16 दिसंबर 2012 को दिल्ली के मुनिरका में हुए निर्भया गैंगरेप के दोषियों को जेल अधीक्षक ने अपनी ओर से फाँसी का नोटिस 29 अक्टूबर को दे दिया है। इस नोटिस के ज़रिए उन्हें बताया गया है कि फाँसी की सज़ा के खिलाफ राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर करने के लिए उनके पास सात दिन का वक़्त है। बता दें कि 29 अक्टूबर को जारी एक कानूनी नोटिस में दोषियों से कहा गया था कि अपनी मौत की सजा के विरुद्ध दया याचिका दाखिल करने के लिए उनके पास 7 दिन का वक़्त है।
Superintendent, Tihar Jail to the four Nirbhaya case convicts: If you wish to file the ‘Mercy Petition’ in your case against the capital sentence before the President, you can file it within 7 days of the receipt of this notice, through prison authorities… (2/3)
नोटिस में कहा गया, “सूचित किया जाता है कि यदि आपने अब तक दया याचिका दायर नहीं की है और यदि आप मामले में फाँसी की सजा के खिलाफ राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर करना चाहते हैं तो आप यह नोटिस पाने के सात दिनों के भीतर ऐसा कर सकते हैं। इसमें नाकाम रहने पर माना जाएगा कि आप दया याचिका नहीं दायर करना चाहते हैं और जेल प्रशासन कानून के मुताबिक आगे की आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू करेगा।”
Asha Devi, mother of December 16 Delhi gang-rape victim: This should have happened long ago, Supreme Court had given the verdict in 2017. I have been struggling for 7 years now, but they haven’t been hanged yet. Jail authorities have taken the right step. https://t.co/KFnbCNVJbbpic.twitter.com/TRpIlPYWyz
बता दें कि 16 दिसंबर 2012 को 23 वर्षीय छात्रा के साथ दिल्ली में एक बस में छ लोगों ने दुष्कर्म कर उसके साथ मार-पीट कर चलती बस ने नीचे फेंक दिया था। 29 दिसंबर 2012 को जिंदगी और मौत की जंग के बीच सिंगापुर में इलाज के दौरान पीड़िता की मौत हो गई थी। इस घटना में पकड़े आरोपियों में से एक राम सिंह ने जेल में ही ख़ुदकुशी कर ली थी।
दिल्ली गैंगरेप घटना को अंजाम देने वाला एक दोषी उस वक़्त नाबालिग था, जिसे न्यायालय ने बाल सुधार गृह में 3 साल की सजा सुनाई थी। वह अब अपनी सज़ा पूरी कर रिहा हो चुका है। जबकि सर्वोच्च न्यायलय ने 9 जुलाई को मामलें के तीन दोषियों मुकेश (31), पवन (24) और विनय शर्मा (25) की याचिकाएँ ख़ारिज कर दी थीं। अपनी इस याचिका में तीनों ने 2017 में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा फाँसी की फैसले को बरक़रार रखने को चुनौती दी थी। जबकि मौत की सजा का सामना कर रहे चौथे दोषी अक्षय कुमार सिंह (33) ने सर्वोच्च न्यायलय में पुनर्विचार याचिका दायर नहीं की थी।
पीड़िता की माँ ने जेल प्रशासन के कदम पर ख़ुशी ज़ाहिर की है। उन्होंने कहा कि यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था। उन्होंने बताया कि वे 7 साल से इसके लिए लड़ रही थीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला 2017 में ही दे दिया था।
दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार ने छठ पूजा कमिटियों को पर्व के लिए एक एडवाइजरी जारी की है। एडवाइजरी में छठ पूजा के मौके पर दिल्ली सरकार द्वारा पर्व के मनाए जाने के लिए सजाए गए 1,108 घाटों पर त्यौहार को प्लास्टिक और पटाखों से दूर रखने की सलाह दी गई है। आज से (गुरुवार, 31 अक्टूबर, 2019) शुरू हो रहे इस चार दिन के त्यौहार में घाटों पर तैनात नागरिक सुरक्षा स्वयंसेवकों और सरकारी अधिकारियों की ज़िम्मेदारी होगी कि वे इन घाटों पर प्लास्टिक के उत्पादों के प्रयोग और आतिशबाजी को हतोत्साहित करें। मुख्य पर्व आगामी शनिवार-रविवार (2-3 नवंबर, 2019) को होना है।
