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अयोध्या पर फैसले से पहले रेलवे ने रद्द की RAF कर्मियों की छुट्टियॉं , 78 रेलवे स्टेशनों पर सुरक्षा के इंतजाम कड़े

भारतीय रेलवे ने गुरुवार को अपने सभी मण्डलों को एक सात पन्ने की एडवाइजरी जारी करते हुए सभी स्टेशनों की सुरक्षा कड़ी करने की सलाह दी है। आरपीएफ के जवानों की छुट्टियाँ भी रद्द कर दी गईं है। बता दें कि रेलवे की ओर से यह फैसला अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के आने वाले निर्णय से ठीक पहले आया है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पाँच सदस्यीय बेंच ने लगातार चालीस दिन तक चली सुनवाई के बाद इस मामले में 16 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई 17 नवम्बर को रिटायर होने वाले हैं। इससे पहले फैसला आने की उम्मीद है।

रेलवे द्वारा जारी एडवाइजरी के तहत अधिकारियों को यह निर्देश दिए गए हैं कि रेलवे प्लेटफॉर्म से लेकर पार्किंग, पुल, टनल, प्रोडक्शन यूनिट से लेकर हर उस जगह की सुरक्षा बढ़ा दी जाए जहाँ हिंसा की आशंका हो सकती है या किसी भी तरीके से हथियार या बम रखने की कोई गुंजाइश हो।

रेलवे सुरक्षाबलों को भी इस सम्बन्ध में निर्देश दिए गए हैं कि रेलवे परिसर की निकटता वाली सभी धार्मिक या मज़हबी प्रकृति की इमारतों पर ध्यान रखा जाए– वे किसी भी तरीके से साम्प्रदयिक उन्माद या दंगे का संभावित केंद्र सकती हैं। देश में 78 ऐसे बड़े स्टेशनों को चिन्हित कर लिया गया है जहाँ से यात्रा करने वाले लोगों की संख्या अधिक है। विशेष सिक्योरिटी प्रदान किए जाने वाले इन स्टेशनों में दिल्ली, मुंबई समेत कई बड़े स्टेशन शामिल हैं।

राम जन्मभूमि पर आने वाले अदालत के फैसले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने रेलवे को दिया बिजली बचाने का आदेश वापस लेते हुए अपने हालिया निर्देश में सभी स्टेशनों को 100 प्रतिशत बिजली खर्च कर उन्हें हर वक़्त रोशनी से भरपूर रखने को कहा है। गृह मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश में पहले ही 4,000 अतिरिक्त अर्धसैनिक बलों के जवानों को सुरक्षा के लिए तैनात कर दिया है। बता दें कि अयोध्या में पहले से ही धारा 144 लागू है।

हनी ट्रैप: आईएसआई की महिला जासूस को फेसबुक से जानकारी देने वाले दो जवान गिरफ्तार

सैन्य जानकारी लीक करने के आरोप में दो जवानों को राजस्थान के जोधपुर रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया। मध्यप्रदेश के रहने वाले लांस नायक रवि वर्मा और असम के विचित्र बोहरा पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के एक महिला जासूस के संपर्क में थे और उसे भारतीय सेना की अंदरूनी खबर दे रहे थे। दोनों राजस्थान के पोखरण में तैनात थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कि इन्हें हनी ट्रैप में फँसाने वाली महिला एक पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई की एक एजेंट है। इस महिला ने फोन कर दोनों जवानों को हनी ट्रैप के जरिए अपना शिकार बनाया और भारतीय सेना के सम्बन्ध में जानकारी एकत्रित करने की कोशिश की।

राजस्थान के एडीजी उमेश मिश्र ने बताया कि प्राथमिक जाँच के दौरान इस बात की पुष्टि हुई है कि दोनों ही सैनिक भारतीय सेना से जुड़ी अहम जानकारियों आईएसआई की महिला जासूस से साझा कर रहे थे। दोनों जवानों को अपना शिकार बनाने के लिए हनी ट्रैप का जाल बिछाने वाली महिला ने उनके नंबर पर कॉल की जिसके लिए उसने इन्टरनेट से वॉयस ओवर इन्टरनेट प्रोटोकॉल (VOIP)की तकनीक का इस्तेमाल किया।

इन्टरनेट से फोन करने की इस तकनीक के जरिए अपनी पहचान और स्थान गुप्त रखते हुए उसने दोनों से पंजाबी लहजे में बात की। इस तकनीक के कारण जवानो के मोबाइल पर महिला का नंबर डिस्प्ले नहीं हुआ। दोनों जवान फेसबुक और ह्वाटसएप के जरिए उसे सेना के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी।

मामले का खुलासा सीबीआई और आईबी के एक साझा ऑपरेशन के बाद हुआ। इसके बाद उन्हें जोधपुर रेलवे स्टेशन पर से उस वक़्त गिरफ्तार कर लिया गया जब दोनों अपने-अपने गाँव भागने की तैयारी में थे। दोनों को गिरफ्तार कर जयपुर ले जाया गया, जहाँ उनसे पूछताछ जारी है। बता दें कि ऐसी तमाम घटनाओं को देखते हुए भारतीय सेना ने अपने जवानों को हनी ट्रैप से बचने और इस तरह के बिछाए हुए जाल से सचेत रहने की चेतवानी भी दी है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सेना ने एडवाइजरी जारी करते हुए फेक फेसबुक प्रोफाइल से भी सतर्क रहने को कहा है।

हिन्दूफ़ोबिया के वीर: शोएब दानियाल के लिए साधु आतंकी, जयराम रमेश के लिए निहत्थों पर गोलीबारी बड़ी बहादुरी

क्या आपने कभी सुना है कि कोई फिदायीन आत्मघाती हमला करने अपने बीवी-बच्चों को साथ लेकर गया हो? क्या कभी किसी ने सुना है कि संसद पर हमला करने वाले अफ़ज़ल गुरु, 26/11 वाले कसाब या पुलवामा के जिहादी आदिल अहमद डार ने अपने घर की या अपने आस-पड़ोस की किसी भी औरत या बच्चे को लेकर अल्लाहु अकबर का नारा धमाका या गोलीबारी करने के पहले लगाया हो?

ऐसा आपने नहीं ही देखा या सुना होगा। यानी यह माना जा सकता है कि आतंकी हमलावर कभी अपने खुद के औरतों और बच्चों को लेकर हमला करने नहीं पहुँचेंगे, और अगर कोई अपने खुद के औरतें और बच्चे लेकर कोई बात करने पहुँचा हो, तो हिंसा करना उसका इरादा नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें उस के खुद के पक्ष के औरतों और बच्चों को नुकसान पहुँचने का खतरा होगा।

तो फिर ऐसा क्यों है कि ‘जाने माने पत्रकार’ शोएब दानियाल और ‘हार्वर्ड से पढ़े लिखे बौद्धिक’ कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश को 2016 के अपने लेखों में लगता था कि अपने साथ औरतों और बच्चों को लेकर, शांतिपूर्ण ढंग से, निहत्थे होकर गौहत्या के खिलाफ कानून की माँग करने, 1966 में संसद का घेराव करने पहुँची एक भीड़ आतंकियों की थी? क्यों उसके लिए जयराम रमेश “संसद पर पहला हमला” विशेषण का प्रयोग कर उसकी बरसी को याद किया था? वह भी तब जब उस भीड़ को अहिंसक होने के बावजूद इंदिरा गाँधी की पुलिस के हाथों हिंसा और मौत ही हाथ लगे?

