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महिला कमिश्नर (IAS) ने झुक कर छुआ कमलनाथ के मंत्री का पैर, हो गया Video Viral

मध्य प्रदेश के देवास जिले से एक वीडियो आया है। एकदम वायरल हो गया है। कारण है कमलनाथ सरकार में लोकनिर्माण मंत्री सज्जन सिंह वर्मा का इस वीडियो में होना। लेकिन इतना काफी नहीं होता। वीडियो वायरल हुआ है क्योंकि एक महिला ऑफिसर भीड़ के बीच में झुक कर मंत्री साहब के पाँव छूते नजर आ रही हैं। इस वीडियो को भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष विजेश लूनावत ने भी ट्वीट किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस वीडियो में नजर आ रही महिला ऑफिसर का नाम संजना जैन है। यह ऑफिसर देवास में नगर निगम कमिश्नर के पद पर तैनात है। मंगलवार को गुरुनानक जयन्ती के अवसर पर जिले के एक गुरुद्वारे में धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन था। जिसमें कमलनाथ मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने भी शिरकत की। लेकिन तभी वहाँ मौजूद नगर निगम की आयुक्त संजना जैन उनके पास पहुँची और उन्होंने कमलनाथ मंत्री का पैर छूकर आशीर्वाद लिया।

इस वाकये का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा है। तो भाजपा ने कॉन्ग्रेस को आड़े हाथों लिया है। भाजपा के सांसद महेंन्द्र सिंह सोलंकी ने कमलनाथ सरकार पर निशाना साधते हुए अधिकारियों को नेताओं की शरण में बताया है और साथ ही महिला ऑफिसर द्वारा मंत्री का पाँव छूना नियम के ख़िलाफ़ बताया है। उन्होंने इसके लिए उचित कार्रवाई की बात की है।

वहीं, भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष विजेश लूनावत ने भी इस को वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा, “ये है नया मध्य प्रदेश, अफसरशाही मंत्री जी के चरणों में… देवास की नगर निगम कमिश्नर सुश्री संजना जैन मध्य प्रदेश के मंत्री सज्जन सिंह वर्मा की चरण वंदना करती हुई।”

हालाँकि, मध्य प्रदेश में प्रशासन व्यवस्था को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं, लेकिन किसी ऑफिसर द्वारा सार्वजनिक स्थान पर इस तरह की मंत्री के पाँव पड़ना, न केवल एक शर्मनाक घटना है बल्कि उस पद की भी तौहीन है, जिस पर वह नियुक्त हैं।

खुद सोशल मीडिया यूजर्स इस वीडियो को देखने के बाद अपनी तरह-तरह की प्रतिक्रिया देते नजर आ रहे हैं। यूजर्स का मानना है कि कॉन्ग्रेस के आने के वहाँ प्रशासन में बहुत तेजी से बदलाव आया है। क्योंकि यही वो महिला ऑफिसर हैं, जिन्होंने कुछ साल पहले देवास के युवराज और शिवराज सरकार के मंत्री तुकोजीराव पंवार को ऐसी अफसरी दिखाई थी कि हड़कंप मच गया था, लेकिन आज ये पाँव पड़ती नजर आ रही हैं।

जब पत्रकार निष्पक्षता का चोला ओढ़े वही काम करते हैं जैसे पाक सेना के लिए वहाँ के आतंकी

पत्रकारिता के बारे में ‘टीवी मत देखा कीजिए’, जिसका मतलब है कि सिर्फ मेरा प्राइम टाइम देखा कीजिए’ से ले कर चाय में बिस्कुट के टूट कर गिर जाने पर ‘यही तो आपातकाल है ब्रो’ कहने की बातें कॉन्ग्रेस के सत्ता से बाहर जाने पर पिछले पाँच सालों से खूब हो रही हैं। एक घंटे की एंकरिंग के बाद, फेसबुक पर पोस्ट के जरिए, या अपने गिरोह के लोगों के घर जा कर इंटरव्यू देते हुए, बार-बार ‘स्वतंत्रता का हनन’ और ‘आवाजों को दबाया जा रहा है’ जैसी बातें कहने वाले बहुतेरे लोग हैं, जो स्वयं को पत्रकार बताते हैं। इनके समर्थक इन्हें पत्रकार ही नहीं, ‘निष्पक्ष पत्रकार’ कहते हैं।

पत्रकारिता की दुनिया में एक और ब्रीड है जो स्वयं को ‘स्वतंत्र पत्रकार’ तो कहती है, लेकिन वाकई में परतंत्र है। ऐसे लोगों को तमाम अखबारों या चैनलों पर ‘स्वतंत्र पत्रकार’ के टैग के साथ एक खास पक्ष की वकालत करते देखा जा सकता है। ऐसे लोग आपको वायर, क्विंट, स्क्रॉल, एनडीटीवी से ले कर हर बड़े संस्थान में प्रोपेगेंडा ठेलते नजर आ जाएँगे।

ऐसे दोनों ही तरह के लोगों को पैसे देने के लिए दो तरह के संस्थान होते हैं। जैसे कि कॉन्ग्रेस का मुखपत्र नेशनल हेरल्ड है, जहाँ अगर कुछ छपता है तो आम आदमी जानता है कि ये तो कॉन्ग्रेस के ही पक्ष में लिखेगा। यहाँ कोई धोखा नहीं होता। यहाँ पता है कि इस वोबसाइट यह बताया जाएगा कि जीडीपी ऊपर जाने से गरीबों के पेट में भोजन नहीं पहुँचता, लेकिन वो नीचे जाए तो देश के आर्थिक स्वास्थ्यका एकमात्र परिचायक वही हो जाता है। यहाँ आपको कॉन्ग्रेस राज को छोड़ कर बाकी किसी भी राज्य या केन्द्र की एक भी योजना सही परिणाम लाती नहीं दिखती।

