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अयोध्या कांड: रथी आडवाणी, सारथी मोदी… और राम मंदिर की वह लहर जिसने खोद दी ‘सेक्युलरों’ की कब्र

रबीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है,

रथ भावे आमी देव, पथ भावे आमी, मूर्ति भावे आमी, देव हॅंसे अंतरयामी।

यानी, रथ, रास्ता और मूर्ति तीनों सोचते हैं कि वही देवता हैं और उनके ही दर्शन को लोग आ रहे हैं। तीनों के अज्ञान को देख भगवान खुद हँसते रहते हैं।

कुछ ऐसी ही थी 29 साल पहले 1990 में निकली वह रथ यात्रा। 25 सितंबर को सोमनाथ से उसकी शुरुआत हुई। 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुॅंच यात्रा खत्म होनी थी। धर्मनिरपेक्षता की राजनीतिक पैंतरेबाजी ने बीच रास्ते में ही उसके पहिए रोक दिए। लेकिन, धर्मनिरपेक्षता के कथित झंडाबरदार उस राम लहर को नहीं रोक पाए जो इस रथ ने पूरे देश में पैदा किया। राम मंदिर की ऐसी लौ जगाई की रथ जिस रास्ते से गुजरता वहाँ की मिट्टी लोग सिर पर लगा लेते।

इस रथ यात्रा के रथी थे आज की भाजपा के भीष्म पितामह लालकृष्ण आडवाणी। सारथी थे, वही नरेंद्र मोदी जो आज देश के प्रधानमंत्री हैं। उस समय वे गुजरात भाजपा के संगठन महामंत्री हुआ करते थे। असल में, राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का अवतरण इसी रथ यात्रा के जरिए हुआ था।

हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में मोदी को इस यात्रा का रणनीतिकार और शिल्पी बताया है। यात्रा के मार्ग और कार्यक्रम को लेकर औपचारिक तौर पर सबसे पहले जानकारी भी मोदी ने ही 13 सितंबर 1990 को दी थी। कहा जाता है कि इस यात्रा की हर सूचना जिस एक शख्स के पास होती थी वे मोदी ही थे। कुछ जानकारियाँ तो आडवाणी को भी बाद में मिलती थी। ‘नरेंद्र मोदी: एक शख्सियत, एक दौर’ में नीलांजन मुखोपाध्याय ने मोदी के हवाले से लिखा है, “इस अनुभव से मुझे मेरी प्रबंधन क्षमता को विकसित करने का अवसर मिला।”

जून 1989 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में भाजपा का अधिवेशन हुआ था और राम मंदिर पहली बार पार्टी के एजेंडे में आया। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रस्ताव पारित कर अयोध्या में राम मंदिर बनाने का संकल्प लिया गया। इस दिशा में सोमनाथ से अयोध्या तक की आडवाणी की राम रथ यात्रा पहली बड़ी पहल थी।

यात्रा की रणनीति तैयार करने में हर छोटी चीज का ध्यान रखा गया। शुरुआत के लिए उस सोमनाथ को चुना गया, जहाँ के पवित्र शिव मंदिर को इस्लामी आक्रांताओं ने बार-बार तोड़ा था। शुरुआत 25 सितंबर को हुई, जो एकात्म मानववाद के प्रणेता दीनदयाल उपाध्याय का जन्मदिन है।

यह रथ यात्रा बताती है कि सेक्यूलर जमात पर किस कदर समुदाय विशेष का मसीहा बनने का भूत सवार था। ‘युद्ध में अयोध्या’ के मुताबिक 19 अक्टूबर 1990 को इंडियन एक्सप्रेस के सुंदरनगर गेस्ट हाउस में एक बैठक हुई। बैठक में शामिल होने के लिए आडवाणी रथ यात्रा धनबाद में छोड़कर आए थे। बैठक प्रधानमंत्री वीपी सिंह की पहल पर हुई थी। आडवाणी ने कहा कि वे सरकार गिराना नहीं चाहते। यदि सरकार अध्यादेश लाकर विवादित ढाँचे के आसपास की जमीन विहिप या उसके प्रतिनिधि को सौंपती है तो हम उसका समर्थन करेंगे।

लेकिन, समुदाय विशेष के दबाव में वीपी सिंह पहले इससे पीछे हट गए। उन्होंने कहा कि न सिर्फ विवादित ढाँचा, बल्कि उसके आसपास की जमीन भी सरकार के कब्जे में होनी चाहिए। फिर बैठकों का सिलसिला चला और 20 अक्टूबर की रात अध्यादेश लागू हुआ। इसके मुताबिक,

  • विवादित ढाँचे और उसके आसपास की जमीन का सरकार अधिग्रहण करेगी।
  • विवादित ढाँचे और उसके चारों तरफ 30 फीट जमीन छोड़कर अधिग्रहित जमीन रामजन्मभूमि न्यास को सौंपी जाएगी।
  • वहाँ कभी मंदिर था या नहीं, इसे सुलझाने का काम संविधान की धारा 143(ए) के तहत सुप्रीम कोर्ट को सौंपा जाएगा।

ज्यादातर तबकों ने इसका स्वागत किया। बाबरी कमिटी इसके विरोध में थी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी। उन्होंने धमकी दी कि वे इस अध्यादेश को यूपी में लागू नहीं होने देंगे। अचानक 22 अक्टूबर को अध्यादेश वापस ले लिया गया और 23 अक्टूबर की सुबह बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी की रथ यात्रा रोक दी गई। उन्हें समस्तीपुर के सर्किट हाउस से गिरफ्तार कर सरकारी जहाज से दुमका ले जाया गया। फिर सड़क रास्ते से मंसानझोर, जहाँ डाकबंगले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत उन्हें कैद कर लिया गया।

