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मामूली आदमी नहीं हैं सोनिया और राहुल गाँधी: कॉन्ग्रेस सांसदों का लोकसभा में हंगामा

संसद सत्र के दूसरे दिन मंगलवार (नवंबर 19, 2019) को गाँधी परिवार से स्पेशल प्रटेक्शन फोर्स (एसपीजी) सुरक्षा वापस लिए जाने के विरोध में कॉन्ग्रेस सदस्यों ने लोकसभा में जमकर हंगामा किया। लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा, “सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी सुरक्षा पाने वाले मामूली लोग नहीं हैं। वाजपेयी जी ने गाँधी परिवार को एसपीजी सुरक्षा दी थी। 1991 से अब तक एनडीए दो बार सत्ता में आई, लेकिन उनकी एसपीजी सुरक्षा कभी नहीं हटाई गई।”

लोकसभा में जब अधीर रंजन इस मसले को उठा रहे थे, तब लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने कहा कि ये मामला अभी लिस्ट में नहीं है। ऐसे में जब ये मामला लिस्ट में हो, तभी सदन में इस मसले को उठाएँ। इससे पहले सोमवार (नवंबर 18, 2019) को भी कॉन्ग्रेस नेता ने इस मसले को लोकसभा में उठाया था और गृह मंत्री से जवाब माँगा था। चौधरी ने गाँधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटाए जाने के गृह मंत्रालय के कदम पर लोकसभा में स्थगन नोटिस भी दिया था।

बता दें कि शीतकालीन सत्र के दूसरे दिन की कार्यवाही आरंभ होते ही कॉन्ग्रेस के सदस्य नारेबाजी करते हुए आसन के निकट पहुँच गए। इसके बाद डीएमके के सदस्य भी कॉन्ग्रेस के समर्थन में आसन के समीप पहुँच कर नारेबाजी करने लगे। कॉन्ग्रेस और डीएमके के सदस्यों ने ‘बदले की राजनीति बंद करो’, ‘एसपीजी के साथ राजनीति करना बंद करो’ और ‘वी वॉन्ट जस्टिस’ के नारे लगाए। इसके बाद कॉन्ग्रेस सांसदों ने सदन से वॉकआउट किया। 

उल्लेखनीय है कि हाल ही में सरकार ने कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी की एसपीजी सुरक्षा वापस ले ली थी। अब उन्हें जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है। अभी गाँधी परिवार की सुरक्षा में CRPF के जवान लगे हुए हैं। तीनों सदस्यों की सुरक्षा में कुल 6 कंपनियाँ तैनात हैं। यानी करीब 600 जवान, 24 घंटे सोनिया-राहुल-प्रियंका की सुरक्षा में तैनात रहेंगे।

पेशवा की ‘छबीली’: चीते का शिकार करने वाली वो वीरांगना जिसकी तलवारों से फिरंगी भी कॉंपे

ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ लड़ते-लड़ते अपनी वीरगाथा को अमर कर जाने वाली झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्मदिवस 19 नवंबर को होता है। वैसे तो लक्ष्मीबाई के विवाह के बाद उनके जीवन का हर पल एक क्रांति का विस्फोट करता है लेकिन उनके जीवन से जुड़े कुछ अन्य पहलू भी हैं, जो बताते हैं कि 1857 में अंग्रेजों को धूल चटाने वाली लक्ष्मीबाई की वीरता परिस्थितियों का फलितार्थ नहीं थी। अच्छे-अच्छे जाँबाजों को रणभूमि में धूल चटाना उनका जन्मजात कौशल था। वह पितृसत्ता द्वारा गढ़ी गई हर भ्रांतियों को तोड़कर आगे बढ़ीं और खुद को इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज करवा गईं।

19 नवंबर 1828 को बनारस में एक मराठा ब्राह्मण के घर में जन्मीं रानी लक्ष्मीबाई का नाम पहले मणिकर्णिका था। घरवाले दुलार में ‘मनु’ बुलाते थे। पेशवा ने उनके स्वभाव के कारण ‘छबीली’ नाम दिया था। रानी, बचपन से ही शस्त्रों के ज्ञान में धनी थी। घुड़सवारी से लकर तलवारबाजी उनके प्रिय खेल थे। 4 साल की उम्र में माँ भागीरथीबाई का साया खोने के बाद पिता मोरोपंत ने उनकी परवरिश की। पिता बिठूर के राजदरबार में थे इसलिए मनु का भी अधिकतर समय वहीं बीतता था। उम्र बढ़ने के साथ उनके भीतर अलग-अलग कौशल विकसित होने लगे, जैसे कोई योद्धा युद्धभूमि के लिए तैयार हो रहा हो। वे रंग रूप से जितनी आकर्षक थीं, उनके हाव-भाव भी उतने ही मन को लुभाने वाले थे।