क्यों शोएब दानियाल उस अहिंसक हिन्दू विरोध-प्रदर्शन की याद अफ़ज़ल गुरु के 2001 के षड्यंत्र से तुलना कर दिलाते हैं, जिसमें 8 सुरक्षा बल के लोग और एक बेगुनाह माली हिंसक, कट्टरपंथी जिहादियों के हाथों मारे गए थे?

इसका जवाब होगा निडर, बेख़ौफ़ हिन्दूफ़ोबिया।

दानियाल की बातों (और नाम) से साफ़ ज़ाहिर है कि वे उसी जिहादी-इस्लामी, मज़हबी नफ़रत और हिंसा में लिथड़ी विचारधारा के करीब 2 अरब वाहनों में से एक हैं, जिसे लगता है कि महज़ हिन्दू, या ‘काफ़िर’, होना भर गुनाह-ए-अज़ीम है, काबिल-ए-कत्ल है; वे उसी कट्टरपंथ के प्रवक्ता हैं जिसमें खुद संसद हमले के बारे में “जिहाद का मतलब स्ट्रगल होता है ब्रो, डोंट ‘डिमनाइज़’ इट” बताया जाता है, और एक अहिंसक भीड़, जिसमें औरतें और बच्चे भी थे, और ज़ाहिर तौर पर जिसका मकसद कोई हिंसा नहीं था, को अपने यहाँ वालों की तरह ही खूँखार दिखाने के लिए उसी संसद हमले से उसकी तुलना कर दी जाती है।

जयराम रमेश भी इतने आराम से गौभक्तों के लोकतान्त्रिक प्रदर्शनों को ‘संसद भवन पर हमला’ बताने की हिमाकत इसलिए कर पाते हैं कि उन्हें पता है इसकी कोई कीमत चुकानी नहीं पड़ेगी। हिन्दू न कभी इतने कट्टरपंथी हुए हैं, न होंगे (और न ही होना चाहिए) कि अपने साधु-संतों के अपमान को, चाहे वो शवों का ही अपमान क्यों न हो, कमलेश तिवारी के कातिलों की तरह ‘काबिले कत्ल’ नहीं बताएँगे। जयराम रमेश को कभी भी किसी आदमी से अकेले में मिलते हुआ यह डर नहीं होगा कि उसके पास मौजूद मिठाई के डिब्बे में से हथियार निकाल कर “जय श्री राम”, “जय साधु-संत” या “जय गौ माता” बोल कर उन्हें कोई काट नहीं डालेगा। उन्हें यह लेख लिखते समय पता था कि निहत्थे साधु-संतों पर गोली चलवाने को “वाह, क्या ‘निर्भीक’ फैसला लिया!” बोलने के लिए राजनीतिक कीमत भी नहीं चुकानी पड़ेगी, क्योंकि इससे अगर 400-500 हिन्दू वोट छिटकते भी हैं तो 20 करोड़ की एक ‘समुदाय विशेष’ की भीड़ का बड़ा हिस्सा ज़बान चटखारते हुए बीफ़-कबाब के सपने देखते हुए उनकी पार्टी को वोट देने के निर्णय पर और दृढ़ता से जम जाएगा।

केवल इस प्रदर्शन की तुलना अफ़ज़ल गुरु के जिहाद से कर के ही नहीं, और भी कई कदमों पर जयराम रमेश और शोएब दानियाल अपने हिन्दूफ़ोबिया के सबूत बड़ी अकड़ से देते हैं।

शोएब दानियाल के स्क्रॉल पर प्रकाशित लेख में इस घटना के कुछ साल पहले हुई एक घटना का भी ज़िक्र है। कुछ गौ रक्षक कार्यकर्ताओं से मिलते हुए जवाहरलाल नेहरू ने नाराज़गी जताई थी कि आखिर ऐसा प्रोपेगंडा कथित तौर पर क्यों चलाया जा रहा है कि वे बीफ़ खाते हैं। अब अपने आप में यह घटना सामान्य-सी लगती है, और होनी भी चाहिए, कि एक व्यक्ति अपने राजनीतिक विरोधियों से से कह रहा है कि उसके बारे में कथित तौर पर गलत बातें न की जाएँ। लेकिन इस घटना को शोएब दानियाल ने अपने लेख में जिस अंदाज़, जिस ‘टोन’ के साथ लिखा है, ऐसा लगता है कि मानो मजहब विशेष में स्वीकृत और (अधिकाँश, यदि सभी नहीं) हिन्दुओं में बुरे माने जाने वाले बीफ़-भक्षण से खुद को दूर दिखाने की कोशिश कर नेहरू ने कोई भयानक पाप कर दिया हो।

‘डेमॉनाईज़िंग’ (दानवीकरण करने वाला) टोन यह होता है दानियाल जी- कि मजहब विशेष के खाने-पीने की पद्धति से अलग, अपनी या अपने वोटरों की आस्था और गैर-इस्लामिक भोजन पद्धति का सम्मान कर देने भर से अपने ‘सेक्युलर’ राजा बाबू नेहरू को आप गोदी से उतार फेंकने को तैयार हैं। आप ऐसा दिखा रहे हैं मानो अगर कोई यह राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करे कि उसे इस्लाम में स्वीकार्य और मजहब में प्रचलित भोजन पद्धति में कोई चीज़ नहीं पसंद, या वह हिन्दुओं की भोजन-पद्धति और आस्था में किसी चीज़ का कोई सम्मान करने का राजनीतिक संदेश देना चाहे तो आपके हिसाब से यह ‘गुनाहे-अज़ीम’ है।

इसी तरह का हिन्दूफ़ोबिक टोन जयराम रमेश के लेख में भी है। वे द हिन्दू में छपे अपने में लेख इस बात पर नाराज़गी जताते हैं कि उक्त हत्याकांड के बाद, पुरी शंकराचार्य के अनशन के बाद (जिसे पत्रकारिता के समुदाय विशेष के ही अख़बार मिंट में ‘शायद गाँधी से भी लम्बा चला अनशन’ खिसियाते हुए माना गया है) गौ हत्या पर कानून बनाने की संभावना पर विचार के लिए बनी कमेटी में एमएस ‘गुरु जी’ गोलवलकर, तत्कालीन आरएसएस प्रमुख, को भी जगह दे दी गई। यह संघ से ज्यादा हिन्दुओं से दुश्मनी का भाव है- उन दिनों संघ विशुद्ध रूप से हिन्दू हितों की पैरोकारी करने वाले संगठन के रूप में देखा जाता था (उसका मजहबी अंग, राष्ट्रीय मुस्लिम मंच, 2002 में बना है), और संघ की उपस्थिति को हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व माना जाता था। यानी जयराम रमेश को इस बात से आपत्ति थी कि हिन्दुओं के मुद्दे पर बनी कमेटी में हिन्दुओं के सबसे बड़े संगठन का प्रतिनिधित्व क्यों था!