कहा जाता है कि वीपी सिंह नहीं चाहते थे कि मुलायम अकेले मजहब विशेष के मसीहा बने, इसलिए उनके निर्देश पर लालू यादव ने बिहार में ही आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। हेमंत शर्मा ने ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखा है- वीपी सिंह ने एक तीर से दो शिकार किए। आडवाणी को गिरफ्तार करवा मुलायम को पटखनी दी।

वीपी सिंह के अयोध्या भूमि अधिग्रहण आदेश का विरोध कर मुलायम सिंह यादव धर्मनिरपेक्षता के इकलौते झंडाबरदार बने थे। वीपी सिंह ने इसकी हवा निकालने की तरकीब ढूँढ़ी। पहले आडवाणी के रथ को देवरिया में रोका जाना जाना था। मुलायम सिंह रथ रोकने वाले नेता बनते। वीपी सिंह को यह मंजूर नहीं था। अरुण नेहरू ने बताया कि प्रधानमंत्री ने लालू यादव को संदेश भेजा कि वे आडवाणी को बिहार में ही रोक लें ताकि धर्मनिरपेक्षता का सारा नेतृत्व मुलायम सिंह यादव के पास ही न रहे।

आडवाणी की वो रथ यात्रा भले मंजिल तक नहीं पहुँच पाई, लेकिन, इसने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर पैंतरेबाजी को बेनकाब कर दिया। इसी सनक में मुलायम ने 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाई और ‘मुल्ला मुलायम’ का खिताब हासिल किया। इसके तीन दिन बाद दो नवंबर को कोठारी बंधु को अयोध्या में छलनी कर दिया गया। यह सब केवल उस होड़ के कारण हुआ ​जो वीपी सिंह, मुलायम और लालू यादव के बीच मची थी। खुद को मजहब विशेष का सबसे बड़ा खलीफा साबित करने की होड़।

राम मंदिर को राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना और संकल्प का हिस्सा बता फूँकी गई उस रथ यात्रा के बिगुल को याद करने के लिए 8 नवंबर से बेहतर दिन नहीं हो सकता। आज आडवाणी 92 साल के हो गए हैं। जैसा हेमंत शर्मा ने अपनी किताब में लिखा है, ‘उनकी यात्रा ने राम मंदिर आंदोलन की दिशा ही बदल दी। इस यात्रा ने न केवल केंद्र में वीपी सिंह की सरकार गिरा दी, बल्कि यूपी में कॉन्ग्रेस की जड़ें हमेशा के लिए खोद दी।’

इस यात्रा ने बता दिया कि बहुसंख्यक हिंदुओं को गाली देकर, कथित अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण कर सत्ता हथियाने के दिन लद गए हैं। इस यात्रा ने सत्ता में भाजपा को स्थापित करने के बीज बोए। आज उसकी जड़ें इतनी फैल गई हैं कि जो नेहरू कभी राम को बेदखल करने पर अमादा थे, आज उनकी ही राजनीति के वारिस मंदिर-मंदिर प्रदक्षिणा को मजबूर हैं। बाकायदा मुनादी की जाती है उनके जनेऊधारी हिन्दू होने की।

गेस्ट हाउस कांड: मायावती ने मुलायम के खिलाफ केस लिया वापस, आजम, शिवपाल… चलता रहेगा मुकदमा

साल 1995 के चर्चिच लखनऊ गेस्ट हाउस कांड मामले में बसपा सुप्रीमो मायावती ने मुलायम सिंह यादव के खिलाफ केस वापस ले लिया है। गेस्ट हाउस कांड के बाद से ही सपा और बसपा एक दूसरे के धुर विरोधी हो गए थे। लेकिन आपसी मतभेदों को भुलाकर पिछले लोकसभा चुनाव में दोनों ही दलों ने गठबंधन किया था और एक साथ चुनाव लड़ा था। इसके बाद आखिरकार मायावती ने मुलायम सिंह के खिलाफ केस वापस ले लिया है। 

जानकारी के मुताबिक मायावती ने केस वापसी के लिए बीते फरवरी में ही शपथ पत्र दिया था। सपा-बसपा का गठबंधन के दौरान ही गेस्ट हाउस कांड से केस वापस लेने की पथकथा लिखी गई थी। बताया जा रहा है कि जब लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनज़र जनवरी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन हुआ था तो अखिलेश यादव ने मायावती से मुलायम सिंह यादव के खिलाफ गेस्ट हाउस कांड में मुकदमा वापस लेने का आग्रह किया था।

जिसके बाद फरवरी में केस वापस लेने का शपथ पत्र दे दिया गया, लेकिन इसे गोपनीय रखा गया। मायावती ने इसकी जानकारी दो दिन पहले अपने नेताओं को दी। बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि उनके पार्टी प्रमुख मायावती ने उच्चतम न्यायालय में मामले को वापस लेने के लिए एक आवेदन दिया था। हालाँकि, सतीश चंद्र ने इस पर अधिक जानकारी नहीं दी। वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा कि फिलहाल उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। इसके बारे में पता करने के बाद ही वो कुछ कहेंगे।

बता दें कि लखनऊ गेस्ट हाउस कांड मामले में मुलायम सिंह यादव, उनके भाई शिवपाल सिंह यादव, बेनी प्रसाद वर्मा और आजम खान सहित कई नेताओं के खिलाफ मायावती की ओर से हजरतगंज थाने में मुकदमा दर्ज करवाया गया था। हालाँकि, मायावती ने सिर्फ मुलायम सिंह यादव पर ही नरमी दिखाई है। मामले में दर्ज अन्य लोगों के खिलाफ केस चलता रहेगा।

उल्लेखनीय है कि बाबरी विध्वंस के बाद 1993 में सपा-बसपा ने गठबंधन कर साथ चुनाव लड़े थे। इसके बाद मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने और गठबंधन सरकार भी बनाई, लेकिन दो साल में ही रिश्तों में खटास आ गई। 2 जून 1995 को मायावती ने गठबंधन तोड़ने को लेकर स्टेट गेस्ट हाउस में बसपा विधायकों की बैठक बुलाई, जहाँ सपा नेताओं ने सैकड़ों समर्थकों के साथ गेस्ट हाउस पर हमला कर दिया। सपा नेताओं के हमले से बचने के लिए मायावती ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था। आरोप है कि सपा के नेताओं ने मायावती के साथ बदसलूकी भी की थी।

