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‘कारसेवकों को मिले शहीद का दर्जा, उनके ख़िलाफ़ दर्ज मामले वापस लिए जाएँ’ – PM मोदी को पत्र

अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ठीक 72 घंटे बाद, अखिल भारत हिन्दू महासभा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बाबरी मस्जिद को गिराने के मामले में कारसेवकों के ख़िलाफ़ दर्ज आपराधिक मामले को वापस लेने की माँग की है।

इसके अलावा, संगठन ने 1992 में मारे गए कारसेवकों को ‘शहीद’ का दर्जा दिए जाने की माँग की है। इस सन्दर्भ में हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि ने गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी पत्र भेजा है। बता दें कि 12 नवंबर को लिखे गए पत्र में लिखा गया है, “चूँकि अब यह स्पष्ट हो गया है कि श्री रामलला एक निर्विवाद मंदिर है, इसलिए उसका शिखर भी मंदिर का था, न कि किसी मस्जिद का गुंबद, तो अनजाने में मंदिर के शिखर को तोड़ने वाले कारसेवकों पर चल रहे बाबरी मस्जिद के गुंबद तोड़ने वाले केस को अविलम्ब सरकार द्वारा समाप्त किया जाए।”

हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि का लिखा ख़त

चक्रपाणि ने कारसेवकों, जो 1992 में ही नहीं बल्कि कारसेवा करने के प्रयास में अलग-अलग घटनाओं में मारे गए, उनके लिए ‘शहीद’ का दर्जा देने और उनकी सूची पट्टिका तैयार कर उसे अयोध्या में लगवाया जाने की माँग की। साथ ही माँग की गई कि उनके परिवार को आर्थिक सहायता और सहयोग दिया जाए।

30 अक्टूबर, 1990 को अयोध्या में विवादित स्थल के पास कारसेवकों पर गोलीबारी की गई थी, इस दौरान कई लोग मारे गए थे।

इस बीच, राम जन्मभूमि न्यास ने कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की निगरानी करने वाले ट्रस्ट की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को करनी चाहिए। न्यास ने कहा कि आदित्यनाथ को गोरक्षा पीठ के महंत के तौर पर ट्रस्ट की अध्यक्षता करनी चाहिए ना कि मुख्यमंत्री के तौर पर।

ग़ौरतलब है कि CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अयोध्या की जिस जमीन को लेकर विवाद था वहॉं मंदिर निर्माण का आदेश दिया है। साथ ही मस्जिद निर्माण के लिए सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से 3 महीने के भीतर इसके लिए एक योजना तैयार करने को कहा है।

माओवादी कैसे मारे गए, इसकी जाँच हो लेकिन रिपोर्ट आने तक हम कोई सवाल नहीं खड़े कर रहे: केरल HC

केरल हाई कोर्ट ने पलक्क्ड़ में अक्टूबर माह में मारे गए संदिग्ध माओवादियों के एनकाउंटर की परिस्थितियों की जाँच के आदेश दे दिए हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कोर्ट ने कहा है कि इस की तफ्तीश हो कि एनकाउंटर में शामिल अफसरों के हाथों इस घटना के दौरान कोई आपराधिक कृत्य तो नहीं घटित हुआ है। लेकिन साथ ही साथ यह भी स्पष्टीकरण आदेश में उल्लिखित है कि जाँच के आदेश को पीठ के इस एनकाउंटर की सत्यता, उसकी परिस्थितियों या माओवाद के आरोपितों की मृत्यु पर सवाल के रूप में न देखा जाए। इन विषयों पर अभी अदालत दूर-दूर तक कोई राय नहीं व्यक्त कर रही है।

आदेश में जस्टिस आर नारायण पिशारदी ने अधिकारियों को वर्तमान के नियमों और रवायतों के अनुसार दोनों माओवादियों के शवों की अंत्येष्टि करने की भी अनुमति दे दी है। उन्होंने सेशंस कोर्ट के उस निर्णय को पलट दिया जिसमें राज्य सरकार को कहा गया था कि उसे अगले आदेश तक कार्तिक और मनिवासकाम नामक माओवाद संदिग्धों के शवों को संभाल कर रखना होगा। यह आदेश उन दोनों के रिश्तेदारों की याचिका पर दिया गया था।

इस घटना के बाद पिछले हफ्ते (6 नवंबर, 2019 को) टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सम्पादकीय पेज पर प्रकाशित एक लेख में केरल के मुख्य सचिव टॉम जोसे ने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र की आतंकवाद की परिभाषा (वे तत्व जो हिंसा का इस्तेमाल राजनीतिक मंशा से करते हैं, और इस प्रक्रिया में नागरिकों को नुकसान पहुँचाते हैं या नुकसान की राह पर धकेलते हैं। अतः एक लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई करने वाले नागरिकों को नुकसान पहुँचाने के चलते आतंकवादी होते हैं) के हिसाब से माओवादी आतंकी ही हुए। उन्होंने यह पक्ष रखा कि सरकारों का काम निहत्थे और शांतिप्रिय नागरिकों की हिफाज़त करना होता है।

जोसे ने लिखा कि इसका कोई औचित्य नहीं कि शांतिप्रिय आम नागरिकों और नक्सल आतंकियों के ह्यूमन राइट्स एक जैसे हों। यह न केवल देश के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ होगा, बल्कि कानून का पालन करने वाले आम नागरिकों का मखौल उड़ाना उनका अपमान होगा।

राम मंदिर निर्माण की देख-रेख करें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ: राम जन्मभूमि न्यास ने उठाई माँग

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद राम मंदिर के निर्माण के लिए केंद्र सरकार की ओर से गठित होने वाले ट्रस्ट में सीएम योगी आदित्यनाथ को शामिल करने की माँग उठी है। राम जन्मभूमि न्यास ने कहा है कि वह चाहते हैं राम मंदिर निर्माण की देख-रेख करने के लिए बनने वाले ट्रस्ट का नेतृत्व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ करें।