बताया जाता है मनु का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर से सिर्फ़ इसलिए हुआ था, क्योंकि झाँसी के महाराज शिवराव भाऊ उनकी बहादुरी से स्तब्ध रह गए थे। दरअसल, उन्होंने मनु को चीते का शिकार करते देखा था, जिसके बाद वह मनु का तेज भूल नहीं पाए। कुछ दिन बाद वह पेशवा के महाराज से मिले और अपने बेटे गंगाधर राव के लिए मनु का हाथ माँगा। झाँसी के महाराज के मन में मनु को अपनी पुत्रवधु बनाने की इच्छा इतनी प्रबल थी पेशवा के आगे कई बार इस संबंध में निवेदन किया। 1842 में 14 साल की उम्र में मनु का विवाह गंगाधर राव से हुआ।

लक्ष्मीबाई, रानी ऑफ झॉंसी का अंश

शादी के बाद गंगाधर राव को एहसास हो गया कि उनका विवाह किसी साधारण महिला से नहीं हुआ है। रानी के युद्ध कौशल, बुद्धि, विवेक को परखते हुए उन्होंने मणिकर्णिका का नाम लक्ष्मीबाई रखा। अपने जीवन काल में राजा ने उन्हें केवल असीम प्रेम ही नहीं किया, बल्कि उनकी इच्छाओं और पसंद-नापसंद का ख्याल रखते हुए शस्त्र संचालन, पुस्तकें, प्रशासन में हिस्सेदारी की व्यवस्था भी सुनिश्चित की। कहा जाता है कि रानी के ससुराल वाले चाहते थे कि वे महल के भीतर रसोई आदि का काम सँभाले, लेकिन वह व्यवस्था में सुधार लाने में जुटी रहती थी। इसके कारण उनके दुश्मन बढ़ते ही जा रहे थे।

समय बीतने के साथ-साथ रानी लक्ष्मीबाई ने एक बच्चे को जन्म दिया, लेकिन दुर्भाग्यवश वह केवल 4 महीने जीवित रह पाया। यह वाकया राजा-रानी दोनों के जीवन में निराशा भर गया और राजा पुत्रवियोग में बीमार रहने लगे। लेकिन, जब उन्हें राज्य पर अंग्रेजों की कुदृष्टि का अंदाजा हुआ तो उन्होंने अपने चचेरे भाई का बच्चा गोद ले लिया, ताकि उनके बाद झाँसी के सिंहासन का उत्तराधिकारी सुनिश्चित हो सके। बच्चे को दामोदार राव नाम दिया गया। लेकिन महाराज की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उसे उनका उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और झाँसी को ब्रितानी राज्य में मिलाने का षड्यंत्र रचने लगे।

उस वक्त भारत में लॉर्ड डलहौजी वायसराय‍ था। जब रानी को पता लगा तो उन्होंने एक वकील की मदद से लंदन की अदालत में मुकदमा दायर किया, लेकिन ब्रितानियों ने रानी की याचिका खारिज कर दी। सन् 1854 के मार्च माह में अंग्रेजी हुकूमत ने रानी को महल छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन रानी ने दृढ़निश्चय किया कि वे अपने राज्य को नहीं छोड़ेंगी। यही वो समय था जब रानी लक्ष्मीबाई ने प्रण लिया कि वे अपने राज्य को फिरंगियों की हुकूमत से आजाद करवाकर दम लेंगी।