जैसे कि भाजपा ने पुल बनवाया तो कहेंगे कि नाव वालों के पेट पर लात मार दी! मोदी शासन में अगर चंद्रयान छोड़ा गया तो जमीन पर भात-दाल खाते गरीब की फोटो साथ में लगा देंगे। मोदी की गंगा आरती दिखावा हो जाएगी, लेकिन चुनावों के समय राहुल गाँधी के पैर के अंगूठे से टीक तक जनेऊ पहना दिया जाए, तो ये भाजपा के राजनीति का जवाब है, वरना ‘हम तो ये सब आज तक घर में ही करते थे’। अगर आपने ज्यादा पूछा तो हो सकता है कि एनडीटीवी वाले आपको थाईलैंड में राहुल गाँधी को सड़क किनारे, कान पर जनेऊ चढ़ा कर, लघुशंका करती तस्वीर दिखा देते।

जब बात नेशनल हेरल्ड से एनडीटीवी तक आ गई है, तो मकसद यही है कि नेशनल हेरल्ड की ईमानदारी तो ये है कि उनके मालिक कॉन्ग्रेस वाले हैं, तो वो उनका गुणगान ही करेंगे, लेकिन एनडीटीवी जैसी संस्थाएँ या आकार पटेल, सुजाता आनंदन जैसे लोग स्वतंत्र पत्रकार का तमगा सर पर चिपकाए, वही काम कर रहे हैं, पर उनकी कथित निष्पक्षता बरकरार रहती है।

जो व्यक्ति यदा-कदा ऐसे लोगों को देखता या पढ़ता है, उसे तो यही लगेगा कि ये निष्पक्ष व्यक्ति है, लेकिन वो काम तो कॉन्ग्रेस का कर रहा है। ऐसे लोगों में मृणाल पांडे जैसे लोग भी आते हैं जो हर बात पर यह विश्वास दिलाने में लगे रहते हैं कि भारत में तो आग लग गई है, सब कुछ बर्बाद हो गया है। ऐसे कई लोग हैं जो ट्विटर पर एक गिरोह के रूप में दिखते हैं, जिनकी मंशा यह बताने की होती है कि वो निष्पक्ष हैं, और निष्पक्ष विचार रख रहे हैं।

ये कुछ ऐसा ही है जैसे कि पैरोडी राष्ट्र पाकिस्तान में आंतकी को सेना ने पैसे देने शुरु किए कि जाओ बेटा, कश्मीर जाना और फट जाना। उनका टार्गेट भारत है। यहाँ सेना का काम सीमाओं को सुरक्षित रखना है, न कि दूसरे के सीमा में जा कर बम फोड़ना या आतंकी वारदातें करना। लेकिन वो कुछ आतंकियों को पाल लेते हैं ताकि उनके मतलब के काम तो वो करें, लेकिन उनका नाम न जाए।

उसी तरह, ये जो कुछ कथित ‘स्वतंत्र पत्रकार’ हैं, वो एक ऐसी ग़ैरज़िम्मेदार मीडिया के लिए लेख लिखते हैं, शो करते हैं, जो कहती तो ये है कि ‘हम तो निष्पक्ष मीडिया हैं’, बाक़ायदा, डिस्क्लेमर भी लगा देती है कि ये विचार लेखक के निजी हैं, और फलानी टीवी इसकी ज़िम्मेदारी नहीं लेती, लेकिन ये काम वो योजनाबद्ध तरीके से, ज़िम्मेदारी के साथ करते हैं। अब कोई यह बता दे कि वो एनडीटीवी की साइट है कि सरकारी पेशाबखाना कि जिसको मन आया यूरिनल छोड़ के हर जगह मूत्र विसर्जन करके चला गया!

हो तो वही रहा है और ये ‘डिस्क्लेमर’ बड़ी ही खूबसूरती से एनडीटीवी जैसों को नेशनल हेरल्ड से तकनीकी तौर पर अलग बना देता है। काम इनका भारत में बम फोड़ने जैसा ही है, भेज इनको पाकिस्तानी सेना ही रही है, लेकिन ‘स्वतंत्र पत्रकार’ और ‘ये उनके निजी विचार हैं’ के नाम पर, धमाका भी हो जाता है, और विश्व समुदाय में ऐसे मीडिया वाले गर्दन तान कर यह कहते हैं कि उनके शरीर पर हमारी वर्दी कहाँ है, वो तो निजी स्तर पर लेखन कर रहे हैं।

NDTV के सीनियर एडिटर हैं, लोकिन उनके लेखों के लिए संस्थान उत्तरदायी नहीं है!

