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मुस्लिमों को 5% आरक्षण देने और सावरकर के लिए भारत रत्न की माँग छोड़ने को तैयार शिवसेना: रिपोर्ट्स

महाराष्ट्र राजनीति में चल रही उथल-पुथल के बीच एक बड़ी खबर सामने आई है। बताया जा रहा है कि अमित शाह द्वारा गठबंधन खत्म करने का ऐलान करने के बाद शिवसेना ने एनसीपी और कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए मुस्लिमों को महाराष्ट्र में 5% आरक्षण देने की बात पर हाँ कर दिया है और अपने कट्टर हिदुत्व का त्याग करने को भी तैयार हो गई है।

दरअसल, गुरुवार को शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी के बीच एक संयुक्त बैठक हुई थी। जिसमें न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर चर्चा की गई। मीडिया खबरों के अनुसार इस बैठक में तीनों पार्टियों के बीच एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार किया गया है। जिसे तीनों पार्टियों के शीर्ष के नेतृत्व के पास भेजा गया। अब अगर तीनों पार्टी के शीर्ष नेता इस कार्यक्रम पर अपनी सहमति देते हैं, तो जल्द ही महाराष्ट्र में सरकार बन सकती है। कहा जा रहा है कि इस साझा मसौदे में शिवसेना कट्टर हिंदुत्व की वैचारिक प्रतिबद्धता का त्याग करेगी यानी शिवसेना वीर सावरकर का नाम लेने से भी बचेगी।

इसके अलावा जनसत्ता की खबर के मुताबिक कॉन्ग्रेस और एनसीपी ने इस बैठक में शिवसेना को शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिमों को पाँच प्रतिशत आरक्षण देने वाली उस योजना के लिए तैयार कर लिया गया है, जिसे पूर्व में कॉन्ग्रेस और एनसीपी सरकार द्वारा उनके कार्यकाल में शुरू किया गया था। लेकिन जब नई सरकार आई तो इसे आगे लागू नहीं किया गया।

ऐसे में अब पूरी उम्मीद है कि शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी का गठबंधन होता है तो ये योजना दोबारा लागू होगी। साथ ही कॉन्ग्रेस-एनसीपी द्वारा चुनावी घोषणा पत्र में कुछ अतिरिक्त वादों पर भी काम होगा। जिसमें किसानों की कर्जमाफी, बेरोजगार युवाओं को मासिक भत्ता, नए उद्योगों में स्थानीय युवाओं का नौकरी के लिए कोटा आदि लागू होने के कयास है।

बता दें कि महाराष्ट्र चुनावों में भाजपा और शिवसेना के गठबंधन को स्पष्ट जनादेश मिला, लेकिन पार्टियों के बीच मुख्यमंत्री पर शिवसेना ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री पद को बाँटने के लिए अटक गई। जिसपर भाजपा ने साफ मना कर दिया और एनसीपी-कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन की जुगत में जुट गए। हालाँकि तय समय में सरकार बनाने का आँकड़ा पेश न कर पाने के कारण राज्य में फिलहाल राष्ट्रपति शासन है।

‘केवल हिन्दुओं’ के लिए बने BHU धर्म संकाय में डॉ. फ़िरोज़ खान की नियुक्ति कैसे हो गई: ग्राउंड रिपोर्ट

‘पंडित कृष्णकांत चतुर्वेदी जल्द ही इस्लाम, शरीयत और इस्लामी तौर तरीकों की शिक्षा देंगे…’ क्या हुआ? ये सुनकर आपको झटका लगा खैर ऐसा फ़िलहाल कहीं नहीं हो रहा है, लेकिन सोचिए अगर ऐसा सच में हो किसी विश्वविद्यालय में तो क्या जो पूरी तरह दिनी तालीम के लिए किसी मदरसे या ऐसे विशेष विभाग में गए होंगे उन्हें झटका नहीं लगेगा? लगना स्वाभाविक है।

हाल-फिलहाल बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय (SVDV) के साहित्य विभाग में एक मुस्लिम सहायक प्रोफेसर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति 5 नवम्बर को हुई, संकाय के विद्यार्थियों को जैसे ही इसकी जानकारी हुई इस नियुक्ति के खिलाफ विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया और पिछले कई दिनों से लगातार छात्रों द्वारा विश्वविद्यालय परिसर में कुलपति के आवास के सामने धरना जारी है।

लेकिन, तमाम मीडिया समूहों ने इस न्यूज़ को ऐसे चलाया जैसे पूरे BHU में मुस्लिम टीचर की नियुक्ति का विरोध हो रहा है। ऐसा बिलकुल नहीं है। अलीगढ़ के तर्ज पर बेशक BHU के नाम में कुछ समानताएँ हो लेकिन वहाँ किसी का सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से विरोध कभी नहीं हुआ। फिर इस बार ऐसा क्या है कि इस नियुक्ति को रद्द करने की माँग SVDV के छात्र कर रहे हैं। इस पूरे मुद्दे पर ऑपइंडिया ने संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय (SVDV) के विद्यार्थियों से बात की कि उनका विरोध किस बात को लेकर है, क्यों है? इस नियुक्ति को लेकर वहाँ के छात्रों ने हमें बहुत कुछ बताया। जिस पर ये पूरी ग्राउंड रिपोर्ट आधारित है।

यहाँ एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि ये छात्र कौन हैं जो एक संस्कृत के ‘मुस्लिम’ छात्र को अध्यापक के रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। क्या यह एक उन्मादी रूढिवादी हिन्दू भीड़ है? क्या यह फिरोज़ खान का विश्वविद्यालय में नियुक्ति का विरोध है? क्या यह एक मुस्लिम अध्यापक के साथ भेदभाव है? ऐसे कई प्रश्न उठाए जा सकते हैं और तर्कों से कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है। जैसा कि मीडिया गिरोह और कुछ फेसबुकिया विद्वान इस मुद्दे को लेकर आक्रोशित हैं और BHU को अपने-अपने तरीके से बदनाम करने में लगे हैं।

इन सभी सवालों का जवाब हमें वहाँ के धरनारत कई छात्रों ने दिया। उन्ही में से एक शशिकांत मिश्रा ने हमें बताया यह विरोध एक गैर-हिन्दू का ‘धर्म-विज्ञान संकाय’ में नियुक्ति का विरोध है। अगर यह नियुक्ति विश्वविद्यालय के ही किसी अन्य संकाय में संस्कृत अध्यापक के रूप में होती तो विरोध नहीं होता। विरोध का मूल इस विशेष संकाय में गैर-हिन्दू की नियुक्ति में निहित है। और विरोध करने वाले छात्र परम्परावादी हिन्दू हैं जो सनातन हिन्दू परम्पराओं, वेद, वेदांग, कर्मकाण्ड, ज्योतिष के प्रति पूरी श्रद्धा और भाव से समर्पित हैं और अब इस प्रकरण के बाद अपने भविष्य को लेकर आशंकित भी।

उन धरनारत छात्रों में से उनके लीडर चक्रपाणि ओझा ने हमें बताया, “अगर हमने आज विरोध नहीं किया तो 15 साल बाद इस संकाय में एक मुस्लिम प्रोफेसर होगा, विभागाध्यक्ष होगा, डीन होगा। जो कई अन्य मुस्लिमों की नियुक्ति करेगा, और एक ऐसा दौर भी आएगा जब हिन्दू विश्वविद्यालय के ‘हिन्दू धर्म संकाय’ का संचालन गैर-हिन्दू करेंगे। वे जिनका इन विषयों से, सनातन परंपरा से, यज्ञ और ज्योतिष से कोई आत्मीय लगाव नहीं होगा, बस यह उनकी जीविका का साधन होगा तो महामना मालवीय जी के इस बगिया में इस संकाय की स्थापना का मूल उद्देश्य ही छिन्न-भिन्न हो जाएगा।”