न्यास का कहना है कि वो योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं बल्कि गोरक्षा पीठ के महंत की हैसियत से राम मंदिर के ट्रस्ट में शामिल किए जाने की माँग करते हैं। न्यास के प्रमुख महंत नृत्य गोपाल दास ने कहा, “राम जन्मभूमि न्यास चाहता है कि योगी आदित्यनाथ ट्रस्ट का नेतृत्व करें। गोरखपुर में प्रतिष्ठित गोरखनाथ मंदिर, जो गोरक्षा पीठ से संबंधित है, ने राम मंदिर आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई है। महंत दिग्विजय नाथ, महंत अवैद्यनाथ और अब योगी आदित्यनाथ मंदिर आंदोलन के अभिन्न अंग रहे हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि प्रस्तावित ट्रस्ट में न्यास की प्रमुख भूमिका होगी, लेकिन उन्होंने विवरण का विभाजन नहीं किया। ट्रस्ट के अन्य सदस्य विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष चंपत राय और विहिप के कोषाध्यक्ष ओम प्रकाश सिंघल हो सकते हैं। बता दें कि 2015 में विहिप नेता अशोक सिंघल के निधन के बाद चम्पत राय विहिप और उसके फ्रंटल संगठनों की गतिविधियों की देखरेख कर रहे हैं।

महंत कमल नारायण दास ने कहा कि राम मंदिर निर्माण के लिए गठित किए जाने वाला ट्रस्ट महंत नृत्य गोपाल दास के निरीक्षण में होगा। रविवार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ मीटिंग के दौरान महंत कमल नारायण ने न्यास का प्रतिनिधित्व किया था। इस मीटिंग में हिन्दू और मुस्लिम के कई नेता शामिल हुए थे।

इसके साथ ही दिगंबर अखाड़ा का कहना है कि उनके प्रमुख महंत सुरेश दास इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए बुधवार (नवंबर 13, 2019) को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात करेंगे। इस बीच, निर्मोही अखाड़े के महंत दीनेंद्र दास ने राम जन्मभूमि न्यास का विरोध करते हुए असहमतिपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “हम राम जन्मभूमि न्यास के खिलाफ लड़ रहे हैं। हम उनके ट्रस्ट के सदस्य बनने के लिए कैसे सहमत हो सकते हैं? वे अपने ट्रस्ट को छोड़कर हमारे साथ ट्रस्ट का हिस्सा बन सकते हैं। यह सरकार के लिए एक समाधान खोजने और एक साथ लाने के लिए है।”

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को अयोध्या टाइटल सूट पर सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए निर्मोही अखाड़ा को भगवान की सेवा करने और उसकी संपत्ति के प्रबंधन के अधिकार के दावे को खारिज कर दिया था। लेकिन बेंच ने विवादित स्थल पर निर्मोही अखाड़ा की ऐतिहासिक उपस्थिति और उनकी भूमिका पर ध्यान दिया और केंद्र को आदेश दिया कि वह राम मंदिर निर्माण के लिए बनाए जाने वाले ट्रस्ट में निर्मोदी अखाड़ा को उपयुक्त भूमिका सौंपे। ।

एक संजय जिसके कारण बाला साहेब ने कुत्ता पालना छोड़ दिया, दूसरे ने उनके बेटे को धोबी का कुत्ता बना दिया

24 अक्टूबर को जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो किसी ने भी यह नहीं सोचा होगा कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगेगा। 288 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को 105 और उसकी सहयोगी शिवसेना को 56 सीटें मिली थी। लेकिन, शिवसेना की एक जिद्द ने न केवल राज्य की राजनीति को भॅंवर में फॅंसाया, बल्कि उसकी खुद की हालत भी ‘न राम मिली, न माया’ जैसी कर दी।

इस सियासी ड्रामे में जो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा वह है शिवसेना सांसद संजय राउत का। राउत पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ के कार्यकारी संपादक भी हैं। उनकी अति सक्रियता ने लोगों को उस दौर की याद दिला दी है, जब शिवसेना की तरफ से इसी तरह बड़े-बड़े दावे करने के लिए ‘हिंदी का सामना’ के कार्यकारी संपादक संजय निरुपम जाने जाते थे। उस दौर में कहा जाता था कि निरुपम वहीं बोलते हैं, जो बाला साहेब का आदेश होता है। जब राउत बार-बार “शिवसेना का ही सीएम होगा” दोहरा रहे थे, तब भी यही माना जा रहा था कि वे उद्धव ठाकरे के दिल में दफ़न आकांक्षा को ही बयॉं कर रहे हैं।

निरुपम के दिन बहुरने तब शुरू हुए जब 1993 में उन्हें ‘दोपहर का सामना’ का कार्यकारी संपादक बाला साहेब ने बनाया। कुछ दिनों में ही वे बाल ठाकरे की आँखों के तारे हो गए। वफादारी का इनाम भी उन्हें जल्द मिला। बाला साहेब ने 1996 में उन्हें राज्यसभा में भेज दिया। लेकिन, राजनीति में स्थापित होते ही निरुपम 2005 में शिवसेना को छोड़ कॉन्ग्रेस में चले गए।

इधर, निरुपम कॉन्ग्रेस में गए और उधर शिवसेना में राउत का कद बढ़ने लगा। वैसे, राजनीति में राउत का सितारा भले निरुपम के जाने के बाद चमका हो, लेकिन सामना के कार्यकारी संपादक वे 1992 में ही बन गए थे। कहा तो यह भी जाता है कि निरुपम की मातोश्री में एंट्री भी उन्होंने ही कराई थी। निरुपम की पत्नी गीता वैद्य मराठी हैं और राउत की पुरानी परिचित भी। 1992 के दंगों के और 1993 के बम धमाकों के बाद जब बाला साहेब ने हिन्दी भाषियों के लिए अखबार शुरू करने का फैसला किया तो राउत ने ही उन्हें निरुपम का नाम सुझाया था।

निरुपम के जाने के बाद शिवसेना में बड़बोले नेता की कमी शिद्दत से महसूस की जा रही थी। उसी जगह को भरने के लिए राउत आगे बढ़ाए गए। लेकिन, इसकी बड़ी कीमत बाला साहेब की हिन्दुत्वादी राजनीति को चुकानी पड़ी है। मातोश्री अब ‘मातेश्री’ का शरणागत है। शिवसेना ने उस कॉन्ग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश की, जिसके सरकार को कभी बाला साहेब ने ‘हिजड़ों का शासन’ कहा था। उद्धव ठाकरे ने सोनिया गॉंधी और शरद पवार जैसों की राजनीति पर भरोसा किया। उनके कहने पर मोदी कैबिनेट से अपने मंत्री को इस्तीफा दिलवा दिया। फिर भी सोनिया गॉंधी और शरद पवार ने अकेले छोड़ दिया।