रानी लक्ष्मीबाई का साहस देखकर अंग्रेजों ने कई बार उनके प्रयासों को विफल करने का प्रयास किया। झाँसी के पड़ोसी राज्य ओरछा व दतिया भी झाँसी पर हमला करने लगे, लेकिन रानी ने उनके इरादों को नाकामयाब कर दिया। किंतु 1858 में ब्रिटिश सरकार ने झाँसी पर हमला कर उसको घेर लिया व उस पर कब्जा कर लिया, लेकिन रानी अपने प्रण पर अटल थीं। उन्होंने 14,000 बागियों की सेना तैयार की। योद्धा की भाँति पोशाक धारण की। पुत्र दामोदर को पीठ पर बाँधा और दोनों हाथों में तलवार लेकर युद्ध मैदान में आ उतरीं। घोड़े की लगाम को मुँह से पकड़े वे अपने सहयोगियों के साथ तात्या तोपे से मिलीं और ग्वालियर के लिए कूच किया।

देश के गद्दारों के कारण रानी को राह में फिर शत्रुओं का सामना करना पड़ा और फिर 29 साल की महानायिका ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया। 18 जून 1858 को युद्ध मैदान में अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गईं। आज उनके जीवन गाथा को शब्दों में सॅंजोए सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली थी’ हर बच्चे की जुबान पर है।

24 को रामलला को मिलेगी फैसले की कॉपी: सुब्रह्मण्यम स्वामी काशी में करेंगे ‘स्पॉट इन्वेस्टीगेशन’

राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी रामलला को 24 नवंबर को सौंपी जाएगी। रामलला विराजमान की तरफ से कानूनी लड़ाई लड़ने वाले वकीलों का एक दल अयोध्या पहुॅंच उन्हें आदेश की कॉपी देंगे और आशीर्वाद लेंगे। वहीं, भाजपा नेता संसद सुब्रह्मण्यम स्वामी 23 नवंबर को अयोध्या जाएँगे। स्वामी ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी है।

बताया जा रहा है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी वकीलों के दल का स्वागत करेंगे। कारेसवकपुरम में वकीलों का अभिनंदन किया जाएगा। वकीलों के इस दल में रामलला की पैरवी करने वाले सीनियर एडवोकेट के. परासरण और उनके परिवार के करीब 2 दर्जन सदस्य भी होंगे। वकीलों का यह दल रामलला का दर्शन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी परिसर के रिसीवर अयोध्या के कमिश्नर को सौंपेगा।

स्वामी ने अयोध्या यात्रा को लेकर जो ट्वीट किया है उसमें वाराणसी जाने की बात भी कही है। उन्होंने कहा है कि वह काशी विश्वनाथ मंदिर क्षेत्र में ‘स्पॉट इनवेस्टिगेशन’ के लिए आएँगे। भाजपा नेता ने बीते दिनों एक इंटरव्यू में कहा था, “हमें तीन मंदिर चाहिए। एक राम मंदिर, दूसरा कृष्ण जन्मस्थान मथुरा का कृष्ण मंदिर और तीसरा काशी विश्वनाथ। काशी विश्वनाथ और कृष्ण मंदिर के तो सबूत भरपूर हैं। ये (राम मंदिर) सबसे मुश्किल था।”

काशी विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र में मौजूद उपासना स्थल को लेकर भी लंबे समय से आवाज उठती रही है। राम जन्मभूमि पर फैसला आने के बाद स्वामी के वाराणसी आने और ‘स्पॉट इन्वेस्टिगेशन की बात लिखने से वाराणसी में भी सरगर्मी बढ़ गई है।

कॉन्ग्रेस 30 नवंबर को रामलीला मैदान में नहीं करेगी रैली, ‘भारत बचाने’ के लिए अभी समय नहीं

बेरोजगारी, आर्थिक मंदी और कृषि संकट को लेकर आगामी 30 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली कॉन्ग्रेस की रैली स्थगित कर दी गई है। कॉन्ग्रेस ने इसे ‘भारत बचाओ’ रैली का नाम दिया था। जानकारी के मुताबिक संसद के शीतकालीन सत्र के मद्देनजर रैली के आयोजन की तिथि आगे बढ़ाई गई है। 30 नवंबर को होने वाली यह रैली अब 14 दिसंबर को हो सकती है।

कॉन्ग्रेस ने देश के विभिन्न हिस्सों में आंदोलन करने की योजना बनाई थी। हालाँकि अयोध्या मामले का फैसला आने के कारण में कुछ राज्यों में पार्टी ने इस कार्यक्रम को थोड़ा आगे बढ़ा दिया था। पार्टी का कहना है कि उसने पिछले कुछ दिनों देश के अलग-अलग हिस्सों में मोदी सरकार की ‘विफलताओं’’ को उजागर करने के लिए विरोध प्रदर्शन किया। इससे पहले कॉन्ग्रेस महसचिवों, प्रदेश प्रभारियों, विभाग अध्यक्षों, प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के प्रमुखों और विधायक दल के नेताओं की बैठक में 30 नवम्बर की रैली करने का निर्णय हुआ था।

