करने के लिए राजनेता से सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगने की माँग की है। जिसके जल्द से जल्द न माँगे जाने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है। स्थानीय राजपूत करणी सेना के अध्यक्ष अरुण राजावत ने कहा, “विधायक द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द बहुत ही अपमानजनक हैं और अगर विधायक इन शब्दों के लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी नहीं माँगते हैं, तो उनकी जीभ काट दी जाएगी।”

हालाँकि, कॉन्ग्रेस ने कुशवाहा के बयान से ख़ुद को दूर कर लिया। पार्टी के वरिष्ठ सदस्य और कॉन्ग्रेस के मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में सामान्य प्रशासन मंत्री, गोविंद सिंह ने कहा कि इस तरह की टिप्पणी करने वाले की जवाबदेही होनी चाहिए।

इस बीच, भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने बयान की निंदा की और कहा कि कॉन्ग्रेस ने हमेशा देशभक्तों का अपमान किया है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस विधायक का बयान बहुत बड़ा अपमान है।

‘इमारत में गुंबद तो मस्जिद, लंबी-सीधी तो चर्च और अगर गंदी मूर्तियाँ/गुड़ियाँ हैं तो वह एक मंदिर’

तमिलनाडु के चिदंबरम निर्वाचन क्षेत्र के सांसद थोल थिरुमावलवन की हिन्दू मंदिर के सन्दर्भ में की गई टिप्पणी से सोशल मीडिया पर हंगामा बरपा हुआ है। यह टिप्पणी 13 नवंबर को की गई थी।

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाले लोकसभा सांसद ने मंदिरों के सन्दर्भ में एक अभद्र टिप्पणी की। बता दें कि वो विदुथलाई चिरुथाइगल काची (वीसीके) के संस्थापक हैं, जो अनुसूचित जाति के अधिकारों के लिए लड़ने का दावा करते हैं।

सोशल मीडिया एक वीडियो में, थिरुमावलवन को “सनातन धर्म शिक्षा नीतियों का विरोध” करने वाली एक बैठक को संबोधित करते हुए कहा, “अगर इमारत में गुंबद है, तो यह एक मस्जिद है; अगर वो इमारत लंबी और सीधी हो, तो वो एक चर्च है; और अगर इमारत में गंदी मूर्तियाँ/गुड़ियाँ हैं, तो वह एक मंदिर है।”इस दौरान वहाँ कई दर्शक भी मौजूद थे, जिन्होंने नेता की टिप्पणी की सराहना भी की।

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने चिदंबरम के सांसद की गिरफ़्तारी की माँग की है।

कुछ लोगों का कहना है कि आख़िर थिरुमावलवन पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही थी, जबकि इंदु मक्कल काची (आईएमके) के संस्थापक अर्जुन संपत को सिर्फ़ एक तिरुवल्लुवर की मूर्ति को भगवा गमछा बाँधने और फिर उसे रुद्राक्ष की माला पहनाने पर गिरफ़्तार कर लिया गया था।

ख़बर के अनुसार, हिन्दू मुन्नानी ने अरियालुर ज़िले के विभिन्न पुलिस स्टेशनों में शिक़ायत दर्ज की है कि उन पर भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए हैं और विदुथलाई थिरुमावलवन काची (वीसीके) नेता थोल के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा रही है। अपनी कथित टिप्पणी के ज़रिए थिरुमावलवन ने हिन्दू देवताओं और धार्मिक विश्वासों को नीचा दिखाया।

संगठन के पदाधिकारियों ने गुरुवार (14 नवंबर) को जयमकोंडम, कुवागम, अंदिमडम और सेंदुरई पुलिस स्टेशनों में शिक़ायतें दर्ज कीं। पुलिस ने बताया कि शिक़ायत पर सेंदुरई पुलिस ने एक सीएसआर (सामुदायिक सेवा रजिस्टर) रसीद जारी की है। सूत्रों ने कहा कि चार पुलिस स्टेशनों में इस संबंध में कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है।

तमिलनाडु कॉन्ग्रेस के एक नेता, अमेरिकाै वी नारायणन ने ट्वीट कर उन्होंने थिरुमावलवन की टिप्पणी पर अपना दु:ख व्यक्त किया, जिसके बाद उन्होंने बताया कि तिरुमलावलन को अपनी टिप्पणी पर पछतावा है और वो टिप्पणी तैश में आकर की गई थी।