दिल्ली सरकार के पर्यावरण मंत्री कैलाश गहलोत ने डीएम, एसडीएम और अन्य अफसरों के साथ कई घाटों का मुआयना किया और पर्व के लिए किए गए इंतजामों की जानकारी ली। उन्होंने भीड़ नियंत्रण के लिए अधिकारियों को विशेष तौर पर निर्देश दिए। गहलोत ने हाथी घाट, कुदेसिया घाट और गीता घाट का दौरा किया।
Inspected today Haathi Ghat, Kudesia Ghat and Geeta Ghat with area DM, SDM and other dept officers to ensure that necessary and proper arrangements are being made for Chhath Pooja on 02.11.19. Have further directed the officers to ensure proper crowd management. pic.twitter.com/t06NTgD1EZ
इसके अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने भी ट्वीट कर जानकारी दी कि श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सरकार ने घाटों की संख्या 72 से बढ़ाकर 1,108 कर दी है।
सभी श्रद्धालुओं को छठ पर्व मनाने के लिए अपने घर से दूर न जाना पड़े इसीलिए हमने 72 से बढ़ा कर इस साल 1108 घाट बनाए हैं। सभी घाटों पर दिल्ली सरकार शानदार इंतजाम कर रही हैं। https://t.co/oONic8jgcL
इसके अलावा तीर्थ यात्रा विकास समिति के अध्यक्ष कमल बंसल के हवाले से टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सरकार ने सभी घाटों पर मोबाइल शौचालय और दवाखानों के भी इंतज़ाम किए हुए हैं। उन्होंने भी छठ पूजा में प्लास्टिक और पटाखों का इस्तेमाल रोकने की बात दोहराई। “हमने छठ पूजा कमिटियों को एक एडवाइजरी जारी की है, जिसमें उनसे त्यौहार के दौरान प्लास्टिक और पटाखों का इस्तेमाल न करने की बात कही गई है।”
इसके अलावा बंसल ने 30 घाट यमुना नदी के किनारे बनाए जाने की बात बताई है। दिल्ली सरकार द्वारा लगाए गए 1,108 घाटों में से 266 दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली (पटेल नगर-द्वारका साइड, ‘ब्लू लाइन’), 184 पश्चिमी दिल्ली (‘ग्रीन लाइन’) और दक्षिणी दिल्ली (जोरबाग-छतरपुर, ‘येलो लाइन’) में 83 घाट लगाए गए हैं।
छत्तीसगढ़ में राज कर रही कॉन्ग्रेस सरकार ने एनडीटीवी के जाने माने और ‘निष्पक्ष’ पत्रकार रविश कुमार को सम्मानित करने का ऐलान किया है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने रवीश को उनकी पत्रकारिता के लिए सम्मान देने का निश्चय किया है।
1 से 3 नवंबर तक दिए जाएँगे यह अवॉर्ड, 21वें स्थान पर देखिए रवीश कुमार का नाम
छत्तीसगढ़ राज्य में स्थापना दिवस के मौके पर तीन दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में तमाम क्षेत्रों से 23 लोगों को सम्मानित किया जाएगा। इस कार्यक्रम में पत्रकारिता क्षेत्र के लिए पंडित माधवराव सप्रे राष्ट्रीय रचनात्मकता सम्मान दिया जाना है, जो एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर रवीश कुमार को दिया जाना तय किया गया है।