शोध छात्र चक्रपाणि ओझा ने विद्यार्थियों का पक्ष रखा

इस विरोध प्रदर्शन की अगुवाई करने वाले शोध छात्र चक्रपाणि ने आगे बताया कि इस विरोध को समझने के लिए संकाय की संरचना को समझने की भी जरूरत है। ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ यह पूरा नाम है, जिसमें दो हिस्से हैं। पहला ‘संस्कृत विद्या’ और दूसरा ‘धर्म विज्ञान’ (Theology)। समझने की बात यह है कि ‘संस्कृत विद्या’ कोई भी किसी भी धर्म का व्यक्ति पढ़-पढ़ा सकता है। लेकिन ‘धर्म विज्ञान’ की बात जब कोई दूसरे धर्म का व्यक्ति करे जिसका उन सनातन मूल्यों में कोई भरोसा ही न हो तो उसमें वह विश्वसनीयता नहीं रह जाती जिसकी जरुरत है।

चक्रपाणि ने कहा, “इसी कारण से यह संकाय भारत के अन्य संस्कृत संकायों/विभागों से भिन्न है। ‘हिन्दू’ विश्वविद्यालय में मालवीय जी ने इस संकाय की स्थापना संस्कृत विद्या के संरक्षण-संवर्धन के लिए इस उद्देश्य से किया कि हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं के वैज्ञानिक स्वरूप की व्याख्या की जा सके। जब किसी हिन्दू धार्मिक मान्यता को (इस्लामिक और इसाई संगठनों द्वारा पोषित) वामपंथी या कोई अन्य तथाकथित बुद्धिजीवी दकियानुसी कह कर मजाक उड़ाता है तब इस संकाय की जिम्मेदारी होती है कि ये उस धार्मिक मान्यता का वैज्ञानिक पक्ष सबके सामने रखे।”

आपको बता दें कि संकाय के मंदिरनुमा भवन के प्रवेश द्वार पर दो स्तंभों पर शंकर-पार्वती की मूर्तियाँ स्थापित हैं जिनका संस्कृत विद्या धर्म संकाय के अधिकांश प्रोफेसर्स प्रदक्षिणा करते हुए संकाय में प्रवेश करते हैं। क्या ऐसा तब भी होगा जब इस संकाय में कल कई सारे मुस्लिम प्रोफ़ेसर होंगे। आपको शायद न पता हो कि BHU के इसी संकाय से प्रकाशित होने वाला ‘विश्व हिंदू पंचांग’ पूरे विश्व के हिन्दू धर्म के तिथि त्योहार सम्बन्धी सभी विवादों का समाधान करता है। लेकिन, आज दुर्भाग्य यह है कि इसके बारे में हिन्दू विश्वविद्यालय के बहुत सारे लोग ही नहीं जानते। और तब की सोचिए जब आज से 20 साल बाद गैर हिन्दू लोग यहाँ संकाय-प्रमुख और विभागाध्यक्ष होंगे तब हिन्दू-परम्पराओं की न जाने क्या-क्या और कैसी-कैसी व्याख्याएँ की जाएँगी।

SVDV BHU

इस विरोध प्रदर्शन को लीड कर रहे संस्कृत विद्या धर्म संकाय के छात्र चक्रपाणि ओझा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा, “हमारे दो आरोप हैं- सबसे पहला तो यह कि ये नियुक्ति षडयंत्र के तहत की गई है। इंटरव्यू और पूरा प्रॉसेस डॉ. फिरोज खान के हिसाब से तय किया गया है। दूसरा आरोप यह है कि जब बीएचयू के शिलालेख पर लिखा है कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में ‘गैर हिंदू’ ना ही अध्ययन कर सकता है और ना ही अध्यापन तो एक मुस्लिम की नियुक्ति क्यों की गई।”

उन्होंने यह भी कहा कि ‘हिन्दू संस्थाएँ’ गैर-हिन्दुओं के प्रवेश निषेध जैसे नियम कायदे संविधान में नहीं लिखवातीं थीं, शिलालेखों पर लिखवाकर परम्परा का संरक्षण समझ लेती थीं। इसलिए इस नियुक्ति का विरोध संवैधानिक नहीं है, शायद तार्किक भी नहीं है। अपितु भावनात्मक ज़्यादा है। लेकिन आपको पता होना चाहिए कि मुस्लिम संस्थाएँ इस संदर्भ में कोई चूक नहीं करतीं।

शिलालेख SVDV BHU

मीडिया द्वारा इस मुद्दे को सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम तक सीमित कर देने से चिंतित वहाँ के छात्रों ने बताया की इस आधुनिक दौर में इन छात्रों को आप वह पारंपरिक रूढ़िवादी आदिवासी या कुछ भी समझ सकते हैं जो अपनी छोटी सी पुरखों की जमीन, सनातन परम्परा और ग्रामदेवता पर आए संकट से बचने के लिए आज भाला बरछी निकाल लिए हैं। क्योंकि, इनके सामने आधुनिक असलहों से लैस वाईसचांसलर(VC) JNU के प्रोफ़ेसर राकेश भटनागर ‘सरकार’ हैं और विभागाध्यक्ष व एक्सपर्ट्स ‘पूँजीपति और अधिकारी।’ तथाकथित विकास और आधुनिकता का समर्थन करने वाली लिबरल जनता (गैंग) भी सामने है। यह छात्र आज खुद में कल का कश्मीरी हिन्दू भी देख रहे हैं। इनके लिए त्रासद यह है कि आज इनके पलायन की भूमिका ‘संघ समर्थित हिन्दू सरकार’ के शासन-काल में लिखी जा रही है। और लोग मौन हैं। आखिर अपनी परम्पराओं के संरक्षण के लिए हम अब खड़े नहीं हुए तो आने वाले समय जो थोड़ा-बहुत संरक्षित पारम्परिक ज्ञान-विज्ञान बचा है उसे भी आज के ‘दीमक’ चाट जाएँगे।

ऑपइंडिया से बात करते हुए वहाँ के छात्रों ने हमें वो पुराने दस्तावेज भी दिखाए जिसके बल पर आज वे मालवीय जी के सपनों के लिए लड़ रहे हैं आने वाली पीढ़ियों के लिए आज उठ खड़े हुए हैं। चक्रपाणि ओझा ने बताया कि आज से बहुत पहले जब दिसंबर में काशी में राष्ट्रीय महासभा हुई और उसी अवसर पर 31 दिसंबर सन 1905 ई० को बरार के श्री वी०एन० महाजनी एम्० ए० के सभापतित्व में काशी के टाउन हॉल में एक बड़ी भारी सभा हुई थी। सब धर्मों के प्रतिनिधि देशभर के प्रसिद्ध शिक्षा प्रेमियों के सामने आज की यह योजना रखी गई। यहाँ भी हिंदू विश्वविद्यालय की योजना का सबने स्वागत किया। 1 जनवरी सन 1906 ई० को वहीं कॉन्ग्रेस के पंडाल में हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा हुई थी।

अगले ही वर्ष सन 1907 ई० में 20 से 26 जनवरी तक प्रयाग में परमहंस परिव्राजकाचार्य जगद्गुरु श्री स्वामी शंकराचार्य जी के सभापतित्व में सुप्रसिद्ध साधुओं तथा विद्वानों की सनातनधर्म महासभा में यह प्रस्ताव स्वीकार हो गया कि-

भारतीय विश्वविद्यालय के नाम से काशी में एक हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए, जिसके निम्नांकित उद्देश्य हों-

  • श्रुतियों तथा स्मृतियों द्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रम धर्म के पोषक, सनातन धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए धर्म के शिक्षक तैयार करना।
  • संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन की अभिवृद्धि।
  • भारतीय भाषाओं तथा संस्कृत के द्वारा वैज्ञानिक तथा शिल्प-कला से संबंधित शिक्षा के प्रचार में योगदान देना।

विश्वविद्यालय में निम्नांकित संस्थाएँ होंगी-

वैदिक विद्यालय (वर्तमान में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय) -जहाँ वेद वेदांग स्मृति इतिहास तथा पुराणों की शिक्षा दी जाएगी ज्योतिष विभाग में एक ज्योतिष संबंधित तथा अंतरिक्ष विद्या संबंधित वेधशाला भी निर्मित की जाएगी।

