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4000 बच्चे हैं जेल में, कश्मीरी लड़कियाँ घर से निकलने में डर रहीं: मलाला ने बिना सबूत उगला ज़हर

नोबल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई का कश्मीर प्रेम एक बार फिर से जाएगा है। मलाला ने एक के बाद एक 7 ट्वीट्स कर जम्मू कश्मीर को लेकर रोना रोया। हालाँकि, बलूचिस्तान में पाक फ़ौज द्वारा किए जा रहे अत्याचारों पर वह चुप रहीं। मलाल को ट्विटर पर लोगों ने याद दिलाया कि पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा मानवाधिकार हनन की बातें सामने आते रहती हैं, वह उस पर भी कुछ कहें। आइए, सबसे पहले देखते हैं कि मलाला ने अपनी ट्वीट्स कर क्या लिखा?

मलाला यूसुफजई ने लिखा कि उन्होंने पिछले कुछ दिनों में ऐसे लोगों से बात की हैं, जो कश्मीर में रह रहे हैं या फिर वहाँ कार्यरत हैं। इनमें छात्र, पत्रकार और मानवाधिकार वकील शामिल हैं। मलाला ने लिखा कि वह कश्मीर की लड़कियों से सीधे बातचीत करना चाहती थीं। उन्होंने ‘कम्युनिकेशन ब्लैकआउट’ का हवाला देकर लिखा कि लोगों से बात करने में काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ा। मलाला ने आरोप लगाया कि कश्मीर को दुनिया से अलग-थलग कर दिया गया है और उनकी आवाज़ बाहर नहीं जाने दी जा रही।

मलाला के अनुसार, कश्मीरी लड़कियों ने उन्हें बताया कि कश्मीर की ताज़ा स्थिति को बयान करने का सबसे अच्छा तरीका है- सिर्फ़ ख़ामोशी। कश्मीरी लड़कियों ने मलाला को कथित रूप से बताया कि उन्हें ख़ुद नहीं पता कि उनके साथ क्या किया जा रहा है? मलाला की मानें तो लड़कियों को उनके घरों की खिड़कियों से केवल सेना की पदचाप सुनाई दे रही है और उन्हें काफ़ी डर लग रहा है। मलाला के अनुसार, उन कश्मीरी लड़कियों ने उनसे कहा:

“मैं ख़ुद को निरर्थक और खिन्न महसूस कर रही हूँ। ऐसा इसीलिए क्योंकि मैं स्कूल नहीं जा सकती। 12 अगस्त को परीक्षाएँ थीं और मैं स्कूल नहीं जा पाई। अब मेरा भविष्य असुरक्षित है। मैं एक लेखिका बनना चाहती हूँ और स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना चाहती हूँ। मैं एक सफल कश्मीरी महिला बनना चाहती हूँ। जैसा चल रहा है, उस हिसाब से यह और कठिन होता जा रहा है।”

कश्मीरी लड़कियों ने कथित रूप से मलाला को बताया कि उन्हें लगता है कि ‘जो लोग उनके लिए आवाज़ उठाते हैं, वह उनकी आशाओं को जीवित रखने का कार्य करते हैं।‘ मलाला के अनुसार, लड़कियों ने उन्हें बताया कि दशकों से कश्मीर जिस दुर्गति में है, वे सभी उससे मुक्त होने के इंतजार कर रही हैं। इसके बाद मलाला ने बिना सबूतों के दावा किया कि बच्चों सहित 4000 लोगों को गिरफ़्तार कर जेल में बंद कर दिया गया है। साथ ही उन्होंने दावा किया कि बच्चे 40 दिनों से स्कूल नहीं जा पाए हैं और लड़कियाँ घर से निकलने में डर रही हैं।

मलाला यूसुफजई यहीं नहीं रुकीं बल्कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली से मामले का संज्ञान लेने की अपील की। उन्होंने वैश्विक नेताओं से कहा कि ‘कश्मीर में शांति’ के लिए प्रयास करें। मलाला ने कश्मीरी आवाज़ों को सुनने की अपील करते हुए बच्चों को स्कूल पहुँचाने की बात कही। हालाँकि, प्रशांत पटेल ने उन्हें याद दिलाया कि सिंध में हिन्दू व सिख लड़कियों के धर्मान्तरण की ख़बरों पर भी टिप्पणी करें। जबरन इस्लामिक धर्मान्तरण का शिकार सिख लड़कियों से भी मलाला को बात करनी चाहिए।

मलाला यूसुफजई ने कश्मीर पर बयान देकर पाकिस्तानी नैरेटिव को ही आगे बढ़ाया है क्योंकि भारतीय सेना को बिना नाम लिए उन्होंने बदनाम करने की कोशिश की है। भारत के कई नेता, यहाँ तक कि कश्मीरी राजनीतिक दल नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद भी कश्मीर होकर आए लेकिन मलाला का बयान इससे बिलकुल अलग है। कश्मीर से हज़ारों मील दूर बैठ कर बयान देने वाली मलाला को यह भी जानना चाहिए कि भारतीय सेना लगातार सीमावर्ती गाँवों में बच्चों को पाकिस्तान की तरफ से होने वाले फायरिंग से बचाने में लगी है।

पाक अधिकृत कश्मीर के समाजसेवी पाकिस्तानी फ़ौज पर अत्याचार का आरोप लगा रहे हैं। परमाणु बम की धमकी पाकिस्तान से आ रही है। वीडियो फुटेज में पाकिस्तानी सेना घुसपैठ करती दिख रही है। बलूचिस्तान के में नरसंहार हो रहा है और नेताओं को पाकिस्तान से बाहर रहना पड़ रहा है। इस्लामिक राष्ट्रों तक ने पाकिस्तान को समर्थन देने से हाथ खींच लिया है। रूस और अमेरिका सहित सभी प्रमुख देशों ने इसे भारत का आंतरिक मुद्दा बताया है। लेकिन, मलाल यह कि मलाला को बलूचिस्तान में निर्दोषों पर अत्याचार और सिंध में लड़कियों का जबरन इस्लामिक धर्मान्तरण नहीं दिखता।

मलाला इससे पहले भी कश्मीर पर बयान दे चुकी हैं। न तो उन्होंने ग्राउंड जीरो पर आकर किसी से संपर्क किया है और न ही इस सम्बन्ध में उनकी किसी योजना के बारे में पता चला है। मलाला ने अपने बयानों के लिए कोई सबूत भी नहीं दिए। कई फॉरेन मीडिया को कश्मीर पर एडिटेड और डॉक्टरेड क्लिप्स और फोटोज चलते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया है। मलाला यूसुफजई को अगर सच में कश्मीर की चिंता है तो उन्हें पाक अधिकृत कश्मीर की होनी चाहिए, जहाँ शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य व्यवस्था तक की हालत बदतर है।

पाकिस्तान में सिर्फ़ पिछले 1 साल में 1000 से भी अधिक हिन्दू व ईसाई लड़कियों का जबरन इस्लामिक धर्मान्तरण कर दिया गया लेकिन मलाला ने इनमें से एक से भी बात नहीं की जबकि वो उन्हीं का देश है। बात करना तो दूर, उन्होंने इसके लिए आवाज़ भी नहीं उठाई। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में ही ऐसा सामने आया है।

जब सरदार पटेल ने हैदराबाद को कश्मीर बनने से रोका: कहानी निज़ाम को झुकाने वाले Operation Polo की

भारत की आज़ादी के समय कई ऐसी रियासतें, या यूँ कह लें, रजवाड़े थे, जो केवल अपना फायदा देख रहे थे। इसमें से अधिकतर ऐसे थे, जो वास्तव में अपने राज्य की जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे लेकिन खानदानी राजपाट होने के कारण जनभावनाओं को ताक पर रखते हुए राज करना चाहते थे। ऐसे ही राज्यों में से एक था हैदराबाद। हैदराबाद सल्तनत की स्थापना औरंगजेब के जनरल ग़ाज़ीउद्दीन ख़ान फ़िरोज़ जोग के बेटे मीर क़मरुद्दीन द्वारा की गई थी। पहला ख़लीफ़ा अबू बकर इसका पूर्वज था।

स्वतंत्रता से पहले: हैदराबाद सल्तनत का इतिहास

हैदराबाद सल्तनत ने सन 1799 में टीपू सुल्तान के ख़िलाफ़ लड़ाई में ईस्ट इंडिया कम्पनी की मदद की थी। इसके बदले में अंग्रेजों ने निज़ाम को टीपू के राज्य का एक टुकड़ा दिया। टीपू सुल्तान की अंग्रेजों के हाथों हार हुई और वह मारा गया। मराठों के ख़िलाफ़ युद्ध में भी हैदराबाद के निज़ाम ने अंग्रेजों का साथ दिया और बदले में सिंधिया के राज्य सहित कई मराठा जिले उसे इनाम के रूप में मिले। मेरे अली उस्मान ख़ान बहादुर हैदराबाद का अंतिम निज़ाम था।

अंग्रेजों की तरफ से उसे सबसे वफादार साथी होने का तमगा दिया गया था। 1.6 करोड़ की आबादी वाले हैदराबाद का वार्षिक राजस्व 26 करोड़ रुपए था और इसीलिए वह भारत के सबसे अमीर राज्यों में से एक था। हैदराबाद की जनसंख्या में 85% हिन्दू थे लेकिन प्रशासन से लेकर पुलिस और सेना तक- हर जगह मजहब विशेष के लोग ही काबिज थे। यहाँ तक कि बाद में निज़ाम द्वारा जो विधायिका गठित हुई, उसमें भी मजहब विशेष प्रभुत्व था। इस अन्याय से हिन्दू जनता में गुस्सा था।