निरुपम के जाने के बाद एक मौके पर बाल ठाकरे ने कहा था कि मैंने कुत्ता पालना छोड़ दिया है। लेकिन उद्धव में न तो बाला साहेब वाले तेवर हैं और न उन जैसी धमक। सो, शायद ही वह कभी अपना दर्द बयॉं कर पाएँ। वे शायद भूल गए थे कि धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र का आँखों देखा हाल सुनाने वाला राज सारथी संजय था। ये आज के संजय हैं। बड़बोलेपन से अपने नेता की लुटिया डूबोने का मौका नहीं छोड़ते। चाहे वे कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता संजय झा हों या फिर नीतीश कुमार के करीबी बिहार के मंत्री संजय कुमार झा

‘सावरकर से प्रॉब्लम होगी, कुछ और कर लो’ – कॉन्ग्रेसी सरकार वाले राजस्थान के यूनिवर्सिटी का टके-सा जवाब

कॉन्ग्रेस के बचे-खुचे प्रभुत्व वाले इलाकों और संस्थानों में स्वतंत्रता सेनानी, हिन्दू महासभा के नेता और ‘एसेंशियल्स ऑफ़ हिंदुत्व’ के लेखक विनायक दामोदर सावरकर की विरासत पर हमले जारी हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में वीर सावरकर के नाम से जाने जाने वाले नेता की मूर्ति पर कॉन्ग्रेस की छात्र शाखा एनएसयूआई (नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इंडिया) के नेताओं द्वारा जूतों की माला पहनाई गई, कालिख पोती गई, राजस्थान में (जहाँ कॉन्ग्रेस का शासन है) इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में उनके नाम से ‘वीर’ हटा दिया गया और अब इतिहासकारों की स्वायत्त संस्था आईसीएचआर (इंडिंयन काउंसिल ऑफ़ हिस्टोरिकल रिसर्च) को राजस्थान यूनिवर्सिटी ने कह दिया है कि संस्था का राजस्थान यूनिवर्सिटी के कैम्पस में प्रस्तावित सम्मलेन सावरकर छोड़ कर किसी भी विषय पर हो सकता है।

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार कल (सोमवार, 11 नवंबर, 2019 को) आरएसएस के अनुषांगिक संगठन ‘अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना’ ने “द ट्रुथ अबाउट सावरकर” (सावरकर के बारे में सत्य) नामक लेक्चर शृंखला का अनावरण किया था। यह तारीख आज़ाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के नाम पर राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाई जाती है। इस लेक्चर शृंखला को आईसीएचआर का समर्थन प्राप्त बताया जा रहा है। यह लेक्चर राजस्थान के जयपुर के अलावा गुवाहाटी, पोर्ट ब्लेयर, पुणे और कुछ अन्य शहरों में होने हैं।

बकौल आईसीएचआर अधिकारीगण, इस लेक्चर शृंखला का मकसद “सावरकर और 1857 की आज़ादी की लड़ाई से जुड़े लेखन के बारे में फैले झूठ का खंडन” करना है। उनके अनुसार राजस्थान यूनिवर्सिटी के लोगों ने उनसे कहा कि वे कोई और विषय ले लें।

वहीं राजस्थान यूनिवर्सिटी के अधिकारियों के हवाले से इकोनॉमिक टाइम्स ने दावा किया है कि राजस्थान यूनिवर्सिटी ने अनुमति देने से मना नहीं किया है बल्कि ‘केवल’ मामले को ठंडे बस्ते में डाला है। “हमने पूरी तरह से मना नहीं किया बल्कि ये कहा है कि हमें एक महीने का समय चाहिए, और उनसे और जानकारी इस लेक्चर के बारे में माँगी है क्योंकि हमें औरों से इस विषय पर सलाह-मशविरा करना है। सावरकर से जुड़े कई मामले बहुत विवादास्पद हैं और हम कोई समस्या नहीं चाहते थे।”

वो 8 मीडिया पोर्टल्स जिन्होंने राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट को ही घेरा, हिन्दू देवताओं का उड़ाया मजाक

राम मंदिर पर फ़ैसला आने के बाद मीडिया की क्या प्रतिक्रिया रही? सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद जहाँ हर तबके में इसका स्वागत किया गया, एक धड़ा ऐसा भी था, जिसने सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को लेकर नकारात्मकता फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जैसे अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद सब कुछ शांतिपूर्वक बीत गया, इन्हें इस बात की चिंता खाए जा रही थी कि राम मंदिर का फ़ैसला हिन्दुओं के हक़ में आने के बाद रक्तपात क्यों नहीं हो रहा? सरकार ने शीर्ष न्यायालय के निर्णय के बाद सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की, शांति-सौहार्द की अपील की और सभी पंथों के धर्मगुरुओं से मुलाकात की। लेकिन मीडिया के वामपंथी धड़े ने क्या किया, इसे आगे देखिए।

1. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला विवादित है: The Quint

‘द क्विंट’ को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि दशकों पुराना विवाद ख़त्म हो गया, उनकी चिंता यह थी कि राम मंदिर पर हो रही राजनीति का अब क्या होगा? क्या यह 2024 तक चल पाएगा? मीडिया पोर्टल ने लिखा कि ओवैसी जैसों का बयान दक्षिणपंथी हिन्दुओं द्वारा ध्रुवीकरण के लिए प्रयोग किया जाता है। विडम्बना देखिए। ओवैसी भी ज़हर उगले तो निशाना हिन्दू ही बनते हैं। ज़हर ओवैसी उगलता है लेकिन ‘द क्विंट’ उसके बयान का जिक्र करते हुए लिखता है कि हिन्दू उसके बयान को लेकर ज़हर फैलाते हैं। मीडिया पोर्टल को इस बात से दिक्कत है कि पीएम मोदी ख़ुद ‘मंदिर कार्ड’ का प्रयोग नहीं करेंगे लेकिन वो अपने कुछ सिपाहसालार नेताओं को इसकी खुली छूट देंगे।

हर क्षण सुप्रीम कोर्ट और संविधान की दुहाई देने वाले वामपंथी जब सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ही ‘विवादित’ करार दें तो आप उन्हें क्या कहेंगे? ‘द क्विंट’ ने ऐसा ही किया। उसने पूछा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह क्यों नहीं बताया कि हिन्दुओं की कौन सी आस्था और विश्वास में ऐसा कहा गया है कि विवादित रहे ज़मीन में कहाँ भगवान राम का जन्म हुआ था, किस बिंदु पर हुआ था। अर्थात, ‘द क्विंट’ ने सुप्रीम कोर्ट से राम के जन्मस्थान की ‘अक्षांश और देशांतर रेखाओं (Longitude & Latitude)’ की माँग की है। जहाँ हज़ार पेज के फ़ैसले में कई महत्वपूर्ण बातें थीं, ‘द क्विंट’ उस जज का नाम खोजता रहा, जिसने ये फ़ैसला लिखा होगा।