इस विश्वविद्यालय का धर्म संबंधी कार्य तथा वैदिक कॉलेज (वर्तमान में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय) का कार्य उन हिंदुओं के अधिकार में होगा जो श्रुति, स्मृति तथा पुराणों द्वारा प्रतिपादित सनातन धर्म के सिद्धांतों को मानने वाले होंगे।

  • इस विश्वविद्यालय में वर्णाश्रम धर्म के नियमानुसार ही प्रवेश होगा।
  • इस विद्यालय (संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय) के अतिरिक्त अन्य सभी विद्यालयों में सब धर्मावलंबियों तथा सब जातियों का प्रवेश हो सकेगा तथा संस्कृत भाषा के अन्य शाखाओं की शिक्षा बिना जाति-पाती का भेदभाव किए सबको दी जाएगी।

आज हम इन्ही मूल्यों के लिए लड़ रहे हैं। इन्हीं आदर्शों को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आज जब विश्विद्यालय अपनी हट पर अड़ा है क्योंकि जो कुछ हाल-फिलहाल में किया गया है। अगर उस पर जाँच बैठाई जाए तो कई लोग बेनकाब होंगे और हम इस नियुक्ति पर जाँच की माँग कर रहे हैं।

धरने पर बैठे एक दूसरे पीएचडी छात्र ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया, “इस संकाय में शिक्षक नहीं गुरू होते हैं। यहाँ सब चोटी रखते हैं, बड़ों के पैर छूते हैं और हवन-यज्ञ करते हैं। जिस मुस्लिम प्रोफेसर फिरोज खान को नियुक्त किया गया है, उनके फेसबुक अकाउंट पर धर्म के कॉलम में मुस्लिम लिखा हुआ है। अगर उन्हें डिपार्टमेंट में जगह दी जाती है तो क्या यह हम वैदिक सनातन परम्पराओं को मानने वाले छात्रों के साथ भेदभाव नहीं होगा।”

यहाँ यह भी बता दें कि डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति पर हो रहे इस विरोध प्रदर्शन के विषय में बीएचयू के प्रवक्‍ता डॉ. राजेश सिंह ने मीडिया के लिए प्रशासन का पक्ष जारी किया है। उन्होंने बताया कि कुलपति की अध्‍यक्षता में चयन समिति की बैठक में विषय विशेषज्ञों ने पारदर्शी प्रक्रिया अपनाते हुए असिस्‍टेंट प्रोफ़ेसर पद पर डॉ. फिरोज खान को योग्‍य पाया। उन्होंने कहा कि बीएचयू की स्‍थापना इस उद्देश्‍य से की गई थी कि यह विश्‍वविद्यालय धर्म, जाति, संप्रदाय, लिंग आदि के भेदभाव से ऊपर उठकर राष्‍ट्र निर्माण के लिए सभी को अध्‍ययन एवं अध्‍यापन के समान अवसर प्रदान करेगा। इस उद्देश्‍य का बीएचयू प्रशासन द्वारा पालन किया जा रहा है।

समझिए पूरा नेक्सस

जबकि संस्कृत विद्या धर्म संकाय के एक पूर्व शोध छात्र सौरभ द्विवेदी ने जो आरोप लगाया वह और भी चौकाने वाला है। पूर्व शोध छात्र सौरभ ने हमें बताया कि साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर उमाकान्त चतुर्वेदी हैं। मेरे शोध-निर्देशक हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 5 साल पहले एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में आए। इसके पहले राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के जयपुर कैम्पस में कार्यरत थे। पूर्व संस्था से इनका लगाव भी है और इनके विश्वस्त लोग आज भी वहीं हैं। इनका व्यक्तित्व धनलोलुपता की पराकाष्ठा है। इनकी धनलोलुपता को समझने के लिए इनसे किसी भी विषय पर 15 मिनट बात करना ही पर्याप्त है। अगर इनका वश चले तो BHU के शोधार्थियों के JRF के पैसों में भी अपना हिस्सा निश्चित कर लें।

शोध छात्र ने आगे कहा कि इस नियुक्ति की सारी फिल्डिंग इन्होंने ही सेट की है। 6 महीने पहले से, मेरा मानना है कि अगर निष्पक्ष जाँच हो जाए तो ये रंगे हाथ पकड़े भी जा सकते हैं। इस नियुक्ति का सबसे बड़ा कारण है पैसा। सुरक्षित और गोपनीय ढंग से पैसे लेने के लिए प्रोफेसर उमाकान्त चतुर्वेदी के लिए सबसे उपयुक्त अभ्यर्थी हैं डॉ फ़िरोज खान, जो कि संस्थान के जयपुर कैंपस के छात्र हैं, OBC केटेगरी से हैं। 10 अभ्यर्थियों का साक्षात्कार हुआ उनमें से कई हिन्दू विश्वविद्यालय के भी पूर्व शोधछात्र थे। लेकिन इन 5 वर्षों में विभागाध्यक्ष को किसी पर इतना विश्वास न था कि पैसे की बात चला सकें। विभागाध्यक्ष को इस बात का भी अंदेशा नहीं था कि बस चयनित अभ्यर्थी के मुस्लिम होने की वजह से भी विवाद हो सकता है।

इन्होंने इंटरव्यू एक्सपर्ट के रूप में जयपुर के ही एक प्रोफेसर ताराशंकर शर्मा पाण्डेय को बुलाया, जो संभवतः इनके सबसे विश्वस्त और हाँ में हाँ मिलाने वाले मित्र हैं। इनके बारे में मैं अधिक नहीं जानता। दूसरे एक्सपर्ट एक्स प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी को बुलाया गया। विचारधारा के संदर्भ में अवसरवादी रूप से कभी ‘वामपंथी-कॉन्ग्रेसी’ कभी ‘पारंपरिक विद्वान’ कभी संस्कृत साहित्य के ‘आधुनिक समालोचक’ हैं। कॉन्ग्रेस के शासनकाल में ये राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के कुलपति रहे हैं। बहुत सारे पदों को अलंकृत कर चुके हैं। इनका वैदुष्य निर्विवाद है। इन्होंने संस्कृत साहित्य को समृद्ध करने के लिए बहुत परिश्रम भी किया है। लेकिन स्याह पक्ष यह है कि इन्होंने अपने सम्पूर्ण विद्वत्ता और पद-प्रतिष्ठा का दुरुपयोग विश्वविद्यालयों में ‘अपने’ लोगों की नियुक्तियों में किया है।

लगभग 20 वर्षों से विश्वविद्यालय स्तर की सभी नियुक्तियों पर इनके ‘गैंग’ का एकाधिपत्य है। संस्कृत के हर संस्थान में इनके नियुक्त किए हुए लोगों का एक नेक्सस है। यह नेक्सस अपने झुण्ड से इतर किसी अन्य को संस्कृत प्रोफेसर बनने की मान्यता नहीं देता। इनकी तुलना एक समय के जाने माने हिन्दी समालोचक से कुछ अंश तक की जा सकती है।

इसी नेक्सस के ये तीनों लोग विद्वान हैं, योग्य हैं। इसलिए इनके द्वारा नियुक्त अभ्यर्थी की योग्यता पर प्रश्नचिह्न लगाना तार्किक रूप से सामान्य व्यक्ति की दृष्टि में गलत है। और इनका पूरा गैंग किसी भी अपने गुट के व्यक्ति को प्रोफेसर बनने के लिए सर्वाधिक योग्य मानता है, साबित भी करता है। प्रोफेसर उमाकान्त चतुर्वेदी के अध्यक्ष रहते यह नियुक्ति बिना पैसे के नहीं हो सकती थी, लेकिन यह अभ्यर्थी एक ‘हिन्दू OBC’ होता तो विरोध नहीं होता, यह बात भी सच है। दिलचस्प यह भी है कि सरकार किसी की भी हो विश्वविद्यालय की नियुक्तियाँ एक विशिष्ट विचारधारा (वामपंथी) के लोग ही करते हैं।