जयराम रमेश यहीं नहीं रुकते। चटखारे लेकर वे यह भी बताते हैं कि कैसे गौहत्या रोकने के लिए अनशन करने वाले पुरी शंकराचार्य को एक तरह से गौमाँस खिलाया गया। उस कमेटी में अमूल के संस्थापक और भारत में दुग्ध उत्पादन ‘आंदोलन’ के जनक माने जाने वाले वर्गीज़ कुरियन भी थे और पुरी शंकराचार्य भी। रमेश के अनुसार कुरियन ने शंकराचार्य की सेवा में पनीर भिजवाया और अगले दिन उन्हें बताया कि दूध से पनीर बनाने के लिए गाय के बछड़े की आँत से निकाले गए जीव-रसायन (‘रेनेट’) का इस्तेमाल हुआ है। किसी को धोखे से ऐसी चीज़ खिलाना जो न केवल उसकी आस्था के खिलाफ है, बल्कि जिसे रोकने को लेकर वह इंसान आंदोलन कर रहा है, अनशन कर चुका है- ऐसा कृत्य भी नीचता है, और इसे जिस ‘मज़े लेने’ के टोन में रमेश ने बताया, वह उससे भी गिरी हुई निकृष्टता है।

इन दोनों लेखों में और भी समानताएँ हैं। दोनों में गुलज़ारी लाल नंदा को मंत्रिमंडल से अपमानित करके निकाले जाने पर तालियाँ पीटी गईं हैं, जबकि उस समय नंदा का पार्टी में बहुत सम्मान था। न केवल तत्कालीन गृह मंत्री होने के तौर पर, बल्कि इसलिए भी कि दो-दो बार कॉन्ग्रेस में प्रधानमंत्रियों नेहरू और शास्त्री की आकस्मिक मौत के बाद कार्यवाहक प्रधानमंत्री की भूमिका निभाने के बाद भी उन्होंने किसी और को पूर्णकालिक प्रधानमंत्री चुने जाने पर शालीनतापूर्वक जगह खाली कर दी थी। इन दोनों के ही मुताबिक नंदा को निकाला भी इसलिए नहीं गया था कि उनके मातहत विभाग ने निहत्थी भीड़ पर अंग्रेजी, औपनिवेशिक बर्बरता दिखाई थी, बल्कि इसलिए कि वे भारतीय साधु समाज से जुड़े थे/गौहत्या पर रोक के समर्थक थे। यानी इंदिरा गाँधी को शक था कि नंदा के ‘बॉस’ होने के कारण पुलिस ने कम लोगों की जान ली, वरना ‘स्कोप’ और भी साधुओं की हत्या का था!

इसके अलावा दोनों ही के लेखों में इस हत्याकांड के बाद हुए 1967 के संसदीय चुनावों में भारतीय जनसंघ की सीटें 14 से 35 हो जाने और इंदिरा गाँधी की सीटें घट जाने को ऐसे दिखाया गया है मानो सीटें घट जाने के रूप में इस हत्याकांड के लिए इंदिरा गाँधी ने सही ही नहीं, सही से ज़्यादा ही कीमत चुका दी!

आज इस हत्याकांड की बरसी पर इंदिरा गाँधी के इस बर्बर दमन को याद करने के साथ जयराम रमेश और शोएब दानियाल जैसे हिन्दूफ़ोबिक लोगों की ओर भी एक गौर किए जाने की ज़रूरत है। यह सोचे जाने की ज़रूरत है कि सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी के धर्म को गाली देने, उसके साथ होने वाली हिंसा पर ताली पीटने की हिम्मत कहाँ से आती है? यह भी सोचना होगा कि ऐसी आस्था जिसने न केवल किसी के साथ मज़हबी हिंसा नहीं की, जबरिया मतांतरण नहीं किया, उससे शोएब दानियाल जैसे व्यक्ति की दुश्मनी क्या है? और जयराम रमेश जैसे लोग जिनकी हिन्दुओं से दुश्मनी नहीं शायद इस कारण से ऐसा कर पाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि हिन्दुओं को गाली देने से, उनकी हत्या का जश्न मनाने से हिन्दुओं का तो वोट जाएगा नहीं, लेकिन दानियाल जैसों का वोट भर-भर कर चला आएगा।

इसका जवाब ढूँढ़ना भी जरूरी है- और उस जवाब का समाधान करना भी।

CPI(M) दुनिया का छठा सबसे खूँखार आतंकी संगठन, जैश और लश्कर से भी ज्यादा बहाए खून

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) दुनिया का छठा सबसे खूॅंखार आतंकी संगठन है। अमेरिकी विदेश विभाग की एक रिपोर्ट से यह तथ्य सामने आया है। आतंकवाद पर य​ह रिपोर्ट शुक्रवार को जारी की गई। ‘कंट्री रिपोर्ट ऑन टेररिज्म 2018’ के आँकड़े बताते हैं कि सीपीआई (एम) ने पिछले साल 177 आतंकी घटनाओं में करीब 311 लोगों की हत्या की। हालॉंकि केंद्रीय गृह-मंत्रालय के आँकड़े बताते हैं कि 2018 में वामपंथी हिंसा की 833 वारदातें हुई। इनमें 240 लोगों ने अपनी जान गँवाई थी।

पिछले साल की ‘कंट्री रिपोर्ट ऑन टेररिज्म-2017’ में अमेरिका ने माओवादियों को दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक संगठन बताया था। ताजा रिपोर्ट में सीपीआई (एम) खूँखार आतंकी संगठनों की श्रेणी में छठे स्थान पर रखा गया है। उससे पहले इस सूची में तालिबान, इस्लामिक स्टेट, अल शबाब (अफ्रीका), बोको हरम (अफ्रीका) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ फिलिपीन्स है।

सीपीआई (एम) का मकसद गुरिल्ला वार के जरिए सरकार को उखाड़ फेंकना है। 21 सितंबर 2004 को इसकी स्थापना कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)), पीपुल्स वार ग्रुप और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसीआई) के विलय से हुई थी। यूएपीए कानून के तहत भारत सरकार ने भी सीपीआई (माओवादी) को आतंकी संगठन घोषित कर रखा है।