उल्लेखनीय है कि कथित ‘निष्पक्ष’ पत्रकार रवीश कुमार ने हाल ही में अयोध्या में हुए दीपोत्सव की रिपोर्टिंग को लेकर हिंदी अख़बार हिंदुस्तान के शीर्षक पर फेसबुक के माध्यम से अपनी टिप्पणी दी थी। रवीश ने हिन्दुओं के त्योहार को हर्षोल्लास से मनाए जाने पर आपत्ति दिखाई थी और तंज मारते हुए अपनी टिप्प्णी में लिखा था कि ऐसी रिपोर्टिंग को पुलित्ज़र प्राइज़ मिलना चाहिए। बता दें कि पुलित्ज़र सम्मान साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में दिया जाने वाला एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मान है। एक समय रवीश ने अपने शो में ज्यादा लोगों के न देखने की वजह का कारण पीएम मोदी को बताया था। इसी दौरान रवीश ने पीएम मोदी को हिटलर भी कहा था।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने चीन के उस बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जिसमें चीन ने लद्दाख और जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन पर आपत्ति जताते हुए इसे अपने इलाके में हस्तक्षेप बताया था। रवीश कुमार ने दो टूक कहा कि जैसे भारत दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखलंदाज़ी नहीं करने की नीति पर चलता है, वैसी ही उम्मीद वह दूसरे देशों से अपने आंतरिक मामलों के लिए भी करता है। उनका इशारा चीन की शिनजियांग, तिब्बत और अब हॉन्ग कॉन्ग में दमनकारी नीति की ओर था।
प्रेस को सम्बोधित करते हुए रवीश कुमार ने कहा, “चीन को पता है कि इस मुद्दे पर भारत की स्थिति स्पष्ट और सतत है। पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य को लद्दाख व जम्मू और कश्मीर के दो केंद्र शासित प्रदेशों में तब्दील करना भारत का आंतरिक मामला है।” उन्होंने आगे जोड़ा, “हम आशा नहीं करते कि चीन समेत अन्य देश उन मामलों पर टिप्पणी करें जो भारत के अंदरूनी हैं, जैसे भारत अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से बचता है।”
Reacting to China’s remark on J&K bifurcation, MEA says UTs of J&K and Ladakh are an integral part of Indiahttps://t.co/xwB1xoLyPV
इसके पहले चीन ने जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन पर आपत्ति जताते हुए “इसमें हमारे हिस्से को भी हड़प लिया” का प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया था। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग को इसके लिए आगे किया गया था। गौरतलब है कि चीन लद्दाख को तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा मानते हुए भौगोलिक और सांस्कृतिक समानता के आधार पर उस पर दावा ठोंकता है। लेकिन उसी भौगोलिक और सांस्कृतिक समानता के आधार पर गिलगित, बाल्टिस्तान, पीओके और पाकिस्तान द्वारा खुद को बेचे हुए पीओके के भूभाग के मामले में इसी आधार को खारिज कर देता है।
China has termed the J&K bifurcation “unlawful” and “void”. Chinese Foreign Ministry spokesperson Geng Shuang said the so-called UTs of J&K and Ladakh included some of China’s territory into its administrative jurisdictionhttps://t.co/xwB1xoLyPV
#China has objected to the bifurcation of J&K into two union territories as “unlawful and void”, saying #India‘s decision to “include” some of China’s territory into its administrative jurisdiction “challenged” Beijing’s sovereignty https://t.co/oJdFPrbVIc
जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बुधवार (30 अक्टूबर) मध्यरात्रि को ख़त्म हो गया। इसके साथ ही दो नए केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख आस्तित्व में आ गए। अनुच्छेद-370 के तहत मिले विशेष दर्जे को संसद द्वारा निरस्त किए जाने के बाद आज से यह निर्णय प्रभावी हो गया है। गृह मंत्रालय ने बुधवार को इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी थी।