कॉन्ग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा था, “भारतीय जनता पार्टी ने भारत को मंदी व तालाबंदी की कगार पर ला खडा कर दिया है। इस पार्टी ने भारत को भुखमरी की तरफ धकेल दिया है और भारत को बेरोजगारी के कुएँ में धकेल दिया है। इस सरकार ने भारत की सम्प्रभुता, आर्थिक सबलता पर आक्रमण और हमला कर दिया है। इसलिए देश के हर जिले मे सोनिया गाँधी व राहुल गाँधी के आह्वान पर इसे लेकर एक व्यापक आंदोलन हमने किया। इस सारे आंदोलन का आगाज 30 नवंबर को ‘भारत बचाओ’ रैली के माध्यम से दिल्ली के रामलीला मैदान में होगा।”

उन्होंने कहा था, “सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के आह्वान पर 25 नवंबर तक हर जिले के अंदर और हर प्रांत के अंदर एक व्यापक आंदोलन का आगाज हमने किया था। 60 प्रतिशत मुल्क में यह आंदोलन संपूर्ण हो चुका है और आज की बैठक में निर्णय किया गया है कि 40 प्रतिशत जहाँ बचा है, वहाँ भी ये संपूर्ण हो जाएगा। 30 नवंबर को ‘भारत बचाओ’ रैली से यह आंदोलन समाप्त होगा।”

इस्लामी एक्सट्रेमिज़्म फ़ैलाने के ख़िलाफ़ ममता बनर्जी ने ओवैसी की ‘एटम बम’ पार्टी को दी चेतावनी

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार में पहली बार अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से बात करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यक अतिवाद के ख़िलाफ़ चेतावनी दी। उन्होंने कहा, “मैं देख रही हूँ कि यहाँ अल्पसंख्यकों में कुछ अतिवादी हैं, जिनकी जमीन हैदराबाद से जुड़ी है। ऐसे लोगों की बिलकुल भी मत सुनिए।” हालाँकि ममता बनर्जी ने अपना ये बयान बिना किसी पार्टी का नाम लिए दिया। लेकिन, राज्य में राजनैतिक चहल-पहल को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनका इशारा असद्दुदीन ओवैसी के इस्लामिक संगठन ऑल इंडिया मजलिस-ए इत्तेहादुल मुसल्लिमीन (AIMIM) की ओर था।

इस बैठक के बाद बंगाल मुख्यमंत्री ने कूचबिहार के मदन मोहन मंदिर की ओर प्रस्थान किया और राजबाड़ी मैदान में रासमेला जाने से पहले वहाँ पूजा-अर्चना की। यहाँ बता दें कि इस बार होने वाले चुनावों में कूचबिहार जिला ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए बहुत चिंता का विषय है। क्योंकि 1951 से यहाँ पर यहाँ की जनता या तो कॉन्ग्रेस को चुनती आई है, या फिर ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्ल़ॉक को। लेकिन 2014 में बड़ी मशक्कत से ममता बनर्जी ने इस जगह पर अपनी पैठ बनाकर जीत हासिल की थी। मगर, 2019 में भाजपा ने उनसे ये सीट छीन ली।इसलिए आगामी विधानसभा चुनावों में कूचबिहार क्षेत्र अगर ममता बनर्जी के हाथों से जाता है, तो ये उनके लिए एक बड़ी हार साबित हो सकती हैं। इसी कारण वे अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए उनके बीच पहुँची।

कूचबिहार में उन्होंने कहा, “मैं अपील करती हूँ टीएमसी नेताओं से कि भाजपा के ख़िलाफ़ चुनौती को स्वीकारें। हमारे कार्यकर्ता हमारी पार्टी की पूँजी हैं। मैं उन्हें नेताओं के नीचे काम करने को नहीं कहूँगी। वे उस झंडे के लिए काम करें जिसे उन्होंने पकड़ा है। अब पार्टी नेताओं को एक दूसरे के ख़िलाफ़ टिप्पणी करना समाप्त कर देना चाहिए। क्योंकि अगर ऐसा रहा, तो उनकी करनी का भुगतान पार्टी को करना पड़ेगा। मैं खुश हूँ कि तृणमूल विधायक, पार्षद एक टीम की तरह काम कर रहे हैं। लेकिन अगर ये पहले ऐसे रहते तो हम कभी सीट नहीं हारते।“

