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समलैंगिक कार्यकर्ताओं ने J&K पर ‘प्रवचन’ दे रहे वामपंथियों को किया बेइज्जत, कविता कृष्णन ने बताया संघी

लंदन के ‘स्कूल ऑफ ओरिएण्टल एंड अफ्रीकन स्टडीज (SOAS)’ यूनिवर्सिटी में कविता कृष्णन सहित कई वामपंथी कार्यकर्ताओं को उस समय बेइज्जती का सामना करना पड़ा, जब ‘Gay For J&K’ का बैनर लिए कुछ लोगों उनके कार्यक्रम में घुस आए। इन लोगों ने वामपंथी एक्टिविस्ट्स के कार्यक्रम को रोक दिया और उनका विरोध किया। वामपंथी कार्यकर्ताओं ने ये कार्यक्रम मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के विरोध में आयोजित किया था, जहाँ वे लोगों को बता रहे थे कि कैसे ‘भारत सरकार का निर्णय ग़लत है और कश्मीर पर अत्याचार हो रहा है।’

‘गे फॉर जेके’ के कार्यकर्ताओं ने कविता कृष्णन सहित अन्य वामपंथियों को आइना दिखाते हुए उन्हें बताया कि भारत का संविधान उन्हें मान्यता देता है कि जम्मू कश्मीर के संविधान में उनके लिए कोई जगह नहीं थी। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के निरस्त होने के साथ ही ‘एक देश – दो संविधान’ वाला मसला भी ख़त्म हो गया और राज्य में भारतीय संविधान पूर्णरूपेण प्रभावी हो गया। वामपंथियों को ‘गे फॉर जेके’ के कार्यकर्ताओं के तर्कों का कोई जवाब ही नहीं सूझा।

बाद में सोशल मीडिया पर भी लोगों ने कविता कृष्णन को होमोफोबिक (समलैंगिक विरोधी) करार दिया, जिसके बाद वह तिलमिला गईं। बौखलाई वामपंथन कविता ने ट्विटर पर पूछा कि ‘गे फॉर जेके’ के कार्यकर्ता सुब्रह्मण्यम स्वामी का विरोध क्यों नहीं करते? कविता ने दावा किया कि भाजपा नेता स्वामी समलैंगिकता को बीमारी मानते हैं। हालाँकि, वह कार्यकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोपों का कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाईं।

जब समलैंगिक कार्यकर्ता वामपंथियों के कार्यक्रम में घुसे, तब वामपंथी उन्हें कहते रहे कि वे समलैंगिकों के समर्थन में हैं। उन्होंने यह कह कर उन्हें शांत कराने की कोशिश की कि वे सभी समलैंगिक अधिकारों का समर्थन करते हैं। इन सबके बावजूद ‘गे फॉर जेके’ के बैनर के साथ आए समलैंगिक कार्यकर्ताओं ने न सिर्फ़ नारे लगाए बल्कि अपने पैम्फलेट भी वितरित किए।

न्यूज़ चैनल न्यूज़ 18 ने कविता कृष्णन सहित अन्य वामपंथियों द्वारा आयोजित कार्यक्रम को भारत-विरोधी कार्यक्रम बताया, जिसके बाद कविता कृष्णन ने न्यूज़ 18 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुखपत्र करार दिया। कविता कृष्णन ने दावा किया कि ये भारत-विरोधी बैठक नहीं थी। उन्होंने कहा कि ये ‘फासिस्ट सरकार द्वारा सताए गए भारतीयों व कश्मीरियों’ के समर्थन में आयोजित कार्यक्रम था। उन्होंने अपने कार्यक्रम में घुसे समलैंगिक कार्यकर्ताओं को भी संघी करार दिया।

हवा पर करो FIR: युवती की मौत पर नेता का शर्मनाक बयान

एक स्थानीय चैनल से बात करते हुए अन्नाद्रमुक नेता सी पोन्नैयन ने मानवीयता के सभी तक़ाज़ों को ताक पर रखते हुए एक इंजीनियर की मौत पर शर्मनाक बयान दिया है। पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक पोन्नैयन का कहना है कि होर्डिंग अपने ऊपर गिरने से हुई सॉफ्टवेयर इंजीनियर सुभाश्री रवि की मौत के लिए होर्डिंग अवैध रूप से लगाने वाला नहीं, बल्कि गिराने वाली हवा ज़िम्मेदार है। अगर FIR करनी है, तो हवा पर की जानी चाहिए। चार बार विधायक रह चुके पोन्नैयन ने कहा, “सुभाश्री की मौत इसलिए हुई क्योंकि बैनर हवा से गिर पड़ा। बैनर लगाने वाले व्यक्ति ने उसे गिरा कर सुभाश्री को नहीं मार डाला। अगर किसी के ख़िलाफ़ FIR करनी है तो हवा के खिलाफ होनी चाहिए।”

उल्लेखनीय है कि मद्रास हाई कोर्ट ने राज्य में सार्वजनिक स्थलों पर बैनर-होर्डिंग लगाने को प्रतिबंधित कर दिया है।