‘4 साल से उससे अलग हूँ… फिर भी उसने मेरा iPad छीन लिया, ED को झूठी गवाही देने के लिए मजबूर किया’

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी को पिछले 80 दिनों से हिरासत में रखा गया है। उन पर अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले और अन्य मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप दर्ज हैं। अब रतुल की पत्नी कविता ने उन पर आरोप लगाया है कि वो उन्हें (कविता को) प्रवर्तन निदेशालय (ED) के सामने झूठा बयान देने के लिए मजबूर कर रहे थे।

कविता ने कहा कि रतुल ने उन्हें चेतावनी दी थी कि कि वो ईडी के पास न जाएँ और न ही किसी अनजान नंबर से आने वाले कॉल का जवाब दे। साथ ही कविता ने यह भी बताया कि रतुल ने उनका टैबलेट (आईपैड) छीन लिया था और फिर वापस माँगने पर यह कहकर देने से इनकार कर दिया कि आयकर विभाग के छापे के दौरान खो गया। बता दें कि ईडी द्वारा कविता के आईपैड को सबूत के रूप में माँगा जा रहा है। 

कविता ने जाँच एजेंसी को बताया कि वो पिछले चार साल से रतुल पुरी से अलग रही हैं। ईडी के सामने बयान दर्ज कराते हुए उन्होंने कहा कि रतुल पुरी ने उनको जुलाई में एक पत्र लिखने के लिए मजबूर किया कि वह जाँच में शामिल नहीं हो सकतीं, क्योंकि उन्हें औरंगजेब रोड स्थित अपने ससुर दीपक पुरी के घर जाना था। कविता फिलहाल हयात रीजेंसी होटल में रह रही हैं।

ईडी ने 2 नवंबर को दिल्ली की एक विशेष अदालत के समक्ष एक पूरक आरोप पत्र के हिस्से के रूप में कविता के बयान को पेश किया और तर्क दिया कि पुरी न्यायिक हिरासत में होने के बावजूद अपनी गर्लफ्रेंड के जरिए सबूतों को नष्ट करने में लगे हैं और गवाहों को धमकी दे रहे हैं।

विशेष अदालत ने ईडी की पूरक चार्जशीट का संज्ञान लिया है। ईडी के सूत्रों ने दावा किया है कि इससे पहले भी पुरी के कई करीबी दोस्त और सहयोगी, जो उनके खिलाफ बयान दर्ज करने के लिए स्वेच्छा से एजेंसी के समक्ष पहले पेश हुए थे, उनको भी धमकी दी जा रही है। उन लोगों ने बताया कि उन्हें पुरी द्वारा चेतावनी दी गई थी कि वे पुरी के अकाउंटेंट के पास से बरामद डायरी में उनके नामों के खिलाफ प्रविष्टियों को स्वीकार न करें।

ईडी के सूत्रों ने दावा किया कि डायरी में पुरी के वित्तीय लेनदेन को सूचीबद्ध किया गया था। ईडी ने विशेष अदालत को यह भी बताया कि इस मामले में एक महत्वपूर्ण गवाह और पुरी के अकाउंटेंट केके खोसला गायब हैं। खोसला, रतुल पुरी के नकद लेन-देन का रिकॉर्ड रखते थे। आयकर विभाग ने रतुल पुरी की कंपनी मोजर बिअर पर छापेमारी के दौरान यह डायरी बरामद की थी। इसके बाद ईडी ने उन लोगों को समन करना शुरू किया था, जिनके नाम का इस डायरी में उल्लेख था। जब से डायरी मिली है, तभी से केके खोसला का कुछ पता नहीं है।

इस डायरी में कथित रूप से कई लोगों के साथ नकद लेन-देन दिखाया गया है और कुछ प्रविष्टियों को रतुल पुरी के पिता दीपक पुरी द्वारा काउंटर-साइन किया गया था। एजेंसी ने दावा किया कि जिन लोगों के नाम का डायरी में उल्लेख था, उनसे पूछताछ के दौरान, सभी ने उन्हें किए गए भुगतान की पुष्टि की है।

डायरी में प्रविष्टियों से संबंधित मामले में जिन लोगों से पूछताछ की गई, उसमें संदीप नारंग, महिपाल, अवध बिहारी गिरि और वेद प्रकाश दामिजा का नाम शामिल है। ये सभी जानकारी अब न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा है। ईडी को दिए ताजा बयान में नारंग ने बताया कि 26 जुलाई को जब वो ईडी ऑफिस से लौटे और रतुल पुरी को पता चला कि उन्होंने एजेंसी को उनके नाम के खिलाफ नकद लेन-देन की प्रविष्टियों की पुष्टि की है, तो रतुल पुरी ने उनसे उनके बयान को वापस लेने के लिए कहा। पुरी ने नारंग से कहा कि उन्हें किसी तरह की पुष्टि नहीं करनी चाहिए थी।

ईडी ने मामले में गवाहों को प्रभावित करने के कई अन्य उदाहरणों का हवाला दिया, जिसमें वीवीआईपी चॉपर घोटाले में आरोपित राजीव सक्सेना को धमकाने का भी आरोप शामिल है। ईडी के आरोप पत्र में कहा गया है कि पुरी ने सक्सेना को अपने पिता और चाचा के खिलाफ साक्ष्यों को जाँच अधिकारियों के समक्ष साझा न करने के लिए दबाव बनाया।

15.65 करोड़ रुपए का घर, ₹73 लाख की खिड़कियाँ… बीवी और 2 बेटियों के साथ इसमें रहता है यहाँ का CM