चौथे व्यक्ति हैं संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय प्रमुख (डीन) प्रोफेसर विन्ध्येश्वरी प्रसाद मिश्र। विद्वान सीधे सादे।
अंतिम में हैं प्रोफेसर राकेश भटनागर जो कि हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। JNU के प्रोफेसर हैं और लोग इन्हें वैचारिक रूप से वामपंथी मानते हैं। कभी एक छोटे से राज्य के विश्वविद्यालय के कुलपति रहे, न चला पाने के कारण पद छोड़ दिया था। आज भारी भरकम विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। इतने से तो आप समझ सकते हैं कि यहाँ दाल में काला नहीं है बल्कि पूरी दाल ही काली है।

चलते-चलते यह भी बता दूँ की ऊपर दिए गए बयान कितना सही है इसकी भनक संस्कृत संकाय के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर उमाकांत चतुर्वेदी की इस बातचीत से भी चल जाता है, “संस्कृत विद्या धर्म संकाय के इस पोस्ट के लिए 29 लोगों ने फॉर्म भरे थे, जिसमें से 10 लोगों का इंटरव्यू के लिए सेलेक्शन हुआ था। इंटरव्यू के दिन 9 लोग ही हाजिर हुए। उन 9 लोगों में चयनित हुआ अभ्यर्थी सबसे ज्यादा योग्य था। बाकी अभ्यर्थियों को 10 में से 0 और 2 नंबर मिले तो चयनित अभ्यर्थी को 10 नंबर मिले।”

अब शायद आपको छात्रों की बातों में दम दिख सकता है। फिलहाल अभी की स्थिति यह है की कुलपति आवास के बाहर धरना जारी है विश्वविद्यालय ने कोई कार्रवाई नहीं की है। संस्कृत के छात्र दिन रात वहाँ प्रदर्शन कर रहे हैं अब देखना यह है कि पूरी प्रक्रिया का अंजाम क्या होता है? क्या विश्वविद्यालय मालवीय जी की थाती और मूल्यों के प्रति अपनी सजगता दिखाता है? या केवल आज के अपने हट की वजह से आने वाले समय में ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ की नींव में खुद ही मट्ठा डालने का काम करता है?

1200 साल बाद 12 नवंबर को सबसे बड़े मुस्लिम देश में हिन्दुओं ने किया शिव का अभिषेक

अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ़ होने और दक्षिण में सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भगवान अय्यप्पा के पक्ष में आने के बाद अब एक और प्राचीन मंदिर से हिन्दुओं के लिए शुभ समाचार आ रहा है। इंडोनेशिया के प्राचीन प्रम्बानन मंदिर में सैकड़ों हिन्दुओं ने 1163 वर्षों के बाद मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक किया। यहाँ यह जान लेना ज़रूरी है कि इंडोनेशिया केवल मुस्लिम बहुल देश ही नहीं है, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी (22.5 करोड़) का घर है।

इस आयोजन को इंडोनेशिया के अलावा पड़ोसी चीन की शिन्हुआ न्यूज़ एजेंसी की खबरों में भी कवर किया गया है।

मूलतः शिवगृह कहा जाने वाला प्रम्बानन मंदिर इंडोनेशिया के तीन प्रांतों स्लेमान, योग्यकर्ता, और मध्य जावा के क्लाटेन के बीच में स्थित है। यह पूजा विधि मंगलवार (12 नवंबर, 2019) को सम्पन्न हुई और हिन्दुओं ने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। “बकौल अभिषेक का आयोजन करने वाली समिति के सदस्य मदे अस्त्र तनया, उन्हें एक शिलालेख मिला था, जिसमें इस मंदिर के उद्घाटन की तारीख 12 नवंबर, 856 ईस्वी दर्ज थी। उसमें यह भी उल्लिखित था कि मंदिर की स्थापना के समय भी ऐसा ही अभिषेक और पूजा पाठ हुआ था। उसके बाद हिन्दुओं ने इस पूजा की तैयारी शुरू की। इस अनुष्ठान का आयोजन रकाई पिकतन द्यः सेलाडु द्वारा इस भव्य मंदिर की स्थापना का उत्सव मनाने के लिए हुआ है।

अंतारा न्यूज़ डॉट कॉम नामक वेबसाइट का कहना है कि यह अभिषेक मातरम नामक हिन्दू साम्राज्य के स्वर्ण काल का भी परिचायक है। उस समय के हिन्दू तावुर अगुंग नामक एक अनुष्ठान करते थे, जिसके बारे में वे मानते थे कि इससे मनुष्यों के साथ समस्त ब्रह्माण्ड को ही पवित्र किया जाता है। प्रम्बानन मंदिर का जीर्णोद्धार इंडोनेशिया की सरकार ने 1953 में कराया था।

शनिवार, 9 नवंबर (संयोगवश भारत में श्री रामजन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिन) को शुरू हुए इस अनुष्ठान का उल्लेख मातरम साम्राज्य के 25 शिलालेखों में मिलने की बात स्थानीय मीडिया में कही गई है। इसमें पहली पूजा मातुर पिउनिंग नामक थी, जिसमें आगे के कर्मकांडों के लिए पूर्वजों से अनुमति माँगी जाती है। यह भारत में मृत पितरों के स्मरण जैसा है। इसके बाद म्रापेन नामक अग्नि प्रज्ज्वलित की गई और 11 पवित्र कुँओं का पानी लाकर पास के बोको मंदिर से प्रम्बानन देवालय तक छिड़काव हुआ। उसके बाद पूजा पाठ और भारत की ही तरह मंदिरों की प्रदक्षिणा भी की गई।

पूजा के बाद शिलालेख के अनुसार मनुसुक सिमा नामक एक और प्रथा के अनुसार शिवगृह देवालय के पारम्परिक नृत्य का भी आयोजन हुआ जिसमें प्रम्बानन मंदिर के पुनर्निर्माण से जुड़ी गाथाओं का वर्णन होता है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल पर CBI का छापा, FCRA के उल्लंघन का मामला: पैसे लेकर J&K पर छापी थी फेक रिपोर्ट्स

एमनेस्टी इंटरनेशनल ग्रुप पर CBI की टीम ने बेंगलुरु में छापा मारा। यह छापेमारी विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के उल्लंघन के मामले में की गई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के बारे में बता दें कि यह एक ग़ैर-सरकारी संगठन है, जो कहने को तो मानवाधिकार के लिए काम करता है, लेकिन इसकी सच्चाई कुछ और ही है।

दरअसल, एमनेस्टी इंटरनेशनल एक एनजीओ है जो ‘मानवाधिकारों की रक्षा’ के लेबल के नीचे लगभग छः दशकों से छुपती रही है लेकिन इसके कुकर्मों की पोल गाहे-बगाहे खुलती रहती है। इसकी शुरुआत 1961 में ब्रिटेन से हुई थी और जिसने अपना उद्देश्य मानवीय मूल्यों पर शोध एवं प्रतिरोध करना बताया था और साथ ही जगजाहिर किया था कि वह मानवाधिकारों के लिए लड़ेगा।

हालाँकि, पिछले कुछ सालों में इस एनजीओ द्वारा की गई करतूतें इसके अस्तित्व की बखिया अपने आप उधेड़ती हैं, जिसके लिए इसे कई देशों से लताड़ भी मिल चुकी है लेकिन फिर भी ये किसी देश के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज नहीं आते।

आपको बता दें कि एमनेस्टी इंडिया ख़ुद को मानवाधिकार के लिए कार्य करने वाला संगठन बताता है लेकिन ताज़ा ख़ुलासे से पता चला है कि वह एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी है, जो कमर्शियल रूप में कार्य करता है। उसे यूनाइटेड किंगडम स्थित एमनेस्टी इंटरनेशनल से फंड्स मिलते हैं। इन फंड्स का इस्तेमाल जम्मू कश्मीर पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए किया जाता है, जिसे मीडिया लपक कर भारत के प्रति नकारात्मक माहौल बनाती है। एमनेस्टी इंडिया ऐसे रिपोर्ट्स तैयार करता है, जिसमें सारा कंटेंट पहले से साज़िश के तहत तैयार रखा जाता है।