गिरी होर्डिंग, चढ़ा टैंकर

23-वर्षीया सुभाश्री की गत 12 सितंबर को टैंकर अपने ऊपर चढ़ जाने से दर्दनाक मौत हो गई थी। वह टैंकर के आगे सड़क पर तब गिर पड़ीं जब सड़क किनारे लगा अवैध बैनर उनकी स्कूटी पर अचानक गिर गया और उनका संतुलन बिगड़ गया। अपने बेटे की शादी के लिए अवैध होर्डिंग लगाने वाले सोशल मीडिया पर घटना को लेकर बवाल के बाद भी अन्नाद्रमुक नेता सी राजगोपाल को गिरफ़्तार करने में पुलिस को 15 दिन लग गए। उन पर, मीडिया खबरों के अनुसार, अवैध होर्डिंग लगाने के लिए IPC की दफ़ा 326 और Tamil Nadu Open Places Act के दफ़ा 3 के अलावा लापरवाही से किसी की मौत का कारण बनने की धारा 304A भी लगाई गई है।

द्रमुक नेता: होर्डिंग लगाओगे तो मैं नहीं आऊँगा

इस मामले में जनता की नाराज़गी को देखते हुए द्रमुक प्रमुख एमके स्टालिन ने ऐलान कर दिया था कि अगर किसी समारोह में अवैध होर्डिंग या बैनर लगे होंगे तो वे उसमें हिस्सा नहीं लेंगे। वे जनता को तक़लीफ़ पहुँचाने के सख्त खिलाफ हैं, और उनकी पार्टी में ऐसा करने वालों पर कड़ी कार्रवाई वे खुद करेंगे।

यही नहीं, मद्रास उच्च न्यायालय ने भी सुभाश्री के परिवार को ₹5,00,000 मुआवजा देने के आदेश के अलावा राज्य सरकार के अमले को भी आड़े हाथों लिया। अदालत ने पूछा, “अभी सड़कों को कितने और खून से रंगा जाना बाकी है?” इसके अलावा राज्य के मुख्यमंत्री पलानिस्वामी और उप-मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम ने भी संयुक्त बयान जारी कर पार्टी सदस्यों से होर्डिंग-बैनर न लगाने सहित जनता को तकलीफ़ देने वाले कदम उठाने से बाज आने की सलाह दी थी।

चोरी हुई महात्मा गाँधी की चिता की राख, चोरों ने बापू के पोस्टर पर लिखा- ‘राष्ट्रदोही’

जब पूरा देश राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती मना रहा था और तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही थी, उसी समय एक बड़ी ख़बर आई। मध्य प्रदेश के रीवा जिले में स्थित मेमोरियल में से महात्मा गाँधी की चिता की राख चोरी कर ली गई। इतना ही नहीं, चोरों ने उनके पोस्टर पर ‘राष्ट्रद्रोही’ भी लिख दिया। बापू के चिता की राख को लक्ष्मण बाग स्थित बापू भवन में रखा गया था, जहाँ ये घटना हुई। बापू भवन का निर्माण 1948 में किया गया था और तब से ही लक्ष्मण बाग ट्रस्ट इसकी देखभाल करता रहा है।

महात्मा गाँधी के 150वें जन्मदिवस के मौके पर जब बुधवार (अक्टूबर 2, 2019) को कॉन्ग्रेस नेता रामकृष्ण शर्मा सहित कई अन्य नेता श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए पहुँचे, उन्होंने पाया कि वहाँ रखी गई गाँधी से जुड़ी चीजें गायब थीं और गाँधी के पोस्टर पर काले स्केच से लिखा गया था- ‘राष्ट्रदोही’। इन नेताओं ने तुरंत इसकी सूचना पुलिस को दी। अज्ञात आरोपितों के ख़िलाफ़ 153-बी (राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन, प्राख्यान), धारा 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) और धारा 505 (जानबूझकर अफवाह फैलाने की कोशिश) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

कॉन्ग्रेस नेता गुरमीत सिंह उर्फ़ मंगू की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। लक्ष्मण बाग़ ट्रस्ट दशकों से कई मंदिरों, गोशाला और बगीचों का सञ्चालन करता रहा है। यह रीवा महाराज द्वारा स्थापित सबसे पुराने ट्रस्टों में से एक है। बापू भवन की देखभाल करने वाले मंगलदीप तिवारी ने बताया कि गाँधी जयंती के दिन उन्होंने सुबह ही भवन का दरवाजा खोल दिया था। जब वह दोपहर 11 बजे लौटे तो उन्होंने पाया कि गाँधीजी से जुड़ी चीजें गायब थीं।

महात्मा गाँधी के पार्थिव शरीर की अंतिम क्रिया के बाद उनके चिता की राख को पूरे भारत में स्थित कई मेमोरियल्स में भेजा गया था और रीवा का बापू भवन उनमें से एक था। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी थी। नाथूराम गोडसे को 15 नवम्बर 1949 को अम्बाला सेन्ट्रल जेल में फाँसी दे दी गई थी।कॉन्ग्रेस ने दोषियों की गिरफ़्तारी जल्द न होने पर व्यापक विरोध प्रदर्शन करने की चेतावनी दी है। मध्य प्रदेश में फ़िलहाल मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की ही सरकार चल रही है।