रिपोर्ट में अमेरिकी ख़ुफ़िया विभाग ने अफगानिस्तान, सीरिया और ईराक के बाद विश्व में भारत को आतंकवाद से प्रभावित चौथा देश बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल भारत में घटित 57 प्रतिशत आतंकवादी घटनाएँ जम्मू-कश्मीर में हुई थीं। मीडिया में आ रही रिपोर्ट्स की मानें तो अमेरिका की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2018 के दौरान भारत में घटित होने वाली अधिकांश घटनाओं के पीछे सीपीआई (माओवादी) के नक्सली शामिल रहे हैं। वे करीब 176 ऐसी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार हैं जोकि कुल आतंकी घटनाओं का 26 फ़ीसदी है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक जैश-ए-मोहम्मद ने 60 और हिज्बुल मुजाहिद्दीन ने 59 आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया। ऐसी घटनाओं में इनकी हिस्सेदारी 9-9 फीसदी है। लश्कर-ए-तैय्यबा को 55 वारदातों के साथ करीब 8 फीसदी घटनाओं का ज़िम्मेदार बताया गया है।

मुंबई हमलों में पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की सक्रिय भूमिका होने का दावा करने वाली इस लिस्ट में भारत के राज्यों में सक्रिय कुछ अन्य संगठनों के भी नाम शामिल हैं। इनमें यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम, नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड-इसाक मुइवा और आईएसआईएस की जम्मू-कश्मीर इकाई शामिल है। भारत और अमेरिका के आँकड़ों में फर्क को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने टिप्पणी से इनकार किया है।

पाकिस्तानी सेना ने इमरान खान से झाड़ा पल्ला, कहा- आजादी मार्च से हमारा नहीं लेना-देना

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम फजल के प्रमुख मौलाना फजलुर्रहमान  के नेतृत्व में आजादी मार्च में शामिल प्रदर्शनकारी उनके इस्तीफे पर अड़े हुए है। इस मुश्किल वक्त में उस सेना ने भी उनका साथ छोड़ दिया है जिसकी वे कठपुतली माने जाते हैं। पाकिस्तानी सेना ने बुधवार (6 नवंबर) को कहा कि इस संकट से सरकार को उबारने के लिए वह मध्यस्थता नहीं करेगी। सेना ने साफ शब्दों में कहा है कि आज़ादी मार्च एक राजनीतिक गतिविधि है और सेना का इससे कोई लेना-देना नहीं है।

डॉन की ख़बर के अनुसार, सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने एक निजी चैनल से कहा कि सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने पहले ही राजनीतिक नेताओं को एक प्रणाली तैयार करने और एक ऐसा माहौल बनाने का प्रस्ताव दिया था जो चुनावों में सेना की भूमिका को समाप्त कर सके।

राजनीति और चुनाव में सेना के हस्तक्षेप को लेकर उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी सेना ने हमेशा कानून और संविधान के मुताबिक, लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकारों का समर्थन किया है। हमारी जिम्मेदारियॉं हमें किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि में शामिल होने की अनुमति नहीं देते हैं। गौरतलब है कि पाकिस्तान के विपक्षी दलों ने सेना की बढ़ती भूमिका पर चिंता जताई है। उनका आरोप है कि सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों ने बीते साल चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया था।

मेजर जनरल गफूर ने कहा कि सेना चुनावों में तभी सम्मिलित होती है जब सरकार द्वारा संविधान के तहत सहायता के लिए अपेक्षित हो। उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं है कि संविधान हमें कोई भूमिका देता है या हमें इसकी ज़रूरत है। यह हमेशा सरकार का निर्णय होता है। अन्य पार्टियों का भी इनपुट है। सेना की इस मामले में कोई भूमिका नहीं है।”

सैन्य प्रवक्ता ने JUI-F सिट-इन द्वारा बनाई गई राजनीतिक स्थिति को परिभाषित करने में सेना की किसी भी भूमिका को उन्होंने ख़ारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “Sit-in एक राजनीतिक गतिविधि है। एक संस्था के रूप में सेना की न तो उसमें कोई भूमिका है और न ही अतीत में होगी…यह मामले से निपटने के लिए सरकार और विपक्ष के लिए है। यह उनका डोमेन और उनका काम है। ”

सेना ने आजादी मार्च को समाप्त करने में रूचि दिखाने से ऐसे वक्त में इनकार किया है जब इमरान के तख्तापलट को लेकर अटकलें लगाई जा रही है। हाल ही में संडे गार्डियन की रिपोर्ट में बताया गया था कि पाकिस्तानी सेना अब इमरान ख़ान की जगह पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रमुख बिलावल भुट्टो जरदारी को देश का प्रधानमंत्री बनाने की योजना पर काम कर रही है।

ऐसा देखा जा रहा है कि हर परिस्थिति में पाकिस्तान का साथ देने वाला चीन का भी इमरान खान पर से भरोसा हटता जा रहा है। इमरान के इस्तीफे की माँग को लेकर कराची से इस्लामाबाद तक होने वाले ‘आजादी मार्च’ से भी यह साफ हो रहा है कि इमरान खान अब सभी तरफ से (मतलब जनता भी त्रस्त है, वो जिन्होंने उन्हें पीएम की कुर्सी तक पहुँचाया) अपना समर्थन खो रहे हैं।

राम सारे संसार के भगवान, इंशाअल्लाह हिंदुओं के हक में आएगा अयोध्या का फैसला: बाबर का वंशज

बाबर के वंशज और मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के परपोते याकूब हबीबुद्दीन उर्फ़ प्रिंस तुसी ने भरोसा जताया है कि अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला हिंदुओं के हक में आएगा। न्यूज़ एक्स मीडिया चैनल से बातचीत में तुसी ने इस मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड की दावेदारी खारिज करते हुए कहा कि वह किसी तरह से भी पक्षकार नहीं है।

उन्होंने कहा कि अगर इस विवाद पर अदालत का फैसला बाबर (मंदिर तोड़कर मस्जिद खड़ी करने वाले) के पक्ष में आता भी है तो यह बात 100 प्रतिशत सच है कि हम यह ज़मीन भारत सरकार को सौंप देंगे। तुसी ने बताया कि बाबर और मुग़ल वंश के बाद अंग्रेजों की ईस्ट इण्डिया कंपनी ने इस ज़मीन के मालिकाना हक़ पर कब्ज़ा कर इसे हथिया लिया था। ईस्ट इण्डिया कंपनी के बाद अब इस ज़मीन को भारत सरकार को दे दिया जाना चाहिए।

प्रिंस ने कहा “मुझे लगता है कि अदालत का फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आएगा। यह सिर्फ हिन्दू या हिंदुस्तान का नहीं, बल्कि आस्था का मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट भी इस पर विचार करेगा, क्योंकि भगवान राम सिर्फ हिन्दुओं के नहीं बल्कि पूरे संसार के भगवान हैं। फैसला जो भी आए हम सभी को उसे स्वीकार करना होगा।”