2. सुप्रीम कोर्ट ने साहसी फ़ैसला नहीं दिया, अपेक्षित ही नहीं था: The Wire

‘द वायर’ की तो पूछिए ही मत। उसमें मार्कण्डेय काटजू का एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें ऑल्टन्यूज़ के प्रतीक सिन्हा के बयान का जिक्र कर यह साबित करने की कोशिश की गई कि मुस्लिमों से एक तो मस्जिद भी छीन लिया गया और ऊपर से उस ज़मीन का हक़ उन हिन्दुओं को दे दिया गया, जिन्होंने मस्जिद तोड़ी थी। प्रतीक सिन्हा ने स्कूली बच्चों के झगड़ों का उदाहरण देकर इसे समझाया। करोड़ों हिन्दुओं की भावनाएँ इन मीडिया वालों के लिए स्कूली बच्चों के झगड़े की तरह ही है। अब आप समझ सकते हैं कि राम मंदिर पर आकलन करते समय क्यों इनका इतिहास सन 1528 के बाद से ही शुरू होता है?

काटजू ने ‘द वायर’ में लेख लिख कर इस पूरे फ़ैसले को ही विचित्र करार दिया। इसी पोर्टल में अपूर्वानन्द ने एक लेख लिखा, जिसमें जजों के पास हौसला न होने की बात कही गई। क्या जज जेएनयू के वामपंथियों की तरह मारपीट करने के लिए अदालत में बैठते हैं? ‘द वायर’ ने एनआरसी और जम्मू कश्मीर का जिक्र करते हुए लिखा कि राम मंदिर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से तो ‘साहसी फ़ैसला’ अपेक्षित भी नहीं था। यही सीजेआई रंजन गोगोई ने जब अन्य जजों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस किया था, तब मसाला की भूखी मीडिया ने उन्हें अपना लाडला बना लिया था। अब? अब शायद अत्यधिक मात्रा में मसाला का सेवन करने के कारण मीडिया के उस धड़े का हाजमा ख़राब हो गया है।

3. रामायण और संविधान की तुलना करने वाला BBC

बीबीसी की तो पूछिए ही मत। जम्मू कश्मीर मुद्दे पर भारत के ख़िलाफ़ प्रोपेगेंडा चला चुके मीडिया संस्थान ने एक कार्टून के जरिए अयोध्या फ़ैसले पर निशाना साधा। उस कार्टून में रामायण और संविधान की तुलना की गई। इसका क्या तुक बनता है? सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में रामायण से भी उद्धृत किए गए अंश हैं और संविधान के अनुसार तो पूरा का पूरा फ़ैसला ही हुआ है। क्या बीबीसी इस्लामिक देशों में वहाँ की पवित्र पुस्तकों का कार्टून में इस्तेमाल कर के इस तरह मजाक बनाने की हिम्मत रखता है? नहीं रखता है। बीबीसी ने दिखाया कि न्यायपालिका के तराजू में रामायण संविधान से ज्यादा भारी दिख रहा है और इसीलिए फ़ैसला उधर की तरफ़ झुक रहा है।

बीबीसी एक क़दम और आगे बढ़ा और उसने पूरे फ़ैसले को ही निराशाजनक करार दिया। इन मीडिया संस्थानों की चाल होती है कि ये सड़क से किसी को भी उठा कर ले आते हैं और उसके बयान या लेख के आधार पर मनगढ़ंत दावे कर देते हैं। किसी गली के कुत्ते के कंधे पर भी बन्दूक रख कर चलाना कोई इनसे सीखे। ताज़ा मामले में बीबीसी दौड़ कर डीएन झा के पास गया, जो उन इतिहासकारों में शामिल थे, जिन्होंने अयोध्या पर ऐसी मनगढ़ंत रिपोर्ट तैयार की थी कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें लापरवाह बता कर फटकार लगाई। डीएन झा के हवाले से बीबीसी ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को निराशाजनक बताते हुए लिखा कि इस फ़ैसले में हिन्दुओं की आस्था और ‘दोषपूर्ण’ एएसआई की रिपोर्ट को तवज्जो दी गई है।

4. ‘द प्रिंट’ को अब सता रहा सबरीमाला फ़ैसले का डर

शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ ने एक ही चीज को दो तरीके से पेश कर के ख़ुद को एक न्यूट्रल पोर्टल साबित करने की कोशिशों को जारी रखा है। इनका मीडिया पोर्टल कहता है कि सुप्रीम कोर्ट काफ़ी बदल गया है। उसने लिखा कि पिछले साल सबरीमाला मामले में कोर्ट ने कहा था कि आस्था और विश्वास के आधार पर किसी से बराबरी का अधिकार छीना नहीं जा सकता, वहीं अब सुप्रीम कोर्ट ने जुडिशल ज्ञान से बाहर जाकर आस्था पर भरोसा जताया है। मीडिया पोर्टल सबरीमाला और अयोध्या के फ़ैसलों में क्या चीजें भिन्न हैं, इसे लेकर निशाना साधता रहा। क्या सारे फ़ैसलों को सिर्फ़ एक ही तराजू से तौला जा सकता है?

इसके बाद ख़ुद शेखर गुप्ता ने मोर्चा संभाला। गुप्ता ने एक लम्बे-चौड़े लेख में बताया कि कैसे मोदी जिस ‘राष्ट्रवाद’ की लहर पर चढ़ कर यहाँ तक पहुँचे हैं, वह अब राम मंदिर पर फ़ैसले के बाद ख़त्म हो जाएगा। शेखर गुप्ता ने पोस्ट तो अयोध्या पर लिखी लेकिन वो उसमे अर्थव्यवस्था लेकर आ गए और पूछा कि उसका क्या? उन्हें इस बात की चिंता खाए जा रही है कि अब अगला चुनाव किन मुद्दों पर होगा? एनआरसी, अयोध्या और पाकिस्तान मुद्दे को गुप्ता ने ‘इमोशनल पॉपुलिजम’ करार दिया है।