अंग्रेज तो इसे जन्मस्थान मान चुके थे, रिकॉर्ड में घपला कर जुड़ा ‘बाबरी मस्जिद’: ऑपइंडिया से इतिहासविद् मीनाक्षी जैन की बातचीत

इतिहासविद् और लेखिका मीनाक्षी जैन ने ऑपइंडिया संपादक अजीत भारती से बातचीत में अयोध्या के रामजन्मभूमि विवाद को लेकर कई ऐतिहासिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में इतिहास की एसोसिएट प्रोफ़ेसर और भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (Indian Council of Historical Research, ICHR) की सदस्या डॉ. जैन ने अयोध्या विवाद पर दो किताबें Rama and Ayodhya (2013) और The Battle for Rama: Case of the Temple at Ayodhya (2017) लिखीं हैं। उन्होंने जन्मभूमि स्थल पर राम मंदिर के लिए इतिहास और पुरातत्व के स्पष्ट समर्थन के अलावा इस मामले में डीएन झा, रोमिला थापर जैसे वामपंथी इतिहासकारों की भूमिका, अंग्रेज़ों द्वारा उस स्थल को जन्मभूमि मान लिए जाने के बाद ऐतिहासिक, सरकारी दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ जैसे मुद्दों पर विस्तार से बात की। नीचे प्रस्तुत है उनके साक्षात्कार का सारांश:

ASI पर सवाल उठाना हास्यास्पद, हिन्दू-मुस्लिम पक्ष की मौजूदगी में खुदाई

पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) पर मुस्लिम पक्ष के वकीलों से लेकर वामपंथी इतिहासकारों द्वारा उठाए गए सवालों को जैन ने सिरे से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने साफ़ किया कि कमल का फ़ूल, वराहमूर्ति, संस्कृत में दीवारों पर शिलालेख आदि से साफ़ तौर पर उस स्थल के हिन्दू होने को प्रमाणित करते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि न तो ASI के खुदाई और सर्वेक्षण कार्य में कोई कमी थी, न ही उनकी रिपोर्ट में। साथ ही, उनकी खुदाई इलाहबाद उच्च न्यायालय के आदेशानुसार हिन्दू और मुस्लिम पक्षों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में की गई थी। खुदाई में मिली एक-एक चीज़ का हिसाब उसी दिन रजिस्टर में लिखा गया, और उस दिन के अंत में दोनों पार्टियों ने उस पर हस्ताक्षर किए हैं।

उस खुदाई में मिली चीज़ों के महत्व पर भी वे प्रकाश डालतीं हैं। उनके मुताबिक खुदाई में मिले साक्ष्यों से यह साफ़ है कि न केवल मस्जिद मंदिर तोड़कर बनी, बल्कि यह स्थल मस्जिद के सैकड़ों, हज़ारों साल पहले से धार्मिक स्थल यानि मंदिर रहा है। उस स्थान पर लगातार किसी-न-किसी मंदिर के उपस्थित होने के सबूत ASI की खुदाई ने दिए हैं।

बाबरी ध्वंस के ही समय मिल गया था मंदिर का प्रमाण

मीनाक्षी जैन ने यह भी बताया कि 1992 में हुए बाबरी ध्वंस के समय ही उस स्थान पर मंदिर होने का प्रमाण मिल गया था। उसी समय वहाँ बाबरी के मलबे में मस्जिद के पूर्ववर्ती मंदिर पर लगा हुआ ‘विष्णु हरि’ शिलालेख गिरा। 5 फुट X 2 फुट के इस शिलालेख में साफ़ तौर पर 12वीं सदी में उस जगह पर मंदिर होने की बात लिखी गई थी, जिससे “लेकिन बाबर ने तो खाली जगह देख कर मस्जिद बनाई थी” का ‘क्यूट’ प्रोपेगंडा, जो आगे जाकर आज अदालत में दलील भी बन गया है, ध्वस्त होने का खतरा पैदा हो गया था।

ऐसे में ‘मदद’ को आए वामपंथी इतिहासकार इरफ़ान हबीब। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उस समय कार्यरत हबीब ने खटराग अलापना शुरू किया कि यह शिलालेख एक ‘निजी संग्रह’ का हिस्सा है, जिसे बाबरी ध्वंस के समय गुपचुप वहाँ ‘तस्करी कर’ लाया गया, और मलबे के बीच रख दिया गया। मीनाक्षी जैन बतातीं हैं कि जब हबीब से सवाल पूछा गया कि वह शिलालेख आखिर किस व्यक्ति के ‘निजी संग्रह’ का हिस्सा है, तो उन्होंने रंग बदल कर इसे ‘त्रेता के ठाकुर’ नामक अयोध्या में ही स्थित एक दूसरे मंदिर से मिला शिलालेख बता दिया। (‘त्रेता के ठाकुर’ मंदिर हालाँकि अयोध्या में ही स्थित है,लेकिन उसका जन्मभूमि से कोई सरोकार नहीं है। यह औरंगज़ेब द्वारा तोड़ा गया एक दूसरा मंदिर है/) उनके मुताबिक लखनऊ संग्रहालय से ‘त्रेता के ठाकुर’ शिलालेख को जन्मभूमि स्थल पर लाया गया, और मलबे में ‘विष्णु हरि’ शिलालेख के नाम से ‘प्लांट’ कर दिया गया।