जब 3 जून 1947 को ‘गवर्नमेंट प्लान’ आया, तब निज़ाम की बाछें खिल उठी। उसने भारत और पाकिस्तान, दोनों के ही संविधान सभा में अपना प्रतिनिधि भेजने से इनकार कर दिया। निज़ाम ने घोषणा करते हुए कहा कि आज़ादी के बाद वह ब्रिटिश कॉमनवैल्थ का सदस्य बन कर एक अलग राज्य की सम्प्रभुता को क़ायम रखना चाहता है। निज़ाम ने लार्ड माउंटबेटन के पास अपने प्रतिनधि भेजे लेकिन उन्होंने साफ-साफ़ शब्दों में कह दिया कि हैदराबाद को भारत या पाकिस्तान में से किसी एक का हिस्सा बनना ही होगा।

निज़ाम की चालाकियाँ और भारत की आज़ादी

हैदराबाद के निज़ाम ने एक प्रतिनिधिमंडल के माध्यम से लॉर्ड माउंटबेटन को कहलवाया कि अगर उस पर ज्यादा दबाव डाला गया तो वह पाकिस्तान का हिस्सा बन जाएगा। माउंटबेटन मानते थे कि वैधानिक रूप से तो निज़ाम को इसका हक़ था लेकिन उन्होंने भौगोलिक स्थितियों के हिसाब से इसे लगभग असंभव करार दिया। माउंटबेटन जानते थे कि मात्र 15% जनसंख्या होने के बावजूद हैदराबाद में लगभग सभी प्रशासनिक पदों पर समुदाय विशेष वाले ही काबिज थे और निज़ाम इस प्रभुत्व को हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। उस समय उनके सलाहकार रहे वीपी मेनन ने अपनी पुस्तक में माउंटबेटन की सोच साझा की।

बस यहीं पर सीन में सरदार पटेल की एंट्री होती है। लॉर्ड माउंटबेटन के पास सरदार का एक पत्र पहुँचा, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि हैदराबाद के पास भारत में विलय के अलावा कोई और चारा है ही नहीं। सरदार चाहते थे कि सभी चीजें जैसी तय हुई हैं वैसी ही हों। सरदार का मानना था कि हैदराबाद के शर्तों पर विलय का अर्थ होगा उन राज्यों के साथ अन्याय, जो पहले ही भारत में विलय के लिए तैयार हो चुके हैं। इसके बाद निज़ाम के पैंतरों को भाँपते हुए सरदार ने ऐसी चाल चली कि इस खेल के बाकी सारे खिलाड़ी चित हो गए।

सरदार वल्लवभाई पटेल ने माउंटबेटन से कहा कि फ़ैसला जनभावना के अनुरूप हो। जनभावना की पुष्टि के लिए उन्होंने जनमत संग्रह कराने की बात कही। जो राज्य की जनता चाहेगी, वही होगा। सरदार का दाँव काम कर गया। लार्ड माउंटबेटन ने निज़ाम को पत्र लिख कर ब्रिटिश अधिकारियों के निरीक्षण में जनमत संग्रह कराने की बात कही। 85% हिन्दुओं का हक़ मार कर बैठे निज़ाम को ये प्रस्ताव न रास आना था और न आया। उसने हैदराबाद की ‘संवैधानिक स्थिति और समस्याओं’ का हवाला देते हुए कहा कि जनमत संग्रह का सवाल ही नहीं उठता।

इसके बाद निज़ाम ने सांप्रदायिक तनाव और उससे उपजने वाली संभावित हिंसा से होने वाले रक्तपात का रोना रोया। उसने अपने प्रतिनिधिमंडल के माध्यम से कहलवाया कि हैदराबाद के अधिकतर हिन्दू निज़ाम के प्रति वफादार हैं। उसकी तरफ से नवाब अली जंग ने धमकी दी कि हैदराबाद महानगर में अधिकतर जनसंख्या समुदाय विशेष की है और वे भारत में विलय कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे। उसने कहा कि इससे ऐसा तनाव उपजेगा जो सभी जिलों में फैलेगा और यह नियंत्रण से बाहर हो जाएगा।

पाकिस्तान का नाम लेकर ब्लैकमेलिंग

निज़ाम अब पाकिस्तान की तरफ देखने लगा था। वह चाहता था कि अनिश्चितता बनी रहे और बातचीत का कोई निष्कर्ष न निकले। उसके व्यवहार में भी बदलाव आ गया था, जिससे विलय हेतु बातचीत करने वाले लोग भी परेशान थे। निज़ाम चाहता था कि विलय के बावजूद हैदराबाद को विदेश नीति में पूरी छूट मिले और वह जिस विदेशी राज्य से चाहे, सम्बन्ध बना सके। वीपी मेनन सरदार पटेल के पास पहुँचे और उन्हें बताया कि हैदराबाद की कुछ शर्तों को मानते हुए विलय कर लेना चाहिए लेकिन सरदार ने कहा कि वह अपनी राय रखने से पहले पहले डाक्यूमेंट्स देखना चाहेंगे।

सरदार पटेल निज़ाम की पैंतरेबाजियों ने तंग आ चुके थे। उन्होंने कहा कि हैदराबाद के द्वारा ड्राफ्ट किए गए अग्रीमेंट को मानने से बेहतर है कि अब निज़ाम के साथ सारी बीतचीत रोक दी जाए। इसके बाद माउंटबेटन ने एक अलग से ड्राफ्ट एग्रीमेंट तैयार करवाया, जो भारत सरकार को मंजूर था। इसे स्वीकृति के लिए निज़ाम के पास भेजा गया। निज़ाम की एग्जीक्यूटिव कॉउन्सिल ने बहुमत से निज़ाम को एग्रीमेंट स्वीकार करने को कहा। लेकिन निज़ाम इसके बाद भी एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने में आनाकानी करता रहा।

इसके बाद पिक्चर में इत्तिहाद-ए-मुस्लिमीन की एंट्री होती है, जिसने हैदराबाद में नई नौटंकी शुरू कर दी। ये वही संगठन है, जो आज एआईएमआईएम के नाम से जाना जाता है और असदुद्दीन ओवैसी इसके मुखिया हैं। जब निज़ाम के पास पहुँचा प्रतिनिधिमंडल दिल्ली के लिए निकलने वाला था, तभी ईएएम के 30,000 लोगों ने अंग्रेज अधिकारी सर वॉटर मॉन्कटॉन सहित अन्य प्रमुख लोगों के घर को घेर लिया। खैर, निज़ाम ने भारत सरकार को कहलवाया कि एग्रीमेंट टूटने की स्थिति में वह पाकिस्तान के साथ मिल जाएगा।

निज़ाम ने अपने लोगों को कराची भेजा था। उसकी पाकिस्तान से जो बातचीत चल रही थी, अब वह उसकी धमकी भी देने लगा था। कश्मीर में भी समस्याएँ चालू हो गई थी और ईएएम के अध्यक्ष कासिम रज़वी को लगता था कि समस्याओं से घिरी भारत सरकार को वह हैदराबाद की शर्तों पर एग्रीमेंट स्वीकार करने के लिए मजबूर कर देगा। अचानक से निज़ाम ने बातचीत के प्रतिनिधिमंडल को बदल दिया, जिससे माउंटबेटन गुस्सा हो गए। सरदार का तो कहना था कि जिस फ्लाइट से निज़ाम का प्रतिनिधिमंडल दिल्ली आए, उसी फ्लाइट से उन्हें वापस भेज देना चाहिए।

स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट और शांति की आशा

खैर, भारत सरकार और हैदराबाद के बीच एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट हुआ, जिससे नेहरू को लगता था कि 1 साल के लिए शांति रहेगी लेकिन निज़ाम की डिमांड्स बढ़ती जा रही थी। उसने भारतीय करेंसी को हैदराबाद में प्रतिबंधित कर दिया। साथ ही उसने हैदराबाद से शेष भारत में होने वाली क़ीमती धातुओं की सप्लाई भी रोक दी। विदेशी संबंधों का हवाला देकर निज़ाम ने पाकिस्तान में एक अधिकारी को तैनात किया। साथ ही उसने पाकिस्तान को 20 करोड़ रुपए का क़र्ज़ भी दिया। हैदराबाद कश्मीर बनने चल निकला था और इसका शिल्पकार था ओवैसी की वर्तमान पार्टी का पुराना स्वरूप और उसका संस्थापक।

क़ासिम रज़वी ने हैदराबाद और उसके बाहर भड़काऊ बयानबाजी चालू कर दी, लोगों को उकसाने के लिए सांप्रदायिक बयान देने लगा। उसने आरोप लगाया कि भारत सरकार हैदराबाद के हिन्दुओं को हथियार सप्लाई कर रही है। उसने ख़ुद के संगठन को भारत भर के समुदाय विशेष का रहनुमा घोषित कर दिया। उसका आतंक इतना बढ़ गया कि पड़ोसी राज्य मद्रास को भी दिक्कत होने लगी। लेकिन, उसका एक बयान ऐसा था जो सरदार के कानों तक पहुँचा और वह एक्शन लेने के मूड में आ गए। क़ासिम ने कहा था कि अगर भारत सरकार हैदराबाद में दखल देती है तो उसे 1.5 करोड़ हिन्दुओं की हड्डियाँ और राख मिलेगी।