बता दें कि थिरुमावलवन इससे पहले भी हिन्दुओं की आलोचना कर चुके हैं और बाद में वो अपने बयान से पलट जाते हैं। हालाँकि, चिदंबरम सांसद ने कथित तौर पर अपने भाषण पर ख़ेद व्यक्त किया है, लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने उनसे सार्वजनिक माफ़ी की माँग की है। संशयवादियों का कहना है कि थिरुमावलवन एक आदतन अपराधी है और वह संभवत: भविष्य में फिर इसी तरह के बयान देगा।

डील पक्की: 50-50 के लिए एनडीए छोड़ने वाली शिव सेना के 16/42 मंत्री, एनसीपी 14, कॉन्ग्रेस 12

मीडिया सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि भाजपा और एनडीए छोड़ यूपीए में शामिल हुई शिव सेना की कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ डील पक्की हो गई है। सत्ता के समझौते के कथित मसौदे के मुताबिक शिव सेना को मुख्यमंत्री की कुर्सी और 16 मंत्री पद मिलेंगे, वहीं एनसीपी को 14 और कॉन्ग्रेस को 12 विधायकों को मंत्री बनवाने का मौका मिलेगा।

शिव सेना प्रवक्ता संजय राउत ने पत्रकारों से बात करते हुए दावा किया है कि सेना अब 25 साल तक महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज रहेगी।

कल यानि गुरुवार, 14 नवंबर को शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी के बीच एक संयुक्त बैठक हुई थी जिसमें न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर चर्चा की गई। मीडिया खबरों के अनुसार इस बैठक में तीनों पार्टियों के बीच एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार किया गया है। जिसे तीनों पार्टियों के शीर्ष के नेतृत्व के पास भेजा गया। अब अगर तीनों पार्टी के शीर्ष नेता इस कार्यक्रम पर अपनी सहमति देते हैं, तो जल्द ही महाराष्ट्र में सरकार बन सकती है। कहा जा रहा है कि इस साझा मसौदे में शिवसेना कट्टर हिंदुत्व की वैचारिक प्रतिबद्धता का त्याग करेगी यानी शिवसेना वीर सावरकर का नाम लेने से भी बचेगी

इसके अलावा जनसत्ता की खबर के मुताबिक कॉन्ग्रेस और एनसीपी ने इस बैठक में शिवसेना को शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिमों को पाँच प्रतिशत आरक्षण देने वाली उस योजना के लिए तैयार कर लिया गया है, जिसे पूर्व में कॉन्ग्रेस और एनसीपी सरकार द्वारा उनके कार्यकाल में शुरू किया गया था। लेकिन जब नई सरकार आई तो इसे आगे लागू नहीं किया गया।

ऐसे में अब पूरी उम्मीद है कि शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी का गठबंधन होता है तो ये योजना दोबारा लागू होगी। साथ ही कॉन्ग्रेस-एनसीपी द्वारा चुनावी घोषणा पत्र में कुछ अतिरिक्त वादों पर भी काम होगा। जिसमें किसानों की कर्जमाफी, बेरोजगार युवाओं को मासिक भत्ता, नए उद्योगों में स्थानीय युवाओं का नौकरी के लिए कोटा आदि लागू होने के कयास है।

288-सदस्यीय विधानसभा के लिए हुए चुनाव में भाजपा को 105 और शिवसेना को 56 सीटें मिली। युति सरकार बननी तय थी, लेकिन भाजपा के पास अपने दम पर बहुमत नहीं होने के कारण शिवसेना ढाई साल के लिए सीएम पद मॉंग रही थी।

उसका दावा था कि उद्धव ठाकरे से अमित शाह ने इसका वादा किया था, लेकिन सेना ने ऐसे किसी वादे का सबूत पेश नहीं किया। फिर शिव सेना ज़्यादा सीटें मिलने पर भाजपा की नज़र बदल जाने का आरोप लगाने लगी। उसका कहना था कि पहले यह तय हुआ था कि चाहे जिसे जितनी सीटें मिलें, भाजपा और शिव सेना के मुख्यमंत्री ढाई-ढाई साल रहेंगे, और आधे-आधे मंत्रालय बाँटे जाएँगे, और अब ज्यादा सीटें जीतने पर राष्ट्रीय दल अपनी बात से पीछे हटना चाहता है।

फिर चुनाव नतीजों के दो हफ्ते बाद पूर्व भाजपा अध्यक्ष और महाराष्ट्र के कद्दावर नेता कहे जाने वाले नितिन गडकरी के हवाले से न्यूज़ 18 ने दावा किया था कि न केवल भारतीय जनता पार्टी 50-50 फॉर्मूले पर तैयार नहीं है, बल्कि चुनावों के पहले दोनों पार्टियों के बीच ऐसी कोई डील थी ही नहीं। 

