कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मुलाक़ात के बाद शरद पवार के तेवर बदले-बदले नज़र आ रहे हैं। पवार ने बैठक के बाद कहा कि शिवसेना के साथ सरकार गठन को लेकर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष से कोई बातचीत ही नहीं हुई। पवार का ये बयान चौंकाने वाला है क्योंकि अब तक शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस गठबंधन द्वारा मिल कर सरकार बनाने की बातें मीडिया में चलाई जा रही थीं। एनसीपी के मुखिया आज सोनिया गाँधी के दिल्ली स्थित आवास पर पहुँचे और वहीं दोनों नेताओं की बैठक हुई।
बैठक के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए शरद पवार ने कहा कि उन्होंने सोनिया गाँधी को महाराष्ट्र की ताज़ा राजनीतिक परिस्थितियों से अवगत कराया। उन्होंने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को राज्य में चल रही राजनीतिक हलचल के बारे में जानकारी दी। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटनी भी इस दौरान बैठक में मौजूद थे। पवार ने कहा कि कॉन्ग्रेस और एनसीपी के कुछ नेता आपस में बात करेंगे और जो भी निष्कर्ष निकलेगा, उससे दोनों दलों के आलाकमान को अवगत कराएँगे।
Sharad Pawar on if Sonia Gandhi is opposed to forming Govt in alliance with Shiv Sena: There was no talk of Govt formation in our meeting, this meeting was all about discussing Congress and NCP. https://t.co/26TnM7lhRfpic.twitter.com/rghFDkuc6A
जब शरद पवार से पूछा गया कि क्या सोनिया गाँधी महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिल कर सरकार गठन करने के ख़िलाफ़ हैं, पवार ने कहा कि सरकार गठन को लेकर कोई बातचीत ही नहीं हुई। उन्होंने कहा कि किसी अन्य तीसरे दल के बारे में चर्चा हुई ही नहीं। बकौल पवार, उनकी और सोनिया की बैठक में सिर्फ़ कॉन्ग्रेस और एनसीपी को लेकर ही बातचीत हुई। इधर केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने कहा कि उन्होंने संजय राउत के सामने 3 साल भाजपा का और 2 साल शिवसेना का सीएम वाले फॉर्मूले को लेकर चर्चा की, जिसपर वो राजी भी हो गए। उन्होंने बताया कि अब वो इस सम्बन्ध में भाजपा से बात करेंगे।
शरद पवार के इस रुख से शिवसेना को झटका लगा है, जो लगातार अपने पास 170 विधायकों का समर्थन होने का दावा कर रही है। शिवसेना एनसीपी और कॉन्ग्रेस के समर्थन के बलबूते सरकार बनाने की बात करती आ रही है। वहीं सोनिया गाँधी शिवसेना की हिंदुत्ववादी विचारधारा के कारण उसे समर्थन देने से हिचक रही है। कॉन्ग्रेस के नव-निर्वाचित विधायक चाहते हैं कि महाराष्ट्र में पार्टी शिवसेना को समर्थन दे लेकिन आलाकमान इसके ख़िलाफ़ है। फ़िलहाल राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू है।
राजस्थान हाई कोर्ट ने सोमवार (नवंबर 18, 2019) को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ दाखिल एक अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया है। यह नोटिस अशोक गहलोत एवं मुख्य सचिव डीबी गुप्ता को जारी किया गया है। राजस्थान हाईकोर्ट के 2 जजों की बेंच ने नोटिस का जवाब देने के लिए अशोक गहलोत सरकार को 6 हफ्ते का वक्त दिया है।
दरअसल यह नोटिस 88 वर्षीय याचिकाकर्ता मिलाप चंद डांडिया की याचिका पर दिया गया है। अवमानना याचिका दायर करने वाले मिलाप चंद डांडिया का कहना है कि उन्होंने अवमानना याचिका इसलिए दायर की क्योंकि राजस्थान सरकार ने मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र का जवाब नहीं दिया। उनका कहना है कि उन्होंने अदालत के आदेश को लागू करने की माँग की थी।
मिलाप चंद डांडिया का आरोप है कि हाईकोर्ट का आदेश आने के 2 महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी गहलोत सरकार ने कोर्ट के फैसले को इंप्लीमेंट नहीं किया है। याचिका में गहलोत सरकार के ऊपर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने राजस्थान हाई कोर्ट के उस फैसले को क्रियान्वित नहीं किया, जिसके तहत कोर्ट ने यह आदेश दिया था कि राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्री सरकारी खर्चे पर आजीवन सुविधाएँ नहीं उठा सकेंगे। कोर्ट के इस आदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन मिलने वाली कुछ सुविधाओं में कटौती की बात कही गई थी।
बता दें कि राजस्थान हाईकोर्ट की ओर से दिए गए एक बड़े फैसले के तहत इसी साल के 4 सितंबर को पूर्व मुख्यमंत्रियों द्वारा ली जा रही आजीवन सुविधाओं पर रोक लगा दी गई थी। जस्टिस प्रकाश गुप्ता द्वारा 4 सितंबर को दिए गए फैसले के तहत राजस्थान मंत्री वेतन संशोधन अधिनियम 2017 को अवैध घोषित कर दिया गया था।
हाई कोर्ट का यह फैसला मिलापचंद डांडिया द्वारा दायर याचिका पर आया था। जिसमें राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगला, कार, ड्राइवर, टेलीफोन सेवाएँ और 10 कर्मचारी वाले स्टाफ जैसी सुविधा जिंदगी भर के लिए देने वाले कानून को चुनौती दी गई थी।
INX मीडिया मामले में पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। सोमवार को उनकी तरफ से वकील और कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अगुआई वाली पीठ के समक्ष याचिका पर जल्द सुनवाई का अनुरोध किया है।
उन्होंने पीठ से कहा कि पूर्व वित्त मंत्री पिछले 90 दिनों से जेल में हैं और उनकी जमानत याचिका पर मंगलवार या बुधवार को सुनवाई होनी चाहिए। इसके बाद पीठ ने सिब्बल से कहा कि हम देखेंगे कि केस को मंगलवार या बुधवार को सूचीबद्ध किया जाए।
Kapil Sibal makes first mentioning before new ChiefJustice of India SA Bobde.
Mentions bail matter of P Chidambaram, “Bail was rejected by High Court. He has been in jail for 90 days”, says Sibal, seeks urgent listing.