सरदार ने कहा कि अगर ऐसी बात है तो यह निज़ाम और उसके पूरे खानदान की जड़ों को नष्ट कर देगा। सरदार ने कहा कि हैदराबाद का विलय उसी प्रकार से होगा, जिस तरह से अन्य राज्यों का हुआ है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता सेनानियों के ख़ून-पसीने से बने भारत को एक धब्बे की वजह से बर्बाद नहीं होने दिया जाएगा। निज़ाम के अंतर्गत कार्यरत हैदराबाद के प्रधानमंत्री मीर लाइक अली सरदार के रुख से सन्न रह गया और तुरंत भाग हैदराबाद निज़ाम के पास पहुँचा। सरदार ने साफ़ कह दिया था कि कोई और विकल्प नहीं है।

ऑपरेशन पोलो: लॉर्ड माउंटबेटन के इस्तीफे के बाद

जून 21, 1948 को लार्ड माउंटबेटन ने गवर्नर जनरल पद से इस्तीफा दे दिया और इसके साथ ही हैदराबाद सल्तनत के पिट्ठुओं ने हिन्दुओं पर आतंक बरपाना शुरू कर दिया। पुलिस के साथ मिल कर समुदाय विशेष, रज़ाकारों ने हिन्दुओं को लूटा। हिन्दू हैदराबाद राज्य की सीमा से बाहर भगाने लगे। इसमें वामपंथियों ने भी उनका साथ दिया। कॉन्ग्रेस के 10,000 कार्यकर्ताओं को जेल में ठूँस दिया गया। यहाँ तक कि इस अन्याय का विरोध करने वाले समुदाय विशेष तक को नहीं छोड़ा गया। राज्य से गुजरने वाली ट्रेनों पर आक्रमण किए गए।

हैदराबाद ने संयुक्त राष्ट्र तक मामला ले जाने की तैयारी कर ली थी। भारत ने साफ़ किया कि यह उसका घरेलू मामला है। हैदराबाद के पीएम ने अमेरिकी राष्ट्रपति को भी पत्र लिखा। इसके बाद मेजर जनरल जेएन चौधरी के नेतृत्व और लेफ्टिनेंट जनरल महाराज श्री राजेन्द्रसिंहजी के मार्गदर्शन में भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन पोलो’ प्रारम्भ किया। सितम्बर 17, 1948 को हैदराबाद की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। भारतीय सेना की राह में आने वाले 800 रज़ाकार मारे गए। हालाँकि, यह संख्या उससे काफ़ी कम है, जितने हिन्दुओं को उन्होंने मार डाला था।

108 घंटे तक चले इस ऑपरेशन के दौरान 18 सितम्बर को भारतीय सेना हैदराबाद में घुसी। हैदराबाद की सरकार ने 17 सितम्बर को ही इस्तीफा दे दिया था। हाउस अरेस्ट में किए जाने का बाद निज़ाम अब ये कह कर भुलावा दे रहा था कि वह नई सरकार का गठन करेगा। पूरे ऑपरेशन के दौरान कहीं भी भारत में कोई सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई। निज़ाम ने विदेशी ताक़तों को लिखा लेकिन भारत के प्रयासों के बाद किसी ने भी दखल नहीं दिया।

(इस लेख को मुख्यतः भारत के बँटवारे और रियासतों के विलय के दौरान अहम किरदार अदा करने वाले अधिकारी वीपी मेनन की पुस्तक ‘THE STORY OF THE INTEGRATION OF THE INDIAN STATES‘ सहित अन्य Sources के आधार पर तैयार किया गया है।)

The Quint कर रहा है पियूष गोयल के बयान पर अपनी ही फैलाई फेक न्यूज़ का Fact Check

सोशल मीडिया के दौर में फेक न्यूज़ कितनी आसानी से अपनी जगह बना लेती हैं इस बात का अंदाजा लगा पाना बेहद कठिन है। हालाँकि, फेक न्यूज़ के जरिए कुछ लोग अपने स्वार्थ जरूर सिद्ध कर लेते हैं।

हाल ही में रेल मंत्री पियूष गोयल के एक बयान पर ट्विटर पर RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के एक फर्जी अकाउंट के ट्वीट को सच मानकर प्रोपगेंडा वेबसाइट The Quint, इकोनॉमिक टाइम्स, ABP न्यूज़, और आउटलुक ने खबर प्रकाशित कर दी।

रघुराम राजन के नकली अकाउंट को उनका आधिकारिक अकाउंट समझते हुए इन सभी ने न्यूज़ शेयर करते हुए बताया कि पियूष गोयल के बयान पर RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने उन्हें फटकार लगाई है।

IANS द्वारा शेयर की गई एक रिपोर्ट के आधार पर रघुराम राजन नाम के ट्विटर अकाउंट ने लिखा था- “जब आप आर्थिक मंदी की ग्रेविटी (गंभीरता) को नहीं समझते हैं, तो शब्दों में चूक हो जाती है और तर्क कमज़ोर हो जाते हैं। अगर कोई सोचता है कि गणित, ग्रेविटी और अर्थशास्त्र को समझने में मदद नहीं करती, तो यह इस बात की ओर इशारा है कि आप वास्तविक आँकड़ों को छिपा रहे हैं। आपके बयान पर न्यूटन मुस्कुरा रहा होगा।”

दरअसल, कल ही एक कार्यक्रम में देश की अर्थव्यवस्था पर बोलते हुए केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए किसी भी तरह के गणित या उससे जुड़े आँकड़ों को देखने की जरूरत नहीं है, अगर आइंस्टीन इस गणित में उलझ जाते तो वे कभी भी ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण) की खोज नहीं कर पाते।

वास्तव में पियूष गोयल का मकसद यह बताना था कि गणित की प्रासंगिकता सीमित है और जीडीपी के सिर्फ आँकड़ो से कुछ साबित नहीं होता है। हालाँकि, इस बयान के बाद पियूष गोयल को जमकर निशाना बनाया गया।

हालाँकि, आज मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान पीयूष गोयल ने सार्वजनिक मंच से अपने बयान में हुई गलती को स्वीकार कर लिया और आइंस्टीन के ही एक वक्तव्य को दोहराते हुए कहा- “जिस व्यक्ति ने कभी गलती नहीं की, उसने कभी कुछ नया करने की कोशिश नहीं की।”

@RaghuramRRajan नाम के ट्विटर अकाउंट ने अपने परिचय में लिखा भी है कि यह पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन का आधिकारिक अकाउंट नहीं है। बावजूद इसके IANS, द क्विंट और इकोनॉमिक टाइम्स से लेकर आउटलुक तक ने इस झूठी खबर को प्रकाशित किया।

बाद में ABP न्यूज़ और इकोनॉमिक टाइम्स ने इस खबर को डिलीट भी किया। लेकिन प्रोपगेंडा वेबसाइट द क्विंट ने बेहद होशियारी से अपनी ही खबर का फैक्ट चेक कर के सारा आरोप समाचार एजेंसी IANS के सर फोड़ कर खुद को दोषमुक्त कर दिया।

फर्जी ट्विटर अकाउंट से रिपोर्ट बनाने के बाद क्विंट द्वारा शेयर की गई न्यूज़-

सच्चाई सामने आने के बाद फैक्ट चेकर बन गया द क्विंट-


इसके बावजूद भी यह खबर सच मानकर कई मीडिया चैनल्स द्वारा शेयर की जा रही है।

हाउसिंग प्रोजेक्ट्स को ₹20,000 करोड़ की सौगात, अर्थव्यवस्था में दिखे सुधार के संकेत

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आर्थिक मंदी की ख़बरों के बीच तीसरी बार प्रेस कॉन्फ्रेंस को सम्बोधित किया। उन्होंने हाउसिंग और एक्सपोर्ट सेक्टर के लिए कई ऐलान किए। वित्त मंत्री के अनुसार, देशभर में अटके पड़े ऐसे अफोर्डेबल और मिडिल क्लास हाउसिंग प्रोजेक्ट जो एनपीए नहीं हैं, दिवालिया अदालत में नहीं हैं और जिनकी पॉजिटिव नेटवर्थ है, उन्हें स्पेशल विंडो के जरिए सरकार मदद प्रदान करेगी। इसके लिए फंड तैयार किया जाएगा, जिसमें सरकार 10 हज़ार करोड़ रुपए का योगदान देगी।

बैंकों के विलय और विदेशी निवेशकों को राहत के बाद अब सरकार ने एक्सपोर्ट्स को बढ़ावा देने के लिए क़दम उठाए हैं। वित्त मंत्री ने कहा कि महंगाई दर नियंत्रण में है। आरबीआई को खुदरा महंगाई दर 2% से 6% के दायरे में रखने का लक्ष्य दिया गया है। फिलहाल यह 4% से बहुत नीचे है। अगस्त में खुदरा महंगाई दर 3.21% रही। सीतारमण ने कहा कि औद्योगिक उत्पादन और निवेश में सुधार के संकेत स्पष्ट दिख रहे हैं। बैंकों की ओर से नकदी प्रवाह बढ़ाने के इंतजाम किए जा रहे हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे अंतरराष्ट्रीय बाजार की मंदी के प्रभाव से निपटने लिए सरकार ने आज निर्यात और रियलटी बाजार को बड़ा पैकेज देते हुए निर्यातकों को राहत देने के लिए 50 हजार करोड़ रुपए छूट देने तथा आवासीय क्षेत्र के लिए लगभग 20 हजार करोड़ रुपए का कोष बनाने की घोषणा की। पूरे देश में मेगा शॉपिंग फेस्टिवल आयोजित किए जाएँगे।