लेकिन उनका यह प्रोपेगंडा भी उनके दुर्भाग्य और हिन्दुओं के अच्छे कर्मों से तब ध्वस्त हो गया, जब किशोर कुणाल नामक एक संस्कृत विद्वान और रिटायर्ड आईपीएस ने लखनऊ के संग्रहालय में से वह शिलालेख खोज निकाला और उसकी तस्वीर प्रकाशित कर दी। ‘त्रेता के ठाकुर’ शिलालेख बेहद टूटा-फूटा और क्षतिग्रस्त है, जिसमें से बमुश्किल 2-3 शब्द पढ़े जा सकते हैं। वहीं ‘विष्णु हरि’ शिलालेख न केवल स्पष्ट और ठीक-ठाक हालत में है, बल्कि उसका अधिकाँश भाग पूरी तरह सुरक्षित और पठनीय भी है।

ब्रिटिश रिकॉर्ड किसने बदले?

मीनाक्षी जैन कुछ चौंकाने वाले खुलासे भी करतीं हैं। वह बतातीं हैं कि 1857 के विद्रोह के बाद बने ब्रिटिश राजस्व रिकॉर्डों में विवादित स्थल को केवल ‘जन्मभूमि’ के नाम से दर्ज किया गया था, जो बाद में (अदालत में रिकॉर्ड मँगाए जाने पर?) बदला गया। जहाँ-जहाँ पुराने रिकॉर्ड में केवल जन्मभूमि का उल्लेख था, वहाँ “*” लगाकर ऊपर की ओर “और बाबरी मस्जिद” लिखा गया, ताकि यह दिखाया जा सके कि मुस्लिमों का भी उस भूभाग पर दावा उतना ही पुराना रहा है, जितने समय पहले से हिंदू इसे मंदिर स्थल बताते हैं।

“Big Four” का प्रपंच

वामपंथी इतिहासकारों की भूमिका पर भी डॉ. मीनाक्षी जैन ने तफ़सील से बात की। उन्होंने बताया कि न केवल वामपंथी इतिहासकारों ने ही मुस्लिमों को झूठा “तुम ये मुकदमा जीत सकते हो” का दिलासा देकर सुलझते-सुलझते मामले को दोबारा उलझा दिया, बल्कि उन्होंने अदालत को भी अपनी ‘राय’ को तथ्य बताकर बरगलाने की कोशिश की। हाई कोर्ट के पास समय की कमी नहीं थी, क्योंकि उस समय मामला ‘गर्म’ नहीं था- इसलिए उच्च न्यायालय ने उन्हें आराम से सुनकर ख़ारिज कर दिया, और वहीं सुप्रीम कोर्ट ने समय की कमी के चलते उन्हें दो टूक किनारे कर दिया।

इसके अलावा वे 1947 के बाद के भारतीय इतिहास लेखन के “Big Four” माने जाने वाले रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, आर एस शर्मा और डी एन झा के प्रपंच की भी पोल-पट्टी खोली। उन्होंने बताया कि कैसे ये चारों खुद अदालत में अपने झूठ की लानत-मलालमत से बचने के लिए अपने छात्रों को भेजते रहे, और खुद ‘निष्पक्षता’ का चोला ओढ़कर अख़बारों के कॉलम से लेकर किताबें तक लिख-लिख कर बिना पाँव के झूठ की पालकी ढोते रहे।

मथुरा, काशी पर भी किताब, गैर-वामपंथी इतिहासकार होना आसान नहीं

एक ट्विटर यूज़र के सवाल के जवाब में डॉ. जैन ने यह भी बताया कि वह अयोध्या की ही तरह मथुरा और काशी पर भी वह अध्ययन कर रहीं हैं। इन मामलों पर भी वे किताब लिखेंगी। इसके अलावा एक दूसरे सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि हालाँकि तथाकथित ‘दक्षिणपंथ’ ने राजनीतिक लड़ाई जीत ली है, लेकिन भाजपा की सरकार में भी अकादमिक जगत जस-का-तस है। आज भी बौद्धिक वर्ग पर कब्ज़ा वामपंथियों का है, और दक्षिणपंथी या हिंदूवादी होना तो दूर, उनसे भिन्न, गैर-वामपंथी मत वाला तक होना आज भी अकादमिक जगत में मुश्किल है।

इस साक्षात्कार हेतु प्रश्नों की तैयारी एवं बाकी शोध मृणाल प्रेम स्वरुप श्रीवास्तव ने किया।

स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना का नाम नेशनल वॉर मेमोरियल में, यासीन मलिक ने करवाई थी हत्या