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के बंगले पर 73 लाख रुपए की खिड़कियाँ-दरवाज़े लगने की ख़बर चर्चा का विषय बनी हुई है। बंगले में लगने जा रहे महँगे और हाईटेक सिक्योरिटी खिड़कियाँ-दरवाज़े के ख़र्च के लिए राज्य सरकार से मंज़ूरी भी मिल गई है। इस मंज़ूरी पर पूर्व मुख्यमंत्री और तेलुगू देशम पार्टी (TDP) के एन चंद्रबाबू नायडू ने सवाल खड़े किए हैं। 

इस मामले पर उन्होंने ट्वीट किया, “YSR जगन की सरकार ने अपने घर की खिड़कियों के लिए 73 लाख रुपए के ख़र्चे को मंज़ूरी दी है! यह सरकारी खजाने की क़ीमत पर किया जा रहा है। यह ऐसे समय पर किया जा रहा है जब पिछले पाँच महीनों से आंध्र प्रदेश की जनता कुप्रबंधन के कारण राजकोषीय गड़बड़ी से जूझ रही है।”

ख़बर के अनुसार, आंध्र प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के कैंप कार्यालय और आवास पर 15.65 करोड़ रुपए ख़र्च कर दिए हैं। 30 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले जगन मोहन रेड्डी ने 73 लाख रुपए केवल खिड़कियों-दरवाज़ों पर ही ख़र्च कर डाले। बता दें कि जगन सरकार ने 9 जुलाई को बिजली आपूर्ति के रख-रखाव के लिए 8.85 लाख रुपए जारी करने का आदेश दिया। इसके बाद 22 जुलाई को हैदराबाद में मुख्यमंत्री आवास के सुरक्षा इंतज़ामों के लिए 24.5 लाख रुपए आवंटित किए गए। इसके अलावा, जन शिक़ायतें सुनने के लिए प्रजा वेदिका के नाम से 20 अगस्त को एक हॉल बनाने के लिए 2.5 लाख रुपए मंज़ूर किए गए।

वहीं, आंध्र प्रदेश के आदेश पर TDP प्रमुख चंद्रबाबू नायडू द्वारा बनवाए गए कॉन्फ्रेन्स हॉल को जून, 2019 में यह कहकर गिरा दिया था कि वो अवैध था। इस कॉन्फ्रेन्स हॉल को बनवाने में 8 करोड़ रुपए का ख़र्चा आया था। चंद्रबाबू नायडू के बेटे नारा लोकेश ने जगन मोहन रेड्डी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि एक तरफ तो वो वेतन में सिर्फ़ एक रुपया लेने का ढोंग करते हैं और दूसरी तरफ शान-ओ-शौकत पर इतना ख़र्च करते हैं। 

जानकारी के मुताबिक़, जगन मोहन के मई में चुनाव जीतने और फिर सत्ता में आने के बाद उनके गुंटूर के टाडेपल्ली गाँव में घर तक के लिए क़रीब 5 करोड़ रुपए की लागत से सड़क बनवाई गई थी। ये भी राज्य सरकार के आदेश से हुआ था। साथ ही आलीशान घर में बिजली के काम में करीब 3.6 करोड़ रुपए का ख़र्च आया था। इसके अलावा, घर के परिसर में एक हेलीपैड भी बनवाया गया। घर में हेलीपैड और दूसरे सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं में 1.89 करोड़ रुपए ख़र्च हुए।

10000 उपद्रवियों, 1659 अकाउंट्स पर नजर, 500 अरेस्ट: राम मंदिर फैसले से पहले UP में तैयारी

राम जन्मभूमि मामले पर अगले 10 दिनों के भीतर किसी भी दिन फ़ैसला आ सकता है। फ़ैसला आने के बाद किसी भी तरह की कोई अप्रिय घटना ना हो, इसके लिए प्रशासन कई पुख़्ता इंतज़ाम करने में जुटा हुआ है। कहीं फ्लैग मार्च, कहीं सद्भावना रैली, तो कहीं हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। केंद्र सरकार से लेकर यूपी सरकार और वहाँ का पूरा प्रशासनिक अमला हाई अलर्ट पर आ चुका है।

गुरुवार (7 नवंबर) को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वीडियो कॉन्फ्रेन्सिंग के ज़रिए सभी ज़िलों के ज़िलाधिकारियों और पुलिस सुपरिटेंडेंट के साथ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की। इसके अलावा, उन्होंने लखनऊ में आला अधिकारियों के साथ बैठक भी की। इस बैठक में डीजीपी, मुख्य सचिव से लेकर वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शामिल रहे। अयोध्या मामले पर आने वाले फ़ैसले को ध्यान में रखते हुए लखनऊ महोत्सव की तारीख जनवरी के तीसरे सप्ताह तक के लिए बढ़ा दी गई है।

नवभारत टाइम्स की ख़बर के अनुसार, यूपी के डीजीपी ओपी सिंह ने बताया कि हमारे रडार पर क़रीब 10 हज़ार लोग हैं। उन पर नजर रखी जा रही है, जिससे वो किसी भी तरह की अशांति न फैला सकें। वहीं, 500 से अधिक लोगों को गिरफ़्तार कर जेल भेजा गया है। उन्होंने बताया कि फिलहाल पुलिस का काम सोशल मीडिया पर कड़ी निगरानी रखना है, जिसके लिए बक़ायदा एक टीम को लगाया गया है। अभी तक ऐसे क़रीब 1,659 लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर यूपी पुलिस की नज़र है, जिनसे सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाली पोस्ट किए जाने की संभावना है।