रिपब्लिक टीवी द्वारा एक्सेस किए गए डॉक्युमेंट्स के अनुसार, एमनेस्टी इंडिया को पिछले कुछ वर्षों में एमनेस्टी इंटरनेशनल से 5,29,87,663 रुपए मिले हैं। यानी लगभग 5.3 करोड़ रुपयों का इस्तेमाल सिर्फ़ जम्मू कश्मीर के बारे में रिपोर्ट्स तैयार करने के लिए किया गया। 2010 में यह ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया फाउंडेशन ट्रस्ट’ के नाम से शुरू हुआ था लेकिन उन्हें ‘विदेशी योगदान नियंत्रण अधिनियम (FCRA, 2010)’ के तहत गृह मंत्रालय से इजाजत नहीं मिली।


रेप, गर्भपात, गुप्तांगों में मिर्ची का पेस्ट: चीन में उइगरों की स्थिति, सामने आया Video, पढ़ें आपबीती

चीन में उइगर मुस्लिमों पर होती बर्बरता का लगातार खुलासा हो रहा है। अभी हाल में वहाँ के यातना गृह से भागकर दुनिया के सामने आने वाली मुस्लिम महिलाओं ने इन कैंपों की हकीकत का खुलासा किया है। उन्होंने विदेशों में शरण पाने के बाद बताया है कि कैसे चीन के यातना कैंपों में उनके साथ बलात्कार होते थे, उनके गर्भपात कराए जाते थे और भयावह तरीके से उनकी नसबंदी होती थी।

इसके अलावा चीन में मुस्लिमों की दशा को दिखाता एक वीडियो भी सामने आया है। जिसे वॉर ऑन फियर नाम के यूट्यूब चैनल पर पिछले महीने अपलोड किया गया है। इसमें देखा जा सकता है कि कई सौ की तादाद में कैसे मुस्लिमों को बंदी बनाकर, उनकी आँखों को मूँदकर ट्रेन से शियानजिंग में स्थांतरित किया जा रहा है।

हालाँकि, चीन इन कॉन्संट्रेशन कैंम्पों को प्रशिक्षण केंद्र मानता है। चीन का कहना है कि मुस्लिम लोगों को अतिवाद से बाहर निकालने और उन्हें नए स्किल देने के लिए ये कैंप चला रहा है। वहीं केवल कैंप से भागी हुई महिलाएँ ही नहीं, बल्कि वहाँ स्थानीय अधिकार समूह भी बताते हैं कि इन कैंपो में महिलाओं के गुप्तांगों में मिर्ची का पेस्ट लगाना जैसी चीजें बेहद आम है।

डेलीमेल की एक रिपोर्ट में ऐसी ही दो महिलाओं की आपबीती का उल्लेख है। जिनमें से एक रुकैया परहेट हैं और दूसरी गुलजिरा मॉगदिन। रुकैया को साल 2009 में शिनजियांग में हिरासत में लिया गया था, जिसके बाद उन्होंने 4 साल तक चीनी अधिकारियों की प्रताड़ना झेलीं। आज वो तुर्की में हैं।

रुकैया बताती हैं कि चीन में 35 साल से कम उम्र के हर आदमी और हर औरत का बलात्कार किया जाता है। कैंप के गार्ड जिसके साथ रात गुजारना चाहते हैं, उसके सिर पर बैग रखते हैं और फिर खींचते हुए बाहर ले जाते है। फिर पूरी रात उसका बलात्कार होता है। रुकैया का दावा है कि चीन में गिरफ्तारी के दौरान जो महिलाएँ गर्भवती होती हैं, उनका बर्बता से गर्भपात करवा दिया जाता है।

रुकैया के अलावा इस कैंप से भागकर कजाकिस्तान में शरण लेने वाली गुलजिरा मॉगदिन भी बताती हैं कि इन कैंपों में भयंकर तरीके से गर्भपात किया जाता है। वे अपना अनुभव साझा करते हुए कहती हैं कि उनके भ्रूण को बिना एनेस्थेसिया दिए चीर दिया गया था।

इतनी बर्बरता और क्रूरता का वीडियो सहित खुलासा होने के बाद भी चीन प्रशासन अपने अधिकारियों की कार्रवाई को एक सामान्य टास्क बता रहा है। जबकि ड्रोन से लिए गए वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि बंदियों को ट्रेन से ले जाया जा रहा है और उन सभी के सर मुंडे हुए है, आँख काली पट्टी से ढकी हुई है और हाथ बंधे हुए हैं। बताया जा रहा है कि यह वीडियो अमेरिकी अधिकारियों द्वारा प्रमाणित है।

मुस्लिम महिलाओं के साथ रात को सोते हैं चीनी अधिकारी: खिलाते हैं सूअर का माँस, पिलाते हैं शराब

यहाँ बता दें कि चीन के इन कैंपों में महिलाओं के प्राइवेट पार्ट्स पर मिर्ची का पेस्ट लगाने वाली क्रूरता का खुलासा होने से पहले भी कई भयावह सच्चाईयाँ सामने आ चुकी हैं। इन कैंपों में प्रताड़ना झेल चुके पूर्व बंदियों ने बताया था कि उइगर मुस्लिमों को वहाँ सुअर का माँस जबरन खिलाया जाता है और मंदारिन बोलने का दबाव बनाया जाता है।

इसके अलावा चीन इन उइगर मुस्लिमों के लिए रोज नए नियम-क़ानून बना रहा है। वहाँ इस्लामी टोपी लगा कर घूमने पर पाबन्दी है, नमाज भी पुलिस की निगरानी में अनुमति लेकर ही पढ़ी जा सकती है और इस्लामिक रीति-रिवाजों पर प्रतिबन्ध है। चीन के शिनजियांग प्रान्त में ख़ास करके उइगर मुस्लिमों को डिटेंशन कैम्प में रखा जाता है, जहाँ उनका ‘चीनीकरण’ किया जाता है।

जानकारी के मुताबिक चीन में जिन मुस्लिमों को डिटेंशन कैम्प में भेजा जाता है, उनके घर की निगरानी रखने के लिए चीनी नागरिकों को हायर किया गया है। ये चीनी नागरिक उइगर मुस्लिमों के घर पर निगरानी रखते हैं। निगरानी के नाम पर इन उइगरों के घर-परिवार के साथ क्या-क्या होता है, यह जानकर आपको आश्चर्यचकित रह जाएँगे, आपको सदमा लगेगा। निगरानी रखने वाले चीनी नागरिक उइगर मुस्लिमों की पत्नियों के साथ बिस्तर पर सोते हैं।

उइगर मुस्लिम परिवारों के लिए नियम बनाया गया है कि वो नियमित रूप से चीनी अधिकारियों को अपने घर पर आमंत्रित करें और अपने मजहबी और राजनीतिक विचारों से उन्हें अवगत कराएँ। इसीलिए, चीन ने ‘पेअर अप एंड बिकम फैमिली’ योजना लागू की है, जिसमें हर उइगर परिवार को एक चीनी असाइन किया गया है। यह कुछ और नहीं बल्कि उइगरों के घर जाकर सेक्स स्लेव (यौन दासी) के साथ मनोरंजन करने की आड़ में बनाया गया कानून है।

182 कन्सेंट्रेशन कैंप, 209 जेल, 74 लेबर कैंप, 10 लाख+ हिरासत में: चीन में उइगरों की हालत

अभी हाल ही में उइगर कार्यकर्ताओं ने भी दावा किया है कि उन्होंने जातीय समूह को हिरासत में लेने के लिए चीन द्वारा चलाए जा रहे करीब 500 शिविर और जेल देखे हैं। जिसे देखकर उनका दावा है कि चीन के इन कैंपों में रह रहे लोगों की संख्या 10 लाख बताई जाती रही है लेकिन यह आँकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है। इसके अलावा ‘द ईस्ट तुर्किस्तान नेशनल अवेकनिंग मूवमेंट’ नाम के समूह ने 182 संदिग्ध ‘‘हिरासत शिविरों’’ के बारे में संकेत दिए हैं, जहाँ उइगरों पर उनकी संस्कृति छोड़ने के लिए कथित तौर पर दबाव बनाया जाता है। और समूह ने गूगल अर्थ पर मौजूद ताजा तस्वीरों का आकलन करने के बाद कहा है कि उसने मंगलवार को 209 संदिग्ध जेल और 74 संदिग्ध श्रम शिविर देखे, जिनके संबंध में वह बाद में जानकारियाँ साझा करेगा।