पाकिस्तानी सेना ‘स्टेट एक्टर’ है, यानी कि सत्ता के अधीन और उसकी इच्छाओं के हिसाब से कार्य करने वाली संस्था। (ये बात और है कि वस्तुस्थिति इसके उलट यह है कि सत्ता पाकिस्तानी सेना के हिसाब से काम करती है।) उसके बाद, पाकिस्तानी सरकार के पास ‘अच्छे आतंकी’ हैं, जो उनकी इच्छा को फलित करने में सेना के आदेशानुसार उन आतंकी वारदातों को अंजाम देती है जो सेना स्वयं खुल्लमखुल्ला नहीं कर सकती। आतंकी ‘नॉन-स्टेट एक्टर’ हैं, यानी वैसे लोग जिन्हें ‘कथित तौर पर’ सत्ता के साथ नहीं होना चाहिए, लेकिन वो भी इनके कुत्सित मंशा को पूरा करने के लिए काम करते हैं। वैसे ही एनडीटीवी जैसों के पास ‘निष्पक्ष’ पत्रकार हैं जो ‘निजी राय’ के नाम पर कॉन्ग्रेस के लिए भाजपा-विरोधी अजेंडा चलाते हैं, क्योंकि वो खुल कर कॉन्ग्रेस का मुखपत्र नहीं बन सकते।

निष्पक्ष मीडिया एक मिथक है

आज के दौर में मीडिया से ले कर समाज तक, वामपंथी मीडिया की गोएबेलियन नीति और नैरेटिव बनाने के तरीकों के कारण, एक सहज घृणा दिखाती हुई, दो हिस्सों में बँट गई है, वहाँ से निष्पक्षता का लोप हो चुका है। आज समाज के साथ-साथ, मीडिया में भी एक धड़े को मोदी सरकार की हर नीति में, हर उपलब्धि में, हर योजना में असफलता या खामियाँ ही दिखती हैं। उनका एकसूत्री अजेंडा है सत्ता में बैठी भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना के नाम पर घृणा परोसना।

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि वर्षों से कॉन्ग्रेस के टुकड़ों पर पलने वाले लोगों के हाथ से नियंत्रण चला गया। अब इन पत्रकारों को लोग संदेह से देखते हैं कि ये पत्रकार है या कॉन्ग्रेस का चरणचुंबन करने वाला व्यक्ति। इससे हुआ यह है कि लोग आज भी रवीश कुमार के, ‘द वायर’ के, ‘क्विंट’, ‘बीबीसी’, ‘स्क्रॉल’ आदि के लेखों पर कमेंट तो ज़रूर करते हैं लेकिन उन टिप्पणियों में तीन-चौथाई लोग बस उन्हें धिक्कारते दिखते हैं।

आप इन सबको ट्रोल नहीं कह सकते। इन लोगों ने सत्य को पहचान लिया है, इन्होंने मुखौटे नोचने शुरू कर दिए हैं। ऐसे लोगों को ट्रोल कह कर खारिज करना इन अजेंडाबाजों की मजबूरी है क्योंकि ये अपने आप को बेकार तो मानेंगे नहीं।

लोग कहते हैं कि एक हिस्सा अगर मोदी की हर बात की आलोचना (वस्तुतः घृणा) करता है, तो दूसरा हिस्सा भी तो मोदी का गुणगान ही कर रहा है। ये बात कुछ हद तक सही है लेकिन इसके कारण क्या हैं? कारण यह है कि दूसरा हिस्सा पुराने नैरेटिव को चुनौती दे रहा है, उसे संतुलित करना चाह रहा है। अगर दूसरा हिस्सा संतुलन बनाने के लिए मोदी की नीतियों पर चर्चा न करे, उसकी योजनाओं को लाभार्थियों की कहानी न दिखाए, हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग पर बात न करे, तो ये वामपंथी गिरोह भारत की छवि ऐसी बना देगा जहाँ न तो सड़कें हैं, न अर्थव्यवस्था ठीक है, न इलाज मिल रहा है, कथित अल्पसंख्यकों को हिन्दू तलवार ले कर दौड़ा रहे हैं…

जिस दिन पहला धड़ा अपनी जिम्मेदारी समझ कर, उचित-अनुचित को तथ्यों के हिसाब से दिखाएगा, जहाँ प्रशंसा करनी हो वहाँ प्रशंसा करेगा, आलोचना योग्य बातों पर आलोचना करेगा, तो दूसरा धड़ा भी अपना काम सही तरीके से करने लगेगा।

लेकिन, जब तक कुछ लोग और संस्थान, व्यक्ति या पार्टी को निशाने पर ले कर, निष्पक्षता का चोला ओढ़े, स्वतंत्र पत्रकारों की सहायता से यहाँ-वहाँ कॉन्ग्रेस की अजेंडा बेचते रहेंगे, तब तक विचारधाराओं की यह लड़ाई जारी रहेगी क्योंकि पाकिस्तान कितना भी बड़ा हो जाए, कितने भी आतंकी पाल ले, एक्सपोज वो स्वयं हो रहा है।

वैसे ही, चाहे जितने बड़े नामों से प्रोपेगेंडा लिखवाया जाए, चाहे कॉन्ग्रेस के आधिकारिक मुखपत्र कॉन्ग्रेस का अजेंडा ठेलें, या ‘वानाबी मुखपत्र’ अपनी चाटुकारिता दर्ज करने को छटपटाता रहे, लोगों को इन सारे पत्रकारों और मीडिया की नग्नता का अहसास हो रहा है। ये सारे लोग खुद को सार्वजिनक तौर पर ज़लील कर रहे हैं। कुत्ते की पूँछ भले ही सीधी न हो, लेकिन एक दिन हर कुत्ता मरता तो है ही।

सरकार बनाओ नहीं तो अस्तित्व ख़त्म: अपने दम पर जीते ‘आक्रामक’ कॉन्ग्रेसी विधायकों की सोनिया को दो टूक