इस बैठक में हैरानी की बात ये हुई कि ममता बनर्जी ने नागरिक संशोधन बिल पर बात न करके मुस्लिम, बंगाली हिंदू और गोरखाओं पर बात की। जिसके संभवत: दो उद्देश्य हैं- एक हिंदुओं में भाजपा के प्रभाव को कम करना और दूसरा AIMIM द्वारा उनके मुस्लिम वोट बैंक को बाँटे जाने की कोशिश का विरोध करना।

गौरतलब है कि बंगाल में हिंदुओं और मुस्लिमों का वोट धीरे-धीरे ममता बनर्जी के हाथ से फिसलता जा रहा है। हिंदुओं के पास भाजपा का विकल्प है, जबकि मुस्लिमों के सामने ओवैसी की पार्टी आ गई हैं। इसके अलावा अभी बीते दिनों की घटनाओं को याद किया जाए तो समझ आएगा कि कैसे एक बड़ी तादाद में हिंदुओं ने ममता बनर्जी का ‘जय श्रीराम’ नारा लगाने वाले मामले में विरोध किया था। वहीं, बंगाल के मुस्लिमों में अपनी पैठ जमा रही AIMIM की ओर से भी चेतावनी दी गई थी,”ये सच है कि तादाद में कम हैं, लेकिन हमें छूना मत। हम ATOM BOMB हैं। दीदी! हमें आपकी दोस्ती भी कुबूल और आपकी दुश्मनी भी। आपको तय करना है कि आप हमें दोस्त समझते हो या फिर दुश्मन।”

महाराष्ट्र: शिवसेना ने कहा- सरकार बनाना हमारी जिम्मेदारी नहीं, कॉन्ग्रेस-एनसीपी ने बैठक टाली

महाराष्ट्र में जारी सियासी उठापठक के बीच ​सरकार बनाने की शिवसेना की उम्मीदें धूमिल होती जा रही है। 170 विधायकों का समर्थन होने का दावा करने वाले शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा है कि सरकार गठन की जिम्मेदारी ​उनकी पार्टी की नहीं है। वहीं, एनसीपी और कॉन्ग्रेस की मंगलवार को होने वाली बैठक भी टाल दी गई है। यह खबरें ऐसे वक्त में आई है जब कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को सीएम बनाने पर कॉन्ग्रेस और एनसीपी राजी हैं।

अटकलों का दौर तब शुरू हुआ जब सोमवार को एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने सोनिया गॉंधी से हुई मुलाकात के दौरान सरकार गठन पर चर्चा नहीं होने की बात कही। इससे पहले उन्होंने यह भी कहा था कि शिवसेना ने कॉन्ग्रेस-एनसीपी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। ऐसे में वे उसके साथ कैसे सरकार बना सकते हैं।

सोमवार (नवंबर 18, 2019) देर शाम पवार से मुलाकात के बाद संजय राउत ने कहा, “सरकार गठन हमारी जिम्मेदारी नहीं है। जिसकी यह जिम्मेदारी थी वे भाग खड़े हुए। बावजूद मुझे यकीन है कि जल्द हम सरकार बनाने में कामयाब रहेंगे।”

शरद पवार को लेकर संजय राउत ने कहा कि शरद पवार को समझने में कई जन्म लग जाएँगे। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें पवार पर किसी तरह का कोई संदेह नहीं है। संजय राउत ने आगे कहा कि वो किसानों के मसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे। ये मुलाकात शरद पवार की अगुवाई में ही होगी।

वहीं जब सोनिया गाँधी के साथ बैठक के बाद जब शरद पवार से राउत के 170 विधायकों के समर्थन के दावे के बारे में पूछा गया, तो पवार ने कहा, “मुझे इस 170 के आँकड़े के बारे में नहीं पता है। इस  बारे में आपको उनसे पूछना चाहिए था।”