इसके बाद शिव सेना ने भाजपा-एनडीए के बाहर सरकार बनाने की कोशिश तेज कर दी, जिसका नतीजा सत्ता का यह नया समीकरण सबके सामने है।

‘दुर्घटना’ में हुई महात्मा गाँधी की मौत: ओडिशा के सरकारी बुकलेट में दावा, नवीन पटनायक से माफी की माँग

ओडिशा में एक सरकारी बुकलेट में दावा किया गया है कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की मृत्यु ‘दुर्घटना’ के चलते हुई। जिसके बाद इसे लेकर राज्य में विवाद छिड़ गया है। राजनीतिक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से माफी माँगने और इस बड़ी भूल को तत्काल सुधारने के लिए कहा है। महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती पर प्रकाशित दो पेजों की बुकलेट ‘आमा बापूजी: एका झलक’ (हमारे बापूजी: एक झलक) में उनकी शिक्षाओं, उनके कार्यों और ओडिशा से उनके जुड़ाव की संक्षिप्त जानकारी दी गई है।

साथ ही इस बुकलेट में लिखा गया है, “गाँधी का दिल्ली के बिड़ला हाउस में 30 जनवरी 1948 को अचानक हुए घटनाक्रम में दुर्घटना के चलते निधन हो गया।” इस बुकलेट को राज्य सरकार के स्कूलों और राज्य सरकार से सहायता प्राप्त स्कूलों में वितरित करने के लिए प्रकाशित किया गया था। बुकलेट पर मचे बवाल के बीच बीजेडी सरकार ने यह पता लगाने के लिए जाँच का आदेश दिया है कि स्कूल और जन शिक्षा विभाग ने ऐसी जानकारी प्रकाशित क्यों की। 

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री नरसिंह मिश्रा ने कहा कि मुख्यमंत्री होने के नाते नवीन पटनायक को बुकलेट में प्रकाशित गलत सूचना के लिए माफी माँगनी चाहिए। उन्होंने इस गलती को अक्षम्य बताया। कॉन्ग्रेस विधायक दल के नेता ने कहा, “पटनायक को इस बड़ी भूल की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, माफी माँगनी चाहिए और बुकलेट तत्काल वापस लेने के लिए निर्देश जारी करने चाहिए।” 

मिश्रा ने बीजेडी सरकार पर गाँधी से नफरत करने वालों का समर्थन करने का आरोप लगाते हुए कहा कि बच्चों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि महात्मा गाँधी की हत्या किसने की और किन परिस्थितियों में की गई। उन्होंने आगे कहा, “राष्ट्रपिता से नफरत करने वालों को खुश करने के लिए उनके निधन की जानकारी इस प्रकार दी गई।”

इसके साथ ही सीपीएम के राज्य सचिव आशीष कानूनगो ने भी आरोप लगाया कि यह कदम इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने और सच को छुपाने के लिए राज्य के रचे षड्यंत्र का हिस्सा है। कानूनगो ने कहा, “हर कोई जानता है कि नाथूराम गोडसे ने गाँधीजी की हत्या की। जिसके बाद उसे पकड़ा गया, उसके खिलाफ मुकदमा चलाया गया और मौत की सजा सुनाई गई। बच्चों को सच बताया जाना चाहिए और बुकलेट को तत्काल वापस लिया जाना चाहिए।”

माकपा नेता जनार्दन पति ने भी कहा कि सरकार ने बच्चों को गुमराह करने की यह ‘कोशिश जानबूझकर’ की है। उन्होंने कहा, ‘‘चालाकी से असत्य बताया गया है। मुख्यमंत्री को इस बड़ी भूल के लिए माफी माँगनी चाहिए।’’

जाने माने शिक्षाविद प्रोफेसर मनोरंजन मोहंती ने सरकारी प्रकाशन में गलत तथ्य पेश करने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की माँग की। साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता प्रफुल्ल सामंतारा ने दावा किया कि ‘‘गोडसे से सहानुभूति रखने वालों ने लेखक एवं प्रकाशक को प्रभावित किया होगा’’। उन्होंने सही जानकारी प्रकाशित कर संशोधित पुस्तिका छात्रों में पुन: वितरित करने पर जोर दिया।

इस बीच राज्य स्कूल और जन शिक्षा मंत्री समीर रंजन दास ने कहा कि मामले की जाँच की जा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और इस कृत्य के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।


जिन्होंने 40 साल पहले इलाज के लिए चंदा जुटाया, उनकी ही सरकार ने मरने के बाद सड़क पर छोड़ दिया