महाराष्ट्र में सरकार बनाने की कोशिश तो सभी दल कर रहे हैं लेकिन अब तक किसी ने भी राज्यपाल के सामने बहुमत के लिए ज़रूरी विधायकों का समर्थन पत्र नहीं सौंपा। इसके बाद राज्यपाल ने राज्य में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर दी। इसके साथ ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इसे मंजूरी दे दी। शिवसेना इस फ़ैसले को चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट पहुँच गई है। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार (नवंबर 13, 2019) को सुबह 10.30 बजे इस मामले को लिस्ट किया गया है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस और एनसीपी अब भी शिवसेना को समर्थन देकर सरकार बनाने की जुगत में लगे हैं। सभी दलों में अंदरूनी बैठकों का दौर जारी है।

कॉन्ग्रेस के कई नेताओं ने पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को कहा है कि अगर महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस सरकार में शामिल होने में विफल रहती है तो राज्य में पार्टी का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा। सोनिया गाँधी शिवसेना के साथ गठबंधन के पक्ष में नहीं हैं लेकिन कोर कमिटी की बैठक में नेताओं के इस रुख के बाद वो थोड़ी नरम पड़ी हैं। अशोक चव्हाण, पृथ्वीराज चव्हाण और बालासाहब थोराट ने सोनिया से कहा कि राजग गठबंधन में फूट पड़ी है और कॉन्ग्रेस को इसका फायदा उठाने में देर नहीं करना चाहिए। उनकी राय है कि भाजपा-शिवसेना के टकराव का पार्टी को पूरा का पूरा फायदा उठाना चाहिए।

इसमें से एक कारण ये भी बताया गया कि महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस के नव-निर्वाचित विधायक सरकार में शामिल होने के लिए बेचैन हैं। चूँकि उन विधायकों ने अपने बलबूते जीत दर्ज की है, ऐसे में वो आक्रामक हो उठे हैं। बता दें कि चुनावों के दौरान राहुल गाँधी ने काफ़ी कम रैली की थी और कॉन्ग्रेस ने सक्रियता भी नहीं दिखाई थी। कॉन्ग्रेस के सभी विधायकों को जयपुर के एक रिसोर्ट में ठहराया गया है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के दिग्गजों की राय का विरोध किया। एके एंटनी और शिवराज पाटिल- तीनों पूर्व केंद्रीय मंत्रियों ने कहा कि बाल ठाकरे और शिवसेना जिस तरह से कट्टर हिंदुत्व की राजनीति करती आई है, उनके साथ सरकार में शामिल होना सही नहीं होगा।

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस के प्रभारी केसी वेणुगोपाल ने कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन की विफलता की बात उठा कर बताया कि महाराष्ट्र में भी ऐसा ही कुछ हो सकता है। मंगलवार की सुबह एंटनी और वेणुगोपाल सोनिया से फिर मिले। महाराष्ट्र में अपने नेताओं के रुख को देखते हुए सोनिया को मजबूरन एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार से बात करनी पड़ी, ताकि गठबंधन सरकार की दिशा में योजना बनाई जा सके। हालाँकि, शरद पवार जल्दबाजी में नहीं हैं और उन्होंने कहा कि इस सम्बन्ध में पूरी तरह बातचीत कर के ही रूपरेखा तैयार की जाएगी। पवार से बात करने एक लिए तीन कॉन्ग्रेस नेताओं को मुंबई भेजने का फ़ैसला किया गया है।

उधर पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता नारायण राणे ने कहा है कि भाजपा जब भी राज्यपाल के पास जाएगी, बहुमत के लिए ज़रूरी विधायकों का समर्थन लेकर जाएगी। उन्होंने कहा कि उन्होंने सभी नेताओं को ‘काम पर लग जाने’ को कह दिया है। जब उनसे पूछा गया कि क्या शुवसेना और कॉन्ग्रेस के विधायक भाजपा के संपर्क में हैं, राणे ने कहा कि जब वो राज्यपाल के पास जाएँगे तो खाली हाथ नहीं जाएँगे।

‘शराब पीकर उत्पात मचाने वाला बंदर’ – शिव सेना ने सामना में कपिल सिब्बल के लिए यही कहा था

शिव सेना महाराष्ट्र में लगने जा रहे राष्ट्रपति शासन को चुनौती देगी। यही नहीं, मीडिया ख़बरों के अनुसार, शिवसेना की तरफ से अदालत में यह मामला वरिष्ठ वकील और कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल द्वारा पेश किया जाएगा

ऐसे में जब कपिल सिब्बल की शरण में शिव सेना पहुँच गई है तो याद करना ज़रूरी है कि इसी शिव सेना ने एक समय में कपिल सिब्बल को ‘शराब पीकर उत्पात मचाने वाला बंदर’ कहा था। वह भी ज़्यादा नहीं, महज़ 5 साल से कुछ समय पहले।

सामना के सम्पादकीय में सिब्बल को निशाने पर लेकर कहा गया था कि 16 मई (2014 के आम चुनावों के नतीजों का दिन) के बाद मानसिक रोगियों का इलाज किया जाएगा।

एक ट्विटर यूज़र ने तो इसे शिव सेना के गर्त का प्रतीक बता दया कि उसे कपिल सिब्बल की ज़रूरत आन पड़ी है।

शिव सेना भले ही कपिल सिब्बल के साथ अपना इतिहास भूल गई हो लेकिन लोगों को याद है। और वे मज़े लेकर उसे भी याद दिला रहे हैं।