हिन्दू धर्मांतरण क्यों नहीं करते? कलमा क्यों नहीं पढ़ लेते? क्योंकि वो काल को जीतने वाले राम के उपासक हैं

गत दस वर्षों में पाकिस्तानी हिन्दू विस्थापितों के साथ काम करते एक प्रश्न ने मुझे बहुत अचंभित किया है। वह यह है कि इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी ये हिन्दू धर्मांतरण क्यों नहीं करते? कलमा क्यों नहीं पढ़ लेते हैं? अपना सर्वस्व त्यागकर ये हिंदू भारत की शरण में आ जाते हैं, पर धर्मांतरण नहीं करते हैं।

आज जब राम जन्मभूमि का निर्णय हो गया है तो मुझे इस प्रश्न का उत्तर थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगा है।

ऐसे लोगों को क्या कहा जाए जो धरती के एक टुकड़े के लिए पाँच सौ साल तक संघर्ष करते हैं? क्या कहा जाए ऐसे लोगों को, जो हर प्रकार की यातना और दुख उठाने के उपरांत भी धरती के उस टुकड़े पर अपना अधिकार ना विस्मृत करते हैं, ना छोड़ते हैं? क्या कहा जाए ऐसे लोगों को, जो मुग़ल बर्बरता, विदेशी आक्रांताओं की दासता और सदियों के नरसंहार के बाद भी इसी आस पर जिए जाते हैं कि एक दिन धरती का वह टुकड़ा वे पुनः प्राप्त करेंगे?

राम जन्मभूमि की मुक्ति का संघर्ष मानव इतिहास के गिने चुने संघर्षों में से एक है जो पाँच सदी तक अनवरत चला। 

इन 500 वर्षों से अधिकांश समय ऐसा था जब दूर-दूर तक कोई आशा भी ना थी कि राम जन्मभूमि को हिन्दू पुनः प्राप्त भी कर सकेंगे। राम जन्मभूमि पर इतना एकतरफ़ा और बर्बर क़ब्ज़ा था कि किसी भी प्रकार की आशा लगाना हास्यास्पद और कल्पना के विपरीत था। न सिर्फ़ विदेशी आक्रांता, बल्कि स्वतंत्रता के पश्चात भारत का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व व भारत के शीर्ष इतिहासविद् भी इस हिन्दू मान्यता के विपरीत थे कि भगवान राम का जन्म इसी पवित्र भूमि पर हुआ था ।

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इतनी घोर विपरीत परिस्थितियों व वामपंथी षड्यंत्रों के बीच भी किस प्रकार हिन्दू जनमानस ने राम जन्मभूमि पर अधिकार को नहीं छोड़ा, समकालीन मानव समाज के लिए यह एक अद्भुत प्रसंग है।

ये कैसा आग्रह था? ये कैसी हठधर्मिता थी हिन्दुओं की? यह कैसा अनोखा संकल्प था कि चारों ओर से विकराल आँधियों में घिरे होने के उपरांत भी हिंदू हृदय में इस नन्हे-से दिए की लौ टिमटिमाती रही!

वर्षों पहले मैं अपने बड़े भाई के साथ कैंटोनमेंट एरिया में गया था। एक अधेड़ सैनिक ने मेरे बड़े भ्राता, जो कि उस समय मेजर थे, को देखकर छाती निकालकर ‘राम राम’ कहा ।

मैं आश्चर्य और आनंद से स्तब्ध खड़ा रह गया। 

सेना के सब अफ़सर, इनकी स्त्रियां, इनके बच्चे आपस में अंग्रेज़ी में बात करते हैं, किंतु साधारण सैनिकों ने राम का नाम आग्रहपूर्वक जीवित रखा हुआ है- और यहीं से स्पष्ट हो जाता है कि यद्यपि विदेशी दरिंदों ने हमारे आराध्य भगवान राम का मंदिर नष्ट कर दिया, श्री राम की जन्मभूमि हम से हथिया ली, पर हिन्दू जनमानस से राम व रामनाम को वे नहीं मिटा पाए ।

जो राम जन्मभूमि और मंदिर रूप में हमसे छिन गए, उसे तत्व बनाकर हमने अपनी आत्मा में प्रवाहित कर लिया।

जन्म के समय के मंगल गीत से लेकर विवाह संस्कार व चिता की अग्नि में शरीर के समर्पण तक राम-नाम का सत्य ही हिन्दुओं का उद्घोष बन गया। संसार का कोई आक्रमण हृदय में बैठे राम को नहीं मिटा सकता था, यह सत्य हमारे पुरखों को ज्ञात था, तथा इस तथ्य का भरपूर उपयोग हमारे पुरखों ने धर्म की रक्षा हेतु किया।

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समकालीन मानव समाज में जब कि हर बात स्थूल से स्थूलतर होती जा रही है तब इतनी सूक्ष्म बात को जनमानस में उतार कर प्रत्यक्ष जीवित रखना हिन्दू समाज की एक विलक्षण खोज है। नेतृत्वहीन, निर्धन, निराश्रित हिन्दू विश्व के सबसे क्रूर धर्मावलम्बियों के सामने किस आत्मबल से डटे रहे, यह भी मनोवैज्ञानिकों व इतिहासकारों के लिए शोध का विषय हो सकता है। 

इस्लामी आक्रान्ताओं ने भारतीय उपमहाद्वीप में हज़ारों मंदिरों को धूल-धूसरित कर उन पर मस्जिदें खड़ी कीं। पर हमारे ऋषियों, मठाधीशों, व गुरुओं ने तीन पवित्रतम स्थानों पर काल की धूल नहीं जमने दी। वे थे शिव की काशी, मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि  व राम जन्मभूमि। 

हिन्दुओं के लिए ये तीन स्थान कभी महज़ भूखंड नहीं, बल्कि सनातन हिन्दू धर्म का मर्मस्थल रहे हैं।  हिन्दू मानस सब आक्रमण सह कर भी इन भूखंडों पर समझौते को कभी राज़ी नहीं हुआ। 

हिन्दू धर्म में ज्योतिष के अनुसार धरती का बहुत अधिक महत्व होता है। ज्यामिति का कोण, वास्तुकला, सूर्य के साथ संबंध, भूखंड की भौगोलिक स्थिति को विशेष प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए कोई भी भूखंड सनातन धर्म में धरती का एक टुकड़ा न होकर ईश्वरीय तत्व के अवतरण का स्थान माना गया है।

इस नियम के आधार पर इन तीनों पवित्रतम स्थानों के अधिग्रहण पर स्वीकृति नहीं दी जा सकती थी।

यदि श्रीराम जन्मभूमि की संदर्भ में बात करें तो वहाँ पाँच सौ साल के अनवरत संघर्ष में हज़ारों हिन्दू व सिख वीरों ने राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए सतत् संघर्ष किया। गोस्वामी तुलसीदास जैसे भक्त कवियों ने अपनी कविताओं द्वारा राम को जीवित रखा। विभिन्न जातियों के हिन्दुओं ने एक सनक की तरह श्रीराम जन्मभूमि पर हिन्दुओं के अधिकार को तिरोहित नहीं होने दिया, क्यूंकि अपने अंतर्मन में हर हिन्दू यह बात जानता था कि श्री राम व राम का नाम हिन्दू धर्म की आत्मा हैराम गए तो हिन्दू धर्म नहीं बचेगा। 

यह चमत्कार उस अज्ञात हिंदू के कारण हुआ जिसकी सहर्ष श्रद्धा को कोई विदेशी आक्रांता, कोई हिंसा, कोई प्रताड़ना, नहीं चुका पाई। वह अज्ञात हिन्दू, जिसने अपने बच्चों को बाबरी मस्जिद के नीचे राम जन्मभूमि होने का विस्मरण नहीं होने दिया। वह अज्ञात हिन्दू, जिसने जगह-जगह इस बात का विवरण लिखा। वह अज्ञात हिन्दू, जो सतत इसी राम जन्मभूमि के पास रामलला की पूजा करता रहा ।