इसी साल 6 अगस्त को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 को पारित कर दिया था। इसके तहत तय हुआ था कि दो अलग-अलग केंद्र शासित राज्यों जम्मू-कश्मीर व लद्दाख के रूप में 31 अक्टूबर 2019 से अस्तित्व में आएगा। ऐसा पहली बार है जब किसी राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में तब्दील कर दिया गया है। इस सिससिले में श्रीनगर और लेह में दो अलग-अलग शपथग्रहण समारोह का आयोजन किया गया। पहला समरोह लेह में हुआ जहाँ आरके माथुर ने लद्दाख के उपराज्यपाल के तौर पर शपथ ली। मुर्मू को जम्मू और कश्मीर घाटी के उपराज्यपाल का पद भार सौंपा गया है, और उनके पूर्ववर्ती सत्यपाल मलिक गोवा के गवर्नर के तौर पर भेजे जाएँगे।
इंदिरा गाँधी की पुण्यतिथि को याद करने के दो कारण हैं – पहला कारण जिससे सभी वाकिफ हैं कि देश ने एक प्रधानमंत्री खोया, जिसे खुदके ही सुरक्षाकर्मियों ने गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया। मगर कुछ ही लोग याद रख पाते हैं कि आज के ही दिन से दिल्ली से लेकर देश के कोने-कोने में सिख विरोधी दंगा हुआ। यह एक ऐसा नरसंहार था, जिसे भारत के इतिहास में दर्ज सबसे सुनियोजित नरसंहार कहना गलत नहीं होगा। लेकिन क्या यही एक धब्बा है, जो कॉन्ग्रेस के गाल पर लगा है? ऐसा नहीं है कि पीएम इंदिरा की हत्या पर सत्तारूढ़ कॉन्ग्रेस ने ऐसी दुर्भावना से नरसंहार को पहली बार बढ़ावा दिया हो। इंदिरा के बेटे और बाद में प्रधानमंत्री बनने वाले राजीव गाँधी ने तब बयान दिया था, “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो आसपास की धरती हिलती ही है।”
उनका यह बयान इतना समझने के लिए काफी है कि इंसानियत को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी की नीयत कैसी रही है और किस तरीके से इन्होंने सुख-दुःख में साथ देने वाली जनता को ही समय-समय पर मौत के घाट उतार दिया। समय-समय पर इसलिए लिखा गया ताकि याद रहे कि 84 के उलट 48 में भी एक दंगा हुआ था, कॉन्ग्रेसियों ने ही कराया था। इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद जो हुआ, वो लगभग सबको याद है या सोशल मीडिया की पहुँच से सब तक जानकारी के रूप में पहुँच चुकी है लेकिन 1948 को भी याद रखना जरूरी है, ताकि कॉन्ग्रेस के असली DNA को पहचाने सकें। तब महात्मा गाँधी की हत्या के बाद हजारों ब्राह्मणों का नरसंहार कॉन्ग्रेस ने करवाया था।
बहुत कम लोग जानते हैं कि 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या के बाद देश में एक भयावह नरसंहार हुआ था। गाँधी के मुस्लिम तुष्टिकरण के रवैये से नाराज़ होकर नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी को उन्हें गोली मार दी थी। नाथूराम पर जब मुकदमा चला तो उसे अपनी करनी की सज़ा अदालत ने दी। इस हत्याकांड के लिए गोडसे को अम्बाला की एक जेल में फाँसी दे दी गई मगर तत्कालीन सत्तारूढ़ कॉन्ग्रेस पार्टी ने गाँधी की हत्या होते ही नरसंहार की आग को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ी। गाँधी के भक्तों और पार्टी के अनुयाइयों ने गोडसे की जाति के लोगों को निशाना बनाया।
न्यू यॉर्क टाइम्स ने गाँधी के हत्यारे को धर्म विशेष से जोड़कर बनाई थी हेडिंग