दरअसल शिवसेना ने बहुमत सिद्ध करने के लिए राज्यपाल से तीन दिन का समय माँगा था, लेकिन राज्यपाल ने समय देने से इनकार कर दिया। पहले (भाजपा) और दूसरे (शिवसेना) सबसे बड़े दल के विफल हो जाने के बाद राज्यपाल ने नियमानुसार, तीसरे सबसे बड़े दल NCP को सरकार गठन के लिए आमंत्रित किया था।

शिवसेना, जिसने सोमवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपने नामित अरविंद सावंत को बाहर निकाला, उसे राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी और कॉन्ग्रेस से समर्थन के साथ सरकार बनाने की उम्मीद की थी। हालाँकि, आदित्य ठाकरे की अगुवाई में शिवसेना के नेताओं ने महाराष्ट्र के राज्यपाल से मुलाक़ात के बाद बताया कि कॉन्ग्रेस और NCP सरकार बनाने के लिए तैयार हैं, लेकिन NCP और कॉन्ग्रेस दोनों ने स्पष्ट किया कि उन्होंने शिवसेना को समर्थन दिए जाने के संबंध में कोई पत्र नहीं भेजा है। कॉन्ग्रेस द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में इस बात का उल्लेख भी किया गया कि पार्टी शरद पवार से बात कर रही थी, और उन्होंने शिवसेना के बारे में किसी तरह का कोई ज़िक्र नहीं किया।

राज्यपाल ने शिवसेना को सरकार बनाने और बहुमत सिद्ध करने के लिए सोमवार (11 नवंबर) को शाम 7.30 बजे तक का समय दिया था। इस पर, शिवसेना नेताओं ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात की और उन्हें सूचित किया कि वे सरकार बनाने के इच्छुक हैं, लेकिन बहुमत सिद्ध करने के लिए उन्हें अतिरिक्त दो दिनों की आवश्यकता है।

राज्यपाल को समर्थन से जुड़े अपेक्षित पत्र को न दिखा पाने की स्थिति में उन्होंने तीसरी सबसे बड़ी पार्टी NCP के प्रमुख शरद पवार को राज्य में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। इस पर भड़की शिव सेना अब सुप्रीम कोर्ट पहुँच रही है कपिल सिब्बल को लेकर।

चू#$या… 4 साल के बच्चे को यही गाली दी थी स्वरा भास्कर ने, अब बोली – ‘मैं तो मज़ाक कर रही थी’

स्वरा भास्कर ने अपने उस विवादित वीडियो को लेकर सफाई दी है जिसमें चार साल के एक बच्चे द्वारा उन्हें आंटी कहने की प्रतिक्रिया में स्वरा ने अभद्र भाषा (चू#$या) का उपयोग किया था। अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि उस शो में वह दरअसल फिल्म इंडस्ट्री के अपने शुरुआती दिनों का अनुभव साझा कर रही थीं।

स्वरा ने कहा, “मैं मुंबई में शूटिंग का अपना अनुभव शेयर कर रही थी। इस दौरान मैंने जो शब्द इस्तेमाल किए वह एडल्ट कॉमेडी है, मैंने यह शब्द एक एडल्ट मज़ाक के तौर पर उस वक़्त के अपने फ्रस्टेशन (कुंठा) को व्यक्त करने के लिए इस्तेमाल किए थे।”

बता दें कि स्वरा का एक बच्चे को गाली बकने का यह मामला ज्यादा पुराना नहीं है। कुछ ही दिनों पहले एक कॉमेडी शो ‘सन ऑफ़ अबीश‘ में स्वरा भास्कर ने खुद बताया था कि एक बच्चे के द्वारा उन्हें आंटी बोलने पर उन्होंने उसको चू#$या और कमीना कह दिया था। इस वीडियो के वायरल होने के बाद स्वरा भास्कर को काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था।

एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वरा ने इस मामले में अपनी सफाई पेश करते हुए कहा, “मुझे बच्चे पसंद हैं, उस शो को वास्तव में देखने वाले जानते होंगे कि मैं एकलौती ऐसी हूँ जो बच्चों की भलाई के लिए बात कर रही थी। मैं वास्तव में चाहती थी कि उस बच्चे को फिल्मों में एक ब्रेक मिले।” उन्होंने कहा कि शो का स्वरुप मजाकिया था, यही वजह है कि उन्होंने जो बात कही, उसका लहजा भी मज़ाक जैसा ही था।

बता दें कि इस भद्दे कमेन्ट के लिए स्वरा भास्कर के खिलाफ दिल्ली भाजपा के कार्यकर्ता आकाश जोशी ने राष्ट्रीय बाल आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। इस घटना को लेकर स्वरा भास्कर ने अब जाकर चुप्पी तोड़ी और अपने बचाव में कहा है कि वह तो मज़ाक था। जबकि स्वरा सोशल मीडिया यूजर्स के निशाने पर तभी आ गईं थीं जब उन्होंने चार साल के बच्चे को चू#$या और कमीना कहा था।

राष्ट्रपति शासन पर शिवसेना ने उड़ाया था BJP नेता का मजाक, पुत्र-मोह में आज खुद उड़ रही खिल्ली!