गौरतलब है कि बीते दिनों 15 नवंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय द्वारा INX मीडिया से जुड़े धनशोधन के मामले में चिदंबरम को जमानत देने से इनकार कर दिया था। साथ ही कहा था कि उनके ऊपर लगे आरोप पहली नजर में गंभीर प्रकृति के हैं और अपराध में उनकी भूमिका भी सक्रिय व प्रमुख रही है।
चिदंबरम पर इस मामले में लगभग ढाई साल पहले 15 मई 2017 को मामला दर्ज हुआ था। 21 अगस्त 2019 को उन्हें उनके घर से सीबीआई ने गिरफ्तार किया। इस मामले में गत माह 22 तारीख को उन्हें जमानत मिल गई थी, लेकिन ईडी द्वारा गिरफ्तारी के कारण वे बाहर नहीं आ सके। इसके बाद उन्होंने जमानत के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
चिदंबरम ने यह कहते हुए जमानत का अनुरोध किया था कि साक्ष्य दस्तावेजी प्रकृति के हैं और ये जाँच एजेंसियों के पास हैं, इसलिए वे उनमें छेड़छाड़ नहीं कर सकते। ईडी ने उनकी याचिका का विरोध करते हुए कहा कि वह भले ही दस्तावेजी साक्ष्यों से छेड़छाड़ न कर पाएँ, लेकिन वे गवाहों को प्रभावित करने तथा धमकी देने की कोशिश कर सकते हैं। चिदंबरम ने सीबीआई मामले में जमानत मिलने के 22 अक्टूबर के आदेश का भी हवाला दिया था और कहा था कि भ्रष्टाचार के मामले में उनके खिलाफ साक्ष्य से छेड़छाड़ करने, विदेश भागने और गवाहों को प्रभावित करने का कोई सबूत नहीं है। इसके बाद हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था।
बीते कुछ सालों में प्रदूषण और श्वास सम्बन्धी बीमारियों के चलते हिन्दुस्तानियों की आदत बनी है कि वे सर्जिकल मास्क पहनने के आदी हो रहे हैं। यह सिलसिला भारत की राजधानी दिल्ली से लेकर अमेरिका के मैनहैटन तक फ़ैल चुका है। 2002 में SARS और 2006 में बर्ड-फ्लू के बाद इबोला जैसे संकट में भी लोगों ने मास्क लगाकर इस संकट से निजात पाई, ऐसे में एहतियात बरतने वाले ज़्यादातर लोग एशियाई थे। हिंदुस्तान की एक बड़ी आबादी आज प्रदूषण की चपेट में है और इससे बचने के लिए मास्क का इस्तेमाल करती है।
अगर इस मास्क को पहनने का इतिहास खंगालें तो पता चलता है कि इसकी शुरुआत जापान से हुई थी। एक मीडिया रिपोर्ट के हवाले से पता चलता है कि बीसवीं शताब्दी में पहले विश्वयुद्ध के दौरान तकरीबन 20-40 मिलियन लोगों की मौत हुई जोकि उस समय विश्व की आबादी का 5% है। इन मौतों के चलते कई बीमारियाँ फैलना शुरू हुईं।
इसी दौरान स्कार्फ से लेकर मास्क का चलन शुरू हुआ। लोग बीमारियों से न मरें इसके लिए उन्होंने इस आदत को तबतक जारी रखा जबतक कि 1919 में इससे फैली महामारी का अंत नहीं हो गया। 1923 में आए ‘ग्रेट कांटो’ भूकंप ने जापान में रहने वाले कई लोगों के घरों को उजाड़ कर रख दिया। इस घटना ने वहाँ रहने वाले करीब छ: लाख लोगों के लिए उस जगह को नरक में तब्दील कर दिया। इस प्राकृतिक आपदा से इलाके में सब तरफ धुआँ और राख फ़ैल गया। इसके बाद भी लोगों ने जो सबसे पहला एहतियात अपनाया वह चेहरे पर पहना जाने वाला मास्क था।
जापान अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण कई आपदाओं के काफी करीब रहा है। आपदाओं में होने वाली मौतें अक्सर संक्रमण लाती हैं जिनसे महामारी फैलती है। जापान में 1934 के ग्लोबल फ़्लू ने वहाँ मास्क-प्रेम को एक बार फिर से उजागर कर दिया। इसके बाद सर्दी के वक़्त मास्क पहनना एक प्रचलन बन गया। इसका बड़ा कारण था कि ज़रा सा संक्रमण भी एक से दूसरे व्यक्ति तक न पहुँचे।
1950 के दशक में जापान की औद्योगिक क्रांति तेज़ी से बढ़ रही थी। नतीजतन हुआ यह कि इस तेज़ी के चलते हवा में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा इतनी बढ़ गई कि इसने फिरसे जापान के लोगों को मास्क से उनके लगाव की याद दिला दी। आज एक साल में करीब 230 बिलियन डॉलर के सर्जिकल मास्क अकेले जापान वाले खरीदते हैं। जापान से सटे चीन और कोरिया जैसे देश भी प्रदूषण के इन्ही हालातों को झेलने के लिए मजबूर हैं यही वजह है कि उन्होंने भी यही रास्ता अपना लिया है। क्वार्टज़ की रिपोर्ट के मुताबिक जाँच में यह भी पाया गया कि एक लम्बे अरसे से मास्क लगाने के चलते जापान में यह एक प्रचलन सरीखा हो गया है, यही वजह है कि वहाँ के स्वस्थ बच्चे भी अब मास्क लगाकर घूमते हैं।
महाराष्ट्र में सरकार गठन की कोशिशों के बीच शिवसेना का बयान लगातार बदल रहा है। अब शिवसेना के नेता संजय राउत ने कहा है कि ढाई साल के लिए नहीं तो कम से कम 2 साल के लिए तो मुख्यमंत्री का पद उनकी पार्टी को मिलना ही चाहिए। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रामदास आठवले ने ऐसा दावा किया है। आठवले ने कहा कि संजय राउत कम से कम 2 साल के लिए मुख्यमंत्री का पद शिवसेना को मिलने पर भाजपा के साथ सरकार बनाने के लिए राजी हैं। बकौल आठवले, नए फॉर्मूले के तहत 3 साल भाजपा का सीएम रहेगा और 2 साल शिवसेना का।
हालाँकि, भाजपा साफ़-साफ़ कहती आ रही है कि मुख्यमंत्री उसकी ही पार्टी का होगा और वो भी पूरे पाँच सालों के लिए। ऐसे में लगता है कि 50-50 की बात कर रही शिवसेना अब मोलभाव करते हुए 60-40 पर राजी होती दिख रही है। केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले के इस बयान के बाद भाजपा की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। आठवले के अनुसार, राउत ने कहा कि अगर भाजपा 60-40 फॉर्मूले पर राजी हो जाती है तो शिवसेना को कोई समस्या नहीं है। आठवले ने बताया कि अब वो इस फॉर्मूले पर विचार-विमर्श करने के लिए भाजपा के पास जा रहे हैं।
Union Minister Ramdas Athawale: I had talked to Sanjay Raut ji about a compromise. I suggested him a formula of 3 years (CM from BJP) and 2 years (CM from Shiv Sena) to which he said that if BJP agrees then Shiv Sena can think about it. I will discuss this with BJP. pic.twitter.com/VRn7AiVgHF
दरअसल, आठवले ने ही इस फॉर्मूले को शिवसेना के समाने रखा था, जिसपर संजय राउत ने सहमति जताई। उधर शरद पवार ने अपने बयान से शिवसेना को सकते में डाल दिया है। पवार ने कहा कि सरकार का गठन कैसे होना है, इस बारे में भाजपा और शिवसेना सोचे। उन्होंने मीडिया में चल रही उस चर्चा को नकार दिया, जिसमें कहा जा रहा था कि शिवसेना और एनसीपी मिल कर सरकार बना रही है। फ़िलहाल शरद पवार दिल्ली में सोनिया गाँधी के साथ बैठक कर रहे हैं।
रामदास आठवले ने इससे पहले भी कहा था कि अमित शाह महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर आश्वस्त हैं। आठवले ने बताया था कि शाह ने उन्हें महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना ही मिल कर सरकार बनाएगी, बस थोड़ा इंतजार करने और धैर्य रखने की ज़रूरत है। अब देखना यह है कि 60-40 का फॉर्मूला लेकर आठवले जब भाजपा के पास जाएँगे, तब उधर से क्या जवाब आएगा?
