Home Blog Page 5498

एक ही आउटलेट से मुर्गा और गाय का दूध बेचेगी कमलनाथ सरकार, भाजपा ने जताया एतराज

मध्य प्रदेश में एक ही आउटलेट में चिकन और गाय का दूध बेचने की कमलनाथ सरकार की परियोजना पर विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार के अधीन आने वाले पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम ने कड़कनाथ चिकन और गाय का दूध बेचने का फैसला लिया है। निगम ने भोपाल में ऐसा एक आउटलेट खोला है। प्रयोग सफल होने पर पूरे राज्य में ऐसे आउटलेट खोले जाएँगे।

भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि इससे लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचेगी, क्योंकि गाय का दूध पवित्र माना जाता है। इसका इस्तेमाल धार्मिक उद्देश्य के लिए किया जाता है। इसे त्योहारों और उपवासों के दौरान भी प्रयोग किया जाता है। ऐसे में जो व्यक्ति चिकन बेच रहा है, वही व्यक्ति गाय का दूध ना बेचे।

उन्होंने कहा, “चिकन के साथ दूध बेचे जाने पर हमें आपत्ति है, क्योंकि यह लोगों की धार्मिक भावना को आहत कर रहा है। सरकार अपने फैसले पर गौर करे। मिल्क पार्लर और चिकन पार्लर एक दूसरे से कुछ दूरी पर खोले जाने जाए और दो अलग-अलग व्यापारियों को मिल्क पार्लर और चिकन पार्लर दिए जाने चाहिए।”

बता दें कि, प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने राज्य भर में एक ही आउटलेट में चिकन और दूध बेचने की परियोजना शुरू की है। भोपाल में इसका एक आउटलेट खोला गया है। राज्य के पशुपालन मंत्री लाखन सिंह यादव का कहना है कि इससे लोगों को अच्छी गुणवत्ता वाले अंडे और दूध मिलेंगे। लाखन सिंह ने कहा कि वो राज्य भर में ऐसे ही पार्लर खोलने पर विचार कर रहे हैं और प्रयोग के तौर पर भोपाल में आउटलेट खोला भी गया है। उनका कहना है कि इसकी सफलता के आधार पर भविष्य की परियोजना को आकार दिया जाएगा।

वहीं, एक ही पार्लर में चिकन और दूध बेचे जाने को लेकर हो रहे विरोध पर लाखन सिंह ने कहा कि दोनों उत्पादों को बेचने के लिए पार्लर के अंदर अलग केबिन बनाए जाएँगे। दूध और चिकन को अलग-अलग केबिन में बेचा जाएगा। हालाँकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि दूध और चिकन एक ही व्यापारी द्वारा बेचे जाएँगे, अथवा दो अलग-अलग व्यापारियों द्वारा।

पुलिस की मॉब लिंचिंग: अलवर में भीड़ ने इस तरह धुना कि अस्पताल पहुँच गए थानेदार, सिपाही

राजस्थान का अलवर जिला लगातार पुलिस और कानून व्यवस्था की बदहाली की नई मिसाल कायम कर रहा है। इस बार एक अलग ही प्रकार की घटना में अलवर पुलिस पर स्थानीय लोगों ने हाथ आजमा दिए। यह मामला अलवर जिले के मुंडावर थाना इलाके की है, जहाँ पुलिस खुद मॉब लिचिंग की शिकार हो गई और उन्हें मुंडावर अस्पताल में प्राथमिक उपचार देकर रात करीब 2 बजे अलवर रेफर कर दिया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भीड़ ने नशे में घटनास्थल पर एक मामला सुलझाने पहुँचे दो पुलिसकर्मियों की जमकर धुनाई कर डाली। ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिसकर्मी शराब के नशे में एक पारिवारिक विवाद का निपटारा करने आए थे। फ़िलहाल दोनों घायल पुलिसकर्मियों का अलवर के अस्पताल में इलाज चल रहा है।