स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना का नाम अब नेशनल वॉर मेमोरियल में शामिल किया जाएगा। भारतीय वायुसेना ने उनके नाम की मंजूरी दे दी है। उनका नाम नेशनल वॉर मेमोरियल में वीरगति को प्राप्त जवानों की सूची में शामिल किया जाएगा। इन जवानों ने देश के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी। ये फ़ैसला सितम्बर के अंतिम सप्ताह में लिया गया, जब वायुसेना के उच्चाधिकारियों ने निर्णय लिया कि रवि खन्ना का नाम नेशनल वॉर मेमोरियल में होना चाहिए। इसके साथ ही उनका नाम वहाँ लिखा जाएगा और साथ ही उनके कारनामों के बारे में विवरण भी दिया जाएगा।

ज्ञात हो कि 1990 में जम्मू-कश्मीर में भारतीय वायुसेना के 4 निहत्थे जवानों की हत्या कर दी गई थी। इनमें स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना भी शामिल थे। इस घटना के 30 साल बाद ट्रायल शुरू किया गया है, जिससे वीरगति प्राप्त जवानों के परिजनों की न्याय की आस फिर से जगी है। टाडा कोर्ट ने तिहाड़ जेल में बंद यासीन मलिक को पेश करने का भी आदेश दिया है। जिन आतंकियों ने जवानों की हत्या की थी, वे यासीन मलिक द्वारा संचालित आतंकी संगठन के सदस्य थे। यह घटना जनवरी 25, 1990 को हुई थी। हाल ही में गोलीबारी की इस घटना में टाडा कोर्ट ने यासीन मलिक सहित 4 आरोपितों को पेश होने का आदेश दिया था।

यासीन मलिक ‘जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ नामक संगठन चलाता है। वह फ़िलहाल टेरर फंडिंग मामले में गिरफ़्तार होकर तिहाड़ जेल में बंद है। उसे एनआईए द्वारा गिरफ़्तार किया गया था। उसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जेल से ही कोर्ट में पेश किया जाएगा। वीरगति को प्राप्त स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना की पत्नी निर्मल खन्ना अपने पति के हत्यारों को सज़ा दिलाने के लिए लड़ रही हैं। हाल ही में उन्होंने रवि खन्ना का नाम नेशनल वॉर मेमोरियल में शामिल करने की माँग की थी, जो अब पूरी हो रही है।

अगर उस हत्याकांड की बात करें तो भारतीय वायुसेना के जवानों की हत्या तब की गई जब उनके पास कोई भी हथियार नहीं था और वे एयरपोर्ट जाने के लिए बस का इन्तजार कर रहे थे। वहाँ भारतीय वायुसेना के 14 जवान थे। तभी अचानक से एक मारुति जिप्सी और एक बाइक से 5 आतंकी वहाँ पहुँचे और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, उन्होंने एके-47 से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। जवानों के अलावा 2 कश्मीरी महिलाओं की भी हत्या कर दी गई, जो बस का इंतजार कर रही थीं। आतंकियों ने ख़ून से लथपथ जवानों के सामने डांस करते हुए जिहादी नारे भी लगाए थे।

‘श्रीराम हमारे पूर्वज और इस्लाम पूजा-पद्धति, मज़हब बदला जा सकता है पर पूर्वज नहीं’

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक कार्यक्रम के दौरान ऐसा वाकया सुनाया, जिसे सुन कर लोगों ने जम कर तालियाँ बजाईं। लखनऊ के ऐशबाग में चल रही रामलीला में पहुँचे मुख्यमंत्री ने भगवान राम व सीता का किरदार निभा रहे कलाकारों को रोली-टीका लगाया और उनकी आरती उतारी। योगी ने रामलीला के मंच से विपक्षियों पर शब्द-बाण चलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने रामायण पर वृहद शोध की ज़रूरत पर बल दिया।

योगी ने बताया कि जब उत्तर प्रदेश में दीपोत्सव कार्यक्रम के दौरान रामलीला का आयोजन किया गया था, तब इंडोनेशिया से भी रामलीला की एक टीम आई थी। उस टीम में सभी कलाकार मुस्लिम थे। बकौल योगी आदित्यनाथ, उन्होंने उन कलाकारों से पूछा कि भगवान श्रीराम से आपका क्या सम्बन्ध है? उन्होंने बताया कि इस्लाम उनकी पूजा-पद्धति है और राम उनके पूर्वज हैं। उन कलाकारों ने सीएम को बताया कि पूजा पद्धति या मज़हब में तो बदलाव किया जा सकता है, लेकिन पूर्वज को बदलना नामुमकिन है।

इस कहानी के माध्यम से योगी ने विपक्षियों पर तंज कसते हुए कहा कि हमारे देश में राम का नाम लेते ही कुछ लोगों को हाई-वोल्टेज करंट लगता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि थाईलैंड के राजा आज भी खुद को श्रीराम का वंशज मानते हैं। उच्च टीआरपी वाली लोकप्रिय टीवी सीरियल रामायण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यह दुनिया के सबसे लोकप्रिय कार्यक्रमों में से एक साबित हुआ। योगी ने कहा कि भगवान राम भारत की हर एक साँस में बसे हैं।