महाराष्ट्र सरकार में वित्त मंत्री रह चुके भाजपा नेता सुधीर मुनगंटीवार पर शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के माध्यम से निशाना साधा था। जबकि मुनगंटीवार ने सीएम पद के लिए शिवसेना द्वारा 50-50 फॉर्मूले पर अड़ जाने को लेकर महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लग सकने की सबसे बड़ी वजह बताया था। इसके बाद शिवसेना ने अपने मुखपत्र के ज़रिए उन पर निशाना साधा था। दरअसल सुधीर ने अपने एक बयान में कहा था कि यदि सात नवम्बर तक राज्य में किसी पार्टी की सरकार नहीं बनती है तो महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाएगा। उनके इस बयान पर शिवसेना ने कटाक्ष करते हुए सामना में पूछ लिया कि क्या राष्ट्रपति की मुहर उनके महाराष्ट्र वाले दफ्तर में रखी है? और इस लेख का शीर्षक क्या दिया? – ‘राष्ट्रपति तुम्हारी जेब में हैं क्या? महाराष्ट्र का अपमान’

यह लेख सिर्फ सामना का नहीं है। यह लेख है शिवसेना की मानसिकता का। वही राय जिसके कारण महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के एक साथ लड़ने के बावजूद भाजपा-शिवसेना में एक राय नहीं बन पाई। इस पर बोलते हुए मुनगंटीवार ने कहा था कि दोनों के मिलकर सरकार बनाने में सबसे बड़ा रोड़ा मुख्यमंत्री पद को लेकर शिवसेना की जिद है। अपने बयान में भाजपा नेता सुधीर ने कहा था, “तय समय सीमा के भीतर सरकार न नियुक्त होने पर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाएगा।” बता दें कि 8 नवम्बर को महाराष्ट्र सरकार का कार्यकाल पूरा हो गया, जिसके बावजूद सूबे में नई सरकार का गठन नहीं किया जा सका।

शिवसेना चाहती तो इसे राजनीतिक सलाह के तौर पर ले सकती थी, राज्य के नागरिकों को एक और चुनाव की ओर झोंकने से बच सकती थी लेकिन नहीं! सामना के जरिए आरोप लगाया कि भाजपा के नेता ने राष्ट्रपति शासन थोपने की धमकी दी है ठीक वैसे ही जैसे वह अन्य एजेंसियों का इस्तेमाल करती है। अपने मुखपत्र सामना में सम्पादकीय के ज़रिए हमला बोलकर शिवसेना ने इसे महाराष्ट्र का अपमान कहा है। सम्पादकीय में मुंगंटीवार के बयान के ज़रिए फडणवीस पर निशाना साधते हुए लिखा गया है – “विदा होती सरकार के बुझे हुए जुगनू रोज नए मजाक करके महाराष्ट्र को कठिनाई में डाल रहे हैं।”

अपने मुखपत्र में भाजपा से सवाल करते हुए शिवसेना ने कहा कि क्या राष्ट्रपति की सील भाजपा के महाराष्ट्र दफ्तर में रखी है। सामना ने अपने सम्पादकीय के अंत में लिखा, “राष्ट्रपति संविधान की सर्वोच्च संस्था हैं। वे व्यक्ति नहीं बल्कि देश हैं। देश किसी की जेब में नहीं है।”

दरअसल महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा को 105 सीटें मिलीं जबकि शिवसेना को 56 सीट। मगर देवेन्द्र फडणवीस की सरकार में साथ होने के बावजूद भी इस चुनाव के नतीजे आते-आते शिवसेना और भाजपा के बीच कड़वाहट बढ़ गई। और यह हुई शिवसेना के अड़ियल रवैये (राजनीति पर पुत्रमोह भारी पड़ी) के कारण।

2014 के मुकाबले इस चुनाव में 17 सीटें कम जीतने वाली भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बावजूद सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 145 के आँकड़े से दूर रही। शिवसेना ने नतीजों के एलान के बाद 50-50 प्लान की बात कही थी। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक शिवसेना ने आधे-टर्म (ढाई साल) के लिए उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने की शर्त रखी थी मगर दोनों पार्टियों की इस मुद्दे पर एक राय नहीं बनी।

हमसे किसी ने कहा ही नहीं: J&K से लेकर महाराष्ट्र-कर्नाटक तक ‘फूफा मोड’ में कॉन्ग्रेस

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कॉन्ग्रेस और उसके नेताओं का व्यवहार आजकल घर के उस ऐंठू जमाई जैसा हो गया है, जिन्हें हर बात में वीवीआईपी ट्रीटमेन्ट चाहिए। घर में चाहे शादी किसी को भी लगी हो, नए दूल्हे की तरह नाराजगी और पसंद-नापसंद का ध्यान उसी का रखा जाए, नई बहू की तरह लाड़-दुलार उन्हीं का हो- भले पूरे गाँव ही नहीं खानदान के सबसे लीचड़ और नाकारा व्यक्ति वही हों।

महाराष्ट्र का उदाहरण लीजिए। चारों मुख्य पार्टियों भाजपा, कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना में सबसे कम यानी केवल 44 विधायक उनके जीते हैं, और राज्यपाल के राष्ट्रपति शासन से पहले की मीटिंग में न बुलाने पर बिफ़र ऐसे रहे हैं मानो बैठक में होते तो दावा सीएम की दावेदारी का पेश कर देते!