तुसी ने कहा कि आस्था को देखते हुए अगर फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आता है तो वहाँ (विवादित स्थल पर) एक भव्य राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आने वाले फैसले का सम्मान करने की बात कहते हुए उन्होंने कहा कि इस्लामिक कानून के मुताबिक दूसरे समुदाय को वहाँ मस्जिद बनाने की इजाज़त ही नहीं है। इस इंटरव्यू में विवादित ज़मीन पर तुसी के उत्तराधिकार के दावे को लेकर भी सवाल किया गया। इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि 16वीं शताब्दी में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने संभवतः एक मंदिर को तोड़कर वहाँ पर मस्जिद बनवाई थी, एएसआई पहले ही इस बात को प्रमाणित कर चुका है।

उन्होंने कहा “यह भूमि एक प्राइवेट प्रॉपर्टी है। प्राइवेट प्रॉपर्टी पर मुस्लिम या उसके संगठन दावा नहीं ठोक सकते। इस सम्बन्ध में वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में कानूनी कागजात भी पेश नहीं कर सका है।” साक्षात्कार में तुसी ने बताया कि भारत के राष्ट्रपति से अपनी भेंट के दौरान उन्होंने कहा था कि बाबर एक सेक्युलर शासक था, जबकि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाने में उसके सेनापति मीर बाकी का हाथ था। तुसी ने कहा कि इस्लाम दूसरे धर्मों का आदर करने की शिक्षा देता है। इस मामले में अदालत का फैसला आने से पूर्व दोनों ही सम्प्रदायों हिन्दुओं और मुस्लिमों को तुसी ने फैसला स्वीकार करने के साथ शांति बनाए रखने की अपील की है।

बता दें कि तुसी अपने पूर्वजों की गलती के लिए पूरे हिन्दू समाज से माफ़ी भी माँग चुके हैं। वे अक्सर राम जन्मभूमि को लेकर दिए अपने बयानों के चलते चर्चाओं में रहते हैं। कुछ ही वक़्त पहले उन्होंने कहा था कि अगर राम मंदिर बना तो सबसे पहली ईंट वे खुद रखेंगे।

जब साधु-संतों पर इंदिरा सरकार ने चलवाई गोलियाँ, गौ भक्तों के खून से लहूलुहान हो गई थी दिल्ली

गौ रक्षा आधुनिक हिंदुत्व/हिन्दू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक रहा है। किंवदंती है कि मुगलों का दार उल इस्लाम उखाड़ फेंकने वाले मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने ‘कैरियर’ की शुरुआत एक मुस्लिम कसाई का वध करके की थी, जब वह एक गाय की हत्या करने जा रहा था। सावरकर हालाँकि वैसे तो ईश्वरीय, परा-प्राकृतिक सत्ता को लेकर संशयवादी/नास्तिक थे, लेकिन जीवित गाय से प्राप्त होने वाले गौ-उत्पादों (पंचगव्य- दूध, घी, दही, गोबर और गौमूत्र) के वैज्ञानिक महत्व और लाभ, और गायों के साथ भारतीय जनमानस के भावनात्मक और आस्था के जुड़ाव के चलते वे भी गौ-रक्षा के समर्थक थे। भारतीय संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों, Directive Principles of State Policy, में भी गायों के संवर्धन और रक्षण की बात कही गई है।

लेकिन इतने सब के बावजूद गौ रक्षक और गौ भक्त इस देश के सबसे अपमानित समूहों में से हैं, इस पर कोई दोराय नहीं हो सकती। कभी भारत में बैठकर रिपोर्टिंग करने वाली विदेशी रिपोर्टर फ़ुरक़ान खान “गौमूत्र पीने वालों, अपना गौमूत्र वाला धर्म छोड़ दो, आधी समस्याएँ दूर हो जाएँगी” की नसीहत दे कर चलीं जातीं हैं, क्योंकि पता है भारत सरकार घंटा कुछ करेगी। कभी आदिल डार गौमूत्र पीने वाले काफ़िरों को सबक सिखाने के लिए वीडियो संदेश छोड़कर पुलवामा हमला करता है, ताकि उन्हें पता चल जाए उनका क्या हाल होने वाला है। लिबरल गिरोह में जिसे लगता है कि किसी हिन्दू से कोई ट्विटर बहस वह हारने वाला है, वह ‘गौ भक्त’, ‘गौ रक्षक गुंडे’ और ‘गौमूत्र पीने वाले’ का तमाचा मार कर ब्लॉक कर देता है- क्योंकि हमारे खुद के नेता ही गौ रक्षकों को गाय की हत्या से रक्षा करने की भावना रखने भर से गुंडा घोषित कर देते हैं।

यह कोई 2014 या 2016 में पैदा हुई बीमारी नहीं है- आज़ादी के बाद से इस देश के नेता हमेशा ही गौ भक्तों को हिकारत भरी नज़रों से ही देखते रहे हैं, भले ही वे नेतागण अपने निजी जीवन में हिन्दू रीति-रिवाजों का नियमपूर्वक पालन करने वाले क्यों न हों, भले ही वे जनता से गाय-बछड़े का चुनाव चिह्न लगाकर वोट क्यों न बटोर रहे हों। ऐसे नेताओं में अग्रणी नाम भारत के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्रियों में गिनी जाने वालीं (लिबरल गिरोह के हिसाब से तो नंबर 1), ‘आयरन लेडी’ इंदिरा गाँधी का है।

आज से 53 साल पहले आज ही के दिन (7 नवंबर, 1966 को; विक्रम संवत में कार्तिक शुक्ल अष्टमी, जिसे गोप अष्टमी भी कहते हैं) इंदिरा गाँधी की सरकार ने निहत्थे साधु-संतों के नेतृत्व में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की
लोकतान्त्रिक तरीके से माँग कर रहे 3 से 7 लाख की भीड़ पर गोली चलवाई, आँसू गैस के गोले छोड़े, लाठियाँ बरसवाईं। यानी, दमन के वह सभी हथियार जनता को दोबारा चखने को मिले जिनको ब्रिटिश छोड़ कर गए थे, और जिनसे मुक्ति के सब्ज़बाग दिखाकर इन्हीं कॉन्ग्रेसी नेताओं ने आम आदमी को आज़ादी की लड़ाई में जोता था।

इस प्रदर्शन के आयोजक थे राजनीतिक ज़मीन तलाशता दिवंगत हो चुके श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारतीय जन संघ, मदन मोहन मालवीय और सावरकर के बाद किसी नए उद्धारक की आस देख रही हिन्दू महासभा (सावरकर ने उसी साल फरवरी में आमरण अनशन से प्राण त्यागे थे), आर्य समाज के नेता, विश्व हिन्दू परिषद और सनातन धर्म सभा नामक 1952 में बना संगठन।