पानीपत का तीसरा युद्ध मराठा साम्राज्य और अफ़ग़ानिस्तान के बादशाह अहमद शाह दुर्रानी के बीच हुआ था। वह युद्ध इतना भीषण था कि उसमें 1 लाख मराठा सैनिकों के मारे जाने की बात कही जाती है। इस युद्ध में मराठा सेना का नेतृत्व सदाशिव राव भाउ ने किया था। वो छत्रपति और पेशवा के बाद तीसरे स्थान पर आते थे। युद्ध में सदाशिव राव का साथ श्रीमंत विश्वास राव पेशवा ने दिया था। वो पेशवा बालाजी बाजीराव भट्ट के बेटे थे। युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई। इससे आहत सदाशिव अपने हाथी को छोड़ कर घोड़े पर सवार हुए और दुर्रानी की सेना पर प्रलय बन कर टूट पड़े। मराठा सेना ने हाथी के ऊपर सदाशिव का स्थान खाली देख कर सोचा कि उनके सेनापति मारे गए हैं। सेना में भगदड़ मच गई और दुर्रानी ने इसका फ़ायदा उठाया। सदाशिव भी वीरगति को प्राप्त हुए।
ये कहानी यहीं से शुरू होती है। जनवरी 1761 में हुए इस युद्ध के बाद उसी साल जून में एक 16 वर्ष के लड़के ने राजाराम भोंसले के छत्र तले मराठा साम्राज्य की कमान सँभाली। वो विश्वास राव के भाई थे। उन्होंने पानीपत के युद्ध की हार को क़रीब से देखा था। उन्हें पता था कि ये लड़ाई अहमद शाह दुर्रानी से नहीं, बल्कि अवध के नवाब शुजाउद्दौला और अफ़ग़ान रोहिल्ला के साथ भी थी। इन सभी ने गठबंधन बना कर मराठा साम्राज्य को चुनौती दी थी। उस 16 वर्ष के लड़के का नाम था माधवराव। माधवराव मराठा साम्रज्य के 8वें पेशवा थे। पानीपत के तीसरे युद्ध ने न सिर्फ़ उनके भाई विश्वासराव, बल्कि उनके चाचा सदाशिव राव की भी बलि ले ली थी। यह बहुत ही कठिन समय था।
उनके पेशवा बनने के एक महीने पहले ही उनके पिता नानासाहब की मृत्यु हो गई थी। हैदराबाद का निज़ाम मराठा साम्राज्य पर बुरी नज़र रखे हुए था। सदाशिव के नेतृत्व में मराठों ने उसे फ़रवरी 1760 में धूल चटाई थी, पानीपत के तीसरे युद्ध के लगभग 1 वर्ष पहले। वह अपनी खोई ज़मीन वापस पाने को बेचैन था। निज़ाम ने उस युद्ध में अहमदनगर, दौलताबाद, बुरहानपुर और बीजापुर जैसे बड़े क्षेत्र गँवा दिए थे। ऐसी कठिनाइयों के बीच मराठा को पुनर्जीवित करने का श्रेय माधवराव को दिया जाता है। भले ही नवंबर 18, 1772 में कम उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन उससे पहले उन्होंने ऐसे-ऐसे कारनामे किए कि इतिहास में उनका नाम दर्ज हो गया।
अपनी मृत्यु के वर्ष ही जनवरी में उन्होंने मुग़ल बादशाह शाह आलम II को फिर से दिल्ली में स्थापित किया। इससे पहले आलम इलाहबाद में निर्वासन की ज़िंदगी जी रहे थे। लेकिन माधवराव की पहली बड़ी परीक्षा हुई दिसंबर 1761 में, जब निज़ाम ने मौके की ताक में पुणे की ओर कूच किया। रघुनाथराव के नेतृत्व में मराठों ने फिर से निज़ाम को धूल चटाई। हालाँकि, इस युद्ध में सेना का नेतृत्व करने वाले माधवराव के चाचा रघुनाथराव भी पेशवा बनना चाहते थे और एक तरह से पुणे में आंतरिक कलह चल रहा था। लेकिन, निज़ाम इसका फ़ायदा नहीं उठा पाया। उधर, जयपुर का राजपूत राजा माधव सिंह भी मराठा के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले हुए था।
Tomorrow is the 247th death anniversary of Madhavrao Peshwa..
Respects will be paid at his statue at Peshwe park #Pune by the Mayor and members of the Peshwa family.