सीएम योगी ने रामायण पर शोध कर के इसे जीवंत बनाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि भारत तभी तक बना रहेगा और मानव कल्याण का मार्ग यहाँ से गुजरता रहेगा, जब तक यह देश मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से ख़ुद को जोड़ कर उनसे प्रेरणा लेता रहेगा। उन्होंने कहा कि भगवान राम के आदर्शों पर ही रामराज्य की परिकल्पना की गई है।

‘कमल हासन राजनीति में बिना डायपर का बच्चा, पूरे राज्य में गंध मचा रखी है’

अभिनेता से नेता बनने की कोशिश कर रहे कमल हासन ने हाल ही में हिंदी को लेकर अपमानजनक टिप्पणी करते हुए भारतीय भाषा परिवार में इसे ‘डायपर वाला बच्चा’ करार दिया था। इसके जवाब में भाजपा नेता और राज्य सभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने हासन को ‘बिना डायपर वाला बच्चा’ करार दिया है।

कमल हासन ने 3 अक्टूबर को चेन्नै के एक कार्यक्रम में हिंदी को ‘डायपर वाला बच्चा’ जैसी नवजात भाषा करार दिया था। उन्होंने हिंदी की मानी हुई आयु की तुलना प्राचीन समय से चली आ रही भाषाओं जैसे तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़ आदि से करते हुए यह बात कही थी।

हासन ने हालाँकि बात सँभालने के लिए साथ में यह भी जोड़ा कि उन्हें हिंदी का भी ख्याल रखे जाने की चिंता है, क्योंकि “ये भी हमारा ही बच्चा है आखिरकार”, लेकिन इशारा साफ़ था। इसके पहले भी एक बार कमल हासन हिंदी के खिलाफ तमिलनाडु में हिंसक आंदोलन की बात कह चुके हैं।

एक ट्विटर यूज़र ने इसी मसले पर ऑपइंडिया की लिंक साझा करते हुए सुब्रमण्यम स्वामी को टैग कर उनका ध्यान इस मुद्दे पर आकर्षित किया था। उसी के जवाब में स्वामी ने लिखा, “और राजनीति में कमल हासन क्या है? एक बिना डायपर का बच्चा,जो पूरे राज्य में बदबू फैला रहा है।” उल्लेखनीय है कि खुद तमिल होने के बावजूद स्वामी हिंदी-संस्कृत को भारत की आधिकारिक और राष्ट्रीय भाषाएँ बनाए जाने की वकालत करते रहे हैं। उनके मुताबिक भारत की राष्ट्रीय भाषा संस्कृत होनी चाहिए, जिसे शनैः-शनैः बढ़ावा दे कर आधिकारिक भाषा बनने की तरफ़ ले जाना चाहिए। वहीं अंग्रेजी के साथ तत्सम/संस्कृतनिष्ठ हिंदी को तात्कालिक राजभाषा और ‘link language’ के तौर पर प्रचारित किया जाना चाहिए।

कौशाम्बी गैंगरेप: दलित नाबालिग से कहा- भगवान नहीं, अल्लाह के नाम पर माँगो रहम की भीख

कौशाम्बी गैंगरेप मामले में स्वराज्य पत्रिका के पोर्टल पर प्रकाशित स्वाति गोयल-शर्मा की रिपोर्ट स्तब्ध कर देने वाले खुलासों से भरी पड़ी है। न केवल इसमें स्थानीय समुदाय विशेष के आरोपितों की उम्र कम करके बताने की कोशिश और बलात्कार को “नादानी” कहने जैसी घटनाओं का ज़िक्र है, बल्कि पुलिसिया लीपापोती से लेकर भाजपा के जनप्रतिनिधि के नाकारेपन तक का कच्चा चिट्ठा भी है।

21 सितंबर को दोपहर में हुए अपराध की रिपोर्ट रात 9.30 बजे के बाद लिखी जाती है। जिस बाप की बेटी को नंगा कर नोंचा गया, उसे ज़मीन पर बिठा कर रखा जाता है (उनके आरोप के अनुसार पीटा भी जाता है) और जो भीड़ आरोपित नाज़िम को रंगे-हाथों पकड़ती है, शायद उसी भीड़ में से कोई बलात्कार का वीडियो वायरल भी कर देता है, फ़ोन पुलिस को सौंपने के पहले।

स्वाति गोयल शर्मा की रिपोर्ट बताती है कि गैंगरेप की घटना नाबालिग पीड़िता की बस्ती के महज़ 100 मीटर दूर हुई, जहाँ वह घास काटने गई हुई थी। आरोपितों के घर जिस समुदाय विशेष की बस्ती में हैं, वह भी पास ही है। घटना के बाद जब पीड़िता की चीखें सुन कर स्थानीय लोग वहाँ पहुँचे तो उनमें से एक लड़की को वापिस अपने घर जाना पड़ा- एक सलवार लाने के लिए, जिससे पीड़िता अपने आप को ढँक सके। कथित तौर पर बलात्कारियों ने पीड़िता का कुरता नहीं उतारा- क्योंकि वह अनुसूचित जाति पासी की थी, जिसे स्थानीय समुदाय विशेष वाले अपने से ‘नीचे’ देखते हैं।