घटना अलवर जिले के मुंडावर के जागीवाड़ा गाँव से प्रकाश में आया। शुक्रवार (सितंबर 14, 2019) रात में सर्किल गश्त के दौरान भिवाड़ी पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली थी कि जागीवाड़ा गाँव में दो महिलाओं को उनके ससुराल में बंधक बनाकर मारपीट की जा रही है।

सूचना पर उप निरीक्षक रामस्वरूप और कॉन्स्टेबल शिवरतन समेत 3-4 पुलिसकर्मी गाँव गए। पुलिस के साथ ही महिलाओं के पीहर पक्ष के (बहरोड़ थाना क्षेत्र के) लोग भी घटनास्थल पर पहुँच गए। ग्रामीणों का आरोप है पुलिसकर्मी शराब के नशे में थे और जबरन महिलाओं को ले जाने की कोशिश कर रहे थे। इस पर ग्रामीणों ने आपत्ति जताते हुए कहा कि महिला पुलिसकर्मी के बिना वे महिलाओं को नहीं भेजेंगे, लेकिन पुलिसकर्मियों ने उनकी बात नहीं सुनी।

ग्रामीणों ने बताया कि एक पुलिसकर्मी के मुँह से शराब की बदबू आने पर लोगों ने उसे पकड़ लिया। उसे बचाने के चक्कर में जब उप निरीक्षक रामस्वरूप और कॉन्स्टेबल शिवरतन आगे आए तो भीड़ ने उनकी जमकर धुनाई कर दी।

घटना की सूचना मिलते ही मौके पर ततारपुर सहित अन्य थानों व क्यूआरटी टीम जागीवाड़ा गाँव पहुँची और दो व्यक्तियों को गिरफ्तार किया, जबकि अन्य फरार हो गए। नीमराना वृताधिकारी हरीराम कुमावत के अनुसार, मामले की जाँच जारी है। पुलिस उक्त लोगों के खिलाफ राजकार्य में बाधा में मारपीट का मामला दर्ज करेगी।

इस पिटाई के बाद फिलहाल दोनों का अलवर के अस्पताल में इलाज चल रहा है। घायल पुलिसकर्मियों का कहना कि ग्रामीणों ने उन्हें बंधक बनाई गई महिलाओं के पीहर पक्ष के साथ आने और जबरन दबाव बनाकर महिलाओं को ले जाने की बात समझकर पिटाई कर दी। बाद में किसी तरह से पुलिसकर्मियों को भीड़ से छुड़वाया गया और उन्हें स्थानीय अस्पताल ले जाया गया। वहाँ दोनों को प्राथमिक उपचार के बाद अलवर रेफर कर दिया गया।

शाहबानो मामले में कहा था फिर भी यूनिफॉर्म सिविल कोड पर कुछ नहीं किया, गोवा से सीखें: SC

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता का मसला फिर से चर्चा में आ गया है। भाजपा शुरुआत से ही इसके पक्ष में रही है। वहीं, इसके विरोधियों का कहना है कि यह सब पर हिंदू कानून थोपने जैसा होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यूनिफॉर्म सिविल पर टिप्पणी करते हुए इस बात पर नाराज़गी जताई है कि अभी तक इसे लागू करने के लिए कोई प्रयास नहीं हुए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में गोवा से सीख लेने की सलाह दी, जहाँ यूनिफॉर्म सिविल कोड सभी पर लागू होता है, चाहे वो किसी भी धर्म का व्यक्ति हो। जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा कि गोवा में कुछ बदलावों के साथ पुर्तगाली सिविल कोड ही लागू है। गोवा के स्थानीय निवासी किसी भी अन्य राज्य में भी बसे हों, तब भी वो इसके दायरे में आते हैं।

कोर्ट ने गोवा की चर्चा करते हुए कहा कि वहाँ मुस्लिम नागरिक एक से ज्यादा निकाह नहीं कर सकते और न ही मौखिक तलाक़ ही दे सकते हैं। लेकिन, देश के अन्य हिस्सों में वे अपने पर्सनल लॉ से चलते हैं। जब कभी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की बात होती है तो इसका मुस्लिम प्रतिनिधि यह कह कर विरोध करते हैं कि यह सब पर हिंदू कानून थोपने जैसा है।