अगस्त 1763 में निज़ाम और मराठा एक बार फिर आमने-सामने थे। रघुनाथराव भी मराठा सेना का नेतृत्व कर रहे थे। निज़ाम ने पुणे की ओर बढ़ते समय मंदिरों को तोड़ा था। माँ पार्वती की प्रतिमा को खंडित कर दिया था। क्रोधित रघुनाथराव ने बदला लेने की ठान रखी थी। लेकिन उन्हें अपने भतीजे का प्रभुत्व भी नहीं पसंद था। गोदावरी के दक्षिणी किनारे पर स्थित राक्षसभुवन क्षेत्र में दोनों सेनाएँ भिड़ीं। निज़ाम का वजीर विट्ठल सुन्दर हैदराबाद की सेना का नेतृत्व कर रहा था। मराठा इतिहास पर कई पुस्तकें लिख चुके उदय कुलकर्णी के अनुसार, युद्ध के बीच में अचानक से रघुनाथराव दुश्मनों से घिर गए थे। तब माधवराव की रणनीतिक चपलता के कारण उनकी जान बची और हैदराबाद का वज़ीर मारा गया। इसके बाद चाचा भी समझ गए कि भतीजे में कुछ बात है और आंतरिक कलह भी कम हो गई।
अमरनाथ डोगरा अपनी पुस्तक ‘दत्तोपंत ठेंगड़ी जीवन दर्शन (वॉल्यूम 3)’ में एक घटना का जिक्र करते हैं, जिससे हमें माधवराव पेशवा के व्यवहार और सोच का पता चलता है। एक बार हाथियों की लड़ाई आयोजित की गई थी, जिसे देखने के लिए पेशवा भी मौजूद थे। तभी एक हाथी पागल हो उठा और वो दर्शक दीर्घा में पेशवा की ओर दौड़ पड़ा। उनका अंगरक्षक खंडेराव बहुत बहादुर था। बावजूद इसके वह वहाँ से भाग खड़ा हुआ। माधवराव बाल-बाल बचे। बाद में लोगों ने उनसे अनुरोध किया कि भाग खड़े होने वाले अंगरक्षक को कार्यमुक्त कर दें। लेकिन, पेशवा माधवराव ने ऐसा नहीं किया। उनका मानना था कि वीर से वीर व्यक्ति भी असमंजस की स्थिति में भयाक्रांत हो जाता है।
रघुनाथ राव भी बहादुर थे। उन्होंने सिंध के पार तक भगवा ध्वज लहराया था। माधवराव द्वारा जान बचाए जाने के 4 वर्षों बाद उन्होंने फिर से बगावती तेवर तेज़ कर दिए। इन कलह के कारण पेशवा को कर्नाटक और उत्तर भारत के कई हिस्सों में सैन्य अभियान का विचार त्यागना पड़ा। एमएस नरवणे अपनी पुस्तक ‘Battles of the Honourable East India Company: Making of the Raj‘ में लिखते हैं कि पेशवा माधवराव उदार थे और परिवार के बीच युद्ध को टालने के लिए उन्होंने बहुतों बार प्रयास किया। वो बड़ों का सम्मान करते थे। अंततः युद्ध हुआ और थोड़प के युद्ध में रघुनाथराव की हार हुई। उन्हें पुणे लाया गया। लेकिन पेशवा ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं की। बस उनकी सक्रियता कम की गई। नरवणे लिखते हैं कि पेशवा की अति-उदारता एक ग़लती थी, क्योंकि रघुनाथ राव सुधरने वाले लोगों में से नहीं थे।
Even while constantly facing the internal power struggle with Raghunathrao (uncle), he assembled a great leadership team of Mahadji Shinde, Holkars and others, along with Nana Phadnavis (who later held the empire together for over two decades…)https://t.co/zA9dVVAnRfpic.twitter.com/Eo1rDpaRMP
इसी तरह जानोजी भोंसले भी पेशवा के ख़िलाफ़ था। वो रघुनाथराव की तरफ़ था। माधवराव ने उसे ठीक करने के लिए निज़ाम का इस्तेमाल किया। इसके बाद भोंसले आजीवन पेशवा के प्रति वफादार बना रहा। उसने 8 लाख रुपए के मूल्य के क्षेत्र भी पेशवा के हवाले किया। मैसूर का हैदर अली भी मराठा का दुश्मन था। सन 1771 में उसे भी पराजित किया गया। रुहेलों, राजपूतों और जाटों को भी मराठा साम्राज्य के आधीन लाने का श्रेय माधवराव को ही जाता है। असल में माधवराव ने हैदर अली को कई बार हराया था। उसे 1762 में भी पराजित किया गया था, लेकिन वो जंगलों में भाग गया। अगर उस वक़्त बीमारी की वजह से पेशवा को वापस पुणे नहीं लौटना होता तो शायद न मैसूर का राज रहता और न ही टीपू सुल्तान।
मई 1764 में हैदर अली को जंगलों से खींच कर निकाला गया और उसे पराजित किया गया। प्रोफ़ेसर एआर कुलकर्णी अपनी पुस्तक ‘The Marathas‘ में लिखते हैं कि इस युद्ध के बाद हैदर अली और उसका खानदान मराठा नाम सुन कर ही काँप उठता था। इसके बाद 1765 में माधवराव ने हैदर अली के ख़िलाफ़ फिर से मोर्चा खोला और स्वयं सेना का नेतृत्व किया। हैदर अली को फिर पराजित किया गया और बदले में उसने जो भी मराठा क्षेत्र कब्जा रखे थे, वो वापस आ गए। जब अंग्रेजों और मैसूर के बीच युद्ध हुआ, तब दोनों पक्ष पेशवा को अपनी तरफ करना चाह रहे थे। लेकिन बदले में पेशवा ने निज़ाम को उखाड़ फेंकने की शर्त रख दी, जिसने अंग्रेजों को सहमा दिया। अंग्रेजों को लगा कि इससे मराठा साम्राज्य की शक्ति दुगुनी हो जाएगी।
ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी मराठा दिल्ली की तरफ़ बढ़े। वहाँ पहुँच कर उन्होंने मुग़ल बादशाह को उसका खोया हुआ सिंहासन दिलाया। इससे पहले माधवराव ने दिल्ली भेजे सेनानियों को पत्र लिख कर कहा था कि उस क्षेत्र में उपस्थित 50,000 मराठा सैनिकों का फायदा उठाया जाए और दिल्ली सहित आसपास के क्षेत्रों में ऐसे लोगों को बिठाया जाए, जो मराठा के अधीन कार्य करें। मुग़ल बादशाह ऐसा करने के लिए राजी हुआ और इसीलिए उसकी ताजपोशी कर दी गई। माधवराव ने अपने पूर्वजों की ग़लतियों से सीख ली। उन्होंने मराठा कमांडरों से कहा कि स्वार्थी होने से बात बिगड़ जाती है। इससे पहले मराठा सरदार एक-दूसरे की खामियाँ निकाल कर जीती हुई बाज़ी हार जाते थे। माधवराव ने इस समास्या की ओर ध्यान देते हुए इसे ख़त्म किया।
पेशवा माधवराव ने मराठा साम्राज्य को फिर उसी स्वर्णयुग में वापस पहुँचा दिया, जहाँ वो पानीपत के युद्ध के पहले था। हजारों सैनिकों के मारे जाने और लाखों लोगों के तबाह होने के बाद एक 16 साल के बच्चे ने कमान अपने हाथ में ली और एक दशक में भारत का मानचित्र बदल कर रख दिया। दुर्भाग्यवश 1772 में माधवराव का मात्र 27 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्हें क्षय रोग (टीबी) हो गया था। माधवराव 11 साल की अवधि में ही वो कर गए, जिसे करने में बड़े बड़े-बड़े योद्धाओं को दशकों लगे। छत्रपति शिवाजी के सम्राज्य को उन्होंने चारों ओर फैलाया। पारिवारिक कलह और चारों ओर दुश्मनों से घिरे रहने के बावजूद इतनी कम उम्र में दिल्ली में भगवा लहराना आसान काम नहीं था।