5. रक्तपात से बने मंदिर में पूजा करने कौन जाएगा?: नेशनल हेराल्ड

कॉन्ग्रेस के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ में एक अजीबोगरीब लेख प्रकाशित कर राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का विरोध किया है। सुजाता आनंदन ने इस लेख में लिखा है कि उन्होंने जब 1992 में बाबरी विध्वंस की ख़बर सुनी, तभी उन्होंने यह फ़ैसला किया था कि यदि यहाँ मंदिर बनता भी है तो वे कभी पूजा करने नहीं जाएँगी। सुजाता ने लिखा कि वो किसी ऐसी जगह पर मंदिर को देखना ही नहीं चाहती हैं, जहाँ पहले मस्जिद रहा हो। उन्होंने दावा किया कि इस संघर्ष में ख़ूब ख़ून-ख़राबा हुआ है और भगवान कभी ऐसा नहीं चाहेंगे कि ख़ून की इन बूँदों से मंदिर की शुद्धता भंग हो।

सुजाता ने लिखा है कि आडवाणी ने प्रधानमंत्री का पद पाने के लिए राम मंदिर आंदोलन में हिस्सा लिया, जो न तो उन्हें कभी मिला और न ही आगे मिलेगा। अडवाणी की आलोचना करते हुए सुजाता ने आगे लिखा कि उनका पीएम न बनना ‘कर्म के फल’ की विचारधारा में उनका विश्वास पक्का करता है। आडवाणी पर उन्होंने निर्दोषों का ख़ून बहाने का आरोप भी लगाया। सुजाता ने ‘नेशनल हेराल्ड’ में लिखा कि आडवाणी के साथ जब भी कुछ बुरा होता है तो उन्हें ख़ूब ख़ुशी होती है। साथ ही वो नरेंद्र मोदी पर आडवाणी के साथ दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाना भी नहीं भूलीं।

6. वृंदा करात और स्वाति चतुर्वेदी जैसे ट्रोल्स की शरण में एनडीटीवी

यहाँ अगर एनडीटीवी की बात न की जाए तो शययद ये सूची अधूरी ही रहेगी। एनडीटीवी ने अयोध्या फैसले के बाद अपनी पीठ थपथपाते हुए दावा किया कि उस दिन सबसे ज्यादा उसे ही देखा गया। एनडीटीवी वाले शायद ये भूल गए कि लोग उस दिन उनके चैनल पर इसीलिए गए थे, ताकि उनका रुदन देख सकें, स्टूडियो में उतरे हुए चेहरों को देख सकें। यही कारण है कि जब चुनावों में भाजपा जीत रही होती है तो लोग एनडीटीवी का ही रुख करते हैं। एनडीटीवी दौड़ कर सीधा वामपंथी नेता वृंदा करात के पास पहुँचे और वहाँ से एक लेख लिखवा कर लाए। करात को इस बात से आपत्ति है कि मंदिर पक्ष को ‘हिन्दू पक्ष’ क्यों बोला जाता है क्योंकि वो नहीं चाहते कि वहाँ आज तक जो कुछ भी हुआ, उसमें उनका नाम इस्तेमाल हो।

करात ने जजमेंट को विरोधाभासी करार दिया। करात इस बात से भी नाख़ुश हैं कि भारतीय क़ानून में देवता को ‘ज्यूरिस्टिक पर्सन’ क्यों माना जाता है और वो इसे विचित्र बताती हैं। ट्रोल स्वाति चतुर्वेदी ने भी एनडीटीवी में एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने अजीबोगरीब दावे किए। उन्होंने लिखा कि अयोध्या आंदोलन के एक नेता उनके सामने रोने लगे क्योंकि राम मंदिर का इस्तेमाल ‘बहुसंखयक मसल फ़्लेक्सिंग’ के लिए किया जा रहा है। स्वाति राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के बाद अब जनसंख्या नियंत्रण और यूनिफॉर्म सिविल कोड आने वाला है। वो लिखती हैं कि ऐसी नीतियों के मामले को गंभीरता से लें क्योंकि मोदी सरकार जो कहती है, वो कर के दिखाती है।

7. अख़बारों ने फ़ैसले को उत्सव के रूप में क्यों देखा?: न्यूज़लॉन्ड्री

हिन्दू देवी-देवताओं को उनका कार्टून बना कर मजाक उड़ाना मीडिया के लिए एक सामान्य प्रक्रिया बन गई है क्योंकि बाकी किसी भी अन्य मजहब के ईश्वर तो दूर, गुरुओं के साथ भी उन्हें ऐसा करने की हिम्मत नहीं है। इसी क्रम में न्यूज़लॉन्ड्री ने एक ख़बर में राम मंदिर को लेकर मीडिया में चल चुकी बहस पर निशाना साधा। मीडिया पोर्टल ने उस कार्टून में दिखाया कि भगवान राम माँ सीता की गोद में लेट कर रो रहे हैं और हनुमान उनके पाँव दबा रहे हैं। राम पूछते हैं कि उनका घर कहाँ है? इन कार्टून को काफ़ी अपमानजनक तरीके से बनाया गया। पोर्टल को इस बात से दिक्कत है कि रामायण से जुड़े नाटक क्यों खेले जाते हैं और मीडिया राम मंदिर पर बहस ही क्यों करती है?

हिन्दू धर्म में आपको बहुत सारी लिबर्टी है लेकिन इसे मजाक का विषय बनाने वालों से पूछा जाना चाहिए कि किसी अन्य मजहब के साथ वो ऐसा क्यों नहीं करते? और हाँ, यही नियम हिन्दू धर्म पर भी क्यों लागू नहीं करते? राम मंदिर पर फ़ैसले के अगले दिन हिंदी ख़बर हिंदी अख़बारों की हैडलाइन बनी और देश की भावनाओं के अनुरूप इसे बड़ा कवरेज दिया गया। न्यूज़लॉन्ड्री को इस बात से दिक्कत थी कि इन समाचारपत्रों ने इस फैसले को एक ‘विजय उत्सव’ के रूप में क्यों लिया? क्या 500 साल बाद सुप्रीम कोर्ट देश की धरती के साथ, संवेदनाओं के साथ न्याय करता है तो इसे विजय के रूप में नहीं लिया जा सकता?