संपत्ति विवाद के एक मामले में टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभी तक देश के सभी हिस्सों में सामान रूप से सिविल कोड लागू करने के लिए किसी भी प्रकार का प्रयास नहीं किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो मामले में अपने फैसले की याद दिलाते हुए कहा कि उसने इस सम्बन्ध में ध्यान भी दिलाया लेकिन तब भी सरकारों ने प्रयास नहीं किए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गोवा में उत्तराधिकार, दहेज़ और संपत्ति मामलों में क़ानून बेहद स्पष्ट है और धर्म इसके आड़े नहीं आता। वहाँ शादी के बाद पति-पत्नी अपनी शादी के पहले और बाद की सम्पत्तियों पर संयुक्त स्वामित्व रखते हैं। अगर तलाक होता है तो इस संपत्ति का बराबर बँटवारा किया जाता है। हाँ, शादी से पहले संपत्ति के सम्बन्ध में मनमाफिक करार किया जा सकता है कि बँटवारा किस प्रकार से होगा?

कोर्ट ने आर्टिकल 44 की चर्चा करते हुए कहा कि इसमें सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता की बात कही गई है लेकिन फिर भी इसकी तरफ़ कोई ध्यान नहीं देता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“लोगों की सोच यह बन गई है कि अगर पर्सनल कोड को लेकर कोई बदलाव होता भी है तो मुस्लिमों को आगे आकर इसकी पहल करनी चाहिए। अभी तक यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर सरकार की तरफ से किसी भी प्रकार की आधिकारिक गतिविधियों की सूचना नहीं है। ये सरकार की ही ज़िम्मेदारी है और विधायिका के पास ही इसे लागू करने की क्षमता भी है।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया में भी यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर बहस छिड़ गई। हालाँकि, आरएसएस और भाजपा लम्बे समय से इसे लागू करने की माँग कर रहे हैं। अनुच्छेद 370, एनआरसी और तीन तलाक़ को लेकर अहम निर्णय लेने वाली मोदी सरकार से लोगों ने अपेक्षा जताई है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में भी प्रयास किए जाएँगे।

पप्पू पीएम नहीं चाहिए, मोदी बढ़िया काम कर रहे: NDTV पर भारत के #1 निवेशक

किसी के घर में घुस कर उसे बेइज़्ज़त करना अमूमन अच्छा नहीं माना जाता। लेकिन भारत के चोटी के निवेशकों में शुमार राकेश झुनझुनवाला ने NDTV के पत्रकार श्रीनिवास जैन के साथ ऐसा ही सुलूक किया। उनके शो में बैठकर झुझुनावाला ने न केवल प्रधानमन्त्री मोदी की तारीफ की, बल्कि राहुल गाँधी के प्रधानमन्त्री बनने पर “I don’t want Pappu to be my Prime Minister” की बिजली से कुठाराघात भी कर दिया। जैन के ‘Executive Decision’ शो में झुनझुनवाला ने राम मन्दिर और कश्मीर के मुद्दों पर ही नहीं, बैंकिंग एनपीए और अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर भी मोदी के प्रति अपना समर्थन दोहराया

मोदी के समर्थन में झुनझुनवाला की बातों पर जब श्रीनिवास जैन ने झुनझुनवाला से पूछा कि क्या वे पिछली सरकारों (यानीमनमोहन सरकार) के कार्यकाल में भी कुछ तारीफ़ करने लायक देखते हैं, तो सवाल से बचते हुए झुनझुनवाला ने कहा कि जो बीत गया, उसे जाने देना चाहिए। लेकिन वे (झुनझुनवाला) मोदी-समर्थक हैं, और वे ‘पप्पू’ को अपना प्रधानमन्त्री नहीं देखना चाहते। उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ा कि भारत के अब तक के सभी प्रधानमन्त्रियों में मोदी सबसे अधिक लोकप्रिय हैं।