नाथूराम गोडसे पुणे (आज के महाराष्ट्र) में जन्मे थे और हिन्दू धर्म के चितपावन ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखते थे। इसी को मोहरा बना कर तत्कालीन सत्तारूढ़ दल और कॉन्ग्रेस हाईकमान के इशारे पर पूरे राज्य में निवास करने वाले चितपावन ब्राह्मणों का क़त्ल किया गया। 31 जनवरी से लेकर 3 फरवरी तक पुणे में ब्राह्मणों के खिलाफ हिंसा का ज़बरदस्त नंगा नाच चला। देखते ही देखते हिंसा की यह चिंगारी जंगल की आग की तरह आग चितपावन ब्राह्मणों की बहुतायत वाले इलाको में फ़ैल गई। इनमें सांगली, कोल्हापुर, सातारा शामिल हैं जहाँ सैंकड़ों लोग मारे गए, हज़ारों घरों को आग के हवाले कर दिया गया, स्त्रियों के साथ बलात्कार हुए ।
विदेशी अख़बार The Cincinnati Post में छपी गाँधी की हत्या के बाद हुए दंगे की खबर
आज़ाद भारत का सबसे पहला नरसंहार यही था, जिसमें असंख्य ब्राह्मणों की नृशंस हत्या कर दी गई। अहिंसा के पुजारी गाँधी का पार्थिव शरीर जिस वक़्त माटी का अपना अंतिम क़र्ज़ चुकाने के लिए चिता पर रखा जाना था, उस वक़्त पुणे और आसपास के इलाकों में न जाने कितने ब्राह्मणों का नरसंहार हो रहा था। यह नरसंहार हिंदुस्तान के इतिहास के उन पन्नों में दर्ज है, जिसके घटनाक्रमों का ज़िक्र किसी ने कभी नहीं किया। उस ज़माने में भी इस सम्बन्ध में अखबार में खबरें कम ही आईं हालाँकि विदेश के अख़बारों ने इस पर रिपोर्ट छापी थी। उनकी रिपोर्ट के मुताबिक हत्या की घटना के अगले ही दिन 31 जनवरी 1948 को मुंबई में 15 लोगों की हत्या की गई थी।
विदेशी अखबार ने गाँधी की हत्या के आरोपित को धर्म विशेष से जोड़कर छापा था
उस वक्त की घटनाओं का वर्णन करने वाली किताब ‘गांधी एंड गोडसे’ में भी इसके प्रमाण मिलते हैं कि ब्राह्मणों के खिलाफ उस वक़्त काफी भयंकर माहौल बना दिया गया था, चितपावन ब्राह्मण समुदाय के लोगों की हत्याएँ आम हो गई थीं। इस पर भी जब कॉन्ग्रेस का मन नहीं भरा तो वहाँ ब्राह्मणों का सामूहिक बहिष्कार किया गया।
किताब ‘गांधी एंड गोडसे’ किताब के चैप्टर-2 के उप-शीर्षक 2.1 में मॉरिन पैटर्सन के उद्धरणों में इस बात का ज़िक्र किया गया है। अपने उद्धरण में मॉरिन ने बताया है कि कैसे गाँधी के अनुयाइयों द्वारा फैलाई जा रही इस हिंसा में ब्राह्मणों के प्रति नफरत फैलाने वाले संगठनों ने भी हवा दी। इनमें कुछ ऐसे संगठन भी थे जिनका नाम ज्योतिबा फुले से जुड़ा है।
इस किताब में बताया गया है कि महात्मा गाँधी और सावरकर दोनों ही लोग वैचारिक रूप में एक दूसरे से पूरी तरह भिन्न थे। इस असहमति को आधार बनाकर अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी के अनुयाइयों की भारी संख्या वाली भीड़ ने स्वतंत्रता आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले वीर सावरकर के घर को ही घेर लिया। इस किताब में ज़िक्र है कि खुद को गाँधी और उनकी पार्टी का कहने वालों की उस भीड़ में करीब 500-1000 लोग थे, जिन्होंने हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दफ्तर में भी तोड़फोड़ की थी।
उस वक़्त लेखक मॉरीन ने दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा किया था। उस समय के अपने संस्मरण को उद्धृत कर उन्होंने लिखा है कि पुलिस के दखल के बाद जाकर कहीं इस भीड़ से सावरकर को शारीरिक क्षति से बचा लिया गया हालाँकि उन्होंने यह भी बताया कि दंगे को लेकर पुलिस ने कभी कोई भी सरकारी रिकॉर्ड उनसे शेयर नहीं किया। कई विश्लेषक मानते हैं कि अगर इस नरसंहार का आँकलन किया जाय तो 1948 का ब्राह्मण नरसंहार 1984 में हुए सिख दंगे से किसी मायने में भी कम नहीं है।
देश में दंगों का सिलसिला बँटवारे के पहले से होता आ रहा है मगर आज़ादी के बाद इसे नियंत्रित कर ख़त्म कर देना जिनके जिम्मे था, उन्होंने इसे पीढ़ी दर पीढ़ी सिर्फ़ किसी विरासत की तरह आगे बढ़ाया। अफसोस कि ये सत्ता की मलाई भी चापते रहे!
संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटेन ने 22 अन्य देशों का नेतृत्व करते हुए चीन द्वारा उइगर मुस्लिमों को बंदी बनाए जाने की निंदा की है। 23 देशों के समूह ने एक संयुक्त बयान में बीजिंग की कड़ी आलोचना की। यह बयान ब्रिटेन के संयुक्त राष्ट्र के राजदूत करेन पियर्स ने 193 सदस्यीय संगठन की मानवाधिकार समिति को दिया। अन्य समर्थकों में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और जापान जैसे देश शामिल थे।
राजदूत पियर्स ने कहा,
“हम चीनी सरकार से शिनजियांग और पूरे चीन में धर्म और विश्वास की स्वतंत्रता सहित मानवाधिकारों के सम्मान के लिए अपने राष्ट्रीय कानूनों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों और प्रतिबद्धताओं को बनाए रखने का आह्वान करते हैं।”
UN का कहना है कि चीन के सुदूर शिनजियांग प्रांत के शिविरों में कम से कम 10 लाख उइगर और अन्य मुस्लिमों को क़ैद कर रखा गया है। वहीं, बीजिंग ने दावा किया कि वो शिविर “व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र” हैं, जिनका निर्माण चरमपंथ पर लगाम लगाने और लोगों को नए कौशल देने के लिए किया गया है।
ख़बर के अनुसार, जो मुस्लिम वहाँ बंदी थे, उनका आरोप है कि कैदियों पर अत्याचार, चिकित्सीय प्रयोग और सामूहिक बलात्कार किए जाते हैं। कुछ अन्य लोगों ने बताया कि मुस्लिम बंदियों को शराब पीने और सूअर का मांस खाने के लिए भी मजबूर किया जाता है। सरकार ने कथित तौर पर देश भर की मस्जिदों में गुंबदों और मीनारों को नष्ट कर दिया है। लेकिन, चीन ने इन सभी आरोपों का खंडन किया है।
चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों पर अत्याचार को लेकर मंगलवार (29 अक्टूबर) को संयुक्त राष्ट्र में चर्चा कराई गई थी। इसमें 54 देशों ने बीजिंग के मानवाधिकारों को लेकर सराहना की, जबकि 23 देशों ने चीन की कड़ी निंदा की। ग़ौर करने वाली बात यह है कि सराहना करने वाले 54 देशों में एक देश पाकिस्तान भी है। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान को उइगर मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। वो केवल चीन के साथ अपनी सदाबहार दोस्ती को निभाने की दिशा में अग्रसर है।
पाकिस्तान दुनिया भर में मुस्लिमों की आवाज़ बनने का दंभ भरता है, लेकिन जब बात चीन की आती है, तो ऐसे समय में उसका यह दोहरा रवैया सामने आता है। पाकिस्तान के अलावा, रूस, बोल्विया, कॉन्गो और सर्बिया जैसे देश चीन के बचाव में हैं।
आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि केंद्र सरकार की पहली प्राथमिकता गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की हालत सुधारने के प्रति होनी चाहिए। चैनल सीएनबीसी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि एनबीएफसी कंपनियों को पैसा दिया जाना चाहिए ताकि वे कर्ज लेने-देने का काम चालू कर सकें। उनकी राय में यह अर्थव्यवस्था को वापस ट्रैक पर लाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। साथ ही उन्होंने सरकार को बैंकों और एनबीएफसी सेक्टर की ‘सफाई’ में भी गति लाने की सलाह दी।
India should clean up financial system fast to spur stronger growth: Raghuram Rajanhttps://t.co/ryCbsL0P9s
राजन ने बैंकों के फँसे कर्जों के संकट (एनपीए क्राइसिस) के बारे में कहा कि इसके बीज 2007-08 में पड़ गए थे। उन्होंने आरबीआई का चार्ज 2013 में लिया था। गौरतलब है कि 2007-08 में मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी की कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार सत्ता में थी। राजन के मुताबिक इस काल खंड में बहुत सारे खराब कर्ज बाँटे गए और आज इनकी साफ़-सफाई होना विकास के लिए ज़रूरी है। उन्होंने दावा किया कि उनके समय से ही आरबीआई ने फंसे कर्जों में सुधार के लिए बैंकों के मैनेजमेंट पर कड़ाई शुरू कर दी थी, और मोदी सरकार को इसमें और ज़्यादा तेज़ी लाने की ज़रूरत है।
राजन का इसके पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ सार्वजनिक विवाद हो चुका है, और ऐसा माना जा रहा है कि वे सीतारमण के आरोपों का ही प्रत्युत्तर दे रहे थे। इसी महीने के मध्य में मोदी सरकार में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने कार्यकाल में सरकारी बैंकों की कथित बदहाली का बचाव करते हुए कहा था कि मनमोहन सिंह-रघुराम राजन काल में बैंकों की वित्तीय स्थिति का “सबसे बुरा दौर” था। बैंक अभी तक उसी से उबर नहीं पाए हैं। वित्त मंत्री उस समय कोलम्बिया विश्वविद्यालय के दीपक और नीरा राज भारतीय आर्थिक नीति केंद्र द्वारा आयोजित लेक्चर में बोल रहीं थीं।