जानकारी के मुताबिक़, पुलिस की तरफ से सुरक्षा के मद्देनज़र एक पूर्व मंत्री समेत 10 पूर्व विधायकों को भी ज़िला छोड़ने का नोटिस दिया गया है। साथ ही यह चेतावनी दी गई है कि यदि वो फ़ैसले वाले दिन मेरठ में दिखाई दिए तो उनकी तुरंत गिरफ़्तारी होगी। हालाँकि, प्रशासन की ओर से इन 10 लोगों के नाम उजागर नहीं किए गए हैं, लेकिन बताया जा रहा है कि पूर्व विधायक योगेश वर्मा और पूर्व मंत्री याकूब क़ुरैशी के अलावा ऐसे कई अन्य उपद्रवियों की पहचान की गई है, जिन पर पहले से ही संगीन धाराओं में मामले दर्ज हैं।    

इसके अलावा, कई अस्थाई जेलें भी बनाई गईं हैं। बरेली ज़ोन के शहर शाहजहाँपुर, बदायूँ, पीलीभीत, रामपुर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा और बिजनौर में 4 हजार से अधिक ऐसे लोग चिन्हित किए गए हैं, जो बवाल करवा सकते हैं। इसके अलावा 90 ऐसे स्थान चिन्हित किए गए हैं, जो संवेदनशील हैं।

एडीजी अविनाश चंद्र के अनुसार, ज़ोन में सभी जगह शांति बनी रहे, इसके लिए संवेदनशील स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं और निगरानी रखने के लिए ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सभी थानों में पीस कमिटी और पुलिस मित्रों की मीटिंग की जा रही है। साथ ही हर थाना क्षेत्र में फ्लैग मार्च भी किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर भी नज़र रखी जा रही है। फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर पर भी कड़ी निगरानी रखी जा रही है। उनका कहना है कि अगर किसी ने भी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लेकर किसी भी तरह की कोई अफ़वाह फैलाई या किसी तरह की कोई विवादित टिप्पणी की तो उसे छोड़ा नहीं जाएगा, उसके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

अयोध्या मामले पर आने वाले फ़ैसले के मद्देनज़र ज़िले में 30 बम निरोधक दस्तों की तैनाती भी की गई है। साथ ही 10 नवंबर तक 150 कंपनियाँ केंद्र की तरफ से और 150 कंपनियाँ राज्य सरकार की तरफ से सुरक्षा के लिए तैनात की जाएँगी। वहीं, भारतीय रेलवे भी अयोध्या फ़ैसले को देखते पुख़्ता इंतज़ाम में जुट गया है। इसके लिए रेलवे पुलिस की तरफ से सात पेज की एडवाइज़री जारी की गई है। इस एडवाइजरी के तहत RPF के जवानों की छुट्टी रद्द कर दी गई है। रेलवे पुलिस ने देश के 78 रेलवे स्टेशनों को अति संवेदनशील माना है, जहाँ सुरक्षा के ठोस इंतज़ाम किए जा रहे हैं। इस स्टेशन्स में दिल्ली, मुंबई, महाराष्ट्र समेत यूपी के कई स्टेशन्स शामिल हैं।

दिल्ली में ‘मुफ्त बिजली’ का सच: चुनाव बाद लगेंगे पैसे… खुद देखिए केजरीवाल सरकार का ऑर्डर

अपनी विवादित टिप्पणियों के चलते हमेशा चर्चा में रहने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पूरी राजनीति मानो झूठे वादों और नौटंकी पर ही टिकी हुई है। झूठ की सियासत करने वाले केजरीवाल का एक और झूठ बिजली के बिल माफ़ करने को लेकर सामने आया है। दरअसल, केजरीवाल यह कहते नज़र आ रहे हैं कि उनकी सरकार ने दिल्ली की जनता को 200 यूनिट तक बिजली मुफ़्त में देने का फ़ैसला किया है और इससे काफ़ी लोगों को फ़ायदा मिल रहा है। जबकि उनके इस खोखले दावे की सच्चाई यह है कि केजरीवाल सरकार ने सिर्फ़ चुनाव के मद्देनज़र यह सियासी खेल खेला है।

दिल्ली विधानसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर जो मुफ़्त बिजली बिल से संबंधित दस्तावेज़ उपलब्ध हैं, उसके अनुसार, सिर्फ़ 31 मार्च 2020 तक ही 200 यूनिट मुफ़्त बिजली का प्रावधान किया गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल अपनी चुनावी राजनीति को अंजाम देते हुए जनता को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने दिल्ली वासियों के हित में कई अहम फ़ैसले लिए हैं, इनमें मुफ़्त बिजली भी शामिल है।

दिल्ली विधानसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध दस्तावेज़

आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध संबंधित दस्तावेज़ को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

केजरीवाल ने अपने झूठ को भले ही सामने न आने दिया हो, लेकिन सोशल मीडिया के इस युग में लोगों की नज़र से कुछ नहीं बच पाता। देर-सवेर लोग इन चुनावी दावों की तह तक पहुँच ही जाते हैं और खोज लाते हैं इसकी असल हक़ीकत। ऐसा ही मुफ़्त बिजली के खोखले दावों के साथ भी हुआ। यूज़र्स ने आधिकारिक वेबसाइट के दस्तावेज़ को संलग्न करते हुए केजरीवाल के झूठ का पर्दाफ़ाश किया।

इसके अलावा, भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने दिल्ली में 200 यूनिट तक बिजली का बिल माफ़ करने की मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की घोषणा को चुनावी लॉलीपॉप बताया था। उन्होंने तंज कसते हुए कहा था कि जब भी चुनाव आते हैं, अरविंद केजरीवाल मुफ़्त वाली घोषणाएँ करने में जुट जाते हैं। उन्होंने दिल्ली सचिवालय से प्राप्त एक दस्तावेज़ (सर्कुलर) का हवाला देते हुए इस बात का भी ज़िक्र किया था कि 31 मार्च 2020 के बाद मुफ़्त बिजली का कोई उल्लेख ही नहीं है।

राम मंदिर फैसला: CJI ने यूपी के मुख्य सचिव और DGP को बुलाया, लेंगे राज्य की कानून व्यवस्था का जायजा