8. मुस्लिमों को हाशिये पर भेजा रहा रहा है: स्क्रॉल ने राम मंदिर का श्रेय कॉन्ग्रेस को दिया

इसी तरह स्क्रॉल ने भी राम मंदिर पर फ़ैसले की व्याख्या की। स्क्रॉल थोड़ा और पीछे गया और उसने बीफ-विरोधी क़ानून और धर्मांतरण रोकथाम क़ानून का जिक्र करते हुए लिखा कि हिन्दू राष्ट्रवाद धीरे-धीरे भारत के सेक्युलर आईडिया पर हावी हो रहा है। कथित लीगल स्कॉलर फैज़ान मुस्तफा के हवाले से स्क्रॉल ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने आस्था और विश्वास को क़ानून से ऊपर रख कर फ़ैसला दिया। स्क्रॉल ने अपने आकाओं को ख़ुश करने के लिए याद दिलाया कि कैसे कॉन्ग्रेस ने 1986 में मंदिर का ताला खुलवा कर राम जन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत की? अब स्क्रॉल कहीं जवाहरलाल नेहरू को ही कारसेवक न घोषित कर दे!

राम मंदिर मुद्दे को जबरदस्ती कई डरावनी चीजों से जोड़ कर देखा गया जबकि ये मुद्दा भारत की ज़मीन पर विदेशी इस्लामी आक्रांताओं के अतिक्रमण से जुड़ा था। स्क्रॉल ने दावा किया कि मुस्लिमों को हाशिये पर भेजा जा रहा है और सामाजिक-आर्थिक रूप से वो दलितों से भी बदतर स्थिति में हैं। इस डाटा या सूचना को राम मंदिर पर लिखे गए लेख में घुसेड़ कर आख़िर स्क्रॉल साबित क्या करना चाहता है? स्क्रॉल लिखता है कि अपनी पत्नी को छोड़ने पर एक मुस्लिम को अब सज़ा हो सकती है। महिला अधिकार की बात करने वाले इन मीडिया पोर्टल्स को महिलाओं के भले के लिए बने क़ानून से भी दिक्कत है? और हाँ, दिक्कत है तो इसका अयोध्या से क्या सम्बन्ध?

‘टिड्डों का पकवान बनाइए, करी के साथ टिड्डा बिरयानी खाइए’ – पाकिस्तान के कृषि मंत्री का Viral Video

पाकिस्तान के कराची में इन दिनों टिड्डों का कहर भरपाया हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार वहाँ की जनता टिड्डों की बढ़ती संख्या से काफी परेशान हैं। लेकिन इस बीच पाकिस्तान के एक मंत्री का बड़ा अटपटा बयान आया है। जिसके कारण सोशल मीडिया पर लोगों को पाकिस्तान पर हँसने का एक बार फिर मौका मिल गया।

दरअसल, इन दिनों टिड्डों से परेशान कराची की जनता को समस्या का समाधान बताते हुए सोशल मीडिया पर सिंध के कृषि मंत्री इस्माइल राहू का एक वीडियो क्लिप वायरल हो रहा है। जिसमें वह बताते नजर आ रहे हैं कि कराची के लोगों को टिड्डियों के पकवान बनाने चाहिए। इस वीडियो में वह लोगों कों कीड़ों के साथ बिरयानी और करी खाने की सलाह दे रहे हैं और बता रहे हैं कि इनसे स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करके स्थिति का लाभ उठाना चाहिए।

हालाँकि इसके बाद वे अपनी बात को मजाकिया लहजे में कहते हुए भी नजर आते हैं कि आखिर वह टिड्डे इतने दूर से आए हैं। इसलिए यहाँ के लोगों को उन्हें खाना ही चाहिए। लेकिन बाद में लोगों को आश्वस्त करते दिखते हैं कि इन कीड़ों से कराची के मलीर में फसलों को कोई नुकसान नहीं पहुँचा है और साथ ही सरकार इन्हें मारने वाली दवाइयों के छिड़काव पर भी काम कर रही है। इसलिए जनता बेफिक्र रहे।

बता दें इस मामले के संबंध में द न्यूज इंटरनेशनल ने टिड्डों का एक वीडियो भी शेयर किया है, इसमें वह आसमान में उड़ते नजर आए हैं। इसके अलावा एक रेस्तरां के मालिक ने टिड्डों को पकाने का तरीका भी शेयर किया है। उसने बताया है कि पहले टिड्डे साफ करने पड़ते हैं और फिर उसके पैर को शरीर अलग किया जाता है। इतना ही नहीं, वहाँ के स्थानीय लोगों ने टिड्डियों को विटामिन का एक बड़ा स्रोत कहा है।

उल्लेखनीय है कि बीते दिनों टिड्डों के झुंड की वजह से सिंध और नॉर्दन के बीच खेला गया मैच भी रोकना पड़ा था। स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि खिलाड़ियों को टिड्डों से बचने के लिए अपनी आँख और कान कवर करने पड़े।

NDTV की एंकर फैला रही थी फेक न्यूज़, वो भी भारत विरोधी… रक्षा विशेषज्ञ ने लगाई क्लास

ऑपइंडिया ने हाल में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें बताया गया था कि निधि राज़दान ने कैसे इंग्लैण्ड में कश्मीर पर हुए एक कार्यक्रम में भारत के पक्ष को रखने के नाम पर कई सारी ऐसी बातें कहीं जो असल में भारत के खिलाफ जातीं थीं। इस पर भड़क कर निधि ने ट्विटर पर हम पर हमलावर होते हुए दावा किया की उन्होंने तो वहाँ भारत के हितों की ‘हिमायत’ की थी। इस पर रक्षा विशेषज्ञ अभिजीत अय्यर मित्रा ने उनके इस झूठ की कलई तसल्लीबख्श तरीके से ट्विटर पर खोली

बता दें कि अभिजीत ने सुब्रमण्यम स्वामी के उस ट्वीट पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी जिसमें भाजपा नेता ने अपने सूत्रों का हवाला देते हुए लिखा था कि कश्मीर पर आयोजित कार्यक्रम में निधि राज़दान ने ऐसा कुछ कहा ही नहीं है जैसा कि दावा किया जा रहा है।

इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए मित्रा बोले कि राजदान ने वही कहा है जो हमारे द्वारा दावा किया जा रहा है। इसे साबित करने के लिए उनके पास कई सबूत हैं, जिनमें पीटीआई के हवाले से इंडिया टुडे की रिपोर्ट और पाकिस्तानी द न्यूज़ इंटरनेशनल के उन्होंने स्क्रीनशॉट दिए।

अभिजीत ने बताया कि निधि ने कहा था कश्मीर एक अभूतपूर्व संचार संकट से जूझ रहा है, जोकि गलत है। अभिजीत के मुताबिक सबसे लम्बे समय तक चलने वाला संचार का आपातकाल 1991-92 का था जब 6 महीने के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई थी- आतंकवादियों ने धमाका कर केबल टावर ही उड़ा दिया था।