बता दें कि सोनिया गाँधी से मुलाकात के बाद पवार ने कहा था, “सोनिया जी के साथ सरकार बनाने को लेकर कोई बात ही नहीं हुई। हमारी अपनी पार्टियों की बात हुई। चुनाव के दौरान कई पार्टियाँ हमारे साथ थीं, उनका भी ध्यान रखना होगा। किसी के साथ सरकार बनाने पर बात नहीं हुई। कॉन्ग्रेस-एनसीपी के अपने मुद्दों पर बात हुई। साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर कोई बात ही नहीं हुई है। कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना के नेताओं के बीच सामान्य मुलाकात हुई थी।”

इस मुलाकात के बाद कॉन्ग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट कर कहा, “शरद पवार ने सोमवार को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मुलाकात की और महाराष्ट्र के राजनीतिक हालात के बारे में उन्हें अवगत कराया। यह निर्णय लिया गया कि अगले एक या दो दिनों में एनसीपी और कॉन्ग्रेस के प्रतिनिधि दिल्ली में फिर मिलेंगे, जिसमें आगे के रणनीति के बारे में चर्चा होगी।” वहीं, एनसीपी प्रवक्ता नवाब मलिक ने बताया है कि कॉन्ग्रेस के साथ होने वाली बैठक इंदिरा गॉंधी की जयंती के कारण टाल दी गई है। अब बैठक बुधवार को होगी।

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राम जन्मभूमि पर छलका वामपंथियों का दर्द, माकपा ने कहा- सुप्रीम कोर्ट ने न्याय नहीं किया

राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की ज्यादातर तबकों में सराहना हो रही है। लेकिन, राष्ट्रीय राजनीति में हाशिए पर पहुॅंच चुके वामपंथियों को यह रास नहीं आ रहा है। माकपा पोलित ब्यूरो की दो दिवसीय बैठक में प्रस्ताव पास कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाया गया है। पोलित ब्यूरो का मानना है, ‘अयोध्या विवाद पर कोर्ट का फैसला आया है, न्याय नहीं।’

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक बैठक में अयोध्या और सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर चर्चा हुई। बैठक के बाद जारी बयान में अयोध्या पर कहा गया है कि फैसला एक पक्ष की भावनाओं और विश्वासों को केंद्र में रखकर दिया गया है। इस मामले में निर्णय भले आ गया है, लेकिन न्याय नहीं हुआ है।

पत्रकारों से बात करते हुए सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि कोर्ट का फैसला स्पष्ट रूप से कहता है कि 1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर असंवैधानिक रूप से मूर्तियों की स्थापना हुई, जो कि गंभीर रूप से कानून का उल्लंघन है। लेकिन फिर भी विवादित जमीन कानून का उल्लंघन करने वालों को दे दी गई। फैसला में स्पष्ट है कि एएसआई की रिपोर्ट में ऐसा कोई सबूत नहीं हैं, जिसमें बताया गया हो कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी।

सबरीमाला पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ बहुमत से इस मामले में 2018 के फैसले को बरकरार रखने में विफल रही। अब इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने से और पुनर्विचार याचिका को लंबित रखने से मामले में अस्पष्ट और अनिश्चित स्थिति पैदा हो गई है।

पोलित ब्यूरो की दो दिवसीय बैठक में अन्य कई मुद्दों पर भी प्रस्ताव पारित किए गए। इनमें अर्थव्यवस्था, राफेल और जम्मू-कश्मीर प्रमुख है। घटती आर्थिक विकास दर पर चिंता जताते हुए सरकार के कामकाज पर सवाल खड़े किए गए हैं। वहीं, राफेल सौदे की जॉंच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की कॉन्ग्रेस की मॉंग का समर्थन किया गया है।

गौरतलब है कि दिल्ली में हुई पोलित ब्यूरो की बैठक में पार्टी की गुटबाजी भी उभरकर सामने आ गई थी। ब्यूरो के तीन वरिष्ठ सदस्यों ने केरल में पार्टी के दो युवा कार्यकर्ताओं पर यूएपीए लगाए जाने को लेकर मुख्यमंत्री पिनरई विजयन को जमकर सुनाया था।

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पाकिस्तान: इस्लाम कबूल नहीं करने पर महिला पत्रकार को किया प्रताड़ित, नौकरी छोड़ने को हुई मजबूर

पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना का सिलसिला थम नहीं रहा। इसके कारण ईसाई पत्रकार गोनिला गिल को नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। 38 वर्षीय गिल ने एक मजहब विशेष के युवक से शादी की है। लेकिन, उन्होंने अपना धर्म नहीं बदला। इसके कारण ऑफिस के सहकर्मी ही उन्हें प्रताड़ित करते थे। अंत में वे इतनी परेशान हो गईं कि उन्हें दुनिया न्यूज यानी अपना ऑफिस ही छोड़ना पड़ा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गोनिला ने कुछ समय पहले हुसनैन जामिल से शादी की। लेकिन, अपना धर्म नहीं बदला। यही बात उनके साथी कर्मचारियों को खटकने लगी। वे हमेशा उनके धर्म के प्रति उनके विश्वास को लेकर और युवक से शादी करने के बावजूद धर्म न बदलने के कारण उन्हें कोसते रहते। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि वे मानसिक तौर पर परेशान रहने लगीं और थक-हारकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

लाहौर प्रेस क्लब से जुड़ी गोनिला एकमात्र ईसाई पत्रकार थीं। लेकिन फिर भी उन्हें धार्मिक अहिष्णुता का शिकार होना पड़ा। मीडिया से बातचीत में उन्होंने बताया, “वे मेरी आस्था को लेकर घटिया बातें करते थे। लेकिन, मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी और अपने धर्म के साथ खड़ी रहूॅंगी।”

गौरतलब है कि ये पहला मामला नहीं है जब अल्पसंख्यकों को लेकर पाकिस्तान की हकीकत उजागर हुई है। प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी के विधायक रहे बलदेव सिंह ने हाल में ही अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों का खुलासा किया था। इससे त्रस्त होकर उन्होंने भारत से शरण माँगी थी। उन्होंने पंजाब पहुँचकर गुहार लगाई थी कि वह अब भारत में ही रहना चाहते हैं।

अल्पसंख्यक समुदाय यानी हिंदुओं, सिखों, ईसाईयों, अहमदियों और शियाओं पर अत्याचार की घटनाएँ आम है। हिंदू और सिख लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन करवाकर निकाह करवाने को मजबूर किया जाता है। खुद पाकिस्तान के विपक्षी दल पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी ने बीते दिनों कहा था कि पाकिस्तान सबसे बुरी किस्म की असहिष्णुता का सामना कर रहा है।

अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को लेकर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार आलोचना हो चुकी है। भारत भी कई मंचों से वहॉं अल्पसंख्यकों की दुर्दशा का मसला उठा चुका है। हालॉंकि पाकिस्तान इन आरोपों को नकारता रहता है। लेकिन, गिल के साथ घटे वाकये ने एक बार उसकी धार्मिक असहिष्णुता उजागर कर दी है।

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महात्मा गाँधी के नाम पर रखें मेडिकल कॉलेज का नाम, कॉन्ग्रेसी मंत्री ने कहा- जुबान बंद कर

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के कोलारस विधानसभा से भाजपा विधायक बीरेंद्र रघुवंशी ने प्रभारी मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर पर धमकाने का आरोप लगाया है। बता दें कि सोमवार (नवंबर 18, 2019) की शाम बीरेंद्र रघुवंशी और प्रद्युम्न सिंह तोमर के बीच कलेक्ट्रेट के सभागार में जिला योजना समिति की बैठक के दौरान जमकर नोकझोंक हो गई।

विवाद शिवपुरी मेडिकल कॉलेज के नामकरण को लेकर हुआ। विधायक रघुवंशी का आरोप है कि जिला योजना समिति की बैठक में जब मेडिकल कॉलेज के नामकरण की बात आई तो उन्होंने माधवराव सिंधिया के बजाय महात्मा गाँधी के नाम पर नामकरण करने का प्रस्ताव रखा। इसी बात पर तोमर बिफर गए और धमकी देने लगे।

बीरेंद्र रघुवंशी ने कहा कि तोमर ने उन्हें देख लेने, जुबान बंद करने और ठिकाने लगाने की धमकी दी। बीजेपी विधायक ने कहा कि सुरक्षा के लिए वे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखेंगे। उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार से भी सुरक्षा की माँग की है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर उन्हें या परिवार को कुछ भी हुआ तो इसके जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ प्रद्युम्न तोमर होंगे।