वह अज्ञात निहंग सिख जिन्होंने 19 वी शताब्दी के मध्य में रामजन्मभूमि पर सशस्त्र आक्रमण कर उसे मुक्त किया। वह अज्ञात हिन्दू, जिसने ब्रिटिश राज के सामने राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए मुक़द्दमे दर्ज किए। वह अज्ञात हिन्दू, जिन्होंने विभाजन के समय सफल नेतृत्व देकर राम जन्म भूमि सरकार द्वारा अधिग्रहित नहीं होने दी।

वह अज्ञात हिन्दू कार सेवक, जो लाखों की संख्या में अयोध्या पहुँचा तथा मुलायम सिंह की पुलिस के द्वारा गोलियाँ व लाठी खाकर वीरगति को प्राप्त हुआ। वह अज्ञात हिन्दू, जिसने सवा रुपया व एक ईंट अपने घर से अयोध्या भेजी थी। इन्हीं अज्ञात हिन्दुओं के सामूहिक चैतन्य व त्याग के फलस्वरूप आज राम जन्मभूमि पूर्णतया मुक्त हो गई है।

जिस दिन इस भव्य मंदिर का निर्माण होगा, तो उस दिन विश्व को जो दृष्टिगोचर होगा वह ईंट पत्थर के बने मंदिर से कहीं अधिक होगा। वह एक स्मारक होगा इस भयंकर धार्मिक उत्पीड़न के सम्मुख मनुष्य  के अदम्य साहस का। वह आश्रय होगा पीढ़ियों से निराश्रित समाज का। वह एक प्रतीक होगा कि किस प्रकार विश्व में प्रताड़ित होने के उपरांत भी अपनी खोई हुई धरोहर को पुनः अर्जित किया जा सकता है। 

सारे विश्व के हिन्दुओं के लिए यह श्रद्धा, आशा व शौर्य का केंद्र होगा। 

इस्लामी आक्रान्ताओं द्वारा अपने मंदिरों के नष्ट होने की पीड़ा की यात्रा में हिन्दुओं ने डिनायल से लेकर आक्रोश तक की यात्रा की है। इस पीड़ा ने हिन्दू समाज को अधिक लचीला, शक्तिशाली व ब्रिटिश साम्राज्यवाद अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने में सहायक बनाया है।

यही समय है कि हम अपने दृढ़ निश्चय को पहचानें। सनातन धर्म के प्रति ख़ूब आस्था को पुनः इंगित करें। वह आस्था, वह श्रद्धा जो हमारे रक्त और हमारी हड्डियों में समाई हुई है। हमारे वेदों, शास्त्रों, सद्गुरुओं व कर्मकांडों ने हमारे चित्तों में एक अखंड ज्योति का एक बीजारोपण किया है जो कितनी भी क्षीण हो गई हो, पर बुझाई ना जा सकी। वह ज्योति जो हर बार गिरने के बाद हमें फिर संभलकर खड़ा होने को उद्यत करती है।

तो राम जन्मभूमि स्थल की विशेषता क्या है ? 

राम जन्मभूमि, राम का जन्मस्थान होने के अतिरिक्त सामूहिक हिन्दू स्मृति व चेतना में एक पवित्रतम  स्थान है, जो कभी मरा नहीं और आज जिसने दर्शा दिया वह स्थान कभी मिटाया नहीं जा सकता। हमें मूर्तिपूजक कह कर हमारा उपहास करने वाले मतांधों को भी हिन्दुओं ने दिखा दिया कि हम उस रिक्त स्थान के लिए भी कट मर सकते हैं। 

वह रिक्त स्थान हर हिन्दू हृदय में एक विशेष कोना बन गया। राम जन्मभूमि का मुक़दमा कदाचित इतिहास में सबसे दीर्घकालीन मामलों में से एक होगा। 

परंतु यह एक और कारण के चलते बहुत महत्वपूर्ण है। राम जन्मभूमि का मामला एक आपराधिक नरसंहार का है जिसका एकमात्र लक्ष्य हिन्दुओं की धर्म व संस्कृति का समूल नाश था। लेकिन हिन्दूओं ने अपनी संस्कृति का नाश नहीं होने दिया। 

संसार के सबसे क्रूर व धनी हत्यारों व सबसे धूर्त वामपंथियों के चंगुल से राम जन्मभूमि को छुड़ाना ऐसे ही है जैसे मगरमच्छ के मुँह से उसका निवाला छीनना। हिन्दुओं ने अपनी सामूहिक चेतना व आग्रह के दम पर असम्भव को भी कर दिखाया है। 

पाकिस्तान में बसने वाले हिन्दू भी इसी सामूहिक चेतना का ज्वलंत उदाहरण हैं। मैंने जब भी पाक से विस्थापित हिन्दुओं से पूछा कि आप लोग अपना धर्म परिवर्तित क्यूँ नहीं करते, तो एक तीरथ राम मेघवाल सहजता से मेरी ओर देखकर बोला, “बाप-दादों का धर्म ऐसे कैसे छोड़ दें साहब?” 

आज मुझे तीरथ राम की बात समझ आई है कि क्यूँ हिन्दू धर्म सत्य सनातन है। आज समझ आया है कि जब तक आकाश में सूर्य उदय हो रहा है, सनातन हिन्दू धर्म जीवित रहेगा। आज समझ आया कि राम का ‘तत्व’ ही वह सत्य है जो काल की गति को पराजित कर पुनर्जीवित हो सकता है। राम का ‘तत्व’ ही वह शाश्वत धारा है जिसने हिन्दू समाज को विषम-से-विषम परिस्थिति में भी स्पंदित व जीवित रखा है, तथा सदैव रखेगी। 

जय श्री राम…

TMC के गुंडों ने भाजपा कार्यकर्ता को फाँसी पर लटकाया: 1 पाँच दिनों से ग़ायब, लिबरल मौन?

पश्चिम बंगाल से आए दिन राजनीतिक हिंसा की घटनाएँ सामने आती रहती हैं। एक बार फिर भाजपा ने सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) पर अपने एक कार्यकर्ता की हत्या का आरोप लगाया है। बंगाल भाजपा के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से किए गए एक ट्वीट के अनुसार राज्य के पश्चिम मेदिनीपुर ज़िले में भाजपा के आदिवासी कार्यकर्ता बरसा हांसदा की लाश मिली है। भाजपा का आरोप है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने हांसदा की हत्या की है।

पश्चिम मेदिनीपुर के एक आदिवासी भाजपा कार्यकर्ता बरसा हांसदा को TMC के गुंडों ने फाँसी पर लटका दिया।

अपने ट्वीट में भाजपा ने सवाल करते हुए लिखा कि TMC के पश्चिम बंगाल में इन क्रूर राजनीतिक हत्याओं पर लिबरल्स अब तक चुप क्यों हैं? अगर यह भाजपा शासित राज्य होता तो क्या वे तब भी इतने चुप रहते?

इसके अलावा, पश्चिम बंगाल के कूच बिहार ज़िले के तूफ़ानगंज में पाँच दिन से एक भाजपा कार्यकर्ता ग़ायब है। इस मामले  में भाजपा ने विरोधियों पर राजनैतिक षणयंत्र रचने का आरोप लगाया है। ग़ायब कार्यकर्ता का नाम छबर शेख है और वो पेशे से एक कारपेंटर है। छबर के ग़ायब होने की लिखित शिक़ायत तूफ़ानगंज थाने में दर्ज है।

ख़बर के अनुसार, 48 वर्षीय छबर पाँच दिन पहले कूच बिहार में काम करने गए थे, लेकिन उसके बाद से घर वापस नहीं लौटे। घर न लौटने पर परिजनों ने उनकी तलाश शुरू की। काफ़ी ढूँढ़ने के बाद जब उनका कुछ नहीं पता चला, तो उनके परिजनों ने तूफ़ानगंज थाने में लिखित शिक़ायत दर्ज करवाई।