वोटरों ने माँगा, मोदी ने दिया’

झुनझुनवाला से जैन ने सवाल किया कि क्या मोदी ने जनता से वह वादे पूरे किए, जिसके लिए जनता ने उन्हें 2014 में चुना था। तो झुनझुनवाला ने जवाब दिया कि मोदी के वोटर जो चाहते थे, वह सब मोदी ने किया। “उनके वोटर 370 हटाना चाहते थे। उनके वोटर राम मन्दिर चाहते हैं। उन्होंने इन वादों पर काम किया है।” इसके अलावा झुनझुनवाला ने मोदी सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का भी ज़िक्र किया, जिनमें मोदी के पहले कार्यकाल की उज्ज्वला के अलावा उनके दूसरे कार्यकाल में ज़ोर पा रही “नल में जल” योजना भी है। झुनझुनवाला के अनुसार चूँकि भारत की 40% बीमारियाँ जलजनित हैं, अतः इस योजना से लोगों को बहुत लाभ होगा।

इससे नीचे नहीं जाएगा बाज़ार

गहराती आर्थिक निराशा के बारे में झुनझुनवाला ने दावा किया कि आर्थिक परिदृश्य उतना भी बुरा नहीं है, जितना दिखाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उनके ‘सूत्रों’ ने उन्हें बताया कि वर्तमान और निकट भूतकाल भले ही मंदी के रहे हों, लेकिन अर्थव्यवस्था सुधार की ओर बढ़ रही है। मिडकैप शेयरों का उदाहरण देते हुए झुनझुनवाला ने दावा किया कि पिछले 18 महीनों से इनमें गिरावट का दौर देखा जा रहा है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि वे इससे नीचे नहीं जा सकते और अब उनमें बढ़ोतरी देखने को मिलेगी।

हालाँकि उन्होंने निवेश के बारे में अंतिम निर्णय लेने के पहले लोगों को अपने निजी वित्तीय सलाहकारों से मशविरा कर लेने के लिए आगाह भी किया, लेकिन एक आम राय दी कि चूँकि मिडकैप बाज़ार में गिरावट चल रही है, स्तर न्यूनतम है और उछाल की आशा है, अतः यह इस सेगमेंट में निवेश का सबसे अच्छा समय हो सकता है।

लोहिया ट्रस्ट की बिल्डिंग यादव परिवार के कब्जे से मुक्त, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर योगी सरकार ने की कार्रवाई

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मुलायम परिवार से लोहिया ट्रस्ट बिल्डिंग खाली करवा ली है। राज्य संपत्ति विभाग ने शनिवार (सितंबर 14, 2019) को विक्रमादित्य मार्ग स्थित लोहिया ट्रस्ट का बंगला खाली करा लिया। बता दें कि, मुलायम सिंह यादव ट्रस्ट के अध्यक्ष और शिवपाल सिंह यादव सचिव हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कई शीर्ष नेता ट्रस्ट के सदस्य हैं।

लोहिया ट्रस्ट की यह बिल्डिंग शिवपाल यादव की पार्टी के कब्जे में थी और पिछले कुछ महीने से इसका बाजार दर पर किराया वसूला जा रहा था। राज्य संपत्ति विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यह कार्रवाई की है। राज्य संपत्ति विभाग ने कड़ी सुरक्षा के बीच लोहिया ट्रस्ट को अपने कब्जे में लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश के 6 पूर्व मुख्यमंत्रियों से सरकारी बंगला खाली करने का आदेश भी दिया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य संपत्ति विभाग की तरफ से सबको 15 दिन के भीतर बंगला खाली करने का नोटिस भी भेजा गया था।