अगले हफ्ते राम जन्मभूमि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाला है। इसको लेकर प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद है। पंच कोसी परिक्रमा को लेकर अलग व्यवस्था की गई है। साथ ही ड्रोन से अयोध्या शहर की निगरानी की जा रही है। इस बीच खबर यह है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को तलब किया है, जहाँ वो शुक्रवार (नवंबर 8, 2019) को दोनों के साथ राज्य की कानून व्यवस्था का जायजा लेंगे।

इस बैठक के पीछे का उद्देश्य अयोध्या भूमि विवाद मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले राज्य में कानून व्यवस्था का आकलन करना है। सीजेआई ने यूपी के मुख्य सचिव राजेंद्र कुमार तिवारी और डीजीपी ओम प्रकाश सिंह को बुलाया है। वो अपने चैंबर में इनके साथ मीटिंग करेंगे और कानून व्यवस्था का जायजा लेंगे।

उल्लेखनीय है कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर 40 दिनों की रोजना सुनवाई के बाद फैसला 16 अक्टूबर को सुरक्षित रखा गया था। बता दें कि न्यायमूर्ति गोगोई का कार्यकाल 17 नवंबर को समाप्त होने वाला है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि उनके सेवानिवृत्त होने से पहले इस पर फैसला सुना दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या के फैसले को देखते हुए गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को एडवाइजरी भेजी है। सभी राज्यों को फैसले को लेकर अलर्ट रहने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही अतिरिक्त सुरक्षा के लिए गृह मंत्रालय ने अर्धसैनिक बलों की 40 कंपनियाँ भेजी हैं। इन 40 कंपनियों में 4000 पैरा मिलिट्री फोर्स के जवान शामिल हैं।

पहला हलाल चश्मा: इंडोनेशिया में किया गया लॉन्च, सिद्धार्थ की कंपनी ने किया यह काम

इंडोनेशिया में हर वस्तु के लिए हलाल सर्टिफिकेट अनिवार्य होने के बाद वहाँ के उद्योग मंत्रालय ने मंगलवार (नवंबर 5, 2019) को पीटी अटल्ला इंडोनेशिया कंपनी द्वारा निर्मित पहले हलाल सर्टिफाइड चश्मे को लॉन्च किया।

अंतरा न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार इस कदम को सराहते हुए इंडोनेशिया के औद्योगिक मंत्रालय ने पीटी अटल्ला कंपनी की काफी तारीफ की। मीडिया से बातचीत के दौरान मंत्रालय की ओर से कहा गया कि वे पीटी अटल्ला इंडोनेशिया के प्रयासों की सराहना करते हैं। हालाँकि चश्मा ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे तत्काल हलाल सर्टिफिकेशन की जरूरत पड़े, लेकिन फिर भी कंपनी ने ये कर दिखाया।

गौरतलब है कि इसी साल 17 अक्टूबर से इंडोनेशिया में 2014 का कानून लागू होने के बाद हर वस्तु पर हलाल सर्टिफिकेट होना अनिवार्य कर दिया गया है। ऐसे में खाद्य वस्तु से जुड़ी कंपनियों के लिए ये सर्टिफिकेट लेना सबसे ज्यादा अनिवार्य है। जबकि अन्य कंपनियों को पाँच सालों के भीतर ये सर्टिफिकेट लेना जरुरी है।

इस कानून की जरुरतों पर बात करते हुए मंत्रालय ने बताया कि कानून का उद्देश्य उपभोक्ताओं को हलाल उत्पादों पर सुरक्षा और निश्चितता प्रदान करना है, साथ ही उत्पादकों का अतिरिक्त मूल्य (added value) बढ़ाना है।

इस अवसर पर बोलते हुए अटल्ला इंडोनेशिया के निदेशक वेंजको सिद्धार्थ ने भी जानकारी दी कि उनके प्रोडक्ट को 2 अक्टूबर को ही हलाल सर्टिफिकेट मिल गया था। जिसे लेने के पीछे उनका उद्देश्य इंडोनेशिया की बहुसंख्यक आबादी यानी मुस्लिम लोगों में अपने वस्तु की कीमत और ब्रांडिंग को बढ़ाना था।

सिद्धार्थ के अनुसार उनकी कंपनी 500 लोगों को रोजगार प्रदान करती है और एक दिन में 60,000 फ्रेम और लेंस तैयार करती है। हालाँकि फ्रेम और लेंस बनाने के उद्योग क्षेत्र में मंत्रालय के पास 15 कंपनियाँ रिकॉर्ड में हैं जिन्होंने 6,300 लोगों को रोजगार दिया है, लेकिन पीटी अटल्ला केवल मात्र ऐसी लोकल कंपनी हैं, जो अपने फ्रेम से लेकर अन्य सामान तक के प्रोडक्ट खुद बनाती है।

पाकिस्तानी पिता की जानकारी छुपाई थी आतिश तासीर ने: रद्द हुआ OCI, भारत में प्रवेश पर लगेगी रोक

एक लेखक और पत्रकार है – आतिश तासीर। इसे ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया (OCI) स्टेटस मिला हुआ था। लेकिन गुरूवार (नवंबर 7, 2019) को यह रद्द कर दिया गया है। कारण है – भारतीय गृह मंत्रालय से जरूरी सूचनाएँ छिपाना। दरअसल, ब्रिटेन में जन्मे लेखक व पत्रकार आतिश अली तासीर ने भारत सरकार से जो जरूरी सूचना छुपाई, वह यह थी कि उसके पिता पाकिस्तानी मूल के थे।

गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार, तासीर ओसीआई कार्ड के लिए अयोग्य हो गया है, क्योंकि ओसीआई कार्ड के लिए बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में वो असमर्थ रहा। उसने अपने पिता के पाकिस्तानी होने की बात अधिकारियों व सरकारी रिकॉर्ड में छिपाई।