कहते हैं, राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। दोस्ती दुश्मनी में बदल जाती है और दुश्मनी दोस्ती में। समय-समय की बात है। वशिष्ठ नारायण सिंह का राजनीति से कोई रिश्ता नहीं था। लेकिन, राजनीति ने समय रहते उनका फ़ायदा उठाया और जब उनसे कोई फ़ायदा नहीं दिखा तो उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया। यहाँ तक कि उनके मरने के बाद उनके पार्थिव शरीर को भी छोड़ दिया। आइंस्टीन की थ्योरी को चुनौती देने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह को स्थानीय लोग ‘वैज्ञानिक जी’ के नाम से जानते थे। अफ़सोस ये कि उन्होंने इसके लिए जो पेपर तैयार किया था, वो चोरी हो गई थी।

इस सम्बन्ध में मैंने कुछ बुजुर्गों से वशिष्ठ नारायण सिंह को लेकर बात की। जैसा कि आपको पता है, उन्होंने अमेरिका जाने से पहले पटना यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी। वहाँ उन्हें पहले ही वर्ष में अंतिम वर्ष की परीक्षा दिला कर डिग्री दे दी गई थी। वशिष्ठ बाबू ऐसे थे कि उनके कारण विश्वविद्यालय को अपने नियम बदलने पड़े। पटना यूनिवर्सिटी में ही उनकी मुलकात अमेरिका के प्रोफेसर कैली से हुई। प्रोफ़ेसर कैली उनकी प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें अमेरिका आने का निमंत्रण दिया। वो अमेरिका गए और वहाँ भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

जब वह अमेरिका से वापस आए, उसके कुछ ही सालों बाद उनकी पत्नी का देहांत हो गया। इसके बाद से ही उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ गई और उन्हें राँची अस्पताल में भर्ती कराया गया। कभी पटना यूनिवर्सिटी में संयुक्त बिहार टॉपर रहा व्यक्ति भूलने की बीमारी से जूझने लगा। उस समय उन्हें क़रीब से देख रहे लोग बताते हैं कि जब उनकी बीमारी के बारे में पता चला था, तब पटना यूनिवर्सिटी के छात्रों ने उनके इलाज के लिए चंदा इकठ्ठा किया था। इनमें कई ऐसे लोग शामिल थे, जो आज शासन-सत्ता में बड़े पदों पर काबिज हैं।

वशिष्ठ नारायण सिंह को पहला दिल का दौरा 1974 में पड़ा था। सुशील कुमार मोदी उन दिनों बड़े छात्र नेता हुआ करता थे। वो अभी बिहार के उप-मुख्यमंत्री हैं। वहीं अश्विनी कुमार चौबे भी उन लोगों में शामिल थे, जो वशिष्ठ बाबू के लिए चंदा इकठ्ठा कर रहे थे। वो आज केंद्र में स्वास्थ्य राज्यमंत्री हैं। लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि उन्हीं के स्वास्थ्य महकमे ने वशिष्ठ नारायण सिंह के निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को 2 घंटे तक सड़क पर छोड़े रखा। वशिष्ठ नारायण सिंह कई दिनों से अपने भाई अयोध्या सिंह के यहाँ रह रहे थे। भाई और उनका परिवार ही वशिष्ठ बाबू की देख-रेख और सेवा-सुश्रुवा कर रहा था।

बच्चों से उन्हें ख़ास लगाव था। बीमारी के दौरान स्कूली बच्चे उनके पास आया करते थे और उनसे बातें करते थे। उन दिनों में भी वह अपने हाथ में एक कॉपी और एक पेन्सिल ज़रूर रखा करते थे। एक दिन में कई कॉपियाँ ख़त्म कर दिया करते थे। परिजन उन्हें भारत रत्न देने की माँग करते थे। कई नेताओं का उनके यहाँ आना-जाना लगा हुआ था लेकिन किसी ने कोई सहायता मुहैया नहीं कराई। एक एनजीओ ने उनके इलाज के लिए खर्च मुहैया कराया था और उनके भाई अयोध्या सिंह ने सभी जिम्मेदारियाँ संभाल रखी थीं। जिस व्यक्ति के निधन पर देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने शोक जताया, उनके पार्टिव शरीर को ले जाने के लिए एक एम्बुलेंस तक नहीं आई। आई भी तो पूरे 2 घंटे देर से।