उल्लेखनीय है कि रिटायर आईएएस अधिकारी एसएन शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि लोहिया ट्रस्ट बंगला नियमों का उल्लंघन करके आवंटित किया गया है। इसी के साथ कई अन्य बंगले भी नियम के खिलाफ आवंटित किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए ट्रस्ट और सोसाइटी के अनाधिकृत बंगलों को 4 महीने में खाली करने का आदेश दिया था।

फैजान को पीटने, धमकाने पर AAP विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ चार्जशीट दायर

दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार  (सितंबर 13, 2019) को आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ मारपीट के एक मामले में चार्जशीट दायर की है। मामला 2018 का है। एसएम फैजान ने 10 अक्टूबर 2018 को दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज कराई थी।

बता दें कि फैजान ने इससे पहले भी खान के खिलाफ दिल्ली के जामिया पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज करवा रखी थी। इसके मुताबिक खान ने फैजान की गाड़ी को टक्कर मार दी थी और जब उसने इसका विरोध किया तो बंदूक दिखाकर उसके साथ मारपीट की और धमकी दी। इसके बाद से ही अमानतुल्लाह केस वापस लेने के लिए उसे लगातार धमका रहे थे।

अमानतुल्लाह ने फैजान के साथ दूसरी बार तब मारपीट की थी, जब वह काका नगर में अपने एक दोस्त की बहन की शादी में गया था। AAP विधायक ने फैजान को पिछला मुकदमा वापस लेने के लिए धमकाया। जाँच के दौरान पुलिस को सबूत के तौर पर शादी में फैजान के साथ हुई मारपीट के चश्मदीद गवाह और कुछ वीडियो फुटेज मिले हैं। फैजान ने बताया कि शादी समारोह के दौरान अमानतुल्लाह खान और उनके सहयोगियों ने विवाह भवन से बाहर जाने के रास्ते को बंंद कर दिया और फिर पिछली घटना को लेकर एफआईआर दर्ज कराने के लिए उसके साथ मारपीट की थी। 

AAP विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। पिछले साल दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ सीएम के आवास पर हुई मारपीट में भी कथित तौर पर शामिल थे।

इसके अलावा, भ्रष्टाचार, दिल्ली वक्फ बोर्ड में अनियमितता, धमकी और यौन उत्पीड़न के मामले में AAP विधायक के खिलाफ आरोपों की एक लंबी सूची है। पिछले साल, वह सिग्नेचर ब्रिज के एक कार्यक्रम में दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी के साथ धक्का-मुक्की करते हुए भी पकड़े गए थे।

हिंदुस्तान ने मार गिराए दो पाकिस्तानी सैनिक, सीजफायर के उल्लंघन पर चखाया मज़ा

हिंदुस्तान की सेना ने दो पाकिस्तानी सैनिकों को हाजीपुर सेक्टर में ढेर कर दिया। घटना तीन दिन पहले (10-11 सितम्बर) की है। पाकिस्तान की ओर से सीजफायर का उल्लंघन किए जाने के बाद भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई में उसक दोनों सैनिक मार गिराए।

मारे गए सैनिकों में से एक का नाम गुलाम रसूल है। वह हिन्दुस्तानी सेना की जवाबी कार्रवाई में मारा गया। ANI के अनुसार गुलाम रसूल पाकिस्तानी पंजाब के बहावलनगर का रहने वाला है। उसकी लाश उठाने के लिए पाकिस्तान ने पहले तो फायरिंग तेज कर हिन्दुस्तानी सेना को पीछे धकेलने की कोशिश की। लेकिन वे न केवल इसमें नाकाम रहे, बल्कि दूसरे मजहब के अपने एक और पंजाबी सैनिक को गँवा दिया। इसके बाद कल (13 सितंबर) सफ़ेद झंडा दिखा पाकिस्तान दोनों के शव ले गया।