संसद भवन के बाहर उन्हें रोक दिया गया और साधु-संतों ने अंदर बैठे सत्ताधीशों को निशाने पर लेकर इकठ्ठा भीड़ को सम्बोधित करना शुरू कर दिया। इसके पहले काफ़ी समय से माँग की जा रही थी कि संविधान के उन हिस्सों, जिन पर अमल करना सरकार के लिए जरूरी नहीं, से गौ-रक्षा को सरकार असली, ठोस नीति के रूप में कानून की शक्ल दे। इसको लेकर आंदोलन नेहरू के समय से चल रहा था और कॉन्ग्रेस के भीतर भी इसके समर्थकों की कमी नहीं थी। लेकिन मोहनदास करमचंद गाँधी की विरासत की दावेदारी से सत्ता पाने वाले जवाहरलाल नेहरू के आगे आवाज़ें घुटी हुईं थीं।

1965 में इस आंदोलन को हवा मिलनी शुरू हुई थी और देश के तीन शंकराचार्यों ने भी इस आंदोलन को अपने आशीर्वचन दे दिए थे। इसके बाद देश भर में विरोध-प्रदर्शन से लेकर भूख हड़तालें शुरू हो गईं थीं।

पहले तो इंदिरा गाँधी ने नई-नई सत्ता की अकड़ में मीडिया से कह दिया कि वे ऐसी किसी माँग के आगे नहीं झुकेंगी, लेकिन 7 नवंबर आते-आते ऐसा लगने लगा था कि वे जनभावना के सम्मान में नरम पड़ सकती हैं। आखिरकार 7 नवंबर को रैली हुई, और इस रैली के पीछे की भावनाओं को अगर और कुछ नहीं तो इस बात से समझा जा सकता है कि इसे उस तारीख तक दिल्ली में आज़ाद भारत की सबसे बड़ी रैली माना जाता है। इसमें वे नग्न नगा साधु भी शामिल हुए, जो आम तौर पर समाज से दूर रहते हैं, जो अपने पास आने वाले अधिकांश श्रद्धालुओं को भी दौड़ा कर दूर भगा देते हैं। The Spokesman नामक अखबार के अनुसार इस रैली में कुल 15,000 के आस-पास तो केवल साधु-संन्यासी ही थे। अन्य रिपोर्टों में इसके अलावा बड़ी संख्या में औरतों और बच्चों के भी होने की बात कही जाती है।

उस समय तक शांतिपूर्वक चल रही रैली की भीड़ तब उत्तेजित हो गई जब पता चला कि भारतीय जनसंघ के सांसद स्वामी रामेश्वरानंद को “अगरिमापूर्ण आचरण” के आरोप में संसद से धक्के मारकर निकाल दिया गया है।

इसके बाद भीड़ को गुस्सा आ गया और भीड़ की उत्तेजना के जवाब में पुलिस ने लाठियाँ भांजनी, गोलियाँ चलानी और आँसू गैस के गोले दागने शरू कर दिए। बाद में विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने वाले चम्पत राय उस रैली में बतौर बीएससी के एक छात्र मौजूद थे। वे बताते हैं कि उस समय संयोगवश मंच पर अटल बिहारी वाजपेयी नामक वही आदमी भाषण दे रहा था, जो युवावस्था में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारत को अंतिम संदेशवाहक था और बाद में भारत का ‘अजातशत्रु’ कहलाने वाला प्रधानमंत्री बना।

इसमें मरने वालों की संख्या पर बहुत विवाद है- सरकारी आँकड़े जहाँ महज़ 7 या 8 लोगों के मारे जाने की बात स्वीकारते हैं (और 500 से अधिक लोगों के अस्पताल में भर्ती होने की बात अगले ही दिन एक अखबार में छपी थी)। संघ विचारक केएन गोविंदाचार्य इस आँकड़े को 200 से ज्यादा बताते हैं। कुछ दक्षिणपंथी संगठनों का दावा है कि असल में 5000 से अधिक लोगों ने जान गँवाई थी, और उन्हें बिना निशान की कब्रों में सरकार ने दफन करा दिया (पत्रकारिता का समुदाय विशेष इसे ‘WhatsApp यूनिवर्सिटी’ से निकला आँकड़ा बताता है) टाइम्स ऑफ़ इंडिया में इस घटना के अगले ही दिन छपी रिपोर्ट में पुलिस के 209 राउंड फायरिंग की बात कही गई थी।

अपने “इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा” अंदाज़ में इंदिरा गाँधी ने बाद में संसद में इस प्रदर्शन को अपनी सरकार नहीं, देश और पूरे लोकतान्त्रिक सिद्धांत के ही खिलाफ बताने का फतवा जारी कर दिया। साथ ही तत्कालीन गृह मंत्री (और दो बार देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री का ओहदा संभाल चुके गौ-हत्या विरोधी) गुलज़ारी लाल नंदा का इस्तीफा ले लिया।

चूँकि उन दिनों इंटरनेट नहीं था, तो शायद ही यह पता चले कि असल में कितने लोग मरे थे, या पहले भीड़ ने हिंसा की (जैसा कि मिंट आदि का लिबरल गैंग दावा करता है), या अंग्रेजी शासन का खुमार नहीं भूली पुलिस ने अपनी राजनीतिक आका को खुश करने के लिए ‘यस बॉस’ कर हमला बोल दिया था। लेकिन इस घटना से यह तो साफ़ पता चलता है कि भारतीय सत्ता हिन्दू-विरोध की बुनियाद पर बने सेक्युलरिज़्म नामक सिद्धांत की वाहक ‘सेक्युलरासुर’ हमेशा से रही है। गौ रक्षकों को उस समय भी अपमान, हिंसा, हत्या के अलावा कुछ नहीं मिलता था।

गलती शायद हिन्दुओं की ही है- अगर गोप अष्टमी के दिन साधुओं के नेतृत्व के जनसमूह पर गौ रक्षा के मुद्दे पर वही शासक हमला कर दे, जनता रक्षक होना जिसका प्राकृतिक धर्म है, और गौ रक्षक होने का जो खुद ही को निर्देश देता है, तो नियति का इशारा उसी दिन समझ जाना चाहिए था कि गौ रक्षकों, गौ भक्तों के तो अच्छे दिन नहीं ही आने वाले हैं।

आतंकियों की हमदर्द माहिरा खान बाँटेगी शरणार्थियों की पीड़ा: एंबेसडर से यूएन की गुडविल ही न हो जाए चौपट

संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियॉं गुडविल एंबेसडर यानी सद्भावना दूत नियुक्त करती रहती हैं। जाने-पहचाने चेहरों को यह जिम्मेदारी दी जाती है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सकारात्मक संदेश पहुॅंचाने में मदद मिले। लेकिन, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी की नई गुडविल एंबेसडर के बॉयो पर जरा गौर फरमाइए।