अरे, अगर भाजपा की सरकार नहीं बन रही, क्योंकि 105 विधायकों के बाद भी भाजपा के पास संख्याबल नहीं है तो अगला निमंत्रण दूसरी सबसे बड़ी पार्टी शिव सेना (56 विधायक) या तीसरी एनसीपी (54) को दिया जाएगा, कि सीधे कॉन्ग्रेस से ही पूछ लिया जाएगा? और कॉन्ग्रेस को तो वैसे भी अभी मोलभाव में लगी शिव सेना और एनसीपी बाहरी समर्थन के लिए रखे हैं! यह तो वही बात हुई कि दूल्हा-दुल्हन अभी राजी हुए नहीं, और बारात में नागिन डांस करने वाले न्यौता न मिलने पर हुक्का-पानी बंद करा देने की धमकी दे रहे हैं!

ऐसे लॉजिक से तो कॉन्ग्रेस से भी पहले दो एमएलए वाली असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और एक विधायक वाली राज ठाकरे की मनसे से पूछा जाना चाहिए था। लेकिन क्या है कि ऐसे उलटे लॉजिक से लोकतंत्र चलता नहीं है।

अब यही हाल कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व कर्नाटक सीएम सिद्दरमैया का भी है। एचडी देवगौड़ा का आरोप कि उन्होंने मल्लिकार्जुन खड़गे के सीएम बनने के मौके पर टाँग मार दी, के जवाब में वे बताने लगे कि वे तो मीटिंग में मौजूद ही नहीं थे, कॉन्ग्रेस आलाकमान ने उनकी राय ही नहीं ली!

कोई बताए उन्हें कि ये बात तो ठीक है कि आपने खड़गे जी के मौके पर मट्ठा नहीं डाला, लेकिन इस बात की क्या नाराजगी कि आपसे पूछा क्यों नहीं गया! आप ही के नेतृत्व में चली सरकार के खिलाफ तो चुनाव केंद्रित था। आप ही के नेतृत्व में गई पार्टी को जनता ने नकार दिया। ऐसे में इस बात का भोंपा क्या काढ़ना कि आपसे किसी ने पूछा क्यों नहीं!

इसके पहले कॉन्ग्रेस जम्मू-कश्मीर के बीडीसी चुनावों का भी बहिष्कार यह कारण बताते हुए कर चुकी है कि चुनावों की तारीख उसके हिसाब से तय नहीं हुई है। पार्टी ने जम्मू-कश्मीर में 24 अक्टूबर को हुए स्थानीय चुनावों में न लड़ने का ऐलान किया था और राज्य में कॉन्ग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रविंदर शर्मा ने सरकार द्वारा चुनावों की तारीख की घोषणा एकतरफ़ा तरीके से थोपे जाने की भी बात उस समय कही थी।

अयोध्या पर फैसला सुनाने वाले 5 जज उस समय पैदा भी नहीं हुए थे, जब दायर हुआ था पहली बार मुकदमा

अयोध्या विवाद पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाने के बाद सीजेआई रंजन गोगोई समेत संवैधानिक पीठ के पाँचों न्यायधीशों का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। अब शायद ही कोई ऐसा शख्स हो जिसने इस फैसले का लंबे वक्त से इंतजार किया हो और वो आने वाले समय में इन पाँचों जजों के नाम को भूल पाए। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि दशकों पुराने इस विवाद पर संतोषजनक फैसला सुनाकर मामले को हमेशा के लिए सुलझाने वाले पाँचों न्यायधीशों का जन्म भी उस समय नहीं हुआ था, जब इस विवाद की शुरुआत हुई थी या ये मामला कोर्ट तक पहुँचा था।

साल 1950 में 16 जनवरी को फैजाबाद जिले के स्थानीय कोर्ट में पहली बार इस मामले पर मुकदमा दर्ज हुआ था। इसे दर्ज करने वाले शख्स का नाम गोपाल सिंह विशारद था। जिन्होंने रामलला की पूजा के अधिकार के लिए संरक्षण की गुहार लगाई गई थी। इसके बाद इस मामले में दूसरी याचिका 5 दिसंबर 1950 को रामचंद्र दास द्वारा दायर की गई थी। जिसे 18 सितंबर 1990 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था।

अब ऐसे में तारीखों के अनुरूप यदि पाँचों जजों की उम्र और इस मामले पर दायर हुए पहले मुकदमे की तिथि को देखा जाएगा, तो पता चलेगा कि ऐतिहासिक फैसला सुनाकर देश में अमन कायम करने वाले इन न्यायधीशों का जन्म भी उस समय नहीं हुआ था, जब इस पूरे मामले में पहली और दूसरी बार मुकदमा दायर हुआ।

दरअसल, सीजेआई रंजन गोगोई इन पाँचों न्यायधीशो में उम्र के लिहाज से सबसे बड़े हैं, जिनकी जन्मतिथि 18 नवंबर 1954 है। इसके बाद जस्टिस बोबड़े हैं, जिनका जन्म 24 अप्रैल 1956 को हुआ। वहीं जस्टिस भूषण की जन्म तारीख जुलाई 5, 1956 और जस्टिस नजीर की 5 जनवरी 1958 है, जबकि जस्टिस चंद्रचूड़ इन सब न्यायधीशों में सबसे कम उम्र के हैं, जिनकी जन्मतिथि नवंबर 11, 1959 है।

1989 में जिस समय इस मामले से संबधित मुकदमों को इलाहाबाद हाइकोर्ट स्थानांतरित किया गया था, उस समय ये पाँचों न्यायधीश वकालत की प्रैक्टिस कर रहे थे। पाँचों की नियुक्ति हाईकोर्ट में बतौर जज सन 2000 में या उसके बाद हुई थी, जबकि बाबरी विध्वंस 6 दिसंबर 1992 को हो चुका था।