स्थानीय लोगों ने स्वाति गोयल-शर्मा को यह भी बताया कि लड़की की चीखें सुनकर इकट्ठा होने वालों की भीड़ केवल हिन्दुओं की थी- वह भी अधिकाँश “नीची” जाति के हिन्दू। न ही कोई दुसरे मजहब विशेष से झाँकने आया, न ही ज्यादा “ऊँची” जाति वाले हिन्दुओं ने इसमें दिलचस्पी ली। और वह तब है जब वह इलाका कथित अल्पसंख्यक-बहुल क्षेत्र है। करीब 600 घरों में से 65%, यानी 400 के आस-पास दूसरे मजहब वालों के हैं।

तीन ने बलात्कार कर ‘अहसान’ किया, वरना 20 करते?

2 मिनट 13 सेकंड के वीडियो में वीडियो बनाने वाला (पीड़िता के आरोप के अनुसार मोहम्मद नाज़िम) पीड़िता से कहता है, “हम लोग नहीं होते तो कम-से-कम 20 लड़के इकट्ठा होते और (गैंगरेप करने के बाद?) तेरे बाप के पास ले जाते।” वीडियो में पीड़िता आरोपितों के घर की बहन-बेटियों का हवाला देती है, भगवान का हवाला देती है। भगवान की कसम पर वे अल्लाह की कसम खाने को कहते हैं, तो वह वो भी करती है। लेकिन बलात्कारी नहीं रुकता। लड़की को वह बताता है कि उसे ‘दो मिनट और चाहिए’। तभी वीडियो बनाने वाला कहता है कि अब उसकी ‘बारी’ है। लड़की इसके बाद चीखने लगती है।

एक तरफ़ भाजपा के नेता मंचों से चढ़ कर बताते हैं कि कैसे न केवल उनके राज में पुलिस-प्रशासन चाक-चौबंद चलने लगता है, बल्कि हिन्दू भी उन्हीं के राज में सुरक्षित हो सकते हैं। स्वाति की रिपोर्ट इस दावे को भी नंगा कर देती है।

स्वाति के अनुसार पीड़िता के परिवार और अन्य स्थानीय ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि सबसे पहले वे भाजपा से जुड़े और सराय अकील नगर के चेयरमैन शिवदानी के पास ही गए, लेकिन उन्होंने उन लोगों को पुलिस के पास जाने की सलाह देकर टरका दिया। अपने आने की बात पर वह ‘तू चल मैं आता हूँ’ हो लिए।

इसके बाद ग्रामीण स्थानीय भाजपा विधायक संजय गुप्ता के ‘जनता दरबार’ में भी गए, लेकिन वहाँ भी उन्हें यही बताया गया कि विधायक जी मामले पर ‘गौर करेंगे’, ‘पुलिस को फ़ोन करेंगे जल्दी ही’। अंत में हार कर उन्हें स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता के पास जाना पड़ा। उन्हीं दम्पति के घर पीड़िता 21 सितंबर की इस घटना के बाद से रुकी हुई है।

किस नज़र से 18 साल का है ‘छोटका’?

स्वाति गोयल-शर्मा यह भी लिखतीं हैं कि जब वे दूसरे मजहब की बस्ती में आरोपितों और उनके समाज का पक्ष जानने गईं तो वहाँ पहले तो कोई अधिक बात करने को ही तैयार नहीं हुआ। किसी तरह बात करने के लिए उन्होंने स्थानीय मस्जिद में रसूख रखने वाले वयोवृद्ध दर्जी को तैयार किया। उसने बताया कि उन लड़कों की ‘नादानी’ से यह घटना हुई है! उन्होंने तो यहाँ तक कि पुलिस की जाँच में क्रमशः 20, 27 और 28 साल के पाए गए नाज़िम, आदिल (‘छोटका’ और ‘आतंकवादी’ के नाम से जाना जाने वाला) और आदिक (‘बड़का’, कुछ जगहों पर नाम आकिब भी रिपोर्ट किया जा रहा है) को 14, 18 और 20 साल का बता दिया। यही नहीं, वह “पासी लोग” पर उन लड़कों को खुद बुलाने का आरोप लगाते हैं।

शिक्षक नौशाद ने छात्रा को प्रेम जाल में फँसाया, निकाह की बात करने पर हत्या कर शव नाले में फेंका

दिल्ली पुलिस ने रविवार (सितम्बर 29, 2019) को करावल नगर के एक नाले से एक बैग बरामद किया था। जब उस बैग को खोला गया तो सभी हक्के-बक्के रह गए, क्योंकि उसमें एक 25 वर्षीय युवती की लाश थी। इस हत्या की गुत्थी सुलझ गई है। हत्यारा और कोई नहीं बल्कि उक्त युवती आफरीन का ट्यूटर नौशाद ही था। वह 25 सितम्बर से ही अपने घर से गायब थी। आफरीन का मोबाइल भी ऑफ आ रहा था, जिसके बाद परिजनों ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