वित्त मंत्री ने जानकारी देते हुए कहा कि सरकार ने अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कई बड़े क़दम उठाए हैं और इन्हें लागू करने का काम शुरू हो चुका है। उन्होंने कहा कि निर्यात बढ़ाने के लिए विदेश व्यापार नीति 2015-20 में घोषित की गयी ‘बाजार आधारित निर्यात छूट योजना’ (एमईआईएस) को वापस लेने का फ़ैसला लिया गया है। अब इसके स्थान पर नयी योजना ‘रिमिशन ऑफ डयूटीज – टेक्सेस ऑन एक्सपोर्ट प्रोडक्ट’ (रोडटेप)) लागू होगी।

निर्मला सीतारमण ने कहा कि एमईआईएस तथा अन्य योजनाओं का लाभ निर्यातकों को इस वर्ष 31 दिसंबर तक मिलता रहेगा। अगले वर्ष एक जनवरी से नयी योजना लागू हो जाएगी। नई योजना में दो प्रतिशत तक की छूट कपडा और हस्तशिल्प के अलावा अन्य निर्यातित वस्तुओं पर भी मिलेगी। इससे सरकार पर 50 हजार करोड़ रुपए का भार पड़ने का अनुमान है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि किफायती और मध्यम आय वर्ग के मकानोें के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। इस क्षेत्र के लिए एक विशेष व्यवस्था उपलब्ध कराई जाएगी। सरकार का ध्यान अधूरी निर्माण परियोजनाओं को पूरा करने पर है। इसके लिए सरकार 10 हजार करोड़ रुपए के एक कोष का निर्माण करेगी जिसमें इतनी ही राशि निजी क्षेत्र से जुटायी जाएगी। इस तरह से इस कोष में 20 हजार करोड़ रुपए की राशि उपलब्ध होगी।

सियासत का स्वामी: जिसके कारण गॉंधी कठघरे में आए, वाजपेयी गए और रामसेतु बचा

आज भारतीय राजनीति में अगर कोई एक अतरंगी किरदार है जिसे समझ पाना, खाँचे में फिट कर पाना मुश्किल है, तो वह हैं भाजपा के राज्य सभा सांसद और नेशनल हेराल्ड से लेकर, रामसेतु, 2G स्पेक्ट्रम जैसे मसलों के याचिकाकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी। खुद को हिंदुवादी बताने वाले स्वामी न तो वाजपेयी सरकार गिराने से चूके और न हाशिमपुरा हत्याकांड में बेगुनाह समुदाय विशेष के पक्ष में अदालत में खड़े होने से। राजीव गाँधी को मित्र बताया लेकिन उनकी पत्नी सोनिया गाँधी और बेटे राहुल गाँधी को कानून के कठघरे में खड़ा करने से संकोच नहीं किया।

वे समलैंगिकता को अपराध नहीं मानते हैं, लेकिन जेनेटिक बीमारी मानते हुए उसके सार्वजनिक प्रदर्शन की आज़ादी का विरोध करते हैं। IIT दिल्ली से बरसों कानूनी जंग लड़कर प्रोफ़ेसरशिप पाई और अगले ही दिन इस्तीफ़ा देकर बकाया वेतन के लिए नया मुकदमा ठोंक दिया (और जीता भी)। वे मोदी के प्रधानमंत्रित्व के सबसे बड़े समर्थक माने जाते हैं, फिर भी उन्होंने चुनाव के ठीक पहले सरकार को चेतावनी दी कि अगर राम मंदिर के रास्ते में कोई अड़चन डाली, तो वे सरकार गिरा देंगे।  

“प्रधानमंत्री बनोगे?” 

बकौल सुब्रमण्यम स्वामी, चंद्रशेखर सरकार का बनना कोई बहुत बड़ी ‘रॉकेट साइंस’ नहीं थी। उनके अनुसार उसकी नींव संसद की बेंच पर ‘ऐंवई’ हुए वार्तालाप में पड़ी थी, जब चंद्रशेखर ने कहा कि उन्हें नहीं लगता प्रधानमंत्री बनना इस जीवन में हो पाएगा। स्वामी बताते हैं कि उन्होंने चंद्रशेखर से पूछा कि क्या चंद्रशेखर उन्हें अपनी सरकार में वित्त मंत्री बनाएँगे। उनके हाँ कहने पर (हालाँकि बाद में बनाया नहीं) स्वामी ने राजीव गाँधी को चंद्रशेखर सरकार के बाहरी समर्थन के लिए मनाया। 

“RSS-पति” सुब्रमण्यम स्वामी  

हार्वर्ड के सबसे कम उम्र के पीएचडी धारकों में शुमार सुब्रमण्यम स्वामी की पत्नी का नाम रॉक्सना सुब्रमण्यम स्वामी है। उनके नाम का “RSS” बनाकर स्वामी अक्सर मज़ाक करते हैं कि संघ के आधिकारिक सदस्य कभी न रहने के बावजूद वे भी RSS के ही हैं। स्वामी तमिल ब्राह्मणों की अय्यर जाति से ताल्लुक रखते हैं और पिता के वामपंथी होने के बावजूद कभी भी वामपंथी राजनीति के प्रति आकर्षित नहीं हुए। जिस समय वे IIT-दिल्ली से मुकदमा लड़ रहे थे, उसी बीच वे उसी संस्थान के निदेशक भी रहे। 2011 तक उन्होंने हार्वर्ड में ग्रीष्म सत्र में अर्थशास्त्र पढ़ाया है। 

वाजपेयी सरकार गिरवाने में अहम भूमिका  

स्वामी के जहाँ सबसे बड़े समर्थक हिंदूवादी हैं, वहीं उनका सबसे बड़ा विरोध भी उन्हीं कोनों से आता है। विरोधी पूछते हैं कि इतने बड़े हिंदूवादी ने पहली हिंदूवादी सरकार कैसे गिरवा दी। कहा जाता है कि स्वामी की  चाय पार्टी पर ही वाजपेयी की 13 महीने की सरकार को गिराने की पटकथा लिखी गई थी। उनके हिंदूवादी विरोधी उस समय संघ के लिए इस्तेमाल कटु-शब्दों को भी याद रखे हुए हैं। 

वहीं, स्वामी-समर्थक इन बातों को विशुद्ध रूप से राजनीतिक और पुरानी बात बताते हैं और गिनाते हैं कि कैसे रामसेतु के पक्ष में केंद्र की कॉन्ग्रेस/संप्रग और तमिलनाडु की द्रमुक सरकार से स्वामी अदालत में न केवल भिड़े, बल्कि रामसेतु को बचा भी लाए, कैसे उन्होंने तारकेश्वर मंदिर में ममता बनर्जी से मिलकर फिरहाद हकीम को मंदिर बोर्ड का अध्यक्ष बनवाए जाने का निर्णय पलटवा दिया।  

अल्पसंख्यकों पर सावरकर की लाइन, फिर भी हाशिमपुरा के पैरोकार  

स्वामी समुदाय विशेष के उन लोगों से नागरिकता और मताधिकार छीन लेने की वकालत करते हैं, जो भारत को अपना ही नहीं, अपने पूर्वजों का भी देश आधिकारिक तौर पर नहीं मान लेते। उनके मुताबिक समुदाय विशेष के जो लोग खुद को भारतीयों का, हिन्दुओं का वंशज नहीं मानते और अरबी-तुर्की पूर्वजों पर ‘गर्व’ से इतराते हैं, वे हिन्दुओं की हत्या और उनके धर्म को खत्म करने की कोशिश करने वालों पर इतरा रहे हैं और ऐसी मानसिकता के लोगों को मताधिकार देने के लिए हिन्दू और भारत बाध्य नहीं है। यह विचार बहुत कुछ ‘हिंदुत्व’ की सावरकर की परिभाषा (“आस्था या पंथ नहीं, बल्कि जो भी भारत की अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है, वह हिन्दू है”) से मिलता-जुलता है।

उनके ऐसे ‘उग्र’ हिन्दूवाद को देखते हुए लोगों को आश्चर्य होता है, जब पता चलता है कि दूसरे मजहब विशेष के बेगुनाह लोगों के 1987 के हाशिमपुरा हत्याकांड में स्वामी ने न्याय की लड़ाई लड़ी थी। उनका आरोप है कि तत्कालीन गृह राज्य मंत्री पी. चिदम्बरम की इस हत्याकांड में भूमिका की जाँच होनी चाहिए।

जेटली, वाजपेयी से 36 का आँकड़ा

स्वामी का भाजपा के दो कद्दावर नेताओं अरुण जेटली और भाजपा के शलाका-पुरुष व पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी से 36 का आँकड़ा रहा है। उन्होंने कभी इस बात को न छिपाया, न नकारा। उन्होंने वाजपेयी पर मोरारजी सरकार को गिराने के लिए चरण सिंह को उकसाने के अलावा अपने (स्वामी के) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच गलतफहमियों का सर्वप्रमुख कारण होने का इल्ज़ाम लगाया।

स्वामी की पत्नी रॉक्सना तो यहाँ तक दावा करतीं हैं कि वाजपेयी ने जनसंघ से भाजपा का निर्माण करने के समय स्वामी को उसका सदस्य स्वीकार करने से साफ़ मना कर दिया था। साथ ही स्वामी वाजपेयी-नरसिम्हा राव की सरकारों की चुनावी हार का उदहारण अपने इस दावे के सबूत के तौर पर देते हैं कि केवल आर्थिक-विकासवादी राजनीति कर, चाहे वह कितनी भी अच्छी क्यों न हो, जनता को अपनी तरफ़ नहीं किया जा सकता। उसके साथ भावनात्मक अपील का पुट होना जरूरी है।