बता दें कि ओसीआई कार्ड के नियम 7A में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति या उसके माता-पिता या दादा-दादी या परदादा-परदादी पाकिस्तान, बांग्लादेश या ऐसे देश जो भारत सरकार के आधिकारिक गजट में अनुसूचित हैं, का नागरिक है, तो वह ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया कार्ड के पंजीकरण के योग्य नहीं है।

प्रवक्ता ने कहा कि तासीर को उसके पीआईओ/ओसीआई कार्ड के संबंध में अपना जवाब/आपत्ति दर्ज करने का अवसर दिया गया था, लेकिन उसने इस नोटिस पर कोई संज्ञान नहीं लिया। उसने इस पर अपना कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद आतिश अली तासीर का नाम भारतीय नागरिकता कानून, 1955 के तहत ओसीआई कार्ड धारक की सूची से हटा दिया गया।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने भी गुरूवार को मीडिया से बात करते हुए कहा कि अगर किसी व्यक्ति ने धोखे से, फर्जीवाड़ा करके या फिर तथ्य छुपा कर ओसीआई कार्ड हासिल किया है, तो ओसीआई कार्ड धारक के रूप में उसका पंजीकरण रद्द कर दिया जाएगा। ओसीआई के मुताबिक उस व्यक्ति का पंजीकरण रद्द करने के साथ ही भविष्य में उसके भारत में प्रवेश करने पर भी रोक लग जाएगी।

आतिश तासीर ने टाइम मैगजीन के 20 मई के संस्करण में एक कवर स्टोरी लिखी थी। इसमें तासीर ने पीएम मोदी को ‘डिवाइडर इन चीफ’ कहते विवादास्पद सवाल किया था- क्या विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र फिर से मोदी को 5 साल का मौका देने को तैयार है? इस लेख में कहा गया था कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र पहले से काफी बँट गया है। साथ ही आतिश ने पीएम मोदी पर धार्मिक राष्ट्रवाद का जहर भरने जैसे तमाम आरोप लगाए थे। हास्यास्पद यह है कि द प्रिंट के पत्रकार ने मनगढ़ंत पत्रकारिता करते हुए यह लिख मारा कि आतिश पर सरकार ने एक्शन इसलिए लिया क्योंकि उसने पीएम मोदी के खिलाफ लेख लिखा था।

सरकार द्वारा आतिश के ओसीआई को रद्द किए जाने पर मीडिया हाउस द प्रिंट ने दावा किया कि तासीर के टाइम मैगजीन में इस लेख के लिखने के बाद से ही उसके ओसीआई को रद्द किए जाने पर विचार किया जा रहा था। हालाँकि, विदेश मंत्रालय ने मीडिया हाउस द्वारा फैलाए जा रहे झूठ को पूरी तरह से नकार दिया। विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया कि द प्रिंट की रिपोर्टिंग पूरी तरह से गलत और तथ्यरहित है।

बता दें कि तासीर के पिता सलमान तासीर, पंजाब (पाकिस्तान में) के गवर्नर थे और उस देश के सबसे हाई प्रोफाइल राजनेताओं में से एक थे। तासीर को पहला पीआईओ कार्ड 1999 में और इसके बाद 2016 में जारी किया गया था। इसके अलावा आतिश तासीर के पास ब्रिटिश पासपोर्ट और अमेरिका का ग्रीन कार्ड भी है।

अयोध्या, प्रयाग, काशी, मथुरा: ‘हिन्दू पद पादशाही’ के लिए मराठों की संघर्ष गाथा

अयोध्या विवाद पर आसन्न फैसले से भगवान श्री राम की भूमि वापिस पाने के सदियों पुराने हिन्दू स्वप्न के पूरा होने की उम्मीद है। बर्बर जिहादियों से यह पवित्र भूमि वापिस पाने के लिए सैकड़ों सालों में अनगिनत प्रयास हुए हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश एक भी प्रयास सफल नहीं रहा। इसके बाद भी अयोध्या-मथुरा-काशी की पुण्यत्रयी और तीर्थराज प्रयाग हमेशा से हिंदवी स्वराज्य के सपने का अभिन्न अंग रही और मराठाओं ने इन्हें पाने के लिए अनथक प्रयास किए।

योजनाएँ

पठानों के साथ सफ़दर जंग की दूसरी लड़ाई (1751-52) में मराठाओं ने निमंत्रण पाने पर साथ दिया और फतेहगढ़ की लड़ाई जीतने के बाद होल्कर ने तीनों पवित्र स्थान पेशवा को सौंपे जाने की माँग की। लेकिन उस समय वह माँग पूरी न कर उन्हें केवल धन दे दिया गया। मराठों ने उस समय ज़्यादा चिल्ल-पों इसलिए नहीं की, क्योंकि वे भी लम्बी रणनीति पर चल रहे थे। उन्होंने सफ़दर जंग का साथ देते हुए भी पठानों का पूरा सफाया नहीं किया और उन्हें जंग के प्रतिद्वंद्वी मुस्लिम के रूप में रहने दिया, ताकि बँटे मुस्लिम धड़ों के बीच हिन्दू साम्राज्य को इस युद्ध का सबसे अधिक फायदा हो।

इतिहासकार एएल श्रीवास्तव की किताब The First Two Nawabs of Awadh के मुताबिक करोड़ों की धनराशि, दैनिक खर्चे का पैसा अलग से और आधे बंगश राज्य को पाकर मराठों ने 50 लाख रुपए अहमद खान बंगश और सदुल्लाह खान रुहल्ला से भी वसूले। यह राशि युद्ध की क्षतिपूर्ति नहीं थी, जैसा कि इतिहासकार सरदेसाई दावा करते हैं, बल्कि उनके लिए संधि में सकारात्मक पहलुओं का जुगाड़ करने के ऐवज में था, जबकि नवाब वज़ीर को केवल दुश्मन को जंग के मैदान में हराने का खोखला हर्ष मिला।