निर्मला सीतारमण ने कहा कि हालाँकि वे राजन का सम्मान करती हैं, लेकिन यह जानना और जनता के सामने सच रखना आवश्यक है कि यह बीमारी आखिर आई कहाँ से। उन्होंने कहा, “भारतीय पब्लिक सेक्टर बैंकों के लिए (रघुराम) राजन के RBI गवर्नर और (मनमोहन) सिंह के प्रधानमंत्री रहने के समय से बुरा समय अभी तक नहीं हुआ है। उस समय हम में से किसी को इसके बारे में नहीं पता था।”
इसके जवाब में इस इंटरव्यू में राजन ने उन्हें याद दिलाया है कि उनके (राजन के) कार्यकाल का दो-तिहाई हिस्सा मोदी सरकार के मातहत ही गुज़रा था।
नेपाल के कपिलवस्तु जिले के कृष्णानगर में, दीवाली पर लक्ष्मी पूजन के बाद गुरुवार (31 अक्टूबर) को सुबह जब मूर्ति विसर्जन के लिए देवी लक्ष्मी का जुलूस निकला तो मुस्लिम समुदाय के लोग उसके विरोध में आ गए।
मीडिया रिपोर्ट के हवाले से कपिलवस्तु जिला पुलिस कार्यालय के प्रमुख एसपी दीपेश शमशेर राणा ने बताया कि, लक्ष्मी पूजा के बाद देवी लक्ष्मी की मूर्ति को विसर्जित करने के लिए हिंदू समूह द्वारा जिस रास्ते से जुलुस को ले जाया जा रहा था उस मार्ग पर दूसरे मजहब के लोगों द्वारा आपत्ति जताने के बाद दोनों समुदायों के बीच झड़प की स्थिति बन गई।
मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा के देवी लक्ष्मी के विसर्जन का यूँ विरोध करने के कारण नेपाल के कपिलवस्तु ज़़िले में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क गई। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, दो अलग-अलग धार्मिक समूहों में इस कदर बढ़ते तनाव के बाद स्थानीय प्रशासन ने कृष्णानगर इलाक़े में कर्फ़्यू लगा दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, कहा जा रहा है कि दोपहर में, दो समुदायों के बीच झड़प के कारण कर्फ़्यू को तोड़ने की कोशिश की गई तो प्रशासन ने फायरिंग कर दी। जिससे एक गोली कपिलवस्तु जिले के कृष्णानगर के निवासी सूरज कुमार पांडेय नामक एक व्यक्ति को लगी और उसकी मौत हो गई।
इस घटना के बाद अपने बयान में डीआईजी सुरेश बिक्रम शाह ने ऑनलाइनखबर को बताया कि मृतक सूरज कुमार पांडे नेपाल-भारत सीमा के पास बदानी के एक भारतीय नागरिक थे। जो कपिलवस्तु में एक चाय की दुकान चलाते थे।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दो धार्मिक समुदायों के बीच तनाव बढ़ने के बाद हुए झड़प में उग्र भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश में कई पुलिस कर्मी भी घायल हो गए।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने गुरुवार (अक्टूबर 31, 2019) को सरदार वल्लभ पटेल की जयन्ती और इंदिरा गाँधी की पुण्यतिथि पर बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत आरएसएस और वीर सावरकर पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी अगर सरदार पटेल को मानते हें तो उन्हें RSS पर फिर से प्रतिबंध लगा देना चाहिए। बिलकुल उसी तरह जैसे सरदार पटेल ने लगाया था। बघेल ने कॉन्ग्रेस भवन में बोलते हुए भाजपा, संघ और पीएम मोदी की खूब आलोचना की। उन्होंने पूछा कि वीर सावरकार को ‘वीर’ की उपाधि किसने दी।
इस दौरान सीएम बघेल ने सरदार पटेल के आजादी में दिए योगदान को याद किया और कहा कि उनके योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता। सरदार पटेल ने किसानों के लिए कई आंदोलन किए। बघेल के अनुसार जब अंग्रेजों को किसानों ने टैक्स देने से मना किया तो उनकी जमीनें छीन ली गई थीं, जिसे आजादी के बाद कॉन्ग्रेस सरकार ने वापस दिलवाया।
पटेल की जयन्ती पर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बघेल ने सवाल पूछा कि धारा 370 पीएम मोदी ने हटाया या शाह ने, इसका श्रेय किसे देना चाहिए? काम कोई भी करे श्रेय मुखिया को जाता है, लेकिन नेहरू ने पूरा श्रेय सरदार पटेल को दिया।
मुख्यमंत्री बघेल ने इस दौरान वीर सावरकर पर भी बयान दिया। उन्होंने कहा कि एक वर्ग है जो महापुरुषों का कद नापते हैं और एक दूसरे को लड़ाते हैं। इनका आजादी से कोई लेना-देना नहीं है। सरदार पटेल को सरदार की उपाधि महात्मा गाँधी या नेहरू ने दी। महात्मा गाँधी को महात्मा की उपाधि रविंद्र नाथ टैगोर ने दी, लेकिन सावरकर को वीर बोला जाता है, इसकी उपाधि किसने दी।
बघेल ने सावरकर पर सवाल करते हुए पूछा कि ये कैसे वीर हो गए? काले पानी की सजा सैकड़ों लोगों को हुई थी। सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, सावरकर को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में सजा हुई थी। सावरकर ने माफी माँगी तो वो वीर कैसे हो गए?