इसके अलावा कश्मीर में 2016 के बुरहान वानी (मुठभेड़ के विरोध में भड़के) दंगों में भी सरकार ने संचार व्यवस्था बंद करने की कोशिश की थी, लेकिन उस समय विफलता हाथ लगी। उसके बाद सबक सीखते हुए सरकार ने इस बार आहिस्ता-आहिस्ता अपने कदम बढ़ाए (ऑपरेशन्स की भाषा में ‘ग्रेडेड एस्केलेशन’ किया)।

निधि के कश्मीर पर डेमोक्रेसी वाली टिप्पणी पर अभिजीत ने कहा कि डेमोक्रसी की रक्षा सभी नागरिकों की सुरक्षा होती है, केवल किसी पत्थरबाज या दंगाई की नहीं। बता दें कि कार्यक्रम में दिए अपने संबोधन में निधि ने कहा था ‘कश्मीर में जो कुछ हो रहा है वह दरअसल लोकतन्त्र के बुनियादी सिद्धान्तों के खिलाफ है’।

निधि ने जब कहा कि कि कश्मीर में सभी राजनेताओं को बिना कुछ किए ही हिरासत में ले लिया गया। जिसके प्रत्युत्तर में अभिजीत ने कहा कि उन्हें ‘एहतियातन हिरासत’ में लिया गया है जिससे वे सूबे में शांति भंग न कर सकें।

निधि ने एक चौंकाने वाला बयान दिया था कि वहाँ कोई हिंसा नहीं होती थी, जिस पर अभिजीत ने उन्हें याद दिलाया कि कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा विस्थापित मजदूरों की नृशंस हत्या कर दी गई थी, सौरा में दंगे हुए थे। इसी बात को लेकर निधि पर तंज करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीयों के मारे जाने को निधि हत्या मानती ही कहाँ हैं।

निधि ने यह तो कहा कि एक बड़ा जनसमूह अवज्ञा आंदोलन कर रहा है, जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता, लेकिन दूसरा हिस्सा गोल कर गईं जिसमें जिहादी व्यापारियों और माल ढुलाई करने वालों को धमका रहे हैं, जान से मार रहे हैं। और, अभिजित के अनुसार, इस खेल में पीडीपी और नेशनल कॉन्फ़्रेंस के नेता भी शामिल हैं।

अभिजित ने यह भी कहा कि अभिवावक बच्चों को घाटी में स्कूल नहीं भेज रहे, स्कूलों को अख़बार में विज्ञापन देकर उसके ज़रिए पाठ्यक्रम पूरा कराना रहा है तो यह ‘अवज्ञा आंदोलन’ में नहीं हो रहा, बल्कि जिहादियों के डर से है।

अपनी बात रखते हुए अभिजीत ने आगे कहा निधि राज़दान कह यह कहना पूरी तरह से गलत है जिसमें वह कहती हैं कि अनुच्छेद 370 को हटाने से पहले वहाँ के लोगों से पूछा नहीं गया। उन्होने कहा कि कश्मीर की जनता मतलब सुन्नी समुदाय ही नहीं हैं। इस मुद्दे पर जनमत की बात करने वाले तब कुछ नहीं बोले जब सुन्नी मुख्यमंत्रियों ने कभी हिन्दू, दलित, बौद्ध और शिया से लेकर LGBTQ तक की कोई कद्र नहीं की।

निधि ने अपने वक्तव्य में कहा था कि जिन नेताओं ने भारत का झंडा उठाया हुआ था, उन्हें ही जेल में ठूँस दिया गया- इस पर अय्यर ने बताया कि आतंकियों के हिमायती हुर्रियत नेता गिलानी सहित कई आतंकियों ने संविधान की शपथ ली, चुनाव भी लड़े मगर इससे भारत के खिलाफ उनकी हरकतों का दाग नही धुल सकता। निधि के लॉजिक के मुताबिक तो तिरंगा थामने भर से कोई भी गुनाहगार अपने गुनाह से मुक्त हो जाता है।

निधि राज़दान ने न केवल भारत के खिलाफ लगभग अपने हर वाक्य में बोला, बल्कि जब भारत पर आरोप लगा कि उसने “5 लाख सैनिक” कश्मीर में तैनात कर रखे हैं तो निधि ने इस झूठ का भी खंडन नहीं किया। मित्रा ने ऑपइंडिया की तारीफ करते हुए लिखा कि तथाकित “राइट विंग कूड़े” ने तथ्य पेश किए, जबकि एनडीटीवी की कथित पत्रकार पाकिस्तान का झूठ फैलातीं पकड़ी गईं।

निधि के भाषण की हर एक पंक्ति में गलती होने पर कटाक्ष करते हुए अभिजित अय्यर-मित्रा ने कहा कि इतनी ज़्यादा गलतियाँ कोई जानबूझकर कर ही नहीं सकता। उन्होंने निधि राज़दान को ‘सचमुच में बेवकूफ़’ बताया और लोगों से उनकी मूर्खता के प्रति सहानुभूति और करुणा की अपील की।

पाकिस्तान के समर्थन में प्रोपेगंडा एनडीटीवी के लिए नया नहीं है। हाल ही में पाकिस्तान ने एनडीटीवी की ही एक फुटेज को अपने भारत-विरोधी एजेंडा को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया था। रवीश के पुलवामा के बाद भारत-पाकिस्तान को कवर न करने की नसीहत वाला वीडियो भी पाकिस्तानी मीडिया ने भारत-विरोधी एजेंडे के लिए हाथोंहाथ लिया था। एनडीटीवी को देखकर लगता है जैसे इन्हें इस बात का इंतजार है कि कब इनके प्रोपेगंडा से हिंदुस्तान में दंगा भड़के। निराधार बातों को फैलाकर एनडीटीवी चाहता है कि बेवजह दहशत और डर का माहौल बनाकर शांति भंग की जाए। इससे यह साफ़ झलकता है कि वे चाहते हैं ऐसी कोई दुर्घटना हो जिसमें लोग अपनी जान गँवा दें और फिर वे इस बात का ठीकरा केंद्र सरकार के सर फोड़ सकें।

शिवसेना का वकील कॉन्ग्रेसी कपिल सिब्बल, सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र के राज्यपाल के ख़िलाफ़ लड़ेंगे केस