The First Two Nawabs of Awadh का अंश

पेशवा के सेनापतियों (‘सरदारों’) में से एक मल्हार राव होल्कर एक बड़ी सेना लेकर काशी पहुँच भी गए थे। वे वहाँ औरंगज़ेब की बनाई ज्ञानवापी मस्जिद को तोड़ देना चाहते थे और उसकी जगह पुण्यभूमि पर प्राचीन मंदिर की पुनर्स्थापना करना चाहते थे। लेकिन काशी के लोगों ने ही मराठों को रोक दिया, क्योंकि उन्हें डर था कि मराठों के चले जाने के बाद जिहादी इसका बदला स्थानीय निरीह हिन्दुओं का कत्लेआम करके लेंगे। काशी के ब्राह्मणों ने ही पेशवा से अपने सरदार को ऐसा करने से रोकने की अपील की। इतिहासकार जीएस सरदेसाई इस घटना का सबूत अपनी किताब New History of the Marathas में 18 जून, 1751 को एक मराठा दूत के लिखे गए पत्र के हवाले से देते हैं। वे इसके अलावा प्रयाग के लिए भी मराठा भावनाओं की सशक्तता का ज़िक्र करते हैं।

बनारस, इलाहाबाद, अयोध्या: पेशवा के पत्र

1759 में पेशवा बालाजी राव द्वारा दत्ताजी शिंदे को लिखे गए एक पत्र में भी इन तीनों स्थलों का ज़िक्र है। ‘सिंधियाओं के प्रबंधक’ माने जाने वाले रामजी अनंत के ज़रिए यह संदेश भिजवाया गया था। पेशवा ने लिखा था कि शुजा-उद-दौला से दो-तीन लक्ष्य हासिल किए जाने हैं। उन्होंने शिंदे को शुजाउद्दौला से बनारस, अयोध्या और इलाहाबाद हासिल करने के लिए कहा। उसी पत्र में कहा गया कि उसने 1757 में ही मराठों को बनारस और अयोध्या देने का वादा कर दिया था और काशी पर बात चल रही थी। अतः अगर सम्भव हो तो शिंदे तीनों को पाने की कोशिश करें।

इसके कुछ महीनों बाद भी एक पत्र में बनारस और काशी का ज़िक्र है। उस पत्र में शिंदे को दिल्ली में डेरा डाल कर मानसून बिताने, वहाँ पर भ्रष्ट अन्ताजी मानकेश्वर को गिरफ़्तार कर पुणे भिजवा देने और उसके बाद मुग़ल वज़ीर (जिससे वैसे तो वे दोस्ताना संबंध चाहते थे) को हटा कर शुजाउद्दौला को उसकी जगह दिला देने समेत किसी भी कीमत पर काशी, मथुरा और प्रयाग को मराठा नियंत्रण में ले आने की हिदायत दी गई है। यानी हिन्दू पवित्र स्थल हमेशा पेशवाई के जेहन में बने रहे।

ज़मीन पर साकार क्यों नहीं हुई धार्मिक स्थलों की मुक्ति?

हम देख सकते हैं कि हिन्दू पवित्र स्थलों को विधर्मियों से वापिस लेना मराठों की प्राथमिकता हमेशा ही थी। इसके भी सबूत हैं कि अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठा सेना के सेनापति रहे सदाशिव राव भाऊ को भी यह आदेश पेशवा से मिले थे। लेकिन 1761 की इस लड़ाई में हार के चलते यह सपना पूरा नहीं हो पाया। हालाँकि उस हार से राजनीतिक रूप से मराठे 10 साल में ही उबर गए, लेकिन तब तक भारत में अंग्रेज़ों के जमते कदमों ने मराठों की धमक को कम कर दिया था।

मराठे अविभाजित भारत के मध्य-दक्षिण यानि दक्कन के पठारों से सत्ताबल पाते थे और उत्तर भारत में उनकी शक्ति सीमित थी। इतिहास के इस काल के बारे में बहुत विस्तृत जानकारी रखने वाले ट्विटर हैंडल @ArmchairPseph के एडमिन का भी मानना है कि उत्तर में अवध और बंगाल के नवाबों की ताकत मराठों के सामने ठीक-ठाक रूप से थी। अतः दक्षिण में फैले साम्राज्य की ताकत के बल पर उससे काफ़ी दूर उत्तर में इन स्थानों पर कब्ज़ा करने लायक शक्ति उस समय तक मराठों के पास नहीं आई थी। उनकी सेनाओं के लौटने के बाद इन स्थानों की सुरक्षा लायक ताकत उस समय तक उनके पास नहीं थी।

अहिल्याबाई होल्कर

मल्हार राव होल्कर की बहू अहिल्या बाई होल्कर, जिन्होंने 1767 में खुद का साम्राज्य बनाया और रानी बनीं, ने आखिरकार 1780 में आज का काशी विश्वनाथ मंदिर बनवाया। मुख्यतः उनके धन और बाकी अन्य मराठाओं के योगदान से बने आक्रांताओं द्वारा तोड़ दिए गए मंदिरों जैसे पुरी के रामचंद्र मंदिर, रामेश्वरम के हनुमान मंदिर, परली का वैद्यनाथ मंदिर, अयोध्या में सरयू घाट, केदारनाथ, उज्जैन और कई अन्य मंदिरों पर उनकी अमिट छाप है।

हालाँकि राजनीतिक और सैन्य कारणों से मराठे हिन्दुओं के पवित्र स्थलों को वापिस हिन्दुओं के लिए पाने का सपना पूरा नहीं कर पाए, लेकिन भरसक प्रयासों में कोई कोताही न रहने की बात मानने के लिए इतने सबूत काफी होने चाहिए। आज जब हम इतिहास के इस मुहाने (राम जन्मभूमि पर आसन्न फैसले की घड़ी) पर खड़े हैं, तो यह याद करना ज़रूरी है कि हमारे पूर्वजों ने धन, प्राण, शक्ति समेत इसके लिए कितनी कुर्बानियाँ दी हैं।

(मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख का हिंदी रूपांतरण मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है।)