जेटली से स्वामी की नाराज़गी का उद्गम 2014 के लोकसभा चुनावों को माना जाता है। स्वामी की अध्यक्षता में जनता पार्टी के भाजपा में विलय के बाद से उनके नई दिल्ली लोकसभा सीट पर उम्मीदवार बनने की चर्चा थी, लेकिन अंत में ऐसा हुआ नहीं। माना जाता है कि स्वामी ने इसका ज़िम्मेदार अरुण जेटली को ठहराया और मोदी सरकार के 5 सालों में शायद ही किसी ने जेटली या उनके किसी विभाग के बारे में स्वामी के मुख से तारीफ़ के दो बोल सुने हों।

राजन अर्थव्यवस्था में ‘टाइम बम’ लगा गए हैं’

आज अर्थव्यवस्था पर जिस तरह के बादलों का ग्रहण लगा है, सुब्रमण्यम स्वामी पिछले 3-4 सालों से (2015-16) उसके बारे में चेतावनी दे रहे थे। हालाँकि उन्होंने कभी इसके लिए मोदी सरकार की खुद की नीतियों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया, लेकिन हमेशा कहते रहे कि पिछली सरकार और RBI के पूर्व प्रमुख रघुराम राजन अर्थव्यवस्था में ‘टाइम बम’ लगा गए हैं, जो ज़रूर फटेंगे और भारत मंदी में जरूर डूबेगा। इस ‘धमाके’ का उनका अनुमान भले ही गलत निकला (उन्होंने जीडीपी ग्रोथ 5% तक डूबने के लिए अधिकतम 2017 तक का समय बताया था, जबकि यह हो 2019 में रहा है) लेकिन बाकी हर लिहाज से वह सही बैठे।

अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए स्वामी जो उपाय बताते हैं, वे भी आसानी से लोगों के गले उतरने वाले नहीं हैं। वे सरकार की राजस्व आय में बड़ा हिस्सा रखने वाले आयकर को खत्म करने की सलाह देते हैं, और उसकी जगह एक न्यून प्रतिशत टैक्स ‘उपभोग टैक्स’ या हर बैंकिंग ट्रांजैक्शन टैक्स के तौर पर लगाने की वकालत करते हैं। इसके पीछे उनका तर्क है कि हाथ में अधिक पैसा होने पर लोग अधिक खर्च करेंगे और सरकार फिर लोगों की आय और बचत की बजाय खर्च पर कर लगा सकती है।

उनके द्वारा सार्वजनिक रूप से सुझाए गए अन्य उपायों में कर्ज की दरों को गिराने और फिक्स्ड डिपॉज़िट पर अधिक ब्याज देने, RBI की स्वायत्ता पर लगाम लगाने जैसे और भी विवादास्पद उपाय शामिल हैं, जिनपर आम लोगों ही नहीं, अर्थशास्त्रियों को भी शंका होती है।

कानून के जानकार

स्वामी का आधिकारिक रूप से कानून का डिग्री धारक न होना उन्हें हैरत में डाल देता है, जिसने उन्हें कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, हाल ही में दिवंगत हुए राम जेठमलानी जैसे वकीलों से बहस करते हुए देखा है। हालाँकि अधिकांश मामलों में उनके अदालती वकील के तौर पर पत्नी रॉक्सना स्वामी या उनकी कानूनी टीम उनका प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन स्वामी खुद क़ानूनी पहलुओं का अध्ययन भी करते हैं और सार्वजनिक बहसों में भी ज़्यादातर कानूनी तर्कों के आधार पर ही बात रखते हैं।

“मैं ‘मजदूर’ लगा लेता हूँ”

मोदी सरकार के साथ स्वामी के रिश्ते के लिए झगड़ालू लेकिन वफ़ादार पत्नी से बेहतर उपमा नहीं हो सकती। जब किसी और पार्टी की बात नहीं हो रही होती तो वे न केवल मोदी सरकार को अपने अन्य मुद्दों पर बयान से मुसीबत में फँसा देते हैं, बल्कि कभी-कभी तो खुद विपक्ष की तरह सरकार को घेरने में लग जाते हैं। यहाँ तक कि 2019 में मोदी के दोबारा सत्ता में आने के बाद एक बार फिर वित्त मंत्री के लिए अपनी अनदेखी होने पर उन्होंने लिखा, “मुझे अपने नाम में ‘चौकीदार’ तो नहीं लेकिन ‘मजदूर’ अवश्य लगा लेना चाहिए। अदालत में केस लड़-लड़कर ‘इमारत’ मैं बनाता हूँ लेकिन मुझे ही उसमें रहने के लिए लक्ज़री अपार्टमेंट (मंत्रिपद) नहीं मिलता। कृष्ण ने यह महाभारत के बाद अर्जुन को समझाया था।”

स्वामी का इशारा इस तथ्य की ओर था कि भाजपा और मोदी कॉन्ग्रेस को जिन मामलों में कठघरे में खड़ा कर रहे थे (2G घोटाला, नेशनल हेराल्ड, राम मन्दिर मामले में कपिल सिब्बल का फैसला रुकवाने का खुल्लम-खुल्ला प्रयास), उनमें मुकदमा दायर कर लड़ने वाले स्वामी ही थे- उन्हीं के प्रयासों से सोनिया-राहुल को नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत लेनी पड़ी और मोदी-भाजपा ने कहना शुरू कर दिया कि कॉन्ग्रेस का राजपरिवार ‘bail-गाड़ी’ पर है।

विपक्ष की दुर्गति को देखते हुए उन्होंने कॉन्ग्रेस से ‘इतालवियों’ को हटाने के बाद एनसीपी-तृणमूल का कॉन्ग्रेस में विलय कर लोकतंत्र के हित में एक मजबूत विपक्षी पार्टी बनाने की सलाह दी और ममता बनर्जी को उसका अगुआ ‘मनोनीत’ भी कर दिया। लेकिन खुद भाजपा छोड़ विपक्ष को मजबूत करने की बात पर छटकते हुए बता दिया कि उनके लिए साफ़-सुथरी राजनीति का पर्याय भाजपा-संघ-मोदी ही हैं।

स्वामी की ‘legacy’ के आकलन में पार्टी, विचारधारा, और निष्ठा को एक ही चीज़ मानकर देखने पर वे शायद ‘मौकापरस्त’, ‘loose cannon’, ‘unpredicatable’ आदि वे सभी चीजें नज़र आएँगे, जो उनके विरोधी उन्हें कहते हैं। लेकिन किसी नेता को आंकने के पैमाने के तौर पर उसके कर्म उसके शब्दों से अधिक सटीक होते हैं, क्योंकि राजनीति कुछ बोलने और कुछ और ही करने का पर्याय बन गई है- शायद राजनीति का स्वभाव ही यही है और शायद इसीलिए स्वामी के बयानों में तमाम विरोधाभास मिलते हैं।

लेकिन डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी के कर्म हमेशा से हिन्दू-हित, दक्षिणपंथी/मुक्त-बाज़ार अर्थव्यवस्था, और उदारवादी (असली अर्थों में, “लिबरल” का मुलम्मा ओढ़कर घोर असहिष्णुता फ़ैलाने वाले धूर्तों की तरह नहीं) लोकतान्त्रिक राजनीति की दिशा से शायद ही इधर-उधर फिरते दिखें। शायद इसीलिए अपनी खुद की इसी भ्रामक ‘legacy’ को ध्यान में रखकर गीता और महाभारत को बार-बार पढ़ने वाले और भगवान कृष्ण को अपना पसंदीदा ‘हीरो’ मानने वाले स्वामी बताते हैं कि वह खुद भी लोगों का आकलन उनके शब्दों नहीं, कृत्यों से करते हैं। और किसी इन्सान को कसने के लिए उसकी खुद की तय की हुई कसौटी से कड़ी शायद ही कोई हो सकती हो!

फोन ऑफ कर गायब हुए ममता के क़रीबी पूर्व सीपी राजीव कुमार: CBI ने आज बुलाया था

क्या कोलकाता के पूर्व पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार फरार हो गए हैं? यह सवाल हम नहीं पूछ रहे बल्कि सीबीआई भी इसकी तह तक जाने में लगी है। सीबीआई ने राजीव को शनिवार (सितम्बर 14, 2019) को पेश होने के लिए समन जारी किया था। राजीव कुमार ने समन को धता बताते हुए सीबीआई के समक्ष अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई। सीबीआई अधिकारियों का कहना है कि शारदा चिट फंड घोटाले में आरोपित राजीव कुमार का फोन भी स्विच ऑफ है।

बता दें कि ये वही राजीव कुमार हैं, जिन्हें गिरफ़्तार करने गई सीबीआई के काम में कोलकाता पुलिस ने बाधा पहुँचाई थी। बंगाल पुलिस ने उल्टा सीबीआई अधिकारियों को ही शिकंजे में ले लिया था। इसके बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी के तमाम नेताओं के साथ धरना दिया था और केंद्र सरकार पर राजीव कुमार को परेशान करने का आरोप लगाया था। मामला हाईकोर्ट तक पहुँचा, जिसने राजीव कुमार को सीबीआई के समक्ष पेश होने को कहा था।