यहाँ मारे गए सैनिकों की जाति और प्रांत बताना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि पाकिस्तानी सेना अपने ही सैनिकों की लाशों के साथ जातीय भेदभाव करती रहती है। मारे जाने वाले सैनिक कश्मीरी (गुलाम कश्मीर/POK के निवासी) या नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री (NLI) के होते हैं तो पाकिस्तान उनकी लाशें लेने में हिचकता है, जबकि समुदाय विशेष के पंजाबी सैनिकों की लाशें वह हर कीमत पर पाने का प्रयास करता है।

कारगिल युद्ध के समय भी उसने मारे गए कश्मीरी/NLI सैनिकों को ‘नॉन-स्टेट एक्टर्स’/‘नॉन-सिटिज़न्स’ बताकर उनकी लाशें और उनके किए की ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया था और उन्हें हिंदुस्तान ने दफनाया। पंजाबी समुदाय का पाकिस्तान के राजनीतिक जीवन में वर्चस्व है। सेना में भी उनसे पहले कश्मीरियों और NLI को आगे धकेल दिया जाता है, ताकि अधिकतम जान के जोखिम से पंजाबी बचे रहें और कश्मीरी/NLI होने के नाते मारे गए सैनिकों के शव लाने का दबाव भी न हो।

करीब 4 मिनट के इस वीडियो में  सफ़ेद झंडा लहराते हुए एक आदमी सामने की पहाड़ी से उतर कर तलहटी के पास एक टीले के पास आता है। उसके बाद कुछ दो-तीन और लोग उसके बुलाने पर आते हैं, और एक-एक कर दो शव उठाकर ले जाते हैं।

इससे पहले पाकिस्तान ने केरन सेक्टर में नियंत्रण रेखा के पास पाँच से सात BAT (Border Action Team) कमांडो के शव को LOC पर से उठाने से मना कर दिया था, जबकि हिन्दुस्तानी सेना ने पेशकश की थी कि पाकिस्तानी सेना सफेद झंडे के साथ आकर इन शवों को ले जा सकती है। उस समय भी खबरें चलीं थीं कि मारे गए सैनिकों में मजहब विशेष के पंजाबी न होने के चलते ही पाकिस्तान ने शवों को ले जाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

अजमेर दरगाह के दीवान ने Article 370 हटाने का किया समर्थन, कहा- मुख्य धारा का हिस्सा बने कश्मीरी

अजमेर दरगाह के दीवान सैयद ज़ैनुल आबेदीन ने जम्मू-कश्मीर पर केंद्र सरकार के फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि भारतीय मुस्लिम पाकिस्तान और उसके झूठ का समर्थन नहीं करते।

आबेदीन ने टाइम्स नाउ से बात करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का सरकार का निर्णय सही निर्णय था। उन्होंने कहा कि मीडिया चैनल के माध्यम से, वह पाकिस्तान और उसके नेताओं को एक संदेश भेजना चाहते हैं कि वो जो भारतीयों को देश के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं और ये उम्मीदें पाले बैठे हैं कि वो उनका समर्थन करेंगे, उनकी ये कोशिश और उम्मीदें बुरी तरह से असफल हो जाएँगी।

इतना ही नहीं, ज़ैनुल आबेदीन ने कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच फिर से कोई और युद्ध होता है, तो देश के अल्पसंख्यक भारतीय सशस्त्र बलों के साथ खड़े होंगे और युद्ध के मैदान में पाकिस्तान का सामना करेंगे।

सैयद ज़ैनुल आबेदीन ने कहा कि भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करके, कश्मीर मुद्दे को लगभग हल कर लिया है। उन्होंने कहा, “हर भारतीय को सरकार के फैसले पर गर्व होना चाहिए। कुछ लोग इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि गलत है। यह किसी भी तरह से धर्म से संबंधित नहीं है और भारत के मुस्लिमों को इस फैसले का स्वागत करना चाहिए।”

अजमेर दरगाह के प्रमुख ने सभी कश्मीरी पुरुषों और महिलाओं से अपील करते हुए कहा कि वो सरकार के फैसले का समर्थन करें, मुख्य धारा का हिस्सा बनने और देश के कानूनों और नीतियों से लाभ उठाने का सुनहरा अवसर प्राप्त करें।