कॉन्ग्रेस पार्टी में अब महिला कार्यकर्ताओं का असंतोष सामने आ रहा है। उत्तराखंड की राजधानी में महिला कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं की राज्य कार्यकारिणी की बैठक बुलाई गई थी। इस बैठक में पार्टी की सैकड़ों महिला कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। उन सभी ने राज्य सरकार की आलोचना तो की ही, लेकिन उपस्थित कॉन्ग्रेस पदाधिकारी तब चकित रह गए जब उन महिलाओं ने अपनी ही पार्टी की आलोचना शुरू कर दी। महिला कार्यकर्ताओं ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी में मेहनत करने वालों को टिकट नहीं दिया जाता।
ये बैठक देहरादून के राजीव भवन में हुई। महिला कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने साफ़ कहा कि जब राजनीति में भागीदारी की बात आती है तो सांसदों और विधायकों की पत्नियों को टिकट दे दिया जाता है। उन्होंने कहा कि ज़मीन पर मेहनत करने वाली महिला कार्यकर्ताओं की पार्टी में कोई इज्जत नहीं है। उन्होंने प्रभारी और प्रदेश उपाध्यक्ष को सम्बोधित करते हुए स्पष्ट कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी महिलाओं की उपेक्षा कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सांसदों व विधायकों की जिन पत्नियों को टिकट दिया जाता है, उनका पार्टी के कार्यक्रमों से कोई लेना-देना नहीं होता।
महिला कॉन्ग्रेस की कार्यकर्ताओं ने इसे उत्पीड़न करार दिया। उन्होंने पूछा कि मेहनत करें कार्यकर्ता और टिकट दिए जाएँ पैसे वालों को? कार्यकर्ताओं का गुस्सा देख कर पार्टी प्रभारी परविंदर कौर और प्रदेश अध्यक्ष सरिता आर्य से कुछ कहते नहीं बना। वो दोनों कार्यकर्ताओं की बातों को सुनती रह गईं। महिलाओं ने कहा कि कॉन्ग्रेस को ये समझने की ज़रूरत है कि महिलाएँ किसी भी स्तर पर कम नहीं हैं। उन्होंने आधी आबादी को समान प्रतिनिधित्व दिए जाने की भी वकालत की।
महिला कॉन्ग्रेस की कार्यकर्ताओं ने कहा कि उनकी बातों को पार्टी आलाकमान के सामने उठाने की ज़रूरत है। बता दें कि कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष इस वक़्त सोनिया गाँधी हैं। महिला अध्यक्ष के रहते पार्टी में महिलाओं द्वारा इस तरह के आरोप लगाना कॉन्ग्रेस के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। एक ईसाई परिवार पिछले तीन दिन से चार साल की मृत बच्ची को जिंदा करने की कोशिश में लगा हुआ है। जिले के भुडकुडा थाने के सिसवार गाँव में रहने वाले अरविंद और उनका परिवार चार साल की मृत बेटी को वापस जिंदा करने के लिए प्रभु यीशु की प्रार्थना कर रहे हैं। हद तो तब हो गई जब वह पुलिस के समझाने पर भी वे नहीं माने और बच्ची के शव के पास बाइबल पढ़ते रहे।
गुरुवार (नवंबर 14, 2019) शाम बच्ची की मौत हो गई थी। लेकिन दफनाने की बजाए परिजन शव को उत्तर प्रदेश के मऊ के करुबीर गाँव में अपने रिश्तेदार के घर ले गए और वहाँ उसके जीवित होने के लिए ‘प्रार्थना’ करने लगे। बता दें कि कुछ साल पहले ईसाई धर्म को अपनाने वाले इस परिवार को उसके समुदाय के लोगों ने आश्वस्त किया था कि बच्चे को यीशु से प्रार्थना करके पुनर्जीवित किया जा सकता है।
गुरुवार की शाम अरविंद की बेटी महिमा को उल्टी और पेट में दर्द शुरू हुआ, जिसके बाद उसे जिला अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने महिमा को उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के एक दूसरे अस्पताल में रेफर कर दिया। हालाँकि, महिमा की हालत बिगड़ गई और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
इसके बाद बच्ची के पिता अरविंद उसके शव को लेकर अपने ससुराल पहुँच गए। वहाँ पर तीन दिनों तक मृत बच्ची के शव के रखकर परिवार वाले उसे जीवित करने की प्रार्थना करने लगे। जौनपुर निवासी राजेंद्र चौहान के कहने पर अरविंद ने बच्ची के शव को नहीं दफनाया। राजेंद्र के कहने पर गाँव के कुछ लोगों ने बच्ची के जिंदा होने की उम्मीद से उसे एक झोपड़ी में रख दिया और प्रर्थना करने लगे। लगातार तीन दिन से चल रही प्रार्थना की सूचना मिलने पर एसपी अनुराग आर्य ने एसओ विनोद कुमार तिवारी को पुलिस की एक टीम के साथ जाँच के लिए भेजा।
एसओ ने परिवार वालों को बहुत समझाया लेकिन परिजन शव का दफनाने के लिए तैयार नहीं हुए। पूछताछ में पता चला कि इस अंधविश्वास में पूरा गाँव शामिल था। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि गाँव की सरिता नाम की एक लड़की को भी डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था, लेकिन यीशु से प्रार्थना के बाद वह ‘पुनर्जीवित’ हो गई और अब अपने परिवार के साथ रह रही है। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि ईसाई ग्रामीण जो अज्ञानी लोगों को अंधविश्वास की ऐसी प्रथाओं में विश्वास करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, वो पिछले 12 सालों से जबरन धर्मांतरण भी करवा रहे थे।
डॉ फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध काशी हिन्दू विश्विद्यालय के कुलपति आवास के बाहर जारी है। संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों की कुलपति से हुई मुलाकात भी बेनतीजा रही लेकिन छात्र अभी भी अपनी माँगों और मूल्यों को लेकर धरने पर हैं। यहाँ एक बात गौर करने वाली यह भी है कि छात्रों का विरोध JNU के प्रोफ़ेसर वर्तमान वाईसचांसलर राकेश भटनागर के सामने JNU की तर्ज पर न होकर अपने आपमें सभी नैतिक मूल्यों को समाहित किए हुए वैदिक परंपरागत रीति से ही जारी है। छात्र कभी बुद्धि-शुद्धि यज्ञ कर रहे हैं तो कभी रुद्राभिषेक तो कभी प्रदर्शन के तौर पर हनुमान चालीसा का पाठ जारी है। यही वो मूल्य हैं जिनके रक्षार्थ ये छात्र इतनी सर्दी में भी वहाँ दिन-रात डटे हैं। कई छात्रों की इस दौरान तबियत भी ख़राब हो गई लेकिन अपने संकल्पों हेतु डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध जारी है।