पुलवामा के आतंकी हमले पर उनके होंठ सिल जाते हैं, लेकिन बालाकोट में आतंकी कैंपों पर एयरस्ट्राइक को वह बेहूदा बताती हैं। वह बॉलीवुड से ‘रईस’ बनती हैं। हिंदी फिल्म के अभिनेता के साथ विदेश में मस्ती कर सुर्खियॉं बटोरती हैं। पाबंदी लगने पर कहती हैं- मैं तो खुद ही छोड़ आई वो गलियॉं। कश्मीर में आतंकवाद से निपटने और आम लोगों की सुरक्षा के लिए मोदी सरकार की ओर से एहतियातन उठाए कदमों पर वह कहती हैं ‘
जन्नत जल रही है…’।

यूएनएचसीआर की नई सद्भावना दूत से अब आप शायद परिचित हो गए होंगे। ये हैं पाकिस्तानी अभिनेत्री माहिरा खान। खुद को गुडविल एंबेसडर चुने जाने की जानकारी देते हुए उन्होंने सोशल मीडिया में यूएन का आभार भी जताया। उनके जिम्मे वही काम होगा जिसके लिए यूएन ने कुछ साल पहले इस्लामिक स्टेट के आतंकियों की सेक्स स्लेव रही 23 साल की नादिया मुराद बासी ताहा को चुना था। मानव तस्करी की शिकार लोगों और खास तौर पर महिलाओं और लड़कियों की पीड़ा के बारे में जागरूकता फैलाना।

माहिरा ने ट्विटर पर लिखा है कि यूएन का एंबेसडर बनना उनके लिए सम्मान की बात है। वे इस बात पर गर्व करती हैं कि उनकी मातृभूमि पाकिस्तान ने पिछले 40 साल से रिफ्यूजियों के लिए अपनी बाहें खोली हुई हैं।

गुडविल एंबेसडर चुनने के लिए यूएन ने बकायदा गाइडलाइन तय कर रखी है। अमूमन ऐसे लोगों का चुनाव किया जाता है जिन्होंने अपने काम से मुकाम हासिल किया हो। जिनकी शख्सियत ही संदेश देने का काम करती हो। कला, साहित्य, विज्ञान, मनोरंजन, खेल आदि क्षेत्रों से चुने जाने वाले ऐसे लोगों का काम दूसरे समुदाय, समाज के बीच सद्भावना बढ़ाना होता है। चुनौतियों से निपटने के लिए जागरूकता पैदा करना इनकी जिम्मेदारी होती है।

इस कसौटी पर माहिरा का अब तक का सफर देखते हुए सवाल उठना लाजिमी है कि उनका चुनाव कर यूएन क्या संदेश देना चाहता है? माहिरा की खासियत है कि वो पाकिस्तान और अपने मजहब से जुड़े मुद्दों पर लगातार बोलती हैं। लेकिन आतंकवाद पर चुप्पी साध लेती हैं। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार उन्हें नहीं दिखाई पड़ता। अहमदिया समुदाय के अधिकार की उन्हें फिक्र नहीं है। एक काम जो वे बखूबी करती हैं वह है मौका मिलते ही भारत के खिलाफ जहर उगलना।

न्यूजीलैंड में मस्जिद पर हुए हमले पर गहरा दुख व्यक्त करने वाली माहिरा पुलवामा के समय ट्विटर पर लाइव होने की सूचना दे रही थी, उनकी पूरी टाइमलाइन पर इस हमले को लेकर कोई जिक्र नहीं था। लेकिन जब आईएएफ ने बालाकोट स्थित आतंकी कैंपों पर अपनी कार्रवाई की, तो उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ लिखा और कहा कि इससे बेहूदा कुछ नहीं है।

इसके बाद जब पाकिस्तान के न सुधरने वाले रवैये पर भारत ने वहाँ के कलाकारों को अपने देश में बैन किया था, तब भी माहिरा ने अपने प्रतिक्रिया देते हुए साफ किया था कि उन्हें इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता। क्योंकि उनका ध्यान पहले से ही अपने मुल्क पर था। कश्मीर से आर्टिकल 370 के निष्प्रभावी पर भी उन्होंने जहर उगलने में कंजूसी नहीं की थी। उन्होंने कहा था कि भारत का यह फैसला निर्दोषों के लिए जान गँवाने जैसा है। ट्वीट किया, “जन्नत जल रही है और हम आँसू बहा रहे हैं।”

माहिरा खान UNHRC द्वारा शेयर की गई एक वीडियो में कहती नजर आ रही हैं कि पाकिस्तान ने पिछले 40 सालों में शरणार्थियों की मेजबानी करके पूरे विश्व में एक उदाहरण कायम किया है। लेकिन, गौर करने वाली बात है कि माहिरा हमेशा अपने देश में अल्पसंख्यकों के साथ होते अत्याचार पर चुप रही हैं। उन्होंने कभी प्रशासन से सवाल पूछने की हिम्मत नहीं जुटाई कि आखिर उनके देश में हिंदुओं, सिखों की हालत इतनी दयनीय क्यों है? आखिर क्यों उनके देश में अहमदियों से मुस्लिम बनने का तमगा छीन लिया गया? आखिर क्यों बलूचिस्तान जैसे प्रांतों में लोग उनकी सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर आंदोलन कर रहे हैं और क्यों आवाज उठाने वाले लोगों से लेकर एक दिमागी रूप से कमजोर चोर तक को उनके प्रशासन द्वारा मार दिया जा रहा है?

माहिरा ऐसी गुडविल एंबेसडर हैं जिन्हें अपने मुल्क में पनप रहा आतंक नहीं दिखता। वे कश्मीर में सुरक्षा बढ़ाए जाने को जेल बनाना समझती हैं और लिखती हैं, “जो लोग कश्मीर को जेल बनाने पर आमदा हैं और खुशी मना रहे हैं, उन्हें अपने दिल में झांक कर देखना चाहिए। आपको ऐसा करने पर कश्मीर में परेशान हो रहे लोगों के लिए सहानभूति महसूस होगीl कश्मीर एक बार फिर खुले जेल की तरह हो गया है।”

माहिरा जैसों से तो दिल की सुनने और दिल में झॉंक कर देखने की उम्मीद नहीं की जा सकती। उम्मीद यूएन से है कि वह अपने गुडविल का ध्यान रखे। ऐसा न हो कि शरणार्थियों का दर्द भी कम न हो और उसकी साख को भी बट्टा लग जाए।

कट्टरपंथी इस्लामी संगठन के मंच पर दिखा पूर्व IAS गोपीनाथन: आर्टिकल 370 हटाए जाने पर दिया था इस्तीफा

पूर्व आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन ने एक कट्टरपंथी इस्लामी छात्र संगठन के कार्यक्रम में शिरकत की। यह संगठन हिन्दुस्तान और हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने के लिए जाना जाता है। गोपीनाथन वही अधिकारी हैं, जिसने जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त करने के मोदी सरकार के फैसले के खिलाफ नौकरी से इस्तीफा दे दिया था।

दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में बुधवार को ‘डिकेड ऑफ़ डिगनिटी’ नामक कार्यक्रम का आयोजन कट्टर इस्लामिक संगठन कैम्पस फ्रंट ऑफ़ इंडिया (सीएफआई) की ओर से किया गया था। सीएफआई विवादित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफआई) से जुड़ा है। सीएफआई के सदस्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोटने के आरोप झेल रहे हैं। इस संगठन से जुड़े लोगों पर अपने से परे विचार रखने वाले लोगों की हत्या के गंभीर आरोप हैं। बावजूद इसके सोशल मीडिया पर जमकर नैतिकता बघारने वाले गोपीनाथन ने उसके कार्यक्रम में अपने विचार रखे।

बीते साल, पीएफआई से प्रेरित सीएफआई के सदस्यों ने केरल के एर्नाकुलम स्थिम महाराजा कॉलेज में छात्रों के एक समूह को चाकू से गोद दिया था। वे इस बात से खफा था कि कैंपस के भीतर दूसरे छात्रों ने वॉल राइटिंग कैसे की। एसएफआई के छात्रों पर हमले के इस मामले में सीएफआई के तीन सदस्य बिलाल, फारूक और रियाज गिरफ्तार किए गए थे। कथित तौर पर हमला करने वाली उस भीड़ में 15 और लोग शामिल थे।

अनुच्छेद 370 पर मोदी सरकार के फैसले का विरोध में आईएएस की नौकरी से इस्तीफ़ा देकर गोपीनाथन सुर्ख़ियों में आए थे। हालाँकि केंद्र सरकार ने अभी तक उनका इस्तीफ़ा मंज़ूर नहीं किया है। इस्तीफ़ा देने के बाद यह बात सामने आई थी कि उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई चल रही थी। यह कार्रवाई कश्मीर पर केंद्र के फैसले से करीब एक महीने पहले 8 जुलाई को शुरू की गई थी।

सीएफआई के अब्बा संगठन पीएफआई पर घृणा और सांप्रदायिक घटनाओं को अंजाम देने जैसे गंभीर आरोप हैं। इस संगठन के सदस्यों ने केरल के प्रोफेसर का हाथ काट दिया था। प्रोफेसर ने कथित तौर पर पैंगबर मुहम्मद का अपमान किया था। नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी (एनआईए) ने केरल में लव-जिहाद को बढ़ावा देने के पीछे इस संगठन का हाथ पाया है। बता दें कि पीएफआई की राजनीतिक इकाई एसडीपीआई भी विवादों से अछूती नहीं है। केरल के कन्नूर में हुई एबीवीपी के कार्यकर्ता की हत्या के सिलसिले में एसडीपीआई के कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था।

रेलवे में ‘केवल अग्रवाल वैश्य समुदाय’ के लिए भर्ती विज्ञापन जारी करने पर HR प्रबंधक बर्खास्त

भारतीय रेलवे के सबसे बड़े खानपान विक्रेताओं में से एक आरके मील्स द्वारा जारी एक विज्ञापन ने सोशल मीडिया पर कई लोगों की भावनाओं को आहत कर दिया। यह विज्ञापन ख़ासतौर पर उन उम्मीदवारों के लिए था जो ‘अग्रवाल वैश्य समुदाय’ से संबंध रखते हों। यह विज्ञापन टाइम्स ऑफ इंडिया के 6 नवंबर 2019 संस्करण में पेज 12 में प्रकाशित हुआ था। 

आरके मील्स द्वारा जारी किया विज्ञापन

Brandavan फूड प्रोडक्ट्स से संबंधित इस विज्ञापन के अनुसार, आरके मील्स को रेलवे फूड प्लाजा मैनेजर, ट्रेन कैटरिंग मैनेजर, बेस किचन मैनेजर और स्टोर मैनेजर के पदों के लिए 100 उम्मीदवारों की भर्ती करनी है।

विज्ञापन में आवेदन के लिए चार मानदंडों का उल्लेख किया गया, जो इस प्रकार हैं:

1. उम्मीदवारों को भारत में कहीं भी काम करने के लिए तैयार होना चाहिए

2. उम्मीदवार केवल अग्रवाल वैश्य समुदाय के होने चाहिए।

3. पारिवारिक पृष्ठभूमि अच्छी होनी चाहिए

4. 10+2 यानी 12वीं कक्षा पास होना चाहिए

इस विज्ञापन का स्क्रीनशॉट जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, यूज़र्स ने विज्ञापन के मानदंडों के प्रति नाराज़गी जताई। बता दें कि यह विज्ञापन Brandavan फूड प्रोडक्ट्स के मानव संसाधन विभाग द्वारा जारी किया गया था।

ऑपइंडिया ने रेलवे के अधिकारियों के संपर्क किया तो उन्होंने आरके मील्स द्वारा जारी किए गए विज्ञापन के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई किए जाने की बात जानकारी शेयर की।

रेलवे के अधिकारियों ने ऑपइंडिया को बताया, “IRCTC द्वारा इस मामले को गंभीरता से लिया गया है और ठेकेदार को जाति के आधार पर नौकरी देने से परहेज करने का नोटिस जारी किया है और किसी भी जाति/ पंथ/ धर्म या क्षेत्र से संबंधित उपयुक्त व्यक्तियों की भर्ती करने के लिए के लिए कहा गया है।”

इसके अलावा, रेलवे अधिकारियों ने पुष्टि की है कि ठेकेदार (आरके मील्स) ने रेलवे को कन्फ़र्म किया है कि उन्होंने ‘अग्रवाल वैश्य समुदाय’ के उम्मीदवारों के लिए आवेदन माँगने वाले HR प्रबंधक को ज़िम्मेदार ठहराते हुए उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया है।

आरके मील्स की वेबसाइट पर उपलब्ध नंबर पर कॉल करके ऑपइंडिया ने भी Brandavan फूड प्रोडक्ट्स तक पहुँचने की कोशिश की। हमारी ओर से जिन्हें कॉल किया गया उन्हें इस मुद्दे की पूरी जानकारी थी, लेकिन जब उनसे टिप्पणी माँगी गई, तो उन्होंने कॉल करने के लिए एक अन्य वैकल्पिक नंबर प्रदान किया।

ऑपइंडिया ने जब उस वैकल्पिक नंबर पर सम्पर्क किया, तो फोन स्विच ऑफ़ हो गया। नंबर स्विच ऑफ़ मिलने के बाद, वेबसाइट पर सूचीबद्ध नंबर को कई बार फिर से कॉल किया गया लेकिन किसी ने भी कॉल का कोई जवाब नहीं दिया।

इसके बाद अधिक जानकारी जुटाने के लिए Brandavan फूड प्रोडक्ट्स को ईमेल किया गया, लेकिन ऑपइंडिया को विक्रेता से अब तक कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई है। इस मामले पर जैसे ही कोई जानकारी प्राप्त होगी हम आपको अपडेट करेंगे।