महाराष्ट्र में सियासी गतिरोध के बीच शिवसेना अब राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने की तैयारी कर रही है। दरअसल, शिवसेना ने बहुमत सिद्ध करने के लिए राज्यपाल से तीन दिन का समय माँगा था, लेकिन राज्यपाल ने समय देने से इनकार कर दिया। पहले (भाजपा) और दूसरे (शिवसेना) सबसे बड़े दल के विफल हो जाने के बाद राज्यपाल ने नियमानुसार, तीसरे सबसे बड़े दल NCP को सरकार गठन के लिए आमंत्रित किया।

ख़बर के अनुसार, शिवसेना की तरफ से अदालत में यह मामला वरिष्ठ वकील और कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल द्वारा पेश किया जाएगा।

शिवसेना, जिसने सोमवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपने नामित अरविंद सावंत को बाहर निकाला, उसे राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी और कॉन्ग्रेस से समर्थन के साथ सरकार बनाने की उम्मीद की थी। हालाँकि, आदित्य ठाकरे की अगुवाई में शिवसेना के नेताओं ने महाराष्ट्र के राज्यपाल से मुलाक़ात के बाद बताया कि कॉन्ग्रेस और NCP सरकार बनाने के लिए तैयार हैं, लेकिन NCP और कॉन्ग्रेस दोनों ने स्पष्ट किया कि उन्होंने शिवसेना को समर्थन दिए जाने के संबंध में कोई पत्र नहीं भेजा है। कॉन्ग्रेस द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में इस बात का उल्लेख भी किया गया कि पार्टी शरद पवार से बात कर रही थी, और उन्होंने शिवसेना के बारे में किसी तरह का कोई ज़िक्र नहीं किया।

राज्यपाल ने शिवसेना को सरकार बनाने और बहुमत सिद्ध करने के लिए सोमवार (11 नवंबर) को शाम 7.30 बजे तक का समय दिया था। इस पर, शिवसेना नेताओं ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात की और उन्हें सूचित किया कि वे सरकार बनाने के इच्छुक हैं, लेकिन बहुमत सिद्ध करने के लिए उन्हें अतिरिक्त दो दिनों की आवश्यकता है।

राज्यपाल को समर्थन से जुड़े अपेक्षित पत्र को न दिखा पाने की स्थिति में उन्होंने तीसरी सबसे बड़ी पार्टी NCP के प्रमुख शरद पवार को राज्य में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। लेकिन, इसकी भी संभावना नहीं है कि NCP सरकार बनाने में सक्षम हो सकेगी। ऐसा इसलिए क्योंंकि जिस तरह के राजनीतिक समीकरण निकलकर सामने आ रहे हैं उससे ऐसा नहीं लगता कि शिवसेना उनका समर्थन करेगी। ऐसे में कॉन्ग्रेस और NCP मिलकल भी सरकार बनाने में विफल रहेंगे क्योंकि दोनों पार्टी को मिली कुल सीटें बहुमत सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं होंगी।

ताज़ा समाचार के अनुसार, महाराष्ट्र के राज्यपाल ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की सिफारिश की है, फिर भले ही NCP को बहुमत सिद्ध करने के लिए दी गई समय-सीमा समाप्त न हुई हो।

ग़ौरतलब है कि 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 105, शिवसेना को 56, कॉन्ग्रेस को 44 और NCP को 54 सीटें मिली है। भाजपा-शिवसेना और कॉन्ग्रेस-NCP ने मिलकर चुनाव लड़ा था। लेकिन, नतीजों के बाद शिवसेना ढाई साल के लिए सीएम का पद मॉंग रही थी जिसे भाजपा ने ठुकरा दिया। रविवार को भाजपा ने गवर्नर से कहा कि वह सरकार नहीं बनाएगी। इसके बाद राज्यपाल ने शिवसेना को न्योता दिया था।

‘आज शिवसैनिक कराह रहे होंगे, बाला साहेब ने सबको एक किया और कुछ ने सबको बिख़ेर दिया’

महाराष्ट्र में चल रही सत्ता की खींचतान में भारतीय जनता पार्टी के हर ओर के क्षत्रप अब मुखर होकर शिव सेना की आलोचना करने लगे हैं। केंद्रीय मंत्री और बिहार के कद्दावर भाजपा नेता गिरिराज सिंह ने एक फोटो अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर की है, जिसमें शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे को भाजपा के पितृ पुरुषों के साथ चर्चा करते हुए दिखाया गया है

इस फोटो के साथ गिरिराज सिंह ने कैप्शन में लिखा है, “बाला साहेब के वर्षों की तपस्या ने सनातनियों को महाराष्ट्र में एक उम्मीद और पहचान दिया…आज हिंदुत्व विरोधियों के साथ जाता देख बाला साहेब और शिवसैनिक कराह रहे होंगे। इतिहास गवाही देगा की कैसे बाला साहेब ने सबको एक किया और कुछ ने सबको बिख़ेर दिया।”

साफ ज़ाहिर है कि उनके निशाने पर बाला साहेब के सपूत और वर्तमान शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे हैं, जिन्होंने भाजपा के साथ शिवसेना का 30 साल पुराना गठबंधन लगभग खत्म कर दिया है। वे अड़े हैं कि भाजपा के साथ सरकार तभी शिवसेना बनाएगी जब उसे ढाई साल के लिए सीएम की कुर्सी और आधे-आधे मंत्रालय मिलेंगे, जबकि उनकी सीटें (56) भाजपा के 105 विधायकों से आधी के आसपास है। ऐसा न होने की सूरत में शिवसेना भाजपा को धमकी दे रही है कि वह 44 विधायकों वाली कॉन्ग्रेस और 54 विधायकों वाली राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (एनसीपी) के साथ भी सरकार बना सकती है। शिवसेना और एनसीपी हमेशा से महाराष्ट्र के मराठा अस्मिता के वोट बैंक के प्रतिद्वंद्वी दावेदार रहे हैं, और भाजपा के साथ होने और हिंदूवादी होने के चलते कॉन्ग्रेस ने भी शिवसेना को ख़ासा अपमानित किया था।

इसके बारे में शिवसेना की सफाई है कि भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह उसे 50-50 फॉर्मूले के तहत ढाई साल के लिए सीएम की कुर्सी और आधे-आधे मंत्रालय का वादा करके मुकर गए हैं, क्योंकि परिणामों में भाजपा की सीटें बहुत अधिक आ गईं थीं। लेकिन उसने इसके पक्ष में कोई सबूत पेश नहीं किया है। वहीं, चुनावी नतीजों के दो हफ्ते बाद भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने दावा किया कि कोई डील हुई ही नहीं थी और भाजपा 50-50 फॉर्मूले पर तैयार नहीं है।