कलकत्ता काईकोर्ट ने राजीव कुमार से अपना पासपोर्ट सीबीआई को जमा कराने को कहा। हाईकोर्ट से उनकी गिरफ़्तारी पर लगी रोक ख़त्म होने के बाद शुक्रवार को कोलकाता में उनके पार्क स्ट्रीट स्थित आवास पर सीबीआई की टीम पहुँची लेकिन वह नहीं मिले। हाईकोर्ट ने कहा था कि सीबीआई जब चाहे तब उन्हें पूछताछ के लिए बुला सकती है। सीबीआई द्वारा उन्हें गिरफ़्तार किए जाने की भी आशंका है, लेकिन एजेंसी इसका निर्णय इस आधार पर लेगी कि वह जाँच में सहयोग करते हैं या नहीं

सीएम ममता बनर्जी ने अपने क़रीबी पुलिस अधिकारी का बचाव करते हुए कहा कि वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पुलिस अधिकारियों में से एक हैं। ममता ने कहा कि राजीव कुमार की वीरता, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा सवालों से परे है। उन्होंने उन पर लगे आरोपों को झूठा बताया। राजीव कुमार पर आरोप है कि उन्होंने सबूतों से छेड़छाड़ कर शारदा चिट फंड घोटाले में फँसे आरोपितों को बचाने की कोशिश की। इस मामले में तृणमूल के कई नेता भी आरोपित हैं।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही राजीव कुमार के ख़िलाफ़ सीबीआई के आरोपों को गंभीर बता चुकी है। राजीव कुमार राज्य सरकार द्वारा गठित उस स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम का हिस्सा थे, जो शारदा चिट फंड घोटाले की जाँच कर रही थी।

मॉब लिंचिंग के डर से शिवलिंग पर पेशाब करने का दावा करने वाले प्रोफेसर ने ली आपातकालीन छुट्टी

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर बहाना बनाकर किसी दुर्घटना की आशंका के डर से अनिश्चितकालीन छुट्टी पर चले गए हैं। हिस्ट्री डिपार्टमेंट में 40 वर्षीय दलित असिस्टेंट प्रोफेसर विक्रम हरिजन ने कहा कि अगस्त में वायरल हुए एक वीडियो में कुछ टिप्पणियों को लेकर पिछले दिनों कैंपस के छात्रों के समूह ने उनका घेराव किया था और उन्हें धमकी दी थी, जिसके बाद वो ‘मॉब लिंचिंग’ का डर बताकर आपातकालीन छुट्टी पर चले गए। 

यूनिवर्सिटी के प्रशासन ने वायरल हुए इस वीडियो में कथित रूप से आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर असिस्टेंट प्रोफेसर विक्रम को एक कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है, जिस पर प्रोफेसर ने अभी तक जवाब नहीं दिया है। वहीं, छात्र संगठन एबीवीपी ने भी इस वीडियो को लेकर प्रोफेसर विक्रम के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज करवाई है।

प्रोफेसर विक्रम के खिलाफ शिकायत करने वालों का आरोप है कि वायरल हो रहे वीडियो में विक्रम ने कथित रूप से हिंदू देवताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की है। पिछले महीने वायरल हुए वीडियो में हरिजन को यह दावा करते हुए देखा जा सकता है कि वो अपने पैतृक गाँव में अपने कुछ दोस्तों के साथ मंदिर गए और वहाँ उन्होंने शिवलिंग पर पेशाब कर दिया।

हरिजन ने कहा कि लोगों में अंधविश्वास है कि अगर वे देवताओं का अनादर करेंगे तो कुछ बुरा होगा। उसने यही दिखाने के लिए कि कोई भी देवता उसे नुकसान नहीं पहुँचा सकता, उसने शिवलिंग पर पेशाब कर दिया। मगर उसके साथ कुछ भी बुरा नहीं हुआ, वह सामान्य जिंदगी जी रहा है।

वीडियो वायरल होने के बाद, विक्रम हरिजन ने दावा किया कि वीडियो को पीएचडी के एक छात्र रंजीत सरोज ने दुश्मनी के कारण उन्हें बदनाम करने के लिए अपलोड किया था। 20 अगस्त को वायरल हुए 2.3 मिनट के वीडियो को लेकर विक्रम का कहना है कि यह वीडियो दो साल पुराना 14 अप्रैल, 2017 का है और इसमें डॉक्टर बीआर अंबेडकर की जयंती के दौरान दिए गए भाषण के कुछ हिस्सों को दिखाया गया है।

इस मौके पर कैंपस के बाहर एक छोटा सा मिलन समारोह रखा गया था, जिसमें उन्होंने यह समझाने के लिए एक घटना का जिक्र किया था कि कड़ी मेहनत के साथ आगे बढ़ा जा सकता है। भाग्य पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उनका कहना है कि वो अपने बयान के माध्यम से ‘विचार’ को बढ़ावा देना चाहते थे।

बाद में एक ब्लॉग-पोस्ट भी सामने आया था, जहाँ यह दावा किया गया था कि डॉ विक्रम हरिजन लंबे समय से अपने पीएचडी छात्र रंजीत सरोज को परेशान कर रहे थे और उन्होंने उससे पैसे भी लिए थे। ब्लॉग पोस्ट में दावा किया गया है कि विक्रम हरिजन, सरोज को विरोध प्रदर्शन करने और अपने उच्च जाति प्रतिद्वंद्वियों को बदनाम करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

पोस्ट के अनुसार, जब सरोज ने उनकी गतिविधियों का हिस्सा बनने पर आपत्ति जताई, तो विक्रम हरिजन ने उन्हें धमकी दी थी कि वह उसका करियर बर्बाद कर देंगे। हालाँकि, हम ब्लॉग पोस्ट द्वारा किए गए दावों को सत्यापित नहीं कर सके।

इस महीने की शुरुआत में द हिंदू से बात करते हुए, विक्रम हरिजन ने दावा किया था कि वीडियो रणजीत सरोज द्वारा अपलोड किया गया था, क्योंकि सरोज की उनके प्रति व्यक्तिगत दुश्मनी है और वह उन्हें उनकी ‘औकात’ दिखाना चाहता है। दोनों ही अनुसूचित जाति के हैं। विक्रम का कहना है कि सरोज ‘पासी’ है और वह सोचता है कि वो उसकी जाति उनसे (विक्रम हरिजन) से बेहतर है।

हालाँकि, सरोज ने विक्रम हरिजन के दावों का खंडन करते हुए कहा था कि उसने वीडियो इसलिए अपलोड किया था, क्योंकि वह विक्रम हरिजन द्वारा बार-बार उत्पीड़न और हिंदू देवताओं के अपमान से व्यथित था। सरोज ने कहा था कि भारत का संविधान सभी को समान अधिकार देता है और किसी को भी इस तरह धर्म का अपमान नहीं करना चाहिए।

वहीं, इस मामले में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के मुख्य प्रॉक्टर आरएस दुबे ने कहा कि अगर डॉ विक्रम हरिजन अपनी जान की सुरक्षा के लिए चिंतित हैं, तो उन्हें पुलिस की मदद लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में शिक्षक संघ के अध्यक्ष के रूप में, वे एक शिक्षक द्वारा की गई धार्मिक बातों के खिलाफ इस तरह की अपमानजनक टिप्पणी की निंदा करते हैं।

2 बच्चों की अम्मी अनीशा ने प्रेमी क़सीम संग मिल कर शौहर गयूर का गला रेता, सऊदी भागने की थी तैयारी

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में रिश्तों को तार-तार करने का मामला सामने आया है। एक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर शौहर की हत्या की साज़िश रची। 2 बच्चों की माँ होने के बावजूद महिला द्वारा ऐसा करना क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोपित महिला का नाम अनीशा है, जिसे गिरफ़्तार कर लिया गया है। अनीशा ने अपने प्रेमी क़सीम के साथ मिल कर पति गयूर अहमद का गला रेत डाला। गयूर अभी जिला अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है।

मामला डिलारी थाना क्षेत्र के बुढ़नपुरगाँव का है। गयूर अहमद की शादी अनीशा ने 7 वर्ष पहले हुई थी। उनके दो बच्चे भी हैं, जिनका नाम वसीम और फहीम है। इसी दौरान अनीशा को पड़ोस में रहने वाले क़सीम से प्यार हो गया। क़सीम सऊदी में कारपेंटर का काम करता था। वह गाँव आता-जाता रहता था और वारदात के समय भी वह गाँव में ही था। पहले तो वह अनीशा से चोरी-छिपे मिलता था, लेकिन बाद में उनका खुलेआम मिलना-जुलना चालू हो गया।

अनीशा के पति गयूर को जब इसकी भनक लगी तो उसने पत्नी को समझाया। अनीशा के प्रेम सम्बन्ध के कारण घर में भी विवाद होता रहता था। अनीशा ने न सिर्फ़ पति की बात पर ध्यान देने से इनकार कर दिया बल्कि प्रेमी क़सीम के साथ मिल कर उसे मार डालने की योजना भी तैयार की। अनीशा ने बड़ी चालाकी से गयूर के खाने में नशीला पदार्थ मिला दिया, जिससे वह बेहोश हो गया। इसके बाद उसने अपने प्रेमी क़सीम को कॉल कर घर पर बुलाया।

क़सीम ने अनीशा के घर पहुँच कर उसके बेहोश पति गयूर के गर्दन पर धारदार हथियार से वार किया। हालाँकि, गयूर तब तक हल्का-हल्का होश में आ रहा था और उसकी चीख-पुकार सुन कर पड़ोस के लोग भी दौड़े आए। पड़ोसियों ने जब माजरा देखा तो क़सीम को दबोच लिया और उसकी पिटाई की। हालाँकि, वह किसी तरह अंधेरे का फायदा उठा कर भागने में सफल रहा। अनीशा को पुलिस ने शिकंजा में ले लिया है, वहीं क़सीम की गिरफ़्तारी के लिए दबिश दी जा रही है।