इसके बाद उन्होंने इंदिरा गाँधी की पुण्यतिथि और सरकार वल्लभ भाई पटेल की जयन्ती पर दोनों नेताओं को याद करते हुए कहा कि जैसे सरदार पटेल और इंदिरा गाँधी ने काम किया, वैसी ही स्थिति वो छत्तीसगढ़ के सामने देना चाहते हैं। उनके अनुसार छत्तीसगढ़ पहला प्रदेश है, जहाँ मंदी की मार नहीं है। ये स्थिति बनाए रखने की उनकी आगे भी कोशिश रहेगी।
अयोध्या रामजन्मभूमि के परिसर में पॉलिथीन में प्रसाद ले जाने पर प्रशासन ने रोक लगा दी है। कहा जा रहा है दिवाली के दिन रामलला का दर्शन करने पहुँचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नाराजगी के बाद ये फैसला लिया गया।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दीपोत्सव के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ 27 अक्टूबर को रामलला के दर्शन के लिए रामजन्मभूमि परिसर में गए थे, तभी उन्हें वहाँ जमीन पर पड़ी तमाम पॉलिथीन नजर आई। जिसके बाद उन्होंने नाराजगी व्यक्त की और कहा कि जब पूरे देश में पॉलिथीन प्रतिबंधित हो रही है तो यहाँ प्रतिबंध क्यों नहीं लग रहा।
खबर के अनुसार इस घटना के बाद ही प्रशासन ने परिसर में पॉलिथीन ले जाने पर रोक लगाने का निर्णय लिया। हालाँकि पॉलिथीन पर रोक लग जाने के कारण व कोई दूसरा विकल्प न होने के कारण अभी श्रद्धालुओं को रामलला को प्रसाद चढ़ाने में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार श्री राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद दास कहते हैं कि सुरक्षा कारणों से करीब 19 वर्ष पहले ही पारदर्शी पन्नी में इलायचीदाना, मिश्री व मूंगफली प्रसाद के रूप में ले जाने की अनुमति दी गई थी। इससे पूर्व तक पहले बर्तन, लड्डू, पेड़ा आदि कई सामान श्रद्धालु लेकर आते थे। लेकिन दो दिन से प्रसाद लेकर श्रद्धालु नहीं आ पा रहे हैं।
गौरतलब है कि रामलला को इलायचीदाना, मिश्री व कच्ची मूंगफली का प्रसाद चढ़ता है। जिसके लिए कपड़े-कागज की थैलियाँ न होने से दो दिन से प्रसाद बेचने वाले प्रभावित हैं। वहीं परिसर के रिसीवर व कमिश्नर मनोज मिश्रा का कहना है कि प्रशासन ने पॉलीथीन में प्रसाद ले जाने व बेचने पर रोक लगाई गई है। प्रसाद चढ़ाने, प्रसाद ले जाने पर कोई रोक नहीं है। पॉलीथीन छोड़कर श्रद्धालु अन्य पारदर्शी वस्तु में प्रसाद ले जा सकते हैं।
इसके अलावा विश्व हिंदू परिषद ने अविलंब प्रसाद चढ़ाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने की माँग की है। परिषद के प्रांतीय प्रवक्ता शरद पवार ने कहा है कि श्रीरामजन्मभूमि पर स्थानीय प्रशासन को पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगाने से पहले विकल्प तलाशना चाहिए और जब तक इसका विकल्प नहीं मिलता तब तक इस प्रतिबंध को हटाना चाहिए। शरद मिश्रा का कहना है कि इस समस्या से तात्कालिक समाधान के लिए विहिप रामजन्मभूमि परिसर के रिसीवर से मुलाकात करके चर्चा करेंगे।