विरोध का तरीका भी वैदिक
ऑपइंडिया से बात करते हुए शशिकांत मिश्रा, कृष्णा, शुभम, चक्रपाणि ओझा सहित SVDV के कई छात्रों ने बताया, “हम इसलिए संघर्ष कर रहे हैं कि यदि हम आज फेल भी हो गए तो आज से 20 साल बाद जब हम अपने मातृ संस्थान की तरफ देखेंगे तो अफ़सोस थोड़ा कम होगा कि हमने संघर्ष किया था लेकिन धनलोलुपता और ‘छद्म सेक्युलरिज्म’ की आड़ में महामना मालवीय जी के भावनाओं और दृष्टिकोण के साथ खिलवाड़ किया गया वो भी उसी जगह जहाँ आज भी उनकी आत्मा बसती है।”
कई शोध छात्रों ने यह बात डंके की चोट पर कही कि बेशक आज बीबीसी, वायर, क्विंट, प्रिंट जैसे पोर्टल और कई मीडिया संस्थान इसे मजहबी स्वरुप देकर ये खुलेआम लिख रहे हों कि BHU में एक संस्कृत के प्रोफ़ेसर का विरोध उसके मजहब के कारण हो रहा है वो भी ‘संस्कृत विभाग’ में, मंगलेश डबराल के लेख में दो हाथ और आगे जाते हुए बीबीसी ने डॉ. फिरोज खान को ‘पद्म श्री’ भी दे डाला है ताकि वो ‘ज़्यादा योग्य’ लगें लेकिन क्यों दिया गया इस पर मौन है। यही वामपंथियों और देश की पारम्परिक संस्कृति, वैदिक धर्म, सनातन परंपरा का विरोध करने वालों की बहुत पुरानी चाल है कि हर बात को ब्राह्मणवाद से जोड़ देना। जिसे बीबीसी ने इस बार भी बखूबी अंजाम दिया है। झूठ और फेक न्यूज़ को कैसे परोसा जाता है इसे आप अक्सर बीबीसी पर देख सकते हैं जिसे वो तथाकथित बड़े नामों की चाशनी में लपेट कर परोसता है कि झूठ न पकड़ा जाए लेकिन बार-बार पकड़े जाने के बावजूद बीबीसी बाज नहीं आता।
बीबीसी में छपा मंगलेश डबराल का लेख बीबीसी में ही छपा वुसअतुल्लाह खान का लेख
यहाँ ये स्पष्ट करना ज़रूरी है कि डॉ. फिरोज खान को देश ने नहीं बल्कि बीबीसी ने अपने झूठ को प्रामाणिक बनाने के लिए ‘पद्म श्री’ दे डाला। इस बात की तस्दीक SVDV के पूर्व शोध छात्र और वर्तमान में असिस्टेंट प्रोफेसर (कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक, नागपुर, महाराष्ट्र) सौरभ द्विवेदी ने भी की। उन्होंने साफ-साफ यह आरोप दोहराया कि बीबीसी सहित कई मीडिया संस्थान ये झूठ फैला रहे हैं कि डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति संस्कृत विभाग में हुई, उन्हें स्पष्ट कर दूँ कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग कला संकाय के अंतर्गत आता है और फिरोज खान की नियुक्ति ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ में हुई है। हम यहाँ अपनी परम्पराओं और मालवीय मूल्यों की रक्षा हेतु विरोध कर रहे हैं। हमारा विरोध सिर्फ किसी दूसरे मजहब का विरोध नहीं है। यहाँ हुई नियुक्ति सिर्फ संस्कृत भाषा से नहीं जुड़ी इस संकाय का मूल ‘धर्म विज्ञान’ में छिपा है।
इस पूरे खेल के मुख्य अभियुक्त चतुर्वेदी जी के ही शोध छात्र सौरभ द्विवेदी ने ये दावे के साथ कहा, “SVDV में फिरोज खान की यह नियुक्ति पैसों और नेक्सस के सिवाय और किसी आधार पर नहीं हुई है। पैसों के लालची साहित्य विभागाध्यक्ष ने अपने 5 साल पुराने विश्वसनीय स्टूडेंट को पैसे लेकर नियुक्त किया है, बस इतनी सी बात है।” सौरभ द्विवेदी सहित सभी शोध छात्रों ने माँग की कि इस नियुक्ति का विश्वविद्यालय प्रशासन से इतर किसी स्वतंत्र संस्था से जाँच होनी चाहिए, फिर अपने आप सारा कच्चा चिट्ठा खुल जाएगा।
ऑपइंडिया से बात करते हुए डॉ. सौरभ द्विवेदी ने बताया, “फ़िरोज खान के मुस्लिम होने का उन्हें कोई नुकसान नहीं है, बल्कि फायदा ही है। कुछ लोग मालवीय मूल्यों, संविधान और मुस्लिम होने की बात को लेकर अधिक भ्रमित हैं। आपको बता दूँ कि किसी भी संस्था की स्थापना के पीछे उसके संस्थापक का एक उद्देश्य होता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ‘हिन्दू’ शब्द और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के ‘धर्म’ शब्द में संस्थापक की बहुत सारी अवधारणाएँ निहित हैं। हमारी परम्परा नामकरण संस्कार करने की रही है, और हम सबसे सार्थक नाम चुनने की कोशिश करते हैं, यह सभी को समझना चाहिए।”
सौरभ द्विवेदी ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि एक घर बनाने में जब हम सबकी जिंदगी खप जाती है। तब संसाधन-विहीन एक व्यक्ति मदन मोहन मालवीय ने आज के एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय की नींव रखी। भीख माँगकर 40 हजार लोगों के पढ़ने और रहने की जगह बनाई। जब भारत में ब्रिटिश शासन अंग्रेजी मूल्यों वाली शिक्षा को मानक शिक्षा के तौर पर स्थापित कर रही थी तब उन्होंने ‘हिन्दू’ मूल्यों के संरक्षण के लिए एक विश्वविद्यालय की परिकल्पना की थी। महात्मा गाँधी ने उन्हें ‘महामना’ कहा। आज संविधान में स्पष्ट निर्देश न होने का बहाना करके उनके मूल्यों की जो अनदेखी की गई है, वह मर्माहत करने वाला है।
आपको बता दूँ कि जब SVDV का एक प्रतिनिधि मंडल कुलपति से मिलने गया तो उन्होंने इस बात को ढाल बनाना चाहा कि “मालवीय जी एक व्यक्ति हैं वो गलत हो सकते हैं और मेरे पास 1969 का संशोधित BHU एक्ट है जिसमें यह नहीं लिखा है कि वहाँ मुस्लिम की नियुक्ति नहीं होगी। शिलालेख मैं नहीं जानता मेरे लिए संविधान सब-कुछ है।”
जानकारी के लिए बता दूँ कि मैं भी उसी विश्विद्यालय का छात्र हूँ और आज जिस देश के संविधान और कॉन्ग्रेस के दौर में BHU के संशोधित संविधान का वाईसचांसलर हवाला दे रहे हैं तो यहाँ इस बात का जिक्र करना ज़रूरी है कि मालवीय जी का 1946 में गुलाम भारत में महाप्रयाण हुआ और वे संविधान-निर्माण का हिस्सा नहीं रहे। लेकिन जिन विचारों और उद्देश्यों को लेकर उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की नींव रखी वो आज भी ज़िंदा है, आज भी उनके विचार जीवित हैं और उतने ही प्रासंगिक है, जितने तब थे।