इस मामले पर कूचबिहार के अल्पसंख्यक मोर्चे के भाजपा नेता एनामुल हक़ ने बताया कि लोकसभा चुनाव के बाद हमारे एक कार्यकर्ता आनंद पाल की हत्या हो गई थी। उसकी हत्या की गुत्थी पुलिस अब तक नहीं सुलझा पाई है। आज फिर से हमारा एक कार्यकर्ता पिछले पाँच दिन से ग़ायब है। पुलिस थाने में लिखित शिक़ायत भी कर दी गई है। यह पूरी तरह से एक राजनीतिक साज़िश है और अगर 2-3 दिन में हमारे लापता भाजपा कार्यकर्ता को अगर नहीं ढूँढा गया तो अल्पसंख्यक मोर्चा मारूगंज ग्राम पंचायत इलाक़े में और बड़ा आंदोलन करेगी।

…जरूरत पड़े तो शेहला राशिद को गिरफ्तार करो, कोर्ट ने दिया आदेश: भारतीय सेना को किया था बदनाम

समय-समय पर कश्मीर की आज़ादी का राग अलापने वाली जेएनयू की शेहला रशीद द्वारा भारतीय सेना के ख़िलाफ़ ट्वीट करने के मामले में शुक्रवार (15 नवंबर) को हुई सुनवाई में दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली पुलिस (Delhi Police) को शेहला राशिद को गिरफ़्तार करने की स्थिति में 10 दिन पूर्व गिरफ़्तारी नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। दरअसल, दिल्ली की अदालत ने आरोपित शेहला राशिद की अग्रिम ज़मानत याचिका पर यह फै़सला दिया है।

शेहला हाल ही में कश्मीर को लेकर सनसनीखेज दावें कर सुर्खियों में आई थीं, जब उन्होंने कहा था कि आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद सेना लोगों को प्रताड़ित कर रही है। इस मामले को लेकर उनके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मुक़दमा किया गया था। इसके अलावा, उन्होंने कश्मीर की चुनावी राजनीति से अलग रहने का ऐलान भी किया था।

उन्होंने यह घोषणा ऐसे वक़्त में की थी जब जम्मू-कश्मीर में बीडीसी यानी ब्लॉक डेवलपमेंट कौंसिल के चुनाव होने थे। राजनीति से तौबा करने का दोष भी उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार पर ही मढ़ा। उन्होंने कहा था कि कश्मीर में जो कुछ हो रहा है उसे वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहीं, इसलिए चुनावी राजनीति से दूर रहने का फ़ैसला किया है। इसकी जानकारी उन्होंने ट्वीट कर दी थी।

ग़ौरतलब है कि शेहला ने इस साल की शुरुआत में पूर्व आईएएस और जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट (जेकेपीएम) के नेता शाह फैसल की पार्टी भी ज्वाइन की थी। लेकिन, केंद्र सरकार ने 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया। इसके बाद से आतंकवाद की दुकान बंद होने के गम में देशभर के वामपंथी गिरोह ने तमाम तरीकों से छाती कूटकर कर अपना गुस्सा ज़ाहिर किया।

INX मीडिया स्कैम में चिदंबरम को झटका: दिल्ली हाईकोर्ट ने नहीं दी जमानत, जेल में ही रहना होगा

कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम को INX मीडिया मामले में दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। उन्हें अभी जेल में ही रहना होगा। बता दें कि पी चिदंबरम इस समय आईएनएक्स मीडिया केस से जुड़े ईडी मामले में तिहाड़ जेल में बंद हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि पी चिदंबरम के खिलाफ आरोप बेहद गंभीर हैं और इसमें आरोपित की भूमिका काफी सक्रिय रही है। कोर्ट का कहना था कि अगर इस परिस्थिति में चिदंबरम को जमानत दी जाती है, तो यह जनहित के खिलाफ होगा। इसलिए जनहित को ध्यान में रखते हुए जमानत अर्जी को खारिज किया जाता है।

बता दें कि इससे पहले न्यायमूर्ति सुरेश कैत ने चिदंबरम और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की दलीलें सुनने के बाद जमानत याचिका पर आठ नवंबर को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। चिदंबरम ने कोर्ट के सामने यह कहते हुए जमानत का अनुरोध किया था कि साक्ष्य दस्तावेजी प्रकृति के हैं और ये जाँच एजेंसियों के पास हैं। इसलिए, वह उनमें छेड़छाड़ नहीं कर सकते। वहीं, ईडी ने जमानत याचिका का जोरदार विरोध करते हुए दलील दी थी कि वह गवाहों को प्रभावित करने तथा धमकी देने की कोशिश कर सकते हैं।

उच्च न्यायालय ने एक नवंबर को चिदंबरम की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए तिहाड़ जेल अधीक्षक को उन्हें स्वच्छ वातावरण और स्वच्छ पेयजल, घर में पकाया गया भोजन, मच्छरदानी और मच्छर भगाने वाली मशीन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। ईडी ने चिदंबरम  को 16 अक्टूबर को गिरफ्तार किया था। उन्हें सीबीआई ने आईएनएक्स मीडिया भ्रष्टाचार मामले में 21 अगस्त को गिरफ्तार किया था।

उल्लेखनीय है कि पूर्व मंत्री पी चिदंबरम वित्त मंत्री रहने के दौरान रिश्वत लेकर INX मीडिया को विदेशी निवेश की स्वीकृति देने के मामले में आरोपित हैं। उनके खिलाफ सीबीआई और ईडी दोनों की अलग-अलग जाँचें चल रहीं हैं, जिनमें चिदंबरम की कस्टडी दोनों एजेंसियों के बीच रोटेट हो रही है।

‘ओवैसी से नफरत फैलती है, उनका बयान मुस्लिमों को देश में अलग-थलग करने की साजिश’

उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने अयोध्या मामले पर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के बयान को निशाने पर लेते हुए साफ कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में मुस्लिम पक्ष को जो जमीन दिए जाने का आदेश दिया है उस जमीन पर मस्जिद ही बनाई जाएगी। उन्होंने ओवैसी के बयान को किनारा करते हुए कहा कि उस जमीन पर मदरसा कॉलेज या अस्पताल नहीं बनाया जा सकता है।

वसीम रिजवी ने कहा कि ओवैसी जैसे नेता समाज में नफरत फैलाने का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि राम मंदिर फैसले पर मुस्लिम पक्ष को जो 5 एकड़ की जमीन दी गई है वह मस्जिद के लिए दी गई है। उस पर मदरसा, कॉलेज या अस्पताल नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने ओवैसी के बयान पर तंज कसते हुए कहा कि सिर्फ मुस्लिमों में नफरत पैदा करने के लिए इस तरीके के बयान दिए जा रहे हैं कि खैरात नहीं ली जा सकती और हिंदुओं का पैसा मस्जिद में नहीं लग सकता है। 

वसीम रिजवी ने कहा कि ओवैसी और उनके जैसे लोगों को वक्फ संपत्ति के मामलों में बोलने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि तमाम मुस्लिम जो हिंदुस्तान में कारोबार कर रहे हैं वह सिर्फ मुस्लिमों के साथ नहीं, बल्कि हर धर्म के लोगों के साथ कारोबार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ओवैसी जैसे नेताओं के ऐसे बयानों का ध्येय सिर्फ नफरत को बढ़ावा देना और देश के मुस्लिमों को इस देश में अलग-थलग करने की साजिश है।

गौरतलब है कि वसीम रिजवी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए 51 हजार रुपए देने की घोषणा की है। गुरुवार (नवंबर 14, 2019) को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में रिजवी ने कहा कि बोर्ड ने मंदिर का समर्थन किया है। उन्होंने इसे सर्वश्रेष्ठ फैसला करार देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, वही एक अकेला रास्ता था जिससे यह मामला सुलझ सकता था।

उन्होंने कहा कि इमामे हिंद, भगवान श्रीराम, जो हम सभी मुस्लिमों के भी पूर्वज हैं, उनके राम मंदिर निर्माण के लिए वसीम रिजवी फिल्मस 51 हजार रुपए की भेंट राम जन्म भूमि न्यास को दे रही है। साथ ही उन्होंने अपने बयान में कहा कि भविष्य में जब भी राम मंदिर का निर्माण होगा, शिया वक्फ बोर्ड की तरफ से उसमें भी मदद की जाएगी। बता दें कि रिजवी इससे पहले मंदिर निर्माण के लिए 10 हजार रुपए दान कर चुके हैं।