कहते हैं, पटना यूनिवर्सिटी में लोग उन्हें देखने व छूने के लिए इतने लालायित रहते थे कि उनसे जानबूझ कर टकरा जाते थे। अमेरिका ने उन्हें ‘जीनियसों का जीनियस’ कहा था। जब वो अमेरिका से लौट कर आए थे, तब पटना यूनिवर्सिटी में अपना कमरा देखने गए थे। वहाँ उन्हें ये देख कर आश्चर्य हुआ कि उस कमरे के बाहर अभी भी उनका ही नाम लिखा हुआ था। वशिष्ठ नारायण सिंह को जानने वाले सभी लोग आज चकित हैं कि जब उनकी प्रतिभा का डंका बज रहा था, तब उनके इलाज के लिए चंदा जुटाने वाले आज बड़े पदों पर रहने के बावजूद कहाँ गायब हैं?

जब नासा के 31 कम्प्यूटर एक साथ ख़राब हो गए थे, तब वशिष्ठ नारायण सिंह का कैलकुलेशन एकदम सटीक रहा है। उन्होंने कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में वो एसोसिएट प्रोफ़ेसर रहे। भारत लौटने के बाद उन्होंने आईआईटी दिल्ली, आईआईटी मुंबई और आईएसआई कोलकाता में पढ़ाया। वो बाद में सिजोफ्रेनिया से पीड़ित हो गए। तब भी वो हाथ में पेन्सिल लेकर बालकनी की रेलिंग या दीवारों पर ही कुछ-कुछ लिखा करते थे और बुदबुदाते हुए कुछ कैलकुलेशन करते थे। सिजोफ्रेनिया उतनी बड़ी बीमारी भी नहीं है। अगर सरकार ध्यान देती तो उनका इलाज अच्छे से होता और वो ठीक हो सकते थे। भारत की प्रगति में उनका योगदान अभूतपूर्व हो सकता था।

जब उनके निधन के बाद एम्बुलेंस न दिए जाने की बात वायरल हो गई, तब लोगों ने बिहार सरकार व प्रशासन को लानतें भेजीं। इसके बाद सरकार ने राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम-संस्कार करने की घोषणा की। जीते-जी जिन्हें सम्मान न दिया जा सका, मरने के बाद भी जिन्हें सम्मान नहीं दिया गया- उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ। जो आज सत्ता में हैं, तब विपक्ष में थे और सरकार पर आरोप लगाते थे कि भारत में वशिष्ठ बाबू जैसे प्रतिभाओं की उपेक्षा की गई है। अब जब वही लोग सत्ता में हैं, उन्होंने उपेक्षा के सारे रिकॉर्ड ही ध्वस्त कर दिए।

वशिष्ठ नारायण सिंह चले गए। भारत में जो असाधारण प्रतिभा के धनी होते हैं, वो ऐसे ही चले जाते हैं। या तो उनका जीवन गुमनामी में गुजरता है, नहीं तो उन्हें विदेश से अच्छे ऑफर मिल जाते हैं। वशिष्ठ बाबू का मन विदेश में कुलबुलाते रहता था। वहाँ से भेजे गए पत्रों को देखें तो वो बार-बार लिखते थे कि अपने देश की, अपने जवार की मिट्टी में बात ही कुछ और है। वशिष्ठ नारायण सिंह ने लिखा था कि अमेरिका उन्हें ज्यादा दिन तक रोक नहीं पाएगा। वो भारत आए, देश के लिए। यदि देश ने, इसी समाज से, यहीँ की सत्ता ने उन्हें पंगु बना दिया। ऐसी स्थिति कोई क्यों न कहे कि भारत की ऐसी असाधारण प्रतिभाओं को लौट कर आना ही नहीं चाहिए।

वशिष्ठ बाबू चले गए। उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते समय हमें उनसे क्षमा भी माँगनी चाहिए। शायद यह देश उन्हें डिजर्व नहीं करता था। वरना जिसके निधन पर 130 करोड़ जनसँख्या वाले देश का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री शोक जताए, उसकी लाश को हॉस्पिटल प्रशासन सड़क पर छोड़ दे, ऐसा नहीं होता। उनके भाई अयोध्या सिंह का यह देश और समाज कृतज्ञ है, जिन्होंने अंतिम दिनों में वशिष्ठ बाबू की सेवा की। अधिकतर मामलों में किसी के साथ अन्याय होता है क्योंकि उसकी प्रतिभा की पहचान नहीं हो पाती। इस मामले में प्रतिभा का डंका भी बजा फिर भी सड़क पर उसकी लाश इन्तजार करती रही। काश! मरने के बाद भी तो जरा सा सम्मान मिल पाता!