परिजनों ने पहले ही इस मामले में उक्त ट्यूटर पर आरोप लगाया था। पुलिस ने उसे हिरासत में लेकर पूछताछ की तो मामला साफ़ हुआ। आफरीन परिवार के साथ बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क क्षेत्र में रहती थी। परिवार में पिता रफीक अहमद, माँ राबिया बेगम, दो भाई दानिश और आमिर के अलावा एक शादीशुदा बहन है। उसके परिवार का टेंट का कारोबार है। आफरीन ने डीयू के माता सुंदरी कॉलेज से स्नातक करने के बाद हरियाणा के एक कॉलेज में बीएड में एडमिशन लिया था।

पुलिस के अनुसार, आफरीन बचपन से ही शास्त्री पार्क निवासी ट्यूटर मोहम्मद नौशाद के पास ट्यूशन पढ़ने जाती थी। उसने परिजनों को बिना बताए ही नौशाद के कोचिंग सेंटर में पढ़ाना भी शुरू कर दिया था। जब उसकी लाश बरामद हुई, तब सड़ जाने के कारण उसकी स्थिति ऐसी थी कि परिजन भी पहचान नहीं कर सके। बाद में उसके भाई ने शव की पहचान की। पुलिस ने जब युवती की आखिरी लोकेशन चेक की तो वह शास्त्री नगर के मोहम्मद नौशाद अली के घर की मिली।

पुलिस ने जब नौशाद से सख्ती से पूछताछ की तो पता चला कि उसने 26 सितम्बर को ही आफरीन की हत्या कर दी थी। फिर उसके शव को एक जूट के बैग में डाला और अपने साले राजिक की मदद से ठिकाने लगाया। इस काम के लिए उसने इको वैन का प्रयोग किया। नौशाद 8वीं से लेकर 12वीं तक की छात्रों को कोचिंग देता है। इसी दौरान उसके पास पढ़ने आने वाली आफरीन से उसे प्यार हो गया। दोनों में नजदीकियाँ बढ़ने के बाद जब आफरीन शादी की जिद करने लगी, तब उसने योजना बना कर उसकी हत्या कर दी।

आफरीन के दोस्तों ने पहले ही पुलिस को बताया था कि उसका अपने ट्यूटर के साथ प्रेम सम्बन्ध था, लेकिन पूछताछ में नौशाद लगातार पुलिस को बरगलाता रहा। पुलिस ने सीसीटीवी खंगाला तो नौशाद उस इलाक़े से गुजरता दिखा। सख्ती बरतने के बाद उसने सब उगल दिया। युवती की हत्या काफ़ी बेरहमी के साथ की गई थी।

अब शहीद और घायल जवानों के परिजनों को 4 गुना अधिक पैसे मिलेंगे

केंद्र सरकार ने शहीद और घायल जवानों के परिवारों को दी जानी वाली आर्थिक मदद चार गुना बढ़ाने का फैसला किया गया है। इसका लाभा हरेक परिस्थिति में शहीद और घायल होने वाले जवानों के परिजनों को मिलेगा। यानी अब परिवारों को दो लाख की बजाए 8 लाख रुपए मिलेंगे।

यह मदद आर्मी बैटल कैजुअल्टी वेलफेयर फंड के तहत दी जाएगी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जवानों के परिजनों के लिए वित्तीय मदद को दो लाख से बढ़ाकर 8 लाख करने को सैद्धांतिक रूप से मंजूरी दे दी है। लंबे समय से यह माँग उठ रही थी।

इससे पहले शहीद होने या 60 प्रतिशत से अधिक की अक्षमता होने पर 2 लाख रुपए की वित्तीय मदद का प्रावधान था। इसके साथ ही 60 फीसदी से कम अक्षमता वाले जवानों को एक लाख रुपए का वित्तीय मदद मिलती थी। ये धनराशि लाभार्थियों को मिलने वाली पारिवारिक पेंशन और आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस की वित्तीय सहायता जैसी दूसरी सुविधाओँ से अतिरिक्त दी जाती थी।

रक्षा मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि रक्षा मंत्री ने युद्ध हताहतों की सभी श्रेणी के परिवारों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता 2 लाख रुपए से बढ़ाकर 8 लाख रुपए करने को सैद्धांतिक स्वीकृति दे दी है। जानकारी के मुताबिक कैजुअल्टी वेलफेयर फंड के तहत मिलने वाली इस सहायता के अलावा, पहले से मौजूद अनुदान में 25 लाख रुपए से लेकर 45 लाख रुपए और सेना समूह बीमा के लिए 40 लाख रुपए से लेकर 75 लाख रुपये तक के विभिन्न अनुदान शामिल हैं।

उल्लेखनीय है कि पिछली सरकार में गृह मंत्री के रूप में राजनाथ सिंह ने कार्रवाई में मारे गए या घायल हुए अर्द्धसैनिक कर्मियों के परिवारों की सहायता के लिए ‘भारत के वीर’ कोष की शुरुआत की थी।