दोनों आरोपित गयूर की हत्या कर के सऊदी भागने की फ़िराक में थे। जब क़सीम ने गयूर के गले पर वार किया, तब उसकी बीवी अनीशा उसके मुँह दबाए हुई थी ताकि उसके गले से चीख न निकले। अनीशा ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि उसका पति शराब पीकर मारपीट करता था और पैसे माँगने पर नहीं देता था, इसीलिए उसने मजबूरी में यह क़दम उठाया। वह पिछले 1 महीने से अपने पति को मारने की योजना बना रही थी।

कॉन्ग्रेस राज में चमचमाने वाला राज ठाकरे बल्ब फ्यूज, चुनावी राजनीति से तौबा करने के दिए संकेत

कॉन्ग्रेस राज में उभरने वाले राज ठाकरे की राजनीतिक दुकान अब बंद होने के कगार पर पहुॅंच चुकी है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के सुप्रीमो ने लोकसभा चुनाव की तरह ही विधानसभा चुनाव भी नहीं लड़ सकती है। ईवीएम से छेड़छाड़ की आशंका और फंड की कमी का हवाला दे राज ठाकरे ने इसके संकेत दिए हैं। ईवीएम का बहाना उन्होंने आम चुनावों में भी बनाया था।

चाचा बाल ठाकरे से राजनीति के दॉंव-पेंच सीखने वाले राज ने मार्च 2006 में शिवसेना छोड़ मनसे का गठन किया था। फरवरी 2008 में मुंबई में उनके कार्यकर्ताओं ने जमकर गुंडई दिखाई थी। उत्तर भारतीयों को निशाना बनाया गया था। उस समय केंद्र और महाराष्ट्र दोनों जगहों पर कॉन्ग्रेस की सरकार हुआ करती थी और राज खूब दहाड़ते थे। 2014 के आम चुनावों से पहले उन्होंने मोदी के भी कसीदे पढ़े थे। लेकिन, भाव नहीं मिलने के बाद उनके खिलाफ खूब जहर उगला। नतीजतन, 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी का खाता तक नहीं खुला।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राज ठाकरे की चुनावी राजनीति से दिलचस्पी इस कदर कम हो गई है उन्होंने पार्टी के नेताओं को सलाह दी है कि देश की इकॉनामी ठीक न होने के कारण आगामी विधानसभा चुनाव से उन सबको दूर रहना चाहिए। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में जो तर्क दिए हैं वो उनके ही पार्टी के नेताओं के गले के नीचे नहीं उतर रही है। इससे पार्टी नेताओं का एक बड़ा वर्ग नाराज बताया जा रहा है।

राज ठाकरे ने चुनाव नहीं लड़ने के संकेत अपने घर पर पार्टी नेताओं की बैठक में दिए। बैठक आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी की दिशा एवं रणनीति पर चर्चा के लिए थी। कुछ नेताओं ने कहा कि चुनाव लड़ना चाहिए तो कुछ ने इसके खिलाफ अपनी राय रखी। इसके बाद राज ठाकरे ने अगली बैठक में अपना निर्णय सुनाने की बात कही। हालाँकि मंदी का हवाला देकर चुनाव से दूर रहने की सलाह देकर उन्होंने बता दिया कि उनके मन में क्या चल रहा है।

फंड हासिल करना मुश्किल है’

राज ठाकरे ने बैठक में कहा, “देश की खराब आर्थिक हालत को देखते हुए अपने पैसे संभाल कर रखिए और सोच समझ कर खर्च कीजिए। EVM पर होने वाले चुनाव निष्पक्ष नहीं होंगे। अगर पार्टी ने चुनाव मैदान में उम्मीदवार उतारे तो फंड हासिल करना मुश्किल होगा।”

राज ठाकरे की अध्यक्षता वाली पार्टी की हालात कितनी नाजुक चल रही है, इस बात का अंदाजा मनसे (MNS) नेताओं द्वारा बैठक में दिए गए बयान से लगाया जा सकता है। इस बैठक में कुछ नेताओं ने कहा, “चुनाव लड़ने में करोड़ों रुपए डालकर अगर हारना ही है, तो चुनाव लड़ने से क्या फ़ायदा? बीजेपी का ईवीएम के जोर पर सत्ता में आना तय है तो ऐसे में चुनाव लड़ने का निर्णय सही नहीं होगा।”

हिन्दी दिवस: एक भाषा ज़्यादा सीख लेने से संस्कृति कैसे बर्बाद होती है?

भारत में लगभग 19,500 मातृभाषाएँ हैं। मातृभाषा यानी वह भाषा जो बच्चे अपनी माँ से सीखते हैं। कुल 121 ऐसी भाषाएँ हैं जिन्हें 10,000 से ज्यादा लोग बोलते हैं। इसमें से 22 ऐसी भाषाएँ हैं जिन्हें भारत की 96% से ज्यादा जनता बोलती है। लगभग एक चौथाई लोग दो भाषाएँ बोल सकते हैं, और 7% को तीन भाषाएँ आती हैं। शहरी युवाओं की बात करें तो आधे लोग दो भाषाएँ जानते हैं, और 18% तीन।

हर राज्य में अपनी भाषाएँ हैं, कुछ में एक तो कुछ में एक से ज्यादा। इसका मतलब क्या है? मतलब यह है कि भाषाएँ बहुत हैं, लोग भी बहुत हैं और इन्हीं भाषाओं की विविधता, सांस्कृतिक विरासतों के कारण राज्यों का बँटवारा हुआ था। एक भाषा-संस्कृति के लोग, एक राज्य को अपना मान कर, अपनी छोटी-छोटी संस्कृतियों को सहेजते हुए, भारत की चलायमान सभ्यता के सहभागी बने।

जब राष्ट्र इतना विविध हो, तो जाहिर है कि संवाद के लिए किसी एक भाषा की जरूरत पड़ेगी। उत्तर भारत में हिन्दी की छतरी के नीचे आने वाली भाषाओं के केन्द्र में एक ही तरह का व्याकरण और शब्दावलियाँ हैं। तो लोग, एक दूसरे को आसानी से समझ लेते हैं।

फिर राजनीति आ गई पिक्चर में और भारत की भाषाई विविधता को ऐसे दिखाया गया मानो ये सभ्यताओं का महायुद्ध चल रहा हो। नेताओं को सत्ता से मतलब होता है, नागरिकों की बेहतरी से नहीं। यही कारण है कि ‘हिन्दी थोपना बंद करो’ जैसी बातें सामने आईं।

हमारा पूरा जीवन अंग्रेजी सीखने और एक्सेंट पकड़ने में चला जाता है। अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाया, लूटा, नरसंहार किए और उसकी भाषा हमने सीखने में जी-जान लगा दिया, लेकिन भारत की ही एक भाषा का, दूसरे राज्यों के बोर्ड पर निर्देशों की तरह इस्तेमाल करने से वो हिन्दी थोपना हो गया, तमिल-कन्नड़-तेलुगु-मलयालम संस्कृतियों पर हमला हो गया!

मैं यह नहीं मानता कि हिन्दी सबसे महान भाषा है और सब बोलें। जी नहीं, हर भाषा किसी संयोग के कारण किसी क्षेत्र की भाषा बनती है, फिर उसमें संस्कृति के अवयव जुड़ते हैं, साहित्य उपजता है, कलाएँ जन्म लेती हैं और वो अपनी पूर्णता को प्राप्त करती है। भाषा का कार्य संस्कृति को जीवित रखना है, अगली पीढ़ी तक पहुँचाना है। इसलिए चाहे वो बहुत छोटे सिक्किम की भाषा हो, या बहुत बड़े महाराष्ट्र की, दोनों ही किसी से कमतर नहीं।

हिन्दी को पूरे भारत को जोड़ने वाली भाषा के तौर पर इसलिए रखा गया कि किसी भी एक भारतीय भाषा की बात करें तो हिन्दी सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली, या समझी जाने वाली भाषा थी। इसलिए दक्षिण भारत के लोगों के लिए एक भाषा सीखना एक सहज उपाय था, ताकि वो कभी उत्तर भारत जाएँ, या उत्तर वाले दक्षिण जाएँ तो आपस में संवाद स्थापित हो सके।

इससे ज्यादा और कुछ भी नहीं। आप सोचिए कि हिन्दी जानने से आपकी संस्कृति कैसे प्रभावित हो रही है? अगर यह कहा जाए कि तुम तेलुगु छोड़ दो, और हिन्दी पढ़ो; तमिल में लिखे सारे निर्देश हटा कर तमिलनाडु में सिर्फ हिन्दी में निर्देश लिखे जाएँगे; कन्नड़ में अब नाटक या फिल्म नहीं बनेंगे, हिन्दी में ही सब होगा; मलयालम की किताबों को जला दो और हिन्दी अनुवाद पढ़ाओ, तब उसे हम कहेंगे कि ‘हिन्दी थोपी जा रही है।’

हमारे देश की केन्द्र सरकार वाली नौकरियों में कई बार एक क्षेत्र के लोगों को दूसरे क्षेत्र में नौकरियाँ करनी पड़ती हैं, उनके ट्रांसफर होते हैं, उन्हें दूसरी जगहों पर लम्बे समय तक रहना पड़ता है। हमारे पास दो उपाय होते हैं: नौकरी छोड़ दें, या वहाँ के हिसाब से खुद को समृद्ध करें। वहाँ का भोजन, वहाँ की भाषा, पहनावा आदि अपनाते हुए, भारत की विविधता को स्वयं में समाहित कर लें।