गौरतलब है कि पिछले दिनों सैयद ज़ैनुल आबेदीन ने गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने का भी आह्वान किया था और मजहब विशेष से हिंदुओं के साथ सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करने के लिए बीफ (गोमांस) का सेवन न करने का आग्रह किया था। हाल ही में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना महमूद मदनी ने भी पीएम मोदी के फैसले का समर्थन किया था और कहा था कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन कश्मीरियों के लिए हानिकारक है।

हिंदी दिवस विशेष: मात्रा ‘मात्र’ नहीं होती, हिंदी में यह ‘माई’ है

किसी पांच सितारा में जाने पर सबसे बड़ी समस्या खाने का ऑर्डर देना भी हो सकता है- वैसे तो खाने का तरीका, कौन सा चम्मच-काँटा या विधि इस्तेमाल करनी है, आदि भी तय करना मुश्किल ही होता है। ऊपर से व्यंजनों के नाम कुछ ऐसे होते हैं, जिनसे शाकाहारी-माँसाहारी का फर्क पता न चले। खाने में स्वाद जाना-पहचाना-सा होगा, या कुछ अजीब, उबला-सा परोस देंगे, यह भी तय कर पाना मुश्किल है। अब, जब ऐसी ‘विकट’ समस्याओं के बीच एक गरीब, मासूम, अंग्रेजी कम जानने वाला, भटका हुआ नौजवान पहली बार 5-सितारा में ऑर्डर देने बैठा तो मेनू को गौर से पढ़ने लगा। चूँकि बिहार से कई लोग महानगरों में नौकरी करने जाते हैं और नौजवान की किस्मत अच्छी थी, इसलिए उसकी टेबल का वेटर भी बिहारी निकला।

उसने नौजवान की समस्या भाँप ली और मेनू में वेज सेक्शन की तरफ़ जाने का इशारा किया। वहां कोफ्ते का एक सेक्शन था और यह नौजवान कोफ्ते क्या होते हैं इतना तो जानता था। व्यंजन का विवरण पढ़कर उसने कद्दू (लौकी)–अंगूर के कोफ्ते का आर्डर कर दिया। नान और कोफ्ते ख़त्म करने के बाद उसने बिल भरा और जब वेटर बिल लेकर वापस आया तो उसने पूछा, “भाई, एक बात बताओ। ये कोफ्ते कद्दू (लौकी) के थे, वो तो ठीक है। मगर ये बताओ कि इसमें अंगूर कहाँ थे?” वेटर ने जवाब दिया, “सर, दोनों चीज़ें इस कोफ्ते को बनाने के लिए बिलकुल बराबर मात्रा में मिलाई जाती हैं। एक लौकी पर एक अंगूर, अगर दस लौकी (कद्दू) का बने तो रसोइया पूरे दस अंगूर डालता है!”

मात्रा बड़ी महत्वपूर्ण चीज़ होती है। सिर्फ खाने में ही नहीं, भाषा में भी मात्रा का अपना महत्व है। हिंदी और भारत की दूसरी कई भाषाओं में इसके होने या न होने से कई बार शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं और अनर्थ हो जाता है। ऐसा ही एक किस्सा सम्राट अशोक के काल का है। किस्से-कहानियों से गायब होने के कारण अशोक का ऐसे तो ज्यादा जिक्र नहीं आता, लेकिन उनकी एक पत्नी का जिक्र बौद्ध ग्रंथों में कई बार आता है। ये पत्नी थी तिष्यरक्षिता, जो कि अत्यंत कामुक मानी जाती थी। अशोक शायद वृद्ध हो चुके थे जब उनका तिष्यरक्षिता से विवाह हुआ। माना जाता है कि इस वजह से तिष्यरक्षिता का ध्यान अन्य पुरुषों पर रहता था। एक मान्यता में उनकी निगाह अशोक के ही एक पुत्र कुणाल पर थी। लेकिन कुणाल उनके प्रयासों को कोई भाव नहीं देता था, इसलिए वो उस से नाराज रहती थी।