सौरभ द्विवेदी भी इस बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि विश्वविद्यालय के दीवारों और पत्थरों पर उनके संदेश पढ़ते हुए हम जवान हुए हैं। हिन्दू विश्वविद्यालय के हम जैसे छात्र उन विचारों को आत्मसात् करने की कोशिश करते हैं। विश्वविद्यालय की दीवारों पर वेदों उपनिषदों के मन्त्र पढ़े हैं हमने। विश्वनाथ मंदिर में खुदे 18 अध्याय गीता को देखकर नतमस्तक हुए हैं। हिन्दू मूल्यों के संरक्षण में मालवीय जी जैसा बनने का सपना देखा है। हमेशा आदर्श माना है। जो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ा है, या पढ़कर भी श्रद्धाविहीन हैं, हम उनसे इस आस्था की उम्मीद बिल्कुल नहीं करते। उनकी धर्म-निरपेक्षता ईमानदार है। लेकिन जो लोग इस आस्था से जुड़े हैं, उनका चुप रहना आज जरूर अखर रहा है।
आगे बढ़ने से पहले एक बात और जान लेते हैं कि बार-बार डॉ. फिरोज खान के इस नियुक्ति के विरोध में ‘मालवीय मूल्यों’ का हवाला दिया जा रहा है तो समझिए हिन्दू धर्म के सन्दर्भ में मालवीय मूल्य क्या हैं इसकी बानगी बस इससे समझ लीजिए कि 1906 में ‘मुस्लिम लीग’ की स्थापना और मुस्लिमों के अनावश्यक माँगों को देखकर 1915 में महामना मालवीय कॉन्ग्रेस में अपनी ऊँची साख होने के बावजूद कॉन्ग्रेस से अलग हुए और हिन्दू-हित की बात के लिए 1915 में ‘अखिल भारतीय हिन्दू महासभा’ की स्थापना की। अपने जीवनकाल में 4 बार कॉन्ग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष रहे, जिसमें से दो अधिवेशनों के समय महामना जेल में भी रहे। जब ब्रिटिश हुकूमत में कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग ने 1916 के ‘लखनऊ पैक्ट’ के तहत मुस्लिमों के लिए अतिरिक्त एवं पृथक प्रतिनिधित्व की बात की, तब मालवीय जी ने कॉन्ग्रेस के इस प्रस्ताव का तीखा प्रतिरोध किया। आज वही प्रतिरोध कहीं न कहीं ‘धर्म संकाय’ के छात्र कर रहे हैं।
सौरभ द्विवेदी इस बात में आगे जोड़ते हुए कहते हैं, “विनायक दामोदर सावरकर और डॉ केशव बलिराम हेडगवार इस हिन्दू महासभा का अहम हिस्सा रहे। बाद में इस संस्था से ‘हिन्दुत्व-बीज’ को लेकर डॉ हेडगेवार ने हिन्दू महासभा से इतर एक संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की। आज उस ‘हिन्दुत्व’ मूल वाले ‘संघ’ के पदाधिकारी जब एक ‘हिन्दू’ विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिए JNU के प्रोफ़ेसर राकेश भटनागर जैसे एक ‘नास्तिक’ या धार्मिक रूप से तटस्थ व्यक्ति की सिफारिश करते हैं उस विश्वविद्यालय में जहाँ आज भी शिक्षा में मूल्य और धर्म की रक्षा भी एक ज़रूरी अंग है तो हृदय असीम वेदना से भर जाता है।”
आज मीडिया गिरोह के वो तमाम लोग जो इस मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम में समेटते हुए इसे ब्राह्मणवाद से जोड़ कर ध्वस्त करने में जी-जान से लगे हुए हैं। जो बनारस से परिचित नहीं हैं वे शायद न जानते हों मैं वहीं का हूँ उन्हें आज यह कह सकता हूँ कि उदारवाद के नाम पर वामपंथी और उनका गिरोह जो जहर हर जगह बोने का काम कर रहे हैं वस्तुतः उनकी उदारवादिता एक ढोंग है, अदूरदर्शिता है। बनारस में आप कहीं भी निकल जाइए संस्कृत के श्लोक बच्चा-बच्चा पढ़ता और बोलता नजर आ जाएगा है, वैदिक मन्त्रों और ऋचाओं से घाट गुंजायमान मिलेंगे लेकिन उन्हें कभी इसे किसी मुस्लिम से पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ी। या उनसे जिनकी उन श्लोकों और मंत्रो के प्रति न भाव हो, न श्रद्धा हो, वह उनके लिए शब्दों संयोजन भले हो सकता है लेकिन उसके प्राण को वो कभी महसूस नहीं कर सकते। क्योंकि उनके अंदर इन मन्त्रों, श्लोकों के प्रति समर्पण और भक्ति का भाव कभी नहीं आएगा।
आज मीडिया गिरोह के लोग इस बात पर जोर दे रहे हैं कि विश्विद्यालय प्रशासन ने डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति उनकी योग्यता के आधार पर किया है। जिसका हम आगे खंडन करेंगे उससे पहले यहाँ एक घटना का जिक्र करना भी समीचीन होगा, ये वही काशी है जहाँ जब पण्डितराज जगन्नाथ शाहजहाँ की पुत्री लवंगी से विवाह करके दिल्ली से बनारस आए और विद्वत्-सभा में जाने की कोशिश की तब उन्हें ‘यवनीसंसर्गदूषित’ कहकर संस्कृत-विद्या के अपय्य दीक्षित जैसे दृढ़ धार्मिक आचार्योंं ने बहिष्कार किया, और उनकी सारी विद्वत्ता प्रतिपादित करते रहने के बावजूद नहीं अपनाया। शायद आप अब यह समझ सकते हैं कि मालवीय जी ने ‘हिन्दू विश्वविद्यालय’ और ‘धर्म विज्ञान संकाय’ के लिये बनारस को यूँ ही नहीं चुना था। उन्हें पता था धर्म की दृढ़ता बनारस में है।
सौरभ द्विवेदी भी कहते हैं कि आज जब SVDV के छात्र विरोध में सड़कों पर हैं और इस बात का अफ़सोस जता रहे हैं कि आज जब एक तरफ धर्म, संस्कृति, वेद, वेदांग और प्राचीन मूल्यों के विरोधी वामपंथी फिरोज खान के समर्थन में खड़े हैं और इस नियुक्ति को जी-जान से सही ठहराने की हर संभव कोशिश में लगे हैं और बाकी लोग, यहाँ तक की संकाय के आचार्य भी नौकरी बचाने के लिए अपनी धार्मिक दृढ़ता को गिरवी रख चुके हैं। उनकी चुप्पी बनारस को सदियों तक सालती रहेगी। महामना का कहना था कि मुझे मोक्ष नहीं चाहिए। मेरी आत्मा यहीं विश्वविद्यालय में मौजूद रहेगी। अगर ऐसा है तो संकाय के जिम्मेदार आचार्यों को देखकर उनकी आत्मा बहुत ग्लानि महसूस कर रही होगी।
आज जब बीबीसी, वायर, क्विंट, प्रिंट जैसे तमाम मीडिया गिरोह इस मुद्दे को ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने की तरफ मोड़ कर इस विरोध को कुंद करने में लगे हैं जितना हाइप मीडिया में आज JNU के अपने ‘सौभाग्य’ को ‘अधिकार’ समझकर हिंसक आंदोलन को मिल रहा है ऐसे दौर में सत्य हमारे साथ है। हमारा विरोध भी गाँधी – महामना की इस धरती पर इतिहास में बेशक दर्ज न हो पर उसकी ताप दूर तक जाएगी। सौरभ द्विवेदी ने मीडिया के ब्राह्मणवाद वाली थ्योरी को ख़ारिज करते हुए सभी तथ्य सामने रख दिए ताकि लोग सत्य से परिचित हों और ऐसे मीडिया समूहों के बहकावे में न आएँ।