ये प्रक्रिया हर वो व्यक्ति अपनाता है जो उत्तर प्रदेश का होते हुए चेन्नई में नौकरी करता है, या तमिलनाडु का होते हुए लखनऊ में जीवनयापन करता है। इसे सकारात्मक तौर पर देखते हुए, हमें समझना चाहिए कि हम एक भाषा को, एक नई संस्कृति को, अपने देश के एक अलग राज्य को अपना कह रहे हैं। ये मेरी जन्मभूमि है, ये मेरी कर्मभूमि और पूरा भारत मेरी मातृभूमि है। सिर्फ बिहार या तमिलनाडु मातृभूमि नहीं होती, भारतभूमि हमारी मातृभूमि है।

अब बात आती है कि अंग्रेज़ी को लिंक-लैंग्वेज की तरह प्रमोट करना चाहिए। दुर्भाग्य से सरकारी कार्यलयों में अंग्रेजी को यह ओहदा मिला हुआ है। दुर्भाग्य इसलिए कि भारत में कुल मिला कर पाँच प्रतिशत लोग नहीं हैं जो अंग्रेजी सही से बोल और लिख लें, लेकिन इसे सरकारी काम-काज की भाषा मान लिया गया। लोगों को इससे दिक्कत नहीं है।

इसे इसलिए रख लिया कि इससे किसी को दिक्कत नहीं होगी! ये किस तरह का तर्क है कि जो भाषा किसी को नहीं आती, या बहुत कम लोगों को आती है, उसे ही रख लो। इससे सरकारी काम-काज तो हो जाएगा लेकिन उड़ीसा के बालासोर का एक परिवार जब तमिलनाडु की सड़कों पर तमिल और अंग्रेजी में निर्देश पढ़ेगा तो उसे दोनों में एक भी समझ में नहीं आएगा। ऐसा नहीं है कि दक्षिण भारत में सब लोग अंग्रेजी समझते हैं। बिलकुल नहीं।

वहाँ के नवयुवक अंग्रेजी समझते हैं, लेकिन बड़े शहरों में ही। छोटे शहरों में स्थानीय भाषा छोड़ कर और कोई भाषा काम नहीं करती। इसलिए अंग्रेजी को बढ़ावा देना, और इस तर्क से बढ़ावा देना कि किसी को समस्या नहीं होगी तो फिर हमें नॉर्वेजियन सीखनी चाहिए, उससे पूरी दुनिया में किसी को समस्या नहीं है।

नेतागीरी और राजनीति की नकारात्मकता

बिहार के किसी गाँव में आखिर अंग्रेजी माध्यम के स्कूल क्यों हैं जहाँ न तो मैथिली भाषा है, न भोजपुरी और हिन्दी इसलिए पढ़ते हैं कि खानापूर्ति करनी है? उत्तर भारत के लोगों में अपनी ही भाषा और संस्कृति को लेकर एक हीन भावना घुसी हुई है कि वो किसी भी तरह अपने आप को अपनी भाषा से अलग करने की कोशिश करता है। वो न तो वैसा पहनावा पहनना चाहता है, न अपनी बोली बोलना चाहता है, बस उसे अंग्रेजी रॉक सुनना है और खराब अंग्रेजी बोलना है।

समस्या अंग्रेजी पढ़ने से नहीं है, समस्या इससे है कि अंग्रेजी ही सही भाषा है, भोजपुरी तो बेकार है। अगर तमिल लोगों के मन में यह भय है कि हिन्दी के आने से उनके मन में हीन भावना भर दी जाएगी कि हिन्दी महान है, तमिल कमतर, तो उनका डर सही है। लेकिन, सरकार की मंशा ऐसी नहीं रही। केन्द्र सरकार ने हिन्दी को, एक एक्सट्रा लैंग्वेज की तौर पर शामिल करने की बात कही ताकि लोगों का लोगों से जुड़ाव बन सके। पॉसिबिलिटी और प्रोबेबिलिटी के हिसाब से जो भाषा सबसे ज्यादा लोगों को समझ में आती हो, या सबसे कम लोगों को समझ में न आती हो, उसे उस समूह को सिखाने से सबका लक्ष्य सधता है।

लेकिन, फिर राजनीति कैसे होगी? फिर उत्तर बनाम दक्षिण कैसे होगा? नेताओं को एक मुद्दा चाहिए कि मराठों की नौकरियाँ बिहारी खाए जा रहे हैं, भगाओ इनको। मराठी लाठी ले कर पिल गए। उन्होंने ये भी नहीं सोचा कि सब्जी का ठेला लगाने के लिए परीक्षा नहीं पास करनी होती, फिर भी उन्होंने सब्जीवाले का ठेला उलट दिया।

दक्षिण भारत में नेताओं ने एक नकली मुद्दा उठाया, उसे खूब हवा दी, आगजनी की, दंगे और हिंसा हुई, फिर एक नाम खड़ा हो गया जिसने ‘हिन्दी’ से अपने राज्य को बचा लिया। किसी ने यह सोचा तक नहीं कि एक ज्यादा भाषा सीखने से नुकसान क्या है? जो भी इस बात को लेकर जज्बाती हो जाते हैं, उनसे पूछिए कि हिन्दी पढ़ना-लिखना आ जाएगा तो उससे तुम्हारा नुकसान क्या है? ये डर तुम्हारे मन में किसने बिठाया कि तुम्हारी संस्कृति बर्बाद हो जाएगी? अंग्रेजी पढ़ने से तो तमिल या मलयालम संस्कृति बर्बाद नहीं हुई, फिर हिन्दी से कैसे हो जाएगी?

हाँ, अगर इस शैक्षणिक बदलाव को, कोई भी नेता ऐसे भुनाता दिखे कि देखो हमने तो आंध्र प्रदेश वालों की भी हिन्दी पढ़ा दिया, अब हम सबसे महान भाषा हो गए, तो वैसे नेता को आड़े हाथों लेना चाहिए और सार्वजनिक तौर पर जलील करना चाहिए क्योंकि ये एकता को विखंडित करने की कोशिश है। जहाँ आपने एक को दूसरे से बेहतर कहने की कोशिश की, वहीं समस्या खड़ी हो जाती है।

समाधान क्या है?

समाधान यही है कि प्राथमिक विद्यालयों में, पूरे देश में, बचपन से ही तीन भाषाएँ पढ़ाई जाएँ। बच्चे एक साथ, अलग-अलग भाषाएँ सीख सकते हैं, और बहुत जल्दी भी सीखते हैं। उस भाषा का साहित्य उसके सिलेबस में हो और स्कूलों में उन राज्यों के जनजीवन को समझाने के लिए साल में एक लम्बा ट्रिप हो। वो बच्चा घर में अपनी मातृभाषा तो सीखेगा ही, उसके अलावा उसके पास भारत के दूसरे राज्यों के बारे में बचपन से जानकारी होगी, तो कहीं भी जाने पर, उसे अजनबी जैसा महसूस नहीं होगी।

आप यह सोचिए कि यहाँ जर्मन तक को केन्द्रीय विद्यालयों में पढ़ाया जाता रहा है! फिर बिहार के बच्चों को तमिल या मणिपुरी सीखने में क्या हर्ज होगा? आखिर किस राज्य के व्यक्ति को दूसरे राज्य के व्यक्ति के मुंह से, उनकी अपनी भाषा में, ‘अरे भैया, आप कैसे हैं’, ‘दीदी मुझे हनुमान मंदिर का रास्ता बता दोगी’ जैसे वाक्य सुन कर खुशी नहीं होगी?

दूसरे राज्य का व्यक्ति हमेशा इस बात को लेकर आह्लादित होता है कि कोई उसकी भाषा में बोलने की कोशिश करता है। ये तो सकारात्मक बात है, इससे ये कैसे साबित होता है कि बिहार की बच्ची तमिल सीखेगी तो वो मैथिली, मगही या भोजपुरी बोलना भूल जाएगी?

हम एक लगातार छोटी हो रही दुनिया में जी रहे हैं। हमारी खुशकिस्मती है कि हमारे देश में हर राज्य में अलग भाषाएँ हैं, अलग संस्कृतियाँ हैं। लोग हमसे जलते हैं कि इतनी विविधताओं के बावजूद यह देश बिखरता कैसे नहीं। अंग्रेजों ने इंतजार किया था कि यह देश पाँच साल भी नहीं चल पाएगा। लेकिन हम सत्तर साल से बढ़ रहे हैं। उनसे बेहतर गति से बढ़ रहे हैं। हमने अपनी विविधता का जश्न मनाया है।

अगर तमिलनाडु में किसी दुकानदार को सिर्फ ‘हलो अन्ना’ बोलने से उसकी आँखों में चमक आ जाती है, तो इस सहृदयता को बचाने की जरूरत है। हमारी पीढ़ी का दुर्भाग्य है कि हम राजनीति में उलझ कर हिन्दी और अंग्रजी, तमिल और अंग्रजी, गुजराती और अंग्रेजी, असमिया और अंग्रेजी, मलयालम और अंग्रेजी सीखने में रह गए। अंग्रेजी सीखने से गुरेज नहीं है क्योंकि वो अंतरराष्ट्रीय भाषा बन चुकी है और उसके अनेकों फायदे हैं, लेकिन अपने ही देश की भाषाओं को न सीख पाना दुर्भाग्य के सिवा कुछ भी नहीं।