‘5 एकड़ जमीन मिली तो बनवाएँगे स्कूल या अस्पताल’ – 14 कोस में जगह माँगने वाले इकबाल अंसारी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या मामले पर ऐतिहासिक फैसला सुनाए जाने के बाद बाबरी मस्जिद पक्षकार इकबाल अंसारी का बड़ा बयान आया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अंसारी ने मस्जिद के लिए मिलने वाली 5 एकड़ जमीन पर स्कूल या अस्पताल खोलने की बात कही है। उन्होंने कहा, “अगर सरकार हमें जमीन देती है तो हम वहाँ पर स्कूल या फिर अस्पताल बनवाएँगे।”

इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा है कि कोर्ट के फैसले के बाद हिंदू-मुस्लिम के बीच पैदा हुई नफरत खत्म हो गई हैं। इसलिए अब वे नहीं चाहते कि हिंदुस्तान में माहौल में बिगड़े।

न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, इकबाल अंसारी ने उनसे बातचीत में बताया कि उन्होंने पहले ही कहा था कि कोर्ट जो भी फैसला करेगी, वह उसका सम्मान करेंगे। उन्हें कोर्ट ने मस्जिद के लिए जमीन दी है। लेकिन कहाँ दी है, उन्हें ये नहीं मालूम।

उनके मुताबिक अगर जमीन पर विचार करने के लिए उन्हें बुलाया जाएगा तो वह इस पर अपनी रणनीति जरूर बताएँगे। इसके अलावा उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दोनों मजहबों के बीच नफरत जो पैदा हुई थी वो खत्म हो गई है। वह नहीं चाहते कि आगे किसी भी कारणवश दोनों समुदायों के बीच नफरत हो।

अंसारी ने कहा कि देश में मोदी और राज्य में योगी की सरकार है। इस बीच देश में अमन शांति रही है, वैसे ही आगे भी रहेगी। उनके अनुसार सरकार उन्हें कोर्ट के आदेशानुसार जमीन देती है तो वह उस पर स्कूल और हॉस्पिटल बनवाएँगे।

उन्होंने अपनी बातचीत में स्पष्ट कहा, “हम चाहते हैं कि इसमें अब कोई नया मोड़ ना आए। हिंदुस्तान में कोई अफरा-तफरी का माहौल ना हो। हम सरकार से माँग करेंगे कि हमें मदरसा बना कर दें।”

बता दें कि इससे पहले इकबाल अंसारी ही वह शख्स थे, जिन्होंने मुस्लिमों को दी जाने वाली जमीन पर माँग उठाई थी कि उन्हें उसी 67 एकड़ में जमीन चाहिए, जिसे 1991 में सरकार ने विवादित स्थल समेत अधिकृत किया था।

इस दौरान अंसारी ने कहा था, “अगर वे हमें जमीन देना चाहते हैं, तो हमें हमारी सुविधा के मुताबिक दी जानी चाहिए और वह 67 एकड़ अधिग्रहित जमीन में से ही होनी चाहिए। तब हम यह लेंगे, अन्यथा हम इस पेशकश को ठुकरा देंगे, क्योंकि लोग कह रहे हैं चौदह कोस से बाहर जाओ और वहाँ मस्जिद बनाओ, यह उचित नहीं है। “

कॉन्ग्रेस के खात्मे का समय आ गया है, यह देश से पहले पार्टी को तवज्जो देती है: AAP नेता

महाराष्ट्र में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी है। इस संबंध में राजभवन की तरफ से एक प्रेस-रिलीज भी जारी कर दी गई है। राज्यपाल ने कहा है कि चूँकि प्रदेश में संवैधिनक रूप से सरकार बनने के आसार नहीं है, लिहाजा राष्ट्रपति शासन लागू किया जाए।

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर कॉन्ग्रेस की शिथिलता पर आम आदमी पार्टी की नेता प्रति शर्मा मेनन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस के खात्मे का समय आ गया है। प्रीति शर्मा ने मंगलवार (नवंबर 12, 2019) को कहा कि कॉन्ग्रेस के लिए देश से पहले पार्टी आती है। कॉन्ग्रेस हमेशा ही देश से पहले पार्टी को तवज्जो देती है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस, बीजेपी को महाराष्ट्र ‘थाली में सजाकर’ दे रही है।

प्रीति ने कहा कि लोकसभा चुनाव के दौरान भी कॉन्ग्रेस ने क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करने से सख्ती से मना कर दिया और भाजपा को आसानी से जीत हासिल करने में मदद की। और अब वे भाजपा को महाराष्ट्र थाल में सजाकर दे रहे हैं। इनका ये रवैया जल्द ही इनका सफाया कर देगी। उन्होंने यह भी कहा कि महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस के विधायकों को राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार के साथ शामिल हो जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “यह सचमुच कॉन्ग्रेस के खात्मे का समय है।”

बता दें कि भाजपा, शिवसेना और एनसीपी- राज्य में तीनों सबसे बड़े दल सरकार गठन में असफल रहे। राज्यपाल ने पहले राज्य में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था। जब बीजेपी ने असमर्थता जताई तो फिर शिवसेना को आमंत्रित किया गया। शिवसेना भी इसमें असफल रही तो फिर राज्यपाल ने एनसीपी को भी सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया क्योंकि वो राज्य में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। मगर अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। एनसीपी नेताओं का कहना है कि कल से वे कॉन्ग्रेस के जवाब का इंतजार कर रहे हैं। मगर उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आ रही है।