सौरभ ने पूरा आँकड़ा समझाते हुए बताया कि हिन्दू धर्म संकाय के साहित्य विभाग के एक OBC पद हेतु 27 अभ्यर्थियों ने आवेदन किया। 26 हिन्दू OBC थे – यादव, पटेल, चौधरी आदि आदि। एक मुस्लिम OBC था – खान और हिन्दू विश्वविद्यालय के नास्तिक कुलपति राकेश भटनागर और भ्रष्ट साहित्य विभागाध्यक्ष और उनके गैंग ने मुस्लिम OBC को ज़्यादा योग्य माना। 26 OBC हिन्दू मूर्ख साबित किए गए। और OBC-SC/ST के हक़ के लिए लड़ने वाले प्रोपोगंडावादी झुण्ड ने एक स्वर में मुस्लिम का धर्म देखकर 26 हिन्दू OBC को लात मार दिया। दूसरी ओर उन 26 OBCs के हक़ के लिए और उनको योग्य सिद्ध करने के लिए ‘संकीर्ण मानसिकता’ की उलाहना लिए आज ‘हिन्दू’ एक ‘हारी हुई लड़ाई’ भजन कीर्तन, मन्त्रों और यज्ञ के सहारे शांतिपूर्ण ढंग से गाँधीवादी तरीके से लड़ रहे हैं।
यह सब देखकर लगता कि SVDV के धरनारत छात्र सही मायने में आज के ‘धर्मयोद्धा’ हैं। यहाँ सिर्फ संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने का मसला है ही नहीं, उन्हें आज की चिन्ता भी नहीं है। लेकिन जब 20 साल बाद ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ में वैदिक मंगलाचरण की जगह कुरान और हदीस की आयतें गूँजेगी, विश्व हिन्दू पंचांग की जगह कुरान और बाइबिल का प्रकाशन होगा, तो बुढ़ापे में आप इस कुण्ठा से जरूर गुजरेंगे कि जब मालवीय मूल्यों और हिन्दू सनातन धर्म और संस्कृति के रक्षार्थ कुछ छात्र लड़ रहे थे, जब संविधान की कोई एक पंक्ति उनके पक्ष में नहीं थी, शायद एक ढंग का तर्क भी उनके पास नहीं था, और महामना के नाम पर जीवनयापन करने वाले अधमर्ण मौन थे, तब भावनाओं के बल पर, अन्तरात्मा की आवाज पर, महामना के आदर्शों और मूल्यों की रक्षा के लिए पुलिस की लाठी खाने और खून का कतरा गिरने तक कुछ निहत्थे एक धर्मयुद्ध लड़ते रहे थे। और हम मौन थे तो आज की अपनी दुर्गति के लिए जिम्मेदार कोई और नहीं हम खुद हैं।
क्रिकेटर से नेता बने भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने आज दिल्ली मुख्यमंत्री केजरीवाल पर निशाना साधा। उन्होंने बीते दिनों खुद को ट्रोल किए जाने वाली बात को आधार बनाकर कहा, “अगर मेरे जलेबी खाने से दिल्ली का प्रदूषण बढ़ रहा है तो मैं हमेशा के लिए जलेबी छोड़ सकता हूँ। 10 मिनट में मुझे ट्रोल करना शुरू कर दिया गया, अगर इतनी मेहनत दिल्ली के प्रदूषण को कम करने में की होती तो हम साँस ले पाते।”
गौतम गंभीर ने इस दौरान केजरीवाल से ये भी सवाल पूछा कि उन्होंने पिछले पाँच सालों में क्या किया? उन्होंने आप सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा, “आपने पाँच वर्षों में केवल विज्ञापन दिया है। हमने विज्ञापन नहीं दिया, बल्कि काम किया है। आपके और हमारे बीच में यही फर्क है।”
गंभीर ने दिल्ली वासियों को मिल रहे गंदे पानी का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा, “सीएम केजरीवाल ने दिल्ली को मुफ्त पानी दिया, लेकिन वो भी जहरीला। उन्होंने किया क्या है? जबकि वे जलबोर्ड के अध्यक्ष हैं।” बता दें इस मुद्दे पर गौतम गंभीर ने ट्वीट भी किया है। जहाँ उन्होंने इंदौर मामले और प्रदूषित जल के मामले को, ‘जल या जलेबी’ लिखकर उठाया है।
#WATCH: Gautam Gambhir, BJP MP says.”Agar mera jalebi khane se Delhi ka pollution badha hai, toh main hamesha ke liye jalebi chhod sakta hoon…10 minute mein mujhe troll karna shuru kar diya, agar itni mehnat Delhi ki pollution ko kam karne mein ki hoti toh hum saas le pate.” pic.twitter.com/K2oW5qokht
इसके अलावा बता दें, गौतम गंभीर ने मीडिया से बात करते हुए प्रदूषण से जुड़ी अहम बैठक में न पहुँचने का भी कारण बताया। जिसके कारण वे पिछले दिनों खूब ट्रोल हुए थे। उन्होंने कहा कि वे प्रदूषण मुद्दे पर आयोजित बैठक में न शामिल होकर इंदौर टेस्ट में कमेंट्री करने इसलिए पहुँचे थे, क्योंकि वे एक अनुबंध से बंधे थे।
उन्होने कहा,“मुझे पता है कि प्रदूषण पर बैठक बहुत अहम थी। लेकिन मैं अनुबंध से बंधा था। मैंने यह कॉन्ट्रैक्ट जनवरी में साइन किया था, जबकि राजनीति से अप्रैल में जुड़ा। उस अनुबंध के तहत ही मुझे कमेंट्री के लिए जाना पड़ा। 11 नवंबर को जिस दिन बैठक होनी थी मुझे इसके बारे में मेल मिला था। मैंने तभी उन्हें इस बारे में जानकारी दे दी थी कि मैं क्यों इस बैठक में शामिल नहीं हो पा रहा हूँ।”
Gautam Gambhir: I had signed the contract in January & I joined politics in April. Due to contractual obligation, I had to go for the commentary. On 11th November I received the mail and on the same day, I had informed them the reason for not attending the meeting. (2/2) pic.twitter.com/bsoYp5rpti
दरअसल, बीते दिनों दिल्ली में बढ़े प्रदूषण को लेकर संसदीय समिति की बैठक होनी थी। बैठक में भाग लेने समिति के 29 सदस्यों में से केवल 4 सांसद ही पहुँचे थे। सांसदों की संख्या कम होने के कारण बैठक रद्द करनी पड़ी, लेकिन इसके बाद गंभीर की इंदौर में पोहा-जलेबी खाते हुए तस्वीर वायरल हो गई। जिसके बाद आप ने गौतम गंभीर को इस तस्वीर को लेकर घेरना शुरू कर दिया।
गंभीर की वीवीएस लक्ष्मण के साथ तस्वीर शेयर कर आम आदमी पार्टी ने लिखा था कि दिल्ली वायु प्रदूषण से परेशान है और गौतम गंभीर इंदौर में मस्ती कर रहे हैं। सांसदों को दिल्ली आना चाहिए था, लेकिन किसी के नहीं आने पर बैठक रद्द करनी पड़ी। बता दें आम आदमी पार्टी की ओर से ये ट्वीट देखकर भाजपा सांसद ने भी जवाब दिया था कि अगर उन्हें गाली देने से दिल्ली का प्रदूषण कम होगा तो वे उन्हें जी भर के गालियाँ दे सकते हैं।