दूसरी प्रचलित मान्यता ये है कि वो अपने पुत्र को राजा बनते देखना चाहती थी, जबकि अशोक कुणाल को अगला मौर्य सम्राट बनाना चाहते थे। इस वजह से तिष्यरक्षिता, कुमार कुणाल से खार खाए बैठी थी। जो भी वजह हो, उनकी कुणाल से शत्रुता का अंत बड़ा भयावह निकला। कहते हैं कि कुणाल को अगले राजा के रूप में शिक्षित करने के लिए अशोक ने अपने मंत्रियों को पत्र लिखा “कुमार अधियती”। पत्र किसी तरह तिष्यरक्षिता के हाथ लग गया और उन्होंने अपनी आँख के काजल से उसमें एक बिंदी बना दी। अनुस्वार की मात्रा पड़ते ही पत्र हो गया “कुमार अंधियती”। अधियती का मतलब जहाँ “शिक्षा दो” होता है, अंधियती का मतलब था “अन्धा कर दो” और अन्धा राजा नहीं बन सकता था। नेत्रहीन कुणाल बाद में अपनी बहन के साथ लंका में बौद्ध धर्म प्रचार के लिए चले गए, और मौर्य वंश नाश की ओर बढ़  गया।

बाकी, हिन्दी भाषा में मात्रा उच्चारण के हिसाब से लगती है- जो आप बोलते हैं, पक्का-पक्का वही लिखा जाता है। जो अशुद्ध हिंदी लिखते हैं, वो ज़्यादातर उच्चारण भी अशुद्ध ही कर रहे होंगे। हिंदी दिवस पर “चंद्रबिंदुओं की रक्षिका” जैसे मठाधीशों के साथ-साथ मेरे जैसे लोग जो मात्राओं की गलतियाँ करते रहते हैं, उन तक भी शुभकामनाएँ पहुँचें!

अब अपना टैक्स खुद भरेंगे यूपी के मंत्री, योगी सरकार ने बदला 40 साल पुराना कानून

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने करीब चार दशक पुराने Uttar Pradesh Ministers’ Salaries and Miscellaneous Act, 1981 में संशोधन करते हुए मंत्रियों का आयकर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भरे जाने का प्रावधान खत्म कर दिया है। अब से सूबे के माननीयों को अपना आयकर खुद भरना होगा, जबकि पहले यह ज़िम्मेदारी राज्य सरकार के खजाने की होती थी कि वह राज्य सरकार के मंत्रियों का इनकम टैक्स भरे

उपरोक्त प्रावधान पूर्व प्रधानमन्त्री वीपी सिंह के समय का है, जब वे सूबे के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। उस समय उन्होंने सूबे के मंत्रियों का टैक्स सरकार द्वारा भरे जाने की व्यवस्था की थी, जो अब तक चली आ रही थी। मीडिया में पिछले दिनों इसे लेकर काफी सवाल उठ रहे थे और सोशल मीडिया पर भी इस व्यवस्था की काफी आलोचना हो रही थी।

खबरों के मुताबिक इस मामले के संज्ञान में आने के बाद योगी आदित्यनाथ ने इस प्रावधान को खत्म करने का निर्णय लिया। राज्य सरकार के वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने भी पुष्टि की कि यह निर्णय योगी आदित्यनाथ के ही निर्देशों पर लिया जा रहा है। इस आशय से प्रदेश के सूचना और जनसम्पर्क विभाग ने भी एक कथन जारी किया है।

मीडिया खबरों के मुताबिक केवल योगी सरकार ही मार्च, 2017 से अब तक अपने मंत्रियों का ₹86 लाख आयकर भर चुकी है। इस स्कीम का फायदा उठाने वालों में ‘आम’ मंत्रियों के अलावा नारायण दत्त तिवारी, मुलायम सिंह, मायावती, वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर नेता भी शामिल रहे हैं।