बीजेपी विधायक का कहना है कि पूरा विश्व महात्मा गाँधी की 150वीं वर्षगाँठ मना रहा है। ऐसे में उन्होंने मेडिकल कॉलेज का नाम महात्मा गाँधी के नाम पर रखने का सुझाव दिया। माधवराव सिंधिया के नाम से पहले भी तीन भवनों के नाम रखे जा चुके हैं। रघुवंशी ने आरोप लगाया कि उनकी इस बात पर तोमर ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी।

वहीं बीजेपी विधायक के धमकाने के आरोपों पर मंत्री तोमर ने कहा, “मुझे ऐसे किसी वाकये की जानकारी नहीं है। मेडिकल कॉलेज का नाम माधवराव सिंधिया के नाम पर रखने का निर्णय आम सहमति से लिया गया था।”

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शिवसेना को मत दो सम​र्थन: कमलेश तिवारी के हत्यारों के मददगार मुस्लिम संगठन ने सोनिया गॉंधी को लिखा खत

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर जारी सियासी उठापठक के बीच एक पत्र सामने आया है। यह पत्र कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को लिखा गया है। पत्र जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख अरशद मदनी ने लिखा है। जमीयत वही मुस्लिम संगठन है जिसने हिंदुवादी नेता कमलेश तिवारी के हत्यारों को मदद की पेशकश की थी।

पत्र में सोनिया से शिवसेना को समर्थन नहीं देने की अपील की गई है। मदनी ने कहा है कि शिवसेना को समर्थन देना कॉन्ग्रेस के लिए घातक साबित होगा। मदनी ने पत्र में लिखा, “मैं आपका ध्यान महाराष्ट्र के राजनीति की तरफ आकर्षित करना चाहता हूँ। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आप शिवसेना का समर्थन करने की सोच रही हैं। यह कॉन्ग्रेस के लिए बहुत ही खतरनाक और घातक कदम साबित होगा। उम्मीद है कि आप मेरा निवेदन अच्छी भावना के साथ लेंगी।”

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सोनिया गॉंधी को लिखा पत्र

बता दें कि यह वही इस्लामिक संस्था है, जिसने हिंदू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की दिनदहाड़े गला रेत कर, गोली मार कर हत्या करने वाले हत्यारों को कानूनी लड़ाई में साथ देने की घोषणा की थी। कमलेश तिवारी की नृशंस हत्या का विरोध करने और हत्यारों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की बात करने के बजाय जमीयत उलेमा-ए-हिंद हत्यारों के बचाव में सामने आया था। हिंदू समाज पार्टी के नेता कमलेश तिवारी की 18 अक्टूबर को निर्मम हत्या कर दी गई थी।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इस मामले में गिरफ्तार पाँचों आरोपितों के परिवार से मुलाकात की। उन्होंने कानूनी लड़ाई लड़ने में असमर्थता जताई तो जमीयत ने अपने खर्चे पर वकील और अन्य सहायता करने का भरोसा दिलाया था। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के इस कदम ने साबित कर दिया था कि वो इस तरह के कुकृत्य और नृशंस हत्या करने वालों के साथ है।

यह पत्र ऐसे वक्त में लिखा गया है जब महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने की शिवसेना की उम्मीदें धूमिल हुई है। शुरुआत में ऐसी खबरें आई थी कि सरकार चलाने को लेकर तीनों दलों ने कॉमन मिनिमम एजेंडा तय कर लिया है और शिवसेना हिंदुत्व के अपने एजेंडे से पीछे हटने को तैयार है।

लेकिन, इसके बाद कहा जाने लगा कि शिवसेना का समर्थन करने को लेकर सोनिया गॉंधी असमंजस में हैं। इस संबंध में अंतिम फैसला सोमवार को दिल्ली में एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार और सोनिया के बीच हुई बैठक में होना था। लेकिन, बैठक के बाद पवार ने कहा कि सरकार गठन को लेकर कोई बात नहीं हुई। वैसे एनसीपी के बदलते स्टैंड का संकेत पवार ने दिल्ली पहुॅंचते ही दे दिया था। उन्होंने पत्रकारों के सवाल के जवाब में कहा था कि शिवसेना ने विधानसभा चुनाव कॉन्ग्रेस एनसीपी के खिलाफ लड़ा था। ऐसे में उसके सरकार कैसे बनाई जा सकती है।

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